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Incest रेखा, स्मिता और उसका बेटा : एक अनकहा रिश्ता

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Befriendmy

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रेखा, स्मिता और उसका बेटा : एक अनकहा रिश्ता

बाहर सावन की अंधेरी रात अपनी पूरी रफ्तार पर थी। मुंबई की गगनचुंबी इमारतों के शीशों से टकराकर बारिश की बूंदें नीचे फिसल रही थीं। ठीक उसी तरह, जैसे ५४ वर्ष की स्मिता के मन में अनगिनत अनुत्तरित सवाल तैर रहे थे। वह अपने आलीशान पेंटहाउस के लिविंग रूम की कांच की विशाल खिड़की के पास खड़ी थी।

स्मिता का शरीर इस उम्र में भी एक खास ढलान और गरिमा लिए हुए था। उसने हाथीदांत (ivory) के रंग की एक ढीली, कॉटन-सिल्क की मैक्सी ड्रेस पहनी हुई थी, जो उसके भरे हुए नितंबों और भारी स्तनों के उभार को छुपाने की असफल कोशिश कर रही थी। उसकी त्वचा पर उम्र की हल्की महीन रेखाएं थीं, लेकिन उसका रंग साफ था और उसकी देह से सालों पुरानी एक शांत, मातृत्व और परिपक्व खुशबू आती थी। उसने अपने बालों को पीछे एक ढीले जूड़े में बांध रखा था, जिससे उसकी गर्दन का पिछला हिस्सा खुला था, जहाँ बारिश की ठंडी हवा के झोंकों से रह-रहकर सिहरन पैदा हो रही थी।

उसके पीछे, सोफे पर उसका ३२ वर्षीय बेटा अर्जुन बैठा था। अर्जुन का शरीर किसी यूनानी मूर्तिकार की तराशी हुई कलाकृति जैसा था। ६ फीट १ इंच लंबा, चौड़े और मजबूत कंधे, और जिम में कसरत करके कमाई गई गठीली छाती। उसने गहरे चारकोल ग्रे रंग की एक लिनन शर्ट पहनी थी, जिसके ऊपर के तीन बटन खुले हुए थे। जब वह सांस लेता, तो उसकी छाती के घने, काले बाल और उसकी कॉलरबोन की मजबूत बनावट साफ दिखाई देती थी। उसकी शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं, जिससे उसकी कलाई और अग्रबाहु (forearms) की उभरी हुई नसें उसकी मर्दानगी को और उभार रही थीं। वह अपनी माँ की बेचैनी को देख रहा था, और उसकी गहरी, कत्थई आँखों में एक अजीब सा सुकून और ठहराव था—एक ऐसा ठहराव जो किसी गहरे रहस्य के पीछे छुपा होता है।

"माँ, तुम थक गई हो। बैठ जाओ न," अर्जुन की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई गूंजी। उसकी आवाज भारी, गहरी और मर्दाना थी, जिसमें एक अजीब सी खनक थी।

स्मिता ने मुड़कर अपने बेटे को देखा। वह हैरान थी कि पिछले छह महीनों में अर्जुन कितना बदल गया था। कहाँ वह एक हताश, नौकरी के लिए परेशान रहने वाला लड़का था, और कहाँ आज वह आत्मविश्वास से लबरेज, एक नामी कॉर्पोरेट फर्म का ऊंचे पद पर आसीन अधिकारी था। उसकी पूरी बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी थी। उसमें एक अजीब सा सम्मोहन था।

ठीक उसी वक्त, दरवाजे की डोरबेल बजी।

अर्जुन सोफे से उठा। जब वह चला, तो उसके चलने के अंदाज में एक शिकारी जैसी सहजता थी। उसने जाकर भारी सागौन के दरवाजे को खोला।
दरवाजे पर जो शख्सियत खड़ी थी, उसने कमरे के भीतर के तापमान को पल भर में कई डिग्री बढ़ा दिया। वह रेखा थी—स्मिता की ४९ वर्षीय छोटी बहन और शहर की सबसे अमीर, कामयाब बिजनेसवुमन्स में से एक।

रेखा को देखकर कोई भी उसकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता था। वह किसी २८-३० साल की परिपक्व और बेहद कामुक अप्सरा जैसी दिख रही थी। उसका कद ५ फीट ७ इंच था और उसका शरीर 'अवरग्लास' (hourglass) शेप का था—यानी पतली, लचीली कमर और भारी, सुडौल कूल्हे। उसने गहरे, आधी रात के नीले रंग (midnight blue) की एक शुद्ध शिफॉन की साड़ी पहनी थी। वह साड़ी इतनी महीन और पारदर्शी थी कि रेखा के पेट की गोरी त्वचा, उसकी गहरी नाभि और कमर की सुगठित गोलाई साफ झलक रही थी।

साड़ी के साथ उसने उसी नीले रंग का स्लीवलेस, बैकलेस ब्रोकेड ब्लाउज पहना था, जो उसकी पीठ को लगभग पूरा खुला छोड़ रहा था। उसकी पीठ की मखमली, कंचन जैसी गोरी त्वचा पर लाइट की पीली रोशनी इस तरह चमक रही थी जैसे सोने पर पानी चढ़ाया गया हो। उसके घने, काले और रेशमी बाल एक तरफ कंधे पर बिखरे थे, जो उसके उन्नत स्तनों के उभार को आंशिक रूप से ढक रहे थे। उसकी आंखों में गहरा काजल, होठों पर वाइन रंग की गीली लिपस्टिक और कानों में हीरे के छोटे-छोटे बुंदे चमक रहे थे। उसकी देह से 'चैनल' के महंगे परफ्यूम की एक मदहोश करने वाली, कस्तूरी जैसी कामुक खुशबू आ रही थी, जो पल भर में पूरे कमरे के कोने-कोने में फैल गई।

"अरे वाह, अर्जुन! तुम तो आज बेहद शानदार लग रहे हो," रेखा ने अंदर कदम रखते ही अपनी मखमली, खनकती हुई आवाज में कहा।
उसने अर्जुन के करीब आकर अपनी दोनों गोरी, सुडौल बाहें उसकी गर्दन के चारों ओर डाल दीं और उसे गले लगा लिया। स्मिता ने खिड़की के पास खड़े होकर इस दृश्य को देखा। रेखा के भारी, रेशमी स्तन अर्जुन की मजबूत छाती से पूरी तरह भींच गए। अर्जुन ने भी बिना किसी झिझक के रेखा की पतली, लचीली कमर पर अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथ टिका दिए। अर्जुन की उंगलियां रेखा की साड़ी के महीन कपड़े को भेदकर उसकी नंगी पीठ की त्वचा को छू रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे को कुछ पलों के लिए इतनी शिद्दत से भींचा कि उनके बीच की हवा भी गायब हो गई। जब वे अलग हुए, तो रेखा ने अपनी लंबी, लाल रंग की नेलपेंट लगी उंगलियों से अर्जुन के गाल को हल्के से सहलाया। उसकी नजरों में एक प्यास थी, एक अधिकार था।

"मासी... आप भी हमेशा की तरह कयामत ढा रही हैं," अर्जुन ने सीधे रेखा की आंखों में देखते हुए, बेहद धीमी और मदहोश आवाज में कहा। उसके मुंह से 'मासी' शब्द निकला जरूर था, लेकिन उसके लहजे में कोई सम्मान नहीं, बल्कि एक अजीब सा रोमांस और वासना की चाशनी घुली थी।

स्मिता आगे बढ़ी। "आओ रेखा। बैठो।" उसकी आवाज में एक अजीब सी भारीपन था।

तीनों लिविंग रूम के बड़े, मखमली एल-शेप सोफे पर बैठ गए। रेखा सोफे के बीचों-बीच बैठी। उसने अपने पैरों पर पैर चढ़ाए (crossed legs), जिससे उसकी साड़ी घुटने से थोड़ी ऊपर खिसक गई और उसकी चिकनी, गोरी पिंडलियाँ साफ दिखाई देने लगीं। अर्जुन ने तुरंत जाकर बार काउंटर से क्रिस्टल के ग्लासों में रेड वाइन डाली। वह वापस आया और रेखा के ठीक बगल में बैठ गया—इतने करीब कि उन दोनों की जांघें एक-दूसरे से पूरी तरह सट गईं।

अर्जुन ने वाइन का ग्लास रेखा की तरफ बढ़ाया। रेखा ने ग्लास थामते हुए अपनी उंगलियों को जानबूझकर अर्जुन की उंगलियों से रगड़ा। दोनों की नजरें मिलीं और एक मूक सहमति सी हवा में तैर गई।

स्मिता ने सिर्फ सादा पानी लिया था। वह उन दोनों के ठीक सामने वाले सिंगल सोफे पर बैठी थी। उसकी अनुभवी आँखें दोनों के बीच के इस मूक लेकिन बेहद गहरे शारीरिक खिंचाव को भांप रही थीं। कमरे में केवल बारिश की आवाज और वाइन के ग्लासों की खनक थी।

"स्मिता... तुम इतनी चुप क्यों हो? और इस तरह घूर क्यों रही हो?" रेखा ने वाइन की एक छोटी सी चुस्की लेते हुए अपने लाल होठों को जीभ से चाटा। यह हरकत इतनी कामुक थी कि अर्जुन की नजरें सीधे रेखा के होठों पर टिक गईं।

स्मिता ने पानी का ग्लास टेबल पर रखा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा कसा। "रेखा... अर्जुन... मैं बेवकूफ नहीं हूँ। मैं देख रही हूँ कि पिछले कुछ महीनों में क्या बदला है। अर्जुन का अचानक बेरोजगार से एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट बन जाना, उसकी महंगी लाइफस्टाइल, और तुम दोनों के बीच का ये... ये अंदाज। यह कोई मौसी और भांजे का रिश्ता नहीं है। मुझे साफ-साफ सच जानना है। आज रात।"
अर्जुन ने थोड़ा असहज होकर अपनी शर्ट के कॉलर को छुआ, उसकी चौड़ी छाती पर पसीने की एक छोटी सी बूंद चमकी। लेकिन रेखा बिल्कुल शांत थी। वह हल्के से मुस्कुराई, जिससे उसके गालों पर छोटे से डिंपल उभरे।

"स्मिता, तुम हमेशा से बहुत समझदार रही हो," रेखा ने अपनी पीठ को सोफे से टिकाते हुए कहा, जिससे उसके स्तन और ऊपर की ओर तन गए। "तो सुनो। कोई सस्पेंस नहीं रखते। मैं और अर्जुन... हम दोनों पिछले आठ महीनों से एक-दूसरे के साथ एक बेहद गहरे, सीक्रेट इंटीमेट रिलेशनशिप में हैं। सीधे शब्दों में कहूं, तो हम एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं।"

यह सुनते ही जैसे कमरे की सारी हवा गायब हो गई। स्मिता की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका दिल जोर से धड़का। "रेखा! तुम होश में तो हो? तुम इसकी मौसी हो! तुम्हारी उम्र ४९ साल है और यह अभी सिर्फ ३२ का है! यह... यह पाप है, पागलपन है!"

"माँ, प्लीज शांत हो जाओ," अर्जुन ने इस बार आगे बढ़कर अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया। उसके हाथ गर्म और बेहद मजबूत थे। "रेखा ने मेरा इस्तेमाल नहीं किया, न ही मैंने उनका। जब मैं जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था, डिप्रेशन में था, तब रेखा ने मुझे सहारा दिया। उन्होंने मुझे अपनी कंपनी के नेटवर्क के जरिए यह जॉब दिलाई। लेकिन उससे भी बढ़कर... उन्होंने मुझे एक मर्द होने का अहसास कराया।"

रेखा ने अपनी वाइन का ग्लास नीचे रखा। वह सोफे पर सरककर अर्जुन के और करीब आ गई। उसने अर्जुन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया, जिससे उसके खुले बाल अर्जुन की शर्ट की खुली छाती पर बिखर गए।

"स्मिता, मेरी बात ठंडे दिमाग से समझो," रेखा की आवाज अब और गहरी, रेशमी और सम्मोहक हो गई थी। "हम दोनों में से कोई भी इस रिश्ते को लेकर उस पारंपरिक तरीके से 'सीरियस' नहीं है। हम कोई शादी नहीं करने जा रहे, न ही समाज को कोई चुनौती दे रहे हैं। यह विशुद्ध रूप से... हमारी शारीरिक और मानसिक भूख का मामला है। एक ऐसी भूख, जो हम दोनों के अंदर सालों से दबी थी।"

रेखा ने स्मिता की तरफ देखा, उसकी आंखों में कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी। "मेरे पास पैसा है, शोहरत है, लेकिन मेरी रातें सूनी थीं। मुझे एक ऐसे जवान, मजबूत और जोशीले मर्द की जरूरत थी जो मुझे एक औरत होने का अहसास करा सके, जो मेरी देह की प्यास को बुझा सके। और अर्जुन... उसे एक ऐसी परिपक्व, खूबसूरत औरत की जरूरत थी जो उसकी मर्दानगी को सराहे, उसे गाइड करे और उसे आत्मविश्वास दे। हम दोनों एक-दूसरे की जरूरत को पूरा करते हैं। जब हम साथ होते हैं, तो हम दुनिया के सारे बंधन भूलकर सिर्फ एक नर और मादा बन जाते हैं। और देखो, इसका नतीजा कितना खूबसूरत है। अर्जुन का करियर सेट है, और मेरी जिंदगी में एक नई रौनक है।"

स्मिता ने अपने बेटे को देखा। अर्जुन की आंखों में अपनी माँ के लिए कोई डर नहीं था, बल्कि एक सच्चाई थी। स्मिता का गुस्सा, जो एक सामाजिक डर से उपजा था, रेखा की इन व्यावहारिक और बेहद ईमानदार बातों को सुनकर धीरे-धीरे पिघलने लगा। उसका दिल शांत होने लगा, लेकिन उसके भीतर एक नई, अनजानी सी बेचैनी शुरू हो गई थी।

कमरे का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। सामाजिक पाबंदियों का डर गायब हो चुका था और उसकी जगह एक शुद्ध, नग्न और कामुक बेबाकी ने ले ली थी।

रेखा सोफे से उठी। जब वह चली, तो उसकी साड़ी की सरसराहट और उसकी पायल की छनक ने कमरे में एक अजीब सी उत्तेजना भर दी। वह चलकर अर्जुन के ठीक सामने खड़ी हो गई। उसने अर्जुन के दोनों कंधों पर अपने हाथ रखे और उसे नीचे बैठे-बैठे ही अपनी तरफ खींचा।

"स्मिता, तुम्हें गर्व होना चाहिए कि तुमने एक बेहद शानदार मर्द को जन्म दिया है," रेखा ने सीधे अपनी बड़ी बहन की आंखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज में अब एक गहरी वासना और कामुकता घुली हुई थी। "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम्हारा बेटा बिस्तर में कितना लाजवाब है।"

"रेखा...!" अर्जुन ने हल्के से शरमाते हुए रेखा की पतली कमर को अपने दोनों हाथों में भींच लिया। उसने रेखा को अपने करीब खींचा, जिससे रेखा के सुडौल नितंब अर्जुन की जांघों से टकराए।
"नहीं अर्जुन, आज सब सच सामने आने दो," रेखा ने अर्जुन के बालों में अपनी उंगलियां फंसाते हुए कहा। "स्मिता, अर्जुन के पास वो ताकत है जो किसी भी औरत को पागल कर दे। लेकिन सबसे खास बात है उसका सब्र (patience)। वह उन नौसिखिए लड़कों जैसा नहीं है जो सिर्फ अपनी भूख मिटाना जानते हैं। वह एक परिपक्व औरत के शरीर के भूगोल को समझता है। वह जानता है कि मेरी त्वचा के किस हिस्से को कब, कहाँ और कितनी शिद्दत से छूना है।"

रेखा की आँखें आधी बंद हो गईं, जैसे वह उस अहसास को दोबारा जी रही हो। "जब वह अपने इन बड़े, मजबूत हाथों से मेरी इस रेशमी पीठ को सहलाता है, तो मेरे शरीर के रोम-रोम खड़े हो जाते हैं। उसके होंठ... ओह, उसके होठों में एक अजीब सी तपिश है। जब वह मेरी गर्दन के पीछे, मेरे कानों के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए मुझे चूमता है, तो मैं पूरी तरह पिघल जाती हूँ। उसकी लव-मेकिंग इतनी गहरी, इतनी लंबी और इतनी मदहोश करने वाली होती है कि मैं चीख उठती हूँ। वह मुझे मेरी उम्र भूलने पर मजबूर कर देता है।"

स्मिता यह सब सुन रही थी। उसकी सांसें भारी हो गई थीं। उसकी हाथीदांत रंग की मैक्सी ड्रेस के नीचे उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। सालों से, जबसे उसके पति का साथ छूटा था, उसने किसी मर्द का स्पर्श महसूस नहीं किया था। अपनी सगी बहन के मुंह से, अपने ही जवान और गठीले बेटे की मर्दानगी का ऐसा जीवंत और कामुक वर्णन सुनकर स्मिता के शरीर के भीतर भी एक सोई हुई ज्वालामुखी करवट लेने लगी थी। उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।

रेखा ने स्मिता की इस हालत को भांप लिया। वह अर्जुन की बांहों से निकलकर धीरे-धीरे चलकर स्मिता के पास आई। वह स्मिता के सोफे के पास नीचे कालीन पर बैठ गई और उसने स्मिता के दोनों ठंडे पड़ रहे हाथों को अपने गर्म, मखमली हाथों में ले लिया।
"स्मिता... खुद को देखो," रेखा ने बेहद धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। "५४ की उम्र में भी तुम्हारी ये देह कितनी भरी हुई और रसीली है। तुमने खुद को इस सूनेपन की कोठरी में क्यों बंद कर रखा है? क्या समाज की झूठी दुहाई तुम्हारी इस शारीरिक और मानसिक भूख को शांत कर सकती है? इस उम्र में औरत को एक मजबूत आलिंगन की, एक गर्म स्पर्श की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।"

स्मिता ने कांपते हुए होठों से कहा, "रेखा... मैं... मैं अब इस उम्र में कहाँ जाऊं? कौन है जो मुझे इस तरह समझेगा?"

