• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Incest ससुराल की नयी दिशा

🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

prkin

Well-Known Member
5,681
6,539
189
Last edited:

prkin

Well-Known Member
5,681
6,539
189
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

prkin

Well-Known Member
5,681
6,539
189
ससुराल की नयी दिशा
अध्याय ५६: पल्लू का मायका और ससुराल

********

पल्लू का मायका


अब तक:

अब प्रतीक्षा थी बुधवार की जहाँ अगले चरण का कार्यक्रम होना था.

अब आगे:

जब फागुनी नीतू की बात करने के लिए गई हुई थी तो पल्लू ने दीप्ति चाची, अमर चाचा और अपने पापा मम्मी से एक प्रश्न किया, “नीतू की बात तो पक्की ही समझिये. मामी अवश्य ही सुखद समाचार ही लाएंगी और हम दोनों बहनें एक ही घर की बहू बन जाएँगी.”

दीप्ति की आँखों में आँसू आ गए, अपनी बेटी को दूसरे घर में भेजने पर किस माँ का मन द्रवित नहीं होता.

भावना ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया, “बेटी को तो जाना ही है, पर सोच दोनों एक घर में ब्याहेंगी तो सुखी रहेंगी. पल्लू की ससुराल तो तुमने देख ही ली है. अच्छे घर में बेटी ब्याही जाये, इससे बड़ा सुख कोई नहीं.”

पल्लू ने अपने पापा और चाचा को एक ओर खींचा, “आपको क्या ये नहीं लगता कि अगर मामी अपने कार्य में सफल हों, जिसकी गारण्टी है तो उन्हें क्या उपहार देना चाहिए?”

उसके पापा और चाचा ने कई वस्तुओं के नाम बताये.

“मेरे विचार से हमें कुछ और करना चाहिए, जो उनकी रूचि को पूर्ण करने में भी सहायक हो. आप समझ रहे हो मैं क्या कह रही हूँ?”

“तू तो बड़ी दुष्ट हो गई है, पल्लू.” उसके चाचा ने उसके कान उमेठते हुए हंसकर कहा.

“अब बताऊँ भी या.....”

“नहीं बता.”

इसके बाद पल्लू ने जो योजना बताई उसे सुनकर दोनों भाइयों के हाथ के तोते उड़ गए.

“बस एक समस्या है, इसमें अधिकतर कार्य मेरे भाइयों को ही करना होगा. पर मुझे लगता है मामी बहुत प्रसन्न हो जाएँगी।”

अशोक और अमर ने एक दूसरे को देखा.

“पापा, चाचू, आजकल सब कुछ रेडीमेड मिलता है, बस लगाने के लिए कुछ परिश्रम, वस्तुएं और बुद्धि चाहिए.”

“ये बात भी ठीक है. पर मुझे दीपक की भी सहमति चाहिए होगी. और तुम्हारी माँ की भी.”

“वो आपकी पहली परीक्षा होगी. पहले मामा से सहमति लो.” ये कहकर पल्लू वहां से हट गई.

सत्या के साथ लौटती हुई फागुनी अपने ही विचारों में खोई हुई थी. सत्या ने भी उसे छेड़ा नहीं। इस समय फागुनी का मन उन बातों में था जो हरीश ने उसे बताई थी. उसने एक योजना बनाई जिसके लिए उसे भावना के सहयोग की आवश्यकता थी. उसे विश्वास था भावना उसे मना नहीं करेगी. पल्लू के जुड़ने से भावना अब अधिक उन्मुक्त प्रतीत हो रही थी.

उसे अपने पति दीपक को भी इसके लिए सहमत करना होगा. इस अभिप्राय को कैसे सफल किया जाये इसी चिंतन में वो घर भी पहुंच गई और उसे ध्यान आया कि उसने सत्या से एक शब्द भी नहीं बोला था.

“सत्या, मुझे क्षमा करना, मैं अपने आप में ही इतना खो गई थी कि तुमसे बात भी नहीं की.”

“कोई बात नहीं, आंटी। मैं भी समझ गया था इसीलिए कोई विघ्न नहीं डाला. ऐसी स्थिति में ऐसा होना सम्भव है.”

“धन्यवाद. सत्या.” ये कहते हुए वो गाड़ी से उतरी और घर में चली गई.

फागुनी ने घर में प्रवेश करने से पहले एक गंभीर मुद्रा अपना ली. जब वो अंदर गई तो सबकी आँखें उसकी ओर मुद गईं। उसके गंभीर चेहरे को देखकर सब मन चिंतित हो गए.

दीप्ति उसके पास गई और पूछा, “क्या हुआ फागुनी, क्या बात नहीं बनी?”

फागुनी उसकी ओर देखते हुए रोने सी लगी. ये देखकर दीप्ति रोने लगी. तभी पल्लू उनके पास पहुँची।

“क्या हुआ मामी? आप ऐसे क्यों रो रही हैं?”

फागुनी ने झूठमूठ अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “अब क्या कहूँ, अपनी नीतू अब पराये घर जो जाने वाली है.”

दीप्ति को ये समझने में कुछ समय लगा और फिर उसने फागुनी के सीने पर एक हल्का सा धक्का मारा.

“अरे पापिन, मेरे तो प्राण ही ले लेती तू.” फिर उसने फागुनी को लगा लिया. सबके चेहरे हर्षित हो उठे और सबने तालियाँ बजानी आरम्भ कर दीं। फागुनी को घेरकर सबने उसे चूमा और उठा लिया.

नीचे उतरने के बाद फागुनी ने दीप्ति और अमर से कहा, “आप उन्हें बुधवार को आमंत्रित कीजिये, नीतू को देखने के लिए.” इसके बाद उसने वहां हुई बातों को बताया, बस ये छोड़ दिया कि वहाँ भी कौटुम्बिक व्यभिचार का प्रचलन है.

जब सब शांत हुए तो उसने अपनी पति दीपक और भावना को एक ओर आने का संकेत दिया. तीनों जब एकांत स्थान पर पहुंचे तो फागुनी से धीरे से हरीश द्वारा बताई हुई घटना उन्हें बताई. दीपक को तो मानो विश्वास ही नहीं हुआ, पर शंका करने का कोई अर्थ भी नहीं था.

फागुनी ने दीपक से कहा, “अब आपको ये निर्णय लेना है कि क्या आपकी माँ को भी जीवन में उस सुख को प्राप्त करना चाहिए जो भावना की सास को मिल रहा है? अगर आप हाँ कहेंगे तो मैं इस विषय में कुछ कर सकती हूँ.”

दीपक सोच में पड़ गया.

तो मित्रों, अपने समझ ही लिया होगा कि जिस वृद्ध दंपत्ति के विषय में अपने पढ़ा था जहाँ वो धन देकर अपनी पत्नी की चुदाई करवाते थे, वो कोई और नहीं दीपक की माँ जया और पिता मनोज थे. हरीश जब उसे दिन घर में गया तो उसने सब देख समझ लिया था.

फिर दीपक बोला, “अगर मैं अशोक और अमर की माँ को चोद सकता हूँ, तो मुझे न कहने का अधिकार नहीं है. परन्तु पिताजी को कैसे समझायेंगे?”

“उस विषय में मैंने कुछ सोचा है. और मेरी योजना है कि ........” फागुनी ने समझाया.

भावना और दीपक ने उसमें कुछ सुझाव दिए और योजना को अंतिम रूप दे दिया. अब इसके कार्यान्वित करना था. जिसके लिए कल का दिन निर्धारित किया गया. इसमें कौन भाग लेगा और किसकी भूमिका क्या होगी, ये भी निश्चित किया गया. इसके बाद वो सबके पास आ गए.

आज पल्लू लौटना था तो फागुनी मामी ने उसे पूरी योजना बता दी. पल्लू को इसमें मामी की चतुरता का आभास हुआ. उन्होंने किस सरलता से सब कुछ अर्जित कर लिया था. यही नहीं परिवारों के मिलन की भी सभी व्यवस्था भी कर ली थी. उसे बस एक संदेह था, क्या सरिता दादी को इस समय इसमें सम्मिलित करना उचित होगा?

फागुनी ने विश्वास दिलाया कि मायादेवी भी रहेंगी तो कोई अड़चन नहीं आएगी, और यही सरिता दादी की इच्छा भी थी. इसके बाद शुभम पल्लू को अपनी ससुराल छोड़ आया, जहाँ इस बार पल्लू का फिर से स्वागत हुआ.

