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Incest Sagar (Completed)

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Incestlala

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Superb update
5.


अगले दिन सुबह जब मैं सो कर उठा तब हल्की हल्की बारिश हो रही थी । मैंने खिड़की से झांक कर देखा तो आसमान में हल्के-हल्के बादल आंख मिचौली खेल रहे थे । अप्रैल का महीना बारिश का नहीं होता है लेकिन हमारे यहां मौसम कब पलट जाए कोई नहीं जानता । शायद इसीलिए भारतीय मानसून को जुए का खेल कहा जाता है । मैं नित्य कर्म से निवृत्त हो कर अपने बिस्तर पर बैठ गया और पिछले कुछ दिनों से चल रहे घटनाओं के बारे में सोचने लगा ।

तभी वहां रीतु आईं ।

" नाश्ता नहीं करना है क्या " रीतु बोली ।

मैंने उसे देखा । नहा धो कर वह किसी ताजा ताजा खिले कली के समान लग रही थी । उसके शरीर से किसी सुगन्धित सेंट की खुशबू आ रही थी । वैसे उसे किसी भी आर्टिफिशियल सेंट की कोई जरूरत नहीं थी। उसने लेगिंग्स और टाप पहना था जिसमें उसके शरीर के उतार चढ़ाव किसी भी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए काफी था । कितनी खूबसूरत है मेरी बहन ।

मैंने एक लम्बी सांस ली और उसके साथ नीचे हाल में आ गया ।

" क्या बात है ! आज बड़ी देर कर दी ।" माॅम ने पूछा ।

" कोई खास बात नहीं है माॅम । चलो जल्दी से नाश्ता लगाओ ।" मैं कुर्सी पर बैठते हुए बोला ।

माॅम ने नाश्ता निकाला । हम दोनों भाई बहन नाश्ता करने लगे । डैड ड्यूटी चले गए थे । थोड़ी देर बाद माॅम भी अपना नाश्ता ले कर हमारे साथ ही बैठ गई ।

" माॅम ! कल मुझे श्वेता दी को लेकर आगरा जाना है ।" मैंने खाने के दौरान कहा ।

" क्यों । " माॅम ने प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा ।

" उनकी सहेली उर्वशी की शादी की रिसेप्शन है ।"

" तो तुम क्यों जा रहे हो । जीजू नहीं है क्या ।" रीतु ने बीच में टोकते हुए कहा ।

" नहीं । उनकी तबीयत थोड़ी रिवर्स गियर में चल रही है ।" मैंने उसे देखकर मजाक करते हुए कहा ।

" तब कल तो आ नहीं पाओगे ? " माॅम ने पूछा ।

" पता नहीं । ये तो वहां जाने के बाद मालूम पड़ेगा ।"

अभी हम बातें कर ही रहे थे कि मेरा मोबाइल बजने लगा । मैंने देखा किसी अनजान नंबर से फोन था । मैंने फोन पिक अप किया ।

" हैलो ! सागर जी ? "

" हां जी । बोलिए ।" मैंने कहा

" मैं अनुष्का ।"

" जी , जी अनुष्का जी कहिए ।"

" यदि आज आप फ्री हो तो क्या हम मिल सकते हैं ।"

" क्यों नहीं । बोलिए कहा और कब आना होगा ।"

" निजामुद्दीन स्टेशन के पास दो बजे तक आ जाइए ।"

" ओके । मैं पहुंच जाऊंगा ।"

फिर ' बाय ' बोलकर उसने फोन काट दिया । अभी उस वक्त दस ही बजे थे मतलब चार घंटे बाद । नाश्ता भी हमारा हो गया था । फिर मैंने माॅम को कालेज जाने की बोलकर घर से निकल गया ।


कालेज से ही मैं निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचा । वहां अगल बगल नजरें दौड़ाई तभी किसी ने मेरा ‌नाम लेकर पुकारा । मैंने देखा अनुष्का कार में बैठे मुझे ईसारे से बुला रही थी । मैं उसके पास गया । उसने मुझे कार में बैठने को कहा । मैं उसके बगल बैठ गया ।कार में उसके सिवा और कोई नहीं था ।

" मुझे शक है कि मेरी निगरानी के लिए मेरे पति ने किसी को मेरे पिछे लगा रखा है । एक आदमी मुझे अपने पिछे लगा हुआ दिखा लेकिन मैं उसे डाज देने में कामयाब हो गई ।" अनुष्का ड्राइव करती हुई बोली ।

