• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
  • Poll closed .

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
Dono hi updates behad shandar he TheBlackBlood Shubham Bhai,
Thanks
Kusum ka bachpana behad hi achcha laga..............zidd karke aakhir wo rupa se mil hi aayi...............itna sabkuch hone ke baad bhi ek behan ke prati vaibhav ke pyar me ratti bhar bhi kami nahi aayi...............
Kusum uski laadli bahan hai, bachpan se usko laad pyaar diya hai. Aise kaise uske prati uska pyar kam ho jayega. Dusri baat ye bhi hai ki ab wo bhi nahi chahta ki uske pariwar me koi man mutaav jaisi situation bane .
Aakhirkar vaibhav aur ragini ne apne apne dil ki sabhi taklife dur kar hi li..............aur sabse achcha ye raha ki dono hi is rishte ko lekar sehmat he.............ragini ke chehre ki laali is baat ka sabut he ki vo ab kisi bhi prakar ke sanshay me nahi he........
Ye to ek din hona hi tha. Aap log bhi ye scene dekhne ko aatur the... :D
Vaibhav ne rupchander ko uski bhabhi ke sath vivah karne ki salah to de di.................lekin kuch aisa laga ki main akela kyun fansu..........tum bhi sath me aao...........

Keep posting Bhai
Is bare me sab koi ek hi dialogue bole ja rahe ho is liye no comments....pahle hi bata chuka hu :beee:
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
Ye story ek trf or waki saari stories ek trf .......
Adhbhut story hai.....
Writer bhai aap wakai bht achhi or deep thinking rkhtey hai ..
Thanks for this awesome story...
Thanks bhai....bas koshish hai ki aisa likhu jise padh kar log behtar tarike se baato ko samajh sake,
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
Yahi baat mai bhi bolta hu lekin Bhai sahab ko yakin ni hota😁😁😁
Are bhai....Aisa nahi hai. Tareef sun kar khushi se gubbare ki tarah phool jata hu, yakeen na ho to Riky007 bhai se puch lo :D
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
Weating for next apdet
Bhai waiting likhne ki zarurat nahi hai, pahle hi bata chuka hu ki apni team ke sath company ke kaam me busy hu...time milta hai to aa ke update post kar deta hu :roll:
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
जबरदस्त कथा है... हर एक पात्र का वास्तविक चित्रण इतना अद्भुत है की नज़रों के सामने वह किरदार खड़े नजर आते है।

कथानक का आलेखन बेहद बारीकी से किया गया है। साथ में यह भी बखूबी ध्यान रखा है की वाचक की कभी भी रसक्षति ना हो!!

गाँव की पृष्ठभू वाली कहानी हमेशा अति-रोचक और रसप्रचुर होती है। ऐसे विवरण लिखना उन्ही के लिए मुमकिन होता है जिन्होंने इस प्रकार के जीवन को बखूबी जिया हो।

लेखक का अपनी भाषा पर शानदार प्रभुत्व है। जितनी सहजता से इस कहानी का निरूपण किया गया है, उसका लेखन उतना ही कठिन रहा होगा यह में अनुभव से कह सकता हूँ।

यूँ ही लिखते रहिए। आपकी लेखनी को नमन.. 🙏


प्यार बरकरार रहे :love3:
Thanks dost...

Haan thodi mushkil to hoti hai lekin likhne ka junoon aur dosto ka pyar mushkilo ko paar karwa hi deta hai. Jab dosto ke itne khubsurat reviews padhne ko milte hain to alag hi anand milta hai aur likhne ka josh badh jata hai...

Is forum me ab tak ka safar aise hi guzra hai. Apne achhe achhe doston ki badaulat. Anyway shukriya bhai....kahani ke aakhir me nazar aaye. Khair sath bane rahe, jaldi hi ye story complete hone wali hai :dost:
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
वैभव अब लगबग सामान्य तरीके से रहने लगा
रागिणी के साथ विवाह करने के विषय को सुगंधादेवी ने उसको अनेक तर्कवितर्क देकर उसके मन की द्विधा स्थिती को सामान्य करके विवाह के लिये तयार कर ही लिया पर वैभव ने अपनी माँ को एक बार चंदनपुर जाने का पुछा वहा भी हामी दे दी लेकीन क्या दादा ठाकुर परवानगी देगे
इधर रागिणी की सहेली शालिनी ने वैभव से विवाह के लिये भी उसे समझाया और उसने हा भी कह दी वही वैभव के बारें में शालिनी के कुछ कहने पर वो सब अच्छा ही बोलकर वैभव अब बदल गया है कही मुझे लगता है शालिनी को वंदना भाभी ने ही रागिणी के पास भेजा हैं कयी बार अपने मन की बात घर वालों से ज्यादा सहेली को बता कर मन हलका होता है खैर देखते हैं आगे क्या होता है
Thanks mitra
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
अध्याय - 153
━━━━━━༻♥༺━━━━━━




अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।


अब आगे....


वीरेंद्र सिंह ने खेतों में जा कर सबको मेरे आने की ख़बर दे दी थी इस लिए दोपहर तक सब आ गए थे। हाल चाल के बाद मैं सबके साथ खाना खाने बैठ गया था। सबके चेहरे खिले हुए थे। ख़ास कर इस बात के चलते कि रागिनी भाभी मुझसे ब्याह करने को राज़ी हो गईं थी और साथ ही उन्हें ये भी पता चल गया था कि मैं भी अपनी भाभी से ब्याह करने को राज़ी हूं।

खाना खाने के बाद हम सब बैठक में आ गए। बैठक में ससुर जी ने कहा कि वो दादा ठाकुर को अपनी बेटी के राज़ी होने की ख़बर भिजवाने का ही सोच रहे थे। यूं तो मेरे यहां आ जाने से वो मेरे द्वारा भी ये ख़बर भिजवा सकते हैं लेकिन फिर उन्होंने कहा कि इस तरह से ख़बर भिजवाना उचित नहीं होगा इस लिए वीरेंद्र सिंह मेरे साथ रुद्रपुर जाएगा। वहां पर वो ख़ुद अपनी बहन के राज़ी होने की ख़बर दादा ठाकुर को देगा।

क़रीब एक डेढ़ घंटा आराम करने के बाद वीरेंद्र सिंह ये कह कर खेतों की तरफ चला गया कि वो शाम होने से पहले ही आ जाएगा। उसके जाने के बाद ससुर जी भी किसी काम से चले गए। बैठक में अब मैं ही बचा था।

आज भाभी से बातें करने के बाद मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था। इसके पहले मन में जिन ख़यालों के चलते मैं खुद को अपराधी सा महसूस कर रहा था उससे अब मुक्ति सी मिल गई थी मुझे। मैं आंखें बंद करता तो बंद पलकों में भाभी का ख़ूबसूरत चेहरा चमक उठता था। एकाएक बंद पलकों में ही भाभी के साथ हुई बातों के दृश्य किसी चलचित्र की तरह चलने लगे।

"सच में सो रहे हैं या आंखें बंद किए किसी के हसीन ख़यालों में खोए हुए हैं महाराज?" एकाएक मेरे कानों में एक मधुर आवाज़ पड़ी तो मैंने पट्ट से आंखें खोल दी।

वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी खड़ीं थी। मुझे आंखें खोल कर अपनी तरफ देखता देख वो हल्के से मुस्कुराईं। उन्हें आया देख मैं भी उठ कर बैठ गया।

"आप कब आईं भाभी?" मैंने खुद को सम्हालते हुए उनसे पूछा।

"बस अभी ही आई हूं।" वंदना भाभी ने कहा____"आपको आंखें बंद किए लेटे देखा तो लगा सो गए हैं आप।"

"नहीं, ऐसी बात नहीं है।" मैंने कहा____"मुझे इतना जल्दी नींद नहीं आती।"

"क्यों भला?" भाभी मुस्कुराईं____"कहीं आंखें बंद किए अपनी होने वाली दुल्हन के हसीन ख़्वाब तो नहीं देख रहे थे आप?"

"ये..ये आप क्या कह रहीं हैं भाभी।" मैं बुरी तरह झेंप गया।

"आप नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं।" वंदना भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अच्छा ये तो बताइए कि अपनी होने वाली दुल्हन से आपने अच्छे से बात की या नहीं?"

उनके इस तरह पूछने पर मुझे शर्म सी महसूस हुई। जवाब में मैंने सिर्फ हां में सिर हिला दिया। मुझे समझ ही न आया कि क्या कहूं?

