Thanks a lot for the commentsDil ki gehraiyo se Shubhkamnaye vakharia Bhai

Shandaar updateपिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..
उस भयावह साजिश के बाद, जहाँ शीला ने पिंटू और कविता को फंसाकर वैशाली और पीयूष के सामने बेनकाब कर दिया था, कहानी अब एक नए मोड़ पर आ जाती है। इस बार का अपडेट फाल्गुनी और मौसम के इर्द-गिर्द घूमती है।
रात के अंधेरे में, फाल्गुनी अपने पड़ोसी मदन अंकल को रूखी और चम्पा नामक दो महिलाओं के साथ अत्यंत उत्तेजक हालत में देखती है। यह दृश्य उसे बेहद गर्म कर देता है। वापस आकर वह अपनी सहेली मौसम को अपने सभी राज बताती है – राजेश सर, मदन अंकल और शीला भाभी के साथ अपने संबंधों के बारे में, और आज रात का खुलासा भी। मौसम, जो पहले से ही फाल्गुनी के अपने पिता के साथ संबंधों के बारे में जानती है, इन बातों से हैरान नहीं होती, बल्कि वासना से भर जाती है।
फाल्गुनी मौसम को रसिक दूधवाले के बारे में बताती है, जिसके पास बहुत बड़ा और मोटा लंड है। मौसम उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाती है। फाल्गुनी रसिक को बुलाती है, और मौसम बाथरूम में छिपकर उनकी कामुक क्रियाओं को देखने का फैसला करती है।
जब रसिक आता है, तो फाल्गुनी उसके साथ अत्यंत उत्तेजक और स्पष्ट यौन संबंध बनाती है। वह उसके विशाल लिंग को मुँह में लेती है और फिर उसके साथ ज़बरदस्त संभोग करती है। मौसम यह सब छिपकर देखती है और बेहद उत्तेजित हो जाती है। संभोग के बाद, रसिक चला जाता है और मौसम बाहर आती है। वह फाल्गुनी से कहती है कि रसिक के लिंग को देखकर वह इतनी गर्म हो गई है कि अब उसे भी किसी असली मर्द की ज़रूरत है। फाल्गुनी उसे बिस्तर पर गिरा देती है, जिससे संकेत मिलता है कि वे दोनों अब आपस में यौन क्रिया करने वाली हैं।
अब आगे देखते है की शीला और वैशाली की ज़िंदगी में क्या हो रहा है..
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उस खौफ़नाक रात के तमाशे को गुज़रे हुए पूरे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन वैशाली के उस आलीशान फ्लैट में पसरा सन्नाटा अभी भी किसी क़ब्रिस्तान जैसा भारी, वीरान और दम घोंटने वाला था। घर की हर एक दीवार, हर एक कोना जैसे उस रात की चीखों, टूटे हुए गुरूर और विश्वासघात की गवाही दे रहा था। दिन के उजाले में भी उस घर के भीतर एक अजीब सा, घुटन भरा अंधकार छाया रहता था, मानो वक़्त वहीं ठहर गया हो।
दूसरी तरफ, पिंटू शहर में ही था, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो अपने ही बनाए उस घर की चौखट पर एक कदम भी रख सके। रंगे हाथों पकड़े जाने की वह भयानक और नंगी शर्म, अपनी खोखली मर्दानगी का वह सरेआम पर्दाफाश और वैशाली के उस ज़ोरदार तमाचे की गूँज ने पिंटू को अंदर तक चीर कर एक ज़िंदा लाश बना दिया था।
शहर के बाहरी इलाके में, हाईवे के किनारे बने एक सस्ते होटल के कमरे में वह पड़ा हुआ था। उस छोटे से कमरे में शराब और सिगरेट की बदबू फैली थी। फर्श पर बिखरी खाली बोतलें और राख से भरी ऐशट्रे उसकी हताशा का जीता-जागता सबूत थीं। वह बिना नहाए, उन्हीं कपड़ों में बिस्तर पर पड़ा था। हर बार जब वह अपनी सूजी हुई आँखें बंद करता, उसे वैशाली की नफरत से भभकती आँखें, उसके तमाचे का वो दर्द जो अभी भी गाल पर महसूस होता था, और पीयूष की वह तिरस्कार भरी हँसी दिखाई देती। वैशाली के कहे वे शब्द.. उसकी नामर्दी का वो सरेआम ऐलान.. उसके दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसकी शराफत और वफादारी का चोला तार-तार हो चुका था। अब उसे वैशाली या शीला का सामना करने के खयाल भर से ही मौत से भी ज़्यादा खौफ आ रहा था; उसका सारा अहंकार उसी रात उस पुराने फ्लैट की ज़मीन में दफन हो चुका था।
इधर, दोपहर का अलसाया हुआ वक़्त था। बाहर की चिलचिलाती धूप को ड्रॉइंग रूम के भारी, मखमली पर्दों ने रोक रखा था और वैशाली के फ्लैट के वातानुकूलित हॉल में एक ठंडी, सुकून भरी खामोशी थी। शीला उस लेदर सोफे पर बिल्कुल वैसे ही इत्मीनान से बैठी थी, जैसे कोई शातिर ग्रैंडमास्टर अपनी बिछाई हुई बिसात पर अपने विरोधियों के मोहरों को कटते हुए देखने के बाद आराम फरमाता है।
वह बड़ी ही तसल्ली और बेपरवाही से अपने फोन की स्क्रीन पर इंस्टाग्राम की रील्स स्क्रॉल कर रही थी, मानो दुनिया में सब कुछ बिल्कुल सही चल रहा हो। तभी अचानक फोन वाइब्रेट हुआ और नीली रोशनी के साथ स्क्रीन पर 'पीयूष' का नाम चमका।
नाम देखते ही शीला की उँगलियाँ रुक गईं। उसकी आँखों में एक गहरी, सर्द और शिकारियों वाली चमक आ गई। होठों पर एक सधी हुई, विजयी और खूंखार मुस्कान रेंग गई। यह कॉल इस बात का पुख्ता ऐलान था कि पीयूष अब पूरी तरह से उसकी मुट्ठी में कैद हो चुका है और उसका अगला मोहरा चलने के लिए बेकरार है।
शीला ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। उसने फोन को दो-तीन बार बजने दिया, अपनी जीत के उस मीठे एहसास को पूरी तरह महसूस किया, और फिर अपने चेहरे के भावों को एक रहस्यमयी शांति में ढालते हुए, बड़े ही इत्मीनान से फोन उठाया।
फोन को अपने कान से लगाते हुए, एक बेहद गहरी, रहस्यमयी और शांत आवाज़ में शीला ने कहा, "कहो पीयूष, बरसों बाद उस झूठे गुरूर के पिंजरे से निकलकर, एक नए नवेले आज़ाद परिंदे की तरह खुली हवा में साँस लेना कैसा महसूस हो रहा है?"
फोन के दूसरी तरफ, अपने उस विशाल और अब पूरी तरह से वीरान हो चुके महल के कांच वाले गलियारे में बेचैनी से टहलते हुए, पीयूष की आवाज़ में एक अजीब सी उतावली, नफरत और गुरूर साफ झलक रहा था।
आवाज़ को थोड़ा और भारी और आक्रामक करते हुए पीयूष बोला, "आज़ादी? असली आज़ादी तो मुझे उस दिन मिलेगी भाभी, जिस दिन मैं उस औरत और उसके उस सड़े हुए अहंकार को पूरी तरह अपनी ज़िंदगी से उखाड़ कर बाहर फेंक दूँगा। मेरे वकीलों की पूरी फौज इस वक़्त तलाक के कागज़ तैयार कर रही है। मैं तो बस यही सोच रहा हूँ कि जितनी जल्दी हो सके, जाकर वो पेपर्स सीधे कविता के उस घमंडी मुँह पर मारूँ ताकि उसे उसकी असली औकात हमेशा के लिए समझ आ जाए।"
अचानक पीयूष की आवाज़ में एक हल्की सी नरमी और दबी हुई चाहत घुल गई। उसने थोड़ा झिझकते हुए पूछा, "और वैशाली? वो कैसी है अब? क्या मैं... क्या मैं आज शाम आप दोनों का हालचाल पूछने और मिलने के लिए घर आ सकता हूँ भाभी?"
पीयूष की इस हताश उतावली को बीच में ही किसी धारदार कैंची की तरह काटते हुए, और एक बेहद सख्त हिदायत के लहज़े में शीला ने कहा, "रुको पीयूष। ये तुम्हारी सबसे बड़ी बेवकूफी होगी। इतनी जल्दबाज़ी मत करो।"
शीला ने सोफे पर अपनी पीठ टिकाई और अपनी आँखें हल्की सी मूँद कर आगे कहा, "अभी माहौल को थोड़ा शांत होने दो। अगर तुमने अभी गुस्से में आकर तलाक के कागज़ उसके मुँह पर मारे, तो तुम उसे एक हथियार दे दोगे। कविता को समाज के सामने बेचारी पत्नी बनने और विक्टिम कार्ड खेलने का सुनहरा मौक़ा मिल जाएगा। लोग कहेंगे कि तुमने उसे बेघर कर दिया। नहीं पीयूष... उसे उसकी उस चुनी हुई, सीलन भरी दुनिया में थोड़ा और तड़पने दो। उसे हर रात उन पुरानी दीवारों के बीच ये भयानक एहसास होने दो कि उसने अपने झूठे गुरूर और एक कायर मर्द के लिए अपनी ज़िंदगी का कितना बड़ा दांव लगा दिया है। जब वो अंदर से पूरी तरह टूट जाएगी, तब वो कागज़ उसके हाथ में थमाना।"
पीयूष इस गहरी चाल को सुनकर खामोश था। उसी खामोशी का फायदा उठाते हुए, शीला ने अपनी आवाज़ में थोड़ा और मीठा, गाढ़ा ज़हर घोलते हुए आगे कहा, "और रही बात मेरी वैशाली की... तो उस मासूम बच्ची का भरोसा अभी-अभी एक धोखेबाज़, दोगले इंसान ने बड़ी बेरहमी से तार-तार किया है। उसका घाव अभी बहुत हरा है। अगर तुम अभी तुरंत उसके सामने गए, तो हो सकता है वो तुम्हें भी उसी शक की नज़र से देखे। उसे थोड़ा और वक़्त दो पीयूष। उस पुरानी इमारत को पूरी तरह ढहने दो, तभी तो तुम वहाँ अपनी नई बुनियाद रख पाओगे। तुम बस अपने घर के दरवाज़े खुले रखना... वैशाली को सही वक़्त पर, सही तरीके से मैं खुद तुम्हारे पास लेकर आऊँगी। तब तक अपने अंदर की इस आग को काबू में रखो, शांत रहो और बस तमाशा देखो।"
पीयूष, जो अब तक अपने गुस्से और चाहत में अंधा हो रहा था, उसे शीला की इस बिछाई हुई शतरंज और उसकी शातिर चाल में पूरा दम नज़र आया। उसे एहसास हो गया कि शीला के इशारों पर चलकर ही उसे उसकी मंज़िल मिलेगी।
एक गहरी, सर्द मुस्कान के साथ पीयूष ने हामी भरते हुए कहा, "आप बिल्कुल सही कह रही हैं भाभी। मैं इंतज़ार करूँगा... अपने दोनों मकसदों के पूरा होने का।"
यह कहकर पीयूष ने फोन काट दिया और शीला ने फोन को वापस टेबल पर रखते हुए एक बेहद खौफनाक और विजयी मुस्कान दी।
पीयूष के कॉल कटने के बाद, फोन स्क्रीन की नीली रौशनी अभी पूरी तरह से बुझी भी नहीं थी कि वो फोन कांच की टेबल पर फिर से ज़ोर से वाइब्रेट कर उठा। इस बार स्क्रीन पर 'कविता' का नाम ब्लिंक कर रहा था।
नाम देखते ही शीला के चेहरे की वो मीठी, फिक्रमंद और सधी हुई मुस्कान एक ही सेकंड में किसी गिरगिट की तरह गायब हो गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, कठोर और बेरुखी भरे भाव ने ले ली। उसने अपना काम निकाल लिया था। बिसात का जो मोहरा अपना काम कर चुका हो, उसे वापस डिब्बे में फेंक दिया जाता है, और शीला के लिए कविता अब उसी पिटे हुए, बेकार मोहरे से ज़्यादा कुछ नहीं थी। उसने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई। फोन को तीन-चार बार बजने दिया, अपनी जीत के गुरूर को महसूस किया, और फिर बड़े ही इत्मीनान से स्क्रीन स्वाइप करके फोन कान से लगा लिया।
फोन उठते ही दूसरी तरफ से एक कांपती, डरी हुई और भयानक हताशा से भरी आवाज़ में कविता ने कहा, "भाभी... अब मैं क्या करूँ? पिछले तीन दिन से मैं पापा के इस खंडहर जैसे फ्लैट में बिल्कुल अकेली पड़ी हूँ। दीवारों का सन्नाटा मुझे खाने को दौड़ रहा है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मेरा अगला कदम क्या होना चाहिए... मुझे बहुत डर लग रहा है भाभी।"
कविता की इस गिड़गिड़ाहट का शीला पर कोई असर नहीं हुआ। अपनी आवाज़ से सारी मिठास, सारी पुरानी हमदर्दी को पूरी तरह से निचोड़ते हुए शीला ने एक बिल्कुल सपाट, रूखे और अजनबी लहज़े में कहा, "इसमें मैं क्या कर सकती हूँ कविता? अब ये तुम्हारी ज़िंदगी है, तुम्हारे अपने फैसले हैं। मैंने तो तुमसे कहा नहीं था कि अपना घर छोड़कर इस खंडहर में जाकर बैठ जाओ! पिंटू से बात करो, उसी की बाँहों में जाने के लिए तो तुमने अपना बसा-बसाया घर और पति छोड़ा था न?"
