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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
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big king

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अध्याय - 158
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दोपहर का वक्त था।
हवेली की बैठक में पिता जी तो बैठे ही थे किंतु उनके साथ किशोरी लाल, गौरी शंकर, रूपचंद्र और वीरेंद्र सिंह भी बैठे हुए थे। वीरेंद्र सिंह को पिता जी ने संदेशा भिजवा कर बुलाया था।

"हमने आप सबको यहां पर इस लिए बुलवाया है ताकि हम सब एक दूसरे के समक्ष अपनी अपनी बात रखें और उस पर विचार कर सकें।" पिता जी ने थोड़े गंभीर भाव से कहा_____"अब जबकि हमारी बहू भी वैभव से विवाह करने को राज़ी हो गई है तो हम चाहते हैं कि जल्द से जल्द ये विवाह संबंध भी हो जाए।" कहने के साथ ही पिता जी गौरी शंकर से मुखातिब हुए____"हम तुमसे जानना चाहते हैं गौरी शंकर कि इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है? हमारा मतलब है कि वैभव की बरात सबसे पहले तुम्हारे घर में आए या फिर चंदनपुर जाए? हमारे लिए तुम्हारी भतीजी भी उतनी ही अहमियत रखती है जितना कि हमारी बहू रागिनी। हम ये कभी नहीं भूल सकते हैं कि तुम्हारी भतीजी के बदौलत ही हमारे बेटे को नया जीवन मिला है। हम ये भी नहीं भूल सकते कि तुम्हारी भतीजी ने अपने प्रेम के द्वारा वैभव को किस हद तक सम्हाला है। इस लिए तुम जैसा चाहोगे हम वैसा ही करेंगे।"

"आपने मेरी भतीजी के विषय में इतनी बड़ी बात कह दी यही बड़ी बात है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से कहा____"यकीन मानिए आपकी इन बातों से मुझे अंदर से बेहद खुशी महसूस हो रही है। मुझे भी इस बात का एहसास है कि मेरी भतीजी की वजह से ही आज मैं और मेरा पूरा परिवार आपकी नज़र में दया के पात्र बने हैं वरना हम भी समझते हैं कि जो कुछ हमने आपके साथ किया था उसके चलते हमारा पतन हो जाना निश्चित ही था।"

"जो गुज़र गया उसके बारे में अब कुछ भी मत कहो गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हम उस सबको कभी याद नहीं करना चाहते। अब तो सिर्फ यही चाहते हैं कि आगे जो भी हो अच्छा ही हो। ख़ैर इस वक्त हम तुमसे यही जानना चाहते हैं कि तुम क्या चाहते हो? क्या तुम ये चाहते हो कि वैभव की बरात सबसे पहले तुम्हारे द्वार पर आए या फिर चंदनपुर जाए?"

"आपको इस बारे में मुझसे कुछ भी पूछने की ज़रूरत नहीं है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"आप अपने मन से जैसा भी करेंगे हम उसी से खुश और संतुष्ट हो जाएंगे।"

"नहीं गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"इस बारे में तुम्हें बिल्कुल भी संकोच करने की अथवा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है। तुम जैसा चाहोगे हम वैसा ही करेंगे और ये हम सच्चे दिल से कह रहे हैं।"

"अगर आप मेरे मुख से ही सुनना चाहते हैं तो ठीक है।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"ये सच है कि हर मां बाप की तरह मेरी भी तमन्ना यही थी कि वैभव की बरात सबसे पहले मेरे ही द्वार पर आए। वैभव का जब अनुराधा के साथ ब्याह होने की बात पता चली थी तो मुझे या मेरे परिवार को उसके साथ वैभव का ब्याह होने में कोई आपत्ति नहीं थी किंतु हां इच्छा यही थी कि वैभव की बरात सबसे पहले मेरी ही चौखट पर आए। यही इच्छा रागिनी बहू के साथ वैभव का विवाह होने पर भी हुई थी लेकिन मैं ये भी समझता हूं कि ऐसा उचित नहीं होगा। रागिनी बहू पहले भी आपकी बहू थीं और अब भी होने वाली बहू ही हैं। वो उमर में भी मेरी भतीजी से बड़ी हैं। ऐसे में अगर उनका विवाह मेरी भतीजी के बाद होगा तो ये हर तरह से अनुचित लगेगा। इस लिए मेरा कहना यही है कि आप वैभव की बरात ले कर सबसे पहले चंदनपुर ही जाएं और रागिनी बिटिया के साथ वैभव का विवाह कर के उन्हें यहां ले आएं। उसके कुछ समय बाद आप वैभव की बरात ले कर हमारे घर आ जाइएगा।"

"इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है वीरेंद्र सिंह?" पिता जी ने वीरेंद्र सिंह की तरफ देखते हुए पूछा।

"आप सब मुझसे बड़े हैं और उचित अनुचित के बारे में भी मुझसे ज़्यादा जानते हैं।" वीरेंद्र सिंह ने शालीनता से कहा____"इस लिए मैं इस बारे में आप लोगों के सामने कुछ भी कहना उचित नहीं समझता हूं। बस इतना ही कहूंगा कि आप सबका जो भी फ़ैसला होगा वो मुझे तहे दिल से मंज़ूर होगा।"

"मेरा तो यही कहना है ठाकुर साहब कि इस बारे में आपको अब कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं आपसे कह चुका हूं कि आप सबसे पहले चंदनपुर ही वैभव की बरात ले कर जाइए। सबसे पहले रागिनी बिटिया का विवाह होना ही हर तरह से उचित है।"

"किशोरी लाल जी।" पिता जी ने मुंशी किशोरी लाल की तरफ देखा____"आपका क्या कहना है इस बारे में?"

"मैं गौरी शंकर जी की बातों से पूरी तरह सहमत हूं ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने कहा____"इन्होंने ये बात बिल्कुल उचित कही है कि रागिनी बहू का विवाह सबसे पहले होना चाहिए। उमर में बड़ी होने के चलते अगर उनका विवाह रूपा बिटिया के बाद होगा तो उचित नहीं लगेगा। छोटी बड़ी हो जाएंगी और बड़ी छोटी हो जाएंगी। लोगों को जब इस बारे में पता चलेगा तो वो भी ऐसी ही बातें करेंगे। इस लिए मैं गौरी शंकर जी की बातों से सहमत हूं।"

"ठीक है।" पिता जी ने एक लंबी सांस लेने के बाद कहा____"अगर आप सबका यही विचार है तो फिर ऐसा ही करते हैं। पुरोहित जी से मिल कर जल्द ही हम दोनों बहुओं के विवाह की लग्न बनवाएंगे। हम चाहते हैं कि इस हवेली में जल्द से जल्द हमारी दोनों बहुएं आ जाएं जिससे इस हवेली में और हमारे परिवार में फिर से रौनक आ जाए।"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद सभा समाप्त हो गई। गौरी शंकर और रूपचंद्र चले गए, जबकि वीरेंद्र सिंह बैठक में ही बैठे रहे। वीरेंद्र सिंह को जल्द ही जाना था इस लिए पिता जी के कहने पर उसने थोड़ी देर आराम किया और फिर खुशी मन से चले गए।

✮✮✮✮

गौरी शंकर और रूपचंद्र ने अपने घर पहुंच कर सबको ये बताया कि हवेली में दादा ठाकुर से क्या बातें हुईं हैं। सबके चेहरों पर खुशी के भाव उभर आए। किसी को भी इस बात से आपत्ति नहीं हुई कि वैभव की बरात सबसे पहले उनके यहां न आ कर चंदनपुर जाएगी। शायद सबको लगता था कि सबसे पहले रागिनी का ही वैभव के साथ विवाह होना चाहिए। जल्दी ही ये ख़बर रूपा के कानों तक पहुंच गई जिसके चलते उसके चेहरे पर भी खुशी के भाव उभर आए। उसकी दोनों भाभियां उसे छेड़ने लगीं जिससे वो शर्माने लगी। फूलवती की वो दोनों बेटियां भी अपनी ससुराल से आ गईं थी जिनका कुछ समय पहले विवाह हुआ था। वो दोनों भी रूपा को छेड़ने में लग गईं थी।

घर में एकदम से ही ख़ुशी का माहौल छा गया था। रूपा को उसकी भाभियों ने और उसकी बहनों ने बताया कि वैभव का विवाह सबसे पहले उसकी भाभी रागिनी से होगा, उसके बाद उससे। रूपा को पहले से ही इस बात का अंदेशा था और वो खुद भी चाहती थी कि पहले उसकी रागिनी दीदी ही वैभव की पत्नी बनें।

बहरहाल, जल्द ही विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं। एक बार फिर से सब अपने अपने काम पर लग गए। घर के सबसे बड़े बुजुर्ग यानि चंद्रमणि को बताया गया कि आख़िर वो दिन जल्द ही आने वाला है जब उनके घर की बेटी दादा ठाकुर की बहू बन कर हवेली जाएगी। चंद्रमणि इस बात से बेहद खुश हुए। उन्होंने गौरी शंकर और बाकी सबसे यही कहा कि सब कुछ अच्छे से करना। हर बात का ख़याल रखना, किसी भी तरह की ग़लती न हो।

"कैसी है मेरी प्यारी बहन?" रूपा के कमरे में दाख़िल होते ही रूपचंद्र ने अपनी बहन से बड़े प्यार से पूछा____"तुझे किसी ने खुशी वाली ख़बर दी कि नहीं?"

रूपचंद्र की इस बात से रूपा शर्माते हुए मुस्कुरा उठी। रूपचंद्र समझ गया कि उसे पता चल चुका है। वो चल कर उसके पास आया और पलंग के किनारे पर बैठ गया।

"वैसे एक बात कहूं।" फिर उसने रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"विवाह तेरा होने वाला है और इसकी खुशी सबसे ज़्यादा मुझे हो रही है। मुझे इस बात की खुशी हो रही है कि मेरी बहन की तपस्या पूरी होने वाली है। मेरी बहन ने इस संबंध के चलते जितना कुछ सहा है आख़िर अब उसका पूरी तरह से अंत हो जाएगा और उसकी जगह उसे ढेर सारी खुशियां मिल जाएंगी।"

रूपा को समझ ना आया कि क्या कहे? बड़े भाई के सामने उसे शर्म आ रही थी। हालाकि उसकी बातों से उसके ज़हन में वो सारी बातें भी ताज़ा हो गईं थी जो उसने अब तक सहा था। उस सबके याद आते ही उसके चेहरे पर कुछ पलों के लिए गंभीरता के भाव उभर आए थे।

"मैं अक्सर ये बात बड़ी गहराई से सोचा करता हूं कि ये जो कुछ भी हुआ है उसके पीछे आख़िर असल वजह क्या थी?" रूपचंद्र ने थोड़े गंभीर भाव से कहा____"क्या इसकी वजह सिर्फ ये थी कि अंततः ऐसा समय आ जाए जब हम सबके दिलो दिमाग़ में दादा ठाकुर और उनके परिवार वालों के प्रति सचमुच का मान सम्मान और प्रेम भाव पैदा हो जाए? क्या इसकी वजह ये थी कि अंततः तेरे प्रेम के चलते दोनों ही परिवारों का कायाकल्प हो जाए? क्या इसकी वजह सिर्फ ये थी कि अंततः प्रेम की ही वजह से वैभव का इस तरह से हृदय परिवर्तन हो जाए और वो एक अच्छा इंसान बन जाए? और क्या इसकी वजह ये भी थी कि अंततः मैं अपनी बहन को समझने लगूं और फिर मैं भी सबके बारे में सच्चे दिल से अच्छा ही सोचने लगूं? अगर वाकई में यही वजह थी तो इस सबके बीच उन्हें क्यों इस दुनिया से गुज़र जाना पड़ा जो हमारे अपने थे? इस सबके बीच उन्हें क्यों गुज़र जाना पड़ा जो निर्दोष थे? मैं अक्सर ये सोचता हूं रूपा लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं सूझता। ख़ैर जाने दे, खुशी के इस मौके पर बीती बातों को याद कर के खुद को क्यों दुखी करना।"

"मैं ये सब तो नहीं जानती भैया।" रूपा ने थोड़ी झिझक के साथ कहा____"लेकिन बड़े बुजुर्गों से सुना है कि एक नया अध्याय तभी शुरू होता है जब उसके पहले का अध्याय समाप्त हो जाता है। जैसे प्रलय के बाद नए सिरे से सृष्टि का निर्माण होता है, ये भी शायद वैसा ही है।"

"हां शायद ऐसा ही होगा।" रूपचंद्र ने सिर हिला कर कहा____"ख़ैर छोड़ इन बातों को। अगर ये सच में नए सिरे से एक नया अध्याय शुरू करने जैसा ही है तो मैं खुशी से इस नए अध्याय का हिस्सा बनना चाहता हूं। अब से मेरी यही कोशिश रहेगी कि अपने जीवन में जो भी करूं अच्छा ही करूं। बाकी ऊपर वाले की इच्छा। अच्छा अब तू आराम कर, मैं चलता हूं।"

कहने के साथ ही रूपचंद्र उठा और कमरे से बाहर चला गया। उसके जान के बाद रूपा पलंग पर लेट गई और जाने किन ख़यालों में खो गई।

✮✮✮✮

दूसरे दिन पिता जी पुरोहित जी से मिले। उनके साथ गौरी शंकर भी था। पिता जी ने पुरोहित जी को विवाह की लग्न देखने की गुज़ारिश की तो वो अपने काम पर लग गए। वो अपने पत्रे में काफी देर तक देखते रहे। उसके बाद उन्होंने बताया कि आज से पंद्रह दिन बाद का दिन विवाह के लिए शुभ है। पिता जी ने उनसे पूछा कि और कौन सा दिन शुभ है तो पुरोहित जी ने पत्रे में देखने के बाद बताया कि उसके बाद बीसवां दिन शुभ है। पिता जी ने उन दोनों दिनों की लग्न बनाने को कह दिया।

कुछ समय बाद जब लग्न बन गई तो पिता जी और गौरी शंकर पुरोहित जी से इजाज़त ले कर वापस आ गए। पिता जी ने गौरी शंकर से कहा कि आज से बीसवें दिन वो बरात ले कर उसके घर आएंगे इस लिए वो विवाह की तैयारियां शुरू कर दें। गौरी शंकर ने खुशी से सिर हिलाया और अपने घर चला गया।

इधर हवेली में पिता जी ने सबको बता दिया कि लग्न बन गई है इस लिए विवाह की तैयारियां शुरू कर दी जाएं। मां के पूछने पर उन्होंने बताया कि आज से पंद्रहवें दिन यहां से बरात प्रस्थान करेगी चंदनपुर के लिए। मां ने कहा कि ऐसे शुभ अवसर पर मेनका चाची के दोनों बेटों को भी यहां होना चाहिए इस लिए उनको भी समय से पहले बुला लिया जाए।

समय क्योंकि ज़्यादा नहीं था इस लिए फ़ौरन ही सब लोग काम पर लग गए। पिता जी ने अपने एक मुलाजिम के हाथों लग्न की एक चिट्ठी चंदनपुर भी भिजवा दी। उसके बाद शुरू हुआ नात रिश्तेदारों को और अपने घनिष्ट मित्रों को निमंत्रण देने का कार्य।

मैं निर्माण कार्य वाली जगह पर था। रूपचंद्र ने आ कर बताया कि विवाह की लग्न बन गई है इस लिए अब मुझे हवेली पर ही रहना चाहिए और अपनी सेहत का ख़याल रखना चाहिए। उसकी ये बात सुन कर मेरे दिल की धड़कनें एकदम से बढ़ गईं। मन में एकाएक जाने कैसे कैसे ख़याल आने लगे जो मुझे रोमांचित भी कर रहे थे और थोड़ा अधीर भी कर रहे थे। रूपचंद्र के ज़ोर देने पर मुझे हवेली लौटना ही पड़ा। सच में वो मेरा पक्का साला बन गया था।

✮✮✮✮

"अरे वाह! विवाह की लग्न बन गई है और पंद्रहवें दिन तेरा विवाह हो जाएगा?" शालिनी ने मुस्कुराते हुए रागिनी को छेड़ा____"यानि मेरी प्यारी रागिनी अब जल्द से जल्द दुल्हन बन कर वैभव जीजा जी के पास पहुंच जाएगी और....और फिर रात को सुहागरात भी मनाएगी।"

"धत्त, कुछ भी बोलती है।" रागिनी बुरी तरह शर्मा गई____"शर्म नहीं आती तुझे ऐसा बोलने में?"

"लो अब इसमें शर्म कैसी भला?" शालिनी ने आंखें नचाते हुए कहा____"विवाह के बाद सुहागरात तो होती ही है और तेरे नसीब में तो दो दो बार सुहागरात का सुख लिखा है। हाय! कैसी हसीन रात होगी वो जब जीजा जी मेरी नाज़ुक सी सहेली के नाज़ुक से बदन पर से एक एक कर के कपड़े उतारेंगे और फिर उसके पूरे बदन को चूमेंगे, सहलाएंगे और फिर ज़ोर से मसलेंगे भी। उफ्फ! कितना मज़ा आएगा ना रागिनी?"

"हे भगवान! शालिनी चुप कर ना।" रागिनी उसकी बातें सुन कर शर्म से पानी पानी हो गई____"कैसे बेशर्म हो कर ये सब बोले जा रही है तू?"

"अरे! तो क्या हो गया मेरी लाडो?" शालिनी ने एकदम से उसके दोनों हाथ पकड़ लिए, फिर बोली_____"तू मेरी सहेली है। तुझसे मैं कुछ भी बोल सकती हूं और तू भी इतना शर्मा मत। तू भी मेरे साथ इन सब बातों का लुत्फ़ उठा।"

"मुझे कोई लुत्फ़ नहीं उठाना।" रागिनी ने उसको घूरते हुए कहा____"मैं तेरी तरह बेशर्म नहीं हूं।"

"बेशर्म तो तुझे बनना ही पड़ेगा अब।" शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा____"जब सुहागरात को जीजा जी तेरे बदन से सारे कपड़े निकाल कर तुझे पूरा नंगा कर देंगे तब क्या करेगी तू? जब वो तुझे हौले हौले प्यार करेंगे तब क्या करेगी तू? मुझे यकीन है तब तू शर्म नहीं करेगी बल्कि जीजा जी के साथ पूरी बेशर्मी से मज़ा करेगी।"

"सच में बहुत बेशर्म हो गई है तू।" रागिनी के समूचे जिस्म में झुरझुरी दौड़ गई, बुरी तरह लजाते हुए बोली____"देख अब इस बारे में कुछ मत बोलना। मैं सुन नहीं सकती, मुझे बहुत शर्म आती है। पता नहीं क्या हो गया है तुझे? शादी से पहले तो तू इतनी बेशर्म नहीं थी।"

"शादी के बाद ही तो इंसान में बदलाव आता है रागिनी।" शालिनी ने कहा____"मैं हैरान हूं कि तू शादी के बाद भी नहीं बदली क्यों? नई नवेली कुंवारी दुल्हन की तरह आज भी शर्माती है।"

"हां मैं शर्माती हूं क्योंकि मुझे शर्म आती है।" रागिनी ने कहा____"मैं तेरी तरह हर बात खुल कर नहीं बोल सकती।"

"अच्छा ये तो बता कि अब तो तू वैभव जीजा जी को पति की नज़र से ही सोचने लगी है ना?" शालिनी ने गौर से उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"या अभी भी उनको देवर ही समझती है?"

"पहले वाला रिश्ता इतना जल्दी कैसे भूल जाऊंगी भला?" रागिनी ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"जब भी उनके बारे में सोचती हूं तो सबसे पहले यही ख़याल आता है कि वो मेरे देवर थे? तू शायद अंदाज़ा भी नहीं लगा सकती कि इस ख़याल के आते ही मेरा समूचा बदन कैसे कांप उठता है? शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस रिश्ते के बारे में अब तक मुझसे ज़्यादा सोच चुका होगा? जब तक आंखें खुली रहती हैं तब तक मन में ख़यालों का तूफ़ान चलता रहता है। मैं अब तक हर उस बात की कल्पना कर चुकी हूं जो इस रिश्ते के बाद मेरे जीवन में होने वाला है।"

"हां मैं समझ सकती हूं यार।" शालिनी ने कहा____"मैं समझ सकती हूं कि तूने इस बारे में अब तक क्या क्या नहीं सोचा होगा। सच में तेरे लिए इस रिश्ते को स्वीकार करना बिल्कुल भी आसान नहीं रहा होगा। ख़ैर जाने दे, अब तो सब ठीक हो गया है ना तो अब सिर्फ ये सोच कि तुझे अपनी आने वाली ज़िंदगी को कैसे खुशहाल बनाना है? मैं तुझे यही सलाह दूंगी कि विवाह के बाद ऐसी बातें बिल्कुल भी मत सोचना जिससे कि तेरे जीवन में और तेरी खुशियों में उसका असर पड़े। नियति ने तुझे नए सिरे से जीवन जीने का अवसर दिया है तो तू इसको उसी हिसाब से और उसी सोच के साथ जी। तेरे होने वाले पति तेरी खुशियों के लिए अगर कुछ भी कर सकते हैं तो तेरी भी यही कोशिश होनी चाहिए कि तू भी उन्हें कभी निराश न करे और हर क़दम पर उनका साथ दे।"

"हम्म्म्म।" रागिनी ने कहा____"सोचा तो यही है बाकी देखती हूं क्या होता है?"

"अच्छा ये बता कि तू अपनी होने वाली सौतन के बारे में क्या सोचती है?" शालिनी ने जैसे उत्सुकता से पूछा____"तेरे मुख से ही सुना था कि वो वैभव जी को बहुत प्रेम करती है और जिस समय वैभव जी अनुराधा नाम की लड़की की वजह से सदमे में चले गए थे तो उसने ही उन्हें उस हाल से बाहर निकाला था।"

"मैं उससे मिल चुकी हूं।" रागिनी ने अधीरता से कहा_____"उसके बारे में उन्होंने सब कुछ बताया था मुझे। सच में वो बहुत अच्छी लड़की है। उसका हृदय बहुत विशाल है। उसके जैसी अद्भुत लड़की शायद ही इस दुनिया में कहीं होगी। जब उसे अनुराधा के बारे में पता चला था तो उसने उसको भी अपना बना लिया था। अनुराधा की मौत के बाद उसने उन्हें तो सम्हाला ही लेकिन उनके साथ साथ अनुराधा की मां और उसके भाई को भी सम्हाला। बेटी बन कर अनुराधा की कमी दूर की उसने। उसके बाद जब उनके साथ मेरा विवाह होने की बात चली तो उसने मुझे भी अनुराधा की तरह अपना मान लिया। उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं हुई कि एक बार फिर से उसे समझौता करना पड़ेगा और अपने प्रेमी को मुझसे साझा करना पड़ेगा। उस पगली ने तो यहां तक कह दिया कि वो मुझे अपनी बड़ी दीदी मान कर मुझसे वैसा ही प्यार करेगी जैसा वो उनसे करती है। अब तुम ही बताओ शालिनी ऐसी नेकदिल लड़की के बारे में मैं कुछ उल्टा सीधा कैसे सोच सकती हूं? पहले भी कभी नहीं सोचा तो अब सोचने का सवाल ही नहीं है। ये तो नियति ने इस तरह का खेल रचा वरना सच कहती हूं उनके जीवन में सिर्फ और सिर्फ उस अद्भुत लड़की रूपा का ही हक़ है। ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि मेरे हिस्से का प्यार भी उसे मिले। उसने बहुत कुछ सहा है इस लिए मैं चाहती हूं कि अब उसे कुछ भी न सहना पड़े बल्कि उसकी ज़िंदगी का हर पल खुशियों से ही भरा रहे।"

"ज़रूर ऐसा ही होगा रागिनी।" शालिनी ने रागिनी के दोनों कन्धों को पकड़ कर कहा____"तेरी बातें सुन कर मुझे यकीन हो गया है कि उस नेकदिल लड़की के जीवन में ऐसा ही होगा। तू भी उसको कभी सौतन मत समझना, बल्कि अपनी छोटी बहन समझना और उसका हमेशा ख़याल रखना।"

"वो तो मैं रखूंगी ही।" रागिनी ने कहा____"पहले भी यही सोचा था मैंने और अब भी यही सोचती हूं।"

"अच्छी बात है।" शालिनी ने कहा____"मुझे तो अब ये सब सोच कर एक अलग ही तरह की अनुभूति होती है यार। वैसे कमाल की बात है ना कि जीजा जी की किस्मत कितनी अच्छी है। मेरा मतलब है कि विवाह के बाद दो दो बीवियां उनके कमरे में पलंग पर उनके दोनों तरफ होंगी और वो दोनों को एक साथ प्यार करेंगे। हाय! कितना मज़ेदार होगा ना वो मंज़र?"

