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bahot hi shhandaar aur umda episodesPART 12
बिस्तर के गद्दे उन दोनों के वजन से नीचे धंस गए थे। कमरे के भीतर फैली वह हल्की नीली रोशनी अब उनके चारों तरफ एक मायावी दुनिया रच रही थी। सिद्धार्थ ने काव्या को अपनी बाहों में उठाकर जब बिस्तर के बीचों-बीच सुलाया, तो काव्या की वह काले रंग की रेशमी नाइट-स्लिप हल्की सी ऊपर खिसक गई, जिससे उसकी गोरी, सुडौल जांघों का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह अनावृत हो गया।
काव्या की सांसें इस वक्त किसी तेज दौड़ते हुए घोड़े की तरह चल रही थीं। उसकी आँखों में एक अजीब सी कशमकश थी—एक तरफ वह 'एथेरिया' की वो योद्धा थी जिसने सदियों से खुद पर काबू रखना सीखा था, दूसरी तरफ एक आम इंसानी औरत का वो डर था जो उसे बार-बार याद दिला रहा था कि बगल के कमरे में उसकी सगी बड़ी बहन साक्षी सो रही है। यह डर, यह झिझक, उनके इस मिलन को और भी ज्यादा रोमांचक और डरावना बना रही थी।
"सिड..." काव्या ने बहुत ही धीमी, लगभग सुबकती हुई आवाज में सिद्धार्थ का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामते हुए कहा। "धीरे... प्लीज। दीदी अगर जाग गईं, तो मैं सच में इसी बिस्तर पर अपनी जान दे दूंगी। मुझे बहुत डर लग रहा है।"
सिद्धार्थ ने काव्या की आँखों में देखा। उन आँखों में छुपा डर और उसके साथ ही उमड़ती हुई वो बेपनाह हवस साफ नजर आ रही थी। सिद्धार्थ अब वो झेंपने वाला लड़का नहीं था। वे दोनों पहले भी कई बार इस बिस्तर पर एक-दूसरे के जिस्म की गहराइयों को नाप चुके थे, इसलिए उनके बीच अब वो शुरुआती अनजानापन नहीं था। वे दोनों एक-दूसरे की कमजोरियों से, एक-दूसरे के जिस्म के हर उस हिस्से से वाकिफ थे जहाँ छूने मात्र से ही बिजली दौड़ जाती थी।
"कोई नहीं जागेगा मौसी... आप सिर्फ मेरी हो, इस वक्त सिर्फ मेरी," सिद्धार्थ ने कहा। उसने जानबूझकर काव्या को 'मौसी' कहकर पुकारा, क्योंकि इस शब्द का इस्तेमाल इस बंद कमरे में उनके भीतर की आग को और ज्यादा भड़का देता था। उसने काव्या के दिमाग में साक्षी का ख्याल आने ही नहीं दिया। वह चाहता था कि काव्या को यही लगे कि सिद्धार्थ की पूरी दुनिया, उसकी पूरी हवस और उसका पूरा प्यार सिर्फ और सिर्फ काव्या के इर्द-गिर्द घूमता है। उसने अपने दिल के उस दूसरे कोने को, जहाँ साक्षी की मासूमियत बसी थी, बहुत ही गहराई से छुपा कर रख लिया था।
सिद्धार्थ ने बिना कोई और वक्त गंवाए काव्या की उस पतली रेशमी नाइट-स्लिप के स्ट्रैप्स को उसके कंधों से नीचे खिसका दिया। वह काला रेशमी कपड़ा सरकता हुआ काव्या की कमर के पास जा गिरा। नीली रोशनी में काव्या का वो दूध जैसा सफेद, सुडौल और गदराया हुआ बदन पूरी तरह से सिद्धार्थ के सामने था। उसकी छाती के भारी उभार उसकी तेज सांसों के साथ ऊपर-नीने हो रहे थे, और उनके ऊपर के कड़े हिस्से सिद्धार्थ को आमंत्रण दे रहे थे।
सिद्धार्थ सीधा काव्या के ऊपर आ गया। उनके जिस्मों का वो सीधा संपर्क इतना उग्र था कि काव्या के मुंह से एक सिसकी निकलने ही वाली थी कि सिद्धार्थ ने फुर्ती से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। उसने काव्या की उस आवाज को अपने मुंह के भीतर ही सोख लिया।
दोनों को पता था कि उन्हें कहाँ पहुंचना है। सिद्धार्थ ने अपनी जीभ काव्या के मुंह के अंदर डाल दी और उसे बुरी तरह मथने लगा। काव्या ने भी अपनी दोनों टांगें सिद्धार्थ की कमर के चारों तरफ कस लीं और अपनी पीठ को बिस्तर से ऊपर उठा दिया। उनके निचले हिस्से एक-दूसरे से इतनी बुरी तरह रगड़ खा रहे थे कि बिना किसी प्रवेश के ही दोनों का शरीर कांपने लगा था।
सिद्धार्थ ने चुंबन तोड़े बिना अपने हाथ नीचे बढ़ाए और काव्या की पैंटी को एक ही झटके में उसकी जांघों से उतार कर फर्श पर फेंक दिया। उसका अपना शरीर भी पूरी तरह से नग्न था। उसने काव्या की एक टांग को अपने कंधे पर रखा, जिससे काव्या की वो गीली चूत पूरी तरह से खुल गई। वहाँ पहले से ही रस की बूंदें चमक रही थीं।
"सिड... आआह्ह... अब और नहीं..." काव्या ने अपनी आँखें पलटते हुए सिद्धार्थ के बालों को मुट्ठी में भींच लिया।
सिद्धार्थ ने अपने शरीर का पूरा वजन आगे बढ़ाया और एक ही धक्के के साथ खुद को काव्या के अंदर पूरी गहराई तक उतार दिया।
"उम्मम्म्मम्म्म!!!" काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपनी पूरी ताकत से सिद्धार्थ के कंधे पर अपने दांत गड़ा दिए ताकि उसकी चीख कमरे से बाहर न जा सके। उसकी चूत की वो कसावट सिद्धार्थ के लंड को इस कदर जकड़ रही थी कि सिद्धार्थ का पूरा बदन अकड़ गया। वह कुछ पलों के लिए वहीं ठहर गया, अपनी सांसों को काबू करने की कोशिश करने लगा।
"ओह गॉड मौसी... आप इतनी तंग हो... हर बार ऐसा लगता है जैसे पहली बार कर रहा हूँ," सिद्धार्थ ने हांफते हुए काव्या के कान के पास फुसफुसाया।
काव्या ने अपनी टांगों से उसकी कमर को और कस लिया। "तो फिर... रुको मत ना... चोदो मुझे... अपनी मौसी को पूरी तरह से फाड़ दो आज..." काव्या इस वक्त लाज-शर्म की सारी हदें पार कर चुकी थी।
सिद्धार्थ ने अपनी गति बढ़ाई। उसके धक्के अब धीमे नहीं थे, वो पूरी तरह से वाइल्ड हो चुके थे। हर एक धक्के के साथ काव्या का पूरा शरीर चारपाई पर ऊपर की तरफ खिसक रहा था। कमरे में उनके शरीरों के आपस में टकराने की एक बहुत ही गीली और तेज 'थप-थप' की आवाज गूंजने लगी। काव्या अपने दोनों हाथों से बिस्तर की चादर को नोच रही थी। उसका पूरा बदन पसीने से भीग चुका था, और वो पसीना उनके जिस्मों के बीच एक चिकनाहट पैदा कर रहा था जिससे घर्षण और भी ज्यादा तीव्र हो गया था।
सिद्धार्थ ने काव्या के दोनों भारी स्तनों को अपने हाथों में लिया और उन्हें इतनी बेरहमी से मसला कि काव्या के मुंह से सिसकियों का एक बवंडर फूट पड़ा। "आह्ह... सिड... हाँ... तेज... और तेज... मर जाऊंगी मैं... आआआह्ह्ह!"
लगभग बीस मिनट की उस निरंतर और खूंखार राइड के बाद, काव्या का पूरा शरीर अचानक से थरथराने लगा। उसकी चूत के अंदर की मांसपेशियां सिद्धार्थ के लंड को बार-बार भींचने लगीं। वह अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। "सिड!! मैं... मैं जा रही हूँ... आह्ह्ह!!"