रेखा के होठों पर एक बेहद शातिर, कामुक और गहरी मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में चमक थी। उसने सिर उठाकर पीछे सोफे पर बैठे अर्जुन की तरफ देखा।

अर्जुन अब सोफे पर पूरी तरह फैलकर बैठा था। उसकी शर्ट के बटन और खुल चुके थे, उसकी गठीली छाती और पेट के सिक्स-पैक एब्स का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था। उसकी आँखें अपनी माँ स्मिता के उभरे हुए सीने और उसकी थिरकती हुई काया पर टिकी थीं। उसकी नजरों में एक गहरा सम्मान, एक असीम चाहत और एक खुला आमंत्रण था।

रेखा ने स्मिता के कान के बिल्कुल करीब अपना मुंह लाया। उसकी गर्म सांसें स्मिता के कान की लौ को छू रही थीं। "तुम्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है, दीदी... जो हुनर, जो ताकत और जो राहत मुझे मिलती है, वो तुम्हारे बहुत करीब है। अर्जुन तुम्हारा बेटा जरूर है, लेकिन वह एक मुकम्मल मर्द है। वह जानता है कि अपनी माँ जैसी खूबसूरत, परिपक्व और आदरणीय औरत का सम्मान कैसे करना है और उसकी रातों के इस सूनेपन को अपनी बांहों में कैसे समेटना है। सुख पर, तृप्ति पर हम दोनों का बराबर हक है..."

लिविंग रूम में एक भारी, दमघोंटू लेकिन बेहद कामुक खामोशी छा गई। केवल बाहर की बारिश की सनसनाहट थी। स्मिता ने धीरे से अपनी पलकें उठाईं और सीधे अर्जुन की आँखों में देखा। अर्जुन ने अपनी जगह से ही अपनी माँ को देखकर एक गहरी, मदहोश मुस्कान दी। स्मिता का दिल किसी पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा था, और उसकी देह ने सदियों बाद एक मीठी, सुलगती हुई तपन को महसूस किया था।
 

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Part 2

कमरे में छाई वह भारी, कामुक खामोशी इतनी गहरी थी कि तीनों की सांसों की आवाज़ साफ सुनी जा सकती थी। रेखा के आखिरी शब्दों ने—कि अर्जुन अपनी माँ के सूनेपन को दूर कर सकता है—कमरे के वातावरण को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ मर्यादा और वासना की सीमाएं आपस में टकरा रही थीं।

स्मिता का दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था। उसकी आँखें अर्जुन के चौड़े, गठीले सीने पर टिकी थीं, लेकिन तभी उसके भीतर की माँ जाग उठी। उसने एक गहरी, कांपती हुई सांस ली और रेखा की तरफ देखा, जिसने अभी भी उसके हाथों को थाम रखा था।
रेखा स्मिता के चेहरे के भावों को पढ़ रही थी। वह एक बेहद चतुर और परिपक्व औरत थी। वह जानती थी कि सदियों पुरानी सामाजिक बेड़ियों और एक माँ के मातृत्व को एक झटके में नहीं तोड़ा जा सकता। जो बीज उसने स्मिता के मन में बोया था, उसे पनपने के लिए वक्त और अकेलेपन की जरूरत थी।

"अच्छा स्मिता..." रेखा हल्के से मुस्कुराई और स्मिता के हाथों को छोड़कर खड़ी हो गई। उसने अपनी आधी रात के नीले रंग की शिफॉन साड़ी के पल्लू को अपनी गोरी कमर पर लपेटते हुए ठीक किया। "रात बहुत हो चुकी है। और बाहर बारिश भी थोड़ी कम हुई है। मुझे अब निकलना चाहिए। मेरी गाड़ी नीचे इंतजार कर रही है।"

उसने मुड़कर अर्जुन को देखा, जो अभी भी सोफे पर उसी सम्मोहक मुद्रा में बैठा था। रेखा उसके पास गई, उसके गाल को चूमा और उसके कान में फुसफुसाया, "अपना ख्याल रखना, मेरे शेर।" फिर उसने स्मिता की तरफ देखा, "सोचना मेरी बातों पर, दीदी। जिंदगी सिर्फ काटने के लिए नहीं, जीने के लिए होती है।"
बिना किसी और औपचारिक बातचीत के, अपनी परफ्यूम की मादक खुशबू को कमरे की हवा में छोड़ती हुई, रेखा अपने सैंडलों की खनक के साथ आलीशान सागौन के दरवाजे से बाहर निकल गई। भारी दरवाजा एक हल्के से क्लिक के साथ बंद हो गया।

रेखा के जाने के बाद, बड़े से लिविंग रूम में केवल अर्जुन और स्मिता रह गए। कमरे की पीली डिम लाइट्स अभी भी उसी कामुक मिजाज को बनाए हुए थीं। हवा में अभी भी रेखा के महंगे परफ्यूम और रेड वाइन की महक घुली हुई थी।

स्मिता सोफे पर वैसे ही बैठी रही। उसकी हाथीदांत रंग की कॉलरबोन और मैक्सी ड्रेस का ऊपरी हिस्सा उसकी भारी होती सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था। उसने अपनी नजरें फर्श पर टिका दी थीं। वह अपने ही बेटे के सामने देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। रेखा ने जो बातें कही थीं, वे उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रही थीं। 'तुम्हारा बेटा बिस्तर में कितना लाजवाब है...' 'वह जानता है कि एक परिपक्व औरत के शरीर को कहाँ छूना है...' इन वाक्यों ने स्मिता के भीतर एक अजीब सी हलचल मचा दी थी।

अर्जुन सोफे से उठा। उसके चलने की आहट इतनी शांत थी कि स्मिता को तब पता चला जब उसकी परछाई उस पर पड़ी। अर्जुन स्मिता के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया।

उसकी लिनन की शर्ट के खुले बटनों से उसकी गठीली छाती के काले बाल और उसकी मर्दाना बनावट स्मिता की नजरों के ठीक सामने थी। अर्जुन के शरीर से आ रही एक प्राकृतिक, मर्दाना गंध—जिसमें हल्की सी वाइन और पसीने की महक शामिल थी—स्मिता की नाक से होती हुई उसके फेफड़ों में उतर रही थी।

"माँ..." अर्जुन की भारी और गहरी आवाज गूंजी। उसमें एक झिझक थी, एक डर था।

स्मिता ने धीरे से अपना सिर उठाया। अर्जुन की कत्थई आँखें इस समय झुकी हुई थीं। उसमें वह शिकारी जैसा आत्मविश्वास नहीं था जो रेखा के सामने था, बल्कि अपनी माँ के सामने एक बेटे का संकोच था।

"माँ, मुझे माफ कर दो," अर्जुन ने बहुत ही धीमे स्वर में कहा, उसके हाथ उसकी जींस की जेबों में चले गए। "आज यहाँ जो कुछ भी हुआ, जो बातें रेखा ने कहीं... और जिस तरह से मैंने रिएक्ट किया... मुझे नहीं पता था कि रेखा तुम्हारे सामने यह सब इस तरह बोल देगी। अगर मेरी किसी बात से, या मेरे इस रिश्ते से तुम्हें ठेस पहुँची हो, तो प्लीज मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ।"

स्मिता ने अर्जुन को ध्यान से देखा। सामने खड़ा ३२ साल का यह युवक उसका बेटा जरूर था, लेकिन इस समय वह एक परिपक्व, समझदार मर्द की तरह बात कर रहा था। स्मिता के भीतर का गुस्सा और सामाजिक पाखंड पूरी तरह गायब हो चुका था। उसकी जगह एक गहरी, व्यावहारिक समझ ने ले ली थी।

उसने एक लंबी सांस ली और सोफे पर थोड़ी पीछे हटकर बैठी, जिससे उसकी मैक्सी ड्रेस उसकी जांघों पर थोड़ी और कस गई, जो उसकी ५४ साल की उम्र के बावजूद सुडौल थीं।

"बैठो, अर्जुन," स्मिता ने शांत लेकिन गंभीर आवाज में कहा।
अर्जुन थोड़ा ठिठका, फिर वह सामने वाले सोफे पर न बैठकर, स्मिता के ठीक बगल वाले सोफे के कोने पर बैठ गया। दोनों के बीच लगभग दो फीट की दूरी थी, लेकिन उस दूरी के बीच भी एक अदृश्य, सुलगता हुआ तनाव महसूस किया जा सकता था।

"माफी मत मांगो, अर्जुन," स्मिता ने अपनी आवाज को स्थिर रखते हुए कहा, हालांकि उसकी उंगलियां अभी भी अपनी ड्रेस के कपड़े को भींच रही थीं। "तुम ३२ साल के हो, और रेखा ४९ की है। तुम दोनों बालिग हो, समझदार हो। और जो बात रेखा ने कही, वह पूरी तरह गलत नहीं है। जब तुम बेरोजगार थे, परेशान थे, तब मैं एक माँ होकर भी तुम्हारी वैसी मदद नहीं कर पाई जैसी रेखा ने की। उसने तुम्हें एक करियर दिया, एक नई जिंदगी दी।"

स्मिता ने रुककर अर्जुन की आँखों में सीधे देखा। "और जहाँ तक तुम दोनों के इस... इस जिस्मानी रिश्ते की बात है, तो मैं समझ सकती हूँ। तुम एक जवान मर्द हो, तुम्हारी अपनी जरूरतें हैं। और रेखा... वह सालों से अकेली है, उसके पास सब कुछ है पर कोई अपना नहीं। तुम दोनों ने अपनी भूख को शांत करने के लिए एक-दूसरे का सहारा लिया। इसमें तुमने किसी तीसरे का नुकसान नहीं किया। तुमने बहुत ही मैच्योरिटी (perfection) के साथ इस बात को संभाला है।"

अर्जुन ने राहत की एक सांस ली। उसकी आँखों में अपनी माँ के लिए सम्मान और बढ़ गया। "थैंक यू, माँ। मुझे डर था कि तुम मुझसे नफरत करने लगोगी। तुम सचमुच बहुत महान हो।"
"लेकिन..." स्मिता की आवाज थोड़ी सख्त हुई, "एक बात का हमेशा ध्यान रखना, अर्जुन। यह समाज बहुत जालिम है। हमारी और रेखा की एक पारिवारिक साख है, तुम्हारा एक करियर है। तुम दोनों बंद कमरों में जो करते हो, वह तुम्हारी निजी जिंदगी है। लेकिन इस बात का पूरा ख्याल रखना कि घर की चारदीवारी से बाहर किसी को भी, कभी भी इस रिश्ते की भनक न लगे। अगर दुनिया को पता चला, तो सब कुछ तबाह हो जाएगा।"

"मैं समझता हूँ, माँ," अर्जुन ने सिर हिलाते हुए कहा। "रेखा और मैं बहुत सावधान रहते हैं। आज भी उसने सिर्फ तुम्हारे सामने यह बात इसलिए कही क्योंकि वह तुम्हें अपनी सगी बहन मानती है और तुमसे कुछ छुपाना नहीं चाहती थी।"

माहौल अब पूरी तरह से शांत और सुरक्षित हो चुका था। दोनों के बीच का तनाव कम हो गया था, लेकिन वह कामुक चिंगारी, जो रेखा छोड़ कर गई थी, वह अभी भी राख के नीचे दबी हुई थी।
अर्जुन सोफे पर थोड़ा आगे की ओर झुका। उसने अपनी कोहनियाँ अपने घुटनों पर टिका दीं। इस मुद्रा में उसकी शर्ट का कॉलर और खुला, और उसकी मजबूत पीठ की चौड़ाई स्मिता को साफ दिखाई दी।

"हाँ माँ, सच तो यही है," अर्जुन ने एक गहरी सांस लेते हुए, थोड़ा बहकती हुई आवाज में कहा। "हम दोनों को उस वक्त एक-दूसरे की सख्त जरूरत थी। मुझे उनका वह परिपक्व, खूबसूरत शरीर और उनका साथ बहुत पसंद आया... और उन्हें मेरी... मेरी ताकत। लेकिन माँ..."

अर्जुन ने अचानक अपना सिर उठाया और सीधे स्मिता की आँखों में देखा। उसकी आँखों में इस समय वाइन का हल्का सा नशा और एक गहरी, अनजानी सी वासना तैर रही थी। "जरूरतें तो सबकी होती हैं ना? रेखा ने जो कहा... वह गलत नहीं था। माँ, तुम भी तो इतने सालों से अकेली हो। तुम्हारी भी तो अपनी जरूरतें हैं, अपनी शारीरिक और मानसिक भूख है..."

यह वाक्य अर्जुन के मुंह से इतनी सहजता और गहराई से निकला कि पल भर के लिए पूरा कमरा मानो जम गया।

'माँ, तुम्हारी भी तो अपनी जरूरतें हैं...' ये शब्द स्मिता के कानों में किसी गरम लावे की तरह उतरे। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। उसकी जांघें आपस में और कस गईं। अपने ही जवान बेटे के मुंह से अपनी शारीरिक जरूरतों की बात सुनना, एक ऐसा अहसास था जिसने स्मिता को अंदर तक हिलाकर रख दिया। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसके होंठ सिर्फ थरथरा कर रह गए।

जैसे ही शब्दों का भारीपन हवा में गूंजा, अर्जुन को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे लगा कि उसने मर्यादा की एक बहुत बड़ी लाइन पार कर दी है। वह अपनी माँ के सामने इस तरह की बात कैसे कह सकता था?