शाम को फागुनी और दीपक ने जया और मनोज को भी शुभ संदेश दिया तो वो अति प्रसन्न हुए. परिवार की इकलौती बेटी का विवाह देखने की उनकी इच्छा जो अब पूरी होनी थी.

अगले दिन:

फागुनी ने अपनी सास जया से कहा कि उन्हें मायादेवी ने बुलाया है. तो ये निश्चित हुआ कि फागुनी ही उन्हें ले जाएगी. उधर दीपक अपने कार्य पर निकल गया, पर उसके मन में बहुत उतार चढ़ाव थे, जिन्हें फागुनी ने कम करने का प्रयास किया, परन्तु वो समझ रही थी कि दीपक की समस्या उसकी माँ नहीं, बल्कि उसके पिता थे. उन्हें किस प्रकार से इसके लिए सहमत किया जायेगा ये एक कठिन प्रश्न था. फागुनी जैसी बुद्धिमती को भी कोई उपाय सूझ न रहा था.

उसके मन में अपनी सास को लेकर भी आशंका थी, परन्तु अगर आगे का जीवन स्वच्छंद रूप से जीना था तो मायादेवी के समान ही उन्हें भी सम्मिलित नितांत आवश्यक था. सम्भवतः उसकी सास ही उसके ससुर से किस प्रकार से इसकी सहमति ली जाये इस विषय में कोई उपाय सुझा सकती थी.

निर्धारित समय पर फागुनी और जया अपने घर से भावना के घर के लिए निकल पड़े.

“अरे ये कहाँ जा रही है, माया तो दूसरी ओर रहती है न? दीप्ति के साथ?”

“जी माँ जी, पर कल से वो वहीँ पर ठहरी हुई हैं, भावना के घर में ही हैं.”

“अच्छा, ये भी ठीक है. चलो.”

“माँ जी, मुझे आपसे कुछ बात करनी थी. अगर आप क्षुभ्ध न हों तो बोलूँ?”

“हाँ, हाँ, तुझे कुछ पूछने के लिए अनुमति थोड़े ही चाहिए.”

फागुनी ने एक गहरी श्वास भरी, “माँ जी, हमें पता है कि बाबूजी अब आपकी उस प्रकार से सेवा नहीं कर सकते हैं. और इस कारण आपको बाहर के लड़कों से अपनी इच्छा पूरी करने पर विवश होना पड़ रहा है.”

जया को काटो तो खून नहीं, ऐसा लगा मानो उसका अस्तित्व ही समाप्त होने को हो. उसका चेहरा लज्जा से लाल हो गया.

“बहू, वो.. मैं.. तेरे बाबूजी…” इससे अधिक वो कुछ बोल न सकी, “मैं कैसे तुम सबको मुँह दिखाऊँगी?”

उसका क्रंदन सुनकर फागुनी का मन द्रवित हो गया.

“माँ जी, माँ जी!” फागुनी ने उसे समझाया, “इसमें आपको कोई भी गलत नहीं समझ रहा है. हमारा मानना है कि आपको भी सुख लेने का पूरा अधिकार है. आपको हमसे मुँह छुपाने की आवश्यकता नहीं है. आप निश्चिन्त रहो.” फागुनी बोली.

“बहू, कैसी बात करती हो? इस आयु में मैं बुढ़िया जवान लौंडों से ये सब करती हूँ और तू कहती है कि मैं विचलित न हूँ?”

“जी माँ जी. मैं यही कह रही हूँ. चलिए हम पहुँच गए, अपना चेहरा ठीक कर लीजिये. यहाँ किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आप व्यथित हैं. हम आगे की बात लौटते हुए कर लेंगे.”

जया ने अपना चेहरा पोंछा, फागुनी ने कार खड़ी की और उन्हें मेकअप का डब्बा दिया तो जया ने अपने चेहरे को व्यवस्थित किया. जया से ऑंखें चुराकर फागुनी ने एक मिस कॉल किया. फिर वो गाड़ी से उतरी और जया को लिया.

“माँ जी, आप बहुत सुंदर लग रही हो, आइये माँ जी आपकी ही राह देख रही होंगी.”

जया को क्या पता था कि मायादेवी किस प्रकार से उसकी राह देख रही हैं.

दोनों अंदर गईं तो बैठक में कोई नहीं था. तो फागुनी ने जया का हाथ पकड़ा और कमरे की ओर चल दी.

जया ने पूछा, “अरे बहू, क्या कर रही है. ऐसे कैसे किसी के कमरे में घुस जाएगी. न घर की घण्टी बजे और सीधे कमरे में जा रही है. कुछ तो ध्यान रख.”

फागुनी, “अरे माँ कोई नहीं है घर में भावना और माँ जी को छोड़कर. आओ.”

और ये कहते हुए कमरे का द्वार खोल लिया. और खुलते ही कमरे से मादक ध्वनि का संगीत सुनाई दिया. जया ठहरी, पर फागुनी निःसंकोच अंदर चली गई और चूँकि उसके हाथ में अपनी सास का हाथ था तो वो भी अंदर खिंची चली गई.

मायादेवी और भावना अंदर ही थीं, परन्तु अकेली न थीं. परिवार के चारों लड़के शुभम, निकुंज, हरीश और गिरीश भी उनके साथ थे. नंगे थे और इस समय जहाँ शुभम और निकुंज मायादेवी को चोद रहे थे तो वहीँ हरीश और गिरीश भावना पर चढ़े हुए थे. फागुनी और भावना की उत्तम योजना का ही परिणाम था कि चुदाई अंतिम चरण पर थी. उन्हें देखकर ये सरलता से समझा जा सकता था कि मायादेवी और भावना दोनों की चूत और गाँड एक साथ मारी जा रही थीं.

जया असहज हो गई और जड़वत खड़ी हुई सामने के दृश्य को देख रही थी. फागुनी ने अभी भी उसका हाथ नहीं छोड़ा था.

“ये ये क्या हैं?” जया ने हिचकते हुए पूछा.

“आपको क्या लगता है माँ जी?” फागुनी से शांति से उत्तर दिया.

“पर ये सब तो एक परिवार के ही हैं. ऐसा जघन्य पाप कैसे कर सकते हैं?”

“माँ जी, पाप है तो है, पर जीवन के सुख भोगने में कैसा पाप? हम सब एक दूसरे के साथ चुदाई का खेल खेलते हैं, और प्रसन्न हैं. बाद एक आप ही हैं जो अब तक जुडी नहीं थीं. और हमारी इच्छा है कि इस कमी को भी आज दूर कर लिया जाये.” फागुनी ने उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा तो जया के शरीर में एक कम्पन सा हुआ.

“पर, मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ? अपने नाती पोतों के साथ?”

“माँ जी, इनके माता पिता भी तो हैं, उनके भी साथ सब कुछ होगा. आपको अब बाहर जाने के विषय में सोचना भी नहीं पड़ेगा.” फागुनी समझ गई कि माँ जी अब बस एक धक्के के साथ ही अपने रंग में आ जाएँगी. पर वो उन्हें ये निर्णय लेना देना चाहती थी. जिससे कि वो आगे के लिए भी आश्वस्त रहें.

“सोचिये माँ जी, जब मन करे तब चुदवा लो, जो भी मिले उससे. कई दिनों तक प्यासी और अतृप्त रहने का कोई कारण नहीं रहेगा.”

जया अब भी अपनी आँखें सामने चलती दो दो दोहरी चुदाई के दृश्य से हटा नहीं पा रही थी.

फागुनी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, “माँ जी, ये आपको निर्णय लेना है कि जीवन कैसे जीना है, अतृप्त रहकर या तृप्ति की राह पर चलते हुए आनंद के साथ.”

“तू कह तो सही रही है बहू, पर लोक लाज और मर्यादा के विषय में सोचती हूँ तो डर लगता है.” जया ने कहा तो फागुनी समझ गई कि अब माँ जी को साथ मिलाने में कोई समस्या नहीं रह गई है.

“थोड़ी देर रुकिए माँ जी, इनका खेल अब समाप्ति पर है. फिर हम दोनों की बारी आएगी.”

“तू भी. क्या तू भी मेरे साथ चु…” कहते हुए जया झेंप गई.

“और क्या माँ जी, हम तो सब यूँ ही एक दूसरे के साथ चोदते चुदवाते हैं. बहुत सुख मिलता है ऐसे. वैसे माँ जी, आप भी तो अपनी सहेली के साथ ही चुदवाती हो. तो इसमें क्या अंतर है?” फागुनी ने अपने कपड़े उतारते हुए कहा.