शीला की इस अप्रत्याशित बेरुखी से कविता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके मुँह पर बर्फीला पानी फेंक दिया हो। रुला देने वाली बेबसी के साथ कविता ने जवाब दिया, "वो मेरा फोन ही नहीं उठा रहा है भाभी! मैंने उसे सैकड़ों कॉल किए हैं, अनगिनत मेसेज किए हैं। उस रात के तमाशे के बाद से वो पूरी तरह गायब है। मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा... मेरे पास अब कोई नहीं है। प्लीज़ मुझे बताइए कि मैं क्या करूँ? आप तो मेरे साथ हैं न भाभी?"
एक बेहद चुभने वाली, निर्मम और ठंडी हँसी हंसते हुए शीला ने कहा, "मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूँ कविता... पर ज़रा प्रैक्टिकल होकर सोचो और इस दुनियादारी को समझो। आज समाज की नज़रों में तुम कौन हो? तुम मेरी अपनी सगी बेटी का बसा-बसाया घर उजाड़ने वाली औरत हो। और मैं? मैं उस लड़की की माँ हूँ, जिसका सीधा-सादा पति उस रात तुम्हारे बिस्तर पर था और तुम उसके सामने आधी नंगी होकर अपनी हवस बुझाने की भीख मांग रही थी। अब तुम ही बताओ, समाज क्या कहेगा अगर मैं तुम्हारे साथ खड़ी नजर आई तो? चाहकर भी मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती। आगे का रास्ता अब तुम्हें खुद ही तलाशना होगा कविता।"
यह सुनते ही कविता की साँसें जैसे उसके सूखे गले में ही काँटों की तरह अटक गईं। उसका दिमाग भन्ना गया। जिस शीला भाभी ने कभी समाज की रत्तीभर भी परवाह नहीं की, जिसने उसे अपना घर तोड़ने और पिंटू को उस बंद कमरे में अपने जिस्म के जाल में फंसाने के लिए उकसाया था... आज वही शीला भाभी समाज और मर्यादा की झूठी दुहाइयाँ दे रही थी!
शीला की आवाज़ अब किसी तेज़ धार वाले ज़हरीले खंजर की तरह हो गई थी, जो सीधे कविता के सीने के पार हो रही थी। उसने अपना आखिरी और सबसे घातक वार करते हुए कहा, "अब ये तुम्हारी जंग है कविता। ये तुम्हारा फैलाया हुआ रायता है, और इसे तुम्हें ही समेटना होगा। ये मेरी लड़ाई नहीं है, और सच कहूँ तो मैं अब इन सब झमेलों से बहुत थक चुकी हूँ।"
इससे पहले कि कविता के कांपते होठों से कोई सफाई, कोई गाली या कुछ और निकल पाता.. क्लिक! शीला ने बेरहमी से फोन काट दिया।
दूसरी तरफ, उस पुराने फ्लैट के अँधेरे में बैठी कविता के पसीने से भीगे हाथों से फोन छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। शीला के उन ज़हरीले शब्दों ने उसे अंदर तक सुन्न कर दिया था। कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और उसकी अपनी भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
उसे आज पहली बार ये भयानक और नंगा एहसास हुआ कि वो कभी शीला की करीबी, उसकी राज़दार या उसकी दोस्त थी ही नहीं। वो तो महज़ एक बेवकूफ कठपुतली थी.. एक ऐसा मोहरा जिसे शीला ने पीयूष के घर से अपनी बेटी का रास्ता साफ करने और पिंटू जैसे नामर्द कांटे को रास्ते से हटाने के लिए बड़ी ही चालाकी से इस्तेमाल किया था। और आज, जब शीला का काम निकल गया था, तो उसने कविता की पूरी ज़िंदगी को एक झटके में कचरे के डिब्बे में फेंक दिया था। कविता के पास अब न अपना गुरूर बचा था, न पीयूष का वो महल, न पिंटू का झूठा सहारा और न ही शीला का वो ज़हरीला साथ। वह पूरी तरह, मुकम्मल तौर पर बर्बाद हो चुकी थी।
कविता का फोन बेरहमी से काटने के बाद, शीला ने उस महंगे लेदर सोफे पर अपनी पीठ टिकाई। उसके चेहरे पर एक बेहद शातिर और मुकम्मल जीत का गुरूर था। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी इस शानदार कामयाबी पर जीत की एक लंबी, सुकून भरी साँस लेनी चाही, लेकिन...
साँस अभी उसके फेफड़ों में पूरी तरह भर भी नहीं पाई थी कि अचानक उसके पेट के निचले हिस्से में एक बेहद तेज़, जानलेवा ऐंठन उठी। ऐसा लगा जैसे किसी ने एक साथ कई जंग लगी सुइयां और कांच के टुकड़े उसके मांस में गहराई तक उतार दिए हों। शीला की आँखें खौफ से झटके से खुल गईं और उसका चेहरा दर्द के मारे बुरी तरह सिकुड़ गया। जीत का वो सारा गुरूर और वो मीठी मुस्कान एक ही सेकंड में हवा हो गई। उसने झटके से अपने दोनों हाथ अपने पेट के निचले हिस्से पर कसकर दबा लिए और एक सिसकी, जो लगभग एक दबी हुई चीख जैसी थी, उसके सूखे होठों से निकल गई।
शीला का पूरा शरीर उस सोफे पर दोहरा हो गया। दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश में सोफे के कुशन को भींचते हुए उसकी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे।
यह दर्द... यह दर्द कोई मामूली थकावट या गैस का दर्द नहीं था, और सच तो यह था कि यह उसके लिए बिल्कुल नया भी नहीं था। पिछले कुछ हफ्तों से उसे अक्सर कमर के निचले हिस्से और पेट में एक भारी, मीठा-मीठा दर्द और ऐंठन महसूस हो रही थी जिसे वो उम्र का तकाज़ा या पीयूष के साथ उस रात हुई घनघोर चुदाई का साइड इफेक्ट समझकर अनदेखा कर रही थी। लेकिन आज? आज यह बर्दाश्त की हर हद पार कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उसके शरीर के भीतर कोई चीज़ उसे ज़िंदा नोच कर खा रही हो।
दर्द के उस भयंकर बवंडर के साथ-साथ, उसे एक अजीब सी, हड्डियां तोड़ देने वाली थकान महसूस हो रही थी। एक ऐसी मनहूस थकान मानो उसके शरीर का सारा खून और उसकी ताक़त किसी ने एक ही झटके में निचोड़ ली हो। उसे अपना ही शरीर एक भारी बोझ लगने लगा था, जिसे उठाना अब उसकी मांसपेशियों के बस में नहीं था।
माथे पर आए ठंडे पसीने को पोंछते हुए और हाँफते हुए, शीला का दिमाग अचानक आज सुबह के उस खौफनाक मंज़र की तरफ चला गया।
सुबह जब वो वॉशरूम में थी, तो सफेद टाइल्स वाली उस तेज़, ठंडी रौशनी में उसने कुछ ऐसा देखा था जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी थी.. असामान्य, गाढ़ा और भारी खून का धब्बा अपनी पैंटी पर नजर आया। उसका मेनोपॉज़ दस सालों पहले ही हो चुका था, फिर यह खून कहाँ से आ रहा था? उस पल जो मौत सा ठंडा खौफ उसके सीने में उठा था, वो ज़िंदगी की किसी भी हार के खौफ से कहीं ज़्यादा बड़ा था।
शीला ने कांपते हाथों से पास कांच की टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाना चाहा, लेकिन कमज़ोरी के मारे गिलास उसके हाथ से छलक गया और पानी ज़मीन पर गिर पड़ा।
"कुछ... कुछ नहीं है... ये कुछ भी नहीं है," शीला ने खुद को तसल्ली देते हुए, एक टूटी हुई और हांफती आवाज़ में खुद से बड़बड़ाई।
उसने गहरी-गहरी साँसें लेते हुए खुद के डर को दबाना शुरू किया, "बस... बस इस सारी भागदौड़ की वजह से हुआ है। कविता, पीयूष, पिंटू.. इन सबके ड्रामे, रतजगे और स्ट्रेस की वजह से शरीर थक गया है। उम्र हो रही है, हार्मोन्स का कोई ऊपर-नीचे होना होगा। मैं.. मैं इतनी आसानी से बीमार नहीं पड़ सकती। मेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ है.. मुझे अभी वैशाली को उस महल में राज करते हुए देखना है।"
लेकिन शीला की ये बड़बड़ाहट उसके अंदर के उस भयानक डर को शांत नहीं कर पा रही थी। वो चाहे अपने दिमाग को जितनी भी तसल्लियां दे ले, अंदर ही अंदर एक अनजाना खौफ उसकी नसों में दीमक की तरह सुगबुगाने लगा था। वो एक बेहद चालाक औरत थी, और उसका खुद का दिमाग उसे चीख-चीख कर बता रहा था कि ये सिर्फ स्ट्रेस नहीं है, बल्कि उसके शरीर के भीतर कुछ तो उबल रहा है।
शीला का दिमाग अभी अपने शरीर के भीतर उठ रहे उस खौफनाक दर्द को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि अचानक कांच की टेबल पर रखा उसका फोन एक तेज़ रिंगटोन के साथ फिर से बज उठा। फोन की उस अचानक हुई आवाज़ से शीला के तने हुए शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने कांपती आँखों से स्क्रीन की तरफ देखा। कॉलर आईडी पर 'मदन' का नाम फ्लैश हो रहा था।
पिछले तीन दिनों में मदन के अनगिनत फोन आ चुके थे, जिन्हें वह लगातार किसी न किसी बहाने से टाल रही थी। मदन यहाँ चल रहे सारे हँगामों से अनजान था। शीला उसे सब कुछ बताना चाहती थी लेकिन इस वक़्त, उस भयानक शारीरिक ऐंठन के बीच मदन की झुंझलाहट और सवालों का सामना करना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था। फिर भी, शीला वो औरत थी जिसने ज़िंदगी में कभी अपनी कमज़ोरी किसी के सामने ज़ाहिर नहीं की थी.. अपने पति के सामने तो बिल्कुल भी नहीं। उसने एक लंबी, कांपती हुई साँस ली, सोफे का हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को ज़बरदस्ती थोड़ा सीधा किया। चेहरे पर दर्द की लकीरों को एक सख्त नकाब के पीछे छुपाते हुए उसने फोन कान से लगा लिया।
फोन उठते ही, बिना कोई हाल-चाल पूछे, एक तेज़, अधिकार से भरी और झुंझलाहट वाली आवाज़ में मदन ने कहा, "शीला! कब तक वैशाली के घर पर डेरा डाले रहने का इरादा है? यहाँ घर का पूरा रूटीन कबाड़ हो गया है तेरे बिना। मेरी सुबह की दवाइयां कहाँ रखी हैं मुझे नहीं पता, मेरी फाइलें नहीं मिल रहीं... कब लौट रही है तू?"