सिद्धार्थ ने भी अपनी गति को अपनी चरम सीमा पर पहुंचा दिया। उसने लगातार पांच-छह इतने गहरे और अंधाधुंध धक्के मारे कि काव्या की चूत के अंदर एक भयंकर विस्फोट हुआ और उसका पूरा पानी बाहर आ गया। ठीक उसी सेकंड, सिद्धार्थ ने भी एक लंबी कराह के साथ अपने पूरे वीर्य को काव्या के गर्भाशय के मुहाने पर खाली कर दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल होकर गिर पड़े।
करीब पंद्रह मिनट तक दोनों वैसे ही लेटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। कमरे की खिड़कियों पर उनके शरीरों की गर्मी से धुंध जम चुकी थी। लेकिन एक युवा लड़के का शरीर इतनी जल्दी शांत होने वाला नहीं था, और न ही काव्या की वो सदियों पुरानी प्यास एक बार में बुझने वाली थी।
सिद्धार्थ का लंड काव्या के अंदर ही था, जो कुछ देर शांत रहने के बाद फिर से धीरे-धीरे कड़ा होने लगा था। काव्या को अपने अंदर उस भारीपन का दोबारा अहसास हुआ, तो उसने अपनी आँखें खोलीं और सिद्धार्थ की तरफ एक मदहोश नजर से देखा।
"अभी भी पेट नहीं भरा तुम्हारा? राक्षस हो क्या तुम?" काव्या ने मुस्कुराते हुए, सिद्धार्थ के गाल पर हल्का सा थप्पड़ मारते हुए कहा।
"आपके इस बदन से मेरा पेट कभी नहीं भर सकता मौसी," सिद्धार्थ ने कहा और वह काव्या के ऊपर से हटा। उसने काव्या को अपनी तरफ घुमाया और उसे चारपाई पर उल्टा सुला दिया।
काव्या समझ गई कि सिद्धार्थ अब क्या करने वाला है। उसके मन में फिर से एक हल्का सा डर जागा। "सिड... इस पोजीशन में आवाज ज्यादा होती है... प्लीज, दीदी जाग जाएंगी।"
"मैंने कहा ना, कोई नहीं जागेगा। आप बस अपनी आवाज को कंट्रोल रखना," सिद्धार्थ ने कहा। उसने काव्या के गांड़ को अपने दोनों हाथों से पकड़ा। काव्या के वो गांड़ इतने भारी, सुडौल और गोरे थे कि नीली रोशनी में वो किसी संगमरमर के दो गोलों जैसे लग रहे थे। सिद्धार्थ ने उन पर अपने दोनों हाथों के निशान छोड़ते हुए उन्हें जोर से भींचा।
"आह... पागल... मत करो ना ऐसा," काव्या ने तकिए में अपना मुंह छुपाते हुए कहा।
सिद्धार्थ ने पीछे से अपने कड़े हो चुके लंड को काव्या की दोनों जांघों के बीच सेट किया। इस बार उसने कोई जल्दबाजी नहीं की। वह धीरे-धीरे, बहुत ही नजाकत से काव्या के पिछले हिस्से से अपनी लंड को अंदर सरकाने लगा। चूँकि वहाँ पहले से ही उनका मिला-जुला पानी लगा हुआ था, इसलिए प्रवेश बहुत ही चिकना और गहरा हुआ।
"उह्ह्ह्ह्ह... सिड..." काव्या ने तकिए को अपने दांतों से कसकर पकड़ लिया। यह पोजीशन उसके लिए बहुत ही ज्यादा गहरी और तीखी थी। सिद्धार्थ का लंड उसकी दीवारों को पूरी तरह से फैलाते हुए उसके पेट के बहुत अंदर तक छू रहा था।
सिद्धार्थ ने बहुत ही लयबद्ध तरीके से पीछे से धक्के मारना शुरू किया। हर धक्के के साथ काव्या के भारी चूतड़ सिद्धार्थ के अंडकोषों से टकरा रहे थे, जिससे एक बहुत ही मादक 'थपक-थपक' की आवाज आ रही थी। सिद्धार्थ ने आगे झुककर काव्या की नंगी पीठ पर अपने होंठ रख दिए। वह उसकी रीढ़ की हड्डी पर अपनी जीभ चला रहा था, जिससे काव्या का पूरा शरीर सिहर रहा था।
"मौसी... आपकी गांड़ बहुत मस्त है... मेरा मन करता है मैं पूरी रात इसे ही देखता रहूं," सिद्धार्थ ने उत्तेजना में बहकर कहा।
काव्या ने तकिए से मुंह हटाकर पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखें पूरी तरह से वासना के नशे में डूबी हुई थीं। "तो फिर देखते क्या हो... चोदो ना अपनी इस मौसी को... तुम्हारे इस डंडे ने मेरी जान निकाल दी है... आह्ह... यैस सिड... वहीं... वहीं मारो जोर से!"
सिद्धार्थ ने अपनी गति को दोगुना कर दिया। वह पीछे से पूरी ताकत से धक्के लगा रहा था। काव्या चारपाई के पायों को अपने हाथों से कसकर पकड़े हुए थी। उसके शरीर का हर एक अंग इस वक्त सिद्धार्थ के नियंत्रण में था। यह उनका दूसरा राउंड था, जो पहले वाले से भी ज्यादा लंबा खिंचा। सिद्धार्थ ने अपनी सांसों पर काबू रखना सीख लिया था। जब भी उसे लगता कि उसका पानी आने वाला है, वह कुछ पलों के लिए रुक जाता, काव्या की पीठ को चूमता, और फिर से शुरू हो जाता।
लगभग आधे घंटे के बाद, काव्या के सब्र का बांध फिर से टूट गया। उसकी चूत से पानी का एक और रेला छूटा, और उसके तुरंत बाद सिद्धार्थ ने भी एक गहरे धक्के के साथ अपना सारा पानी उसके अंदर छोड़ दिया। काव्या पूरी तरह से बिस्तर पर ढह गई।
रात के करीब एक बज चुके थे। कमरे का तापमान एसी चलने के बावजूद काफी गर्म था। सिद्धार्थ उठकर टेबल से पानी की बोतल लाया। उसने खुद भी पानी पिया और फिर काव्या के मुंह से बोतल लगा दी। काव्या ने गटक-गटक कर आधा पानी पी लिया। उसकी छाती अभी भी बुरी तरह हांफ रही थी।
"तुम इंसान नहीं हो सिड... कोई नहीं कह सकता कि तुम 18 साल के हो। तुमने मुझे पूरी तरह से निचोड़ दिया है," काव्या ने अपनी सूजी हुई आँखों से उसे देखते हुए कहा।
सिद्धार्थ बिस्तर पर सीधा लेट गया। "तो ठीक है, अब मैं आराम करता हूँ।"
काव्या ने उसे देखा। सिद्धार्थ का वो लंबा, कड़ा लंड अभी भी पूरी तरह से शांत नहीं हुआ था, वो उसकी जांघों पर एक भारी सांप की तरह लेटा हुआ था। काव्या के अंदर की औरत को इस बात से एक अजीब सा घमंड महसूस हुआ। ये लड़का सिर्फ मेरे लिए इतना बेकाबू रहता है। दीदी तो इसके लिए सिर्फ एक माँ हैं, लेकिन मैं इसकी असलियत हूँ। (काव्या अभी भी उसी भ्रम में जी रही थी)।
"तुम आराम करोगे? और मेरा क्या? मुझे तुमने बीच मझधार में छोड़ दिया है," काव्या ने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा।
वह उठी और सिद्धार्थ के पैरों की तरफ से रेंगती हुई उसके ऊपर आ गई। उसने अपनी दोनों टांगें सिद्धार्थ के दोनों तरफ फैलाईं और उसके पेट के ऊपर बैठ गई। काव्या के खुले हुए लंबे बाल सिद्धार्थ के चेहरे और सीने पर बिखर गए।
"अब मैं चलाऊंगी गाड़ी... तुम बस चुपचाप पड़े रहना और देखना कि तुम्हारी मौसी तुम्हें कैसे मजा देती है," काव्या ने कहा और उसने अपने हाथों से सिद्धार्थ के उस कड़े लंड को पकड़ा। उसने उसे अपनी चूत के मुहाने पर सेट किया और बहुत ही धीरे से नीचे की तरफ बैठ गई।
"आह्ह्ह..." सिद्धार्थ के मुंह से एक गहरी कराह निकली। काव्या की चूत के अंदर की गर्मी और वो गीलापन इस वक्त एक अलग ही लेवल पर था। काव्या ने पूरा लंड एक ही बार में अपने अंदर ले लिया और सिद्धार्थ के सीने पर अपने दोनों हाथ टिका दिए।
