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"जवा उस समय 19 साल का था —
दिन भर शैतानी और खेल-कूद,
पर पढ़ाई में हमेशा अव्वल।
दतिया, मध्य प्रदेश के सरकारी डिग्री कॉलेज का मेधावी छात्र था —
जिसे हर टीचर पसंद करता था,
और हर लड़की की नज़र उस पर ठहरती थी।"
"उसकी छोटी बहन विजया —
उससे एक क्लास पीछे,
पढ़ाई में होशियार, पर बात-बात पर भाई से भिड़ जाती।
दोनों का झगड़ा घर की पहचान था —
कभी TV रिमोट को लेकर,
तो कभी माँ के बनाए खाने के टुकड़े को लेकर।"
"जवा का दिन —
सुबह की धूप में क्रिकेट,
दोपहर में दोस्तों के साथ गपशप,
और रात को देर तक पढ़ाई —
यही उसकी दिनचर्या थी।
पर हर शाम, जब घर की रौनक बढ़ती,
तो बहन के साथ नोक-झोंक उसकी ज़िंदगी का सबसे प्यारा हिस्सा था।"
**"विजया उसे छेड़ती,
तो वो उसकी चोटी खींचता।
वो उसकी किताब छुपाती,
तो वो उसके कमरे का लाइट बंद कर देता।
माँ बीच-बीच में आकर दोनों को डाँटती,
पर दोनों की आँखों में वही चमक होती —
जो सगे भाई-बहन के बीच ही होती है।"
"पर जवा की नज़रें अब विजया पर कुछ और ठहरने लगी थीं —
उसकी बहना, जो अब बड़ी हो रही थी,
उसकी चाल, उसकी हँसी,
और उसकी बढ़ती देह —
सब कुछ जवा के दिल में एक नई बेचैनी पैदा कर रहा था…"
"उधर जवा इस साल IIT की तैयारी में जुटा था —
किताबों के ढेर, कोचिंग के नोट्स, और रात-रात भर जागकर सवाल सुलझाना।
पर इधर उसकी छोटी बहन विजया के साथ नोक-झोंक भी बढ़ती जा रही थी।
वो भी गणित में अच्छी थी, और अगले साल JEE देने का प्लान बना रही थी।
पर अब दोनों उस उम्र में थे,
जहाँ हार्मोनल बदलाव अपना रंग दिखाने लगते हैं।"
"विजया की छाती भरी हो रही थी —
उसकी साड़ी या कुर्ती में नई लकीरें आ रही थीं,
और उसकी चाल में एक ठहराव आ गया था,
जो पहले कभी नहीं था।
और जवा का लंड —
बात-बात पर खड़ा हो जाता था,
बिना किसी वजह, बिना किसी बहाने।
बस विजया की हँसी, उसका झुकना,
या उसकी चोटी की हिलावट —
सब कुछ उसके शरीर में एक नई बेचैनी पैदा कर देता था।"
"हार्मोन्स का असर दोनों पर था —
विजया अब अपने भाई से पहले जैसी बातें नहीं कर पाती थी।
जब वो उसे किताब माँगने उसके कमरे में जाती,
तो उसकी नज़र अनजाने ही उसके लंड की तरफ़ चली जाती,
जो उसकी पैंट में उभरा हुआ दिखता।
और जवा भी —
जब विजया झुककर किताब उठाती,
तो उसकी नज़र उसके उभारों पर ठहर जाती,
जो अब पहले से अधिक गोल और भरे हुए थे।"
"घर का माहौल बदल रहा था —
न तो बातें पहले जैसी थीं,
न छुअन, न नज़रें।
दोनों के बीच बिना कहे एक तनाव था,
जो हर गुज़रते दिन के साथ गहरा होता जा रहा था।
और दोनों जानते थे —
कि ये बदलाव सिर्फ उम्र का नहीं,
बल्कि उस अनकही लालसा का था,
जो हर भाई-बहन के बीच
कभी न कभी उभरती है — पर जिसे वो नाम नहीं देना चाहते थे।"
एक दिन विजया की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी —
पेट में दर्द, चेहरे पर उदासी,
और वो बार-बार अपनी पीठ को सहला रही थी।
पर जवा को कोई अंदाज़ा नहीं था —
उसे कहाँ से पता होता…
ये सब उसकी समझ से बाहर था।"
"विजया ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया था,
और अंदर से आहें आ रही थीं।
जवा ने आवाज़ लगाई —
'क्या हुआ, विजया? तबीयत खराब है?'
