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Adultery सज्जनपुर की कहानी

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Arthur Morgan

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मित्रगण कहानी का नया अध्याय नंबर 22, पेज संख्या 43 पर पोस्ट कर दिया है। अच्छे से रिव्यू दें लाइक करें।
अपडेट जल्दी जल्दी दे रहा हूं पर रिव्यू नहीं आ रहे हैं उस अनुसार, थोड़ा सा समय लगाएं जिससे मेरी भी इच्छा हो आगे और जल्दी लिखने की।
।।बहुत बहुत धन्यवाद।।
 
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रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।

बारहवाँ अध्याय


रजनी कर्मा की बाहों में लेटी थी, दोनों अभी भी नंगे थे। कर्मा के हाथ में एक किताब थी, जिसमें चुदाई के अलग-अलग आसनों और कामुक क्रियाओं की तस्वीरें थीं। रजनी की आँखें आश्चर्य से फैली हुई थीं। “हाय दईया, ये सब भी होता है?” उसने हैरानी भरे लहजे में कहा।

“और क्या, चाची? और बहुत मज़ा भी आता है, करके देखो,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, किताब की तस्वीरों को और करीब से दिखाते हुए।

“अच्छा, बोल तो ऐसे रहे हो जैसे सब किया हो तुमने,” रजनी ने हँसते हुए तंज कसा।

“किया नहीं है, पर कर तो सकता हूँ—तुम्हारे साथ,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा।

“धत्त, बदमाश!” रजनी ने हँसते हुए कहा, मगर उसकी आँखों में शरारत और उत्तेजना की चमक थी।

कर्मा ने रजनी को अपने लंड की ओर धकेलते हुए कहा, “चाची, करो ना, लो ना अपने मुँह में।”

रजनी ने कर्मा की आँखों में देखा, थोड़ा शरमाते हुए बोली, “छी, ये मुँह में लेने वाली चीज़ थोड़े ही है!”

“अच्छा, एक बार लेकर देखो,” कर्मा ने उकसाया। “अगर अच्छा न लगे, तो मत करना।”

“बस एक बार?” रजनी ने संकोच भरे लहजे में पूछा।

“हाँ, पक्का,” कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा। “पर अगर अच्छा लगे, तो रुकना भी मत।”

रजनी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कर्मा की ओर देखा। वह कर्मा की बेपरवाह और खिलंदड़ी बातों में खो चुकी थी। कर्मा का व्यवहार उसे किसी तरह का दबाव नहीं देता था; वह उसके साथ खेलता था, बराबरी का व्यवहार करता था। रजनी को लगता था जैसे वह फिर से एक जवान, कुंवारी लड़की बन गई हो। शायद यही वजह थी कि वह कर्मा को कुछ भी मना नहीं कर पाती थी। दूसरी बात, उसकी उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। नीलेश और फिर सरोज-बिमला के साथ के अनुभवों ने उसे अपने बदन के सुख से परिचित करा दिया था। अब वह उस सुख का पूरा आनंद लेना चाहती थी। सही-गलत, समाज, मर्यादा—ये सब अब उसके लिए फीके पड़ चुके थे। जब तक उसने इनकी परवाह की थी, उसे सिर्फ़ दुख और दुत्कार मिली थी। मगर जब से उसने अपने बदन की सुनना शुरू किया, उसे सुख ही सुख मिल रहा था। उसकी परेशानियाँ जैसे गायब हो गई थीं।

रजनी ने अपना सिर झुकाया और कर्मा के लंड पर अपने होंठ टिका दिए। कर्मा उस गर्म, मुलायम स्पर्श से मचल उठा। “आह… चाची… ओह… अहम्म…” उसकी आहें कमरे में गूँज उठीं। रजनी को यह ताकत अच्छी लग रही थी—वह अपने होंठों से एक मर्द को, या यों कहें, अपने बेटे की उम्र के लड़के को तड़पा सकती थी। वह उसके साथ खेल सकती थी। उसने थोड़ा और मुँह खोला और कर्मा के लंड के टोपे को अपने मुँह में भर लिया। उसका कड़क, गर्म अहसास और हल्का सा नमकीन स्वाद पहले तो रजनी को अजीब लगा। मगर कुछ पल बाद उसे यह उतना बुरा भी नहीं लगा। उसने लंड को मुँह से निकाला और कर्मा की ओर देखा।

“क्या हुआ, चाची? अच्छा नहीं लगा?” कर्मा ने पूछा, उसकी आँखों में शरारत थी।

“थोड़ा अलग सा है,” रजनी ने कहा। “पर इतना बुरा भी नहीं।”

“तो वापस लो न,” कर्मा ने उकसाया।

“कितना बेसब्र है तू, लल्ला,” रजनी ने हँसते हुए कहा। उसने फिर से लंड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे वह अभ्यस्त हो गई। पहले वह हल्के से चूसती, फिर निकाल लेती।

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हर बार वह थोड़ा और गहराई तक लेने लगी। कर्मा आहें भर रहा था। “आह… चाची… ओह…” उसकी सिसकियाँ रजनी को और उत्तेजित कर रही थीं। वह अब पूरी लगन से कर्मा का लंड चूस रही थी, उसका आधे से ज़्यादा लंड उसके मुँह में समा रहा था। कर्मा का बदन मचल रहा था। उसने रजनी का सिर पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर दबा दिया। अगले ही पल वह गुर्राते हुए झड़ने लगा। एक के बाद एक पिचकारी रजनी के मुँह में भरने लगी। रजनी, जिसका मुँह दबा हुआ था, के पास कोई चारा नहीं था। उसने कर्मा का रस गटक लिया। उसे उसकी गंध और स्वाद बुरा नहीं लगा, बल्कि यह उसे और उत्तेजित कर गया।

झड़ने के बाद कर्मा ने रजनी का सिर छोड़ा। रजनी ने लंड निकाला और हाँफते हुए पीछे हट गई। दोनों बिस्तर पर लेटे, हाँफते हुए एक-दूसरे के बगल में। कुछ देर बाद रजनी उठी और अपने कपड़े पहनने लगी।

“अभी से जा रही हो?” कर्मा ने पूछा, उसकी आवाज़ में शरारत अब भी बाकी थी।

“हाँ, और अब तू भी उठ। नहा ले, बदन पसीने से महक रहा है,” रजनी ने हल्के से डाँटते हुए कहा। उसने कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई। कर्मा लेटा रहा, चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान लिए। फिर वह उठा और नहाने चला गया।

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**कम्मू का घर**

सुबह की पहली किरण के साथ कम्मू की आँखें खुलीं। उसे रात का दृश्य सता रहा था—उसके माँ-पापा की चुदाई, और फिर उसकी माँ के नंगे बदन को याद करके उसने जो किया। ग्लानि उसके मन को खाए जा रही थी। “हाय, मैंने अपनी माँ को सोचकर हिलाया। ये कितना बड़ा पाप है!” वह खुद को कोस रहा था। मगर उसकी आँखों के सामने अब भी वही दृश्य था—सुमन का भरा हुआ बदन, उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, गहरी नाभि, और रसीली चूत। वह खुद को समझाने की कोशिश करता हुआ उठा और सुबह के काम निपटाने लगा।

आज का दिन बादलों से घिरा हुआ था। फूल सिंह के घर में चहल-पहल थी। अजीत और कुसुम शहर जा रहे थे, धीरज की शादी के लिए कपड़े और दूसरा सामान लेने। फूल सिंह सुबह-सुबह खेतों की ओर निकल चुके थे। उन्हें शहर जाना और खरीदारी करना पसंद नहीं था, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी अजीत पर थी। सुमन, अनामिका, और अंजू को घर की दीवारें पोतने का काम था। धीरज, जतन, और कम्मू को बारिश से पहले उपले और भूसा झोपड़ी में रखने का काम मिला था। कुल मिलाकर, सबके पास कोई न कोई काम था।


सज्जनपुर से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क आती थी, जहाँ से शहर के लिए बस मिलती थी। सज्जनपुर और सड़क के बीच सिर्फ़ खेत और जंगल थे। अजीत और कुसुम सुबह जल्दी निकल पड़े। कुसुम ने लाल साड़ी पहनी थी, जो उसके भरे हुए बदन को और निखार रही थी। अजीत ने नीला कुरता-पायजामा पहना था, और कंधे पर गमछा डाला हुआ था।

“इस लाल साड़ी में तो बिल्कुल लाल परी लग रही हो, भाभी,” अजीत ने गाँव से बाहर निकलते ही मज़ाक में छेड़ा।

“तुम भी इस नीले कुरते में नीले कबूतर लग रहे हो, देवर जी,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया।

दोनों मज़ाक करते हुए चल रहे थे। करीब डेढ़ किलोमीटर चले होंगे कि अचानक बादल गरजने लगे, और बारिश शुरू हो गई। “धत्त, तेरी की! लो, हो गई खरीदारी!” कुसुम ने झल्लाते हुए कहा।

“अरे, भाभी, उधर जंगल में चलो,” अजीत ने कहा। “पेड़ों के नीचे थोड़ा बच जाएँगे।”

“हाँ, यहाँ तो तुरंत भीग जाएँगे,” कुसुम ने सहमति जताई।

दोनों रास्ते से हटकर जंगल की ओर बढ़ गए। वे घने पेड़ों की तलाश में थे, मगर बारिश तेज़ थी। जंगल में घुसने के बावजूद वे ज़्यादा देर नहीं बच पाए। दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। कुसुम की साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी, और उसका भरा हुआ बदन अब और उभर रहा था। उसका ब्लाउज़ उसकी मोटी चूचियों को तान रहा था, और गीली साड़ी उसकी गहरी नाभि और मांसल पेट को उघाड़ रही थी। अजीत का कुरता भी भीगकर चिपक गया था, और वह बार-बार अपनी भाभी की ओर देख रहा था।

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वे एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो गए, मगर बारिश की बूँदें अब भी उनकी देह को भिगो रही थीं। कुसुम ने अपनी साड़ी निचोड़ी और हँसते हुए कहा, “हाय, अब तो सारा मज़ा खराब हो गया।”

अजीत ने उसकी ओर देखा। उसकी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिक गईं। “अरे, भाभी, मज़ा तो अब शुरू हुआ है,” उसने शरारत भरे लहजे में कहा।

कुसुम ने उसकी ओर देखा और हँस पड़ी। “तूम भी न, देवर जी, मौके का फायदा उठाने से चूकते नहीं।”

दोनों हँसते हुए पेड़ के नीचे खड़े थे, मगर बारिश की ठंडक और उनके भीगे हुए बदनों ने माहौल को एक नई गर्मी दे दी थी।

कुसुम की लाल साड़ी उसके बदन से चिपककर उसकी मोटी चूचियों, गहरी नाभि, और भरे हुए चूतड़ों को और उभार रही थी। अजीत का नीला कुरता भीगकर उसकी देह से लिपट गया था, और उसकी आँखों में वासना की चमक साफ़ झलक रही थी। दोनों के बीच मज़ाकिया छेड़छाड़ अब एक अलग ही रंग ले रही थी।
“वैसे, भाभी, इस बारिश में तुम्हें कुछ करने का मन नहीं कर रहा?” अजीत ने शरारत भरे लहजे में पूछा, अपनी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिकाते हुए।
“कर रहा है न, घर जाने का मन कर रहा है,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया, अपनी साड़ी निचोड़ते हुए।
“अरे, ऐसी बारिश में घर जाने का क्या मतलब?” अजीत ने पास आते हुए कहा। “ऐसी बारिश तो आग शांत करने के लिए होती है।”
“अच्छा, इतना भीग गए, फिर कौन सी आग है जो बुझी नहीं तुम्हारी?” कुसुम ने भौंहें चढ़ाकर, मज़ाक में तंज कसा।
“अंदर की आग है, भाभी,” अजीत ने अपनी आवाज़ को और गहरा करते हुए कहा।
“अंदर की कौन सी? खुलकर बताओ,” कुसुम ने शरारत से पूछा, उसकी आँखों में भी अब एक चमक थी।
“अरे, भाभी, बनो मत। तुम सब जानती हो,” अजीत ने हँसते हुए कहा।
“नहीं तो, मैं कुछ नहीं जानती। तुम ही बताओ,” कुसुम ने मासूमियत का नाटक करते हुए कहा।
“क्यों, भैया ने कभी आग नहीं बुझाई तुम्हारी, बारिश में भीगते हुए?” अजीत ने और पास आते हुए पूछा।
“अरे, वो और बारिश में भीगेंगे, वो भी मेरे साथ?” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया। “तुम अपने भैया को नहीं जानते क्या?”
“जानता हूँ, पर बदन की आग कुछ भी करवा सकती है,” अजीत ने अपनी नज़रें कुसुम की चूचियों पर टिकाते हुए कहा।
“लगता है, बहुत जोर की आग है तुम्हारे अंदर, देवर जी,” कुसुम ने छेड़ते हुए कहा। “बुझा क्यों नहीं लेते?”
“बुझा तो लूँ, पर तुम हाँ ही नहीं कहती,” अजीत ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया।
“अरे, आग तुम्हारी है, इसमें मैं क्या हाँ-ना कहूँ? बुझा लो,” कुसुम ने हँसते हुए कहा।
“पक्का?” अजीत ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।
“हाँ, पक्का,” कुसुम ने बेपरवाही से कहा, मगर उसकी आवाज़ में एक हल्की सी काँप थी।
अजीत ने कुसुम की ओर देखा, और फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए। कुसुम एक पल के लिए हैरान रह गई। उसे लगा था कि यह सिर्फ़ मज़ाक था, जैसा वह और अजीत अक्सर करते थे। मगर आज पहली बार उसके देवर ने हद पार कर दी थी। बारिश का मौसम, उनके भीगे हुए बदन, या कुसुम के अंदर की उत्तेजना—कुछ तो था, जिसने उसे अजीत का साथ देने के लिए मजबूर कर दिया। वह धीरे-धीरे अजीत के होंठों का जवाब देने लगी।


