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Adultery शीला की लीला -५५ साल की शीला की जवानी (Completed)

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Ek number

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

उस भयावह साजिश के बाद, जहाँ शीला ने पिंटू और कविता को फंसाकर वैशाली और पीयूष के सामने बेनकाब कर दिया था, कहानी अब एक नए मोड़ पर आ जाती है। इस बार का अपडेट फाल्गुनी और मौसम के इर्द-गिर्द घूमती है।

रात के अंधेरे में, फाल्गुनी अपने पड़ोसी मदन अंकल को रूखी और चम्पा नामक दो महिलाओं के साथ अत्यंत उत्तेजक हालत में देखती है। यह दृश्य उसे बेहद गर्म कर देता है। वापस आकर वह अपनी सहेली मौसम को अपने सभी राज बताती है – राजेश सर, मदन अंकल और शीला भाभी के साथ अपने संबंधों के बारे में, और आज रात का खुलासा भी। मौसम, जो पहले से ही फाल्गुनी के अपने पिता के साथ संबंधों के बारे में जानती है, इन बातों से हैरान नहीं होती, बल्कि वासना से भर जाती है।

फाल्गुनी मौसम को रसिक दूधवाले के बारे में बताती है, जिसके पास बहुत बड़ा और मोटा लंड है। मौसम उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाती है। फाल्गुनी रसिक को बुलाती है, और मौसम बाथरूम में छिपकर उनकी कामुक क्रियाओं को देखने का फैसला करती है।

जब रसिक आता है, तो फाल्गुनी उसके साथ अत्यंत उत्तेजक और स्पष्ट यौन संबंध बनाती है। वह उसके विशाल लिंग को मुँह में लेती है और फिर उसके साथ ज़बरदस्त संभोग करती है। मौसम यह सब छिपकर देखती है और बेहद उत्तेजित हो जाती है। संभोग के बाद, रसिक चला जाता है और मौसम बाहर आती है। वह फाल्गुनी से कहती है कि रसिक के लिंग को देखकर वह इतनी गर्म हो गई है कि अब उसे भी किसी असली मर्द की ज़रूरत है। फाल्गुनी उसे बिस्तर पर गिरा देती है, जिससे संकेत मिलता है कि वे दोनों अब आपस में यौन क्रिया करने वाली हैं।

अब आगे देखते है की शीला और वैशाली की ज़िंदगी में क्या हो रहा है..
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उस खौफ़नाक रात के तमाशे को गुज़रे हुए पूरे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन वैशाली के उस आलीशान फ्लैट में पसरा सन्नाटा अभी भी किसी क़ब्रिस्तान जैसा भारी, वीरान और दम घोंटने वाला था। घर की हर एक दीवार, हर एक कोना जैसे उस रात की चीखों, टूटे हुए गुरूर और विश्वासघात की गवाही दे रहा था। दिन के उजाले में भी उस घर के भीतर एक अजीब सा, घुटन भरा अंधकार छाया रहता था, मानो वक़्त वहीं ठहर गया हो।

दूसरी तरफ, पिंटू शहर में ही था, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो अपने ही बनाए उस घर की चौखट पर एक कदम भी रख सके। रंगे हाथों पकड़े जाने की वह भयानक और नंगी शर्म, अपनी खोखली मर्दानगी का वह सरेआम पर्दाफाश और वैशाली के उस ज़ोरदार तमाचे की गूँज ने पिंटू को अंदर तक चीर कर एक ज़िंदा लाश बना दिया था।

शहर के बाहरी इलाके में, हाईवे के किनारे बने एक सस्ते होटल के कमरे में वह पड़ा हुआ था। उस छोटे से कमरे में शराब और सिगरेट की बदबू फैली थी। फर्श पर बिखरी खाली बोतलें और राख से भरी ऐशट्रे उसकी हताशा का जीता-जागता सबूत थीं। वह बिना नहाए, उन्हीं कपड़ों में बिस्तर पर पड़ा था। हर बार जब वह अपनी सूजी हुई आँखें बंद करता, उसे वैशाली की नफरत से भभकती आँखें, उसके तमाचे का वो दर्द जो अभी भी गाल पर महसूस होता था, और पीयूष की वह तिरस्कार भरी हँसी दिखाई देती। वैशाली के कहे वे शब्द.. उसकी नामर्दी का वो सरेआम ऐलान.. उसके दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसकी शराफत और वफादारी का चोला तार-तार हो चुका था। अब उसे वैशाली या शीला का सामना करने के खयाल भर से ही मौत से भी ज़्यादा खौफ आ रहा था; उसका सारा अहंकार उसी रात उस पुराने फ्लैट की ज़मीन में दफन हो चुका था।
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1
इधर, दोपहर का अलसाया हुआ वक़्त था। बाहर की चिलचिलाती धूप को ड्रॉइंग रूम के भारी, मखमली पर्दों ने रोक रखा था और वैशाली के फ्लैट के वातानुकूलित हॉल में एक ठंडी, सुकून भरी खामोशी थी। शीला उस लेदर सोफे पर बिल्कुल वैसे ही इत्मीनान से बैठी थी, जैसे कोई शातिर ग्रैंडमास्टर अपनी बिछाई हुई बिसात पर अपने विरोधियों के मोहरों को कटते हुए देखने के बाद आराम फरमाता है।

वह बड़ी ही तसल्ली और बेपरवाही से अपने फोन की स्क्रीन पर इंस्टाग्राम की रील्स स्क्रॉल कर रही थी, मानो दुनिया में सब कुछ बिल्कुल सही चल रहा हो। तभी अचानक फोन वाइब्रेट हुआ और नीली रोशनी के साथ स्क्रीन पर 'पीयूष' का नाम चमका।

नाम देखते ही शीला की उँगलियाँ रुक गईं। उसकी आँखों में एक गहरी, सर्द और शिकारियों वाली चमक आ गई। होठों पर एक सधी हुई, विजयी और खूंखार मुस्कान रेंग गई। यह कॉल इस बात का पुख्ता ऐलान था कि पीयूष अब पूरी तरह से उसकी मुट्ठी में कैद हो चुका है और उसका अगला मोहरा चलने के लिए बेकरार है।

शीला ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। उसने फोन को दो-तीन बार बजने दिया, अपनी जीत के उस मीठे एहसास को पूरी तरह महसूस किया, और फिर अपने चेहरे के भावों को एक रहस्यमयी शांति में ढालते हुए, बड़े ही इत्मीनान से फोन उठाया।

फोन को अपने कान से लगाते हुए, एक बेहद गहरी, रहस्यमयी और शांत आवाज़ में शीला ने कहा, "कहो पीयूष, बरसों बाद उस झूठे गुरूर के पिंजरे से निकलकर, एक नए नवेले आज़ाद परिंदे की तरह खुली हवा में साँस लेना कैसा महसूस हो रहा है?"

फोन के दूसरी तरफ, अपने उस विशाल और अब पूरी तरह से वीरान हो चुके महल के कांच वाले गलियारे में बेचैनी से टहलते हुए, पीयूष की आवाज़ में एक अजीब सी उतावली, नफरत और गुरूर साफ झलक रहा था।

आवाज़ को थोड़ा और भारी और आक्रामक करते हुए पीयूष बोला, "आज़ादी? असली आज़ादी तो मुझे उस दिन मिलेगी भाभी, जिस दिन मैं उस औरत और उसके उस सड़े हुए अहंकार को पूरी तरह अपनी ज़िंदगी से उखाड़ कर बाहर फेंक दूँगा। मेरे वकीलों की पूरी फौज इस वक़्त तलाक के कागज़ तैयार कर रही है। मैं तो बस यही सोच रहा हूँ कि जितनी जल्दी हो सके, जाकर वो पेपर्स सीधे कविता के उस घमंडी मुँह पर मारूँ ताकि उसे उसकी असली औकात हमेशा के लिए समझ आ जाए।"

अचानक पीयूष की आवाज़ में एक हल्की सी नरमी और दबी हुई चाहत घुल गई। उसने थोड़ा झिझकते हुए पूछा, "और वैशाली? वो कैसी है अब? क्या मैं... क्या मैं आज शाम आप दोनों का हालचाल पूछने और मिलने के लिए घर आ सकता हूँ भाभी?"

पीयूष की इस हताश उतावली को बीच में ही किसी धारदार कैंची की तरह काटते हुए, और एक बेहद सख्त हिदायत के लहज़े में शीला ने कहा, "रुको पीयूष। ये तुम्हारी सबसे बड़ी बेवकूफी होगी। इतनी जल्दबाज़ी मत करो।"

शीला ने सोफे पर अपनी पीठ टिकाई और अपनी आँखें हल्की सी मूँद कर आगे कहा, "अभी माहौल को थोड़ा शांत होने दो। अगर तुमने अभी गुस्से में आकर तलाक के कागज़ उसके मुँह पर मारे, तो तुम उसे एक हथियार दे दोगे। कविता को समाज के सामने बेचारी पत्नी बनने और विक्टिम कार्ड खेलने का सुनहरा मौक़ा मिल जाएगा। लोग कहेंगे कि तुमने उसे बेघर कर दिया। नहीं पीयूष... उसे उसकी उस चुनी हुई, सीलन भरी दुनिया में थोड़ा और तड़पने दो। उसे हर रात उन पुरानी दीवारों के बीच ये भयानक एहसास होने दो कि उसने अपने झूठे गुरूर और एक कायर मर्द के लिए अपनी ज़िंदगी का कितना बड़ा दांव लगा दिया है। जब वो अंदर से पूरी तरह टूट जाएगी, तब वो कागज़ उसके हाथ में थमाना।"

पीयूष इस गहरी चाल को सुनकर खामोश था। उसी खामोशी का फायदा उठाते हुए, शीला ने अपनी आवाज़ में थोड़ा और मीठा, गाढ़ा ज़हर घोलते हुए आगे कहा, "और रही बात मेरी वैशाली की... तो उस मासूम बच्ची का भरोसा अभी-अभी एक धोखेबाज़, दोगले इंसान ने बड़ी बेरहमी से तार-तार किया है। उसका घाव अभी बहुत हरा है। अगर तुम अभी तुरंत उसके सामने गए, तो हो सकता है वो तुम्हें भी उसी शक की नज़र से देखे। उसे थोड़ा और वक़्त दो पीयूष। उस पुरानी इमारत को पूरी तरह ढहने दो, तभी तो तुम वहाँ अपनी नई बुनियाद रख पाओगे। तुम बस अपने घर के दरवाज़े खुले रखना... वैशाली को सही वक़्त पर, सही तरीके से मैं खुद तुम्हारे पास लेकर आऊँगी। तब तक अपने अंदर की इस आग को काबू में रखो, शांत रहो और बस तमाशा देखो।"

पीयूष, जो अब तक अपने गुस्से और चाहत में अंधा हो रहा था, उसे शीला की इस बिछाई हुई शतरंज और उसकी शातिर चाल में पूरा दम नज़र आया। उसे एहसास हो गया कि शीला के इशारों पर चलकर ही उसे उसकी मंज़िल मिलेगी।

एक गहरी, सर्द मुस्कान के साथ पीयूष ने हामी भरते हुए कहा, "आप बिल्कुल सही कह रही हैं भाभी। मैं इंतज़ार करूँगा... अपने दोनों मकसदों के पूरा होने का।"

यह कहकर पीयूष ने फोन काट दिया और शीला ने फोन को वापस टेबल पर रखते हुए एक बेहद खौफनाक और विजयी मुस्कान दी।

पीयूष के कॉल कटने के बाद, फोन स्क्रीन की नीली रौशनी अभी पूरी तरह से बुझी भी नहीं थी कि वो फोन कांच की टेबल पर फिर से ज़ोर से वाइब्रेट कर उठा। इस बार स्क्रीन पर 'कविता' का नाम ब्लिंक कर रहा था।

नाम देखते ही शीला के चेहरे की वो मीठी, फिक्रमंद और सधी हुई मुस्कान एक ही सेकंड में किसी गिरगिट की तरह गायब हो गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, कठोर और बेरुखी भरे भाव ने ले ली। उसने अपना काम निकाल लिया था। बिसात का जो मोहरा अपना काम कर चुका हो, उसे वापस डिब्बे में फेंक दिया जाता है, और शीला के लिए कविता अब उसी पिटे हुए, बेकार मोहरे से ज़्यादा कुछ नहीं थी। उसने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई। फोन को तीन-चार बार बजने दिया, अपनी जीत के गुरूर को महसूस किया, और फिर बड़े ही इत्मीनान से स्क्रीन स्वाइप करके फोन कान से लगा लिया।

फोन उठते ही दूसरी तरफ से एक कांपती, डरी हुई और भयानक हताशा से भरी आवाज़ में कविता ने कहा, "भाभी... अब मैं क्या करूँ? पिछले तीन दिन से मैं पापा के इस खंडहर जैसे फ्लैट में बिल्कुल अकेली पड़ी हूँ। दीवारों का सन्नाटा मुझे खाने को दौड़ रहा है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मेरा अगला कदम क्या होना चाहिए... मुझे बहुत डर लग रहा है भाभी।"

कविता की इस गिड़गिड़ाहट का शीला पर कोई असर नहीं हुआ। अपनी आवाज़ से सारी मिठास, सारी पुरानी हमदर्दी को पूरी तरह से निचोड़ते हुए शीला ने एक बिल्कुल सपाट, रूखे और अजनबी लहज़े में कहा, "इसमें मैं क्या कर सकती हूँ कविता? अब ये तुम्हारी ज़िंदगी है, तुम्हारे अपने फैसले हैं। मैंने तो तुमसे कहा नहीं था कि अपना घर छोड़कर इस खंडहर में जाकर बैठ जाओ! पिंटू से बात करो, उसी की बाँहों में जाने के लिए तो तुमने अपना बसा-बसाया घर और पति छोड़ा था न?"

शीला की इस अप्रत्याशित बेरुखी से कविता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके मुँह पर बर्फीला पानी फेंक दिया हो। रुला देने वाली बेबसी के साथ कविता ने जवाब दिया, "वो मेरा फोन ही नहीं उठा रहा है भाभी! मैंने उसे सैकड़ों कॉल किए हैं, अनगिनत मेसेज किए हैं। उस रात के तमाशे के बाद से वो पूरी तरह गायब है। मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा... मेरे पास अब कोई नहीं है। प्लीज़ मुझे बताइए कि मैं क्या करूँ? आप तो मेरे साथ हैं न भाभी?"

एक बेहद चुभने वाली, निर्मम और ठंडी हँसी हंसते हुए शीला ने कहा, "मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूँ कविता... पर ज़रा प्रैक्टिकल होकर सोचो और इस दुनियादारी को समझो। आज समाज की नज़रों में तुम कौन हो? तुम मेरी अपनी सगी बेटी का बसा-बसाया घर उजाड़ने वाली औरत हो। और मैं? मैं उस लड़की की माँ हूँ, जिसका सीधा-सादा पति उस रात तुम्हारे बिस्तर पर था और तुम उसके सामने आधी नंगी होकर अपनी हवस बुझाने की भीख मांग रही थी। अब तुम ही बताओ, समाज क्या कहेगा अगर मैं तुम्हारे साथ खड़ी नजर आई तो? चाहकर भी मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती। आगे का रास्ता अब तुम्हें खुद ही तलाशना होगा कविता।"

यह सुनते ही कविता की साँसें जैसे उसके सूखे गले में ही काँटों की तरह अटक गईं। उसका दिमाग भन्ना गया। जिस शीला भाभी ने कभी समाज की रत्तीभर भी परवाह नहीं की, जिसने उसे अपना घर तोड़ने और पिंटू को उस बंद कमरे में अपने जिस्म के जाल में फंसाने के लिए उकसाया था... आज वही शीला भाभी समाज और मर्यादा की झूठी दुहाइयाँ दे रही थी!

शीला की आवाज़ अब किसी तेज़ धार वाले ज़हरीले खंजर की तरह हो गई थी, जो सीधे कविता के सीने के पार हो रही थी। उसने अपना आखिरी और सबसे घातक वार करते हुए कहा, "अब ये तुम्हारी जंग है कविता। ये तुम्हारा फैलाया हुआ रायता है, और इसे तुम्हें ही समेटना होगा। ये मेरी लड़ाई नहीं है, और सच कहूँ तो मैं अब इन सब झमेलों से बहुत थक चुकी हूँ।"

इससे पहले कि कविता के कांपते होठों से कोई सफाई, कोई गाली या कुछ और निकल पाता.. क्लिक! शीला ने बेरहमी से फोन काट दिया।

दूसरी तरफ, उस पुराने फ्लैट के अँधेरे में बैठी कविता के पसीने से भीगे हाथों से फोन छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। शीला के उन ज़हरीले शब्दों ने उसे अंदर तक सुन्न कर दिया था। कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और उसकी अपनी भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।

उसे आज पहली बार ये भयानक और नंगा एहसास हुआ कि वो कभी शीला की करीबी, उसकी राज़दार या उसकी दोस्त थी ही नहीं। वो तो महज़ एक बेवकूफ कठपुतली थी.. एक ऐसा मोहरा जिसे शीला ने पीयूष के घर से अपनी बेटी का रास्ता साफ करने और पिंटू जैसे नामर्द कांटे को रास्ते से हटाने के लिए बड़ी ही चालाकी से इस्तेमाल किया था। और आज, जब शीला का काम निकल गया था, तो उसने कविता की पूरी ज़िंदगी को एक झटके में कचरे के डिब्बे में फेंक दिया था। कविता के पास अब न अपना गुरूर बचा था, न पीयूष का वो महल, न पिंटू का झूठा सहारा और न ही शीला का वो ज़हरीला साथ। वह पूरी तरह, मुकम्मल तौर पर बर्बाद हो चुकी थी।

कविता का फोन बेरहमी से काटने के बाद, शीला ने उस महंगे लेदर सोफे पर अपनी पीठ टिकाई। उसके चेहरे पर एक बेहद शातिर और मुकम्मल जीत का गुरूर था। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी इस शानदार कामयाबी पर जीत की एक लंबी, सुकून भरी साँस लेनी चाही, लेकिन...

