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Erotica फागुन के दिन चार

komaalrani

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फागुन के दिन चार भाग ५१ - पृष्ठ ४९१

२६ नवम्बर २००८ - जुबेदा - सी एसटी


अपडेट पोस्ट हो गया है, और यह अपडेट कुछ अलग है, और इससे ज्यादा कहना शायद बहुत सी स्मृतियों के साथ अन्याय होगा।

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motaalund

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महक -अमीषा डबल का मीठा
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सेल्सगर्ल के बाहर निकलते ही महक ने मुझे अपनी बांहों में जकड़ लिया।

उसके किशोर उभार मेरी पीठ में रगड़ खा रहे थे, और वो उन्हें हल्के-हल्के दबा रही थी, रगड़ रही थी। उसकी जांघें भी अब मेरे नितम्बों को पीछे से दबा रही थी। और अगले ही पल उसके दोनों हाथ मेरे सीने पे थे, उसकी लम्बी उंगलियां, बड़े-बड़े नाखून मेरे टिट्स के आस पास टहल रहे थे, और अचानक महक ने मेरे मेल टिट्स को अपने एक लम्बे नाखून से खरोंच दिया, और साथ ही उसके होंठ मेरे गर्दन पे एक हल्की सी किस और वहां से मेरे इयर लोबस पे। एक सहलाती हुई चुम्मी।



अगर सामने वो स्टोर इंचार्ज ना खड़ी होती तो मैं मुड़कर महक को बता देता, चोट मेरे बाएं हाथ में लगी थी। बाकी अंग तो ठीक ही थे।

अमीषा उस स्टोर इंचार्ज का नाम था, और फिगर उसकी अमीषा पटेल से एक-दो नंबर बड़ी ही रही होगी, तभी शायद वो लिंगरी सेक्शन की इंचार्ज थी।

महक बोली- “अमीषा, जरा देख बेल्ट कुछ ज्यादा टाईट सी नहीं लग रही है…”

“हाँ…” वो झुक के बोली और मेरे बकल ढीले कर दिए।

क्या जबर्दस्त परफ्यूम लगाया था उस अमीषा ने, और जब झुकी तो खुलकर पूरा क्लीवेज, दोनों गोरी-गोरी गोलाइयां। मेरी तो हालत खराब। और उसी समय महक ने कसकर मेरे सीने को दबोच लिया और हल्के से दबाने लगी। मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था।

उधर उठते-उठते अमीषा ने मेरे पैंट के बल्ज को हल्के से, ….बल्की खुलकर दबा दिया और जब वो मुड़ी तो उसके लम्बे खुले लहराते बाल मेरे सीने पे छू गए। उसके नितम्ब 36+ रहे होंगे और दरार पूरी तरह दिख रही थी इतनी टाईट ड्रेस थी।



महक की जीभ की नोक अब मेरे कान के छेद में और हाथ सीधे बल्ज पे। उसने सहलाया नहीं बल्की खुलकर दबा दिया। ‘वो’ आलमोस्ट 90° डिग्री हो रहा था-

“मैंने बोला था ना की बिल दूंगी मैं। पूरी तरह। तो अभी तो बस शुरूआत है। पूरा बिल, सर्विस टैक्स एक्स्ट्रा…”

वो मेरे कान में फुसफुसा रही थी, और उसका एक हाथ मेरे बल्ज पे टिका था।

मैं समझ गया था। की वो किस ‘बिल’ की बात कर रही थी।

पता नहीं महक ने इशारा किया या अमीषा ने खुद पहल की, पीछे से महक लता की तरह चिपटी थी तो आगे से अमीषा चिपक गयी और उसकी बाहों ने महक को पकड़ कर और कस के मेरी देह पर दबोच दिया, और अमीषा एकदम खुल कर खेली खायी लगती थी और महक की राजदार भी, महक को उकसाती चिढ़ाती बोली,



" सारे बिल दे देना, कोई बचा के मत रखना "



मेरे मुंह से घिसा पिटा डायलॉग निकलते निकलते रह गया, मैं छेद छेद में भेद नहीं करता, लेकिन जवाब महक ने ही दिया,



" एकदम नहीं, घुसते ही ये चिल्ला रहे थे, बिल लाओ, बिल लाओ, अब देखती हूँ अगर ये बिना बिल लिए गए न तो इनकी, " और यह कह के अपने बस आ रहे छोटे छोटे २८ साइज के जोबन पीठ पर रगड़ दिए, लेकिन जुगलबंदी के लिए अमीषा थी न , ३४ सी साइज वाली और दोनों ओर से जोबन की चक्की चल रही थी।

जंगबहादुर की हालत खराब थी, कभी तने बल्ज के ऊपर से महक की बिच्छी की तरह डंक मारती उंगलिया तो कभी अमीषा अपने दोनों जाँघों के बीच से ही उसे रगड़ने की कोशिश करती

" और क्या पहले तो कपडे उतरवा लेंगे इनके, शर्ट और बनियान तो उतर ही गयी, पेंट की भी बेल्ट खुल गयी है तो बस उसे भी उतरा लेती हूँ " अमीषा ने चिढ़ाया और सच में मेरी ज़िप खोलने के लिए हाथ लगा दिया



अब कुछ ज्यादा हो रहा था, मैंने नहीं नहीं किया, लेकिन ढीली पेंट के पिछवाड़े अमीषा ने हाथ डाल ही दिया और नितम्बो को दबोचते बोली

" लड़कियां नहीं नहीं करती हैं तो सुनते हो तुम लोग,….. तो हम लोग क्यों सुने, क्यों महक "

" एकदम, "खिलखिला के महक बोली।



चुम्मन से पार पाना तब भी आसान था लेकिन गुंजा की इस सहेली से निबटना बहुत टेढ़ा था, लेकिन बचाया गुंजा ने ही,



