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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

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What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
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TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
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अध्याय - 41
━━━━━━༻♥༺━━━━━━

अब तक....

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"


दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।

अब आगे.....

रात में सबके साथ मैं भी खाना खाने बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान खाने की तरफ ज़रा भी नहीं था। रह रह कर ज़हन में उस काका की बातें गूँज उठतीं और मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है? सहसा जगताप चाचा ने मुझे टोका तो मैं हल्के से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने इशारे से ही मुझे खाना खाने के लिए कहा तो मैं चुप चाप भोजन करने लगा। मैंने सिर उठा कर एक नज़र विभोर और अजीत पर डाली। मेरे वो दोनों कमीने भाई बेफ़िक्र हो कर खाने में मगन थे। उन्हें देख कर मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा उबल पड़ा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया। खाने के बाद पिता जी ने एक बार फिर से मुझसे कहा कि सुबह जल्दी तैयार हो जाना क्योंकि मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है।

अपने कमरे में बेड पर लेटा मैं रात भर करवटें बदलता रहा और मन ही मन मौजूदा परिस्थितियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता रहा। मैंने फैसला कर लिया था कि अगले दिन पिता जी से इस बारे में बात करुंगा और फिर जल्द से जल्द इस बारे में कुछ करुंगा। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख लगी और मैं नींद की आगोश में चला गया।

बन्द पलकों तले सहसा कुछ अजीब से चित्र उभरने लगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले भी दो बार मैं सपने में देख चुका था। मैं एक सुनसान जगह पर एक बड़ी सी शिला पर लेटा हुआ था। चारो तरह अँधेरे की चादर फैली हुई थी। मुझसे क़रीब बीस फिट की दूरी पर घने पेड़ पौधों से युक्त जंगल दिख रहा था जो कि मेरे चारो तरफ ही था। सहसा उन पेड़ पौधों से मुझे अपनी तरफ बढ़ता हुआ गाढ़ा धुआँ दिखा। मैं शिला पर चित्त लेटा हुआ था। मेरे हाथ पैर पूरी तरह आज़ाद थे लेकिन मैं उन्हें अपनी मर्ज़ी से हिला नहीं सकता था। पेड़ों के बीच से निकल कर आता हुआ वो गाढ़ा धुआँ निरंतर मेरी तरफ ही बढ़ता चला आ रहा था। मैं उस गाढ़े धुएं को देख एकदम से घबरा उठा और खुद को उस धुएं से बचाने के लिए उस शिला से उठ कर भागने का सोचा मगर उठना तो दूर की बात थी मैं हिल भी नहीं पा रहा था। उधर वो गाढ़ा धुआँ अब मेरे बेहद क़रीब आ चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे वो धुआँ नहीं बल्कि कोई भयानक यमदूत हो जो धुएं का रूप ले कर मुझे चारो तरफ से घेरते हुए आ रहा था।

उस धुएं को अपने बेहद क़रीब देख कर मैं बुरी तरह उससे बचने के लिए छटपटाने लगा मगर मेरा छटपटाना सिर्फ मेरे मन तक ही था। मैं पूरी ताक़त लगा कर उस शिला से उठ कर भाग जाना चाहता था मगर मेरी हर कोशिश बेकार थी। मेरे देखते ही देखते वो गाढ़ा धुआँ आया और मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं उस गाढ़े धुएं में पूरी तरह डूब गया। डर और घबराहट से मैं बुरी तरह चीख पड़ा और तभी मेरी आँख खुल गई।

मैं बेड पर उठ कर बैठ गया था और बुरी तरह हांफते हुए इधर उधर देखने लगा था। मेरा चेहरा पसीने से तरबतर था। छत के कुंडे पर झूल रहे पंखे की हवा जैसे मुझ पर कोई असर ही नहीं डाल पा रही थी। मैंने बेड पर बिछे चादर से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर लेट कर उस सपने के बारे में सोचने लगा। ये तीसरी बार था जब मुझे इस तरह का सपना आया था। मेरे ज़हन में एक बार फिर से उस काका की बातें गूँज उठीं। पलक झपकते ही मेरे अंदर गुस्सा उभर आया। मेरा मन किया कि अभी यहाँ से जाऊं और उन लोगों का खून कर दूं जिन्होंने ऐसा कुचक्र चला रखा है।

जाने कितनी ही देर तक मैं उस सपने और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद जाने कब मेरी आँख फिर से लग गई। सुबह मेनका चाची के जगाने पर ही मेरी आँख खुली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जल्दी से गुशलखाने में जा कर नहा धो लूं क्योंकि मुझे दादा ठाकुर के साथ पंचायत पर जाना है। चाची की बात सुन कर मैं फ़ौरन ही बेड से उठा और नीचे गुशलखाने की तरफ चल पड़ा।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं बैठक में पहुंचा। पिता जी और जगताप चाचा कुछ बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही पिता जी ने मुझसे जीप निकालने के लिए कहा तो मैंने वहीं दीवार पर लगी कील से जीप की चाभी ली और बाहर निकल गया।

ये पहली बार था जब मैं पिता जी के साथ किसी पंचायत पर जा रहा था वरना इसके पहले तो ज़्यादातर जगताप चाचा ही जाते थे या फिर बड़े भ‌इया। पिता जी की जीप के पीछे दो जीपें और जाती थीं जिनमें वो लोग होते थे जो पिता जी की सुरक्षा के लिए होते थे और उनके हाथों में बन्दूखें होती थीं। ख़ैर पिता जी जीप में मेरे बगल से बैठे तो मैंने उनके आदेश पर जीप को आगे बढ़ा दिया। हमारे पीछे वो दोनों जीपें भी चल पड़ीं।

"हमने तुम्हारे लिए एक ख़ास चीज़ मंगवाई है।" रास्ते में पिता जी ने मुझसे कहा____"और तुमसे यही उम्मीद करते हैं कि उस ख़ास चीज़ का तुम ग़लत स्तेमाल नहीं करोगे।"
"ऐसी कौन सी ख़ास चीज़ है पिता जी?" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा।

"रिवाल्वर।" पिता जी ने ये कह कर मानो धमाका सा किया, और उनकी इस धमाकेदार बात को सुन कर मैं चकित भाव से उनकी तरफ देखने लगा जबकि उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"जैसा कि तुम्हें भी पता है कि आज कल हालात कुछ ठीक नहीं हैं इस लिए हमने तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए यही सोचा कि तुम्हारे पास एक ऐसी चीज़ ज़रूर होनी चाहिए जिससे विकट हालात में तुम बेहतर तरीके से अपनी सुरक्षा कर सको।"

"क्या अभी भी आपको इस बात का पता नहीं चल पाया है कि हमारे खिलाफ़ जो लोग षड़यंत्र रचे हुए हैं वो कौन लोग हैं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"पहले हमें सिर्फ़ अंदेशा था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन अब यकीन हो चुका है इस बात का। बहुत हद तक हमें ऐसे लोगों पर शक भी है लेकिन जैसा कि हम पहले भी तुमसे कह चुके हैं कि सिर्फ़ शक के आधार पर हम किसी पर भी हाथ नहीं डाल सकते, बल्कि किसी भी बात को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पुख़्ता सबूतों का होना बेहद ज़रूरी है।"

"यानि आपको ऐसे लोगों पर शक तो है लेकिन पुख़्ता सबूत न होने की वजह से आप खुद को लाचार बना के बैठे हुए हैं।" मैंने बेख़ौफ़ भाव से कहा____"आपका दरोग़ा भी आज तक मुरारी काका के हत्यारे का पता नहीं लगा पाया।"

"उसको ये तो पता चला है कि उस रात जिस नक़ाबपोश की हत्या हुई थी वो कौन था।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अभी वो ये पता नहीं लगा पाया है कि उस नक़ाबपोश को उस रात जान से मारने वाला वो सफ़ेदपोश कौन था।"

"मेरा ख़याल है कि उस सफ़ेदपोश का पता लगा पाना अब उस दरोगा के बस का है भी नहीं पिता जी।" मैंने बेझिझक कहा____"लेकिन इस मामले में मुझे कुछ ऐसा पता चला है जिसके बारे में आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं।"

"क्..क्या मतलब?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"ऐसा क्या पता चला है तुम्हें?"
"यही कि बड़े भैया के सम्बन्ध में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी झूठी है।" मैंने ये कह कर मानो धमाका सा कर दिया था।

"क्...क्या??" पिता जी बुरी तरह उछल पड़े, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोले____"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"यही सच है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाल कर कहा____"कुल गुरु ने बड़े भैया के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की है वो पूरी तरह तो नहीं लेकिन झूठी ज़रूर है। यानी अगर हम चाहें तो बड़े भैया को कुछ नहीं हो सकता।"

"ले...लेकिन।" पिता जी के मुख से बड़ी मुश्किल से अल्फ़ाज़ निकले____"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम? आख़िर ऐसा कहने के पीछे आधार क्या है तुम्हारे पास? कुल गुरु भला हमसे झूठ क्यों कहेंगे कि तुम्हारे बड़े भाई का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"यही तो एक बड़ा षड़यंत्र है पिता जी।" मैंने पिता जी को इस तरह चकित कर देने पर मन ही मन थोड़ा विजयी महसूस किया, फिर बड़े गर्व से बोला____"आप भी जानते हैं कि कुल गुरु कोई भगवान नहीं हैं बल्कि हमारी ही तरह एक आम इंसान ही हैं और इंसान से डरा धमका कर कुछ भी कराया जा सकता है।"

"मतलब तुम ये कहना चाहते हो कि किसी ने कुल गुरु को बुरी तरह डराया धमकाया?" पिता जी ने पहले जैसे ही चकित भाव से कहा____"और उनसे हमारे बड़े बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी करवाई?"