साँस अभी उसके फेफड़ों में पूरी तरह भर भी नहीं पाई थी कि अचानक उसके पेट के निचले हिस्से में एक बेहद तेज़, जानलेवा ऐंठन उठी। ऐसा लगा जैसे किसी ने एक साथ कई जंग लगी सुइयां और कांच के टुकड़े उसके मांस में गहराई तक उतार दिए हों। शीला की आँखें खौफ से झटके से खुल गईं और उसका चेहरा दर्द के मारे बुरी तरह सिकुड़ गया। जीत का वो सारा गुरूर और वो मीठी मुस्कान एक ही सेकंड में हवा हो गई। उसने झटके से अपने दोनों हाथ अपने पेट के निचले हिस्से पर कसकर दबा लिए और एक सिसकी, जो लगभग एक दबी हुई चीख जैसी थी, उसके सूखे होठों से निकल गई।

शीला का पूरा शरीर उस सोफे पर दोहरा हो गया। दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश में सोफे के कुशन को भींचते हुए उसकी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे।

यह दर्द... यह दर्द कोई मामूली थकावट या गैस का दर्द नहीं था, और सच तो यह था कि यह उसके लिए बिल्कुल नया भी नहीं था। पिछले कुछ हफ्तों से उसे अक्सर कमर के निचले हिस्से और पेट में एक भारी, मीठा-मीठा दर्द और ऐंठन महसूस हो रही थी जिसे वो उम्र का तकाज़ा या पीयूष के साथ उस रात हुई घनघोर चुदाई का साइड इफेक्ट समझकर अनदेखा कर रही थी। लेकिन आज? आज यह बर्दाश्त की हर हद पार कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उसके शरीर के भीतर कोई चीज़ उसे ज़िंदा नोच कर खा रही हो।

दर्द के उस भयंकर बवंडर के साथ-साथ, उसे एक अजीब सी, हड्डियां तोड़ देने वाली थकान महसूस हो रही थी। एक ऐसी मनहूस थकान मानो उसके शरीर का सारा खून और उसकी ताक़त किसी ने एक ही झटके में निचोड़ ली हो। उसे अपना ही शरीर एक भारी बोझ लगने लगा था, जिसे उठाना अब उसकी मांसपेशियों के बस में नहीं था।
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2
माथे पर आए ठंडे पसीने को पोंछते हुए और हाँफते हुए, शीला का दिमाग अचानक आज सुबह के उस खौफनाक मंज़र की तरफ चला गया।

सुबह जब वो वॉशरूम में थी, तो सफेद टाइल्स वाली उस तेज़, ठंडी रौशनी में उसने कुछ ऐसा देखा था जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी थी.. असामान्य, गाढ़ा और भारी खून का धब्बा अपनी पैंटी पर नजर आया। उसका मेनोपॉज़ दस सालों पहले ही हो चुका था, फिर यह खून कहाँ से आ रहा था? उस पल जो मौत सा ठंडा खौफ उसके सीने में उठा था, वो ज़िंदगी की किसी भी हार के खौफ से कहीं ज़्यादा बड़ा था।

शीला ने कांपते हाथों से पास कांच की टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाना चाहा, लेकिन कमज़ोरी के मारे गिलास उसके हाथ से छलक गया और पानी ज़मीन पर गिर पड़ा।

"कुछ... कुछ नहीं है... ये कुछ भी नहीं है," शीला ने खुद को तसल्ली देते हुए, एक टूटी हुई और हांफती आवाज़ में खुद से बड़बड़ाई।

उसने गहरी-गहरी साँसें लेते हुए खुद के डर को दबाना शुरू किया, "बस... बस इस सारी भागदौड़ की वजह से हुआ है। कविता, पीयूष, पिंटू.. इन सबके ड्रामे, रतजगे और स्ट्रेस की वजह से शरीर थक गया है। उम्र हो रही है, हार्मोन्स का कोई ऊपर-नीचे होना होगा। मैं.. मैं इतनी आसानी से बीमार नहीं पड़ सकती। मेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ है.. मुझे अभी वैशाली को उस महल में राज करते हुए देखना है।"

लेकिन शीला की ये बड़बड़ाहट उसके अंदर के उस भयानक डर को शांत नहीं कर पा रही थी। वो चाहे अपने दिमाग को जितनी भी तसल्लियां दे ले, अंदर ही अंदर एक अनजाना खौफ उसकी नसों में दीमक की तरह सुगबुगाने लगा था। वो एक बेहद चालाक औरत थी, और उसका खुद का दिमाग उसे चीख-चीख कर बता रहा था कि ये सिर्फ स्ट्रेस नहीं है, बल्कि उसके शरीर के भीतर कुछ तो उबल रहा है।

शीला का दिमाग अभी अपने शरीर के भीतर उठ रहे उस खौफनाक दर्द को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि अचानक कांच की टेबल पर रखा उसका फोन एक तेज़ रिंगटोन के साथ फिर से बज उठा। फोन की उस अचानक हुई आवाज़ से शीला के तने हुए शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने कांपती आँखों से स्क्रीन की तरफ देखा। कॉलर आईडी पर 'मदन' का नाम फ्लैश हो रहा था।

पिछले तीन दिनों में मदन के अनगिनत फोन आ चुके थे, जिन्हें वह लगातार किसी न किसी बहाने से टाल रही थी। मदन यहाँ चल रहे सारे हँगामों से अनजान था। शीला उसे सब कुछ बताना चाहती थी लेकिन इस वक़्त, उस भयानक शारीरिक ऐंठन के बीच मदन की झुंझलाहट और सवालों का सामना करना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था। फिर भी, शीला वो औरत थी जिसने ज़िंदगी में कभी अपनी कमज़ोरी किसी के सामने ज़ाहिर नहीं की थी.. अपने पति के सामने तो बिल्कुल भी नहीं। उसने एक लंबी, कांपती हुई साँस ली, सोफे का हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को ज़बरदस्ती थोड़ा सीधा किया। चेहरे पर दर्द की लकीरों को एक सख्त नकाब के पीछे छुपाते हुए उसने फोन कान से लगा लिया।

फोन उठते ही, बिना कोई हाल-चाल पूछे, एक तेज़, अधिकार से भरी और झुंझलाहट वाली आवाज़ में मदन ने कहा, "शीला! कब तक वैशाली के घर पर डेरा डाले रहने का इरादा है? यहाँ घर का पूरा रूटीन कबाड़ हो गया है तेरे बिना। मेरी सुबह की दवाइयां कहाँ रखी हैं मुझे नहीं पता, मेरी फाइलें नहीं मिल रहीं... कब लौट रही है तू?"

मदन एक सेकंड के लिए रुका और फिर थोड़ा और चिढ़ते हुए अपनी उसी टिपिकल सोच के साथ बोला, "और वैशाली? वो ठीक है न अब? पिंटू के साथ जो भी छोटी-मोटी अनबन थी, वो सुलझ गई न? देख शीला, दामाद के घर में सास का इतने दिन टिकना अच्छा नहीं लगता। लोग बातें बनाते हैं। तू अब जल्द ही वापस आ जा!"

शीला के पेडू में दर्द की एक और ज़ोरदार लहर उठी। उसने अपने होंठों को इतनी ज़ोर से भींचा कि उन पर दाँतों के निशान पड़ गए। अपने माथे और गर्दन पर आई पसीने की उन ठंडी, चिपचिपी बूँदों को अपने भारी दुपट्टे से पोंछते हुए और अपनी आवाज़ की कांपन को पूरी तरह काबू में करते हुए शीला ने एक बेहद सधी हुई और धारदार आवाज़ में जवाब दिया।

"मदन, तेरी यही आदत मुझे हमेशा से चुभती है। यहाँ मेरी बच्ची का पूरा संसार उजड़ने की कगार पर था, और तुझे अपनी दवाइयों और फाइलों की पड़ी है?" शीला की आवाज़ में अब वो पुरानी, हुक्म चलाने वाली और हावी होने वाली टोन वापस लौट आई थी, जो उसके अंदर के दर्द को ढंकने का सबसे बेहतरीन हथियार थी।

उसने एक गहरी साँस ली और लहज़े को थोड़ा और सख्त करते हुए कहा, "मैं यहाँ कोई छुट्टियां मनाने या दामाद की रोटियां तोड़ने नहीं रुकी हूँ मदन। तेरी उस लाड़ली बेटी का घर टूटते-टूटते बचा है। जो गंदगी उस घर में पनप रही थी, उसे मैंने अपने हाथों से साफ किया है। अब बस कुछ चीज़ें और सेट करनी बाकी हैं।"

मदन की तरफ से कुछ बोलने की कोशिश हुई, लेकिन शीला ने उसे बीच में ही काट दिया, "और समाज की और दामाद के घर टिकने की चिंता तू मत कर। पिंटू को उसकी असली जगह दिखा दी है मैंने। अब वो इस घर में क्या, वैशाली की नज़रों में भी कभी सर उठाने लायक नहीं बचा। तू बेकार में वहाँ बैठकर अपनी फिक्र मत कर और अपना ब्लड प्रेशर मत बढ़ा। मैं अपना काम पूरा करके जल्द ही आ जाऊंगी।"

यह कहकर शीला ने मदन के किसी भी और सवाल या शिकायत का इंतज़ार किए बिना फोन खट से काट दिया।

फोन वापस टेबल पर रखते ही, उसकी वो सख़्त आवाज़ और वो झूठा गुरूर फिर से भरभरा कर टूट गया। वो एक बार फिर पेट पकड़ कर, दर्द से कराहते हुए सोफे पर निढाल होकर गिर सी गई.. इस बार पहले से भी ज़्यादा कमज़ोर, पसीने से तर-बतर और लाचार होकर।

तभी किचन से ताज़ा बनी कॉफी की सोंधी महक आई। वैशाली एक ट्रे में दो मग कॉफी लेकर भारी और थके हुए कदमों से बाहर आ रही थी। लेकिन जैसे ही उसकी नज़रें सोफे पर पड़ीं, उसके कदमों की गति अचानक वहीं जम गई। सामने का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

शीला सोफे पर बुरी तरह दोहरी हो चुकी थी। उसने अपने दोनों हाथों से अपना पेडू कसकर पकड़ा हुआ था और उसका चेहरा दर्द के मारे किसी सफेद कागज़ की तरह फक पड़ चुका था। माथे और गर्दन से टपकते ठंडे पसीने की बूँदें हॉल की रोशनी में चमक रही थीं और वह दर्द को दबाने की कोशिश में बुरी तरह हाँफ रही थी। शीला ने वैशाली को देखते ही जल्दी से मदन का कॉल काट दिया, ताकि वह कोई सवाल न पूछ सके।

वैशाली के हाथों में पकड़ी ट्रे बुरी तरह कांप उठी, जिससे गर्म कॉफी छलक कर ट्रे में गिर गई। उसने किसी तरह खुद को संभाला, लपककर आगे बढ़ी और ट्रे को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, अपनी माँ के पास घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई।

उसने शीला के ठंडे, पसीने से तर-बतर चेहरे को अपने हाथों में लिया और एक घबराहट से भरी, कांपती आवाज़ में पूछा, "मम्मी! ये क्या हालत हो रही है तुम्हारी? तुम ठीक तो हो? हे भगवान, तुम्हारा चेहरा... ये बिल्कुल सफेद पड़ गया है! तुम तो पसीने से पूरी भीग रही हो। दर्द कहाँ हो रहा है?"

शीला ने अपने चेहरे की सिकुड़न और दर्द को ज़बरदस्ती गले के नीचे उतारने की नाकाम कोशिश की। उसने वैशाली का हाथ हल्के से दबाते हुए, एक बेहद कमज़ोर, खोखली और बनावटी मुस्कान के साथ अपनी तकलीफ़ को छुपाना चाहा, "अरे... कुछ नहीं मेरी बच्ची। तू ऐसे ही घबरा रही है। बस थोड़ी भयंकर वाली एसिडिटी और थकान हो गई है। पिछले कुछ दिनों से सही से खाना-पीना और नींद नहीं हुई न... बस वही है। और फिर... उम्र भी तो हो रही है अब तुम्हारी मम्मी की, शरीर कभी-कभी जवाब दे ही देता है।"

लेकिन वैशाली अब वो पुरानी, नासमझ बच्ची नहीं थी जिसे आसानी से इन गोल-मोल बातों में बेवकूफ बनाया जा सके। पिछले कुछ दिनों के धोखे और सदमे ने उसे बहुत तीखा और ऑब्ज़र्वेंट बना दिया था। उसने शीला की इस झूठी तसल्ली को सिरे से खारिज कर दिया।

शीला के बिल्कुल करीब खिसकते हुए, उसने एक बेहद सख्त, तीखे और अधिकार भरे लहज़े में अपनी माँ को डपटते हुए कहा, "बकवास मत करो मम्मी! एसिडिटी में किसी का चेहरा ऐसे मुर्दे की तरह पीला नहीं पड़ता। मैं अंधी नहीं हूँ। मैं पिछले दो दिन से नोटिस कर रही हूँ, तुम बात करते-करते अचानक अपना पेट पकड़ कर कराह उठती हो। रात को तुम्हारी पीठ में भी इतना भयंकर दर्द होता है कि तुम करवट तक नहीं ले पातीं।"

वैशाली ने शीला की आँखों में सीधा देखते हुए अपना अटल फैसला सुनाया, "तुम्हारा शरीर अंदर से बहुत कमज़ोर लग रहा है और तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। मुझे और कोई झूठा बहाना नहीं सुनना है अब। हम अभी, इसी वक़्त डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम यहीं बैठो, मैं अभी क्लिनिक में अपॉइंटमेंट फिक्स करती हूँ।"

शीला अंदर से डर गई। अगर वैशाली उसे डॉक्टर के पास ले गई, तो सारे टेस्ट होंगे और कुछ न कुछ निकलेगा। उसने घबराकर मना करने और बात को टालने के लिए मुँह खोला ही था कि...

ट्रिंग... ट्रिंग...!!

तभी उस भारी, फिक्रमंद और तनावपूर्ण माहौल को बीच से चीरती हुई, वैशाली के फोन की तेज़ रिंगटोन गूँज उठी।

वैशाली ने झुंझलाते हुए फोन उठाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र स्क्रीन पर फ्लैश हो रहे नाम पर पड़ी, उसकी उँगलियाँ वहीं जम गईं। कुछ ही सेकंड पहले उसके चेहरे पर अपनी माँ के लिए जो गहरी फिक्र और चिंता थी, वो एक ही पल में वाष्प बनकर उड़ गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, खौफनाक और बर्फ जैसी सख्त बेरुखी ने ले ली। उसकी त्योरियां चढ़ गईं और जबड़े गुस्से से तन गए।

स्क्रीन पर नाम चमक रहा था 'पापा जी' (पिंटू के पिता)।

वैशाली ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले अपने सीने में हवा भरता है। उसने अपनी आँखों को पल भर के लिए बंद किया और अपने अंदर के उस पुराने, कमज़ोर हिस्से को हमेशा के लिए कहीं दफन कर दिया। जब उसने फोन उठाया, तो उसकी आवाज़ में वो पुरानी, मीठी, सहमी हुई और 'संस्कारी बहू' वाली नज़ाकत रत्ती भर भी नहीं थी, जो अक्सर ससुर का फोन आने पर उसके लहज़े में चाशनी की तरह घुल जाती थी। उसकी जगह एक बेहद ठंडी, निडर और पत्थर जैसी सख्त औरत की बेरुखी ने ले ली थी।

बिना कोई औपचारिक अभिवादन किए, एक बिल्कुल सपाट और रूखे लहज़े में वैशाली ने कहा, "जी पापा जी... कहिए? आज अचानक इस वक़्त कैसे फोन किया?"

दूसरी तरफ से एक घबराई हुई, हकलाती और दबी-दबी सी आवाज़ आई। पिंटू के पिता कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके शब्दों में एक अजीब सी हड़बड़ाहट और खौफ था। उनकी वो कांपती हुई आवाज़ सुनते ही वैशाली के चेहरे के भाव तेज़ी से बदलने लगे। उसकी आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ गईं।

हैरानी, लेकिन एक खौफनाक संयम के साथ वैशाली ने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए जवाब दिया, "क्या? लेकिन आप लोग तो अगले हफ्ते आने वाले थे न? ये अचानक प्रोग्राम कैसे बदल गया?"

फोन के दूसरी तरफ से फिर कुछ घबराहट भरे शब्द सुनाई दिए..'अचानक काम आ गया', 'पिंटू से बात नहीं हो रही', 'हम बस आ रहे हैं'।

वैशाली के होठों पर एक कड़वी, तिरस्कार भरी मुस्कान आ गई। वह सब कुछ समझ चुकी थी। उसने बेहद ठंडे और अंतिम अंदाज़ में कहा, "अच्छा... कल सुबह की फ्लाइट है? जी ठीक है... आइए। नहीं पिंटू कहाँ है वो मुझे भी नहीं पता.. नहीं मैं एयरपोर्ट लेने नहीं आ सकती.. आप कैब लेकर आ जाना.. जी, ठीक है।"

वैशाली ने बिना उनके कुछ और कहने का इंतज़ार किए 'खट' से फोन काट दिया और मोबाइल को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, एक भारी साँस छोड़ कर सोफे के बैकरेस्ट पर टिक गई। दर्द की वजह से दोहरी हो रही शीला ने अपनी उँगलियों के बीच से, आशंकित और सवालिया नज़रों से अपनी बेटी के इस आक्रामक रूप को देखा।

अपनी दोनों मुट्ठियों को इतनी ज़ोर से भींचते हुए कि उसके नाखून हथेलियों में चुभने लगे, वैशाली ने एक खुरदरी, ज़हरीली आवाज़ में कहा, "पिंटू के मम्मी-पापा आ रहे हैं मम्मी। कल सुबह की फ्लाइट है उनकी। मुझे पक्का यकीन है कि उस नामर्द ने अपनी गंदी करतूत छुपाने के लिए उन्हें फोन करके कोई उल्टी-सीधी, मनगढ़ंत कहानी सुनाई है। या फिर वो अपने माँ-बाप को ढाल बनाकर यहाँ इमोशनल ब्लैकमेल का गंदा खेल खेलने आ रहा है।"

वैशाली की आँखों में अब एक खूंखार चमक थी, उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "रो-धो कर, 'परिवार मत तोड़ो', 'औरतों को समझौता करना पड़ता है' और 'समाज क्या कहेगा' का वास्ता देकर वो लोग सोच रहे हैं कि मैं पिंटू के उस गंदे गुनाह को माफ कर दूँगी? जो भी है मम्मी... कल इस घर में बहुत बड़ा तमाशा होने वाला है। और यकीन मानो, इस बार तमाशा वो लोग नहीं, मैं करूँगी!"