मदन एक सेकंड के लिए रुका और फिर थोड़ा और चिढ़ते हुए अपनी उसी टिपिकल सोच के साथ बोला, "और वैशाली? वो ठीक है न अब? पिंटू के साथ जो भी छोटी-मोटी अनबन थी, वो सुलझ गई न? देख शीला, दामाद के घर में सास का इतने दिन टिकना अच्छा नहीं लगता। लोग बातें बनाते हैं। तू अब जल्द ही वापस आ जा!"
शीला के पेडू में दर्द की एक और ज़ोरदार लहर उठी। उसने अपने होंठों को इतनी ज़ोर से भींचा कि उन पर दाँतों के निशान पड़ गए। अपने माथे और गर्दन पर आई पसीने की उन ठंडी, चिपचिपी बूँदों को अपने भारी दुपट्टे से पोंछते हुए और अपनी आवाज़ की कांपन को पूरी तरह काबू में करते हुए शीला ने एक बेहद सधी हुई और धारदार आवाज़ में जवाब दिया।
"मदन, तेरी यही आदत मुझे हमेशा से चुभती है। यहाँ मेरी बच्ची का पूरा संसार उजड़ने की कगार पर था, और तुझे अपनी दवाइयों और फाइलों की पड़ी है?" शीला की आवाज़ में अब वो पुरानी, हुक्म चलाने वाली और हावी होने वाली टोन वापस लौट आई थी, जो उसके अंदर के दर्द को ढंकने का सबसे बेहतरीन हथियार थी।
उसने एक गहरी साँस ली और लहज़े को थोड़ा और सख्त करते हुए कहा, "मैं यहाँ कोई छुट्टियां मनाने या दामाद की रोटियां तोड़ने नहीं रुकी हूँ मदन। तेरी उस लाड़ली बेटी का घर टूटते-टूटते बचा है। जो गंदगी उस घर में पनप रही थी, उसे मैंने अपने हाथों से साफ किया है। अब बस कुछ चीज़ें और सेट करनी बाकी हैं।"
मदन की तरफ से कुछ बोलने की कोशिश हुई, लेकिन शीला ने उसे बीच में ही काट दिया, "और समाज की और दामाद के घर टिकने की चिंता तू मत कर। पिंटू को उसकी असली जगह दिखा दी है मैंने। अब वो इस घर में क्या, वैशाली की नज़रों में भी कभी सर उठाने लायक नहीं बचा। तू बेकार में वहाँ बैठकर अपनी फिक्र मत कर और अपना ब्लड प्रेशर मत बढ़ा। मैं अपना काम पूरा करके जल्द ही आ जाऊंगी।"
यह कहकर शीला ने मदन के किसी भी और सवाल या शिकायत का इंतज़ार किए बिना फोन खट से काट दिया।
फोन वापस टेबल पर रखते ही, उसकी वो सख़्त आवाज़ और वो झूठा गुरूर फिर से भरभरा कर टूट गया। वो एक बार फिर पेट पकड़ कर, दर्द से कराहते हुए सोफे पर निढाल होकर गिर सी गई.. इस बार पहले से भी ज़्यादा कमज़ोर, पसीने से तर-बतर और लाचार होकर।
तभी किचन से ताज़ा बनी कॉफी की सोंधी महक आई। वैशाली एक ट्रे में दो मग कॉफी लेकर भारी और थके हुए कदमों से बाहर आ रही थी। लेकिन जैसे ही उसकी नज़रें सोफे पर पड़ीं, उसके कदमों की गति अचानक वहीं जम गई। सामने का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
शीला सोफे पर बुरी तरह दोहरी हो चुकी थी। उसने अपने दोनों हाथों से अपना पेडू कसकर पकड़ा हुआ था और उसका चेहरा दर्द के मारे किसी सफेद कागज़ की तरह फक पड़ चुका था। माथे और गर्दन से टपकते ठंडे पसीने की बूँदें हॉल की रोशनी में चमक रही थीं और वह दर्द को दबाने की कोशिश में बुरी तरह हाँफ रही थी। शीला ने वैशाली को देखते ही जल्दी से मदन का कॉल काट दिया, ताकि वह कोई सवाल न पूछ सके।
वैशाली के हाथों में पकड़ी ट्रे बुरी तरह कांप उठी, जिससे गर्म कॉफी छलक कर ट्रे में गिर गई। उसने किसी तरह खुद को संभाला, लपककर आगे बढ़ी और ट्रे को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, अपनी माँ के पास घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई।
उसने शीला के ठंडे, पसीने से तर-बतर चेहरे को अपने हाथों में लिया और एक घबराहट से भरी, कांपती आवाज़ में पूछा, "मम्मी! ये क्या हालत हो रही है तुम्हारी? तुम ठीक तो हो? हे भगवान, तुम्हारा चेहरा... ये बिल्कुल सफेद पड़ गया है! तुम तो पसीने से पूरी भीग रही हो। दर्द कहाँ हो रहा है?"
शीला ने अपने चेहरे की सिकुड़न और दर्द को ज़बरदस्ती गले के नीचे उतारने की नाकाम कोशिश की। उसने वैशाली का हाथ हल्के से दबाते हुए, एक बेहद कमज़ोर, खोखली और बनावटी मुस्कान के साथ अपनी तकलीफ़ को छुपाना चाहा, "अरे... कुछ नहीं मेरी बच्ची। तू ऐसे ही घबरा रही है। बस थोड़ी भयंकर वाली एसिडिटी और थकान हो गई है। पिछले कुछ दिनों से सही से खाना-पीना और नींद नहीं हुई न... बस वही है। और फिर... उम्र भी तो हो रही है अब तुम्हारी मम्मी की, शरीर कभी-कभी जवाब दे ही देता है।"
लेकिन वैशाली अब वो पुरानी, नासमझ बच्ची नहीं थी जिसे आसानी से इन गोल-मोल बातों में बेवकूफ बनाया जा सके। पिछले कुछ दिनों के धोखे और सदमे ने उसे बहुत तीखा और ऑब्ज़र्वेंट बना दिया था। उसने शीला की इस झूठी तसल्ली को सिरे से खारिज कर दिया।
शीला के बिल्कुल करीब खिसकते हुए, उसने एक बेहद सख्त, तीखे और अधिकार भरे लहज़े में अपनी माँ को डपटते हुए कहा, "बकवास मत करो मम्मी! एसिडिटी में किसी का चेहरा ऐसे मुर्दे की तरह पीला नहीं पड़ता। मैं अंधी नहीं हूँ। मैं पिछले दो दिन से नोटिस कर रही हूँ, तुम बात करते-करते अचानक अपना पेट पकड़ कर कराह उठती हो। रात को तुम्हारी पीठ में भी इतना भयंकर दर्द होता है कि तुम करवट तक नहीं ले पातीं।"
वैशाली ने शीला की आँखों में सीधा देखते हुए अपना अटल फैसला सुनाया, "तुम्हारा शरीर अंदर से बहुत कमज़ोर लग रहा है और तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। मुझे और कोई झूठा बहाना नहीं सुनना है अब। हम अभी, इसी वक़्त डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम यहीं बैठो, मैं अभी क्लिनिक में अपॉइंटमेंट फिक्स करती हूँ।"
शीला अंदर से डर गई। अगर वैशाली उसे डॉक्टर के पास ले गई, तो सारे टेस्ट होंगे और कुछ न कुछ निकलेगा। उसने घबराकर मना करने और बात को टालने के लिए मुँह खोला ही था कि...
ट्रिंग... ट्रिंग...!!
तभी उस भारी, फिक्रमंद और तनावपूर्ण माहौल को बीच से चीरती हुई, वैशाली के फोन की तेज़ रिंगटोन गूँज उठी।
वैशाली ने झुंझलाते हुए फोन उठाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र स्क्रीन पर फ्लैश हो रहे नाम पर पड़ी, उसकी उँगलियाँ वहीं जम गईं। कुछ ही सेकंड पहले उसके चेहरे पर अपनी माँ के लिए जो गहरी फिक्र और चिंता थी, वो एक ही पल में वाष्प बनकर उड़ गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, खौफनाक और बर्फ जैसी सख्त बेरुखी ने ले ली। उसकी त्योरियां चढ़ गईं और जबड़े गुस्से से तन गए।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था 'पापा जी' (पिंटू के पिता)।
वैशाली ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले अपने सीने में हवा भरता है। उसने अपनी आँखों को पल भर के लिए बंद किया और अपने अंदर के उस पुराने, कमज़ोर हिस्से को हमेशा के लिए कहीं दफन कर दिया। जब उसने फोन उठाया, तो उसकी आवाज़ में वो पुरानी, मीठी, सहमी हुई और 'संस्कारी बहू' वाली नज़ाकत रत्ती भर भी नहीं थी, जो अक्सर ससुर का फोन आने पर उसके लहज़े में चाशनी की तरह घुल जाती थी। उसकी जगह एक बेहद ठंडी, निडर और पत्थर जैसी सख्त औरत की बेरुखी ने ले ली थी।
बिना कोई औपचारिक अभिवादन किए, एक बिल्कुल सपाट और रूखे लहज़े में वैशाली ने कहा, "जी पापा जी... कहिए? आज अचानक इस वक़्त कैसे फोन किया?"