उसका चेहरा तुरंत लाल हो गया और उसने झटके से अपनी नजरें हटा लीं। "आई... आई एम सॉरी, माँ! प्लीज मुझे माफ कर दो! मेरा वो मतलब नहीं था... पता नहीं मेरी जुबान कैसे फिसल गई। मैं... मैं सचमुच बहुत शर्मिंदा हूँ। मुझे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए थी।" अर्जुन की आवाज में इस समय एक सच्चा पछतावा और घबराहट थी।

स्मिता ने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसने अपने दिल पर हाथ रखा, जो किसी घायल पंछी की तरह तेजी से धड़क रहा था। उसने खुद को संभाला। वह जानती थी कि अगर उसने इस समय इस बात को तूल दिया, तो उनके बीच का यह पवित्र रिश्ता हमेशा के लिए अजीब हो जाएगा।
उसने अपनी आंखें खोलीं और एक फीकी सी मुस्कुराने की कोशिश की। "कोई बात नहीं, अर्जुन। रात बहुत हो गई है, और हम सबने थोड़ी वाइन... और बहुत सी अजीब बातें की हैं। जुबान फिसल जाती है। तुम जाओ, और जाकर सो जाओ।"

अर्जुन सोफे से खड़ा हुआ। वह अभी भी बहुत असहज महसूस कर रहा था। उसने अपनी शर्ट के बटनों को थोड़ा ठीक किया, लेकिन उसकी मर्दाना देह का आकर्षण अभी भी कमरे में बिखरा हुआ था।

"गुड नाइट, माँ," अर्जुन ने दबी आवाज में कहा।

"गुड नाइट, अर्जुन," स्मिता ने जवाब दिया।

अर्जुन भारी कदमों से अपने बेडरूम की तरफ चल दिया। उसके जाने के बाद, स्मिता ने लिविंग रूम की लाइट्स बंद कीं और वह भी अपने बेडरूम में आ गई।

उसने अपने बेडरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। कमरा पूरी तरह से शांत था, केवल खिड़की के बाहर बारिश की हल्की टिप-टिप आ रही थी। स्मिता ने अपनी हाथीदांत रंग की मैक्सी ड्रेस को उतारा और नाईटगाउन पहनने के लिए आईने के सामने खड़ी हो गई।

५४ वर्ष की उम्र में भी, उसका शरीर आईने में बेहद आकर्षक और भरा हुआ दिख रहा था। उसकी कंचन जैसी गोरी त्वचा, उसके भारी और सुडौल स्तन, और उसकी चौड़ी कमर। उसने आईने में खुद को देखते हुए अपने हाथों को धीरे-धीरे अपनी ही गर्दन और कंधों पर फेरा। उसके कानों में अभी भी अर्जुन की वो आवाज गूंज रही थी—'माँ, तुम्हारी भी तो अपनी जरूरतें हैं...'

उसने एक ठंडी सांस ली, अपना नाईटगाउन पहना और बिस्तर पर लेट गई। लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।

ठीक बगल वाले कमरे में, अर्जुन भी अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसने अपनी शर्ट उतार दी थी और वह सिर्फ शॉर्ट्स में था। उसका गठीला, कसरती बदन बिस्तर की चादर पर फैला हुआ था। वह छत को घूर रहा था। उसके दिमाग में बार-बार अपनी माँ का वो चेहरा आ रहा था जब उसने कहा था—'तुम्हारी भी तो जरूरतें हैं।' उसने याद किया कि कैसे उसकी माँ की मैक्सी ड्रेस उनके भरे हुए जिस्म पर कसी हुई थी। अर्जुन ने करवट बदली, उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने महसूस किया कि जाने-अनजाने, मर्यादा की दीवार में एक बहुत महीन दरार आ चुकी थी।

दोनों माँ-बेटे अपने-अपने बिस्तरों में, एक ही घर की दो दीवारों के पीछे, एक अनकही, सुलगती हुई उत्तेजना और झिझक के साए में जाग रहे थे, और बाहर सावन की रात और गहरी होती जा रही थी।
 

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Part 3

जागती चेतना, सुलगती नजरें और खामोश तलब
अगली सुबह जब मुंबई की खिड़की से हल्की, मटमैली धूप कमरे के भीतर आई, तो स्मिता की आँखें पहले से ही खुली थीं। वह रात भर ठीक से सो नहीं पाई थी। जब भी वह आँखें मूंदती, उसे रेखा के वे शब्द याद आते— “तुम्हारा बेटा बिस्तर में कितना लाजवाब है...”* और फिर अर्जुन का वह सुलगता हुआ जुमला—*“माँ, तुम्हारी भी तो अपनी जरूरतें हैं।”

उसने करवट बदली। उसके बदन पर रात का वही रेशमी, ढीला नाइटगाउन था, जिसके नीचे उसने कोई ब्रा नहीं पहनी थी। बिस्तर की चादर की रगड़ से उसके भारी और रसीले स्तनों के कड़े हो चुके निप्पल (nipples) रह-रहकर सिहर रहे थे। ५४ साल की उम्र में भी उसकी देह में जो गर्माहट थी, वह आज उसे खुद बेचैन कर रही थी। उसने एक गहरी सांस ली, खुद को संभाला और बिस्तर से उठकर किचन की तरफ चल दी।

किचन में वह अभी कॉफी मशीन ऑन ही कर रही थी कि पीछे से भारी कदमों की आहट आई। अर्जुन आ गया था।

उसने केवल ग्रे रंग का लोअर पहना हुआ था। उसकी चौड़ी, गठीली और नंगी छाती पर सुबह के पसीने की हल्की सी चमक थी। उसकी मजबूत बाहों की नसें साफ उभर रही थीं।

"माँ..." अर्जुन की भारी आवाज में सुबह का एक धीमापन था, और उससे भी ज्यादा एक संकोच था।

स्मिता मुड़ी। अर्जुन की नंगी, मर्दाना छाती को इतनी करीब देखकर उसका दिल एक पल के लिए थमा।

"माँ, मुझे कल रात के लिए एक बार फिर से सॉरी बोलना है," अर्जुन ने अपनी कत्थई आँखें झुकाते हुए कहा। "मेरी जुबान सचमुच बहुत गंदी तरह फिसल गई थी। प्लीज, कल की उस बात को एक बुरा सपना समझकर भूल जाओ। मैं चाहता हूँ कि हमारे बीच सब कुछ पहले जैसा नॉर्मल हो जाए। तुम मेरी माँ हो, और मैं हमेशा तुम्हारा सम्मान करूँगा।"

स्मिता ने अर्जुन के उदास और संजीदा चेहरे को देखा। उसके भीतर की माँ ने राहत की सांस ली, लेकिन उसके भीतर की औरत को कहीं न कहीं एक अधूरी कसक सी महसूस हुई। उसने अपने चेहरे पर एक शांत, मातृत्व भरी मुस्कान लाई।

"कोई बात नहीं, अर्जुन," उसने अपनी मखमली आवाज में कहा। "मैंने कल ही कहा था कि मैं उस बात को भूल चुकी हूँ। तुम जाओ, फ्रेश हो जाओ। कॉफी तैयार हो रही है।"

अर्जुन ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और वहाँ से चला गया। उसने कह तो दिया था कि भूल जाओ, और स्मिता ने मान भी लिया था, लेकिन क्या कोई उस सुलगते हुए सच को भूल सकता था? दिमाग के किसी गहरे कोने में वह आग धधक चुकी थी।

उस सुबह के बाद से, स्मिता के व्यवहार में एक अजीब सा विरोधाभास आ गया था। वह कभी अर्जुन के सामने अपनी देह को लेकर हद से ज्यादा सावधान (careful) हो जाती, तो कभी अनजाने में—या शायद अपने अवचेतन मन की किसी गहरी चाहत के कारण—बेहद लापरवाह (careless) हो जाती।

दो दिन बाद की दोपहर थी। अर्जुन लिविंग रूम में लैपटॉप पर काम कर रहा था। स्मिता अपने बेडरूम से नहाकर निकली थी। उसने एक हल्के, आसमानी रंग की सूती साड़ी पहनी थी। आमतौर पर वह अपनी साड़ियों को बहुत सलीके से पहनती थी, लेकिन आज उसने पेटीकोट के ऊपर साड़ी को थोड़ा ढीला बांधा था, जिससे उसके भारी और सुडौल कूल्हों (hips) का उभार और उसकी पतली कमर का निचला हिस्सा हर कदम के साथ थिरक रहा था।

उसने ब्लाउज के नीचे अपनी पसंदीदा मैरून रंग की लेस वाली ब्रा (lace bra) पहनी थी। साड़ी का महीन सूती कपड़ा इतना पारदर्शी था कि पीछे से उसकी ब्रा की चौड़ी पट्टी और उसकी गोरी, साफ पीठ की त्वचा साफ झलक रही थी।

वह लिविंग रूम से गुजरी। अर्जुन ने अनजाने में सिर उठाया। उसकी नजरें अपनी माँ की उस थिरकती काया पर टिक गईं। स्मिता को पता था कि अर्जुन उसे देख रहा है। उसने जानबूझकर अपनी चाल को थोड़ा धीमा किया। उसकी साड़ी का पल्लू उसके बाएं कंधे से थोड़ा नीचे खिसक गया, जिससे उसके भारी, गोल स्तन (boobs) का ऊपरी गोरा हिस्सा और उसकी गहरी क्लीवेज (cleavage) अर्जुन की नजरों के ठीक सामने आ गई।

स्मिता ने पलटकर देखा, तो अर्जुन की सांसें भारी थीं और उसकी आँखें उसकी छाती पर जमी हुई थीं। स्मिता के पेट के निचले हिस्से में एक मीठा सा दर्द हुआ। उसने झटके से पल्लू संभाला, जैसे वह बहुत सावधान हो रही हो। "अर्जुन, शाम को क्या खाओगे?" उसने पूछा, उसकी आवाज में एक अजीब सी थरथराहट थी।

"कुछ... कुछ भी बना लो, माँ," अर्जुन ने सकपकाते हुए अपना गला साफ किया और नजरें लैपटॉप पर टिका दीं, लेकिन उसका ब्रीफ (brief) के भीतर का हिस्सा इस समय पूरी तरह से कड़ा हो चुका था, जिसे छुपाने के लिए उसने लैपटॉप को अपनी जांघों पर रख लिया था।

रेखा के उन वाक्यों ने—कि अर्जुन एक 'हेल्दी, तंदुरुस्त मर्द' है—स्मिता की नजरों का नजरिया पूरी तरह बदल दिया था। अब वह अर्जुन को सिर्फ अपने बेटे के रूप में नहीं देख पाती थी। वह उसे एक मुकम्मल, हॉट और गठीले मर्द के रूप में नोटिस करने लगी थी।
एक शाम, अर्जुन जिम से लौटकर सीधे शावर लेने गया। बाथरूम का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था, उसमें एक हल्की सी दरार थी। स्मिता कपड़े समेटने के बहाने उधर से गुजरी। उसकी नजर उस दरार पर थमी और उसके कदम वहीं जम गए।

बाथरूम के भीतर, शावर से गिरते पानी के नीचे अर्जुन खड़ा था। पानी की बूंदें उसके चौड़े कंधों से होती हुई उसकी छाती के घने बालों को भिगो रही थीं। उसके सिक्स-पैक एब्स पर पानी की लकीरें तैर रही थीं। उसने अपनी आँखें बंद कर रखी थीं और अपने बालों को पीछे की तरफ सहला रहा था, जिससे उसकी पूरी मर्दाना देह का सौष्ठव उभर कर आ रहा था।

स्मिता की सांसें रुक गईं। उसका मुंह थोड़ा खुल गया। उसके हाथों में पकड़े कपड़े उसकी उंगलियों से भींच गए। उसने मन ही मन माना—*मेरा बेटा सचमुच बेहद हॉट है। किसी भी औरत को पागल करने के लिए काफी है।* रेखा गलत नहीं थी। उस गठीले बदन को देखकर स्मिता के भीतर की ५४ साल की सूखी जमीन पर कामुकता की बारिश होने लगी थी। उसकी पैन्टी (panty) के भीतर एक गीलापन धीरे-धीरे रिसने लगा था। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी इस 'नापाक' भावना को दबाने की एक नाकाम कोशिश करते हुए अपने कमरे की तरफ भाग गई।
लेकिन वह जितनी कोशिश करती, इच्छा उतनी ही बलवती होती जाती।

जब अर्जुन अच्छे कपड़े पहनकर, शर्ट के ऊपर के बटन खोलकर, बियर्ड को ट्रिम करके और एक सोंधी सी कोलोन लगाकर बाहर निकलता, तो स्मिता का मन करता कि वह बस उसे देखती रहे। वह चाहती थी कि अर्जुन आए, उसके पास बैठे, और कल रात की तरह अपनी जुबान को एक बार फिर बहकने दे।

दिन बीतते गए, और दोनों के बीच का वह मूक, कामुक तनाव और गहरा होता गया। अब स्मिता के मन में एक नई बेचैनी ने जन्म ले लिया था। वह जब भी अर्जुन को देखती, उसके दिमाग में यह सवाल कौंधता कि क्या अर्जुन अभी भी रेखा के साथ शारीरिक संबंध बना रहा है? क्या वे दोनों अभी भी मिलते हैं?

एक रात, दोनों डिनर कर रहे थे। बाहर अभी भी हल्की बारिश हो रही थी। डाइनिंग टेबल की पीली रोशनी में माहौल बेहद शांत और अंतरंग था। स्मिता ने आज एक गहरे लाल रंग की सिल्क की नाइटी पहनी थी, जिसके ऊपर उसने एक मैचिंग रॉब (robe) डाल रखा था, लेकिन रॉब की डोरी ढीली थी, जिससे उसकी मैरून ब्रा के कप्स और उसके स्तनों का भारी उभार साफ दिख रहा था।

अर्जुन अपनी प्लेट में देखते हुए खाना खा रहा था, लेकिन उसकी नजरें बार-बार अपनी माँ की गहरी होती क्लीवेज पर जाकर टिक जाती थीं।

"अर्जुन..." स्मिता ने अचानक बहुत ही धीमी, रेशमी आवाज में पुकारा।

"हाँ, माँ?" अर्जुन ने अपनी कत्थई आँखें उठाईं।

स्मिता ने अपनी उंगली से वाइन के ग्लास के किनारे को सहलाया—बिल्कुल वैसे ही जैसे उस रात रेखा ने किया था। उसकी आँखों में एक अजीब सी मादकता थी। "रेखा का फोन आया था आज... वह पूछ रही थी कि इस वीकेंड फ्री हूँ या नहीं।"

अर्जुन थोड़ा ठिठका। उसने अपनी माँ के चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश की। "ओह... अच्छा। माँ, तुम... तुम कुछ सोच रही हो क्या?"

स्मिता ने अपनी नाइटी के पल्लू को थोड़ा और ढीला होने दिया, जिससे उसके स्तनों की गोलाई और साफ दिखने लगी। "मैं बस... यह सोच रही थी कि तुम दोनों का वह... जो सिलसिला है, वह अभी भी चालू है? मतलब, तुम दोनों अभी भी... मिलते हो?"