काव्या ने धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होना शुरू किया। वह अपनी मर्जी से गति तय कर रही थी। जब वो ऊपर उठती, तो सिद्धार्थ का लंड लगभग पूरा बाहर आ जाता, और जब वो नीचे बैठती, तो एक गहरी 'प्लॉप' की आवाज के साथ वो पूरा अंदर समा जाता।
सिद्धार्थ ने नीचे से काव्या की पतली कमर को अपने हाथों से पकड़ लिया और उसे ऊपर-नीचे होने में मदद करने लगा। ऊपर से काव्या के दोनों भारी स्तन हवा में लहरा रहे थे। सिद्धार्थ ने अपने सिर को थोड़ा उठाया और बारी-बारी से उसके दोनों स्तनों को अपने मुंह में भरकर चूसने लगा।
"ओह्ह... सिड... हाए री मम्मी... ये बहुत अच्छा है... आह्ह... चूसो उन्हें... और तेज धक्के मारो नीचे से... हाँ बाबू... ऐसे ही..." काव्या अब पूरी तरह से इस राइड के मजे ले रही थी।
कमरे का सन्नाटा उनकी इस उग्र चोदामारी से पूरी तरह टूट चुका था। काव्या की चूड़ियों की छन-छन और उनके जिस्मों की आवाजें एक अजीब सा संगीत रच रही थीं। काव्या ने अपनी गति को और तेज कर दिया। वह किसी अनुभवी घुड़सवार की तरह सिद्धार्थ के ऊपर कूद रही थी। सिद्धार्थ का पूरा शरीर इस सुख से कांप रहा था।
यह उनका तीसरा राउंड था, जो पूरी तरह से काव्या के नियंत्रण में था। लगभग पच्चीस मिनट की इस राइड के बाद, काव्या ने एक बहुत ही तीखी चीख मारी और सिद्धार्थ के सीने पर पूरी तरह से गिर पड़ी। उसकी चूत ने सिद्धार्थ के लंड को इतनी जोर से भींचा कि सिद्धार्थ भी खुद को रोक नहीं पाया और उसका पानी भी एक फव्वारे की तरह काव्या के अंदर छूट गया।
रात के तीन बज रहे थे। यह वो वक्त था जब इंसान का दिमाग पूरी तरह से सो जाता है और सिर्फ उसका आदिम शरीर काम करता है। इतने थकावट भरे तीन राउंड्स के बाद भी, उन दोनों के भीतर की आग पूरी तरह शांत नहीं हुई थी। जवानी का नशा और प्रेम का वो रोमांच उन्हें बार-बार एक-दूसरे की तरफ खींच रहा था।
सिद्धार्थ ने इस बार काव्या को बिस्तर के किनारे पर लाकर खड़ा कर दिया। काव्या के पैर जमीन पर थे, लेकिन उसका आधा शरीर बिस्तर पर झुका हुआ था। सिद्धार्थ उसके पीछे खड़ा था।
"सिड... अब और ताकत नहीं है मेरे पैरों में... मैं गिर जाऊंगी," काव्या ने हांफते हुए कहा। उसकी आवाज में अब एक गहरी थकावट थी, लेकिन उसकी आँखों की वासना अभी भी वैसी ही थी।
"मैं हूँ ना मौसी... गिरने नहीं दूंगा," सिद्धार्थ ने पीछे से उसकी कमर को इतनी जोर से पकड़ा कि उसकी उंगलियों के निशान काव्या की गोरी त्वचा पर छप गए।
उसने बिना कोई भूमिका बनाए, पीछे से एक ही झटके में अपनी लंड को काव्या के अंदर डाल दिया। चूँकि काव्या का शरीर पहले से ही पूरी तरह से खुला हुआ और गीला था, इसलिए लंड बिना किसी रुकावट के पूरा अंदर चला गया।
"आआआआह्ह्ह्ह!!" काव्या ने बिस्तर की चादर को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया। । वह बिना रुके, लगातार बहुत ही तेज और गहरे धक्के मार रहा था।
काव्या का पूरा शरीर हर धक्के के साथ आगे की तरफ हिल रहा था। उसके मुंह से अब लगातार "आह... उम्म... सिड... जानू... मम्म... मम्मी..." की आवाजें निकल रही थीं। वह भूल चुकी थी कि बगल के कमरे में साक्षी है। उसे इस वक्त सिर्फ और सिर्फ सिद्धार्थ का वो भारी और कड़ा लंड महसूस हो रहा था जो उसके वजूद को चीरता हुआ अंदर जा रहा था।
सिद्धार्थ ने पीछे से काव्या के बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया और उसका सिर पीछे की तरफ खींचा। उसने काव्या के होठों को फिर से अपने मुंह में भर लिया। यह किस बहुत ही रफ (खुरदरा) था। सिद्धार्थ ने काव्या के होठों को काटना शुरू कर दिया। काव्या को थोड़ा दर्द हो रहा था, लेकिन वो दर्द इस वक्त उसे एक अलग ही नशा दे रहा था।
यह राउंड लगभग बीस मिनट तक चला, जहाँ सिद्धार्थ ने बिना रुके काव्या को एक बेदर्दी के साथ चोदा। अंत में, दोनों एक साथ, एक ही पल में चिल्लाते हुए बिस्तर पर गिर पड़े। उनका पानी एक बार फिर से एक-दूसरे के अंदर समा गया।
सुबह के करीब साढ़े चार बज रहे थे। हवेली के बाहर आसमान का रंग अब गहरे काले से हल्का नीला होने लगा था। पक्षियों की चहचहाहट बहुत ही धीमी आवाज में शुरू हो चुकी थी। यह रात का आखिरी पहर था, और दोनों जानते थे कि कुछ ही देर में सुबह हो जाएगी, दरवाजा खोलना पड़ेगा, और उन्हें फिर से 'मौसी' और 'भांजे' का नाटक करना पड़ेगा।
इस बात के अहसास ने उनके अंदर एक आखिरी, बहुत ही गहरी और उदास तड़प पैदा कर दी थी।
काव्या सिद्धार्थ की बाहों में सीधी लेटी हुई थी। उसका पूरा शरीर टूट चुका था, उसकी जांघों के बीच एक हल्की सी सूजन और जलन थी, लेकिन उसका दिल अभी भी सिद्धार्थ के लिए धड़क रहा था।
"सिड... सुबह होने वाली है," काव्या ने बहुत ही धीमी आवाज में सिद्धार्थ के सीने पर अपनी उंगली फिराते हुए कहा।
"मुझे पता है मौसी..." सिद्धार्थ ने कहा।
"दूर मत जाना मेरे से... कभी नहीं," काव्या ने कहा और उसने खुद सिद्धार्थ को अपने ऊपर खींच लिया।
यह पूरी तरह से एक-दूसरे में समा जाने का, एक-दूसरे को महसूस करने का एक बहुत ही धीमा और गहरा सेशन था।
सिद्धार्थ ने बहुत ही कोमलता से लंड को काव्या के अंदर उतारा। काव्या की आँखों से इस बार दर्द के नहीं, बल्कि एक बहुत ही गहरे और आत्मिक सुख के आंसू निकल आए। सिद्धार्थ ने बहुत ही धीमे-धीमे, हर एक धक्के को महसूस करते हुए गति शुरू की। काव्या ने उसकी पीठ को बहुत ही प्यार से सहलाया।
"आई लव यू सिड... तुमसे बहुत प्यार करती हूँ मैं... चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे कभी मत छोड़ना," काव्या ने सिद्धार्थ के कानों में फुसफुसाया।
"मैं कभी नहीं छोड़ूँगा मौसी... आप मेरी हो," सिद्धार्थ ने कहा।
वे दोनों करीब चालीस मिनट तक इसी धीमी और मदहोश कर देने वाली गति में एक-दूसरे से जुड़े रहे। भोर की हल्की सुनहरी किरणें जब खिड़की के पर्दों से छनकर उनके पसीने से भीगे हुए, नग्न शरीरों पर पड़ीं, तब जाकर उन दोनों का वो आखिरी और सबसे गहरा डिस्चार्ज हुआ।
सिद्धार्थ पूरी तरह से काव्या के ऊपर ढह गया। काव्या ने उसे अपनी बाहों में पूरी मजबूती से जकड़ लिया। कमरे में अब सिर्फ उनकी शांत होती सांसों की आवाज थी। वे दोनों एक-दूसरे में इस कदर उलझे हुए थे कि कोई नहीं कह सकता था कि ये दुनिया की नजरों में मौसी और भांजे हैं। वे दोनों गहरी, थकावट भरी लेकिन एक परम संतुष्ट नींद के आगोश में चले गए, यह जाने बिना कि इस बंद कमरे के बाहर, हवेली की रसोई में साक्षी अब जाग चुकी थी और चाय बनाने की तैयारी कर रही थी।
