- 43
- 362
- 69
रेखा, स्मिता और उसका बेटा : एक अनकहा रिश्ता
बाहर सावन की अंधेरी रात अपनी पूरी रफ्तार पर थी। मुंबई की गगनचुंबी इमारतों के शीशों से टकराकर बारिश की बूंदें नीचे फिसल रही थीं। ठीक उसी तरह, जैसे ५४ वर्ष की स्मिता के मन में अनगिनत अनुत्तरित सवाल तैर रहे थे। वह अपने आलीशान पेंटहाउस के लिविंग रूम की कांच की विशाल खिड़की के पास खड़ी थी।
स्मिता का शरीर इस उम्र में भी एक खास ढलान और गरिमा लिए हुए था। उसने हाथीदांत (ivory) के रंग की एक ढीली, कॉटन-सिल्क की मैक्सी ड्रेस पहनी हुई थी, जो उसके भरे हुए नितंबों और भारी स्तनों के उभार को छुपाने की असफल कोशिश कर रही थी। उसकी त्वचा पर उम्र की हल्की महीन रेखाएं थीं, लेकिन उसका रंग साफ था और उसकी देह से सालों पुरानी एक शांत, मातृत्व और परिपक्व खुशबू आती थी। उसने अपने बालों को पीछे एक ढीले जूड़े में बांध रखा था, जिससे उसकी गर्दन का पिछला हिस्सा खुला था, जहाँ बारिश की ठंडी हवा के झोंकों से रह-रहकर सिहरन पैदा हो रही थी।
उसके पीछे, सोफे पर उसका ३२ वर्षीय बेटा अर्जुन बैठा था। अर्जुन का शरीर किसी यूनानी मूर्तिकार की तराशी हुई कलाकृति जैसा था। ६ फीट १ इंच लंबा, चौड़े और मजबूत कंधे, और जिम में कसरत करके कमाई गई गठीली छाती। उसने गहरे चारकोल ग्रे रंग की एक लिनन शर्ट पहनी थी, जिसके ऊपर के तीन बटन खुले हुए थे। जब वह सांस लेता, तो उसकी छाती के घने, काले बाल और उसकी कॉलरबोन की मजबूत बनावट साफ दिखाई देती थी। उसकी शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं, जिससे उसकी कलाई और अग्रबाहु (forearms) की उभरी हुई नसें उसकी मर्दानगी को और उभार रही थीं। वह अपनी माँ की बेचैनी को देख रहा था, और उसकी गहरी, कत्थई आँखों में एक अजीब सा सुकून और ठहराव था—एक ऐसा ठहराव जो किसी गहरे रहस्य के पीछे छुपा होता है।
"माँ, तुम थक गई हो। बैठ जाओ न," अर्जुन की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई गूंजी। उसकी आवाज भारी, गहरी और मर्दाना थी, जिसमें एक अजीब सी खनक थी।
स्मिता ने मुड़कर अपने बेटे को देखा। वह हैरान थी कि पिछले छह महीनों में अर्जुन कितना बदल गया था। कहाँ वह एक हताश, नौकरी के लिए परेशान रहने वाला लड़का था, और कहाँ आज वह आत्मविश्वास से लबरेज, एक नामी कॉर्पोरेट फर्म का ऊंचे पद पर आसीन अधिकारी था। उसकी पूरी बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी थी। उसमें एक अजीब सा सम्मोहन था।
ठीक उसी वक्त, दरवाजे की डोरबेल बजी।
अर्जुन सोफे से उठा। जब वह चला, तो उसके चलने के अंदाज में एक शिकारी जैसी सहजता थी। उसने जाकर भारी सागौन के दरवाजे को खोला।
दरवाजे पर जो शख्सियत खड़ी थी, उसने कमरे के भीतर के तापमान को पल भर में कई डिग्री बढ़ा दिया। वह रेखा थी—स्मिता की ४९ वर्षीय छोटी बहन और शहर की सबसे अमीर, कामयाब बिजनेसवुमन्स में से एक।
रेखा को देखकर कोई भी उसकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता था। वह किसी २८-३० साल की परिपक्व और बेहद कामुक अप्सरा जैसी दिख रही थी। उसका कद ५ फीट ७ इंच था और उसका शरीर 'अवरग्लास' (hourglass) शेप का था—यानी पतली, लचीली कमर और भारी, सुडौल कूल्हे। उसने गहरे, आधी रात के नीले रंग (midnight blue) की एक शुद्ध शिफॉन की साड़ी पहनी थी। वह साड़ी इतनी महीन और पारदर्शी थी कि रेखा के पेट की गोरी त्वचा, उसकी गहरी नाभि और कमर की सुगठित गोलाई साफ झलक रही थी।
साड़ी के साथ उसने उसी नीले रंग का स्लीवलेस, बैकलेस ब्रोकेड ब्लाउज पहना था, जो उसकी पीठ को लगभग पूरा खुला छोड़ रहा था। उसकी पीठ की मखमली, कंचन जैसी गोरी त्वचा पर लाइट की पीली रोशनी इस तरह चमक रही थी जैसे सोने पर पानी चढ़ाया गया हो। उसके घने, काले और रेशमी बाल एक तरफ कंधे पर बिखरे थे, जो उसके उन्नत स्तनों के उभार को आंशिक रूप से ढक रहे थे। उसकी आंखों में गहरा काजल, होठों पर वाइन रंग की गीली लिपस्टिक और कानों में हीरे के छोटे-छोटे बुंदे चमक रहे थे। उसकी देह से 'चैनल' के महंगे परफ्यूम की एक मदहोश करने वाली, कस्तूरी जैसी कामुक खुशबू आ रही थी, जो पल भर में पूरे कमरे के कोने-कोने में फैल गई।