"ज़्यादा बकवास की तो गला दबा दूंगी तेरा।" रागिनी उसकी बात सुन कर फिर से शर्मा गई बोली____"जब देखो ऐसी ही बातें सोचती रहती है। चल अब जा यहां से, मुझे तुझसे अब कोई बात नहीं करना।"

"अरे! गुस्सा क्यों करती है मेरी लाडो?" शालिनी ने हल्के से हंसते हुए कहा____"मैं तो वही कह रही हूं जो भविष्य में होने वाला है।"

"तुझे बड़ा पता है भविष्य के बारे में।" रागिनी ने उसे घूर कर देखा____"तेरी जानकारी के लिए बता दूं कि ऐसा कुछ नहीं होगा। अब चुपचाप यहां से जा। मुझे भाभी के साथ काम करना है, तेरी तरह फ़ालतू की बातें करने का समय नहीं है मेरे पास।"

"आय हाय! समय नहीं है तेरे पास।" शालिनी ने आंखें फैलाई____"ज़्यादा बातें न कर मेरे सामने। मुझे पता है कि आज कल तू खाली बैठी जीजा जी के हसीन ख़यालों में ही खोई रहती है, बात करती है।"

उसकी बात सुन कर रागिनी झूठा गुस्सा दिखाते हुए उसे मारने के लिए दौड़ी तो शालिनी हंसते हुए भाग ली। उसके जाने के बाद रागिनी भी मंद मंद मुस्कुराते हुए घर के अंदर चली गई।




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Bahot pyaara update tha bhai ek shukhad anubhuti hui iye dekh kar ki ab vaibhab ki jindagi me kuchh acha hoga. Bahot romaanchak aur majedaar update tha bhai. Next update ka intajaar rahegaa bhai 👌👌👌👌👌👍👍👍👍👍👍👍👍👌👌👌👌👌👌
 
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मेनका चाची के शब्द भले ही माहौल के अनुकूल नही थे लेकिन हमे उनके शब्दों के अंदर छिपी हुई उनकी सोच और उनकी भावनाओं को समझना चाहिए । और वो यह स्पष्ट जाहिर करती है कि वो फिर से वही स्वभाविक व्यवहार और रिएक्शन पाना चाहती है जो इन कुछ दिनों से टूट सा गया है ।
मेनका कोई दूध पीती बच्ची नही है जो यह समझ ही न सके कि पहले और आज मे क्या फर्क आ गया है । वह चाहती है कि दादा ठाकुर न सिर्फ उसे दिल से क्षमा कर दें बल्कि उनकी बेटी के भाग्य का फैसला भी वही करे ।

दादा ठाकुर के इस डिसिजन से मै बिल्कुल इतिफाक रखता हूं कि कुसुम के शादी के निर्णय करने का अधिकार उसकी मां मेनका को होना चाहिए ।

लेकिन जैसा कि दादा ठाकुर के परिवार मे यह चलन रहा है कि घर का मुखिया ही अहम और बड़े फैसला लेते आया है , इसलिए मेनका ने जो कुछ कहा उसमे कुछ शंका जैसी बात नही होनी चाहिए ।


रागिनी भाभी - आखिरकार भाभी के दिल मे प्रेम , इश्क और मोहब्बत का भाव पनपना शुरू हुआ । यह एक शुभ संकेत है - रागिनी के लिए भी और वैभव के लिए भी ।

रागिनी और रूपा की शादी की तारीख भी फिक्स हो चुकी है । ये भी बहुत अच्छी खबर है । शुभ कार्य मे देर वैसे भी नही करनी चाहिए ।
लेकिन वैभव का पहले रागिनी के घर बारात लेकर जाना और उसके मात्र पांच दिन बाद रूपा के घर बारात लेकर जाना कुछ अजीब जैसा लगता है । क्या यह सम्भव नही है कि दोनो महिलाओं की शादी एक साथ , एक ही वक्त मे वैभव के साथ कर दी जाए !


रूपा - रूपा अपने विवाह की खबर सुनकर अत्यंत ही प्रसन्न है , इसमे कोई भी शक नही । लेकिन जिस खबर को सुनने के बाद उसके दिल मे सतरंगी सपने आना चाहिए उसके जगह पर वो गम्भीर मुद्रा बनाए चिंतन कर रही है । कहीं वो यह तो नही सोच रही है कि उसकी डोली उसके ही घर से निकलना चाहिए या फिर स्वर्गीय अनुराधा के घर से ?

बहुत ही खूबसूरत अपडेट शुभम भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
 
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12bara

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Akhir Saadi ki date fix ho hi gai .pahle bhabhi se fir roopa se Saadi ho gi jo acha faisla hai. Bhabhi ne akhir vaibhav ko apne pati ke roopa me sochna bhi chalu kar diya hai jo bahot achi bat hai .roopa ki akhir Prem tapsaya bhi safal hogai.kusum ki bhi Saadi ab lagbhag Tai hogai hai ab bas roopchand hi bcha hai.lagta hai jald hi roopchand ka bhi number lag jayega....ab dur dur tak kahin koi gadbad najar nhi arhi hai filhaal sab sahi raste me chal rahe hain.
 

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अध्याय - 155
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रागिनी तब तक रसोई से का चुकी थी लेकिन वंदना को पूरा यकीन था कि उसने उसका ये वाक्य ज़रूर सुन लिया होगा। बहरहाल, रागिनी को शर्म के मारे यूं भाग गई देख वंदना हल्के से हंसने लगी थी। फिर एकदम से उसने मन ही मन ऊपर वाले को याद कर के कहा____"हे ऊपर वाले! अब कुछ भी बुरा मत करना मेरी ननद के साथ।"


अब आगे....


वीरेंद्र सिंह के आने से और उसके द्वारा रागिनी भाभी के राज़ी हो जाने की बात सुन लेने से मां बहुत ज़्यादा खुश थीं। जगताप चाचा और मेनका चाची के दिए हुए झटके और दुख को जैसे वो एक ही पल में भूल गईं थी। आज काफी दिनों बाद मैं उनके चेहरे पर खुशी की असली चमक देख रहा था।

सबको पता चल चुका था कि रागिनी भाभी मुझसे विवाह करने को राज़ी हो गईं हैं। कुसुम कुछ ज़्यादा ही खुशी से उछल रही थी। उधर मेनका चाची भी खुश थीं, ये अलग बात है कि कभी भी उनके चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव उभर आते थे। कदाचित उन्हें अपने और जगताप चाचा द्वारा किए गए कर्म याद आ जाते थे जिसके चलते वो दुखी हो जातीं थी।

रसोई में वीरेंद्र सिंह के लिए बढ़िया बढ़िया पकवान बन रहे थे। आम तौर पर मां रसोई में कम ही जातीं थी लेकिन आज वो रसोई में ही मौजूद थीं। निर्मला काकी और मेनका चाची दोनों ही पकवान बनाने में लगी हुईं थी। मेनका चाची सब कुछ वैसा ही करती जा रहीं थी जैसा मां कहती जा रहीं थी। कुसुम और कजरी बाकी के छोटे मोटे काम में उनकी मदद कर रहीं थी।

इधर मैं अपने कमरे से निकल कर सीधा बैठक में आ गया था, जहां पर किशोरी लाल और वीरेंद्र सिंह बैठे हुए थे। बैठक में काफी देर तक हमारी आपस में दुनिया जहान की बातें होती रहीं। उसके बाद जब अंदर से कुसुम ने आ कर हम सबको खाना खाने के लिए अंदर चलने को कहा तो हम सब बैठक से उठ गए।

गुसलखाने से स्वच्छ होने के बाद मैं, वीरेंद्र भैया और किशोरी लाल भोजन करने बैठे। मेनका चाची और निर्मला काकी ने हम सबके सामने थाली रखी। सच में काफी अच्छा भोजन नज़र आ रहा था। खाने की खुशबू भी बहुत बढ़िया आ रही थी। हम सबने खाना शुरू किया। पिता जी नहीं थे इस लिए खाने के दौरान थोड़ी बहुत इधर उधर की बातें हुईं। खाने के बाद हम सब उठे।

अब सोने का समय था इस लिए मैं वीरेंद्र सिंह को मेहमान कक्ष में ले गया और वहां पर उसको सोने को कहा। वीरेंद्र सिंह उमर में मुझसे बहुत बड़ा था इस लिए मेरी उससे ज़्यादा बातें नहीं हुईं। वैसे भी ये जो नया रिश्ता बन गया था उसके चलते मैं उसके सामने थोड़ा संकोच और झिझक महसूस करने लगा था। मैंने उसको आराम से सो जाने को कहा और सुबह मिलने का कह कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

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महेंद्र सिंह की हवेली में काफी चहल पहल थी। रात के समय हवेली में काफी रौनक नज़र आ रही थी। गांव में बिजली का कोई भरोसा नहीं रहता था इस लिए ज्ञानेंद्र सिंह शहर से जनरेटर ले आया था ताकि हवेली के अंदर और बाहर पर्याप्त मात्रा में रोशनी रहे। कम समय में जितना इंतज़ाम किया जा सकता था उससे ज़्यादा ही किया था ज्ञानेंद्र सिंह ने।

ज्ञानेंद्र सिंह के बेटे का जन्मदिन था इस लिए ख़ास ख़ास लोगों को ही बुलाया गया था जिनमें से सर्व प्रथम दादा ठाकुर यानि ठाकुर प्रताप सिंह ही थे। ज्ञानेंद्र सिंह के भी कुछ ख़ास मित्रगण थे। महेंद्र सिंह ने अर्जुन सिंह को भी बुलवाया था।

हवेली के बाहर लंबे चौड़े मैदान में चांदनी लगी हुई थी। उसी के नीचे एक मंच बनाया गया था। नाच गाने का प्रबंध था जिसके लिए ज्ञानेंद्र सिंह ने शहर से कलाकार बुलाए थे। दूसरी तरफ हवेली के अंदर एक बड़े से हाल में अलग ही नज़ारा था। पूजा तो दिन में ही हो गई थी किंतु रात में मेहमानों को भोजन कराने के लिए हाल में ही बढ़िया व्यवस्था की गई थी। एक बड़ी सी आयताकार मेज़ थी जिसके दोनों तरफ लकड़ी की कुर्सियां लगी हुईं थी। मेज़ पर नई नवेली चादर बिछी हुई थी और बड़ी सी मेज में थोड़ी थोड़ी दूरी के अंतराल में ख़ूबसूरत फूलों के छोटे छोटे गमले रखे हुए थे जिनकी महक दूर तक फैल रही थी।

सभी मेहमान आ चुके थे। सब दादा ठाकुर से मिले और उन्हें हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। दादा ठाकुर की मौजूदगी सबके लिए जैसे बहुत ही ख़ास थी। सब जानते थे कि दादा ठाकुर कितनी महान हस्ती हैं। बहरहाल, मिलने मिलाने के बाद महेंद्र सिंह ने सबसे पहले सभी से भोजन करने का आग्रह किया, उसके बाद नाच गाना देखने का।

भोजन वाकई में बहुत स्वादिष्ट बना हुआ था। सभी मेहमानों ने भर पेट खाया और फिर बाहर मंच पर आ गए। मंच के ऊपर मोटे मोटे गद्दे बिछे हुए थे और उनके पीछे मोटे मोटे तकिए रखे हुए थे। मंच काफी विशाल था जिसके चलते सभी ख़ास मेहमान बड़े आराम से उसमें आ सकते थे। मंच के नीचे एक बड़े से घेरे में नाचने वाली कई लड़कियां मौजूद थीं। उनके एक तरफ संगीत बजाने वाले कुछ कलाकार बैठे हुए थे। उसके बाद बाकी का जो मैदान था उसमें गांव के लोगों की भीड़ जमा थी जो नाच गाना देखने आए थे।

ऐसा नहीं था कि दादा ठाकुर को नाच गाना पसंद नहीं था लेकिन उन्हें ये तब पसंद आता था जब ये सब मर्यादा के अनुकूल हो। ज़्यादातर वो शास्त्रीय संगीत सुनना पसंद करते थे। उनके पिता के समय में जो नाच गाना होता था वो बहुत ही ज़्यादा अमर्यादित होता था जिसे वो कभी पसंद नहीं करते थे। यहां पर ज्ञानेंद्र सिंह ने जो कार्यक्रम शुरू करवाया था वो कुछ हद तक उन्हें पसंद था, हालाकि लड़कियों का अभद्र तरीके से नाचना उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं आ रहा था लेकिन ख़ामोशी से इस लिए बैठे हुए थे कि वो नहीं चाहते थे कि उनकी वजह से महेंद्र सिंह और ज्ञानेंद्र सिंह की खुशियों पर कोई खलल पड़े। दूसरी वजह ये भी थी कि वो इसी बहाने कुछ देर के लिए अपने अंदर की पीड़ा को भूल जाना चाहते थे।

बहरहाल नाच गाना चलता रहा। लोग ये सब देख कर खुशी से झूमते रहे। वातावरण में संगीत कम लोगों का शोर ज़्यादा सुनाई दे रहा था। आख़िर दो घण्टे बाद नाच गाना बंद हुआ और सभी मेहमान जाने लगे। महेंद्र सिंह के आग्रह पर अर्जुन सिंह भी रुक गए। दादा ठाकुर और अर्जुन सिंह को मेहमान कक्ष में सोने की व्यवस्था थी।

अर्जुन सिंह जब अपने कमरे में सोने लगे तो महेंद्र सिंह दादा ठाकुर के कमरे में आए। दादा ठाकुर पलंग पर लेट चुके थे और खुली आंखों से कुछ सोच रहे थे। महेंद्र सिंह को आया देख वो उठे और अधलेटी सी अवस्था में आ गए।

"हमने आपको तकलीफ़ तो नहीं दी ना ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने बड़े नम्र भाव से पास ही रखी एक कुर्सी पर बैठते हुए पूछा____"असल में सबके बीच आपसे ज़्यादा बातें करने का अवसर ही नहीं मिला।"

"ऐसी कोई बात नहीं है मित्र।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें भी अभी नींद नहीं आ रही थी। अच्छा हुआ आप आ गए।"

"काफी समय से हम आपसे एक बात कहना चाहते थे लेकिन फिर कहने का मौका ही नहीं मिला।" महेंद्र सिंह ने थोड़ी गंभीरता अख़्तियार करते हुए कहा____"हालात कुछ ऐसे हो गए जिनकी आपके साथ साथ हमने भी कभी कल्पना नहीं की थी। उन हालातों में हमने उस बात को आपसे कहना उचित नहीं समझा था। अब जबकि सब कुछ ठीक हो गया है तो हम सोचते हैं कि आपसे वो बात कह ही दें। शायद इससे बेहतर मौका हमें कहीं और ना मिले।"

"बिल्कुल कहिए मित्र।" दादा ठाकुर ने सामान्य भाव से कहा____"हम भी जानना चाहते हैं कि ऐसी कौन सी बात है जिसे कहने के लिए हमारे मित्र को इतना इंतज़ार करना पड़ा?"

"उस बात को कहने में हमें थोड़ा झिझक हो रही है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने सच में झिझकते हुए कहा____"लेकिन दिल यही चाहता है कि आपसे अपने मन की बात कह ही दें। हमारी आपसे गुज़ारिश है कि आप बेहद शांत मन से हमारी वो बात सुन लें उसके बाद आपका जो भी फ़ैसला होगा उसे हम अपने सिर आंखों पर रख लेंगे।"

"आपको अपने दिल की कोई भी बात हमसे कहने में झिझकने की आवश्यकता नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"आप हमारे मित्र हैं। हम अच्छी तरह जानते हैं कि आप हमसे जो भी कहेंगे अच्छा ही कहेंगे।"

"हमारी मंशा तो यही है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"और यकीन मानिए, हमारे मन में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल आया था और ना ही कभी आ सकता है।"

"आपको ये सब कहने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है।" दादा ठाकुर ने अधीरता से कहा____"हम अच्छी तरह जानते हैं कि आप हमारे ऐसे मित्र हैं जिन्होंने जीवन में कभी भी हमारे लिए ग़लत नहीं सोचा। आप अपनी बात बेफ़िक्र हो कर और बेझिझक हो के कहिए। हम आपको वचन देते हैं कि हम आपकी बात पूरी शांति से और पूरे मन से सुनेंगे।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने जैसे मन ही मन राहत की सांस लेते हुए कहा____"बात दरअसल ये है कि हम काफी समय से आपसे ये कहना चाहते थे कि क्यों न हम अपनी मित्रता को एक हसीन रिश्ते में बदल लें। स्पष्ट शब्दों में कहें तो ये कि हम अपने बेटे राघवेंद्र का विवाह आपकी भतीजी कुसुम के साथ करने की हसरत रखते हैं। क्या आप हमारी मित्रता को ऐसे हसीन रिश्ते में बदलने की कृपा करेंगे? हम जानते हैं कि आपसे हमने ऐसी बात कह दी है जिसे आपसे कहने की हमारी औकात नहीं है लेकिन फिर भी एक मित्र होने के नाते आपसे अपने बेटे के लिए आपकी भतीजी का हाथ मांगने की गुस्ताख़ी कर रहे हैं।"

महेंद्र सिंह की ये बातें सुन कर दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ बोल ना सके। चेहरे पर हैरानी के भाव लिए वो कुछ सोचते नज़र आए। ये देख महेंद्र सिंह की धड़कनें रुक गईं सी महसूस हुई।

"क...क्या हुआ ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने घबराए से लहजे में पूछा____"क्या आपको हमारी बातों से धक्का लगा है? देखिए अगर आपको हमारी बातों से चोट पहुंची हो तो हमें माफ़ कर दीजिए।"

"नहीं नहीं मित्र।" दादा ठाकुर ने अधीरता से कहा____"आप माफ़ी मत मांगिए। आपकी बातों से हमें बिलकुल भी चोट नहीं पहुंची है लेकिन हां, धक्का ज़रूर लगा है। धक्का इस बात का लगा है कि जो बात कभी हम आपसे कहना चाहते थे वही बात आज आपने खुद ही हमसे कह दी।"

"ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" महेंद्र ने अविश्वास भरे भाव से कहा____"हमारा मतलब है कि क्या सच में आप हमसे ऐसा कहना चाहते थे?"

"हां मित्र।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"ये तब की बात है जब हमारे परिवार के सदस्यों पर वैसे संकट जैसे हालात नहीं थे जैसों से जूझ कर हम सब यहां पहुंचे हैं और इतना ही नहीं उनमें हमने अपनों को भी खोया। ख़ैर कुसुम भले ही हमारे छोटे भाई जगताप की बेटी थी लेकिन उसको हम अपनी ही बेटी मानते आए हैं। हमारे मन में कई बार ये ख़याल आया था कि हम अपनी बेटी का विवाह आपके बेटे राघवेंद्र से करें। बहरहाल, हमारा ये ख़याल ख़याल ही रह गया और हालात ऐसे हो गए जैसे कुदरत का क़हर ही हम पर बरसने लगा था। हमने अपने बड़े बेटे और छोटे भाई को खो दिया। अगर अपने अंदर का सच बताएं मित्र तो वो यही है कि अंदर से अब हम पूरी तरह से टूट चुके हैं। इस सबके बाद अगर हमें बाकी सबका ख़याल न होता तो कब का हम सब कुछ छोड़ कर किसी ऐसी दुनिया में चले गए होते जहां न कोई माया मोह होता और ना ही किसी तरह का बंधन....अगर कुछ होता तो सिर्फ शांति।"

"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने अधीरता से कहा____"आप जैसे विशाल हृदय वाले इंसान को इस तरह से विचलित होना शोभा नहीं देता। हम मानते हैं कि पिछले कुछ समय में आपने जो कुछ सहा है और जो कुछ खोया है वो वाकई में असहनीय था लेकिन आप भी जानते हैं कि ये सब ऊपर वाले के ही खेल होते हैं। वो हम इंसानों को मोहरा बना कर जाने कैसे कैसे खेल खेलता रहता है।"

"अगर बात सिर्फ खेल की ही होती तो कदाचित हमें इतनी तकलीफ़ ना हुई होती मित्र।" दादा ठाकुर ने सहसा दुखी हो कर कहा____"यहां तो ऐसी बात हुई है जिसके बारे में हम कल्पना ही नहीं कर सकते थे। उस दिन जब आप हमारे यहां आए थे और सफ़ेदपोश के बारे में पूछ रहे थे तो हमने आपको उसके बार में पूछने से मना कर दिया था। जानते हैं क्यों? क्योंकि हम ऐसी हालत में ही नहीं हैं कि किसी को सफ़ेदपोश के बारे में बता सकें। आप जब वापस चले गए तो हमें ये सोच कर दुख हो रहा था कि हमने अपने मित्र को इस बारे में नहीं बताया। भला ये कैसी मित्रता है कि हम अपने मित्र से ही कोई बात छुपाएं? मित्र तो वो होता है ना जो अपने मित्र से कुछ भी न छुपाए लेकिन हमने छुपाया मित्र। अपने दिल पर पत्थर रख कर छुपाया हमने।"

"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह दादा ठाकुर को आहत और दुखी हालत में देख खुद भी दुखी नज़र आए____"यकीन मानिए आपके छुपाए जाने से हमें बिलकुल भी बुरा नहीं लगा था। हां, ये सोच कर दुख ज़रूर हुआ था कि ये विधाता की कैसी क्रूरता है जिसके चलते आपकी ऐसी दशा हो गई थी? आप इस बारे में ये सब सोच कर खुद को दुखी मत कीजिए मित्र। हमारी आपसे वर्षों की मित्रता है और हम वर्षों से आपको जानते हैं कि आप कितने महान इंसान हैं।"

"नहीं मित्र।" दादा ठाकुर के चेहरे पर एकाएक कठोरता के भाव उभर आए____"हमारे जैसा इंसान अब महान नहीं रहा। भला वो इंसान महान हो भी कैसे सकता है जिसने एक ही झटके में इतने सारे लोगों को मार डाला हो? वो इंसान महान कैसे हो सकता है जिसने हर किसी से सफ़ेदपोश का सच छुपाया और....और वो व्यक्ति भला कैसे महान हो सकता है मित्र जिसके अपने ही छोटे भाई ने सफ़ेदपोश के रूप में अपने ही बड़े भाई और उसके समूचे परिवार को नेस्तनाबूत कर देने का षडयंत्र रचा?"

"ये....ये क्या कह रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह को ज़बरदस्त झटका लगा____"आपके छोटे भाई जगताप थे सफ़ेदपोश? हे भगवान! ये कैसे हो सकता है?"

"यही सच है मित्र।" दादा ठाकुर ने आहत भाव से कहा____"इसी लिए तो हम ये बात किसी को बता नहीं सकते कि सफ़ेदपोश असल में हमारा ही छोटा भाई जगताप था।"

"बड़ी हैरतअंगेज़ बात बता रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह के चेहरे पर अभी भी आश्चर्य नाच रहा था____"लेकिन अगर आपके भाई ही सफ़ेदपोश थे तो फिर वो आपके द्वारा पकड़े कैसे गए? हमारा मतलब है कि उनकी तो साहूकारों ने चंद्रकांत के साथ मिल कर हत्या कर दी थी ना? फिर वो ज़िंदा कैसे हुए?"

"उसके ज़िंदा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता मित्र।" दादा ठाकुर ने कहा____"सच बात ये है कि उसकी मौत के बाद सफ़ेदपोश का लिबास उसकी पत्नी यानि मेनका ने पहन लिया था और फिर उसी ने उसके काम को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था।"

"हे भगवान! ये तो और भी ज़्यादा आश्चर्यचकित कर देने वाली बात है।" महेंद्र सिंह ने आश्चर्य से आंखें फैलाते हुए कहा____"यकीन नहीं होता कि एक औरत होने के बावजूद उन्होंने सफ़ेदपोश बन कर ऐसे दुस्साहस से भरे काम किए।"

"सच जानने के बाद हम भी इसी तरह चकित हुए थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन उससे ज़्यादा ये सोच कर दुखी हुए कि हमारे अपने ही हमें अपना जन्म जात शत्रु माने हुए थे और हमें मिटाने पर तुले हुए थे।"

महेंद्र सिंह के पूछने पर दादा ठाकुर ने संक्षेप में सारा किस्सा बता दिया जिसे सुन कर महेंद्र की मानों बोलती ही बंद हो गई। आख़िर कुछ देर में उनकी हालत सामान्य हुई।

"वाकई, ये सच तो यकीनन दिल दहला देने वाला और पूरी तरह जान निकाल देने वाला है।" फिर उन्होंने कहा____"आपके मुख से ये सब सुनने के बाद जब हमारी ख़ुद की हालत बहुत अजीब सी हो गई है तो आपकी हालत का अंदाज़ा हम बखूबी लगा सकते हैं। समझ में नहीं आ रहा कि जगताप जैसे सुलझे हुए इंसान के मन में ये सब करने का ख़याल कैसे आ गया था? क्या सच में इंसान की सोच इतना जल्दी गिर जाती है? क्या सच में इंसान धन दौलत के लालच में और सिर्फ अपने हितों के बारे में सोचने के चलते इतना क्रूर बन जाता है? ठाकुर साहब, आपकी तरह हम भी ये कल्पना नहीं कर सकते थे लेकिन सच तो सच ही है। हम आपसे यही कहेंगे कि इस सबके बारे में सोच कर अपने आपको दुखी मत रखिए। इस संसार में सच की सूरत ज़्यादातर कड़वी ही देखने को मिलती है।"

"सही कहा आपने।" दादा ठाकुर ने कहा____"हम भी इस कड़वे सच को हजम करने की नाकाम कोशिशों में लगे हुए हैं। ख़ैर अब हम आपसे ये कहना चाहते हैं कि इस सच को जानने के बाद भी क्या आप अपने बेटे का विवाह हमारी बेटी से करने का सोचते हैं?"