यह सुनते ही शीला का माथा बुरी तरह ठनक गया। पिंटू के माता-पिता का नाम सुनते ही उसे उबकाई सी आने लगी। पिंटू के माता-पिता यानी वही टिपिकल मिडिल-क्लास सोच, रोना-धोना, रिश्तों की झूठी दुहाई और फालतू का जज़्बाती ड्रामा। शीला बहुत अच्छी तरह जानती थी कि अगर वो कल यहाँ रुकी, तो उसे उस पूरे कीचड़ में उतरना पड़ेगा। उसे उन लोगों की बकवास सुननी पड़ेगी और अपनी बेटी का घर तुड़वाने के इल्ज़ामों की जवाबदेही देनी पड़ेगी।

और उसका शरीर...? शीला ने अपने पेट को और कसकर दबा लिया। उसका कमज़ोर पड़ रहा शरीर अब इस नए ड्रामे का मानसिक और शारीरिक बोझ उठाने की हालत में बिल्कुल नहीं था। जैसी किसी शारीरिक तकलीफ के वो अनजाने, लेकिन खौफनाक लक्षण उसे अंदर ही अंदर किसी दीमक की तरह खोखला कर रहे थे। एक ऐसा भयंकर दर्द जो उसकी रगों का खून सोख रहा था। उसे लगा जैसे उसका शरीर चीख-चीख कर कह रहा हो कि अब यहाँ वो ज्यादा देर रुक नहीं पाएगी।

शीला ने अपने कांपते हुए हाथों से सोफे का भारी लेदर हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को एक झटके से सीधा करने की कोशिश की। इस कोशिश में उसकी रीढ़ की हड्डी से लेकर पेडू तक एक भयंकर टीस उठी, लेकिन उसने अपने होठों को ज़ोर से भींचकर उस दर्दनाक चीख को बाहर नहीं आने दिया। दर्द ने उसका शरीर ज़रूर निचोड़ लिया था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी वही पुरानी, खूंखार और शातिर चमक ज़िंदा थी, जो किसी भी शिकारी के पास अपने शिकार को जाल में फड़फड़ाते हुए देखने के बाद होती है। बस फर्क इतना था कि अब उसका अपना ही शरीर उसके खिलाफ बगावत कर रहा था।

एक गहरी, कांपती हुई साँस लेते हुए और अपने माथे का पसीना पोंछते हुए शीला ने कहा, "वैशाली... मुझे लगता है कि अब मुझे तुम्हारे पापा के पास घर लौट जाना चाहिए। मदन वहाँ अकेले बहुत परेशान है, पूरा घर सर पर उठा रखा है उसने। और सच कहूँ मेरी बच्ची.. तो मेरी तबियत भी अब कुछ ठीक नहीं लग रही। मुझे अपने घर जाकर आराम करने की ज़रूरत है। वहीं हमारे फैमिली डॉक्टर को दिखा दूँगी।"

शीला थोड़ा रुकी, उसने एक पल के लिए अपनी बेटी के चेहरे के सख्त भावों को पढ़ा और फिर अपनी उसी पुरानी चालाकी के साथ बोली, "और वैसे भी, अगर कल सुबह मैं यहाँ पिंटू के माँ-बाप के सामने मौजूद रही, तो उन छोटी सोच वाले लोगों को यही लगेगा कि मैं तुम्हारा कान भर रही हूँ। वो अपनी औलाद के निकम्मेपन का सारा ठीकरा मेरे सिर फोड़ेंगे और समाज में ढिंढोरा पीटेंगे कि मैंने तुम्हारा बसा-बसाया घर तुड़वा दिया। मैं उनके उस गंदे कीचड़ में नहीं उतरना चाहती और न ही फालतू की सफाई देना चाहती हूँ।"

वैशाली ने बिना कुछ कहे अपनी माँ की उन थकी हुई, पीली पड़ चुकी और बीमार आँखों में झांका। जिन आँखों में उसने बचपन से हमेशा एक अटल गुरूर और हुक्म देखा था, आज वो आँखें किसी अनजाने दर्द से धुंधला रही थीं। उसे साफ समझ आ रहा था कि उसकी माँ कोई बहाना नहीं बना रही है, बल्कि सच में शारीरिक रूप से बुरी तरह टूट रही है।

वैशाली सोफे से उठी। उसने आगे बढ़कर अपनी माँ के उन ठंडे, पसीने से भीगे हाथों को अपनी हथेलियों की गर्माहट में कसकर थाम लिया। उसकी अपनी आँखों में अब कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक खौफनाक और बर्फ जैसा ठंडा आत्मविश्वास था।

"तुम बेफिक्र होकर जाओ मम्मी," वैशाली की आवाज़ किसी सधे हुए तीर की तरह थी, "तुम्हें इस वक़्त सबसे ज़्यादा अपनी सेहत पर ध्यान देने की सख़्त ज़रूरत है। मैं अभी तुम्हारे लिए कैब बुक करवाती हूँ।"

वैशाली ने शीला के हाथों को हल्का सा दबाया और अपनी आवाज़ को और सख्त करते हुए कहा, "और जहाँ तक पिंटू के उन माँ-बाप और कल सुबह होने वाले उनके इस घिनौने, जज़्बाती ड्रामे का सवाल है... उसे मैं अकेले, अपने तरीके से हैंडल करूँगी। उन्हें लगता है कि वो रो-धोकर मुझ पर दबाव बना लेंगे? अब मैं वो पुरानी, बेवकूफ और डरी हुई वैशाली नहीं हूँ जो उनकी मीठी बातों में आ जाएगी या रिश्ते बचाने के खोखले बोझ तले दबकर अपना वजूद मिटा देगी। पिंटू ने जो घिनौना खेल खेला है, उसकी सज़ा उसे और उसके उस संस्कारी परिवार को भुगतनी ही पड़ेगी। कल उन्हें उनकी असली औकात मैं खुद दिखाऊँगी, ये मेरा वादा है तुमसे।"

शीला ने अपनी बेटी की उन बड़ी-बड़ी आँखों में वो भभकती हुई आग साफ देखी.. वही नफरत और बगावत की आग, जो उसने खुद बड़ी चालाकी से वहाँ जलाई थी। उसे अब पूरा यकीन हो गया था कि वैशाली अब दुनिया के किसी भी दबाव, किसी भी रिश्ते की दुहाई में नहीं पिघलेगी। पीयूष के उस करोड़ों के महल और वैशाली के बीच का रास्ता अब बिल्कुल साफ था, कोई कांटा नहीं बचा था।

पेडू में उठ रही सुइयों जैसी चुभन और पीठ के भयंकर दर्द से कराहते हुए भी, शीला के होंठों पर अपनी इस शानदार जीत के सुकून की एक हल्की, शैतानी मुस्कान थी। उसी शाम, उसने बहुत ही मुश्किल से अपना सूटकेस बंद किया और मदन के पास लौटने के लिए नीचे इंतज़ार कर रही कैब में जाकर बैठ गई।

कैब ने रफ्तार पकड़ी और वैशाली का घर पीछे छूटने लगा। शहर की चमचमाती रोशनियों के बीच, कैब की पिछली सीट पर शीला दर्द से दोहरी हो रही थी। वह अपनी जीत का परचम लहरा कर, अपना मास्टरस्ट्रोक खेलकर वापस जा रही थी।

खेल अभी खत्म नहीं हुआ था, बल्कि अब एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ मोहरे नहीं.. पर बिसात बिछाने वाली खुद मात खाने वाली थी।
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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

उस भयावह साजिश के बाद, जहाँ शीला ने पिंटू और कविता को फंसाकर वैशाली और पीयूष के सामने बेनकाब कर दिया था, कहानी अब एक नए मोड़ पर आ जाती है। इस बार का अपडेट फाल्गुनी और मौसम के इर्द-गिर्द घूमती है।

रात के अंधेरे में, फाल्गुनी अपने पड़ोसी मदन अंकल को रूखी और चम्पा नामक दो महिलाओं के साथ अत्यंत उत्तेजक हालत में देखती है। यह दृश्य उसे बेहद गर्म कर देता है। वापस आकर वह अपनी सहेली मौसम को अपने सभी राज बताती है – राजेश सर, मदन अंकल और शीला भाभी के साथ अपने संबंधों के बारे में, और आज रात का खुलासा भी। मौसम, जो पहले से ही फाल्गुनी के अपने पिता के साथ संबंधों के बारे में जानती है, इन बातों से हैरान नहीं होती, बल्कि वासना से भर जाती है।

फाल्गुनी मौसम को रसिक दूधवाले के बारे में बताती है, जिसके पास बहुत बड़ा और मोटा लंड है। मौसम उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाती है। फाल्गुनी रसिक को बुलाती है, और मौसम बाथरूम में छिपकर उनकी कामुक क्रियाओं को देखने का फैसला करती है।

जब रसिक आता है, तो फाल्गुनी उसके साथ अत्यंत उत्तेजक और स्पष्ट यौन संबंध बनाती है। वह उसके विशाल लिंग को मुँह में लेती है और फिर उसके साथ ज़बरदस्त संभोग करती है। मौसम यह सब छिपकर देखती है और बेहद उत्तेजित हो जाती है। संभोग के बाद, रसिक चला जाता है और मौसम बाहर आती है। वह फाल्गुनी से कहती है कि रसिक के लिंग को देखकर वह इतनी गर्म हो गई है कि अब उसे भी किसी असली मर्द की ज़रूरत है। फाल्गुनी उसे बिस्तर पर गिरा देती है, जिससे संकेत मिलता है कि वे दोनों अब आपस में यौन क्रिया करने वाली हैं।

अब आगे देखते है की शीला और वैशाली की ज़िंदगी में क्या हो रहा है..
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उस खौफ़नाक रात के तमाशे को गुज़रे हुए पूरे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन वैशाली के उस आलीशान फ्लैट में पसरा सन्नाटा अभी भी किसी क़ब्रिस्तान जैसा भारी, वीरान और दम घोंटने वाला था। घर की हर एक दीवार, हर एक कोना जैसे उस रात की चीखों, टूटे हुए गुरूर और विश्वासघात की गवाही दे रहा था। दिन के उजाले में भी उस घर के भीतर एक अजीब सा, घुटन भरा अंधकार छाया रहता था, मानो वक़्त वहीं ठहर गया हो।

दूसरी तरफ, पिंटू शहर में ही था, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो अपने ही बनाए उस घर की चौखट पर एक कदम भी रख सके। रंगे हाथों पकड़े जाने की वह भयानक और नंगी शर्म, अपनी खोखली मर्दानगी का वह सरेआम पर्दाफाश और वैशाली के उस ज़ोरदार तमाचे की गूँज ने पिंटू को अंदर तक चीर कर एक ज़िंदा लाश बना दिया था।

शहर के बाहरी इलाके में, हाईवे के किनारे बने एक सस्ते होटल के कमरे में वह पड़ा हुआ था। उस छोटे से कमरे में शराब और सिगरेट की बदबू फैली थी। फर्श पर बिखरी खाली बोतलें और राख से भरी ऐशट्रे उसकी हताशा का जीता-जागता सबूत थीं। वह बिना नहाए, उन्हीं कपड़ों में बिस्तर पर पड़ा था। हर बार जब वह अपनी सूजी हुई आँखें बंद करता, उसे वैशाली की नफरत से भभकती आँखें, उसके तमाचे का वो दर्द जो अभी भी गाल पर महसूस होता था, और पीयूष की वह तिरस्कार भरी हँसी दिखाई देती। वैशाली के कहे वे शब्द.. उसकी नामर्दी का वो सरेआम ऐलान.. उसके दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसकी शराफत और वफादारी का चोला तार-तार हो चुका था। अब उसे वैशाली या शीला का सामना करने के खयाल भर से ही मौत से भी ज़्यादा खौफ आ रहा था; उसका सारा अहंकार उसी रात उस पुराने फ्लैट की ज़मीन में दफन हो चुका था।
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इधर, दोपहर का अलसाया हुआ वक़्त था। बाहर की चिलचिलाती धूप को ड्रॉइंग रूम के भारी, मखमली पर्दों ने रोक रखा था और वैशाली के फ्लैट के वातानुकूलित हॉल में एक ठंडी, सुकून भरी खामोशी थी। शीला उस लेदर सोफे पर बिल्कुल वैसे ही इत्मीनान से बैठी थी, जैसे कोई शातिर ग्रैंडमास्टर अपनी बिछाई हुई बिसात पर अपने विरोधियों के मोहरों को कटते हुए देखने के बाद आराम फरमाता है।

वह बड़ी ही तसल्ली और बेपरवाही से अपने फोन की स्क्रीन पर इंस्टाग्राम की रील्स स्क्रॉल कर रही थी, मानो दुनिया में सब कुछ बिल्कुल सही चल रहा हो। तभी अचानक फोन वाइब्रेट हुआ और नीली रोशनी के साथ स्क्रीन पर 'पीयूष' का नाम चमका।

नाम देखते ही शीला की उँगलियाँ रुक गईं। उसकी आँखों में एक गहरी, सर्द और शिकारियों वाली चमक आ गई। होठों पर एक सधी हुई, विजयी और खूंखार मुस्कान रेंग गई। यह कॉल इस बात का पुख्ता ऐलान था कि पीयूष अब पूरी तरह से उसकी मुट्ठी में कैद हो चुका है और उसका अगला मोहरा चलने के लिए बेकरार है।

शीला ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। उसने फोन को दो-तीन बार बजने दिया, अपनी जीत के उस मीठे एहसास को पूरी तरह महसूस किया, और फिर अपने चेहरे के भावों को एक रहस्यमयी शांति में ढालते हुए, बड़े ही इत्मीनान से फोन उठाया।

फोन को अपने कान से लगाते हुए, एक बेहद गहरी, रहस्यमयी और शांत आवाज़ में शीला ने कहा, "कहो पीयूष, बरसों बाद उस झूठे गुरूर के पिंजरे से निकलकर, एक नए नवेले आज़ाद परिंदे की तरह खुली हवा में साँस लेना कैसा महसूस हो रहा है?"

फोन के दूसरी तरफ, अपने उस विशाल और अब पूरी तरह से वीरान हो चुके महल के कांच वाले गलियारे में बेचैनी से टहलते हुए, पीयूष की आवाज़ में एक अजीब सी उतावली, नफरत और गुरूर साफ झलक रहा था।

आवाज़ को थोड़ा और भारी और आक्रामक करते हुए पीयूष बोला, "आज़ादी? असली आज़ादी तो मुझे उस दिन मिलेगी भाभी, जिस दिन मैं उस औरत और उसके उस सड़े हुए अहंकार को पूरी तरह अपनी ज़िंदगी से उखाड़ कर बाहर फेंक दूँगा। मेरे वकीलों की पूरी फौज इस वक़्त तलाक के कागज़ तैयार कर रही है। मैं तो बस यही सोच रहा हूँ कि जितनी जल्दी हो सके, जाकर वो पेपर्स सीधे कविता के उस घमंडी मुँह पर मारूँ ताकि उसे उसकी असली औकात हमेशा के लिए समझ आ जाए।"

अचानक पीयूष की आवाज़ में एक हल्की सी नरमी और दबी हुई चाहत घुल गई। उसने थोड़ा झिझकते हुए पूछा, "और वैशाली? वो कैसी है अब? क्या मैं... क्या मैं आज शाम आप दोनों का हालचाल पूछने और मिलने के लिए घर आ सकता हूँ भाभी?"

पीयूष की इस हताश उतावली को बीच में ही किसी धारदार कैंची की तरह काटते हुए, और एक बेहद सख्त हिदायत के लहज़े में शीला ने कहा, "रुको पीयूष। ये तुम्हारी सबसे बड़ी बेवकूफी होगी। इतनी जल्दबाज़ी मत करो।"

शीला ने सोफे पर अपनी पीठ टिकाई और अपनी आँखें हल्की सी मूँद कर आगे कहा, "अभी माहौल को थोड़ा शांत होने दो। अगर तुमने अभी गुस्से में आकर तलाक के कागज़ उसके मुँह पर मारे, तो तुम उसे एक हथियार दे दोगे। कविता को समाज के सामने बेचारी पत्नी बनने और विक्टिम कार्ड खेलने का सुनहरा मौक़ा मिल जाएगा। लोग कहेंगे कि तुमने उसे बेघर कर दिया। नहीं पीयूष... उसे उसकी उस चुनी हुई, सीलन भरी दुनिया में थोड़ा और तड़पने दो। उसे हर रात उन पुरानी दीवारों के बीच ये भयानक एहसास होने दो कि उसने अपने झूठे गुरूर और एक कायर मर्द के लिए अपनी ज़िंदगी का कितना बड़ा दांव लगा दिया है। जब वो अंदर से पूरी तरह टूट जाएगी, तब वो कागज़ उसके हाथ में थमाना।"

पीयूष इस गहरी चाल को सुनकर खामोश था। उसी खामोशी का फायदा उठाते हुए, शीला ने अपनी आवाज़ में थोड़ा और मीठा, गाढ़ा ज़हर घोलते हुए आगे कहा, "और रही बात मेरी वैशाली की... तो उस मासूम बच्ची का भरोसा अभी-अभी एक धोखेबाज़, दोगले इंसान ने बड़ी बेरहमी से तार-तार किया है। उसका घाव अभी बहुत हरा है। अगर तुम अभी तुरंत उसके सामने गए, तो हो सकता है वो तुम्हें भी उसी शक की नज़र से देखे। उसे थोड़ा और वक़्त दो पीयूष। उस पुरानी इमारत को पूरी तरह ढहने दो, तभी तो तुम वहाँ अपनी नई बुनियाद रख पाओगे। तुम बस अपने घर के दरवाज़े खुले रखना... वैशाली को सही वक़्त पर, सही तरीके से मैं खुद तुम्हारे पास लेकर आऊँगी। तब तक अपने अंदर की इस आग को काबू में रखो, शांत रहो और बस तमाशा देखो।"

पीयूष, जो अब तक अपने गुस्से और चाहत में अंधा हो रहा था, उसे शीला की इस बिछाई हुई शतरंज और उसकी शातिर चाल में पूरा दम नज़र आया। उसे एहसास हो गया कि शीला के इशारों पर चलकर ही उसे उसकी मंज़िल मिलेगी।

एक गहरी, सर्द मुस्कान के साथ पीयूष ने हामी भरते हुए कहा, "आप बिल्कुल सही कह रही हैं भाभी। मैं इंतज़ार करूँगा... अपने दोनों मकसदों के पूरा होने का।"

यह कहकर पीयूष ने फोन काट दिया और शीला ने फोन को वापस टेबल पर रखते हुए एक बेहद खौफनाक और विजयी मुस्कान दी।

पीयूष के कॉल कटने के बाद, फोन स्क्रीन की नीली रौशनी अभी पूरी तरह से बुझी भी नहीं थी कि वो फोन कांच की टेबल पर फिर से ज़ोर से वाइब्रेट कर उठा। इस बार स्क्रीन पर 'कविता' का नाम ब्लिंक कर रहा था।

नाम देखते ही शीला के चेहरे की वो मीठी, फिक्रमंद और सधी हुई मुस्कान एक ही सेकंड में किसी गिरगिट की तरह गायब हो गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, कठोर और बेरुखी भरे भाव ने ले ली। उसने अपना काम निकाल लिया था। बिसात का जो मोहरा अपना काम कर चुका हो, उसे वापस डिब्बे में फेंक दिया जाता है, और शीला के लिए कविता अब उसी पिटे हुए, बेकार मोहरे से ज़्यादा कुछ नहीं थी। उसने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई। फोन को तीन-चार बार बजने दिया, अपनी जीत के गुरूर को महसूस किया, और फिर बड़े ही इत्मीनान से स्क्रीन स्वाइप करके फोन कान से लगा लिया।

फोन उठते ही दूसरी तरफ से एक कांपती, डरी हुई और भयानक हताशा से भरी आवाज़ में कविता ने कहा, "भाभी... अब मैं क्या करूँ? पिछले तीन दिन से मैं पापा के इस खंडहर जैसे फ्लैट में बिल्कुल अकेली पड़ी हूँ। दीवारों का सन्नाटा मुझे खाने को दौड़ रहा है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मेरा अगला कदम क्या होना चाहिए... मुझे बहुत डर लग रहा है भाभी।"

कविता की इस गिड़गिड़ाहट का शीला पर कोई असर नहीं हुआ। अपनी आवाज़ से सारी मिठास, सारी पुरानी हमदर्दी को पूरी तरह से निचोड़ते हुए शीला ने एक बिल्कुल सपाट, रूखे और अजनबी लहज़े में कहा, "इसमें मैं क्या कर सकती हूँ कविता? अब ये तुम्हारी ज़िंदगी है, तुम्हारे अपने फैसले हैं। मैंने तो तुमसे कहा नहीं था कि अपना घर छोड़कर इस खंडहर में जाकर बैठ जाओ! पिंटू से बात करो, उसी की बाँहों में जाने के लिए तो तुमने अपना बसा-बसाया घर और पति छोड़ा था न?"

शीला की इस अप्रत्याशित बेरुखी से कविता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके मुँह पर बर्फीला पानी फेंक दिया हो। रुला देने वाली बेबसी के साथ कविता ने जवाब दिया, "वो मेरा फोन ही नहीं उठा रहा है भाभी! मैंने उसे सैकड़ों कॉल किए हैं, अनगिनत मेसेज किए हैं। उस रात के तमाशे के बाद से वो पूरी तरह गायब है। मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा... मेरे पास अब कोई नहीं है। प्लीज़ मुझे बताइए कि मैं क्या करूँ? आप तो मेरे साथ हैं न भाभी?"

एक बेहद चुभने वाली, निर्मम और ठंडी हँसी हंसते हुए शीला ने कहा, "मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूँ कविता... पर ज़रा प्रैक्टिकल होकर सोचो और इस दुनियादारी को समझो। आज समाज की नज़रों में तुम कौन हो? तुम मेरी अपनी सगी बेटी का बसा-बसाया घर उजाड़ने वाली औरत हो। और मैं? मैं उस लड़की की माँ हूँ, जिसका सीधा-सादा पति उस रात तुम्हारे बिस्तर पर था और तुम उसके सामने आधी नंगी होकर अपनी हवस बुझाने की भीख मांग रही थी। अब तुम ही बताओ, समाज क्या कहेगा अगर मैं तुम्हारे साथ खड़ी नजर आई तो? चाहकर भी मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती। आगे का रास्ता अब तुम्हें खुद ही तलाशना होगा कविता।"

यह सुनते ही कविता की साँसें जैसे उसके सूखे गले में ही काँटों की तरह अटक गईं। उसका दिमाग भन्ना गया। जिस शीला भाभी ने कभी समाज की रत्तीभर भी परवाह नहीं की, जिसने उसे अपना घर तोड़ने और पिंटू को उस बंद कमरे में अपने जिस्म के जाल में फंसाने के लिए उकसाया था... आज वही शीला भाभी समाज और मर्यादा की झूठी दुहाइयाँ दे रही थी!