"अगर और बात करनी हो तो बेझिझक हो के बता दीजिए मुझे।" वंदना भाभी ने पूर्व की भांति ही मुस्कुराते हुए कहा____"इतनी दूर से मिलने आए हैं तो जी भर के देख लीजिए और जी भर के बातें कर भी लीजिए। वापस जाते समय मन में किसी तरह का मलाल नहीं रहना चाहिए।"

"ऐसी कोई बात नहीं है भाभी।" मैं शर्म तो महसूस कर ही रहा था किंतु साथ ही मुझे अजीब भी लग रहा था उनके ऐसा कहने पर____"उनसे मुझे जो कहना था कह चुका हूं।"

"तो क्या अब फिर से उनसे बात करने का अथवा उन्हें देखने का मन नहीं कर रहा आपका?" वंदना भाभी जैसे मुझे छेड़ने से बाज नहीं आ रहीं थी____"वैसे जब तक आपसे उनका ब्याह नहीं हो जाता तब तक तो वो आपकी भाभी ही हैं तो इसी नाते से आप उनसे बात कर सकते हैं।"

"उनकी जगह कोई और होता तो बेशक मैं बात करता और देखता भी।" मैंने कहा____"लेकिन उनसे मेरा बहुत ही साफ और पवित्र भावनात्मक रिश्ता रहा है। बड़ी मुश्किल से मैं उनसे अपने दिल की सच्चाई बता पाया हूं। अब अगर फिर से उनसे मिलने की बात कहूंगा तो जाने वो क्या सोच बैठेंगी मेरे बारे में। इस लिए मैं ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहता जिससे कि उन्हें मेरे किसी आचरण से धक्का लगे अथवा उनका मन दुखी हो जाए।"

"वाह! आप तो सच में बदल गए हैं महाराज।" वंदना भाभी ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और यकीन मानिए आपका बदला हुआ ये रूप देख कर और अपनी भाभी के प्रति आपकी ये बातें सुन कर व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत ही अच्छा लगा है।"

"मैं नहीं जानता कि मैं कितना बदल गया हूं अथवा मुझमें कोई अच्छाई आई है या नहीं।" मैंने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन इतना दावे के साथ कहता हूं कि मुझे अच्छा इंसान बनने के लिए मुझ पर ज़ोर डालने वाली मेरी भाभी ही थीं। हर क़दम पर मेरा मार्गदर्शन करने वाली वही थीं। मेरे अंदर हर किसी के प्रति कोमल भावनाएं पैदा करने वाली वही थीं। मेरी मुश्किलों को आसान बनाने वाली मेरी भाभी ही थीं। मेरे दुख में हद से ज़्यादा दुखी हो जाने वाली और मुझे अपने सीने से लगा कर मुझे सम्हालने वाली वहीं थी। मेरे मन में उनके प्रति बहुत ही ज़्यादा श्रद्धा भाव है। मैं अगर अपनी देवी समान भाभी के बारे में ग़लत ख़याल लाऊंगा तो समझिए इस धरती पर मुझसे बड़ा नीच और पापी कोई नहीं हो सकता। मेरी बस एक ही चाहत है कि मेरी भाभी हमेशा खुश रहें। उनकी खुशी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं।"

"आपको ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है महाराज।" वंदना भाभी ने अधीरता से कहा____"रागिनी के द्वारा मैं पहले ही आपके बारे में ये सब जान चुकी हूं और समझ चुकी हूं कि आप उनके प्रति क्या सोचते हैं। मेरी ननद का चरित्र शुरू से ही बेहद साफ और पवित्र रहा है। वो कभी किसी पर पुरुष का ख़याल अपने मन में नहीं लाईं। विधवा होने के बाद जब आपसे उनका ब्याह होने का उन्हें पता चला तो बहुत धक्का लगा था उन्हें। पिछले काफी दिनों से हम उन्हें हर तरह से समझाते आए हैं तब जा कर उन्हें इस रिश्ते के लिए राज़ी कर पाए हैं। वो यही कहती थीं कि जिसे उन्होंने हमेशा अपने देवर और अपने छोटे भाई की नज़र से देखा है उसको अचानक से पति की नज़र से कैसे देखूं? जब आपको पता चलेगा तो आप क्या सोचेंगे अपनी भाभी के बारे में? यही सब बातें सोचते हुए वो दुखी हो जातीं थी। मेरी भी यही दिली तमन्ना थी कि रागिनी जैसी उत्तम चरित्र वाली लड़की को उत्तम चरित्र वाला लड़का ही जीवन साथी के रूप में मिले। सच कहूं तो जिस तरह से आप बदल गए हैं और आपकी सोच तथा विचाराधारा इतनी अच्छी हो गई उससे मुझे बहुत खुशी हुई है। अब मुझे यकीन हो गया है कि उन्हें जिस तरह का जीवन साथी मिलना चाहिए था वो आपके रूप में मिल गया है।"

"आप मुझे बहुत ज़्यादा बड़ा बना रही हैं भाभी।" मैंने कहा____जबकि मैं अभी भी कुछ नहीं हूं। भाभी को अपनी पत्नी के रूप में पाना मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य होगा लेकिन सच ये है कि मैं उनके लायक कभी नहीं हो सकता। वो आसमान का चमकता हुआ चांद हैं और मैं धरती में पड़ा एक मामूली सा कंकड़।"

"हाय! क्या बात कह दी आपने।" वंदना भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"काश! हमें भी कोई आसमान का चांद कहता।"

"वीरेंद्र भैया के लिए आप आसमान का चांद ही हैं भाभी।" मैंने सहसा हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"क्या वो आपको ऐसा नहीं कहते?"

"कैसे कहेंगे महाराज?" वंदना भाभी ने आह सी भरी____"आसमान में चांद तो एक ही होता है ना और वो चांद मेरी ननद रानी हैं जो आपको मिलने वाली हैं।"

मैं बस मुस्कुरा कर रह गया। मेरे अंदर अजीब सी गुदगुदी होने लगी थी। दिल में एक मीठा सा एहसास होने लगा था। आंखों के सामने भाभी का ख़ूबसूरत चेहरा चमक उठा।

थोड़ी देर और वंदना भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। मैं भी पलंग पर वापस लेट कर उनकी बातों के बारे में सोचने लगा। अभी कुछ ही देर हुई थी कि अंदर से फिर कोई आ गया। मैंने आंखें खोल कर देखा तो कामिनी पर मेरी नज़र पड़ी।

"ओहो! आप हैं? कैसी हैं कामिनी जी?" मैंने उठ कर उससे पूछा___"आइए बैठिए।"

"वाह जी वाह! आज तो आप बड़ी इज्ज़त दे रहे हैं मुझे?" कामिनी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा और फिर आ कर दूसरे पलंग पर मेरे सामने बैठ गई।

"इज्ज़त तो मैं पहले भी देता था आपको।" मैं हल्के से मुस्कुराया____"आपको ही ग़लत लगता था तो क्या करें?"

"ग़लत जो होता है वो ग़लत ही लगता है जीजा जी।" कामिनी ने कहा____"ख़ैर जाने दीजिए, वैसे आज आपने मुझे सच में हैरान कर दिया है।"

"अच्छा जी, मैंने ऐसा क्या कर दिया?" मैं चौंक सा गया।

"वंदना भाभी से आपने जो बातें की और जिस तरीके से की उन्हें सुन कर मैं सच में हैरान थी।" कामिनी ने कहा____"माफ़ कीजिए, वो मैं दरवाज़े के पीछे ही खड़ी आप दोनों की बातें सुन रही थी। वैसे अच्छा ही हुआ कि मैंने आपकी बातें सुनी वरना कैसे जान पाती कि आप कितना बदल गए हैं।"

"ऐसा शायद इस लिए हुआ है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"क्योंकि कामिनी जी से मोहब्बत करने पर मुझे उनकी मोहब्बत नहीं मिली। सुना है जब दिल टूट जाता है तो इंसान की सोच ऐसी ही हो जाती है।"

"ओह! ऐसा है क्या?" कामिनी मेरी उम्मीद के विपरीत मुस्कुरा उठी____"फिर तो ये अच्छा ही हुआ कि आपको मेरी मोहब्बत नहीं मिली और आपका दिल टूट गया। कम से कम इसी बहाने आप सुधर तो गए।"

"बहुत ज़ालिम हो आप।" मैंने कहा____"किसी का दिल तोड़ना अच्छी बात नहीं होती है।"

"अगर दिल तोड़ने से सामने वाला सुधर जाए और एक अच्छा इंसान बन जाए।" कामिनी ने कहा____"तो यकीन मानिए मैं सौ बार नहीं बल्कि हज़ारों बार दिल तोड़ने वाला ही काम करूंगी।"

"दिल तोड़ना हुस्न वालों की अदा होती है।" मैंने गहरी सांस ली____"और आप में वो अदा कूट कूट कर भरी हुई है। ख़ैर कोई बात नहीं, ये बताइए कि उस दिन आपने मुझसे झूठ क्यों बोला था?"

"झूठ???" कामिनी चौंकी____"मैंने क्या झूठ बोला था आपसे?"

"भाभी के ब्याह के बारे में ग़लत बताया था आपने मुझे।" मैंने शिकायती लहजे से कहा____"आपको तो पहले से ही सब पता था ना तो आपने मुझे उस दिन सब कुछ सच सच क्यों नहीं बताया था?"

"आपने पूछा ही नहीं।" कामिनी शरारती अंदाज़ से मुस्कुराई____"वैसे भी मैं तो ये देखना चाहती थी कि दीदी के ब्याह वाली बात सुन कर आप पर क्या असर होता है?"

"सच में बहुत ज़ालिम हो।" मैंने कहा____"एक बार भी नहीं सोचा कि आपकी उन बातों से मुझे दिल का दौरा भी पड़ सकता था।"

"अच्छा, क्या सच में?" कामिनी ने हल्के से हंस कर कहा____"ठाकुर वैभव सिंह इतने कमज़ोर दिल के हैं क्या?"

"हाय! राम।" अचानक सुलोचना देवी की इस आवाज़ से हम दोनों ही चौंके, उधर उन्होंने कामिनी से कहा____"कुछ तो शर्म कर। ये क्या बोल रही है अपने जीजा जी को?"

"मैंने ऐसा क्या बोल दिया मां?" कामिनी ने कहा____"मैं तो बस जीजा जी से थोड़ा मज़ाक कर रही थी।"

"अच्छा।" सुलोचना देवी ने उसे घूरा____"इसके पहले तो कभी मज़ाक नहीं करती थी इनसे। पहले तो हमेशा गुस्सा ही करती थी और इनसे झगड़ती ही रहती थी। अब अचानक से मज़ाक कैसे करने लगी तू?"