"अरे वाह, अर्जुन! तुम तो आज बेहद शानदार लग रहे हो," रेखा ने अंदर कदम रखते ही अपनी मखमली, खनकती हुई आवाज में कहा।
उसने अर्जुन के करीब आकर अपनी दोनों गोरी, सुडौल बाहें उसकी गर्दन के चारों ओर डाल दीं और उसे गले लगा लिया। स्मिता ने खिड़की के पास खड़े होकर इस दृश्य को देखा। रेखा के भारी, रेशमी स्तन अर्जुन की मजबूत छाती से पूरी तरह भींच गए। अर्जुन ने भी बिना किसी झिझक के रेखा की पतली, लचीली कमर पर अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथ टिका दिए। अर्जुन की उंगलियां रेखा की साड़ी के महीन कपड़े को भेदकर उसकी नंगी पीठ की त्वचा को छू रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे को कुछ पलों के लिए इतनी शिद्दत से भींचा कि उनके बीच की हवा भी गायब हो गई। जब वे अलग हुए, तो रेखा ने अपनी लंबी, लाल रंग की नेलपेंट लगी उंगलियों से अर्जुन के गाल को हल्के से सहलाया। उसकी नजरों में एक प्यास थी, एक अधिकार था।
"मासी... आप भी हमेशा की तरह कयामत ढा रही हैं," अर्जुन ने सीधे रेखा की आंखों में देखते हुए, बेहद धीमी और मदहोश आवाज में कहा। उसके मुंह से 'मासी' शब्द निकला जरूर था, लेकिन उसके लहजे में कोई सम्मान नहीं, बल्कि एक अजीब सा रोमांस और वासना की चाशनी घुली थी।
स्मिता आगे बढ़ी। "आओ रेखा। बैठो।" उसकी आवाज में एक अजीब सी भारीपन था।
तीनों लिविंग रूम के बड़े, मखमली एल-शेप सोफे पर बैठ गए। रेखा सोफे के बीचों-बीच बैठी। उसने अपने पैरों पर पैर चढ़ाए (crossed legs), जिससे उसकी साड़ी घुटने से थोड़ी ऊपर खिसक गई और उसकी चिकनी, गोरी पिंडलियाँ साफ दिखाई देने लगीं। अर्जुन ने तुरंत जाकर बार काउंटर से क्रिस्टल के ग्लासों में रेड वाइन डाली। वह वापस आया और रेखा के ठीक बगल में बैठ गया—इतने करीब कि उन दोनों की जांघें एक-दूसरे से पूरी तरह सट गईं।
अर्जुन ने वाइन का ग्लास रेखा की तरफ बढ़ाया। रेखा ने ग्लास थामते हुए अपनी उंगलियों को जानबूझकर अर्जुन की उंगलियों से रगड़ा। दोनों की नजरें मिलीं और एक मूक सहमति सी हवा में तैर गई।
स्मिता ने सिर्फ सादा पानी लिया था। वह उन दोनों के ठीक सामने वाले सिंगल सोफे पर बैठी थी। उसकी अनुभवी आँखें दोनों के बीच के इस मूक लेकिन बेहद गहरे शारीरिक खिंचाव को भांप रही थीं। कमरे में केवल बारिश की आवाज और वाइन के ग्लासों की खनक थी।
"स्मिता... तुम इतनी चुप क्यों हो? और इस तरह घूर क्यों रही हो?" रेखा ने वाइन की एक छोटी सी चुस्की लेते हुए अपने लाल होठों को जीभ से चाटा। यह हरकत इतनी कामुक थी कि अर्जुन की नजरें सीधे रेखा के होठों पर टिक गईं।
स्मिता ने पानी का ग्लास टेबल पर रखा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा कसा। "रेखा... अर्जुन... मैं बेवकूफ नहीं हूँ। मैं देख रही हूँ कि पिछले कुछ महीनों में क्या बदला है। अर्जुन का अचानक बेरोजगार से एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट बन जाना, उसकी महंगी लाइफस्टाइल, और तुम दोनों के बीच का ये... ये अंदाज। यह कोई मौसी और भांजे का रिश्ता नहीं है। मुझे साफ-साफ सच जानना है। आज रात।"
अर्जुन ने थोड़ा असहज होकर अपनी शर्ट के कॉलर को छुआ, उसकी चौड़ी छाती पर पसीने की एक छोटी सी बूंद चमकी। लेकिन रेखा बिल्कुल शांत थी। वह हल्के से मुस्कुराई, जिससे उसके गालों पर छोटे से डिंपल उभरे।
"स्मिता, तुम हमेशा से बहुत समझदार रही हो," रेखा ने अपनी पीठ को सोफे से टिकाते हुए कहा, जिससे उसके स्तन और ऊपर की ओर तन गए। "तो सुनो। कोई सस्पेंस नहीं रखते। मैं और अर्जुन... हम दोनों पिछले आठ महीनों से एक-दूसरे के साथ एक बेहद गहरे, सीक्रेट इंटीमेट रिलेशनशिप में हैं। सीधे शब्दों में कहूं, तो हम एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं।"
यह सुनते ही जैसे कमरे की सारी हवा गायब हो गई। स्मिता की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका दिल जोर से धड़का। "रेखा! तुम होश में तो हो? तुम इसकी मौसी हो! तुम्हारी उम्र ४९ साल है और यह अभी सिर्फ ३२ का है! यह... यह पाप है, पागलपन है!"