शीला की आवाज़ अब किसी तेज़ धार वाले ज़हरीले खंजर की तरह हो गई थी, जो सीधे कविता के सीने के पार हो रही थी। उसने अपना आखिरी और सबसे घातक वार करते हुए कहा, "अब ये तुम्हारी जंग है कविता। ये तुम्हारा फैलाया हुआ रायता है, और इसे तुम्हें ही समेटना होगा। ये मेरी लड़ाई नहीं है, और सच कहूँ तो मैं अब इन सब झमेलों से बहुत थक चुकी हूँ।"

इससे पहले कि कविता के कांपते होठों से कोई सफाई, कोई गाली या कुछ और निकल पाता.. क्लिक! शीला ने बेरहमी से फोन काट दिया।

दूसरी तरफ, उस पुराने फ्लैट के अँधेरे में बैठी कविता के पसीने से भीगे हाथों से फोन छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। शीला के उन ज़हरीले शब्दों ने उसे अंदर तक सुन्न कर दिया था। कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और उसकी अपनी भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।

उसे आज पहली बार ये भयानक और नंगा एहसास हुआ कि वो कभी शीला की करीबी, उसकी राज़दार या उसकी दोस्त थी ही नहीं। वो तो महज़ एक बेवकूफ कठपुतली थी.. एक ऐसा मोहरा जिसे शीला ने पीयूष के घर से अपनी बेटी का रास्ता साफ करने और पिंटू जैसे नामर्द कांटे को रास्ते से हटाने के लिए बड़ी ही चालाकी से इस्तेमाल किया था। और आज, जब शीला का काम निकल गया था, तो उसने कविता की पूरी ज़िंदगी को एक झटके में कचरे के डिब्बे में फेंक दिया था। कविता के पास अब न अपना गुरूर बचा था, न पीयूष का वो महल, न पिंटू का झूठा सहारा और न ही शीला का वो ज़हरीला साथ। वह पूरी तरह, मुकम्मल तौर पर बर्बाद हो चुकी थी।

कविता का फोन बेरहमी से काटने के बाद, शीला ने उस महंगे लेदर सोफे पर अपनी पीठ टिकाई। उसके चेहरे पर एक बेहद शातिर और मुकम्मल जीत का गुरूर था। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी इस शानदार कामयाबी पर जीत की एक लंबी, सुकून भरी साँस लेनी चाही, लेकिन...

साँस अभी उसके फेफड़ों में पूरी तरह भर भी नहीं पाई थी कि अचानक उसके पेट के निचले हिस्से में एक बेहद तेज़, जानलेवा ऐंठन उठी। ऐसा लगा जैसे किसी ने एक साथ कई जंग लगी सुइयां और कांच के टुकड़े उसके मांस में गहराई तक उतार दिए हों। शीला की आँखें खौफ से झटके से खुल गईं और उसका चेहरा दर्द के मारे बुरी तरह सिकुड़ गया। जीत का वो सारा गुरूर और वो मीठी मुस्कान एक ही सेकंड में हवा हो गई। उसने झटके से अपने दोनों हाथ अपने पेट के निचले हिस्से पर कसकर दबा लिए और एक सिसकी, जो लगभग एक दबी हुई चीख जैसी थी, उसके सूखे होठों से निकल गई।

शीला का पूरा शरीर उस सोफे पर दोहरा हो गया। दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश में सोफे के कुशन को भींचते हुए उसकी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे।

यह दर्द... यह दर्द कोई मामूली थकावट या गैस का दर्द नहीं था, और सच तो यह था कि यह उसके लिए बिल्कुल नया भी नहीं था। पिछले कुछ हफ्तों से उसे अक्सर कमर के निचले हिस्से और पेट में एक भारी, मीठा-मीठा दर्द और ऐंठन महसूस हो रही थी जिसे वो उम्र का तकाज़ा या पीयूष के साथ उस रात हुई घनघोर चुदाई का साइड इफेक्ट समझकर अनदेखा कर रही थी। लेकिन आज? आज यह बर्दाश्त की हर हद पार कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उसके शरीर के भीतर कोई चीज़ उसे ज़िंदा नोच कर खा रही हो।

दर्द के उस भयंकर बवंडर के साथ-साथ, उसे एक अजीब सी, हड्डियां तोड़ देने वाली थकान महसूस हो रही थी। एक ऐसी मनहूस थकान मानो उसके शरीर का सारा खून और उसकी ताक़त किसी ने एक ही झटके में निचोड़ ली हो। उसे अपना ही शरीर एक भारी बोझ लगने लगा था, जिसे उठाना अब उसकी मांसपेशियों के बस में नहीं था।
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2
माथे पर आए ठंडे पसीने को पोंछते हुए और हाँफते हुए, शीला का दिमाग अचानक आज सुबह के उस खौफनाक मंज़र की तरफ चला गया।

सुबह जब वो वॉशरूम में थी, तो सफेद टाइल्स वाली उस तेज़, ठंडी रौशनी में उसने कुछ ऐसा देखा था जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी थी.. असामान्य, गाढ़ा और भारी खून का धब्बा अपनी पैंटी पर नजर आया। उसका मेनोपॉज़ दस सालों पहले ही हो चुका था, फिर यह खून कहाँ से आ रहा था? उस पल जो मौत सा ठंडा खौफ उसके सीने में उठा था, वो ज़िंदगी की किसी भी हार के खौफ से कहीं ज़्यादा बड़ा था।

शीला ने कांपते हाथों से पास कांच की टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाना चाहा, लेकिन कमज़ोरी के मारे गिलास उसके हाथ से छलक गया और पानी ज़मीन पर गिर पड़ा।

"कुछ... कुछ नहीं है... ये कुछ भी नहीं है," शीला ने खुद को तसल्ली देते हुए, एक टूटी हुई और हांफती आवाज़ में खुद से बड़बड़ाई।

उसने गहरी-गहरी साँसें लेते हुए खुद के डर को दबाना शुरू किया, "बस... बस इस सारी भागदौड़ की वजह से हुआ है। कविता, पीयूष, पिंटू.. इन सबके ड्रामे, रतजगे और स्ट्रेस की वजह से शरीर थक गया है। उम्र हो रही है, हार्मोन्स का कोई ऊपर-नीचे होना होगा। मैं.. मैं इतनी आसानी से बीमार नहीं पड़ सकती। मेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ है.. मुझे अभी वैशाली को उस महल में राज करते हुए देखना है।"

लेकिन शीला की ये बड़बड़ाहट उसके अंदर के उस भयानक डर को शांत नहीं कर पा रही थी। वो चाहे अपने दिमाग को जितनी भी तसल्लियां दे ले, अंदर ही अंदर एक अनजाना खौफ उसकी नसों में दीमक की तरह सुगबुगाने लगा था। वो एक बेहद चालाक औरत थी, और उसका खुद का दिमाग उसे चीख-चीख कर बता रहा था कि ये सिर्फ स्ट्रेस नहीं है, बल्कि उसके शरीर के भीतर कुछ तो उबल रहा है।

शीला का दिमाग अभी अपने शरीर के भीतर उठ रहे उस खौफनाक दर्द को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि अचानक कांच की टेबल पर रखा उसका फोन एक तेज़ रिंगटोन के साथ फिर से बज उठा। फोन की उस अचानक हुई आवाज़ से शीला के तने हुए शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने कांपती आँखों से स्क्रीन की तरफ देखा। कॉलर आईडी पर 'मदन' का नाम फ्लैश हो रहा था।

पिछले तीन दिनों में मदन के अनगिनत फोन आ चुके थे, जिन्हें वह लगातार किसी न किसी बहाने से टाल रही थी। मदन यहाँ चल रहे सारे हँगामों से अनजान था। शीला उसे सब कुछ बताना चाहती थी लेकिन इस वक़्त, उस भयानक शारीरिक ऐंठन के बीच मदन की झुंझलाहट और सवालों का सामना करना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था। फिर भी, शीला वो औरत थी जिसने ज़िंदगी में कभी अपनी कमज़ोरी किसी के सामने ज़ाहिर नहीं की थी.. अपने पति के सामने तो बिल्कुल भी नहीं। उसने एक लंबी, कांपती हुई साँस ली, सोफे का हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को ज़बरदस्ती थोड़ा सीधा किया। चेहरे पर दर्द की लकीरों को एक सख्त नकाब के पीछे छुपाते हुए उसने फोन कान से लगा लिया।

फोन उठते ही, बिना कोई हाल-चाल पूछे, एक तेज़, अधिकार से भरी और झुंझलाहट वाली आवाज़ में मदन ने कहा, "शीला! कब तक वैशाली के घर पर डेरा डाले रहने का इरादा है? यहाँ घर का पूरा रूटीन कबाड़ हो गया है तेरे बिना। मेरी सुबह की दवाइयां कहाँ रखी हैं मुझे नहीं पता, मेरी फाइलें नहीं मिल रहीं... कब लौट रही है तू?"

मदन एक सेकंड के लिए रुका और फिर थोड़ा और चिढ़ते हुए अपनी उसी टिपिकल सोच के साथ बोला, "और वैशाली? वो ठीक है न अब? पिंटू के साथ जो भी छोटी-मोटी अनबन थी, वो सुलझ गई न? देख शीला, दामाद के घर में सास का इतने दिन टिकना अच्छा नहीं लगता। लोग बातें बनाते हैं। तू अब जल्द ही वापस आ जा!"

शीला के पेडू में दर्द की एक और ज़ोरदार लहर उठी। उसने अपने होंठों को इतनी ज़ोर से भींचा कि उन पर दाँतों के निशान पड़ गए। अपने माथे और गर्दन पर आई पसीने की उन ठंडी, चिपचिपी बूँदों को अपने भारी दुपट्टे से पोंछते हुए और अपनी आवाज़ की कांपन को पूरी तरह काबू में करते हुए शीला ने एक बेहद सधी हुई और धारदार आवाज़ में जवाब दिया।

"मदन, तेरी यही आदत मुझे हमेशा से चुभती है। यहाँ मेरी बच्ची का पूरा संसार उजड़ने की कगार पर था, और तुझे अपनी दवाइयों और फाइलों की पड़ी है?" शीला की आवाज़ में अब वो पुरानी, हुक्म चलाने वाली और हावी होने वाली टोन वापस लौट आई थी, जो उसके अंदर के दर्द को ढंकने का सबसे बेहतरीन हथियार थी।

उसने एक गहरी साँस ली और लहज़े को थोड़ा और सख्त करते हुए कहा, "मैं यहाँ कोई छुट्टियां मनाने या दामाद की रोटियां तोड़ने नहीं रुकी हूँ मदन। तेरी उस लाड़ली बेटी का घर टूटते-टूटते बचा है। जो गंदगी उस घर में पनप रही थी, उसे मैंने अपने हाथों से साफ किया है। अब बस कुछ चीज़ें और सेट करनी बाकी हैं।"

मदन की तरफ से कुछ बोलने की कोशिश हुई, लेकिन शीला ने उसे बीच में ही काट दिया, "और समाज की और दामाद के घर टिकने की चिंता तू मत कर। पिंटू को उसकी असली जगह दिखा दी है मैंने। अब वो इस घर में क्या, वैशाली की नज़रों में भी कभी सर उठाने लायक नहीं बचा। तू बेकार में वहाँ बैठकर अपनी फिक्र मत कर और अपना ब्लड प्रेशर मत बढ़ा। मैं अपना काम पूरा करके जल्द ही आ जाऊंगी।"

यह कहकर शीला ने मदन के किसी भी और सवाल या शिकायत का इंतज़ार किए बिना फोन खट से काट दिया।

फोन वापस टेबल पर रखते ही, उसकी वो सख़्त आवाज़ और वो झूठा गुरूर फिर से भरभरा कर टूट गया। वो एक बार फिर पेट पकड़ कर, दर्द से कराहते हुए सोफे पर निढाल होकर गिर सी गई.. इस बार पहले से भी ज़्यादा कमज़ोर, पसीने से तर-बतर और लाचार होकर।

तभी किचन से ताज़ा बनी कॉफी की सोंधी महक आई। वैशाली एक ट्रे में दो मग कॉफी लेकर भारी और थके हुए कदमों से बाहर आ रही थी। लेकिन जैसे ही उसकी नज़रें सोफे पर पड़ीं, उसके कदमों की गति अचानक वहीं जम गई। सामने का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

शीला सोफे पर बुरी तरह दोहरी हो चुकी थी। उसने अपने दोनों हाथों से अपना पेडू कसकर पकड़ा हुआ था और उसका चेहरा दर्द के मारे किसी सफेद कागज़ की तरह फक पड़ चुका था। माथे और गर्दन से टपकते ठंडे पसीने की बूँदें हॉल की रोशनी में चमक रही थीं और वह दर्द को दबाने की कोशिश में बुरी तरह हाँफ रही थी। शीला ने वैशाली को देखते ही जल्दी से मदन का कॉल काट दिया, ताकि वह कोई सवाल न पूछ सके।

वैशाली के हाथों में पकड़ी ट्रे बुरी तरह कांप उठी, जिससे गर्म कॉफी छलक कर ट्रे में गिर गई। उसने किसी तरह खुद को संभाला, लपककर आगे बढ़ी और ट्रे को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, अपनी माँ के पास घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई।

उसने शीला के ठंडे, पसीने से तर-बतर चेहरे को अपने हाथों में लिया और एक घबराहट से भरी, कांपती आवाज़ में पूछा, "मम्मी! ये क्या हालत हो रही है तुम्हारी? तुम ठीक तो हो? हे भगवान, तुम्हारा चेहरा... ये बिल्कुल सफेद पड़ गया है! तुम तो पसीने से पूरी भीग रही हो। दर्द कहाँ हो रहा है?"

शीला ने अपने चेहरे की सिकुड़न और दर्द को ज़बरदस्ती गले के नीचे उतारने की नाकाम कोशिश की। उसने वैशाली का हाथ हल्के से दबाते हुए, एक बेहद कमज़ोर, खोखली और बनावटी मुस्कान के साथ अपनी तकलीफ़ को छुपाना चाहा, "अरे... कुछ नहीं मेरी बच्ची। तू ऐसे ही घबरा रही है। बस थोड़ी भयंकर वाली एसिडिटी और थकान हो गई है। पिछले कुछ दिनों से सही से खाना-पीना और नींद नहीं हुई न... बस वही है। और फिर... उम्र भी तो हो रही है अब तुम्हारी मम्मी की, शरीर कभी-कभी जवाब दे ही देता है।"

लेकिन वैशाली अब वो पुरानी, नासमझ बच्ची नहीं थी जिसे आसानी से इन गोल-मोल बातों में बेवकूफ बनाया जा सके। पिछले कुछ दिनों के धोखे और सदमे ने उसे बहुत तीखा और ऑब्ज़र्वेंट बना दिया था। उसने शीला की इस झूठी तसल्ली को सिरे से खारिज कर दिया।

शीला के बिल्कुल करीब खिसकते हुए, उसने एक बेहद सख्त, तीखे और अधिकार भरे लहज़े में अपनी माँ को डपटते हुए कहा, "बकवास मत करो मम्मी! एसिडिटी में किसी का चेहरा ऐसे मुर्दे की तरह पीला नहीं पड़ता। मैं अंधी नहीं हूँ। मैं पिछले दो दिन से नोटिस कर रही हूँ, तुम बात करते-करते अचानक अपना पेट पकड़ कर कराह उठती हो। रात को तुम्हारी पीठ में भी इतना भयंकर दर्द होता है कि तुम करवट तक नहीं ले पातीं।"

वैशाली ने शीला की आँखों में सीधा देखते हुए अपना अटल फैसला सुनाया, "तुम्हारा शरीर अंदर से बहुत कमज़ोर लग रहा है और तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। मुझे और कोई झूठा बहाना नहीं सुनना है अब। हम अभी, इसी वक़्त डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम यहीं बैठो, मैं अभी क्लिनिक में अपॉइंटमेंट फिक्स करती हूँ।"

शीला अंदर से डर गई। अगर वैशाली उसे डॉक्टर के पास ले गई, तो सारे टेस्ट होंगे और कुछ न कुछ निकलेगा। उसने घबराकर मना करने और बात को टालने के लिए मुँह खोला ही था कि...

ट्रिंग... ट्रिंग...!!

तभी उस भारी, फिक्रमंद और तनावपूर्ण माहौल को बीच से चीरती हुई, वैशाली के फोन की तेज़ रिंगटोन गूँज उठी।

वैशाली ने झुंझलाते हुए फोन उठाया। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र स्क्रीन पर फ्लैश हो रहे नाम पर पड़ी, उसकी उँगलियाँ वहीं जम गईं। कुछ ही सेकंड पहले उसके चेहरे पर अपनी माँ के लिए जो गहरी फिक्र और चिंता थी, वो एक ही पल में वाष्प बनकर उड़ गई। उसकी जगह एक बेहद सर्द, खौफनाक और बर्फ जैसी सख्त बेरुखी ने ले ली। उसकी त्योरियां चढ़ गईं और जबड़े गुस्से से तन गए।

स्क्रीन पर नाम चमक रहा था 'पापा जी' (पिंटू के पिता)।

वैशाली ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले अपने सीने में हवा भरता है। उसने अपनी आँखों को पल भर के लिए बंद किया और अपने अंदर के उस पुराने, कमज़ोर हिस्से को हमेशा के लिए कहीं दफन कर दिया। जब उसने फोन उठाया, तो उसकी आवाज़ में वो पुरानी, मीठी, सहमी हुई और 'संस्कारी बहू' वाली नज़ाकत रत्ती भर भी नहीं थी, जो अक्सर ससुर का फोन आने पर उसके लहज़े में चाशनी की तरह घुल जाती थी। उसकी जगह एक बेहद ठंडी, निडर और पत्थर जैसी सख्त औरत की बेरुखी ने ले ली थी।

बिना कोई औपचारिक अभिवादन किए, एक बिल्कुल सपाट और रूखे लहज़े में वैशाली ने कहा, "जी पापा जी... कहिए? आज अचानक इस वक़्त कैसे फोन किया?"

दूसरी तरफ से एक घबराई हुई, हकलाती और दबी-दबी सी आवाज़ आई। पिंटू के पिता कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके शब्दों में एक अजीब सी हड़बड़ाहट और खौफ था। उनकी वो कांपती हुई आवाज़ सुनते ही वैशाली के चेहरे के भाव तेज़ी से बदलने लगे। उसकी आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ गईं।

हैरानी, लेकिन एक खौफनाक संयम के साथ वैशाली ने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए जवाब दिया, "क्या? लेकिन आप लोग तो अगले हफ्ते आने वाले थे न? ये अचानक प्रोग्राम कैसे बदल गया?"