"लीजिए जीजा जी।" कामिनी ने मुझसे मुखातिब हो कर कहा____"आपकी सासू मां तो अभी से आपका पक्ष लेने लगीं। बेटी ने कुछ कहा भी नहीं फिर भी डांट मिल गई।"

"चुप कर।" सुलोचना देवी ने कहा____"और अंदर जा कर चाय बना अपने जीजा जी को। थोड़ी देर में वीरेंद्र भी आ जाएगा। उसे महाराज के साथ रुद्रपुर जाना है। दिन ढलते ही ठंड बढ़ने लगती है इस लिए समय रहते ये दोनों चले जाएंगे तो अच्छा रहेगा।"

कामिनी उठी और मुझे घूरते हुए अंदर चली गई। मैं उसके घूरने पर बस मुस्कुरा कर रह गया। मैं सच में इस बात से हैरान था कि कामिनी का मेरे प्रति बर्ताव अचानक से इस तरह नर्म कैसे हो गया था? इसके पहले तो उसका मुझसे छत्तीस का ही आंकड़ा रहता था।

"उसकी बातों का बुरा मत मानिएगा महाराज।" उधर सुलोचना देवी ने मुझसे बड़े ही प्रेम भाव से कहा____"वो बड़ी ज़रूर हो गई है लेकिन भेजे में रत्ती भर का भी दिमाग़ नहीं है उसमें।"

"अरे! नहीं मां जी।" मैंने कहा____"मुझे उनकी बातों का बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा है। वैसे भी हम दोनों के बीच थोड़ी सी नोक झोंक ही चल रही थी। वैसे मैं इस बात से हैरान ज़रूर हूं कि इस समय वो मुझसे बड़े ही नर्म और तरीके से ही बातें करने लगी हैं। जबकि इसके पहले तो वो हमेशा मुझसे गुस्सा ही रहती थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि अचानक से उनमें मेरे प्रति इतना बदलाव कैसे हो गया है?"

"मैं क्या बताऊं बेटा?" सुलोचना देवी ने कहा____"मुझे भी उसके बर्ताव से हैरानी हुई है। पता नहीं उसमें ये बदलाव कहां से और कैसे आ गया है? ख़ैर आप बैठिए, मैं ज़रा देखूं वो आपके लिए चाय बनाने गई भी है या अपने कमरे में लंबा तान कर लेट गई है?"

मैंने बस सिर हिला दिया जिसके बाद वो पलट कर अंदर की तरफ बढ़ गई। क़रीब दस मिनट बाद अंदर से किसी के आने की आहट हुई तो मैं सम्हल कर बैठ गया।

अगले कुछ ही पलों में मेरी उम्मीद के विपरीत रागिनी भाभी हाथ में ट्रे लिए आईं और मेरे सामने खड़ी हो गईं। मैं थोड़ी हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा, उधर उनके चेहरे पर हल्के शर्म के भाव उभर आए थे।

"ए..ऐसे क्यों देख रहे हो?" उन्होंने धीमें स्वर में कहा तो मैं एकदम से हड़बड़ा सा गया और फिर खुद को सम्हालते हुए जल्दी ही उनसे नज़र हटा कर ट्रे में से चाय का कप उठा लिया।

"वो मां ने कहा कि मैं ही तुम्हें चाय देने जाऊं।" भाभी ने कहा____"इस लिए मुझे ही आना पड़ा।"

"ये तो बहुत ही अच्छा हुआ मेरे लिए।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"इसी बहाने कम से कम अपनी प्यारी सी भाभी को एक बार फिर से देख लिया मैंने।"

मेरी ये बात सुन कर भाभी ने शर्म के चलते अपनी नज़रें झुका लीं। उनके होठों पर इस बार बारीक सी मुस्कान उभर आई जिसे जल्दी ही उन्होंने छुपा लेने की नाकाम कोशिश की।

"एक बात पूछूं?" फिर उन्होंने हल्के से नज़रें उठा कर धीमें स्वर में मुझसे कहा।

"जी बिलकुल पूछिए।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ उनकी तरफ देखा____"आपको मुझसे कुछ भी पूछने के लिए इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है।"

"अ...अब भाभी क्यों कहते हो मुझे?" भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए थोड़े झिझक के साथ पूछा।

"तो क्या नहीं कहना चाहिए मुझे?" मैंने थोड़ी हैरानी से उन्हें देखा।

"ह...हमारे बीच एक दूसरा रिश्ता तय हो चुका है।" भाभी ने उसी झिझक के साथ कहा____"उस हिसाब से क्या अब तुम्हें मुझको भाभी कहना ठीक लगता है?"

"ओह! हां, पर अभी सिर्फ रिश्ता ही तो तय हुआ है।" मैंने अपलक उनकी तरफ देखते हुए कहा____"जिस दिन आपसे मेरा विवाह हो जाएगा उस दिन से आपको भाभी कहना बंद कर दूंगा।"

"हम्म्म्म।" भाभी ने धीमें से कहा____"फिर क्या कहा करोगे मुझे?"

"आपको जो सुनना अच्छा लगेगा वही कहूंगा।" मैंने धड़कते दिल से किंतु बड़े नम्र भाव से कहा____"हमारे बीच चाहे जो रिश्ता हो जाए अथवा चाहे जैसी भी परिस्थितियां आ जाएं मेरे मन में आपके लिए वैसा ही आदर सम्मान रहेगा जैसा हमेशा से रहा है।"

मेरी ये बात सुन कर भाभी अपलक देखने लगीं मुझे। उनके चेहरे पर कई तरह के भाव उभरे और फिर गायब होते नज़र आए। समंदर सी गहरी आंखों में कुछ झिलमिलाता हुआ नज़र आया मुझे।

"एक बात और।" मुझे सहसा कुछ याद आया तो मैंने कहा____"आप इस सबके बाद भी मुझे पूरे हक के साथ डांट सकती हैं, छेड़ सकती हैं, मेरी टांगें खींच सकती हैं और कहीं ग़लती करूं तो मेरी पिटाई भी कर सकती हैं।"

"य...ये क्या कह रहे हो?" भाभी का गला भर आया। पलक झपकते ही आंखों में आंसू तैरते नज़र आने लगे।

"मैं सिर्फ ये चाहता हूं कि आप हमेशा मेरे साथ सहज रहें।" मैंने अधीरता से कहा____"और वो सब कुछ करें जिससे आपको ख़ुशी मिले।"

भाभी ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं। जैसे ही उनकी आंखें बंद हुईं तो आंसू के कतरे पलकों की झिरी से निकल कर उनके गुलाबी गालों पर टप्प से गिर आए जो एक लंबी लकीर भी बना गए। ये देख मैं एकदम से चौंका और थोड़ा घबरा भी गया।

"अरे! क्या हुआ आपको?" मैं उसी घबराहट में पूछ बैठा____"क्या मैंने कुछ ग़लत कह दिया आपको? अगर ऐसा है तो माफ़ कर दीजिए मुझे।"

"नहीं नहीं।" भाभी ने आंखें खोल कर झट से कहा____"तुमने कुछ ग़लत नहीं कहा है। ये...ये आंसू तो बस ये सोच के छलक पड़े हैं कि तुम इस सबके बाद भी मुझे इतना सम्मान दे रहे हो।"

"वो तो मैं हमेशा दूंगा।" मैंने कहा____"और मेरी भी आपसे एक विनती है कि आप भी मुझे कभी भटकने मत देना।"

मेरी बात सुन कर भाभी ने हां में सिर हिलाया। उनके चेहरे पर वेदना जैसे भाव उभर आए थे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके अंदर बहुत कुछ चलने लगा था जिसे वो बड़ी मुश्किल से काबू में करने का प्रयास कर रहीं थी। ख़ैर कुछ ही देर में वो मेरा चाय का खाली कप ले कर चली गईं। इस बार भाभी से बातें करने में मुझे ज़्यादा झिझक नहीं हुई थी। एक अलग ही सुखद एहसास हो रहा था।

कुछ देर में वीरेंद्र सिंह खेतों से आ गया। हाथ मुंह धोने के बाद वो मेरे पास ही आ कर बैठ गया। कामिनी उसके लिए चाय ले आई। ऐसे ही थोड़ा और समय गुज़रा। वीरेंद्र के पिता जी, चाचा जी और उनके दोनों बेटे भी आ गए। थोड़ी देर इधर उधर की बातों के बाद चलने का समय हो गया। वीरेंद्र सिंह को क्योंकि मेरे साथ ही जाना था इस लिए वो जल्दी ही कपड़े पहन कर आ गया।

सभी घर वालों ने आ कर मेरे पांव छुए और विदाई दी। उसके बाद मैं और वीरेंद्र सिंह अपनी अपनी जीप में चल पड़े। पूरे रास्ते मैं भाभी से हुईं बातों और मुलाक़ातों के बारे में सोचता रहा और जाने कैसे कैसे अद्भुत एहसास में खोता रहा। क़रीब सवा घंटे में हम हवेली पहुंच गए।




━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
80,603
118,549
354
अध्याय - 154
━━━━━━༻♥༺━━━━━━





मेरे साथ वीरेंद्र सिंह को आया देख पिता जी थोड़ा हैरान से नज़र आए। उन्होंने बड़े ध्यान से मुझे और वीरेंद्र सिंह को देखा। उधर वीरेंद्र सिंह ने झुक कर पिता जी पांव छुए। मैं चुपचाप अंदर की तरफ चला गया।

जल्दी ही ये ख़बर हवेली के अंदर फैल गई कि चंदनपुर से रागिनी भाभी के बड़े भैया यानि वीरेंद्र सिंह आए हैं। मां तो लगभग भागते हुए मेरे पास आईं और फिर सारा हाल समाचार पूछने लगीं। ख़ास कर ये कि वीरेंद्र सिंह मेरे साथ किस सिलसिले में यहां आया है? मां के पूछने पर मैंने उन्हें बता दिया कि वो पिता जी को ये बताने आए हैं कि भाभी मेरे साथ ब्याह करने को राज़ी हो गईं हैं।