" अच्छा ! बहुत होशियार है आप ।"

" वो तो मैं हूं ।" वो मुदित मन से बोली ।

" अब हम कहां जा रहे हैं ।"

" जहां तुम कहो ।"

" जी ! किसी खास जगह चलें ।"

" कैसी खास जगह ।"

" जहां तन्हाई हो । नीम अंधेरा हो । रोमांटिक म्यूजिक हो । जहां जाम छलकते हों । शराब के भी और शवाव के भी ।"

" ऐसी कोई जगह है यहां

" एक नहीं कई है ।"

" कहां है ? " वह संशय भरे दृष्टि डाली ।

" होटल में ।"

" बीबी झाड़ू लेकर सर गंजी कर देगी ।"

" आप के खादिम के पास झाड़ू तो है लेकिन बीबी नहीं ।"

" क्यों । मायके गई है ।"

" है ही नहीं ।"

" इस बात का अफसोस है या खुशी ।"

" दोनों । कभी अफसोस कभी खुशी ।"

" मतलब ।"

" " सर्दियों की तन्हा रातों में अफसोस और बाकी खुशी ।"

" काफी रंगीन किस्म के आदमी हो ।"

" ऐसा ही है कुछ ।"

" बातें बढ़िया करते हो ।"

" मैं और भी कई काम बढ़िया करता हूं लेकिन वो फिर कभी । "

उसके बाद हम निजामुद्दीन में ही कनिष्क नामक बार एंड रेस्टोरेंट में गये । वहां एक कोने की टेबल पर आमने-सामने बैठने की जगह अगल बगल बैठ गये ।

" क्या लोगे " " उसने कहा ।

" जो आप कहो ।"

थोड़ी देर बाद हमारे टेबल पर काफी की ग्लास आई ।

" उस दिन मेरे पति के सामने मेरी पोल न खोलने के लिए शुक्रिया ।"

" वो सब छोड़ो , उस दिन मैंने जो सवाल पूछा था उसका जवाब दो ।"

" देखो ! मुझे राजीव ने बता दिया है कि उससे तुम्हारी बात हुई है । तुम सब कुछ तो जान ही चुके हो ।"

" सब कुछ नहीं । दी के आने से बात अधुरी रह गई थी । तुम अपने बारे में कुछ बताओ ।"

" मैं , मैं मेरठ की रहने वाली हूं । मेरे घर में मेरे अलावा सिर्फ एक बहन है जो वहीं रहती है । हमारे मां बाप बहुत पहले गुजर चुके थे ।हमारी जिंदगी काफी ग़रीबी में कटी है , हमने अपने जिन्दगी में इतने अभाव देखें है कि उन दिनों की याद करके आज भी हमारी रूह कांप जाती है ।" वो जैसे बिते दिनों में खो सी गई थी ।

" फिर । फिर क्या हुआ ।"

मेरे टोकने पर वह धरातल पर आई ।

" हमारे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि हम अपर क्लास की शिक्षा पूरी कर पाते । वीणा की तो पढ़ाई में कोई खास रूचि नहीं थी लेकिन मैं पढ़ना चाहती थी । मैं कुछ करना चाहती थी । मैं कुछ बनना चाहती थी । मैंने , मां की कुछ जेवर थी , वो बेच कर दिल्ली आ गयी । यहां आकर कालेज में दाखिला लिया । यहीं राजीव से मुलाकात हुई । "

मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था । थोड़ी देर बाद वो बोली ।

" वो मुझ से शादी करना चाहता था लेकिन मैंने जो कष्ट , जो जिल्लत , जो अभाव देखा था वो मुझे रह रह कर डरावने ख्वाब की तरह डसता था । राजीव एक अच्छा लड़का था लेकिन वो मेरे सपनों को पूरा करने में सक्षम नहीं था । करीब एक साल के बाद हमने आपसी रजामंदी से अलग अलग रास्ते चुन लिए । "


" तुम्हारी मुलाकात कुलभूषण खन्ना से कैसे हुई ? " मैंने पूछा ।

" वो हमारे कालेज के principal का दोस्त था । एक दिन वो कालेज principal से मिलने आया था , तभी उसने मुझे देखा था ।
वो मुझ पर फिदा हो गया और दो चार मुलाकात में ही शादी का प्रस्ताव रख दिया ।... मैंने बहुत सोचा । महिनों सोचा फिर लास्ट में उसे हां कर दी । "