फोन के दूसरी तरफ से फिर कुछ घबराहट भरे शब्द सुनाई दिए..'अचानक काम आ गया', 'पिंटू से बात नहीं हो रही', 'हम बस आ रहे हैं'।

वैशाली के होठों पर एक कड़वी, तिरस्कार भरी मुस्कान आ गई। वह सब कुछ समझ चुकी थी। उसने बेहद ठंडे और अंतिम अंदाज़ में कहा, "अच्छा... कल सुबह की फ्लाइट है? जी ठीक है... आइए। नहीं पिंटू कहाँ है वो मुझे भी नहीं पता.. नहीं मैं एयरपोर्ट लेने नहीं आ सकती.. आप कैब लेकर आ जाना.. जी, ठीक है।"

वैशाली ने बिना उनके कुछ और कहने का इंतज़ार किए 'खट' से फोन काट दिया और मोबाइल को कांच की टेबल पर लगभग पटकते हुए, एक भारी साँस छोड़ कर सोफे के बैकरेस्ट पर टिक गई। दर्द की वजह से दोहरी हो रही शीला ने अपनी उँगलियों के बीच से, आशंकित और सवालिया नज़रों से अपनी बेटी के इस आक्रामक रूप को देखा।

अपनी दोनों मुट्ठियों को इतनी ज़ोर से भींचते हुए कि उसके नाखून हथेलियों में चुभने लगे, वैशाली ने एक खुरदरी, ज़हरीली आवाज़ में कहा, "पिंटू के मम्मी-पापा आ रहे हैं मम्मी। कल सुबह की फ्लाइट है उनकी। मुझे पक्का यकीन है कि उस नामर्द ने अपनी गंदी करतूत छुपाने के लिए उन्हें फोन करके कोई उल्टी-सीधी, मनगढ़ंत कहानी सुनाई है। या फिर वो अपने माँ-बाप को ढाल बनाकर यहाँ इमोशनल ब्लैकमेल का गंदा खेल खेलने आ रहा है।"

वैशाली की आँखों में अब एक खूंखार चमक थी, उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "रो-धो कर, 'परिवार मत तोड़ो', 'औरतों को समझौता करना पड़ता है' और 'समाज क्या कहेगा' का वास्ता देकर वो लोग सोच रहे हैं कि मैं पिंटू के उस गंदे गुनाह को माफ कर दूँगी? जो भी है मम्मी... कल इस घर में बहुत बड़ा तमाशा होने वाला है। और यकीन मानो, इस बार तमाशा वो लोग नहीं, मैं करूँगी!"

यह सुनते ही शीला का माथा बुरी तरह ठनक गया। पिंटू के माता-पिता का नाम सुनते ही उसे उबकाई सी आने लगी। पिंटू के माता-पिता यानी वही टिपिकल मिडिल-क्लास सोच, रोना-धोना, रिश्तों की झूठी दुहाई और फालतू का जज़्बाती ड्रामा। शीला बहुत अच्छी तरह जानती थी कि अगर वो कल यहाँ रुकी, तो उसे उस पूरे कीचड़ में उतरना पड़ेगा। उसे उन लोगों की बकवास सुननी पड़ेगी और अपनी बेटी का घर तुड़वाने के इल्ज़ामों की जवाबदेही देनी पड़ेगी।

और उसका शरीर...? शीला ने अपने पेट को और कसकर दबा लिया। उसका कमज़ोर पड़ रहा शरीर अब इस नए ड्रामे का मानसिक और शारीरिक बोझ उठाने की हालत में बिल्कुल नहीं था। जैसी किसी शारीरिक तकलीफ के वो अनजाने, लेकिन खौफनाक लक्षण उसे अंदर ही अंदर किसी दीमक की तरह खोखला कर रहे थे। एक ऐसा भयंकर दर्द जो उसकी रगों का खून सोख रहा था। उसे लगा जैसे उसका शरीर चीख-चीख कर कह रहा हो कि अब यहाँ वो ज्यादा देर रुक नहीं पाएगी।

शीला ने अपने कांपते हुए हाथों से सोफे का भारी लेदर हत्था कसकर पकड़ा और अपने दोहरे हो रहे शरीर को एक झटके से सीधा करने की कोशिश की। इस कोशिश में उसकी रीढ़ की हड्डी से लेकर पेडू तक एक भयंकर टीस उठी, लेकिन उसने अपने होठों को ज़ोर से भींचकर उस दर्दनाक चीख को बाहर नहीं आने दिया। दर्द ने उसका शरीर ज़रूर निचोड़ लिया था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी वही पुरानी, खूंखार और शातिर चमक ज़िंदा थी, जो किसी भी शिकारी के पास अपने शिकार को जाल में फड़फड़ाते हुए देखने के बाद होती है। बस फर्क इतना था कि अब उसका अपना ही शरीर उसके खिलाफ बगावत कर रहा था।

एक गहरी, कांपती हुई साँस लेते हुए और अपने माथे का पसीना पोंछते हुए शीला ने कहा, "वैशाली... मुझे लगता है कि अब मुझे तुम्हारे पापा के पास घर लौट जाना चाहिए। मदन वहाँ अकेले बहुत परेशान है, पूरा घर सर पर उठा रखा है उसने। और सच कहूँ मेरी बच्ची.. तो मेरी तबियत भी अब कुछ ठीक नहीं लग रही। मुझे अपने घर जाकर आराम करने की ज़रूरत है। वहीं हमारे फैमिली डॉक्टर को दिखा दूँगी।"

शीला थोड़ा रुकी, उसने एक पल के लिए अपनी बेटी के चेहरे के सख्त भावों को पढ़ा और फिर अपनी उसी पुरानी चालाकी के साथ बोली, "और वैसे भी, अगर कल सुबह मैं यहाँ पिंटू के माँ-बाप के सामने मौजूद रही, तो उन छोटी सोच वाले लोगों को यही लगेगा कि मैं तुम्हारा कान भर रही हूँ। वो अपनी औलाद के निकम्मेपन का सारा ठीकरा मेरे सिर फोड़ेंगे और समाज में ढिंढोरा पीटेंगे कि मैंने तुम्हारा बसा-बसाया घर तुड़वा दिया। मैं उनके उस गंदे कीचड़ में नहीं उतरना चाहती और न ही फालतू की सफाई देना चाहती हूँ।"

वैशाली ने बिना कुछ कहे अपनी माँ की उन थकी हुई, पीली पड़ चुकी और बीमार आँखों में झांका। जिन आँखों में उसने बचपन से हमेशा एक अटल गुरूर और हुक्म देखा था, आज वो आँखें किसी अनजाने दर्द से धुंधला रही थीं। उसे साफ समझ आ रहा था कि उसकी माँ कोई बहाना नहीं बना रही है, बल्कि सच में शारीरिक रूप से बुरी तरह टूट रही है।

वैशाली सोफे से उठी। उसने आगे बढ़कर अपनी माँ के उन ठंडे, पसीने से भीगे हाथों को अपनी हथेलियों की गर्माहट में कसकर थाम लिया। उसकी अपनी आँखों में अब कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक खौफनाक और बर्फ जैसा ठंडा आत्मविश्वास था।

"तुम बेफिक्र होकर जाओ मम्मी," वैशाली की आवाज़ किसी सधे हुए तीर की तरह थी, "तुम्हें इस वक़्त सबसे ज़्यादा अपनी सेहत पर ध्यान देने की सख़्त ज़रूरत है। मैं अभी तुम्हारे लिए कैब बुक करवाती हूँ।"

वैशाली ने शीला के हाथों को हल्का सा दबाया और अपनी आवाज़ को और सख्त करते हुए कहा, "और जहाँ तक पिंटू के उन माँ-बाप और कल सुबह होने वाले उनके इस घिनौने, जज़्बाती ड्रामे का सवाल है... उसे मैं अकेले, अपने तरीके से हैंडल करूँगी। उन्हें लगता है कि वो रो-धोकर मुझ पर दबाव बना लेंगे? अब मैं वो पुरानी, बेवकूफ और डरी हुई वैशाली नहीं हूँ जो उनकी मीठी बातों में आ जाएगी या रिश्ते बचाने के खोखले बोझ तले दबकर अपना वजूद मिटा देगी। पिंटू ने जो घिनौना खेल खेला है, उसकी सज़ा उसे और उसके उस संस्कारी परिवार को भुगतनी ही पड़ेगी। कल उन्हें उनकी असली औकात मैं खुद दिखाऊँगी, ये मेरा वादा है तुमसे।"

शीला ने अपनी बेटी की उन बड़ी-बड़ी आँखों में वो भभकती हुई आग साफ देखी.. वही नफरत और बगावत की आग, जो उसने खुद बड़ी चालाकी से वहाँ जलाई थी। उसे अब पूरा यकीन हो गया था कि वैशाली अब दुनिया के किसी भी दबाव, किसी भी रिश्ते की दुहाई में नहीं पिघलेगी। पीयूष के उस करोड़ों के महल और वैशाली के बीच का रास्ता अब बिल्कुल साफ था, कोई कांटा नहीं बचा था।

पेडू में उठ रही सुइयों जैसी चुभन और पीठ के भयंकर दर्द से कराहते हुए भी, शीला के होंठों पर अपनी इस शानदार जीत के सुकून की एक हल्की, शैतानी मुस्कान थी। उसी शाम, उसने बहुत ही मुश्किल से अपना सूटकेस बंद किया और मदन के पास लौटने के लिए नीचे इंतज़ार कर रही कैब में जाकर बैठ गई।

कैब ने रफ्तार पकड़ी और वैशाली का घर पीछे छूटने लगा। शहर की चमचमाती रोशनियों के बीच, कैब की पिछली सीट पर शीला दर्द से दोहरी हो रही थी। वह अपनी जीत का परचम लहरा कर, अपना मास्टरस्ट्रोक खेलकर वापस जा रही थी।

खेल अभी खत्म नहीं हुआ था, बल्कि अब एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ मोहरे नहीं.. पर बिसात बिछाने वाली खुद मात खाने वाली थी।
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बहुत ही जबरदस्त शानदार लाजवाब और बडा ही खतरनाक रोमांचक अपडेट है भाई मजा आ गया
ये शिला को कौनसी बिमारी लग गयी इतनी तकलीफदेह हैं और पिंटू के माता पिता आने के बाद क्या धमाका होता है
वही शीला के जाल में फसकर अपना सब कुछ गवानें के बाद शीला के व्दारा दुत्कार ने के बाद बेचारी कविता क्या निर्णय लेती हैं
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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vakharia

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Supreme
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204
पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

पिछले अपडेट में हमने देखा कि कैसे शीला ने अपनी शातिर चालों से पिंटू और कविता को बेनकाब करके वैशाली और पीयूष का रास्ता साफ कर दिया। लेकिन इस बार कहानी ने और भी गहरे और खौफनाक मोड़ लिए हैं। आइए, इस जटिल गाथा के सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं..

रात के अंधेरे में फाल्गुनी अपने पड़ोसी मदन अंकल को रूखी और चम्पा नामक दो महिलाओं के साथ अत्यंत उत्तेजक हालत में देखती है। यह दृश्य उसे बेहद गर्म कर देता है। वापस आकर वह अपनी सहेली मौसम को अपने सभी राज़ बताती है.. राजेश सर, मदन अंकल और शीला भाभी के साथ अपने संबंधों के बारे में, और आज रात का खुलासा भी। मौसम, जो पहले से ही फाल्गुनी के अपने पिता के साथ संबंधों के बारे में जानती है, इन बातों से हैरान नहीं होती, बल्कि वासना से भर जाती है।

फाल्गुनी मौसम को रसिक दूधवाले के बारे में बताती है, जिसके पास बहुत बड़ा और मोटा लिंग है। मौसम उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाती है। फाल्गुनी रसिक को बुलाती है, और मौसम बाथरूम में छिपकर उनकी कामुक क्रियाओं को देखने का फैसला करती है। जब रसिक आता है, तो फाल्गुनी उसके साथ अत्यंत उत्तेजक और स्पष्ट यौन संबंध बनाती है.. वह उसके विशाल लिंग को मुँह में लेती है और फिर उसके साथ ज़बरदस्त संभोग करती है। मौसम यह सब छिपकर देखती है और बेहद उत्तेजित हो जाती है। संभोग के बाद, रसिक चला जाता है और मौसम बाहर आती है। वह फाल्गुनी से कहती है कि रसिक के लिंग को देखकर वह इतनी गर्म हो गई है कि अब उसे भी किसी असली मर्द की ज़रूरत है.. और फाल्गुनी उसे बिस्तर पर गिरा देती है, जिससे संकेत मिलता है कि वे दोनों अब आपस में यौन क्रिया करने वाली हैं।

उस भयानक रात को गुज़रे तीन दिन हो चुके हैं, लेकिन वैशाली के फ्लैट में पसरा सन्नाटा अभी भी किसी क़ब्रिस्तान जैसा भारी, वीरान और दम घोंटने वाला है। घर की हर दीवार, हर कोना उस रात की चीखों, टूटे हुए गुरूर और विश्वासघात की गवाही दे रहा है। दिन के उजाले में भी उस घर के भीतर एक अजीब सी, घुटन भरी अंधियारी छाई रहती है, मानो समय वहीं ठहर गया हो।

दूसरी तरफ, पिंटू शहर के बाहरी इलाके में हाईवे के किनारे बने एक सस्ते होटल में छिपा है। रंगे हाथों पकड़े जाने की भयानक शर्म, अपनी खोखली मर्दानगी का सरेआम पर्दाफाश और वैशाली के उस ज़ोरदार तमाचे की गूँज ने उसे अंदर तक चीर कर एक ज़िंदा लाश बना दिया है। शराब और सिगरेट की बदबू के बीच, फर्श पर बिखरी खाली बोतलें और राख से भरी ऐशट्रे उसकी हताशा का जीता-जागता सबूत हैं। हर बार जब वह अपनी सूजी हुई आँखें बंद करता है, उसे वैशाली की नफरत से भरी आँखें, उसके तमाचे का दर्द और पीयूष की तिरस्कार भरी हँसी दिखाई देती है। उसका सारा अहंकार उसी रात उस फ्लैट की ज़मीन में दफन हो चुका है।

दूसरी ओर, अपनी जीत के गुरूर में डूबी शीला को पीयूष का फोन आता है। पीयूष तलाक के कागज़ लेकर कविता के सामने जाने और वैशाली से मिलने की जल्दी में है, लेकिन शीला उसे रोकती है। वह समझाती है कि अगर पीयूष ने जल्दबाजी की तो कविता को विक्टिम कार्ड खेलने का मौका मिल जाएगा। शीला उसे धीरज रखने की सलाह देती है.. कविता को उसकी चुनी हुई दुनिया में तड़पने दो, और वैशाली का घाव अभी हरा है, इसलिए उसे और समय चाहिए। शीला वादा करती है कि वह सही वक़्त पर वैशाली को खुद पीयूष के पास लेकर आएगी। पीयूष, जो अब तक अपने गुस्से और चाहत में अंधा था, शीला की इस बिछाई हुई शतरंज में पूरा दम देखता है और उसके इशारों पर चलने को राज़ी हो जाता है।

लेकिन जब कविता शीला को फोन करके मदद माँगती है.. क्योंकि पिंटू उसका फोन नहीं उठा रहा और वह पूरी तरह अकेली है.. तो शीला का रवैया बिल्कुल बदल जाता है। वह अपनी आवाज़ से सारी मिठास निचोड़कर कविता को साफ-साफ कहती है कि अब यह उसकी अपनी जंग है। शीला समाज, मर्यादा और अपनी बेटी का बहाना बनाकर कविता को ठुकरा देती है। कविता को उसी पल एहसास होता है कि वह कभी शीला की दोस्त या राज़दार नहीं थी.. वह महज़ एक कठपुतली थी, एक मोहरा जिसे शीला ने पीयूष के घर से अपनी बेटी का रास्ता साफ करने के लिए इस्तेमाल किया था। और अब, जब काम निकल गया, तो शीला ने उसे कचरे की तरह फेंक दिया। कविता के पास अब न गुरूर बचा है, न पीयूष का महल, न पिंटू का सहारा, और न शीला का ज़हरीला साथ.. वह पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है।

अपनी जीत का जश्न मनाते ही शीला के पेट के निचले हिस्से में एक जानलेवा ऐंठन उठती है। उसे सुबह अपनी पैंटी पर असामान्य, गाढ़ा खून भी देखने को मिला था.. हालाँकि उसका मेनोपॉज़ दस साल पहले ही हो चुका था। वह दर्द को स्ट्रेस और उम्र का तकाज़ा बताकर अनदेखा करने की कोशिश करती है, लेकिन उसका अपना दिमाग उसे चीख-चीख कर बता रहा है कि यह सिर्फ थकान नहीं है, बल्कि उसके शरीर के भीतर कुछ गहरा उबल रहा है।

इसी बीच मदन का फोन आता है, जो उसकी वापसी के लिए उत्सुक है, लेकिन शीला उसे टालकर वैशाली के घर में अपनी उपस्थिति को सही ठहराती है। फोन रखते ही वह फिर से दर्द से दोहरी हो जाती है। जब वैशाली कॉफी लेकर आती है और अपनी माँ की यह हालत देखती है, तो वह डॉक्टर के पास चलने पर अड़ जाती है.. लेकिन शीला डरती है कि टेस्ट में कुछ न कुछ निकलेगा, इसलिए वह टालने की कोशिश करती है।

तभी वैशाली के फोन की घंटी बजती है.. पिंटू के पिता का फोन है। वे बताते हैं कि वे कल सुबह की फ्लाइट से आ रहे हैं, हालाँकि वे अगले हफ्ते आने वाले थे। वैशाली, जो अब पुरानी, मीठी और सहमी हुई बहू नहीं रही, बल्कि एक सख्त, बेरुख और बगावती औरत बन चुकी है, उन्हें बिना किसी गर्मजोशी के कैब लेकर आने को कहती है और फोन काट देती है।

वह शीला को बताती है कि पिंटू ने शायद अपने माँ-बाप को कोई उल्टी-सीधी कहानी सुनाई है, या वे इमोशनल ब्लैकमेल के लिए आ रहे हैं। लेकिन वैशाली साफ कर देती है.. "कल इस घर में बहुत बड़ा तमाशा होने वाला है, और इस बार तमाशा मैं करूँगी!" उसकी आँखों में अब नफरत और बगावत की आग जल रही है, जो शीला ने खुद बड़ी चालाकी से उसमें भड़काई थी।

पिंटू के माता-पिता के कीचड़ भरे ड्रामे और अपनी बिगड़ती सेहत से बचने के लिए शीला वैशाली के घर से लौटने का फैसला करती है। वह तसल्ली देती है कि अब पीयूष के करोड़ों के महल और वैशाली के बीच का रास्ता बिल्कुल साफ है, कोई काँटा नहीं बचा है। लेकिन जब वह कैब में बैठकर वैशाली का घर छोड़ती है, तो उसके पेडू में सुइयों जैसी चुभन और पीठ का भयंकर दर्द उसे चीर रहा होता है।

शहर की चमचमाती रोशनियों के बीच, वह अपनी जीत का परचम लहराकर, अपना मास्टरस्ट्रोक खेलकर वापस जा रही थी.. लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ था। बल्कि, कहानी अब एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुँच गई थी जहाँ मोहरे नहीं, बल्कि बिसात बिछाने वाली खुद मात खाने वाली थी।

देखते हैं इस साजिश, बदले और वासना की दुनिया में अब कौन-सा नया तूफान उठता है…
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आज मौसम का मन फुदक रहा था.. कल फाल्गुनी को रसिक के साथ चुदते देख उससे रहा नहीं गया और फाल्गुनी को बोलकर रसिक को आज रात फिर बुलावा भेजा.. मौसम आज रसिक के तगड़े मूसल का स्वाद लेना चाहती थी.. वह उत्तेजित तो थी पर साथ ही उसे डर भी लग रहा था

रसिक के आने से पहले दोनों सहेलियों ने तीन तीन पेग शराब पी रखी थी.. वैसे मौसम का ज्यादा मन नहीं था पीने का पर फिर भी उसने व्हिस्की पी ली ताकि रसिक को झेलने की हिम्मत आ जाए.. अब तक व्हिस्की का सुरूर उसके सिर पर चढ़ चुका था

कुछ ही देर में रसिक आ पहुंचा.. फाल्गुनी ने उसे सामने वाले सोफ़े पर बैठने को कहा। रसिक अपनी फटी आँखों से इन दोनों लड़कियों को शराब पीते देखता रहा.. मौसम तो रसिक को देखकर ऐसे शरमा रही थी जैसे नई नवेली दुल्हन हो..