मेरे मुख से ये बात सुनते ही मां के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई। इतने दिनों में पहली बार मैं उनके चेहरे को खुशी से जगमगा उठा देख रहा था। मां को इस बात की इतनी खुशी हुई कि वो खुद को सम्हाल न सकीं बल्कि फ़ौरन ही सबको बताने लगीं कि उनकी बेटी रागिनी ने ब्याह की मंजूरी दे दी है। मां की ये बात सुन कर मेनका चाची, कुसुम और निर्मला काकी के चेहरे भी खिल उठे।

बहरहाल, वीरेंद्र सिंह का स्वागत सत्कार शुरू हो चुका था। मैं ऊपर अपने कमरे में आ कर कपड़े बदल कर पलंग पर लेट गया। मैं सोचने लगा कि भाभी के राज़ी होने की बात सुन कर मां कितना खुश हो गईं हैं। आज काफी दिनों बाद उनके चेहरे पर सच्ची खुशी देखा था मैंने। ज़ाहिर है यही हाल पिता जी का भी हुआ होगा जब वीरेंद्र सिंह ने उन्हें ये बताया होगा कि उनकी बहन मुझसे ब्याह करने को राज़ी हो गई है।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी कमरे में कुसुम आ गई। मेरे पास आ कर उसने मुझे चाय दी और फिर मेरे पास ही बैठ गई। उसके चेहरे पर खुशी छाई हुई थी और होठों पर मुस्कान।

"क्या हुआ?" मैंने उसे मुस्कुराते हुए देखा तो पूछा____"किस बात से इतना मुस्कुरा रही है?"

"वो मैं ना बहुत खुश हूं इस लिए।" उसने अपने ही अंदाज़ में कहा____"आपको पता है सुबह जब आप चंदनपुर चले गए थे तो बड़ी मां ने सबको बताया कि भाभी का फिर से ब्याह करने का फ़ैसला किया है ताऊ जी ने। उनकी बात सुन कर हम सब बड़ा हैरान हुए। फिर जब मां ने उनसे पूछा कि भाभी का ब्याह कहां और किसके साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो बड़ी मां ने बताया कि आपके साथ।"

"ओह! मतलब हवेली में ये बात बाकी सबको आज ही पता चली है?" मुझे बड़ी हैरानी हुई।

"हां।" कुसुम ने कहा____"बड़ी मां ने बताया कि ये सब अचानक से ही सोच कर फ़ैसला किया गया है। वो चाहते हैं कि भाभी का जीवन फिर से संवर जाए और वो खुश रहें इस लिए उनका ब्याह करने का फ़ैसला किया है उन्होंने। उनका आपसे ब्याह करने का फ़ैसला इस लिए किया गया है ताकि भाभी जैसी बहू हमेशा इस हवेली में ही रहें।"

"मुझे भी इस बारे में पहले कुछ नहीं पता था गुड़िया।" मैंने चाय का एक घूंट लेने के बाद कहा____"अभी कुछ दिन पहले ही मां से पता चला था। ख़ैर तू ये सब छोड़ और ये बता कि कल वहां तू मिली अपनी होने वाली भाभी से?"

"हां भैया।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"पहले तो उनके घर के बाकी लोगों से ही मिली फिर बाद में भाभी से मिली। भाभी मुझे अपने कमरे में ले गईं थीं।"

"ओह! तो फिर क्या बातें की तूने उससे?" मैंने उत्सुकतावश पूछा।

"मैंने तो बहुत सारी बातें की थी उनसे।" कुसुम ने कहा____"लेकिन अब याद नहीं कि क्या क्या बातें की थी मैंने, पर इतना याद है कि मैं ही बोले जा रही थी और वो बस हां हूं ही कर रहीं थीं।"

"वाह! क्या बात है।" मैं मन ही मन मुस्कुरा उठा____"मतलब तेरे सामने तेरी होने वाली भाभी की बोलती ही बंद थी?"

"अरे! ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" कुसुम एकदम से चौंक कर बोली____"उनकी बोलती नहीं बंद थी, वो तो मैं ही बोले जा रही थी इस लिए वो बेचारी हां हूं ही करती रहीं। सारी मेरी ही ग़लती थी, बाद में मुझे एहसास हुआ कि मुझे उनको भी बोलने का मौका देना चाहिए।"

"अच्छा ये तो बड़ी समझदारी दिखाई तूने।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"ख़ैर तो फिर तूने क्या उसे मौका दिया?"

"और तो नहीं क्या?" कुसुम ने हाथ झटकते हुए कहा____"मैंने उनसे कहा कि अब वो भी कुछ बोलें। तब फिर वो बोलीं, मेरा हाल चाल पूछने लगीं और भी बहुत कुछ। पूरा मुझे याद नहीं है।"

"ओह! चल कोई बात नहीं।" मैंने कहा____"तुझे ये तो याद है ना कि तुझे उससे मिल के कैसा लगा था?"

"अरे! मैं इतनी भी भुलक्कड़ नहीं हूं जितना आप समझ रहे हैं।" कुसुम ने पहले बुरा सा मुंह बनाया फिर खुश होते हुए बोली____"मुझे अपनी होने वाली भाभी से मिल के और उनसे बात कर के बहुत अच्छा लगा था। वैसे भैया ये कितनी हैरानी वाली बात है ना कि आपकी शादी दो दो से होगी। मतलब मेरे दो दो भाभियां हो जाएंगी।"

"अब क्या कहूं गुड़िया।" मैंने कहा____"तेरे नसीब में दो दो भाभियां ही लिखीं हैं।"

"मुझे तो इस बात की खुशी है भैया कि मेरी सबसे अच्छी वाली भाभी का फिर से ब्याह होगा।" कुसुम ने खुशी से चहकते हुए कहा____"और वो फिर से नई नवेली दुल्हन बन कर और मेरी भाभी बन कर इस हवेली में आ जाएंगी। वैसे उनसे आपकी शादी कब होगी भैया?"

"मुझे क्या पता?" मैंने कहा____"इस बारे में मां और पिता जी ही जानें।"

थोड़ी देर बाद कुसुम चाय का खाली कप ले कर चली गई। उसके जाने के बाद मैं भी आराम से पलंग पर लेट गया और अपनी होने वाली दो दो बीवियों के बारे में सोचने लगा।

✮✮✮✮

बैठक में वीरेंद्र सिंह से बातें हो ही रहीं थी कि तभी दरबान ने आ कर कहा कि ठाकुर महेंद्र सिंह आए हैं। दादा ठाकुर के कहने पर दरबान फ़ौरन ही बाहर गया और फिर कुछ ही पलों में वो महेंद्र सिंह को ले के आ गया।

महेंद्र सिंह का इस वक्त यूं अचानक से आ जाना दादा ठाकुर के मन में कई तरह के विचार पैदा कर गया था। बहरहाल उन्होंने एक नौकरानी को बुला कर महेंद्र सिंह के लिए चाय लाने को कहा।

"और बताइए मित्र?" दादा ठाकुर ने महेंद्र सिंह से मुखातिब हो कर कहा____"शाम के इस वक्त अचानक से यहां कैसे आना हुआ? सब ठीक तो है ना?"

"सब ठीक ही है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा____"इस वक्त आपके पास हम एक ख़ास सिलसिले में आए हैं। असल में बात ये है कि आज हमारे छोटे भाई ज्ञानेंद्र के बेटे का जन्मदिन है। आज से वो दो साल का हो गया है। हम घर पर थे नहीं क्योंकि एक ज़रूरी काम से कहीं गए हुए थे और वापस लौटने की भी उम्मीद नहीं थी। इस चक्कर में ज्ञानेंद्र ने अपने बेटे के जन्मदिन पर कोई ख़ास कार्यक्रम भी नहीं रखा था। अभी एक घंटे पहले जब हम वापस आ गए तो हमें इस सबका पता चला। हमारे ही ज़ोर देने पर जल्दी जल्दी में कार्यक्रम का आयोजन शुरू किया गया। इस खुशी के मौके पर हमारे मित्र यानि आप ना हों ऐसा हो ही नहीं सकता था इस लिए हम फ़ौरन ही आपको लेने यहां आ गए।"

"ओह! ये तो बड़ी खुशी की बात है मित्र।" दादा ठाकुर ने मन ही मन राहत की सांस लेते हुए कहा____"हम ज़रूर आपके साथ बच्चे के जन्मदिन पर चलेंगे और आप सबकी ख़ुशी पर शरीक होंगे।"

"हमें आपसे यही उम्मीद थी ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने खुश हो कर कहा____"आप हमेशा हमारे आग्रह पर हमारी खुशी में शामिल होते रहे हैं। माना कि पिछले कुछ समय से हालात ठीक नहीं थे जिसके चलते आप थोड़ा व्यथित थे किंतु फिर भी हमें पूरी उम्मीद थी कि आप हमारे आग्रह को ठुकराएंगे नहीं।"

"इंसान के जीवन में सुख दुख और उतार चढ़ाव तो बने ही रहते हैं मित्र।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ले कर कहा____"पिछले कुछ समय से हम सब जिस तरह के हालातों में घिरे हुए थे उससे यकीनन बहुत प्रभाव पड़ा है लेकिन अब तो जैसे इसके आदी हो गए हैं हम। ख़ैर, हम आपके साथ ज़रूर चलेंगे।"