मैं चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा । मैं उसके दुबारा बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।

" आप उस दिन राजीव के फ्लेट में क्या कर रही थी ।" मैंने पुराना सवाल फिर दोहराया ।

थोड़ी देर बाद वो बोली ।
" राजीव से दुबारा छः महीने पहले मुलाकात हुई । वो अपने दोस्तों के साथ पैराडाइज क्लब आया था । मैं उस वक्त अपनी सहेलियों के साथ स्वीमिंगपूल में थी । हमारी बातें हुई ।उसने बताया उसकी शादी डेढ़ साल पहले हो चुकी है । मैंने भी अपने बारे में बताया । फिर कुछ और मुलाकातें हुईं और हम दुबारा दोस्त बन गए । ...उस दिन हमारी राजीव के फ्लेट पर डेट थी । मैं वहां सुबह के ग्यारह बजे पहुंची थी । राजीव ने अपने फ्लैट की डुप्लीकेट चाबी मुझे पहले ही दे दी थी । जब मैं वहां पहुंची तब दरवाजा खुला था । मैंने सोचा वो फ्लेट में ही होगा लेकिन वो वहां नहीं था । मैंने उसे फ़ोन किया तो उसने बताया कि वह रास्ते में है । मैं थोड़ी देर बिस्तर पर लेट गई । थोड़ी देर बाद मैं हाथ मुंह धोने बाथरूम गई । वहां मैंने एक आदमी को बाथ-टब में पड़े हुए देखा । मैं डर गई फिर मैंने उसके पास जाकर देखा तो वह मरा पड़ा था । उसे गोली लगी थी । मेरे छक्के छूट गये ।मैं काफी भयभीत हो गयी । फिर जल्दी से वहां से भाग कर निकल ही रही थी कि तुम आ गए ।"

वो चुप हो गई ।

मैं कुछ समझ तक चुप रहा फिर मैंने सिगरेट निकाल कर उसे आफर की तो उसने पैकेट में से एक सिगरेट निकाल ली । फिर मैंने भी सिगरेट निकाली और उसकी सिगरेट सुलगाने के बाद अपनी सुलगाई ।

सिगरेट के चार पांच कश लगाने के बाद वो थोड़ी नार्मल हुई ।

" तुम्हारे पति को राजीव के साथ अफेयर की कोई खबर है ? " मैंने सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए कहा ।

" पता नहीं..... मेरा पति बहुत ईष्र्या करने वाला आदमी है ।" उसने कहा ।

" कोई बड़ी बात नहीं । आप जैसी खुबसूरत औरत का पति जो कोई भी होगा , ऐसा ही होगा ।" मैंने मज़ाक कर कहा ।

" हर किसी पे शक करने वाला ? "

" वो हर किसी पे शक करता है ? "

" हां ।"

" फिर तो मुझे यूं आपके करीब नहीं बैठा होना चाहिए ।"

" अरे ! वो तुम पर शक नहीं करता ।"

" मैं इसे अपनी खुशकिस्मती समझु या तौहीन ।"

वह हंसी फिर बोली - " सुनो , मैं तुमसे एक वादा चाहती हूं ।"

" कैसा वादा ।'

" कि तुम मेरे राज को आगे भी राज रखोगे ।"

" लगता है आप अपने पति से बहुत डरती है ।"

" हां । बहुत ज्यादा ।"

" आप की बनती नहीं उनसे ।"

" नहीं ।"

" तो फिर छोड़ क्यों नहीं देती ।"

" मैं ऐसा नहीं कर सकती ।"

" क्योंकी वो अमीर है । क्योंकी दौलत के बिना आप नहीं रह सकती ।"

उसने आहत भाव से मेरी तरफ देखा ।

औरत ही ऐसा कर सकती है कि चित भी उसकी हो और पट भी उसकी । वो दो किशितयो में सवार होकर चाह सकती हैं कि मझधार में न गिरे । औरत के मन में क्या है , कौन माई का लाल बता सकता है । ( मैं मन ही मन सोचा )

