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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

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What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
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aalu

Well-Known Member
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158
Aajane hi sahi vaibhaw wahee kar raha hain jo uske bapu ne chaha tha, jis aawaragardee ke aadato kee wajah se wo pareshan the, aaj wahee larka mehnat majdori kar raha hain, jo pehle nikhattu kee tarah matargasti ka rraha hain, wo apne jid ke wajah se hi sahi lekin aaj mehnat toh kar raha hain.
Lekin iski aayashi khatam na hui, saroj ke urroj bare bedardi se masla jaa raha hain, yehan usne iske lachargi pe taras kha ke usse sahar diya, isne uski bewi ko hi sahara dena shuru kar diya, bechara murari chala hero banne, lekin vaibhaw ne villain ban ke iski lugai thok dee .:D

Kutta iski beti pe bhi najar maar raha hain, lekin wahan pe toh bhanda phor ho gaya, raat mein disco :hehe: jo kar rahe the, wo pure tanmayta se lagta hain dekha hain usne. ab kaheen beti baapu ke samne bak na de. Phir murari hal chalayega iske pichhe.
 

aalu

Well-Known Member
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Ab e lo miya toh anuradha ke chakkar mein confusiya gaye hain, ab maal bhi chahiye aur uski bitiya bhi, aur bechara murari hilata hua rahe.
Ab kaheen desi tika ke anuradha ka paudwal bajane na nikal jaye.
E sasura toh sabun bhi na lagata hain, lugai toh door se hi dutkar degi.

उसकी बीवी के साथ जो भी करता था उसमे उसकी बीवी की भी बराबर रज़ामंदी होती थी किन्तु इसके बावजूद मुझे अपने अंदर एक ग्लानि सी महसूस होती थी और उस ग्लानि के लिए मैं ईश्वर से माफ़ी भी मांगता था। :hehe: sahi hain

Ab thakur ke naam se baura jata hain toh kahe thakuraiyate rahte ho bhai, sidha gireban hi pakar liya, bechara murari, bewi toh thok hi raha hain, lekin lagta hain yeh apni beti khud hi thukwana chahta hain, jaroor isse apni beti ka rishta karna chahta hoga.

मैं उसके बारे में हमेशा सोचता था कि गांव में ऐसी लड़की मेरे जैसे हवस के पुजारियों से अब तक कैसे बची हुई थी? bachi hain toh jaada din tak bachi na rahegi, ab tak hamre vaibhaw thakur( gussa nahin thakur na bulayege) kee najro mein nahin na aayee thee.

Sahi hain dosti bhi hui toh daaru pe, kaheen nashe mein bak na dee, ke tohar lugai ka tabla hum hi bajate hain, sala half mind hain, kabhi 2 senty ho jata hain toh kabhi mund garam.
 

Chutiyadr

Well-Known Member
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259
☆ प्यार का सबूत ☆
अध्याय - 03
---------☆☆☆---------


अब तक,,,,

"वो मुझे नींद नहीं आ रही थी।" फिर मैंने आनन फानन में उसे जवाब देते हुए कहा____"इस लिए बाहर गया था किन्तु तुम ये क्यों कह रही हो कि मैं और तुम्हारी माँ कहां गए थे? क्या काकी भी रात में कहीं गईं थी?"

"क्या आपको उनके जाने का पता नहीं है?" उसने अपनी आंखें सिकोड़ते हुए पूछा तो मेरी धड़कनें और भी तेज़ हो ग‌ईं।
"मुझे भला कैसे पता होगा?" मैंने अपने माथे पर उभर आए पसीने को महसूस करते हुए कहा____"अँधेरा बहुत था इस लिए मैंने उन्हें नहीं देखा।"