कोई जवाब नहीं आया।
उसने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया —
'चल, मैं डॉक्टर को बुलाता हूँ…'"
"तभी विजया ने दरवाज़ा खोला —
चेहरे पर शर्म थी, आँखें नीची थीं।
उसके हाथ में एक कपड़ा था,
और उसके पीछे बिस्तर पर एक गीला निशान था।
जवा कुछ समझ नहीं पा रहा था।
उसने पूछा —
'क्या हुआ? खून कहाँ से आया?'"
"विजया ने शरमाते हुए कहा —
'भैया… ये… मेरी… MC है…'
जवा सन्न रह गया —
उसका चेहरा लाल हो गया,
और वो बिना कुछ कहे वहाँ से चला गया।
पर उसके मन में एक अजीब सा ख्याल आया —
कि उसकी छोटी बहना अब बड़ी हो गई है।"
4"जवा को 9वीं क्लास का रिप्रोडक्टिव सिस्टम का चैप्टर याद आ गया —
और उसने उस दिन एक बार फिर उस ज्ञान को दोहराया।
उसे समझ आया — विजया अब बड़ी हो गई थी,
अब वो उसकी छोटी बच्ची नहीं रही थी।"
"माँ ने विजया को सम्हाला,
कुछ हिदायतें दी, और शायद कोई गोली या दवाई भी दी —
पहली बार उसे सैनिटरी पैड लाकर दिए।
जवा ने ये सब दूर से देखा,
पर कुछ नहीं कहा।"
"जवा की साँसें थम गईं —
उसने ब्रा को हाथों में लिया,
उसके कपड़े को छुआ,
उसके आकार का अंदाज़ा लगाया —
'ये माँ की नहीं हो सकती…'
'तो क्या… ये विजया की है…?'
'अरे… विजया इतनी बड़ी हो गई है…
कि उसने ब्रा पहनना शुरू कर दिया?'"
"उस पल जवा के मन में
हज़ारों ख़याल आए —
उसकी बहना, जो कल तक बच्ची थी,
अब एक जवान लड़की बन चुकी थी।
और उसकी ब्रा का आकार
उसकी बढ़ती देह का सबूत था।
जवा ने ब्रा को वहीं रख दिया,
पर उसका मन अब कहीं और था —
उसी घर में, उसी छत के नीचे,
जहाँ उसकी बहना की जवानी
उसके लिए एक नई पहेली बन गई थी।"
दिन विजया अपने कपड़े सुखा रहा थी —
छत पर, तारों के बीच, तबही जावा छत पे आ गया
जब अचानक उसकी नज़र विजया ने जो सलवार pehani thii uske नीचे पड़ी झांकती पेंटी पे पड़ी।
विजया कपडे सुखा के चली गई
तभी जावा ने देखा विजया की कमीज के नीचे कुछ लटक रहा था —
एक छोटी सी, रंगीन चीज़।
उसने सलवार उठाकर देखा —
वो एक ब्रा थी।"
"और जब जवा ने ब्रा को वहाँ रखा,
तो उसकी नज़र एक पैंटी पर पड़ी —
जो वहीं, सलवार के पास, लटक रही थी।
उसके मन में जिज्ञासा जागी —
कि ये किसकी है?