दूसरी तरफ से एक घबराई हुई, हकलाती और दबी-दबी सी आवाज़ आई। पिंटू के पिता कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके शब्दों में एक अजीब सी हड़बड़ाहट और खौफ था। उनकी वो कांपती हुई आवाज़ सुनते ही वैशाली के चेहरे के भाव तेज़ी से बदलने लगे। उसकी आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ गईं।
हैरानी, लेकिन एक खौफनाक संयम के साथ वैशाली ने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए जवाब दिया, "क्या? लेकिन आप लोग तो अगले हफ्ते आने वाले थे न? ये अचानक प्रोग्राम कैसे बदल गया?"
फोन के दूसरी तरफ से फिर कुछ घबराहट भरे शब्द सुनाई दिए..'अचानक काम आ गया', 'पिंटू से बात नहीं हो रही', 'हम बस आ रहे हैं'।
वैशाली के होठों पर एक कड़वी, तिरस्कार भरी मुस्कान आ गई। वह सब कुछ समझ चुकी थी। उसने बेहद ठंडे और अंतिम अंदाज़ में कहा, "अच्छा... कल सुबह की फ्लाइट है? जी ठीक है... आइए। नहीं पिंटू कहाँ है वो मुझे भी नहीं पता.. नहीं मैं एयरपोर्ट लेने नहीं आ सकती.. आप कैब लेकर आ जाना.. जी, ठीक है।"
वैशाली ने बिना उनके कुछ और कहने का इंतज़ार किए 'खट' से फोन काट दिया और मोबाइल को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, एक भारी साँस छोड़ कर सोफे के बैकरेस्ट पर टिक गई। दर्द की वजह से दोहरी हो रही शीला ने अपनी उँगलियों के बीच से, आशंकित और सवालिया नज़रों से अपनी बेटी के इस आक्रामक रूप को देखा।
अपनी दोनों मुट्ठियों को इतनी ज़ोर से भींचते हुए कि उसके नाखून हथेलियों में चुभने लगे, वैशाली ने एक खुरदरी, ज़हरीली आवाज़ में कहा, "पिंटू के मम्मी-पापा आ रहे हैं मम्मी। कल सुबह की फ्लाइट है उनकी। मुझे पक्का यकीन है कि उस नामर्द ने अपनी गंदी करतूत छुपाने के लिए उन्हें फोन करके कोई उल्टी-सीधी, मनगढ़ंत कहानी सुनाई है। या फिर वो अपने माँ-बाप को ढाल बनाकर यहाँ इमोशनल ब्लैकमेल का गंदा खेल खेलने आ रहा है।"
वैशाली की आँखों में अब एक खूंखार चमक थी, उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "रो-धो कर, 'परिवार मत तोड़ो', 'औरतों को समझौता करना पड़ता है' और 'समाज क्या कहेगा' का वास्ता देकर वो लोग सोच रहे हैं कि मैं पिंटू के उस गंदे गुनाह को माफ कर दूँगी? जो भी है मम्मी... कल इस घर में बहुत बड़ा तमाशा होने वाला है। और यकीन मानो, इस बार तमाशा वो लोग नहीं, मैं करूँगी!"
यह सुनते ही शीला का माथा बुरी तरह ठनक गया। पिंटू के माता-पिता का नाम सुनते ही उसे उबकाई सी आने लगी। पिंटू के माता-पिता यानी वही टिपिकल मिडिल-क्लास सोच, रोना-धोना, रिश्तों की झूठी दुहाई और फालतू का जज़्बाती ड्रामा। शीला बहुत अच्छी तरह जानती थी कि अगर वो कल यहाँ रुकी, तो उसे उस पूरे कीचड़ में उतरना पड़ेगा। उसे उन लोगों की बकवास सुननी पड़ेगी और अपनी बेटी का घर तुड़वाने के इल्ज़ामों की जवाबदेही देनी पड़ेगी।
और उसका शरीर...? शीला ने अपने पेट को और कसकर दबा लिया। उसका कमज़ोर पड़ रहा शरीर अब इस नए ड्रामे का मानसिक और शारीरिक बोझ उठाने की हालत में बिल्कुल नहीं था। जैसी किसी शारीरिक तकलीफ के वो अनजाने, लेकिन खौफनाक लक्षण उसे अंदर ही अंदर किसी दीमक की तरह खोखला कर रहे थे। एक ऐसा भयंकर दर्द जो उसकी रगों का खून सोख रहा था। उसे लगा जैसे उसका शरीर चीख-चीख कर कह रहा हो कि अब यहाँ वो ज्यादा देर रुक नहीं पाएगी।
शीला ने अपने कांपते हुए हाथों से सोफे का भारी लेदर हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को एक झटके से सीधा करने की कोशिश की। इस कोशिश में उसकी रीढ़ की हड्डी से लेकर पेडू तक एक भयंकर टीस उठी, लेकिन उसने अपने होठों को ज़ोर से भींचकर उस दर्दनाक चीख को बाहर नहीं आने दिया। दर्द ने उसका शरीर ज़रूर निचोड़ लिया था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी वही पुरानी, खूंखार और शातिर चमक ज़िंदा थी, जो किसी भी शिकारी के पास अपने शिकार को जाल में फड़फड़ाते हुए देखने के बाद होती है। बस फर्क इतना था कि अब उसका अपना ही शरीर उसके खिलाफ बगावत कर रहा था।
एक गहरी, कांपती हुई साँस लेते हुए और अपने माथे का पसीना पोंछते हुए शीला ने कहा, "वैशाली... मुझे लगता है कि अब मुझे तुम्हारे पापा के पास घर लौट जाना चाहिए। मदन वहाँ अकेले बहुत परेशान है, पूरा घर सर पर उठा रखा है उसने। और सच कहूँ मेरी बच्ची.. तो मेरी तबियत भी अब कुछ ठीक नहीं लग रही। मुझे अपने घर जाकर आराम करने की ज़रूरत है। वहीं हमारे फैमिली डॉक्टर को दिखा दूँगी।"
शीला थोड़ा रुकी, उसने एक पल के लिए अपनी बेटी के चेहरे के सख्त भावों को पढ़ा और फिर अपनी उसी पुरानी चालाकी के साथ बोली, "और वैसे भी, अगर कल सुबह मैं यहाँ पिंटू के माँ-बाप के सामने मौजूद रही, तो उन छोटी सोच वाले लोगों को यही लगेगा कि मैं तुम्हारा कान भर रही हूँ। वो अपनी औलाद के निकम्मेपन का सारा ठीकरा मेरे सिर फोड़ेंगे और समाज में ढिंढोरा पीटेंगे कि मैंने तुम्हारा बसा-बसाया घर तुड़वा दिया। मैं उनके उस गंदे कीचड़ में नहीं उतरना चाहती और न ही फालतू की सफाई देना चाहती हूँ।"
वैशाली ने बिना कुछ कहे अपनी माँ की उन थकी हुई, पीली पड़ चुकी और बीमार आँखों में झांका। जिन आँखों में उसने बचपन से हमेशा एक अटल गुरूर और हुक्म देखा था, आज वो आँखें किसी अनजाने दर्द से धुंधला रही थीं। उसे साफ समझ आ रहा था कि उसकी माँ कोई बहाना नहीं बना रही है, बल्कि सच में शारीरिक रूप से बुरी तरह टूट रही है।
वैशाली सोफे से उठी। उसने आगे बढ़कर अपनी माँ के उन ठंडे, पसीने से भीगे हाथों को अपनी हथेलियों की गर्माहट में कसकर थाम लिया। उसकी अपनी आँखों में अब कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक खौफनाक और बर्फ जैसा ठंडा आत्मविश्वास था।
"तुम बेफिक्र होकर जाओ मम्मी," वैशाली की आवाज़ किसी सधे हुए तीर की तरह थी, "तुम्हें इस वक़्त सबसे ज़्यादा अपनी सेहत पर ध्यान देने की सख़्त ज़रूरत है। मैं अभी तुम्हारे लिए कैब बुक करवाती हूँ।"
वैशाली ने शीला के हाथों को हल्का सा दबाया और अपनी आवाज़ को और सख्त करते हुए कहा, "और जहाँ तक पिंटू के उन माँ-बाप और कल सुबह होने वाले उनके इस घिनौने, जज़्बाती ड्रामे का सवाल है... उसे मैं अकेले, अपने तरीके से हैंडल करूँगी। उन्हें लगता है कि वो रो-धोकर मुझ पर दबाव बना लेंगे? अब मैं वो पुरानी, बेवकूफ और डरी हुई वैशाली नहीं हूँ जो उनकी मीठी बातों में आ जाएगी या रिश्ते बचाने के खोखले बोझ तले दबकर अपना वजूद मिटा देगी। पिंटू ने जो घिनौना खेल खेला है, उसकी सज़ा उसे और उसके उस संस्कारी परिवार को भुगतनी ही पड़ेगी। कल उन्हें उनकी असली औकात मैं खुद दिखाऊँगी, ये मेरा वादा है तुमसे।"
शीला ने अपनी बेटी की उन बड़ी-बड़ी आँखों में वो भभकती हुई आग साफ देखी.. वही नफरत और बगावत की आग, जो उसने खुद बड़ी चालाकी से वहाँ जलाई थी। उसे अब पूरा यकीन हो गया था कि वैशाली अब दुनिया के किसी भी दबाव, किसी भी रिश्ते की दुहाई में नहीं पिघलेगी। पीयूष के उस करोड़ों के महल और वैशाली के बीच का रास्ता अब बिल्कुल साफ था, कोई कांटा नहीं बचा था।
पेडू में उठ रही सुइयों जैसी चुभन और पीठ के भयंकर दर्द से कराहते हुए भी, शीला के होंठों पर अपनी इस शानदार जीत के सुकून की एक हल्की, शैतानी मुस्कान थी। उसी शाम, उसने बहुत ही मुश्किल से अपना सूटकेस बंद किया और मदन के पास लौटने के लिए नीचे इंतज़ार कर रही कैब में जाकर बैठ गई।
कैब ने रफ्तार पकड़ी और वैशाली का घर पीछे छूटने लगा। शहर की चमचमाती रोशनियों के बीच, कैब की पिछली सीट पर शीला दर्द से दोहरी हो रही थी। वह अपनी जीत का परचम लहरा कर, अपना मास्टरस्ट्रोक खेलकर वापस जा रही थी।
खेल अभी खत्म नहीं हुआ था, बल्कि अब एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ मोहरे नहीं.. पर बिसात बिछाने वाली खुद मात खाने वाली थी।
बहुत ही जबरदस्त शानदार लाजवाब और बडा ही खतरनाक रोमांचक अपडेट है भाई मजा आ गयापिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..