"बिल्कुल ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने दृढ़ता से कहा____"मानते हैं कि जो कुछ हुआ बहुत भयानक और हैरतअंगेज़ था लेकिन इसमें उस बच्ची का तो कहीं कोई दोष ही नहीं है। जिसने बुरी नीयत से दुष्कर्म किया उसको उसकी करनी की सज़ा मिल चुकी है। मंझली ठकुराईन को भी अपनी ग़लतियों का एहसास हो चुका है जिसके चलते वो प्रायश्चित कर रही हैं। ऐसे में हम भला ये क्यों सोचेंगे कि हम अपने बेटे का विवाह आपकी भतीजी से न करें? ठाकुर साहब, आप हमारे मित्र हैं और संबंध हमें आपसे बनाना है।"

"हमने भले ही उसे अपनी बेटी माना है मित्र।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन जिस सच्चाई से हम रूबरू हुए हैं उसके बाद ऐसा लगने लगा है जैसे अब हमारा अपने के रूप में कोई नहीं है। काश! वो सचमुच में हमारी ही बेटी होती तो हम खुशी खुशी आपका ये प्रस्ताव स्वीकार कर लेते लेकिन उसमें अब हमारा कोई हक़ नहीं है। अगर आप सच में चाहते हैं कि उसी के साथ आपके बेटे का विवाह हो तो इसके लिए आपको उसकी मां से बात करना होगा जिसने सचमुच में उसे पैदा किया है।"

"शायद आप ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"इतना सब कुछ होने के बाद आपकी मानसिकता इस तरह की हो जाना स्वाभाविक ही है। वाकई पहले जैसी बात नहीं हो सकती है। ख़ैर, अगर आप सच में ऐसा ही चाहते हैं तो हम ज़रूर उन्हीं से बात करेंगे। उम्मीद है कि वो अपनी बेटी का विवाह हमारे बेटे से करने को तैयार हो जाएंगी।"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद महेंद्र सिंह चले गए। उनके जाने के बाद दादा ठाकुर काफी देर तक इस बारे में सोचते रहे। मन में जाने कैसे कैसे ख़्याल उभर रहे थे जिसके चलते उनका मन व्यथित होने लगता था। बड़ी मुश्किल से उन्हें नींद आई।

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अपने कमरे में मैं पलंग पर लेटा हुआ था। मन में बहुत कुछ चल रहा था। ख़ास कर भाभी से हुई बातें। मैंने महसूस किया जैसे आज का दिन बड़ा ही ख़ास था। आज एक अजब संयोग भी हुआ था। इधर मैं अपने दिल की बातें भाभी से कहने पहुंचा और उधर मेरी तमाम उम्मीदों के विपरीत मुझे ये पता चला कि भाभी भी मुझसे विवाह करने को राज़ी हो गईं हैं। इतना ही नहीं इस बात की ख़बर देने उनका भाई मेरे साथ ही हवेली आ गया था। माना कि अब यही सच था लेकिन मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि सचमुच ये रिश्ता एक दिन अटूट बंधन के रूप में और पूरी मान्यताओं के साथ बंध जाएगा।

मैं सोचने लगा कि वाकई में किस्मत बड़ी हैरतअंगेज़ बला होती है। या फिर ये कहूं कि ऊपर वाले का खेल बड़ा ही अजीब होता है। इंसान की हर कल्पना से परे होता है। मैं एकदम से अपनी ज़िंदगी में हुए इस अविश्वसनीय परिवर्तनों के बारे में सोचने लगा।

एक वक्त था जब मैं सिर्फ मौज मस्ती और अय्याशियों में ही मगन रहता था। मेरे लिए जैसे ज़िंदगी का असली आनंद ही इसी सब में था। मैं शुरू से ही बड़ा निडर, दुस्साहसी और गुस्सैल स्वभाव का रहा था लेकिन इस सबके बीच मेरे अंदर कहीं न कहीं कोमल भावनाएं भी थी और इस बात का बोध भी था कि कम से कम मैं अपनी कुदृष्टि अपने ही घर की बहू बेटी पर न डालूं। यानि मैं ये समझता था कि ऐसा करना ऊंचे दर्ज़े का पाप है। शायद यही वजह थी कि मैंने कभी ऐसा किया भी नहीं था। हां, भाभी के रूप सौंदर्य पर ज़रूर आकर्षित हो जाया करता था जोकि सच कहूं तो ये मेरे बस में था भी नहीं। पहले भी बता चुका हूं कि वो थीं ही इतनी सुंदर और सादगी से भरी हुईं।

जब मुझे एहसास हो गया कि मैं उनके रूप सौंदर्य से खुद को आकर्षित होने से रोक नहीं सकता तो मैंने हवेली में रहना ही कम कर दिया था। कभी दोस्तों के घर में तो कभी कहीं, यही मेरी ज़िंदगी बन गई थी। दो दो तीन तीन दिन मैं हवेली से ग़ायब रहता। जैसा कि मैंने बताया मैं बहुत ही निडर दुस्साहसी और गुस्सैल स्वभाव का था इस लिए मैं जहां भी जाता अपनी छाप छोड़ देता था। हालाकि इस सबके पीछे पिता जी का नाम भी जैसे मेरा मददगार ही होता था। कोई भी मुझसे उलझने की कोशिश नहीं करता था। यही वजह थी कि मेरे नाम का डंका दूर दूर तक बज चुका था।

मेरे दुस्साहस की वजह से बड़े बड़े लोग भी मेरे संपर्क में आ गए थे जो अपने मतलब के लिए मुझसे सहायता मांगते थे और मैं बड़े शान से उनकी सहायता कर भी देता था। ये उसी का परिणाम था कि मेरी पहुंच और मेरे संबंध आम लोगों की नज़र में हैरतअंगेज़ बात थी। जिस जगह पर और जिस चीज़ पर मैंने हाथ रख दिया वो मेरी होती थी और अगर किसी ने विरोध किया तो परिणाम बुरा ही होता था। मेरे इन कारनामों की वजह से पिता जी चकित तो होते ही थे किंतु परेशान और चिंतित भी रहते थे। मेरी हरकतों की वजह से उनका नाम ख़राब होता था। इसके लिए मुझे हर बार दंड दिया जाता था जोकि कोड़ों की मार की शक्ल में ही होता था लेकिन मजाल है कि ठाकुर वैभव सिंह में कभी कोई बदलाव आया हो। मैं बड़े शौक से पिता जी की सज़ा क़बूल करता था और कोड़ों की मार सहता था उसके बाद फिर से उसी राह पर चल पड़ता था जिसमें मुझे अत्यधिक आनन्द आता था।

गांव के साहूकारों के लड़के शुरू से ही मुझे अपना दुश्मन समझते थे। इसकी वजह सिर्फ ये नहीं थी कि बड़े दादा ठाकुर ने उनके साथ बुरा किया था बल्कि ये भी थी कि मैं उनकी सोच और कल्पनाओं से बहुत ज़्यादा उड़ान भर रहा था। ये सच है कि मैं उनसे उलझने की कभी पहल नहीं करता था लेकिन जब वो पहल करते थे तो उन्हें बक्शता भी नहीं था। अपने गांव में ही नहीं बल्कि आस पास गांवों में भी मेरा यही रवैया था। मैं मौज मस्ती और अय्याशियों में इतना खो गया था कि मुझे इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कब मेरे दामन पर बदनामी की कालिख लग चुकी थी?

ऐसे ही ज़िंदगी गुज़र रही थी और फिर एक दिन पिता जी ने मुझे गांव से निष्कासित कर दिया। बस, यहीं से मेरी ज़िंदगी में जैसे परिवर्तन होना शुरू हो गया था। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन में कभी ऐसे दिन आएंगे जो मुझे धीरे धीरे बदलना शुरू कर देंगे। मुरारी की लड़की अनुराधा पर जब मेरी नज़र पड़ी थी तो ये सच है कि उसको भी मैंने बाकी लड़कियों की तरह भोगना ही चाहा था लेकिन ऐसा नहीं कर सका। कदाचित ये सोच कर कि जिस घर के मुखिया ने मुझे अपना समझा और मेरी इतनी मदद की मैं उसी की बेटी की इज्ज़त कैसे ख़राब कर सकता हूं? सरोज से नाजायज़ संबंध ज़रूर बन गया था लेकिन इसमें भी सिर्फ मेरा ही बस दोष नहीं था। सरोज ने ही मुझे इसके लिए इशारा किया था और अपना जिस्म दिखा दिखा कर ये जताया था कि वो मुझसे चुदना चाहती है। मैं तो जिस्म का भूखा था ही, दूसरे निष्कासित किए जाने से अंदर गुस्सा भी भरा हुआ था इस लिए मैंने बिल्कुल भी नहीं सोचा कि ये मैं किसके साथ दुष्कर्म करने जा रहा हूं?

कई बार मन बनाया कि किसी दिन अकेले में अनुराधा को पटाने की कोशिश करूंगा और उसको अपने मोह जाल में फंसाऊंगा लेकिन हर बार जाने क्यों ऐसा करने के लिए मेरे ज़मीर ने मुझे रोक लिया। उसकी मासूमियत, उसका भोलापन धीरे धीरे ही सही लेकिन मेरे दिलो दिमाग़ में जैसे घर करने लगा था। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैं उसकी मासूमियत, उसके भोलेपन और उसकी सादगी पर मर मिटा था। मेरे सामने उसका छुई मुई हो जाना, शर्म से सिमट जाना, मेरे ठकुराईन कहने पर पहले तो नाराज़ होना और फिर शर्म के साथ मुस्कराने लगना ये सब मेरे दिल में रफ़्ता रफ़्ता एक अलग ही एहसास पैदा करते जा रहे थे। एक समय ऐसा आया जब मैं खुद महसूस करने लगा कि मेरे दिल में अनुराधा के प्रति एक ऐसी भावना ने जन्म ले लिया है जो अब तक किसी के लिए भी पैदा नहीं हुई थी। फिर एक दिन उसने मुझे बड़ी कठोरता से दुत्कार दिया और मुझे ये एहसास करा दिया कि मैं किसी कीमत पर उसे हासिल नहीं कर सकता हूं। हालाकि ऐसा मेरा कोई इरादा भी नहीं था लेकिन उसकी नज़र में तो ऐसा ही था। उस दिन बड़ी तकलीफ़ हुई थी मुझे। ऐसा लगा था जैसे पहली बार किसी ने मेरे दिल को चीर दिया हो। मामला जब दिल से संबंध रखने लगता है तो उसकी एक अलग ही कहानी शुरू हो जाती है जिसके एहसास में इंसान बड़ा विचित्र सा हो जाता है। वही मेरे साथ हुआ। अनुराधा से दूर हो जाना पड़ा, किंतु ये दूरी भी जैसे नियति का ही कोई खेल थी। यकीनन मेरे जैसे चरित्र का लड़का इस दूरी से इतना विचलित नहीं होता और एक बार फिर से अपने पुराने अवतार में आ जाता लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नियति मुझे प्रेम का पाठ पढ़ाना चाहती थी। मेरे दिल में ठूंस ठूंस कर प्रेम के एहसास भर देना चाहती थी और ऐसा ही हुआ। मैं भला कैसे नियति के विरुद्ध चला जाता? आज तक भला कोई जा पाया है जो मैं चला जाता?

मैं क्या जनता था कि नियति मेरे साथ आगे चल कर कितना बड़ा धोखा करने वाली थी। एक तरफ तो वो मेरे दिल में प्रेम के एहसास भर रही थी और दूसरी तरफ जिसके लिए एहसास भर रही थी उसको हमेशा के लिए मुझसे दूर कर देने का समान भी जुटाए जा रही थी। अगर मुझे पता होता कि मेरे प्रेम के चलते उस मासूम का ऐसा भनायक अंजाम होगा तो मैं कभी उसके क़रीब न जाता। मुझे ऐसा प्रेम नहीं चाहिए था और ना ही अपने लिए ऐसा बदलाव चाहिए था जिसके चलते किसी निर्दोष का जीवन ही छिन जाए। मगर ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ, बल्कि हुआ तो वो जिसने हम सबको हिला कर रख दिया।

बहरहाल, वक्त कभी नहीं रुकता। वो चलता ही जाता है और उसी के साथ चीज़ें भी बदलती जाती हैं। मेरे जीवन में रूपा का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। बड़ी अजीब लड़की है वो। एक ऐसे लड़के से प्रेम कर बैठी थी जो हमेशा प्रेम को बकवास कहता था। इतना सब कुछ होने के बाद जब फिर से उससे मुलाक़ात हुई तो इस बार मैं उसके प्रेम को बकवास नहीं कह सका। कहता भी कैसे? प्रेम जैसी बला से अच्छी तरह वाकिफ़ जो हो गया था मैं, बल्कि ये कहना चाहिए कि नियति ने मुझे अच्छी तरह प्रेम से परिचित करा दिया था।

मैं पूरे यकीन से कहता हूं कि रूपा इस युग की लड़की नहीं हो सकती। वो ग़लती से इस युग में पैदा हो गई है। इस युग की लड़की के अंदर इतने अद्भुत गुण नहीं हो सकते। ख़ैर, सच जो भी हो लेकिन ये तो सच ही था कि ऐसी अद्भुत लड़की ने मुझे एक नया जीवन दिया और उससे भी बढ़ कर मुझसे प्रेम किया। एक ऐसा प्रेम जिसके बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। उसका हृदय मानों ब्रम्हांड की तरह विशाल है। वो सब कुछ क़बूल कर सकती है। वो सबको अपना समझ सकती है। मुझे बेइंतहा प्रेम करती है लेकिन मुझ पर अपना कोई हक़ नहीं समझती। मैं नतमस्तक हूं उसके इस प्रेम के सामने। काश! हर जन्म में वो मुझे इसी रूप में मिले, लेकिन एक शर्त है कि मेरे अंदर भी उसके जैसा ही प्रेम हो ताकि मैं भी उसको उसी के जैसा प्रेम कर सकूं।

बहरहाल, ये सब कुछ मेरी कल्पनाओं से परे था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा भी कभी होगा लेकिन हुआ। उधर नियति का जैसे अभी भी मन नहीं भरा था तो उसने फिर से एक बार कुछ ऐसा किया जो एक बार फिर मेरे लिए कल्पना से परे था। मेरी भाभी को मेरी पत्नी बनाने का खेल रचा नियति ने। वजह, आप सब जानते हैं। माना कि ये एक जायज़ वजह है लेकिन ये भी तो ख़याल रखना चाहिए था कि क्या कोई इतनी आसानी से ये हजम भी कर लेगा? ख़ैर ऐसा लगता है जैसे कुछ सवालों के जवाब ही नहीं होते और अगर होते हैं तो बताए नहीं जाते।

पलंग पर लेटा मैं जाने क्या क्या सोचे जा रहा था। कुछ ही देर में जैसे मैंने अपने जीवन को शुरू से जी लिया था। आज के हालात और आज की तस्वीर बड़ी अजब थी। बहरहाल, जो कुछ भी था उसको क़बूल करना ही जैसे अब सबके हित में था और ये मैं समझ भी चुका था। मैं अपनी भाभी को हमेशा ख़ुश देखना चाहता हूं। अगर उनकी ख़ुशी के लिए मुझे इस हद तक भी गुज़र जाना लिखा है तो यकीनन गुज़र जाऊंगा।




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बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया
 

Sanju@

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अध्याय - 143
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"मुझे ग़लत मत समझना वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन इस बारे में मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकता।"

मैं मूर्खों की तरह देखता रह गया उसे। रूपचंद्र के चेहरे पर खेद पूर्ण भाव थे। कुछ देर वो ख़ामोशी से मुझे देखता रहा उसके बाद मेरे कंधे पर हल्के से हाथ की थपकी देने के बाद चला गया। मुझे समझ ना आया कि अब ये क्या चक्कर है?



अब आगे....


रसोई में रागिनी अपनी भाभी वंदना का खाना बनाने में हाथ बंटा रही थी। यूं तो घर में उसे कोई भी काम करने के लिए नहीं कहता था लेकिन उसे खुद ही अच्छा नहीं लगता था कि वो बैठ के सिर्फ खाना खाए। पहले भी उसे काम करना बेहद पसंद था और आज भी वो खाली बैठना पसंद नहीं करती थी।

कुछ समय पहले तक सब ठीक ही था लेकिन फिर एक दिन उसके ससुर यानि दादा ठाकुर यहां आए। उन्होंने उसके पिता से उसके ब्याह के संबंध में जो भी बातें की उसके बारे में जान कर उसे बड़ा झटका लगा था। पहले तो ये बात उसे अपनी भाभी वंदना ने ही बताया और फिर रात में उसकी मां ने बताया। रागिनी के लिए वो सारी बातें ऐसी थीं कि उसके बाद से जैसे उसका हंसना मुस्कुराना ही बंद हो गया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके ससुर उसका फिर से ब्याह करने की चर्चा करने उसके पिता के पास आए थे। बात अगर सिर्फ इतनी ही होती तो कदाचित उसे इतना झटका नहीं लगता किंतु झटके वाली बात ये थी कि उसके ससुर उसका ब्याह उसके ही देवर से करने की बात बोले थे।

रागिनी के लिए ये बात किसी झटके से कम नहीं थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके ससुर ऐसा कैसे चाह सकते थे और उसके खुद के पिता भी उनकी इस बात को मंजूरी कैसे दे सकते थे? अब क्योंकि वो खुद किसी से इस बारे में कुछ कह नहीं सकती थी इस लिए अंदर ही अंदर वो इस बात से परेशान हो गई थी। दो तीन दिन तक यही आलम रहा लेकिन फिर उसकी मां के समझाने पर वो थोड़ा सामान्य होने लगी थी। हालाकि अंदर से वो अभी भी बेचैन थी।

वैभव को उसने देवर के साथ साथ हमेशा ही अपना छोटा भाई समझा था। वो अच्छी तरह जानती थी कि वैभव कैसे चरित्र का लड़का है इसके बाद भी वो ये समझती थी कि वैभव ने कभी उसे ग़लत नज़र से नहीं देखा था। हालाकि ये सिर्फ उसका सोचना ही था क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी के अंदर की बात पूर्ण रूप से नहीं जान रहा होता है, ये तो बस उसका विश्वास था।

"अब इतना भी मत सोचो रागिनी।" वंदना ने उसे ख़ामोशी से काम करते देखा तो बोल पड़ी____"तुम भी अच्छी तरह समझती हो कि तुम्हारे ससुर जी और तुम्हारे पिता जी तुम्हारी भलाई के लिए ही ऐसा चाहते हैं। सच कहूं तो इस रिश्ते के लिए किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है। तुम्हें पता है, तुम्हारे भैया से हर रोज़ मेरी इस बारे में बात होती है। उनका भी यही कहना है कि तुम्हारा वैभव के साथ ब्याह कर देने का फ़ैसला बिल्कुल भी ग़लत नहीं है। देवर से भाभी का ब्याह हो जाना कोई ग़लत नहीं है। ऐसा तो हमेशा से होता आया है।"

"मैं दुबारा ब्याह करने से इंकार नहीं कर रही भाभी।" रागिनी ने गंभीर भाव से कहा____"मैं सिर्फ ये कह रही हूं कि वैभव से ही क्यों? जिसे अब तक मैं अपने देवर के साथ साथ अपना छोटा भाई समझती आई हूं उसे एकदम से पति की नज़र से कैसे देखने लगूं? आप लोगों ने तो कह दिया लेकिन आप लोग ये नहीं समझ रहे हैं कि इस बारे में मैं क्या महसूस करती हूं।"

"ऐसा नहीं है रागिनी।" वंदना ने कहा____"हम सबको एहसास है कि इस रिश्ते के बारे में तुम इस समय कैसा महसूस करती होगी। तुम्हारी जगह मैं होती तो मेरा भी यही कहना होता लेकिन जीवन में हमें इसके अलावा भी कई सारी बातें सोचनी पड़ती हैं। तुम्हारा कहना है कि वैभव से ही क्यों? यानि तुम्हें वैभव से ब्याह करने में आपत्ति है, जबकि नहीं होनी चाहिए। ऐसा इस लिए क्योंकि तुम उसके बारे में पहले से ही सब कुछ जानती हो। तुम जानती हो कि वो तुम्हारी कितनी इज्ज़त करता है और कितनी फ़िक्र करता है। तुम्हीं ने बताया था कि वो तुम्हारे होठों पर मुस्कान लाने के लिए क्या क्या करता रहता है। सोचने वाली बात है रागिनी कि जो व्यक्ति तुम्हारी खुशी के लिए इतना कुछ करता हो और तुम्हें इतना चाहता हो उससे ब्याह करने से इंकार क्यों? किसी दूसरे व्यक्ति से ब्याह करने का सोचती हो तो बताओ क्या वो व्यक्ति वैभव की तरह तुम्हें मान सम्मान देगा? क्या वो वैभव की तरह तुम्हें चाहेगा और क्या उसके घर वाले तुम्हें अपने घर की शान बना लेंगे?"

रागिनी कुछ बोल ना सकी किंतु चेहरे से स्पष्ट नज़र आ रहा था कि उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था। वंदना कुछ देर तक उसे देखती रही।

"मैं जानती हूं कि तुमने अपने जीवन में कभी किसी लड़के का ख़याल भी अपने मन में नहीं लाया था।" फिर उसने रागिनी के दोनों कन्धों को पकड़ कर बड़े स्नेह से कहा____"तुम्हारे जीवन में जो आया वो सिर्फ तुम्हारा पति ही था। यही वजह है कि तुम किसी और के बारे में ऐसा सोचना ही नहीं चाहती, ख़ास कर वैभव के बारे में। तुम भी जानती हो कि शादी से पहले लड़का लड़की एक दूसरे के लिए अजनबी ही होते हैं। दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति कई तरह की आशंकाएं रहती हैं। ख़ास कर लड़की ये सोच कर परेशान हो जाती है कि जाने कैसा होगा उसका होने वाला पति और फिर आगे जाने क्या होगा? लेकिन जब दोनों की शादी हो जाती है और दोनों साथ रहने लगते हैं तो मन की सारी आशंकाएं अपने आप ही दूर होती चली जाती हैं। एक वक्त ऐसा आता है जब दोनों को एक दूसरे से बेहद लगाव हो जाता है और फिर दोनों को ये भी लगने लगता है जैसे वो दोनों एक दूसरे के लिए ही बने थे। तुम्हारे लिए तो सबसे अच्छी बात यही है कि तुम अपने होने वाले पति के बारे में पहले से ही सब कुछ जानती हो। सबसे बड़ी बात ये जानती हो कि वो तुम्हें कितना चाहता है और तुम्हारी कितनी फ़िक्र करता है। एक औरत को इससे ज़्यादा और क्या चाहिए होता है? भूल जाओ कि तुम वैभव की भाभी हो या वैभव तुम्हारा देवर है। मन में सिर्फ ये रखो कि वो एक ऐसा लड़का है जिससे तुम्हारा ब्याह होना है।"

"यही तो नहीं कर पा रही भाभी।" रागिनी ने जैसे आहत हो कर कहा____"उसके बारे में एक पल में सब कुछ भूल जाना आसान नहीं है। मेरा तो ये सोच कर हृदय कांप जाता है कि जब उसे सच का पता चलेगा तो क्या सोचेगा वो मेरे बारे में? अगर उसने एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो कैसे नज़रें मिला पाऊंगी उससे?"