स्मिता के मुंह से 'सेक्स' शब्द सीधे नहीं निकला, लेकिन उसकी आँखों की चमक और उसकी भारी सांसों ने सब कुछ साफ कर दिया था। वह यह जानने के लिए तड़प रही थी कि उसका यह जवान, तंदुरुस्त बेटा अपनी मौसी के साथ बिस्तर में क्या-क्या करता है। वह उस अनुभव को, उस वासना को अपने बहुत करीब महसूस करना चाहती थी।

अर्जुन ने स्मिता की आँखों में देखा। उसे अपनी माँ की आवाज़ में कोई शिकायत नहीं, बल्कि एक गहरी, सुलगती हुई उत्सुकता और छिपी हुई तलब महसूस हुई। उसने अपनी प्लेट को थोड़ा आगे खिसकाया और टेबल पर थोड़ा आगे झुक गया, जिससे दोनों के चेहरे बहुत करीब आ गए।

"माँ..." अर्जुन की आवाज अब और भारी, कामुक और गहरी हो गई थी, "अगर मैं सच कहूँ... तो जब से तुमने हमारे बारे में जाना है, तब से रेखा मासी के साथ मेरी वो बात नहीं रही। मेरा दिमाग... कहीं और अटका हुआ है।"

उसकी नजरें सीधे स्मिता के लाल, कांपते होठों पर और फिर नीचे उसकी ब्रा से बाहर झांकते स्तनों के उभार पर टिक गईं। कमरे का तापमान एक बार फिर चरम पर पहुँच चुका था, और मर्या

दा की वह महीन दरार अब एक गहरे, कामुक गड्ढे में बदलने को तैयार थी।
 

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Part 4

डाइनिंग टेबल पर अर्जुन का वह वाक्य— “मेरा दिमाग कहीं और अटका हुआ है”—हवा में किसी सुलगते हुए तीर की तरह तैर रहा था। स्मिता ने उस रात अपनी धड़कनों को जैसे-जैसे संभाला था, वह सिर्फ वही जानती थी। वह समझ चुकी थी कि उसका ३२ साल का गठीला बेटा अब सिर्फ अपनी मौसी का आशिक नहीं रहा, उसकी नजरें अब अपनी ही माँ की भरी हुई, रसीली देह पर टिकने लगी थीं। और सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि स्मिता को इस बात से डर नहीं, बल्कि एक अनाम, तीखी उत्तेजना महसूस हो रही थी।

अगली दोपहर, मुंबई की उमस और बढ़ गई थी। स्मिता किचन में खड़ी सिंक के पास कुछ बर्तन साफ कर रही थी। उसने एक पतली, नीले रंग की सिंथेटिक साड़ी पहनी हुई थी। उमस के कारण उसकी पीठ पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं, जिससे उसकी साड़ी का कपड़ा उसकी पीठ की गोरी त्वचा और उसकी काली लेस वाली ब्रा (lace bra) की पट्टी से चिपक गया था।

तभी अर्जुन किचन में दाखिल हुआ। वह केवल एक सफेद रंग की सैंडो बनियान (vest) और काले जिम शॉर्ट्स में था। वह पानी पीने के लिए फ्रिज की तरफ बढ़ा, लेकिन उसकी नजरें अपनी माँ के भारी नितंबों (hips) पर टिक गईं, जो साड़ी के पतले कपड़े में से हर हरकत के साथ मटक रहे थे।

पानी का ग्लास लेकर वह वापस मुड़ा, तो सिंक और उसके बीच की जगह बहुत कम थी। आम तौर पर वह दूर से निकल जाता था, लेकिन आज उसकी बेबाकी थोड़ी बढ़ चुकी थी। वह जानबूझकर स्मिता के ठीक पीछे से गुजरा।

इतने पास से, कि उसकी चौड़ी, मर्दाना छाती स्मिता की पीठ से लगभग छू गई। जब वह गुजरा, तो उसकी बनियान के ऊपर से उसकी छाती के कड़क बाल स्मिता की नंगी पीठ पर सरसराए। अर्जुन ने जानबूझकर अपनी रफ्तार धीमी की और उसका एक मजबूत, गठीला हाथ स्मिता की पतली कमर के गोरे हिस्से से रगड़ता हुआ निकला।

"सॉरी माँ... जगह थोड़ी कम थी," अर्जुन ने बहुत ही धीमी, भारी और कामुक आवाज में सीधे स्मिता के कान के पास कहा। उसकी गर्म, वाइन और पुदीने जैसी सांसें स्मिता की गर्दन के पिछले हिस्से पर पड़ीं, जहाँ पसीना तैर रहा था।

स्मिता का पूरा शरीर जैसे पत्थर का हो गया। उसके हाथों से बर्तन छूटते-छूटते बचा। उसकी धड़कनें इतनी तेज हो गईं कि उसे अपनी छाती के भीतर एक धमाका सा महसूस हुआ। उसकी साड़ी के नीचे, उसकी ब्रा के भीतर उसके स्तनों के निप्पल (nipples) कड़क होकर कपड़े को फाड़ देने पर आमादा हो गए। अर्जुन वहाँ से मुस्कुराता हुआ निकल गया, लेकिन स्मिता वहीं सिंक को पकड़े हांफती रही। उसकी जांघों के बीच, उसकी पैन्टी (panty) में एक गाढ़ा, चिपचिपा गीलापन तेजी से रिसने लगा था। वह समझ गई कि अर्जुन अब खेल को आगे बढ़ा रहा है।

अर्जुन की उस हल्की सी बेबाकी ने स्मिता के दिमाग की नसें हिला दी थीं। उसकी छाती की धड़कनें थमने का नाम नहीं ले रही थीं। अपने भीतर मची इस कामुक खलबली को शांत करने और ध्यान भटकाने के लिए वह घर के कामों में जुट गई। वह वाशिंग मशीन के पास गई ताकि अर्जुन के जिम के कपड़े धोने के लिए डाल सके।

बाथरूम के कोने में रखी लॉन्ड्री बास्केट को उसने जैसे ही पलटा, अर्जुन के उतरे हुए कपड़े बाहर गिर गए। वहाँ उसकी जिम की टी-शर्ट थी, उसका शॉर्ट्स था, और सबसे नीचे... उसका वह अंडरवियर (briefs) था जिसे उसने आज सुबह जिम में पहना था।

वह गहरे नीले रंग का स्ट्रेचेबल कॉटन अंडरवियर था। स्मिता के हाथ अनजाने में रुक गए। उसने चारों तरफ देखा, घर में कोई नहीं था, अर्जुन अपने कमरे में था। एक अजीब सी, पाशविक उत्सुकता के वश में होकर स्मिता ने नीचे झुककर उस अंडरवियर को अपने दोनों हाथों में उठा लिया।

कपड़ा अभी भी थोड़ा सा नम था। स्मिता ने अपनी आँखें बंद कीं और उस अंडरवियर को सीधे अपने चेहरे के पास ले आई। उसने अपनी नाक उस कपड़े के ठीक बीच वाले हिस्से (crotch area) पर टिका दी, जहाँ मर्द की मर्दानगी का सबसे गहरा असर होता है।

उसने एक लंबी, गहरी सांस खींची।

ओह! अर्जुन के जिस्म की वह कच्ची, तीखी और मर्दाना गंध—जिसमें पसीना, उसकी कोलोन और एक मुकम्मल मर्द के अंडकोशों (balls) की सोंधी खुशबू घुली हुई थी—सीधे स्मिता के दिमाग पर चढ़ गई। वह गंध इतनी स्ट्रॉन्ग और कामुक थी कि स्मिता के पैर कांपने लगे। उसने उस अंडरवियर को अपने होठों से लगा लिया। उसे ऐसा लगा जैसे वह सीधे अर्जुन की उस कड़क मर्दानगी को चूम रही हो, जिसके बारे में रेखा ने इतनी तारीफें की थीं।

उसने अपनी उंगलियों से उस कपड़े के उभरे हुए हिस्से को भींचा। उसकी कल्पना की आँखों के सामने अर्जुन का वह ६ फीट का गठीला बदन, उसकी नंगी छाती और उसकी जांघों के बीच का वह कड़क हिस्सा नाचने लगा। स्मिता ने उस अंडरवियर को अपनी छाती से भींच लिया, उसकी सिल्क की साड़ी के ऊपर से ही उसके स्तनों के निप्पल उस कपड़े से रगड़ खा रहे थे। वह हांफ रही थी, उसकी पैन्टी अब तक पूरी तरह से उसके अपने रसीले पानी से भीग चुकी थी। वह ५४ साल की माँ नहीं, बल्कि एक भूखी, प्यासी मादा बन चुकी थी जिसे अपने ही बेटे के जिस्म की लत लग चुकी थी। उसने कांपते हाथों से उस अंडरवियर को मशीन में डाला, लेकिन उस गंध का नशा उसके पोर-पोर में समा गया था।

रात के बारह बज चुके थे। बाहर बारिश की बूंदें अब और भारी होकर खिड़की के शीशों को पीट रही थीं, जैसे स्मिता के मन के भीतर उठते हुए तूफान को हवा दे रही हों।

स्मिता अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी। उसने आज रात जानबूझकर कोई साड़ी या भारी कपड़े नहीं पहने थे। उसने केवल एक बेहद महीन, सफेद रंग का साटन का नाइटगाउन पहना था। वह गाउन इतना पतला था कि बिना ब्रा के उसके भारी, गोल स्तनों का पूरा आकार, उनकी ढलान और उनके कड़े हो चुके काले निप्पल साफ बाहर की तरफ झांक रहे थे। नीचे उसने कोई पैन्टी भी नहीं पहनी थी, जिससे उसकी भारी जांघों और उसकी चुत की मखमली गोलाई सीधे साटन के कपड़े से छू रही थी।

वह बार-बार करवट बदल रही थी। चादर की हर रगड़ उसके बदन में एक सिहरन पैदा कर रही थी। जब भी वह आँखें बंद करती, उसे लॉन्ड्री में महसूस हुई अर्जुन की वह तीखी मर्दाना गंध याद आती। उसका हाथ अनजाने में उसके अपने पेट से होता हुआ नीचे सरकने लगा। उसने अपनी उंगलियों को अपनी जांघों के बीच के उस गीले, रेशमी हिस्से पर रखा। वह पूरी तरह से पानी छोड़ चुकी थी। उसने धीरे से अपनी उंगली को अपनी योनि की दरार पर रगड़ा। एक गहरी कराह उसके होठों से निकली, "ओह... अर्जुन..."

लेकिन तभी उसे एक झटका लगा। वह उठकर बैठ गई। "नहीं! यह मैं क्या कर रही हूँ? वह मेरा बेटा है... मेरा अपना खून!" उसने अपने चेहरे को अपने हाथों में छुपा लिया। समाज, मर्यादा और माँ का पद उसे रोक रहा था, लेकिन उसके बदन की भूख, रेखा की बातें और अर्जुन की वह दोपहर वाली छुअन उसे अपनी तरफ खींच रही थी।

वह बिस्तर से उठी। उसका गला सूख रहा था। पानी पीने के बहाने वह अपने कमरे से बाहर निकली। पूरा घर अंधेरे में डूबा था, केवल पैर रखने वाली नाइट लाइट्स जल रही थीं।

जब वह लिविंग रूम से गुजर रही थी, तो उसकी नजर अर्जुन के बेडरूम पर पड़ी। उसका दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था, बल्कि हमेशा की तरह थोड़ा सा खुला था।

स्मिता के कदम अनजाने में उस दरवाजे की तरफ बढ़ गए। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे डर था कि कहीं अर्जुन जाग न जाए। उसने दबे पाँव जाकर उस दरार से अंदर झांका।

कमरे के भीतर की मद्धम पीली रोशनी में जो नजारा था, उसने स्मिता की सांसें पूरी तरह से रोक दीं।

अर्जुन बिस्तर पर पूरी तरह से नंगा लेटा हुआ था। उसने शर्ट तो दूर, कोई शॉर्ट्स या ब्रीफ भी नहीं पहना था। उसका लंबा, चौड़ा और गठीला बदन चादर पर फैला हुआ था। उसके सिक्स-पैक एब्स और उसकी मजबूत जांघों की मांसपेशियां साफ चमक रही थीं। और सबसे होश उड़ाने वाली बात यह थी कि नींद में या शायद किसी गहरे सपने के कारण, उसकी जांघों के बीच का वह मर्दाना अंग—वह कड़क, लंबा और मोटा औजार—पूरी तरह से तनकर उसकी नाभि की तरफ इशारा कर रहा था। उसकी नसें उस काले, मजबूत अंग पर साफ उभरी हुई थीं।

स्मिता की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपनी जिंदगी में अपने सिर्फ अपने पति का खड़ा लंड देखा था, लेकिन अर्जुन की यह मर्दानगी, यह तंदुरुस्ती किसी भी औरत को घुटनों पर लाने के लिए काफी थी। रेखा की बातें उसके दिमाग में गूंजने लगीं—“वह जानता है कि कहाँ और कैसे छूना है...”

स्मिता का हाथ अनजाने में दरवाजे के हैंडल पर टिक गया। उसका मन कर रहा था कि वह सारी मर्यादाओं को लात मार दे, उस दरवाजे को धक्का दे और सीधे उस बिस्तर पर चढ़कर अर्जुन के उस विशाल, कड़क अंग को अपने भीतर समेट ले। उसकी योनि से पानी का एक और कतरा नीचे उसकी जांघ पर फिसल गया। वह नींद और जागृति की उस दहलीज पर खड़ी थी, जहाँ एक तरफ समाज का नरक था और दूसरी तरफ तृप्ति का स्वर्ग।

उसने कांपते हुए अपनी उंगलियों से अपने साटन के गाउन के ऊपर से अपने स्तनों को भींचा। अर्जुन ने नींद में एक हल्की सी करवट ली और उसके मुंह से एक धीमी सी आवाज निकली, "माँ..."

यह सुनकर स्मिता ने घबराकर अपने कदम पीछे खींच लिए। वह हांफती हुई, अपनी छाती को पकड़े हुए वापस अपने कमरे की तरफ भागी और दरवाजा बंद करके पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। उसकी सांसें किसी धावक की तरह चल रही थीं। मर्यादा की दीवार अभी टूटी नहीं थी, लेकिन उस नंगे सच को देखने के बाद, स्मिता जानती थी कि अब ज्यादा दि
नों तक इस आग को दबाकर रखना उसके बस की बात नहीं थी।
 
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रात के उस होश उड़ा देने वाले मंज़र के बाद, जब स्मिता ने अर्जुन की नग्न, कड़क मर्दानगी को अपनी आँखों से देखा था, सुबह की पहली किरण तक उसकी पलकें नहीं झपकी थीं। भोर होते ही वह अपने बिस्तर से उठी। उसका पूरा बदन एक अजीब सी तपन और टूटन से भर रहा था। उसने रात भर अपनी जांघों के बीच जो गीलापन महसूस किया था, उसे साफ़ करने के लिए वह सीधे अपने बेडरूम से जुड़े बाथरूम की तरफ बढ़ी।

जल्दबाजी और रात के उस मानसिक तूफान के कारण, स्मिता से एक बहुत बड़ी चूक हो गई। उसने नहाने से पहले अपनी जो गाढ़े मैरून रंग की, लेस वाली पैन्टी उतारी थी—जो रात भर उसके अपने रसीले, कामुक पानी से भीगकर नम हो चुकी थी—उसे वह वॉशबेसिन के बगल में लगे स्टील के एक हुक पर टांगकर भूल गई। नहाने के बाद उसने हल्के बादामी रंग की एक महीन कॉटन साड़ी पहनी, उसने अपने स्लीवलेस ब्लाउज के नीचे जानबूझकर कोई ब्रा नहीं पहनी थी। स्तनों के निप्पल (nipples) अभी भी कल रात की उत्तेजना से कड़े थे, जो ब्लाउज के पतले कपड़े को अंदर से कुरेद रहे थे। वह बिना पैन्टी पहने ही, अपनी देह को हवा देती हुई किचन की तरफ चली गई।

उसके बाहर निकलते ही, अर्जुन की आँख खुली। रात के अधूरेपन और अपनी माँ के उस साटन गाउन वाले रूप की कल्पना ने उसे भी सोने नहीं दिया था। उसका शरीर इस समय केवल एक हल्के स्लेटी रंग के boxer में था, जिसके आगे का हिस्सा उसकी सुबह की कड़क मर्दानगी के कारण किसी तने हुए तीर की तरह उभरा हुआ था। वह अलसाया हुआ सीधे उसी बाथरूम में घुसा।

बाथरूम के भीतर अभी भी स्मिता के नहाने के बाद की गर्म भाप और उसके 'लक्स' साबुन की भीनी-भीनी, स्त्रीसुलभ खुशबू तैर रही थी। अर्जुन जैसे ही बेसिन के पास अपना मुंह धोने बढ़ा, उसकी नजर ठीक बगल के हुक पर पड़ी।

वहाँ स्मिता की वह भारी, मैरून रंग की नायलॉन-लेस पैन्टी टंगी थी।
अर्जुन की सांसें वहीं थम गईं। उसने आगे बढ़कर अपनी बड़ी, कांपती हुई उंगलियों से उस महीन कपड़े को छुआ। पैन्टी का जो हिस्सा (crotch area) औरत के सबसे निजी अंग को छूता है, वह हिस्सा स्मिता के रात भर के गाढ़े, रसीले पानी से अभी भी हल्का सा नम और चिपचिपा था। अर्जुन ने उस पैन्टी को हुक से उतारा और सीधे अपनी नाक से सटा लिया।

"ओह... माँ..." अर्जुन के मुंह से एक गहरी, दबी हुई कराह निकली।
उस पैन्टी से उसकी माँ के जिस्म की वह असली, तीखी और औरत जात की कस्तूरी जैसी खुशबू आ रही थी, जिसे सूंघते ही अर्जुन का लण्ड पत्थर से भी ज्यादा कड़क हो गया। वह अब खुद पर काबू नहीं रख पा रहा था। उसने अपने दूसरे हाथ से अपने बॉक्सर के भीतर हाथ डाला और अपनी उस मोटी, लंबी और नस-नस उभरी हुई मर्दानगी को बाहर निकाल लिया। उसका वह कड़क औजार इस समय अपनी पूरी लंबाई में तन चुका था, जिसके tip से काम-रस की एक बूंद पहले ही टपक चुकी थी।