"माँ, प्लीज शांत हो जाओ," अर्जुन ने इस बार आगे बढ़कर अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया। उसके हाथ गर्म और बेहद मजबूत थे। "रेखा ने मेरा इस्तेमाल नहीं किया, न ही मैंने उनका। जब मैं जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था, डिप्रेशन में था, तब रेखा ने मुझे सहारा दिया। उन्होंने मुझे अपनी कंपनी के नेटवर्क के जरिए यह जॉब दिलाई। लेकिन उससे भी बढ़कर... उन्होंने मुझे एक मर्द होने का अहसास कराया।"
रेखा ने अपनी वाइन का ग्लास नीचे रखा। वह सोफे पर सरककर अर्जुन के और करीब आ गई। उसने अर्जुन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया, जिससे उसके खुले बाल अर्जुन की शर्ट की खुली छाती पर बिखर गए।
"स्मिता, मेरी बात ठंडे दिमाग से समझो," रेखा की आवाज अब और गहरी, रेशमी और सम्मोहक हो गई थी। "हम दोनों में से कोई भी इस रिश्ते को लेकर उस पारंपरिक तरीके से 'सीरियस' नहीं है। हम कोई शादी नहीं करने जा रहे, न ही समाज को कोई चुनौती दे रहे हैं। यह विशुद्ध रूप से... हमारी शारीरिक और मानसिक भूख का मामला है। एक ऐसी भूख, जो हम दोनों के अंदर सालों से दबी थी।"
रेखा ने स्मिता की तरफ देखा, उसकी आंखों में कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी। "मेरे पास पैसा है, शोहरत है, लेकिन मेरी रातें सूनी थीं। मुझे एक ऐसे जवान, मजबूत और जोशीले मर्द की जरूरत थी जो मुझे एक औरत होने का अहसास करा सके, जो मेरी देह की प्यास को बुझा सके। और अर्जुन... उसे एक ऐसी परिपक्व, खूबसूरत औरत की जरूरत थी जो उसकी मर्दानगी को सराहे, उसे गाइड करे और उसे आत्मविश्वास दे। हम दोनों एक-दूसरे की जरूरत को पूरा करते हैं। जब हम साथ होते हैं, तो हम दुनिया के सारे बंधन भूलकर सिर्फ एक नर और मादा बन जाते हैं। और देखो, इसका नतीजा कितना खूबसूरत है। अर्जुन का करियर सेट है, और मेरी जिंदगी में एक नई रौनक है।"
स्मिता ने अपने बेटे को देखा। अर्जुन की आंखों में अपनी माँ के लिए कोई डर नहीं था, बल्कि एक सच्चाई थी। स्मिता का गुस्सा, जो एक सामाजिक डर से उपजा था, रेखा की इन व्यावहारिक और बेहद ईमानदार बातों को सुनकर धीरे-धीरे पिघलने लगा। उसका दिल शांत होने लगा, लेकिन उसके भीतर एक नई, अनजानी सी बेचैनी शुरू हो गई थी।
कमरे का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। सामाजिक पाबंदियों का डर गायब हो चुका था और उसकी जगह एक शुद्ध, नग्न और कामुक बेबाकी ने ले ली थी।
रेखा सोफे से उठी। जब वह चली, तो उसकी साड़ी की सरसराहट और उसकी पायल की छनक ने कमरे में एक अजीब सी उत्तेजना भर दी। वह चलकर अर्जुन के ठीक सामने खड़ी हो गई। उसने अर्जुन के दोनों कंधों पर अपने हाथ रखे और उसे नीचे बैठे-बैठे ही अपनी तरफ खींचा।
"स्मिता, तुम्हें गर्व होना चाहिए कि तुमने एक बेहद शानदार मर्द को जन्म दिया है," रेखा ने सीधे अपनी बड़ी बहन की आंखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज में अब एक गहरी वासना और कामुकता घुली हुई थी। "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम्हारा बेटा बिस्तर में कितना लाजवाब है।"
"रेखा...!" अर्जुन ने हल्के से शरमाते हुए रेखा की पतली कमर को अपने दोनों हाथों में भींच लिया। उसने रेखा को अपने करीब खींचा, जिससे रेखा के सुडौल नितंब अर्जुन की जांघों से टकराए।
