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Incest रिश्तों का कामुक संगम

vyabhichari

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दूध- मलाई

सुबह हो चुकी थी और आंगन में धूप खिल रही थी। घर के आंगन से ठंडी बयार बह रही थी। चिड़ियों की चहचहाहट और पेड़ों के पत्तों की सरसराहट एक अलग ही ताजगी का एहसास करा रही थी। गांव का शुद्ध पर्यावरण, अपने संग एक अलग ही उत्साह लेकर आता है। सच गांव की सुबह बहुत प्यारी लग रही थी। लेकिन राजू को असल ताजगी और उत्साह तभी मिलती थी जब गुड्डी का खूबसूरत चेहरा वो देखता था। राजू अपनी बड़ी बहन का दीवाना बन चुका था। जबसे उन दोनों ने रात मड़ई में मस्ती की थी राजू गुड्डी को मौका मिलते ही ताड़ता और छेड़ने लगता। गुड्डी उसे डराती की कोई देख लेगा, पर उसे भी ये छेड़छाड़ पसंद थी। वो खुद जानबूझकर उसके सामने गाँड़ मटकाते हुए चलती और चूचियाँ भी हिलाती थी। राजू उसकी जवानी के उभार देख लण्ड मसलके रह जाता था। राजू ने उसे कई बार घर के कोने में दबोचा था, पर गुड्डी उसे हर बार कहती," भाई, हम खुद तहरा साथे चुदाबे चाहेनि, तहके ही हम जोवन के खजाना देब, तू हमके जहां ले चलबू हम जाइब, बस हमार एक इच्छा बा कि जब तू हमके चोदे त केहू रोके टोके ना, केहू के डर ना रही।"
राजू उसके बूर, चुच्ची और गाँड़ को पूरा सहलाता था, गुड्डी उसके लिए मना नहीं करती थी।
गुड्डी ने अपनी सहेली बिजुरी को राजू और उसके बीच हुए प्रसंग की जानकारी दे दी थी। बिजुरी को ये सुनके बड़ा अच्छा लगा कि आखिर गुड्डी और राजू के बीच संबंध स्थापित हो रहे हैं। बिजुरी ने उससे कहा भी कि जब वो इतना आगे बढ़ चुके हैं तो मौका पाकर वो राजू से चुदवा क्यों नहीं लेती। गुड्डी ने फिर कहा कि वो राजू के साथ बेझिझक और बेरोकटोक चुदाई का भरपूर आनंद लेना चाहती है घर में हमेशा किसी ना किसीके आने का डर बना रहता है और वो राजू के साथ हसीन पलों को डर में गंवाना नहीं चाहती। उसने बिजुरी से कुछ जुगाड़ लगाने को कहा, तो बिजुरी ने उससे वादा किया कि वो उन दोनों के मिलन के लिए कोई ना कोई युक्ति जरूर निकाल लेगी। साथ ही उसने गुड्डी को उसकी सोच के लिए तारीफ भी की। दोनों काफी दिन तक विचार करते रहे पर कोई उपाय नहीं निकल रहा था। लेकिन दोनों ने इस पर काम करना बंद नहीं किया। बिजुरी निरंतर उनदोनों के लिए सोच रही थी।
एक दिन जब दोनों बैठे पढ़ाई कर रहे थे तो राजू गुड्डी को छेड़ रहा था। वो गुड्डी के गदराए बदन पर हाथ फेर रहा था। गुड्डी भी उसके छुवन का आनंद ले रही थी। गुड्डी की जांघों को सहला रहा था। गुड्डी बार बार उसे समझा रही थी, की कोई देख लेगा। राजू गुड्डी को अपने करीब खींच लिया और उसके होंठों पर चुम्बन धर दिया। उसका बस चलता तो वहीं गुड्डी को नंगी कर पेलने लगता। गुड्डी उसकी बांहों में कसमसा रही थी। तभी गुड्डी की माँ की आवाज़ गूंजी," गुड्डी, बाबूजी के खाना निकाल दे।" गुड्डी राजू से अलग होने की कोशिश करने लगी और बोली," राजू जाय दे, माई बोलात बिया, बाबूजी के खाना देबे के बा।"
राजू," दीदी, तहके छोड़े के मन ना करेला, जी चाहे ला तहके सारा रात असही बांहिया में कसके धइले रही। जइसे चंदन के पेड़ से सांप लिपटल रहेला।"
गुड्डी," राजू बात बूझ, बाबूजी घर आ गईल बारे, कभू केहू इधर आ जाई, कोई देख ली त जवाब देत ना बनि।"
राजू," ठीक बा जाय के टैक्स देबे के पड़ि।"
गुड्डी," का बोलअ ?