"मैडम, मैं भी एकाद गिलास पी लूँ?" महंगी शराब की बोतल देखकर रसिक के मुंह में पानी आ गया

"तुम पी लेना.. पर अभी नहीं.. सब खत्म होने के बाद.. अब अंदर चलें?" फाल्गुनी ने किसी मालकिन के अंदाज में खड़े होते हुए कहा.. वह जानती थी की अगर इस रसिक नाम के सांड के पूरे मजे लेने हो तो उसे शुरू से ही काबू में रखना जरूरी था। आज बात केवल उसकी नहीं थी, मौसम भी शामिल थी। जो की पहले से ही थोड़ी डरी हुई थी.. उसके आत्मविश्वास के लिए यह जताना जरूरी था की रसिक उसके काबू में है..

रसिक खड़ा हुआ.. और गुड्डे की तरह फाल्गुनी के पीछे पीछे बेडरूम की तरफ जाने लगा

"तू क्यों यहाँ बैठी है..!! चल अंदर..!!" फाल्गुनी ने मौसम से कहा.. जो अब भी सोफ़े पर बैठे हुए रसिक की दोनों टांगों के बीच देख रही थी

"उम्म.. वो.. पहले तुम चली जाओ.. मैं फिर बाद में.." मौसम की जबान लड़खड़ा रही थी.. नशे से और डर से भी..!!

"बाद में.. वाद में कुछ नहीं.. चल अभी" कहते हुए फाल्गुनी ने मौसम को हाथ पकड़कर सोफ़े से खड़ा कर दिया और अपने साथ खींच लिया..

छोटी से स्कर्ट पहने मौसम की जांघ, सोफ़े से उठते हुए खुल गई.. मुलायम गोरी और चिकनी जांघ को देख रसिक के मुंह में पानी आ गया.. वह मन ही मन ऊपरवाले का शुक्रियादा कर रहा था की उसे एक साथ दो जवान लड़कियों को साथ में भोगने का अवसर मिला

तीनों अंदर बेडरूम में पहुंचे।

"अब तुम कपड़े उतारकर यहाँ बैठ जाओ" बेड की ओर इशारा करते हुए फाल्गुनी ने रसिक से कहा

रसिक ने पहले अपनी कमीज उतारी और फिर पतलून.. केवल अंडरवेयर पहने हुए वो बेड के कोने पर बैठ गया.. जांघिये के बीचोंबीच उसका लंड इतना बड़ा उभार बना रहा था की मौसम तो देखकर ही सिसक उठी
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बेड की एक तरफ मौसम तो दूसरी तरफ फाल्गुनी खड़ी थी.. बीच मे रसिक बैठा था.. लैम्प की रोशनी मे उसका काला विकराल बदन चमक रहा था.. उस कसरती बदन का वैभव देखकर फाल्गुनी की आँखें फटी की फटी रह गई.. अब तक पॉर्न फिल्मों मे जिन कल्लुओ को देखा था बिल्कुल वैसा ही शरीर था रसिक का.. काला गठीला बदन.. छाती पर ढेर सारे घुँघराले बाल.. आग मे तांबे की तप रहा शरीर.. चौड़े मजबूत कंधे.. बड़े बड़े डोले.. फाल्गुनी के साथ साथ मौसम की जांघों के बीच भी गर्माहट होने लगी.. उसे देखकर मौसम सोच रही थी.. रोज तो एकदम गंदा बदबूदार होता है रसिक.. आज तो साफ सुथरा लग रहा है.. शायद अभी नहाया होगा वो.. !!

रसिक: "आप दोनों खड़े क्यों हो?? बैठिए यहाँ" कहते हुए रसिक बेड से खड़ा होकर मौसम की ओर आगे बढ़ा.. मौसम घबराकर तुरंत बेड पर बैठ गई.. और उसके पीछे पीछे फाल्गुनी भी जा बैठी.. रसिक उनके सामने पहाड़ की तरह खड़ा था.. रसिक के बदन को देखकर तेज ए.सी. की ठंडी हवा के बीच भी दोनों की ठंडी गायब हो चुकी थी।

सफेद रंग के जांघिये से रसिक के लोडे का उभार दिख रहा था फाल्गुनी को.. रसिक का ध्यान मौसम की कमसिन जवानी पर था.. क्योंकि फाल्गुनी के जिस्म को तो वो पिछली रात ही रौंद चुका था.. अब वो धीरे धीरे चलते हुए मौसम के पास आकर खड़ा हो गया.. और बोला

रसिक: "आपको आज दरवाजे के पीछे छुपकर नहीं देखना पड़ेगा.. शांति से मन भरकर देख लीजिए मेरा.. "

सुनते ही मौसम के चेहरे से नूर गायब हो गया..!! मतलब रसिक को पता था की वो बाथरूम के दरवाजे के पीछे छुपकर सब देख रही थी.. फाल्गुनी भी पहले चोंक उठी और फिर मुस्कुराने लगी

मौसम से सिर्फ एक कदम दूर खड़ा था रसिक.. उसका लंड ऐसा उभार बना रहा था.. की मौसम चाहकर भी अपनी नजरें फेर नहीं पाई.. वो डर रही थी.. कहीं ये राक्षस उसे नोच न खाए.. उसने रसिक के लंड से नजरें हटा ली..

रसिक अब फाल्गुनी की ओर मुड़ा.. फाल्गुनी अत्यंत रोमांचित होकर रसिक के तंबू को देख रही थी..

रसिक: "आह्ह मैडम.. गजब की छातियाँ है आपकी.. वाह.. !!" रसिक के मुख से कामुक उद्गार निकल गए

इतने करीब से रसिक का बाम्बू देखकर फाल्गुनी की पुच्ची मे गजब की चुनमुनी होने लगी.. वो रसिक के लंड को चड्डी के अंदर से निकालने के बेकरार थी पर पहल करने से डर रही थी

रसिक अब फाल्गुनी की इतने करीब आ गया की उसके चेहरे और रसिक के लंड के बीच अब सिर्फ एक इंच की ही दूरी रह गई.. फाल्गुनी ने घबराकर मुंह फेर लिया.. और लंड का उभरा हुआ हिस्सा.. फाल्गुनी के गालों के डिम्पल पर जा टकराया..

रसिक अब फिर से मौसम के पास आया.. और लंड को चड्डी के ऊपर से ही अपनी मुठ्ठी मे पकड़कर मौसम को दिखाने लगा.. उस लंड का भव्य आकार देखकर मौसम की पेन्टी गीली हो गई.. !!

रसिक अब मौसम और फाल्गुनी के बीच बेड पर बैठ गया.. उसकी जांघें दोनों की जांघों को छूने लगी.. और दोनों को वह स्पर्श होते ही ४४० वॉल्ट का करंट सा लग गया..

मौसम और फाल्गुनी एक दूसरे की आँखों मे देखने लगी.. फाल्गुनी ने एक शरारती मुस्कान देकर मौसम को आँख मारते हुए नीचे देखने को कहा

रसिक के अन्डरवेर के साइड से.. खड़ा हुआ लंड.. बाहर झाँकने लगा था.. उसका लाल टोपा देखकर मौसम कांपने लगी.. जैसे बिल के अंदर से सांप बाहर निकला हो.. ऐसा लग रहा था रसिक का लंड

दोनों के कंधों पर एक एक हाथ रखते हुए रसिक ने कहा "शर्माने की जरूरत नहीं है.. आप दोनों खुलकर जो भी करना है कर सकते हो"

फिर उसने मौसम की ओर घूमकर कहा "मैडम, अब और कितना तड़पाओगी इसे?? अब तो महरबानी कर दो" कहते हुए मौसम का हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया उसने

मौसम थरथर कांपने लगी.. उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसका हाथ लोहे के गरम सरिये पर रख दिया हो.. वो हाथ खींचने गई पर रसिक ने राक्षसी ताकत से उसकी कलाई को पकड़ रखा था.. आखिर मौसम ने अपनी मुठ्ठी मे उसका लंड पकड़ ही लिया.. !! अभी भी उसकी हथेली और लंड के बीच मे अन्डरवेर का आवरण था पर.. जैसे हिंग-जीरे के छोंक की खुशबू से खाने के स्वाद का पता लग जाता है.. वैसे ही लंड के आकार से उसकी ताकत और चोदने की क्षमता का अंदाजा लग रहा था..

फाल्गुनी: "गजब का है.. आज तो कल से भी मोटा लग रहा है ये तो"

मौसम ने फाल्गुनी की ओर देखा.. फाल्गुनी आँखें बंद कर अपने स्तनों का खुद ही मर्दन करते हुए मजे कर रही थी.. रसिक ने फाल्गुनी का हाथ उसके स्तनों से खींचते ही फाल्गुनी ने आँखें खोल दी

"अपने हाथों को क्यों तकलीफ दे रही हो.. !! मैं हूँ ना.. !! आप सिर्फ इसे संभालो.. मैं आपके दोनों बबलों को संभाल लूँगा" रसिक ने कहा

रसिक ने फाल्गुनी का भी हाथ खींचा और मौसम के हाथ के साथ साथ अपने लंड पर रख दिया.. अब मौसम की शर्म भी थोड़ी घटने लगी.. फाल्गुनी और मौसम की हथेलियों के बीच रसिक का लोडा मचलने लगा..

फाल्गुनी अब लंड को खोल कर देखने के लिए बेचैन हो रही थी.. बेहद उत्तेजित होकर उसने सिसकियाँ लेते हुए रसिक की अन्डरवेर मे हाथ डाला और एक झटके मे लंड को बाहर निकाल दिया.. !!!
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"ओ बाप रे.. !!" लंड का आकार और कद देखकर फाल्गुनी के मुंह से निकल गया

फाल्गुनी इतनी जोर से चीखी थी.. मौसम आसपास देखने लगी.. कहीं किसी ने सुन तो नहीं लिया.. !!

रसिक ने मौसम का सुंदर चेहरा ठुड्डी से पकड़कर अपनी ओर फेरते हुए कहा "ओह्ह मैडम.. कितनी सुंदर हो आप.. एकदम गोरी गोरी.. इन गोरे गालों को चबा जाने का मन करता है मेरा"

सुनकर मौसम शरमा गई.. उसका शरीर अब भी कांप रहा था.. उसका मन अभी भी यह सोच रहा था की रसिक को यहाँ बुलाने के लिए कहकर कहीं उसने गलती तो नहीं कर दी.. !!

फाल्गुनी अब पूरी तरह बेशर्म होकर रसिक के लंड की चमड़ी उतारकर आगे पीछे करते हुए हिलाने लगी.. रसिक के लंड को महसूस करते हुए वह पॉर्न फिल्मों मे देखे अफ्रीकन मर्दों के लोडॉ को याद करने लगी.. रसिक ने मौसम के टॉप पर से उसके स्तनों को दबा दिया.. मौसम से अब इतनी अधिक उत्तेजना बर्दाश्त नहीं हो रही थी.. वो खड़ी हो गई और बेड के साइड पर चली गई..

मौसम: "रसिक, तुम्हें जो भी करना हो वो फाल्गुनी के साथ करो.. मुझे कुछ नहीं करवाना"

रसिक: "मैडम, आप तो मुझे पहले से बहोत पसंद हो.. ऐसा क्यों कर रही हो?? बस एक बार मुझे मेरी इच्छा पूरी कर लेने दीजिए.. !! आप पहले कविता मैडम के घर आती थी तब से देखता आया हूँ.. आपको एक बार नंगा देखने की बड़ी इच्छा है मुझे.. आह्ह.. देखिए.. ये आपको देखकर कैसे खड़ा हो गया है.. !!"

फाल्गुनी रसिक के मोटे लंड को दबाते हुए बोली "हाँ यार मौसम.. गजब का टाइट हो गया है.. !!"

मौसम: "फाल्गुनी प्लीज.. डॉन्ट इनवॉल्व मी.. यू इन्जॉय विद हीम.. !!" उनकी अंग्रेजी रसिक के पल्ले नहीं पड़ी..

फाल्गुनी: "ठीक है यार.. जैसी तेरी मर्जी.. आज तेरे कहने पर ही तो उसे बुलाया था.. तुझे नहीं करना तो कोई बात नहीं"

फिर रसिक की ओर मुड़कर फाल्गुनी ने कहा "ओह रसिक.. तुम मेरे कपड़े उतारो... मुझे नंगी कर दो" फाल्गुनी ने अपनी बीभत्स मांग रखकर रसिक का ध्यान अपनी ओर खींचा

मौसम के सामने देखते हुए रसिक ने फाल्गुनी को अपनी जांघों पर सुला दिया.. फाल्गुनी ओर बेचैन हो गई... उसका पतला सा टॉप ऊपर कर.. अपने हाथ बाहर निकालकर.. टॉप उतार दिया.. और कमर के ऊपर से नंगी हो गई.. !! उसके मदमस्त चुचे देखकर रसिक लार टपकाने लगा.. दोनों स्तनों को बेरहमी पूर्वक आंटे की तरह गूँदने लगा वो.. और फिर अपना एक हाथ उसने फाल्गुनी की चूत वाले हिस्से पर रखकर दबाया.. फाल्गुनी की चूत काफी मात्रा मे पानी छोड़ रही थी..
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जैसे जैसे फाल्गुनी की उत्तेजना बढ़ती गई वैसे वैसे उसकी हरकतें भी बढ़ने लगी.. रसिक की गोद मे उसने करवट लेकर अपने मुंह को उसके लंड के करीब ले गई.. यह अवस्था चूसने के लिए आदर्श थी.. फाल्गुनी अब पागलों की तरह उस मूसल लंड को चूमने लगी.. लंड को मूल से लेकर टोपे तक अपनी जीभ फेरते हुए उसने अपनी लार से लंड को गीला कर दिया.. ​

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अब तक आक्रामकता से फाल्गुनी के बदन को रौंद रहा रसिक.. फाल्गुनी के चाटने के कारण बेबस हो गया.. उसकी हरकतें धीमी पड़ने लगी.. और अब फाल्गुनी आक्रामक होने लगी.. जैसे जैसे वो चूसती गई वैसे वैसे रसिक आनंद के महासागर मे गोते खाने लगा था..

अब तक जितनी भी ब्ल्यू-फिल्में देखकर ब्लो-जॉब की कला सीखी थी.. वह सारी उसने रसिक का लंड चूसने मे लगा दी थी.. फाल्गुनी का यह स्वरूप देखकर मौसम भी हतप्रभ हो गई थी.. फाल्गुनी जिस तरह से लंड को मजे लेकर चूस रही थी.. वो देखकर मौसम के लिए भी अपने आप को कंट्रोल मे रखना मुश्किल हो रहा था.. आखिर मौसम खुद ही स्कर्ट के ऊपर से अपनी चूत को दबाने लगी..

"ऐसे नहीं मैडम.. कपड़े उतार दीजिए ना.. !! आप कहोगे तो मैं हाथ भी नहीं लगाऊँगा.. पर एक बार आपका नंगा बदन देखने तो दीजिए.. !!" मौसम को ऐसा करने मे कोई दिक्कत नहीं लगी.. जहां तक रसिक उसके जिस्म को हाथ नहीं लगाता उसे कोई प्रॉब्लेम नहीं थी.. और वैसे भी वो जिस हद तक गरम हो चुकी थी.. वह खुद भी कपड़े उतारना चाहती थी

एक के बाद एक.. मौसम ने अपने सारे कपड़े उतार दीये.. और सर से पाँव तक नंगी होकर.. बेड के कोने पर बैठ गई.. बेड की खुरदरी रस्सी उसकी कोमल गांड पर चुभ रही थी.. उसका गोरा संगेमरमरी बदन आग मे तांबे की तरह चमक रहा था..

रसिक का लंड मुंह से बाहर निकालकर फाल्गुनी ने कहा "यार मौसम, ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा.. चूत मे ना लेना हो तो ना सही.. एक बार चूसकर तो देख.. इतना मज़ा आ रहा है यार.. !!" बड़े ही कामुक अंदाज मे रसिक का गीला लंड पकड़कर हिलाते हुए वो बोली "एक बार देख तो सही.. !! घोड़े के लंड जैसा मोटा और तगड़ा है"

मौसम ने जवाब नहीं दिया.. पर उसकी आँखों मे हवस का जबरदस्त खुमार देखते ही बनता था..

फाल्गुनी का सिर अपनी गोद से हटाकर बेड पर टिकाकर रसिक खड़ा हो गया.. और अपनी अन्डरवेर उतार दी.. उसका विशाल लंड.. तगड़ा शरीर.. और काला रंग.. लैम्प की रोशनी मे चमककर डरावना सा लग रहा था.. मौसम ने सोचा की आदिकाल मे असुर ऐसे ही दिखते होंगे.. !! अब फाल्गुनी भी बेड से खड़ी हो गई.. और अपना गाउन और पेन्टी उतारकर साइड मे रख दिया.. और फिर रसिक की छाती के साथ अपने स्तनों को दबाते हुए उसे चूमने लगी.. नाग की तरह फुँकार रहे लंड को पकड़कर वो हिला भी रही थी..

रसिक ने फाल्गुनी के गुलाबी अधरों को चूम लिया.. इतनी लंबी और उत्तेजक किस थी की देखकर ही मौसम पिघल गई.. उसकी सांसें भारी हो गई..

मौसम की इस अवस्था को भांपकर रसिक ने कहा "मैडम.. आप ऐसे बैठे रहेगी तो कैसे मज़ा आएगा?? चोदने न दो तो कोई बात नहीं... एक बार चाटने तो दीजिए.. उसमें तो आपको ही मज़ा आएगा"

फाल्गुनी ने रसिक का लंड हिलाते हुए कहा "हाँ यार.. चाटने तो दे.. मज़ा आएगा तुझे.. बेकार शरमा रही है तू.. इतना डेरिंग कर ही लिया है तो थोड़ा और सही.. सामने इतना मस्त लंड हो और तू मुंह धोने जाने की बातें मत कर"

वैसे भी मौसम मन ही मन पिघल रही थी.. ऊपर से रसिक और फाल्गुनी के आग्रह ने उसके विरोध को ओर कमजोर किया

"ऐसा नहीं है यार.. मैं देख तो रही हूँ.. आप दोनों करते रहो जो भी करना हो.. मेरा मन करेगा तो मैं जुड़ जाऊँगी.. पर अभी नहीं.. " मौसम ने ऊटपटाँग जवाब देकर खिसकना चाहा

फाल्गुनी रसिक को छोड़कर मौसम के करीब आई.. उसके नंगे स्तनों के बीच मौसम का चेहरा रगड़कर उसे चूम लिया और बोली "मादरचोद.. नखरे मत कर.. चल चुपचाप.. !!" कहते हुए वो मौसम को घसीटकर रसिक के पास ले आई और उसे कंधों से दबाकर घुटनों के बल नीचे बीठा दिया.. और खुद भी साथ बैठ गई..

रसिक अब पैर चौड़े कर अपने हाथ को पीछे ले जाकर विश्राम की पोजीशन मे खड़ा हो गया.. मौसम और फाल्गुनी दोनों के चेहरों के बीच उसका तगड़ा लंड सेंडविच होने के लिए तैयार था.. पर मौसम उसे हाथ लगाने से झिझक रही थी.. फाल्गुनी ने जबरन मौसम के दोनों हाथों को पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया.. और मौसम उन्हें मसलने लगी.. फाल्गुनी की निप्पल एकदम कडक बेर जैसी हो गई थी.. अपनी पहली उंगली और अंगूठे के बीच उस सख्त निप्पल को दबाकर खींचते हुए उसने पहली बार फाल्गुनी के होंठों के करीब आना चाहा.. धीरे धीरे माहोल मे ढल रही मौसम को देखकर फाल्गुनी ने दोगुने उत्साह से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दीये.. मौसम फाल्गुनी के होंठों को चूसने लगी.. अपनी जीभ उसकी जीभ से मिलाकर उसका स्वाद चखने लगी..