"नहीं अर्जुन, आज सब सच सामने आने दो," रेखा ने अर्जुन के बालों में अपनी उंगलियां फंसाते हुए कहा। "स्मिता, अर्जुन के पास वो ताकत है जो किसी भी औरत को पागल कर दे। लेकिन सबसे खास बात है उसका सब्र (patience)। वह उन नौसिखिए लड़कों जैसा नहीं है जो सिर्फ अपनी भूख मिटाना जानते हैं। वह एक परिपक्व औरत के शरीर के भूगोल को समझता है। वह जानता है कि मेरी त्वचा के किस हिस्से को कब, कहाँ और कितनी शिद्दत से छूना है।"
रेखा की आँखें आधी बंद हो गईं, जैसे वह उस अहसास को दोबारा जी रही हो। "जब वह अपने इन बड़े, मजबूत हाथों से मेरी इस रेशमी पीठ को सहलाता है, तो मेरे शरीर के रोम-रोम खड़े हो जाते हैं। उसके होंठ... ओह, उसके होठों में एक अजीब सी तपिश है। जब वह मेरी गर्दन के पीछे, मेरे कानों के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए मुझे चूमता है, तो मैं पूरी तरह पिघल जाती हूँ। उसकी लव-मेकिंग इतनी गहरी, इतनी लंबी और इतनी मदहोश करने वाली होती है कि मैं चीख उठती हूँ। वह मुझे मेरी उम्र भूलने पर मजबूर कर देता है।"
स्मिता यह सब सुन रही थी। उसकी सांसें भारी हो गई थीं। उसकी हाथीदांत रंग की मैक्सी ड्रेस के नीचे उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। सालों से, जबसे उसके पति का साथ छूटा था, उसने किसी मर्द का स्पर्श महसूस नहीं किया था। अपनी सगी बहन के मुंह से, अपने ही जवान और गठीले बेटे की मर्दानगी का ऐसा जीवंत और कामुक वर्णन सुनकर स्मिता के शरीर के भीतर भी एक सोई हुई ज्वालामुखी करवट लेने लगी थी। उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
रेखा ने स्मिता की इस हालत को भांप लिया। वह अर्जुन की बांहों से निकलकर धीरे-धीरे चलकर स्मिता के पास आई। वह स्मिता के सोफे के पास नीचे कालीन पर बैठ गई और उसने स्मिता के दोनों ठंडे पड़ रहे हाथों को अपने गर्म, मखमली हाथों में ले लिया।
"स्मिता... खुद को देखो," रेखा ने बेहद धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। "५४ की उम्र में भी तुम्हारी ये देह कितनी भरी हुई और रसीली है। तुमने खुद को इस सूनेपन की कोठरी में क्यों बंद कर रखा है? क्या समाज की झूठी दुहाई तुम्हारी इस शारीरिक और मानसिक भूख को शांत कर सकती है? इस उम्र में औरत को एक मजबूत आलिंगन की, एक गर्म स्पर्श की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।"
स्मिता ने कांपते हुए होठों से कहा, "रेखा... मैं... मैं अब इस उम्र में कहाँ जाऊं? कौन है जो मुझे इस तरह समझेगा?"
रेखा के होठों पर एक बेहद शातिर, कामुक और गहरी मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में चमक थी। उसने सिर उठाकर पीछे सोफे पर बैठे अर्जुन की तरफ देखा।
अर्जुन अब सोफे पर पूरी तरह फैलकर बैठा था। उसकी शर्ट के बटन और खुल चुके थे, उसकी गठीली छाती और पेट के सिक्स-पैक एब्स का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था। उसकी आँखें अपनी माँ स्मिता के उभरे हुए सीने और उसकी थिरकती हुई काया पर टिकी थीं। उसकी नजरों में एक गहरा सम्मान, एक असीम चाहत और एक खुला आमंत्रण था।
रेखा ने स्मिता के कान के बिल्कुल करीब अपना मुंह लाया। उसकी गर्म सांसें स्मिता के कान की लौ को छू रही थीं। "तुम्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है, दीदी... जो हुनर, जो ताकत और जो राहत मुझे मिलती है, वो तुम्हारे बहुत करीब है। अर्जुन तुम्हारा बेटा जरूर है, लेकिन वह एक मुकम्मल मर्द है। वह जानता है कि अपनी माँ जैसी खूबसूरत, परिपक्व और आदरणीय औरत का सम्मान कैसे करना है और उसकी रातों के इस सूनेपन को अपनी बांहों में कैसे समेटना है। सुख पर, तृप्ति पर हम दोनों का बराबर हक है..."