राजू," तू तनि आपन बूर देखा दअ, रानी।"
गुड्डी," ना, ई कइसे करि, तू जानत बारे ना बाबूजी अउर माँ कभू कोई आ सकेला, देखि त का सोचिहे।"
राजू," अरे, कोई ना आई जल्दी से गुलाबी बूर देखा दअ।"
तभी बीना की आवाज़ फिर से गूंजी," अरे, गुड्डी तहरा सुनाई नइखे देत का बहरी कहीं के। जल्दी इँहा आ ना।"
गुड्डी," राजू प्लीज जाय दे ना, माई खिसयात बारि।
राजू गुड्डी को बांहों में भरे बोला," जाय त तभिये देब गुड्डी दीदी जब तू हमके बूर देखाबे।"
गुड्डी," ठीक बा, लेकिन एक बेर।"
राजू," मंजूर बा, लेकिन पहिले देखाअ दे।"
गुड्डी बोली," पहिले तू हमके छोड़बु तब ना देखाएब। राजू ने उसे बांहों से आज़ाद किया, गुड्डी उसकी बांहों से अलग हुई और खड़ी होकर अपनी सलवार के नाड़े को खोलने लगी। सलवार की डोरी तुरंत ही अलग हो गयी। गुड्डी ने अपनी कुर्ती उठा ली और सलवार को पैंटी सहित नीचे उतार दिया। उसकी झांटदार बूर बल्ब की रोशनी में चमक उठी। राजू अपनी बहन की रेशमी झांटों से भरी बूर को निहारने लगा। गुड्डी उसे देख शर्मा गयी। ऐसा तो नहीं था कि राजू अपनी बड़ी बहन की नंगी बूर को पहली बार देख रहा था, पर शायद उसकी बहन की बूर की लालसा और चाह उसे उसकी तरफ खींच रही थी। गुड्डी को अपने भाई की आंखों में, हवस और वासना देख एक पल के लिए डर लगा पर, अगले ही पल उसे एहसास हुआ कि वो स्वयं भी तो यही चाहती है। यौवन एक ऐसा अनोखा अनुभव है, जिसमें ना रिश्तों की सीमा तय होती है, ना ही उम्र की। बस एक दूसरे को पाने की चाह और लालसा और इस सत्य को कोई ठुकरा नहीं सकता। वन में जब पौधों पर नई कलियाँ खिलती हैं, तो उनका स्वागत भँवरे ही करते हैं। कलियों का काम है, खिलना और भँवरों का काम है उनका रस चूस के उन्हें खिलाना। दोनों एक दूसरे के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितना जीवन के लिए पानी। गुड्डी वो कली थी जिसे खिलना था और राजू वो भंवरा जिसपर जिम्मेदारी थी, उसे खिलाने की। राजू अपने सामने फैले नजारे को देख मस्ती में आगे बढ़ा और गुड्डी की बूर को फैला दिया। गुड्डी की बूर फैली थी, तो अंदर का गुलाबी छेद उभर आया। राजू ने उसे चूम लिया। गुड्डी सिसक उठी। तभी उसकी माँ की आवाज़ फिर गूंजी, गुड्डी ने राजू से कहा," जाय दे राजू फेर देख लिहअ।" ऐसा बोल उसने राजू को धक्का दिया और फिर सलवार ऊपर कर नाड़ा बांध तेज़ी से आंगन की ओर चल दी। राजू अपनी जुबान पर उसके बूर के स्वाद को महसूस कर रहा था। वो मुस्कुरा रहा था।
इस तरह उन दोनों के बीच छेड़छाड़ चलती रही।

एक दिन राजु सुबह सुबह उठकर रोज की तरह गाय का दूध निकालने के लिए खटाल ( गाय बांधने का स्थान) की ओर जा रहा था। गुड्डी उसे देख बोली," राजू आज हमके भी गाय के दूध कइसे दूहल जाला सिखा दे ना।" राजू उसकी ओर देख मुस्कुरा के बोला," ई लइकियन के बस के बात नइखे, आ तहरा सिखाबे के टाइम भी नइखे। हमरा ट्यूशन भी जायके बा।"
गुड्डी मुंह बना बैठी। तभी उसके पिताजी वहां आये, तो गुड्डी ने उनसे कहा," बाबूजी, देखी ना राजू हमके गाय कइसे दुहात बिया, नइखे सिखावत। एकरा से कही ना कि हमके सिखा दी। हमरा सिखे के बा बाबूजी।"
धरमदेव मुस्कुराते हुए बोला," तू सीख के का करबा बेटी। ई काम त मरद करेला।"
गुड्डी," बाबूजी हमके भी सीखेके बा। सीखे में बुराई त नइखे, का जाने कब काम आ जाई।"
धरमदेव को गुड्डी की बात जंच गयी। वो राजू की ओर देख बोले," गुड्डी के भी खटाल ले जो अउर सिखा दे।"
राजू की अब मजबूरी थी, कि वो गुड्डी को ले जाकर सिखाये। वैसे भी आज स्कूल में छुट्टी थी, तो गुड्डी को स्कूल नहीं जाना था। वो राजू के पीछे पीछे चल दी। धरमदेव खेतों की ओर निकल गए। गुड्डी की माँ घर में दैनिक कार्य में व्यस्त थी। राजू और गुड्डी खटाल में पहुंच गए। राजू ने गुड्डी के सामने बाल्टी रखी और जाकर पहले बछड़े को खोल दिया। बछड़ा लपकके गाय के थन पर टूट पड़ा। गाय अपने बछड़े को चाटके लाड़ प्यार कर रही थी। गुड्डी का हृदय ये देख ममता से भर उठा। उसके अंदर भविष्य का दृश्य जैसे उखड़ आया जिसमे वो अपने बच्चे को लाड़ प्यार करते हुए दूध पिलाएगी। राजू उधर गाय के नाद ( जिसमें जानवरों को चारा खिलाया जाता है) में चारा भर भरके डाल रहा था। गाय धीरे धीरे चारा खाने लगी। उधर उसका बछड़ा दूध पीने लगा। कुछ देर बाद राजू ने, बछड़े को अलग कर दिया। फिर बाल्टी लेकर गाय के थनों के नीचे बैठ गया। उसने लोटे से पानी निकाल थनों पर पानी के छींटे मारे। गुड्डी उसके पास आके सबकुछ देखने लगी। राजू ने फिर थनों को पकड़ दूध दुहना शुरू किया। थनों को राजू अपनी उंगलियों में थामे बार बार मीजके दूध निकाल रहा था। दूध की मोटी सफेद धार, सीधे बाल्टी में जमा होने लगी। राजू दूध लगातार दुह रहा था। गुड्डी उसके तेजी से चलते हाथों को देख रही थी। गुड्डी काफी देर तक ये देखते रही। राजू ने तभी गुड्डी को देख कहा," दीदी तहराके गाय के दुहे के सीखे के बा त देख के ना, बल्कि कइके सीखे के पड़ी। चल इँहा बइठ जो, अउर गाय के थन के मीज मीजके दूध निकाल।" गुड्डी का हाथ पकड़ राजू ने उसे अपने पास बिठा दिया अउर थन पकड़ा दिया। राजू ने फिर उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर उसे दूहने को कहने लगा। गुड्डी भी उसके साथ दूहने लगी। राजू इसी बहाने गुड्डी के पीछे आकर उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया। गुड्डी पहली बार गाय का दूध निकाल रही थी, वो बहुत उत्साहित थी। राजू उसे देख और उत्साहित था। राजू ने उसी समय गुड्डी के गर्दन और कान पर चुम्मा ले लिया। गुड्डी के दिल में हलचल मच रही थी। वो खुद भी बहकने लगी। इस एहसास के साथ गुड्डी ने अचानक गाय के थन को काफी जोर से खींच दिया और गाय दर्द से बिदक गयी। गाय के हड़बड़ाने से गुड्डी राजू की ओर तेजी से मुड़ी और राजू उसे बांहों में भर संतुलन खोकर गिर पड़ा। गुड्डी की चूचियाँ राजू के सीने में धंस गयी। राजू और गुड्डी वहीं पुआल पर लेटे हुए थे। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। तभी राजू ने गुड्डी की लटों को उंगली से समेट उसके कान के पीछे रख दिया। गुड्डी राजू के सीने से चिपकी हुई थी। गुड्डी बोली," लागत बा, हम ना सीख पाइब, गाय के दूध कइसे निकालल जाता।"
राजू," काहे ना सिखबू, हम सिखाईब तहराके गुड्डी दीदी।" ऐसा बोलके उसने गुड्डी के होठ को अपने होठ से छू लिया। गुड्डी राजू के होंठ का स्पर्श पाकर सिहर सी गयी। राजू के इस छुअन से, गुड्डी के अंग अंग में बिजली दौड़ने लगी। उसने राजू के होंठ पर होठ रख पुनः चुम्बन आरम्भ कर दिया। दोनों एक दूसरे को चूम रहे थे। गुड्डी राजू की मजबूत बांहों में लिपटके बेचैन हो उठी थी। दोनों कुछ देर तक ऐसे ही प्रगाढ़ और गहरे चुम्मे में खोए रहे। कभी वो उसके निचले होठ को चूसती तो कभी ऊपर के होठ को। कभी राजू की जीभ उसकी जीभ से टकराती और सांपो की तरह एक दूसरे से लिपट जाती। दोनों के मुंह के थूक एक दूसरे से मिल एक अलग ही स्वाद को जन्म दे रहे थे। दोनों थोड़ी देर के लिए भूल चुके थे कि वो घर में हैं। जिस्म की भूख की जो ज्वाला दोनों के भीतर जल रही थी, उसे सिर्फ उनका समागम ही बुझा सकता था। दोनों भूल गए थे, कि दोनों ने क्या निर्णय ले रखा है। तभी उन्हें महसूस हुआ कि, कोई उस तरफ ही आ रहा है। गुड्डी फौरन सचेत हो उठी। और हट कर अलग खड़ी हो गयी। राजू ने खुद को संभाला। धरमदेव खेती का कोई सामान भूल गए थे, तो वो लेने वो वापस आये थे। धरमदेव ने समान उठाया और पूछा," का बेटी राजू तहराके ठीक से सिखाता की ना?"
गुड्डी झेंपते हुए बोली," जी बाबूजी, सिखात बा बढ़िया से।"
धरमदेव," ठीक बा सीख लअ। राजू दीदी के बढ़िया से सिखा दे। हम जात हईं।" और वो निकल गए। गुड्डी भी वहां से निकलने लगी। राजू ने उसका हाथ पकड़ लिया। गुड्डी का दिल थम सा गया। वो पीछे मुड़के बोली," राजू जाय दे, देखला बाबूजी आ गईल रहनि ना। हम सांझ में फेर आईब तब सिखब।" राजू ने उसे जाने दिया और वो वापिस काम पर लग गया। गुड्डी ये समझ रही थी कि उन दोनों के लिए खुद को ज्यादे दिन रोकना मुश्किल होगा। वो डरी भी हुई थी और उत्साहित भी। राजू और गुड्डी दिनभर अपने काम में व्यस्त रहे। शाम को राजू फिर दूध निकालने के लिए खटाल की ओर चल पड़ा। पर गुड्डी उसे कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। राजू ने उसे बहुत तलाशा, पर जब वो नहीं मिली तो उसने माँ से पूछा," माई, गुड्डी दीदी कहां गईल ह?
बीना," अरे उ त कहत रहनि की उ बिजुरी के इँहा जात बिया। ओकरा कउनु काम रहे, अभी दस मिनट पहिले गईल बिया।"
राजू का ये सुनके मुंह लटक गया। वो बेमन से खटाल के अंदर गया और गाय को दूहने का इंतज़ाम करने लगा। राजू गाय का दूध निकालने लगा।

दूसरी ओर
गुड्डी और बिजुरी आपस में बात कर रही थी। बिजुरी गुड्डी से चहकते हुए बोली," तहरा खातिर एगो बढ़िया इंतज़ाम हो गइल बा गुड्डी।"
गुड्डी," का बोल ना जल्दी से"।
बिजुरी," सुन, काल रजनी के बियाह बा। हम तहार घर आके तहार माई से कहब कि दुनु बियाह में जाइब अउर भोरे आईब। तू राजू के कहके ऊंहा रात में बुला ले नौ या दस बजे। राजू से कह कोई जगह देख ली। ऊंहा उ तहरा ले जाई। फेर तू दुनु पूरा रतिया मज़ा करिहा। कोई देख भी ली राजू के साथ त शक ना करि, काहे की उ तहार भाई बा। का का बोलत हउ, गुड्डी रानी।"
गुड्डी आश्चर्यचकित हो बोली," ई त बहुत बढ़िया आइडिया बा बिजुरी, तहार दिमाग बड़ा चलेला।"
बिजुरी हंसते हुए," अरे ई सब तहरा खातिर गुड्डी। आखिर सहेली ही सहेली के काम आवेला। तू जाके राजू जीजा के बताई दिहा।" बिजुरी मजाक करते हुए बोली।"

राजू ने एक बाल्टी दूध निकाला और उसे रखने के लिए मुड़ा। तभी उसे लगा कि कोई उसके पीछे खड़ा है। उसने पलट के देखा, तो वहां कोई नहीं था। वो फिर काम करने लगा। तभी पीछे फिर दरवाज़े के अंधेरे से उसे पायल की छनछनाहट सुनाई दी। उसने मुड़के देखा तो, उसे एहसास हुआ कि कोई दरवाज़े के पीछे खड़ा है। वो धीरे कदमों से वहां पहुंचा। उसकी नज़र वहां अंधेरे में चमकते खूबसूरत नयनों से टकराई। वो उन आंखों को बहुत अच्छे से जानता था। बाहर अंधेरा होने लगा था, राजू ने लालटेन को उठा के देखा तो वो गुड्डी ही थी। गुड्डी ने होठों पर उंगली रख राजू को चुपने का इशारा किया। राजू ने लालटेन रख दिया और गुड्डी को खुद से चिपका लिया। गुड्डी खुद भी उसकी बांहों में सिमट उससे आत्मसात हो रही थी।
गुड्डी फिर धीरे से बोली," राजू आज दिन में त ना सिखनि, पर अभी दूध निकाले सिखा दे।"
राजू बोला," सिखा देब, पर अपना तरीका से।"
गुड्डी," का मतबल??
राजू," गाय के थन के केतना खींचेला अउर कइसे खींचेला उ कुल बताईब, पर.....