"बिल्कुल।" मैंने ज़ोर दे कर कहा____"अब क्योंकि आप कुल गुरु की बातों पर आँख बंद कर के भरोसा कर लेंगे इस लिए इस बात को आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकेंगे कि कुल गुरु ने ऐसा किसी के डराने धमकाने से कहा होगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी तुरंत कुछ न बोल सके थे। मेरी तरफ ऐसे देखने लगे थे मानो मैं कोई अजूबा था। वैसे मौजूदा परिस्थितियों में मैं उनके लिए अजूबा ही तो बन गया था।

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो सकता है।" उन्होंने सोचने वाले भाव से किन्तु गंभीरता से कहा____"कुल गुरु ऐसे नहीं हैं कि वो किसी के डराने या धमकाने से हमारे बेटे के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल देंगे। तुम्हें जहां से भी ये सब बातें पता चली हैं वो निहायत ही फ़र्ज़ी और बकवास हैं।"

"आप ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि आपको कुल गुरु पर खुद से ज़्यादा भरोसा है और आपकी नज़र में वो कभी भी किसी से झूठ नहीं बोल सकते।" मैंने कहा____"जबकि आपके इसी विश्वास का फ़ायदा हमारे दुश्मनों ने उठाया है। हालांकि कुल गुरु ने जो कुछ आपसे कहा था वो यकीनन हो जाने वाला है। यानी एक तरह से उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं होगी लेकिन ये सब ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा जिसे प्राकृतिक कहा जा सके।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने झुंझलाते हुए कहा____"कभी कहते हो कि कुल गुरु ने झूठी भविष्यवाणी की थी और कभी कहते हो कि उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं है। आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?"

"क्या आप ये सोच सकते हैं कि बड़े भैया पर किसी ने तंत्र मंत्र करवाया हो सकता है?" मैंने ये कह कर मानो एक और धमाका किया, जिस पर पिता जी ने एक बार फिर से मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। जबकि मैंने आगे कहा____"जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने बहुत दूर का सोच कर ही ऐसा खेल रचा है। इसे सीधे तरीके से यूं समझिए कि किसी ने बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवा दिया और हमारे कुल गुरु द्वारा ये भविष्यवाणी आपको सुनवा दी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। कुल गुरु के कहे को आप विधाता का लेख समझ कर चुप चाप बैठ जाते। आप इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचते कि बड़े भैया के साथ किसी ने तंत्र मंत्र किया हो सकता है जिसके लिए आपको किसी ऐसे तांत्रिक से या किसी जादू मंतर करने वाले के पास जाना चाहिए जो भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का इलाज़ कर सके। ज़ाहिर है जब आप ऐसा कुछ करते ही नहीं तो उस तंत्र मंत्र के प्रभाव से बड़े भैया एक दिन ज़रूर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते और आप यही समझते रहते कि ये सब विधाता का ही लेख था। षड़यंत्र करता ने जिस मकसद से ये षड़यंत्र रचा था उसमें वो बड़ी आसानी से सफल हो जाता। वो अपनी दुश्मनी के चलते आपके बड़े बेटे को इतनी आसानी से ख़त्म कर देता और आप अपने बेटे की हुई इस अकस्मात मौत को विधी का लेख ही समझते रहते।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एक बार फिर से मुझे वैसे ही देखने लगे थे जैसे कि मैं कोई अजूबा होऊं। मेरा ख़याल था कि अब उनकी बुद्धि के द्वार खुल चुके थे और ऐसा मुझे उनके चेहरे को देख कर आभास भी होने लगा था।

"यकीनन।" पिता जी गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कह उठे____"हम यकीनन ऐसा कुछ नहीं सोच सकते थे। तुमने बिल्कुल सही कहा कि जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने काफी दूर का सोच कर ही रचा है और इसके लिए उसने हमारे कुल गुरु को भी माध्यम बना लिया। हैरत की बात है कि हमारे कुल गुरु ने उनके कहने पर ऐसा कैसे कह दिया हमसे?"

"बताया न पिता जी कि इंसान से डरा धमका कर कुछ भी करवाया जा सकता है।" मैंने जीप को दाएं तरफ मोड़ते हुए कहा____"कुल गुरु को उन लोगों ने डराया धमकाया होगा या फिर किसी चीज़ से उन्हें मजबूर कर दिया गया होगा।"

"लेकिन तुम्हें ये सब बातें कहां से पता चलीं?" पिता जी ने मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा____"किसने बताया तुम्हें और कब बताया?"

"मुझे ये बातें कल शाम को हमारे ही गांव के एक आदमी द्वारा पता चली हैं पिता जी।" मैंने कहा____"और तभी से मेरा खून ये सोच कर खौला जा रहा है कि जिस किसी ने भी मेरे भाई की मौत का ऐसा गन्दा षड्यंत्र रचा है उसको चीर फाड़ कर रख दूं।"

"नहीं, तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमें इस मामले में बहुत ही सावधानी से और बहुत ही बुद्धिमानी से काम लेना होगा। वैसे भी अभी हमें ये नहीं पता है कि ऐसा षड्यंत्रकारी कौन है? अगर हमने बिना सोचे समझे गुस्से में आ कर कोई भी कठोर क़दम उठाया तो हमारा दुश्मन सतर्क हो जाएगा।"

"आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि आप इस सबको विधि का लेख समझ बैठे थे।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मैं काफी समय से इस बात को देख कर हैरान था और सोच में पड़ा हुआ था कि बड़े भैया का बर्ताव अचानक से बदल कैसे जाता है। कभी तो वो मुझसे बड़ी ही ख़ुशी से बातें करते हैं और कभी उनके अंदर इतना गुस्सा और इतनी ज़्यादा नफ़रत भर जाती है कि वो मेरी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। आपको पता है अब तक वो कई बार मुझे अपने इस बदले हुए बर्ताव की वजह से थप्पड़ मार चुके हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि आख़िर ऐसा क्या है कि वो अलग अलग समय में दो तरह का बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं। कल जब गांव के उस काका द्वारा मुझे ये सब बातें पता चलीं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसा वो जान बूझ कर नहीं बल्कि उस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से ही करते थे।"

पिता जी किसी गहरी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे। चेहरे पर कई तरह के भावों का आवा गवन चालू था। मैंने उन्हें इतना विचाराधीन कभी नहीं देखा था।

"हमें गुप्त रूप से कुल गुरु से मिलना होगा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"उन्हीं से पता चलेगा कि उनसे हमारे बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कराने वाला कौन था और उन्होंने किस मजबूरी के तहत ऐसी भविष्यवाणी की थी?"

"आपको जो सही लगे कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मैं भी अब अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं और आप इसके लिए मुझे बिल्कुल भी मना नहीं करेंगे।"

"क्या करना चाहते हो तुम?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"देखो, तुम्हें फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिसकी वजह से अब तक के सारे किए कराए पर पानी फिर जाए। इस मामले को हम अपने तरीके से सम्हाल लेंगे।"

"आप बेफ़िक्र रहिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"आप जिस आशंका के चलते मुझे कुछ भी करने से रोक रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा। हालांकि मैं तो सब कुछ डंके की चोट पर करना पसंद करता हूं लेकिन क्योंकि मुझे भी वक़्त और हालात का बखूबी एहसास है इस लिए मैं जो कुछ भी करुंगा वो ठंडे दिमाग़ से और होशो हवास में ही करुंगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी मेरी तरफ अपलक देखने लगे थे। जैसे समझने की कोशिश कर रहे हों कि मेरे अंदर आख़िर चल क्या रहा है? हम दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

"और क्या बताया था गांव के उस आदमी ने तुम्हें?" पिता जी ने मुझसे पूछा जिसके जवाब में मैंने उन्हें सारी बातें बता दी जिसे सुन कर वो दंग रह गए थे। माथे पर सोचो की लकीरों का मानों जाल सा फ़ैल गया था।

"बड़ी अजीब बात है।" सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"किसी ने हवेली में दो ऐसी नौकरानियों को रखा हुआ है जो नमक तो हवेली का खा रही हैं लेकिन काम उनका कर रही हैं। ख़ैर, सोचने वाली बात है कि उस नौकरानी को ऐसे कौन से कागज़ात हमारे कमरे से निकाल कर लाने का काम सौंपा होगा उन लोगों ने? क्या हमारी ज़मीन जायदाद के कागज़ात या फिर हमारी वसीयत वाले कागज़ात?"

"अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात पूछूं आपसे?" मैंने धड़कते दिल से उनकी तरफ देखते हुए कहा तो उन्होंने सामान्य भाव से ही कहा____"क्या पूछना चाहते हो?"