लिविंग रूम में एक भारी, दमघोंटू लेकिन बेहद कामुक खामोशी छा गई। केवल बाहर की बारिश की सनसनाहट थी। स्मिता ने धीरे से अपनी पलकें उठाईं और सीधे अर्जुन की आँखों में देखा। अर्जुन ने अपनी जगह से ही अपनी माँ को देखकर एक गहरी, मदहोश मुस्कान दी। स्मिता का दिल किसी पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा था, और उसकी देह ने सदियों बाद एक मीठी, सुलगती हुई तपन को महसूस किया था।
बाहर सावन की अंधेरी रात अपनी पूरी रफ्तार पर थी। मुंबई की गगनचुंबी इमारतों के शीशों से टकराकर बारिश की बूंदें नीचे फिसल रही थीं। ठीक उसी तरह, जैसे ५४ वर्ष की स्मिता के मन में अनगिनत अनुत्तरित सवाल तैर रहे थे। वह अपने आलीशान पेंटहाउस के लिविंग रूम की कांच की विशाल खिड़की के पास खड़ी थी।
स्मिता का शरीर इस उम्र में भी एक खास ढलान और गरिमा लिए हुए था। उसने हाथीदांत (ivory) के रंग की एक ढीली, कॉटन-सिल्क की मैक्सी ड्रेस पहनी हुई थी, जो उसके भरे हुए नितंबों और भारी स्तनों के उभार को छुपाने की असफल कोशिश कर रही थी। उसकी त्वचा पर उम्र की हल्की महीन रेखाएं थीं, लेकिन उसका रंग साफ था और उसकी देह से सालों पुरानी एक शांत, मातृत्व और परिपक्व खुशबू आती थी। उसने अपने बालों को पीछे एक ढीले जूड़े में बांध रखा था, जिससे उसकी गर्दन का पिछला हिस्सा खुला था, जहाँ बारिश की ठंडी हवा के झोंकों से रह-रहकर सिहरन पैदा हो रही थी।
उसके पीछे, सोफे पर उसका ३२ वर्षीय बेटा अर्जुन बैठा था। अर्जुन का शरीर किसी यूनानी मूर्तिकार की तराशी हुई कलाकृति जैसा था। ६ फीट १ इंच लंबा, चौड़े और मजबूत कंधे, और जिम में कसरत करके कमाई गई गठीली छाती। उसने गहरे चारकोल ग्रे रंग की एक लिनन शर्ट पहनी थी, जिसके ऊपर के तीन बटन खुले हुए थे। जब वह सांस लेता, तो उसकी छाती के घने, काले बाल और उसकी कॉलरबोन की मजबूत बनावट साफ दिखाई देती थी। उसकी शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं, जिससे उसकी कलाई और अग्रबाहु (forearms) की उभरी हुई नसें उसकी मर्दानगी को और उभार रही थीं। वह अपनी माँ की बेचैनी को देख रहा था, और उसकी गहरी, कत्थई आँखों में एक अजीब सा सुकून और ठहराव था—एक ऐसा ठहराव जो किसी गहरे रहस्य के पीछे छुपा होता है।
"माँ, तुम थक गई हो। बैठ जाओ न," अर्जुन की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई गूंजी। उसकी आवाज भारी, गहरी और मर्दाना थी, जिसमें एक अजीब सी खनक थी।
स्मिता ने मुड़कर अपने बेटे को देखा। वह हैरान थी कि पिछले छह महीनों में अर्जुन कितना बदल गया था। कहाँ वह एक हताश, नौकरी के लिए परेशान रहने वाला लड़का था, और कहाँ आज वह आत्मविश्वास से लबरेज, एक नामी कॉर्पोरेट फर्म का ऊंचे पद पर आसीन अधिकारी था। उसकी पूरी बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी थी। उसमें एक अजीब सा सम्मोहन था।
ठीक उसी वक्त, दरवाजे की डोरबेल बजी।
अर्जुन सोफे से उठा। जब वह चला, तो उसके चलने के अंदाज में एक शिकारी जैसी सहजता थी। उसने जाकर भारी सागौन के दरवाजे को खोला।
दरवाजे पर जो शख्सियत खड़ी थी, उसने कमरे के भीतर के तापमान को पल भर में कई डिग्री बढ़ा दिया। वह रेखा थी—स्मिता की ४९ वर्षीय छोटी बहन और शहर की सबसे अमीर, कामयाब बिजनेसवुमन्स में से एक।
रेखा को देखकर कोई भी उसकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता था। वह किसी २८-३० साल की परिपक्व और बेहद कामुक अप्सरा जैसी दिख रही थी। उसका कद ५ फीट ७ इंच था और उसका शरीर 'अवरग्लास' (hourglass) शेप का था—यानी पतली, लचीली कमर और भारी, सुडौल कूल्हे। उसने गहरे, आधी रात के नीले रंग (midnight blue) की एक शुद्ध शिफॉन की साड़ी पहनी थी। वह साड़ी इतनी महीन और पारदर्शी थी कि रेखा के पेट की गोरी त्वचा, उसकी गहरी नाभि और कमर की सुगठित गोलाई साफ झलक रही थी।
साड़ी के साथ उसने उसी नीले रंग का स्लीवलेस, बैकलेस ब्रोकेड ब्लाउज पहना था, जो उसकी पीठ को लगभग पूरा खुला छोड़ रहा था। उसकी पीठ की मखमली, कंचन जैसी गोरी त्वचा पर लाइट की पीली रोशनी इस तरह चमक रही थी जैसे सोने पर पानी चढ़ाया गया हो। उसके घने, काले और रेशमी बाल एक तरफ कंधे पर बिखरे थे, जो उसके उन्नत स्तनों के उभार को आंशिक रूप से ढक रहे थे। उसकी आंखों में गहरा काजल, होठों पर वाइन रंग की गीली लिपस्टिक और कानों में हीरे के छोटे-छोटे बुंदे चमक रहे थे। उसकी देह से 'चैनल' के महंगे परफ्यूम की एक मदहोश करने वाली, कस्तूरी जैसी कामुक खुशबू आ रही थी, जो पल भर में पूरे कमरे के कोने-कोने में फैल गई।