तब तक गुंजा की आवाज दूर से आई- “मैंने शर्ट्स देख ली हैं। तू भी एक बार चेक कर ले…”



महक हँसकर बोली- “आती हूँ मेरी नानी…” और मुझे पुश करके सीट पे बैठा दिया।
अमीषा के तो पसेरी पसेरी के हैं...
और परफ्यूम लगा के खुला निमंत्रण....
और अमीषा और महक मिलकर दोहरा अटैक...
 

motaalund

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अमीषा
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अब मैं सीट पे और सामने अमीषा स्टूल पे अपने नेल फाइल करती हुई, मुश्कुराते हुए वो बोली- “आपकी मसल्स बहुत स्ट्रांग हैं…”



मैं भी अब फ्लर्ट करने के मूड में था, मैंने मुश्कुराकर बोला- “हाँ, सारी की सारी…”

अमीषा भी उसी अंदाज में बोल रही थी- “अब जो दिखती है मैं तो उसी के बारे में बोल सकती हूँ। हाँ जो नहीं दिखती। …” वो लगातार मेरे बल्ज को घूरे जा रही थी और जिस तरह से वो पैर पे पैर रखकर बैठी थी उसकी हाई हील्स 7-8 इंच ही दूर रही होंगी ‘उन मसल्स’ से- “खैर, अंदाज तो लगा ही सकती हूँ की वो भी स्ट्रांग होंगी…”

“आपका अंदाज और गलत…” मैंने बहुत हल्के से अपने बल्ज को उचकाते हुए कहा।

मुश्कुराकर अमीषा ने जवाब दिया की उसने सिगनल समझ लिया है। फिर वो बोली- “इनर वियर के अलावा मैं स्पा की भी इंचार्ज हूँ। मैं और वो लड़की जो बाहर गई मेरी हेल्पर है। मेनिक्योर, पेडिक्योर और ओनली फोर गर्ल्स बाडी मसाज। वी हैव सोना, जाकुजी। और मैं स्वीडिश मसाज, तांत्रिक मसाज, थाई मसाज शियात्शु। मैंने दो साल बैंगकाक के एक सैलून में काम किया है। एक साल फुकेत में। लेकिन यहाँ पे ओनली फार गर्ल्स। हाँ यू आर एक्सेप्शन…”



अमीषा उठकर खड़ी हो गई। एक प्लेट में उसने दो बड़ी कैंडल्स जलायीं। लैवेंडर की महक हवा मैंने तैर रही थी। फिर एक छोटी सी बोतल से दो बूँद तेल निकालकर अपनी उंगली के टिप्स पे लगाया और मेरे पीछे खड़ी हो गई। कैंडल के साथ उसने कोई म्यूजिक भी आन कर दिया था, रेलैक्सिंग। और वो मेरे पीछे थी। मैं चाहकर भी मना नहीं कर पाया।



अमीषा की उंगलियां मेरे कन्धों पे। पहले उसने सिर्फ उंगली की टिप से दबाया फिर जोर-जोर से। थोड़े ही देर में मेरे कंधे पे उसके दोनों हाथ थे। वो कस-कसकर मस्साज कर रही थी। दोपहर को दुकान में जो मार-पीट, फिर स्कूल में, सारा दर्द सारी एक थकान साथ उभर आई थी, जो मैंने इतनी देर से बर्दास्त किया था। मेरी पूरी देह दर्द से डूब गई। पोर-पोर। एक-एक मसल्स।



लेकिन एक-दो मिनट के बाद जब उसने हथेली से कंधे के नीचे मेरी पीठ और एकदम चूतड़ तक अपने हाथ से सहलाना, दबाना शुरू किया। तो लगाने लगा जैसे उसकी उंगलियां मेरा सारा दर्द, सारी थकान पी जा रही हों।

रीत की सहेली की दूकान में, जब छोटा चेतन और उसके तिलंगों से मुकाबला हुआ, ज्यादा तो नहीं पड़ी मुझे लेकिन तभी भी दो चार हाथ, और उसमे एक दो निशाने पर लग गए थे, चेहरा तो मैंने बचा लिया था, पर पीठ पर, पैरों पर, और एक दो बार गिरते गिरते भी मेज से टकराया और गुंजा को दबोच कर बचाने के चक्कर में सीधे धड़ाम से फर्श पर, अन आर्म्ड कम्बैट में तो सबसे पहले गिरना ही सिखाते हैं और हर तरह के फर्श पर, इसलिए इतनी नहीं लगी लेकिन जो भी अंदरूनी चोट थी और उससे बढ़कर थकान अब सब अमीषा की उँगलियों से घुल रही थी।

मेरी आँखें बंद होने लगी मेरा सारा शरीर शिथिल पड़ने लगा, और मैं सो गया या तंद्रा में चला गया पता नहीं। मेरी आँख खुली महक और गुंजा के शोर से, मुझे लगा घंटों बाद सोकर उठा हूँ।



लेकिन घड़ी देखा तो सिर्फ 6:00 मिनट हुए थे। मेरी सारी थकान, दर्द मसल्स में तनाव सब गायब था, एकदम फ्रेश।





गुंजा और महक एक शर्ट लाने गई थी लेकिन जैसे पूरी दुकान उठा लायी थी और जब मैंने ध्यान से देखा तो बस मेरे मन में यही आया- “दुष्ट, बदमाश…” लगता है गुड्डी ने इन सबसे शेयर कर रखा था की मुझे पिंक या फ्लोरल प्रिंट नहीं पसंद है। मैंने गुड्डी से एक बार कह दिया था की ये सब तो लड़कियों वाले रंग हैं। छोरियां पहनती हैं, और शर्ट टी-शर्ट कई तो स्लीवलेश थी। आलमोस्ट ट्रांसपरेंट।