मौसम इस लिप किस मे इतना खो गई थी.. तभी फाल्गुनी ने बड़ी ही चालाकी से रसिक का लँड दोनों के मुंह के बीच रख दिया.. लंड इतना कडक था की दोनों के होंठों को चीरकर आरपार निकल गया.. इतना कामुक द्रश्य था.. की मौसम ने पहली बार सामने से रसिक के सुपाड़े को पकड़ लिया.. मौसम के स्पर्श को पहचानकर रसिक बेहद खुश हो गया.. उसका सख्त तगड़ा लंड मौसम नाम की मोरनी को रिझाने के लिए नृत्य करने लगा.. फाल्गुनी ने उस लंड को थोड़ी देर तक चूसा और फिर मौसम को देते हुए कहा "ले, अब तू चूस.. !!"

मौसम ने मुंह फेर लिया "मुझे नहीं चूसना है.. !!"

फाल्गुनी: "अब नखरे छोड़ भी दे.. !!"

मौसम: "मुझे फोर्स मत कर फाल्गुनी.. तुझे जो करना हो कर.. चूसना हो तो चूस.. आगे पीछे जहां भी लेना हो ले.. तुझे कहाँ रोक रही हूँ मैं??"

फाल्गुनी अपना आपा खो बैठी "इतना मस्त लोडा मिला है मजे करने को.. और इस महारानी के नखरे ही खतम नहीं हो रहे है.. चल.. अब इसे चूस.. वरना तुझे उल्टा सुलाकर तेरी गांड मे दे दूँगी रसिक का लंड.. !!" मौसम के मुंह मे रसिक का लंड जबरदस्ती डालकर ही चैन लिया फाल्गुनी ने

"ओह्ह यस बेबी.. सक इट.. !!" फाल्गुनी मौसम को उकसाने लगी

मौसम को शुरू शुरू मे.. बड़ा अटपटा सा लगा.. पर वो खुद भी इतनी उत्तेजित थी की जो आदमी उसे देखकर ही पसंद नहीं था.. उसका लंड चूस रही थी.. थोड़ी देर के बाद फाल्गुनी ने मौसम को धकेल दिया और खुद चूसने लगी..
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काफी देर तक लंड की चुसाई के बाद फाल्गुनी ने लंड छोड़ा.. फिर मौसम को बेड पर लेटाकर रसिक को उसकी चूत चाटने का इशारा किया.. रसिक बावरा हो गया.. और अपनी पसंदीदा चूत पर टूट पड़ने के लिए तैयार हो गया..

मौसम की चूत पर रसिक की जीभ फिरते ही वो सिहर उठी.. सातवे आसमान पर उड़ने लगी मौसम.. उसकी निप्पलें टाइट हो गई.. और शुरुआत मे जांघें दबाकर रखने वाली मौसम ने खुद ही अपनी टांगें फैलाते हुए रसिक को चाटने मे आसानी कर दी..
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पैर चौड़े होते ही मौसम की नाजुक चूत के पंखुड़ियों जैसे होंठ खुल गए.. उसकी लाल क्लिटोरिस और छोटा सा छेद देखकर रसिक समझ गया की वो उसका लंड अंदर नहीं ले पाएगी..

मौसम की लाल क्लिटोरिस को होंठों के बीच दबाकर रसिक ने जब चूसा... तब उत्तेजित होकर मौसम अपनी गांड उछालकर गोल गोल घुमाते हुए ऊपर नीचे करने लगी.. आह्ह आह्ह आह्ह.. की आवाज़ें कमरे मे गूंजने लगी.. मौसम की चूत चाट रहे रसिक के लंड को फाल्गुनी बड़े ही प्यार से देख रही थी.. वो उसके लंड से कभी अपने गालों को रगड़ती तो कभी दो स्तनों के बीच उसे दबा देती..

"मैडम.. आप अपनी फैलाकर मेरे मुंह पर बैठ जाओ.. मज़ा आएगा.. मुझे उस तरह चाटना बहोत अच्छा लगता है" पतली सी मौसम के बदन को खिलौने की तरह उठाकर खड़ा कर दिया रसिक ने.. और खुद बेड पर लेट गया.. मौसम के गोरे कूल्हों पर हाथ फेरते हुए उसे अपने मुंह पर बीठा दिया रसिक ने..

मौसम की कोमल चूत के वर्टिकल होंठों को चाटते हुए अंदर घुसाने का सुराख ढूंढ रही थी रसिक की जीभ.. !! मौसम को तो जैसे बिन मांगे ही स्वर्ग मिल गया.. !! रसिक के प्रति उसके मन मे जो घृणा थी.. वो उत्तेजना की गर्मी से भांप बनकर उड़ गई.. !! आँखें बंद कर वो रसिक के मुंह पर सवारी कर अपनी चूत को आगे पीछे रगड़ रही थी.. ऐसा मौका दिलाने के लिए वो मन ही मन फाल्गुनी का आभार प्रकट करने लगी.. अगर फाल्गुनी ने इतनी हिम्मत न की होती.. तो ऐसा आनंद उसे कभी नहीं मिलता.. !! लंड तो लंड.. रसिक की तो जीभ भी कितनी कडक थी.. चूत की अंदरूनी परतों को कुरेद रही थी.. माय गॉड.. यह आदमी वाकई असुर योनि का लगता है.. इसकी जीभ तो लंड से भी ज्यादा खतरनाक है..
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मौसम का शरीर अकड़ने लगा. और उसने अपनी चूत की मांसपेशियों को जकड़ लिया.. रसिक की जीभ और तीव्रता से मौसम की चूत मे जितना अंदर जा सकती थी.. घुस गई.. !! दोनों तरफ आनंद की लहरें उठ रही थी.. दोनों हाथ ऊपर कर रसिक ने मौसम के नाजुक स्तनों को पकड़ लिया और दबाते हुए अपनी जीभ उसकी चूत मे नचाने लगा..

मौसम ने दोनों हाथ से रसिक का सर पकड़ लिया और अपनी चूत को ताकत के साथ उसकी जीभ पर दबाते हुए अपने शरीर को तंग कर दिया.. दूसरे ही पल.. रसिक का लोडा चूस रही फाल्गुनी के मुंह मे.. गाढ़े लस्सेदार वीर्य की पिचकारी छूटी.. फाल्गुनी इस प्रहार के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी.. वह उत्तेजित तो थी पर वीर्य को मुंह मे लेने की उसकी तैयारी नहीं थी.. उसने तुरंत लंड मुंह से बाहर निकाल दिया.. वीर्य थूक दिया और छी छी करते हुए खाँसने लगी..
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रसिक के चेहरे से उतरकर बेड के कोने पर बैठ गई.. फाल्गुनी के हाल पर हँसते हुए उसने रसिक के लंड की तरफ देखा.. बाप रे.. !! फाल्गुनी की लार और वीर्य से तरबतर लोडा, हर सेकंड पर एक झटका मार रहा था.. अद्भुत द्रश्य था.. !! फाल्गुनी और मौसम दोनों की नजर उस आसुरी लंड पर चिपक गई थी.. मौसम ऐसे देख रही थी जैसी किसी दुर्लभ प्रजाति के प्राणी को देख रही हो.. और फाल्गुनी थोड़ी सी नाराजगी से रसिक की तरफ देख रही थी

थोड़ी देर के बाद सब से पहले मौसम उठी और कपड़े पहनने लगी..

"अरे मैडम.. अभी से कपड़े पहनने लगी आप? अभी तो सिर्फ शुरुआत हुई है.. " रसिक खड़ा हो गया और मौसम के पीछे जाकर उसे अपनी बाहों मे जकड़कर स्तनों को दबाने लगा.. इस बार मौसम को रसिक के प्रति कोई घृणा नहीं हो रही थी.. पर फिर भी रसिक को अपने शरीर से दूर धकेलते हुए कहा "मुझे ठंड लग रही है.. जरूरत पड़ी तो फिर से उतार दूँगी.. अभी पहन लेने दो मुझे.. और पहले उस रंडी की चूत चोदकर ढीली कर दो.. कब से मचल रही है चुदवाने के लिए" मौसम अब बेझिझक होकर बोलने लगी थी

फाल्गुनी खुश होकर बोली "अरे वाह.. अब तो तू भी एकदम खुल गई मौसम.. !!"

रसिक: "जब कपड़े ही उतर चुके हो.. फिर किस बात की झिझक.. !! क्यों सही कहा ना मैडम.. !!"

रसिक अब बेड पर बैठ गया और मौसम तथा फाल्गुनी दोनों को अपनी एक एक जांघ पर बीठा दिया.. और फिर उनकी काँखों के नीचे से हाथ डालकर दोनों को स्तनों को दबाने लगा
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फाल्गुनी रसिक के आधे-मुरझाए लंड से खेलने लगी। फाल्गुनी के हाथों के जादू से रसिक का लंड फिर से खड़ा हो गया.. उसका विकराल रूप देखकर मौसम फिर से घबरा गई "देख तो सही फाल्गुनी.. इसके लंड से मेरी गुलाबी कोमल चूत की धज्जियां उड़ जाएगी.. !!"

रसिक: "आपको इतना डर हो तो मैं वादा करता हूँ.. के कभी अंदर डालने के लिए मजबूर नहीं करूंगा आपको.. मुझे बस अपनी चूत पर लंड रगड़ने देगी तो भी मेरा निकल जाएगा.. !!"

मौसम ने जवाब नहीं दिया

अब फाल्गुनी ने रसिक के लंड को अपनी चिपचिपी बुर पर रगड़ना शुरू कर दिया था.. फाल्गुनी के इस साहस मे मदद करने के लिए रसिक की जांघ से उठकर, बेड के छोर पर खड़ी हो गई मौसम
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रसिक की मोटी जांघों की दोनों और अपने पैर फैलाकर बैठते हुए.. नीचे हाथ डालकर.. अपनी जामुन जैसी क्लिटोरिस पर रगड़ रही थी फाल्गुनी.. स्त्री के शरीर के सब से संवेदनशील हिस्से पर मर्द के जीवंत पौरुष-सभर अंग का गरमागरम स्पर्श होते ही, फाल्गुनी का बदन लहराने लगा..

उसके बदन मे कसाव आने लगा और साथ ही साथ उत्तेजना बढ़ने लगी.. उसका साहस भी अब एक कदम आगे बढ़ने लगा था.. उत्तेजना इंसान को साहसिक बना देती है.. फाल्गुनी ने रसिक का खंभे जैसा लंड अपनी बुर मे लेने के लिए कमर कस ली थी.. अपनी योनि के सुराख पर रसिक का लाल टमाटर जैसा सुपाड़ा टिकाते हुए उसने हल्के हल्के शरीर का दबाव बनाना शुरू किया.. योनिमार्ग के शुरुआती प्रतिरोध के बाद.. रसिक का सुपाड़ा अंदर धीरे धीरे घुस गया.. फाल्गुनी उस विकराल लंड को बड़ी मुश्किल से आधा ही ले पाई अंदर.. फाल्गुनी अब स्थिर हो गई.. शरीर का पूरा वज़न डालने के बावजूद लोडा ज्यादा अंदर नहीं जा पा रहा था.. उसकी चूत अपने महत्तम परिघ तक फैल चुकी थी.. इससे ज्यादा चौड़ी होना मुमकिन नहीं था..
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फाल्गुनी के चेहरे पर असह्य पीड़ा के भाव दिख रहे थे.. उसका बदन पसीने से तर हो रहा था..

"क्या हो रहा है तुझे फाल्गुनी? बाहर निकाल देना है... ?? कल तो बड़े मजे से लिया था तूने" फाल्गुनी को इस हाल मे देखकर.. घबराते हुए मौसम ने कहा..

फाल्गुनी ने टूटती हुई आवाज मे कहा.. "न.. नहीं.. कल तो लेटे लेटे लिया था.. आज ऊपर चढ़ी उसलिए दर्द हुआ पर.. इस दर्द को सहने के लिए.. तो मैं.. आह्ह.. तड़प रही थी.. मर जाने दे मुझे.. पर मैं इसे अब बाहर नहीं निकालूँगी.. ओह्ह.. मज़ा आएगा अब तो.. मौसम.. ओह माय गॉड.. क्या मस्त लंड है यार.. प्लीज.. जरा नीचे देखकर बता मुझे.. कितना अंदर गया और कितना बाकी है.. !!"

मौसम बेड के पास, रसिक की जांघों के बीच बैठ गई और देखने की कोशिश करने लगी.. पर उसे कुछ नजर नहीं आ रहा था..

मौसम: "कुछ दिख नहीं रहा है फाल्गुनी.. !!"

"एक मिनट मैडम.. " रसिक ने कहा.. और फाल्गुनी को कमर से पकड़कर वो बेड से खड़ा हो गया.. ऐसा करने से फाल्गुनी की चूत और फैल गई और लंड का अधिक हिस्सा अंदर घुस गया.. फाल्गुनी की चीख निकल गई... !!!!!

"ऊईईईईईई माँ.... !!!!!! मर गईई मम्मी.. रसिक बहोत दुख रहा है मुझे... आह उतार दे मुझे" फाल्गुनी की आँखों से आँसू बहने लगे

रसिक ने फाल्गुनी के चूतड़ों को अपने हाथों से सहारा देकर.. अपना लंड उसकी चूत से हल्का सा बाहर निकालकर फाल्गुनी को थोड़ी सी राहत दी.. फाल्गुनी की जान मे जान आई..

रसिक: "लीजिए मैडम... अब आपको दिखेगा.. " फूल की तरह उठा रखा था फाल्गुनी को रसिक ने

मौसम ने नीचे झुककर देखा.. अब लिंग-योनि की महायुति अब स्पष्ट नजर आ रही थी.. मौसम ने फाल्गुनी के चूतड़ों को जितना हो सकता था.. अपने हाथों से फैलाकर देखा.. देखकर मौसम की जुबान उसके हलक मे उतर गई... फाल्गुनी की चूत के अंदर रसिक का लंड बुरी तरह फंसा हुआ था.. वीर्य से भरे अंडकोश इतने मोटे मोटे नजर आ रहे थे.. फाल्गुनी की द्रवित हो रही चूत के रस से सराबोर होकर.. आग की रोशनी मे कंचे की तरह चमक रहे थे..

"अभी तो आधा ही अंदर गया है फाल्गुनी.. आधा बाहर है" मौसम ने रसिक के अंडकोशों पर हाथ फेर लिया.. और लंड के बाहर वाले हिस्से की मोटाई को हाथ लगाकर नापते हुए... घबराकर कहा "ओ बाप रे.. पूरा तो अंदर जाएगा ही नहीं.. फट जाएगी तेरी.. !!"

अपने राक्षसी हाथों मे फाल्गुनी को उठाकर आग की प्रदक्षिणा करते हुए हल्के हल्के चोदने लगा रसिक.. उसके हर नाजुक धक्के के साथ फाल्गुनी की सिसकियाँ और दर्द भरी कराहें निकलकर.. रात के अंधेरे मे ओजल हो रही थी.. बड़ा खतरनाक साहस कर दिया था फाल्गुनी ने.. अपनी हवस को संतुष्ट करने के लिए इंसान बड़े से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार हो जाता है.. यह उसका प्रत्यक्ष उदाहरण था..
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मौसम बेड पर बैठे बैठे.. दोनों के कठिन पर कामुक मिलन को विस्मय भरी नज़रों से देख रही थी.. सुंदर बदन वाली फाल्गुनी को उचककर घूम रहे रसिक के हाथ के डोले फूल गए थे.. फाल्गुनी ने रसिक की गर्दन मे अपने दोनों हाथ पिरोते हुए अपना सारा वज़न उसके शरीर पर डाल दिया था.. रसिक और फाल्गुनी के होंठ बस चार-पाँच इंच के अंतर पर थे.. फाल्गुनी के मुलायम गुलाबी होंठों को अपना बनाने के इरादे से रसिक ने अपने खुरदरे काले होंठों से उसे चूम लिया.. और अनुभवहीनता से चूसने लगा.. वो ऐसे चूम रहा था जैसे पुंगी बजा रहा हो..

रसिक के चूमने के इस तरीके पर फाल्गुनी को हंसी आ गई.. पर वो हंसी ज्यादा देर तक टिकी नहीं.. क्योंकि रसिक को किस करना आता नहीं था और वो खुद भी यह जानता था.. अब तक उसने उस क्षेत्र मे ज्यादा संशोधन किया नहीं था.. जरूरत भी नहीं पड़ी थी.. जितनी औरतों से उसका पाला पड़ा था उन्हें चूमने से ज्यादा उसके लंड से चुदने में ज्यादा दिलचस्पी थी.. उसने एक विशेष इरादे से फाल्गुनी को किस किया था.. जो फाल्गुनी को जल्दी ही समझ आने वाला था..

फाल्गुनी की चूत के बाहर जो आधा लंड घुसना बाकी था.. उसे एक जबरदस्त धक्का देते हुए अंदर डालने के बाद.. फाल्गुनी जोर से चीख न सकें इसलिए रसिक ने उसके मुंह को पकड़कर.. फाल्गुनी के चूतड़ों के नीचे सपोर्ट देने के लिए रखे अपने दोनों हाथों को छोड़ दिया.. फाल्गुनी के भारी शरीर का वज़न लंड पर पड़ते ही.. लंड का चार से पाँच इंच हिस्सा अंदर घुस गया.. !!!!!

फाल्गुनी ऐसे फड़फड़ाते हुए तड़पने लगी जैसे मछली पानी से बाहर निकल ने पर फड़फड़ाती है.. रसिक की बाहों से छूटने के लिए जद्दोजहत करने लगी.. पर चूत के अंदर लंड.. नश्तर की तरह घुसे हुए उसे बहुत दर्द दे रहा था.. असह्य पीड़ा से कराहते हुए फाल्गुनी जरा सी भी हलचल करती तो उसका दर्द और बढ़ रहा था.. इसलिए अब वो हिल भी नहीं पा रही थी.. इसलिए फाल्गुनी ने रसिक के बालों को ताकत पूर्वक पकड़कर लीप किस तोड़ दी और रसिक के कंधे पर सिर रखकर.. फुटफुटकर रोने लगी.. !!!

"ओह्ह... रसिक... मैं मर जाऊँगी..मुझे नहीं कराना.. प्लीज.. बाहर निकाल.. बहोत दर्द हो रहा है.. मौसम यार.. जरा समझा रसिक को.. !!"

मौसम बेड पर बैठे बैठे एक लकड़ी की मदद से आग के अंदर लकड़ियों को सही कर रही थी.. बड़े ही आराम से उसने कहा "तुझे ही बड़ा शौक था उसका लेने का.. अब अपनी सारी तमन्ना पूरी कर.. !!"

"नहीं नहीं.. रसिक, मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा.. फट गई है मेरी.. मेरे शरीर के बीच से दो टुकड़े हो जाएंगे ऐसा लग रहा है मुझे.. प्लीज" फाल्गुनी ने दर्द भरी विनती से रसिक और उत्तेजित हो गया.. उसने फाल्गुनी को मौसम के बगल मे.. बेड पर लेटा दिया.. और उसकी दोनों टांगों को फैलाकर मौसम के स्तनों को दबाने लगा और बोला "कल तो बड़े आराम से लिया था.. मैडम, आप इसकी दोनों टांगों को चौड़ा पकड़ रखिए.. आज तो इनको पूरा मज़ा देकर ही दम लूँगा.. "

बड़ी ही स्फूर्ति से मौसम खड़ी हो गई और फाल्गुनी की दोनों टांगों को पकड़कर चौड़ा कर दिया.. पर ऐसा करते वक्त जांघों के बीच झूल रहे मस्त लंड को पकड़कर अपने मन की मुराद पूरा करना भूली नहीं.. वो भले ही चूत मे लेने के लिए समर्थ नहीं थी.. पर इस मन-लुभावन लंड को पसंद तो करने लगी थी.. मौसम का हाथ लंड को छूते ही.. जैसे नेवले को देखकर सांप सचेत हो जाता है.. वैसे ही रसिक का लंड ऊपर होकर आसपास देखने लगा

"ओह् भेनचोद... मैडम, आपके हाथ मे पता नहीं कौन सा जादू है.. हाथ लगते ही मेरा उछलने लगता है.. आह्ह मैडम, थोड़ा सहलाओ इसे.. आह आह मज़ा आ रहा है.. थोड़ा सा चूस भी लो मेरी रानी.. !!" सुनते ही मौसम की प्यारी सी चूत मे जबरदस्त खुजली होने लगी..