"कागज़ातों के बारे में विचार कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"और सोचिए कि हमारे ऐसे कागज़ातों की सबसे ज़्यादा किसे ज़रूरत हो सकती है? अगर वो कागज़ात वसीयत वाले हैं तो आख़िर ऐसा कौन हो सकता है जो उस नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से उस वसीयत को चुरा लेना चाहता है? क्या ऐसा काम जगताप चाचा करवा सकते हैं? संभव है कि उनके मन में ये लालच अथवा ये भावना पनप रही हो कि हवेली का सारा कारोबार सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की मुट्ठी में होना चाहिए।"

"इस सम्बन्ध में तुम्हारा जगताप पर इस तरह से शक करना जायज़ तो है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी यकीन मानो कि ना तो उसके मन में इस तरह का कोई लालच है और ना ही वो ऐसा किसी से करवा सकता है।"

"आप इतने यकीन से जगताप चाचा के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ एक नज़र डाली____"जबकि दुनिया का एक सच यही है कि ज़र जोरु और ज़मीन के लिए आज तक कोई किसी का नहीं हुआ।"

"हमारे इस यकीन की वजह ये है कि कुछ समय पहले जब हमने वसीयत बदलवाई थी।" पिता जी ने कहा____"तब हम जगताप को भी अपने साथ ही ले गए थे और सब कुछ उससे पूछ कर ही करवाया था। एक बात और, हमने अपनी सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद के दो हिस्से भी किए थे। हालांकि जगताप इससे सहमत नहीं था पर हमने भविष्य का सोच कर ही ऐसा किया था। हमने उसे समझाया था कि समय के साथ साथ हर इंसान की सोच और मानसिकता बदल जाती है इस लिए कल को किसी भी तरह का ज़मीनी विवाद न हो इस लिए सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद का बटवारा अभी से कर देना ज़्यादा उचित होगा। अब तुम खुद सोचो कि जिस जगताप को हिस्सा करना ही पसंद नहीं था और वो ये कहता था कि उसे ज़मीन जायदाद का मोह नहीं है बल्कि वो सिर्फ़ अपने बड़े भैया की सेवा ही करते रहना चाहता है वो किसी नौकरानी के द्वारा हमारे कमरे से ऐसे कोई कागज़ात क्यों चुराना चाहेगा?"

"जैसा कि आपने खुद कहा कि वक़्त के साथ साथ लोगों की सोच और मानसिकता भी बदल जाती है।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज के वक़्त में जगताप चाचा की सोच और मानसिकता बदल गई हो? जिस समय आपने सम्पूर्ण संपत्ति और ज़मीन जायदाद के दो हिस्से किए थे उस समय उनकी मानसिकता भले ही वैसी रही हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी वो वैसी ही मानसिकता रखते हों? संभव तो ये भी है कि उस समय उन्होंने ये मोह और आपकी सेवा करने वाली बात इसी लिए कही होगी ताकि उनके द्वारा ऐसा कहने से आपके मन में वो अपने प्रति एक अटूट विश्वास बैठा सकें। उनकी योजना रही होगी कि अगर कभी भविष्य में ऐसा कुछ होता नज़र आए तो आप उन पर शक ही न कर सकें। सीधी सी बात है पिता जी कि एक पिता को अपने लिए भले ही किसी चीज़ का लालच न हो लेकिन अपनी औलाद के लिए वो बहुत कुछ कर गुज़रने की मानसिकता रख सकता है।"

"हम मानते हैं कि तुम्हारी ये बातें तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन सिर्फ तर्क़ संगत बातों से कुछ नहीं होता। अगर सच्चाई वाकई में यही है तो इस सच्चाई को साबित करने के लिए भी सबसे पहले हमारे पास किसी ठोस प्रमाण का होना ज़रूरी है। वैसे हमें यकीन है कि जगताप के मन में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमें आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ कि उसके मन में ऐसा कुछ है।"

"मौजूदा परिस्थितियों में और कल उस गांव वाले काका के द्वारा ऐसी बातें जानने के बाद।" मैंने कहा____"मैंने इतना ज़रूर समझा है कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी होती है। बड़े भैया के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ आपको बताया उससे आप समझ ही गए होंगे कि ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप तंत्र मंत्र जैसी चीज़ों का तसव्वुर तक नहीं कर सकते थे। ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप बड़े भैया की मौत को महज विधि का लेख समझ कर अपने बेटे की मौत पर सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखी ही होते रहते। जहां तक मुझे याद है कुल गुरु ने अपनी भविष्यवाणी में यही कहा था कि बड़े भैया का जब अंत समय आएगा तब वो बीमार पड़ जाएंगे। अब सवाल ये है कि उनके बीमार पड़ जाने पर क्या आप या हवेली का कोई भी सदस्य सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाता? क्या उनकी बिमारी के इलाज़ के लिए कुछ न किया जाता? क्या सब लोग सिर्फ ये सोच कर ही बैठे रहते कि कुल गुरु ने बड़े भैया के लिए ऐसी भविष्यवाणी कर दी है तो अब कुछ हो ही नहीं सकता?"

"आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?" पिता जी ने मेरी तरफ शख़्त भाव से देखा।
"यही कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना कभी कभी बहुत ही ज़्यादा ग़लत और नुक़सानदायक होता है।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैं अपने ही बाप को छोटा बच्चा समझ कर समझा रहा होऊं।

"हम मानते हैं कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया था।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन हमने कुल गुरु की बातों पर भरोसा भी इसी लिए किया क्योंकि वो हमारे कुल गुरु हैं और उन पर या उनकी किसी भी बात पर शक करना हम पाप समझते थे। ख़ैर अब जब कि हमें सच का पता चल गया है तो हम यही सोच रहे हैं कि वास्तव में भीषण कलियुग आ गया है, जिसके चलते अब हमें अपने ही पूज्य गुरु पर शक करना होगा वरना भरोसा करने की स्थिति में बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है।"

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।


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"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"

दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।

अब आगे.....

रात में सबके साथ मैं भी खाना खाने बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान खाने की तरफ ज़रा भी नहीं था। रह रह कर ज़हन में उस काका की बातें गूँज उठतीं और मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है? सहसा जगताप चाचा ने मुझे टोका तो मैं हल्के से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने इशारे से ही मुझे खाना खाने के लिए कहा तो मैं चुप चाप भोजन करने लगा। मैंने सिर उठा कर एक नज़र विभोर और अजीत पर डाली। मेरे वो दोनों कमीने भाई बेफ़िक्र हो कर खाने में मगन थे। उन्हें देख कर मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा उबल पड़ा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया। खाने के बाद पिता जी ने एक बार फिर से मुझसे कहा कि सुबह जल्दी तैयार हो जाना क्योंकि मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है।

अपने कमरे में बेड पर लेटा मैं रात भर करवटें बदलता रहा और मन ही मन मौजूदा परिस्थितियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता रहा। मैंने फैसला कर लिया था कि अगले दिन पिता जी से इस बारे में बात करुंगा और फिर जल्द से जल्द इस बारे में कुछ करुंगा। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख लगी और मैं नींद की आगोश में चला गया।

बन्द पलकों तले सहसा कुछ अजीब से चित्र उभरने लगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले भी दो बार मैं सपने में देख चुका था। मैं एक सुनसान जगह पर एक बड़ी सी शिला पर लेटा हुआ था। चारो तरह अँधेरे की चादर फैली हुई थी। मुझसे क़रीब बीस फिट की दूरी पर घने पेड़ पौधों से युक्त जंगल दिख रहा था जो कि मेरे चारो तरफ ही था। सहसा उन पेड़ पौधों से मुझे अपनी तरफ बढ़ता हुआ गाढ़ा धुआँ दिखा। मैं शिला पर चित्त लेटा हुआ था। मेरे हाथ पैर पूरी तरह आज़ाद थे लेकिन मैं उन्हें अपनी मर्ज़ी से हिला नहीं सकता था। पेड़ों के बीच से निकल कर आता हुआ वो गाढ़ा धुआँ निरंतर मेरी तरफ ही बढ़ता चला आ रहा था। मैं उस गाढ़े धुएं को देख एकदम से घबरा उठा और खुद को उस धुएं से बचाने के लिए उस शिला से उठ कर भागने का सोचा मगर उठना तो दूर की बात थी मैं हिल भी नहीं पा रहा था। उधर वो गाढ़ा धुआँ अब मेरे बेहद क़रीब आ चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे वो धुआँ नहीं बल्कि कोई भयानक यमदूत हो जो धुएं का रूप ले कर मुझे चारो तरफ से घेरते हुए आ रहा था।

उस धुएं को अपने बेहद क़रीब देख कर मैं बुरी तरह उससे बचने के लिए छटपटाने लगा मगर मेरा छटपटाना सिर्फ मेरे मन तक ही था। मैं पूरी ताक़त लगा कर उस शिला से उठ कर भाग जाना चाहता था मगर मेरी हर कोशिश बेकार थी। मेरे देखते ही देखते वो गाढ़ा धुआँ आया और मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं उस गाढ़े धुएं में पूरी तरह डूब गया। डर और घबराहट से मैं बुरी तरह चीख पड़ा और तभी मेरी आँख खुल गई।

मैं बेड पर उठ कर बैठ गया था और बुरी तरह हांफते हुए इधर उधर देखने लगा था। मेरा चेहरा पसीने से तरबतर था। छत के कुंडे पर झूल रहे पंखे की हवा जैसे मुझ पर कोई असर ही नहीं डाल पा रही थी। मैंने बेड पर बिछे चादर से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर लेट कर उस सपने के बारे में सोचने लगा। ये तीसरी बार था जब मुझे इस तरह का सपना आया था। मेरे ज़हन में एक बार फिर से उस काका की बातें गूँज उठीं। पलक झपकते ही मेरे अंदर गुस्सा उभर आया। मेरा मन किया कि अभी यहाँ से जाऊं और उन लोगों का खून कर दूं जिन्होंने ऐसा कुचक्र चला रखा है।