कुछ ही पलों में फागुनी भी जया के सामने नँगी खड़ी थी.

“आइये माँ जी, आपके इन वस्त्रों का कोई अर्थ नहीं है.” फागुनी ने जया की साड़ी के आँचल को हटाते हुए उसकी साड़ी निकाल दी. फिर पेटीकोट, ब्लाउज़ और अंत में ब्रा भी हटा दी. अब जया भी उन सबके सामने नंगी थी.

सभी चुदक्क्ड़ ऐसा आचरण कर रहे थे मानो उन्हें पता भी न हो कि फागुनी और उसकी सास कमरे में हैं. उनकी चुदाई का अंतिम चरण समापन की ओर था और उनकी गति, हुंकार और सिसकियों से प्रतीत हो रहा था कि ये दौड़ समाप्त हो रही थी.

“माँ जी, मैं अब अपने कार्य में लगूँगी, चाहो तो आप भी आ जाना.” ये कहते हुए वो मायादेवी की ओर बढ़ी जहाँ शुभम और निकुंज अब उनकी चूत और गाँड में अपना पानी छोड़ रहे थे. निकुंज ने अपना लौड़ा गाँड से निकाला और मुस्कुराते हुए फागुनी को सौंप दिया. फागुनी ने तपाक से अपने मुँह में लिया और चाटने लगी.

“आह मामी, क्या मस्त चाटती हो.” उसने मामी के सिर को पकड़कर अपने लंड को उनके मुँह में ठूँस दिया. फागुनी ने उसका हाथ हटाकर उसका लंड मुँह से निकाला और फिर मायादेवी की गाँड की ओर देखा जिसमें से निकुंज का पानी बाहर निकल रहा था. जया आश्चर्य से देख रही थी कि उसकी बहू ने मायादेवी की गाँड को फैलाया और उसमें से बहते रस को चाटने लगी.

जया की चूत और गाँड में सुरसुरी होने लगी. फागुनी ने मायादेवी की गाँड साफ करने के बाद उनकी गाँड पर एक हल्की सी चपत लगाई तो वो शुभम के लौड़े से हटकर एक ओर लुढ़क गईं. अब शुभम के लौड़े और मायादेवी की चूत की सफाई का अभियान चला और फागुनी ने संतुष्ट होकर ही उन्हें छोड़ा और मायादेवी को संकेत दिया कि अब उनकी भूमिका आ गई है.

मायादेवी ने एक अंगड़ाई लेते हुए जया की ओर देखा और उठकर उसकी ओर बढ़ी.

“जवान लौंडे ऐसी चुदाई करते हैं कि अंग अंग में तरंग भर जाती है. इन बूढ़ी हड्डियों में भी मानो नई शक्ति आ जाती है.” ये कहकर उन्होंने जया का हाथ थामा और इससे पहले कि वो कुछ कह पाती उसके होंठ चूम लिए.

“बहू सोना है, शुद्ध सोना. देख न तेरे पोतों के लौड़े कैसे मन लगाकर चाट रही है.” मायादेवी ने जया का ध्यान उनके पोतों हरीश और गिरीश में लौड़े चाट रही थी. वहीँ भावना ओर पड़ी हुई थी और उसकी चूत और गाँड से वीर्य बहने को आतुर थे. अपने बेटों के लंड चाटकर फागुनी ने भावना की चूत और गाँड को भी साफ किया और भावना को लेकर जया के पास आ गई.

“लड़कों ने मेरी जवानी लौटा दी.” मायादेवी ने जया को देखते हुए कहा. “अब तुम भी अपने सुख की राह पर चल दो.”

“पर इनके बाबूजी? उन्हें कैसे बताएँगे? क्या बताएँगे?” जया ने प्रश्न किया.

“उन्हें मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं बात करुँगी उनसे. उन्हें मैं समझा दूँगी। तुम अपनी सोचो, क्या जीवन को आनंद जीना चाहती हो, या यूँ ही अतृप्त रहकर?”

जया ने सिर झुकाया, फिर उठाते हुए मायादेवी, फागुनी और भावना को देखा.

“सुख के साथ, आनंद के साथ. जैसे तुम सब जी रहे हो. पर उन्हें समझाना और सहमत कराने का कार्य तुम सबका है. अन्यथा आज के बाद कभी नहीं. उनकी इच्छा से ही मैं अब तक चुदाई करवाती रही हूँ. आज एक अपवाद हो या नहीं ये निर्णय नहीं ले पा रही हूँ. अगर वो पूछेंगे तो मैं झूठ नहीं बोलूँगी। तो बताओ मई क्या करूँ?”

फागुनी, मायादेवी और भावना एक दूसरे को देखने लगे.

फिर मायादेवी बोलीं, “फागुनी, तुम मुझे भाईसाहब के पास ले चलो. तुम्हें बाहर ही रहना है. मैं बात करुँगी और फिर जया को बता दूँगी। अगर मनोज ने सहमति दे दी, तो ठीक अन्यथा इस विषय को यहीं समाप्त कर देंगे. जया, तुम चाहो तो कपड़े पहन सकती हो, अन्यथा भी कोई तुम्हें छुएगा नहीं.”

“मैं, मैं. ठीक हूँ. बस ये ध्यान रखना कि उन्हें कोई कष्ट न हो. सम्भल कर बात करना.”

“मैं ऐसा ही करुँगी. मेरे पास एक और भी युक्ति है, जो सम्भवतः सहायक हो सकती है.”

फागुनी और मायादेवी ने वस्त्र पहने और फागुनी फिर अपने घर की ओर चल पड़ी.


क्रमशः
 
Last edited:
  • Like
Reactions: parkas

prkin

Well-Known Member
5,681
6,539
189
Last edited:

badepapa

New Member
14
4
3
ससुराल की नयी दिशा
अध्याय ५६: पल्लू का मायका और ससुराल

********

पल्लू का मायका


अब तक:

अब प्रतीक्षा थी बुधवार की जहाँ अगले चरण का कार्यक्रम होना था.

अब आगे:

जब फागुनी नीतू की बात करने के लिए गई हुई थी तो पल्लू ने दीप्ति चाची, अमर चाचा और अपने पापा मम्मी से एक प्रश्न किया, “नीतू की बात तो पक्की ही समझिये. मामी अवश्य ही सुखद समाचार ही लाएंगी और हम दोनों बहनें एक ही घर की बहू बन जाएँगी.”

दीप्ति की आँखों में आँसू आ गए, अपनी बेटी को दूसरे घर में भेजने पर किस माँ का मन द्रवित नहीं होता.

भावना ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया, “बेटी को तो जाना ही है, पर सोच दोनों एक घर में ब्याहेंगी तो सुखी रहेंगी. पल्लू की ससुराल तो तुमने देख ही ली है. अच्छे घर में बेटी ब्याही जाये, इससे बड़ा सुख कोई नहीं.”

पल्लू ने अपने पापा और चाचा को एक ओर खींचा, “आपको क्या ये नहीं लगता कि अगर मामी अपने कार्य में सफल हों, जिसकी गारण्टी है तो उन्हें क्या उपहार देना चाहिए?”

उसके पापा और चाचा ने कई वस्तुओं के नाम बताये.

“मेरे विचार से हमें कुछ और करना चाहिए, जो उनकी रूचि को पूर्ण करने में भी सहायक हो. आप समझ रहे हो मैं क्या कह रही हूँ?”

“तू तो बड़ी दुष्ट हो गई है, पल्लू.” उसके चाचा ने उसके कान उमेठते हुए हंसकर कहा.

“अब बताऊँ भी या.....”

“नहीं बता.”

इसके बाद पल्लू ने जो योजना बताई उसे सुनकर दोनों भाइयों के हाथ के तोते उड़ गए.

“बस एक समस्या है, इसमें अधिकतर कार्य मेरे भाइयों को ही करना होगा. पर मुझे लगता है मामी बहुत प्रसन्न हो जाएँगी।”

अशोक और अमर ने एक दूसरे को देखा.

“पापा, चाचू, आजकल सब कुछ रेडीमेड मिलता है, बस लगाने के लिए कुछ परिश्रम, वस्तुएं और बुद्धि चाहिए.”

“ये बात भी ठीक है. पर मुझे दीपक की भी सहमति चाहिए होगी. और तुम्हारी माँ की भी.”

“वो आपकी पहली परीक्षा होगी. पहले मामा से सहमति लो.” ये कहकर पल्लू वहां से हट गई.