तभी रसिक ने मौसम को धक्का देकर फाल्गुनी के बगल मे सुला दिया.. और रसिक उन दोनों के बदन पर छा गया.. भले ही अब तक एक भी चूत मे लंड घुस नहीं सका था.. पर रसिक के विशाल शरीर के तले दोनों लड़कियां ढँक गई थी.. फाल्गुनी और मौसम के स्तनों की हालत दयनीय थी.. मसल मसलकर रसिक ने स्तनों के आकार बदल दिया था.. उनके कोमल बदनो को कुचलते हुए.. अपने शरीर का तमाम वज़न उसने इन दोनों पर डाल दिया..

बारी बारी से दोनों के गालों को चूम रहा था रसिक.. वो दोनों के स्तनों को चूस रहा था.. जब फाल्गुनी के स्तन को चूसता तब मौसम के स्तन को मसलता.. उसके मर्दाना स्पर्श से दोनों कामुक सिसकियाँ निकालने लगी.. लंड बाहर निकल जाने से फाल्गुनी का दर्द भी गायब हो चुका था.. अब वो नए दर्द के लिए तड़पने लगी थी

अंधेरे कमरे में चमकता नाइट लैम्प.. ए.सी. की ठंडी हवा.. बेड पर लेटी हुई.. दो अति सुंदर नग्न सुंदरियाँ.. और उनके ऊपर मंडरा रहा हेवान जैसा रसिक.. बड़ी ही अद्भुत रात थी ये मौसम और फाल्गुनी के लिए.. दोनों सहेलियाँ इतनी कामुक हो गई थी अब उन्हें रसिक के छूने से कोई संकोच नहीं हो रहा था..

रसिक का खड़ा लंड मौसम के पेट और नाभि पर चुभ रहा था.. और उसे बेहद मज़ा आ रहा था.. फाल्गुनी इतनी उत्तेजित थी की रसिक के शरीर को मौसम के ऊपर से खींचकर अपने ऊपर लेने की कोशिश कर रही थी.. रसिक के स्वागत के लिए उसने अपनी जांघें खोल रखी थी.. फाल्गुनी का आमंत्रण समझ गया रसिक.. और मौसम के ऊपर से सरककर फाल्गुनी के शरीर के ऊपर छा गया..

फाल्गुनी की दोनों जांघों के बीच बैठकर.. रसिक का लोडा फाल्गुनी की चूत ढूंढकर.. बड़े ही आराम से आधा अंदर उतर गया.. फाल्गुनी की आँखों मे मोटे लंड-प्रवेश का जबरदस्त सुरूर छाने लगा था.. रसिक के काले चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए वो उसके कंधों पर काटने लगी

बगल मे लेटी मौसम खुद ही अपनी चूत सहलाते हुए रसिक के कूल्हे और पीठ पर हाथ सहला रही थी.. और आश्चर्य भरी नज़रों से फाल्गुनी के इस अप्रतिम साहस को देख रही थी.. एक पल के लिए उसे ऐसा मन हुआ की वो फाल्गुनी को हटाकर खुद रसिक के नीचे लेट जाए.. जो होगा फिर देखा जाएगा.. पर दूसरे ही पल.. फाल्गुनी की दर्द-सभर चीखें याद आ जाती और उसका हौसला पस्त हो गया.. !!

थोड़ी देर पहले रसिक ने जितना लंड फाल्गुनी की चूत मे डाला था, उतना तो इस बार आसानी से चला गया.. पर लंड का बाकी हिस्सा अंदर घुसने का नाम ही नहीं ले रहा था.. रसिक ने अब बाकी का लंड, किसी भी सूरत मे, अंदर डालने का मन बनाकर मौसम से कहा "तुम इसका मुंह बंद दबाकर रखो.. मैं आखरी शॉट मारने जा रहा हूँ"

सुनते ही फाल्गुनी की शक्ल रोने जैसी हो गई, वो बोली "नहीं रसिक.. मेरी फट जाएगी.. खून निकल जाएगा.. पूरा अंदर नहीं जाएगा.. बस जितना अंदर गया है उतना ही अंदर बाहर करते है ना.. !!! दोनों को मज़ा आएगा" अपना मुंह दबाने करीब आ रही मौसम को दूर धकेलते हुए फाल्गुनी ने कहा

मौसम: "हाँ रसिक.. उसको जिस तरह करवाना हो वैसे ही करो.. जो करने मे उसे मज़ा न आए और दर्द हो.. ऐसा करने मे क्या फायदा??"

रसिक: "ठीक है मैडम.. जैसा आप कहो.. !!"

इतना कहते हुए रसिक ने मौसम का हाथ पकड़कर.. चूत से बाहर लंड के हिस्से पर रखते हुए कहा "इस आधे लंड को आप पकड़कर रखो.. ताकि इससे ज्यादा अंदर जाए नहीं.. मैं धक्के मारना शुरू कर रहा हूँ.. अगर दर्द ज्यादा हो तो बता देना.. मैं पूरा बाहर निकाल दूंगा.. ठीक है.. !!"

फाल्गुनी की चूत मे आधे घुसे लंड के बाद जो हिस्सा बाहर रह गया था, उसे मुठ्ठी मे पकड़ लिया मौसम ने.. लंड के परिघ को नापते हुए मौसम के रोंगटे खड़े हो गए.. इतना मोटा था की मौसम अपनी हथेली से उसे पूरी तरह पकड़ भी नहीं पा रही थी..

फाल्गुनी के मस्त स्तनों को मसलते हुए.. पहले लोकल ट्रेन की गति से.. और फिर राजधानी की स्पीड से.. रसिक पेलने लगा..!! फाल्गुनी आनंद से सराबोर हो गई.. उसके शरीर मे.. रसिक के लंड के घर्षण से एक तरह की ऐसी ऊर्जा उत्पन्न हुई की इतने भारी रसिक के नीचे दबे होने के बावजूद वो अपने चूतड़ उठाकर उछल रही थी.. रसिक को भी बहोत मज़ा आ रहा था.. बड़ी उम्र की.. फैले हुए भोसड़ों वाली औरतों के मुकाबले.. फाल्गुनी की चूत तो काफी टाइट थी.. वो सिसकते हुए फाल्गुनी की जवानी को रौंदने लगा..

रसिक ने धक्के लगाने की गति को और तेज कर दिया.. उसके हेवानी धक्कों की वजह से हुआ यह की.. मौसम का हाथ उसके लंड से छूट गया.. जो स्टापर का काम कर रहा था.. चूत के अंदर जाने का जो तय नाप था.. वो अब नहीं रहा.. और लंड पूरा अंदर घुस गया.. और फाल्गुनी की फिर से चीख निकल गई..

पर अब रसिक रुकने वाला नहीं था.. लगभग पाँच मिनट की जंगली चुदाई के बाद फाल्गुनी का शरीर ढीला पड़ गया और वो रसिक के बदन से लिपट पड़ी.. "आह आह रसिक.. आह्ह आह्ह ओह्ह मैं गई अब... ऊँहह.. आह्ह.. !!!" कहते हुए फाल्गुनी की चूत का रस झड़ गया.. इस अनोखे स्खलन को मौसम बड़े ही करीब से देख रही थी
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रसिक के लंड को पता चल गया की इस युद्ध मे उसकी भव्य विजय हुई है.. अब बिना एक पल का इंतज़ार कीये रसिक ने फाल्गुनी की चूत से लंड बाहर निकाला और उसके शरीर के ऊपर से खड़ा हो गया.. हल्का सा सरककर वो मौसम के ऊपर चढ़ गया.. उससे पहले की मौसम को सोच या समझ पाती.. रसिक ने अपने हाथ से लंड के सुपाड़े को मौसम की फुलझड़ी पर रगड़ना शुरू कर दिया.. रसिक की इस हरकत को देखकर ही मौसम कांप उठी.. उसने हाथ जोड़ दीये

मौसम: "नहीं नहीं रसिक.. फाल्गुनी की बात अलग है.. मेरे अंदर डालने की कोशिश करेगा तो मेरी जान निकल जाएगी"

रसिक: "आप चिंता मत करो मैडम.. अंदर नहीं डालूँगा.. मुझे पता है की अंदर जाएगा ही नहीं.. इतनी संकरी है आपकी फुद्दी.. जहां मेरी उंगली भी मुश्किल से घुस पाती हो वहाँ ये डंडा तो जाने से रहा.. मैं तो बस ऊपर ऊपर से रगड़कर आपको मज़ा देना चाहता हूँ.. देखना अभी कितना मज़ा आता है" कहते हुए रसिक मौसम के गाल को चूमता हुआ उसके होंठों को चूसकर.. मौसम की क्लिटोरिस को अपने खूंखार सुपाड़े से घिसने लगा.. आनंद से फड़फड़ाने लगी मौसम..

बेहद उत्तेजित होकर मौसम ने कहा "बहुत मज़ा आ रहा है रसिक.. एक बार मेरी चाटो ना.. !!"

रसिक बड़ी ही सावधानी से एक एक कदम आगे बढ़ रहा था.. वो ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता थी जिससे मौसम नाराज हो.. वो खड़ा हो गया.. मौसम के पूरे शरीर को सहलाते हुए पलट गया.. मौसम के मुख की तरफ अपना लंड सेट करके वो उसके ऊपर लेट गया.. मौसम के चूतड़ों के नीचे हाथ डालकर खिलौने की तरह ऊपर उठाते हुए वो चूत चाटने लगा

"आह्ह रसिक.. ओह ओह्ह.. " मौसम ने सिसकने के लिए अपना मुंह खोला और तभी रसिक ने अपना लंड उसके होंठों के बीच दबाकर उसका मुंह बंद कर दिया.. बिना किसी घिन के रसिक का लंड पकड़कर बड़े ही प्रेम से चूसते हुए मौसम ने अपना पूरा शरीर रसिक को सौंप दिया..

रसिक ने कभी सपने मे भी नहीं सोचा था की मौसम उसका लंड चुसेगी.. अपने बबले दबाने देगी.. गुलाब की पंखुड़ियों जैसी उसकी चूत चाटने देगी..!!
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मौसम अपनी उत्तेजना के आखरी पड़ाव पर पहुँच चुकी थी.. और इस वक्त वो इतनी बेकाबू हो गई थी की रसिक के लंड को मुंह मे आधा लेकर वो पॉर्न फिल्मों की राँडों की तरह चूसने लगी.. रसिक भी सिसकियाँ भरते हुए मौसम के मुंह से अपने लंड को निकालकर उसी अवस्था मे मुठ्ठी से पकड़कर जबरदस्त स्पीड से हिलाने लगा.. फांसी की सजा पाए हुए कैदी की जैसे आखिरी इच्छा पूरी की जाती है वैसे रसिक अपने लंड को अंतिम सत्य के लिए लयबद्ध तरीके से हिला रहा था..

फाल्गुनी कभी उसके हाथ के डोलों को देखती.. तो कभी उसकी मुठ्ठी मे आगे पीछे होते सुपाड़े को.. !! रसिक के चौड़े कंधे और बड़ी लाल आँखें रात के अंधेरे मे बेहद डरावनी लग रही थी..

रसिक अचानक उठा.. और छलांग लगाते हुए मौसम की दोनों जांघों के बीच बैठ गया.. अपने लंड पर मुंह से निकालकर लार लगाते हुए.. इससे पहले की मौसम कुछ सोच या समझ पाती.. उसने मौसम की छोटी सी चूत पर अपना सुपाड़ा टीका दिया..

एकदम घबरा गई मौसम बोली "नहीं रसिक.. मत करो, मैंने पहले ही मना किया था" वो छटपटाने लगी पर रसिक के भारी शरीर तले उसकी जांघें दबी हुई थी इसलिए वो खिसक न पाई

हांफते हुए रसिक ने कहा "मैडम जी, कब से आपकी चूत चाट रहा था.. इतनी मस्त गंध आ रही थी.. इस गुलाबी छेद में एक बार डालने का मन है.. बस सिर्फ एक बार" कहते हुए उसने अपने सुपाड़े को मौसम की संकरी दरार के बीच दबाया

"ओह्ह फाल्गुनी, इसे समझा.. नहीं जाएगा अंदर.. मैं मर जाऊँगी.. उफ्फ़ प्लीज" मौसम ने गिड़गिड़ाते हुए फाल्गुनी से विनती की

"रहने दो रसिक, उसका मन नहीं है तो.. "फाल्गुनी अपना वाक्य पूरा करती इससे पहले तो रसिक ने अपना सुपाड़ा मौसम की मुनिया में अंदर धंसा दिया..

मौसम चीखती उससे पहले रसिक ने अपनी एक हथेली उसके मुंह पर दबा दी.. और इससे पहले की फाल्गुनी उसे रोकने के लिए कुछ कर पाती.. रसिक ने आधा लंड अंदर ठुसते हुए धक्के लगाना शुरू कर दिया..
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मौसम की संकरी सी चूत को रसिक का फौलादी लोडा चीर रहा था.. गनीमत थी की मौसम की चूत गीली थी वरना उसकी चमड़ी फट जाती..

रसिक की भारी हथेली तले दबी मौसम कुछ पलों के लिए छटपता कर शांत हो गई.. एक पल के लिए रसिक को लगा की मौसम को अब मज़ा आ रहा था.. पर ध्यान से देखने पर पता चला की मौसम अपने होश गंवा बैठी थी..!!

यह देखते ही रसिक की गांड फट गई.. उसने तुरंत मौसम के चेहरे से अपनी हथेली हटा ली.. और धीरे से अपना फंसा हुआ लंड मौसम की चूत से बाहर निकालने लगा..

जैसे ही उसका सुपाड़ा चूत के छेद से बाहर निकला.. मौसम की चूत से खून रिसने लगा.. देखते ही रसिक के तो पसीने छूट गए..

खून देखते ही फाल्गुनी भी बावरी हो गई.. "ये क्या कर दिया तूने रसिक..!!" कहते हुए उसने चद्दर उठाई और मौसम की चूत पर दबा दी ताकि खून का बहाव रोक सकें.. मौसम बेजान होकर बेड पर पड़ी थी

रसिक डरकर बेड से उठ गया.. फाल्गुनी ने घबराते हुए चद्दर को हल्के से हटाकर देखा.. मौसम की चूत से अब भी खून बह रहा था.. और जो बहाव था वो सामान्य नहीं था.. उसे यकीन हो गया की उसका योनिमार्ग अंदर से चोटिल हो चुका था.. अब बात काबू से बाहर थी.. तुरंत उसे मेडिकल मदद की जरूरत थी..

वह बेड से खड़ी हुई और अपने कपड़े पहनने लगी तब उसे एहसास हुआ की रसिक तो कब का भाग चुका था और अब वो अकेली थी..

उसने एम्बुलेंस बुलाने की सोची पर फिर उसे डर लगा की लोग क्या कहेंगे..!! उसने तुरंत अपने मोबाइल का एप खोलकर केब बुलाई। जैसे तैसे मौसम को कपड़े पहनाए और उसकी पेन्टी के अंदर एक सैनिटेरी पॅड रख दिया ताकि खून के बहाव को रोका जा सकें।

कैब आ गई और फाल्गुनी ने ड्राइवर की मदद से मौसम को पिछली सीट पर सुला दिया.. मदद की अपेक्षा से फाल्गुनी ने शीला भाभी के घर की ओर देखा पर वहाँ बाहर ताला लगा हुआ था..

कैब अस्पताल पहुंची और मौसम को ओ.पी.डी. में ले जाया गया..

कुछ देर बाद लैडी डॉक्टर ने बाहर आकर कहा की मौसम को काफी गंभीर अंदरूनी चोट लगी थी.. वह सब प्रयास कर रहे है पर अगर खून का बहाव न रुका तो मौसम की जान को खतरा हो सकता है

फाल्गुनी को पूरा विश्व गोल गोल घूमता नजर आने लगा.. वह अपना संतुलन खोकर कुर्सी पर गिर पड़ी.. वो अब अपने आप को कोस रही थी.. रसिक को बुलाना, मौसम को इसमें शामिल करना और फिर रसिक को रोक पाने में उसकी असमर्थता.. अगर मौसम को कुछ हो गया तो वो खुद को कभी माफ नहीं कर पाएगी.. सोचने पर उसे यह भी एहसास हुआ की इन सब के पीछे जिम्मेदार थी उसकी हवस.. और कुछ हद तक मौसम की भी.. इसी हवस के चलते आज मौसम ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी

पश्चाताप अक्सर इंसान को जीवन के सबसे गहरे दार्शनिक सवालों के सामने लाकर खड़ा कर देता है। युवावस्था के उस भ्रामक अहंकार में, जहाँ क्षणिक सुख और रोमांच ही सर्वोपरि लगते हैं, हम परिणामों की गंभीरता को नकार देते हैं और यह मान बैठते हैं कि हर परिस्थिति हमारे नियंत्रण में है। लेकिन, जब एक पल का भटकाव किसी अपने को जीवन और मृत्यु की दहलीज पर ले आता है, तो वह नियंत्रण का भ्रम पूरी तरह चूर-चूर हो जाता है। ऐसे असहाय क्षणों में हम विवश होकर अपनी आज़ादी, अपनी इच्छाओं और निर्णयों की वास्तविक कीमत पर सवाल उठाने लगते हैं। मन में यह द्वंद्व उठने लगता है कि क्या वह एक स्वीकृति वास्तव में हमारी आज़ादी का प्रतीक थी, या महज़ एक नासमझी? जब वक्त रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है, तब यह कड़वा सत्य सामने आता है कि हमारी नियति अक्सर उन क्षणभंगुर विकल्पों द्वारा ही तय होती है, जिनका असली वजन हम तब तक महसूस नहीं कर पाते, जब तक कि सब कुछ दांव पर न लग जाए।

"अरे फाल्गुनी, तुम यहाँ क्या कर रही हो?"

अपनी दोनों हथेलियों के बीच चेहरा छुपाकर रो रही फाल्गुनी को इस जानी पहचानी आवाज ने झकझोर कर रख दिया.. उसने तुरंत अपने आँसू पोंछे और सामने देखा.. सामने मदन खड़ा था.. दो दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी.. उतरा सा चेहरा..

एक पल के लिए फाल्गुनी को समझ नहीं आया की वह क्या बोले..

"वो.. वो.. वो तो मैं एक दोस्त को देखने आई थी.. पर अंकल आप यहाँ क्या कर रहे है??" फाल्गुनी ने खुद को थोड़ा सा स्वस्थ करते हुए पूछा

मदन ने एक भारी सांस छोड़ी और फाल्गुनी की बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया

"आज शीला वैशाली के घर से लौट रही थी.. सुबह से उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी.. पर यहाँ पहुँचने से पहली ही उसे पेट में इतना दर्द शुरू हो गया की वह दर्द के मारे बेहोश हो गई.. भला हो उस ड्राइवर का जो उसे सीधे अस्पताल ले गया और फिर उसने वैशाली को फोन किया.. वैशाली ने मुझे फोन करके बताया.. वो भी यहाँ आने के लिए निकल गई है" मदन ने बताया

आश्चर्य के साथ फाल्गुनी ने कहा "पर शीला भाभी को हुआ क्या है? डॉक्टर ने कुछ बताया?"

"उसे कुछ ब्लीडिंग हो रही है नीचे.. शायद को लेडिज प्रॉब्लेम हो.. डॉक्टर सारे टेस्ट कर रहे है.. रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ बता पाएंगे"

उस रात फाल्गुनी और मदन अस्पताल में पूरी रात बैठे रहे..


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