"ऐसा सिर्फ तुम सोचती हो रागिनी।" वंदना ने कहा____"ऐसा भी तो हो सकता है कि वो तुम्हारे बारे में ऐसा कुछ सोचे ही नहीं बल्कि ये सोच ले कि वो कितना किस्मत वाला है जो उसके जीवन में तुम जैसी लड़की पत्नी के रूप में मिलने वाली है। आख़िर तुम्हारी अच्छाईयां और तुम्हारी खूबियों के बारे में तो उसे पता ही है। मुझे पूरा यकीन है कि जब उसे इस सच का पता चलेगा तो वो सपने में भी तुम्हारे बारे में ग़लत नहीं सोचेगा। बल्कि यही सोचेगा कि अब वो पूरे हक़ से और पूरी आज़ादी के साथ तुम्हें खुश रखने का प्रयास कर सकेगा। हां रागिनी, जितना कुछ तुमने उसके बारे में मुझे बताया है उससे मैं पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि वैभव इस रिश्ते को ख़ुशी से स्वीकार करेगा और ब्याह के बाद तुम्हें बहुत खुश रखेगा।"

रागिनी के समूचे बदन में झुरझूरी सी दौड़ गई। उसे बड़ा अजीब लग रहा था। चेहरे पर अभी भी पहले जैसी गंभीरता और उदासी छाई हुई थी।

"एक बार अपने सास ससुर के बारे में भी सोचो रागिनी।" वंदना ने कुछ सोचते हुए कहा____"तुम्हीं बताया करती थी ना कि वो दोनों तुम्हें बहू नहीं बल्कि अपनी बेटी मानते हैं और तुम्हें अपनी हवेली की शान समझते हैं। इसी से ज़ाहिर होता है कि वो तुम्हें कितना चाहते हैं। वैभव से तुम्हारा ब्याह करवा देने के पीछे उनकी यही भावना है कि तुम हमेशा उनकी बेटी बन कर उनकी हवेली की शान ही बनी रहो और साथ ही फिर से सुहागन बनने के बाद एक खुशहाल जीवन जियो। मानती हूं कि इतनी कम उमर में तुम्हें विधवा बना कर ऊपर वाले ने तुम्हारे साथ अच्छा नहीं किया है लेकिन मैं ये भी मानती हूं कि तुम बहुत भाग्यशाली हो जो तुम्हें इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे हितों के बारे में सोचते हैं। वरना मैंने ऐसे भी लोग देखे और सुने हैं जो अपनी बहू के विधवा हो जाने पर उसे नौकरानी बना कर सारा जीवन उसे दुख देते रहते हैं। शायद यही सब पिता जी ने और तुम्हारे भैया ने भी सोचा होगा। माना कि तुम्हारे सास ससुर ऐसे नहीं हैं लेकिन कोई भी माता पिता ये नहीं चाहते कि उनकी बेटी विधवा के रूप में जीवन भर कष्ट सहे। तुम्हारा फिर से ब्याह करने की बात तुम्हारे अपने सास ससुर ने की है। ज़ाहिर है वो भी ऐसा नहीं चाहते और फिर जब उन्होंने यहां आ कर पिता जी से इस रिश्ते की बात कही तो पिता जी भी झट से मान गए थे। इस डर से नहीं कि तुम्हारा क्या होगा बल्कि इस खुशी में कि अपनी बेटी का जिस तरह से भला वो खुद चाहते थे वैसा उनकी बेटी के सास ससुर खुद ही चाहते हैं। तुम्हीं सोचो कि आज के युग में ऐसे महान सास ससुर कहां मिलते हैं जो अपनी बहू के बारे में इतना कुछ सोचें?"

"हां ये तो आप सही कह रही हैं।" रागिनी ने सिर हिलाते हुए धीमें से कहा____"इस मामले में मेरे सास ससुर बहुत अच्छे हैं। उन्होंने कभी भूल से भी किसी तरह का मुझे कोई कष्ट नहीं दिया। इतना कुछ हो जाने के बाद भी उन्होंने मुझे किसी बात का ताना नहीं मारा बल्कि मेरे दुख से दुखी हो कर हमेशा मुझे अपने सीने से लगाए रखा था।"

"इसी लिए तो कहती हूं रागिनी कि तुम बहुत भाग्यशाली हो।" वंदना ने कहा____"पूर्व जन्म में तुमने ज़रूर बहुत अच्छे कर्म किए थे जिसके चलते इस जन्म में तुम्हें इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं। पति में भी कोई ख़राबी नहीं थी, वो तो उन बेचारे की किस्मत ही ख़राब थी जिसके चलते ऊपर वाले ने उन्हें अपने पास बुला लिया। तुम्हारे देवर के बारे में तुमसे बेहतर कौन जान सकता है? सच तो ये है कि तुम्हारे ससुराल में हर कोई बहुत अच्छा है। इस लिए मैं तो यही कहूंगी कि तुम अब कुछ भी मत सोचो, ईश्वर ने तुम्हारी खुशियां छीनी थी तो उसने फिर से तुम्हें खुशियां देने के लिए इस तरह का रिश्ता भेज दिया है। इसे ख़ुशी ख़ुशी क़बूल करो और वैभव के साथ जीवन में आगे बढ़ जाओ।"

अभी रागिनी कुछ कहने ही वाली थी कि तभी रसोई में कामिनी आ गई। उसने बताया कि पिता जी और भैया खेतों से आ गए हैं और हाथ मुंह धोने के बाद जल्दी ही बरामदे में खाना खाने के लिए आ जाएंगे। कामिनी की इस बात के बाद वंदना और रागिनी जल्दी जल्दी थाली सजाने की तैयारी करने लगीं।

✮✮✮✮

रूपचंद्र के जाने के बाद मेरे मन में विचारों का जैसे बवंडर सा उठ खड़ा हुआ था। वो तो चला गया था लेकिन मुझे उलझा गया था। मैं सोचने लगा था कि आख़िर कौन से सच की बात कर रहा था वो और तो और वो ख़ुद क्यों नहीं बता सकता था? आख़िर ऐसा कौन सा सच होगा जिसे मैं अपने माता पिता से ही जान सकता था?

दोपहर तक मैं इसी तरह विचारों में उलझा रहा और मजदूरों को काम करते हुए देखता रहा। उसके बाद मैं खाना खाने के लिए मोटर साईकिल में बैठ कर हवेली की तरफ चल पड़ा। मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि मौका मिलते ही मां से पूछूंगा कि अभी ऐसा क्या है जिसे उन्होंने मुझे नहीं बताया है?

हवेली पहुंचा तो देखा पिता जी खाना खाने बैठ चुके थे। मुंशी किशोरी लाल भी बैठा हुआ था। मुझे आया देख मां ने मुझे भी हाथ मुंह धो कर बैठ जाने के लिए कहा। मैं फ़ौरन ही हाथ मुंह धो के आया और कुर्सी पर बैठ गया। कुसुम और कजरी खाना परोसने लगीं। खाना खाने के दरमियान हमेशा की ही तरह ख़ामोशी रही। पिता जी को खाते वक्त बातें करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था।

खाना पीना कर के जब पिता जी और मुंशी जी चले गए तो मैंने मां की तरफ देखा। मुझे पिता जी और मुंशी जी की तरह कुर्सी से उठ कर न गया देख मां समझ गईं कि कोई बात है जिसके चलते मैं अभी भी कुर्सी पर बैठा हुआ था।

"क्या हुआ बेटा?" मां ने मेरे क़रीब आ कर बड़े स्नेह से कहा____"भोजन तो कर चुका है तू, फिर बैठा क्यों है? आराम नहीं करना है क्या तुझे?"

"आराम बाद में कर लूंगा मां।" मैंने कहा____"इस वक्त मुझे आपसे कुछ जानना है और उम्मीद करता हूं कि आप मुझे सब कुछ सच सच बताएंगी।"

मेरी बात सुन कर मां मेरी तरफ बड़े ध्यान से देखने लगीं। कजरी तो जूठे बर्तन उठा कर चली गई थी लेकिन कुसुम मेरी बात सुन कर ठिठक गई थी और उत्सुक भाव से हमारी तरफ देखने लगी थी।

"क्या जानना चाहता है तू?" इधर मां ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"तेरी भाभी के बारे में तो मैंने तुझे कल ही बता दिया था, फिर अब क्या जानना चाहता है?"

"वही जो आपने नहीं बताया।" मैंने मां की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा____"और मुझे लगता है कि अभी भी आपने मुझसे कुछ छुपा रखा है।"

"अपने कमरे में जा।" मां ने गहरी सांस ले कर कहा____"मैं आती हूं थोड़ी देर में।"

"ठीक है।" मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा____"जल्दी आइएगा।"

कहने के साथ ही मैं तो अपने कमरे की तरफ चला गया किंतु पीछे मां एकदम से परेशान हो उठीं थी। कुछ पलों तक जाने वो क्या सोचती रहीं फिर खुद को सम्हालते हुए अपने कमरे की तरफ बढ़ चलीं। जल्दी ही वो कमरे में पहुंच गईं। कमरे में पिता जी पलंग पर आराम करने के लिए लेट चुके थे। कमरे में आते ही मां ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया। ये देख पिता जी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।

"क्या हुआ?" वो पूछ ही बैठे____"आपको भोजन नहीं करना क्या?"

"बाद में कर लेंगे।" उन्होंने पिता जी के क़रीब जा कर कहा____"इस वक्त एक समस्या हो गई है।"

"स...समस्या??" पिता जी चौंके____"ये क्या कह रही हैं आप?"

"लगता है हमारे बेटे को शक हो गया है।" मां ने चिंतित भाव से कहा____"अभी अभी वो हमसे कोई बात जानने की बात कह रहा था और ये भी कह रहा था कि हमने अभी भी उससे कुछ छुपाया है।"

"क्या उसने स्पष्ट रूप से आपसे ऐसा कुछ कहा है?" पिता जी ने पूछा____"क्या आपको लगता है कि वो रागिनी बहू के बारे में आपसे जानने की बात कह रहा था?"

"पता नहीं।" मां ने कहा____"लेकिन जिस अंदाज़ में बोल रहा था उससे तो यही लगता है कि वो रागिनी बहू के बारे में ही जानना चाहता है।"

मां की इस बात पर पिता जी फ़ौरन कुछ ना बोले। उनके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे। मां बेचैनी से उन्हें ही देखे जा रहीं थी।

"क्या सोचने लगे आप?" फिर उन्होंने कहा____"कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं? हमने उसे कमरे में जाने को कह दिया है और ये भी कहा है कि आते हैं थोड़ी देर में। ज़ाहिर है वो हमारी प्रतीक्षा करेगा। समझ में नहीं आ रहा कि अगर उसने रागिनी बहू के बारे में ही पूछेगा तो क्या बताएंगे उसे?"

"हमें लगता है कि सच बताना ही पड़ेगा उसे।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"इस बात को ज़्यादा समय तक उससे छुपा के भी नहीं रख सकते। वैसे भी जो कुछ उसे बताया गया है उससे वो परेशान और दुखी ही होगा। इस लिए बेहतर है कि उसे सच ही बता दिया जाए।"

"क्या आपको लगता है कि सच जानने के बाद वो चुप बैठेगा?" मां ने कहा____"पहले ही वो अनुराधा की मौत हो जाने से टूट सा गया था और बड़ी मुश्किल से उसके सदमे से बाहर आया है। अगर उसे ये बात बताएंगे तो जाने क्या सोच बैठे वो और फिर जाने क्या करने पर उतारू हो जाए?"

"हम मानते हैं कि उसको सच बताना ख़तरा मोल लेने जैसा है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन एक दिन तो उसे बताना ही पड़ेगा इस सच को। वैसे हमारा ख़याल है कि अगर आप उसे बेहतर तरीके से समझाएंगी तो शायद वो समझ जाएगा। आप उसे ये भी बता सकती हैं कि ये सब कुल गुरु की भविष्यवाणी के अनुसार ही हो रहा है।"

"कुल गुरु का नाम लेंगे तो वो भड़क जाएगा।" मां ने झट से कहा____"पहले भी वो अपने बड़े भाई की भविष्यवाणी वाली बात से उन पर बिगड़ गया था।"

"तो फिर आप उसे समझाइएगा कि इसी में सबका भला है।" पिता जी ने कहा____"ख़ास कर उसकी भौजाई का। अगर वो चाहता है कि उसकी भौजाई हमेशा खुश रहे और इसी हवेली में रहे तो उसे इस रिश्ते को स्वीकार करना ही होगा।"

पिता जी की इस बात पर मां कुछ देर तक उन्हें देखतीं रहीं। इतना तो वो भी समझती थीं कि एक दिन सच का पता वैभव को चलेगा ही तो बेहतर है आज ही बता दिया जाए। वैसे उन्हें यकीन था कि अपनी भाभी की ख़ुशी के लिए उनका बेटा ज़रूर इस रिश्ते को स्वीकार कर लेगा।

"ठीक है फिर।" मां ने जैसे निर्णायक अंदाज़ से कहा____"हम जा कर उसे सच बता देते हैं। अब जो होगा देखा जाएगा।"

✮✮✮✮

मैं पलंग पर लेटा बड़ी शिद्दत से मां का इंतज़ार कर रहा था। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे जिसकी वजह से मेरी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। तभी खुले दरवाज़े पर मां नज़र आईं। उन्हें देखते ही मैं उठ कर बैठ गया। उधर वो कमरे में दाख़िल हो कर मेरे पास आईं और पलंग पर बैठ गईं। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंची हुई थीं।

"आने में बड़ी देर लगा दी आपने?" मैंने व्याकुल भाव से कहा____"ख़ैर अब बताइए कि मुझसे और क्या छुपाया है आपने?"

"मैं तुझे सच बता दूंगी।" मां ने कहा____"लेकिन उससे पहले मैं तुझसे कुछ पूछना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि मैं तुझसे जो भी पूछूं उसका तू पूरी ईमानदारी से सच सच जवाब दे।"

"बिल्कुल दूंगा मां।" मैंने एकदम दृढ़ हो कर कहा____"आप पूछिए, मैं आपको वचन देता हूं कि आप जो कुछ भी मुझसे पूछेंगी मैं उसका सच सच जवाब दूंगा।"

"ठीक है।" मां ने एक लंबी सांस ली____"मैं तुझसे ये जानना चाहती हूं कि तू अपनी भाभी के बारे में क्या सोचता है?"

"य...ये कैसा सवाल है मां?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मेरी नज़र में भाभी की क्या अहमियत है। वो इस हवेली की शान हैं। उनके जैसी बहू और भाभी हमारे पास होना बड़े गौरव की बात है।"

"ये मैं जानती हूं।" मां ने कहा____"मैं तुझसे इसके अलावा जानना चाहती हूं। जैसे कि, क्या तू चाहता है कि तेरी भाभी हमेशा इस हवेली की शान बनी रहे? क्या तू चाहता है कि तेरी भाभी अपने जीवन में हमेशा खुश रहे?"

"मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप ये कैसे सवाल कर रही हैं?" मैंने थोड़ा परेशान हो कर कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि ऐसा इस हवेली में हर कोई चाहता है।"

"मैं हर किसी की नहीं।" मां ने कहा____"बल्कि तेरी बात कर रही हूं। तू अपनी बता कि तू क्या चाहता है?"

"सबकी तरह मैं भी यही चाहता हूं कि मेरी भाभी हमेशा खुश रहें।" मैंने कहा____"उनके जीवन में कभी कोई दुख न आए। भैया के गुज़र जाने के बाद मेरी यही कोशिश थी कि मैं हर वक्त उनके चेहरे पर मुस्कान ला सकूं।"

"सिर्फ इतना ही?" मां ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखा।

"और क्या मां?" मैंने कहा____"हम सबसे जितना हो सकता है उतना ही तो कर सकते हैं। काश! इससे ज़्यादा कुछ करना मेरे बस में होता तो मैं वो भी करता उनकी खुशी के लिए।"

"क्या तुझे लगता है कि तेरे बस में सिर्फ इतना ही था?" मां ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"अगर मैं कहूं कि तू उसकी खुशी के लिए और भी बहुत कुछ कर सकता है तो क्या तू करेगा?"

"बिल्कुल करूंगा मां।" मैंने झट से कहा____"अगर मुझे पता चल जाए कि जिस चीज़ से भाभी खुश हो जाएंगी वो दुनिया के फला कोने में है तो यकीन मानिए मैं उस कोने में जा कर वो चीज़ ले आऊंगा और भाभी को दे कर उन्हें खुश करूंगा। अब इससे ज़्यादा क्या कहूं?"

"क्या तू उसकी खुशी के लिए कुछ भी कर सकता है?" मां ने जैसे मुझे परखा।

"हां, अगर मेरे बस में हुआ तो कुछ भी कर जाऊंगा।" मैंने पूरी दृढ़ता से कहा____"आज मैं जो कुछ भी हूं उसमें मेरी भाभी का बहुत बड़ा हाथ है मां। इस लिए अपनी भाभी को खुश करने के लिए कुछ भी कर सकता हूं लेकिन अब शायद ऐसा नहीं कर सकूंगा क्योंकि उनके माता पिता उनका फिर से कहीं ब्याह करने का फ़ैसला कर चुके हैं। अब वो ना आपकी बहू रहेंगी और ना ही मेरी भाभी। इस हवेली से हमेशा के लिए उनका नाता टूट जाएगा।"

"क्या तू चाहता है कि तेरी भाभी कहीं न जाए और इसी हवेली में बहू बन कर रहे?" मां ने पूछा।

"मैं अपने स्वार्थ के लिए उनका जीवन बर्बाद नहीं कर सकता मां।" मैंने सहसा गंभीर हो कर कहा____"उनके लिए यही बेहतर है कि उनका फिर से ब्याह हो जाए ताकि वो अपने पति के साथ जीवन में हमेशा खुश रह सकें।"

"अगर वो फिर से सुहागन बन कर इस हवेली में आ जाए तो क्या वो खुश नहीं रहेगी?" मां ने धड़कते दिल से कहते हुए मेरी तरफ देखा।

"य...ये क्या कह रही हैं आप?" मैं एकदम से चकरा सा गया____"ऐसा भला कैसे हो सकता है?"

"क्यों नहीं हो सकता?" मां ने जैसे तर्क़ दिया____"अगर तू उसे ब्याह करके इस हवेली में ले आएगा तो क्या वो फिर से खुश नहीं हो जाएगी?"

तीव्र झटका लगा मुझे। ऐसा लगा जैसे आसमान से मैं पूरे वेग से धरती पर आ गिरा था। हैरत से आंखें फाड़े मैं देखता रह गया मां को। उधर वो भी चहरे पर हल्के घबराहट के भाव लिए मेरी तरफ ही देखे जा रहीं थी।

"क...क्या हुआ?" फिर उन्होंने कहा____"क्या तू अपनी भाभी की खुशी के लिए उससे ब्याह नहीं कर सकता?"

"य...ये आप क्या बोल रही हैं मां?" मैं सकते जैसी हालत में था____"आप होश में तो हैं? आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं?"

"वक्त और हालात इंसान को और भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं बेटा।" मां ने जब देखा कि मैं उनकी इस बात से भड़का नहीं हूं तो उन्होंने राहत की सांस लेते हुए कहा____"तुझे बताने की ज़रूरत नहीं है कि रागिनी हमारे लिए क्या मायने रखती है। तू भी जानता है और मानता भी है कि इस हवेली में उसके रहने से हम सब कैसा महसूस करते हैं? ये तो उस बेचारी की बदकिस्मती थी कि उसे इतनी कम उमर में विधवा हो जाना पड़ा लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या हम उसे ऐसे ही सारी जिंदगी यहां रखेंगे और उसे दुख सहता देखेंगे? नहीं बेटा, ऐसा ना हम चाह सकते हैं और ना ही तू। यही सब बातें मैं और तेरे पिता जी अक्सर अकेले में सोचते थे। तब हमने फ़ैसला किया कि हम अपनी बहू को हमेशा खुश रखने के लिए उसका फिर से ब्याह करेंगे। हम ये भी चाहते थे कि वो हमेशा हमारी ही बहू बन कर इस हवेली में रहे और ऐसा तो तभी संभव होगा जब उसका ब्याह हम अपने ही बेटे से यानि तुझसे करें।"

"बड़ी अजीब बातें कर रही हैं आप।" मैंने चकित भाव से कहा____"आप सोच भी कैसे सकती हैं कि मैं अपनी भाभी से ब्याह करने का सोच भी सकता हूं? मैं उनकी बहुत इज्ज़त करता हूं और मेरे लिए वो किसी देवी की तरह पूज्यनीय हैं।"

"मैं जानती हूं बेटा।" मां ने सिर हिलाते हुए कहा____"और उसके प्रति तेरी भावनाओं को भी समझती हूं लेकिन तुझे भी समझना होगा कि ज़रूरत पड़ने पर सबकी भलाई के लिए हमें ऐसे भी काम करने पड़ते हैं जिसे करने के लिए पहली नज़र में हमारा दिल नहीं मानता।"

"लेकिन मां वो मेरी भाभी हैं।" मैंने पुरज़ोर भाव से कहा____"उनके बारे में ऐसा सोचना भी मेरे लिए गुनाह है।"

"देवर का भाभी से ब्याह होना ऐसी बात नहीं है बेटा जिसे समाज मान्यता नहीं देता।" मां ने जैसे मुझे समझाते हुए कहा____"दुनिया में ऐसा पहले भी हुआ है और आगे भी ज़रूरत पड़ने पर होता रहेगा। इस लिए तू इस बारे में व्यर्थ की बातें मत सोच। तू जानना चाहता था न कि मैंने तुझसे अभी और क्या छुपाया है तो वो यही है। असल में जब मैंने और तुम्हारे पिता जी ने रागिनी का फिर से ब्याह करने का सोच लिया और ये भी सोच लिया कि हम उसका ब्याह तुझसे ही करेंगे तो हमने इस बारे में सबसे पहले रागिनी के पिता जी से भी चर्चा करने का सोच लिया था। कुछ दिन पहले तेरे पिता जी चंदनपुर गए थे समधी जी से इस बारे में बात करने। जब उन्होंने रागिनी के पिता जी से इस बारे में चर्चा की तो वो भी इस रिश्ते के लिए खुशी खुशी मान गए। उन्हें तो इसी बात से खुशी हुई थी कि हम उनकी बेटी की भलाई के लिए इतना कुछ सोचते हैं।"

मैं अवाक सा देखता रह गया मां को। एकाएक ही मेरे मन मस्तिष्क में धमाके से होने लगे थे। अचानक ही ज़हन में वो बातें गूंजने लगीं जो चंदनपुर में कामिनी से हुईं थी और फिर भाभी से हुईं थी। भाभी का उदास और गंभीर चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो गया। उनकी बातें मेरे कानों में गूंजने लगीं।




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बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट है
दोनो अभी तक असमंजस में हैं दोनो ये सोच रहे हैं कि अगर मैने हां बोल दिया तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगा इसी वजह से दोनो में से कोई भी हां नहीं बोल रहा है जबकि दोनो जानते है कि उनको ऐसा प्यार करने वाला साथी और परिवार कभी नही मिलेगा
 

Sanju@

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अध्याय - 144
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मैं अवाक सा देखता रह गया मां को। एकाएक ही मेरे मन मस्तिष्क में धमाके से होने लगे थे। अचानक ही ज़हन में वो बातें गूंजने लगीं जो चंदनपुर में कामिनी से हुईं थी और फिर भाभी से हुईं थी। भाभी का उदास और गंभीर चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो गया। उनकी बातें मेरे कानों में गूंजने लगीं।


अब आगे....