" फिलहाल मुझे नहीं मालूम कि अमर की मौत से आपका कोई रिश्ता है या नहीं । और अभी तक आप के बारे में पुलिस को भी कुछ नहीं पता । अगर आप बेगुनाह है तो बेफिक्र होकर रहिए । ... लेकिन अगर आप गुनाहगार है तो अभी से पनाह तलाश करनी शुरू कर दीजिए ।" मैंने कहा ।

उसके चेहरे पर सख्त नाराजगी के भाव उभरे ‌। वो जोर से लम्बी लम्बी सांसें लेने लगी ।

" मिस्टर सागर ।'

" यस मैडम ।"

" मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी ।"

" कैसी उम्मीद नहीं थी मैडम ! "

" कि तुम्हें मेरा जरा भी लिहाज नहीं होगा । मैं इतनी दूर से तुम्हारे पास आईं और तुम...."।

" इज्जत अफजाई का शुक्रिया । " मैंने हल्के से सिर झुका कर कहा ।

वो खड़ी हुई और अपना पर्स उठाते हुए बोली -" मैं तुम से फिर बात करूंगी ।"

" वैलकम मैडम ।"

फिर दनदनाते हुए रेस्टोरेंट से बाहर निकल गई । मैं कुछ देर तक वहीं बैठा सोचता रहा फिर मैं वहां से निकल गया ।














"
 
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Shayad hamare yaha 4 din internet band rahega.
 
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Update 8.


दोपहर बाद जब मैं घर पहुंचा तो माॅम ने खाना लगाया । रीतु अपनी सहेली काजल से मिलने गयी थी । मैं अपने कमरे में गया । कुछ देर आराम करने करने के बाद पैराडाइज क्लब चला गया । आज कुलभूषण खन्ना नहीं आया था । वहां ड्यूटी देने के बाद मैंने कुलभूषण खन्ना के असिस्टेंट से एक दिन की छुट्टी लेकर घर आ गया । आठ बज गए थे लेकिन अभी तक रीतु आईं नहीं थी । माॅम से पूछा तो उन्होंने कहा वो नौ बजे तक लौटोगे । माॅम ने खाने के लिए पुछा तो मैंने रीतु के आने तक इन्तजार करने के लिए कहा ।


मैं अपने कमरे में गया । कपड़े बदले और छत पर टहलने लगा । तभी मुझे याद आया कि मैंने अपने ब्लेजर और पैंट तो लांड्रिंग में दिए हैं, वो तो मैं लाना ही भूल गया । मैंने रीतु को फोन लगाया और उससे पूछा वो अभी काजल के पास ही है या वहां से निकल गई है तो उसने कहा आधे घंटे में निकल रही है । मैंने उससे कहा कि आते समय रास्ते में ही जो लाउंड्री है और उससे मेरी बात करा देना और मेरी कपड़े लेती आना ।

पहले तो बड़ी आना कानी करी कि वो लांड्रिंग वाला उसके आते वक्त रास्ते में नहीं पड़ेगा , वो जगह दुर है , वो बस से नहीं आयेगी , बस से आने से कपड़े खराब हो जायेंगे , गर्मी से मेरी पोलिस उत्तर जायेगी , कैब से आयेगी , कैब के भाड़े के पैसे नहीं हैं , तब मैंने बड़ी मुश्किल से उसे कपड़े लेकर आने के लिए तैयार किया ।

रीतु को किसी बात के लिए convince कराना बड़ी टेड़ी खीर है । ये शर्तिया अपने हसबैंड को नाकों चने चबवा देगी । मैं जा कर अपने बेड पर लेट गया और पिछले दिनों के बारे में सोचने लगा ।

करीब एक आध घंटे बाद रीतु आईं और मेरे आयरन किए हुए कपड़े सलिके से बिस्तर पर रख दी । मैंने उसे देखा वो इस वक्त एक हरे रंग का सलवार सूट पहनी थी । उसके शरीर से आती वही जानी पहचानी खुशबू । हमेशा की तरह जगमग जगमग ।

" बस में तुम्हारी पालिश तो ‌नही उतरी ।" मैंने कहा ।

" नहीं उतरी ।" वो खड़े खड़े ही बोली ।

" अंदेशा तो बहुत था तुम्हें ।"

" हां । अलबत्ता उससे ज्यादा बुरी बात हो गई ।"

" क्या ?" मैं सशंकित स्वर में बोला ।

" बस में कुछ लफंगे सवार थे ।"

" ओहो !" - मैं हमदर्दी भरे स्वर में बोला - " उन्होंने तुम्हें छेड़ा होगा , गन्दे इशारे किए होंगे , फब्तियां कसी होंगी ।"

" इससे भी बुरा किया कमीनों ने ।"

" अच्छा !" क्या किया उन्होंने ?"