"अरे वाह, अर्जुन! तुम तो आज बेहद शानदार लग रहे हो," रेखा ने अंदर कदम रखते ही अपनी मखमली, खनकती हुई आवाज में कहा।
उसने अर्जुन के करीब आकर अपनी दोनों गोरी, सुडौल बाहें उसकी गर्दन के चारों ओर डाल दीं और उसे गले लगा लिया। स्मिता ने खिड़की के पास खड़े होकर इस दृश्य को देखा। रेखा के भारी, रेशमी स्तन अर्जुन की मजबूत छाती से पूरी तरह भींच गए। अर्जुन ने भी बिना किसी झिझक के रेखा की पतली, लचीली कमर पर अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथ टिका दिए। अर्जुन की उंगलियां रेखा की साड़ी के महीन कपड़े को भेदकर उसकी नंगी पीठ की त्वचा को छू रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे को कुछ पलों के लिए इतनी शिद्दत से भींचा कि उनके बीच की हवा भी गायब हो गई। जब वे अलग हुए, तो रेखा ने अपनी लंबी, लाल रंग की नेलपेंट लगी उंगलियों से अर्जुन के गाल को हल्के से सहलाया। उसकी नजरों में एक प्यास थी, एक अधिकार था।
"मासी... आप भी हमेशा की तरह कयामत ढा रही हैं," अर्जुन ने सीधे रेखा की आंखों में देखते हुए, बेहद धीमी और मदहोश आवाज में कहा। उसके मुंह से 'मासी' शब्द निकला जरूर था, लेकिन उसके लहजे में कोई सम्मान नहीं, बल्कि एक अजीब सा रोमांस और वासना की चाशनी घुली थी।
स्मिता आगे बढ़ी। "आओ रेखा। बैठो।" उसकी आवाज में एक अजीब सी भारीपन था।
तीनों लिविंग रूम के बड़े, मखमली एल-शेप सोफे पर बैठ गए। रेखा सोफे के बीचों-बीच बैठी। उसने अपने पैरों पर पैर चढ़ाए (crossed legs), जिससे उसकी साड़ी घुटने से थोड़ी ऊपर खिसक गई और उसकी चिकनी, गोरी पिंडलियाँ साफ दिखाई देने लगीं। अर्जुन ने तुरंत जाकर बार काउंटर से क्रिस्टल के ग्लासों में रेड वाइन डाली। वह वापस आया और रेखा के ठीक बगल में बैठ गया—इतने करीब कि उन दोनों की जांघें एक-दूसरे से पूरी तरह सट गईं।
अर्जुन ने वाइन का ग्लास रेखा की तरफ बढ़ाया। रेखा ने ग्लास थामते हुए अपनी उंगलियों को जानबूझकर अर्जुन की उंगलियों से रगड़ा। दोनों की नजरें मिलीं और एक मूक सहमति सी हवा में तैर गई।
स्मिता ने सिर्फ सादा पानी लिया था। वह उन दोनों के ठीक सामने वाले सिंगल सोफे पर बैठी थी। उसकी अनुभवी आँखें दोनों के बीच के इस मूक लेकिन बेहद गहरे शारीरिक खिंचाव को भांप रही थीं। कमरे में केवल बारिश की आवाज और वाइन के ग्लासों की खनक थी।
"स्मिता... तुम इतनी चुप क्यों हो? और इस तरह घूर क्यों रही हो?" रेखा ने वाइन की एक छोटी सी चुस्की लेते हुए अपने लाल होठों को जीभ से चाटा। यह हरकत इतनी कामुक थी कि अर्जुन की नजरें सीधे रेखा के होठों पर टिक गईं।
स्मिता ने पानी का ग्लास टेबल पर रखा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा कसा। "रेखा... अर्जुन... मैं बेवकूफ नहीं हूँ। मैं देख रही हूँ कि पिछले कुछ महीनों में क्या बदला है। अर्जुन का अचानक बेरोजगार से एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट बन जाना, उसकी महंगी लाइफस्टाइल, और तुम दोनों के बीच का ये... ये अंदाज। यह कोई मौसी और भांजे का रिश्ता नहीं है। मुझे साफ-साफ सच जानना है। आज रात।"
अर्जुन ने थोड़ा असहज होकर अपनी शर्ट के कॉलर को छुआ, उसकी चौड़ी छाती पर पसीने की एक छोटी सी बूंद चमकी। लेकिन रेखा बिल्कुल शांत थी। वह हल्के से मुस्कुराई, जिससे उसके गालों पर छोटे से डिंपल उभरे।
"स्मिता, तुम हमेशा से बहुत समझदार रही हो," रेखा ने अपनी पीठ को सोफे से टिकाते हुए कहा, जिससे उसके स्तन और ऊपर की ओर तन गए। "तो सुनो। कोई सस्पेंस नहीं रखते। मैं और अर्जुन... हम दोनों पिछले आठ महीनों से एक-दूसरे के साथ एक बेहद गहरे, सीक्रेट इंटीमेट रिलेशनशिप में हैं। सीधे शब्दों में कहूं, तो हम एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं।"
यह सुनते ही जैसे कमरे की सारी हवा गायब हो गई। स्मिता की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका दिल जोर से धड़का। "रेखा! तुम होश में तो हो? तुम इसकी मौसी हो! तुम्हारी उम्र ४९ साल है और यह अभी सिर्फ ३२ का है! यह... यह पाप है, पागलपन है!"