महक ने पीछे से मेरे कंधे से मेजर किया और गुंजा से आँख नचाकर बोली- “साइज तो सही है। लगता है तुमने अच्छी तरह से नापा है…”



“एकदम…” गुंजा टी-शर्ट नापते हुए बोली- “मेरे जीजू हैं, नाप के तो देखना ही पड़ेगा…”



महक तुरंत उछल गई- “थे। अब मेरे हैं…”

किसी तरह मौका निकालकर मैं बोला- “अरे यार थोड़ी सोबर व्हाईट या ब्लू। और फिर इतनी ज्यादा…”

महक मेरे ऊपर चढ़ गई- “आपसे पूछा किसी ने आपकी पसंद? हमें मालूम है आपकी पसंद। लेकिन आपकी पसंद नापसंद से क्या फर्क पड़ता है? चलिए पहनिए इसे…”



तब तक जिस सेल्सगर्ल को उसने बाहर लगा रखा था उसका मेसेज आया- “डाक्टर साहेब आ रही हैं…”

मैं भी थोड़ा ठीक होकर बैठ गया।

गुंजा भी मुझसे दूर हट गई।
अमीषा की नजर तो दूर तक मार करती है...
नजरों के तीर.. मोटे तीर के मसल्स भांप गई...
और मन थोड़ा बहक गया...
 

motaalund

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डाक्टर
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वो किसी ओर से डाक्टर नहीं लग रही थी।

लाईट ब्लू साड़ी, एकदम कसी हुई, सारे उभार और कटाव दिखाती हुई हल्की ट्रांसपेरेंट, नूडल स्ट्रैप ब्लाउज़, डीप लो-कट, एकदम चिपका स्लीवलेश, पीछे से भी बैकलेश, सिर्फ एक पतली सी स्ट्रिंग। और पल्लू भी इस तरह की एक उभार पूरा खुला। नीचे भी साड़ी नाभि-दर्शना, गहरी नाभी, चिकना गोरा पेट, बहुत पतली कमर और साड़ी किसी तरह कुल्हे से टिकी, चूतड़ बड़े-बड़े। और जिस तरह से मैं उन्हें देख रहा था उसी तरह वो भी मुझे नीचे से ऊपर। मेरी एक-एक मसल्स।

फिर मैं और चौंक गया, जिस तरह से वो महक से मिली।

महक ने जोर से उन्हें हाय भाभी बोला और जवाब में उन्होंने महक को गले लगा लिया। और सिर्फ गले ही नहीं लगा लिया जिस तरह से वो दबा रही थी उसे और महक भी रिस्पांस दे रही थी। मेरी तो देखकर।

उन्होंने महक के कान में पूछा- “हे कहाँ गायब हो गई थी तू?”
महक- “भाभी वो लम्बी कहानी है। पहले आप इनसे मिलो…” उनसे अपने को छुड़ाती महक बोली- “इन्हीं के लिए आपको फोन किया था…”

जब तक गुंजा मुँह खोलती, महक बोल चुकी थी- “ये मेरे जीजू हैं…”

वो बोली- “अरे वाह। तब तो ये मेरे नंदोई हुए और सलहज का हक तो साली से भी पहले होता है…” और मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया।

जब मैंने उठने की कोशिश की तो उन्होंने दूसरे हाथ से मेरे कंधे को दबाकर बैठा दिया। इसके दो असर हुए, एक तो जब उनका हाथ मेरे कंधे पे था तो उनका पल्लू और बाल मेरे गाल पे छू गए। और दूसरा जब वो झुकीं तो मेरी निगाह उनकी गोरी गुदाज गोलाइयों पे पड़ गई, बल्की सच बोलूं तो चिपक गई। क्या कटाव क्या उभार। पूरा क्लीवेज दिख रहा था। और उसका असर जो होना था हुआ। ‘वो’ लगभग 90° डिग्री होकर सलामी देने लगा।

जैसे किसी भी मर्द की निगाह महिलाओं के सीधे ब्लाउज़ पे। मेरा मतलब चूचियों पे पड़ती है, उसी तरह लड़कियों की निगाह भी बल्ज पे भले ही वो हटा लें। और उनकी निगाह भी वहीं एक पल के लिए।

फिर वो बोली- “मैं डाक्टर दिया शर्मा…”

मैंने कुछ बोलने की कोशिश की तो उन्होंने चुप करा दिया और महक से बोली- “हे तेरे जीजू। इन्हें कहीं लिटा सकते हैं, मेरा मतलब एक्जामिन करने के लिए…”



पास खड़ी अमीषा बोली- “स्पा में मसाज टेबल है…”

डाक्टर दिया बोली- “तो चलो…” और मैं स्पा में मसाज टेबल पे लिटा दिया गया।

अमीषा, गुंजा और महक डाक्टर के साथ खड़ी थी।

और जब उन्होंने महक की लगाई दुपट्टे की पट्टी खोली तो मेरा दिल धक से रह गया। बगल के शीशे से साफ दिख रहा था और मेरे साथ सबको। दो इंच गहरा और साढ़े तीन इंच लंबा घाव था, खून अभी भी रिस रहा था। अगर चाकू थोड़ा सा और अन्दर गया होता तो हड्डी पे भी घाव हो गया होता।

अब मेरी समझ में महक की हरकत आई। वो लड़की है बहुत समझदार। अगर इस घाव के साथ मैं किसी हास्पिटल में जाता तो फिर तमाम सवाल, चाकू का घाव था। पहले पुलिस रिपोर्ट फिर कहाँ लगा? और अगर मैं डी॰बी॰ की सहायता फिर लेता। इससे ज्यादा आसान महक का तरीका था यहाँ बिना किसी शोरगुल के डाक्टर साहेब देख रही थी। डाक्टर ने एक टार्च मेरी आँख में डाली, उंगलियों को मुड़वाया, घाव के आस पास का स्किन थोड़े ध्यान से देखा।