जाने कितनी ही देर तक मैं उस सपने और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद जाने कब मेरी आँख फिर से लग गई। सुबह मेनका चाची के जगाने पर ही मेरी आँख खुली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जल्दी से गुशलखाने में जा कर नहा धो लूं क्योंकि मुझे दादा ठाकुर के साथ पंचायत पर जाना है। चाची की बात सुन कर मैं फ़ौरन ही बेड से उठा और नीचे गुशलखाने की तरफ चल पड़ा।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं बैठक में पहुंचा। पिता जी और जगताप चाचा कुछ बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही पिता जी ने मुझसे जीप निकालने के लिए कहा तो मैंने वहीं दीवार पर लगी कील से जीप की चाभी ली और बाहर निकल गया।

ये पहली बार था जब मैं पिता जी के साथ किसी पंचायत पर जा रहा था वरना इसके पहले तो ज़्यादातर जगताप चाचा ही जाते थे या फिर बड़े भ‌इया। पिता जी की जीप के पीछे दो जीपें और जाती थीं जिनमें वो लोग होते थे जो पिता जी की सुरक्षा के लिए होते थे और उनके हाथों में बन्दूखें होती थीं। ख़ैर पिता जी जीप में मेरे बगल से बैठे तो मैंने उनके आदेश पर जीप को आगे बढ़ा दिया। हमारे पीछे वो दोनों जीपें भी चल पड़ीं।

"हमने तुम्हारे लिए एक ख़ास चीज़ मंगवाई है।" रास्ते में पिता जी ने मुझसे कहा____"और तुमसे यही उम्मीद करते हैं कि उस ख़ास चीज़ का तुम ग़लत स्तेमाल नहीं करोगे।"
"ऐसी कौन सी ख़ास चीज़ है पिता जी?" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा।

"रिवाल्वर।" पिता जी ने ये कह कर मानो धमाका सा किया, और उनकी इस धमाकेदार बात को सुन कर मैं चकित भाव से उनकी तरफ देखने लगा जबकि उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"जैसा कि तुम्हें भी पता है कि आज कल हालात कुछ ठीक नहीं हैं इस लिए हमने तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए यही सोचा कि तुम्हारे पास एक ऐसी चीज़ ज़रूर होनी चाहिए जिससे विकट हालात में तुम बेहतर तरीके से अपनी सुरक्षा कर सको।"

"क्या अभी भी आपको इस बात का पता नहीं चल पाया है कि हमारे खिलाफ़ जो लोग षड़यंत्र रचे हुए हैं वो कौन लोग हैं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"पहले हमें सिर्फ़ अंदेशा था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन अब यकीन हो चुका है इस बात का। बहुत हद तक हमें ऐसे लोगों पर शक भी है लेकिन जैसा कि हम पहले भी तुमसे कह चुके हैं कि सिर्फ़ शक के आधार पर हम किसी पर भी हाथ नहीं डाल सकते, बल्कि किसी भी बात को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पुख़्ता सबूतों का होना बेहद ज़रूरी है।"

"यानि आपको ऐसे लोगों पर शक तो है लेकिन पुख़्ता सबूत न होने की वजह से आप खुद को लाचार बना के बैठे हुए हैं।" मैंने बेख़ौफ़ भाव से कहा____"आपका दरोग़ा भी आज तक मुरारी काका के हत्यारे का पता नहीं लगा पाया।"

"उसको ये तो पता चला है कि उस रात जिस नक़ाबपोश की हत्या हुई थी वो कौन था।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अभी वो ये पता नहीं लगा पाया है कि उस नक़ाबपोश को उस रात जान से मारने वाला वो सफ़ेदपोश कौन था।"

"मेरा ख़याल है कि उस सफ़ेदपोश का पता लगा पाना अब उस दरोगा के बस का है भी नहीं पिता जी।" मैंने बेझिझक कहा____"लेकिन इस मामले में मुझे कुछ ऐसा पता चला है जिसके बारे में आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं।"

"क्..क्या मतलब?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"ऐसा क्या पता चला है तुम्हें?"
"यही कि बड़े भैया के सम्बन्ध में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी झूठी है।" मैंने ये कह कर मानो धमाका सा कर दिया था।

"क्...क्या??" पिता जी बुरी तरह उछल पड़े, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोले____"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"यही सच है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाल कर कहा____"कुल गुरु ने बड़े भैया के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की है वो पूरी तरह तो नहीं लेकिन झूठी ज़रूर है। यानी अगर हम चाहें तो बड़े भैया को कुछ नहीं हो सकता।"

"ले...लेकिन।" पिता जी के मुख से बड़ी मुश्किल से अल्फ़ाज़ निकले____"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम? आख़िर ऐसा कहने के पीछे आधार क्या है तुम्हारे पास? कुल गुरु भला हमसे झूठ क्यों कहेंगे कि तुम्हारे बड़े भाई का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"यही तो एक बड़ा षड़यंत्र है पिता जी।" मैंने पिता जी को इस तरह चकित कर देने पर मन ही मन थोड़ा विजयी महसूस किया, फिर बड़े गर्व से बोला____"आप भी जानते हैं कि कुल गुरु कोई भगवान नहीं हैं बल्कि हमारी ही तरह एक आम इंसान ही हैं और इंसान से डरा धमका कर कुछ भी कराया जा सकता है।"

"मतलब तुम ये कहना चाहते हो कि किसी ने कुल गुरु को बुरी तरह डराया धमकाया?" पिता जी ने पहले जैसे ही चकित भाव से कहा____"और उनसे हमारे बड़े बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी करवाई?"

"बिल्कुल।" मैंने ज़ोर दे कर कहा____"अब क्योंकि आप कुल गुरु की बातों पर आँख बंद कर के भरोसा कर लेंगे इस लिए इस बात को आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकेंगे कि कुल गुरु ने ऐसा किसी के डराने धमकाने से कहा होगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी तुरंत कुछ न बोल सके थे। मेरी तरफ ऐसे देखने लगे थे मानो मैं कोई अजूबा था। वैसे मौजूदा परिस्थितियों में मैं उनके लिए अजूबा ही तो बन गया था।

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो सकता है।" उन्होंने सोचने वाले भाव से किन्तु गंभीरता से कहा____"कुल गुरु ऐसे नहीं हैं कि वो किसी के डराने या धमकाने से हमारे बेटे के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल देंगे। तुम्हें जहां से भी ये सब बातें पता चली हैं वो निहायत ही फ़र्ज़ी और बकवास हैं।"

"आप ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि आपको कुल गुरु पर खुद से ज़्यादा भरोसा है और आपकी नज़र में वो कभी भी किसी से झूठ नहीं बोल सकते।" मैंने कहा____"जबकि आपके इसी विश्वास का फ़ायदा हमारे दुश्मनों ने उठाया है। हालांकि कुल गुरु ने जो कुछ आपसे कहा था वो यकीनन हो जाने वाला है। यानी एक तरह से उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं होगी लेकिन ये सब ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा जिसे प्राकृतिक कहा जा सके।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने झुंझलाते हुए कहा____"कभी कहते हो कि कुल गुरु ने झूठी भविष्यवाणी की थी और कभी कहते हो कि उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं है। आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?"

"क्या आप ये सोच सकते हैं कि बड़े भैया पर किसी ने तंत्र मंत्र करवाया हो सकता है?" मैंने ये कह कर मानो एक और धमाका किया, जिस पर पिता जी ने एक बार फिर से मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। जबकि मैंने आगे कहा____"जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने बहुत दूर का सोच कर ही ऐसा खेल रचा है। इसे सीधे तरीके से यूं समझिए कि किसी ने बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवा दिया और हमारे कुल गुरु द्वारा ये भविष्यवाणी आपको सुनवा दी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। कुल गुरु के कहे को आप विधाता का लेख समझ कर चुप चाप बैठ जाते। आप इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचते कि बड़े भैया के साथ किसी ने तंत्र मंत्र किया हो सकता है जिसके लिए आपको किसी ऐसे तांत्रिक से या किसी जादू मंतर करने वाले के पास जाना चाहिए जो भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का इलाज़ कर सके। ज़ाहिर है जब आप ऐसा कुछ करते ही नहीं तो उस तंत्र मंत्र के प्रभाव से बड़े भैया एक दिन ज़रूर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते और आप यही समझते रहते कि ये सब विधाता का ही लेख था। षड़यंत्र करता ने जिस मकसद से ये षड़यंत्र रचा था उसमें वो बड़ी आसानी से सफल हो जाता। वो अपनी दुश्मनी के चलते आपके बड़े बेटे को इतनी आसानी से ख़त्म कर देता और आप अपने बेटे की हुई इस अकस्मात मौत को विधी का लेख ही समझते रहते।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एक बार फिर से मुझे वैसे ही देखने लगे थे जैसे कि मैं कोई अजूबा होऊं। मेरा ख़याल था कि अब उनकी बुद्धि के द्वार खुल चुके थे और ऐसा मुझे उनके चेहरे को देख कर आभास भी होने लगा था।

"यकीनन।" पिता जी गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कह उठे____"हम यकीनन ऐसा कुछ नहीं सोच सकते थे। तुमने बिल्कुल सही कहा कि जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने काफी दूर का सोच कर ही रचा है और इसके लिए उसने हमारे कुल गुरु को भी माध्यम बना लिया। हैरत की बात है कि हमारे कुल गुरु ने उनके कहने पर ऐसा कैसे कह दिया हमसे?"