सत्या के साथ लौटती हुई फागुनी अपने ही विचारों में खोई हुई थी. सत्या ने भी उसे छेड़ा नहीं। इस समय फागुनी का मन उन बातों में था जो हरीश ने उसे बताई थी. उसने एक योजना बनाई जिसके लिए उसे भावना के सहयोग की आवश्यकता थी. उसे विश्वास था भावना उसे मना नहीं करेगी. पल्लू के जुड़ने से भावना अब अधिक उन्मुक्त प्रतीत हो रही थी.

उसे अपने पति दीपक को भी इसके लिए सहमत करना होगा. इस अभिप्राय को कैसे सफल किया जाये इसी चिंतन में वो घर भी पहुंच गई और उसे ध्यान आया कि उसने सत्या से एक शब्द भी नहीं बोला था.

“सत्या, मुझे क्षमा करना, मैं अपने आप में ही इतना खो गई थी कि तुमसे बात भी नहीं की.”

“कोई बात नहीं, आंटी। मैं भी समझ गया था इसीलिए कोई विघ्न नहीं डाला. ऐसी स्थिति में ऐसा होना सम्भव है.”

“धन्यवाद. सत्या.” ये कहते हुए वो गाड़ी से उतरी और घर में चली गई.

फागुनी ने घर में प्रवेश करने से पहले एक गंभीर मुद्रा अपना ली. जब वो अंदर गई तो सबकी आँखें उसकी ओर मुद गईं। उसके गंभीर चेहरे को देखकर सब मन चिंतित हो गए.

दीप्ति उसके पास गई और पूछा, “क्या हुआ फागुनी, क्या बात नहीं बनी?”

फागुनी उसकी ओर देखते हुए रोने सी लगी. ये देखकर दीप्ति रोने लगी. तभी पल्लू उनके पास पहुँची।

“क्या हुआ मामी? आप ऐसे क्यों रो रही हैं?”

फागुनी ने झूठमूठ अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “अब क्या कहूँ, अपनी नीतू अब पराये घर जो जाने वाली है.”

दीप्ति को ये समझने में कुछ समय लगा और फिर उसने फागुनी के सीने पर एक हल्का सा धक्का मारा.

“अरे पापिन, मेरे तो प्राण ही ले लेती तू.” फिर उसने फागुनी को लगा लिया. सबके चेहरे हर्षित हो उठे और सबने तालियाँ बजानी आरम्भ कर दीं। फागुनी को घेरकर सबने उसे चूमा और उठा लिया.

नीचे उतरने के बाद फागुनी ने दीप्ति और अमर से कहा, “आप उन्हें बुधवार को आमंत्रित कीजिये, नीतू को देखने के लिए.” इसके बाद उसने वहां हुई बातों को बताया, बस ये छोड़ दिया कि वहाँ भी कौटुम्बिक व्यभिचार का प्रचलन है.

जब सब शांत हुए तो उसने अपनी पति दीपक और भावना को एक ओर आने का संकेत दिया. तीनों जब एकांत स्थान पर पहुंचे तो फागुनी से धीरे से हरीश द्वारा बताई हुई घटना उन्हें बताई. दीपक को तो मानो विश्वास ही नहीं हुआ, पर शंका करने का कोई अर्थ भी नहीं था.

फागुनी ने दीपक से कहा, “अब आपको ये निर्णय लेना है कि क्या आपकी माँ को भी जीवन में उस सुख को प्राप्त करना चाहिए जो भावना की सास को मिल रहा है? अगर आप हाँ कहेंगे तो मैं इस विषय में कुछ कर सकती हूँ.”

दीपक सोच में पड़ गया.

तो मित्रों, अपने समझ ही लिया होगा कि जिस वृद्ध दंपत्ति के विषय में अपने पढ़ा था जहाँ वो धन देकर अपनी पत्नी की चुदाई करवाते थे, वो कोई और नहीं दीपक की माँ जया और पिता मनोज थे. हरीश जब उसे दिन घर में गया तो उसने सब देख समझ लिया था.

फिर दीपक बोला, “अगर मैं अशोक और अमर की माँ को चोद सकता हूँ, तो मुझे न कहने का अधिकार नहीं है. परन्तु पिताजी को कैसे समझायेंगे?”

“उस विषय में मैंने कुछ सोचा है. और मेरी योजना है कि ........” फागुनी ने समझाया.

भावना और दीपक ने उसमें कुछ सुझाव दिए और योजना को अंतिम रूप दे दिया. अब इसके कार्यान्वित करना था. जिसके लिए कल का दिन निर्धारित किया गया. इसमें कौन भाग लेगा और किसकी भूमिका क्या होगी, ये भी निश्चित किया गया. इसके बाद वो सबके पास आ गए.

आज पल्लू लौटना था तो फागुनी मामी ने उसे पूरी योजना बता दी. पल्लू को इसमें मामी की चतुरता का आभास हुआ. उन्होंने किस सरलता से सब कुछ अर्जित कर लिया था. यही नहीं परिवारों के मिलन की भी सभी व्यवस्था भी कर ली थी. उसे बस एक संदेह था, क्या सरिता दादी को इस समय इसमें सम्मिलित करना उचित होगा?

फागुनी ने विश्वास दिलाया कि मायादेवी भी रहेंगी तो कोई अड़चन नहीं आएगी, और यही सरिता दादी की इच्छा भी थी. इसके बाद शुभम पल्लू को अपनी ससुराल छोड़ आया, जहाँ इस बार पल्लू का फिर से स्वागत हुआ.

शाम को फागुनी और दीपक ने जया और मनोज को भी शुभ संदेश दिया तो वो अति प्रसन्न हुए. परिवार की इकलौती बेटी का विवाह देखने की उनकी इच्छा जो अब पूरी होनी थी.

अगले दिन:

फागुनी ने अपनी सास जया से कहा कि उन्हें मायादेवी ने बुलाया है. तो ये निश्चित हुआ कि फागुनी ही उन्हें ले जाएगी. उधर दीपक अपने कार्य पर निकल गया, पर उसके मन में बहुत उतार चढ़ाव थे, जिन्हें फागुनी ने कम करने का प्रयास किया, परन्तु वो समझ रही थी कि दीपक की समस्या उसकी माँ नहीं, बल्कि उसके पिता थे. उन्हें किस प्रकार से इसके लिए सहमत किया जायेगा ये एक कठिन प्रश्न था. फागुनी जैसी बुद्धिमती को भी कोई उपाय सूझ न रहा था.

उसके मन में अपनी सास को लेकर भी आशंका थी, परन्तु अगर आगे का जीवन स्वच्छंद रूप से जीना था तो मायादेवी के समान ही उन्हें भी सम्मिलित नितांत आवश्यक था. सम्भवतः उसकी सास ही उसके ससुर से किस प्रकार से इसकी सहमति ली जाये इस विषय में कोई उपाय सुझा सकती थी.

निर्धारित समय पर फागुनी और जया अपने घर से भावना के घर के लिए निकल पड़े.

“अरे ये कहाँ जा रही है, माया तो दूसरी ओर रहती है न? दीप्ति के साथ?”

“जी माँ जी, पर कल से वो वहीँ पर ठहरी हुई हैं, भावना के घर में ही हैं.”

“अच्छा, ये भी ठीक है. चलो.”

“माँ जी, मुझे आपसे कुछ बात करनी थी. अगर आप क्षुभ्ध न हों तो बोलूँ?”

“हाँ, हाँ, तुझे कुछ पूछने के लिए अनुमति थोड़े ही चाहिए.”

फागुनी ने एक गहरी श्वास भरी, “माँ जी, हमें पता है कि बाबूजी अब आपकी उस प्रकार से सेवा नहीं कर सकते हैं. और इस कारण आपको बाहर के लड़कों से अपनी इच्छा पूरी करने पर विवश होना पड़ रहा है.”

जया को काटो तो खून नहीं, ऐसा लगा मानो उसका अस्तित्व ही समाप्त होने को हो. उसका चेहरा लज्जा से लाल हो गया.

“बहू, वो.. मैं.. तेरे बाबूजी…” इससे अधिक वो कुछ बोल न सकी, “मैं कैसे तुम सबको मुँह दिखाऊँगी?”

उसका क्रंदन सुनकर फागुनी का मन द्रवित हो गया.