"माँ, प्लीज शांत हो जाओ," अर्जुन ने इस बार आगे बढ़कर अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया। उसके हाथ गर्म और बेहद मजबूत थे। "रेखा ने मेरा इस्तेमाल नहीं किया, न ही मैंने उनका। जब मैं जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था, डिप्रेशन में था, तब रेखा ने मुझे सहारा दिया। उन्होंने मुझे अपनी कंपनी के नेटवर्क के जरिए यह जॉब दिलाई। लेकिन उससे भी बढ़कर... उन्होंने मुझे एक मर्द होने का अहसास कराया।"
रेखा ने अपनी वाइन का ग्लास नीचे रखा। वह सोफे पर सरककर अर्जुन के और करीब आ गई। उसने अर्जुन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया, जिससे उसके खुले बाल अर्जुन की शर्ट की खुली छाती पर बिखर गए।
"स्मिता, मेरी बात ठंडे दिमाग से समझो," रेखा की आवाज अब और गहरी, रेशमी और सम्मोहक हो गई थी। "हम दोनों में से कोई भी इस रिश्ते को लेकर उस पारंपरिक तरीके से 'सीरियस' नहीं है। हम कोई शादी नहीं करने जा रहे, न ही समाज को कोई चुनौती दे रहे हैं। यह विशुद्ध रूप से... हमारी शारीरिक और मानसिक भूख का मामला है। एक ऐसी भूख, जो हम दोनों के अंदर सालों से दबी थी।"
रेखा ने स्मिता की तरफ देखा, उसकी आंखों में कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी। "मेरे पास पैसा है, शोहरत है, लेकिन मेरी रातें सूनी थीं। मुझे एक ऐसे जवान, मजबूत और जोशीले मर्द की जरूरत थी जो मुझे एक औरत होने का अहसास करा सके, जो मेरी देह की प्यास को बुझा सके। और अर्जुन... उसे एक ऐसी परिपक्व, खूबसूरत औरत की जरूरत थी जो उसकी मर्दानगी को सराहे, उसे गाइड करे और उसे आत्मविश्वास दे। हम दोनों एक-दूसरे की जरूरत को पूरा करते हैं। जब हम साथ होते हैं, तो हम दुनिया के सारे बंधन भूलकर सिर्फ एक नर और मादा बन जाते हैं। और देखो, इसका नतीजा कितना खूबसूरत है। अर्जुन का करियर सेट है, और मेरी जिंदगी में एक नई रौनक है।"
स्मिता ने अपने बेटे को देखा। अर्जुन की आंखों में अपनी माँ के लिए कोई डर नहीं था, बल्कि एक सच्चाई थी। स्मिता का गुस्सा, जो एक सामाजिक डर से उपजा था, रेखा की इन व्यावहारिक और बेहद ईमानदार बातों को सुनकर धीरे-धीरे पिघलने लगा। उसका दिल शांत होने लगा, लेकिन उसके भीतर एक नई, अनजानी सी बेचैनी शुरू हो गई थी।
कमरे का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। सामाजिक पाबंदियों का डर गायब हो चुका था और उसकी जगह एक शुद्ध, नग्न और कामुक बेबाकी ने ले ली थी।
रेखा सोफे से उठी। जब वह चली, तो उसकी साड़ी की सरसराहट और उसकी पायल की छनक ने कमरे में एक अजीब सी उत्तेजना भर दी। वह चलकर अर्जुन के ठीक सामने खड़ी हो गई। उसने अर्जुन के दोनों कंधों पर अपने हाथ रखे और उसे नीचे बैठे-बैठे ही अपनी तरफ खींचा।
"स्मिता, तुम्हें गर्व होना चाहिए कि तुमने एक बेहद शानदार मर्द को जन्म दिया है," रेखा ने सीधे अपनी बड़ी बहन की आंखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज में अब एक गहरी वासना और कामुकता घुली हुई थी। "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम्हारा बेटा बिस्तर में कितना लाजवाब है।"
"रेखा...!" अर्जुन ने हल्के से शरमाते हुए रेखा की पतली कमर को अपने दोनों हाथों में भींच लिया। उसने रेखा को अपने करीब खींचा, जिससे रेखा के सुडौल नितंब अर्जुन की जांघों से टकराए।
"नहीं अर्जुन, आज सब सच सामने आने दो," रेखा ने अर्जुन के बालों में अपनी उंगलियां फंसाते हुए कहा। "स्मिता, अर्जुन के पास वो ताकत है जो किसी भी औरत को पागल कर दे। लेकिन सबसे खास बात है उसका सब्र (patience)। वह उन नौसिखिए लड़कों जैसा नहीं है जो सिर्फ अपनी भूख मिटाना जानते हैं। वह एक परिपक्व औरत के शरीर के भूगोल को समझता है। वह जानता है कि मेरी त्वचा के किस हिस्से को कब, कहाँ और कितनी शिद्दत से छूना है।"