"हमारा आपसे एक और आग्रह है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"और वो ये कि रात आप हमारे यहां ही रुकेंगे। बात ये है कि कार्यक्रम को देखने सुनने में रात ज़्यादा गुज़र जाएगी जिसके चलते आपका रात के उस समय वापस लौटना उचित नहीं होगा। इस लिए हम चाहते हैं कि रात आप हमारे यहां ही गुजारें। सुबह नाश्ता पानी करने के बाद आप वापस आ जाइएगा यहां।"

"वैसे तो हमें रात के किसी भी वक्त वापस लौटने में कोई समस्या नहीं होगी मित्र।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन आप कहते हैं तो हम आपके यहां ही रुक जाएंगे।"

कुछ देर और इधर उधर की बातें हुईं उसके बाद महेंद्र सिंह के कहने पर दादा ठाकुर उठ कर बैठक से तैयार होने के लिए अंदर अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। क़रीब पंद्रह मिनट बाद वो आए।

"किशोरी लाल जी यहां सभी का ख़याल रखिएगा।" दादा ठाकुर किशोरी से कहने के साथ ही वीरेंद्र सिंह से मुखातिब हुए____"और बेटा तुम कुछ दिन यहीं रुकोगे। हम कल सुबह जल्द ही वापस आने का प्रयास करेंगे।"

"माफ़ कीजिए दादा ठाकुर जी लेकिन मैं यहां रुक नहीं सकूंगा।" वीरेंद्र सिंह ने थोड़ा झिझक के साथ कहा____"आप तो जानते हैं कि खेती बाड़ी में सब कुछ मुझे ही देखना पड़ता है। पिता जी घुटने के बात के चलते ज़्यादा मेहनत वाला काम नहीं कर पाते हैं। वैसे भी इस समय खेतों में जंगली जानवर और मवेशियों ने बहुत उत्पात मचा रखा है जिसके चलते रात में भी रखवाली करनी पड़ती है। आप जाएं, मैं सुबह आपके आने तक यहीं रुका रहूंगा। उसके बाद ही यहां से जाऊंगा।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर हम तुम्हें रुकने के लिए ज़ोर नहीं देंगे।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर, तुम किशोरी लाल जी के पास बैठो और बातें करो, या फिर अंदर बाकी सबसे मिलो। हम अब जा रहे हैं, सुबह जल्दी ही वापस आने की कोशिश करेंगे।"

कहने के साथ ही दादा ठाकुर बैठक से बाहर निकल गए। उनके पीछे महेंद्र सिंह भी चल पड़े। थोड़ी ही देर में दादा ठाकुर महेंद्र सिंह की जीप में बैठ कर चले गए।

✮✮✮✮

रागिनी अपनी भाभी वंदना के साथ रसोई में सबके के लिए खाना बनाने में उनका हाथ बंटा रही थी। जब से रागिनी आई थी तब से ज़्यादातर वही वंदना के साथ रसोई में खाना बनाने में हाथ बंटाती थी। इसके पहले कामिनी अपनी भाभी का हाथ बंटाया करती थी। शुरुआत में जब रागिनी रसोई में आई तो कामिनी ने उसको काम करने से मना किया था लेकिन रागिनी ने कहा कि अब से वो आराम करे और वो खुद अपनी भाभी के साथ सबके लिए खाना बनाया करेगी।

कामिनी शुरू से ही अपनी रागिनी दीदी को बहुत चाहती थी। ऊपर वाले ने जब उसकी दीदी पर इतना बड़ा दुख बरपाया तो उसे भी बहुत दुख हुआ था। उसका बड़ा भाई वीरेंद्र सिंह जब रागिनी को यहां ले कर आया था तो रो रो कर सबका बुरा हाल हो गया था। उसकी मां सुलोचना देवी को तो शहर ही ले जाना पड़ गया था। आख़िर बड़ी मुश्किल से सब सम्हले थे। सब रागिनी का ख़याल रखते थे। कामिनी ज़्यादातर अपनी दीदी के साथ ही रहने की कोशिश करती थी और उसका मन बहलाने की कोशिश करती थी। वैभव से रागिनी का ब्याह होने की बात जब उसको पता चली थी तो उसे बड़ा तेज़ झटका लगा था। हालाकि उसके मन में वैभव के बारे में जो छवि बनी हुई थी वो अब बहुत हद तक मिट चुकी थी। ऐसा इस लिए क्योंकि रागिनी के द्वारा उसको पता चल चुका था कि वैभव अब पहले जैसा नहीं रहा। अपनी दीदी के साथ रहने से उसे वैभव से संबंधित बहुत सी ऐसी बातों का पता चल गया था।

कामिनी को जब रागिनी ने ये बताया था कि वैभव अनुराधा नाम की एक लड़की से बहुत ज़्यादा प्रेम करता था और उससे ब्याह भी करना चाहता था तो उसको बड़ा आश्चर्य हुआ था। फिर जब रागिनी ने ये बताया कि अभी कुछ समय पहले ही अनुराधा की हत्या हो चुकी है तो कामिनी को ये सुन कर झटका लगा था और साथ ही वैभव के प्रति सहानुभूति भी हुई थी। रागिनी ने उसे रूपा के बारे में भी सब कुछ बताया था। ये सारी बातें सुनने के बाद कामिनी शुरू शुरू में बहुत हैरान होती थी। ऐसे ही धीरे धीरे उसके मन से वैभव के प्रति नफ़रत ख़त्म हो गई थी। वो चकित थी कि वैभव जैसा लड़का जो हमेशा अय्याशियां ही करता था वो इस क़दर बदल गया था। यही वजह थी कि जब वैभव यहां आया तो उसने उसे ख़ुद परखना चाहा था।

"अब तक तो तुम्हारे सास ससुर को पता चल ही चुका होगा कि तुम वैभव के साथ ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई हो।" वंदना ने हल्के से मुस्कुराते हुए रागिनी से कहा____"मुझे यकीन है कि तुम्हारे भैया के मुख से ये ख़बर सुनने के बाद वहां सब लोग बहुत ही ज़्यादा खुश हो गए होंगे।"

वंदना की ये बातें सुन कर रागिनी कुछ न बोली। कदाचित उसे समझ ही नहीं आया कि क्या कहे? ये अलग बात है कि उसके सुंदर चेहरे पर लाज की हल्की सुर्खी छा गई थी।

"क्या हुआ?" वंदना ने उसी मुस्कान के साथ कहा____"अब चुप मत रहो मेरी लाडो। कुछ तो बोलो, मेरे होने वाले जीजा जी के बारे में सोच कर अब कैसा महसूस होता है तुम्हें?"

"क्या भाभी, कुछ भी बोलती हैं आप?" रागिनी बुरी तरह झेंपते हुए बोल पड़ी। चेहरे पर छाई लाज की सुर्खी में पलक झपकते ही इज़ाफा हो गया।

"अच्छा जी।" वंदना की आंखें फैलीं____"तो अब मैं कुछ भी बोल रही हूं...हां?"

"और नहीं तो क्या।" रागिनी ने खुद को सम्हालते हुए कहा____"मैंने इस रिश्ते के लिए मंजूरी दी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मैं किसी के बारे में कुछ सोचने लगी हूं। मेरे लिए तो अभी भी उस बारे में सोचना बहुत ही ज़्यादा असहज करने वाला और शर्मिंदगी भरा है।"

"अब छोड़ो भी रागिनी।" वंदना ने कहा____"यूं बहाने मत बनाओ। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि तुमने इस रिश्ते को मंजूरी तभी दी है जब तुमने इस रिश्ते के लिए खुद को पूरी तरह से तैयार कर लिया है। इस वक्त तुम ऐसा इस लिए कह रही हो क्योंकि तुम्हें इस बारे में बात करने से शर्म आ रही है। कह दो भला कि ये सच नहीं है?"

रागिनी बगले झांकने लगी। शर्म से उसका चेहरा जो पहले से ही सुर्ख पड़ा हुआ था वो और भी ज़्यादा लाल पड़ गया। वंदना उसकी ये हालत देख कर बरबस ही मुस्कुरा उठी। उसे अपनी ननद रागिनी पर बहुत ज़्यादा प्यार आया। वो जानती थी कि रागिनी के लिए इस रिश्ते को स्वीकार करना बहुत ही मुश्किल था। इसके बावजूद अगर उसने इस रिश्ते को स्वीकार किया था तो ज़ाहिर है कि उसमें उसने सबकी खुशी का सबसे ज़्यादा ख़याल किया था। वैभव को पति की नज़र देखना अभी भी उसके लिए शायद आसान नहीं है।

"ओह! मेरी रागिनी।" वंदना लपक कर उसके क़रीब आई और उसे कंधों से पकड़ कर बड़े स्नेह से बोली____"तुम्हें मेरे सामने इतना लजाने की अथवा असहज महसूस करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरा यकीन करो, मैं इस रिश्ते के संबंध में तुम्हारे बारे में कोई भी ग़लत बात नहीं सोचती हूं। सच तो ये है कि मैं तुम्हारे लिए बहुत ज़्यादा खुश हूं। तुम्हें अपनी ननद से ज़्यादा मैंने हमेशा अपनी सहेली समझा था और ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि ब्याह से पहले हम दोनों की आपस में कितनी पटती थी।"

"हां जानती हूं भाभी।" रागिनी ने पलकें उठा कर उसे देखा____"और मुझे हमेशा आपके जैसी भाभी के साथ साथ आपके जैसी सहेली मिलने की खुशी थी।"

"इसी लिए कहती हूं कि इस वक्त तुम्हें ऐसा वैसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है।" वंदना ने बड़े प्यार से कहा____"वैभव के प्रति जो भी तुम्हारे मन में हो वो तुम मुझसे बेझिझक हो कर बता सकती हो। वैसे भी अब तो तुमने खुद ही इस रिश्ते को मंजूरी दे दी है तो अब कैसा शर्माना और कैसी झिझक?"