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दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे के होंठों को चूमते रहे। जब उनके होंठ अलग हुए, तो कुसुम को शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने नज़रें दूसरी ओर कर लीं।
अजीत अभी भी अपनी भाभी को देख रहा था। बारिश की बूँदें उसके बदन को और उत्तेजित कर रही थीं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। कुसुम का मखमली पेट और गहरी नाभि अब अजीत की आँखों के सामने थी। कुसुम आँखें नीचे किए खड़ी रही, उसका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल था। अजीत ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम के पेट पर रख दिया। कुसुम के बदन में जैसे बिजली सी दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। अजीत ने फिर से अपने होंठ कुसुम के होंठों से मिला दिए और उसके पेट को सहलाने लगा।

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कुसुम इस आनंद में इतनी खो गई कि उसे होश तब आया, जब वह अजीत की गोद में थी। उसकी साड़ी और ब्लाउज़ बदन से अलग पेड़ के नीचे पड़े थे। वह अब सिर्फ़ पेटीकोट और ब्रा में थी। वह कुछ सोच पाती, इससे पहले अजीत ने फिर से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

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कुसुम की शर्म अब धीरे-धीरे उत्तेजना में बदल रही थी। अजीत ने उसकी ब्रा को खींचकर उतार दिया, और कुसुम की मोटी-मोटी चूचियाँ अब पूरी तरह नंगी थीं। बारिश की बूँदें उन पर टपक रही थीं, जिससे वे और चमक रही थीं। अजीत ने कुसुम की चूचियों को अपने हाथों में लिया और उन्हें मसलने लगा। “आह… भाभी… क्या मस्त चूचियाँ हैं तुम्हारी,” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इनका रस तो मैं कबसे चखना चाहता था।”
कुसुम ने हल्के से विरोध किया। “अरे… देवर जी… नहीं… ये गलत है…” उसकी आवाज़ में शर्म थी, मगर उसका बदन अजीत के स्पर्श का जवाब दे रहा था।
“गलत क्या, भाभी?” अजीत ने उसकी चूचियों को और ज़ोर से दबाते हुए कहा। “जब बदन मज़ा ले रहा है, तो गलत क्या? बोलो, मज़ा नहीं आ रहा तुम्हें?”
कुसम शरमाते हुए चुप रही, मगर उसकी साँसें तेज़ थीं। अजीत ने उसका पेटीकोट ऊपर खींचा और उसे कमर तक इकट्ठा कर दिया। कुसुम की चूत अब बारिश में भीगकर और रसीली हो गई थी। अजीत ने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत पर फेरनी शुरू कीं। “आह… भाभी… कितनी गीली है तुम्हारी चूत… ये तो मुझसे मिलने को तड़प रही है,” उसने कहा।
“अरे… नहीं… अजीत… छोड़ो…” कुसुम ने हल्के से कहा, मगर उसका विरोध अब कमज़ोर पड़ रहा था। उसका बदन अजीत के स्पर्श में पिघल रहा था।
अजीत ने कुसुम को पेड़ के तने से टिका दिया और अपनी धोती खोल दी। उसका मोटा, कड़क लंड बारिश में चमक रहा था। “देखो, भाभी, ये कितना तड़प रहा है तुम्हारी चूत के लिए,” उसने वासना भरे लहजे में कहा। उसने कुसुम की टाँगें फैलाईं और अपने लंड को उसकी चूत के द्वार पर रखा। कुसुम ने एक आखिरी बार शरमाते हुए कहा, “अजीत… नहीं… ये ठीक नहीं…”
मगर अजीत ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसने एक ज़ोरदार धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में जड़ तक समा गया। कुसुम की चीख निकल गई। “आह… अजीत… ओह…” उसकी साँसें काँप रही थीं। अजीत ने उसकी कमर थाम ली और धक्के लगाना शुरू कर दिया। “आह… भाभी… कितनी कसी हुई चूत है तुम्हारी… आह… मज़ा आ रहा है… बोलो, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है न?” उसने गंदी बातें करते हुए कहा।

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कुसुम की शुरुआती शर्म अब पूरी तरह टूट चुकी थी। वह अजीत के धक्कों का जवाब अपनी कमर हिलाकर दे रही थी। “आह… हाँ… अजीत… आह… मज़ा आ रहा है…” उसने हाँफते हुए कहा। उसका बदन बारिश और वासना में तर था। अजीत ने उसकी चूचियों को मसलते हुए और ज़ोर से धक्के लगाए। “आह… भाभी… तुम्हारी चूत को तो मैं रोज़ चोदना चाहता हूँ… आह… कितना रस है इसमें…” वह गुर्राते हुए बोला।
“आह… अजीत… चोदो… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को भर दो…” कुसुम ने भी अब खुलकर गंदी बातें शुरू कर दीं। उसकी सारी शर्म, सारी मर्यादा बारिश के पानी के साथ बह चुकी थी। वह अजीत के लंड के हर धक्के का आनंद ले रही थी।
अजीत ने कुसुम को ज़मीन पर लिटा दिया और उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उसने और तेज़ी से धक्के लगाना शुरू किया। “आह… भाभी… तुम्हारी चूचियाँ देख… कैसे नाच रही हैं… आह… साली, तू तो पूरी मलाई है…” उसने कहा। कुसुम की चूचियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं, और उसका मखमली पेट बारिश में चमक रहा था।
“आह… अजीत… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को फाड़ दो…” कुसुम ने तड़पते हुए कहा। उसका बदन अब पूरी तरह अजीत के हवाले था। बारिश की बूँदें उनके नंगे बदनों पर टपक रही थीं, और जंगल का सन्नाटा उनकी आहों और सिसकियों से गूँज रहा था।
अजीत ने कुसुम की चूत में अपने लंड को और ज़ोर से ठूँसा। “आह… भाभी… तुम्हारा बदन तो स्वर्ग है… आह… अब रोज़ चोदूँगा…” उसने गुर्राते हुए कहा। कुसुम की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसका बदन काँपने लगा, और वह स्खलित होने वाली थी। “आह… अजीत… मैं… आह… मैं जा रही हूँ…” उसने चीखते हुए कहा। उसी पल अजीत भी अपने चरम पर था। उसने एक आखिरी धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में पिचकारी मारने लगा। दोनों एक साथ स्खलित हो गए।
वे ज़मीन पर लेट गए, बारिश में भीगे हुए, हाँफते हुए। कुसुम की साँसें अभी भी तेज़ थीं। उसका मन ग्लानि और आनंद के बीच झूल रहा था। यह गलत था, मगर इस सुख ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। अजीत ने कुसुम की ओर देखा और मुस्कुराया। “क्या बात है, भाभी… ये बारिश तो सचमुच आग बुझाने वाली थी।”
कुसुम ने शरमाते हुए उसकी ओर देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी साड़ी उठाकर पहनने लगी। बारिश अब धीमी पड़ रही थी, मगर उनके बदनों की गर्मी अभी बाकी थी। पर गर्मी के साथ साथ अभी जो हुआ उसकी ग्लानि के बादल भी छाने लगे थे।


हवेली के बाहर सोनू का मन काम में नहीं लग रहा था। बारिश की वजह से काम कम था, मगर उसका दिमाग कहीं और था। हलवाइन की मोटी चूचियाँ, लाली की थिरकती कमर, और कभी-कभी कम्मू की माँ सुमन और ताई कुस के भरे हुए बदन उसके मन में कौंध रहे थे। कर्मा ने उसके मन में यह बीज बो दिया था, और अब वह इन खयालों से परेशान था। वह सोच रहा था कि इन विचारों का क्या करे। उसे लगा कि अगर कोई उसकी मदद कर सकता है, तो वह कर्मा ही है। वह बेसब्री से कर्मा के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।
जल्द ही कर्मा हवेली से बाहर निकला। सोनू उसे देखते ही खुश हो गया। “अरे, कर्मा भैया, आज बड़ी देर लगा दी अंदर!”
कर्मा ने सोनू को मुस्कुराकर देखा और मन ही मन सोचा, “अगर तुझे पता होता कि मैं अंदर क्या कर रहा था, तो ये सवाल नहीं पूछता।” उसने बेपरवाही से कहा, “अरे, हाँ, थोड़ा देर से उठा। तू बता, काम हो गया?”
“बारिश की वजह से काम ही नहीं है कुछ,” सोनू ने जवाब दिया।
“हाँ, ये तो है,” कर्मा ने कहा।
सोनू ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कुछ बात करनी थी।”
“हाँ, बोल न, इतना शरमा क्या रहा है?” कर्मा ने हँसते हुए कहा।
सोनू ने हिम्मत जुटाकर अपने खयालों के बारे में बताया। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “लड़का बड़ा हो रहा है। ये तो होगा ही, और होना भी चाहिए।”
“पर, भैया, मुझे लगता है मैं गलत कर रहा हूँ,” सोनू ने उदास लहजे में कहा।
“अरे, इसमें गलत क्या है?” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “जवान है, लंड तो खड़ा होगा ही। तू बता, भूख लगती है तो क्या करता है?”
“खाना खाता हूँ,” सोनू ने जवाब दिया।
“वैसे ही, जैसे वो पेट की भूख है, ये बदन की भूख है,” कर्मा ने समझाया। “जब पेट की भूख गलत नहीं, तो बदन की गलत कैसे हो सकती है?”
“हाँ, ये भी है,” सोनू ने कर्मा की बातों से प्रभावित होकर कहा।
“तभी तो कहता हूँ, खुलकर मज़े ले,” कर्मा ने कहा। “सही-गलत के चक्कर में रहा, तो हाथ मलता रह जाएगा।”
“पर कभी-कभी किसी ऐसे के लिए भी गलत खयाल आ जाते हैं, जिसके लिए नहीं आने चाहिए,” सोनू ने संकोच से कहा। “फिर ग्लानि होती है।”
“अरे, ग्लानि कैसी?” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “तुझे भूख लगी है और खाना सामने है, तो खाने का मन करेगा ही। अब ये थोड़े सोचेगा कि खाना किसी और का है, इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए।”
“फिर क्या करना चाहिए?” सोनू ने पूछा।
“झिझक खत्म कर,” कर्मा ने कहा। “जिसके बारे में चाहे, सोच। हिला। और मौका मिले, तो चोदने से भी पीछे मत रह।”
“पर अगर उनके और मेरे बीच ऐसा रिश्ता हो, जिसमें ये सब गलत हो या पाप हो?” सोनू ने चिंता से पूछा।
“देख, लंड और चूत का रिश्ता सिर्फ़ एक ही होता है—चुदाई का,” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “बाकी सारे रिश्ते समाज के बनाए हुए हैं। अगर किसी को देखकर लंड खड़ा हो रहा है, तो उसे चोदने में कोई बुराई नहीं।”
कर्मा की बातें सोनू के दिमाग पर गहरा असर कर रही थीं। “वैसे, बता तो, किसके बारे में सोच रहा था?” कर्मा ने पूछा।
“कई सारे लोगों के,” सोनू ने शरमाते हुए कहा।
“कौन-कौन?” कर्मा ने उत्साह से पूछा।
“हलवाइन, लाली… और…” सोनू रुक गया।
“और?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।
सोनू थोड़ा सोच में पड़ गया। कर्मा ने हँसकर कहा, “इतना सोच में रहेगा, तो कैसे मज़े ले पाएगा?”
सोनू ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुमन और कुसum चाची के बारे में।”
कर्मा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अरे, वाह! कम्मू की माँ और ताई? वैसे, इसमें गलत क्या है? दोनों तो एक से बढ़कर एक हैं।”
“कुछ गलत नहीं है? दोस्त की माँ के बारे में सोचना?” सोनू ने संकोच से पूछा।
“क्या तुझे यकीन है कि वो तेरी माँ के बारे में ऐसा नहीं सोचते होंगे?” कर्मा ने सवाल दागा।
यह सुनकर सोनू सोच में पड़ गया। तभी बिमला दोनों के लिए चाय लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। सोनू के दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, और कर्मा के होंठों पर एक चालाक मुस्कान थी।