गुड्डी," का पर... बता दे।"
राजू," गुड्डी दीदी जब तलक तहरा महसूस ना होई, तब तक तहरा बुझाई ना कि केतना कसके खींचे पड़ेला। एहीसे तहके खुद गाय बनके, महसूस करेके पड़ी कि गाय कइसे महसूस करेला।"
गुड्डी जानती थी कि राजू बस मज़े लेना चाहता है, वो भी ये खेल में शामिल होते हुए बोली," ठीक कहेला तू राजू, पर हम गाय कइसे बनि। अउर तू का कहे चाहे तारअ?
राजू," दीदी तू पूरा नंगे हो जो, अउर हम तहार चुचिया के दुह के बताईब। तभी तू महसूस करबू, कि कइसे गैय्या दूहल जाला।"
गुड्डी," ओह्ह, राजू ई सच में करे के पड़ी का ?
राजू," दीदी, ई त करिके पड़ी। ना त ना सीख पैबु।"
गुड्डी," ठीक बा, हम उतार देत बानि, पर तु हमके अच्छा से सिखाइह।"
गुड्डी ने राजू को पीछे मुड़ने को बोला और अपने सारे कपड़े उतार के नंगी हो गयी। गुड्डी पूर्ण निर्वस्त्र हो राजू के पीछे खड़ी थी। गुड्डी ने राजू के कंधे पर हाथ रखा, तो राजू मुड़ गया।

राजू गुड्डी को इस तरह निर्वस्त्र देख बेचैन हो उठा। गुड्डी बिल्कुल नंगी खड़ी थी, अपने भाई के सामने। उसने अपना सर झुका रखा था, और वो नीचे देख रही थी, इस बात की उम्मीद में कि राजू उसकी ओर आगे बढ़ेगा। राजू गुड्डी की ओर आगे बढ़ने लगा तो गुड्डी उसकी आहट महसूस कर बेसब्र हो उठी। गुड्डी के एकदम पास आकर राजू रुक गया। उसने गुड्डी के हाथ जो उसके स्तनों/चूचियों को ढके हुए थे उसे कलाई से पकड़कर हटा दिया। गुड्डी ने जो प्रतिरोध दिखाया उसमें विरोध कम और सहमति ज्यादा थी।
गुड्डी ने दूसरे हाथ से अपनी बूर को ढक रखा था। राजू ने अपनी दीदी के उस सुंदर खजाने से भी हथेली का पहरा हटा दिया। इस तरह गुड्डी का खिला यौवन अपने छोटे भाई के सामने पूरी तरह खिल उठा। राजू ने गुड्डी के उन्नत चूचियों के ऊपर कड़े चूचकों को गौर से निहारा। उसने गुड्डी के मटर के दाने जैसे चूचकों को अपनी उंगलियों से छेड़ा, तो गुड्डी सिहर उठी और उसके मुंह से सिसकारी छूट गयी। गुड्डी को राजू की छेड़छाड़ से मज़ा और मस्ती दोनों चढ़ रही थी।
तभी राजू बोला," दीदी अब तू गाय जइसन दुनु हाथ दुनु ठेहुना पर चौपाया बन जो। तब तोरा बताईब की गाय के चुच्ची के केतना जोर से दबावे के बा अउर केतना खींचे के बा। तहके पूरा जानकारी तभी मिली।"
गुड्डी भी अनजान बनते हुए बोली," सही कहला तू राजू, जइसे तू कहलु हम कुल कपड़ा उतारके पूरा लँगटे हो गइल बानि। जइसे गाय जानवर ह, अउर ओकरा के देहिया पर कपड़ा ना होखेला, वइसे ही हम भी बिना कपड़ा के लँगटे रहब। हम बिल्कुल अपना के गाय जइसन बूझके चौपाया हो जात हईं।"
ये बोलके गुड्डी पुआल के ढ़ेर पर अपने घुटनों और हथेली जमीन पर टिका के चौपाया बन गई। गुड्डी फिर राजू की ओर देख बोली," देखअ, राजू हम ठीक से चौपाया बन गईल बानि ना, जइसे की आपन गाय बारि।" राजू अपनी दीदी के करीब उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोला," हॉं, दीदी अब तू हमार गुड्डी दीदी ना बल्कि गाय बुझातिया। गाय बेचारी असही लंगटे रहेलि अउर सब ओकरा देखत हई। अब तू एगो गाय बिया, जेकर दूध हम निकालब अउर तू महसूस करिहा कि गाय के लोग जब दुहेला त ओकरा कइसन बुझावेला। ऐसे तहरा इहो पता चल जाई, कि गाय के थन के केतना जोर से अउर कइसे मीज के दूध निकाले के बा।"
ऐसा बोलके राजू ने गुड्डी के लटकते चूचियों को अपने हाथों से सहलाया और उन्हें अपने पंजों में रख गुड्डी रूपी गाय के थनों/चूचियों के भारीपन का अनुमान लगाया। गुड्डी अपने स्तनों के पकड़े जाने से अच्छा महसूस कर रही थी। राजू उसके पास बाल्टी से पानी अपने हथेलियों में भरके उसके लटकते तने भूरे मोटे चूचकों पर पानी मारा। गुड्डी पे पानी का हर छींटा आग के ऊपर पानी की फव्वारे की तरह गिर रहा था। आग पर पानी गिरने से छन की आवाज़ आती है और यहां गुड्डी की तेज सिसकारियों ने उसकी जगह ले ली थी। गुड्डी सिसकारी भरते हुए," राजू ई पानी तू काहे मारलस, हमार थन पर??
राजू," दीदी पानी मारला से चूचक बढ़िया से पकड़ाई अउर बढ़िया से चुच्ची से दूध दुहाई। ई बहुत जरूरी बा, ना त गाय कभू बिदक जायी।"
गुड्डी," ठीक बा, हमार चुच्ची के घुंडी कड़ा हो रहल बा। तू बड़ा बढ़िया से पानी से भिजइले बा।"
राजू अब अपनी बड़ी बहन को चौपाया बनाके, उसकी चूचियाँ उंगलियों में थामे, दुहने के बहाने उसे मज़े से मीज रहा था। गुड्डी की चूचियाँ और चूचक दोनों कड़े हो चुके थे, राजू के स्पर्श से। उसके स्तन सामान्य से बड़े लग रहे थे। राजू गुड्डी के भोलेपन का पूरा फायदा उठा रहा था। उसे लग रहा था कि गुड्डी को इस बात का पता नहीं है कि वो दूध दूहने के बहाने उसकी चूचियों के मज़े ले रहा था। सच तो ये था कि गुड्डी को राजू से ज़्यादा मज़ा आ रहा था। उसके मुंह से निकलती आँहें इस बात का प्रमाण थी। राजू उसकी आहों से काफी उत्तेजित हो रहा था। राजू चूचियाँ मीजते हुए पूछा," दीदी, देखत बारू, महसूस करत बारू, कइसे गैय्या के दुहे के??