तब तक महक चालू थी- “भाभी ने अभी बी॰एच॰यू॰ से एम॰एस॰ पूरा किया है, और डिप्लोमा…”

तब तक डाक्टर दिया ने आँख तरेरी और महक चुप होकर मुश्कुराने लगी।

डाक्टर दिया बोली- “घाव बहुत बड़ा है। स्टिच करना पड़ेगा, लेकिन मैं एनेस्थेसिया नहीं लायी हूँ। थोड़ा दर्द होगा। या फिर किसी प्राइवेट नर्सिंग होम में, आधे घंटे में अगर नहीं किया तो इन्फेक्शन सेट कर सकता है। फिर मुश्किल हो जायेगी…”


मैं बोला- “अरे आप स्टिच कर दीजिये ना। कहाँ नर्सिंग होम के चक्कर मैं लगाऊंगा…” मुझे भी घर जाने की जल्दी थी- “और हाँ अगर बेहाश ही करना है तो ये सब है ना यहाँ। एक बार मुश्कुरायेंगी तो मैं बेहोश जाऊँगा…”



सब एक साथ 1-2-3 बोल-कर मुश्कुरायी
लेकिन मैं बेहोश नहीं हुआ। जिसने लिखा था की मर्द को दर्द नहीं होता एक बार स्टिच करा के देखे। 6 बड़े-बड़े टाँके लगे।

गुंजा ने पूछा- “टाँके कटवाने के लिए?”

डाक्टर ने बोला- “नहीं नहीं, डिसाल्वेबल हैं। तीन दिन में अपने आप खतम हो जायेंगे। हाँ पांच-छ दिन में एक बार देखने से ठीक रहता, लेकिन ये तो आज जा रहे हैं। फिर?”

गुंजा झट से बोली- “हाँ लेकिन चार-पांच दिन के लिए। रंग पंचमी के पहले ये आ जायेंगे…”

“फिर क्या? फिर तो मैं थारो चेक अप कर लूँगी…” डाक्टर अब डाक्टर से सलहज वाले रंग में आने लगी थी।

मैंने कुछ पूछने की कोशिश की- “दवा। डाक्टर साहेब?”

उन्होंने बीच में बात काट दिया और महक से बोली- “हे यहाँ कोई डाक्टर वाक्टर है क्या?”
महक भी अपनी बड़ी-बड़ी आँखें नचाकर चारों ओर देखते हुए बोली- “ना मुझे तो कहीं नहीं दिख रहा है…” और मेरी ओर आँख तरेर के बोली- “डाक्टर किसे कह रहे हो? ये मेरी प्यारी होने वाली भाभी हैं और आप मेरे जीजू तो…”
मैं बोला- “ओके डाक्टर भाभी…”

“सिर्फ भाभी…”

440 वोल्ट की मुश्कान के साथ जवाब मिला और डांट भी-

“अब चुप रहो। अभी इंजेक्शन लगेंगे और वो भी मोटे-मोटे। अमीषा इनकी पैंट नीचे करो और नीचे हाँ घुटने तक। ये इंजेक्शन तो चूतड़ में लगेंगे ना…”

अमीषा को तो जैसे इसी बात का इंतजार था। मैं पेट के बल लेटा था और जब उसने पैंट नीचे सरकाई तो उसके लम्बे नाखून, मेरे चूतड़ों के निचले भाग पे छू गए। जोर का झटका जोर से लगा।

लेकिन डाक्टर ऊप्स। भाभी को इससे संतोष नहीं हुआ। वो अमीषा से बोली-

“अरे यार तू तो ट्रेंड नर्स है। क्या इंजेक्शन चड्ढी के ऊपर से लगेगा, इसे भी तो सरकाओ नीचे…”

पता नहीं ये अमीषा की बदमाशी थी या महक और गुंजा की करतूत? चड्ढी भी घुटने तक पहुँच गई और अबकी अमीषा ने दोनों हाथ का इश्तेमाल किया। दो उंगलियां वहां भी छू गईं। क्या हालात हुई होगी कोई भी सोच सकता है।



गुंजा और महक ने स्कूल के बारे में बताना शुरू किया, बस चुम्मन का नाम और उससे जुड़ी बातें वो गोल कर गईं ये कहकर। की दो गुंडे थे। ये मैंने तीनों को और गुड्डी को भी अच्छी तरह समझा दिया था की उसका नाम किसी के सामने न लें।

“उयी…” मैं जोर से चिल्लाया।
अमीषा ने इंजेक्शन लगा दिया था। सारी की सारी। मुझे देखकर मुश्कुरा रही थीं।

अमीषा बोली- “अभी एक और लगाना है। ये तो टिटनेस वाला था अभी एंटी बायोटिक बाकी है…” वो आराम से धीरे-धीरे मेरे खुले नितम्बों पे इथर लगा रही थी।



डाक्टर कम भाभी बोली- “नहीं, उसकी तो आई॰वी॰ लगानी पड़ेगी। एक छोटी बोतल 10 मिनट में हो जायेगी। फिर इन्हें घर जाकर सिर्फ ओरल लेनी होंगी…”



महक मुश्कुराते हुए बोली- “भाभी। वो वाला इंजेक्सन लगा दीजिये ना तबियत हरी हो जायेगी, इनकी एकदम…”



“तू ना…” डाक्टर दिया ने उसे डपटा, फिर मेरे नितम्बों को हल्के से छुवा और छूते हुए उनकी लम्बी उंगलियां आगे भी टच कर गईं।



बड़ी मुश्किल से उसे मैंने 90° डिग्री होने से रोका।



मुश्कुराते हुए वो बोली- “हूँ रियेक्शन तो ठीक है। “चल तू बोल रही है तो लेकिन बहुत लाईट डोज…”



महक बोली- “नहीं भाभी। कम से कम मीडियम डोज…”



डाक्टर दिया बोली- “ओके चल तू भी क्या याद करेगी?”