Superb updatePART 13
हवेली की उस सुबह में एक अजीब सी खामोशी और भारीपन था। बाहर सूरज पूरी तरह से निकल चुका था, और उसकी तेज सुनहरी किरणें खिड़की के भारी पर्दों के किनारों से छनकर कमरे के फर्श पर पड़ रही थीं। दीवार घड़ी में सुबह के 9:30 बज चुके थे, जो कि हवेली के नियमों के हिसाब से बहुत देर थी।
लेकिन उस बंद कमरे के अंदर, बिस्तर पर लेटे उन दोनों इंसानों को दुनिया, वक्त या सूरज की रोशनी का कोई होश नहीं था। रात भर की उस भयंकर, जंगली और रूह को निचोड़ देने वाली उनके शरीरों की आखिरी बूंद तक की ऊर्जा सोख ली थी।
सिद्धार्थ औंधे मुंह लेटा हुआ था। उसका चेहरा तकिए में धंसा था और उसके मुंह से हल्की-हल्की खर्राटे जैसी आवाजें आ रही थीं। काव्या पूरी तरह से सिद्धार्थ के ऊपर आधी चढ़ी हुई सो रही थी। उसका एक पैर सिद्धार्थ की कमर पर था और उसका सिर सिद्धार्थ की पीठ पर रखा हुआ था। दोनों के शरीर पर धागे का एक टुकड़ा भी नहीं था। वे पूरी तरह से नग्न{NUDE} थे और उनके ऊपर बस एक भारी सी रजाई (कंबल) आधी-अधूरी पड़ी हुई थी। कमरे की हवा में अभी भी पसीने, वासना और उनके जिस्मों की वो तेज, नशीली महक तैर रही थी। फर्श पर काव्या की लाल साड़ी, पेटीकोट, उसकी काली ब्रा और सिद्धार्थ का लोअर बिखरे हुए पड़े थे।
उधर, रसोई में साक्षी सुबह 7 बजे से उठ चुकी थीं। उन्होंने नहा-धोकर पूजा कर ली थी, नाश्ता बना लिया था और अब चाय के कप ट्रे में सजा रही थीं। साक्षी ने अपनी एक बहुत ही साधारण सी सफेद और गुलाबी रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी। उनके चेहरे शांति थी, इस बात से पूरी तरह अनजान कि बीती रात उनकी ही बहन के कमरे में उनके बेटे ने क्या तूफान मचाया है।
"आज ये दोनों अब तक उठे क्यों नहीं? काव्या तो कभी इतनी देर तक नहीं सोती," साक्षी ने खुद से बड़बड़ाते हुए चाय की ट्रे उठाई और काव्या के कमरे की तरफ चल दीं।
कमरे के बाहर पहुंचकर साक्षी ने पहले हल्के से दरवाजा खटखटाया। "काव्या? सिड? उठ जाओ बच्चों, 9:30 बज गए हैं।"
अंदर, उस गहरी नींद में डूबी काव्या के कानों में जब साक्षी की वो मीठी सी आवाज पड़ी, तो पहले तो उसे लगा कि वह कोई सपना देख रही है। लेकिन फिर एक और 'नॉक-नॉक' की आवाज आई।
"काव्या! दरवाजा खोल, मैं चाय लाई हूँ।"
ये आवाज सुनते ही काव्या की आँखें एक ही झटके में पूरी तरह से खुल गईं। उसका दिमाग अभी नींद के नशे में था, लेकिन जैसे ही उसे अहसास हुआ कि वह कहाँ है और किस हालत में है, उसके पूरे शरीर का खून जैसे बर्फ बन गया। उसकी रूह कांप गई।
काव्या ने झटके से अपना सिर उठाया और चारों तरफ देखा। कमरा किसी तबाही का मंजर लग रहा था। कपड़े हर जगह बिखरे थे। और सबसे बड़ी बात, वह खुद पूरी तरह से नंगी थी और सिद्धार्थ भी नंगा था।
हे भगवान!! दीदी बाहर खड़ी हैं!! काव्या के दिल की धड़कन 200 की स्पीड पर दौड़ने लगी। उसका चेहरा डर के मारे सफेद पड़ गया। अगर साक्षी अंदर आ गईं, तो सिर्फ बदनामी ही नहीं होगी, साक्षी सदमे से वहीं मर जाएंगी।
काव्या ने घबराहट में सिद्धार्थ के कंधे को जोर से हिलाया। "सिड!! सिड उठ!! उठ जा पागल, दीदी बाहर हैं!!" काव्या लगभग बिना आवाज किए फुसफुसाते हुए चीख रही थी।
सिद्धार्थ ने बहुत ही भारीपन से करवट ली। "उम्म... सोने दो ना मौसी... बहुत दर्द है बदन में," सिद्धार्थ ने नींद में ही काव्या की नंगी कमर पर हाथ फेरते हुए कहा।
काव्या ने उसका हाथ झटक दिया और उसे एक जोर की चुटकी काटी। "गधे! उठ!! दीदी दरवाजे पर खड़ी हैं! हमारी जान चली जाएगी!"
चुटकी के दर्द और 'दीदी' शब्द ने सिद्धार्थ की नींद को एक ही सेकंड में हवा कर दिया। उसने आँखें फाड़कर देखा। उसका वो डर, जो रात के अंधेरे में वासना के नीचे दब गया था, अब सुबह की रोशनी में एक भयंकर खौफ बनकर सामने आ गया।
"काव्या! क्या कर रहे हो तुम दोनों अंदर? मेरी आवाज नहीं आ रही क्या?" बाहर से साक्षी ने दरवाजे के हैंडल को हल्का सा घुमाते हुए कहा। किस्मत अच्छी थी कि काव्या ने रात को ही अंदर से ताला मार दिया था।
"आ... आ रही हूँ दीदी! बस दो मिनट... वो मैं वॉशरूम में थी!" काव्या ने अपनी आवाज को बिल्कुल सामान्य और थोड़ा सा नींद में होने का नाटक करते हुए कहा, लेकिन उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं।
"कपड़े पहन!! जल्दी कपड़े पहन!" काव्या ने सिद्धार्थ को धक्का देते हुए कहा।
लेकिन कपड़े कमरे के दूसरे कोने में पड़े थे और दरवाजे के बिल्कुल पास थे। अगर वो उठकर कपड़े लेने जाते, तो दरवाजे के नीचे से दिखने वाली परछाई या किसी भी आहट से साक्षी को शक हो सकता था। और कमरे में जो महक थी, वो तो किसी भी हाल में छुपने वाली नहीं थी।
"मेरे पास टाइम नहीं है!" काव्या ने घबराहट में कहा। उसने जल्दी से वो भारी कंबल उठाया और खुद को उसमें गले तक अच्छी तरह से लपेट लिया। "तू यहीं बिस्तर पर लेटा रह, कंबल के अंदर छुप जा। मैं थोड़ा सा दरवाजा खोलकर उन्हें वापस भेजती हूँ।"
सिद्धार्थ जल्दी बिस्तर के उसी किनारे पर खिसक आया और उसने अपने नंगे शरीर को कंबल के एक हिस्से से ढक लिया।
काव्या ने एक लंबी, गहरी सांस ली। अपने चेहरे पर एक झूठी सी मुस्कान लाई, और बहुत ही कांपते हुए हाथों से दरवाजे की कुंडी खोली।
उसने दरवाजा सिर्फ दो या तीन इंच ही खोला। बस इतना कि उसका चेहरा बाहर नजर आए।
"गुड मॉर्निंग दीदी," काव्या ने अपनी नींद से भरी हुई आँखें मलते हुए कहा।
साक्षी मुस्कुराईं। उनके हाथों में चाय की ट्रे थी। "गुड मॉर्निंग कुंभकरण! आज क्या हो गया तुझे? रात को ठीक से नींद नहीं आई क्या? और सिड कहाँ है?" साक्षी ने अपनी मासूम गर्दन को थोड़ा सा टेढ़ा करके दरवाजे की उस दरार से अंदर झांकने की कोशिश की।
काव्या का दिल मुंह को आ गया। उसने जल्दी से अपने शरीर (जो कंबल में लिपटा था) को दरवाजे की दरार के बिल्कुल सामने कर दिया ताकि साक्षी अंदर न देख सकें।
"वो... वो दीदी... रात को मुझे बहुत तेज दर्द हो रहा था। और सिड बेचारा मेरे पैर दबाता रहा देर रात तक। इसलिए हम दोनों की आँख ही नहीं खुली," काव्या ने एक बहुत ही सटीक बहाना मारा।
"ओह मेरा बच्चा! मुझे क्यों नहीं उठाया तूने? ला मैं तेरे तेल लगा देती हूँ," साक्षी के चेहरे पर तुरंत ममता और चिंता आ गई। उन्होंने दरवाजा और खोलने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
काव्या की जान हलक में आ गई। अगर दीदी अंदर आ गईं, तो कपड़े और ये बदबू सब बता देगी!