गुड्डी," आह.... ओह्ह..हाँ राजू, बड़ा ही टेढ़ काम बा। तू केतना सफाई और बढ़िया से कर रहल बारू। लेकिन अभी अउर बढ़िया से दुह ले आपन बहिन के, बता दे गाय के कइसे दूहल जाता।"
राजू," गुड्डी दीदी, तू जब तक ना कहबू, तब तक हम तहके चुच्ची दुहत रहब। तहार दुनु चुच्ची मस्त बा। जब तू माँ बनबु, त खूब दूध होई।"
गुड्डी," राजू बछड़ा गाय के कुल दूध ना पी पावेला, हमनी के पियल जात बानि। अगर हमरा भी गाय जइसन दूध होई, त के उ दूध पीई।"
राजू ने जब उसके लंपट सवाल को सुना तो उसने, गुड्डी की चुच्ची में मुंह लगा दिया और चूचक को चूसने लगा। गुड्डी की आँहें और सिसकारियां राजू के कान में मिश्री की तरह घुल रही थी। गुड्डी बिल्कुल नंगी, अपने भाई को चौपाया हो, अपना दूध पिला रही थी या यूं कहें कि चुच्ची से दूध पिलाने के बहाने काम रस का लाभ उठा रही थी। गुड्डी," आह... राजू पी लअ हमार चुचिया के दूध। देख तू हमार बछड़ा बा अउर हम तहार गाय माँ। ले थाम के पिलअ आह.... गाय के केतना मज़ा आत होई, जब बछड़ा दूध पियत होही। हमहुँ हमार बच्चा के असही दूध पियाईब।" राजू उसे कहां छोड़ने वाला था। उसे तो बहुत अधिक उत्तेजना हो रही थी। उसने मन में सोचा कि एक दिन तू इसी घर में मेरे ही बच्चे की मां बनेगी और उसे और मुझे अपना दूध पिलाएगी। राजू उसके नीचे लेटा हुया था, और गुड्डी वैसे ही चौपाया बनी हुई थी। वो अपने चूचियाँ झूला झूला के उसे दूध पिला रही थी। काफी देर से नंगी होने की वजह से गुड्डी को पेशाब लग गयी। गुड्डी सिसयायते हुए राजू से बोली," राजू हमके मूते के बा, बड़ी जोर से पेशाब लाग गईल बा।"
राजू उसकी चुच्ची छोड़ते हुए बोला," गुड्डी दीदी, तू गाय बारू अउर गाय जहां रहेला जइसन रहेला उंहे मूतेली। तू भी मूत ना रानी।"
गुड्डी," उ त ठीक बा, पर अईसे नीक ना लागी। तहार देहिया भीज जायी।"
राजू," तू ओकर चिंता मत कर। हमार खातिर उ अमृत बा। जइसे गौ मूत्र पवित्र होखेला, वइसे ही तहार मूत्र भी पवित्र अउर अमूल्य बा।"
गुड्डी," केतना प्यार करेलु तू हमरा से राजू। ले अब हम मूतत बानि। तहार हिस्सा के पवित्र और अमूल्य गुड्डी मूत्र।" और जोर से हंसने लगी। उसकी बूर की फांके पहले तो हल्की फरकी, फिर उसकी कमर मूत निकालने के लिए थोड़ी प्रेशर के लिए झुकी। फिर बूर से बुलबुला के मूत की धार ऐसे बही, जैसे चट्टानों के बीच से अविरल धारा। गुड्डी का पेशाब अब छर छर कर नीचे राजू के लण्ड पर चू रहा था। राजू गुड्डी की गर्म मूत अपने पैंट के ऊपर से महसूस कर रहा था जो पूरी तरह गीली हो चुकी थी। राजू ने फिर गुड्डी को अपनी बांहों में भर लिया, गुड्डी की मूत बंद हो चुकी थी। वो राजू के गोद में बैठी थी। राजू ने दूध से भरे बाल्टी में लोटा से एक लोटा दूध निकाला और गुड्डी के माथे पर दूध का लोटा धीरे धीरे खाली करने लगा। गुड्डी राजू के कंधे थामे हुई थी, राजू उसे सर से दूध से नहलाने लगा। गुड्डी के बदन से फिसलता दूध उसके गोरे रंग में चार चांद लगा रहा था। गुड्डी की आंखे बंद थी, उसका नंगा बदन दूध की क्षणिक चादर ओढ़ फिर नंगा हो जाता। राजू ने उसके ऊपर एक के बाद एक तीन चार लोटा दूध डाल दिया। गुड्डी किसी राजकुमारी की तरह दूध से स्नान कर रही थी। उसका पूरा बदन दूध से गीला हो चुका था। राजू उसके गाल और होठों पर जीभ फेरते हुए दूध चाटने लगा। गुड्डी को उसके चाटने से गुदगुदी हो रही थी, वो हल्के हल्के मुस्कुरा रही थी। वैसे तो गुड्डी खुद ही बहुत मलाईदार थी, पर दूध ने उसे गीला कर और भी मलाईदार बना दिया था। राजू अब अपनी बहन को चूम रहा था। होठ भी दूध के स्पर्श से अधूरे नहीं थे। गुड्डी के होठ राजू के प्यास को बुझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। गुड्डी अपने भाई के बांहों में सिमट सी गयी थी। उसके चेहरे पर काम वासना साफ झलक रही थी। दोनों काफी देर तक चुम्बन में लीन थे। राजू फिर उसकी गर्दन को चाटने लगा। गुड्डी वासनामयी हो अपने सर को दांये बांये कर रही थी। उसके चूचकों से दूध की बूंदे मोतियों की तरह चमक और टपक रही थी। राजू उसके चूचियों को फिर से मुंह में समाए चूसने लगा। दोनों भाई बहन एक दूजे में खो चुके थे।