उस भयावह साजिश के बाद, जहाँ शीला ने पिंटू और कविता को फंसाकर वैशाली और पीयूष के सामने बेनकाब कर दिया था, कहानी अब एक नए मोड़ पर आ जाती है। इस बार का अपडेट फाल्गुनी और मौसम के इर्द-गिर्द घूमती है।
रात के अंधेरे में, फाल्गुनी अपने पड़ोसी मदन अंकल को रूखी और चम्पा नामक दो महिलाओं के साथ अत्यंत उत्तेजक हालत में देखती है। यह दृश्य उसे बेहद गर्म कर देता है। वापस आकर वह अपनी सहेली मौसम को अपने सभी राज बताती है – राजेश सर, मदन अंकल और शीला भाभी के साथ अपने संबंधों के बारे में, और आज रात का खुलासा भी। मौसम, जो पहले से ही फाल्गुनी के अपने पिता के साथ संबंधों के बारे में जानती है, इन बातों से हैरान नहीं होती, बल्कि वासना से भर जाती है।
फाल्गुनी मौसम को रसिक दूधवाले के बारे में बताती है, जिसके पास बहुत बड़ा और मोटा लंड है। मौसम उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाती है। फाल्गुनी रसिक को बुलाती है, और मौसम बाथरूम में छिपकर उनकी कामुक क्रियाओं को देखने का फैसला करती है।
जब रसिक आता है, तो फाल्गुनी उसके साथ अत्यंत उत्तेजक और स्पष्ट यौन संबंध बनाती है। वह उसके विशाल लिंग को मुँह में लेती है और फिर उसके साथ ज़बरदस्त संभोग करती है। मौसम यह सब छिपकर देखती है और बेहद उत्तेजित हो जाती है। संभोग के बाद, रसिक चला जाता है और मौसम बाहर आती है। वह फाल्गुनी से कहती है कि रसिक के लिंग को देखकर वह इतनी गर्म हो गई है कि अब उसे भी किसी असली मर्द की ज़रूरत है। फाल्गुनी उसे बिस्तर पर गिरा देती है, जिससे संकेत मिलता है कि वे दोनों अब आपस में यौन क्रिया करने वाली हैं।
अब आगे देखते है की शीला और वैशाली की ज़िंदगी में क्या हो रहा है..
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उस खौफ़नाक रात के तमाशे को गुज़रे हुए पूरे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन वैशाली के उस आलीशान फ्लैट में पसरा सन्नाटा अभी भी किसी क़ब्रिस्तान जैसा भारी, वीरान और दम घोंटने वाला था। घर की हर एक दीवार, हर एक कोना जैसे उस रात की चीखों, टूटे हुए गुरूर और विश्वासघात की गवाही दे रहा था। दिन के उजाले में भी उस घर के भीतर एक अजीब सा, घुटन भरा अंधकार छाया रहता था, मानो वक़्त वहीं ठहर गया हो।
दूसरी तरफ, पिंटू शहर में ही था, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो अपने ही बनाए उस घर की चौखट पर एक कदम भी रख सके। रंगे हाथों पकड़े जाने की वह भयानक और नंगी शर्म, अपनी खोखली मर्दानगी का वह सरेआम पर्दाफाश और वैशाली के उस ज़ोरदार तमाचे की गूँज ने पिंटू को अंदर तक चीर कर एक ज़िंदा लाश बना दिया था।
शहर के बाहरी इलाके में, हाईवे के किनारे बने एक सस्ते होटल के कमरे में वह पड़ा हुआ था। उस छोटे से कमरे में शराब और सिगरेट की बदबू फैली थी। फर्श पर बिखरी खाली बोतलें और राख से भरी ऐशट्रे उसकी हताशा का जीता-जागता सबूत थीं। वह बिना नहाए, उन्हीं कपड़ों में बिस्तर पर पड़ा था। हर बार जब वह अपनी सूजी हुई आँखें बंद करता, उसे वैशाली की नफरत से भभकती आँखें, उसके तमाचे का वो दर्द जो अभी भी गाल पर महसूस होता था, और पीयूष की वह तिरस्कार भरी हँसी दिखाई देती। वैशाली के कहे वे शब्द.. उसकी नामर्दी का वो सरेआम ऐलान.. उसके दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसकी शराफत और वफादारी का चोला तार-तार हो चुका था। अब उसे वैशाली या शीला का सामना करने के खयाल भर से ही मौत से भी ज़्यादा खौफ आ रहा था; उसका सारा अहंकार उसी रात उस पुराने फ्लैट की ज़मीन में दफन हो चुका था।
इधर, दोपहर का अलसाया हुआ वक़्त था। बाहर की चिलचिलाती धूप को ड्रॉइंग रूम के भारी, मखमली पर्दों ने रोक रखा था और वैशाली के फ्लैट के वातानुकूलित हॉल में एक ठंडी, सुकून भरी खामोशी थी। शीला उस लेदर सोफे पर बिल्कुल वैसे ही इत्मीनान से बैठी थी, जैसे कोई शातिर ग्रैंडमास्टर अपनी बिछाई हुई बिसात पर अपने विरोधियों के मोहरों को कटते हुए देखने के बाद आराम फरमाता है।
वह बड़ी ही तसल्ली और बेपरवाही से अपने फोन की स्क्रीन पर इंस्टाग्राम की रील्स स्क्रॉल कर रही थी, मानो दुनिया में सब कुछ बिल्कुल सही चल रहा हो। तभी अचानक फोन वाइब्रेट हुआ और नीली रोशनी के साथ स्क्रीन पर 'पीयूष' का नाम चमका।
नाम देखते ही शीला की उँगलियाँ रुक गईं। उसकी आँखों में एक गहरी, सर्द और शिकारियों वाली चमक आ गई। होठों पर एक सधी हुई, विजयी और खूंखार मुस्कान रेंग गई। यह कॉल इस बात का पुख्ता ऐलान था कि पीयूष अब पूरी तरह से उसकी मुट्ठी में कैद हो चुका है और उसका अगला मोहरा चलने के लिए बेकरार है।
शीला ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। उसने फोन को दो-तीन बार बजने दिया, अपनी जीत के उस मीठे एहसास को पूरी तरह महसूस किया, और फिर अपने चेहरे के भावों को एक रहस्यमयी शांति में ढालते हुए, बड़े ही इत्मीनान से फोन उठाया।
फोन को अपने कान से लगाते हुए, एक बेहद गहरी, रहस्यमयी और शांत आवाज़ में शीला ने कहा, "कहो पीयूष, बरसों बाद उस झूठे गुरूर के पिंजरे से निकलकर, एक नए नवेले आज़ाद परिंदे की तरह खुली हवा में साँस लेना कैसा महसूस हो रहा है?"
फोन के दूसरी तरफ, अपने उस विशाल और अब पूरी तरह से वीरान हो चुके महल के कांच वाले गलियारे में बेचैनी से टहलते हुए, पीयूष की आवाज़ में एक अजीब सी उतावली, नफरत और गुरूर साफ झलक रहा था।
आवाज़ को थोड़ा और भारी और आक्रामक करते हुए पीयूष बोला, "आज़ादी? असली आज़ादी तो मुझे उस दिन मिलेगी भाभी, जिस दिन मैं उस औरत और उसके उस सड़े हुए अहंकार को पूरी तरह अपनी ज़िंदगी से उखाड़ कर बाहर फेंक दूँगा। मेरे वकीलों की पूरी फौज इस वक़्त तलाक के कागज़ तैयार कर रही है। मैं तो बस यही सोच रहा हूँ कि जितनी जल्दी हो सके, जाकर वो पेपर्स सीधे कविता के उस घमंडी मुँह पर मारूँ ताकि उसे उसकी असली औकात हमेशा के लिए समझ आ जाए।"
अचानक पीयूष की आवाज़ में एक हल्की सी नरमी और दबी हुई चाहत घुल गई। उसने थोड़ा झिझकते हुए पूछा, "और वैशाली? वो कैसी है अब? क्या मैं... क्या मैं आज शाम आप दोनों का हालचाल पूछने और मिलने के लिए घर आ सकता हूँ भाभी?"
पीयूष की इस हताश उतावली को बीच में ही किसी धारदार कैंची की तरह काटते हुए, और एक बेहद सख्त हिदायत के लहज़े में शीला ने कहा, "रुको पीयूष। ये तुम्हारी सबसे बड़ी बेवकूफी होगी। इतनी जल्दबाज़ी मत करो।"
शीला ने सोफे पर अपनी पीठ टिकाई और अपनी आँखें हल्की सी मूँद कर आगे कहा, "अभी माहौल को थोड़ा शांत होने दो। अगर तुमने अभी गुस्से में आकर तलाक के कागज़ उसके मुँह पर मारे, तो तुम उसे एक हथियार दे दोगे। कविता को समाज के सामने बेचारी पत्नी बनने और विक्टिम कार्ड खेलने का सुनहरा मौक़ा मिल जाएगा। लोग कहेंगे कि तुमने उसे बेघर कर दिया। नहीं पीयूष... उसे उसकी उस चुनी हुई, सीलन भरी दुनिया में थोड़ा और तड़पने दो। उसे हर रात उन पुरानी दीवारों के बीच ये भयानक एहसास होने दो कि उसने अपने झूठे गुरूर और एक कायर मर्द के लिए अपनी ज़िंदगी का कितना बड़ा दांव लगा दिया है। जब वो अंदर से पूरी तरह टूट जाएगी, तब वो कागज़ उसके हाथ में थमाना।"
पीयूष इस गहरी चाल को सुनकर खामोश था। उसी खामोशी का फायदा उठाते हुए, शीला ने अपनी आवाज़ में थोड़ा और मीठा, गाढ़ा ज़हर घोलते हुए आगे कहा, "और रही बात मेरी वैशाली की... तो उस मासूम बच्ची का भरोसा अभी-अभी एक धोखेबाज़, दोगले इंसान ने बड़ी बेरहमी से तार-तार किया है। उसका घाव अभी बहुत हरा है। अगर तुम अभी तुरंत उसके सामने गए, तो हो सकता है वो तुम्हें भी उसी शक की नज़र से देखे। उसे थोड़ा और वक़्त दो पीयूष। उस पुरानी इमारत को पूरी तरह ढहने दो, तभी तो तुम वहाँ अपनी नई बुनियाद रख पाओगे। तुम बस अपने घर के दरवाज़े खुले रखना... वैशाली को सही वक़्त पर, सही तरीके से मैं खुद तुम्हारे पास लेकर आऊँगी। तब तक अपने अंदर की इस आग को काबू में रखो, शांत रहो और बस तमाशा देखो।"
पीयूष, जो अब तक अपने गुस्से और चाहत में अंधा हो रहा था, उसे शीला की इस बिछाई हुई शतरंज और उसकी शातिर चाल में पूरा दम नज़र आया। उसे एहसास हो गया कि शीला के इशारों पर चलकर ही उसे उसकी मंज़िल मिलेगी।
एक गहरी, सर्द मुस्कान के साथ पीयूष ने हामी भरते हुए कहा, "आप बिल्कुल सही कह रही हैं भाभी। मैं इंतज़ार करूँगा... अपने दोनों मकसदों के पूरा होने का।"
यह कहकर पीयूष ने फोन काट दिया और शीला ने फोन को वापस टेबल पर रखते हुए एक बेहद खौफनाक और विजयी मुस्कान दी।
पीयूष के कॉल कटने के बाद, फोन स्क्रीन की नीली रौशनी अभी पूरी तरह से बुझी भी नहीं थी कि वो फोन कांच की टेबल पर फिर से ज़ोर से वाइब्रेट कर उठा। इस बार स्क्रीन पर 'कविता' का नाम ब्लिंक कर रहा था।
नाम देखते ही शीला के चेहरे की वो मीठी, फिक्रमंद और सधी हुई मुस्कान एक ही सेकंड में किसी गिरगिट की तरह गायब हो गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, कठोर और बेरुखी भरे भाव ने ले ली। उसने अपना काम निकाल लिया था। बिसात का जो मोहरा अपना काम कर चुका हो, उसे वापस डिब्बे में फेंक दिया जाता है, और शीला के लिए कविता अब उसी पिटे हुए, बेकार मोहरे से ज़्यादा कुछ नहीं थी। उसने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई। फोन को तीन-चार बार बजने दिया, अपनी जीत के गुरूर को महसूस किया, और फिर बड़े ही इत्मीनान से स्क्रीन स्वाइप करके फोन कान से लगा लिया।
फोन उठते ही दूसरी तरफ से एक कांपती, डरी हुई और भयानक हताशा से भरी आवाज़ में कविता ने कहा, "भाभी... अब मैं क्या करूँ? पिछले तीन दिन से मैं पापा के इस खंडहर जैसे फ्लैट में बिल्कुल अकेली पड़ी हूँ। दीवारों का सन्नाटा मुझे खाने को दौड़ रहा है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मेरा अगला कदम क्या होना चाहिए... मुझे बहुत डर लग रहा है भाभी।"
कविता की इस गिड़गिड़ाहट का शीला पर कोई असर नहीं हुआ। अपनी आवाज़ से सारी मिठास, सारी पुरानी हमदर्दी को पूरी तरह से निचोड़ते हुए शीला ने एक बिल्कुल सपाट, रूखे और अजनबी लहज़े में कहा, "इसमें मैं क्या कर सकती हूँ कविता? अब ये तुम्हारी ज़िंदगी है, तुम्हारे अपने फैसले हैं। मैंने तो तुमसे कहा नहीं था कि अपना घर छोड़कर इस खंडहर में जाकर बैठ जाओ! पिंटू से बात करो, उसी की बाँहों में जाने के लिए तो तुमने अपना बसा-बसाया घर और पति छोड़ा था न?"