जारी रहेगी
बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गया
कर्मा को निंद से उठाने गयी रजनी को कर्मा ने अपने जाल में फसाकर उसका वो भोग लगाया और वो आनंद दिया जो उसने आज तक नहीं लिया था साथ में कर्मा का लंड चुसकर उसका अमृत रस भी पी गयी
खरेदी के लिये शहर निकले अजीत कुसुम जंगल विराने में बारीश में फस गये फिर क्या जंगल में मंगल हो गया दोनों देवर भाभी में और नतिजा दोनों तृप्त हो गये
व्दीधा मनस्थिती में फसें सोनू ने कर्मा से उस बारें में पुछा तो बेबाग तरीके से कर्मा ने सोनू को अपनी बातों के जाल में फसाकर उसका दिमाख खराब कर दिया
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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Ajju Landwalia

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बारहवाँ अध्याय


रजनी कर्मा की बाहों में लेटी थी, दोनों अभी भी नंगे थे। कर्मा के हाथ में एक किताब थी, जिसमें चुदाई के अलग-अलग आसनों और कामुक क्रियाओं की तस्वीरें थीं। रजनी की आँखें आश्चर्य से फैली हुई थीं। “हाय दईया, ये सब भी होता है?” उसने हैरानी भरे लहजे में कहा।

“और क्या, चाची? और बहुत मज़ा भी आता है, करके देखो,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, किताब की तस्वीरों को और करीब से दिखाते हुए।

“अच्छा, बोल तो ऐसे रहे हो जैसे सब किया हो तुमने,” रजनी ने हँसते हुए तंज कसा।

“किया नहीं है, पर कर तो सकता हूँ—तुम्हारे साथ,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा।

“धत्त, बदमाश!” रजनी ने हँसते हुए कहा, मगर उसकी आँखों में शरारत और उत्तेजना की चमक थी।

कर्मा ने रजनी को अपने लंड की ओर धकेलते हुए कहा, “चाची, करो ना, लो ना अपने मुँह में।”

रजनी ने कर्मा की आँखों में देखा, थोड़ा शरमाते हुए बोली, “छी, ये मुँह में लेने वाली चीज़ थोड़े ही है!”

“अच्छा, एक बार लेकर देखो,” कर्मा ने उकसाया। “अगर अच्छा न लगे, तो मत करना।”

“बस एक बार?” रजनी ने संकोच भरे लहजे में पूछा।

“हाँ, पक्का,” कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा। “पर अगर अच्छा लगे, तो रुकना भी मत।”

रजनी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कर्मा की ओर देखा। वह कर्मा की बेपरवाह और खिलंदड़ी बातों में खो चुकी थी। कर्मा का व्यवहार उसे किसी तरह का दबाव नहीं देता था; वह उसके साथ खेलता था, बराबरी का व्यवहार करता था। रजनी को लगता था जैसे वह फिर से एक जवान, कुंवारी लड़की बन गई हो। शायद यही वजह थी कि वह कर्मा को कुछ भी मना नहीं कर पाती थी। दूसरी बात, उसकी उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। नीलेश और फिर सरोज-बिमला के साथ के अनुभवों ने उसे अपने बदन के सुख से परिचित करा दिया था। अब वह उस सुख का पूरा आनंद लेना चाहती थी। सही-गलत, समाज, मर्यादा—ये सब अब उसके लिए फीके पड़ चुके थे। जब तक उसने इनकी परवाह की थी, उसे सिर्फ़ दुख और दुत्कार मिली थी। मगर जब से उसने अपने बदन की सुनना शुरू किया, उसे सुख ही सुख मिल रहा था। उसकी परेशानियाँ जैसे गायब हो गई थीं।

रजनी ने अपना सिर झुकाया और कर्मा के लंड पर अपने होंठ टिका दिए। कर्मा उस गर्म, मुलायम स्पर्श से मचल उठा। “आह… चाची… ओह… अहम्म…” उसकी आहें कमरे में गूँज उठीं। रजनी को यह ताकत अच्छी लग रही थी—वह अपने होंठों से एक मर्द को, या यों कहें, अपने बेटे की उम्र के लड़के को तड़पा सकती थी। वह उसके साथ खेल सकती थी। उसने थोड़ा और मुँह खोला और कर्मा के लंड के टोपे को अपने मुँह में भर लिया। उसका कड़क, गर्म अहसास और हल्का सा नमकीन स्वाद पहले तो रजनी को अजीब लगा। मगर कुछ पल बाद उसे यह उतना बुरा भी नहीं लगा। उसने लंड को मुँह से निकाला और कर्मा की ओर देखा।

“क्या हुआ, चाची? अच्छा नहीं लगा?” कर्मा ने पूछा, उसकी आँखों में शरारत थी।

“थोड़ा अलग सा है,” रजनी ने कहा। “पर इतना बुरा भी नहीं।”

“तो वापस लो न,” कर्मा ने उकसाया।

“कितना बेसब्र है तू, लल्ला,” रजनी ने हँसते हुए कहा। उसने फिर से लंड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे वह अभ्यस्त हो गई। पहले वह हल्के से चूसती, फिर निकाल लेती।

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हर बार वह थोड़ा और गहराई तक लेने लगी। कर्मा आहें भर रहा था। “आह… चाची… ओह…” उसकी सिसकियाँ रजनी को और उत्तेजित कर रही थीं। वह अब पूरी लगन से कर्मा का लंड चूस रही थी, उसका आधे से ज़्यादा लंड उसके मुँह में समा रहा था। कर्मा का बदन मचल रहा था। उसने रजनी का सिर पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर दबा दिया। अगले ही पल वह गुर्राते हुए झड़ने लगा। एक के बाद एक पिचकारी रजनी के मुँह में भरने लगी। रजनी, जिसका मुँह दबा हुआ था, के पास कोई चारा नहीं था। उसने कर्मा का रस गटक लिया। उसे उसकी गंध और स्वाद बुरा नहीं लगा, बल्कि यह उसे और उत्तेजित कर गया।

झड़ने के बाद कर्मा ने रजनी का सिर छोड़ा। रजनी ने लंड निकाला और हाँफते हुए पीछे हट गई। दोनों बिस्तर पर लेटे, हाँफते हुए एक-दूसरे के बगल में। कुछ देर बाद रजनी उठी और अपने कपड़े पहनने लगी।

“अभी से जा रही हो?” कर्मा ने पूछा, उसकी आवाज़ में शरारत अब भी बाकी थी।

“हाँ, और अब तू भी उठ। नहा ले, बदन पसीने से महक रहा है,” रजनी ने हल्के से डाँटते हुए कहा। उसने कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई। कर्मा लेटा रहा, चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान लिए। फिर वह उठा और नहाने चला गया।

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**कम्मू का घर**

सुबह की पहली किरण के साथ कम्मू की आँखें खुलीं। उसे रात का दृश्य सता रहा था—उसके माँ-पापा की चुदाई, और फिर उसकी माँ के नंगे बदन को याद करके उसने जो किया। ग्लानि उसके मन को खाए जा रही थी। “हाय, मैंने अपनी माँ को सोचकर हिलाया। ये कितना बड़ा पाप है!” वह खुद को कोस रहा था। मगर उसकी आँखों के सामने अब भी वही दृश्य था—सुमन का भरा हुआ बदन, उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, गहरी नाभि, और रसीली चूत। वह खुद को समझाने की कोशिश करता हुआ उठा और सुबह के काम निपटाने लगा।

आज का दिन बादलों से घिरा हुआ था। फूल सिंह के घर में चहल-पहल थी। अजीत और कुसुम शहर जा रहे थे, धीरज की शादी के लिए कपड़े और दूसरा सामान लेने। फूल सिंह सुबह-सुबह खेतों की ओर निकल चुके थे। उन्हें शहर जाना और खरीदारी करना पसंद नहीं था, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी अजीत पर थी। सुमन, अनामिका, और अंजू को घर की दीवारें पोतने का काम था। धीरज, जतन, और कम्मू को बारिश से पहले उपले और भूसा झोपड़ी में रखने का काम मिला था। कुल मिलाकर, सबके पास कोई न कोई काम था।


सज्जनपुर से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क आती थी, जहाँ से शहर के लिए बस मिलती थी। सज्जनपुर और सड़क के बीच सिर्फ़ खेत और जंगल थे। अजीत और कुसुम सुबह जल्दी निकल पड़े। कुसुम ने लाल साड़ी पहनी थी, जो उसके भरे हुए बदन को और निखार रही थी। अजीत ने नीला कुरता-पायजामा पहना था, और कंधे पर गमछा डाला हुआ था।

“इस लाल साड़ी में तो बिल्कुल लाल परी लग रही हो, भाभी,” अजीत ने गाँव से बाहर निकलते ही मज़ाक में छेड़ा।

“तुम भी इस नीले कुरते में नीले कबूतर लग रहे हो, देवर जी,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया।

दोनों मज़ाक करते हुए चल रहे थे। करीब डेढ़ किलोमीटर चले होंगे कि अचानक बादल गरजने लगे, और बारिश शुरू हो गई। “धत्त, तेरी की! लो, हो गई खरीदारी!” कुसुम ने झल्लाते हुए कहा।

“अरे, भाभी, उधर जंगल में चलो,” अजीत ने कहा। “पेड़ों के नीचे थोड़ा बच जाएँगे।”

“हाँ, यहाँ तो तुरंत भीग जाएँगे,” कुसुम ने सहमति जताई।

दोनों रास्ते से हटकर जंगल की ओर बढ़ गए। वे घने पेड़ों की तलाश में थे, मगर बारिश तेज़ थी। जंगल में घुसने के बावजूद वे ज़्यादा देर नहीं बच पाए। दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। कुसुम की साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी, और उसका भरा हुआ बदन अब और उभर रहा था। उसका ब्लाउज़ उसकी मोटी चूचियों को तान रहा था, और गीली साड़ी उसकी गहरी नाभि और मांसल पेट को उघाड़ रही थी। अजीत का कुरता भी भीगकर चिपक गया था, और वह बार-बार अपनी भाभी की ओर देख रहा था।

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वे एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो गए, मगर बारिश की बूँदें अब भी उनकी देह को भिगो रही थीं। कुसुम ने अपनी साड़ी निचोड़ी और हँसते हुए कहा, “हाय, अब तो सारा मज़ा खराब हो गया।”

अजीत ने उसकी ओर देखा। उसकी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिक गईं। “अरे, भाभी, मज़ा तो अब शुरू हुआ है,” उसने शरारत भरे लहजे में कहा।

कुसुम ने उसकी ओर देखा और हँस पड़ी। “तूम भी न, देवर जी, मौके का फायदा उठाने से चूकते नहीं।”

दोनों हँसते हुए पेड़ के नीचे खड़े थे, मगर बारिश की ठंडक और उनके भीगे हुए बदनों ने माहौल को एक नई गर्मी दे दी थी।

कुसुम की लाल साड़ी उसके बदन से चिपककर उसकी मोटी चूचियों, गहरी नाभि, और भरे हुए चूतड़ों को और उभार रही थी। अजीत का नीला कुरता भीगकर उसकी देह से लिपट गया था, और उसकी आँखों में वासना की चमक साफ़ झलक रही थी। दोनों के बीच मज़ाकिया छेड़छाड़ अब एक अलग ही रंग ले रही थी।
“वैसे, भाभी, इस बारिश में तुम्हें कुछ करने का मन नहीं कर रहा?” अजीत ने शरारत भरे लहजे में पूछा, अपनी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिकाते हुए।
“कर रहा है न, घर जाने का मन कर रहा है,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया, अपनी साड़ी निचोड़ते हुए।
“अरे, ऐसी बारिश में घर जाने का क्या मतलब?” अजीत ने पास आते हुए कहा। “ऐसी बारिश तो आग शांत करने के लिए होती है।”
“अच्छा, इतना भीग गए, फिर कौन सी आग है जो बुझी नहीं तुम्हारी?” कुसुम ने भौंहें चढ़ाकर, मज़ाक में तंज कसा।
“अंदर की आग है, भाभी,” अजीत ने अपनी आवाज़ को और गहरा करते हुए कहा।
“अंदर की कौन सी? खुलकर बताओ,” कुसुम ने शरारत से पूछा, उसकी आँखों में भी अब एक चमक थी।
“अरे, भाभी, बनो मत। तुम सब जानती हो,” अजीत ने हँसते हुए कहा।
“नहीं तो, मैं कुछ नहीं जानती। तुम ही बताओ,” कुसुम ने मासूमियत का नाटक करते हुए कहा।
“क्यों, भैया ने कभी आग नहीं बुझाई तुम्हारी, बारिश में भीगते हुए?” अजीत ने और पास आते हुए पूछा।
“अरे, वो और बारिश में भीगेंगे, वो भी मेरे साथ?” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया। “तुम अपने भैया को नहीं जानते क्या?”
“जानता हूँ, पर बदन की आग कुछ भी करवा सकती है,” अजीत ने अपनी नज़रें कुसुम की चूचियों पर टिकाते हुए कहा।
“लगता है, बहुत जोर की आग है तुम्हारे अंदर, देवर जी,” कुसुम ने छेड़ते हुए कहा। “बुझा क्यों नहीं लेते?”
“बुझा तो लूँ, पर तुम हाँ ही नहीं कहती,” अजीत ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया।
“अरे, आग तुम्हारी है, इसमें मैं क्या हाँ-ना कहूँ? बुझा लो,” कुसुम ने हँसते हुए कहा।
“पक्का?” अजीत ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।
“हाँ, पक्का,” कुसुम ने बेपरवाही से कहा, मगर उसकी आवाज़ में एक हल्की सी काँप थी।
अजीत ने कुसुम की ओर देखा, और फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए। कुसुम एक पल के लिए हैरान रह गई। उसे लगा था कि यह सिर्फ़ मज़ाक था, जैसा वह और अजीत अक्सर करते थे। मगर आज पहली बार उसके देवर ने हद पार कर दी थी। बारिश का मौसम, उनके भीगे हुए बदन, या कुसुम के अंदर की उत्तेजना—कुछ तो था, जिसने उसे अजीत का साथ देने के लिए मजबूर कर दिया। वह धीरे-धीरे अजीत के होंठों का जवाब देने लगी।