उसने माँ की उस भीगी हुई पैन्टी को अपने उस कड़क अंग के चारों तरफ लपेट लिया। रेशमी लेस का वह कपड़ा जब उसकी मर्दानगी की संवेदनशील त्वचा से रगड़ खाया, तो अर्जुन की आँखों के सामने अपनी माँ की वह ५४ साल की भारी, रसीली देह, उनके बड़े-बड़े गोल स्तन और उनके नितंबों की गोलाई नाचने लगी। वह तेजी से अपने हाथ को ऊपर-नीचे चलाने लगा। पैन्टी के कपड़े पर उसकी उंगलियों की पकड़ मजबूत होती गई। उसकी सांसें किसी हांफते हुए जानवर जैसी हो गईं।

बाथरूम के उस बंद एकांत में, केवल कपड़े की सरसराहट और अर्जुन की भारी सांसों की आवाज थी। मात्र कुछ ही पलों के उस तीव्र घर्षण के बाद, अर्जुन के सब्र का बांध टूट गया। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक तगड़ा करंट दौड़ा और उसकी जांघें कांप उठीं। उसके कड़क अंग के मुंह से उसका गाढ़ा, सफ़ेद और गर्म वीर्य एक के बाद एक कई पिचकारियों के साथ बाहर छूटा।

उसने जानबूझकर उस पूरे गाढ़े, दूधिया वीर्य को मां की उसी पैन्टी के बीचों-बीच, उसके अपने रसीले पानी वाले हिस्से पर ही निकाल दिया। वह गाढ़ा रस उस मैरून कपड़े पर फैल गया। अर्जुन ने एक गहरी सांस ली, अपने अंग को वापस अंदर किया, और स्मिता की उस वीर्य से सनी हुई पैन्टी को बिना धोए, वैसे ही वापस उस स्टील के हुक पर टांग दिया। वह यह देखना चाहता था कि उसकी माँ इस सीधे, नग्न संदेश पर क्या प्रतिक्रिया देती है।

करीब आधे घंटे बाद, जब अर्जुन बाहर लिविंग रूम में अखबार पढ़ने का नाटक कर रहा था, स्मिता को अचानक याद आया कि वह अपनी पैन्टी बाथरूम में ही भूल आई है। उसका दिल धक से रह गया। वह तेजी से बाथरूम की तरफ बढ़ी और अंदर घुसकर दरवाजा बंद कर लिया।

उसकी नजर हुक पर पड़ी। पैन्टी वहीं थी। लेकिन जैसे ही वह उसे उठाने के लिए आगे बढ़ी, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
मैरून रंग के उस गहरे कपड़े के ठीक बीच में, जहाँ सुबह उसका अपना पानी लगा था, अब एक बहुत ही गाढ़ा, लसदार और सफ़ेद रंग का धब्बा चमचमा रहा था। वह कोई मामूली दाग नहीं था। वह उसके जवान, तंदुरुस्त बेटे के जिस्म का सबसे शुद्ध निचोड़ था—उसका गाढ़ा वीर्य। वह अभी भी पूरी तरह सूखा नहीं था, बल्कि उसकी चिपचिपाहट और उसकी एक तीखी, ब्लीच जैसी मर्दाना गंध पूरे बाथरूम की हवा में तैर रही थी।

स्मिता की सांसें गले में अटक गईं। उसकी जांघें कांपने लगीं। वह समझ गई कि अर्जुन ने यह जानबूझकर किया है। यह उसकी तरफ से एक सीधा, बिना शब्दों का ऐलान था कि वह अपनी माँ की इस देह को किस कदर चाहता है।

एक पल के लिए समाज और लोकलाज का डर उसके दिमाग में आया, लेकिन अगले ही पल उसके भीतर की कामुक मादा पूरी तरह हावी हो गई। उसने कांपते हाथों से उस पैन्टी को हुक से उतारा। अर्जुन के उस गाढ़े वीर्य की महक उसकी नासिकाओं में समा गई। उसने अपनी आँखें बंद कीं, बाथरूम के दरवाजे से अपनी पीठ टिकाई और धीरे-धीरे नीचे फर्श पर खिसकती चली गई।

उसने उस वीर्य से सनी हुई पैन्टी को अपने चेहरे पर मल लिया। अर्जुन के उस सफ़ेद रस का कुछ हिस्सा उसके होठों और उसकी गालों पर लग गया। वह पूरी तरह से कामुकता के नशे में डूब चुकी थी। उसने अपनी बादामी साड़ी को घुटनों से ऊपर उठा दिया, जिससे उसकी भारी, गोरी और सुडौल जांघें पूरी तरह नंगी हो गईं। नीचे उसने कुछ नहीं पहना था।

उसने उस पैन्टी के उस हिस्से को, जहाँ अर्जुन का वीर्य और उसका अपना पानी आपस में मिल चुके थे, सीधे अपनी योनि (pussy) की दरार पर रख दिया।

"ओह... आअह... बेटा..." स्मिता के होठों से एक तीखी, दबी हुई सिसकी निकली।

उसने उस कपड़े को अपनी योनि की मखमली पंखुड़ियों पर रगड़ना शुरू किया। अर्जुन का वह गाढ़ा रस उसकी अपनी योनि के रसीले पानी के साथ घुलकर एक हो गया। उसने अपनी उंगलियों से अपनी उस कामुक जगह को कपड़े के ऊपर से ही भींचना शुरू किया। उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से पूरी तरह गिर चुका था, और बिना ब्रा के उसके भारी, रसीले स्तन हवा में थरथरा रहे थे। वह अपनी दूसरी हथेली से अपने स्तनों को भींचने लगी, उनके कड़े निप्पल को अपनी उंगलियों से मरोड़ने लगी। अर्जुन के वीर्य का वह स्पर्श उसे चरम सुख की तरफ ले जा रहा था। कुछ ही मिनटों की उस तीव्र रगड़ के बाद, स्मिता का पूरा बदन अकड़ गया, उसकी आँखें उलट गईं, और उसकी योनि ने पानी का एक बहुत बड़ा सैलाब छोड़ दिया। वह फर्श पर बैठी हांफती रही, अर्जुन के रस से तरबतर होकर।

बाथरूम के उस एकांत में अर्जुन के वीर्य का स्वाद और उसकी छुअन अपनी योनि की मखमली पंखुड़ियों पर महसूस करने के बाद, स्मिता ने खुद को साफ़ किया। उसने उस मैरून पैन्टी को हल्के गुनगुने पानी से धोया। लेकिन माँ के संस्कार और इतने सालों की लोकलाज उसके भीतर अभी भी थी। वह सीधे अर्जुन के सामने जाकर नग्नता का प्रदर्शन नहीं कर सकती थी। उसे अपनी झिझक के दायरे में रहकर ही उस कड़क मर्द को इशारा देना था।

उसने उस पैन्टी को घर के भीतर सुखाने के बजाय, लिविंग रूम से जुड़ी हुई गैलरी की डोरी पर ले जाकर टांग दिया। दोपहर ढल चुकी थी और आसमान में अचानक काले-स्याह बादलों का डेरा जमा होने लगा था। मुंबई की मानसूनी हवाओं में एक बार फिर से भारी नमी और ठंडक घुलने लगी थी, जो बारिश के आने का साफ़ संकेत थी।

स्मिता किचन में खड़ी शाम की चाय बना रही थी। उसने एक सादे, हल्के कत्थई रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू उसके सीने पर सलीके से लिपटा था। तभी बाहर गड़गड़ाहट हुई और ठंडी हवा का एक तेज झोंका सीधे किचन तक आया।

"अर्जुन!" स्मिता ने किचन से ही अपनी मखमली, भारी आवाज में पुकारा। "बाहर देखो, बारिश आने वाली है। जरा गैलरी से कपड़े उठा लाओ, वरना सब दोबारा भीग जाएंगे।"

लिविंग रूम में सोफे पर बैठा अर्जुन, जो सुबह की उस पैन्टी वाली घटना के बाद से ही अपनी जांघों के बीच सुलगती बेचैनी से जूझ रहा था, तुरंत उठा। "हाँ माँ, लाता हूँ," उसने कहा और गैलरी का कांच का दरवाजा खिसकाकर बाहर आ गया।

गैलरी में तेज हवा चल रही थी। अर्जुन जैसे ही डोरी के पास पहुँचा, वह चौंक गया। डोरी पर कोई और कपड़े नहीं थे—केवल उसकी माँ, स्मिता के सबसे अंतरंग और निजी वस्त्र टंगे थे।

वहाँ मां की वह मैरून रंग की लेस वाली पैन्टी हवा में लहरा रही थी, जिसे अर्जुन ने सुबह अपने वीर्य से सराबोर किया था। साबुन से धुलने के बाद भी, उस महीन नायलॉन के धागों में स्मिता के जिस्म की वह प्राकृतिक, कस्तूरी जैसी खुशबू अभी भी कहीं न कहीं रची-बसी थी। उसके ठीक बगल में स्मिता की दो और पैन्टियाँ टंगी थीं—एक गहरे काले रंग की साटन पैन्टी और एक सफ़ेद सूती ब्रीफ।

अर्जुन के हाथों में एक अजीब सी कपकंपी छूटी। उसने चारों तरफ देखा। बाहर बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। उसने अपनी बड़ी, गठीली हथेलियों में अपनी माँ के उन undies को समेटा। जब मैरून पैन्टी का वह हिस्सा उसकी उंगलियों से छूआ, तो उसे सुबह का अपना वह गाढ़ा, सफ़ेद बहाव याद आ गया जो इस कपड़े के आर-पार हुआ था। उसके शॉर्ट्स के भीतर उसका औजार एक बार फिर से पूरी ताकत से सर उठाने लगा।

वह उन कपड़ों को एक गुच्छे की तरह अपनी छाती से सटाकर लिविंग रूम में वापस आया। स्मिता किचन के दरवाजे पर खड़ी थी। उसकी नजर सीधे अर्जुन के हाथों में दबी अपनी उन पैन्टियों पर पड़ी। उसके चेहरे पर एक हल्की सी लाली दौड़ी, लेकिन उसने अपनी नजरें नहीं झुकाईं।

"माँ, ये... ये तुम्हारे कपड़े," अर्जुन ने अपनी कत्थई आँखों में झिझक लिए, थोड़ा हकलाते हुए कहा।

स्मिता आगे बढ़ी। उसके बदन की सादगी के नीचे एक सुलगती हुई औरत छिपी थी। उसने चाय का कप टेबल पर रखा और अर्जुन के बिल्कुल करीब आकर खड़ी हो गई। इतनी करीब, कि उसके स्तनों का भारी उभार अर्जुन की सैंडो बनियान से छूते-छूते बचा।

"एक काम कर, अर्जुन," स्मिता ने अपनी आवाज को थोड़ा और धीमा, रेशमी करते हुए कहा। "इन्हें मेरे बेडरूम में ले जा। और जो अलमारी है, उसके नीचे वाले drawer में ठीक से तह करके रख दे।"

अर्जुन अपनी माँ के उस सुलगते हुए आदेश को टाल नहीं सका। वह भारी कदमों से स्मिता के खुशबूदार बेडरूम में घुसा। कमरे में 'लैवेंडर' की एक शांत, स्त्रीसुलभ महक थी। उसने अलमारी का भारी दरवाजा खोला और नीचे वाले दराज को बाहर खींचा।

दराज खुलते ही अर्जुन की सांसें भारी हो गईं।
वहाँ स्मिता की अंतरंग दुनिया बिखरी पड़ी थी। अलग-अलग रंगों, डिजाइनों और कपड़ों की पैन्टियाँ और ब्रा वहाँ सलीके से रखी थीं। सिल्क, साटन और नेट की कई ब्रा (bras) थीं जिनके भारी कप्स स्मिता के ३६-डी साइज के स्तनों की गवाही दे रहे थे। अर्जुन ने गैलरी से लाए कपड़ों को वहाँ रखा। वह उस दराज को बंद करने ही वाला था कि पीछे से एक साए की आहट हुई।

मां धीरे-धीरे चलकर अर्जुन के ठीक पीछे आकर खड़ी हो गई। उसकी साड़ी का पल्लू अब थोड़ा ढीला होकर उसके कंधे से नीचे सरक चुका था, जिससे उसकी मखमली पीठ और उसकी छाती का ऊपरी गोरा हिस्सा साफ दिख रहा था।

"रख दिया?" स्मिता ने सीधे अर्जुन की पीठ के पीछे से फुसफुसाया।

उसकी गर्म सांसें अर्जुन की नंगी गर्दन के बालों को सहला गईं।
अर्जुन मुड़ा। वह अब इस मानसिक खिंचाव को और नहीं सह पा रहा था। "हाँ माँ... रख दिया।"

स्मिता ने अलमारी के उस दराज को देखा, फिर अपनी नजरें उठाईं और सीधे अर्जुन की आँखों में आँखें डाल दीं। उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ऐसी ढिठाई थी जो केवल एक परिपक्व औरत में ही हो सकती है। वह हल्के से मुस्कुराई—एक ऐसी कामुक, रहस्यमयी मुस्कान जो अर्जुन को पागल कर देने के लिए काफी थी।
"वैसे अर्जुन..." स्मिता ने अपनी आवाज को और मदहोश करते हुए कहा, उसका हाथ अनजाने में अलमारी के हैंडल पर टिक गया, जिससे उसकी छाती और आगे की तरफ तन गई। "रात को तुम... ऐसे ही सो जाते हो क्या? अपने कमरे का दरवाजा पूरा खुला रखकर?"

यह सुनते ही अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका दिल जोर से धड़का। वह समझ गया कि कल रात जब वह पूरी तरह नंगा होकर अपने उस कड़क औजार के साथ सो रहा था, शायद माँ ने उसे देख लिया था।

"माँ... वो... वो रात को कब नींद आई पता ही नहीं चला, तो..." अर्जुन ने सकपकाते हुए अपनी नजरें झुका लीं, उसका चेहरा शर्म और वासना से लाल हो रहा था।

स्मिता ने उसे टोकने या कुंडी लगाने की हिदायत देने के बजाय, अपनी उंगली से अर्जुन की बनियान के कंधे की पट्टी को हल्के से छुआ। वह छुअन इतनी बारीक थी कि अर्जुन के पूरे बदन के रोएं खड़े हो गए।

"मुझे पता है, बेटा," स्मिता ने बहुत ही धीमी, रॉ और कामुक आवाज में कहा, उसकी आँखें एक सेकंड के लिए अर्जुन के शॉर्ट्स के भीतर कड़े हो चुके उस बड़े उभार पर टिकीं। "बेटा, इतना काम न कर, अपनी सेहत का भी ध्यान रख, वैसे नंगे सोने में एक अलग ही आराम होता है, कहते है शरीर के लिए भी सही है, कोई बात नहीं... और इस घर में हमारे अलावा और है ही कौन?"