"नहीं नहीं दीदी! मैं बिल्कुल ठीक हूँ अब। बस अभी उठी हूँ, कपड़े भी नहीं पहने ठीक से। आप चाय डाइनिंग टेबल पर रख दो, मैं बस नहाकर आती हूँ। और सिड को सोने दो, वो बहुत थक गया है," काव्या ने बहुत ही तेजी से कहा।
लेकिन काव्या जिस वक्त साक्षी से ये बात कर रही थी और दरवाजे पर खड़ी मौत (पकड़े जाने के डर) का सामना कर रही थी, ठीक उसी वक्त उसके पीछे बिस्तर पर लेटे सिद्धार्थ का दिमाग एक अलग ही दिशा में दौड़ पड़ा।
रात के बाद भी, सुबह का वक्त एक जवान लड़के के लिए बहुत उत्तेजक होता है (Morning wood)। सिद्धार्थ का लंड पूरी तरह से सख्त हो चुका था। उसने देखा कि काव्या दरवाजे के पास खड़ी है। काव्या ने कंबल आगे से तो लपेट रखा था, लेकिन पीछे की तरफ से वो कंबल खुला हुआ था। काव्या की नंगी पीठ, उसकी सुडौल और भारी गांड़ और उसकी दोनों टांगें सिद्धार्थ के चेहरे के बिल्कुल सामने थीं।
सिद्धार्थ ने बहुत ही दबे पाँव, बिना कोई आवाज किए अपने शरीर को आगे खिसकाया। काव्या दरवाजे की चौखट से लगी खड़ी थी। सिद्धार्थ ने अपना नंगा और सख्त लंड पीछे से काव्या की दोनों नंगी जांघों के बीच ले जाकर हल्का सा सटा दिया।
काव्या, जो सामने साक्षी से बात कर रही थी, इस अचानक हुए गर्म और सख्त स्पर्श से एकदम से सिहर उठी।
"उईई!" काव्या के मुंह से अनजाने में एक हल्की सी आवाज निकल गई।
"क्या हुआ काव्या? दर्द हो रहा है क्या?" साक्षी ने चिंता से पूछा।
काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने होंठों को दांतों तले कसकर दबा लिया। उसका चेहरा शर्म और डर से लाल हो गया। "न.. नहीं दीदी। वो.. वो पैर में हल्की सी मोच आ गई थी, उसी का दर्द है।"
काव्या ने अपने हाथ को पीछे ले जाकर सिद्धार्थ को दूर धकेलने की कोशिश की। लेकिन सिद्धार्थ कहाँ रुकने वाला था। उसने काव्या का वो हाथ पकड़ लिया। फिर सिद्धार्थ ने अपना दूसरा हाथ काव्या के कंबल के अंदर डाला और उसकी कमर को पीछे से पकड़ लिया।
काव्या की सांसें अटक गईं। सामने उसकी सगी बहन खड़ी थी, और पीछे उसका भांजा उसे नंगा छू रहा था। यह एक ऐसी खौफनाक और उत्तेजक स्थिति थी कि काव्या का दिमाग सुन्न हो गया।
सिद्धार्थ के हाथ अब काव्या की कमर से होते हुए नीचे उसकी गांड़ पर आ गए थे। उसने काव्या के दोनों गोरे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों में भर लिया और उन्हें बहुत ही नजाकत से, लेकिन मजबूती से दबाना शुरू कर दिया।
काव्या का पूरा शरीर एक कमान की तरह तन गया। वह अपनी जगह पर कांपने लगी।
"काव्या? तू कांप क्यों रही है? तुझे बुखार तो नहीं है?" साक्षी ने काव्या के चेहरे को देखकर पूछा, जो अब पसीने से भीगने लगा था।
"न.. नहीं दीदी.. वो मुझे वॉशरूम जाना है.. बहुत जोर से.. इसलिए.. आप प्लीज जाओ," काव्या बहुत ही मुश्किल से अपने शब्दों को जोड़ पा रही थी।
सिद्धार्थ अब अपनी हदों को पार कर रहा था। उसने काव्या के चूतड़ों को छोड़ कर, अपनी एक उंगली को काव्या की दोनों जांघों के बीच की उस गीली चूत पर रख दिया, जहाँ रात के कारण अभी भी बहुत ज्यादा दर्द था।
जैसे ही सिद्धार्थ की उंगली ने उस जगह को सहलाया, काव्या के मुंह से एक तेज सिसकी निकलने ही वाली थी, लेकिन उसने दरवाजे के पल्ले को अपने दोनों हाथों से पूरी ताकत से जकड़ लिया और अपनी चीख को अपने सीने में ही घोंट दिया।
"काव्या, तेरा चेहरा तो एकदम लाल हो रहा है। रुक मैं अंदर आती हूँ," साक्षी नेदरवाजा धकेलने की कोशिश की।
काव्या अपनी पूरी ताकत लगाकर दरवाजे को वापस खींचा। "नहीं दीदी!! मेरी कसम, मैं ठीक हूँ! आप प्लीज जाओ! मैं सिड को लेकर आ रही हूँ बस पांच मिनट में!"
काव्या की आवाज में इतना असली डर और घबराहट थी कि साक्षी थोड़ा पीछे हट गईं।
"अच्छा ठीक है बाबा। मैं चाय टेबल पर ढक कर रख रही हूँ। जल्दी आना," साक्षी ने कहा और वो मुड़कर दालान की तरफ जाने लगीं।
काव्या ने जैसे ही देखा कि साक्षी मुड़ गई हैं, उसने बिना एक सेकंड गंवाए दरवाजे को एक झटके में बंद किया और खटाक से कुंडी मार दी।
दरवाजा लॉक होते ही काव्या ने वो कंबल वहीं फर्श पर फेंक दिया। वह पलटी। उसकी आँखों में गुस्सा, डर और शर्म मिला-जुला था।
सिद्धार्थ अभी भी वहीं खड़ा था, पूरी तरह नंगा, और उसके चेहरे पर एक बहुत ही शैतानी मुस्कान थी। उसका लंड हवा में तन कर खड़ा था।
"कुत्ते!! कमीने!! जानवर कहीं के!!" काव्या फुसफुसाती हुई चीखी और वो सिद्धार्थ के ऊपरह टूट पड़ी।
उसने सिद्धार्थ को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया और उसके सीने पर, कंधों पर अपने दोनों हाथों से मुक्के बरसाने लगी।
"तू मुझे मरवाएगा!! मेरी जान ले लेगा तू एक दिन! तेरा दिमाग खराब है? दीदी सामने खड़ी थीं और तू पीछे से मेरी... मेरी... उफ़्फ़!! अगर वो एक इंच भी दरवाजा खोल लेतीं तो हम दोनों सड़क पर होते आज!" काव्या उसे पीटते हुए रोने जैसी हो गई थी।
सिद्धार्थ उसे रोक नहीं रहा था। वो बस बिस्तर पर पड़ा-पड़ा जोर-जोर से हंस रहा था। उसे काव्या की इस घबराहट और अपने इस मजे पर बहुत हंसी आ रही थी। वो इतना हंसा कि उसकी आँखों से पानी आ गया।
"हंस रहा है? बेशर्म इंसान! मुझे हार्ट अटैक आ जाता अभी!" काव्या ने एक और मुक्का मारा, लेकिन इस बार उसकी अपनी हंसी भी छूट गई।
खतरे से बाल-बाल बचने का वो रोमांच और वो अजीब सी स्थिति, काव्या को भी अंदर ही अंदर गुदगुदा रही थी। वो भी सिद्धार्थ के ऊपर गिरकर हंसने लगी। दोनों कुछ देर तक बस बिस्तर पर पड़े-पड़े हंसते रहे।
सिद्धार्थ ने हंसते हुए काव्या को अपनी बाहों में खींच लिया। "पर मौसी... जो मजा पीछे से आपको छूने में आया ना, वो रात में भी नहीं था। आपका चेहरा देखने लायक था जब दीदी आपसे बात कर रही थीं और मैं आपकी..."