महक ने मुश्कुराते हुए बोला- “भाभी मास्टर्स के बाद। ई॰डी॰ में डिप्लोमा करेंगी…”ई॰डी॰ मतलब एरेक्टाइल डिसफंक्शन। इतना तो मुझे भी मालूम था।



तुरंत महक के कान पकड़ लिए गए। मुश्कुराते हुए डाक्टर कम भाभी बोली- “ये बताना जरूरी था?”

महक बोली- “अरे आपके ननदोई हैं। इनसे क्या शर्म?” उसके कान अभी भी दिया के हाथ में थे।



दिया- “वैसे इन्हें कोई जरूरत नहीं पड़ने वाली है। लौटकर आयेंगे तो मैं जरूर डिटेल में चेक करूँगी
कान महक के उनके हाथ में थे लेकिन वो देख मुझे रही थी।



दिया- “रिटेलिन है?” अबकी वो अमीषा से बोली।



अमीषा ने मुश्कुराते हुए जवाब दिया- “हाँ एक वायल है…”

फिर दो-तीन और दवाएं डाक्टर दिया ने बोला और अमीषा ने कुछ देर में दवाओं का काकटेल तैयार कर दिया और एक इंजेक्सन और चूतड़ के निचले हिस्से में। पल भर में मुझे लगा की मेरा सारा दर्द गायब। मैं उठने लगा तो अमीषा ने फिर लिटा दिया, और मेरे कान में होंठ लगाकर बोली- “चुपचाप अच्छे बच्चे की तरह आँख बंद कर लो। बस दो मिनट तक और अच्छी-अच्छी बातें सोचो…” और उसने मेरी चड्ढी और पैंट ऊपर कर दिया।

गुंजा महक और डाक्टर दिया बाहर चली गई थी।



हाँ अमीषा ने पैंट ठीक करते-करते। मेरे अब लगभग तने जंगबहादुर को कसकर रगड़ दिया और अपने मोटे-मोटे नितम्ब मटकाती चल दी। जब मैंने आँखें बंद की तो बस वही, बड़े-बड़े कसे नितम्ब मेरी आँखों के सामने थे, और फिर डाक्टर भाभी की गोलाइयां। गोरी गुदाज, महक और फिर गुड्डी। दो मिनट में न जाने कहाँ की ताकत मेरे अंदर आ गई और आँखों के सामने बस।



“सो गए क्या?” महक की आवाज बाहर से आई और मैं उठकर बाहर निकला।



जहाँ हम पहले बैठे थे लिंगरी और कास्मेटिक्स के काउंटर के पास। वहीं सारे लोग थे। एक आई॰वी॰ स्टैंड अमीषा और डाक्टर भाभी मिलकर लगा रहे थे। उन लोगों ने मिलकर ड्रिप लगा दी। एक सेल्सगर्ल काफी, पेस्ट्री और साल्टेड काजू ले आई।



अमीषा ने मेरे पैर एक फूट बाथटब में डाल दिए थे, उसमें कुछ गुलाब की पंखुडियां पड़ी हुई थी और एक-दो साल्ट्स पड़े थे। नीचे मारबल राक्स थी जो मेरे तलुवे में हल्के-हल्के रगड़ रही थी। गुनगुने पानी में अमीषा ने लवेंडर तेल की कुछ बूंदें भी डाल दी थी जो बहुत रिलैक्सिंग थी। साथ में वो मेरे एंकल्स का मस्साज भी कर रही थी। ड्रिप खतम होने के पहले उसने मेरे पैर निकाल लिए और तौलिया से रगड़कर उसे एक्स्फोलियेट भी कर दिया। पूरी देह एकदम हल्की सी हो गई।



तभी मेरा फोन बजा। गुड्डी का फोन था वो बस दो मिनट में पहुँच रही थी।

मेरी ड्रिप निकालते हुए डाक्टर भाभी ने कहा- “बस अब तुम्हें किसी इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ेगी। हाँ कुछ पिल्स मैं फार्मेसी पे निकलवा देती हूँ और एक-दो ड्रेसिंग। वो आप ले लीजियेगा…”
अब आए हैं डॉ के कब्जे में...
इंजेक्शन के अलावा क्या-क्या लगाती हैं..
या फिर क्या क्या लगवाती हैं...
इसका भी अनुभव अब आनंद बाबू को होने वाला है...
और डॉक्टर भी ईडी की है... तो मजे में कोई कमी नहीं...
 

motaalund

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शोख शरारतें
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“बस अब तुम्हें किसी इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ेगी। हाँ कुछ पिल्स मैं फार्मेसी पे निकलवा देती हूँ और एक-दो ड्रेसिंग। वो आप ले लीजियेगा…”



गुंजा ने कहा- “मैं समझ लेती हूँ…”



महक बोली- “ठीक है वैसे गुड्डी भी पहुँच ही रही हैं और वो इनके साथ जायेगी तो आप उनको समझा दीजियेगा तो और बेहतर रहेगा…”



डाक्टर भाभी बोली- “वो तो बेस्ट है उसे मैं ड्रेसिंग भी समझा दूंगी। एक-दो बार चेंज करना होगा बस…” और गुंजा के साथ फार्मसी की ओर चल दी।