अब आगे,,,,,

मेरी बात सुन कर अनुराधा मुझे ख़ामोशी से देखने लगी थी। उसका अंदाज़ ऐसा था जैसे वो मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही हो और साथ ही ये पता भी कर रही हो कि मैं झूठ बोल रहा हूं या सच? उसके इस तरह देखने से मुझे मेरी धड़कनें रूकती हुई सी महसूस हुईं। जीवन में पहली बार मैं किसी लड़की के सामने अंदर से इतना घबराया हुआ महसूस कर रहा था। ख़ैर इससे पहले कि वो मुझसे कुछ और कहती मैं फौरन ही पलट कर दरवाज़े से बाहर निकल गया। पीछे से इस बार उसने भी मुझे रोकने की कोशिश नहीं की थी।

मुरारी के घर से मैं तेज़ तेज़ क़दमों से चलते हुए सीधा जंगल की तरफ निकल गया। मेरे कानों में अभी भी अनुराधा की बातें गूंज रही थीं और मैं ये सोचे जा रहा था कि क्या सच में उसे पता चल गया है या वो मुझसे ये सब पूछ कर अपनी शंका का समाधान करना चाहती थी? मैं ये सब सोचते हुए किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच सका, किन्तु मेरे मन में ये ख़याल ज़रूर उभरा कि अगर उसने सच में देख लिया होगा या फिर उसे पता चल गया होगा तो मेरे लिए ये ठीक नहीं होगा क्यों कि अनुराधा अब मेरे दिमाग में घर कर चुकी थी और मैं उसे किसी भी कीमत पर भोगना चाहता था। अगर उसे इस सबका पता चल गया होगा तो मेरी ये मंशा कभी पूरी नहीं हो सकती थी क्यों कि उस सूरत में मेरे प्रति उसके ख़याल बदल जाने थे। उसके मन में मेरे प्रति यही छवि बन जानी थी कि मैं एक निहायत ही गिरा हुआ इंसान हूं जिसने उसकी माँ के साथ ग़लत काम किया था।

जंगल में पहुंच कर मैं नित्य क्रिया से फ़ारिग हुआ और फिर नहा धो कर वापस अपने खेत पर आ गया था। मेरे दिमाग़ से अनुराधा का ख़याल और उसकी बातें जा ही नहीं थी और हर गुज़रते पल के साथ मेरे अंदर एक बेचैनी सी बढ़ती जा रही थी जो अब मुझे परेशान करने लगी थी। मेरा मन अब किसी भी काम में नहीं लग रहा था। जाने कितनी ही देर तक मैं अपने खेत के पास बैठा इन ख़यालों में डूबा रहा था।

"छोटे ठाकुर।" एक जानी पहचानी आवाज़ को सुन कर मैंने पलट कर आवाज़ की दिशा में देखा। मुरारी सिंह मेरी तरफ बढ़ा चला आ रहा था और उसी ने ज़ोर की आवाज़ देते हुए कहा था____"आज क्या तुमने तय कर लिया है कि सारी फसल काट कर और उसे गाह कर उसका सारा अनाज झोपड़े में रख लेना है?"

मुरारी की बातें सुन कर मैंने चौंक कर अपने हाथों की तरफ देखा। मेरे हाथ में गेहू की पुल्लियों का एक गट्ठा था जिसे मैं रस्सी से बाँध रहा था। गुज़र चुके दिनों की याद में मैं इस क़दर खो गया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि मैं वर्तमान में क्या कर रहा था। मैंने खेत में चारो तरफ नज़र घुमाई तो देखा मैंने गेहू की सारी पुल्लियों को रस्सी से बाँध बाँध कर एक जगह इकठ्ठा कर लिया था। मुझे अपने द्वारा किये गए इस काम को देख कर बड़ी हैरानी हुई। फिर मुझे याद आया कि आज घर से भाभी आईं थी और मैं उनसे बात करते हुए बेहद गुस्सा हो गया था। गुस्से में मैंने जाने क्या क्या कह दिया था उन्हें। मुझे अहसास हुआ कि मुझे इस तरह उनसे गुस्से में बात नहीं करनी चाहिए थी। आख़िर उनकी तो कोई ग़लती नहीं थी।