और उसने बिना सोचे-समझे,
उस पैंटी को उठा लिया।"
"धीरे से, मानो कोई अनजान रहस्य छू रहा हो,
उसने पैंटी को सूँघा —
और एक तीखी, गहरी, प्यारी-सी गंध
उसके नथुनों में समा गई।
वो गंध ऐसी थी —
जो किसी और चीज़ में नहीं मिलती,
बस उस उम्र की लड़की की होती है,
जब उसकी चूत पक कर लंड के योग्य हो जाती है।"
"जवा की साँसें तेज़ हो गईं —
उसे समझ आया —
'यही तो होता है…'
'जब घर में कोई जवान लड़की हो,'
'तो वो अपनी चूत की खुशबू से,'
'पूरे घर को अपनी जवानी का एहसास करा देती है…'"
"उस पल जवा को पता चल गया —
कि विजया अब बच्ची नहीं रही,
और उसकी चूत की गंध
अब उसके लिए एक अनकही प्यास बन गई थी…"
"अब जवा को विजया थोड़ी अनजान-सी लगने लगी थी —
जहाँ पहले वो लड़ते-झगड़ते थे,
अब विजया थोड़ी गंभीर हो गई थी।
उसकी हँसी कम हो गई थी,
और वो अक्सर अपने कमरे में अकेली रहती थी।
जवा उसे देखता, पर कुछ कह नहीं पाता।"
"2-3 दिनों बाद, माँ ने विजया का नहलाया —
उसके सिर में तेल लगाया,
और शैम्पू से उसके बाल धोए।
विजया आँगन में बैठी,
माँ उसके बालों को सुखा रही थी,
और जवा दूर से देख रहा था —
उसकी बहना, जो अब इतनी बड़ी हो गई थी,
कि उसकी बढ़ती देह हर नज़र में आती थी।"
"फिर ये क्रम हर महीने का हो गया —
विजया की तबीयत खराब होती,
माँ उसे सम्हालती,
और कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाता।
जवा होशियार था —
उसने जल्दी ही तारीखों का पैटर्न पहचान लिया।
उसे पता चल गया —
कि विजया के MC के दिन कौन से हैं।"
"अब जवा उन दिनों अलग ही एहसास करता था —
कि उसकी बहना अब एक औरत है,
और उसके शरीर का हर बदलाव
उसके लिए एक नई जिज्ञासा बन रहा था…"
"अब जवा ने नोट किया —
घर के आस-पास के लड़के मंडराने लगे थे।
उसके खुद के दोस्त भी किसी न किसी बहाने
उसके घर के चक्कर लगाने लगे —
किताब माँगने, नोट्स लेने, या बस ‘हाल-चाल’ पूछने।
पर जवा जानता था —
उनकी नज़रें विजया पर थीं।"
"कॉलेज में भी लड़के उससे दोस्ती करने को उत्सुक रहते —
विजया को क्लास में घेरना,
उसके साथ बैठने की होड़,
यहाँ तक कि पापा के दोस्त — प्रकाश अंकल —
जो अक्सर चाय पीने आते थे,
अब विजया को बिल्कुल अलग नज़रों से घूरने लगे थे।
उसकी उभरती छाती पर उनकी नज़रें
बेवजह ठहर जाती थीं,
और कभी-कभी वो बहाने से
उसके करीब आकर बातें करने लगते —
'विजया, पढ़ाई कैसी चल रही है?
तुम्हारी माँ ने बताया था कि तुम्हें गणित में मुश्किल होती है…'
पर जवा को गुस्सा और बेचैनी दोनों होती थी।"
"विजया पर दिन-ब-दिन एक नया निखार आता जा रहा था —
उसकी चाल, उसकी हँसी,
उसके बढ़ते उभार —
सब कुछ उसे और खूबसूरत बना रहा था।
पहले दोनों भाई-बहन एक ही कमरे में सोते थे —
पर अब माँ ने एक स्टोर रूम को साफ़ करके,
उसमें विजया के लिए अलग बेड लगा दिया।"
"माँ ने कहा —
'बेटा, तुझे IIT की तैयारी करनी है…
ये तुझे डिस्टर्ब करेगी…'
जवा को बुरा लगा —
पर वो क्या कर सकता था?