"कहती तो आप ठीक हैं भाभी।" रागिनी ने कहा____"लेकिन जाने क्यों अभी भी मैं खुद को इसके लिए सहज नहीं महसूस कर रही हूं।"

"फ़िक्र मत करो।" वंदना ने कहा____"धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। असल में बात ये है कि तुम अभी भी वैभव को अपने देवर की ही नज़र से सोचती हो और यही वजह है कि तुम्हें बहुत अजीब महसूस होता होगा और साथ ही शर्म भी महसूस होती होगी। मेरा तुमसे यही कहना है कि अब जब तुम उनसे विवाह करने के लिए राज़ी हो गई हो तो तुम्हें वैभव को अपने देवर की नज़र से नहीं बल्कि एक ऐसे लड़के की नज़र से देखना चाहिए जिससे तुम्हारा विवाह होना तय हो चुका है। बिल्कुल ही भूल जाओ कि वैभव तुम्हारे देवर हैं या उनसे तुम्हारा क्या रिश्ता रहा है।"

"कोशिश कर रही हूं भाभी।" रागिनी ने धीमें से कहा____"हर वक्त अपने आपको यही सोच कर समझाती हूं लेकिन हर बार मन में यही ख़याल उभर आता है कि वो मेरे देवर थे और मैं उनकी भाभी। हम दोनों के बीच भावनाओं और मर्यादा का एक पवित्र रिश्ता था।"

"हां मैं समझती हूं।" वंदना ने कहा____"तुम्हारे जैसी उत्तम चरित्र वाली लड़की के लिए ये सब भुला देना इतना आसान नहीं है लेकिन तुम्हें भी पता है कि अब भूल जाने में ही भलाई है। अगर भूलोगी नहीं तो उसके साथ पति पत्नी के रूप में रहना भी आसान नहीं होगा।"

रागिनी को समझ ना आया कि क्या कहे? हालाकि ये बातें अब वो भी सोचने लगी थी और खुद को इसके लिए समझाती भी थी लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि उसका मन घूम फिर कर फिर से वहीं पर आ कर ठहर जाता था।

"वैसे आज मैंने भी तुम्हारी और वैभव की बातें सुनी थी।" वंदना ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"और उनके मुख से जो कुछ तुम्हारे लिए सुना उससे मैं दावे के साथ कह सकती हूं वो तुम्हें बहुत ज़्यादा चाहते हैं। तभी तो तुम्हारी खुशी के लिए वो कुछ भी करने की बात कर रहे थे। उनकी नज़र में तुम्हारी अहमियत क्या है ये भी सुना था मैंने।"

"क...क्या सच में आपने ये सब सुना था?" रागिनी ने आश्चर्य और घबराहट के मिले जुले भाव से कहा____"हाय राम! आप छुप के हमारी बातें सुन रहीं थी उस वक्त?"

"हां तो क्या हो गया?" वंदना ने हल्के से हंसते हुए कहा____"असल में मैं बड़ा उत्सुक थी ये जानने के लिए कि तुम्हारे ब्याह की बात जान लेने के बाद वैभव महाराज तुमसे अब क्या बातें करेंगे? मुझे नहीं पता था कि वो इस क़दर दुखी और संजीदा हो जाएंगे।"

रागिनी को बहुत ज़्यादा शर्म आई। ऐसा नहीं था कि वैभव ने अपनी बातों में उसको कुछ ऐसा वैसा कहा था लेकिन फिर भी जाने क्यों उसको शर्म महसूस हुई। पता नहीं क्या सोच बैठी थी वो।

"मुझे तो सोच के ही गुदगुदी होती है कि जो व्यक्ति पहले से ही तुम्हें इतना पसंद करता रहा है और इतना चाहता रहा है।" वंदना ने मुस्कुराते हुए कहा____"वो तब कितना तुम्हें चाहेगा जब तुम उनकी पत्नी बन कर उनके घर पहुंच जाओगी? मुझे तो ऐसा लगता है कि तब उनकी चाहत की पराकाष्ठा ही हो जाएगी।"

"हाय राम! बस भी कीजिए भाभी।" रागिनी का मारे शर्म के बुरा हाल हो गया____"ये क्या क्या बोले जा रही हैं आप?"

"उफ्फ! क्या बताऊं मेरी लाडो।" वंदना ने उसके दोनों हाथ पकड़ कर खींचा और फिर उसको ज़बरदस्ती गोल गोल घुमाते हुए बोली____"विवाह तुम्हारा होने वाला है और विवाह के बाद जो होगा उसका एहसास मुझे हो रहा है।"

रागिनी उसकी बात सुन कर और भी बुरी तरह शर्मा गई। जब उसे बर्दास्त न हुआ तो उसने वंदना से अपने हाथ छुड़ाए और रसोई से बाहर की तरफ जाने लगी। उसको यूं भाग कर जाते देख वंदना पीछे से थोड़ा ऊंचे स्वर में बोली____"आज रात इसी तरह के हसीन ख़्वाब देखना मेरी प्यारी ननद रानी।"

रागिनी तब तक रसोई से का चुकी थी लेकिन वंदना को पूरा यकीन था कि उसने उसका ये वाक्य ज़रूर सुन लिया होगा। बहरहाल, रागिनी को शर्म के मारे यूं भाग गई देख वंदना हल्के से हंसने लगी थी। फिर एकदम से उसने मन ही मन ऊपर वाले को याद कर के कहा____"हे ऊपर वाले! अब कुछ भी बुरा मत करना मेरी ननद के साथ।"




━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 

Kuresa Begam

Member
243
712
108
अध्याय - 153
━━━━━━༻♥༺━━━━━━




अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।


अब आगे....



वीरेंद्र सिंह ने खेतों में जा कर सबको मेरे आने की ख़बर दे दी थी इस लिए दोपहर तक सब आ गए थे। हाल चाल के बाद मैं सबके साथ खाना खाने बैठ गया था। सबके चेहरे खिले हुए थे। ख़ास कर इस बात के चलते कि रागिनी भाभी मुझसे ब्याह करने को राज़ी हो गईं थी और साथ ही उन्हें ये भी पता चल गया था कि मैं भी अपनी भाभी से ब्याह करने को राज़ी हूं।

खाना खाने के बाद हम सब बैठक में आ गए। बैठक में ससुर जी ने कहा कि वो दादा ठाकुर को अपनी बेटी के राज़ी होने की ख़बर भिजवाने का ही सोच रहे थे। यूं तो मेरे यहां आ जाने से वो मेरे द्वारा भी ये ख़बर भिजवा सकते हैं लेकिन फिर उन्होंने कहा कि इस तरह से ख़बर भिजवाना उचित नहीं होगा इस लिए वीरेंद्र सिंह मेरे साथ रुद्रपुर जाएगा। वहां पर वो ख़ुद अपनी बहन के राज़ी होने की ख़बर दादा ठाकुर को देगा।

क़रीब एक डेढ़ घंटा आराम करने के बाद वीरेंद्र सिंह ये कह कर खेतों की तरफ चला गया कि वो शाम होने से पहले ही आ जाएगा। उसके जाने के बाद ससुर जी भी किसी काम से चले गए। बैठक में अब मैं ही बचा था।

आज भाभी से बातें करने के बाद मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था। इसके पहले मन में जिन ख़यालों के चलते मैं खुद को अपराधी सा महसूस कर रहा था उससे अब मुक्ति सी मिल गई थी मुझे। मैं आंखें बंद करता तो बंद पलकों में भाभी का ख़ूबसूरत चेहरा चमक उठता था। एकाएक बंद पलकों में ही भाभी के साथ हुई बातों के दृश्य किसी चलचित्र की तरह चलने लगे।

"सच में सो रहे हैं या आंखें बंद किए किसी के हसीन ख़यालों में खोए हुए हैं महाराज?" एकाएक मेरे कानों में एक मधुर आवाज़ पड़ी तो मैंने पट्ट से आंखें खोल दी।

वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी खड़ीं थी। मुझे आंखें खोल कर अपनी तरफ देखता देख वो हल्के से मुस्कुराईं। उन्हें आया देख मैं भी उठ कर बैठ गया।

"आप कब आईं भाभी?" मैंने खुद को सम्हालते हुए उनसे पूछा।

"बस अभी ही आई हूं।" वंदना भाभी ने कहा____"आपको आंखें बंद किए लेटे देखा तो लगा सो गए हैं आप।"

"नहीं, ऐसी बात नहीं है।" मैंने कहा____"मुझे इतना जल्दी नींद नहीं आती।"

"क्यों भला?" भाभी मुस्कुराईं____"कहीं आंखें बंद किए अपनी होने वाली दुल्हन के हसीन ख़्वाब तो नहीं देख रहे थे आप?"

"ये..ये आप क्या कह रहीं हैं भाभी।" मैं बुरी तरह झेंप गया।

"आप नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं।" वंदना भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अच्छा ये तो बताइए कि अपनी होने वाली दुल्हन से आपने अच्छे से बात की या नहीं?"

उनके इस तरह पूछने पर मुझे शर्म सी महसूस हुई। जवाब में मैंने सिर्फ हां में सिर हिला दिया। मुझे समझ ही न आया कि क्या कहूं?