राजू ने फिर बेझिजक गुड्डी को वापस गाय बना दिया और उसके शानदार बूर को पीछे से आके चूमने लगा। गुड्डी उसकी बूर को चूमते राजू की शक्ल भले ही ना देख पा रही थी, पर उसके जीभ और होठ बूर पर अपनी छाप जरूर छोड़ रहे थे। गुड्डी की बूर अत्यधिक गीली और लसलसी हो रही थी। ऐसी चिपचिपी बूर उसी स्त्री की हो सकती है, जो खुद चुदवाने के लिए बेक़रार और बेताब हो। गुड्डी की बूर की दोनों फांके ग्रीज़नुमा चिपचिपा बूर के पानी से तर थी। उसके बूर से उठती, रहस्मयी खुशबू राजू के नाक को उसे सूंघने का आमंत्रण दे रही थी। बूर शायद स्त्री का वो अभिन्न हिस्सा है, जो पुरुष के लिंग के लिए ही नहीं बल्कि उसकी जीभ के लिए भी बना है। राजू की लपलपाती जीभ देख कोई भी यही कहता, कि बूर पानी लण्ड के लिए कम और चाटने के लिए ज्यादा छोड़ती है।
जैसे किसी कुत्ती के बूर को कुत्ते सूंघते और चाटते है, ठीक वैसे ही गुड्डी की कसमसाई बूर राजू के भूखे मुंह का चखना बनी हुई थी। बूर का पानी, निरंतर लण्ड के आगमन की प्रतीक्षा में बह रहा था, जिसे राजू हलक में उतार लें रहा था। वैसे तो बूर किसी की भी हो कुत्ते सूंघते और चाटते तो जरूर हैं, पर बूर के पानी का स्वाद उस वक़्त और आता गई जब वो बहन की हो। गुड्डी की आँहें और कामुक सिसकारी राजू के फेरती जीभ से खुलकर बाहर आ रही थी। उसके बूर की गुलाबी पत्तियां और फांकों को अलग कर जीभ को छेद में आगे पीछे कर रहा था। उसे पूरी तरह खोल ऊपर से लेकर नीचे तक चाट रहा था। ऐसे में कौनसी लडक़ी ज्यादा देर टिक पाती। अपने बूर की सीमाएं तोड़ गुड्डी की धार बह निकली। गुड्डी ने गहरी लंबी सांस ली और आह आह आह करते हुए झड़ गयी। गुड्डी अभी भी हांफ रही थी। उसकी थकान में भी मुस्कान साफ पता चल रही थी।
राजू ने गुड्डी को वहीं बिठा दिया और नंगा हो गया। राजू का शानदार कड़क लण्ड देख गुड्डी के मुंह से पानी टपकने लगा। उसके कुछ कहने से पहले ही गुड्डी उसका लण्ड थाम चुकी थी। राजू के तने हुए लण्ड को जीभ से चाटने लगी। राजू के मस्त लण्ड को देख गुड्डी ने सोचा क्यों ना आज चुद जाऊं, ये जवानी की तड़पती आग बर्दाश्त नहीं हो रही। घर में इतना मस्त लौड़ा मुझे चोदने को बेताब है, और मैं ही उस सुख से वंचित हूँ। गुड्डी पूरे मन से किसी लण्डखोर प्यासी रंडी सी भाई के लण्ड को चूस रही थी।
राजू उसके मुंह को बहुत देर तक चोदता रहा। थोड़ी देर में राजू के लण्ड की मलाई गुड्डी के मुंह मे गिर गयी।
राजू अपनी बहन की लगन देख उसे गोद में उठा लिया। गुड्डी ने अपने भाई की बांहों में खुद को सौंप दिया। राजू का तना हुआ लण्ड गुड्डी की बूर को छू रहा था। तभी गुड्डी ने राजू से कहा," राजू, उ दिन कब आयी जब हमार तहार मिलन होई। दुनु के किस्मत देख, एक ही माई के कोख से जन्म लेनी भाई बहिन कहात बानि, लेकिन भाई बहिन के रिश्ता त धूमिल हो गइल। हमके अपन रानी बना ले, अउर हमार राजा बन जो। जाने का किस्मत में लिखल बाटे मोर राजा।"
राजू," अरे मोर रानी, तहार हमार मिलन जरूर होई। तहरा के हम सबके सामने से ले जाइब अउर केकरो पता भी ना चली, कि तहरा संगे का सब करब। हमार तन मन सबमें तू बस गईलु गुड्डी रानी। अगर तू कहबू त आजे मिलन हो जाई, अभी, इँहा, एहि बेरा।"
गुड्डी," तहरा का लागेला राजा, अईसे नंगे तहार बांहिया में बानि, हमके चुदाबे के मन नइखे। राजा हमार प्यास तहरा से कम नइखे। पर तु ही सोचआ अईसे डर के माहौल में मज़ा ले पाईबु।"
राजू गुड्डी के चूतड़ों को सहलाते हुए बोला," गुड्डी दीदी, पर साला मौका नइखे मिलत, ना त अब तक तहके बीस बेर चोद देले रहति।"
गुड्डी मुस्कुरा उठी," सुन हम बिजुरी से मिलके आईल बानि। काल रात गांव में रजनी मोर सहेली के बियाह बा। बिजुरी माई से कहके हमरा ले जाई, रजनी के घर। ऊंहा तू आके हमरा ले चलहि। अब त बदन के गर्मी हमरा से भी बर्दाश्त नइखे होता। कउनो जगह देख ले।"
राजू की आंखों में चमक थी, उसने गुड्डी की ओर देखा और बोला," सुन, काल रात हम माँ बाबूजी के सुते के बाद, रजनी के घर से ले लेब। खेत में जउन अपन ट्यूबवेल वाला घर बा ऊंहा मस्त रही। राते कोई ना आई। ऊंहा.....
गुड्डी उसकी आँखों में देखते हुए बोली," राजू, ई ठीक रही। ऊंहा सारा रात........