शीला की इस अप्रत्याशित बेरुखी से कविता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके मुँह पर बर्फीला पानी फेंक दिया हो। रुला देने वाली बेबसी के साथ कविता ने जवाब दिया, "वो मेरा फोन ही नहीं उठा रहा है भाभी! मैंने उसे सैकड़ों कॉल किए हैं, अनगिनत मेसेज किए हैं। उस रात के तमाशे के बाद से वो पूरी तरह गायब है। मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा... मेरे पास अब कोई नहीं है। प्लीज़ मुझे बताइए कि मैं क्या करूँ? आप तो मेरे साथ हैं न भाभी?"
एक बेहद चुभने वाली, निर्मम और ठंडी हँसी हंसते हुए शीला ने कहा, "मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूँ कविता... पर ज़रा प्रैक्टिकल होकर सोचो और इस दुनियादारी को समझो। आज समाज की नज़रों में तुम कौन हो? तुम मेरी अपनी सगी बेटी का बसा-बसाया घर उजाड़ने वाली औरत हो। और मैं? मैं उस लड़की की माँ हूँ, जिसका सीधा-सादा पति उस रात तुम्हारे बिस्तर पर था और तुम उसके सामने आधी नंगी होकर अपनी हवस बुझाने की भीख मांग रही थी। अब तुम ही बताओ, समाज क्या कहेगा अगर मैं तुम्हारे साथ खड़ी नजर आई तो? चाहकर भी मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती। आगे का रास्ता अब तुम्हें खुद ही तलाशना होगा कविता।"
यह सुनते ही कविता की साँसें जैसे उसके सूखे गले में ही काँटों की तरह अटक गईं। उसका दिमाग भन्ना गया। जिस शीला भाभी ने कभी समाज की रत्तीभर भी परवाह नहीं की, जिसने उसे अपना घर तोड़ने और पिंटू को उस बंद कमरे में अपने जिस्म के जाल में फंसाने के लिए उकसाया था... आज वही शीला भाभी समाज और मर्यादा की झूठी दुहाइयाँ दे रही थी!
शीला की आवाज़ अब किसी तेज़ धार वाले ज़हरीले खंजर की तरह हो गई थी, जो सीधे कविता के सीने के पार हो रही थी। उसने अपना आखिरी और सबसे घातक वार करते हुए कहा, "अब ये तुम्हारी जंग है कविता। ये तुम्हारा फैलाया हुआ रायता है, और इसे तुम्हें ही समेटना होगा। ये मेरी लड़ाई नहीं है, और सच कहूँ तो मैं अब इन सब झमेलों से बहुत थक चुकी हूँ।"
इससे पहले कि कविता के कांपते होठों से कोई सफाई, कोई गाली या कुछ और निकल पाता.. क्लिक! शीला ने बेरहमी से फोन काट दिया।
दूसरी तरफ, उस पुराने फ्लैट के अँधेरे में बैठी कविता के पसीने से भीगे हाथों से फोन छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। शीला के उन ज़हरीले शब्दों ने उसे अंदर तक सुन्न कर दिया था। कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और उसकी अपनी भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
उसे आज पहली बार ये भयानक और नंगा एहसास हुआ कि वो कभी शीला की करीबी, उसकी राज़दार या उसकी दोस्त थी ही नहीं। वो तो महज़ एक बेवकूफ कठपुतली थी.. एक ऐसा मोहरा जिसे शीला ने पीयूष के घर से अपनी बेटी का रास्ता साफ करने और पिंटू जैसे नामर्द कांटे को रास्ते से हटाने के लिए बड़ी ही चालाकी से इस्तेमाल किया था। और आज, जब शीला का काम निकल गया था, तो उसने कविता की पूरी ज़िंदगी को एक झटके में कचरे के डिब्बे में फेंक दिया था। कविता के पास अब न अपना गुरूर बचा था, न पीयूष का वो महल, न पिंटू का झूठा सहारा और न ही शीला का वो ज़हरीला साथ। वह पूरी तरह, मुकम्मल तौर पर बर्बाद हो चुकी थी।
कविता का फोन बेरहमी से काटने के बाद, शीला ने उस महंगे लेदर सोफे पर अपनी पीठ टिकाई। उसके चेहरे पर एक बेहद शातिर और मुकम्मल जीत का गुरूर था। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी इस शानदार कामयाबी पर जीत की एक लंबी, सुकून भरी साँस लेनी चाही, लेकिन...
साँस अभी उसके फेफड़ों में पूरी तरह भर भी नहीं पाई थी कि अचानक उसके पेट के निचले हिस्से में एक बेहद तेज़, जानलेवा ऐंठन उठी। ऐसा लगा जैसे किसी ने एक साथ कई जंग लगी सुइयां और कांच के टुकड़े उसके मांस में गहराई तक उतार दिए हों। शीला की आँखें खौफ से झटके से खुल गईं और उसका चेहरा दर्द के मारे बुरी तरह सिकुड़ गया। जीत का वो सारा गुरूर और वो मीठी मुस्कान एक ही सेकंड में हवा हो गई। उसने झटके से अपने दोनों हाथ अपने पेट के निचले हिस्से पर कसकर दबा लिए और एक सिसकी, जो लगभग एक दबी हुई चीख जैसी थी, उसके सूखे होठों से निकल गई।
शीला का पूरा शरीर उस सोफे पर दोहरा हो गया। दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश में सोफे के कुशन को भींचते हुए उसकी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे।
यह दर्द... यह दर्द कोई मामूली थकावट या गैस का दर्द नहीं था, और सच तो यह था कि यह उसके लिए बिल्कुल नया भी नहीं था। पिछले कुछ हफ्तों से उसे अक्सर कमर के निचले हिस्से और पेट में एक भारी, मीठा-मीठा दर्द और ऐंठन महसूस हो रही थी जिसे वो उम्र का तकाज़ा या पीयूष के साथ उस रात हुई घनघोर चुदाई का साइड इफेक्ट समझकर अनदेखा कर रही थी। लेकिन आज? आज यह बर्दाश्त की हर हद पार कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उसके शरीर के भीतर कोई चीज़ उसे ज़िंदा नोच कर खा रही हो।
दर्द के उस भयंकर बवंडर के साथ-साथ, उसे एक अजीब सी, हड्डियां तोड़ देने वाली थकान महसूस हो रही थी। एक ऐसी मनहूस थकान मानो उसके शरीर का सारा खून और उसकी ताक़त किसी ने एक ही झटके में निचोड़ ली हो। उसे अपना ही शरीर एक भारी बोझ लगने लगा था, जिसे उठाना अब उसकी मांसपेशियों के बस में नहीं था।
माथे पर आए ठंडे पसीने को पोंछते हुए और हाँफते हुए, शीला का दिमाग अचानक आज सुबह के उस खौफनाक मंज़र की तरफ चला गया।
सुबह जब वो वॉशरूम में थी, तो सफेद टाइल्स वाली उस तेज़, ठंडी रौशनी में उसने कुछ ऐसा देखा था जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी थी.. असामान्य, गाढ़ा और भारी खून का धब्बा अपनी पैंटी पर नजर आया। उसका मेनोपॉज़ दस सालों पहले ही हो चुका था, फिर यह खून कहाँ से आ रहा था? उस पल जो मौत सा ठंडा खौफ उसके सीने में उठा था, वो ज़िंदगी की किसी भी हार के खौफ से कहीं ज़्यादा बड़ा था।
शीला ने कांपते हाथों से पास कांच की टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाना चाहा, लेकिन कमज़ोरी के मारे गिलास उसके हाथ से छलक गया और पानी ज़मीन पर गिर पड़ा।
"कुछ... कुछ नहीं है... ये कुछ भी नहीं है," शीला ने खुद को तसल्ली देते हुए, एक टूटी हुई और हांफती आवाज़ में खुद से बड़बड़ाई।
उसने गहरी-गहरी साँसें लेते हुए खुद के डर को दबाना शुरू किया, "बस... बस इस सारी भागदौड़ की वजह से हुआ है। कविता, पीयूष, पिंटू.. इन सबके ड्रामे, रतजगे और स्ट्रेस की वजह से शरीर थक गया है। उम्र हो रही है, हार्मोन्स का कोई ऊपर-नीचे होना होगा। मैं.. मैं इतनी आसानी से बीमार नहीं पड़ सकती। मेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ है.. मुझे अभी वैशाली को उस महल में राज करते हुए देखना है।"
लेकिन शीला की ये बड़बड़ाहट उसके अंदर के उस भयानक डर को शांत नहीं कर पा रही थी। वो चाहे अपने दिमाग को जितनी भी तसल्लियां दे ले, अंदर ही अंदर एक अनजाना खौफ उसकी नसों में दीमक की तरह सुगबुगाने लगा था। वो एक बेहद चालाक औरत थी, और उसका खुद का दिमाग उसे चीख-चीख कर बता रहा था कि ये सिर्फ स्ट्रेस नहीं है, बल्कि उसके शरीर के भीतर कुछ तो उबल रहा है।
शीला का दिमाग अभी अपने शरीर के भीतर उठ रहे उस खौफनाक दर्द को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि अचानक कांच की टेबल पर रखा उसका फोन एक तेज़ रिंगटोन के साथ फिर से बज उठा। फोन की उस अचानक हुई आवाज़ से शीला के तने हुए शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने कांपती आँखों से स्क्रीन की तरफ देखा। कॉलर आईडी पर 'मदन' का नाम फ्लैश हो रहा था।
पिछले तीन दिनों में मदन के अनगिनत फोन आ चुके थे, जिन्हें वह लगातार किसी न किसी बहाने से टाल रही थी। मदन यहाँ चल रहे सारे हँगामों से अनजान था। शीला उसे सब कुछ बताना चाहती थी लेकिन इस वक़्त, उस भयानक शारीरिक ऐंठन के बीच मदन की झुंझलाहट और सवालों का सामना करना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था। फिर भी, शीला वो औरत थी जिसने ज़िंदगी में कभी अपनी कमज़ोरी किसी के सामने ज़ाहिर नहीं की थी.. अपने पति के सामने तो बिल्कुल भी नहीं। उसने एक लंबी, कांपती हुई साँस ली, सोफे का हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को ज़बरदस्ती थोड़ा सीधा किया। चेहरे पर दर्द की लकीरों को एक सख्त नकाब के पीछे छुपाते हुए उसने फोन कान से लगा लिया।
फोन उठते ही, बिना कोई हाल-चाल पूछे, एक तेज़, अधिकार से भरी और झुंझलाहट वाली आवाज़ में मदन ने कहा, "शीला! कब तक वैशाली के घर पर डेरा डाले रहने का इरादा है? यहाँ घर का पूरा रूटीन कबाड़ हो गया है तेरे बिना। मेरी सुबह की दवाइयां कहाँ रखी हैं मुझे नहीं पता, मेरी फाइलें नहीं मिल रहीं... कब लौट रही है तू?"