“माँ जी, माँ जी!” फागुनी ने उसे समझाया, “इसमें आपको कोई भी गलत नहीं समझ रहा है. हमारा मानना है कि आपको भी सुख लेने का पूरा अधिकार है. आपको हमसे मुँह छुपाने की आवश्यकता नहीं है. आप निश्चिन्त रहो.” फागुनी बोली.

“बहू, कैसी बात करती हो? इस आयु में मैं बुढ़िया जवान लौंडों से ये सब करती हूँ और तू कहती है कि मैं विचलित न हूँ?”

“जी माँ जी. मैं यही कह रही हूँ. चलिए हम पहुँच गए, अपना चेहरा ठीक कर लीजिये. यहाँ किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आप व्यथित हैं. हम आगे की बात लौटते हुए कर लेंगे.”

जया ने अपना चेहरा पोंछा, फागुनी ने कार खड़ी की और उन्हें मेकअप का डब्बा दिया तो जया ने अपने चेहरे को व्यवस्थित किया. जया से ऑंखें चुराकर फागुनी ने एक मिस कॉल किया. फिर वो गाड़ी से उतरी और जया को लिया.

“माँ जी, आप बहुत सुंदर लग रही हो, आइये माँ जी आपकी ही राह देख रही होंगी.”

जया को क्या पता था कि मायादेवी किस प्रकार से उसकी राह देख रही हैं.

दोनों अंदर गईं तो बैठक में कोई नहीं था. तो फागुनी ने जया का हाथ पकड़ा और कमरे की ओर चल दी.

जया ने पूछा, “अरे बहू, क्या कर रही है. ऐसे कैसे किसी के कमरे में घुस जाएगी. न घर की घण्टी बजे और सीधे कमरे में जा रही है. कुछ तो ध्यान रख.”

फागुनी, “अरे माँ कोई नहीं है घर में भावना और माँ जी को छोड़कर. आओ.”

और ये कहते हुए कमरे का द्वार खोल लिया. और खुलते ही कमरे से मादक ध्वनि का संगीत सुनाई दिया. जया ठहरी, पर फागुनी निःसंकोच अंदर चली गई और चूँकि उसके हाथ में अपनी सास का हाथ था तो वो भी अंदर खिंची चली गई.

मायादेवी और भावना अंदर ही थीं, परन्तु अकेली न थीं. परिवार के चारों लड़के शुभम, निकुंज, हरीश और गिरीश भी उनके साथ थे. नंगे थे और इस समय जहाँ शुभम और निकुंज मायादेवी को चोद रहे थे तो वहीँ हरीश और गिरीश भावना पर चढ़े हुए थे. फागुनी और भावना की उत्तम योजना का ही परिणाम था कि चुदाई अंतिम चरण पर थी. उन्हें देखकर ये सरलता से समझा जा सकता था कि मायादेवी और भावना दोनों की चूत और गाँड एक साथ मारी जा रही थीं.

जया असहज हो गई और जड़वत खड़ी हुई सामने के दृश्य को देख रही थी. फागुनी ने अभी भी उसका हाथ नहीं छोड़ा था.

“ये ये क्या हैं?” जया ने हिचकते हुए पूछा.

“आपको क्या लगता है माँ जी?” फागुनी से शांति से उत्तर दिया.

“पर ये सब तो एक परिवार के ही हैं. ऐसा जघन्य पाप कैसे कर सकते हैं?”

“माँ जी, पाप है तो है, पर जीवन के सुख भोगने में कैसा पाप? हम सब एक दूसरे के साथ चुदाई का खेल खेलते हैं, और प्रसन्न हैं. बाद एक आप ही हैं जो अब तक जुडी नहीं थीं. और हमारी इच्छा है कि इस कमी को भी आज दूर कर लिया जाये.” फागुनी ने उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा तो जया के शरीर में एक कम्पन सा हुआ.

“पर, मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ? अपने नाती पोतों के साथ?”

“माँ जी, इनके माता पिता भी तो हैं, उनके भी साथ सब कुछ होगा. आपको अब बाहर जाने के विषय में सोचना भी नहीं पड़ेगा.” फागुनी समझ गई कि माँ जी अब बस एक धक्के के साथ ही अपने रंग में आ जाएँगी. पर वो उन्हें ये निर्णय लेना देना चाहती थी. जिससे कि वो आगे के लिए भी आश्वस्त रहें.

“सोचिये माँ जी, जब मन करे तब चुदवा लो, जो भी मिले उससे. कई दिनों तक प्यासी और अतृप्त रहने का कोई कारण नहीं रहेगा.”

जया अब भी अपनी आँखें सामने चलती दो दो दोहरी चुदाई के दृश्य से हटा नहीं पा रही थी.

फागुनी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, “माँ जी, ये आपको निर्णय लेना है कि जीवन कैसे जीना है, अतृप्त रहकर या तृप्ति की राह पर चलते हुए आनंद के साथ.”

“तू कह तो सही रही है बहू, पर लोक लाज और मर्यादा के विषय में सोचती हूँ तो डर लगता है.” जया ने कहा तो फागुनी समझ गई कि अब माँ जी को साथ मिलाने में कोई समस्या नहीं रह गई है.

“थोड़ी देर रुकिए माँ जी, इनका खेल अब समाप्ति पर है. फिर हम दोनों की बारी आएगी.”

“तू भी. क्या तू भी मेरे साथ चु…” कहते हुए जया झेंप गई.

“और क्या माँ जी, हम तो सब यूँ ही एक दूसरे के साथ चोदते चुदवाते हैं. बहुत सुख मिलता है ऐसे. वैसे माँ जी, आप भी तो अपनी सहेली के साथ ही चुदवाती हो. तो इसमें क्या अंतर है?” फागुनी ने अपने कपड़े उतारते हुए कहा.

कुछ ही पलों में फागुनी भी जया के सामने नँगी खड़ी थी.

“आइये माँ जी, आपके इन वस्त्रों का कोई अर्थ नहीं है.” फागुनी ने जया की साड़ी के आँचल को हटाते हुए उसकी साड़ी निकाल दी. फिर पेटीकोट, ब्लाउज़ और अंत में ब्रा भी हटा दी. अब जया भी उन सबके सामने नंगी थी.

सभी चुदक्क्ड़ ऐसा आचरण कर रहे थे मानो उन्हें पता भी न हो कि फागुनी और उसकी सास कमरे में हैं. उनकी चुदाई का अंतिम चरण समापन की ओर था और उनकी गति, हुंकार और सिसकियों से प्रतीत हो रहा था कि ये दौड़ समाप्त हो रही थी.

“माँ जी, मैं अब अपने कार्य में लगूँगी, चाहो तो आप भी आ जाना.” ये कहते हुए वो मायादेवी की ओर बढ़ी जहाँ शुभम और निकुंज अब उनकी चूत और गाँड में अपना पानी छोड़ रहे थे. निकुंज ने अपना लौड़ा गाँड से निकाला और मुस्कुराते हुए फागुनी को सौंप दिया. फागुनी ने तपाक से अपने मुँह में लिया और चाटने लगी.

“आह मामी, क्या मस्त चाटती हो.” उसने मामी के सिर को पकड़कर अपने लंड को उनके मुँह में ठूँस दिया. फागुनी ने उसका हाथ हटाकर उसका लंड मुँह से निकाला और फिर मायादेवी की गाँड की ओर देखा जिसमें से निकुंज का पानी बाहर निकल रहा था. जया आश्चर्य से देख रही थी कि उसकी बहू ने मायादेवी की गाँड को फैलाया और उसमें से बहते रस को चाटने लगी.

जया की चूत और गाँड में सुरसुरी होने लगी. फागुनी ने मायादेवी की गाँड साफ करने के बाद उनकी गाँड पर एक हल्की सी चपत लगाई तो वो शुभम के लौड़े से हटकर एक ओर लुढ़क गईं. अब शुभम के लौड़े और मायादेवी की चूत की सफाई का अभियान चला और फागुनी ने संतुष्ट होकर ही उन्हें छोड़ा और मायादेवी को संकेत दिया कि अब उनकी भूमिका आ गई है.

मायादेवी ने एक अंगड़ाई लेते हुए जया की ओर देखा और उठकर उसकी ओर बढ़ी.

“जवान लौंडे ऐसी चुदाई करते हैं कि अंग अंग में तरंग भर जाती है. इन बूढ़ी हड्डियों में भी मानो नई शक्ति आ जाती है.” ये कहकर उन्होंने जया का हाथ थामा और इससे पहले कि वो कुछ कह पाती उसके होंठ चूम लिए.