वैसे हक़ीक़त ये थी कि मुझे गुस्सा भी इस बात पर आ गया था कि इन चार महीनों में मेरे घर का कोई भी सदस्य मुझसे मिलने नहीं आया था और ना ही ये देखने आया था कि घर गांव से निकाले जाने के बाद मैं किस तरह से यहाँ जी रहा हूं। भाभी ने ये कह दिया कि माँ मेरे लिए बहुत दुखी हैं तो क्या उससे मुझे संतुष्टि मिल जाएगी? मेरे माँ बाप को तो जैसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था कि मैं यहाँ किस हाल में हूं। अपने मान सम्मान को बढ़ाने के लिए कोई फैसला करना बहुत आसान होता है लेकिन अगर यही फैसला खुद उनके लिए होता और वो खुद ऐसी परिस्थिति में होते तब पता चलता कि कैसा महसूस होता है। सारी दुनियां मुझे बुरा कहे मगर मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। मेरे अंदर तो माँ बाप के लिए नफ़रत में जैसे और भी इज़ाफ़ा हो गया था।

इन चार महीनों में मैं इतना तो सीख ही गया था कि मुसीबत में कोई किसी का साथ नहीं देता। सब साले मतलब के रिश्ते हैं और मतलब के यार हैं। जब मेरे अपनों का ये हाल था तो गैरों के बारे में क्या कहता? मेरे दोस्तों में से कोई भी मेरे पास नहीं आया था। जब भी ये सोचता था तो मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी धधक उठता था और मन करता था कि ऐसे मतलबी दोस्तों को जान से मार दूं।

"क्या हुआ छोटे ठाकुर?" मुरारी ने मुझे ख़यालों में गुम देखा तो इस बार वो थोड़ा चिंतित भाव से पूछ बैठा था____"आज क्या हो गया है तुम्हें? कहां इतना खोये हुए हो?"

"काका देशी है क्या तुम्हारे पास?" मैंने गेहू के गट्ठे को एक बड़े गट्ठे के पास फेंकते हुए मुरारी से पूछा तो वो हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए बोला____"देशी??? ये क्या कह रहे हो छोटे ठाकुर? क्या आज देशी चढ़ाने का इरादा है?"

"मुझे समझ आ गया है काका।" मैंने मुरारी के पास आते हुए कहा____"कि दुनिया में कोई भी चीज़ बुरी नहीं होती, बल्कि देशी जैसी चीज़ तो बहुत ही अच्छी होती है। अगर तुम्हारे पास है तो लाओ काका। आज मैं भी इसे पिऊंगा और इसके नशे को महसूस करुंगा।"

"छोटे ठाकुर।" मुरारी मुझे बड़े ध्यान से देखते हुए बोला____"आख़िर बात क्या है? कुछ हुआ है क्या?"
"क्या तुम्हें लगता है काका कि कुछ हो सकता है?" मैंने फीकी सी मुस्कान में कहा____"अपने साथ तो जो होना था वो चार महीने पहले ही हो चुका है। अब तो बस ये फसल गाह लूं और अपने बाप को दिखा दूं कि उसने मुझे तोड़ने का भले ही पूरा प्रबंध किया था मगर मैं ज़रा भी नहीं टूटा बल्कि पहले से और भी ज़्यादा मजबूत हो गया हूं।"

मुरारी मेरे मुख से ऐसी बातें सुन कर हैरान था। ऐसा नहीं था कि उसने ऐसी बातें मेरे मुख से पहले सुनी नहीं थी किन्तु आज वो हैरान इस लिए था क्योंकि आज मेरी आवाज़ में और मेरे बोलने के अंदाज़ में भारीपन था। मेरे चेहरे पर आज उसे एक दर्द दिख रहा था।

"ऐसे क्या देख रहे हो काका?" मैंने मुरारी के कंधे पर अपना हाथ रख कर कहा____"देशी हो तो निकाल कर दो न मुझे। यकीन मानो काका आज तुम्हारी देशी पीने का बहुत मन कर रहा है।"