ऊपर वाले का खेल भी बड़ा अजब होता है। वो अक्सर कुछ ऐसा कर देता है जिसकी हम इंसान कल्पना भी नहीं किए होते। मैंने सपने में भी कभी ये नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मुझे अपनी ही भाभी से ब्याह करना होगा। अपनी उस भाभी से जिनके प्रति मेरे मन में आदर और सम्मान तो था ही किंतु एक श्रद्धा भाव भी था। एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर विचलित होने लगता था। मुझे डर लगने लगता था कि कहीं इस वजह से मुझसे कोई अनर्थ न हो जाए। यही वजह थी कि मैं हमेशा उनसे दूर दूर ही रहा करता था। उसके बाद कुछ ऐसा हो गया जिसने हम सबको हिला कर ही रख दिया।

बड़े भैया गुज़र गए और मेरी भाभी विधवा हो गईं। उन्हें विधवा के लिबास में देख कर हम सब दुखी हो जाते थे। मेरे अंदर ऐसा बदलाव आया कि उसके बाद कभी मेरे मन में उनके प्रति कोई ग़लत ख़याल नहीं उभरा। इसके बाद वक्त कुछ ऐसा आया कि मेरे अंदर का वो वैभव ही ख़त्म हो गया जो सिर्फ अय्याशियों में ही मगन रहता था।

"मैं अपनी रागिनी जैसी बेटी को नहीं खोना चाहती बेटा।" सहसा मां की इस आवाज़ से मैं चौंक कर ख़यालों से बाहर आया। उधर मां भारी गले से कह रहीं थी____"मैं उसे हमेशा के लिए इस हवेली की शान ही बनाए रखना चाहती हूं। उसे खुश देखना चाहती हूं। इस लिए मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूं कि तू उससे ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"म...मां।" मैंने हड़बड़ा कर मां के हाथों को थाम लिया____"ये क्या कर रही हैं आप? हाथ जोड़ कर अपने बेटे को पापी मत बनाइए।"

"तो मान जा न मेरे लाल।" मां ने नम आंखों से मुझे देखा____"रागिनी से ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"क्या भाभी को भी पता है इस बारे में?" मैंने मां से पूछा।

"हां, उसके माता पिता ने उसे भी सब बता दिया होगा।" मां ने कहा।

"तो क्या वो तैयार हैं इस रिश्ते के लिए?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा।

"जब वो तैयार हो जाएगी तो उसके पिता संदेश भिजवा देंगे तेरे पिता जी को।" मां ने कहा____"या फिर वो स्वयं ही यहां आएंगे ख़बर देने।"

"इसका मतलब भाभी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं अभी।" मैंने कहा____"और मुझे यकीन है कि वो तैयार भी नहीं होंगी। मेरी भाभी ऐसी नहीं हैं जो ऐसे रिश्ते के लिए हां कह देंगी।"

"और अगर उसने हां कह दिया तो?" मां ने कहा____"तब तो तू उससे ब्याह करेगा ना?"

"आप बेवजह उनके ऊपर इस रिश्ते को थोप रही हैं मां।" मैंने हताश भाव से कहा____"उन पर ऐसा ज़ुल्म मत कीजिए आप लोग।"

"इस वक्त भले ही तुम्हें या रागिनी को ये ज़ुल्म लग रहा है।" मां ने अधीरता से कहा____"लेकिन मुझे यकीन है कि ब्याह के बाद तुम दोनों इस रिश्ते से खुश रहोगे।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं अब? बड़ी अजीब सी परिस्थिति बन गई थी। मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि इतने दिनों से मेरे माता पिता ये सब सोच रहे थे और इतना ही नहीं ऐसा करने का फ़ैसला भी कर चुके थे। हैरत की बात ये कि मुझे इस बात की भनक तक नहीं लगने दी थी।

"ऐसे चुप मत बैठ बेटा।" मां ने मुझे चुप देखा तो कहा____"मुझे बता कि अगर रागिनी इस रिश्ते के लिए मान जाती है तो तू उसके साथ ब्याह करेगा ना?"

"मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा मां।" मैंने हैरान परेशान भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपसे कुछ नहीं कहूंगा। मुझे सोचने के लिए समय चाहिए।"

"ठीक है तुझे सोचने के लिए जितना समय चाहिए ले ले।" मां ने कहा____"लेकिन ज़्यादा समय भी मत लगाना।"

"एक बात बताइए।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"क्या इस बारे में गौरी शंकर को पता है?"

"हां।" मेरी उम्मीद के विपरीत मां ने जब हां कहा तो मैं हैरान रह गया।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि इस बारे में सबको पता है लेकिन मुझे ही पता नहीं था। अचानक मुझे रूपा का ख़याल आया तो मैंने मां से कहा____"फिर तो रूपा को भी पता होगा ना इस बारे में?"

"नहीं।" मां ने एक बार फिर मुझे हैरान किया_____"उसको अभी इस बारे में नहीं बताया गया है।"

"ऐसा क्यों?" मैं पूछे बगैर न रह सका।

"असल में हम चाहते थे कि पहले तुम और रागिनी दोनों ही इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाओ।" मां ने कहा____"उसके बाद ही रूपा को इस बारे में बताएंगे। हम जानते हैं कि रूपा एक बहुत ही अच्छी लड़की है, बहुत समझदार है वो। जब उसे इस बारे में बताएंगे तो वो इस बात की गहराई को समझेगी। ख़ास कर रागिनी के बारे में सोचेगी। यही सब सोच कर हमने सिर्फ गौरी शंकर को इस बारे में बता रखा है।"

"बड़े आश्चर्य की बात है।" मैंने गहरी सांस ली____"इतना कुछ सोचा हुआ था आप दोनों ने और मुझसे छुपा के रखा, क्यों?"

"डरते थे कि कहीं तू इस बारे में जान कर नाराज़ ना हो जाए।" मां ने कहा____"दूसरी वजह ये भी थी कि तू अनुराधा की वजह से इस हालत में भी नहीं था कि तू शांति से इस बारे में सुन सके।"

मां के मुख से अनुराधा का नाम सुन कर मेरे अंदर एकाएक टीस सी उठी। आंखों के सामने उसका मासूम चेहरा चमक उठा। पलक झपकते ही मेरे चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आए। सीने में दर्द जाग उठा। फ़ौरन ही आंखें बंद कर के मैंने उस दर्द को जज़्ब करने की कोशिश में लग गया।

"क्या रूपचंद्र को भी इस बारे में बताया था पिता जी ने?" फिर मैंने खुद को सम्हालते हुए पूछा।

"नहीं तो।" मां ने हैरानी ज़ाहिर की____"लेकिन तू ऐसा क्यों कह रहा है?"

"क्योंकि आज वो मुझसे कुछ अजीब सी बातें कर रहा था।" मैंने कहा____"जब मैंने पूछा तो कहने लगा कि वो खुद मुझे कुछ नहीं बता सकता लेकिन हां इस बारे में मैं अपने माता पिता से पूछ सकता हूं।"

"अच्छा तो इसी लिए तू वहां से आते ही मुझसे इस बारे में ऐसा कह रहा था?" मां को जैसे अब समझ आया था____"ख़ैर हो सकता है कि गौरी शंकर ने अपने घर में इस बात का ज़िक्र किया हो जिसके चलते उसे भी इस बारे में पता चल गया होगा।"

"फिर तो रूपा को भी पता चल ही गया होगा।" मैंने जैसे संभावना ब्यक्त की।

"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।" मां ने मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा____"तेरे पिता जी ने गौरी शंकर से स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वो इस बारे में रूपा को पता न चलने दें।"

"और ऐसा कब तक रहेगा?" मैंने पूछा।

"उचित समय आने पर उसे भी बता दिया जाएगा।" मां ने पलंग से उतर कर कहा____"फिलहाल हमें चंदनपुर से तेरी भाभी के राज़ी होने की ख़बर की प्रतीक्षा है। उसकी हां के बाद ही हम रूपा को इस बारे में बताएंगे।"

कहने के साथ ही मां मुझे आराम करने का बोल कर कमरे से चली गईं। वो तो चली गईं थी लेकिन मुझे सोचो के भंवर में फंसा गईं थी। मैं बड़ी अजीब सी दुविधा और परेशानी में पड़ गया था।

✮✮✮✮

"आपको क्या लगता है काका?" रूपचंद्र ने गौरी शंकर से मुखातिब हो कर कहा____"सच जानने के बाद वैभव की क्या प्रतिक्रिया होगी?"

"कुछ कह नहीं सकता।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन तुम्हें उससे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। तुम्हें समझना चाहिए था कि अभी अभी वो उस लड़की के सदमे से बाहर आया है। ऐसे में उसके सामने इस तरह की बातें करना उचित नहीं था।"

"मैं मानता हूं काका कि उचित नहीं था।" रूपचंद्र ने कहा____"इसी लिए मैंने अपने मुख से उसको सच नहीं बताया।"

"हां लेकिन उसके मन में सच जानने की जिज्ञासा तो डाल ही दी थी ना तुमने।" गौरी शंकर ने कहा____"ऐसे में वो ये सोच कर नाराज़ हो जाएगा कि उसके माता पिता ने उससे कोई सच छुपा के रखा। उसकी नाराज़गी हम सबके लिए भारी पड़ सकती है।"

"आप बेवजह ही इतना ज़्यादा सोच रहे हैं काका।" रूपचंद्र ने कहा____"जबकि मुझे पूरा यकीन है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। वैसे भी मुझे लगता है कि उसके मन में सच जानने की उत्सुकता डाल कर मैंने अच्छा ही किया है। इसी बहाने अब वो अपने माता पिता से सच जानने का प्रयास करेगा। उसके माता पिता को भी उसे सब कुछ सच सच बताना ही पड़ेगा। मेरा ख़याल है कि जब वो वैभव को सच बताएंगे तो उसके साथ ही उसे परिस्थितियों का भी एहसास कराएंगे। वो उसे समझाएंगे कि वो जो कुछ भी करना चाहते हैं उसी में सबका भला है, ख़ास कर उसकी भाभी का। इतना तो वो लोग भी जानते हैं कि वैभव अपनी भाभी को कितना मानता है और उनकी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता है।"

"शायद रूप ठीक कह रहा है गौरी।" ललिता देवी ने कहा____"मानती हूं कि उसे सच बताने का ये सही वक्त नहीं था लेकिन अब जो हो गया उसका क्या कर सकते हैं? वैसे भी मुझे पूर्ण विश्वास है कि अगर वैभव को सच का पता उसकी अपनी मां के द्वारा चलेगा तो ज़्यादा बेहतर होगा। ठकुराईन बहुत ही प्यार से अपने बेटे को इस सबके बारे में समझा सकती हैं और वैभव भी उनकी बातों को शांत मन से सुन कर समझने की कोशिश करेगा।"

"ललिता सही कह रही है।" फूलवती ने कहा____"मेरा भी यही मानना है कि वैभव की मां इस बारे में अपने बेटे को बहुत अच्छी तरह से समझा सकती हैं और उसे अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए मना भी सकती हैं।"

"अगर ऐसा हो जाए तो अच्छा ही है।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं आज शाम को दादा ठाकुर से मिलने हवेली जाऊंगा और ये जानने का प्रयास करूंगा कि इस बारे में उन्होंने वैभव से बात की है या नहीं?"

"इस बारे में तो मैं खुद ही पता कर लूंगा काका।" रूपचंद्र ने झट से कहा____"कुछ देर में वैभव वापस काम धाम देखने आएगा तो मैं किसी बहाने उससे इस बारे में पता कर लूंगा।"

"हां ये भी ठीक है।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन उससे कुछ भी पूछने से पहले ये ज़रूर परख लेना कि उसकी मानसिक अवस्था कैसी है? ऐसा न हो कि वो तुम्हारे द्वारा कुछ पूछने पर बिगड़ जाए।"

"फ़िक्र मत कीजिए काका।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं इस बात का अंदाज़ा लगा लेने के बाद ही उससे इस बारे में बात करूंगा।"

कुछ देर और इसी संबंध में उनकी बातें हुईं उसके बाद दोनों औरतें अंदर चली गईं जबकि रूपचंद्र और गौरी शंकर पलंग पर लेट कर आराम करने लगे। दोनों चाचा भतीजे खाना खा चुके थे।

✮✮✮✮

मैं हवेली से आराम करने के बाद वापस उस जगह पर आ गया था जहां पर अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य चल रहा था। सारे मज़दूर और मिस्त्री भी अपने अपने घरों से लाया हुआ खाना खा चुके थे और अब फिर से काम पर लग गए थे। निर्माण कार्य बड़े उत्साह से और बड़ी तेज़ गति से चल रहा था।

मैं देवी मां के मंदिर के पास ही एक पेड़ के पास रखी एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठा हुआ था। मेरी नज़रें ज़रूर लोगों पर टिकी हुईं थी लेकिन मेरा मन कहीं और ही उलझा हुआ था। बार बार ज़हन में मां की बातें गूंजने लगती थीं और मैं ना चाहते हुए भी उन बातों के बारे में सोचने लगता था।

मैंने सपने में भी ये उम्मीद अथवा कल्पना नहीं की थी कि ऐसा भी कभी होगा। बार बार आंखों के सामने भाभी का उदास और गंभीर चेहरा उजागर हो जाता था। मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि क्या इसी वजह से कल भाभी इतना उदास और गंभीर नज़र आ रहीं थी? मतलब उन्हें भी इस रिश्ते के बारे में पता चल चुका था और इसी लिए वो मेरे सामने इतनी उदास अवस्था में खड़ी बातें कर रहीं थी।

अचानक ही मेरे मन में सवाल उभरा कि अगर उन्हें पहले से ही इस बारे में पता था तो उन्होंने कल मुझसे इस बारे में कुछ कहा क्यों नहीं? वो उदास तथा गंभीर ज़रूर थीं लेकिन मुझसे सामान्य भाव से ही बातें कर रहीं थी, ऐसा क्यों? अपने इन सवालों का जवाब मैं सोचने लगा। जल्दी ही जवाब के रूप में मेरे ज़हन में सवाल उभरा____'क्या वो उस समय मेरे मन की टोह ले रहीं थी?'

जवाब के रूप में ज़हन में उभरा ये सवाल ऐसा था जिसने मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मैं सोचने लगा कि क्या सच में वो ये देखना चाहती थीं कि मेरे मन में क्या है?

अचानक मेरे मन में ख़याल उभरा कि क्या वो मुझसे ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई होंगी? इस ख़याल के एहसास ने एक बार फिर से मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मेरे मन में फिर से सवाल उभरा कि क्या सचमुच मेरी भाभी मुझसे यानि अपने देवर से शादी करने का सोच सकती हैं?

मैं अपने मन में उभरते सवालों और ख़यालों के चलते एकाएक बुरी तरह उलझ गया था। मुझे पता ही न चला कि कब वक्त गुज़रा और रूपचंद्र आ कर मेरे पास ही खड़ा हो गया था। होश तब आया जब उसने मेरा कंधा पकड़ कर मुझे हिलाया।

"क्या हुआ भाई?" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए एकाएक मज़ाकिया भाव से पूछा____"मेरी बहन के अलावा और किसके ख़यालों में खोए हुए हो तुम?"

"न...नहीं तो।" मैं बुरी तरह बौखला गया, खुद को सम्हालते हुए कहा____"ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुम बताओ कब आए?"

"मुझे आए हुए तो काफी समय हो गया।" रूपचंद्र ने मुझे बड़े ध्यान से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पास ही खड़ा था और ये देखने में लगा हुआ था कि तुम बैठे तो यहीं पर हो लेकिन तुम्हारा मन जाने कहां था। मैं सही कह रहा हूं ना?"

"ह...हां वो मैं कुछ सोच रहा था।" मैंने काफी हद तक खुद को सम्हाल लिया था____"मैं सोच रहा था कि जब हमारे गांव में अस्पताल और विद्यालय बन कर तैयार हो जाएंगे तो लोगों को बहुत राहत हो जाएगी। ग़रीब लोग सहजता से इलाज़ करा सकेंगे। उनके बच्चे विद्यालय में पढ़ने लगेंगे तो उनके बच्चों का जीवन और व्यक्तित्व काफी निखर जाएगा।"

"ये तो तुमने बिल्कुल सही कहा।" रूपचंद्र ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम ये सब नहीं सोच रहे थे।"

रूपचंद्र की इस बात पर मैं चकित भाव से उसे देखने लगा। उधर वो भी कम्बख़्त मुझे ही देखे जा रहा था। कोई और परिस्थिति होती तो मैं हर्गिज़ उससे नज़रें चुराने वाला नहीं था लेकिन इस वक्त मैंने ख़ुद महसूस किया कि मेरी हालत उससे कमज़ोर है।

"मेरी बात का बुरा मत मानना वैभव।" फिर उसने थोड़ा संजीदा हो कर कहा____"असल में जिस तरह तुम यहां बैठे कहीं खोए हुए थे उससे मैं समझ गया था कि तुम्हें वो सच पता चल चुका है जिसे मैं खुद तुम्हें नहीं बता सकता था। ख़ैर, अगर सच में ही तुम्हें सच का पता चल चुका है तो तुम्हें मुझसे कुछ भी छुपाने की ना तो ज़रूरत है और ना ही मुझसे नज़रें चुराने की।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं उससे? बड़ा अजीब सा महसूस करने लगा था मैं। सबसे ज़्यादा मुझे ये सोच कर अजीब लगने लगा था कि वो और उसके घर वाले क्या सोच रहे होंगे इस रिश्ते के बारे में।

"ऐसे उतरा हुआ चेहरा मत बनाओ यार।" रूपचंद्र ने मेरे कंधे को हल्के से दबाते हुए जैसे दिलासा दी____"अब तुम्हारे और हमारे बीच कुछ भी पराया नहीं है। तुम्हारा दुख हमारा दुख है और तुम्हारा सुख हमारा सुख है। तुमसे ही सब कुछ है, तुम जो भी करोगे उसका हम पर भी असर होगा। इस लिए व्यर्थ का संकोच छोड़ दो और जो भी मन में हो खुशी मन से साझा करो। एक बात मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि मैं और मेरे घर वालों को अब किसी भी बात से कोई एतराज़ नहीं है। यूं समझो कि तुम्हारी खुशी में ही हम सबकी खुशी है। अब इससे ज़्यादा क्या कहूं?"

"मतलब तुम्हें या तुम्हारे घर वालों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ मेरी ही भाभी से कर देना चाहते हैं?" मैंने जैसे एक ही सांस में सब कह दिया।

"सच कहूं तो पहली बार जब इस बारे में काका से पता चला था तो हम सबको थोड़ा बुरा लगा था।" रूपचंद्र ने गंभीर हो कर कहा____"लेकिन काका ने जब इस रिश्ते के संबंध में पूरी बात विस्तार से बताई तो हम सबको एहसास हुआ कि ऐसा होना कहीं से भी ग़लत नहीं है। पहले भी तो तुम अनुराधा से ब्याह करना चाहते थे। हमें अनुराधा से भी कोई समस्या नहीं थी, ये तो फिर भी तुम्हारी अपनी भाभी हैं। अगर तुम्हारे द्वारा उनका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में हमेशा खुश रह सकती हैं तो ये अच्छी बात ही है।"

"बात तो ठीक है रूपचंद्र।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन अपनी भाभी से ब्याह करने की बात सोच कर ही मुझे बड़ा अजीब सा लगता है। तुम तो जानते हो कि सबको मेरे चरित्र के बारे में पता है और इस वजह से लोगों को जब ये पता चलेगा कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ अपनी ही बहू से कर देना चाहते हैं तो जाने वो लोग क्या क्या सोच बैठेंगे। मुझे अपने ऊपर लोगों द्वारा खीचड़ उछाले जाने पर कोई एतराज़ नहीं होगा लेकिन अगर लोग मेरी भाभी के चरित्र पर कीचड़ उछालने लगेंगे तो मैं बर्दास्त नहीं कर सकूंगा। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मेरी भाभी का चरित्र गंगा मैया की तरह स्वच्छ और पवित्र रहा है। ये उनकी बदकिस्मती ही थी कि उनके पति गुज़र गए और वो विधवा हो गईं, लेकिन मैं ये हर्गिज़ सहन नहीं करूंगा कि लोग इस रिश्ते के चलते उनके चरित्र पर सवाल उठाने लगें।"

"लोग तो भगवान पर भी कीचड़ उछाल देते हैं वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"इंसानों की तो बात ही मत करो। मैं तो यही कहूंगा कि तुम लोगों के बारे में मत सोचो बल्कि सिर्फ अपनी भाभी के बारे में सोचो। उनकी ज़िंदगी संवारने के बारे में सोचो। अगर तुम्हें भी लगता है कि तुमसे ब्याह हो जाने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा और वो खुश रहने लगेंगी तो तुम इस रिश्ते को स्वीकार कर लो। सच कहूं तो मैं भी चाहता हूं कि उनका जीवन संवर जाए। विधवा के रूप में इतना लंबा जीवन गुज़ारना बहुत ही कठिन होगा उनके लिए।"

"और तुम्हारी बहन का क्या?" मैंने धड़कते दिल से उससे पूछा____"पहले भी अनुराधा की वजह से उसने खुद को समझाया था और अब फिर से वही किस्सा? पहले तो मैंने अपनी मूर्खता के चलते उसके साथ नाइंसाफी की थी लेकिन अब जान बूझ कर कैसे उसके साथ अन्याय करूं? आख़िर और कितना उसे अपने प्रेम के चलते समझौता करना पड़ेगा?"

"मेरी बहन के बारे में तुम्हारा ऐसा सोचना ही ये साबित करता है कि तुम्हें उसके प्रेम का और उसकी तकलीफ़ों का एहसास है।" रूपचंद्र ने कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे मुंह से अपनी बहन के लिए ये फिक्रमंदी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा है। लेकिन तुम शायद अभी भी मेरी बहन को अच्छे से समझे नहीं हो। अगर समझे होते तो ये भी समझ जाते कि उसे इस रिश्ते से भी कोई समस्या नहीं होगी। जैसे उसने अनुराधा को ख़ुशी ख़ुशी क़बूल कर लिया था वैसे ही अब वो रागिनी दीदी को भी ख़ुशी से क़बूल कर लेगी।"

"तुम्हारी बहन बहुत महान है रूपचंद्र।" मैंने सहसा संजीदा हो कर कहा____"इतना कुछ होने के बाद भी उसके दिल से मेरे प्रति उसका प्रेम नहीं मिटा। अनुराधा की मौत के बाद जब मैं गहरे सदमे में चला गया था तो उसने जिस तरह से मुझे उसके दुख से निकाला उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता मैं। मेरे लिए उसने जितना त्याग और जितना समझौता किया है उतना इस संसार में दूसरा कोई नहीं कर सकता। मैं इस जन्म में ही नहीं बल्कि अपने हर जन्म में उसका ऋणी रहूंगा। अक्सर सोचता हूं कि मेरे जैसे इंसान के नसीब में ऊपर वाले ने इतनी अच्छी लड़कियां क्यों लिखी थी? भला मैंने अपने जीवन में कौन से ऐसे अच्छे कर्म किए थे जिसके चलते मुझे रूपा और अनुराधा जैसी प्रेम करने वाली लड़कियां नसीब हुईं?"

"ऊपर वाले की लीला वही जाने वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"हम इंसान तो बस यही कह सकते हैं कि ये सब किस्मत की ही बातें हैं। ख़ैर छोड़ो और ये बताओ कि अब क्या सोचा है तुमने? मेरा मतलब है कि क्या तुम अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए राज़ी हो?"

"सच कहूं तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा भाई।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"जब से मां के द्वारा इस सच का पता चला है तब से मन में यही सब चल रहा है। कल तक मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था और शायद यही वजह थी कि कल चंदनपुर में मैं अपनी भाभी से बात भी कर सका था। मगर अब ये सब जानने के बाद उनसे बात करने की तो दूर उनसे नज़रें मिलाने की भी हिम्मत नहीं कर पाऊंगा। जाने क्या क्या सोच रहीं होंगी वो मेरे बारे में?"

"मुझे लगता है कि तुम बेकार में ही ये सब सोच रहे हो।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं ये मानता हूं कि उनको भी इस रिश्ते के बारे में सोच कर तुम्हारी तरह ही अजीब लग रहा होगा लेकिन यकीन मानों देर सवेर वो भी इस रिश्ते को स्वीकार कर लेंगी। उनके घर वाले उन्हें भी तो समझाएंगे कि उनके लिए क्या सही है और क्या उचित है।"

थोड़ी देर रूपचंद्र से और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद मैं उसे यहीं रहने का बोल कर अपने खेतों की तरफ निकल गया। रूपचंद्र से इस बारे में बातें कर के थोड़ा बेहतर महसूस करने लगा था मैं।




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बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट है
रागिनी और वैभव में दोनो के रिश्ते को लेकर जो असमंजस चल रहा है उसे घर वाले दूर करने की कोशिश कर रहे हैं रूपा को फिर से अपना प्यार बाटना पड़ेगा और वह खुशी खुशी वह इस रिश्ते को स्वीकार करेगी ।रूपा को इतना महान नहीं बनाना चाहिए था दुख होता है कि हर बात दुख उसी को दिया जाता है
 

Sanju@

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अध्याय - 145
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थोड़ी देर रूपचंद्र से और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद मैं उसे यहीं रहने का बोल कर अपने खेतों की तरफ निकल गया। रूपचंद्र से इस बारे में बातें कर के थोड़ा बेहतर महसूस करने लगा था मैं।


अब आगे....