"चुप कर जा कमीने!" काव्या ने सिद्धार्थ के होठों पर अपना हाथ रख दिया। "आज के बाद ऐसा कभी मत करना। मेरा दिल अभी भी बाहर आने को हो रहा है।"
सिद्धार्थ ने काव्या के उस हाथ को चूम लिया। दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा। वो एक बहुत ही गहरा, प्यार भरा और राहत का पल था।
"चलो अब, जल्दी से कपड़े पहनो। दीदी सच में आ जाएंगी दोबारा," काव्या ने कहा और वो उठकर वॉशरूम की तरफ भाग गई।
जब काव्या और सिद्धार्थ जल्दी-जल्दी तैयार होकर बाहर निकले, तो सिद्धार्थ की हालत सच में खराब होने लगी थी। एड्रेनालाईन (Adrenaline) और डर का असर अब खत्म हो चुका था। 18 साल के एक लड़के के शरीर ने रात भर में जितना काम किया था, अब वो शरीर अपनी कीमत मांग रहा था। सिद्धार्थ की आँखें नींद से भारी हो रही थीं, उसके पैरों में दर्द था और वो सच में खड़े होने की स्थिति में नहीं था।
डाइनिंग टेबल पर साक्षी ने उन दोनों को चाय दी। काव्या ने तो जल्दी से चाय पी ली, लेकिन सिद्धार्थ कुर्सी पर बैठा-बैठा ही झपकियां लेने लगा।
साक्षी ने सिद्धार्थ की ये हालत देखी। उनका दिल पसीज गया।
"सिड? मेरा बच्चा, क्या हो गया तुझे? तेरी तो आँखें भी नहीं खुल रही हैं," साक्षी ने सिद्धार्थ के माथे पर हाथ रखते हुए बहुत ही मासूम और चिंतित स्वर में कहा।
सिद्धार्थ ने अपनी आधी खुली आँखों से साक्षी को देखा। साक्षी का वो प्यार भरा चेहरा, उनकी वो मासूमियत और महक सिद्धार्थ को एक अलग ही दुनिया में ले गई। काव्या के साथ वो एक जंगली शेर था, लेकिन साक्षी के सामने वो हमेशा उनका वही मासूम सा बच्चा बन जाता था।
"माँ... बहुत नींद आ रही है। सिर में भी दर्द है," सिद्धार्थ ने सच में एक बच्चे की तरह लाड़ करते हुए कहा।
"ओह मेरा सिड! रात भर तूने काव्या के पैर दबाए हैं ना, इसलिए तेरी ये हालत हो गई है," साक्षी ने सिद्धार्थ को अपनी बाहों के सहारे उठाया। "चल, तू मेरे कमरे में चल। वहाँ आराम से सो जाना।"
काव्या वहीं खड़ी ये सब देख रही थी। उसे पता था कि सिद्धार्थ रात भर सोया नहीं है (कारण तो वो अच्छे से जानती थी)। उसे सिद्धार्थ पर तरस भी आ रहा था, लेकिन साथ ही साक्षी का सिद्धार्थ को इस तरह प्यार से ले जाना उसे फिर से एक अजीब सी जलन दे रहा था।
"दीदी, मैं सुला देती हूँ इसे अपने कमरे में," काव्या ने जल्दी से कहा।
"नहीं काव्या, तेरे कमरे में धूप आती है इस वक्त। मेरा कमरा ठंडा है। और तू भी जाकर आराम कर, रात को तेरी भी तबीयत खराब थी," साक्षी ने बहुत ही भोलेपन से कहा।
काव्या कुछ नहीं बोल पाई। वो बस सिद्धार्थ को साक्षी के साथ जाते हुए देखती रही।
साक्षी सिद्धार्थ को अपने कमरे में ले गईं। उनका कमरा बहुत ही शांत, साफ और हल्के नीले रंग का था। कमरे में एक बहुत ही पवित्र सी शांति थी।
साक्षी ने सिद्धार्थ को अपने बड़े से बिस्तर पर लिटाया। सिद्धार्थ सच में इतना थक चुका था कि बिस्तर पर गिरते ही उसका शरीर निढाल हो गया।
साक्षी उसके पास ही बिस्तर के किनारे पर बैठ गईं। उन्होंने सिद्धार्थ का सिर अपनी गोद में रख लिया। साक्षी अपनी उन मुलायम और ठंडी उंगलियों से सिद्धार्थ के बालों को सहलाने लगीं।
"सो जा मेरे बच्चे... मैं हूँ तेरे पास," साक्षी ने बहुत ही प्यार से सिद्धार्थ के माथे पर एक किस किया।
सिद्धार्थ ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसका चेहरा साक्षी के पेट और उनकी छाती के बिल्कुल करीब था। साक्षी की सूती साड़ी की वो नरमी, उनके जिस्म की वो ठंडी और पवित्र गर्माहट सिद्धार्थ के थके हुए शरीर को एक ऐसा सुकून दे रही थी जो दुनिया की किसी भी दवा में नहीं था।
सिद्धार्थ का दिमाग अब दो अलग-अलग दुनियाओं में झूल रहा था। कुछ घंटे पहले, वो काव्या के साथ एक बंद कमरे में हवस और पागलपन की सारी हदें पार कर रहा था। वो काव्या को बिस्तर पर रौंद रहा था। और अब, वो दुनिया की सबसे खूबसूरत और मासूम औरत की गोद में, एक बच्चे की तरह सिर रखकर सो रहा था, वो औरत जिसे वो अपनी माँ कहता था, लेकिन जिसके लिए उसके दिल के सबसे गहरे कोने में एक ऐसा प्यार पनप रहा था जो काव्या के प्यार से भी ज्यादा खतरनाक और गहरा था।
सिद्धार्थ ने गहरी सांस ली। साक्षी की वो महक उसके फेफड़ों में भर गई।
मैं दोनों को प्यार करता हूँ... और मैं दोनों को कभी नहीं खो सकता, सिद्धार्थ ने आधी नींद में मन ही मन सोचा।
कुछ ही मिनटों में, साक्षी की उस ममता भरी छांव में, सिद्धार्थ एक बहुत ही गहरी और लंबी नींद में चला गया। हवेली में अब पूरी तरह से शांति छा गई थी।
Nice story broPART 13
हवेली की उस सुबह में एक अजीब सी खामोशी और भारीपन था। बाहर सूरज पूरी तरह से निकल चुका था, और उसकी तेज सुनहरी किरणें खिड़की के भारी पर्दों के किनारों से छनकर कमरे के फर्श पर पड़ रही थीं। दीवार घड़ी में सुबह के 9:30 बज चुके थे, जो कि हवेली के नियमों के हिसाब से बहुत देर थी।
लेकिन उस बंद कमरे के अंदर, बिस्तर पर लेटे उन दोनों इंसानों को दुनिया, वक्त या सूरज की रोशनी का कोई होश नहीं था। रात भर की उस भयंकर, जंगली और रूह को निचोड़ देने वाली उनके शरीरों की आखिरी बूंद तक की ऊर्जा सोख ली थी।
सिद्धार्थ औंधे मुंह लेटा हुआ था। उसका चेहरा तकिए में धंसा था और उसके मुंह से हल्की-हल्की खर्राटे जैसी आवाजें आ रही थीं। काव्या पूरी तरह से सिद्धार्थ के ऊपर आधी चढ़ी हुई सो रही थी। उसका एक पैर सिद्धार्थ की कमर पर था और उसका सिर सिद्धार्थ की पीठ पर रखा हुआ था। दोनों के शरीर पर धागे का एक टुकड़ा भी नहीं था। वे पूरी तरह से नग्न{NUDE} थे और उनके ऊपर बस एक भारी सी रजाई (कंबल) आधी-अधूरी पड़ी हुई थी। कमरे की हवा में अभी भी पसीने, वासना और उनके जिस्मों की वो तेज, नशीली महक तैर रही थी। फर्श पर काव्या की लाल साड़ी, पेटीकोट, उसकी काली ब्रा और सिद्धार्थ का लोअर बिखरे हुए पड़े थे।
उधर, रसोई में साक्षी सुबह 7 बजे से उठ चुकी थीं। उन्होंने नहा-धोकर पूजा कर ली थी, नाश्ता बना लिया था और अब चाय के कप ट्रे में सजा रही थीं। साक्षी ने अपनी एक बहुत ही साधारण सी सफेद और गुलाबी रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी। उनके चेहरे शांति थी, इस बात से पूरी तरह अनजान कि बीती रात उनकी ही बहन के कमरे में उनके बेटे ने क्या तूफान मचाया है।
"आज ये दोनों अब तक उठे क्यों नहीं? काव्या तो कभी इतनी देर तक नहीं सोती," साक्षी ने खुद से बड़बड़ाते हुए चाय की ट्रे उठाई और काव्या के कमरे की तरफ चल दीं।
कमरे के बाहर पहुंचकर साक्षी ने पहले हल्के से दरवाजा खटखटाया। "काव्या? सिड? उठ जाओ बच्चों, 9:30 बज गए हैं।"
अंदर, उस गहरी नींद में डूबी काव्या के कानों में जब साक्षी की वो मीठी सी आवाज पड़ी, तो पहले तो उसे लगा कि वह कोई सपना देख रही है। लेकिन फिर एक और 'नॉक-नॉक' की आवाज आई।
"काव्या! दरवाजा खोल, मैं चाय लाई हूँ।"
ये आवाज सुनते ही काव्या की आँखें एक ही झटके में पूरी तरह से खुल गईं। उसका दिमाग अभी नींद के नशे में था, लेकिन जैसे ही उसे अहसास हुआ कि वह कहाँ है और किस हालत में है, उसके पूरे शरीर का खून जैसे बर्फ बन गया। उसकी रूह कांप गई।
काव्या ने झटके से अपना सिर उठाया और चारों तरफ देखा। कमरा किसी तबाही का मंजर लग रहा था। कपड़े हर जगह बिखरे थे। और सबसे बड़ी बात, वह खुद पूरी तरह से नंगी थी और सिद्धार्थ भी नंगा था।
हे भगवान!! दीदी बाहर खड़ी हैं!! काव्या के दिल की धड़कन 200 की स्पीड पर दौड़ने लगी। उसका चेहरा डर के मारे सफेद पड़ गया। अगर साक्षी अंदर आ गईं, तो सिर्फ बदनामी ही नहीं होगी, साक्षी सदमे से वहीं मर जाएंगी।
काव्या ने घबराहट में सिद्धार्थ के कंधे को जोर से हिलाया। "सिड!! सिड उठ!! उठ जा पागल, दीदी बाहर हैं!!" काव्या लगभग बिना आवाज किए फुसफुसाते हुए चीख रही थी।
सिद्धार्थ ने बहुत ही भारीपन से करवट ली। "उम्म... सोने दो ना मौसी... बहुत दर्द है बदन में," सिद्धार्थ ने नींद में ही काव्या की नंगी कमर पर हाथ फेरते हुए कहा।
काव्या ने उसका हाथ झटक दिया और उसे एक जोर की चुटकी काटी। "गधे! उठ!! दीदी दरवाजे पर खड़ी हैं! हमारी जान चली जाएगी!"