"अगर और बात करनी हो तो बेझिझक हो के बता दीजिए मुझे।" वंदना भाभी ने पूर्व की भांति ही मुस्कुराते हुए कहा____"इतनी दूर से मिलने आए हैं तो जी भर के देख लीजिए और जी भर के बातें कर भी लीजिए। वापस जाते समय मन में किसी तरह का मलाल नहीं रहना चाहिए।"

"ऐसी कोई बात नहीं है भाभी।" मैं शर्म तो महसूस कर ही रहा था किंतु साथ ही मुझे अजीब भी लग रहा था उनके ऐसा कहने पर____"उनसे मुझे जो कहना था कह चुका हूं।"

"तो क्या अब फिर से उनसे बात करने का अथवा उन्हें देखने का मन नहीं कर रहा आपका?" वंदना भाभी जैसे मुझे छेड़ने से बाज नहीं आ रहीं थी____"वैसे जब तक आपसे उनका ब्याह नहीं हो जाता तब तक तो वो आपकी भाभी ही हैं तो इसी नाते से आप उनसे बात कर सकते हैं।"

"उनकी जगह कोई और होता तो बेशक मैं बात करता और देखता भी।" मैंने कहा____"लेकिन उनसे मेरा बहुत ही साफ और पवित्र भावनात्मक रिश्ता रहा है। बड़ी मुश्किल से मैं उनसे अपने दिल की सच्चाई बता पाया हूं। अब अगर फिर से उनसे मिलने की बात कहूंगा तो जाने वो क्या सोच बैठेंगी मेरे बारे में। इस लिए मैं ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहता जिससे कि उन्हें मेरे किसी आचरण से धक्का लगे अथवा उनका मन दुखी हो जाए।"

"वाह! आप तो सच में बदल गए हैं महाराज।" वंदना भाभी ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और यकीन मानिए आपका बदला हुआ ये रूप देख कर और अपनी भाभी के प्रति आपकी ये बातें सुन कर व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत ही अच्छा लगा है।"

"मैं नहीं जानता कि मैं कितना बदल गया हूं अथवा मुझमें कोई अच्छाई आई है या नहीं।" मैंने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन इतना दावे के साथ कहता हूं कि मुझे अच्छा इंसान बनने के लिए मुझ पर ज़ोर डालने वाली मेरी भाभी ही थीं। हर क़दम पर मेरा मार्गदर्शन करने वाली वही थीं। मेरे अंदर हर किसी के प्रति कोमल भावनाएं पैदा करने वाली वही थीं। मेरी मुश्किलों को आसान बनाने वाली मेरी भाभी ही थीं। मेरे दुख में हद से ज़्यादा दुखी हो जाने वाली और मुझे अपने सीने से लगा कर मुझे सम्हालने वाली वहीं थी। मेरे मन में उनके प्रति बहुत ही ज़्यादा श्रद्धा भाव है। मैं अगर अपनी देवी समान भाभी के बारे में ग़लत ख़याल लाऊंगा तो समझिए इस धरती पर मुझसे बड़ा नीच और पापी कोई नहीं हो सकता। मेरी बस एक ही चाहत है कि मेरी भाभी हमेशा खुश रहें। उनकी खुशी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं।"

"आपको ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है महाराज।" वंदना भाभी ने अधीरता से कहा____"रागिनी के द्वारा मैं पहले ही आपके बारे में ये सब जान चुकी हूं और समझ चुकी हूं कि आप उनके प्रति क्या सोचते हैं। मेरी ननद का चरित्र शुरू से ही बेहद साफ और पवित्र रहा है। वो कभी किसी पर पुरुष का ख़याल अपने मन में नहीं लाईं। विधवा होने के बाद जब आपसे उनका ब्याह होने का उन्हें पता चला तो बहुत धक्का लगा था उन्हें। पिछले काफी दिनों से हम उन्हें हर तरह से समझाते आए हैं तब जा कर उन्हें इस रिश्ते के लिए राज़ी कर पाए हैं। वो यही कहती थीं कि जिसे उन्होंने हमेशा अपने देवर और अपने छोटे भाई की नज़र से देखा है उसको अचानक से पति की नज़र से कैसे देखूं? जब आपको पता चलेगा तो आप क्या सोचेंगे अपनी भाभी के बारे में? यही सब बातें सोचते हुए वो दुखी हो जातीं थी। मेरी भी यही दिली तमन्ना थी कि रागिनी जैसी उत्तम चरित्र वाली लड़की को उत्तम चरित्र वाला लड़का ही जीवन साथी के रूप में मिले। सच कहूं तो जिस तरह से आप बदल गए हैं और आपकी सोच तथा विचाराधारा इतनी अच्छी हो गई उससे मुझे बहुत खुशी हुई है। अब मुझे यकीन हो गया है कि उन्हें जिस तरह का जीवन साथी मिलना चाहिए था वो आपके रूप में मिल गया है।"

"आप मुझे बहुत ज़्यादा बड़ा बना रही हैं भाभी।" मैंने कहा____जबकि मैं अभी भी कुछ नहीं हूं। भाभी को अपनी पत्नी के रूप में पाना मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य होगा लेकिन सच ये है कि मैं उनके लायक कभी नहीं हो सकता। वो आसमान का चमकता हुआ चांद हैं और मैं धरती में पड़ा एक मामूली सा कंकड़।"

"हाय! क्या बात कह दी आपने।" वंदना भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"काश! हमें भी कोई आसमान का चांद कहता।"

"वीरेंद्र भैया के लिए आप आसमान का चांद ही हैं भाभी।" मैंने सहसा हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"क्या वो आपको ऐसा नहीं कहते?"

"कैसे कहेंगे महाराज?" वंदना भाभी ने आह सी भरी____"आसमान में चांद तो एक ही होता है ना और वो चांद मेरी ननद रानी हैं जो आपको मिलने वाली हैं।"

मैं बस मुस्कुरा कर रह गया। मेरे अंदर अजीब सी गुदगुदी होने लगी थी। दिल में एक मीठा सा एहसास होने लगा था। आंखों के सामने भाभी का ख़ूबसूरत चेहरा चमक उठा।

थोड़ी देर और वंदना भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। मैं भी पलंग पर वापस लेट कर उनकी बातों के बारे में सोचने लगा। अभी कुछ ही देर हुई थी कि अंदर से फिर कोई आ गया। मैंने आंखें खोल कर देखा तो कामिनी पर मेरी नज़र पड़ी।

"ओहो! आप हैं? कैसी हैं कामिनी जी?" मैंने उठ कर उससे पूछा___"आइए बैठिए।"

"वाह जी वाह! आज तो आप बड़ी इज्ज़त दे रहे हैं मुझे?" कामिनी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा और फिर आ कर दूसरे पलंग पर मेरे सामने बैठ गई।

"इज्ज़त तो मैं पहले भी देता था आपको।" मैं हल्के से मुस्कुराया____"आपको ही ग़लत लगता था तो क्या करें?"

"ग़लत जो होता है वो ग़लत ही लगता है जीजा जी।" कामिनी ने कहा____"ख़ैर जाने दीजिए, वैसे आज आपने मुझे सच में हैरान कर दिया है।"

"अच्छा जी, मैंने ऐसा क्या कर दिया?" मैं चौंक सा गया।

"वंदना भाभी से आपने जो बातें की और जिस तरीके से की उन्हें सुन कर मैं सच में हैरान थी।" कामिनी ने कहा____"माफ़ कीजिए, वो मैं दरवाज़े के पीछे ही खड़ी आप दोनों की बातें सुन रही थी। वैसे अच्छा ही हुआ कि मैंने आपकी बातें सुनी वरना कैसे जान पाती कि आप कितना बदल गए हैं।"

"ऐसा शायद इस लिए हुआ है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"क्योंकि कामिनी जी से मोहब्बत करने पर मुझे उनकी मोहब्बत नहीं मिली। सुना है जब दिल टूट जाता है तो इंसान की सोच ऐसी ही हो जाती है।"

"ओह! ऐसा है क्या?" कामिनी मेरी उम्मीद के विपरीत मुस्कुरा उठी____"फिर तो ये अच्छा ही हुआ कि आपको मेरी मोहब्बत नहीं मिली और आपका दिल टूट गया। कम से कम इसी बहाने आप सुधर तो गए।"

"बहुत ज़ालिम हो आप।" मैंने कहा____"किसी का दिल तोड़ना अच्छी बात नहीं होती है।"

"अगर दिल तोड़ने से सामने वाला सुधर जाए और एक अच्छा इंसान बन जाए।" कामिनी ने कहा____"तो यकीन मानिए मैं सौ बार नहीं बल्कि हज़ारों बार दिल तोड़ने वाला ही काम करूंगी।"

"दिल तोड़ना हुस्न वालों की अदा होती है।" मैंने गहरी सांस ली____"और आप में वो अदा कूट कूट कर भरी हुई है। ख़ैर कोई बात नहीं, ये बताइए कि उस दिन आपने मुझसे झूठ क्यों बोला था?"

"झूठ???" कामिनी चौंकी____"मैंने क्या झूठ बोला था आपसे?"

"भाभी के ब्याह के बारे में ग़लत बताया था आपने मुझे।" मैंने शिकायती लहजे से कहा____"आपको तो पहले से ही सब पता था ना तो आपने मुझे उस दिन सब कुछ सच सच क्यों नहीं बताया था?"

"आपने पूछा ही नहीं।" कामिनी शरारती अंदाज़ से मुस्कुराई____"वैसे भी मैं तो ये देखना चाहती थी कि दीदी के ब्याह वाली बात सुन कर आप पर क्या असर होता है?"

"सच में बहुत ज़ालिम हो।" मैंने कहा____"एक बार भी नहीं सोचा कि आपकी उन बातों से मुझे दिल का दौरा भी पड़ सकता था।"

"अच्छा, क्या सच में?" कामिनी ने हल्के से हंस कर कहा____"ठाकुर वैभव सिंह इतने कमज़ोर दिल के हैं क्या?"

"हाय! राम।" अचानक सुलोचना देवी की इस आवाज़ से हम दोनों ही चौंके, उधर उन्होंने कामिनी से कहा____"कुछ तो शर्म कर। ये क्या बोल रही है अपने जीजा जी को?"