यह कहकर स्मिता ने अर्जुन की आँखों में एक आखिरी, सुलगती हुई नजर डाली—एक ऐसा मूक संकेत, जिसने यह साफ़ कर दिया था कि दरवाजा अब सिर्फ कमरे का नहीं, बल्कि मर्यादा का भी खुल चुका है।

वह मुस्कुराती हुई कमरे से बाहर निकल गई, और अर्जुन अपनी माँ के कपड़ों की उस खुशबू के बीच, अपने कड़क लंड को थामे वहीं खड़ा हांफता रह गया।
अर्जुन को लगा मां ने अपनी गरिमा को बनाए रखते हुए भी यह 'ग्रीन सिग्नल' दे दिया है कि वह रात को उसके नंगे बदन को देख चुकी है और उसे इससे कोई ऐतराज नहीं है।

अब उसे कुछ लग रहा था कि माँ भी उस जिस्मानी मिलन के लिए शायद तैयार है, और पहले कदम का इंतजार है।
 
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दोपहर की उमस और चिपचिपी गर्मी में पूरा घर तप रहा था। स्मिता किचन में खड़ी साड़ी के पल्लू से अपनी गर्दन का पसीना पोंछ रही थी, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। सुबह बाथरूम में अर्जुन की पैन्टी पर छोड़े गए गाढ़े वीर्य के उस सफ़ेद दाग ने उसके भीतर की वासना को पूरी तरह जगा दिया था। वह कोई नादान औरत नहीं थी।

जब अर्जुन केवल एक जिम ब्रीफ और ढीले शॉर्ट्स में, अपनी नंगी छाती पर पसीने की बूंदें चमकाता हुआ किचन में आया, तो स्मिता की नजरें सीधे उसके शॉर्ट्स के उस भारी उभार पर टिक गईं जिसे स्मिता ने रात में नंगा देखा था।

"माँ..." अर्जुन ने स्मिता के बेहाल जिस्म को देखकर अपनी भारी, मर्दाना आवाज़ में कहा। उसने आगे बढ़कर अपना बड़ा, गर्म हाथ सीधे स्मिता के नंगे, पसीने से तर कंधे पर रख दिया। "कल तुमने ही तो कहा था कि नंगे रहने में आराम मिलता है। तो फिर तुम खुद को इस भारी साड़ी और पेटीकोट में क्यों तपा रही हो? तुम भी कुछ हल्का और आरामदायक क्यों नहीं पहनतीं? इस घर में हमारे अलावा और है ही कौन?"

स्मिता ने पलटकर अर्जुन की कत्थई आँखों में देखा। इस बार उसकी आँखों में कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक तीखी ढिठाई थी। उसने अर्जुन के हाथ को अपने कंधे पर और कसने दिया।

स्मिता ने एक डर्टी मुस्कान के साथ बहुत ही मखमली और भारी आवाज में कहा। "रेखा जैसे कपड़े पहनवाना चाहते हो?"

यह सुनते ही अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका औजार शॉर्ट्स के भीतर झटके से कड़ा हो गया। "माँ... तुम... तुम क्या कह रही हो?"

स्मिता ने उसके गाल को हल्के से छुआ, उसकी उंगलियां अर्जुन की दाढ़ी की रगड़ को महसूस कर रही थीं। "कहो क्या ट्राई करूँ मै?"

अर्जुन का चेहरा शर्म और चरम उत्तेजना से लाल हो गया। उसने कांपते हाथों से अपनी काले रंग की ढीली टी-शर्ट और अपना एक छोटा, ग्रे रंग का बॉक्सर स्मिता को थमा दिया। स्मिता ने उन कपड़ों को लिया, अर्जुन के कड़े होते अंग को एक आखिरी बार घूरा, और बेडरूम में चली गई।

दस मिनट बाद जब स्मिता बाहर निकली, तो अर्जुन की आँखें फटी की फटी रह गईं।

साड़ी और पेटीकोट के हटते ही स्मिता का ५४ साल का भारी, रसीला और गदराया हुआ शरीर पूरी कामुकता के साथ बाहर आ गया था। अर्जुन की वह काले रंग की टी-शर्ट स्मिता के भारी, ३६-डी साइज के स्तनों पर इस तरह कस गई थी कि उनकी पूरी गोलाई और नीचे की तरफ का भारी ढलान साफ बाहर झांक रहा था। उसने नीचे कोई ब्रा नहीं पहनी थी। बिना ब्रा के, उसके स्तनों के दोनों बड़े, काले और कड़े हो चुके निप्पल (nipples) टी-शर्ट के पतले कॉटन के कपड़े को अंदर से चीरते हुए साफ बाहर तने हुए थे।

नीचे का छोटा शॉर्ट्स उसके भारी नितंबों (hips) पर इतना कसा था कि उसकी सुघड़, गोरी और सुडौल जांघों का पूरा ऊपरी हिस्सा पूरी तरह नंगा था। वह धीरे-धीरे मटकती हुई आई और सोफे पर अर्जुन के बिल्कुल करीब, उससे सटकर बैठ गई।

बैठते ही उसका शॉर्ट्स और ऊपर खिसक गया, जिससे उसकी चुत के ठीक पास की नंगी, गोरी जांघ सीधे अर्जुन के पैर के घने बालों से पूरी तरह रगड़ खा गई। दोनों की त्वचा के मिलते ही कमरे की हवा गर्म हो गई। स्मिता ने नीचे अपनी वही मैरून रंग की लेस वाली पैन्टी पहनी थी, जो सुबह अर्जुन के वीर्य से तर हुई थी।

"सचमुच अर्जुन..." स्मिता ने अपनी आवाज को बेहद धीमी, रॉ और कामुक करते हुए सीधे अर्जुन के कान के पास कहा। "इन कपड़ों में बदन को बहुत आराम मिल रहा है।"

उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा और उसे अपनी गोद में पकड़े बैठी। अर्जुन की उंगलियां जब स्मिता की मखमली त्वचा से छुईं, तो अर्जुन का औजार लोहे की रॉड की तरह कड़ा होकर उसके शॉर्ट्स को फाड़ने लगा।

"माँ... तुम... तुम बहुत हॉट लग रही हो..." अर्जुन ने हांफते हुए कहा, उसकी उंगलियां अब खुद-ब-खुद स्मिता की उंगलियों को भींचने लगी थीं।

"हॉट?" स्मिता ने एक गहरी सिसकी ली और अर्जुन के चेहरे के और करीब आई, उसके भारी स्तन अर्जुन के चौड़े सीने से पूरी तरह टकरा गए और उनके कड़े निप्पल अर्जुन की बनियान को चुभने लगे।

"अपनी मौसी से ज्यादा हॉट हूँ या कम?" स्मिता की आवाज में अब शुद्ध वासना और अधिकार था।

खेल अब पूरी तरह से नंगा और बेबाक होने की कगार पर था।
 
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स्मिता अपनी उस बढ़ती हुई मानसिक उत्तेजना और ध्यान को भटकाने के लिए उसने एक बेहद घरेलू और स्वाभाविक रास्ता चुना।

सोफे के ठीक पीछे, दीवार पर एक ऊँची शेल्फ बनी थी जहाँ कुछ सजावटी चीजें और किताबें रखी थीं। स्मिता सोफे पर उठी और सोफे की गद्दी पर ही अपने नंगे पैर रखकर थोड़ी ऊपर की तरफ उचकी ताकि वहां चीज़े व्यवस्थित कर सके।

इस हरकत से अर्जुन की टी-शर्ट और उसका छोटा ग्रे शॉर्ट्स उसकी जांघों पर और ऊपर चढ़ गया।

इसलिए जैसे ही वह ऊपर उचकी, अर्जुन की नजरें सीधे नीचे से उसकी भारी, गोरी जांघों के उस मखमली जोड़ और उसके नितंबों (hips) की विशाल गोलाई पर जम गईं।

तभी स्मिता का संतुलन अचानक बिगड़ गया। उसका पैर सोफे की ढीली गद्दी से फिसला और वह खुद को संभाल नहीं पाई।

"ओह...!" स्मिता के मुंह से एक चीख निकली।

वह सीधे नीचे बैठी हुई स्थिति में, पीछे की तरफ गिरी और उसका पूरा भारी, ५४ साल का रसीला बदन सीधे नीचे बैठे अर्जुन की दोनों फैली हुई जांघों के ठीक बीच में, उसकी गोद में जा गिरा। वह कोई जानबूझकर की गई हरकत नहीं थी, एक पूरी तरह से नेचुरल दुर्घटना थी।

लेकिन जैसे ही वह गिरी, माहौल पूरा बदल गया।

स्मिता की दोनों भारी, गोरी जांघें अर्जुन की मजबूत जांघों के ऊपर फैल गईं और उसका वह पेटीकोट-विहीन, भारी और गदराया हुआ नितंब सीधे अर्जुन के शॉर्ट्स के भीतर लोहे की रॉड की तरह तने हुए उस ६ इंच लंबे, मोटे और कड़क औजार के ऊपर जाकर पूरी ताकत से धंस गया।

"आअह..." अर्जुन के हलक से एक जंगली, दबी हुई कराह निकली।

स्मिता का पूरा जिस्म अर्जुन की छाती से सट चुका था। बिना ब्रा के स्मिता के भारी ३६-डी साइज के स्तनों के दोनों कड़े, काले निप्पल टी-शर्ट के पतले कॉटन के आर-पार अर्जुन के सीने में सीधे चुभ रहे थे। दोनों की सांसें इतनी तेज थीं कि एक-दूसरे के मुंह के भीतर समा रही थीं।

एक सेकंड के लिए स्मिता को उठना चाहिए था, मर्यादा यही कहती थी। लेकिन जैसे ही उसकी योनि (pussy) के मखमली उभार ने अर्जुन की उस कड़क मर्दानगी की मोटाई और उसकी तपती हुई नस-नस को अपने शॉर्ट्स के पतले कपड़े के नीचे महसूस किया, उसके दिमाग का सारा कंट्रोल उड़ गया। उसकी योनि से काम-रस का एक भारी, गाढ़ा सैलाब रिसकर सीधे उसके ग्रे शॉर्ट्स को अंदर से भिगो गया। मन ही मन मची वासना अब पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
बिना एक भी शब्द बोले, दोनों के बीच एक मूक सहमति बन गई। स्मिता ने अर्जुन के चौड़े कंधों पर अपनी हथेलियां कसीं और वहीं गोद में बैठे-बैठे अपनी कमर को बहुत ही बारीक, डर्टी और तीखे अंदाज में आगे-पीछे रगड़ना (dry humping) शुरू कर दिया।

घिस... घिस... घिस...!

दोनों के शॉर्ट्स के सूती कपड़ों के आपस में रगड़ने की वह तीखी, डर्टी आवाज उस शांत कमरे में गूंजने लगी। स्मिता ने जब अपनी भारी जांघों का पूरा दबाव अर्जुन के कड़क औजार पर डाला, तो अर्जुन के सब्र का बांध भी टूट गया। उसने अपने दोनों बड़े, मजबूत हाथ स्मिता की उन नंगी, गोरी जांघों के जोड़ों पर जमा दिए और अपनी उंगलियों को उसकी मखमली त्वचा में भींच दिया।

जब भी स्मिता अपनी कमर को पीछे खींचकर पूरे घर्षण के साथ आगे लाती, अर्जुन नीचे से अपने कूल्हों का एक ज़ोरदार झटका ऊपर की तरफ देता। कपड़ों के आर-पार अर्जुन का वह कड़क औजार स्मिता की योनि के दोनों रसीले होठों और उसके काम-दाने (clitoris) को बुरी तरह से मसल रहा था। स्मिता की आँखें आधी बंद हो गईं, उसके होठ खुले रह गए और उसके मुंह से बेहद डर्टी, मदहोश कर देने वाली सिसकियाँ निकलने लगीं।

"उफ्फ... आअह... अर्जुन... नहीं बेटा..." पर वह पागलों की तरह अपनी जांघों को उसके अंग पर रगड़ रही थी। उसका ग्रे शॉर्ट्स अब बीच वाले हिस्से से पूरी तरह से उसके अपने रसीले पानी से भीगकर काला पड़ चुका था, और उस गीले कपड़े के आर-पार अर्जुन की मर्दानगी की तपन सीधे उसकी योनि के भीतर तक महसूस हो रही थी।

अर्जुन का पूरा बदन पसीने से नहा चुका था, उसकी सांसें किसी हांफते जानवर जैसी थीं। हर एक हंप (hump) के साथ वे दोनों उस चरम बिंदु की तरफ बढ़ रहे थे जहाँ मर्यादा पूरी तरह भस्म हो जाती।

करीब चार पांच ऐसे ही गहरे, पाशविक और पूरी तरह से रॉ हम्प्स के बाद, जब अर्जुन का लंड झटके लेने लगा, स्मिता की चेतना वापस लौटी।

उसने झटके से अपनी कमर को रोका, अर्जुन के कंधों पर दबाव देकर खुद को ऊपर उठाया और उसकी गोद से अलग हो गई।

उसका बदन पूरी तरह कांप रहा था, बिना ब्रा के उसके भारी स्तन उसकी छाती पर बुरी तरह हांफ रहे थे। उसने अपनी बिखरी जुल्फों को समेटा और बिना अर्जुन की आँखों में देखे, अपनी भारी और कांपती आवाज में कहा, "खाने का वक्त हो रहा है अर्जुन। मुझे किचन का काम देखना है... तुम तब तक आराम करो।"

वह तेज कदमों से सीधे किचन की तरफ भाग गई, जहाँ सिंक को पकड़कर वह अपने सुलगते बदन को शांत करने लगी। सोफे पर बैठा अर्जुन शॉर्ट्स के ऊपर से अपनी उस कड़क मर्दानगी को थामे, अपनी माँ के जिस्म के उस रसीले पानी की गंध को हवा में सूंघता हुआ वहीं हांफता रह गया।

अब रास्ता पूरी तरह साफ़ हो रहा था, और वह सुलगती हुई रात इस खेल को पूरी तरह नंगा करने के लिए तैयार थी।
 
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रेखा, स्मिता और उसका बेटा : एक अनकहा रिश्ता

बाहर सावन की अंधेरी रात अपनी पूरी रफ्तार पर थी। मुंबई की गगनचुंबी इमारतों के शीशों से टकराकर बारिश की बूंदें नीचे फिसल रही थीं। ठीक उसी तरह, जैसे ५४ वर्ष की स्मिता के मन में अनगिनत अनुत्तरित सवाल तैर रहे थे। वह अपने आलीशान पेंटहाउस के लिविंग रूम की कांच की विशाल खिड़की के पास खड़ी थी।

स्मिता का शरीर इस उम्र में भी एक खास ढलान और गरिमा लिए हुए था। उसने हाथीदांत (ivory) के रंग की एक ढीली, कॉटन-सिल्क की मैक्सी ड्रेस पहनी हुई थी, जो उसके भरे हुए नितंबों और भारी स्तनों के उभार को छुपाने की असफल कोशिश कर रही थी। उसकी त्वचा पर उम्र की हल्की महीन रेखाएं थीं, लेकिन उसका रंग साफ था और उसकी देह से सालों पुरानी एक शांत, मातृत्व और परिपक्व खुशबू आती थी। उसने अपने बालों को पीछे एक ढीले जूड़े में बांध रखा था, जिससे उसकी गर्दन का पिछला हिस्सा खुला था, जहाँ बारिश की ठंडी हवा के झोंकों से रह-रहकर सिहरन पैदा हो रही थी।

उसके पीछे, सोफे पर उसका ३२ वर्षीय बेटा अर्जुन बैठा था। अर्जुन का शरीर किसी यूनानी मूर्तिकार की तराशी हुई कलाकृति जैसा था। ६ फीट १ इंच लंबा, चौड़े और मजबूत कंधे, और जिम में कसरत करके कमाई गई गठीली छाती। उसने गहरे चारकोल ग्रे रंग की एक लिनन शर्ट पहनी थी, जिसके ऊपर के तीन बटन खुले हुए थे। जब वह सांस लेता, तो उसकी छाती के घने, काले बाल और उसकी कॉलरबोन की मजबूत बनावट साफ दिखाई देती थी। उसकी शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं, जिससे उसकी कलाई और अग्रबाहु (forearms) की उभरी हुई नसें उसकी मर्दानगी को और उभार रही थीं। वह अपनी माँ की बेचैनी को देख रहा था, और उसकी गहरी, कत्थई आँखों में एक अजीब सा सुकून और ठहराव था—एक ऐसा ठहराव जो किसी गहरे रहस्य के पीछे छुपा होता है।

"माँ, तुम थक गई हो। बैठ जाओ न," अर्जुन की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई गूंजी। उसकी आवाज भारी, गहरी और मर्दाना थी, जिसमें एक अजीब सी खनक थी।

स्मिता ने मुड़कर अपने बेटे को देखा। वह हैरान थी कि पिछले छह महीनों में अर्जुन कितना बदल गया था। कहाँ वह एक हताश, नौकरी के लिए परेशान रहने वाला लड़का था, और कहाँ आज वह आत्मविश्वास से लबरेज, एक नामी कॉर्पोरेट फर्म का ऊंचे पद पर आसीन अधिकारी था। उसकी पूरी बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी थी। उसमें एक अजीब सा सम्मोहन था।