चुटकी के दर्द और 'दीदी' शब्द ने सिद्धार्थ की नींद को एक ही सेकंड में हवा कर दिया। उसने आँखें फाड़कर देखा। उसका वो डर, जो रात के अंधेरे में वासना के नीचे दब गया था, अब सुबह की रोशनी में एक भयंकर खौफ बनकर सामने आ गया।
"काव्या! क्या कर रहे हो तुम दोनों अंदर? मेरी आवाज नहीं आ रही क्या?" बाहर से साक्षी ने दरवाजे के हैंडल को हल्का सा घुमाते हुए कहा। किस्मत अच्छी थी कि काव्या ने रात को ही अंदर से ताला मार दिया था।
"आ... आ रही हूँ दीदी! बस दो मिनट... वो मैं वॉशरूम में थी!" काव्या ने अपनी आवाज को बिल्कुल सामान्य और थोड़ा सा नींद में होने का नाटक करते हुए कहा, लेकिन उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं।
"कपड़े पहन!! जल्दी कपड़े पहन!" काव्या ने सिद्धार्थ को धक्का देते हुए कहा।
लेकिन कपड़े कमरे के दूसरे कोने में पड़े थे और दरवाजे के बिल्कुल पास थे। अगर वो उठकर कपड़े लेने जाते, तो दरवाजे के नीचे से दिखने वाली परछाई या किसी भी आहट से साक्षी को शक हो सकता था। और कमरे में जो महक थी, वो तो किसी भी हाल में छुपने वाली नहीं थी।
"मेरे पास टाइम नहीं है!" काव्या ने घबराहट में कहा। उसने जल्दी से वो भारी कंबल उठाया और खुद को उसमें गले तक अच्छी तरह से लपेट लिया। "तू यहीं बिस्तर पर लेटा रह, कंबल के अंदर छुप जा। मैं थोड़ा सा दरवाजा खोलकर उन्हें वापस भेजती हूँ।"
सिद्धार्थ जल्दी बिस्तर के उसी किनारे पर खिसक आया और उसने अपने नंगे शरीर को कंबल के एक हिस्से से ढक लिया।
काव्या ने एक लंबी, गहरी सांस ली। अपने चेहरे पर एक झूठी सी मुस्कान लाई, और बहुत ही कांपते हुए हाथों से दरवाजे की कुंडी खोली।
उसने दरवाजा सिर्फ दो या तीन इंच ही खोला। बस इतना कि उसका चेहरा बाहर नजर आए।
"गुड मॉर्निंग दीदी," काव्या ने अपनी नींद से भरी हुई आँखें मलते हुए कहा।
साक्षी मुस्कुराईं। उनके हाथों में चाय की ट्रे थी। "गुड मॉर्निंग कुंभकरण! आज क्या हो गया तुझे? रात को ठीक से नींद नहीं आई क्या? और सिड कहाँ है?" साक्षी ने अपनी मासूम गर्दन को थोड़ा सा टेढ़ा करके दरवाजे की उस दरार से अंदर झांकने की कोशिश की।
काव्या का दिल मुंह को आ गया। उसने जल्दी से अपने शरीर (जो कंबल में लिपटा था) को दरवाजे की दरार के बिल्कुल सामने कर दिया ताकि साक्षी अंदर न देख सकें।
"वो... वो दीदी... रात को मुझे बहुत तेज दर्द हो रहा था। और सिड बेचारा मेरे पैर दबाता रहा देर रात तक। इसलिए हम दोनों की आँख ही नहीं खुली," काव्या ने एक बहुत ही सटीक बहाना मारा।
"ओह मेरा बच्चा! मुझे क्यों नहीं उठाया तूने? ला मैं तेरे तेल लगा देती हूँ," साक्षी के चेहरे पर तुरंत ममता और चिंता आ गई। उन्होंने दरवाजा और खोलने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
काव्या की जान हलक में आ गई। अगर दीदी अंदर आ गईं, तो कपड़े और ये बदबू सब बता देगी!
"नहीं नहीं दीदी! मैं बिल्कुल ठीक हूँ अब। बस अभी उठी हूँ, कपड़े भी नहीं पहने ठीक से। आप चाय डाइनिंग टेबल पर रख दो, मैं बस नहाकर आती हूँ। और सिड को सोने दो, वो बहुत थक गया है," काव्या ने बहुत ही तेजी से कहा।
लेकिन काव्या जिस वक्त साक्षी से ये बात कर रही थी और दरवाजे पर खड़ी मौत (पकड़े जाने के डर) का सामना कर रही थी, ठीक उसी वक्त उसके पीछे बिस्तर पर लेटे सिद्धार्थ का दिमाग एक अलग ही दिशा में दौड़ पड़ा।
रात के बाद भी, सुबह का वक्त एक जवान लड़के के लिए बहुत उत्तेजक होता है (Morning wood)। सिद्धार्थ का लंड पूरी तरह से सख्त हो चुका था। उसने देखा कि काव्या दरवाजे के पास खड़ी है। काव्या ने कंबल आगे से तो लपेट रखा था, लेकिन पीछे की तरफ से वो कंबल खुला हुआ था। काव्या की नंगी पीठ, उसकी सुडौल और भारी गांड़ और उसकी दोनों टांगें सिद्धार्थ के चेहरे के बिल्कुल सामने थीं।
सिद्धार्थ ने बहुत ही दबे पाँव, बिना कोई आवाज किए अपने शरीर को आगे खिसकाया। काव्या दरवाजे की चौखट से लगी खड़ी थी। सिद्धार्थ ने अपना नंगा और सख्त लंड पीछे से काव्या की दोनों नंगी जांघों के बीच ले जाकर हल्का सा सटा दिया।
काव्या, जो सामने साक्षी से बात कर रही थी, इस अचानक हुए गर्म और सख्त स्पर्श से एकदम से सिहर उठी।
"उईई!" काव्या के मुंह से अनजाने में एक हल्की सी आवाज निकल गई।
"क्या हुआ काव्या? दर्द हो रहा है क्या?" साक्षी ने चिंता से पूछा।
काव्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने होंठों को दांतों तले कसकर दबा लिया। उसका चेहरा शर्म और डर से लाल हो गया। "न.. नहीं दीदी। वो.. वो पैर में हल्की सी मोच आ गई थी, उसी का दर्द है।"
काव्या ने अपने हाथ को पीछे ले जाकर सिद्धार्थ को दूर धकेलने की कोशिश की। लेकिन सिद्धार्थ कहाँ रुकने वाला था। उसने काव्या का वो हाथ पकड़ लिया। फिर सिद्धार्थ ने अपना दूसरा हाथ काव्या के कंबल के अंदर डाला और उसकी कमर को पीछे से पकड़ लिया।
काव्या की सांसें अटक गईं। सामने उसकी सगी बहन खड़ी थी, और पीछे उसका भांजा उसे नंगा छू रहा था। यह एक ऐसी खौफनाक और उत्तेजक स्थिति थी कि काव्या का दिमाग सुन्न हो गया।
सिद्धार्थ के हाथ अब काव्या की कमर से होते हुए नीचे उसकी गांड़ पर आ गए थे। उसने काव्या के दोनों गोरे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों में भर लिया और उन्हें बहुत ही नजाकत से, लेकिन मजबूती से दबाना शुरू कर दिया।
काव्या का पूरा शरीर एक कमान की तरह तन गया। वह अपनी जगह पर कांपने लगी।
"काव्या? तू कांप क्यों रही है? तुझे बुखार तो नहीं है?" साक्षी ने काव्या के चेहरे को देखकर पूछा, जो अब पसीने से भीगने लगा था।
"न.. नहीं दीदी.. वो मुझे वॉशरूम जाना है.. बहुत जोर से.. इसलिए.. आप प्लीज जाओ," काव्या बहुत ही मुश्किल से अपने शब्दों को जोड़ पा रही थी।
सिद्धार्थ अब अपनी हदों को पार कर रहा था। उसने काव्या के चूतड़ों को छोड़ कर, अपनी एक उंगली को काव्या की दोनों जांघों के बीच की उस गीली चूत पर रख दिया, जहाँ रात के कारण अभी भी बहुत ज्यादा दर्द था।
जैसे ही सिद्धार्थ की उंगली ने उस जगह को सहलाया, काव्या के मुंह से एक तेज सिसकी निकलने ही वाली थी, लेकिन उसने दरवाजे के पल्ले को अपने दोनों हाथों से पूरी ताकत से जकड़ लिया और अपनी चीख को अपने सीने में ही घोंट दिया।
"काव्या, तेरा चेहरा तो एकदम लाल हो रहा है। रुक मैं अंदर आती हूँ," साक्षी नेदरवाजा धकेलने की कोशिश की।
काव्या अपनी पूरी ताकत लगाकर दरवाजे को वापस खींचा। "नहीं दीदी!! मेरी कसम, मैं ठीक हूँ! आप प्लीज जाओ! मैं सिड को लेकर आ रही हूँ बस पांच मिनट में!"