"बताया न पिता जी कि इंसान से डरा धमका कर कुछ भी करवाया जा सकता है।" मैंने जीप को दाएं तरफ मोड़ते हुए कहा____"कुल गुरु को उन लोगों ने डराया धमकाया होगा या फिर किसी चीज़ से उन्हें मजबूर कर दिया गया होगा।"

"लेकिन तुम्हें ये सब बातें कहां से पता चलीं?" पिता जी ने मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा____"किसने बताया तुम्हें और कब बताया?"

"मुझे ये बातें कल शाम को हमारे ही गांव के एक आदमी द्वारा पता चली हैं पिता जी।" मैंने कहा____"और तभी से मेरा खून ये सोच कर खौला जा रहा है कि जिस किसी ने भी मेरे भाई की मौत का ऐसा गन्दा षड्यंत्र रचा है उसको चीर फाड़ कर रख दूं।"

"नहीं, तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमें इस मामले में बहुत ही सावधानी से और बहुत ही बुद्धिमानी से काम लेना होगा। वैसे भी अभी हमें ये नहीं पता है कि ऐसा षड्यंत्रकारी कौन है? अगर हमने बिना सोचे समझे गुस्से में आ कर कोई भी कठोर क़दम उठाया तो हमारा दुश्मन सतर्क हो जाएगा।"

"आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि आप इस सबको विधि का लेख समझ बैठे थे।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मैं काफी समय से इस बात को देख कर हैरान था और सोच में पड़ा हुआ था कि बड़े भैया का बर्ताव अचानक से बदल कैसे जाता है। कभी तो वो मुझसे बड़ी ही ख़ुशी से बातें करते हैं और कभी उनके अंदर इतना गुस्सा और इतनी ज़्यादा नफ़रत भर जाती है कि वो मेरी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। आपको पता है अब तक वो कई बार मुझे अपने इस बदले हुए बर्ताव की वजह से थप्पड़ मार चुके हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि आख़िर ऐसा क्या है कि वो अलग अलग समय में दो तरह का बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं। कल जब गांव के उस काका द्वारा मुझे ये सब बातें पता चलीं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसा वो जान बूझ कर नहीं बल्कि उस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से ही करते थे।"

पिता जी किसी गहरी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे। चेहरे पर कई तरह के भावों का आवा गवन चालू था। मैंने उन्हें इतना विचाराधीन कभी नहीं देखा था।

"हमें गुप्त रूप से कुल गुरु से मिलना होगा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"उन्हीं से पता चलेगा कि उनसे हमारे बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कराने वाला कौन था और उन्होंने किस मजबूरी के तहत ऐसी भविष्यवाणी की थी?"

"आपको जो सही लगे कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मैं भी अब अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं और आप इसके लिए मुझे बिल्कुल भी मना नहीं करेंगे।"

"क्या करना चाहते हो तुम?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"देखो, तुम्हें फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिसकी वजह से अब तक के सारे किए कराए पर पानी फिर जाए। इस मामले को हम अपने तरीके से सम्हाल लेंगे।"

"आप बेफ़िक्र रहिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"आप जिस आशंका के चलते मुझे कुछ भी करने से रोक रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा। हालांकि मैं तो सब कुछ डंके की चोट पर करना पसंद करता हूं लेकिन क्योंकि मुझे भी वक़्त और हालात का बखूबी एहसास है इस लिए मैं जो कुछ भी करुंगा वो ठंडे दिमाग़ से और होशो हवास में ही करुंगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी मेरी तरफ अपलक देखने लगे थे। जैसे समझने की कोशिश कर रहे हों कि मेरे अंदर आख़िर चल क्या रहा है? हम दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

"और क्या बताया था गांव के उस आदमी ने तुम्हें?" पिता जी ने मुझसे पूछा जिसके जवाब में मैंने उन्हें सारी बातें बता दी जिसे सुन कर वो दंग रह गए थे। माथे पर सोचो की लकीरों का मानों जाल सा फ़ैल गया था।

"बड़ी अजीब बात है।" सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"किसी ने हवेली में दो ऐसी नौकरानियों को रखा हुआ है जो नमक तो हवेली का खा रही हैं लेकिन काम उनका कर रही हैं। ख़ैर, सोचने वाली बात है कि उस नौकरानी को ऐसे कौन से कागज़ात हमारे कमरे से निकाल कर लाने का काम सौंपा होगा उन लोगों ने? क्या हमारी ज़मीन जायदाद के कागज़ात या फिर हमारी वसीयत वाले कागज़ात?"

"अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात पूछूं आपसे?" मैंने धड़कते दिल से उनकी तरफ देखते हुए कहा तो उन्होंने सामान्य भाव से ही कहा____"क्या पूछना चाहते हो?"

"कागज़ातों के बारे में विचार कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"और सोचिए कि हमारे ऐसे कागज़ातों की सबसे ज़्यादा किसे ज़रूरत हो सकती है? अगर वो कागज़ात वसीयत वाले हैं तो आख़िर ऐसा कौन हो सकता है जो उस नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से उस वसीयत को चुरा लेना चाहता है? क्या ऐसा काम जगताप चाचा करवा सकते हैं? संभव है कि उनके मन में ये लालच अथवा ये भावना पनप रही हो कि हवेली का सारा कारोबार सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की मुट्ठी में होना चाहिए।"

"इस सम्बन्ध में तुम्हारा जगताप पर इस तरह से शक करना जायज़ तो है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी यकीन मानो कि ना तो उसके मन में इस तरह का कोई लालच है और ना ही वो ऐसा किसी से करवा सकता है।"

"आप इतने यकीन से जगताप चाचा के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ एक नज़र डाली____"जबकि दुनिया का एक सच यही है कि ज़र जोरु और ज़मीन के लिए आज तक कोई किसी का नहीं हुआ।"

"हमारे इस यकीन की वजह ये है कि कुछ समय पहले जब हमने वसीयत बदलवाई थी।" पिता जी ने कहा____"तब हम जगताप को भी अपने साथ ही ले गए थे और सब कुछ उससे पूछ कर ही करवाया था। एक बात और, हमने अपनी सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद के दो हिस्से भी किए थे। हालांकि जगताप इससे सहमत नहीं था पर हमने भविष्य का सोच कर ही ऐसा किया था। हमने उसे समझाया था कि समय के साथ साथ हर इंसान की सोच और मानसिकता बदल जाती है इस लिए कल को किसी भी तरह का ज़मीनी विवाद न हो इस लिए सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद का बटवारा अभी से कर देना ज़्यादा उचित होगा। अब तुम खुद सोचो कि जिस जगताप को हिस्सा करना ही पसंद नहीं था और वो ये कहता था कि उसे ज़मीन जायदाद का मोह नहीं है बल्कि वो सिर्फ़ अपने बड़े भैया की सेवा ही करते रहना चाहता है वो किसी नौकरानी के द्वारा हमारे कमरे से ऐसे कोई कागज़ात क्यों चुराना चाहेगा?"

"जैसा कि आपने खुद कहा कि वक़्त के साथ साथ लोगों की सोच और मानसिकता भी बदल जाती है।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज के वक़्त में जगताप चाचा की सोच और मानसिकता बदल गई हो? जिस समय आपने सम्पूर्ण संपत्ति और ज़मीन जायदाद के दो हिस्से किए थे उस समय उनकी मानसिकता भले ही वैसी रही हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी वो वैसी ही मानसिकता रखते हों? संभव तो ये भी है कि उस समय उन्होंने ये मोह और आपकी सेवा करने वाली बात इसी लिए कही होगी ताकि उनके द्वारा ऐसा कहने से आपके मन में वो अपने प्रति एक अटूट विश्वास बैठा सकें। उनकी योजना रही होगी कि अगर कभी भविष्य में ऐसा कुछ होता नज़र आए तो आप उन पर शक ही न कर सकें। सीधी सी बात है पिता जी कि एक पिता को अपने लिए भले ही किसी चीज़ का लालच न हो लेकिन अपनी औलाद के लिए वो बहुत कुछ कर गुज़रने की मानसिकता रख सकता है।"

"हम मानते हैं कि तुम्हारी ये बातें तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन सिर्फ तर्क़ संगत बातों से कुछ नहीं होता। अगर सच्चाई वाकई में यही है तो इस सच्चाई को साबित करने के लिए भी सबसे पहले हमारे पास किसी ठोस प्रमाण का होना ज़रूरी है। वैसे हमें यकीन है कि जगताप के मन में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमें आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ कि उसके मन में ऐसा कुछ है।"

"मौजूदा परिस्थितियों में और कल उस गांव वाले काका के द्वारा ऐसी बातें जानने के बाद।" मैंने कहा____"मैंने इतना ज़रूर समझा है कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी होती है। बड़े भैया के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ आपको बताया उससे आप समझ ही गए होंगे कि ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप तंत्र मंत्र जैसी चीज़ों का तसव्वुर तक नहीं कर सकते थे। ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप बड़े भैया की मौत को महज विधि का लेख समझ कर अपने बेटे की मौत पर सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखी ही होते रहते। जहां तक मुझे याद है कुल गुरु ने अपनी भविष्यवाणी में यही कहा था कि बड़े भैया का जब अंत समय आएगा तब वो बीमार पड़ जाएंगे। अब सवाल ये है कि उनके बीमार पड़ जाने पर क्या आप या हवेली का कोई भी सदस्य सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाता? क्या उनकी बिमारी के इलाज़ के लिए कुछ न किया जाता? क्या सब लोग सिर्फ ये सोच कर ही बैठे रहते कि कुल गुरु ने बड़े भैया के लिए ऐसी भविष्यवाणी कर दी है तो अब कुछ हो ही नहीं सकता?"

"आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?" पिता जी ने मेरी तरफ शख़्त भाव से देखा।
"यही कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना कभी कभी बहुत ही ज़्यादा ग़लत और नुक़सानदायक होता है।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैं अपने ही बाप को छोटा बच्चा समझ कर समझा रहा होऊं।

"हम मानते हैं कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया था।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन हमने कुल गुरु की बातों पर भरोसा भी इसी लिए किया क्योंकि वो हमारे कुल गुरु हैं और उन पर या उनकी किसी भी बात पर शक करना हम पाप समझते थे। ख़ैर अब जब कि हमें सच का पता चल गया है तो हम यही सोच रहे हैं कि वास्तव में भीषण कलियुग आ गया है, जिसके चलते अब हमें अपने ही पूज्य गुरु पर शक करना होगा वरना भरोसा करने की स्थिति में बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है।"

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।



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Kk number bro abhi maja aayega na jab ye apne bhaiyon ka maja chakjayega chipke se aur apne Bade bhiya ko bachane ka tarika nikalega
 

Lib am

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अध्याय - 41
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अब तक....

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"

दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।

अब आगे.....

रात में सबके साथ मैं भी खाना खाने बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान खाने की तरफ ज़रा भी नहीं था। रह रह कर ज़हन में उस काका की बातें गूँज उठतीं और मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है? सहसा जगताप चाचा ने मुझे टोका तो मैं हल्के से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने इशारे से ही मुझे खाना खाने के लिए कहा तो मैं चुप चाप भोजन करने लगा। मैंने सिर उठा कर एक नज़र विभोर और अजीत पर डाली। मेरे वो दोनों कमीने भाई बेफ़िक्र हो कर खाने में मगन थे। उन्हें देख कर मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा उबल पड़ा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया। खाने के बाद पिता जी ने एक बार फिर से मुझसे कहा कि सुबह जल्दी तैयार हो जाना क्योंकि मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है।

अपने कमरे में बेड पर लेटा मैं रात भर करवटें बदलता रहा और मन ही मन मौजूदा परिस्थितियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता रहा। मैंने फैसला कर लिया था कि अगले दिन पिता जी से इस बारे में बात करुंगा और फिर जल्द से जल्द इस बारे में कुछ करुंगा। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख लगी और मैं नींद की आगोश में चला गया।

बन्द पलकों तले सहसा कुछ अजीब से चित्र उभरने लगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले भी दो बार मैं सपने में देख चुका था। मैं एक सुनसान जगह पर एक बड़ी सी शिला पर लेटा हुआ था। चारो तरह अँधेरे की चादर फैली हुई थी। मुझसे क़रीब बीस फिट की दूरी पर घने पेड़ पौधों से युक्त जंगल दिख रहा था जो कि मेरे चारो तरफ ही था। सहसा उन पेड़ पौधों से मुझे अपनी तरफ बढ़ता हुआ गाढ़ा धुआँ दिखा। मैं शिला पर चित्त लेटा हुआ था। मेरे हाथ पैर पूरी तरह आज़ाद थे लेकिन मैं उन्हें अपनी मर्ज़ी से हिला नहीं सकता था। पेड़ों के बीच से निकल कर आता हुआ वो गाढ़ा धुआँ निरंतर मेरी तरफ ही बढ़ता चला आ रहा था। मैं उस गाढ़े धुएं को देख एकदम से घबरा उठा और खुद को उस धुएं से बचाने के लिए उस शिला से उठ कर भागने का सोचा मगर उठना तो दूर की बात थी मैं हिल भी नहीं पा रहा था। उधर वो गाढ़ा धुआँ अब मेरे बेहद क़रीब आ चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे वो धुआँ नहीं बल्कि कोई भयानक यमदूत हो जो धुएं का रूप ले कर मुझे चारो तरफ से घेरते हुए आ रहा था।

उस धुएं को अपने बेहद क़रीब देख कर मैं बुरी तरह उससे बचने के लिए छटपटाने लगा मगर मेरा छटपटाना सिर्फ मेरे मन तक ही था। मैं पूरी ताक़त लगा कर उस शिला से उठ कर भाग जाना चाहता था मगर मेरी हर कोशिश बेकार थी। मेरे देखते ही देखते वो गाढ़ा धुआँ आया और मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं उस गाढ़े धुएं में पूरी तरह डूब गया। डर और घबराहट से मैं बुरी तरह चीख पड़ा और तभी मेरी आँख खुल गई।

मैं बेड पर उठ कर बैठ गया था और बुरी तरह हांफते हुए इधर उधर देखने लगा था। मेरा चेहरा पसीने से तरबतर था। छत के कुंडे पर झूल रहे पंखे की हवा जैसे मुझ पर कोई असर ही नहीं डाल पा रही थी। मैंने बेड पर बिछे चादर से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर लेट कर उस सपने के बारे में सोचने लगा। ये तीसरी बार था जब मुझे इस तरह का सपना आया था। मेरे ज़हन में एक बार फिर से उस काका की बातें गूँज उठीं। पलक झपकते ही मेरे अंदर गुस्सा उभर आया। मेरा मन किया कि अभी यहाँ से जाऊं और उन लोगों का खून कर दूं जिन्होंने ऐसा कुचक्र चला रखा है।

जाने कितनी ही देर तक मैं उस सपने और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद जाने कब मेरी आँख फिर से लग गई। सुबह मेनका चाची के जगाने पर ही मेरी आँख खुली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जल्दी से गुशलखाने में जा कर नहा धो लूं क्योंकि मुझे दादा ठाकुर के साथ पंचायत पर जाना है। चाची की बात सुन कर मैं फ़ौरन ही बेड से उठा और नीचे गुशलखाने की तरफ चल पड़ा।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं बैठक में पहुंचा। पिता जी और जगताप चाचा कुछ बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही पिता जी ने मुझसे जीप निकालने के लिए कहा तो मैंने वहीं दीवार पर लगी कील से जीप की चाभी ली और बाहर निकल गया।

ये पहली बार था जब मैं पिता जी के साथ किसी पंचायत पर जा रहा था वरना इसके पहले तो ज़्यादातर जगताप चाचा ही जाते थे या फिर बड़े भ‌इया। पिता जी की जीप के पीछे दो जीपें और जाती थीं जिनमें वो लोग होते थे जो पिता जी की सुरक्षा के लिए होते थे और उनके हाथों में बन्दूखें होती थीं। ख़ैर पिता जी जीप में मेरे बगल से बैठे तो मैंने उनके आदेश पर जीप को आगे बढ़ा दिया। हमारे पीछे वो दोनों जीपें भी चल पड़ीं।

"हमने तुम्हारे लिए एक ख़ास चीज़ मंगवाई है।" रास्ते में पिता जी ने मुझसे कहा____"और तुमसे यही उम्मीद करते हैं कि उस ख़ास चीज़ का तुम ग़लत स्तेमाल नहीं करोगे।"
"ऐसी कौन सी ख़ास चीज़ है पिता जी?" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा।

"रिवाल्वर।" पिता जी ने ये कह कर मानो धमाका सा किया, और उनकी इस धमाकेदार बात को सुन कर मैं चकित भाव से उनकी तरफ देखने लगा जबकि उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"जैसा कि तुम्हें भी पता है कि आज कल हालात कुछ ठीक नहीं हैं इस लिए हमने तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए यही सोचा कि तुम्हारे पास एक ऐसी चीज़ ज़रूर होनी चाहिए जिससे विकट हालात में तुम बेहतर तरीके से अपनी सुरक्षा कर सको।"

"क्या अभी भी आपको इस बात का पता नहीं चल पाया है कि हमारे खिलाफ़ जो लोग षड़यंत्र रचे हुए हैं वो कौन लोग हैं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"पहले हमें सिर्फ़ अंदेशा था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन अब यकीन हो चुका है इस बात का। बहुत हद तक हमें ऐसे लोगों पर शक भी है लेकिन जैसा कि हम पहले भी तुमसे कह चुके हैं कि सिर्फ़ शक के आधार पर हम किसी पर भी हाथ नहीं डाल सकते, बल्कि किसी भी बात को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पुख़्ता सबूतों का होना बेहद ज़रूरी है।"

"यानि आपको ऐसे लोगों पर शक तो है लेकिन पुख़्ता सबूत न होने की वजह से आप खुद को लाचार बना के बैठे हुए हैं।" मैंने बेख़ौफ़ भाव से कहा____"आपका दरोग़ा भी आज तक मुरारी काका के हत्यारे का पता नहीं लगा पाया।"