“बिल अभी बाकी है…” महक ने आँख नचाकर कहा और उसमें काउंटर से एक बिल निकाल लिया।



“एकदम…” मैं बोला। मेरे मन में कुछ-कुछ हो रहा था। वो तो मुझे बाद में पता चला की जो दूसरा इंजेक्शन था उसमें युफोरिक और सटीम्युलेंट दवाओं का मिक्सचर था, जो स्लो रिलीज थी और उसका पूरा असर चार-पाँच घंटे में होने वाला था।

--

महक ने एक डार्क कलर की लिपस्टिक निकालकर अपने होंठों पे अच्छी तरह लगा ली और फिर बिल पे पेमेंट की जगह अपने होंठों से किस कर लिया। वहां उसके होंठों के निशान पड़ गए थे। मेरी ओर बिल बढ़ाकर वो मुश्कुराकर बोली- “पेमेंट प्लीज…”



“श्योर…” मैं बोला और उसे बाहों में भरकर मेरे होंठ उसके होंठों पे चिपक गए। फिर उसके होंठों ने उसी गरम जोशी से जवाब दिया। मेरे होंठों को अपने आलिंगन में भरकर और उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस गई। मेरे हाथ उसके स्कूल यूनिफार्म में कैद उन रूई के फाहे जैसे बादलों पे पड़ गए जिन्हें सीढ़ी पे गलती से मैंने छू दिया था। लेकिन अबकी ना मैंने हाथ हटाया ना सारी बोला बल्की हल्के से दबा दिया।



बगल के कमरे से गुड्डी की आवाजें आने लगी थी, तो महक मुझसे अलग हो गई।

मैंने बोला- “क्यों हो गया पेमेंट पूरा?”

उसने जोर से ना में सिर हिलाया और मुश्कुराकर बोली- “ये तो सिर्फ एडवांस था…”

तब तक गुंजा आ गई और बोली- “क्यों हो गया बिल पेमेंट। और महक के हाथ से वो लिपस्टिक लेकर मुझे दे दिया- “ले लीजिये याद रहेगा मेरी सहेली का बिल…”

गुंजा ने अमीषा से पूछा- “हे तुम्हारे पास स्ल्ट रेड है क्या?”

“एकदम…” वो बोली और उसने निकलकर दे दिया। गुंजा ने वो और तीन-चार शेड के लिपस्टिक ले लिए।



हम लोग बाहर निकले तो डाक्टर भाभी जा चुकी थी और गुड्डी काउंटर से दवाएं ले रही थी।
अब तो रात में गुड्डी की हालत खराब करने का इंतजाम हो गया..
उन दवाइयों का असर अब गुड्डी हीं झेलेगी...
 

motaalund

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गुंजा
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लेकिन उसके दस पंद्रह मिनट पहले, इंजेक्शन के बाद का असर था शायद,थोड़ी तन्द्रा, खुमारी सी और मैं अधलेटा पहले जुमहाने लगा फिर सो जैसा गया। और मुझे सोता देख कर, महक, सेल्स गर्ल्स, गुंजा सब दबे पाँव बाहर खिसक ली, रह रह कर पक्षियों के कलरव की तरह उनकी चहचाहट दरवाजे से छन छन कर हलकी सी आ रही थी, कुछ देर बाद मेरी आँख खुली, अब तबियत एकदम फ्रेश लग रही थी, थकान,दर्द सब गायब हो गया था। लग रहा था इंजेक्शनों का असर हो चुका था। किसी तरह उस मसाज टेबल से मैं नीचे उतरा, अंगड़ाई ली, उँगलियाँ चटकाईं और दरवाजे की ओर देखने लगा।



उन भयावह यादो से अब मैं अपने को आजाद कर रहा था
बस दरवाजा खुल गया।
गुंजा,
एक पल के लिए वहीँ खड़े खड़े मुस्करायी, फिर पैरो से पीछे की ओर मार के दरवाजा बंद किया, और लगभग दौड़ती हुयी, सीधे मेरी अँकवार में

और सुबकने लगी, बस बिना कुछ बोले,



आंसू उसके गालों को गीला करते मेरे कंधे पर गिर रहे थे, और मैंने भी कस के उसे भींच लिया। हलके हलके उसकी पीठ सहलाता रहा, अपने होने का अहसास दिलाते, मेरे उँगलियाँ उसके फूल जैसी देह पर फिसल रही थीं और जितनी जोर से मैं भींच रहा था उससे ज्यादा जोर से वो चिपकी थी।



न उसके आंसू थम रहे थे, न मैंने उन्हें रोकने की कोई कोशिश की।



जिस हादसे से वो गुजरी थी, जहाँ बचने का जरा भी चांस नहीं था, खिड़की रोशनदान उमीदों के एकदम बंद थे, कोई एक छोटी से किरण भी नहीं आ रही थी, वहां से बस बच कर निकली थी, मौत जैसे सहला कर निकल जाए, जो लड़की अभी ढंग से कैशोर्य में भी न हो उसे ये सब देखना पड़े



लेकिन मैं सोच रहा था, अबतक बहुत कोशिश कर के सायास गुंजा ने अपने डर को दबोच कर पिंजड़े में कर के रखा था, लेकिन जरूरी था यह की यह सब एक बार बाहर निकल जाए, अब तक छेड़खानी कर के, सहेलियों के साथ हलकी फुल्की बातें कर के, जैसे यह न दिखाना चाहती हो की उसे कुछ हुआ भी है, पर अब,



और सुबकना अब हिचकियों में बदल गया था , और धीरे धीरे उन्होंने शब्दों की शक्ल ली



" जीजू, अगर तुम न आते, सच में " और फिर हिचकियाँ

मैं सिर्फ उसकी पीठ थपथपा रहा था,



" जीजू अगर तुम न आते सच, बस दो चार मिनट की देरी भी हर होती, "