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दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे के होंठों को चूमते रहे। जब उनके होंठ अलग हुए, तो कुसुम को शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने नज़रें दूसरी ओर कर लीं।
अजीत अभी भी अपनी भाभी को देख रहा था। बारिश की बूँदें उसके बदन को और उत्तेजित कर रही थीं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। कुसुम का मखमली पेट और गहरी नाभि अब अजीत की आँखों के सामने थी। कुसुम आँखें नीचे किए खड़ी रही, उसका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल था। अजीत ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम के पेट पर रख दिया। कुसुम के बदन में जैसे बिजली सी दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। अजीत ने फिर से अपने होंठ कुसुम के होंठों से मिला दिए और उसके पेट को सहलाने लगा।

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कुसुम इस आनंद में इतनी खो गई कि उसे होश तब आया, जब वह अजीत की गोद में थी। उसकी साड़ी और ब्लाउज़ बदन से अलग पेड़ के नीचे पड़े थे। वह अब सिर्फ़ पेटीकोट और ब्रा में थी। वह कुछ सोच पाती, इससे पहले अजीत ने फिर से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

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कुसुम की शर्म अब धीरे-धीरे उत्तेजना में बदल रही थी। अजीत ने उसकी ब्रा को खींचकर उतार दिया, और कुसुम की मोटी-मोटी चूचियाँ अब पूरी तरह नंगी थीं। बारिश की बूँदें उन पर टपक रही थीं, जिससे वे और चमक रही थीं। अजीत ने कुसुम की चूचियों को अपने हाथों में लिया और उन्हें मसलने लगा। “आह… भाभी… क्या मस्त चूचियाँ हैं तुम्हारी,” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इनका रस तो मैं कबसे चखना चाहता था।”
कुसुम ने हल्के से विरोध किया। “अरे… देवर जी… नहीं… ये गलत है…” उसकी आवाज़ में शर्म थी, मगर उसका बदन अजीत के स्पर्श का जवाब दे रहा था।
“गलत क्या, भाभी?” अजीत ने उसकी चूचियों को और ज़ोर से दबाते हुए कहा। “जब बदन मज़ा ले रहा है, तो गलत क्या? बोलो, मज़ा नहीं आ रहा तुम्हें?”
कुसम शरमाते हुए चुप रही, मगर उसकी साँसें तेज़ थीं। अजीत ने उसका पेटीकोट ऊपर खींचा और उसे कमर तक इकट्ठा कर दिया। कुसुम की चूत अब बारिश में भीगकर और रसीली हो गई थी। अजीत ने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत पर फेरनी शुरू कीं। “आह… भाभी… कितनी गीली है तुम्हारी चूत… ये तो मुझसे मिलने को तड़प रही है,” उसने कहा।
“अरे… नहीं… अजीत… छोड़ो…” कुसुम ने हल्के से कहा, मगर उसका विरोध अब कमज़ोर पड़ रहा था। उसका बदन अजीत के स्पर्श में पिघल रहा था।
अजीत ने कुसुम को पेड़ के तने से टिका दिया और अपनी धोती खोल दी। उसका मोटा, कड़क लंड बारिश में चमक रहा था। “देखो, भाभी, ये कितना तड़प रहा है तुम्हारी चूत के लिए,” उसने वासना भरे लहजे में कहा। उसने कुसुम की टाँगें फैलाईं और अपने लंड को उसकी चूत के द्वार पर रखा। कुसुम ने एक आखिरी बार शरमाते हुए कहा, “अजीत… नहीं… ये ठीक नहीं…”
मगर अजीत ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसने एक ज़ोरदार धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में जड़ तक समा गया। कुसुम की चीख निकल गई। “आह… अजीत… ओह…” उसकी साँसें काँप रही थीं। अजीत ने उसकी कमर थाम ली और धक्के लगाना शुरू कर दिया। “आह… भाभी… कितनी कसी हुई चूत है तुम्हारी… आह… मज़ा आ रहा है… बोलो, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है न?” उसने गंदी बातें करते हुए कहा।

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कुसुम की शुरुआती शर्म अब पूरी तरह टूट चुकी थी। वह अजीत के धक्कों का जवाब अपनी कमर हिलाकर दे रही थी। “आह… हाँ… अजीत… आह… मज़ा आ रहा है…” उसने हाँफते हुए कहा। उसका बदन बारिश और वासना में तर था। अजीत ने उसकी चूचियों को मसलते हुए और ज़ोर से धक्के लगाए। “आह… भाभी… तुम्हारी चूत को तो मैं रोज़ चोदना चाहता हूँ… आह… कितना रस है इसमें…” वह गुर्राते हुए बोला।
“आह… अजीत… चोदो… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को भर दो…” कुसुम ने भी अब खुलकर गंदी बातें शुरू कर दीं। उसकी सारी शर्म, सारी मर्यादा बारिश के पानी के साथ बह चुकी थी। वह अजीत के लंड के हर धक्के का आनंद ले रही थी।
अजीत ने कुसुम को ज़मीन पर लिटा दिया और उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उसने और तेज़ी से धक्के लगाना शुरू किया। “आह… भाभी… तुम्हारी चूचियाँ देख… कैसे नाच रही हैं… आह… साली, तू तो पूरी मलाई है…” उसने कहा। कुसुम की चूचियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं, और उसका मखमली पेट बारिश में चमक रहा था।
“आह… अजीत… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को फाड़ दो…” कुसुम ने तड़पते हुए कहा। उसका बदन अब पूरी तरह अजीत के हवाले था। बारिश की बूँदें उनके नंगे बदनों पर टपक रही थीं, और जंगल का सन्नाटा उनकी आहों और सिसकियों से गूँज रहा था।
अजीत ने कुसुम की चूत में अपने लंड को और ज़ोर से ठूँसा। “आह… भाभी… तुम्हारा बदन तो स्वर्ग है… आह… अब रोज़ चोदूँगा…” उसने गुर्राते हुए कहा। कुसुम की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसका बदन काँपने लगा, और वह स्खलित होने वाली थी। “आह… अजीत… मैं… आह… मैं जा रही हूँ…” उसने चीखते हुए कहा। उसी पल अजीत भी अपने चरम पर था। उसने एक आखिरी धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में पिचकारी मारने लगा। दोनों एक साथ स्खलित हो गए।
वे ज़मीन पर लेट गए, बारिश में भीगे हुए, हाँफते हुए। कुसुम की साँसें अभी भी तेज़ थीं। उसका मन ग्लानि और आनंद के बीच झूल रहा था। यह गलत था, मगर इस सुख ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। अजीत ने कुसुम की ओर देखा और मुस्कुराया। “क्या बात है, भाभी… ये बारिश तो सचमुच आग बुझाने वाली थी।”
कुसुम ने शरमाते हुए उसकी ओर देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी साड़ी उठाकर पहनने लगी। बारिश अब धीमी पड़ रही थी, मगर उनके बदनों की गर्मी अभी बाकी थी। पर गर्मी के साथ साथ अभी जो हुआ उसकी ग्लानि के बादल भी छाने लगे थे।


हवेली के बाहर सोनू का मन काम में नहीं लग रहा था। बारिश की वजह से काम कम था, मगर उसका दिमाग कहीं और था। हलवाइन की मोटी चूचियाँ, लाली की थिरकती कमर, और कभी-कभी कम्मू की माँ सुमन और ताई कुस के भरे हुए बदन उसके मन में कौंध रहे थे। कर्मा ने उसके मन में यह बीज बो दिया था, और अब वह इन खयालों से परेशान था। वह सोच रहा था कि इन विचारों का क्या करे। उसे लगा कि अगर कोई उसकी मदद कर सकता है, तो वह कर्मा ही है। वह बेसब्री से कर्मा के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।
जल्द ही कर्मा हवेली से बाहर निकला। सोनू उसे देखते ही खुश हो गया। “अरे, कर्मा भैया, आज बड़ी देर लगा दी अंदर!”
कर्मा ने सोनू को मुस्कुराकर देखा और मन ही मन सोचा, “अगर तुझे पता होता कि मैं अंदर क्या कर रहा था, तो ये सवाल नहीं पूछता।” उसने बेपरवाही से कहा, “अरे, हाँ, थोड़ा देर से उठा। तू बता, काम हो गया?”
“बारिश की वजह से काम ही नहीं है कुछ,” सोनू ने जवाब दिया।
“हाँ, ये तो है,” कर्मा ने कहा।
सोनू ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कुछ बात करनी थी।”
“हाँ, बोल न, इतना शरमा क्या रहा है?” कर्मा ने हँसते हुए कहा।
सोनू ने हिम्मत जुटाकर अपने खयालों के बारे में बताया। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “लड़का बड़ा हो रहा है। ये तो होगा ही, और होना भी चाहिए।”
“पर, भैया, मुझे लगता है मैं गलत कर रहा हूँ,” सोनू ने उदास लहजे में कहा।
“अरे, इसमें गलत क्या है?” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “जवान है, लंड तो खड़ा होगा ही। तू बता, भूख लगती है तो क्या करता है?”
“खाना खाता हूँ,” सोनू ने जवाब दिया।
“वैसे ही, जैसे वो पेट की भूख है, ये बदन की भूख है,” कर्मा ने समझाया। “जब पेट की भूख गलत नहीं, तो बदन की गलत कैसे हो सकती है?”
“हाँ, ये भी है,” सोनू ने कर्मा की बातों से प्रभावित होकर कहा।
“तभी तो कहता हूँ, खुलकर मज़े ले,” कर्मा ने कहा। “सही-गलत के चक्कर में रहा, तो हाथ मलता रह जाएगा।”
“पर कभी-कभी किसी ऐसे के लिए भी गलत खयाल आ जाते हैं, जिसके लिए नहीं आने चाहिए,” सोनू ने संकोच से कहा। “फिर ग्लानि होती है।”
“अरे, ग्लानि कैसी?” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “तुझे भूख लगी है और खाना सामने है, तो खाने का मन करेगा ही। अब ये थोड़े सोचेगा कि खाना किसी और का है, इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए।”
“फिर क्या करना चाहिए?” सोनू ने पूछा।
“झिझक खत्म कर,” कर्मा ने कहा। “जिसके बारे में चाहे, सोच। हिला। और मौका मिले, तो चोदने से भी पीछे मत रह।”
“पर अगर उनके और मेरे बीच ऐसा रिश्ता हो, जिसमें ये सब गलत हो या पाप हो?” सोनू ने चिंता से पूछा।
“देख, लंड और चूत का रिश्ता सिर्फ़ एक ही होता है—चुदाई का,” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “बाकी सारे रिश्ते समाज के बनाए हुए हैं। अगर किसी को देखकर लंड खड़ा हो रहा है, तो उसे चोदने में कोई बुराई नहीं।”
कर्मा की बातें सोनू के दिमाग पर गहरा असर कर रही थीं। “वैसे, बता तो, किसके बारे में सोच रहा था?” कर्मा ने पूछा।
“कई सारे लोगों के,” सोनू ने शरमाते हुए कहा।
“कौन-कौन?” कर्मा ने उत्साह से पूछा।
“हलवाइन, लाली… और…” सोनू रुक गया।
“और?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।
सोनू थोड़ा सोच में पड़ गया। कर्मा ने हँसकर कहा, “इतना सोच में रहेगा, तो कैसे मज़े ले पाएगा?”
सोनू ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुमन और कुसum चाची के बारे में।”
कर्मा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अरे, वाह! कम्मू की माँ और ताई? वैसे, इसमें गलत क्या है? दोनों तो एक से बढ़कर एक हैं।”
“कुछ गलत नहीं है? दोस्त की माँ के बारे में सोचना?” सोनू ने संकोच से पूछा।
“क्या तुझे यकीन है कि वो तेरी माँ के बारे में ऐसा नहीं सोचते होंगे?” कर्मा ने सवाल दागा।
यह सुनकर सोनू सोच में पड़ गया। तभी बिमला दोनों के लिए चाय लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। सोनू के दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, और कर्मा के होंठों पर एक चालाक मुस्कान थी।



जारी रहेगी

Bahut hi mast update he Arthur Morgan Bro,

Karma ne sonu ki maa ko bhi apne jaal me fansa liya..............