"उसको ये तो पता चला है कि उस रात जिस नक़ाबपोश की हत्या हुई थी वो कौन था।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अभी वो ये पता नहीं लगा पाया है कि उस नक़ाबपोश को उस रात जान से मारने वाला वो सफ़ेदपोश कौन था।"

"मेरा ख़याल है कि उस सफ़ेदपोश का पता लगा पाना अब उस दरोगा के बस का है भी नहीं पिता जी।" मैंने बेझिझक कहा____"लेकिन इस मामले में मुझे कुछ ऐसा पता चला है जिसके बारे में आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं।"

"क्..क्या मतलब?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"ऐसा क्या पता चला है तुम्हें?"
"यही कि बड़े भैया के सम्बन्ध में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी झूठी है।" मैंने ये कह कर मानो धमाका सा कर दिया था।

"क्...क्या??" पिता जी बुरी तरह उछल पड़े, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोले____"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"यही सच है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाल कर कहा____"कुल गुरु ने बड़े भैया के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की है वो पूरी तरह तो नहीं लेकिन झूठी ज़रूर है। यानी अगर हम चाहें तो बड़े भैया को कुछ नहीं हो सकता।"

"ले...लेकिन।" पिता जी के मुख से बड़ी मुश्किल से अल्फ़ाज़ निकले____"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम? आख़िर ऐसा कहने के पीछे आधार क्या है तुम्हारे पास? कुल गुरु भला हमसे झूठ क्यों कहेंगे कि तुम्हारे बड़े भाई का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"यही तो एक बड़ा षड़यंत्र है पिता जी।" मैंने पिता जी को इस तरह चकित कर देने पर मन ही मन थोड़ा विजयी महसूस किया, फिर बड़े गर्व से बोला____"आप भी जानते हैं कि कुल गुरु कोई भगवान नहीं हैं बल्कि हमारी ही तरह एक आम इंसान ही हैं और इंसान से डरा धमका कर कुछ भी कराया जा सकता है।"

"मतलब तुम ये कहना चाहते हो कि किसी ने कुल गुरु को बुरी तरह डराया धमकाया?" पिता जी ने पहले जैसे ही चकित भाव से कहा____"और उनसे हमारे बड़े बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी करवाई?"

"बिल्कुल।" मैंने ज़ोर दे कर कहा____"अब क्योंकि आप कुल गुरु की बातों पर आँख बंद कर के भरोसा कर लेंगे इस लिए इस बात को आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकेंगे कि कुल गुरु ने ऐसा किसी के डराने धमकाने से कहा होगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी तुरंत कुछ न बोल सके थे। मेरी तरफ ऐसे देखने लगे थे मानो मैं कोई अजूबा था। वैसे मौजूदा परिस्थितियों में मैं उनके लिए अजूबा ही तो बन गया था।

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो सकता है।" उन्होंने सोचने वाले भाव से किन्तु गंभीरता से कहा____"कुल गुरु ऐसे नहीं हैं कि वो किसी के डराने या धमकाने से हमारे बेटे के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल देंगे। तुम्हें जहां से भी ये सब बातें पता चली हैं वो निहायत ही फ़र्ज़ी और बकवास हैं।"

"आप ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि आपको कुल गुरु पर खुद से ज़्यादा भरोसा है और आपकी नज़र में वो कभी भी किसी से झूठ नहीं बोल सकते।" मैंने कहा____"जबकि आपके इसी विश्वास का फ़ायदा हमारे दुश्मनों ने उठाया है। हालांकि कुल गुरु ने जो कुछ आपसे कहा था वो यकीनन हो जाने वाला है। यानी एक तरह से उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं होगी लेकिन ये सब ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा जिसे प्राकृतिक कहा जा सके।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने झुंझलाते हुए कहा____"कभी कहते हो कि कुल गुरु ने झूठी भविष्यवाणी की थी और कभी कहते हो कि उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं है। आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?"

"क्या आप ये सोच सकते हैं कि बड़े भैया पर किसी ने तंत्र मंत्र करवाया हो सकता है?" मैंने ये कह कर मानो एक और धमाका किया, जिस पर पिता जी ने एक बार फिर से मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। जबकि मैंने आगे कहा____"जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने बहुत दूर का सोच कर ही ऐसा खेल रचा है। इसे सीधे तरीके से यूं समझिए कि किसी ने बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवा दिया और हमारे कुल गुरु द्वारा ये भविष्यवाणी आपको सुनवा दी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। कुल गुरु के कहे को आप विधाता का लेख समझ कर चुप चाप बैठ जाते। आप इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचते कि बड़े भैया के साथ किसी ने तंत्र मंत्र किया हो सकता है जिसके लिए आपको किसी ऐसे तांत्रिक से या किसी जादू मंतर करने वाले के पास जाना चाहिए जो भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का इलाज़ कर सके। ज़ाहिर है जब आप ऐसा कुछ करते ही नहीं तो उस तंत्र मंत्र के प्रभाव से बड़े भैया एक दिन ज़रूर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते और आप यही समझते रहते कि ये सब विधाता का ही लेख था। षड़यंत्र करता ने जिस मकसद से ये षड़यंत्र रचा था उसमें वो बड़ी आसानी से सफल हो जाता। वो अपनी दुश्मनी के चलते आपके बड़े बेटे को इतनी आसानी से ख़त्म कर देता और आप अपने बेटे की हुई इस अकस्मात मौत को विधी का लेख ही समझते रहते।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एक बार फिर से मुझे वैसे ही देखने लगे थे जैसे कि मैं कोई अजूबा होऊं। मेरा ख़याल था कि अब उनकी बुद्धि के द्वार खुल चुके थे और ऐसा मुझे उनके चेहरे को देख कर आभास भी होने लगा था।

"यकीनन।" पिता जी गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कह उठे____"हम यकीनन ऐसा कुछ नहीं सोच सकते थे। तुमने बिल्कुल सही कहा कि जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने काफी दूर का सोच कर ही रचा है और इसके लिए उसने हमारे कुल गुरु को भी माध्यम बना लिया। हैरत की बात है कि हमारे कुल गुरु ने उनके कहने पर ऐसा कैसे कह दिया हमसे?"

"बताया न पिता जी कि इंसान से डरा धमका कर कुछ भी करवाया जा सकता है।" मैंने जीप को दाएं तरफ मोड़ते हुए कहा____"कुल गुरु को उन लोगों ने डराया धमकाया होगा या फिर किसी चीज़ से उन्हें मजबूर कर दिया गया होगा।"

"लेकिन तुम्हें ये सब बातें कहां से पता चलीं?" पिता जी ने मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा____"किसने बताया तुम्हें और कब बताया?"

"मुझे ये बातें कल शाम को हमारे ही गांव के एक आदमी द्वारा पता चली हैं पिता जी।" मैंने कहा____"और तभी से मेरा खून ये सोच कर खौला जा रहा है कि जिस किसी ने भी मेरे भाई की मौत का ऐसा गन्दा षड्यंत्र रचा है उसको चीर फाड़ कर रख दूं।"

"नहीं, तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमें इस मामले में बहुत ही सावधानी से और बहुत ही बुद्धिमानी से काम लेना होगा। वैसे भी अभी हमें ये नहीं पता है कि ऐसा षड्यंत्रकारी कौन है? अगर हमने बिना सोचे समझे गुस्से में आ कर कोई भी कठोर क़दम उठाया तो हमारा दुश्मन सतर्क हो जाएगा।"

"आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि आप इस सबको विधि का लेख समझ बैठे थे।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मैं काफी समय से इस बात को देख कर हैरान था और सोच में पड़ा हुआ था कि बड़े भैया का बर्ताव अचानक से बदल कैसे जाता है। कभी तो वो मुझसे बड़ी ही ख़ुशी से बातें करते हैं और कभी उनके अंदर इतना गुस्सा और इतनी ज़्यादा नफ़रत भर जाती है कि वो मेरी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। आपको पता है अब तक वो कई बार मुझे अपने इस बदले हुए बर्ताव की वजह से थप्पड़ मार चुके हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि आख़िर ऐसा क्या है कि वो अलग अलग समय में दो तरह का बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं। कल जब गांव के उस काका द्वारा मुझे ये सब बातें पता चलीं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसा वो जान बूझ कर नहीं बल्कि उस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से ही करते थे।"

पिता जी किसी गहरी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे। चेहरे पर कई तरह के भावों का आवा गवन चालू था। मैंने उन्हें इतना विचाराधीन कभी नहीं देखा था।

"हमें गुप्त रूप से कुल गुरु से मिलना होगा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"उन्हीं से पता चलेगा कि उनसे हमारे बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कराने वाला कौन था और उन्होंने किस मजबूरी के तहत ऐसी भविष्यवाणी की थी?"