मदन एक सेकंड के लिए रुका और फिर थोड़ा और चिढ़ते हुए अपनी उसी टिपिकल सोच के साथ बोला, "और वैशाली? वो ठीक है न अब? पिंटू के साथ जो भी छोटी-मोटी अनबन थी, वो सुलझ गई न? देख शीला, दामाद के घर में सास का इतने दिन टिकना अच्छा नहीं लगता। लोग बातें बनाते हैं। तू अब जल्द ही वापस आ जा!"
शीला के पेडू में दर्द की एक और ज़ोरदार लहर उठी। उसने अपने होंठों को इतनी ज़ोर से भींचा कि उन पर दाँतों के निशान पड़ गए। अपने माथे और गर्दन पर आई पसीने की उन ठंडी, चिपचिपी बूँदों को अपने भारी दुपट्टे से पोंछते हुए और अपनी आवाज़ की कांपन को पूरी तरह काबू में करते हुए शीला ने एक बेहद सधी हुई और धारदार आवाज़ में जवाब दिया।
"मदन, तेरी यही आदत मुझे हमेशा से चुभती है। यहाँ मेरी बच्ची का पूरा संसार उजड़ने की कगार पर था, और तुझे अपनी दवाइयों और फाइलों की पड़ी है?" शीला की आवाज़ में अब वो पुरानी, हुक्म चलाने वाली और हावी होने वाली टोन वापस लौट आई थी, जो उसके अंदर के दर्द को ढंकने का सबसे बेहतरीन हथियार थी।
उसने एक गहरी साँस ली और लहज़े को थोड़ा और सख्त करते हुए कहा, "मैं यहाँ कोई छुट्टियां मनाने या दामाद की रोटियां तोड़ने नहीं रुकी हूँ मदन। तेरी उस लाड़ली बेटी का घर टूटते-टूटते बचा है। जो गंदगी उस घर में पनप रही थी, उसे मैंने अपने हाथों से साफ किया है। अब बस कुछ चीज़ें और सेट करनी बाकी हैं।"
मदन की तरफ से कुछ बोलने की कोशिश हुई, लेकिन शीला ने उसे बीच में ही काट दिया, "और समाज की और दामाद के घर टिकने की चिंता तू मत कर। पिंटू को उसकी असली जगह दिखा दी है मैंने। अब वो इस घर में क्या, वैशाली की नज़रों में भी कभी सर उठाने लायक नहीं बचा। तू बेकार में वहाँ बैठकर अपनी फिक्र मत कर और अपना ब्लड प्रेशर मत बढ़ा। मैं अपना काम पूरा करके जल्द ही आ जाऊंगी।"
यह कहकर शीला ने मदन के किसी भी और सवाल या शिकायत का इंतज़ार किए बिना फोन खट से काट दिया।
फोन वापस टेबल पर रखते ही, उसकी वो सख़्त आवाज़ और वो झूठा गुरूर फिर से भरभरा कर टूट गया। वो एक बार फिर पेट पकड़ कर, दर्द से कराहते हुए सोफे पर निढाल होकर गिर सी गई.. इस बार पहले से भी ज़्यादा कमज़ोर, पसीने से तर-बतर और लाचार होकर।
तभी किचन से ताज़ा बनी कॉफी की सोंधी महक आई। वैशाली एक ट्रे में दो मग कॉफी लेकर भारी और थके हुए कदमों से बाहर आ रही थी। लेकिन जैसे ही उसकी नज़रें सोफे पर पड़ीं, उसके कदमों की गति अचानक वहीं जम गई। सामने का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
शीला सोफे पर बुरी तरह दोहरी हो चुकी थी। उसने अपने दोनों हाथों से अपना पेडू कसकर पकड़ा हुआ था और उसका चेहरा दर्द के मारे किसी सफेद कागज़ की तरह फक पड़ चुका था। माथे और गर्दन से टपकते ठंडे पसीने की बूँदें हॉल की रोशनी में चमक रही थीं और वह दर्द को दबाने की कोशिश में बुरी तरह हाँफ रही थी। शीला ने वैशाली को देखते ही जल्दी से मदन का कॉल काट दिया, ताकि वह कोई सवाल न पूछ सके।
वैशाली के हाथों में पकड़ी ट्रे बुरी तरह कांप उठी, जिससे गर्म कॉफी छलक कर ट्रे में गिर गई। उसने किसी तरह खुद को संभाला, लपककर आगे बढ़ी और ट्रे को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, अपनी माँ के पास घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई।
उसने शीला के ठंडे, पसीने से तर-बतर चेहरे को अपने हाथों में लिया और एक घबराहट से भरी, कांपती आवाज़ में पूछा, "मम्मी! ये क्या हालत हो रही है तुम्हारी? तुम ठीक तो हो? हे भगवान, तुम्हारा चेहरा... ये बिल्कुल सफेद पड़ गया है! तुम तो पसीने से पूरी भीग रही हो। दर्द कहाँ हो रहा है?"
शीला ने अपने चेहरे की सिकुड़न और दर्द को ज़बरदस्ती गले के नीचे उतारने की नाकाम कोशिश की। उसने वैशाली का हाथ हल्के से दबाते हुए, एक बेहद कमज़ोर, खोखली और बनावटी मुस्कान के साथ अपनी तकलीफ़ को छुपाना चाहा, "अरे... कुछ नहीं मेरी बच्ची। तू ऐसे ही घबरा रही है। बस थोड़ी भयंकर वाली एसिडिटी और थकान हो गई है। पिछले कुछ दिनों से सही से खाना-पीना और नींद नहीं हुई न... बस वही है। और फिर... उम्र भी तो हो रही है अब तुम्हारी मम्मी की, शरीर कभी-कभी जवाब दे ही देता है।"
लेकिन वैशाली अब वो पुरानी, नासमझ बच्ची नहीं थी जिसे आसानी से इन गोल-मोल बातों में बेवकूफ बनाया जा सके। पिछले कुछ दिनों के धोखे और सदमे ने उसे बहुत तीखा और ऑब्ज़र्वेंट बना दिया था। उसने शीला की इस झूठी तसल्ली को सिरे से खारिज कर दिया।
शीला के बिल्कुल करीब खिसकते हुए, उसने एक बेहद सख्त, तीखे और अधिकार भरे लहज़े में अपनी माँ को डपटते हुए कहा, "बकवास मत करो मम्मी! एसिडिटी में किसी का चेहरा ऐसे मुर्दे की तरह पीला नहीं पड़ता। मैं अंधी नहीं हूँ। मैं पिछले दो दिन से नोटिस कर रही हूँ, तुम बात करते-करते अचानक अपना पेट पकड़ कर कराह उठती हो। रात को तुम्हारी पीठ में भी इतना भयंकर दर्द होता है कि तुम करवट तक नहीं ले पातीं।"
वैशाली ने शीला की आँखों में सीधा देखते हुए अपना अटल फैसला सुनाया, "तुम्हारा शरीर अंदर से बहुत कमज़ोर लग रहा है और तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। मुझे और कोई झूठा बहाना नहीं सुनना है अब। हम अभी, इसी वक़्त डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम यहीं बैठो, मैं अभी क्लिनिक में अपॉइंटमेंट फिक्स करती हूँ।"
शीला अंदर से डर गई। अगर वैशाली उसे डॉक्टर के पास ले गई, तो सारे टेस्ट होंगे और कुछ न कुछ निकलेगा। उसने घबराकर मना करने और बात को टालने के लिए मुँह खोला ही था कि...
ट्रिंग... ट्रिंग...!!
तभी उस भारी, फिक्रमंद और तनावपूर्ण माहौल को बीच से चीरती हुई, वैशाली के फोन की तेज़ रिंगटोन गूँज उठी।
वैशाली ने झुंझलाते हुए फोन उठाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र स्क्रीन पर फ्लैश हो रहे नाम पर पड़ी, उसकी उँगलियाँ वहीं जम गईं। कुछ ही सेकंड पहले उसके चेहरे पर अपनी माँ के लिए जो गहरी फिक्र और चिंता थी, वो एक ही पल में वाष्प बनकर उड़ गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, खौफनाक और बर्फ जैसी सख्त बेरुखी ने ले ली। उसकी त्योरियां चढ़ गईं और जबड़े गुस्से से तन गए।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था 'पापा जी' (पिंटू के पिता)।
वैशाली ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले अपने सीने में हवा भरता है। उसने अपनी आँखों को पल भर के लिए बंद किया और अपने अंदर के उस पुराने, कमज़ोर हिस्से को हमेशा के लिए कहीं दफन कर दिया। जब उसने फोन उठाया, तो उसकी आवाज़ में वो पुरानी, मीठी, सहमी हुई और 'संस्कारी बहू' वाली नज़ाकत रत्ती भर भी नहीं थी, जो अक्सर ससुर का फोन आने पर उसके लहज़े में चाशनी की तरह घुल जाती थी। उसकी जगह एक बेहद ठंडी, निडर और पत्थर जैसी सख्त औरत की बेरुखी ने ले ली थी।
बिना कोई औपचारिक अभिवादन किए, एक बिल्कुल सपाट और रूखे लहज़े में वैशाली ने कहा, "जी पापा जी... कहिए? आज अचानक इस वक़्त कैसे फोन किया?"