हवेली के बाहर गांव के कुछ लोग आए हुए थे। दादा ठाकुर बैठक से निकल कर बाहर आ गए थे। उनके साथ मुंशी किशोरी लाल भी था। गांव के लोग अक्सर अपनी समस्या ले कर दादा ठाकुर के पास हवेली आ जाया करते थे। गांव वालों की समस्या दूर करने के लिए दादा ठाकुर हमेशा तत्पर रहते थे।

"प्रणाम दादा ठाकुर।" सामने खड़े लोगों में से एक आदमी ने अपने हाथ जोड़ कर जब ये कहा तो बाकी लोगों ने भी हाथ जोड़ कर अपना सिर झुकाया। जवाब में दादा ठाकुर ने हाथ उठा कर सबको शांत किया।

"कहिए आप लोगों को क्या परेशानी है?" फिर उन्होंने हमेशा की तरह उनसे पूछा____"बेझिझक हो कर हमें अपनी समस्या बताएं। हमसे जो हो सकेगा आप लोगों के लिए करेंगे।"

"आप बहुत दयालू हैं दादा ठाकुर।" एक दूसरे व्यक्ति ने अधीरता से कहा____"हमारे भगवान हैं आप। आपके रहते भला हमें किस बात की समस्या हो सकती है? हमारी भलाई के लिए आप इस गांव में अस्पताल बनवा रहे हैं। हमारे बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए गांव में विद्यालय बनवा रहे हैं। आप सच में बहुत महान हैं दादा ठाकुर।"

"हम तो सिर्फ माध्यम हैं भाईयो।" दादा ठाकुर ने कहा____"सच तो ये है कि ये जो कुछ भी बन रहा है वो आप लोगों के ही भाग्य से बन रहा है।"

"हमारे भाग्य विधाता तो आप ही हैं दादा ठाकुर।" एक अन्य ने कहा____"ये सब आपकी ही कृपा से हमें मिलने वाला है। आपने हमेशा हमारा भला चाहा है और हमेशा हमारे दुख दर्द को दूर करने का प्रयास किया है। आप सच में हमारे लिए देवता हैं।"

"अरे! ऐसा कुछ नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"आप लोगों की दुआओं से ऊपर वाले ने हमें इस क़ाबिल बनाया है कि हम आप लोगों के लिए कुछ करने में सफल होते हैं। वैसे आप लोगों की जानकारी के लिए हम ये बताना चाहते हैं कि इस गांव में अस्पताल और विद्यालय बनवाने का विचार हमारा नहीं था बल्कि हमारे बेटे वैभव का था। उसी ने हमसे ज़ोर दे कर कहा था कि गांव के लोगों की भलाई के लिए हमें अपने गांव में अस्पताल और विद्यालय बनवाना चाहिए। हमें भी उसका ये सुझाव अच्छा लगा इस लिए हमने सरकार को पत्र भेजा और इसके लिए मंजूरी प्राप्त की।"

"छोटे कुंवर की जय हो....छोटे कुंवर की जय हो।" दादा ठाकुर की बात सुनते ही एक के बाद सब खुशी से जयकारा लगाने लगे। ये देख दादा ठाकुर ने फिर से हाथ उठा कर सबको शांत कराया।

"हमें माफ़ कर दीजिए दादा ठाकुर।" एक ने थोड़ा दुखी हो कर कहा____"हम छोटे कुंवर के बारे में अब तक जाने क्या क्या सोचते रहे थे जबकि वो तो हमारी भलाई के लिए इतना कुछ कर रहे हैं।"

"आप लोगों को हमसे माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है।" दादा ठाकुर ने कहा____"हम समझते हैं कि आप लोग उसके बारे में जो कुछ सोचते थे वो अपनी जगह उचित ही था किंतु अब आप लोगों को हम इस बात का यकीन दिलाते हैं कि जिस तरह अब तक हम आप लोगों का दुख दर्द समझते आए हैं उसी तरह आपके छोटे कुंवर भी आप लोगों का दुख दर्द समझेंगे।"

"दादा ठाकुर की जय हो।" एक बार फिर से सब के सब जयकारा लगाने लगे____"छोटे कुंवर की जय हो।"

"अब से आप लोग अपने छोटे कुंवर के सामने भी अपनी समस्याएं रख सकते हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"वो आप लोगों की समस्याओं को वैसे ही दूर करने की कोशिश करेंगे जैसे अब तक हम करते आए हैं।"

दादा ठाकुर की इस बात को सुन कर सबके चेहरे खिल उठे। वो सब एक दूसरे को देखते हुए अपनी खुशी का इज़हार करते नज़र आए।

"ख़ैर अब आप लोग बताएं कि इस वक्त हम आप लोगों के लिए क्या कर सकते हैं?" दादा ठाकुर ने उन सबकी तरफ देखते हुए पूछा।

दादा ठाकुर के पूछने पर सब अपनी अपनी समस्याएं बताने लगे। ज़्यादातर लोगों की समस्याएं पैसा ही था। ग़रीब लोग थे वो जिनके पास अपनी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पैसे नहीं होते थे। घर का कोई सदस्य बीमार पड़ जाता था तो इलाज़ के लिए पैसा नहीं होता था। बहुत तो कर्ज़े से परेशान थे। खेतों में फसल उगा कर भी वो अपना कर्ज़ नहीं चुका पाते थे। बहुत से ऐसे थे जो कई बार दादा ठाकुर से कर्ज़ ले चुके थे और दादा ठाकुर उनके कर्ज़ को माफ़ भी कर चुके थे। इस चक्कर में वो दुबारा दादा ठाकुर से कर्ज़ मांगने पर हद से ज़्यादा संकोच करते थे। ऐसी नौबत आने पर वो दूसरे गांव के साहूकारों से कर्ज़ ले लेते थे। दूसरे गांव के साहूकार दादा ठाकुर जैसे नेक दिल नहीं थे। वो कर्ज़ वसूलने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे।

बहरहाल, दादा ठाकुर ने मुंशी किशोरी लाल को हुकुम दिया कि वो अंदर से पैसा ले कर आएं और जिनको जितनी ज़रूरत हो दे दें। किशोरी लाल ने फ़ौरन ही अमल किया। पैसा मिल जाने पर वो सब लोग बड़ा खुश हुए और फिर जयकारा लगाते हुए खुशी खुशी चले गए।

गांव वालों को गए हुए अभी थोड़ा ही समय हुआ था कि हाथी दरवाज़े से एक जीप अंदर दाख़िल होती नज़र आई। कुछ ही पलों में वो जीप हवेली के पास आ कर रुकी। जीप से महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई ज्ञानेंद्र सिंह के साथ नीचे उतरे।

"आइए मित्र।" दादा ठाकुर ने हल्की सी मुस्कान होठों पर सजा कर महेंद्र सिंह से कहा और फिर उनको साथ ले कर ही अंदर बैठक में आ गए।

"कल परसों से आपसे मिलने का सोच रहे थे हम।" बैठक में एक कुर्सी पर बैठने के बाद महेंद्र सिंह ने कहा____"लेकिन व्यस्तता के चलते आ ही नहीं पाए।"

"हां काम धाम के चलते व्यस्तता तो रहती ही है मित्र।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर कहिए कैसे आना हुआ यहां?"

कहने के साथ ही उन्होंने नौकरानी को आवाज़ दे कर बुलाया और फिर उसे सबके लिए जल पान लाने के लिए कहा।

"कोई विशेष बात तो नहीं है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"बस उड़ती हुई कुछ बातें हमने सुनी हैं जिसकी पुष्टि के लिए आपसे मिलने चले आए।"

"उड़ती हुई बातें?" दादा ठाकुर के माथे पर शिकन उभरी____"ये क्या कह रहे हैं आप?"

"मानते हैं कि आपको ये सुन कर अजीब लगा होगा।" महेंद्र सिंह ने कहा____"लेकिन बात क्योंकि सफ़ेदपोश से संबंधित थी इस लिए हम उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सके।"

महेंद्र सिंह की इस बात से दादा ठाकुर के साथ साथ किशोरी लाल भी चौंका। उधर दादा ठाकुर के चेहरे पर एक ही पल में कई तरह के भाव उभरे और फिर लोप होते नज़र आए।

"बड़ी दिलचस्प बात है।" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"ख़ैर बताइए, कैसी बातें सुनी हैं आपने जो सफ़ेदपोश से संबंधित थी?"

"यही कि सफ़ेदपोश को पकड़ लिया गया है।" महेंद्र सिंह ने कहा____"क्या वाकई में ये बात सच है ठाकुर साहब?"

महेंद्र सिंह की इस बात से दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ बोल ना सके। असल में उन्हें फ़ौरन कुछ सूझा ही नहीं कि क्या कहें? उन्हें ये सोच कर भी हैरानी हुई कि सफ़ेदपोश के पकड़े जाने वाली बात कैसे फैल गई? उन्हें समझ न आया कि इस संबंध में वो महेंद्र सिंह को क्या जवाब दें? वो ये भी जानते थे कि सच को उनसे छुपाना भी उचित नहीं है लेकिन ये भी सच था कि सफ़ेदपोश का सच बताना भी उनके लिए बहुत मुश्किल कार्य था। भला वो ये कैसे बताते कि सफ़ेदपोश कोई और नहीं बल्कि उनका अपना ही छोटा भाई जगताप था और उसकी मौत के बाद सफ़ेदपोश का नक़ाब उसकी पत्नी ने पहन लिया था। वो ये कैसे बताते कि उनके भाई और भाई की पत्नी ने ही ये सब किया था जिसका पता चलने के बाद उनकी ही क्या बल्कि उनकी पत्नी और बेटे की भी हालत बहुत ख़राब हो गई थी।

"क्या बात है ठाकुर साहब?" उन्हें एकदम से ख़ामोश हो गया देख महेंद्र सिंह ने सहसा फिक्रमंद हो कर पूछा____"आप अचानक से ख़ामोश क्यों हो गए हैं? सब ठीक तो है ना?"

तभी बैठक में नौकरानी दाख़िल हुई। उसके हाथ में एक ट्रे था जिसमें उसने सबके लिए नाश्ता रखा हुआ था। उसने ट्रे को सबके बीच रखी टेबल पर रखा और फिर एक एक कर के सबकी तरफ प्लेटें बढ़ा दी। उसके बाद वो चली गई।

"हम जानते हैं कि इस बारे में आपको सच न बताना बहुत ही अनुचित होगा मित्र।" दादा ठाकुर ने गहन गंभीर भाव से कहा____"लेकिन यकीन मानिए हमारे लिए सच बताना बहुत ही ज़्यादा मुश्किल है।"

"ये क्या कह कर रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह के साथ साथ उनका भाई ज्ञानेंद्र सिंह भी चकित भाव से देखने लगा दादा ठाकुर को। इधर महेंद्र सिंह ने कहा____"आपकी इन बातों से ऐसा लगता है जैसे सब ठीक नहीं है। हमें बताइए मित्र कि आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते आप अचानक से ही इस वक्त इतने गंभीर और हताश से नज़र आने लगे हैं?"

"अगर आप सच में सच्चे दिल से हमें अपना मित्र मानते हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"तो हमसे सफ़ेदपोश के बारे में मत पूछिए। बस इतना जान लीजिए कि सफ़ेदपोश के पकड़े जाने वाली बात सच है।"

महेंद्र सिंह और उनका भाई ज्ञानेंद्र सिंह भौचक्के से देखते रह गए उन्हें। चेहरों पर कई तरह के भाव आते जाते नज़र आए। इधर दादा ठाकुर के चेहरे पर भी गहन गंभीरता और अवसाद के भाव उभरे हुए थे।

"अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो ठीक है।" महेंद्र सिंह ने फिर गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कहा____"हम बिल्कुल भी आपसे उसके बारे में जानने का प्रयास नहीं करेंगे और ना ही आपको किसी भी तरह से परेशान और हताश होते हुए देख सकते हैं।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मित्र।" दादा ठाकुर ने राहत की लंबी सांस ले कर कहा____"हम आपको बता नहीं सकते कि आपकी इन बातों से हमें कितनी राहत मिली है।"

"आपको धन्यवाद कहने की ज़रूरत नहीं ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने अपनेपन से कहा____"आप हमारे मित्र हैं और मित्र का तो धर्म ही यही होता है कि वो हर परिस्थिति में अपने मित्र के कुशल मंगल की ही कामना करे और उसका भला चाहे। इस लिए हम बस यही चाहते हैं कि आप और आपसे जुड़े हर व्यक्ति हमेशा खुश रहें। आपसे अब बस इतना ही जानना चाहते हैं कि सफ़ेदपोश के पकड़े जाने के बाद क्या हर तरह के ख़तरे से मुक्ति मिल गई है?"

"सबसे बड़ा ख़तरा उसी से था मित्र।" दादा ठाकुर ने कहा____"अतः जब वो पकड़ा गया तो उसके ख़तरे से भी मुक्ति मिल गई। एक बात और...आपको भी अब रघुवीर के हत्यारे को कहीं खोजने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा इस लिए क्योंकि सफ़ेदपोश ही असल में रघुवीर का हत्यारा था।"

"ओह! ये तो सच में हैरत की बात है।" महेंद्र सिंह ने कहा____"आपने पहले भी इसी बात की आशंका व्यक्त की थी। ख़ैर जो भी हो, अच्छी बात यही हुई कि अब सब कुछ ठीक हो चुका है। एक लंबे समय से जो घटनाक्रम चल रहा था आख़िर उसमें अब पूर्ण विराम लग गया। उम्मीद है आगे भविष्य में किसी के भी साथ ऐसा नहीं होगा।"

"हम इंसानों की चाहत तो यही होती है मित्र।" दादा ठाकुर ने गंभीरता से कहा____"लेकिन आप भी जानते हैं कि ऐसा होता नहीं है। ऊपर बैठा विधाता हम इंसानों के साथ कोई न कोई खेल खेलता ही रहता है।"

"हां ये तो सही कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने सिर हिला कर कहा____"हर चीज़ का कर्ता धर्ता तो वही है लेकिन कभी कभी वो अन्याय भी कर बैठता है। किसी मासूम और निर्दोष का जीवन छीन कर उसके चाहने वालों पर दुखों का पहाड़ गिरा बैठता है वो।"

"क्या कर सकते हैं मित्र।" दादा ठाकुर ने बेचैन भाव से कहा____"विधाता पर किसी का ज़ोर कहां चलता है किसी का?"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई के साथ चले गए। दादा ठाकुर वापस बैठक में आ कर अपने सिंहासन पर बैठ गए।

"किशोरी लाल जी।" फिर उन्होंने किशोरी लाल से मुखातिब हो कर पूछा____"क्या लगता है आपको, हमने महेंद्र सिंह को सफ़ेदपोश के बारे में ना बता कर ठीक किया है अथवा ग़लत?"

"इस बारे में मैं आपसे क्या कहूं ठाकुर साहब?" किशोरी लाल ने उलझन पूर्ण भाव से कहा____"वैसे मैं तो यही समझता हूं कि आपने अपने हिसाब से ये अच्छा ही किया है लेकिन...!"

"लेकिन??"

"आप भी जानते हैं कि हर व्यक्ति के सोचने का अपना अपना नज़रिया होता है।" किशोरी लाल ने कहा____"आपने उन्हें सफ़ेदपोश के बारे में ना बता कर ठीक किया, ये आपके हिसाब से ठीक था लेकिन यही बात उनके नज़रिए में उन्हें एक दूसरा ही अर्थ समझा गई होगी। माना कि वो आपके मित्र हैं और आपकी मानसिक अवस्था को अच्छे से समझते हैं लेकिन कहीं न कहीं वो ये भी सोच सकते हैं कि मित्र होने के बाद भी आपने उन्हें सफ़ेदपोश के बारे में क्यों नहीं बताया?"

"आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"हम भी इस बारे में ऐसा ही सोचते हैं लेकिन क्या करें? ये हमारी मजबूरी थी कि हम उन्हें सफ़ेदपोश का सच नहीं बता सकते थे। हम नहीं चाहते थे कि वो सच जानने के बाद हम में से किसी के भी बारे में ग़लत धारणाएं बना लें। वैसे सच तो हमने आपको भी नहीं बताया, क्या आप भी हमारे बारे में ऐसा ही सोचते हैं?"

"बिल्कुल भी नहीं।" किशोरी लाल ने मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा____"यकीन मानिए, मैं आपके बारे में ऐसा कुछ भी नहीं सोचता क्योंकि मैं आपकी मजबूरी को बखूबी समझता हूं। इस दुनिया में सबके जीवन में इस तरह की कोई न कोई मजबूरी हो ही जाती है जिसके बारे में वो किसी दूसरे को बता नहीं सकता।"

"हम्म्म्म।" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए कहा____"वैसे हैरानी की बात है कि सफ़ेदपोश को पकड़ लिए जाने वाली बात इस तरह फैल गई है जबकि हमें यही लगता था कि ऐसा होना संभव नहीं है। इस बात से अब हमें ये भी आभास हो रहा है कि महेंद्र सिंह को सफ़ेदपोश का सच भी पता चल गया होगा।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" किशोरी लाल के चेहरे पर हैरत के भाव उभर आए____"भला ऐसा कैसे हो सकता है?"

"सीधी सी बात है किशोरी लाल जी।" दादा ठाकुर ने कहा____"अगर सफ़ेदपोश के पकड़े जाने की बात उड़ती हुई महेंद्र सिंह के कानों तक पहुंची है तो उन्होंने अपने तरीके से इस बारे में पता भी किया होगा। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि जिसने ये अफवाह उड़ाई हो उसे ये भी न पता हो कि सफ़ेदपोश असल में कौन था?"

"बात तो सही है ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने चकित भाव से कहा____"लेकिन क्या ज़रूरी है कि अफवाह उड़ाने वाले को सफ़ेदपोश का सच भी पता रहा होगा? ऐसा भी तो हो सकता है कि उसे सिर्फ इतना ही पता चल पाया हो कि सफ़ेदपोश पकड़ लिया गया है। जब आपके साथ रहते हुए मुझे खुद ही सच का पता नहीं है तो इस बारे में बाहर किसी को कैसे पता हो सकता है?"

"हां ये भी ठीक कहा आपने।" दादा ठाकुर ने ग़ौर से किशोरी लाल की तरफ देखा____"लेकिन हम ये बात नहीं मान सकते कि आपको सच का पता नहीं चल सका है अब तक?"

"ठ..ठाकुर साहब।" किशोरी लाल एकदम से झेंपते हुए बोला____"ये क्या कह रहे हैं आप?"

"तो अब आप भी हमसे झूठ बोलने लगे?" दादा ठाकुर ने सहसा गंभीर हो कहा____"आपसे ये उम्मीद नहीं थी हमें।"

"गुस्ताख़ी माफ़ ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने फ़ौरन ही हाथ जोड़ते हुए कहा____"लेकिन यकीन मानिए, मुझे पूरी तरह से अब भी सच का पता नहीं है। मुझे बस शक है कि सफ़ेदपोश कौन हो सकता है।"

"तो फिर बताइए।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें बताइए कि किस पर और क्यों शक है आपको?"

"उसी रात शक हुआ था मुझे।" किशोरी लाल ने कहा____"जिस रात आप और छोटे कुंवर सफ़ेदपोश के पकड़े जाने की ख़बर सुन कर हवेली से गए थे। आप और छोटे कुंवर तो चले गए थे लेकिन मुझे देर से पता चला था। ख़ैर उसके बाद जब मझली ठकुराईन अपनी बेटी का पता करने उनके कमरे में गईं और फिर एकदम से ग़ायब ही गईं तो मैं समझ गया कि कुछ गड़बड़ है। मैं समझ गया था कि कुसुम बिटिया शायद अपने कमरे में नहीं थीं और इसी लिए उन्हें खोजने के चलते मझली ठकुराईन भी हवेली से ग़ायब हो गईं हैं। उसके बाद जब मैंने आपके और छोटे कुंवर के साथ उन दोनों को भी आया देखा और साथ ही आप सबकी ऐसी हालत देखी तो मेरा शक यकीन में बदलने लगा। हालाकि दिल तब भी नहीं मान रहा था क्योंकि ऐसी उम्मीद ही नहीं कर सकता था मैं। उसके बाद जिस तरह से हवेली में आप सब गुमसुम से नज़र आने लगे थे उससे मुझे ये लगने लगा था कि हो न हो ऐसा इसी लिए होगा क्योंकि कुसुम बिटिया ही सफ़ेदपोश के रूप में पकड़ी गई रही होगी। उसके बाद जब आपने मेरे पूछने पर मुझे इस बारे में पूछने से मना कर दिया तो यकीन हो गया कि जो मैं अनुमान लगा रहा था वो सच है। बस इतना ही जानता हूं मैं। हालाकि अभी भी मुझे यह लगता है कि कुसुम बिटिया वो हो ही नहीं सकती हैं।"

किशोरी लाल की इन बातों के बाद दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ बोल ना सके। उनके चेहरे पर सोचो के भाव नुमायां हो उठे थे। इधर किशोरी लाल भी धड़कते दिल के साथ उन्हें देखे जा रहा था।

"ख़ैर छोड़िए इन बातों को।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"चलिए ज़रा वहां का काम धाम भी देख लें। उसके बाद वहीं से कुंदनपुर (मेनका चाची का मायका) चले जाएंगे।"

"कु...कुंदनपुर???" किशोरी लाल के माथे पर शिकन उभरी____"वहां कोई ख़ास काम है क्या ठाकुर साहब?"

"हां ऐसा ही कुछ समझ लीजिए।" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए कहा____"चलिए चलते हैं।"

कहने के साथ ही वो अपने सिंहासन से उठ गए तो किशोरी लाल ने भी अपनी कुर्सी छोड़ दी। कुछ ही देर में दादा ठाकुर तैयार होने के बाद हवेली से बाहर आ गए। उन्होंने शेरा को जीप लाने का हुकुम दिया। कुछ देर में जब शेरा जीप ले आया तो दादा ठाकुर उसमें बैठ गए और उनके साथ किशोरी लाल भी। उसके बाद उनके कहने पर शेरा ने जीप को आगे बढ़ा दिया।




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अध्याय - 146
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रूपा अपनी मां ललिता देवी के साथ जीप में बैठी सरोज के घर पहुंची। जीप को गौरी शंकर का केशव नाम का एक नौकर चला कर लाया था। बहरहाल जीप सरोज के घर के बाहर रुकी तो दोनों मां बेटी जीप से नीचे उतर आईं। ललिता देवी केशव को जीप में ही बैठे रहने का बोल कर रूपा के साथ दरवाज़े की तरफ बढ़ीं।

रूपा कई दिनों से अपनी मां को सरोज के घर चलने को कह रही थी। उसने अपनी मां को सब कुछ बता दिया था। ललिता देवी उसके मुख से सब कुछ जान कर बड़ा हैरान हुई थी और फिर उसे ये सोच कर रोना आ गया था कि उसने अब तक अपनी उस बेटी को दुख दिया था जिसके अंदर हर किसी के लिए सिर्फ और सिर्फ प्रेम की ही भावना थी। सरोज उसकी बेटी की कुछ नहीं लगती थी इसके बावजूद उसने उसको अपनी मां कहा और एक बेटी का फर्ज़ निभाया। ये सोच कर ही ललिता देवी का सीना गर्व से फूल उठा था और फिर उसने रूपा को अपने कलेजे से लगा लिया था। बहरहाल काम की व्यस्तता के चलते आज ही वो अपनी बेटी के साथ यहां आ पाई थी।

रूपा ने दरवाज़े की शांकल बजाई तो कुछ ही पलों में सरोज ने दरवाज़ा खोला। बाहर रूपा के साथ एक औरत को खड़ा देख उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे, ये अलग बात है कि रूपा को देखते ही उसका मुरझाया चेहरा खिल उठा था और उसकी आंखें नम सी हो गईं थी।

"कैसी हैं मां?" सरोज को देखते ही रूपा ने बड़े ही अपनेपन से कहा____"अपनी बेटी को अंदर आने को नहीं कहेंगी आप?"