"मैंने ऐसा क्या बोल दिया मां?" कामिनी ने कहा____"मैं तो बस जीजा जी से थोड़ा मज़ाक कर रही थी।"

"अच्छा।" सुलोचना देवी ने उसे घूरा____"इसके पहले तो कभी मज़ाक नहीं करती थी इनसे। पहले तो हमेशा गुस्सा ही करती थी और इनसे झगड़ती ही रहती थी। अब अचानक से मज़ाक कैसे करने लगी तू?"

"लीजिए जीजा जी।" कामिनी ने मुझसे मुखातिब हो कर कहा____"आपकी सासू मां तो अभी से आपका पक्ष लेने लगीं। बेटी ने कुछ कहा भी नहीं फिर भी डांट मिल गई।"

"चुप कर।" सुलोचना देवी ने कहा____"और अंदर जा कर चाय बना अपने जीजा जी को। थोड़ी देर में वीरेंद्र भी आ जाएगा। उसे महाराज के साथ रुद्रपुर जाना है। दिन ढलते ही ठंड बढ़ने लगती है इस लिए समय रहते ये दोनों चले जाएंगे तो अच्छा रहेगा।"

कामिनी उठी और मुझे घूरते हुए अंदर चली गई। मैं उसके घूरने पर बस मुस्कुरा कर रह गया। मैं सच में इस बात से हैरान था कि कामिनी का मेरे प्रति बर्ताव अचानक से इस तरह नर्म कैसे हो गया था? इसके पहले तो उसका मुझसे छत्तीस का ही आंकड़ा रहता था।

"उसकी बातों का बुरा मत मानिएगा महाराज।" उधर सुलोचना देवी ने मुझसे बड़े ही प्रेम भाव से कहा____"वो बड़ी ज़रूर हो गई है लेकिन भेजे में रत्ती भर का भी दिमाग़ नहीं है उसमें।"

"अरे! नहीं मां जी।" मैंने कहा____"मुझे उनकी बातों का बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा है। वैसे भी हम दोनों के बीच थोड़ी सी नोक झोंक ही चल रही थी। वैसे मैं इस बात से हैरान ज़रूर हूं कि इस समय वो मुझसे बड़े ही नर्म और तरीके से ही बातें करने लगी हैं। जबकि इसके पहले तो वो हमेशा मुझसे गुस्सा ही रहती थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि अचानक से उनमें मेरे प्रति इतना बदलाव कैसे हो गया है?"

"मैं क्या बताऊं बेटा?" सुलोचना देवी ने कहा____"मुझे भी उसके बर्ताव से हैरानी हुई है। पता नहीं उसमें ये बदलाव कहां से और कैसे आ गया है? ख़ैर आप बैठिए, मैं ज़रा देखूं वो आपके लिए चाय बनाने गई भी है या अपने कमरे में लंबा तान कर लेट गई है?"

मैंने बस सिर हिला दिया जिसके बाद वो पलट कर अंदर की तरफ बढ़ गई। क़रीब दस मिनट बाद अंदर से किसी के आने की आहट हुई तो मैं सम्हल कर बैठ गया।

अगले कुछ ही पलों में मेरी उम्मीद के विपरीत रागिनी भाभी हाथ में ट्रे लिए आईं और मेरे सामने खड़ी हो गईं। मैं थोड़ी हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा, उधर उनके चेहरे पर हल्के शर्म के भाव उभर आए थे।

"ए..ऐसे क्यों देख रहे हो?" उन्होंने धीमें स्वर में कहा तो मैं एकदम से हड़बड़ा सा गया और फिर खुद को सम्हालते हुए जल्दी ही उनसे नज़र हटा कर ट्रे में से चाय का कप उठा लिया।

"वो मां ने कहा कि मैं ही तुम्हें चाय देने जाऊं।" भाभी ने कहा____"इस लिए मुझे ही आना पड़ा।"

"ये तो बहुत ही अच्छा हुआ मेरे लिए।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"इसी बहाने कम से कम अपनी प्यारी सी भाभी को एक बार फिर से देख लिया मैंने।"

मेरी ये बात सुन कर भाभी ने शर्म के चलते अपनी नज़रें झुका लीं। उनके होठों पर इस बार बारीक सी मुस्कान उभर आई जिसे जल्दी ही उन्होंने छुपा लेने की नाकाम कोशिश की।

"एक बात पूछूं?" फिर उन्होंने हल्के से नज़रें उठा कर धीमें स्वर में मुझसे कहा।

"जी बिलकुल पूछिए।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ उनकी तरफ देखा____"आपको मुझसे कुछ भी पूछने के लिए इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है।"

"अ...अब भाभी क्यों कहते हो मुझे?" भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए थोड़े झिझक के साथ पूछा।

"तो क्या नहीं कहना चाहिए मुझे?" मैंने थोड़ी हैरानी से उन्हें देखा।

"ह...हमारे बीच एक दूसरा रिश्ता तय हो चुका है।" भाभी ने उसी झिझक के साथ कहा____"उस हिसाब से क्या अब तुम्हें मुझको भाभी कहना ठीक लगता है?"

"ओह! हां, पर अभी सिर्फ रिश्ता ही तो तय हुआ है।" मैंने अपलक उनकी तरफ देखते हुए कहा____"जिस दिन आपसे मेरा विवाह हो जाएगा उस दिन से आपको भाभी कहना बंद कर दूंगा।"

"हम्म्म्म।" भाभी ने धीमें से कहा____"फिर क्या कहा करोगे मुझे?"

"आपको जो सुनना अच्छा लगेगा वही कहूंगा।" मैंने धड़कते दिल से किंतु बड़े नम्र भाव से कहा____"हमारे बीच चाहे जो रिश्ता हो जाए अथवा चाहे जैसी भी परिस्थितियां आ जाएं मेरे मन में आपके लिए वैसा ही आदर सम्मान रहेगा जैसा हमेशा से रहा है।"

मेरी ये बात सुन कर भाभी अपलक देखने लगीं मुझे। उनके चेहरे पर कई तरह के भाव उभरे और फिर गायब होते नज़र आए। समंदर सी गहरी आंखों में कुछ झिलमिलाता हुआ नज़र आया मुझे।

"एक बात और।" मुझे सहसा कुछ याद आया तो मैंने कहा____"आप इस सबके बाद भी मुझे पूरे हक के साथ डांट सकती हैं, छेड़ सकती हैं, मेरी टांगें खींच सकती हैं और कहीं ग़लती करूं तो मेरी पिटाई भी कर सकती हैं।"

"य...ये क्या कह रहे हो?" भाभी का गला भर आया। पलक झपकते ही आंखों में आंसू तैरते नज़र आने लगे।

"मैं सिर्फ ये चाहता हूं कि आप हमेशा मेरे साथ सहज रहें।" मैंने अधीरता से कहा____"और वो सब कुछ करें जिससे आपको ख़ुशी मिले।"

भाभी ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं। जैसे ही उनकी आंखें बंद हुईं तो आंसू के कतरे पलकों की झिरी से निकल कर उनके गुलाबी गालों पर टप्प से गिर आए जो एक लंबी लकीर भी बना गए। ये देख मैं एकदम से चौंका और थोड़ा घबरा भी गया।

"अरे! क्या हुआ आपको?" मैं उसी घबराहट में पूछ बैठा____"क्या मैंने कुछ ग़लत कह दिया आपको? अगर ऐसा है तो माफ़ कर दीजिए मुझे।"

"नहीं नहीं।" भाभी ने आंखें खोल कर झट से कहा____"तुमने कुछ ग़लत नहीं कहा है। ये...ये आंसू तो बस ये सोच के छलक पड़े हैं कि तुम इस सबके बाद भी मुझे इतना सम्मान दे रहे हो।"

"वो तो मैं हमेशा दूंगा।" मैंने कहा____"और मेरी भी आपसे एक विनती है कि आप भी मुझे कभी भटकने मत देना।"

मेरी बात सुन कर भाभी ने हां में सिर हिलाया। उनके चेहरे पर वेदना जैसे भाव उभर आए थे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके अंदर बहुत कुछ चलने लगा था जिसे वो बड़ी मुश्किल से काबू में करने का प्रयास कर रहीं थी। ख़ैर कुछ ही देर में वो मेरा चाय का खाली कप ले कर चली गईं। इस बार भाभी से बातें करने में मुझे ज़्यादा झिझक नहीं हुई थी। एक अलग ही सुखद एहसास हो रहा था।

कुछ देर में वीरेंद्र सिंह खेतों से आ गया। हाथ मुंह धोने के बाद वो मेरे पास ही आ कर बैठ गया। कामिनी उसके लिए चाय ले आई। ऐसे ही थोड़ा और समय गुज़रा। वीरेंद्र के पिता जी, चाचा जी और उनके दोनों बेटे भी आ गए। थोड़ी देर इधर उधर की बातों के बाद चलने का समय हो गया। वीरेंद्र सिंह को क्योंकि मेरे साथ ही जाना था इस लिए वो जल्दी ही कपड़े पहन कर आ गया।

सभी घर वालों ने आ कर मेरे पांव छुए और विदाई दी। उसके बाद मैं और वीरेंद्र सिंह अपनी अपनी जीप में चल पड़े। पूरे रास्ते मैं भाभी से हुईं बातों और मुलाक़ातों के बारे में सोचता रहा और जाने कैसे कैसे अद्भुत एहसास में खोता रहा। क़रीब सवा घंटे में हम हवेली पहुंच गए।





━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
लाजवाब लेखानी का प्रदर्शन
Nice update🙏
 
Top