"छोटे ठाकुर।" मुरारी ने संजीदगी से कहा____"अभी तो नहीं है मेरे पास लेकिन अगर तुम सच में पीना चाहते हो तो मैं घर से ले आऊंगा।"
"अरे तो तुम्हें क्या लगा काका?" मैंने मुरारी से दो कदम पीछे हटते हुए कहा____"मैं क्या तुमसे मज़ाक कर रहा हूं? अभी जाओ और घर से देशी लेकर आओ। आज हम दोनों साथ में बैठ कर देशी शराब पिएँगे।"

मुरारी मेरी बातों से अचंभित था और मेरी तरफ ऐसे देख रहा था जैसे कि मैं एकदम से पागल हो गया हूं। ख़ैर मेरे ज़ोर देने पर मुरारी वापस अपने घर की तरफ चला गया। वो तेज़ तेज़ क़दमों से चला जा रहा था और उसे जाता देख मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई थी। इस वक़्त सच में मेरे अंदर एक द्वन्द सा चल रहा था। एक आग सी लगी हुई थी मेरे अंदर जो मुझे जलाये जा रही थी और मैं चाहता था कि ये आग और भी ज़्यादा भड़के। मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से विचारों का बवंडर घूमे जा रहा था।

मुरारी के जाने के बाद मैं अपने झोपड़े की तरफ आ गया। आज बहुत ज्यादा मेहनत की थी मैंने और अब मुझे थकान महसूस हो रही थी। जिस्म से पसीने की बदबू भी आ रही थी इस लिए मैंने सोचा कि नहा लिया जाये ताकि थोड़ी राहत महसूस हो। मिट्टी के दो बड़े बड़े मटके थे मेरे पास जिनमे पानी भर कर रखता था मैं और एक लोहे की बाल्टी थी। मैंने एक मटके से बाल्टी में पानी भरा और झोपड़े के पास ही रखे एक सपाट पत्थर के पास बाल्टी को रख दिया। उसके बाद मैंने अपने जिस्म से बनियान और तौलिये को उतार कर उस सपाट पत्थर के पास आ गया।

पानी से पहले मैंने हाथ पैर धोये और फिर लोटे में पानी भर भर कर अपने सिर पर डालने लगा। मिट्टी के मटके का पानी बड़ा ही शीतल था। जैसे ही वो ठंडा पानी मेरे जिस्म पर पड़ा तो मुझे बेहद आनंद आया। हाथों से अच्छी तरह जिस्म को मला मैंने और फिर से लोटे में पानी भर भर कर अपने सिर पर डालने लगा। बाल्टी का पानी ख़त्म हुआ तो मटके से और पानी लिया और फिर से नहाना शुरू कर दिया। नहाने के बाद थोड़े बचे पानी से मैंने कच्छा बनियान धोया और गन्दा पानी फेंक कर बाल्टी को झोपड़े के पास रख दिया। गीले कच्छे बनियान को मैंने वहीं एक तरफ झोपड़े के ऊपर फैला कर डाल दिया।

नहाने के बाद अब मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। दिन ढलने लगा था और शाम का धुंधलका धीरे धीरे बढ़ने लगा था। नहाने के बाद मैंने दूसरा कच्छा बनियान पहन लिया और ऊपर से पैंट शर्ट भी। अभी मैं कपड़े पहन कर झोपड़े से बाहर आया ही था कि मुरारी आ गया।

मुरारी देशी शराब के दो ठर्रे ले कर आया था। मुरारी के बड़े उपकार थे मुझ पर और मैं हमेशा सोचता था कि अगर वो न होता तो क्या मैं इस बंज़र ज़मीन पर अकेले फसल उगा पाता? बेशक मैंने बहुत मेहनत की थी मगर खेत में हल चलाना और बीज बोना उसी ने सिखाया था मुझे। उसके बाद जब गेहू की फसल कुछ बड़ी हुई तो उसी की मदद से मैंने खेत को पानी से क‌ई बार सींचा था। सिंचाई के लिए कोई नशीन तो थी नहीं इस लिए उसकी बैल गाडी ले कर मैं जंगल जाता और जंगल के अंदर मौजूद उस नदी से ड्रमों में पानी भर कर लाता था। नदी से ड्रमों में पानी भर कर लाता और फिर उस पानी को अपने खेत में डालता था। किसी किसी दिन मुरारी इस काम में मेरा साथ देता था। उसके अपने भी खेत थे जिनमे वो ब्यस्त रहता था। किसी किसी दिन उसकी बीवी सरोज भी आ जाया करती थी और थोड़ी बहुत मेरी मदद कर देती थी। हालांकि उसके आने का प्रयोजन कुछ और ही होता था।