"अरे! क्यों नहीं कहूंगी भला?" सरोज ने झट से कहा____"तुझे देख के मेरे अंदर इतनी खुशी भर गई कि तुझे अंदर आने के लिए कहना ही भूल गई मैं। आ जा बेटी, जल्दी से आ कर मेरे कलेजे से लग जा। बहुत दिन हो गए तुझे देखे हुए। बहुत याद आ रही थी तेरी।"

"मुझे भी आपकी बहुत याद आ रही थी मां।" रूपा ने झट से अंदर आ कर सरोज के गले से लग कर कहा_____"कई दिनों से मां से कह रही थी कि मुझे अपनी मां से मिलना है और उनका हाल चाल पूछना है।"

ललिता देवी इस अद्भुत नज़ारे को देखने में जैसे खो ही गई थी। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी आंखों में आंसू भर आए और फिर छलक भी पड़े। उधर सरोज ने जोरों से रूपा को अपने कलेजे से लगा लिया था। ना चाहते हुए भी उसकी सिसकियां छूट गईं थी।

"तुझे अपने कलेजे से लगा लिया तो ऐसा लग रहा है जैसे मैंने अपनी अनू को कलेजे से लगा लिया है।" सरोज ने रुंधे गले से कहा____"अब जा कर ठंडक मिली है मेरे कलेजे को।"

"चलिए अब रोइए मत।" रूपा ने सरोज से अलग हो कर कहा____"आप जानती हैं ना कि मैं अपनी मां की आंखों में आंसू नहीं देख सकती।"

"अरे! कहां रो रही हूं मैं?" सरोज झट आंचल से अपने आंसू पोंछते हुए जबरन मुस्कुराई____"ये तो खुशी के आंसू हैं। मेरी बेटी जो मिलने आई है मुझसे।"

"अगर ऐसा है तो फिर ठीक है।" रूपा ने मुस्कुराते हुए कहा____"अच्छा अब आप इनसे मिलिए। ये मेरी मां हैं....ललिता देवी।"

"प्रणाम बहन जी।" सरोज ने ललिता की तरफ देखते हुए झट से हाथ जोड़ कर उसे प्रणाम किया तो जवाब में ललिता देवी ने भी हाथ जोड़ लिए।

"सच कहती हूं बहन।" फिर उसने अधीरता से कहा____"आज अपनी आंखों से आप दोनों मां बेटी का ये मिलन देख कर धन्य सी हो गई हूं मैं। काश! ऐसा प्रेम और ऐसी ममता मेरे भी सीने में होती तो मैं कभी अपनी बेटी को दुख देने का न सोचती।"

"ऐसी बातें मत कहिए मां।" रूपा ने पलट कर अपनी मां से कहा____"जो हुआ उसे भूल जाइए। मैं तो अब इसी बात से खुश हूं कि मुझे मेरे इस एक ही जन्म में दो दो मां मिल गई हैं। मैं चाहती हूं मेरी दोनों माएं खुश रहें और मुझ पर अपनी ममता लुटाती रहें।"

"बहुत नेक दिल बिटिया है आपकी।" सरोज ने कहा____"बिल्कुल मेरी बेटी अनू के जैसी है ये। तभी तो ये मुझे एक पल के लिए भी मायूस या दुखी नहीं होने देती। अक्सर सोचती हूं कि अगर ये मेरी बेटी बन कर न आई होती तो क्या होता मेरा? मैं तो हर वक्त अपनी बेटी के वियोग में ही घुटती रहती थी लेकिन इसने आ कर जादू किया और मेरे ठहर गए जीवन को फिर से चलायमान कर दिया।"

"मैंने इसे जन्म ज़रूर दिया है लेकिन इसके बावजूद मैं इसे कभी समझ नहीं सकी बहन।" ललिता देवी ने कहा____"इसने वैभव से प्रेम किया जिसके चलते मैंने हमेशा इसे कोसा और दुख दिया। मुझसे बेहतर तो आप हैं जो इसे समझती हैं और इस पर अपनी ममता लुटाती हैं।"

"हे भगवान! पता नहीं आप दोनों ये कैसी बातें ले कर बैठ गईं हैं?" रूपा ने जैसे तुनक कर झूठी नाराज़गी दिखाई____"अरे! कोई और बात कीजिए जिससे किसी को कोई दुख तकलीफ़ न हो।"

रूपा की ये बात सुन कर ललिता देवी और सरोज दोनों ही मुस्कुरा उठीं। तभी दूसरे वाले दरवाज़े से भागता हुआ अनूप आ गया। उसके एक हाथ में खिलौना था। आंगन में रखी चारपाई पर अपनी मां के अलावा एक अन्य अंजान औरत को देख वो एकदम से ठिठक गया। एकाएक उसकी नज़र रूपा पर पड़ी तो उसके चेहरे पर खुशी के भाव उभर आए।

"अले! दीदी तुम आ दई।" अनूप ने अपनी तोतली भाषा में खुशी ज़ाहिर की, फिर सहसा चेहरे पर अजीब से भाव ला कर कहा____"ना मुधे तुमथे बात न‌ई कलना।"

"अरे! ये क्या कह रहा है मेरा बेटू।" रूपा झट से उसके क़रीब जा कर बड़े प्रेम भाव से बोली____"भला मुझसे क्यों बात नहीं करेगा मेरा बेटू...हां?"

"त्योंती तुम पता न‌ई तहां तली द‌ई थी?" अनूप ने मुंह फुलाए कहा____"त्या तुम मेली अनू दीदी तो धूधने द‌ई थी?"

अनूप की ये बात सुनते ही रूपा की आंखें भर आईं। उसके अंदर ये सोच कर हुक सी उठी कि इतना छोटा होने पर भी वो अब तक अपनी अनू दीदी को भूल नहीं पाया है, बड़ों की तो बात ही क्या थी।

"अले! त्या हुआ तुमतो?" रूपा को चुप देख उसने एकाएक मासूम सी शक्ल बना कर पूछा____"तुम लो त्यों ल‌ई हो? त्या अनू दीदी न‌ई मिली तुमे?"

रूपा ने झपट कर उसे अपने गले से लगा लिया। उसके जज़्बात बुरी तरह मचल उठे थे। उसने अपने जज़्बातों को तो काबू कर लिया था लेकिन आंखें छलक पड़ने से रोक न सकी थी। उधर चारपाई पर बैठी ललिता देवी और सरोज की भी आंखें छलक पड़ीं थी। ललिता देवी ने आज पहली बार ऐसा दृश्य देखा था और उसे आत्मा की गहराई से महसूस किया था। उसे एकदम से एहसास हुआ कि वाकई में अनू के जाने से इस घर में दोनों मां बेटों की क्या हालत रही होगी।

"अले! मत लो दीदी।" उधर अनूप की आवाज़ वातावरण में गूंजी____"न‌ई तो मैं भी लो दूंगा।"

"नहीं, मेरा बेटू बिल्कुल नहीं रोएगा।" रूपा ने झट से उसे अपने से अलग कर के कहा____"मेरा बेटू बहुत अच्छा है ना। अच्छा देखो, मैं अपने सबसे अच्छे बेटू के लिए क्या लाई हूं।"

रूपा की बात सुन अनूप बड़ी उत्सुकता से देखने लगा। रूपा ने अपने कुर्ते को थोड़ा सा उठा कर अपनी कमर से एक छोटी सी थैली निकाली। थैली की गांठ खोल कर उसने उसमें से कागज़ में लिपटा हुआ कुछ निकाला। अनूप बहुत ही ज़्यादा उत्सुकता से उसे देखे जा रहा था। इधर सरोज भी नम आंखों से देख रही थी। रूपा ने जल्दी ही कागज़ को चारो तरफ से खोल दिया। कागज़ के खुलते ही उसमें जो कुछ नज़र आया उसे देख जहां अनूप खुशी से उछल पड़ा वहीं सरोज की आंखों से आंसू का एक कतरा छलक गया।

"अले अले! ये तो दुल है औल नम्तीन भी।" अनूप मारे ख़ुशी के उछलते हुए बोल पड़ा____"ये थब मेले लिए लाई ओ ना दीदी? दो दल्दी थे दो मुधे।"

"हां ये लो।" रूपा ने सारा का सारा ही उसे पकड़ाते हुए कहा____"ये मैं अपने बेटू के लिए ही लाई हूं। मुझे पता था कि मेरा बेटू मुझसे गुड़ मांगेगा इस लिए ले आई थी मैं।"

अनूप कुछ ज़्यादा ही खुश हो गया था। उसकी मनपसंद चीज़ जो मिल गई थी उसे। खिलौने को उसने पहले ही ज़मीन पर फेंक दिया था और अब गुड़ नमकीन लिए आंगन के एक तरफ बनी पट्टी पर बैठ कर खाने लगा था। ये सारा मंज़र देख ललिता देवी को अपनी बेटी पर अत्यधिक लाड़ आ रहा था। उसे ये सोच कर आत्मिक खुशी हो रही थी कि उसकी बेटी सिर्फ अपनों का ही नहीं बल्कि दूसरों का भी दुख दर्द समझती थी और उस दुख दर्द को दूर करने का प्रयत्न भी करती थी। आज के युग में कहां लोगों के अंदर ऐसी पवित्र भावनाएं होती है?

"ये बस खेलता ही रहता है मां या पढ़ता भी है?" रूपा ने सरोज के पास आ कर पूछा।

"शुरू शुरू में एक दो दिन इसने पढ़ाई की थी।" सरोज ने बताया____"उसके बाद फिर से खेल में लग गया। मैंने जब इसे पढ़ने को कहा तो कहने लगा जब रूपा दीदी आएगी तो पढूंगा। मैं तो अनपढ़ गंवार हूं। उसके पहाड़े में क्या लिखा है मुझे कुछ पता ही नहीं है। तूने जो कुछ उसे पढ़ाया था और सिखाया था उसे भी भूल गया होगा वो।"

"कोई बात नहीं मां।" रूपा ने कहा____"अभी बच्चा ही तो है। आपको पता है, हमारे गांव में विद्यालय बन रहा है। अगले साल से ये उसी विद्यालय में पढ़ने जाया करेगा।"

"देखा आपने बहन जी।" सरोज ने ललिता देवी से कहा____"मेरी ये बेटी जाने क्या क्या करने का सोच रखी है। इसे कैसे समझाऊं कि मैं एक बहुत ही मामूली किसान की औरत हूं। हमारे जैसे लोगों के लिए पढ़ाई लिखाई शोभा नहीं देती बल्कि हमारा धर्म है बड़े लोगों की ज़मीनों पर मेहनत मज़दूरी करना और उनकी सेवा करना।"

"हां तो ठीक है ना।" रूपा ने कहा____"आप अपना धर्म निभाते रहना लेकिन मेरा भाई किसी के भी यहां मेहनत मज़दूरी नहीं करेगा। वो खूब पढ़ेगा लिखेगा और फिर एक दिन बहुत ही क़ाबिल इंसान बनेगा।"

"देख रही हैं आप बहन जी।" सरोज ने ललिता देवी से कहा____"आप ही समझाइए इसे कि ये सब हम जैसों को शोभा नहीं देता।"

"नहीं बहन जी।" ललिता देवी ने कहा____"इस बात पर तो मैं भी यही कहूंगी कि रूपा सही कह रही है। युग बदल रहा है, समय बदल रहा है और इस लिए समय के साथ साथ लोगों की विचारधारा भी बदलनी चाहिए। छोटे बड़े का लिहाज करना, समाज के नियमों का पालन करना और साथ ही अच्छे संस्कार रखना बहुत ही अच्छी बात है लेकिन बदलते समय के साथ व्यक्ति का शिक्षित होना भी बेहद महत्वपूर्ण है। हमारे समय में तो ये सब सोचता भी नहीं था कोई लेकिन जब हमें भी शिक्षा का महत्व समझ आया तो हमने भी शिक्षित होना ज़रूरी समझा। इसी तरह बाकी सबको भी समझना चाहिए। मैंने सुना है कि छोटे छोटे कस्बों में भी आज कल हर कोई शिक्षा के पीछे भाग रहा है। ज़ाहिर है वो सब भी समझते हैं कि आज के युग में शिक्षा का क्या महत्व है।"

सरोज को समझ ना आया कि क्या कहे। ख़ैर उसके बाद काफी देर तक तीनों एक दूसरे से बातें करती रहीं। इस बीच सरोज जब सबके लिए चाय बनाने जाने लगी तो रूपा ने उसे रोक दिया और खुद चाय बना कर ले आई। ललिता देवी काफी हद तक सरोज से घुल मिल गईं थी। सरोज को भी बहुत अच्छा महसूस हो रहा था कि वो अपनी बेटी के साथ उससे मिलने और उसका हाल चाल पूछने आई थी।

कुछ समय बाद ललिता देवी ने सरोज से जाने की इजाज़त मांगी और फिर ये कह कर चलने लगी कि वो फिर से किसी दिन समय निकाल कर आएगी। ललिता देवी ने सरोज से भी कहा कि वो उसके घर आ जाया करें। बहरहाल, रूपा और ललिता देवी एक एक कर के सरोज से गले मिलीं और फिर जीप में बैठ कर चली गईं। सरोज उन्हें तब तक देखती रही जब तक कि जीप उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई।

✮✮✮✮

मैं भुवन के साथ खेतों पर था। धूप तो खिली हुई थी लेकिन दिन ढलने की वजह से ठंड का असर होने लगा था। रूपचंद्र से हुई बातों के बाद मैं और भी उलझ गया था। मैं बहुत कोशिश करता था कि मेरे मन में भाभी से ब्याह होने वाली बातें ना आएं लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था। भुवन के साथ मैं खेतों पर कोई न कोई काम करने के बहाने खुद को बहलाने की कोशिश करता रहा था लेकिन मन था कि कमबख़्त बार बार वहीं जा कर अटक जाता था।

कुछ समय बाद मैं वापस मकान में आया और बाहर ही एक चारपाई रख कर बैठ गया। अभी कुछ ही पल गुज़रे थे कि तभी मेरी नज़र सुनील और चेतन पर पड़ी। वो दोनों मेरी तरफ ही चले आ रहे थे। इतने समय बाद दोनों को देख कर मैं थोड़ा चौंक सा गया था। मन में अचानक से ये ख़याल भी उभर आया कि आज ये दोनों यूं खुले आम मेरी तरफ क्यों चले आ रहे हैं? क्या इन्हें सफ़ेदपोश का डर नहीं है?

मैं सोचने लगा कि जिस तरह ये दोनों निडरता से चले आ रहे थे उससे तो यही लगता है जैसे अब इन्हें सफ़ेदपोश का डर नहीं है। अगर ऐसा ही है तो क्या इसका मतलब ये हो सकता है कि दोनों को सफ़ेदपोश के पकड़े जाने का पता चल चुका है? पर सवाल है कि कैसे? जब बाकी किसी को उसके पकड़े जाने का पता नहीं है तो इन दोनों को कैसे हो सकता है? मैं ये सब सोच ही रहा था कि वो दोनों मेरे पास ही आ गए।

"तुम दोनों नमूने आज यहां कैसे भटकते हुए आ गए?" मैंने दोनों को बारी बारी से देखते हुए पूछा____"तुम्हारे उस आका को पता चला तो क़यामत आ जाएगी तुम दोनों के ऊपर।"

"क़यामत आनी है तो अभी आ जाए भाई।" चेतन ने आहत भाव से कहा____"बेटीचोद फ़क़ीरों जैसी ज़िंदगी हो गई है हमारी। उसके डर से मारे मारे फिर रहे हैं हम और एक वो है कि मादरचोद जाने कहां ग़ायब हो गया है?"

"अरे! ये कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो तुम?" मैंने थोड़ी हैरानी से पूछा____"बताओ तो कि आख़िर हुआ क्या है और आज यहां कसे?"

"जान हथेली पर रख के आए हैं यार।" सुनील ने कहा____"साला बहुत डर डर के भटक लिए, अब और नहीं। अब तो सोच लिया है कि चाहे वो हमारी जान ही क्यों न ले ले लेकिन अब उसके डर से कहीं छिपने नहीं जाएंगे। तुम्हें पता है हम दोनों के घर वालों का कितना बुरा हाल है? हम तो डर के मारे जी ही रहे हैं वो लोग भी ऐसे ही जी रहे हैं। एक तो हमारे ऊपर मंडराने वाले ख़तरे का डर, दूसरे हमारी वजह से कुछ हो जाने का डर। इसी लिए भाई, हम दोनों ने सोच लिया है कि वो चाहे आज ही हमें मार दे लेकिन अब हम उसके डर से अपने घर वालों से दूर नहीं रहेंगे।"

मैं समझ गया कि इन दोनों को सफ़ेदपोश के पकड़े जाने का पता नहीं है। होता भी कैसे? सफ़ेदपोश के पकड़े जाने की ख़बर किसी को दी ही नहीं गई थी। बहरहाल, मैं सोचने लगा कि अब इनका क्या किया जाए? सफ़ेदपोश के पकड़े जाने का सच बता नहीं सकता था लेकिन मैं ये भी नहीं चाहता था कि वो दोनों सफ़ेदपोश के डर से ही जिएं।

"आज के बाद तुम दोनों को अपने आका से डरने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने कहा____"और ना ही उसके डर से कहीं छिपने की ज़रूरत है। बेफ़िक्र हो कर अपने अपने घर जाओ और बिल्कुल वैसे ही बिना डर के अपने घर वालों के साथ रहो जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था।"

"भाई ये तुम क्या कह रहे हो?" चेतन की आंखें फैली____"क्या तुम हमारी मौत का प्रबंध कर रहे हो?"

"अबे ऐसा कुछ नहीं है।" मैंने कहा____"बल्कि सच कह रहा हूं।"

"लेकिन सफ़ेदपोश का क्या?" सुनील बोल पड़ा।

"अभी तो बड़ा डींगें मार रहे थे कि अब और नहीं।" मैंने घूरते हुए कहा___"फिर अब क्या हुआ? सालो एक तरफ तो कहते हो कि चाहे आज ही मौत आ जाए तुम लोग अब छिप के नहीं रहोगे, दूसरी तरफ उसके डर से गांड़ भी फट रही है तुम दोनों की।"

"मौत से किसे डर नहीं लगता यार?" चेतन ने कहा____"सच कहता हूं भाई, मां चुद गई है इतने समय से ऐसी जिंदगी जीते जीते। अब तो बस यही दिल करता है कि थोड़ी सी शांति मिल जाए।"

"अबे कहा तो मैंने कि आराम से अपने अपने घर जाओ और अपने घर वालों के साथ खुशी खुशी रहो।" मैंने कहा____"अब तुम लोगों के साथ कोई कुछ नहीं करेगा। यूं समझ लो कि सफ़ेदपोश का अंत हो चुका है।"

"क्या सच में?" दोनों बुरी तरह चौंके।

"हां सच में।" मैंने कहा____"उसका एक तरह से अंत ही हो चुका है। ख़ुद सोचो कि महीने भर से तुम दोनों को वो कहीं नज़र क्यों नहीं आया? मतलब साफ है कि उसका किस्सा ख़त्म हो चुका है।"

"वैसे सच कहूं भाई तो हमें भी अब यही आभास होने लगा था।" सुनील ने कहा____"साला इतना समय गुज़र गया मगर एक दिन भी वो हमें नहीं मिला और ना ही किसी माध्यम से उसका संदेश हम तक पहुंचा है। इस वजह से अब हमें भी यही आभास होने लगा था कि वो साला कहीं मर खप गया होगा और इसी लिए हम दोनों यहां चले भी आए हैं।"

"अच्छा किया जो चले आए।" मैंने कहा____"तुम दोनों अब बेफ़िक्र हो जाओ और खुशी खुशी अपने घर वालों के साथ रहते हुए अपनी अपनी ज़िम्मेदारी निभाओ।"

"वो तो अब हम निभाएंगे ही भाई।" चेतन ने कहा____"हमारे ना रहने पर हमारे घर वाले बहुत परेशान और चिंतित थे। हालात बहुत बिगड़ गए हैं। अब हमें सब कुछ सम्हालना है। बहुत हुआ ये लुका छिपी का खेल। हमने इस सब के चक्कर में तुम्हारे विश्वास को भी तोड़ा और तुम्हारे साथ गद्दारी भी की। सच तो ये है कि सच्चे दोस्त के नाम पर कलंक हो चुके हैं हम। हर वक्त यही ख़याल आता है कि जिस दोस्त की वजह से हम दोनों की पहचान थी और जिसकी वजह से हम वो सब सहजता से पा लेते थे जो अपने दम पर कभी पा ही नहीं सकते थे उसके साथ हमने क्या किया है।"

"भूल जाओ सब कुछ।" मैंने कहा____"मैं जानता हूं कि तुम दोनों ने ये सब अपनी मर्ज़ी से नहीं किया है। ख़ैर अब सब ठीक हो चुका है इस लिए अगर तुम लोग वास्तव में मुझे अपना समझते हो तो जो मैं कहता हूं वही करो।"

"बिल्कुल भाई।" सुनील ने अधीरता से कहा____"हम पहले भी तुम्हारा कहा मानते थे और अभी भी तुम्हारा कहा मानेंगे। तुम जो कहोगे वही करेंगे हम।"

"ठीक है।" मैंने दोनों को बारी बारी से देखते हुए कहा____"मेरा तुम दोनों से यही कहना है कि अब से तुम दोनों कोई भी ग़लत काम नहीं करोगे। एक अच्छे इंसान बनोगे और अच्छे इंसानों की ही तरह अपने घर परिवार की ज़िम्मेदारी निभाओगे। अब से कभी किसी की बहू बेटी पर नीयत ख़राब नहीं करोगे बल्कि सबके बारे में अच्छा ही सोचोगे और अच्छा ही आचरण करोगे।"

"अब से हम ऐसा ही करेंगे भाई।" सुनील ने सिर हिलाते हुए कहा____"इतना कुछ होने के बाद अब हमें भी एहसास हो गया है कि ग़लत तो ग़लत ही होता है और ग़लत कर्म करने का बहुत बुरा परिणाम भी भोगना पड़ता है। इस लिए हम दोनों ने यही फ़ैसला किया था कि सब कुछ ठीक हो जाने के बाद हम तुम्हारी ही तरह अच्छे इंसान बनेंगे। आज तुमने भी हमें यही सब करने को कह दिया है तो यकीन मानो अब से हमारा लक्ष्य एक अच्छा इंसान बनना ही रहेगा।"

"बहुत बढ़िया।" मैंने कहा____"अब जाओ और अपने घर वालों से मिलो। वो सब तुम लोगों के लिए बहुत चिंतित होंगे। बाकी कभी किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो मुझसे बोल देना।"

मेरी बात सुन कर दोनों की आंखें भर आईं। दोनों झपट कर मुझसे लिपट गए। मैंने भी दोनों की पीठ थपथपाई। कुछ देर बाद वो दोनों चले गए। उनके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि चलो इनका भी बुरा वक्त टल गया और अब से ये दोनों भी एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चल पड़े हैं। ख़ैर कुछ देर मैं वहीं बैठा रहा और फिर भुवन को बता कर अपनी मोटर साईकिल से हवेली की तरफ चल पड़ा।



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दोनो अपडेट बहुत ही शानदार है इतना छुपाने के बाद भी ठाकुर महेंद्र सिंह को सफेद नकाबपोश के बारे में पता चल गया है साथ ही किशोरी लाल को भी
लगता है यह राज अब राज नही रहेगा ठाकुर साहब को अपने मित्र को सच बताना ही पड़ेगा देखते हैं अब ये राज राज रहता है या किसी को बताना पड़ता है
रूपा का ललिता देवी के साथ सरोज के घर जाना और वह जाकर रूपा के बारे में जानकर ललिता देवी को गर्व और दुख दोनो हुआ दुख तो इस बात का हुआ कि उसने अपनी बेटी को बहुत गलत समझा और उसके साथ गलत व्यवहार किया और गर्व इस बात का हुआ कि उसकी बेटी दूसरो का दुख बहुत ही अच्छे से समझती है साथ ही कैसे उसने सरोज और अनूप को संभाला ।
रूपा और अनूप के बीच का संवाद बहुत ही Emotinal 😭😭 और दिल को चीर देने वाला था
 

Sunli

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अध्याय - 158
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दोपहर का वक्त था।
हवेली की बैठक में पिता जी तो बैठे ही थे किंतु उनके साथ किशोरी लाल, गौरी शंकर, रूपचंद्र और वीरेंद्र सिंह भी बैठे हुए थे। वीरेंद्र सिंह को पिता जी ने संदेशा भिजवा कर बुलाया था।

"हमने आप सबको यहां पर इस लिए बुलवाया है ताकि हम सब एक दूसरे के समक्ष अपनी अपनी बात रखें और उस पर विचार कर सकें।" पिता जी ने थोड़े गंभीर भाव से कहा_____"अब जबकि हमारी बहू भी वैभव से विवाह करने को राज़ी हो गई है तो हम चाहते हैं कि जल्द से जल्द ये विवाह संबंध भी हो जाए।" कहने के साथ ही पिता जी गौरी शंकर से मुखातिब हुए____"हम तुमसे जानना चाहते हैं गौरी शंकर कि इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है? हमारा मतलब है कि वैभव की बरात सबसे पहले तुम्हारे घर में आए या फिर चंदनपुर जाए? हमारे लिए तुम्हारी भतीजी भी उतनी ही अहमियत रखती है जितना कि हमारी बहू रागिनी। हम ये कभी नहीं भूल सकते हैं कि तुम्हारी भतीजी के बदौलत ही हमारे बेटे को नया जीवन मिला है। हम ये भी नहीं भूल सकते कि तुम्हारी भतीजी ने अपने प्रेम के द्वारा वैभव को किस हद तक सम्हाला है। इस लिए तुम जैसा चाहोगे हम वैसा ही करेंगे।"

"आपने मेरी भतीजी के विषय में इतनी बड़ी बात कह दी यही बड़ी बात है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से कहा____"यकीन मानिए आपकी इन बातों से मुझे अंदर से बेहद खुशी महसूस हो रही है। मुझे भी इस बात का एहसास है कि मेरी भतीजी की वजह से ही आज मैं और मेरा पूरा परिवार आपकी नज़र में दया के पात्र बने हैं वरना हम भी समझते हैं कि जो कुछ हमने आपके साथ किया था उसके चलते हमारा पतन हो जाना निश्चित ही था।"

"जो गुज़र गया उसके बारे में अब कुछ भी मत कहो गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हम उस सबको कभी याद नहीं करना चाहते। अब तो सिर्फ यही चाहते हैं कि आगे जो भी हो अच्छा ही हो। ख़ैर इस वक्त हम तुमसे यही जानना चाहते हैं कि तुम क्या चाहते हो? क्या तुम ये चाहते हो कि वैभव की बरात सबसे पहले तुम्हारे द्वार पर आए या फिर चंदनपुर जाए?"