दूसरी तरफ से एक घबराई हुई, हकलाती और दबी-दबी सी आवाज़ आई। पिंटू के पिता कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके शब्दों में एक अजीब सी हड़बड़ाहट और खौफ था। उनकी वो कांपती हुई आवाज़ सुनते ही वैशाली के चेहरे के भाव तेज़ी से बदलने लगे। उसकी आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ गईं।
हैरानी, लेकिन एक खौफनाक संयम के साथ वैशाली ने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए जवाब दिया, "क्या? लेकिन आप लोग तो अगले हफ्ते आने वाले थे न? ये अचानक प्रोग्राम कैसे बदल गया?"
फोन के दूसरी तरफ से फिर कुछ घबराहट भरे शब्द सुनाई दिए..'अचानक काम आ गया', 'पिंटू से बात नहीं हो रही', 'हम बस आ रहे हैं'।
वैशाली के होठों पर एक कड़वी, तिरस्कार भरी मुस्कान आ गई। वह सब कुछ समझ चुकी थी। उसने बेहद ठंडे और अंतिम अंदाज़ में कहा, "अच्छा... कल सुबह की फ्लाइट है? जी ठीक है... आइए। नहीं पिंटू कहाँ है वो मुझे भी नहीं पता.. नहीं मैं एयरपोर्ट लेने नहीं आ सकती.. आप कैब लेकर आ जाना.. जी, ठीक है।"
वैशाली ने बिना उनके कुछ और कहने का इंतज़ार किए 'खट' से फोन काट दिया और मोबाइल को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, एक भारी साँस छोड़ कर सोफे के बैकरेस्ट पर टिक गई। दर्द की वजह से दोहरी हो रही शीला ने अपनी उँगलियों के बीच से, आशंकित और सवालिया नज़रों से अपनी बेटी के इस आक्रामक रूप को देखा।
अपनी दोनों मुट्ठियों को इतनी ज़ोर से भींचते हुए कि उसके नाखून हथेलियों में चुभने लगे, वैशाली ने एक खुरदरी, ज़हरीली आवाज़ में कहा, "पिंटू के मम्मी-पापा आ रहे हैं मम्मी। कल सुबह की फ्लाइट है उनकी। मुझे पक्का यकीन है कि उस नामर्द ने अपनी गंदी करतूत छुपाने के लिए उन्हें फोन करके कोई उल्टी-सीधी, मनगढ़ंत कहानी सुनाई है। या फिर वो अपने माँ-बाप को ढाल बनाकर यहाँ इमोशनल ब्लैकमेल का गंदा खेल खेलने आ रहा है।"
वैशाली की आँखों में अब एक खूंखार चमक थी, उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "रो-धो कर, 'परिवार मत तोड़ो', 'औरतों को समझौता करना पड़ता है' और 'समाज क्या कहेगा' का वास्ता देकर वो लोग सोच रहे हैं कि मैं पिंटू के उस गंदे गुनाह को माफ कर दूँगी? जो भी है मम्मी... कल इस घर में बहुत बड़ा तमाशा होने वाला है। और यकीन मानो, इस बार तमाशा वो लोग नहीं, मैं करूँगी!"
यह सुनते ही शीला का माथा बुरी तरह ठनक गया। पिंटू के माता-पिता का नाम सुनते ही उसे उबकाई सी आने लगी। पिंटू के माता-पिता यानी वही टिपिकल मिडिल-क्लास सोच, रोना-धोना, रिश्तों की झूठी दुहाई और फालतू का जज़्बाती ड्रामा। शीला बहुत अच्छी तरह जानती थी कि अगर वो कल यहाँ रुकी, तो उसे उस पूरे कीचड़ में उतरना पड़ेगा। उसे उन लोगों की बकवास सुननी पड़ेगी और अपनी बेटी का घर तुड़वाने के इल्ज़ामों की जवाबदेही देनी पड़ेगी।
और उसका शरीर...? शीला ने अपने पेट को और कसकर दबा लिया। उसका कमज़ोर पड़ रहा शरीर अब इस नए ड्रामे का मानसिक और शारीरिक बोझ उठाने की हालत में बिल्कुल नहीं था। जैसी किसी शारीरिक तकलीफ के वो अनजाने, लेकिन खौफनाक लक्षण उसे अंदर ही अंदर किसी दीमक की तरह खोखला कर रहे थे। एक ऐसा भयंकर दर्द जो उसकी रगों का खून सोख रहा था। उसे लगा जैसे उसका शरीर चीख-चीख कर कह रहा हो कि अब यहाँ वो ज्यादा देर रुक नहीं पाएगी।
शीला ने अपने कांपते हुए हाथों से सोफे का भारी लेदर हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को एक झटके से सीधा करने की कोशिश की। इस कोशिश में उसकी रीढ़ की हड्डी से लेकर पेडू तक एक भयंकर टीस उठी, लेकिन उसने अपने होठों को ज़ोर से भींचकर उस दर्दनाक चीख को बाहर नहीं आने दिया। दर्द ने उसका शरीर ज़रूर निचोड़ लिया था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी वही पुरानी, खूंखार और शातिर चमक ज़िंदा थी, जो किसी भी शिकारी के पास अपने शिकार को जाल में फड़फड़ाते हुए देखने के बाद होती है। बस फर्क इतना था कि अब उसका अपना ही शरीर उसके खिलाफ बगावत कर रहा था।
एक गहरी, कांपती हुई साँस लेते हुए और अपने माथे का पसीना पोंछते हुए शीला ने कहा, "वैशाली... मुझे लगता है कि अब मुझे तुम्हारे पापा के पास घर लौट जाना चाहिए। मदन वहाँ अकेले बहुत परेशान है, पूरा घर सर पर उठा रखा है उसने। और सच कहूँ मेरी बच्ची.. तो मेरी तबियत भी अब कुछ ठीक नहीं लग रही। मुझे अपने घर जाकर आराम करने की ज़रूरत है। वहीं हमारे फैमिली डॉक्टर को दिखा दूँगी।"
शीला थोड़ा रुकी, उसने एक पल के लिए अपनी बेटी के चेहरे के सख्त भावों को पढ़ा और फिर अपनी उसी पुरानी चालाकी के साथ बोली, "और वैसे भी, अगर कल सुबह मैं यहाँ पिंटू के माँ-बाप के सामने मौजूद रही, तो उन छोटी सोच वाले लोगों को यही लगेगा कि मैं तुम्हारा कान भर रही हूँ। वो अपनी औलाद के निकम्मेपन का सारा ठीकरा मेरे सिर फोड़ेंगे और समाज में ढिंढोरा पीटेंगे कि मैंने तुम्हारा बसा-बसाया घर तुड़वा दिया। मैं उनके उस गंदे कीचड़ में नहीं उतरना चाहती और न ही फालतू की सफाई देना चाहती हूँ।"
वैशाली ने बिना कुछ कहे अपनी माँ की उन थकी हुई, पीली पड़ चुकी और बीमार आँखों में झांका। जिन आँखों में उसने बचपन से हमेशा एक अटल गुरूर और हुक्म देखा था, आज वो आँखें किसी अनजाने दर्द से धुंधला रही थीं। उसे साफ समझ आ रहा था कि उसकी माँ कोई बहाना नहीं बना रही है, बल्कि सच में शारीरिक रूप से बुरी तरह टूट रही है।
वैशाली सोफे से उठी। उसने आगे बढ़कर अपनी माँ के उन ठंडे, पसीने से भीगे हाथों को अपनी हथेलियों की गर्माहट में कसकर थाम लिया। उसकी अपनी आँखों में अब कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक खौफनाक और बर्फ जैसा ठंडा आत्मविश्वास था।
"तुम बेफिक्र होकर जाओ मम्मी," वैशाली की आवाज़ किसी सधे हुए तीर की तरह थी, "तुम्हें इस वक़्त सबसे ज़्यादा अपनी सेहत पर ध्यान देने की सख़्त ज़रूरत है। मैं अभी तुम्हारे लिए कैब बुक करवाती हूँ।"
वैशाली ने शीला के हाथों को हल्का सा दबाया और अपनी आवाज़ को और सख्त करते हुए कहा, "और जहाँ तक पिंटू के उन माँ-बाप और कल सुबह होने वाले उनके इस घिनौने, जज़्बाती ड्रामे का सवाल है... उसे मैं अकेले, अपने तरीके से हैंडल करूँगी। उन्हें लगता है कि वो रो-धोकर मुझ पर दबाव बना लेंगे? अब मैं वो पुरानी, बेवकूफ और डरी हुई वैशाली नहीं हूँ जो उनकी मीठी बातों में आ जाएगी या रिश्ते बचाने के खोखले बोझ तले दबकर अपना वजूद मिटा देगी। पिंटू ने जो घिनौना खेल खेला है, उसकी सज़ा उसे और उसके उस संस्कारी परिवार को भुगतनी ही पड़ेगी। कल उन्हें उनकी असली औकात मैं खुद दिखाऊँगी, ये मेरा वादा है तुमसे।"
शीला ने अपनी बेटी की उन बड़ी-बड़ी आँखों में वो भभकती हुई आग साफ देखी.. वही नफरत और बगावत की आग, जो उसने खुद बड़ी चालाकी से वहाँ जलाई थी। उसे अब पूरा यकीन हो गया था कि वैशाली अब दुनिया के किसी भी दबाव, किसी भी रिश्ते की दुहाई में नहीं पिघलेगी। पीयूष के उस करोड़ों के महल और वैशाली के बीच का रास्ता अब बिल्कुल साफ था, कोई कांटा नहीं बचा था।
पेडू में उठ रही सुइयों जैसी चुभन और पीठ के भयंकर दर्द से कराहते हुए भी, शीला के होंठों पर अपनी इस शानदार जीत के सुकून की एक हल्की, शैतानी मुस्कान थी। उसी शाम, उसने बहुत ही मुश्किल से अपना सूटकेस बंद किया और मदन के पास लौटने के लिए नीचे इंतज़ार कर रही कैब में जाकर बैठ गई।
कैब ने रफ्तार पकड़ी और वैशाली का घर पीछे छूटने लगा। शहर की चमचमाती रोशनियों के बीच, कैब की पिछली सीट पर शीला दर्द से दोहरी हो रही थी। वह अपनी जीत का परचम लहरा कर, अपना मास्टरस्ट्रोक खेलकर वापस जा रही थी।
खेल अभी खत्म नहीं हुआ था, बल्कि अब एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ मोहरे नहीं.. पर बिसात बिछाने वाली खुद मात खाने वाली थी।
Next update tomorrowmast hai...update pls
















Thanks a lot for the commentsWelcome ji

Thanks a lot for the commentsशानदार, हमेशा की तरह