Aur dustri taraf ajit aur kusum ne baarish me chdai ka bharpur maja liya...........

Sonu karma ke sath rehkar jald hi apne hi parivar ki kisi lugai chodne wala he.......

Keep rocking Bro
 

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Milf lover.
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Great update garma garam
रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।

बारहवाँ अध्याय


रजनी कर्मा की बाहों में लेटी थी, दोनों अभी भी नंगे थे। कर्मा के हाथ में एक किताब थी, जिसमें चुदाई के अलग-अलग आसनों और कामुक क्रियाओं की तस्वीरें थीं। रजनी की आँखें आश्चर्य से फैली हुई थीं। “हाय दईया, ये सब भी होता है?” उसने हैरानी भरे लहजे में कहा।

“और क्या, चाची? और बहुत मज़ा भी आता है, करके देखो,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, किताब की तस्वीरों को और करीब से दिखाते हुए।

“अच्छा, बोल तो ऐसे रहे हो जैसे सब किया हो तुमने,” रजनी ने हँसते हुए तंज कसा।

“किया नहीं है, पर कर तो सकता हूँ—तुम्हारे साथ,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा।

“धत्त, बदमाश!” रजनी ने हँसते हुए कहा, मगर उसकी आँखों में शरारत और उत्तेजना की चमक थी।

कर्मा ने रजनी को अपने लंड की ओर धकेलते हुए कहा, “चाची, करो ना, लो ना अपने मुँह में।”

रजनी ने कर्मा की आँखों में देखा, थोड़ा शरमाते हुए बोली, “छी, ये मुँह में लेने वाली चीज़ थोड़े ही है!”

“अच्छा, एक बार लेकर देखो,” कर्मा ने उकसाया। “अगर अच्छा न लगे, तो मत करना।”

“बस एक बार?” रजनी ने संकोच भरे लहजे में पूछा।

“हाँ, पक्का,” कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा। “पर अगर अच्छा लगे, तो रुकना भी मत।”

रजनी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कर्मा की ओर देखा। वह कर्मा की बेपरवाह और खिलंदड़ी बातों में खो चुकी थी। कर्मा का व्यवहार उसे किसी तरह का दबाव नहीं देता था; वह उसके साथ खेलता था, बराबरी का व्यवहार करता था। रजनी को लगता था जैसे वह फिर से एक जवान, कुंवारी लड़की बन गई हो। शायद यही वजह थी कि वह कर्मा को कुछ भी मना नहीं कर पाती थी। दूसरी बात, उसकी उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। नीलेश और फिर सरोज-बिमला के साथ के अनुभवों ने उसे अपने बदन के सुख से परिचित करा दिया था। अब वह उस सुख का पूरा आनंद लेना चाहती थी। सही-गलत, समाज, मर्यादा—ये सब अब उसके लिए फीके पड़ चुके थे। जब तक उसने इनकी परवाह की थी, उसे सिर्फ़ दुख और दुत्कार मिली थी। मगर जब से उसने अपने बदन की सुनना शुरू किया, उसे सुख ही सुख मिल रहा था। उसकी परेशानियाँ जैसे गायब हो गई थीं।

रजनी ने अपना सिर झुकाया और कर्मा के लंड पर अपने होंठ टिका दिए। कर्मा उस गर्म, मुलायम स्पर्श से मचल उठा। “आह… चाची… ओह… अहम्म…” उसकी आहें कमरे में गूँज उठीं। रजनी को यह ताकत अच्छी लग रही थी—वह अपने होंठों से एक मर्द को, या यों कहें, अपने बेटे की उम्र के लड़के को तड़पा सकती थी। वह उसके साथ खेल सकती थी। उसने थोड़ा और मुँह खोला और कर्मा के लंड के टोपे को अपने मुँह में भर लिया। उसका कड़क, गर्म अहसास और हल्का सा नमकीन स्वाद पहले तो रजनी को अजीब लगा। मगर कुछ पल बाद उसे यह उतना बुरा भी नहीं लगा। उसने लंड को मुँह से निकाला और कर्मा की ओर देखा।

“क्या हुआ, चाची? अच्छा नहीं लगा?” कर्मा ने पूछा, उसकी आँखों में शरारत थी।

“थोड़ा अलग सा है,” रजनी ने कहा। “पर इतना बुरा भी नहीं।”

“तो वापस लो न,” कर्मा ने उकसाया।

“कितना बेसब्र है तू, लल्ला,” रजनी ने हँसते हुए कहा। उसने फिर से लंड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे वह अभ्यस्त हो गई। पहले वह हल्के से चूसती, फिर निकाल लेती।

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हर बार वह थोड़ा और गहराई तक लेने लगी। कर्मा आहें भर रहा था। “आह… चाची… ओह…” उसकी सिसकियाँ रजनी को और उत्तेजित कर रही थीं। वह अब पूरी लगन से कर्मा का लंड चूस रही थी, उसका आधे से ज़्यादा लंड उसके मुँह में समा रहा था। कर्मा का बदन मचल रहा था। उसने रजनी का सिर पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर दबा दिया। अगले ही पल वह गुर्राते हुए झड़ने लगा। एक के बाद एक पिचकारी रजनी के मुँह में भरने लगी। रजनी, जिसका मुँह दबा हुआ था, के पास कोई चारा नहीं था। उसने कर्मा का रस गटक लिया। उसे उसकी गंध और स्वाद बुरा नहीं लगा, बल्कि यह उसे और उत्तेजित कर गया।

झड़ने के बाद कर्मा ने रजनी का सिर छोड़ा। रजनी ने लंड निकाला और हाँफते हुए पीछे हट गई। दोनों बिस्तर पर लेटे, हाँफते हुए एक-दूसरे के बगल में। कुछ देर बाद रजनी उठी और अपने कपड़े पहनने लगी।

“अभी से जा रही हो?” कर्मा ने पूछा, उसकी आवाज़ में शरारत अब भी बाकी थी।

“हाँ, और अब तू भी उठ। नहा ले, बदन पसीने से महक रहा है,” रजनी ने हल्के से डाँटते हुए कहा। उसने कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई। कर्मा लेटा रहा, चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान लिए। फिर वह उठा और नहाने चला गया।

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**कम्मू का घर**

सुबह की पहली किरण के साथ कम्मू की आँखें खुलीं। उसे रात का दृश्य सता रहा था—उसके माँ-पापा की चुदाई, और फिर उसकी माँ के नंगे बदन को याद करके उसने जो किया। ग्लानि उसके मन को खाए जा रही थी। “हाय, मैंने अपनी माँ को सोचकर हिलाया। ये कितना बड़ा पाप है!” वह खुद को कोस रहा था। मगर उसकी आँखों के सामने अब भी वही दृश्य था—सुमन का भरा हुआ बदन, उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, गहरी नाभि, और रसीली चूत। वह खुद को समझाने की कोशिश करता हुआ उठा और सुबह के काम निपटाने लगा।

आज का दिन बादलों से घिरा हुआ था। फूल सिंह के घर में चहल-पहल थी। अजीत और कुसुम शहर जा रहे थे, धीरज की शादी के लिए कपड़े और दूसरा सामान लेने। फूल सिंह सुबह-सुबह खेतों की ओर निकल चुके थे। उन्हें शहर जाना और खरीदारी करना पसंद नहीं था, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी अजीत पर थी। सुमन, अनामिका, और अंजू को घर की दीवारें पोतने का काम था। धीरज, जतन, और कम्मू को बारिश से पहले उपले और भूसा झोपड़ी में रखने का काम मिला था। कुल मिलाकर, सबके पास कोई न कोई काम था।


सज्जनपुर से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क आती थी, जहाँ से शहर के लिए बस मिलती थी। सज्जनपुर और सड़क के बीच सिर्फ़ खेत और जंगल थे। अजीत और कुसुम सुबह जल्दी निकल पड़े। कुसुम ने लाल साड़ी पहनी थी, जो उसके भरे हुए बदन को और निखार रही थी। अजीत ने नीला कुरता-पायजामा पहना था, और कंधे पर गमछा डाला हुआ था।

“इस लाल साड़ी में तो बिल्कुल लाल परी लग रही हो, भाभी,” अजीत ने गाँव से बाहर निकलते ही मज़ाक में छेड़ा।

“तुम भी इस नीले कुरते में नीले कबूतर लग रहे हो, देवर जी,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया।

दोनों मज़ाक करते हुए चल रहे थे। करीब डेढ़ किलोमीटर चले होंगे कि अचानक बादल गरजने लगे, और बारिश शुरू हो गई। “धत्त, तेरी की! लो, हो गई खरीदारी!” कुसुम ने झल्लाते हुए कहा।

“अरे, भाभी, उधर जंगल में चलो,” अजीत ने कहा। “पेड़ों के नीचे थोड़ा बच जाएँगे।”

“हाँ, यहाँ तो तुरंत भीग जाएँगे,” कुसुम ने सहमति जताई।

दोनों रास्ते से हटकर जंगल की ओर बढ़ गए। वे घने पेड़ों की तलाश में थे, मगर बारिश तेज़ थी। जंगल में घुसने के बावजूद वे ज़्यादा देर नहीं बच पाए। दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। कुसुम की साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी, और उसका भरा हुआ बदन अब और उभर रहा था। उसका ब्लाउज़ उसकी मोटी चूचियों को तान रहा था, और गीली साड़ी उसकी गहरी नाभि और मांसल पेट को उघाड़ रही थी। अजीत का कुरता भी भीगकर चिपक गया था, और वह बार-बार अपनी भाभी की ओर देख रहा था।

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वे एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो गए, मगर बारिश की बूँदें अब भी उनकी देह को भिगो रही थीं। कुसुम ने अपनी साड़ी निचोड़ी और हँसते हुए कहा, “हाय, अब तो सारा मज़ा खराब हो गया।”

अजीत ने उसकी ओर देखा। उसकी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिक गईं। “अरे, भाभी, मज़ा तो अब शुरू हुआ है,” उसने शरारत भरे लहजे में कहा।

कुसुम ने उसकी ओर देखा और हँस पड़ी। “तूम भी न, देवर जी, मौके का फायदा उठाने से चूकते नहीं।”

दोनों हँसते हुए पेड़ के नीचे खड़े थे, मगर बारिश की ठंडक और उनके भीगे हुए बदनों ने माहौल को एक नई गर्मी दे दी थी।

कुसुम की लाल साड़ी उसके बदन से चिपककर उसकी मोटी चूचियों, गहरी नाभि, और भरे हुए चूतड़ों को और उभार रही थी। अजीत का नीला कुरता भीगकर उसकी देह से लिपट गया था, और उसकी आँखों में वासना की चमक साफ़ झलक रही थी। दोनों के बीच मज़ाकिया छेड़छाड़ अब एक अलग ही रंग ले रही थी।
“वैसे, भाभी, इस बारिश में तुम्हें कुछ करने का मन नहीं कर रहा?” अजीत ने शरारत भरे लहजे में पूछा, अपनी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिकाते हुए।
“कर रहा है न, घर जाने का मन कर रहा है,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया, अपनी साड़ी निचोड़ते हुए।
“अरे, ऐसी बारिश में घर जाने का क्या मतलब?” अजीत ने पास आते हुए कहा। “ऐसी बारिश तो आग शांत करने के लिए होती है।”
“अच्छा, इतना भीग गए, फिर कौन सी आग है जो बुझी नहीं तुम्हारी?” कुसुम ने भौंहें चढ़ाकर, मज़ाक में तंज कसा।
“अंदर की आग है, भाभी,” अजीत ने अपनी आवाज़ को और गहरा करते हुए कहा।
“अंदर की कौन सी? खुलकर बताओ,” कुसुम ने शरारत से पूछा, उसकी आँखों में भी अब एक चमक थी।
“अरे, भाभी, बनो मत। तुम सब जानती हो,” अजीत ने हँसते हुए कहा।
“नहीं तो, मैं कुछ नहीं जानती। तुम ही बताओ,” कुसुम ने मासूमियत का नाटक करते हुए कहा।
“क्यों, भैया ने कभी आग नहीं बुझाई तुम्हारी, बारिश में भीगते हुए?” अजीत ने और पास आते हुए पूछा।
“अरे, वो और बारिश में भीगेंगे, वो भी मेरे साथ?” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया। “तुम अपने भैया को नहीं जानते क्या?”
“जानता हूँ, पर बदन की आग कुछ भी करवा सकती है,” अजीत ने अपनी नज़रें कुसुम की चूचियों पर टिकाते हुए कहा।
“लगता है, बहुत जोर की आग है तुम्हारे अंदर, देवर जी,” कुसुम ने छेड़ते हुए कहा। “बुझा क्यों नहीं लेते?”
“बुझा तो लूँ, पर तुम हाँ ही नहीं कहती,” अजीत ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया।
“अरे, आग तुम्हारी है, इसमें मैं क्या हाँ-ना कहूँ? बुझा लो,” कुसुम ने हँसते हुए कहा।
“पक्का?” अजीत ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।
“हाँ, पक्का,” कुसुम ने बेपरवाही से कहा, मगर उसकी आवाज़ में एक हल्की सी काँप थी।
अजीत ने कुसुम की ओर देखा, और फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए। कुसुम एक पल के लिए हैरान रह गई। उसे लगा था कि यह सिर्फ़ मज़ाक था, जैसा वह और अजीत अक्सर करते थे। मगर आज पहली बार उसके देवर ने हद पार कर दी थी। बारिश का मौसम, उनके भीगे हुए बदन, या कुसुम के अंदर की उत्तेजना—कुछ तो था, जिसने उसे अजीत का साथ देने के लिए मजबूर कर दिया। वह धीरे-धीरे अजीत के होंठों का जवाब देने लगी।