“बहू सोना है, शुद्ध सोना. देख न तेरे पोतों के लौड़े कैसे मन लगाकर चाट रही है.” मायादेवी ने जया का ध्यान उनके पोतों हरीश और गिरीश में लौड़े चाट रही थी. वहीँ भावना ओर पड़ी हुई थी और उसकी चूत और गाँड से वीर्य बहने को आतुर थे. अपने बेटों के लंड चाटकर फागुनी ने भावना की चूत और गाँड को भी साफ किया और भावना को लेकर जया के पास आ गई.

“लड़कों ने मेरी जवानी लौटा दी.” मायादेवी ने जया को देखते हुए कहा. “अब तुम भी अपने सुख की राह पर चल दो.”

“पर इनके बाबूजी? उन्हें कैसे बताएँगे? क्या बताएँगे?” जया ने प्रश्न किया.

“उन्हें मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं बात करुँगी उनसे. उन्हें मैं समझा दूँगी। तुम अपनी सोचो, क्या जीवन को आनंद जीना चाहती हो, या यूँ ही अतृप्त रहकर?”

जया ने सिर झुकाया, फिर उठाते हुए मायादेवी, फागुनी और भावना को देखा.

“सुख के साथ, आनंद के साथ. जैसे तुम सब जी रहे हो. पर उन्हें समझाना और सहमत कराने का कार्य तुम सबका है. अन्यथा आज के बाद कभी नहीं. उनकी इच्छा से ही मैं अब तक चुदाई करवाती रही हूँ. आज एक अपवाद हो या नहीं ये निर्णय नहीं ले पा रही हूँ. अगर वो पूछेंगे तो मैं झूठ नहीं बोलूँगी। तो बताओ मई क्या करूँ?”

फागुनी, मायादेवी और भावना एक दूसरे को देखने लगे.

फिर मायादेवी बोलीं, “फागुनी, तुम मुझे भाईसाहब के पास ले चलो. तुम्हें बाहर ही रहना है. मैं बात करुँगी और फिर जया को बता दूँगी। अगर मनोज ने सहमति दे दी, तो ठीक अन्यथा इस विषय को यहीं समाप्त कर देंगे. जया, तुम चाहो तो कपड़े पहन सकती हो, अन्यथा भी कोई तुम्हें छुएगा नहीं.”

“मैं, मैं. ठीक हूँ. बस ये ध्यान रखना कि उन्हें कोई कष्ट न हो. सम्भल कर बात करना.”

“मैं ऐसा ही करुँगी. मेरे पास एक और भी युक्ति है, जो सम्भवतः सहायक हो सकती है.”

फागुनी और मायादेवी ने वस्त्र पहने और फागुनी फिर अपने घर की ओर चल पड़ी.


क्रमशः
 

Mass

Well-Known Member
12,865
27,129
259
Wonderful update bhai..जाया भी गयी ..उसे तो लाइन में आना ही है.. और कोई रास्ता भी नहीं है ;)

prkin
 
Last edited:
  • Like
Reactions: parkas
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

parkas

Well-Known Member
33,923
71,643
303
ससुराल की नयी दिशा
अध्याय ५६: पल्लू का मायका और ससुराल

********

पल्लू का मायका


अब तक:

अब प्रतीक्षा थी बुधवार की जहाँ अगले चरण का कार्यक्रम होना था.

अब आगे:

जब फागुनी नीतू की बात करने के लिए गई हुई थी तो पल्लू ने दीप्ति चाची, अमर चाचा और अपने पापा मम्मी से एक प्रश्न किया, “नीतू की बात तो पक्की ही समझिये. मामी अवश्य ही सुखद समाचार ही लाएंगी और हम दोनों बहनें एक ही घर की बहू बन जाएँगी.”

दीप्ति की आँखों में आँसू आ गए, अपनी बेटी को दूसरे घर में भेजने पर किस माँ का मन द्रवित नहीं होता.

भावना ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया, “बेटी को तो जाना ही है, पर सोच दोनों एक घर में ब्याहेंगी तो सुखी रहेंगी. पल्लू की ससुराल तो तुमने देख ही ली है. अच्छे घर में बेटी ब्याही जाये, इससे बड़ा सुख कोई नहीं.”

पल्लू ने अपने पापा और चाचा को एक ओर खींचा, “आपको क्या ये नहीं लगता कि अगर मामी अपने कार्य में सफल हों, जिसकी गारण्टी है तो उन्हें क्या उपहार देना चाहिए?”

उसके पापा और चाचा ने कई वस्तुओं के नाम बताये.

“मेरे विचार से हमें कुछ और करना चाहिए, जो उनकी रूचि को पूर्ण करने में भी सहायक हो. आप समझ रहे हो मैं क्या कह रही हूँ?”

“तू तो बड़ी दुष्ट हो गई है, पल्लू.” उसके चाचा ने उसके कान उमेठते हुए हंसकर कहा.

“अब बताऊँ भी या.....”

“नहीं बता.”

इसके बाद पल्लू ने जो योजना बताई उसे सुनकर दोनों भाइयों के हाथ के तोते उड़ गए.

“बस एक समस्या है, इसमें अधिकतर कार्य मेरे भाइयों को ही करना होगा. पर मुझे लगता है मामी बहुत प्रसन्न हो जाएँगी।”

अशोक और अमर ने एक दूसरे को देखा.

“पापा, चाचू, आजकल सब कुछ रेडीमेड मिलता है, बस लगाने के लिए कुछ परिश्रम, वस्तुएं और बुद्धि चाहिए.”

“ये बात भी ठीक है. पर मुझे दीपक की भी सहमति चाहिए होगी. और तुम्हारी माँ की भी.”

“वो आपकी पहली परीक्षा होगी. पहले मामा से सहमति लो.” ये कहकर पल्लू वहां से हट गई.

सत्या के साथ लौटती हुई फागुनी अपने ही विचारों में खोई हुई थी. सत्या ने भी उसे छेड़ा नहीं। इस समय फागुनी का मन उन बातों में था जो हरीश ने उसे बताई थी. उसने एक योजना बनाई जिसके लिए उसे भावना के सहयोग की आवश्यकता थी. उसे विश्वास था भावना उसे मना नहीं करेगी. पल्लू के जुड़ने से भावना अब अधिक उन्मुक्त प्रतीत हो रही थी.

उसे अपने पति दीपक को भी इसके लिए सहमत करना होगा. इस अभिप्राय को कैसे सफल किया जाये इसी चिंतन में वो घर भी पहुंच गई और उसे ध्यान आया कि उसने सत्या से एक शब्द भी नहीं बोला था.

“सत्या, मुझे क्षमा करना, मैं अपने आप में ही इतना खो गई थी कि तुमसे बात भी नहीं की.”

“कोई बात नहीं, आंटी। मैं भी समझ गया था इसीलिए कोई विघ्न नहीं डाला. ऐसी स्थिति में ऐसा होना सम्भव है.”

“धन्यवाद. सत्या.” ये कहते हुए वो गाड़ी से उतरी और घर में चली गई.

फागुनी ने घर में प्रवेश करने से पहले एक गंभीर मुद्रा अपना ली. जब वो अंदर गई तो सबकी आँखें उसकी ओर मुद गईं। उसके गंभीर चेहरे को देखकर सब मन चिंतित हो गए.

दीप्ति उसके पास गई और पूछा, “क्या हुआ फागुनी, क्या बात नहीं बनी?”

फागुनी उसकी ओर देखते हुए रोने सी लगी. ये देखकर दीप्ति रोने लगी. तभी पल्लू उनके पास पहुँची।

“क्या हुआ मामी? आप ऐसे क्यों रो रही हैं?”

फागुनी ने झूठमूठ अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “अब क्या कहूँ, अपनी नीतू अब पराये घर जो जाने वाली है.”

दीप्ति को ये समझने में कुछ समय लगा और फिर उसने फागुनी के सीने पर एक हल्का सा धक्का मारा.

“अरे पापिन, मेरे तो प्राण ही ले लेती तू.” फिर उसने फागुनी को लगा लिया. सबके चेहरे हर्षित हो उठे और सबने तालियाँ बजानी आरम्भ कर दीं। फागुनी को घेरकर सबने उसे चूमा और उठा लिया.

नीचे उतरने के बाद फागुनी ने दीप्ति और अमर से कहा, “आप उन्हें बुधवार को आमंत्रित कीजिये, नीतू को देखने के लिए.” इसके बाद उसने वहां हुई बातों को बताया, बस ये छोड़ दिया कि वहाँ भी कौटुम्बिक व्यभिचार का प्रचलन है.