रेखा की आँखें आधी बंद हो गईं, जैसे वह उस अहसास को दोबारा जी रही हो। "जब वह अपने इन बड़े, मजबूत हाथों से मेरी इस रेशमी पीठ को सहलाता है, तो मेरे शरीर के रोम-रोम खड़े हो जाते हैं। उसके होंठ... ओह, उसके होठों में एक अजीब सी तपिश है। जब वह मेरी गर्दन के पीछे, मेरे कानों के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए मुझे चूमता है, तो मैं पूरी तरह पिघल जाती हूँ। उसकी लव-मेकिंग इतनी गहरी, इतनी लंबी और इतनी मदहोश करने वाली होती है कि मैं चीख उठती हूँ। वह मुझे मेरी उम्र भूलने पर मजबूर कर देता है।"
स्मिता यह सब सुन रही थी। उसकी सांसें भारी हो गई थीं। उसकी हाथीदांत रंग की मैक्सी ड्रेस के नीचे उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। सालों से, जबसे उसके पति का साथ छूटा था, उसने किसी मर्द का स्पर्श महसूस नहीं किया था। अपनी सगी बहन के मुंह से, अपने ही जवान और गठीले बेटे की मर्दानगी का ऐसा जीवंत और कामुक वर्णन सुनकर स्मिता के शरीर के भीतर भी एक सोई हुई ज्वालामुखी करवट लेने लगी थी। उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
रेखा ने स्मिता की इस हालत को भांप लिया। वह अर्जुन की बांहों से निकलकर धीरे-धीरे चलकर स्मिता के पास आई। वह स्मिता के सोफे के पास नीचे कालीन पर बैठ गई और उसने स्मिता के दोनों ठंडे पड़ रहे हाथों को अपने गर्म, मखमली हाथों में ले लिया।
"स्मिता... खुद को देखो," रेखा ने बेहद धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। "५४ की उम्र में भी तुम्हारी ये देह कितनी भरी हुई और रसीली है। तुमने खुद को इस सूनेपन की कोठरी में क्यों बंद कर रखा है? क्या समाज की झूठी दुहाई तुम्हारी इस शारीरिक और मानसिक भूख को शांत कर सकती है? इस उम्र में औरत को एक मजबूत आलिंगन की, एक गर्म स्पर्श की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।"
स्मिता ने कांपते हुए होठों से कहा, "रेखा... मैं... मैं अब इस उम्र में कहाँ जाऊं? कौन है जो मुझे इस तरह समझेगा?"
रेखा के होठों पर एक बेहद शातिर, कामुक और गहरी मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में चमक थी। उसने सिर उठाकर पीछे सोफे पर बैठे अर्जुन की तरफ देखा।
अर्जुन अब सोफे पर पूरी तरह फैलकर बैठा था। उसकी शर्ट के बटन और खुल चुके थे, उसकी गठीली छाती और पेट के सिक्स-पैक एब्स का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था। उसकी आँखें अपनी माँ स्मिता के उभरे हुए सीने और उसकी थिरकती हुई काया पर टिकी थीं। उसकी नजरों में एक गहरा सम्मान, एक असीम चाहत और एक खुला आमंत्रण था।
रेखा ने स्मिता के कान के बिल्कुल करीब अपना मुंह लाया। उसकी गर्म सांसें स्मिता के कान की लौ को छू रही थीं। "तुम्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है, दीदी... जो हुनर, जो ताकत और जो राहत मुझे मिलती है, वो तुम्हारे बहुत करीब है। अर्जुन तुम्हारा बेटा जरूर है, लेकिन वह एक मुकम्मल मर्द है। वह जानता है कि अपनी माँ जैसी खूबसूरत, परिपक्व और आदरणीय औरत का सम्मान कैसे करना है और उसकी रातों के इस सूनेपन को अपनी बांहों में कैसे समेटना है। सुख पर, तृप्ति पर हम दोनों का बराबर हक है..."
लिविंग रूम में एक भारी, दमघोंटू लेकिन बेहद कामुक खामोशी छा गई। केवल बाहर की बारिश की सनसनाहट थी। स्मिता ने धीरे से अपनी पलकें उठाईं और सीधे अर्जुन की आँखों में देखा। अर्जुन ने अपनी जगह से ही अपनी माँ को देखकर एक गहरी, मदहोश मुस्कान दी। स्मिता का दिल किसी पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा था, और उसकी देह ने सदियों बाद एक मीठी, सुलगती हुई तपन को महसूस किया था।