ठीक उसी वक्त, दरवाजे की डोरबेल बजी।

अर्जुन सोफे से उठा। जब वह चला, तो उसके चलने के अंदाज में एक शिकारी जैसी सहजता थी। उसने जाकर भारी सागौन के दरवाजे को खोला।
दरवाजे पर जो शख्सियत खड़ी थी, उसने कमरे के भीतर के तापमान को पल भर में कई डिग्री बढ़ा दिया। वह रेखा थी—स्मिता की ४९ वर्षीय छोटी बहन और शहर की सबसे अमीर, कामयाब बिजनेसवुमन्स में से एक।

रेखा को देखकर कोई भी उसकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता था। वह किसी २८-३० साल की परिपक्व और बेहद कामुक अप्सरा जैसी दिख रही थी। उसका कद ५ फीट ७ इंच था और उसका शरीर 'अवरग्लास' (hourglass) शेप का था—यानी पतली, लचीली कमर और भारी, सुडौल कूल्हे। उसने गहरे, आधी रात के नीले रंग (midnight blue) की एक शुद्ध शिफॉन की साड़ी पहनी थी। वह साड़ी इतनी महीन और पारदर्शी थी कि रेखा के पेट की गोरी त्वचा, उसकी गहरी नाभि और कमर की सुगठित गोलाई साफ झलक रही थी।

साड़ी के साथ उसने उसी नीले रंग का स्लीवलेस, बैकलेस ब्रोकेड ब्लाउज पहना था, जो उसकी पीठ को लगभग पूरा खुला छोड़ रहा था। उसकी पीठ की मखमली, कंचन जैसी गोरी त्वचा पर लाइट की पीली रोशनी इस तरह चमक रही थी जैसे सोने पर पानी चढ़ाया गया हो। उसके घने, काले और रेशमी बाल एक तरफ कंधे पर बिखरे थे, जो उसके उन्नत स्तनों के उभार को आंशिक रूप से ढक रहे थे। उसकी आंखों में गहरा काजल, होठों पर वाइन रंग की गीली लिपस्टिक और कानों में हीरे के छोटे-छोटे बुंदे चमक रहे थे। उसकी देह से 'चैनल' के महंगे परफ्यूम की एक मदहोश करने वाली, कस्तूरी जैसी कामुक खुशबू आ रही थी, जो पल भर में पूरे कमरे के कोने-कोने में फैल गई।

"अरे वाह, अर्जुन! तुम तो आज बेहद शानदार लग रहे हो," रेखा ने अंदर कदम रखते ही अपनी मखमली, खनकती हुई आवाज में कहा।
उसने अर्जुन के करीब आकर अपनी दोनों गोरी, सुडौल बाहें उसकी गर्दन के चारों ओर डाल दीं और उसे गले लगा लिया। स्मिता ने खिड़की के पास खड़े होकर इस दृश्य को देखा। रेखा के भारी, रेशमी स्तन अर्जुन की मजबूत छाती से पूरी तरह भींच गए। अर्जुन ने भी बिना किसी झिझक के रेखा की पतली, लचीली कमर पर अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथ टिका दिए। अर्जुन की उंगलियां रेखा की साड़ी के महीन कपड़े को भेदकर उसकी नंगी पीठ की त्वचा को छू रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे को कुछ पलों के लिए इतनी शिद्दत से भींचा कि उनके बीच की हवा भी गायब हो गई। जब वे अलग हुए, तो रेखा ने अपनी लंबी, लाल रंग की नेलपेंट लगी उंगलियों से अर्जुन के गाल को हल्के से सहलाया। उसकी नजरों में एक प्यास थी, एक अधिकार था।

"मासी... आप भी हमेशा की तरह कयामत ढा रही हैं," अर्जुन ने सीधे रेखा की आंखों में देखते हुए, बेहद धीमी और मदहोश आवाज में कहा। उसके मुंह से 'मासी' शब्द निकला जरूर था, लेकिन उसके लहजे में कोई सम्मान नहीं, बल्कि एक अजीब सा रोमांस और वासना की चाशनी घुली थी।

स्मिता आगे बढ़ी। "आओ रेखा। बैठो।" उसकी आवाज में एक अजीब सी भारीपन था।

तीनों लिविंग रूम के बड़े, मखमली एल-शेप सोफे पर बैठ गए। रेखा सोफे के बीचों-बीच बैठी। उसने अपने पैरों पर पैर चढ़ाए (crossed legs), जिससे उसकी साड़ी घुटने से थोड़ी ऊपर खिसक गई और उसकी चिकनी, गोरी पिंडलियाँ साफ दिखाई देने लगीं। अर्जुन ने तुरंत जाकर बार काउंटर से क्रिस्टल के ग्लासों में रेड वाइन डाली। वह वापस आया और रेखा के ठीक बगल में बैठ गया—इतने करीब कि उन दोनों की जांघें एक-दूसरे से पूरी तरह सट गईं।

अर्जुन ने वाइन का ग्लास रेखा की तरफ बढ़ाया। रेखा ने ग्लास थामते हुए अपनी उंगलियों को जानबूझकर अर्जुन की उंगलियों से रगड़ा। दोनों की नजरें मिलीं और एक मूक सहमति सी हवा में तैर गई।

स्मिता ने सिर्फ सादा पानी लिया था। वह उन दोनों के ठीक सामने वाले सिंगल सोफे पर बैठी थी। उसकी अनुभवी आँखें दोनों के बीच के इस मूक लेकिन बेहद गहरे शारीरिक खिंचाव को भांप रही थीं। कमरे में केवल बारिश की आवाज और वाइन के ग्लासों की खनक थी।

"स्मिता... तुम इतनी चुप क्यों हो? और इस तरह घूर क्यों रही हो?" रेखा ने वाइन की एक छोटी सी चुस्की लेते हुए अपने लाल होठों को जीभ से चाटा। यह हरकत इतनी कामुक थी कि अर्जुन की नजरें सीधे रेखा के होठों पर टिक गईं।

स्मिता ने पानी का ग्लास टेबल पर रखा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा कसा। "रेखा... अर्जुन... मैं बेवकूफ नहीं हूँ। मैं देख रही हूँ कि पिछले कुछ महीनों में क्या बदला है। अर्जुन का अचानक बेरोजगार से एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट बन जाना, उसकी महंगी लाइफस्टाइल, और तुम दोनों के बीच का ये... ये अंदाज। यह कोई मौसी और भांजे का रिश्ता नहीं है। मुझे साफ-साफ सच जानना है। आज रात।"
अर्जुन ने थोड़ा असहज होकर अपनी शर्ट के कॉलर को छुआ, उसकी चौड़ी छाती पर पसीने की एक छोटी सी बूंद चमकी। लेकिन रेखा बिल्कुल शांत थी। वह हल्के से मुस्कुराई, जिससे उसके गालों पर छोटे से डिंपल उभरे।

"स्मिता, तुम हमेशा से बहुत समझदार रही हो," रेखा ने अपनी पीठ को सोफे से टिकाते हुए कहा, जिससे उसके स्तन और ऊपर की ओर तन गए। "तो सुनो। कोई सस्पेंस नहीं रखते। मैं और अर्जुन... हम दोनों पिछले आठ महीनों से एक-दूसरे के साथ एक बेहद गहरे, सीक्रेट इंटीमेट रिलेशनशिप में हैं। सीधे शब्दों में कहूं, तो हम एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं।"

यह सुनते ही जैसे कमरे की सारी हवा गायब हो गई। स्मिता की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका दिल जोर से धड़का। "रेखा! तुम होश में तो हो? तुम इसकी मौसी हो! तुम्हारी उम्र ४९ साल है और यह अभी सिर्फ ३२ का है! यह... यह पाप है, पागलपन है!"

"माँ, प्लीज शांत हो जाओ," अर्जुन ने इस बार आगे बढ़कर अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया। उसके हाथ गर्म और बेहद मजबूत थे। "रेखा ने मेरा इस्तेमाल नहीं किया, न ही मैंने उनका। जब मैं जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था, डिप्रेशन में था, तब रेखा ने मुझे सहारा दिया। उन्होंने मुझे अपनी कंपनी के नेटवर्क के जरिए यह जॉब दिलाई। लेकिन उससे भी बढ़कर... उन्होंने मुझे एक मर्द होने का अहसास कराया।"

रेखा ने अपनी वाइन का ग्लास नीचे रखा। वह सोफे पर सरककर अर्जुन के और करीब आ गई। उसने अर्जुन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया, जिससे उसके खुले बाल अर्जुन की शर्ट की खुली छाती पर बिखर गए।

"स्मिता, मेरी बात ठंडे दिमाग से समझो," रेखा की आवाज अब और गहरी, रेशमी और सम्मोहक हो गई थी। "हम दोनों में से कोई भी इस रिश्ते को लेकर उस पारंपरिक तरीके से 'सीरियस' नहीं है। हम कोई शादी नहीं करने जा रहे, न ही समाज को कोई चुनौती दे रहे हैं। यह विशुद्ध रूप से... हमारी शारीरिक और मानसिक भूख का मामला है। एक ऐसी भूख, जो हम दोनों के अंदर सालों से दबी थी।"

रेखा ने स्मिता की तरफ देखा, उसकी आंखों में कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी। "मेरे पास पैसा है, शोहरत है, लेकिन मेरी रातें सूनी थीं। मुझे एक ऐसे जवान, मजबूत और जोशीले मर्द की जरूरत थी जो मुझे एक औरत होने का अहसास करा सके, जो मेरी देह की प्यास को बुझा सके। और अर्जुन... उसे एक ऐसी परिपक्व, खूबसूरत औरत की जरूरत थी जो उसकी मर्दानगी को सराहे, उसे गाइड करे और उसे आत्मविश्वास दे। हम दोनों एक-दूसरे की जरूरत को पूरा करते हैं। जब हम साथ होते हैं, तो हम दुनिया के सारे बंधन भूलकर सिर्फ एक नर और मादा बन जाते हैं। और देखो, इसका नतीजा कितना खूबसूरत है। अर्जुन का करियर सेट है, और मेरी जिंदगी में एक नई रौनक है।"

स्मिता ने अपने बेटे को देखा। अर्जुन की आंखों में अपनी माँ के लिए कोई डर नहीं था, बल्कि एक सच्चाई थी। स्मिता का गुस्सा, जो एक सामाजिक डर से उपजा था, रेखा की इन व्यावहारिक और बेहद ईमानदार बातों को सुनकर धीरे-धीरे पिघलने लगा। उसका दिल शांत होने लगा, लेकिन उसके भीतर एक नई, अनजानी सी बेचैनी शुरू हो गई थी।

कमरे का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। सामाजिक पाबंदियों का डर गायब हो चुका था और उसकी जगह एक शुद्ध, नग्न और कामुक बेबाकी ने ले ली थी।

रेखा सोफे से उठी। जब वह चली, तो उसकी साड़ी की सरसराहट और उसकी पायल की छनक ने कमरे में एक अजीब सी उत्तेजना भर दी। वह चलकर अर्जुन के ठीक सामने खड़ी हो गई। उसने अर्जुन के दोनों कंधों पर अपने हाथ रखे और उसे नीचे बैठे-बैठे ही अपनी तरफ खींचा।

"स्मिता, तुम्हें गर्व होना चाहिए कि तुमने एक बेहद शानदार मर्द को जन्म दिया है," रेखा ने सीधे अपनी बड़ी बहन की आंखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज में अब एक गहरी वासना और कामुकता घुली हुई थी। "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम्हारा बेटा बिस्तर में कितना लाजवाब है।"

"रेखा...!" अर्जुन ने हल्के से शरमाते हुए रेखा की पतली कमर को अपने दोनों हाथों में भींच लिया। उसने रेखा को अपने करीब खींचा, जिससे रेखा के सुडौल नितंब अर्जुन की जांघों से टकराए।
"नहीं अर्जुन, आज सब सच सामने आने दो," रेखा ने अर्जुन के बालों में अपनी उंगलियां फंसाते हुए कहा। "स्मिता, अर्जुन के पास वो ताकत है जो किसी भी औरत को पागल कर दे। लेकिन सबसे खास बात है उसका सब्र (patience)। वह उन नौसिखिए लड़कों जैसा नहीं है जो सिर्फ अपनी भूख मिटाना जानते हैं। वह एक परिपक्व औरत के शरीर के भूगोल को समझता है। वह जानता है कि मेरी त्वचा के किस हिस्से को कब, कहाँ और कितनी शिद्दत से छूना है।"

रेखा की आँखें आधी बंद हो गईं, जैसे वह उस अहसास को दोबारा जी रही हो। "जब वह अपने इन बड़े, मजबूत हाथों से मेरी इस रेशमी पीठ को सहलाता है, तो मेरे शरीर के रोम-रोम खड़े हो जाते हैं। उसके होंठ... ओह, उसके होठों में एक अजीब सी तपिश है। जब वह मेरी गर्दन के पीछे, मेरे कानों के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए मुझे चूमता है, तो मैं पूरी तरह पिघल जाती हूँ। उसकी लव-मेकिंग इतनी गहरी, इतनी लंबी और इतनी मदहोश करने वाली होती है कि मैं चीख उठती हूँ। वह मुझे मेरी उम्र भूलने पर मजबूर कर देता है।"

स्मिता यह सब सुन रही थी। उसकी सांसें भारी हो गई थीं। उसकी हाथीदांत रंग की मैक्सी ड्रेस के नीचे उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। सालों से, जबसे उसके पति का साथ छूटा था, उसने किसी मर्द का स्पर्श महसूस नहीं किया था। अपनी सगी बहन के मुंह से, अपने ही जवान और गठीले बेटे की मर्दानगी का ऐसा जीवंत और कामुक वर्णन सुनकर स्मिता के शरीर के भीतर भी एक सोई हुई ज्वालामुखी करवट लेने लगी थी। उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।

रेखा ने स्मिता की इस हालत को भांप लिया। वह अर्जुन की बांहों से निकलकर धीरे-धीरे चलकर स्मिता के पास आई। वह स्मिता के सोफे के पास नीचे कालीन पर बैठ गई और उसने स्मिता के दोनों ठंडे पड़ रहे हाथों को अपने गर्म, मखमली हाथों में ले लिया।
"स्मिता... खुद को देखो," रेखा ने बेहद धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। "५४ की उम्र में भी तुम्हारी ये देह कितनी भरी हुई और रसीली है। तुमने खुद को इस सूनेपन की कोठरी में क्यों बंद कर रखा है? क्या समाज की झूठी दुहाई तुम्हारी इस शारीरिक और मानसिक भूख को शांत कर सकती है? इस उम्र में औरत को एक मजबूत आलिंगन की, एक गर्म स्पर्श की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।"

स्मिता ने कांपते हुए होठों से कहा, "रेखा... मैं... मैं अब इस उम्र में कहाँ जाऊं? कौन है जो मुझे इस तरह समझेगा?"

रेखा के होठों पर एक बेहद शातिर, कामुक और गहरी मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में चमक थी। उसने सिर उठाकर पीछे सोफे पर बैठे अर्जुन की तरफ देखा।

अर्जुन अब सोफे पर पूरी तरह फैलकर बैठा था। उसकी शर्ट के बटन और खुल चुके थे, उसकी गठीली छाती और पेट के सिक्स-पैक एब्स का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था। उसकी आँखें अपनी माँ स्मिता के उभरे हुए सीने और उसकी थिरकती हुई काया पर टिकी थीं। उसकी नजरों में एक गहरा सम्मान, एक असीम चाहत और एक खुला आमंत्रण था।

रेखा ने स्मिता के कान के बिल्कुल करीब अपना मुंह लाया। उसकी गर्म सांसें स्मिता के कान की लौ को छू रही थीं। "तुम्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है, दीदी... जो हुनर, जो ताकत और जो राहत मुझे मिलती है, वो तुम्हारे बहुत करीब है। अर्जुन तुम्हारा बेटा जरूर है, लेकिन वह एक मुकम्मल मर्द है। वह जानता है कि अपनी माँ जैसी खूबसूरत, परिपक्व और आदरणीय औरत का सम्मान कैसे करना है और उसकी रातों के इस सूनेपन को अपनी बांहों में कैसे समेटना है। सुख पर, तृप्ति पर हम दोनों का बराबर हक है..."