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दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे के होंठों को चूमते रहे। जब उनके होंठ अलग हुए, तो कुसुम को शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने नज़रें दूसरी ओर कर लीं।
अजीत अभी भी अपनी भाभी को देख रहा था। बारिश की बूँदें उसके बदन को और उत्तेजित कर रही थीं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। कुसुम का मखमली पेट और गहरी नाभि अब अजीत की आँखों के सामने थी। कुसुम आँखें नीचे किए खड़ी रही, उसका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल था। अजीत ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम के पेट पर रख दिया। कुसुम के बदन में जैसे बिजली सी दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। अजीत ने फिर से अपने होंठ कुसुम के होंठों से मिला दिए और उसके पेट को सहलाने लगा।

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कुसुम इस आनंद में इतनी खो गई कि उसे होश तब आया, जब वह अजीत की गोद में थी। उसकी साड़ी और ब्लाउज़ बदन से अलग पेड़ के नीचे पड़े थे। वह अब सिर्फ़ पेटीकोट और ब्रा में थी। वह कुछ सोच पाती, इससे पहले अजीत ने फिर से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

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कुसुम की शर्म अब धीरे-धीरे उत्तेजना में बदल रही थी। अजीत ने उसकी ब्रा को खींचकर उतार दिया, और कुसुम की मोटी-मोटी चूचियाँ अब पूरी तरह नंगी थीं। बारिश की बूँदें उन पर टपक रही थीं, जिससे वे और चमक रही थीं। अजीत ने कुसुम की चूचियों को अपने हाथों में लिया और उन्हें मसलने लगा। “आह… भाभी… क्या मस्त चूचियाँ हैं तुम्हारी,” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इनका रस तो मैं कबसे चखना चाहता था।”
कुसुम ने हल्के से विरोध किया। “अरे… देवर जी… नहीं… ये गलत है…” उसकी आवाज़ में शर्म थी, मगर उसका बदन अजीत के स्पर्श का जवाब दे रहा था।
“गलत क्या, भाभी?” अजीत ने उसकी चूचियों को और ज़ोर से दबाते हुए कहा। “जब बदन मज़ा ले रहा है, तो गलत क्या? बोलो, मज़ा नहीं आ रहा तुम्हें?”
कुसम शरमाते हुए चुप रही, मगर उसकी साँसें तेज़ थीं। अजीत ने उसका पेटीकोट ऊपर खींचा और उसे कमर तक इकट्ठा कर दिया। कुसुम की चूत अब बारिश में भीगकर और रसीली हो गई थी। अजीत ने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत पर फेरनी शुरू कीं। “आह… भाभी… कितनी गीली है तुम्हारी चूत… ये तो मुझसे मिलने को तड़प रही है,” उसने कहा।
“अरे… नहीं… अजीत… छोड़ो…” कुसुम ने हल्के से कहा, मगर उसका विरोध अब कमज़ोर पड़ रहा था। उसका बदन अजीत के स्पर्श में पिघल रहा था।
अजीत ने कुसुम को पेड़ के तने से टिका दिया और अपनी धोती खोल दी। उसका मोटा, कड़क लंड बारिश में चमक रहा था। “देखो, भाभी, ये कितना तड़प रहा है तुम्हारी चूत के लिए,” उसने वासना भरे लहजे में कहा। उसने कुसुम की टाँगें फैलाईं और अपने लंड को उसकी चूत के द्वार पर रखा। कुसुम ने एक आखिरी बार शरमाते हुए कहा, “अजीत… नहीं… ये ठीक नहीं…”
मगर अजीत ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसने एक ज़ोरदार धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में जड़ तक समा गया। कुसुम की चीख निकल गई। “आह… अजीत… ओह…” उसकी साँसें काँप रही थीं। अजीत ने उसकी कमर थाम ली और धक्के लगाना शुरू कर दिया। “आह… भाभी… कितनी कसी हुई चूत है तुम्हारी… आह… मज़ा आ रहा है… बोलो, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है न?” उसने गंदी बातें करते हुए कहा।

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कुसुम की शुरुआती शर्म अब पूरी तरह टूट चुकी थी। वह अजीत के धक्कों का जवाब अपनी कमर हिलाकर दे रही थी। “आह… हाँ… अजीत… आह… मज़ा आ रहा है…” उसने हाँफते हुए कहा। उसका बदन बारिश और वासना में तर था। अजीत ने उसकी चूचियों को मसलते हुए और ज़ोर से धक्के लगाए। “आह… भाभी… तुम्हारी चूत को तो मैं रोज़ चोदना चाहता हूँ… आह… कितना रस है इसमें…” वह गुर्राते हुए बोला।
“आह… अजीत… चोदो… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को भर दो…” कुसुम ने भी अब खुलकर गंदी बातें शुरू कर दीं। उसकी सारी शर्म, सारी मर्यादा बारिश के पानी के साथ बह चुकी थी। वह अजीत के लंड के हर धक्के का आनंद ले रही थी।
अजीत ने कुसुम को ज़मीन पर लिटा दिया और उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उसने और तेज़ी से धक्के लगाना शुरू किया। “आह… भाभी… तुम्हारी चूचियाँ देख… कैसे नाच रही हैं… आह… साली, तू तो पूरी मलाई है…” उसने कहा। कुसुम की चूचियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं, और उसका मखमली पेट बारिश में चमक रहा था।
“आह… अजीत… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को फाड़ दो…” कुसुम ने तड़पते हुए कहा। उसका बदन अब पूरी तरह अजीत के हवाले था। बारिश की बूँदें उनके नंगे बदनों पर टपक रही थीं, और जंगल का सन्नाटा उनकी आहों और सिसकियों से गूँज रहा था।
अजीत ने कुसुम की चूत में अपने लंड को और ज़ोर से ठूँसा। “आह… भाभी… तुम्हारा बदन तो स्वर्ग है… आह… अब रोज़ चोदूँगा…” उसने गुर्राते हुए कहा। कुसुम की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसका बदन काँपने लगा, और वह स्खलित होने वाली थी। “आह… अजीत… मैं… आह… मैं जा रही हूँ…” उसने चीखते हुए कहा। उसी पल अजीत भी अपने चरम पर था। उसने एक आखिरी धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में पिचकारी मारने लगा। दोनों एक साथ स्खलित हो गए।
वे ज़मीन पर लेट गए, बारिश में भीगे हुए, हाँफते हुए। कुसुम की साँसें अभी भी तेज़ थीं। उसका मन ग्लानि और आनंद के बीच झूल रहा था। यह गलत था, मगर इस सुख ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। अजीत ने कुसुम की ओर देखा और मुस्कुराया। “क्या बात है, भाभी… ये बारिश तो सचमुच आग बुझाने वाली थी।”
कुसुम ने शरमाते हुए उसकी ओर देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी साड़ी उठाकर पहनने लगी। बारिश अब धीमी पड़ रही थी, मगर उनके बदनों की गर्मी अभी बाकी थी। पर गर्मी के साथ साथ अभी जो हुआ उसकी ग्लानि के बादल भी छाने लगे थे।


हवेली के बाहर सोनू का मन काम में नहीं लग रहा था। बारिश की वजह से काम कम था, मगर उसका दिमाग कहीं और था। हलवाइन की मोटी चूचियाँ, लाली की थिरकती कमर, और कभी-कभी कम्मू की माँ सुमन और ताई कुस के भरे हुए बदन उसके मन में कौंध रहे थे। कर्मा ने उसके मन में यह बीज बो दिया था, और अब वह इन खयालों से परेशान था। वह सोच रहा था कि इन विचारों का क्या करे। उसे लगा कि अगर कोई उसकी मदद कर सकता है, तो वह कर्मा ही है। वह बेसब्री से कर्मा के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।
जल्द ही कर्मा हवेली से बाहर निकला। सोनू उसे देखते ही खुश हो गया। “अरे, कर्मा भैया, आज बड़ी देर लगा दी अंदर!”
कर्मा ने सोनू को मुस्कुराकर देखा और मन ही मन सोचा, “अगर तुझे पता होता कि मैं अंदर क्या कर रहा था, तो ये सवाल नहीं पूछता।” उसने बेपरवाही से कहा, “अरे, हाँ, थोड़ा देर से उठा। तू बता, काम हो गया?”
“बारिश की वजह से काम ही नहीं है कुछ,” सोनू ने जवाब दिया।
“हाँ, ये तो है,” कर्मा ने कहा।
सोनू ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कुछ बात करनी थी।”
“हाँ, बोल न, इतना शरमा क्या रहा है?” कर्मा ने हँसते हुए कहा।
सोनू ने हिम्मत जुटाकर अपने खयालों के बारे में बताया। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “लड़का बड़ा हो रहा है। ये तो होगा ही, और होना भी चाहिए।”
“पर, भैया, मुझे लगता है मैं गलत कर रहा हूँ,” सोनू ने उदास लहजे में कहा।
“अरे, इसमें गलत क्या है?” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “जवान है, लंड तो खड़ा होगा ही। तू बता, भूख लगती है तो क्या करता है?”
“खाना खाता हूँ,” सोनू ने जवाब दिया।
“वैसे ही, जैसे वो पेट की भूख है, ये बदन की भूख है,” कर्मा ने समझाया। “जब पेट की भूख गलत नहीं, तो बदन की गलत कैसे हो सकती है?”
“हाँ, ये भी है,” सोनू ने कर्मा की बातों से प्रभावित होकर कहा।
“तभी तो कहता हूँ, खुलकर मज़े ले,” कर्मा ने कहा। “सही-गलत के चक्कर में रहा, तो हाथ मलता रह जाएगा।”
“पर कभी-कभी किसी ऐसे के लिए भी गलत खयाल आ जाते हैं, जिसके लिए नहीं आने चाहिए,” सोनू ने संकोच से कहा। “फिर ग्लानि होती है।”
“अरे, ग्लानि कैसी?” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “तुझे भूख लगी है और खाना सामने है, तो खाने का मन करेगा ही। अब ये थोड़े सोचेगा कि खाना किसी और का है, इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए।”
“फिर क्या करना चाहिए?” सोनू ने पूछा।
“झिझक खत्म कर,” कर्मा ने कहा। “जिसके बारे में चाहे, सोच। हिला। और मौका मिले, तो चोदने से भी पीछे मत रह।”
“पर अगर उनके और मेरे बीच ऐसा रिश्ता हो, जिसमें ये सब गलत हो या पाप हो?” सोनू ने चिंता से पूछा।
“देख, लंड और चूत का रिश्ता सिर्फ़ एक ही होता है—चुदाई का,” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “बाकी सारे रिश्ते समाज के बनाए हुए हैं। अगर किसी को देखकर लंड खड़ा हो रहा है, तो उसे चोदने में कोई बुराई नहीं।”
कर्मा की बातें सोनू के दिमाग पर गहरा असर कर रही थीं। “वैसे, बता तो, किसके बारे में सोच रहा था?” कर्मा ने पूछा।
“कई सारे लोगों के,” सोनू ने शरमाते हुए कहा।
“कौन-कौन?” कर्मा ने उत्साह से पूछा।
“हलवाइन, लाली… और…” सोनू रुक गया।
“और?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।
सोनू थोड़ा सोच में पड़ गया। कर्मा ने हँसकर कहा, “इतना सोच में रहेगा, तो कैसे मज़े ले पाएगा?”
सोनू ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुमन और कुसum चाची के बारे में।”
कर्मा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अरे, वाह! कम्मू की माँ और ताई? वैसे, इसमें गलत क्या है? दोनों तो एक से बढ़कर एक हैं।”
“कुछ गलत नहीं है? दोस्त की माँ के बारे में सोचना?” सोनू ने संकोच से पूछा।
“क्या तुझे यकीन है कि वो तेरी माँ के बारे में ऐसा नहीं सोचते होंगे?” कर्मा ने सवाल दागा।
यह सुनकर सोनू सोच में पड़ गया। तभी बिमला दोनों के लिए चाय लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। सोनू के दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, और कर्मा के होंठों पर एक चालाक मुस्कान थी।



जारी रहेगी
 

Deepaksoni

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रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।

बारहवाँ अध्याय


रजनी कर्मा की बाहों में लेटी थी, दोनों अभी भी नंगे थे। कर्मा के हाथ में एक किताब थी, जिसमें चुदाई के अलग-अलग आसनों और कामुक क्रियाओं की तस्वीरें थीं। रजनी की आँखें आश्चर्य से फैली हुई थीं। “हाय दईया, ये सब भी होता है?” उसने हैरानी भरे लहजे में कहा।

“और क्या, चाची? और बहुत मज़ा भी आता है, करके देखो,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, किताब की तस्वीरों को और करीब से दिखाते हुए।

“अच्छा, बोल तो ऐसे रहे हो जैसे सब किया हो तुमने,” रजनी ने हँसते हुए तंज कसा।

“किया नहीं है, पर कर तो सकता हूँ—तुम्हारे साथ,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा।

“धत्त, बदमाश!” रजनी ने हँसते हुए कहा, मगर उसकी आँखों में शरारत और उत्तेजना की चमक थी।

कर्मा ने रजनी को अपने लंड की ओर धकेलते हुए कहा, “चाची, करो ना, लो ना अपने मुँह में।”

रजनी ने कर्मा की आँखों में देखा, थोड़ा शरमाते हुए बोली, “छी, ये मुँह में लेने वाली चीज़ थोड़े ही है!”