" उन्होंने मुझे हर तरह से नजर अंदाज कर दिया , मेरी तरफ झांका भी नहीं , पीठ फेर ली मेरी तरफ से ।"

" यह तो वाकई बुरा किया कमीनों ने ।"

" हां न । आप यदि मुझे कैब से आने को बोले होते तो क्या होती मेरी इतनी बेइज्जती ।" " आप ..........."

उसकी बक बक शुरू हो गई थी और मैं चुपचाप उसे देखे जा रहा था । मैं जानता था कि वो कैब से ही आयी होगी लेकिन उसे तो मुझसे अपनी बक बक करनी थी । मुझे तो उसकी बक बक भी बहुत प्यारी और सेक्सी लगती थी । उसके बोलने का अंदाज , उसके लबों का हिलना, उसके हाथों का झटकना, बोलते वक्त उसके लटो का उसके गालों को चूमना । मैं तो जैसे कहीं खो गया था ।

" लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"

" क.. क्या कहा ? " मैं जैसे होश में आया ।

" मैंने कहा लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"

" कैसे जाना ?" मैं हकबकाया ।

" आंखों ही आंखों में मुझे निगल जाने की कोशिश जो कर रहे हो ।"

" सिर्फ कोशिश कर रहा हूं ।" - मैंने नकली आह भरी - " कोशिशें तो मैं और भी बहुत करता हूं लेकिन कामयाब कहां हो पाता हूं ।"

" कयी बार कोशिश में कामयाबी से ज्यादा मजा आता है ।"

" वो कैसे ?"

" कोशिश इनसान बार बार करता है । कामयाबी के बाद वो कहानी खतम हो जाती है ।"

" क्या बात है , आज तो बड़ी काबिलियत भरी बातें कर रही है ।"

" मैं अक्सर काबिलियत भरी बातें करती हूं , खास तौर से सूर्य अस्त होने के बाद ।"

" गुड । अब अपनी प्रवचन बन्द कर मुझे जोरों से भुख लगी है ।"

" तो मैंने आपको खाने से रोका है कब से खुद ही बक बक किये जा रहे हो ।" वो अपनी आंखें तरेरती हुई बोली ।


फिर खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया और आगरा जाने के लिए अपने बैग तैयार किया और फिर बिस्तर के हवाले हो गया ।



सुबह साढ़े आठ बजे होंगे जब मैं गाजियाबाद श्वेता दी के फ्लेट पहुंचा । जीजा अपने कमरे में आराम कर रहा था । श्वेता दी तैयार हो गई थी । उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी । बिना आस्तीन का ब्लाउज जिसमें उनके गोरी माशल भुजाएं काफी आकर्षित लग रही थी । ब्लाउज का गला v आकार का था जिसमें से उनकी cleavage कुछ हद तक नुमाइश हो रही थी । गले में मंगलसूत्र के अलावा बदन पर कुछ और भी गहने पहन रखी थी । उनका गदराया हुआ यौवन किसी भी इन्सान को घायल करने के लिए पर्याप्त था ।

मैंने नाश्ता वहीं किया फिर जीजा से इजाजत लेकर हम दोनों कार लेकर वहां से निकल गये । मैं ड्राइव कर रहा था और वो आगे वाली सीट पर मेरे बगल बैठी थी । कुछ दुर तक हम शान्त ही रहे । जब कार भीड़ भाड़ वाले एरिया से बाहर निकल मेन रोड पर आई तब श्वेता दी ने कहा ।

" अब बताओ क्या बात है "

" कैसी बात ? " मैंने नजरें स्क्रीन से हटाकर उनकी तरफ देखा ।

" जब तुम राजीव से प्रायवेट बात करने को बोल कर मुझे वहां से हटने के लिए बोले थे।"

" ओह ! वो । " मैं वापस नजरें स्क्रीन पर रखते हुए कहा - " " बता दुंगा , थोड़ी धीरज रखो ।"

" नहीं । अभी बताओ ।"