इतने में बाहर से आवाज़ गूंजी तो गुड्डी और राजू निर्वस्त्र अवस्था में अलग हुए। गुड्डी भाग के अपने कपड़े उठायी और फौरन पहन ली। फिर राजू की ओर देखके बोली," हम कल रात रजनी के घर तहार इंतज़ार करब, मोर बलम भैया।"

राजू और गुड्डी के मिलन का शायद इंतज़ाम हो चुका था।
 

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दूध- मलाई

सुबह हो चुकी थी और आंगन में धूप खिल रही थी। घर के आंगन से ठंडी बयार बह रही थी। चिड़ियों की चहचहाहट और पेड़ों के पत्तों की सरसराहट एक अलग ही ताजगी का एहसास करा रही थी। गांव का शुद्ध पर्यावरण, अपने संग एक अलग ही उत्साह लेकर आता है। सच गांव की सुबह बहुत प्यारी लग रही थी। लेकिन राजू को असल ताजगी और उत्साह तभी मिलती थी जब गुड्डी का खूबसूरत चेहरा वो देखता था। राजू अपनी बड़ी बहन का दीवाना बन चुका था। जबसे उन दोनों ने रात मड़ई में मस्ती की थी राजू गुड्डी को मौका मिलते ही ताड़ता और छेड़ने लगता। गुड्डी उसे डराती की कोई देख लेगा, पर उसे भी ये छेड़छाड़ पसंद थी। वो खुद जानबूझकर उसके सामने गाँड़ मटकाते हुए चलती और चूचियाँ भी हिलाती थी। राजू उसकी जवानी के उभार देख लण्ड मसलके रह जाता था। राजू ने उसे कई बार घर के कोने में दबोचा था, पर गुड्डी उसे हर बार कहती," भाई, हम खुद तहरा साथे चुदाबे चाहेनि, तहके ही हम जोवन के खजाना देब, तू हमके जहां ले चलबू हम जाइब, बस हमार एक इच्छा बा कि जब तू हमके चोदे त केहू रोके टोके ना, केहू के डर ना रही।"
राजू उसके बूर, चुच्ची और गाँड़ को पूरा सहलाता था, गुड्डी उसके लिए मना नहीं करती थी।
गुड्डी ने अपनी सहेली बिजुरी को राजू और उसके बीच हुए प्रसंग की जानकारी दे दी थी। बिजुरी को ये सुनके बड़ा अच्छा लगा कि आखिर गुड्डी और राजू के बीच संबंध स्थापित हो रहे हैं। बिजुरी ने उससे कहा भी कि जब वो इतना आगे बढ़ चुके हैं तो मौका पाकर वो राजू से चुदवा क्यों नहीं लेती। गुड्डी ने फिर कहा कि वो राजू के साथ बेझिझक और बेरोकटोक चुदाई का भरपूर आनंद लेना चाहती है घर में हमेशा किसी ना किसीके आने का डर बना रहता है और वो राजू के साथ हसीन पलों को डर में गंवाना नहीं चाहती। उसने बिजुरी से कुछ जुगाड़ लगाने को कहा, तो बिजुरी ने उससे वादा किया कि वो उन दोनों के मिलन के लिए कोई ना कोई युक्ति जरूर निकाल लेगी। साथ ही उसने गुड्डी को उसकी सोच के लिए तारीफ भी की। दोनों काफी दिन तक विचार करते रहे पर कोई उपाय नहीं निकल रहा था। लेकिन दोनों ने इस पर काम करना बंद नहीं किया। बिजुरी निरंतर उनदोनों के लिए सोच रही थी।
एक दिन जब दोनों बैठे पढ़ाई कर रहे थे तो राजू गुड्डी को छेड़ रहा था। वो गुड्डी के गदराए बदन पर हाथ फेर रहा था। गुड्डी भी उसके छुवन का आनंद ले रही थी। गुड्डी की जांघों को सहला रहा था। गुड्डी बार बार उसे समझा रही थी, की कोई देख लेगा। राजू गुड्डी को अपने करीब खींच लिया और उसके होंठों पर चुम्बन धर दिया। उसका बस चलता तो वहीं गुड्डी को नंगी कर पेलने लगता। गुड्डी उसकी बांहों में कसमसा रही थी। तभी गुड्डी की माँ की आवाज़ गूंजी," गुड्डी, बाबूजी के खाना निकाल दे।" गुड्डी राजू से अलग होने की कोशिश करने लगी और बोली," राजू जाय दे, माई बोलात बिया, बाबूजी के खाना देबे के बा।"
राजू," दीदी, तहके छोड़े के मन ना करेला, जी चाहे ला तहके सारा रात असही बांहिया में कसके धइले रही। जइसे चंदन के पेड़ से सांप लिपटल रहेला।"
गुड्डी," राजू बात बूझ, बाबूजी घर आ गईल बारे, कभू केहू इधर आ जाई, कोई देख ली त जवाब देत ना बनि।"
राजू," ठीक बा जाय के टैक्स देबे के पड़ि।"
गुड्डी," का बोलअ ?
राजू," तू तनि आपन बूर देखा दअ, रानी।"
गुड्डी," ना, ई कइसे करि, तू जानत बारे ना बाबूजी अउर माँ कभू कोई आ सकेला, देखि त का सोचिहे।"
राजू," अरे, कोई ना आई जल्दी से गुलाबी बूर देखा दअ।"
तभी बीना की आवाज़ फिर से गूंजी," अरे, गुड्डी तहरा सुनाई नइखे देत का बहरी कहीं के। जल्दी इँहा आ ना।"
गुड्डी," राजू प्लीज जाय दे ना, माई खिसयात बारि।
राजू गुड्डी को बांहों में भरे बोला," जाय त तभिये देब गुड्डी दीदी जब तू हमके बूर देखाबे।"
गुड्डी," ठीक बा, लेकिन एक बेर।"
राजू," मंजूर बा, लेकिन पहिले देखाअ दे।"