काव्या की आवाज में इतना असली डर और घबराहट थी कि साक्षी थोड़ा पीछे हट गईं।
"अच्छा ठीक है बाबा। मैं चाय टेबल पर ढक कर रख रही हूँ। जल्दी आना," साक्षी ने कहा और वो मुड़कर दालान की तरफ जाने लगीं।
काव्या ने जैसे ही देखा कि साक्षी मुड़ गई हैं, उसने बिना एक सेकंड गंवाए दरवाजे को एक झटके में बंद किया और खटाक से कुंडी मार दी।
दरवाजा लॉक होते ही काव्या ने वो कंबल वहीं फर्श पर फेंक दिया। वह पलटी। उसकी आँखों में गुस्सा, डर और शर्म मिला-जुला था।
सिद्धार्थ अभी भी वहीं खड़ा था, पूरी तरह नंगा, और उसके चेहरे पर एक बहुत ही शैतानी मुस्कान थी। उसका लंड हवा में तन कर खड़ा था।
"कुत्ते!! कमीने!! जानवर कहीं के!!" काव्या फुसफुसाती हुई चीखी और वो सिद्धार्थ के ऊपरह टूट पड़ी।
उसने सिद्धार्थ को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया और उसके सीने पर, कंधों पर अपने दोनों हाथों से मुक्के बरसाने लगी।
"तू मुझे मरवाएगा!! मेरी जान ले लेगा तू एक दिन! तेरा दिमाग खराब है? दीदी सामने खड़ी थीं और तू पीछे से मेरी... मेरी... उफ़्फ़!! अगर वो एक इंच भी दरवाजा खोल लेतीं तो हम दोनों सड़क पर होते आज!" काव्या उसे पीटते हुए रोने जैसी हो गई थी।
सिद्धार्थ उसे रोक नहीं रहा था। वो बस बिस्तर पर पड़ा-पड़ा जोर-जोर से हंस रहा था। उसे काव्या की इस घबराहट और अपने इस मजे पर बहुत हंसी आ रही थी। वो इतना हंसा कि उसकी आँखों से पानी आ गया।
"हंस रहा है? बेशर्म इंसान! मुझे हार्ट अटैक आ जाता अभी!" काव्या ने एक और मुक्का मारा, लेकिन इस बार उसकी अपनी हंसी भी छूट गई।
खतरे से बाल-बाल बचने का वो रोमांच और वो अजीब सी स्थिति, काव्या को भी अंदर ही अंदर गुदगुदा रही थी। वो भी सिद्धार्थ के ऊपर गिरकर हंसने लगी। दोनों कुछ देर तक बस बिस्तर पर पड़े-पड़े हंसते रहे।
सिद्धार्थ ने हंसते हुए काव्या को अपनी बाहों में खींच लिया। "पर मौसी... जो मजा पीछे से आपको छूने में आया ना, वो रात में भी नहीं था। आपका चेहरा देखने लायक था जब दीदी आपसे बात कर रही थीं और मैं आपकी..."
"चुप कर जा कमीने!" काव्या ने सिद्धार्थ के होठों पर अपना हाथ रख दिया। "आज के बाद ऐसा कभी मत करना। मेरा दिल अभी भी बाहर आने को हो रहा है।"
सिद्धार्थ ने काव्या के उस हाथ को चूम लिया। दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा। वो एक बहुत ही गहरा, प्यार भरा और राहत का पल था।
"चलो अब, जल्दी से कपड़े पहनो। दीदी सच में आ जाएंगी दोबारा," काव्या ने कहा और वो उठकर वॉशरूम की तरफ भाग गई।
जब काव्या और सिद्धार्थ जल्दी-जल्दी तैयार होकर बाहर निकले, तो सिद्धार्थ की हालत सच में खराब होने लगी थी। एड्रेनालाईन (Adrenaline) और डर का असर अब खत्म हो चुका था। 18 साल के एक लड़के के शरीर ने रात भर में जितना काम किया था, अब वो शरीर अपनी कीमत मांग रहा था। सिद्धार्थ की आँखें नींद से भारी हो रही थीं, उसके पैरों में दर्द था और वो सच में खड़े होने की स्थिति में नहीं था।
डाइनिंग टेबल पर साक्षी ने उन दोनों को चाय दी। काव्या ने तो जल्दी से चाय पी ली, लेकिन सिद्धार्थ कुर्सी पर बैठा-बैठा ही झपकियां लेने लगा।
साक्षी ने सिद्धार्थ की ये हालत देखी। उनका दिल पसीज गया।
"सिड? मेरा बच्चा, क्या हो गया तुझे? तेरी तो आँखें भी नहीं खुल रही हैं," साक्षी ने सिद्धार्थ के माथे पर हाथ रखते हुए बहुत ही मासूम और चिंतित स्वर में कहा।
सिद्धार्थ ने अपनी आधी खुली आँखों से साक्षी को देखा। साक्षी का वो प्यार भरा चेहरा, उनकी वो मासूमियत और महक सिद्धार्थ को एक अलग ही दुनिया में ले गई। काव्या के साथ वो एक जंगली शेर था, लेकिन साक्षी के सामने वो हमेशा उनका वही मासूम सा बच्चा बन जाता था।
"माँ... बहुत नींद आ रही है। सिर में भी दर्द है," सिद्धार्थ ने सच में एक बच्चे की तरह लाड़ करते हुए कहा।
"ओह मेरा सिड! रात भर तूने काव्या के पैर दबाए हैं ना, इसलिए तेरी ये हालत हो गई है," साक्षी ने सिद्धार्थ को अपनी बाहों के सहारे उठाया। "चल, तू मेरे कमरे में चल। वहाँ आराम से सो जाना।"
काव्या वहीं खड़ी ये सब देख रही थी। उसे पता था कि सिद्धार्थ रात भर सोया नहीं है (कारण तो वो अच्छे से जानती थी)। उसे सिद्धार्थ पर तरस भी आ रहा था, लेकिन साथ ही साक्षी का सिद्धार्थ को इस तरह प्यार से ले जाना उसे फिर से एक अजीब सी जलन दे रहा था।
"दीदी, मैं सुला देती हूँ इसे अपने कमरे में," काव्या ने जल्दी से कहा।
"नहीं काव्या, तेरे कमरे में धूप आती है इस वक्त। मेरा कमरा ठंडा है। और तू भी जाकर आराम कर, रात को तेरी भी तबीयत खराब थी," साक्षी ने बहुत ही भोलेपन से कहा।
काव्या कुछ नहीं बोल पाई। वो बस सिद्धार्थ को साक्षी के साथ जाते हुए देखती रही।
साक्षी सिद्धार्थ को अपने कमरे में ले गईं। उनका कमरा बहुत ही शांत, साफ और हल्के नीले रंग का था। कमरे में एक बहुत ही पवित्र सी शांति थी।
साक्षी ने सिद्धार्थ को अपने बड़े से बिस्तर पर लिटाया। सिद्धार्थ सच में इतना थक चुका था कि बिस्तर पर गिरते ही उसका शरीर निढाल हो गया।
साक्षी उसके पास ही बिस्तर के किनारे पर बैठ गईं। उन्होंने सिद्धार्थ का सिर अपनी गोद में रख लिया। साक्षी अपनी उन मुलायम और ठंडी उंगलियों से सिद्धार्थ के बालों को सहलाने लगीं।
"सो जा मेरे बच्चे... मैं हूँ तेरे पास," साक्षी ने बहुत ही प्यार से सिद्धार्थ के माथे पर एक किस किया।
सिद्धार्थ ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसका चेहरा साक्षी के पेट और उनकी छाती के बिल्कुल करीब था। साक्षी की सूती साड़ी की वो नरमी, उनके जिस्म की वो ठंडी और पवित्र गर्माहट सिद्धार्थ के थके हुए शरीर को एक ऐसा सुकून दे रही थी जो दुनिया की किसी भी दवा में नहीं था।
सिद्धार्थ का दिमाग अब दो अलग-अलग दुनियाओं में झूल रहा था। कुछ घंटे पहले, वो काव्या के साथ एक बंद कमरे में हवस और पागलपन की सारी हदें पार कर रहा था। वो काव्या को बिस्तर पर रौंद रहा था। और अब, वो दुनिया की सबसे खूबसूरत और मासूम औरत की गोद में, एक बच्चे की तरह सिर रखकर सो रहा था, वो औरत जिसे वो अपनी माँ कहता था, लेकिन जिसके लिए उसके दिल के सबसे गहरे कोने में एक ऐसा प्यार पनप रहा था जो काव्या के प्यार से भी ज्यादा खतरनाक और गहरा था।
सिद्धार्थ ने गहरी सांस ली। साक्षी की वो महक उसके फेफड़ों में भर गई।
मैं दोनों को प्यार करता हूँ... और मैं दोनों को कभी नहीं खो सकता, सिद्धार्थ ने आधी नींद में मन ही मन सोचा।
कुछ ही मिनटों में, साक्षी की उस ममता भरी छांव में, सिद्धार्थ एक बहुत ही गहरी और लंबी नींद में चला गया। हवेली में अब पूरी तरह से शांति छा गई थी।