और अब मैं काँप गया। वो मंजर मेरे सामने फिर से नाचने लगा और जो बात इन लड़कियों ने बताई थी की कैसे शाजिया का फोन छिना, महक के सीने के ऊपर टॉप पर अपना चाक़ू लगा के धमकया और चलने के पहले बोला, बस पांच मिनट और , ये पुलिस वाले बहुत चालाक बन रहे हैं न बस पांच मिनट और उसके बाद तुम तीनो ऊपर, धड़ाम



" कैसे नहीं आता मैं, होली के बाद फिर होली कैसे खेलता "



एक पल के लिए वो मुस्करायी, लेकिन फिर डर के बादलों ने चांदनी की मुश्के कस दी। फिर वह उन पलों में वापस हो गयी लेकिन हल्की सी मुस्कराहट उसके चेहरे पर खेलने लगी, मेरे गाल पर एक ऊँगली फिराकर बोली,

' लेकिन एक बार तू आ गया न तो बस मुझे लग गया, अब तो मेरा कुछ नहीं हो सकता, मैंने हाथ दबा के शाजिया और महक को भी अश्योर किया और जो आपने इशारा किया तो बस मैंने पहले शाजिया को और फिर महक को,



धुप छाँह का खेल चल रहा था, एक बार फिर से गुंजा उदास हो गयी। कुछ देर बाद खुद ही बोली, " आप के साथ होली अधूरी छोड़ के मैं जो आयी तो बहुत अफ़सोस हो रहा था और फिर अचानक ये डर लगने लगा की तुझ से दुबारा मिलूंगी की नहीं जैसे कोई अपशकुन की आहत आ रही हो "



मैं सिर्फ उसके बाल सहला रहा था और धीरे धीरे उसके कान में बोल रहा था अच्छा वो सब छोडो लेकिन जब चुम्मन आया और चाक़ू निकाला तब डर

नहीं लगा।



इतनी देर बाद वो खिलखिलाई, एकदम नहीं, तुम तो आ ही गए थे, अब सब जिम्मेदारी तेरी थी।



और जब सीढ़ी पर गोली चल रही थी, मैंने फिर पूछा



" एकदम नहीं यार तेरे रहते क्या डरना और जब शाजिया और महक नहीं डर रही थीं ,तेरी टांग खींच रही थीं तो मैं क्यों डरती, " हँसते हुए वो हसंनि बोली



शैतान का नाम लो, बल्कि शैतान की मौसी का नाम लो और वो हाजिर, उसी तरह झटाक से दरवाजा खोल के महक घुसी और साथ में एक सेल्स गर्ल

महक ने हम दोनों को चिपके देखा तो छेड़ा, अभी तक सिर्फ चुम्मा चाटी, चिपका चिपकी चल रही है या कुछ हुआ भी, और सेल्सगर्ल से बोली,



" यार जरा एक बड़ी शीशी वैसलीन की ले आना, नहीं, बल्कि के वाई जेली की एक ट्यूब उठा लाओ। "



" अरे नहीं दी, आर्गेनिक का ज़माना है, थूक से बढ़िया कुछ नहीं, जब हम लोग सुई के पतले छेद में लुजलुज लुजलुज धागा घुसेड़ सकते हैं तो इनका तो एकदम कड़ा तना है, " सीधे मेरे बल्ज को घूरती हुयी वो वो दुष्ट बोली। पर जवाब मेरी ओर से गुंजा ने दिया,

" कमीनी तेरे चक्कर में तो, जरा दो मिनट कोई चैन से चुम्मा चाटी तो कर नहीं सकता आगे की रील कैसे चलेगी। और अब जब होगा तो तेरे सामने होगा, होली के बाद जब जीजू आएंगे और तेरा शाजिया का भी नंबर लगेगा, जीजू लेते नहीं है चीथड़े चीथड़े कर देते हैं, चार दिन चल नहीं पाओगी। स्साली "

" अरे तो क्या डर है, मेरे तेरे यार ने पन्दरह दिन की छुट्टी तो करवा दी है न " हँसते हुए महक बोली।



लेकिन तबतक धड़ाक से दरवाजा खुला और हांफती घबड़ायी दूसरी सेल्स गर्ल अंदर आयी और इशारे से पहली वाली को अपने पास बुलाया , कान में कुछ फुसफुसाया और अपने फोन में कोई मेसेज दिखाया,



और वो सेल्सगर्ल भी एकदम सहम गयी, जैसे उसने भूत देख लिया हो। बस उसके मुंह से मुश्किल से यही निकला



" तो, अब "



कुछ पल पहले जो खुल के मजाक कर रही थी, छेड़ रही थी, खिलखिला रही थी, अब एकदम जड़। जैसे उसके गोरे चिकने चेहरे पर किसी ने कालिक पोत दी हो। और तब तक उस लड़की के फोन पर भी मेसेज आया उसके घर से, और उसे पढ़ते ही उसके पैर जैसे पानी के बने हो एकदम ढीले पड़ गए, सांस फूलने लगी और उसने फोन सीधे मेरे हाथ में पकड़ा दिया,



' तुरंत घर चली आओ । महौल खराब हो रहा है, बहुत ज्यादा टेंशन है, हर जगह पुलिस है, लोग कह रहे हैं कई जगह दंगा हो गया है, बस कर्फ्यू लगने वाला है, टीवी चैनल वाले दिखा रहे हैं। कुछ भी हो सकता है, हम सब के बगल वाला मोहल्ला तो तुम जानती हो कैसेलोग है, उधर से मत आना, बस . उस लड़की का मुंह सूख गया था, कुछ उसके समझ में नहीं आ रहा था, कभी महक को देखती, कभी दूसरी सेल्स गर्ल, लेकिन कनखियों से मेरी निगाह गुंजा पर पड़ी