“अच्छा, एक बार लेकर देखो,” कर्मा ने उकसाया। “अगर अच्छा न लगे, तो मत करना।”

“बस एक बार?” रजनी ने संकोच भरे लहजे में पूछा।

“हाँ, पक्का,” कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा। “पर अगर अच्छा लगे, तो रुकना भी मत।”

रजनी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कर्मा की ओर देखा। वह कर्मा की बेपरवाह और खिलंदड़ी बातों में खो चुकी थी। कर्मा का व्यवहार उसे किसी तरह का दबाव नहीं देता था; वह उसके साथ खेलता था, बराबरी का व्यवहार करता था। रजनी को लगता था जैसे वह फिर से एक जवान, कुंवारी लड़की बन गई हो। शायद यही वजह थी कि वह कर्मा को कुछ भी मना नहीं कर पाती थी। दूसरी बात, उसकी उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। नीलेश और फिर सरोज-बिमला के साथ के अनुभवों ने उसे अपने बदन के सुख से परिचित करा दिया था। अब वह उस सुख का पूरा आनंद लेना चाहती थी। सही-गलत, समाज, मर्यादा—ये सब अब उसके लिए फीके पड़ चुके थे। जब तक उसने इनकी परवाह की थी, उसे सिर्फ़ दुख और दुत्कार मिली थी। मगर जब से उसने अपने बदन की सुनना शुरू किया, उसे सुख ही सुख मिल रहा था। उसकी परेशानियाँ जैसे गायब हो गई थीं।

रजनी ने अपना सिर झुकाया और कर्मा के लंड पर अपने होंठ टिका दिए। कर्मा उस गर्म, मुलायम स्पर्श से मचल उठा। “आह… चाची… ओह… अहम्म…” उसकी आहें कमरे में गूँज उठीं। रजनी को यह ताकत अच्छी लग रही थी—वह अपने होंठों से एक मर्द को, या यों कहें, अपने बेटे की उम्र के लड़के को तड़पा सकती थी। वह उसके साथ खेल सकती थी। उसने थोड़ा और मुँह खोला और कर्मा के लंड के टोपे को अपने मुँह में भर लिया। उसका कड़क, गर्म अहसास और हल्का सा नमकीन स्वाद पहले तो रजनी को अजीब लगा। मगर कुछ पल बाद उसे यह उतना बुरा भी नहीं लगा। उसने लंड को मुँह से निकाला और कर्मा की ओर देखा।

“क्या हुआ, चाची? अच्छा नहीं लगा?” कर्मा ने पूछा, उसकी आँखों में शरारत थी।

“थोड़ा अलग सा है,” रजनी ने कहा। “पर इतना बुरा भी नहीं।”

“तो वापस लो न,” कर्मा ने उकसाया।

“कितना बेसब्र है तू, लल्ला,” रजनी ने हँसते हुए कहा। उसने फिर से लंड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे वह अभ्यस्त हो गई। पहले वह हल्के से चूसती, फिर निकाल लेती।

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हर बार वह थोड़ा और गहराई तक लेने लगी। कर्मा आहें भर रहा था। “आह… चाची… ओह…” उसकी सिसकियाँ रजनी को और उत्तेजित कर रही थीं। वह अब पूरी लगन से कर्मा का लंड चूस रही थी, उसका आधे से ज़्यादा लंड उसके मुँह में समा रहा था। कर्मा का बदन मचल रहा था। उसने रजनी का सिर पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर दबा दिया। अगले ही पल वह गुर्राते हुए झड़ने लगा। एक के बाद एक पिचकारी रजनी के मुँह में भरने लगी। रजनी, जिसका मुँह दबा हुआ था, के पास कोई चारा नहीं था। उसने कर्मा का रस गटक लिया। उसे उसकी गंध और स्वाद बुरा नहीं लगा, बल्कि यह उसे और उत्तेजित कर गया।

झड़ने के बाद कर्मा ने रजनी का सिर छोड़ा। रजनी ने लंड निकाला और हाँफते हुए पीछे हट गई। दोनों बिस्तर पर लेटे, हाँफते हुए एक-दूसरे के बगल में। कुछ देर बाद रजनी उठी और अपने कपड़े पहनने लगी।

“अभी से जा रही हो?” कर्मा ने पूछा, उसकी आवाज़ में शरारत अब भी बाकी थी।

“हाँ, और अब तू भी उठ। नहा ले, बदन पसीने से महक रहा है,” रजनी ने हल्के से डाँटते हुए कहा। उसने कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई। कर्मा लेटा रहा, चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान लिए। फिर वह उठा और नहाने चला गया।

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**कम्मू का घर**

सुबह की पहली किरण के साथ कम्मू की आँखें खुलीं। उसे रात का दृश्य सता रहा था—उसके माँ-पापा की चुदाई, और फिर उसकी माँ के नंगे बदन को याद करके उसने जो किया। ग्लानि उसके मन को खाए जा रही थी। “हाय, मैंने अपनी माँ को सोचकर हिलाया। ये कितना बड़ा पाप है!” वह खुद को कोस रहा था। मगर उसकी आँखों के सामने अब भी वही दृश्य था—सुमन का भरा हुआ बदन, उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, गहरी नाभि, और रसीली चूत। वह खुद को समझाने की कोशिश करता हुआ उठा और सुबह के काम निपटाने लगा।

आज का दिन बादलों से घिरा हुआ था। फूल सिंह के घर में चहल-पहल थी। अजीत और कुसुम शहर जा रहे थे, धीरज की शादी के लिए कपड़े और दूसरा सामान लेने। फूल सिंह सुबह-सुबह खेतों की ओर निकल चुके थे। उन्हें शहर जाना और खरीदारी करना पसंद नहीं था, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी अजीत पर थी। सुमन, अनामिका, और अंजू को घर की दीवारें पोतने का काम था। धीरज, जतन, और कम्मू को बारिश से पहले उपले और भूसा झोपड़ी में रखने का काम मिला था। कुल मिलाकर, सबके पास कोई न कोई काम था।


सज्जनपुर से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क आती थी, जहाँ से शहर के लिए बस मिलती थी। सज्जनपुर और सड़क के बीच सिर्फ़ खेत और जंगल थे। अजीत और कुसुम सुबह जल्दी निकल पड़े। कुसुम ने लाल साड़ी पहनी थी, जो उसके भरे हुए बदन को और निखार रही थी। अजीत ने नीला कुरता-पायजामा पहना था, और कंधे पर गमछा डाला हुआ था।

“इस लाल साड़ी में तो बिल्कुल लाल परी लग रही हो, भाभी,” अजीत ने गाँव से बाहर निकलते ही मज़ाक में छेड़ा।

“तुम भी इस नीले कुरते में नीले कबूतर लग रहे हो, देवर जी,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया।

दोनों मज़ाक करते हुए चल रहे थे। करीब डेढ़ किलोमीटर चले होंगे कि अचानक बादल गरजने लगे, और बारिश शुरू हो गई। “धत्त, तेरी की! लो, हो गई खरीदारी!” कुसुम ने झल्लाते हुए कहा।

“अरे, भाभी, उधर जंगल में चलो,” अजीत ने कहा। “पेड़ों के नीचे थोड़ा बच जाएँगे।”

“हाँ, यहाँ तो तुरंत भीग जाएँगे,” कुसुम ने सहमति जताई।

दोनों रास्ते से हटकर जंगल की ओर बढ़ गए। वे घने पेड़ों की तलाश में थे, मगर बारिश तेज़ थी। जंगल में घुसने के बावजूद वे ज़्यादा देर नहीं बच पाए। दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। कुसुम की साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी, और उसका भरा हुआ बदन अब और उभर रहा था। उसका ब्लाउज़ उसकी मोटी चूचियों को तान रहा था, और गीली साड़ी उसकी गहरी नाभि और मांसल पेट को उघाड़ रही थी। अजीत का कुरता भी भीगकर चिपक गया था, और वह बार-बार अपनी भाभी की ओर देख रहा था।

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वे एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो गए, मगर बारिश की बूँदें अब भी उनकी देह को भिगो रही थीं। कुसुम ने अपनी साड़ी निचोड़ी और हँसते हुए कहा, “हाय, अब तो सारा मज़ा खराब हो गया।”

अजीत ने उसकी ओर देखा। उसकी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिक गईं। “अरे, भाभी, मज़ा तो अब शुरू हुआ है,” उसने शरारत भरे लहजे में कहा।

कुसुम ने उसकी ओर देखा और हँस पड़ी। “तूम भी न, देवर जी, मौके का फायदा उठाने से चूकते नहीं।”

दोनों हँसते हुए पेड़ के नीचे खड़े थे, मगर बारिश की ठंडक और उनके भीगे हुए बदनों ने माहौल को एक नई गर्मी दे दी थी।

कुसुम की लाल साड़ी उसके बदन से चिपककर उसकी मोटी चूचियों, गहरी नाभि, और भरे हुए चूतड़ों को और उभार रही थी। अजीत का नीला कुरता भीगकर उसकी देह से लिपट गया था, और उसकी आँखों में वासना की चमक साफ़ झलक रही थी। दोनों के बीच मज़ाकिया छेड़छाड़ अब एक अलग ही रंग ले रही थी।
“वैसे, भाभी, इस बारिश में तुम्हें कुछ करने का मन नहीं कर रहा?” अजीत ने शरारत भरे लहजे में पूछा, अपनी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिकाते हुए।
“कर रहा है न, घर जाने का मन कर रहा है,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया, अपनी साड़ी निचोड़ते हुए।
“अरे, ऐसी बारिश में घर जाने का क्या मतलब?” अजीत ने पास आते हुए कहा। “ऐसी बारिश तो आग शांत करने के लिए होती है।”
“अच्छा, इतना भीग गए, फिर कौन सी आग है जो बुझी नहीं तुम्हारी?” कुसुम ने भौंहें चढ़ाकर, मज़ाक में तंज कसा।
“अंदर की आग है, भाभी,” अजीत ने अपनी आवाज़ को और गहरा करते हुए कहा।
“अंदर की कौन सी? खुलकर बताओ,” कुसुम ने शरारत से पूछा, उसकी आँखों में भी अब एक चमक थी।
“अरे, भाभी, बनो मत। तुम सब जानती हो,” अजीत ने हँसते हुए कहा।
“नहीं तो, मैं कुछ नहीं जानती। तुम ही बताओ,” कुसुम ने मासूमियत का नाटक करते हुए कहा।
“क्यों, भैया ने कभी आग नहीं बुझाई तुम्हारी, बारिश में भीगते हुए?” अजीत ने और पास आते हुए पूछा।
“अरे, वो और बारिश में भीगेंगे, वो भी मेरे साथ?” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया। “तुम अपने भैया को नहीं जानते क्या?”
“जानता हूँ, पर बदन की आग कुछ भी करवा सकती है,” अजीत ने अपनी नज़रें कुसुम की चूचियों पर टिकाते हुए कहा।
“लगता है, बहुत जोर की आग है तुम्हारे अंदर, देवर जी,” कुसुम ने छेड़ते हुए कहा। “बुझा क्यों नहीं लेते?”
“बुझा तो लूँ, पर तुम हाँ ही नहीं कहती,” अजीत ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया।
“अरे, आग तुम्हारी है, इसमें मैं क्या हाँ-ना कहूँ? बुझा लो,” कुसुम ने हँसते हुए कहा।
“पक्का?” अजीत ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।
“हाँ, पक्का,” कुसुम ने बेपरवाही से कहा, मगर उसकी आवाज़ में एक हल्की सी काँप थी।
अजीत ने कुसुम की ओर देखा, और फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए। कुसुम एक पल के लिए हैरान रह गई। उसे लगा था कि यह सिर्फ़ मज़ाक था, जैसा वह और अजीत अक्सर करते थे। मगर आज पहली बार उसके देवर ने हद पार कर दी थी। बारिश का मौसम, उनके भीगे हुए बदन, या कुसुम के अंदर की उत्तेजना—कुछ तो था, जिसने उसे अजीत का साथ देने के लिए मजबूर कर दिया। वह धीरे-धीरे अजीत के होंठों का जवाब देने लगी।