मुरारी के इन उपकारों के बारे में जब भी मैं सोचता तो मुझे अपने उस काम की याद आ जाती जो मैं उसकी बीवी के साथ करता था। हालांकि मैं उसकी बीवी के साथ जो भी करता था उसमे उसकी बीवी की भी बराबर रज़ामंदी होती थी किन्तु इसके बावजूद मुझे अपने अंदर एक ग्लानि सी महसूस होती थी और उस ग्लानि के लिए मैं ईश्वर से माफ़ी भी मांगता था।

मुरारी की बेटी अनुराधा से मैं बहुत कम बात करता था। उस दिन के हादसे के बाद मैं उसके सामने जाने से ही कतराने लगा था। हालांकि उस हादसे के बाद उसने कभी मुझसे उस बारे में कुछ नहीं पूछा था बल्कि अब तो ऐसा भी होता था कि अगर मैं मुरारी के साथ उसके घर जाता तो वो मुझे देख कर हल्के से मुस्कुरा देती थी। जब वो हल्के से मुस्कुराती थी तो मेरे मन के तार एकदम से झनझना उठते थे और दिल में जज़्बातों और हसरतों का तूफ़ान सा खड़ा हो जाता था मगर फिर मैं खुद को सम्हाल कर उसके सामने से हट जाता था। अनुराधा को अब तक जितना मैंने जाना था उसका सार यही था कि वो एक निहायत ही शरीफ लड़की थी जिसमे सादगी और मासूमियत कूट कूट कर भरी हुई थी।

मुरारी का घर गांव के एकांत में बना हुआ था जहां पर उसके खेत थे। मुरारी का एक भाई और था जिसका घर गांव में बना हुआ था। अनुराधा ज़्यादातर घर में ही रहती थी या फिर अपने माँ बाप और भाई के साथ खेतों पर काम करने चली जाती थी। मैं उसके बारे में हमेशा सोचता था कि गांव में ऐसी लड़की मेरे जैसे हवस के पुजारियों से अब तक कैसे बची हुई थी?

"छोटे ठाकुर।" मुरारी की आवाज़ से मैं ख़यालों से बाहर आया____"तुम्हारे लिए अलग से देशी का एक ठर्रा ले कर आया हूं और घर से चने भी भुनवा कर लाया हूं। वैसे मैं तो ऐसे ही पी लेता हूं इसे।"

"तो मैं भी ऐसे ही पी लूंगा इसे।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"काकी को क्यों परेशान किया चने भुनवा कर?"
"क्या बात करते हो छोटे ठाकुर।" मुरारी ने बुरा सा मुँह बनाया____"ये चने तो मैंने अनुराधा बिटिया से भुनवाये हैं। तुम्हारी काकी तो ससुरी मेरी सुनती ही नहीं है कभी।"

"ऐसा क्यों काका?" मुरारी की इस बात से मैंने पूछा____"काकी तुम्हारी क्यों नहीं सुनती है?"
"अब तुमसे क्या बताऊं छोटे ठाकुर?" मुरारी ने देशी ठर्रे का ढक्कन खोलते हुए कहा____"उम्र में मुझसे छोटे हो और रिश्ते में मेरे भतीजे भी लगते हो इस लिए तुमसे वो सब बातें नहीं कह सकता।"