जब सब शांत हुए तो उसने अपनी पति दीपक और भावना को एक ओर आने का संकेत दिया. तीनों जब एकांत स्थान पर पहुंचे तो फागुनी से धीरे से हरीश द्वारा बताई हुई घटना उन्हें बताई. दीपक को तो मानो विश्वास ही नहीं हुआ, पर शंका करने का कोई अर्थ भी नहीं था.

फागुनी ने दीपक से कहा, “अब आपको ये निर्णय लेना है कि क्या आपकी माँ को भी जीवन में उस सुख को प्राप्त करना चाहिए जो भावना की सास को मिल रहा है? अगर आप हाँ कहेंगे तो मैं इस विषय में कुछ कर सकती हूँ.”

दीपक सोच में पड़ गया.

तो मित्रों, अपने समझ ही लिया होगा कि जिस वृद्ध दंपत्ति के विषय में अपने पढ़ा था जहाँ वो धन देकर अपनी पत्नी की चुदाई करवाते थे, वो कोई और नहीं दीपक की माँ जया और पिता मनोज थे. हरीश जब उसे दिन घर में गया तो उसने सब देख समझ लिया था.

फिर दीपक बोला, “अगर मैं अशोक और अमर की माँ को चोद सकता हूँ, तो मुझे न कहने का अधिकार नहीं है. परन्तु पिताजी को कैसे समझायेंगे?”

“उस विषय में मैंने कुछ सोचा है. और मेरी योजना है कि ........” फागुनी ने समझाया.

भावना और दीपक ने उसमें कुछ सुझाव दिए और योजना को अंतिम रूप दे दिया. अब इसके कार्यान्वित करना था. जिसके लिए कल का दिन निर्धारित किया गया. इसमें कौन भाग लेगा और किसकी भूमिका क्या होगी, ये भी निश्चित किया गया. इसके बाद वो सबके पास आ गए.

आज पल्लू लौटना था तो फागुनी मामी ने उसे पूरी योजना बता दी. पल्लू को इसमें मामी की चतुरता का आभास हुआ. उन्होंने किस सरलता से सब कुछ अर्जित कर लिया था. यही नहीं परिवारों के मिलन की भी सभी व्यवस्था भी कर ली थी. उसे बस एक संदेह था, क्या सरिता दादी को इस समय इसमें सम्मिलित करना उचित होगा?

फागुनी ने विश्वास दिलाया कि मायादेवी भी रहेंगी तो कोई अड़चन नहीं आएगी, और यही सरिता दादी की इच्छा भी थी. इसके बाद शुभम पल्लू को अपनी ससुराल छोड़ आया, जहाँ इस बार पल्लू का फिर से स्वागत हुआ.

शाम को फागुनी और दीपक ने जया और मनोज को भी शुभ संदेश दिया तो वो अति प्रसन्न हुए. परिवार की इकलौती बेटी का विवाह देखने की उनकी इच्छा जो अब पूरी होनी थी.

अगले दिन:

फागुनी ने अपनी सास जया से कहा कि उन्हें मायादेवी ने बुलाया है. तो ये निश्चित हुआ कि फागुनी ही उन्हें ले जाएगी. उधर दीपक अपने कार्य पर निकल गया, पर उसके मन में बहुत उतार चढ़ाव थे, जिन्हें फागुनी ने कम करने का प्रयास किया, परन्तु वो समझ रही थी कि दीपक की समस्या उसकी माँ नहीं, बल्कि उसके पिता थे. उन्हें किस प्रकार से इसके लिए सहमत किया जायेगा ये एक कठिन प्रश्न था. फागुनी जैसी बुद्धिमती को भी कोई उपाय सूझ न रहा था.

उसके मन में अपनी सास को लेकर भी आशंका थी, परन्तु अगर आगे का जीवन स्वच्छंद रूप से जीना था तो मायादेवी के समान ही उन्हें भी सम्मिलित नितांत आवश्यक था. सम्भवतः उसकी सास ही उसके ससुर से किस प्रकार से इसकी सहमति ली जाये इस विषय में कोई उपाय सुझा सकती थी.

निर्धारित समय पर फागुनी और जया अपने घर से भावना के घर के लिए निकल पड़े.

“अरे ये कहाँ जा रही है, माया तो दूसरी ओर रहती है न? दीप्ति के साथ?”

“जी माँ जी, पर कल से वो वहीँ पर ठहरी हुई हैं, भावना के घर में ही हैं.”

“अच्छा, ये भी ठीक है. चलो.”

“माँ जी, मुझे आपसे कुछ बात करनी थी. अगर आप क्षुभ्ध न हों तो बोलूँ?”

“हाँ, हाँ, तुझे कुछ पूछने के लिए अनुमति थोड़े ही चाहिए.”

फागुनी ने एक गहरी श्वास भरी, “माँ जी, हमें पता है कि बाबूजी अब आपकी उस प्रकार से सेवा नहीं कर सकते हैं. और इस कारण आपको बाहर के लड़कों से अपनी इच्छा पूरी करने पर विवश होना पड़ रहा है.”

जया को काटो तो खून नहीं, ऐसा लगा मानो उसका अस्तित्व ही समाप्त होने को हो. उसका चेहरा लज्जा से लाल हो गया.

“बहू, वो.. मैं.. तेरे बाबूजी…” इससे अधिक वो कुछ बोल न सकी, “मैं कैसे तुम सबको मुँह दिखाऊँगी?”

उसका क्रंदन सुनकर फागुनी का मन द्रवित हो गया.

“माँ जी, माँ जी!” फागुनी ने उसे समझाया, “इसमें आपको कोई भी गलत नहीं समझ रहा है. हमारा मानना है कि आपको भी सुख लेने का पूरा अधिकार है. आपको हमसे मुँह छुपाने की आवश्यकता नहीं है. आप निश्चिन्त रहो.” फागुनी बोली.

“बहू, कैसी बात करती हो? इस आयु में मैं बुढ़िया जवान लौंडों से ये सब करती हूँ और तू कहती है कि मैं विचलित न हूँ?”

“जी माँ जी. मैं यही कह रही हूँ. चलिए हम पहुँच गए, अपना चेहरा ठीक कर लीजिये. यहाँ किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आप व्यथित हैं. हम आगे की बात लौटते हुए कर लेंगे.”

जया ने अपना चेहरा पोंछा, फागुनी ने कार खड़ी की और उन्हें मेकअप का डब्बा दिया तो जया ने अपने चेहरे को व्यवस्थित किया. जया से ऑंखें चुराकर फागुनी ने एक मिस कॉल किया. फिर वो गाड़ी से उतरी और जया को लिया.

“माँ जी, आप बहुत सुंदर लग रही हो, आइये माँ जी आपकी ही राह देख रही होंगी.”

जया को क्या पता था कि मायादेवी किस प्रकार से उसकी राह देख रही हैं.

दोनों अंदर गईं तो बैठक में कोई नहीं था. तो फागुनी ने जया का हाथ पकड़ा और कमरे की ओर चल दी.

जया ने पूछा, “अरे बहू, क्या कर रही है. ऐसे कैसे किसी के कमरे में घुस जाएगी. न घर की घण्टी बजे और सीधे कमरे में जा रही है. कुछ तो ध्यान रख.”

फागुनी, “अरे माँ कोई नहीं है घर में भावना और माँ जी को छोड़कर. आओ.”

और ये कहते हुए कमरे का द्वार खोल लिया. और खुलते ही कमरे से मादक ध्वनि का संगीत सुनाई दिया. जया ठहरी, पर फागुनी निःसंकोच अंदर चली गई और चूँकि उसके हाथ में अपनी सास का हाथ था तो वो भी अंदर खिंची चली गई.

मायादेवी और भावना अंदर ही थीं, परन्तु अकेली न थीं. परिवार के चारों लड़के शुभम, निकुंज, हरीश और गिरीश भी उनके साथ थे. नंगे थे और इस समय जहाँ शुभम और निकुंज मायादेवी को चोद रहे थे तो वहीँ हरीश और गिरीश भावना पर चढ़े हुए थे. फागुनी और भावना की उत्तम योजना का ही परिणाम था कि चुदाई अंतिम चरण पर थी. उन्हें देखकर ये सरलता से समझा जा सकता था कि मायादेवी और भावना दोनों की चूत और गाँड एक साथ मारी जा रही थीं.