वो चुप रहा,
पर उसके मन में एक खालीपन आ गया —
क्योंकि अब विजया की नज़दीकी
भी उससे छिनती जा रही थी…
और प्रकाश अंकल जैसे लोगों की नज़रें
उसकी बहना पर थीं, जो उसे बर्दाश्त नहीं था।"
"प्रकाश अंकल — पापा के पुराने दोस्त, ऑफिस के कॉलीग, और शाम की पेग पार्टी के पक्के साथी —
अब विजया में कुछ ज़्यादा ही इंटरेस्ट दिखाने लगे थे।
पहले तो वो बहाने से उसके पास आते,
पर अब तो उसे अपने पास बुलाकर,
बगल में बिठा लेते,
और बात-बात पर उसे चूमने की कोशिश करते —
कभी माथे पर, तो कभी गाल पर।"
"एक दिन तो उन्होंने विजया को अपनी गोद में बिठा लिया —
'बहुत अच्छी बच्ची हो बेटा…'
कहते हुए उनका हाथ उसकी कमर पर चला गया,
और फिर धीरे-धीरे उसकी छाती पर आ गया।
विजया हड़बड़ा गई, पर उससे पहले ही
प्रकाश अंकल ने उसके उभारों को हल्के से मसल दिया —
जैसे कोई पका हुआ फल चख रहा हो।
विजया ने झटके से उनका हाथ हटाया,
और बिना कुछ कहे वहाँ से उठकर चली गई —
पर उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं।"
"माँ और जवा — दोनों ने प्रकाश अंकल की नज़रों को पहचान लिया था।
एक दिन माँ ने बिना शोर मचाए,
उन्हें हल्के-फुल्के अंदाज़ में क्लास ली —
'प्रकाश जी, हमारी बिटिया अभी बच्ची है…
और आप तो उसके बड़े-बुज़ुर्ग हैं…'
इतना कहना था कि प्रकाश अंकल का चेहरा लाल हो गया।"
"और फिर ये बात लेडीज़ सर्कल में फैल गई —
और जैसे ही उनकी बीवी को पता चला,
उन्होंने प्रकाश अंकल की खूब गाली निकाली —
घर में, बाहर, रिश्तेदारों के बीच —
और उन्हें ऐसी क्लास लगाई,
कि प्रकाश अंकल को घर से बाहर निकलना
भी मुश्किल हो गया।"
"उसके माँ-बाबू को लगा —
जवा की तैयारी यहाँ उतनी अच्छी नहीं हो रही है।
दतिया में कोई अच्छी कोचिंग भी नहीं थी,
और IIT की रेस में हर दिन मायने रखता था।
फिर फैसला हुआ —
जवा को कोटा भेजा जाए।
और वही हुआ —
जवा ने कोटा जाकर कोचिंग ज्वाइन कर ली।"
"वहाँ पढ़ाई का अपना रुटीन था —
सुबह क्लास, दोपहर टेस्ट,
रात को नोट्स रिवाइज —
पर जब भी किताबों से नज़रें हटतीं,
तो विजया याद आती थी।
उसकी हँसी, उसकी नोक-झोंक,
उसकी बढ़ती देह,
उसके MC के दिनों की बेचैनी —
सब कुछ जवा के दिमाग में गहरा बैठ गया था।"
"वो अक्सर सोचता —
'विजया अब क्या कर रही होगी?'
'क्या वो भी उसे याद करती होगी?'