और वह जड़ हो गयी थी, एकदम संज्ञा शून्य। उसने मेरे हाथ को पकड़ रखा था लेकिन अब उसे छोड़ दिया था, जैसे उम्मीद ने उसका साथ छोड़ दिया हो। बस सूनी आँखों से छत को देख रही थी, जैसे बस नियति का इन्तजार करना था, लेकिन बाकी लोग उसकी इस हालत से नावाकिफ थे. उस लड़की का मुंह सूख गया था, कुछ उसके समझ में नहीं आ रहा था, कभी महक को देखती, कभी दूसरी सेल्स गर्ल, लेकिन कनखियों से मेरी निगाह गुंजा पर पड़ी



और गुंजा जड़ हो गयी थी, एकदम संज्ञा शून्य। उसने मेरे हाथ को पकड़ रखा था लेकिन अब उसे छोड़ दिया था, जैसे उम्मीद ने उसका साथ छोड़ दिया हो। बस सूनी आँखों से छत को देख रही थी, जैसे बस नियति का इन्तजार करना था, लेकिन बाकी लोग उसकी इस हालत से नावाकिफ थी।



और मैं समझ रहा था उसकी हालत को, कितनी मुश्किल से वो हादसे वापस आयी थी, धीरे धीरे सामन्य हो रही थी, लेकिन एक बार फिर वही लौट गयी थी।



और फिर किसी ने टीवी खोल दिया।



वहां तो एकदम आग लग हुयी थी, एक ऐंकर चीख रखी, ' पुलिस लड़कियों के नाम क्यों नहीं बताती , प्रेस के सामने उन लड़कियों को पेश करने में क्या डर है, क्या वह बता देंगी उनके साथ क्या हैवानियत हुयी। जागो, जागो कौन है हमारी होली को बर्बाद कर रहा है, मालूम आप सब को है, हर बार हमारे धार्मिक स्थल त्यौहारों पर ही हमला क्यों होता है '



नीचे रनर चल रहा था, पूरी शहर में तनाव, कई जगह दुकाने फूंकी गयी, पूरे शहर में पुलिस की गस्त जाती, अघोषित कर्फ्यू थोड़ी देर में नदेसर में एसटीएफ की प्रेस कांफ्रेस



दुसरे चैनल पे बनारस लोकल नेटवर्क आ रहा था और वहां और भी आग में घी नहीं प्रेट्रोल डाला जाला जा रहा था। पीछे पुराने बम्ब कांडो की

फ़ाइल पिक्चर दिखाई जा रही थी और कुछ किसी और शहर के दंगो की, और उसी बैकग्राउंड में एक टीका वीका लगाए जो किसी परम्पर मंच के अध्य्क्ष थे, प्रकट हुए। हर वैलेंटाइन को उनका मंच प्रकट हो जाता था, लड़के लड़कियों को पकड़ने के लिए



" जो कहते हैं आतंकी का कोई धरम नहीं होता, झूठ बोलते हैं, गद्दार है, लाशो की राजनीति करते हैं। और आज भी आतंकी का धर्म था वो तो एसटीएफ के लोगों ने जान पर खेल कर लड़कियों को बचा लिया, लेकिन हमारा भी धर्म है, आज हमें सिखा देना है, की हमने चुडिया नहीं पहन रखी हैं अगर हम अपने पर उतर आएं तो उनकी ऐसी की तैसी कर देंगे। आज समय घर में बैठने का नहीं है, क्या आप चाहते हैं की आपके बहन बेटियों की इजजत बचे तो बाहर निकलिए, वो दस हैं तो हम हजार है, '



और तभी मेरा फोन घनघनाया, डीबी का फोन था,

" तुरंत निकलो, और हाँ कार वार से नहीं, सड़क पे मुश्किल हो सकती है। "



मैं फोन लेकर कमरे के कोने में आ गया था, पहली बार डीबी घबड़ाये लग रहे थे, लग रहा था, वो भी बहुत टेंशन में हैं, लेकिन उन्होंने प्रॉब्लम का हल भी बताया, " गुड्डी से कहना, और हाँ पुलिस से अबकी कोई हेल्प नहीं मिलेगी, हाँ बहुत होगा तो सिद्दीकी के टच में रहना और मुझे इसी फोन पे '



मुझे लग रहा था की पुलिस की कोई गाडी, हमें गुंजा के घर पहुंचा देगी लेकिन वो भी नहीं, और एक बात और बोल के डीबी ने फोन काट दिया



" पन्दरह बीस मिनट के अंदर पहुँच जाओ और गुंजा का बहुत ध्यान रखना "



और उसी समय गुड्डी भी कमरे में दाखिल हुयी, एकदम बद हवास, ' हम लोगो को तुरंत निकलना होगा, हालत बहुत तेजी से खराब हो रही है /
अपनों का सहारा... बहुत राहत देने वाला होता है...
आखिर इतनी छोटी उमर में मौत का इस तरह सामना...
उसे मिटाने के लिए काफी वक्त लगेगा...
 

motaalund

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अब तो अंकल भी चले गए...
और महक ने भी अपने अर्थपूर्ण बातों से ख्याल रखने का मतलब समझा दिया..
गुंजा, गुड्डी, रीत और शाजिया... अब तो इन्हीं चांडाल चौकड़ी का बोलबाला रहेगा...
अब तो इस होली में आनंद बाबू के कपड़े फटे हीं फटे...
 

motaalund

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बिल देने के बजाय बिल लेने की बातें हो रही हैं...
अब तो आनंद बाबू को अपना कार्ड(लंड) स्वाइप कर हीं देना चाहिए...
हाँ.. हर पीओएस(POS) पर स्वाइप होगा...
 
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