"आपको इस बारे में मुझसे कुछ भी पूछने की ज़रूरत नहीं है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"आप अपने मन से जैसा भी करेंगे हम उसी से खुश और संतुष्ट हो जाएंगे।"

"नहीं गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"इस बारे में तुम्हें बिल्कुल भी संकोच करने की अथवा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है। तुम जैसा चाहोगे हम वैसा ही करेंगे और ये हम सच्चे दिल से कह रहे हैं।"

"अगर आप मेरे मुख से ही सुनना चाहते हैं तो ठीक है।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"ये सच है कि हर मां बाप की तरह मेरी भी तमन्ना यही थी कि वैभव की बरात सबसे पहले मेरे ही द्वार पर आए। वैभव का जब अनुराधा के साथ ब्याह होने की बात पता चली थी तो मुझे या मेरे परिवार को उसके साथ वैभव का ब्याह होने में कोई आपत्ति नहीं थी किंतु हां इच्छा यही थी कि वैभव की बरात सबसे पहले मेरी ही चौखट पर आए। यही इच्छा रागिनी बहू के साथ वैभव का विवाह होने पर भी हुई थी लेकिन मैं ये भी समझता हूं कि ऐसा उचित नहीं होगा। रागिनी बहू पहले भी आपकी बहू थीं और अब भी होने वाली बहू ही हैं। वो उमर में भी मेरी भतीजी से बड़ी हैं। ऐसे में अगर उनका विवाह मेरी भतीजी के बाद होगा तो ये हर तरह से अनुचित लगेगा। इस लिए मेरा कहना यही है कि आप वैभव की बरात ले कर सबसे पहले चंदनपुर ही जाएं और रागिनी बिटिया के साथ वैभव का विवाह कर के उन्हें यहां ले आएं। उसके कुछ समय बाद आप वैभव की बरात ले कर हमारे घर आ जाइएगा।"

"इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है वीरेंद्र सिंह?" पिता जी ने वीरेंद्र सिंह की तरफ देखते हुए पूछा।

"आप सब मुझसे बड़े हैं और उचित अनुचित के बारे में भी मुझसे ज़्यादा जानते हैं।" वीरेंद्र सिंह ने शालीनता से कहा____"इस लिए मैं इस बारे में आप लोगों के सामने कुछ भी कहना उचित नहीं समझता हूं। बस इतना ही कहूंगा कि आप सबका जो भी फ़ैसला होगा वो मुझे तहे दिल से मंज़ूर होगा।"

"मेरा तो यही कहना है ठाकुर साहब कि इस बारे में आपको अब कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं आपसे कह चुका हूं कि आप सबसे पहले चंदनपुर ही वैभव की बरात ले कर जाइए। सबसे पहले रागिनी बिटिया का विवाह होना ही हर तरह से उचित है।"

"किशोरी लाल जी।" पिता जी ने मुंशी किशोरी लाल की तरफ देखा____"आपका क्या कहना है इस बारे में?"

"मैं गौरी शंकर जी की बातों से पूरी तरह सहमत हूं ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने कहा____"इन्होंने ये बात बिल्कुल उचित कही है कि रागिनी बहू का विवाह सबसे पहले होना चाहिए। उमर में बड़ी होने के चलते अगर उनका विवाह रूपा बिटिया के बाद होगा तो उचित नहीं लगेगा। छोटी बड़ी हो जाएंगी और बड़ी छोटी हो जाएंगी। लोगों को जब इस बारे में पता चलेगा तो वो भी ऐसी ही बातें करेंगे। इस लिए मैं गौरी शंकर जी की बातों से सहमत हूं।"

"ठीक है।" पिता जी ने एक लंबी सांस लेने के बाद कहा____"अगर आप सबका यही विचार है तो फिर ऐसा ही करते हैं। पुरोहित जी से मिल कर जल्द ही हम दोनों बहुओं के विवाह की लग्न बनवाएंगे। हम चाहते हैं कि इस हवेली में जल्द से जल्द हमारी दोनों बहुएं आ जाएं जिससे इस हवेली में और हमारे परिवार में फिर से रौनक आ जाए।"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद सभा समाप्त हो गई। गौरी शंकर और रूपचंद्र चले गए, जबकि वीरेंद्र सिंह बैठक में ही बैठे रहे। वीरेंद्र सिंह को जल्द ही जाना था इस लिए पिता जी के कहने पर उसने थोड़ी देर आराम किया और फिर खुशी मन से चले गए।

✮✮✮✮

गौरी शंकर और रूपचंद्र ने अपने घर पहुंच कर सबको ये बताया कि हवेली में दादा ठाकुर से क्या बातें हुईं हैं। सबके चेहरों पर खुशी के भाव उभर आए। किसी को भी इस बात से आपत्ति नहीं हुई कि वैभव की बरात सबसे पहले उनके यहां न आ कर चंदनपुर जाएगी। शायद सबको लगता था कि सबसे पहले रागिनी का ही वैभव के साथ विवाह होना चाहिए। जल्दी ही ये ख़बर रूपा के कानों तक पहुंच गई जिसके चलते उसके चेहरे पर भी खुशी के भाव उभर आए। उसकी दोनों भाभियां उसे छेड़ने लगीं जिससे वो शर्माने लगी। फूलवती की वो दोनों बेटियां भी अपनी ससुराल से आ गईं थी जिनका कुछ समय पहले विवाह हुआ था। वो दोनों भी रूपा को छेड़ने में लग गईं थी।

घर में एकदम से ही ख़ुशी का माहौल छा गया था। रूपा को उसकी भाभियों ने और उसकी बहनों ने बताया कि वैभव का विवाह सबसे पहले उसकी भाभी रागिनी से होगा, उसके बाद उससे। रूपा को पहले से ही इस बात का अंदेशा था और वो खुद भी चाहती थी कि पहले उसकी रागिनी दीदी ही वैभव की पत्नी बनें।

बहरहाल, जल्द ही विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं। एक बार फिर से सब अपने अपने काम पर लग गए। घर के सबसे बड़े बुजुर्ग यानि चंद्रमणि को बताया गया कि आख़िर वो दिन जल्द ही आने वाला है जब उनके घर की बेटी दादा ठाकुर की बहू बन कर हवेली जाएगी। चंद्रमणि इस बात से बेहद खुश हुए। उन्होंने गौरी शंकर और बाकी सबसे यही कहा कि सब कुछ अच्छे से करना। हर बात का ख़याल रखना, किसी भी तरह की ग़लती न हो।

"कैसी है मेरी प्यारी बहन?" रूपा के कमरे में दाख़िल होते ही रूपचंद्र ने अपनी बहन से बड़े प्यार से पूछा____"तुझे किसी ने खुशी वाली ख़बर दी कि नहीं?"

रूपचंद्र की इस बात से रूपा शर्माते हुए मुस्कुरा उठी। रूपचंद्र समझ गया कि उसे पता चल चुका है। वो चल कर उसके पास आया और पलंग के किनारे पर बैठ गया।

"वैसे एक बात कहूं।" फिर उसने रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"विवाह तेरा होने वाला है और इसकी खुशी सबसे ज़्यादा मुझे हो रही है। मुझे इस बात की खुशी हो रही है कि मेरी बहन की तपस्या पूरी होने वाली है। मेरी बहन ने इस संबंध के चलते जितना कुछ सहा है आख़िर अब उसका पूरी तरह से अंत हो जाएगा और उसकी जगह उसे ढेर सारी खुशियां मिल जाएंगी।"

रूपा को समझ ना आया कि क्या कहे? बड़े भाई के सामने उसे शर्म आ रही थी। हालाकि उसकी बातों से उसके ज़हन में वो सारी बातें भी ताज़ा हो गईं थी जो उसने अब तक सहा था। उस सबके याद आते ही उसके चेहरे पर कुछ पलों के लिए गंभीरता के भाव उभर आए थे।

"मैं अक्सर ये बात बड़ी गहराई से सोचा करता हूं कि ये जो कुछ भी हुआ है उसके पीछे आख़िर असल वजह क्या थी?" रूपचंद्र ने थोड़े गंभीर भाव से कहा____"क्या इसकी वजह सिर्फ ये थी कि अंततः ऐसा समय आ जाए जब हम सबके दिलो दिमाग़ में दादा ठाकुर और उनके परिवार वालों के प्रति सचमुच का मान सम्मान और प्रेम भाव पैदा हो जाए? क्या इसकी वजह ये थी कि अंततः तेरे प्रेम के चलते दोनों ही परिवारों का कायाकल्प हो जाए? क्या इसकी वजह सिर्फ ये थी कि अंततः प्रेम की ही वजह से वैभव का इस तरह से हृदय परिवर्तन हो जाए और वो एक अच्छा इंसान बन जाए? और क्या इसकी वजह ये भी थी कि अंततः मैं अपनी बहन को समझने लगूं और फिर मैं भी सबके बारे में सच्चे दिल से अच्छा ही सोचने लगूं? अगर वाकई में यही वजह थी तो इस सबके बीच उन्हें क्यों इस दुनिया से गुज़र जाना पड़ा जो हमारे अपने थे? इस सबके बीच उन्हें क्यों गुज़र जाना पड़ा जो निर्दोष थे? मैं अक्सर ये सोचता हूं रूपा लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं सूझता। ख़ैर जाने दे, खुशी के इस मौके पर बीती बातों को याद कर के खुद को क्यों दुखी करना।"

"मैं ये सब तो नहीं जानती भैया।" रूपा ने थोड़ी झिझक के साथ कहा____"लेकिन बड़े बुजुर्गों से सुना है कि एक नया अध्याय तभी शुरू होता है जब उसके पहले का अध्याय समाप्त हो जाता है। जैसे प्रलय के बाद नए सिरे से सृष्टि का निर्माण होता है, ये भी शायद वैसा ही है।"

"हां शायद ऐसा ही होगा।" रूपचंद्र ने सिर हिला कर कहा____"ख़ैर छोड़ इन बातों को। अगर ये सच में नए सिरे से एक नया अध्याय शुरू करने जैसा ही है तो मैं खुशी से इस नए अध्याय का हिस्सा बनना चाहता हूं। अब से मेरी यही कोशिश रहेगी कि अपने जीवन में जो भी करूं अच्छा ही करूं। बाकी ऊपर वाले की इच्छा। अच्छा अब तू आराम कर, मैं चलता हूं।"

कहने के साथ ही रूपचंद्र उठा और कमरे से बाहर चला गया। उसके जान के बाद रूपा पलंग पर लेट गई और जाने किन ख़यालों में खो गई।

✮✮✮✮

दूसरे दिन पिता जी पुरोहित जी से मिले। उनके साथ गौरी शंकर भी था। पिता जी ने पुरोहित जी को विवाह की लग्न देखने की गुज़ारिश की तो वो अपने काम पर लग गए। वो अपने पत्रे में काफी देर तक देखते रहे। उसके बाद उन्होंने बताया कि आज से पंद्रह दिन बाद का दिन विवाह के लिए शुभ है। पिता जी ने उनसे पूछा कि और कौन सा दिन शुभ है तो पुरोहित जी ने पत्रे में देखने के बाद बताया कि उसके बाद बीसवां दिन शुभ है। पिता जी ने उन दोनों दिनों की लग्न बनाने को कह दिया।

कुछ समय बाद जब लग्न बन गई तो पिता जी और गौरी शंकर पुरोहित जी से इजाज़त ले कर वापस आ गए। पिता जी ने गौरी शंकर से कहा कि आज से बीसवें दिन वो बरात ले कर उसके घर आएंगे इस लिए वो विवाह की तैयारियां शुरू कर दें। गौरी शंकर ने खुशी से सिर हिलाया और अपने घर चला गया।

इधर हवेली में पिता जी ने सबको बता दिया कि लग्न बन गई है इस लिए विवाह की तैयारियां शुरू कर दी जाएं। मां के पूछने पर उन्होंने बताया कि आज से पंद्रहवें दिन यहां से बरात प्रस्थान करेगी चंदनपुर के लिए। मां ने कहा कि ऐसे शुभ अवसर पर मेनका चाची के दोनों बेटों को भी यहां होना चाहिए इस लिए उनको भी समय से पहले बुला लिया जाए।

समय क्योंकि ज़्यादा नहीं था इस लिए फ़ौरन ही सब लोग काम पर लग गए। पिता जी ने अपने एक मुलाजिम के हाथों लग्न की एक चिट्ठी चंदनपुर भी भिजवा दी। उसके बाद शुरू हुआ नात रिश्तेदारों को और अपने घनिष्ट मित्रों को निमंत्रण देने का कार्य।

मैं निर्माण कार्य वाली जगह पर था। रूपचंद्र ने आ कर बताया कि विवाह की लग्न बन गई है इस लिए अब मुझे हवेली पर ही रहना चाहिए और अपनी सेहत का ख़याल रखना चाहिए। उसकी ये बात सुन कर मेरे दिल की धड़कनें एकदम से बढ़ गईं। मन में एकाएक जाने कैसे कैसे ख़याल आने लगे जो मुझे रोमांचित भी कर रहे थे और थोड़ा अधीर भी कर रहे थे। रूपचंद्र के ज़ोर देने पर मुझे हवेली लौटना ही पड़ा। सच में वो मेरा पक्का साला बन गया था।

✮✮✮✮

"अरे वाह! विवाह की लग्न बन गई है और पंद्रहवें दिन तेरा विवाह हो जाएगा?" शालिनी ने मुस्कुराते हुए रागिनी को छेड़ा____"यानि मेरी प्यारी रागिनी अब जल्द से जल्द दुल्हन बन कर वैभव जीजा जी के पास पहुंच जाएगी और....और फिर रात को सुहागरात भी मनाएगी।"

"धत्त, कुछ भी बोलती है।" रागिनी बुरी तरह शर्मा गई____"शर्म नहीं आती तुझे ऐसा बोलने में?"

"लो अब इसमें शर्म कैसी भला?" शालिनी ने आंखें नचाते हुए कहा____"विवाह के बाद सुहागरात तो होती ही है और तेरे नसीब में तो दो दो बार सुहागरात का सुख लिखा है। हाय! कैसी हसीन रात होगी वो जब जीजा जी मेरी नाज़ुक सी सहेली के नाज़ुक से बदन पर से एक एक कर के कपड़े उतारेंगे और फिर उसके पूरे बदन को चूमेंगे, सहलाएंगे और फिर ज़ोर से मसलेंगे भी। उफ्फ! कितना मज़ा आएगा ना रागिनी?"

"हे भगवान! शालिनी चुप कर ना।" रागिनी उसकी बातें सुन कर शर्म से पानी पानी हो गई____"कैसे बेशर्म हो कर ये सब बोले जा रही है तू?"

"अरे! तो क्या हो गया मेरी लाडो?" शालिनी ने एकदम से उसके दोनों हाथ पकड़ लिए, फिर बोली_____"तू मेरी सहेली है। तुझसे मैं कुछ भी बोल सकती हूं और तू भी इतना शर्मा मत। तू भी मेरे साथ इन सब बातों का लुत्फ़ उठा।"

"मुझे कोई लुत्फ़ नहीं उठाना।" रागिनी ने उसको घूरते हुए कहा____"मैं तेरी तरह बेशर्म नहीं हूं।"

"बेशर्म तो तुझे बनना ही पड़ेगा अब।" शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा____"जब सुहागरात को जीजा जी तेरे बदन से सारे कपड़े निकाल कर तुझे पूरा नंगा कर देंगे तब क्या करेगी तू? जब वो तुझे हौले हौले प्यार करेंगे तब क्या करेगी तू? मुझे यकीन है तब तू शर्म नहीं करेगी बल्कि जीजा जी के साथ पूरी बेशर्मी से मज़ा करेगी।"

"सच में बहुत बेशर्म हो गई है तू।" रागिनी के समूचे जिस्म में झुरझुरी दौड़ गई, बुरी तरह लजाते हुए बोली____"देख अब इस बारे में कुछ मत बोलना। मैं सुन नहीं सकती, मुझे बहुत शर्म आती है। पता नहीं क्या हो गया है तुझे? शादी से पहले तो तू इतनी बेशर्म नहीं थी।"

"शादी के बाद ही तो इंसान में बदलाव आता है रागिनी।" शालिनी ने कहा____"मैं हैरान हूं कि तू शादी के बाद भी नहीं बदली क्यों? नई नवेली कुंवारी दुल्हन की तरह आज भी शर्माती है।"

"हां मैं शर्माती हूं क्योंकि मुझे शर्म आती है।" रागिनी ने कहा____"मैं तेरी तरह हर बात खुल कर नहीं बोल सकती।"

"अच्छा ये तो बता कि अब तो तू वैभव जीजा जी को पति की नज़र से ही सोचने लगी है ना?" शालिनी ने गौर से उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"या अभी भी उनको देवर ही समझती है?"

"पहले वाला रिश्ता इतना जल्दी कैसे भूल जाऊंगी भला?" रागिनी ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"जब भी उनके बारे में सोचती हूं तो सबसे पहले यही ख़याल आता है कि वो मेरे देवर थे? तू शायद अंदाज़ा भी नहीं लगा सकती कि इस ख़याल के आते ही मेरा समूचा बदन कैसे कांप उठता है? शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस रिश्ते के बारे में अब तक मुझसे ज़्यादा सोच चुका होगा? जब तक आंखें खुली रहती हैं तब तक मन में ख़यालों का तूफ़ान चलता रहता है। मैं अब तक हर उस बात की कल्पना कर चुकी हूं जो इस रिश्ते के बाद मेरे जीवन में होने वाला है।"

"हां मैं समझ सकती हूं यार।" शालिनी ने कहा____"मैं समझ सकती हूं कि तूने इस बारे में अब तक क्या क्या नहीं सोचा होगा। सच में तेरे लिए इस रिश्ते को स्वीकार करना बिल्कुल भी आसान नहीं रहा होगा। ख़ैर जाने दे, अब तो सब ठीक हो गया है ना तो अब सिर्फ ये सोच कि तुझे अपनी आने वाली ज़िंदगी को कैसे खुशहाल बनाना है? मैं तुझे यही सलाह दूंगी कि विवाह के बाद ऐसी बातें बिल्कुल भी मत सोचना जिससे कि तेरे जीवन में और तेरी खुशियों में उसका असर पड़े। नियति ने तुझे नए सिरे से जीवन जीने का अवसर दिया है तो तू इसको उसी हिसाब से और उसी सोच के साथ जी। तेरे होने वाले पति तेरी खुशियों के लिए अगर कुछ भी कर सकते हैं तो तेरी भी यही कोशिश होनी चाहिए कि तू भी उन्हें कभी निराश न करे और हर क़दम पर उनका साथ दे।"

"हम्म्म्म।" रागिनी ने कहा____"सोचा तो यही है बाकी देखती हूं क्या होता है?"

"अच्छा ये बता कि तू अपनी होने वाली सौतन के बारे में क्या सोचती है?" शालिनी ने जैसे उत्सुकता से पूछा____"तेरे मुख से ही सुना था कि वो वैभव जी को बहुत प्रेम करती है और जिस समय वैभव जी अनुराधा नाम की लड़की की वजह से सदमे में चले गए थे तो उसने ही उन्हें उस हाल से बाहर निकाला था।"

"मैं उससे मिल चुकी हूं।" रागिनी ने अधीरता से कहा_____"उसके बारे में उन्होंने सब कुछ बताया था मुझे। सच में वो बहुत अच्छी लड़की है। उसका हृदय बहुत विशाल है। उसके जैसी अद्भुत लड़की शायद ही इस दुनिया में कहीं होगी। जब उसे अनुराधा के बारे में पता चला था तो उसने उसको भी अपना बना लिया था। अनुराधा की मौत के बाद उसने उन्हें तो सम्हाला ही लेकिन उनके साथ साथ अनुराधा की मां और उसके भाई को भी सम्हाला। बेटी बन कर अनुराधा की कमी दूर की उसने। उसके बाद जब उनके साथ मेरा विवाह होने की बात चली तो उसने मुझे भी अनुराधा की तरह अपना मान लिया। उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं हुई कि एक बार फिर से उसे समझौता करना पड़ेगा और अपने प्रेमी को मुझसे साझा करना पड़ेगा। उस पगली ने तो यहां तक कह दिया कि वो मुझे अपनी बड़ी दीदी मान कर मुझसे वैसा ही प्यार करेगी जैसा वो उनसे करती है। अब तुम ही बताओ शालिनी ऐसी नेकदिल लड़की के बारे में मैं कुछ उल्टा सीधा कैसे सोच सकती हूं? पहले भी कभी नहीं सोचा तो अब सोचने का सवाल ही नहीं है। ये तो नियति ने इस तरह का खेल रचा वरना सच कहती हूं उनके जीवन में सिर्फ और सिर्फ उस अद्भुत लड़की रूपा का ही हक़ है। ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि मेरे हिस्से का प्यार भी उसे मिले। उसने बहुत कुछ सहा है इस लिए मैं चाहती हूं कि अब उसे कुछ भी न सहना पड़े बल्कि उसकी ज़िंदगी का हर पल खुशियों से ही भरा रहे।"

"ज़रूर ऐसा ही होगा रागिनी।" शालिनी ने रागिनी के दोनों कन्धों को पकड़ कर कहा____"तेरी बातें सुन कर मुझे यकीन हो गया है कि उस नेकदिल लड़की के जीवन में ऐसा ही होगा। तू भी उसको कभी सौतन मत समझना, बल्कि अपनी छोटी बहन समझना और उसका हमेशा ख़याल रखना।"

"वो तो मैं रखूंगी ही।" रागिनी ने कहा____"पहले भी यही सोचा था मैंने और अब भी यही सोचती हूं।"

"अच्छी बात है।" शालिनी ने कहा____"मुझे तो अब ये सब सोच कर एक अलग ही तरह की अनुभूति होती है यार। वैसे कमाल की बात है ना कि जीजा जी की किस्मत कितनी अच्छी है। मेरा मतलब है कि विवाह के बाद दो दो बीवियां उनके कमरे में पलंग पर उनके दोनों तरफ होंगी और वो दोनों को एक साथ प्यार करेंगे। हाय! कितना मज़ेदार होगा ना वो मंज़र?"

"ज़्यादा बकवास की तो गला दबा दूंगी तेरा।" रागिनी उसकी बात सुन कर फिर से शर्मा गई बोली____"जब देखो ऐसी ही बातें सोचती रहती है। चल अब जा यहां से, मुझे तुझसे अब कोई बात नहीं करना।"

"अरे! गुस्सा क्यों करती है मेरी लाडो?" शालिनी ने हल्के से हंसते हुए कहा____"मैं तो वही कह रही हूं जो भविष्य में होने वाला है।"

"तुझे बड़ा पता है भविष्य के बारे में।" रागिनी ने उसे घूर कर देखा____"तेरी जानकारी के लिए बता दूं कि ऐसा कुछ नहीं होगा। अब चुपचाप यहां से जा। मुझे भाभी के साथ काम करना है, तेरी तरह फ़ालतू की बातें करने का समय नहीं है मेरे पास।"

"आय हाय! समय नहीं है तेरे पास।" शालिनी ने आंखें फैलाई____"ज़्यादा बातें न कर मेरे सामने। मुझे पता है कि आज कल तू खाली बैठी जीजा जी के हसीन ख़यालों में ही खोई रहती है, बात करती है।"

उसकी बात सुन कर रागिनी झूठा गुस्सा दिखाते हुए उसे मारने के लिए दौड़ी तो शालिनी हंसते हुए भाग ली। उसके जाने के बाद रागिनी भी मंद मंद मुस्कुराते हुए घर के अंदर चली गई।




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Bahut hi sandar apdet Bhai
 
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