" वो काफी लम्बी कहानी है , इस वक्त कार ड्राइव करते हुए कैसे बोल सकता हूं । एक काम करते हैं वहां पहुंच कर बताता हूं । वहां अकेले में हमें काफी समय मिलेगा ।"

" ओके ।" बोलकर वो चुप हो गई । कुछ देर बाद वो एक्साइटेड हो कर बोली - " आज कितने दिनों के बाद न हम किसी पार्टी में शामिल हो रही हैं , कितना मजा आयेगा । है ना ।"

" हां । तुम्हारे शादी के बाद पहली बार ।" - मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

" हां । जब हम छोटे थे कितने मस्ती करते थे , कितने झगड़ते थे । "- वो कहीं खोई खोई सी बोली । - " और अब जैसे लगता है मैं अपना बचपन भुल गयी हूं ।"

" अच्छा तो है , अब शादी शुदा जिंदगी की लुत्फ उठा रही हो । इतना अच्छा प्यार करने वाला पति मिला है । वैसे भी जिन्दगी का चक्र तो हमेशा बदलते रहता है ।"

" हां । " वो चुपचाप सी हो गई ।

" सब ठीक है ना ? "

" हां । सब ठीक ठाक है ।" - वो अचानक से अलग रंग में आते हुए बोली - " छोड़ो वो सब , कोई गाना वाना लगाओ । किशोर कुमार के मस्त गाने ।"

करीब एक घंटे बाद वो गाने से बोर होने लगी तो मैंने कहा अगर नींद आ रही हो तो सो जाओ । मगर उसनेे मना कर दिया । और खुद ही तरन्नुम में शायरी करने लगी -

" फिर मुझे दीदा - ए - तर याद आया ,
दिल जिगर तश्रना ए फरियाद आया ,
दम लिया था ना कयामत ने हनोज ,
फिर तेरा वक्त ए सफ़र याद आया । "

" वाह ! वाह । शायरी की तुकबंदी तो बहुत अच्छी है लेकिन मुझे समझ नहीं आया ।" मैंने उनको शाबाशी देते हुए कहा ।

वो हंसते हुए बोली - " मुझे उर्वशी ने सुनाया था पर सच कहूं तो मुझे भी इसका अर्थ नही पता ।"

" उर्वशी ऐसी भी शायरी करती है मगर मुझे तो ..." मैं अचरज से बोला ।

" क्या मुझे तो ? " वो प्रश्न सूचक दृष्टि डाली ।

" नहीं , कुछ नहीं ।"

" तुम कुछ छुपा रहे हो , मेरी कसम बोलो ।"

" मुझे तो बड़ी सिम्पल और अच्छी अच्छी शायरी भेजती हैं ।" मैंने धीरे से कहा ।

" क्या मतलब ? - वो अचरज से बोली - " उर्वशी तुम्हें शायरी मैसेज करती है ।"

" हां । इसमें अचरज की बात क्या है , तुम्हीं ने तो कराई थी हमारी जान पहचान , भुल गयी ? "

" नहीं ।" वो अभी भी शंकित नजरों से मुझे घुर रही थी - " वैसे वो क्या क्या मैसेज करती थी ? "

" अरे यार ! क्यों हलकान होती है , वहीं सिम्पल साधारण सी मैसेज ।"

" मुझे दिखाओ ।" मुझे घुरते हुए बोली ।

" ठीक है बाबा ! आगरा चल के देख लेना ।"

वो आश्वस्त नहीं हुई ।

" क्या अब भी , मेरा मतलब ‌शादी के बाद भी मैसेज करती है ? "

" हां । अभी भी करती है । परसों ही तो किया था ।" - मैंने उसे और छेड़ते हुए कहा ।

" और तुम ? क्या तुम भी करते हो ? "

" मैं भी करता हूं ।"

अब श्वेता दी के मन मन्दिर में उथल-पुथल मच गई थी । वो काफी देर तक चुप रही फिर बोली -

" अच्छा परसों वो क्या मैसेज की थी ? "

" अरे यार ! कितनी शकी हो । मैंने कहा न आगरे में बता दुंगा ।"

" नहीं । परसो वाली मैसेज बताओ बाकी वहां बता देना ।" उसने जीद पकड़ ली ।

मैं सोचता हुआ बोला - " मुझे पुरी तरह से याद नहीं आ रहा है ।"

" कुछ तो याद होगा वहीं बताओ ।"

" ठीक है , मुझे सोचने दो ।"