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दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे के होंठों को चूमते रहे। जब उनके होंठ अलग हुए, तो कुसुम को शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने नज़रें दूसरी ओर कर लीं।
अजीत अभी भी अपनी भाभी को देख रहा था। बारिश की बूँदें उसके बदन को और उत्तेजित कर रही थीं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। कुसुम का मखमली पेट और गहरी नाभि अब अजीत की आँखों के सामने थी। कुसुम आँखें नीचे किए खड़ी रही, उसका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल था। अजीत ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम के पेट पर रख दिया। कुसुम के बदन में जैसे बिजली सी दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। अजीत ने फिर से अपने होंठ कुसुम के होंठों से मिला दिए और उसके पेट को सहलाने लगा।

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कुसुम इस आनंद में इतनी खो गई कि उसे होश तब आया, जब वह अजीत की गोद में थी। उसकी साड़ी और ब्लाउज़ बदन से अलग पेड़ के नीचे पड़े थे। वह अब सिर्फ़ पेटीकोट और ब्रा में थी। वह कुछ सोच पाती, इससे पहले अजीत ने फिर से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

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कुसुम की शर्म अब धीरे-धीरे उत्तेजना में बदल रही थी। अजीत ने उसकी ब्रा को खींचकर उतार दिया, और कुसुम की मोटी-मोटी चूचियाँ अब पूरी तरह नंगी थीं। बारिश की बूँदें उन पर टपक रही थीं, जिससे वे और चमक रही थीं। अजीत ने कुसुम की चूचियों को अपने हाथों में लिया और उन्हें मसलने लगा। “आह… भाभी… क्या मस्त चूचियाँ हैं तुम्हारी,” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इनका रस तो मैं कबसे चखना चाहता था।”
कुसुम ने हल्के से विरोध किया। “अरे… देवर जी… नहीं… ये गलत है…” उसकी आवाज़ में शर्म थी, मगर उसका बदन अजीत के स्पर्श का जवाब दे रहा था।
“गलत क्या, भाभी?” अजीत ने उसकी चूचियों को और ज़ोर से दबाते हुए कहा। “जब बदन मज़ा ले रहा है, तो गलत क्या? बोलो, मज़ा नहीं आ रहा तुम्हें?”
कुसम शरमाते हुए चुप रही, मगर उसकी साँसें तेज़ थीं। अजीत ने उसका पेटीकोट ऊपर खींचा और उसे कमर तक इकट्ठा कर दिया। कुसुम की चूत अब बारिश में भीगकर और रसीली हो गई थी। अजीत ने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत पर फेरनी शुरू कीं। “आह… भाभी… कितनी गीली है तुम्हारी चूत… ये तो मुझसे मिलने को तड़प रही है,” उसने कहा।
“अरे… नहीं… अजीत… छोड़ो…” कुसुम ने हल्के से कहा, मगर उसका विरोध अब कमज़ोर पड़ रहा था। उसका बदन अजीत के स्पर्श में पिघल रहा था।
अजीत ने कुसुम को पेड़ के तने से टिका दिया और अपनी धोती खोल दी। उसका मोटा, कड़क लंड बारिश में चमक रहा था। “देखो, भाभी, ये कितना तड़प रहा है तुम्हारी चूत के लिए,” उसने वासना भरे लहजे में कहा। उसने कुसुम की टाँगें फैलाईं और अपने लंड को उसकी चूत के द्वार पर रखा। कुसुम ने एक आखिरी बार शरमाते हुए कहा, “अजीत… नहीं… ये ठीक नहीं…”
मगर अजीत ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसने एक ज़ोरदार धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में जड़ तक समा गया। कुसुम की चीख निकल गई। “आह… अजीत… ओह…” उसकी साँसें काँप रही थीं। अजीत ने उसकी कमर थाम ली और धक्के लगाना शुरू कर दिया। “आह… भाभी… कितनी कसी हुई चूत है तुम्हारी… आह… मज़ा आ रहा है… बोलो, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है न?” उसने गंदी बातें करते हुए कहा।

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कुसुम की शुरुआती शर्म अब पूरी तरह टूट चुकी थी। वह अजीत के धक्कों का जवाब अपनी कमर हिलाकर दे रही थी। “आह… हाँ… अजीत… आह… मज़ा आ रहा है…” उसने हाँफते हुए कहा। उसका बदन बारिश और वासना में तर था। अजीत ने उसकी चूचियों को मसलते हुए और ज़ोर से धक्के लगाए। “आह… भाभी… तुम्हारी चूत को तो मैं रोज़ चोदना चाहता हूँ… आह… कितना रस है इसमें…” वह गुर्राते हुए बोला।
“आह… अजीत… चोदो… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को भर दो…” कुसुम ने भी अब खुलकर गंदी बातें शुरू कर दीं। उसकी सारी शर्म, सारी मर्यादा बारिश के पानी के साथ बह चुकी थी। वह अजीत के लंड के हर धक्के का आनंद ले रही थी।
अजीत ने कुसुम को ज़मीन पर लिटा दिया और उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उसने और तेज़ी से धक्के लगाना शुरू किया। “आह… भाभी… तुम्हारी चूचियाँ देख… कैसे नाच रही हैं… आह… साली, तू तो पूरी मलाई है…” उसने कहा। कुसुम की चूचियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं, और उसका मखमली पेट बारिश में चमक रहा था।
“आह… अजीत… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को फाड़ दो…” कुसुम ने तड़पते हुए कहा। उसका बदन अब पूरी तरह अजीत के हवाले था। बारिश की बूँदें उनके नंगे बदनों पर टपक रही थीं, और जंगल का सन्नाटा उनकी आहों और सिसकियों से गूँज रहा था।
अजीत ने कुसुम की चूत में अपने लंड को और ज़ोर से ठूँसा। “आह… भाभी… तुम्हारा बदन तो स्वर्ग है… आह… अब रोज़ चोदूँगा…” उसने गुर्राते हुए कहा। कुसुम की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसका बदन काँपने लगा, और वह स्खलित होने वाली थी। “आह… अजीत… मैं… आह… मैं जा रही हूँ…” उसने चीखते हुए कहा। उसी पल अजीत भी अपने चरम पर था। उसने एक आखिरी धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में पिचकारी मारने लगा। दोनों एक साथ स्खलित हो गए।
वे ज़मीन पर लेट गए, बारिश में भीगे हुए, हाँफते हुए। कुसुम की साँसें अभी भी तेज़ थीं। उसका मन ग्लानि और आनंद के बीच झूल रहा था। यह गलत था, मगर इस सुख ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। अजीत ने कुसुम की ओर देखा और मुस्कुराया। “क्या बात है, भाभी… ये बारिश तो सचमुच आग बुझाने वाली थी।”
कुसुम ने शरमाते हुए उसकी ओर देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी साड़ी उठाकर पहनने लगी। बारिश अब धीमी पड़ रही थी, मगर उनके बदनों की गर्मी अभी बाकी थी। पर गर्मी के साथ साथ अभी जो हुआ उसकी ग्लानि के बादल भी छाने लगे थे।


हवेली के बाहर सोनू का मन काम में नहीं लग रहा था। बारिश की वजह से काम कम था, मगर उसका दिमाग कहीं और था। हलवाइन की मोटी चूचियाँ, लाली की थिरकती कमर, और कभी-कभी कम्मू की माँ सुमन और ताई कुस के भरे हुए बदन उसके मन में कौंध रहे थे। कर्मा ने उसके मन में यह बीज बो दिया था, और अब वह इन खयालों से परेशान था। वह सोच रहा था कि इन विचारों का क्या करे। उसे लगा कि अगर कोई उसकी मदद कर सकता है, तो वह कर्मा ही है। वह बेसब्री से कर्मा के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।
जल्द ही कर्मा हवेली से बाहर निकला। सोनू उसे देखते ही खुश हो गया। “अरे, कर्मा भैया, आज बड़ी देर लगा दी अंदर!”
कर्मा ने सोनू को मुस्कुराकर देखा और मन ही मन सोचा, “अगर तुझे पता होता कि मैं अंदर क्या कर रहा था, तो ये सवाल नहीं पूछता।” उसने बेपरवाही से कहा, “अरे, हाँ, थोड़ा देर से उठा। तू बता, काम हो गया?”
“बारिश की वजह से काम ही नहीं है कुछ,” सोनू ने जवाब दिया।
“हाँ, ये तो है,” कर्मा ने कहा।
सोनू ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कुछ बात करनी थी।”
“हाँ, बोल न, इतना शरमा क्या रहा है?” कर्मा ने हँसते हुए कहा।
सोनू ने हिम्मत जुटाकर अपने खयालों के बारे में बताया। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “लड़का बड़ा हो रहा है। ये तो होगा ही, और होना भी चाहिए।”
“पर, भैया, मुझे लगता है मैं गलत कर रहा हूँ,” सोनू ने उदास लहजे में कहा।
“अरे, इसमें गलत क्या है?” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “जवान है, लंड तो खड़ा होगा ही। तू बता, भूख लगती है तो क्या करता है?”
“खाना खाता हूँ,” सोनू ने जवाब दिया।
“वैसे ही, जैसे वो पेट की भूख है, ये बदन की भूख है,” कर्मा ने समझाया। “जब पेट की भूख गलत नहीं, तो बदन की गलत कैसे हो सकती है?”
“हाँ, ये भी है,” सोनू ने कर्मा की बातों से प्रभावित होकर कहा।
“तभी तो कहता हूँ, खुलकर मज़े ले,” कर्मा ने कहा। “सही-गलत के चक्कर में रहा, तो हाथ मलता रह जाएगा।”
“पर कभी-कभी किसी ऐसे के लिए भी गलत खयाल आ जाते हैं, जिसके लिए नहीं आने चाहिए,” सोनू ने संकोच से कहा। “फिर ग्लानि होती है।”
“अरे, ग्लानि कैसी?” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “तुझे भूख लगी है और खाना सामने है, तो खाने का मन करेगा ही। अब ये थोड़े सोचेगा कि खाना किसी और का है, इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए।”
“फिर क्या करना चाहिए?” सोनू ने पूछा।
“झिझक खत्म कर,” कर्मा ने कहा। “जिसके बारे में चाहे, सोच। हिला। और मौका मिले, तो चोदने से भी पीछे मत रह।”
“पर अगर उनके और मेरे बीच ऐसा रिश्ता हो, जिसमें ये सब गलत हो या पाप हो?” सोनू ने चिंता से पूछा।
“देख, लंड और चूत का रिश्ता सिर्फ़ एक ही होता है—चुदाई का,” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “बाकी सारे रिश्ते समाज के बनाए हुए हैं। अगर किसी को देखकर लंड खड़ा हो रहा है, तो उसे चोदने में कोई बुराई नहीं।”
कर्मा की बातें सोनू के दिमाग पर गहरा असर कर रही थीं। “वैसे, बता तो, किसके बारे में सोच रहा था?” कर्मा ने पूछा।
“कई सारे लोगों के,” सोनू ने शरमाते हुए कहा।
“कौन-कौन?” कर्मा ने उत्साह से पूछा।
“हलवाइन, लाली… और…” सोनू रुक गया।
“और?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।
सोनू थोड़ा सोच में पड़ गया। कर्मा ने हँसकर कहा, “इतना सोच में रहेगा, तो कैसे मज़े ले पाएगा?”
सोनू ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुमन और कुसum चाची के बारे में।”
कर्मा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अरे, वाह! कम्मू की माँ और ताई? वैसे, इसमें गलत क्या है? दोनों तो एक से बढ़कर एक हैं।”
“कुछ गलत नहीं है? दोस्त की माँ के बारे में सोचना?” सोनू ने संकोच से पूछा।
“क्या तुझे यकीन है कि वो तेरी माँ के बारे में ऐसा नहीं सोचते होंगे?” कर्मा ने सवाल दागा।
यह सुनकर सोनू सोच में पड़ गया। तभी बिमला दोनों के लिए चाय लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। सोनू के दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, और कर्मा के होंठों पर एक चालाक मुस्कान थी।


जारी रहेगी
Arthur bhai sonu ko bhi ab chut ka swad chaka do na suman or kusum jaisi gadrai aurat ki chut or gand ja usko milegi to maja aa jayega
 
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