"उम्र में मैं छोटा हूं और रिश्ते में तुम्हारा भतीजा भी लगता हूं।" मैंने फिर से मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन दारू तो पिला ही रहे हो ना काका? क्या इसके लिए तुमने सोचा कुछ? जबकि बाकी चीज़ों के लिए तुम मुझे उम्र और रिश्ते का हवाला दे रहे हो।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है छोटे ठाकुर।" मुरारी ने देशी शराब को एक गिलास में उड़ेलते हुए कहा____"लेकिन इसकी बात अलग है और उसकी अलग।"
"अरे! क्या इसकी उसकी लगा रखे हो काका?" मैंने कहा____"हमारे बीच क्या रिश्ता है उसको गोली मारो। मैं तो बस इतना जानता हूं कि आज के वक़्त में मेरा तुम्हारे सिवा कोई नहीं है। इन चार महीनो में जिस तरह से तुमने मेरा साथ दिया है और मेरी मदद की है उसे मैं कभी नहीं भुला सकता। इस लिए तुम मेरे लिए हर रिश्ते से बढ़ कर हो।"

"तुम कुछ ज़्यादा ही मुझे मान दे रहे हो छोटे ठाकुर।" मुरारी ने एक दूसरे गिलास में देशी को उड़ेलते हुए कहा____"जब कि सच तो ये है कि मैंने जो कुछ किया है उसमे मेरा भी कोई न कोई स्वार्थ था।"

"सबसे पहले तो तुम मुझे छोटे ठाकुर बोलना बंद करो काका।" मैंने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा____"मुझे इस शब्द से नफ़रत हो गई है। तुम जब भी मुझे इस नाम से बुलाते हो तो मुझे इस नाम से जुड़ा हर रिश्ता याद आ जाता है, जो मुझे तकलीफ देने लगता है। इस लिए अब से तुम मुझे सिर्फ वैभव बुलाओगे।"

"मैं तुम्हें नाम से कैसे बुला सकता हूं छोटे ठाकुर?" मुरारी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"अगर कहीं से बड़े ठाकुर को इस बात का पता चल गया तो वो मेरी खाल उधेड़वा देंगे।"

"ऐसा कुछ नहीं होगा काका।" मैंने शख्त भाव से कहा____"अगर होना होता तो पहले ही हो जाता। तुम्हें क्या लगता है तुम्हारे उस बड़े ठाकुर को क्या ये पता नहीं होगा कि तुम मेरी मदद करते हो? उसे ज़रूर पता होगा। वो अपने आदमियों के द्वारा मेरी हर पल की ख़बर रखता होगा लेकिन उसने आज तक तुम्हारे या तुम्हारे परिवार के साथ कुछ नहीं किया। इस लिए इस बात से बेफिक्र रहो और हां अगर वो ऐसा करेगा भी तो मैं तुम्हारे सामने तुम्हारी ढाल बन कर खड़ा हो जाउंगा। उसके बाद मैं भी देखूगा कि तुम्हारा वो बड़ा ठाकुर क्या उखाड़ लेता है।"

"अपने पिता से इतनी नफ़रत ठीक नहीं है छोटे ठाकुर।" मुरारी मेरी बातें सुन कर थोड़ा सहम गया था____"माना कि उन्होंने ये सब कर के अच्छा नहीं किया है मगर उनके ऐसा करने के पीछे भी कोई न कोई वजह ज़रूर होगी।"

"तुम मेरे सामने उस इंसान की तरफदारी मत करो काका।" मैंने गुस्से से कहा____"वो मेरा कोई नहीं है और ना ही मेरी नज़र में उसकी कोई अहमियत है। सोचा था कि आज तुम्हारे साथ देशी पिऊंगा और तुमसे अपने दिल की बातें करुंगा मगर तुमने मेरा मूड ख़राब कर दिया। ले जाओ अपनी इस शराब को।"

"छोटे ठाकुर।" मुरारी ने भय और आश्चर्य से बोला ही था कि मैं गुस्से से उबलते हुए चीख पड़ा____"ख़ामोश! अपना ये सामान समेटो और चले जाओ यहाँ से। मुझे किसी की ज़रूरत नहीं है। तुम सब उस घटिया इंसान के तलवे चाटने वाले कुत्ते हो। चले जाओ मेरी नज़रों के सामने से।"