"आपको जो सही लगे कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मैं भी अब अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं और आप इसके लिए मुझे बिल्कुल भी मना नहीं करेंगे।"

"क्या करना चाहते हो तुम?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"देखो, तुम्हें फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिसकी वजह से अब तक के सारे किए कराए पर पानी फिर जाए। इस मामले को हम अपने तरीके से सम्हाल लेंगे।"

"आप बेफ़िक्र रहिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"आप जिस आशंका के चलते मुझे कुछ भी करने से रोक रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा। हालांकि मैं तो सब कुछ डंके की चोट पर करना पसंद करता हूं लेकिन क्योंकि मुझे भी वक़्त और हालात का बखूबी एहसास है इस लिए मैं जो कुछ भी करुंगा वो ठंडे दिमाग़ से और होशो हवास में ही करुंगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी मेरी तरफ अपलक देखने लगे थे। जैसे समझने की कोशिश कर रहे हों कि मेरे अंदर आख़िर चल क्या रहा है? हम दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

"और क्या बताया था गांव के उस आदमी ने तुम्हें?" पिता जी ने मुझसे पूछा जिसके जवाब में मैंने उन्हें सारी बातें बता दी जिसे सुन कर वो दंग रह गए थे। माथे पर सोचो की लकीरों का मानों जाल सा फ़ैल गया था।

"बड़ी अजीब बात है।" सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"किसी ने हवेली में दो ऐसी नौकरानियों को रखा हुआ है जो नमक तो हवेली का खा रही हैं लेकिन काम उनका कर रही हैं। ख़ैर, सोचने वाली बात है कि उस नौकरानी को ऐसे कौन से कागज़ात हमारे कमरे से निकाल कर लाने का काम सौंपा होगा उन लोगों ने? क्या हमारी ज़मीन जायदाद के कागज़ात या फिर हमारी वसीयत वाले कागज़ात?"

"अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात पूछूं आपसे?" मैंने धड़कते दिल से उनकी तरफ देखते हुए कहा तो उन्होंने सामान्य भाव से ही कहा____"क्या पूछना चाहते हो?"

"कागज़ातों के बारे में विचार कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"और सोचिए कि हमारे ऐसे कागज़ातों की सबसे ज़्यादा किसे ज़रूरत हो सकती है? अगर वो कागज़ात वसीयत वाले हैं तो आख़िर ऐसा कौन हो सकता है जो उस नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से उस वसीयत को चुरा लेना चाहता है? क्या ऐसा काम जगताप चाचा करवा सकते हैं? संभव है कि उनके मन में ये लालच अथवा ये भावना पनप रही हो कि हवेली का सारा कारोबार सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की मुट्ठी में होना चाहिए।"

"इस सम्बन्ध में तुम्हारा जगताप पर इस तरह से शक करना जायज़ तो है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी यकीन मानो कि ना तो उसके मन में इस तरह का कोई लालच है और ना ही वो ऐसा किसी से करवा सकता है।"

"आप इतने यकीन से जगताप चाचा के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ एक नज़र डाली____"जबकि दुनिया का एक सच यही है कि ज़र जोरु और ज़मीन के लिए आज तक कोई किसी का नहीं हुआ।"

"हमारे इस यकीन की वजह ये है कि कुछ समय पहले जब हमने वसीयत बदलवाई थी।" पिता जी ने कहा____"तब हम जगताप को भी अपने साथ ही ले गए थे और सब कुछ उससे पूछ कर ही करवाया था। एक बात और, हमने अपनी सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद के दो हिस्से भी किए थे। हालांकि जगताप इससे सहमत नहीं था पर हमने भविष्य का सोच कर ही ऐसा किया था। हमने उसे समझाया था कि समय के साथ साथ हर इंसान की सोच और मानसिकता बदल जाती है इस लिए कल को किसी भी तरह का ज़मीनी विवाद न हो इस लिए सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद का बटवारा अभी से कर देना ज़्यादा उचित होगा। अब तुम खुद सोचो कि जिस जगताप को हिस्सा करना ही पसंद नहीं था और वो ये कहता था कि उसे ज़मीन जायदाद का मोह नहीं है बल्कि वो सिर्फ़ अपने बड़े भैया की सेवा ही करते रहना चाहता है वो किसी नौकरानी के द्वारा हमारे कमरे से ऐसे कोई कागज़ात क्यों चुराना चाहेगा?"

"जैसा कि आपने खुद कहा कि वक़्त के साथ साथ लोगों की सोच और मानसिकता भी बदल जाती है।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज के वक़्त में जगताप चाचा की सोच और मानसिकता बदल गई हो? जिस समय आपने सम्पूर्ण संपत्ति और ज़मीन जायदाद के दो हिस्से किए थे उस समय उनकी मानसिकता भले ही वैसी रही हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी वो वैसी ही मानसिकता रखते हों? संभव तो ये भी है कि उस समय उन्होंने ये मोह और आपकी सेवा करने वाली बात इसी लिए कही होगी ताकि उनके द्वारा ऐसा कहने से आपके मन में वो अपने प्रति एक अटूट विश्वास बैठा सकें। उनकी योजना रही होगी कि अगर कभी भविष्य में ऐसा कुछ होता नज़र आए तो आप उन पर शक ही न कर सकें। सीधी सी बात है पिता जी कि एक पिता को अपने लिए भले ही किसी चीज़ का लालच न हो लेकिन अपनी औलाद के लिए वो बहुत कुछ कर गुज़रने की मानसिकता रख सकता है।"

"हम मानते हैं कि तुम्हारी ये बातें तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन सिर्फ तर्क़ संगत बातों से कुछ नहीं होता। अगर सच्चाई वाकई में यही है तो इस सच्चाई को साबित करने के लिए भी सबसे पहले हमारे पास किसी ठोस प्रमाण का होना ज़रूरी है। वैसे हमें यकीन है कि जगताप के मन में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमें आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ कि उसके मन में ऐसा कुछ है।"

"मौजूदा परिस्थितियों में और कल उस गांव वाले काका के द्वारा ऐसी बातें जानने के बाद।" मैंने कहा____"मैंने इतना ज़रूर समझा है कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी होती है। बड़े भैया के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ आपको बताया उससे आप समझ ही गए होंगे कि ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप तंत्र मंत्र जैसी चीज़ों का तसव्वुर तक नहीं कर सकते थे। ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप बड़े भैया की मौत को महज विधि का लेख समझ कर अपने बेटे की मौत पर सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखी ही होते रहते। जहां तक मुझे याद है कुल गुरु ने अपनी भविष्यवाणी में यही कहा था कि बड़े भैया का जब अंत समय आएगा तब वो बीमार पड़ जाएंगे। अब सवाल ये है कि उनके बीमार पड़ जाने पर क्या आप या हवेली का कोई भी सदस्य सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाता? क्या उनकी बिमारी के इलाज़ के लिए कुछ न किया जाता? क्या सब लोग सिर्फ ये सोच कर ही बैठे रहते कि कुल गुरु ने बड़े भैया के लिए ऐसी भविष्यवाणी कर दी है तो अब कुछ हो ही नहीं सकता?"

"आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?" पिता जी ने मेरी तरफ शख़्त भाव से देखा।
"यही कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना कभी कभी बहुत ही ज़्यादा ग़लत और नुक़सानदायक होता है।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैं अपने ही बाप को छोटा बच्चा समझ कर समझा रहा होऊं।

"हम मानते हैं कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया था।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन हमने कुल गुरु की बातों पर भरोसा भी इसी लिए किया क्योंकि वो हमारे कुल गुरु हैं और उन पर या उनकी किसी भी बात पर शक करना हम पाप समझते थे। ख़ैर अब जब कि हमें सच का पता चल गया है तो हम यही सोच रहे हैं कि वास्तव में भीषण कलियुग आ गया है, जिसके चलते अब हमें अपने ही पूज्य गुरु पर शक करना होगा वरना भरोसा करने की स्थिति में बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है।"

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।



━━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
वैभव अब एक समझदार और जिम्मेदार इंसान की तरह सोच रहा है। दादा ठाकुर भी उस पर भरोसा करने लगे है मगर क्या वो अकेला इस गुत्थी को सुलझा पाएगा। कुसुम को फसाने वाला/वाली और ये साजिश करने वाले एक ही तो नही है जो कई तरफ से एक साथ वार करना चाहते हो हवेली को नुकसान पहुंचाने के लिए। बहुत ही शानदार अपडेट।
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Wah kya baat Hai subham bhai.
Lagta hai vaibhav haweli ke gaddar ko dhoondh k rahega.
Or wo us nokrani ko pakad ke bhi pooch tach kar sakta hai.
Kaisa ho agar kusum use saxhai bata de or wo saboot ke tor pe use gawah bana ke dada thaur ke samne apne chachere bhaiyo k khilaaf Khada kar de??
Do Line tumhare liye:
Jab roobru aa hi gaya ek fool sa chehra,
Ek kali pe mana sabaab aaya tha,
sard hawa ke jhoke ne jhankor ke rakh diya,
Foolo ki basti me ek sailaab aaya Tha,
Ab kya kahe us deed ki pyasi chakori ko,
Ke apne "Raj" pe pyaar use Be-hisaab aaya tha.
 
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agmr66608

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भाई, बहुत शानदार अनुच्छेद उपहार दिये है हमें। अभी एक समझदार लेकिन रोबदार बैभव को देखने मिलेंगे। नेहले पे दहला, कौन जीतेगा या यूं कहेंगे की कोन कोन पिटेगा बैभब से ये देखने लायक होगा। शानदार वापसी किए है मित्र। अगला अनुच्छेद लगता है उस साहूकार का बेटा गौरव के नाम होगा। अगला अनुच्छेद के लिए प्रतीक्षा मे रहेंगे। धन्यबाद।
 
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