लिविंग रूम में एक भारी, दमघोंटू लेकिन बेहद कामुक खामोशी छा गई। केवल बाहर की बारिश की सनसनाहट थी। स्मिता ने धीरे से अपनी पलकें उठाईं और सीधे अर्जुन की आँखों में देखा। अर्जुन ने अपनी जगह से ही अपनी माँ को देखकर एक गहरी, मदहोश मुस्कान दी। स्मिता का दिल किसी पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा था, और उसकी देह ने सदियों बाद एक मीठी, सुलगती हुई तपन को महसूस किया था।
बहुत ही जबरदस्त शानदार लाजवाब और अद्भुत प्रारंभ हैं भाई कहानी का मजा आ गया
 

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Part 2

कमरे में छाई वह भारी, कामुक खामोशी इतनी गहरी थी कि तीनों की सांसों की आवाज़ साफ सुनी जा सकती थी। रेखा के आखिरी शब्दों ने—कि अर्जुन अपनी माँ के सूनेपन को दूर कर सकता है—कमरे के वातावरण को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ मर्यादा और वासना की सीमाएं आपस में टकरा रही थीं।

स्मिता का दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था। उसकी आँखें अर्जुन के चौड़े, गठीले सीने पर टिकी थीं, लेकिन तभी उसके भीतर की माँ जाग उठी। उसने एक गहरी, कांपती हुई सांस ली और रेखा की तरफ देखा, जिसने अभी भी उसके हाथों को थाम रखा था।
रेखा स्मिता के चेहरे के भावों को पढ़ रही थी। वह एक बेहद चतुर और परिपक्व औरत थी। वह जानती थी कि सदियों पुरानी सामाजिक बेड़ियों और एक माँ के मातृत्व को एक झटके में नहीं तोड़ा जा सकता। जो बीज उसने स्मिता के मन में बोया था, उसे पनपने के लिए वक्त और अकेलेपन की जरूरत थी।

"अच्छा स्मिता..." रेखा हल्के से मुस्कुराई और स्मिता के हाथों को छोड़कर खड़ी हो गई। उसने अपनी आधी रात के नीले रंग की शिफॉन साड़ी के पल्लू को अपनी गोरी कमर पर लपेटते हुए ठीक किया। "रात बहुत हो चुकी है। और बाहर बारिश भी थोड़ी कम हुई है। मुझे अब निकलना चाहिए। मेरी गाड़ी नीचे इंतजार कर रही है।"

उसने मुड़कर अर्जुन को देखा, जो अभी भी सोफे पर उसी सम्मोहक मुद्रा में बैठा था। रेखा उसके पास गई, उसके गाल को चूमा और उसके कान में फुसफुसाया, "अपना ख्याल रखना, मेरे शेर।" फिर उसने स्मिता की तरफ देखा, "सोचना मेरी बातों पर, दीदी। जिंदगी सिर्फ काटने के लिए नहीं, जीने के लिए होती है।"
बिना किसी और औपचारिक बातचीत के, अपनी परफ्यूम की मादक खुशबू को कमरे की हवा में छोड़ती हुई, रेखा अपने सैंडलों की खनक के साथ आलीशान सागौन के दरवाजे से बाहर निकल गई। भारी दरवाजा एक हल्के से क्लिक के साथ बंद हो गया।

रेखा के जाने के बाद, बड़े से लिविंग रूम में केवल अर्जुन और स्मिता रह गए। कमरे की पीली डिम लाइट्स अभी भी उसी कामुक मिजाज को बनाए हुए थीं। हवा में अभी भी रेखा के महंगे परफ्यूम और रेड वाइन की महक घुली हुई थी।

स्मिता सोफे पर वैसे ही बैठी रही। उसकी हाथीदांत रंग की कॉलरबोन और मैक्सी ड्रेस का ऊपरी हिस्सा उसकी भारी होती सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था। उसने अपनी नजरें फर्श पर टिका दी थीं। वह अपने ही बेटे के सामने देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। रेखा ने जो बातें कही थीं, वे उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रही थीं। 'तुम्हारा बेटा बिस्तर में कितना लाजवाब है...' 'वह जानता है कि एक परिपक्व औरत के शरीर को कहाँ छूना है...' इन वाक्यों ने स्मिता के भीतर एक अजीब सी हलचल मचा दी थी।

अर्जुन सोफे से उठा। उसके चलने की आहट इतनी शांत थी कि स्मिता को तब पता चला जब उसकी परछाई उस पर पड़ी। अर्जुन स्मिता के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया।

उसकी लिनन की शर्ट के खुले बटनों से उसकी गठीली छाती के काले बाल और उसकी मर्दाना बनावट स्मिता की नजरों के ठीक सामने थी। अर्जुन के शरीर से आ रही एक प्राकृतिक, मर्दाना गंध—जिसमें हल्की सी वाइन और पसीने की महक शामिल थी—स्मिता की नाक से होती हुई उसके फेफड़ों में उतर रही थी।

"माँ..." अर्जुन की भारी और गहरी आवाज गूंजी। उसमें एक झिझक थी, एक डर था।

स्मिता ने धीरे से अपना सिर उठाया। अर्जुन की कत्थई आँखें इस समय झुकी हुई थीं। उसमें वह शिकारी जैसा आत्मविश्वास नहीं था जो रेखा के सामने था, बल्कि अपनी माँ के सामने एक बेटे का संकोच था।

"माँ, मुझे माफ कर दो," अर्जुन ने बहुत ही धीमे स्वर में कहा, उसके हाथ उसकी जींस की जेबों में चले गए। "आज यहाँ जो कुछ भी हुआ, जो बातें रेखा ने कहीं... और जिस तरह से मैंने रिएक्ट किया... मुझे नहीं पता था कि रेखा तुम्हारे सामने यह सब इस तरह बोल देगी। अगर मेरी किसी बात से, या मेरे इस रिश्ते से तुम्हें ठेस पहुँची हो, तो प्लीज मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ।"

स्मिता ने अर्जुन को ध्यान से देखा। सामने खड़ा ३२ साल का यह युवक उसका बेटा जरूर था, लेकिन इस समय वह एक परिपक्व, समझदार मर्द की तरह बात कर रहा था। स्मिता के भीतर का गुस्सा और सामाजिक पाखंड पूरी तरह गायब हो चुका था। उसकी जगह एक गहरी, व्यावहारिक समझ ने ले ली थी।

उसने एक लंबी सांस ली और सोफे पर थोड़ी पीछे हटकर बैठी, जिससे उसकी मैक्सी ड्रेस उसकी जांघों पर थोड़ी और कस गई, जो उसकी ५४ साल की उम्र के बावजूद सुडौल थीं।

"बैठो, अर्जुन," स्मिता ने शांत लेकिन गंभीर आवाज में कहा।
अर्जुन थोड़ा ठिठका, फिर वह सामने वाले सोफे पर न बैठकर, स्मिता के ठीक बगल वाले सोफे के कोने पर बैठ गया। दोनों के बीच लगभग दो फीट की दूरी थी, लेकिन उस दूरी के बीच भी एक अदृश्य, सुलगता हुआ तनाव महसूस किया जा सकता था।

"माफी मत मांगो, अर्जुन," स्मिता ने अपनी आवाज को स्थिर रखते हुए कहा, हालांकि उसकी उंगलियां अभी भी अपनी ड्रेस के कपड़े को भींच रही थीं। "तुम ३२ साल के हो, और रेखा ४९ की है। तुम दोनों बालिग हो, समझदार हो। और जो बात रेखा ने कही, वह पूरी तरह गलत नहीं है। जब तुम बेरोजगार थे, परेशान थे, तब मैं एक माँ होकर भी तुम्हारी वैसी मदद नहीं कर पाई जैसी रेखा ने की। उसने तुम्हें एक करियर दिया, एक नई जिंदगी दी।"

स्मिता ने रुककर अर्जुन की आँखों में सीधे देखा। "और जहाँ तक तुम दोनों के इस... इस जिस्मानी रिश्ते की बात है, तो मैं समझ सकती हूँ। तुम एक जवान मर्द हो, तुम्हारी अपनी जरूरतें हैं। और रेखा... वह सालों से अकेली है, उसके पास सब कुछ है पर कोई अपना नहीं। तुम दोनों ने अपनी भूख को शांत करने के लिए एक-दूसरे का सहारा लिया। इसमें तुमने किसी तीसरे का नुकसान नहीं किया। तुमने बहुत ही मैच्योरिटी (perfection) के साथ इस बात को संभाला है।"

अर्जुन ने राहत की एक सांस ली। उसकी आँखों में अपनी माँ के लिए सम्मान और बढ़ गया। "थैंक यू, माँ। मुझे डर था कि तुम मुझसे नफरत करने लगोगी। तुम सचमुच बहुत महान हो।"
"लेकिन..." स्मिता की आवाज थोड़ी सख्त हुई, "एक बात का हमेशा ध्यान रखना, अर्जुन। यह समाज बहुत जालिम है। हमारी और रेखा की एक पारिवारिक साख है, तुम्हारा एक करियर है। तुम दोनों बंद कमरों में जो करते हो, वह तुम्हारी निजी जिंदगी है। लेकिन इस बात का पूरा ख्याल रखना कि घर की चारदीवारी से बाहर किसी को भी, कभी भी इस रिश्ते की भनक न लगे। अगर दुनिया को पता चला, तो सब कुछ तबाह हो जाएगा।"

"मैं समझता हूँ, माँ," अर्जुन ने सिर हिलाते हुए कहा। "रेखा और मैं बहुत सावधान रहते हैं। आज भी उसने सिर्फ तुम्हारे सामने यह बात इसलिए कही क्योंकि वह तुम्हें अपनी सगी बहन मानती है और तुमसे कुछ छुपाना नहीं चाहती थी।"

माहौल अब पूरी तरह से शांत और सुरक्षित हो चुका था। दोनों के बीच का तनाव कम हो गया था, लेकिन वह कामुक चिंगारी, जो रेखा छोड़ कर गई थी, वह अभी भी राख के नीचे दबी हुई थी।
अर्जुन सोफे पर थोड़ा आगे की ओर झुका। उसने अपनी कोहनियाँ अपने घुटनों पर टिका दीं। इस मुद्रा में उसकी शर्ट का कॉलर और खुला, और उसकी मजबूत पीठ की चौड़ाई स्मिता को साफ दिखाई दी।

"हाँ माँ, सच तो यही है," अर्जुन ने एक गहरी सांस लेते हुए, थोड़ा बहकती हुई आवाज में कहा। "हम दोनों को उस वक्त एक-दूसरे की सख्त जरूरत थी। मुझे उनका वह परिपक्व, खूबसूरत शरीर और उनका साथ बहुत पसंद आया... और उन्हें मेरी... मेरी ताकत। लेकिन माँ..."

अर्जुन ने अचानक अपना सिर उठाया और सीधे स्मिता की आँखों में देखा। उसकी आँखों में इस समय वाइन का हल्का सा नशा और एक गहरी, अनजानी सी वासना तैर रही थी। "जरूरतें तो सबकी होती हैं ना? रेखा ने जो कहा... वह गलत नहीं था। माँ, तुम भी तो इतने सालों से अकेली हो। तुम्हारी भी तो अपनी जरूरतें हैं, अपनी शारीरिक और मानसिक भूख है..."

यह वाक्य अर्जुन के मुंह से इतनी सहजता और गहराई से निकला कि पल भर के लिए पूरा कमरा मानो जम गया।

'माँ, तुम्हारी भी तो अपनी जरूरतें हैं...' ये शब्द स्मिता के कानों में किसी गरम लावे की तरह उतरे। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। उसकी जांघें आपस में और कस गईं। अपने ही जवान बेटे के मुंह से अपनी शारीरिक जरूरतों की बात सुनना, एक ऐसा अहसास था जिसने स्मिता को अंदर तक हिलाकर रख दिया। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसके होंठ सिर्फ थरथरा कर रह गए।

जैसे ही शब्दों का भारीपन हवा में गूंजा, अर्जुन को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे लगा कि उसने मर्यादा की एक बहुत बड़ी लाइन पार कर दी है। वह अपनी माँ के सामने इस तरह की बात कैसे कह सकता था?

उसका चेहरा तुरंत लाल हो गया और उसने झटके से अपनी नजरें हटा लीं। "आई... आई एम सॉरी, माँ! प्लीज मुझे माफ कर दो! मेरा वो मतलब नहीं था... पता नहीं मेरी जुबान कैसे फिसल गई। मैं... मैं सचमुच बहुत शर्मिंदा हूँ। मुझे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए थी।" अर्जुन की आवाज में इस समय एक सच्चा पछतावा और घबराहट थी।

स्मिता ने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसने अपने दिल पर हाथ रखा, जो किसी घायल पंछी की तरह तेजी से धड़क रहा था। उसने खुद को संभाला। वह जानती थी कि अगर उसने इस समय इस बात को तूल दिया, तो उनके बीच का यह पवित्र रिश्ता हमेशा के लिए अजीब हो जाएगा।
उसने अपनी आंखें खोलीं और एक फीकी सी मुस्कुराने की कोशिश की। "कोई बात नहीं, अर्जुन। रात बहुत हो गई है, और हम सबने थोड़ी वाइन... और बहुत सी अजीब बातें की हैं। जुबान फिसल जाती है। तुम जाओ, और जाकर सो जाओ।"

अर्जुन सोफे से खड़ा हुआ। वह अभी भी बहुत असहज महसूस कर रहा था। उसने अपनी शर्ट के बटनों को थोड़ा ठीक किया, लेकिन उसकी मर्दाना देह का आकर्षण अभी भी कमरे में बिखरा हुआ था।

"गुड नाइट, माँ," अर्जुन ने दबी आवाज में कहा।

"गुड नाइट, अर्जुन," स्मिता ने जवाब दिया।

अर्जुन भारी कदमों से अपने बेडरूम की तरफ चल दिया। उसके जाने के बाद, स्मिता ने लिविंग रूम की लाइट्स बंद कीं और वह भी अपने बेडरूम में आ गई।

उसने अपने बेडरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। कमरा पूरी तरह से शांत था, केवल खिड़की के बाहर बारिश की हल्की टिप-टिप आ रही थी। स्मिता ने अपनी हाथीदांत रंग की मैक्सी ड्रेस को उतारा और नाईटगाउन पहनने के लिए आईने के सामने खड़ी हो गई।

५४ वर्ष की उम्र में भी, उसका शरीर आईने में बेहद आकर्षक और भरा हुआ दिख रहा था। उसकी कंचन जैसी गोरी त्वचा, उसके भारी और सुडौल स्तन, और उसकी चौड़ी कमर। उसने आईने में खुद को देखते हुए अपने हाथों को धीरे-धीरे अपनी ही गर्दन और कंधों पर फेरा। उसके कानों में अभी भी अर्जुन की वो आवाज गूंज रही थी—'माँ, तुम्हारी भी तो अपनी जरूरतें हैं...'

उसने एक ठंडी सांस ली, अपना नाईटगाउन पहना और बिस्तर पर लेट गई। लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।

ठीक बगल वाले कमरे में, अर्जुन भी अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसने अपनी शर्ट उतार दी थी और वह सिर्फ शॉर्ट्स में था। उसका गठीला, कसरती बदन बिस्तर की चादर पर फैला हुआ था। वह छत को घूर रहा था। उसके दिमाग में बार-बार अपनी माँ का वो चेहरा आ रहा था जब उसने कहा था—'तुम्हारी भी तो जरूरतें हैं।' उसने याद किया कि कैसे उसकी माँ की मैक्सी ड्रेस उनके भरे हुए जिस्म पर कसी हुई थी। अर्जुन ने करवट बदली, उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने महसूस किया कि जाने-अनजाने, मर्यादा की दीवार में एक बहुत महीन दरार आ चुकी थी।

दोनों माँ-बेटे अपने-अपने बिस्तरों में, एक ही घर की दो दीवारों के पीछे, एक अनकही, सुलगती हुई उत्तेजना और झिझक के साए में जाग रहे थे, और बाहर सावन की रात और गहरी होती जा रही थी।
बहुत ही खुबसुरत लाजवाब और शानदार मदमस्त अपडेट है भाई मजा आ गया
 
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