मुझे इस वक़्त इतना गुस्सा आ गया था कि मैं खुद आवेश में कांपने लगा था। मुरारी मेरा ये रूप देख कर बुरी तरह घबरा गया था। मैं मिट्टी के बने उस छोटे चबूतरे से उठा और अँधेरे में ही जंगल की तरफ चल पड़ा। इस वक़्त मैं नफ़रत और गुस्से की आग में बुरी तरह जलने लगा था। मेरा मन कर रहा था कि सारी दुनिया को आग लगा दूं।

मैं तेज़ी से जंगल की तरफ बढ़ता जा रहा था। मैं खुद नहीं जानता था कि इस वक़्त मैं अँधेरे में जंगल की तरफ क्यों जा रहा था। मैं तो बस इतना सोच पा रहा था कि अपने इस गुस्से से मैं किसी का खून कर दूं?

मैं जंगल में अभी दाखिल ही हुआ था कि मेरे कानों में मुरारी की आवाज़ पड़ी। वो पीछे से मुझे आवाज़ें लगा रहा था। उसकी आवाज़ से साफ़ पता चल रहा था कि वो भागते हुए मेरी तरफ ही आ रहा है किन्तु मैं उसकी आवाज़ सुन कर भी रुका नहीं बल्कि जंगल में आगे बढ़ता ही रहा। हालांकि रात अभी नहीं हुई थी किन्तु शाम घिर चुकी थी और शाम का धुंधलका छा गया था। जंगल में तो और भी ज़्यादा अँधेरा दिख रहा था।

"रूक जाओ छोटे ठाकुर।" मुरारी की आवाज़ मुझे अपने एकदम पास से सुनाई दी। मैं उसे दिख तो नहीं रहा था किन्तु ज़मीन पर सूखे पत्तों पर मेरे चलने की आवाज़ हो रही थी जिससे वो अंदाज़े से मेरे पास आ गया था।

"छोटे ठाकुर रुक जाओ।" मुरारी हांफते हुए बोला____"मुझे माफ़ कर दो। मैं कसम खा के कहता हूं कि आज के बाद बड़े ठाकुर का ज़िक्र ही नहीं करुंगा और ये भी यकीन मानो कि मैं औरों की तरह उनके तलवे चाटने वाला कुत्ता नहीं हूं।"

"मैंने तुम्हें मना किया था ना कि मुझे छोटे ठाकुर मत कहो।" मैंने पलट कर गुस्से में मुरारी का गला पकड़ लिया और गुर्राते हुए बोला____"मगर तुम्हारे भेजे में मेरी ये बात अब तक नहीं घुसी। तुम्हें बताया था ना कि मुझे इस नाम से ही नफ़रत है? मेरा बस चले तो मैं अपने नाम से जुड़े हर नाम को मिट्टी में मिला दूं।"

"माफ़ कर दो वैभव।" मुरारी मेरे द्वारा अपना गला दबाये जाने से अटकते हुए स्वर में बोला____"आज के बाद मैं तुम्हें उस नाम से नहीं बुलाऊंगा।"

मुरारी के ऐसा कहने पर मैंने झटके से उसके गले से अपना पंजा खींच लिया। मुरारी ने फ़ौरन ही अपने दोनों हाथों से अपने गले को सहलाना शुरू कर दिया। उसकी साँसें चढ़ी हुई थी।

"अब चलो वैभव।" फिर मुरारी ने अपनी उखड़ी हुई साँसों को सम्हालते हुए कहा____"यहां से चलो। इस वक़्त यहाँ पर रुकना ठीक नहीं है। चलो हम साथ में बैठ कर देशी का लुत्फ़ उठाएंगे। क्या अपने काका की इतनी सी बात भी नहीं मानोगे?"