वो बैठे बैठे ही पहलु बदल रही थी और मैं ड्राइव करते हुए थोड़ी सोचने की मुद्रा में आ गया ।

" अभी याद नहीं आ रहा है ।" मैंने ललाट सहलाते हुए कहा ।

" चुपचाप सीधी तरह से बताओ नहीं तो अभी गाड़ी से ढकेल दुंगी ।" वो आंखें तरेरते हुए बोली ।

" हद है यार । ठीक है याद करने की कोशिश करता हूं ।" - थोड़ी देर बाद बोला - " हां , कुछ कुछ याद आया , बोलता हूं ।"

" सुनो ।"

वो मुझे अपलक देखती रही ।

" तेरी बु...."( मैं यहां बु बोलकर अटक गया जैसे कि मैं भुल गया हूं )

वो चौंकी ।

" तेरी बुटदार चु...." ( मैं अब चु पर अटक गया )

वो इस बार अपनी आंखें फैलाई । ये देख मैं जल्दी से बोला -

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झां....( अब मैं झां पर अटक गया )

अब उसके चेहरे के रंग बदलने लगे थे । उसके गुस्सा होने से पहले मैंने वाक्य पुरी की -

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।"

अब वो थोड़ी नोर्मल हुई तो फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया ।

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चु....( अब फिर मैं चु पर अटक गया और याद करने का नाटक करने लगा )

वो मुझे बिना पलक झुकाए मुझे देख रही थी । मैंने उसे देखा फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया -

" तेरी चुन-चुन करती पायल ने मेरा लन्ड....." ( इस बार मैं लन्ड पर अटक गया )

उसके चेहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि अब ज्वालामुखी फटने ही वाला है इसलिए मैंने जल्दी से अगले लाईन को भी पुरा किया -

" मेरा लंडन जाना रोक दिया ।" - बोलकर मैंने उसे देखा और उसे शायराना अंदाज़ में पुरी शायरी एकसाथ कहा ।

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर , मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चुन-चुन करती पायल ने , मेरा लंडन जाना रोक दिया । "

वो मुझे गुस्से से अपनी आंखें बड़ी बड़ी करके अपलक देखे जा रही थी ।

मैंने कहा - " ऐसे क्या देख रही हो ? मैंने तो पहले ही कहा था मुझे याद नहीं आ रहा है ।...... वैसे शायरी अच्छी थी न ? "

उसने एक जोरदार का पंच मेरे बांह पर मारा ।

" अरे ! क्या करती हो ? एक्सीडेंट हो जाएगा ।" - मैंने अपने हाथ सहलाते हुए कहा ।

" मैं सब समझती हूं । तुम न ! तुम्हे ना मैं वहां जाके आगरा के पागलखाने में भर्ती करवा दुंगी । तुम पहले पहुंचो वहां ।" - उसने मुझे घुरते हुए कहा ।

" मुझे एक और याद आ गया । सुनाऊं ? " मैंने उसे छेड़ते हुए कहा ।

" जरुरत नहीं है । चुपचाप गाड़ी चलाओ । - मुझे घुरते हुए ही बोली - " और रास्ते में कहीं होटल के सामने रुकना "

" क्यों ? भुख लगी है क्या ? अरे ! कितना खाती हो यार दो ढाई घंटे पहले ही तो खाया था, मोटी हो जाओगी । जानती हो , मोटापा न अपने आप में एक गम्भीर बिमारी है । तुम्हारी ये छरहरी काया ..."

" चुप रहो " - मुझे बीच में टोकते हुए बोली - " बकवास बंद करो । मुझे बाथरूम जाना है ।"

" बाथरूम ! ... बाथरूम क्यों ? घर में नहाई नहीं थी क्या या सिर्फ हाथ मुंह धोना है ।"

" तुम ! " - वो गुस्से से देखी - " टायलेट जाना है । अब ये मत पूछना कि टायलेट क्यों जाना है ।"

" ठीक है नहीं पूछूंगा । वैसे एक बात कहूं ? "

" क्या ?"

" मैं पुछने वाला था ।"

" तुम एक नम्बर के कमीने हो ।" - कहकर फिर मेरे बगल में घुसा मारा ।

कुछ दुर जाने के पश्चात एक होटल जो ठीक ठाक ही था मिला । हम कार से उतर कर होटल की तरफ चल दिए ।
 
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