जया असहज हो गई और जड़वत खड़ी हुई सामने के दृश्य को देख रही थी. फागुनी ने अभी भी उसका हाथ नहीं छोड़ा था.

“ये ये क्या हैं?” जया ने हिचकते हुए पूछा.

“आपको क्या लगता है माँ जी?” फागुनी से शांति से उत्तर दिया.

“पर ये सब तो एक परिवार के ही हैं. ऐसा जघन्य पाप कैसे कर सकते हैं?”

“माँ जी, पाप है तो है, पर जीवन के सुख भोगने में कैसा पाप? हम सब एक दूसरे के साथ चुदाई का खेल खेलते हैं, और प्रसन्न हैं. बाद एक आप ही हैं जो अब तक जुडी नहीं थीं. और हमारी इच्छा है कि इस कमी को भी आज दूर कर लिया जाये.” फागुनी ने उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा तो जया के शरीर में एक कम्पन सा हुआ.

“पर, मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ? अपने नाती पोतों के साथ?”

“माँ जी, इनके माता पिता भी तो हैं, उनके भी साथ सब कुछ होगा. आपको अब बाहर जाने के विषय में सोचना भी नहीं पड़ेगा.” फागुनी समझ गई कि माँ जी अब बस एक धक्के के साथ ही अपने रंग में आ जाएँगी. पर वो उन्हें ये निर्णय लेना देना चाहती थी. जिससे कि वो आगे के लिए भी आश्वस्त रहें.

“सोचिये माँ जी, जब मन करे तब चुदवा लो, जो भी मिले उससे. कई दिनों तक प्यासी और अतृप्त रहने का कोई कारण नहीं रहेगा.”

जया अब भी अपनी आँखें सामने चलती दो दो दोहरी चुदाई के दृश्य से हटा नहीं पा रही थी.

फागुनी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, “माँ जी, ये आपको निर्णय लेना है कि जीवन कैसे जीना है, अतृप्त रहकर या तृप्ति की राह पर चलते हुए आनंद के साथ.”

“तू कह तो सही रही है बहू, पर लोक लाज और मर्यादा के विषय में सोचती हूँ तो डर लगता है.” जया ने कहा तो फागुनी समझ गई कि अब माँ जी को साथ मिलाने में कोई समस्या नहीं रह गई है.

“थोड़ी देर रुकिए माँ जी, इनका खेल अब समाप्ति पर है. फिर हम दोनों की बारी आएगी.”

“तू भी. क्या तू भी मेरे साथ चु…” कहते हुए जया झेंप गई.

“और क्या माँ जी, हम तो सब यूँ ही एक दूसरे के साथ चोदते चुदवाते हैं. बहुत सुख मिलता है ऐसे. वैसे माँ जी, आप भी तो अपनी सहेली के साथ ही चुदवाती हो. तो इसमें क्या अंतर है?” फागुनी ने अपने कपड़े उतारते हुए कहा.

कुछ ही पलों में फागुनी भी जया के सामने नँगी खड़ी थी.

“आइये माँ जी, आपके इन वस्त्रों का कोई अर्थ नहीं है.” फागुनी ने जया की साड़ी के आँचल को हटाते हुए उसकी साड़ी निकाल दी. फिर पेटीकोट, ब्लाउज़ और अंत में ब्रा भी हटा दी. अब जया भी उन सबके सामने नंगी थी.

सभी चुदक्क्ड़ ऐसा आचरण कर रहे थे मानो उन्हें पता भी न हो कि फागुनी और उसकी सास कमरे में हैं. उनकी चुदाई का अंतिम चरण समापन की ओर था और उनकी गति, हुंकार और सिसकियों से प्रतीत हो रहा था कि ये दौड़ समाप्त हो रही थी.

“माँ जी, मैं अब अपने कार्य में लगूँगी, चाहो तो आप भी आ जाना.” ये कहते हुए वो मायादेवी की ओर बढ़ी जहाँ शुभम और निकुंज अब उनकी चूत और गाँड में अपना पानी छोड़ रहे थे. निकुंज ने अपना लौड़ा गाँड से निकाला और मुस्कुराते हुए फागुनी को सौंप दिया. फागुनी ने तपाक से अपने मुँह में लिया और चाटने लगी.

“आह मामी, क्या मस्त चाटती हो.” उसने मामी के सिर को पकड़कर अपने लंड को उनके मुँह में ठूँस दिया. फागुनी ने उसका हाथ हटाकर उसका लंड मुँह से निकाला और फिर मायादेवी की गाँड की ओर देखा जिसमें से निकुंज का पानी बाहर निकल रहा था. जया आश्चर्य से देख रही थी कि उसकी बहू ने मायादेवी की गाँड को फैलाया और उसमें से बहते रस को चाटने लगी.

जया की चूत और गाँड में सुरसुरी होने लगी. फागुनी ने मायादेवी की गाँड साफ करने के बाद उनकी गाँड पर एक हल्की सी चपत लगाई तो वो शुभम के लौड़े से हटकर एक ओर लुढ़क गईं. अब शुभम के लौड़े और मायादेवी की चूत की सफाई का अभियान चला और फागुनी ने संतुष्ट होकर ही उन्हें छोड़ा और मायादेवी को संकेत दिया कि अब उनकी भूमिका आ गई है.

मायादेवी ने एक अंगड़ाई लेते हुए जया की ओर देखा और उठकर उसकी ओर बढ़ी.

“जवान लौंडे ऐसी चुदाई करते हैं कि अंग अंग में तरंग भर जाती है. इन बूढ़ी हड्डियों में भी मानो नई शक्ति आ जाती है.” ये कहकर उन्होंने जया का हाथ थामा और इससे पहले कि वो कुछ कह पाती उसके होंठ चूम लिए.

“बहू सोना है, शुद्ध सोना. देख न तेरे पोतों के लौड़े कैसे मन लगाकर चाट रही है.” मायादेवी ने जया का ध्यान उनके पोतों हरीश और गिरीश में लौड़े चाट रही थी. वहीँ भावना ओर पड़ी हुई थी और उसकी चूत और गाँड से वीर्य बहने को आतुर थे. अपने बेटों के लंड चाटकर फागुनी ने भावना की चूत और गाँड को भी साफ किया और भावना को लेकर जया के पास आ गई.

“लड़कों ने मेरी जवानी लौटा दी.” मायादेवी ने जया को देखते हुए कहा. “अब तुम भी अपने सुख की राह पर चल दो.”

“पर इनके बाबूजी? उन्हें कैसे बताएँगे? क्या बताएँगे?” जया ने प्रश्न किया.

“उन्हें मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं बात करुँगी उनसे. उन्हें मैं समझा दूँगी। तुम अपनी सोचो, क्या जीवन को आनंद जीना चाहती हो, या यूँ ही अतृप्त रहकर?”

जया ने सिर झुकाया, फिर उठाते हुए मायादेवी, फागुनी और भावना को देखा.

“सुख के साथ, आनंद के साथ. जैसे तुम सब जी रहे हो. पर उन्हें समझाना और सहमत कराने का कार्य तुम सबका है. अन्यथा आज के बाद कभी नहीं. उनकी इच्छा से ही मैं अब तक चुदाई करवाती रही हूँ. आज एक अपवाद हो या नहीं ये निर्णय नहीं ले पा रही हूँ. अगर वो पूछेंगे तो मैं झूठ नहीं बोलूँगी। तो बताओ मई क्या करूँ?”

फागुनी, मायादेवी और भावना एक दूसरे को देखने लगे.

फिर मायादेवी बोलीं, “फागुनी, तुम मुझे भाईसाहब के पास ले चलो. तुम्हें बाहर ही रहना है. मैं बात करुँगी और फिर जया को बता दूँगी। अगर मनोज ने सहमति दे दी, तो ठीक अन्यथा इस विषय को यहीं समाप्त कर देंगे. जया, तुम चाहो तो कपड़े पहन सकती हो, अन्यथा भी कोई तुम्हें छुएगा नहीं.”

“मैं, मैं. ठीक हूँ. बस ये ध्यान रखना कि उन्हें कोई कष्ट न हो. सम्भल कर बात करना.”

“मैं ऐसा ही करुँगी. मेरे पास एक और भी युक्ति है, जो सम्भवतः सहायक हो सकती है.”

फागुनी और मायादेवी ने वस्त्र पहने और फागुनी फिर अपने घर की ओर चल पड़ी.


क्रमशः
Bahut hi badhiya update diya Jai prkin bhai.....
Nice and beautiful update....
 
Top