मुरारी की इन बातों से मेरे अंदर का गुस्सा शांत होने लगा और मैं चुप चाप जंगल से बाहर की तरफ वापस चल दिया। मेरे चलने पर मुरारी भी मेरे पीछे पीछे चल दिया। कुछ ही देर में हम दोनों वापस मेरे झोपड़े पर आ ग‌ए। झोपड़े पर लालटेन जल रही थी। मैं आया और चुप चाप मिट्टी के उसी चबूतरे पर बैठ गया जिसमे मैं पहले बैठा था। गुस्सा गायब हुआ तो मुझे अहसास हुआ कि मैंने मुरारी से जो कुछ भी कहा था और उसके साथ जो कुछ भी किया था वो बिल्कुल ठीक नहीं था। मुझे अपनी ग़लती का बोध हुआ और मुझे अपने आप पर शर्मिंदगी होने लगी। मुरारी रिश्ते और उम्र में मुझसे बड़ा था और सबसे बड़ी बात ये कि ऐसे वक़्त में सिर्फ उसी ने मेरा साथ दिया था और मैंने उसका ही गिरहबान पकड़ लिया था।

"मुझे माफ़ कर दो काका।" फिर मैंने धीमे स्वर में मुरारी से कहा____"मैंने गुस्से में तुम्हारे साथ ठीक नहीं किया। मेरी इस ग़लती के लिए मुझे जो चाहो सजा दे दो।"

"नहीं वैभव नहीं।" मुरारी ने मेरी तरफ बड़े स्नेह से देखते हुए कहा___"तुम्हें माफ़ी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं अच्छी तरह समझता हूं कि ऐसे वक़्त में तुम्हारी मनोदशा ही ऐसी है कि तुम्हारी जगह अगर कोई भी होता तो यही करता। इस लिए भूल जाओ सब कुछ और इस देशी का मज़ा लो।"

"तुम सच में बहुत अच्छे हो काका।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"इतना कुछ होने के बाद भी तुम मेरे पास बैठे हो और सब कुछ भूल जाने को कह रहे हो।"
"अब छोड़ो भी इस बात को।" मुरारी ने अपना गिलास उठाते हुए कहा____"चलो उठाओ अपना गिलास और अपनी नाक बंद कर के एक ही सांस में पी जाओ इसे।"

"नाक बंद कर के क्यों काका?" मैंने ना समझने वाले अंदाज़ से पूछा____"क्या इसे नाक बंद कर के पिया जाता है?"
"हा हा हा हा नहीं वैभव।" मुरारी ने हंसते हुए कहा____"नाक बंद कर के पीने को इस लिए कह रहा हूं क्योंकि इसकी गंध बहुत ख़राब होती है। अगर पीते वक़्त इसकी गंध नाक में घुस जाये तो इंसान का कलेजा हिल जाता है और पहली बार पीने वाला तो फिर इसे पीने का सोचेगा भी नहीं।"

"अच्छा ऐसी बात है।" मैंने समझते हुए कहा____"फिर तो मैं अपनी नाक बंद कर के ही पियूंगा इसे मगर मेरी एक शर्त है काका।"
"कैसी शर्त वैभव?" मुरारी ने मेरी तरफ सवालिया निगाहों से देखा।
"शर्त ये है कि अब से हमारे बीच उम्र और रिश्ते की कोई बात नहीं रहेगी।" मैंने अपना गिलास उठा कर कहा____"हम दोनों एक दूसरे से हर तरह की बातें बेझिझक हो कर करेंगे। बोलो शर्त मंजूर है ना?"

"अगर तुम यही चाहते हो।" मुरारी ने मुस्कुराते हुए कहा____"तो ठीक है। मुझे तुम्हारी ये शर्त मंजूर है। अब चलो पीना शुरू करो तुम।"
"आज की ये शाम।" मैंने कहा____"हमारी गहरी दोस्ती के नाम।"

"दोस्ती??" मुरारी मेरी बात सुन कर चौंका।
"हां काका।" मैंने कहा____"अब जब हम एक दूसरे से हर तरह की बातें करेंगे तो हमारे बीच दोस्ती का एक और रिश्ता भी तो बन जायेगा ना?"
"ओह! हां समझ गया।" मुरारी धीरे से हँसा और फिर गिलास को उसने अपने अपने होठों से लगा लिया।


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Desi desi desi.... :love:
Aise main desi bina naak band kiye pita hu wo bhi aaram
 
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