पर कोटा की नई ज़िंदगी में
वो पुरानी बातों को दबाने की कोशिश करता था —
पर विजया की यादें हर साँस में बसी रहती थीं।"
कोटा में पढ़ाई का प्रेशर ऐसा था — सुबह 6 बजे क्लास, रात 11 बजे सेल्फ स्टडी,
और बीच में नोट्स, टेस्ट, रैंकिंग की अंधी स्पर्धा।
हर बच्चा टॉपर बनना चाहता था,
हर टेस्ट में कट-ऑफ के नंबर पार करने की होड़,
और जो पीछे रह जाता, वो डिप्रेशन में चला जाता।
कोटा की हवा में सिर्फ एक ही जुनून था —
'IIT निकालना है, चाहे कुछ भी हो जाए।'
पर इसी भागदौड़ में,
जवा का मन बार-बार विजया की तरफ भागता था।"
"विजया की यादें —
वो बचपन की नोक-झोंक,
वो उसकी बढ़ती देह,
वो MC के दिनों की बेचैनी,
वो ब्रा और पैंटी की गंध,
वो प्रकाश अंकल का हाथ उसकी छाती पर,
और माँ का उसे अलग कमरे में भेज देना —
सब कुछ जवा के दिमाग में घूमता रहता था।
वो सोचता —
'विजया अब क्या कर रही होगी?
क्या वो भी मुझे याद करती होगी?'
पर जवा जानता था —
उसे पहले IIT क्रैक करना है,
फिर विजया के सामने अपनी चाहत रखनी है।"
"वो अपने आप से कहता —
'पहले JEE निकालूँ, फिर उसे बताऊँ…
कि मैं उसे बचपन से चाहता हूँ…'
पर उसके अंदर एक बेचैनी थी —
कि जब तक वो IIT निकालेगा,
विजया की चूत की गर्मी किसी और के हाथ लग जाएगी।
इसलिए वो रात-रात जागकर पढ़ता,
और सपने में विजया की नंगी देह देखता,
जो उसे पढ़ाई से भी ज़्यादा
उसकी जान लगती थी…"
"और उधर विजया भी अपनी 12वीं की तैयारी में मगन थी —
पढ़ाई, किताबें, और कॉपियाँ —
पर उसके दिमाग में जवा बार-बार आता।
वो उसे भाई की तरह मिस करती थी,
पर उसके अंदर वो भाई वाली दीवानगी नहीं थी —
जो जवा के दिल में थी।
पर अब विजया को अपनी बढ़ती जवानी का एहसास हो चला था —
या ये कहो कि ज़माने ने कर दिया था।"
"उसे कोई नहीं मसलना चाहता था —
PT सर, किसी न किसी बहाने,
उसे यहाँ-वहाँ छूने की कोशिश करते,
और स्कूल की बस में तो हालत और खराब थी —
बस में चढ़ते ही सारे लड़के उसके पीछे पड़ जाते,
कभी धक्का, तो कभी बहाने से हाथ फिसल जाता।"
"और माँ —
जिनकी पैनी नज़र हर वक्त विजया पर रहती,
उन्होंने उसके इतने ढीले कपड़े सिलवा दिए,
कि उसके उभार छिप जाएँ।
पर लाल ही गुड़गुड़ी में कहाँ छिपता है —
उसके यौवन के विशाल पहाड़
फिर भी दिख ही जाते थे,
और हर कोई उनका दीवाना था —
यहाँ तक कि उसका सगा भाई भी।"
"विजया के पीछे लड़कों की लाइन लगी थी —
कोई SMS करता, कोई WhatsApp पर परेशान करता,
और प्रकाश अंकल तो बदनाम हो चुके थे,
पर अब कभी मौसाजी, कभी फुफाजी —
'बेटा-बेटा' कहकर उसकी गोलाइयों का मज़ा ले चुके थे।
लड़कियाँ तो nahii bigadein
पर ये मदरचोद मर्द
उसे चैन से जीने कहाँ देते थे।"
"और इसी सब के बीच,
वक्त निकलता जा रहा था —
विजया की बोर्ड की परीक्षा आ गई,
और जवा का JEE एंट्रेंस टेस्ट भी —
अब घड़ी करीब थी,
और दोनों की ज़िंदगी की चाल अलग-अलग दिशा में जा रही थी।"