गुड्डी बोली," पहिले तू हमके छोड़बु तब ना देखाएब। राजू ने उसे बांहों से आज़ाद किया, गुड्डी उसकी बांहों से अलग हुई और खड़ी होकर अपनी सलवार के नाड़े को खोलने लगी। सलवार की डोरी तुरंत ही अलग हो गयी। गुड्डी ने अपनी कुर्ती उठा ली और सलवार को पैंटी सहित नीचे उतार दिया। उसकी झांटदार बूर बल्ब की रोशनी में चमक उठी। राजू अपनी बहन की रेशमी झांटों से भरी बूर को निहारने लगा। गुड्डी उसे देख शर्मा गयी। ऐसा तो नहीं था कि राजू अपनी बड़ी बहन की नंगी बूर को पहली बार देख रहा था, पर शायद उसकी बहन की बूर की लालसा और चाह उसे उसकी तरफ खींच रही थी। गुड्डी को अपने भाई की आंखों में, हवस और वासना देख एक पल के लिए डर लगा पर, अगले ही पल उसे एहसास हुआ कि वो स्वयं भी तो यही चाहती है। यौवन एक ऐसा अनोखा अनुभव है, जिसमें ना रिश्तों की सीमा तय होती है, ना ही उम्र की। बस एक दूसरे को पाने की चाह और लालसा और इस सत्य को कोई ठुकरा नहीं सकता। वन में जब पौधों पर नई कलियाँ खिलती हैं, तो उनका स्वागत भँवरे ही करते हैं। कलियों का काम है, खिलना और भँवरों का काम है उनका रस चूस के उन्हें खिलाना। दोनों एक दूसरे के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितना जीवन के लिए पानी। गुड्डी वो कली थी जिसे खिलना था और राजू वो भंवरा जिसपर जिम्मेदारी थी, उसे खिलाने की। राजू अपने सामने फैले नजारे को देख मस्ती में आगे बढ़ा और गुड्डी की बूर को फैला दिया। गुड्डी की बूर फैली थी, तो अंदर का गुलाबी छेद उभर आया। राजू ने उसे चूम लिया। गुड्डी सिसक उठी। तभी उसकी माँ की आवाज़ फिर गूंजी, गुड्डी ने राजू से कहा," जाय दे राजू फेर देख लिहअ।" ऐसा बोल उसने राजू को धक्का दिया और फिर सलवार ऊपर कर नाड़ा बांध तेज़ी से आंगन की ओर चल दी। राजू अपनी जुबान पर उसके बूर के स्वाद को महसूस कर रहा था। वो मुस्कुरा रहा था।
इस तरह उन दोनों के बीच छेड़छाड़ चलती रही।

एक दिन राजु सुबह सुबह उठकर रोज की तरह गाय का दूध निकालने के लिए खटाल ( गाय बांधने का स्थान) की ओर जा रहा था। गुड्डी उसे देख बोली," राजू आज हमके भी गाय के दूध कइसे दूहल जाला सिखा दे ना।" राजू उसकी ओर देख मुस्कुरा के बोला," ई लइकियन के बस के बात नइखे, आ तहरा सिखाबे के टाइम भी नइखे। हमरा ट्यूशन भी जायके बा।"
गुड्डी मुंह बना बैठी। तभी उसके पिताजी वहां आये, तो गुड्डी ने उनसे कहा," बाबूजी, देखी ना राजू हमके गाय कइसे दुहात बिया, नइखे सिखावत। एकरा से कही ना कि हमके सिखा दी। हमरा सिखे के बा बाबूजी।"
धरमदेव मुस्कुराते हुए बोला," तू सीख के का करबा बेटी। ई काम त मरद करेला।"
गुड्डी," बाबूजी हमके भी सीखेके बा। सीखे में बुराई त नइखे, का जाने कब काम आ जाई।"
धरमदेव को गुड्डी की बात जंच गयी। वो राजू की ओर देख बोले," गुड्डी के भी खटाल ले जो अउर सिखा दे।"
राजू की अब मजबूरी थी, कि वो गुड्डी को ले जाकर सिखाये। वैसे भी आज स्कूल में छुट्टी थी, तो गुड्डी को स्कूल नहीं जाना था। वो राजू के पीछे पीछे चल दी। धरमदेव खेतों की ओर निकल गए। गुड्डी की माँ घर में दैनिक कार्य में व्यस्त थी। राजू और गुड्डी खटाल में पहुंच गए। राजू ने गुड्डी के सामने बाल्टी रखी और जाकर पहले बछड़े को खोल दिया। बछड़ा लपकके गाय के थन पर टूट पड़ा। गाय अपने बछड़े को चाटके लाड़ प्यार कर रही थी। गुड्डी का हृदय ये देख ममता से भर उठा। उसके अंदर भविष्य का दृश्य जैसे उखड़ आया जिसमे वो अपने बच्चे को लाड़ प्यार करते हुए दूध पिलाएगी। राजू उधर गाय के नाद ( जिसमें जानवरों को चारा खिलाया जाता है) में चारा भर भरके डाल रहा था। गाय धीरे धीरे चारा खाने लगी। उधर उसका बछड़ा दूध पीने लगा। कुछ देर बाद राजू ने, बछड़े को अलग कर दिया। फिर बाल्टी लेकर गाय के थनों के नीचे बैठ गया। उसने लोटे से पानी निकाल थनों पर पानी के छींटे मारे। गुड्डी उसके पास आके सबकुछ देखने लगी। राजू ने फिर थनों को पकड़ दूध दुहना शुरू किया। थनों को राजू अपनी उंगलियों में थामे बार बार मीजके दूध निकाल रहा था। दूध की मोटी सफेद धार, सीधे बाल्टी में जमा होने लगी। राजू दूध लगातार दुह रहा था। गुड्डी उसके तेजी से चलते हाथों को देख रही थी। गुड्डी काफी देर तक ये देखते रही। राजू ने तभी गुड्डी को देख कहा," दीदी तहराके गाय के दुहे के सीखे के बा त देख के ना, बल्कि कइके सीखे के पड़ी। चल इँहा बइठ जो, अउर गाय के थन के मीज मीजके दूध निकाल।" गुड्डी का हाथ पकड़ राजू ने उसे अपने पास बिठा दिया अउर थन पकड़ा दिया। राजू ने फिर उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर उसे दूहने को कहने लगा। गुड्डी भी उसके साथ दूहने लगी। राजू इसी बहाने गुड्डी के पीछे आकर उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया। गुड्डी पहली बार गाय का दूध निकाल रही थी, वो बहुत उत्साहित थी। राजू उसे देख और उत्साहित था। राजू ने उसी समय गुड्डी के गर्दन और कान पर चुम्मा ले लिया। गुड्डी के दिल में हलचल मच रही थी। वो खुद भी बहकने लगी। इस एहसास के साथ गुड्डी ने अचानक गाय के थन को काफी जोर से खींच दिया और गाय दर्द से बिदक गयी। गाय के हड़बड़ाने से गुड्डी राजू की ओर तेजी से मुड़ी और राजू उसे बांहों में भर संतुलन खोकर गिर पड़ा। गुड्डी की चूचियाँ राजू के सीने में धंस गयी। राजू और गुड्डी वहीं पुआल पर लेटे हुए थे। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। तभी राजू ने गुड्डी की लटों को उंगली से समेट उसके कान के पीछे रख दिया। गुड्डी राजू के सीने से चिपकी हुई थी। गुड्डी बोली," लागत बा, हम ना सीख पाइब, गाय के दूध कइसे निकालल जाता।"
राजू," काहे ना सिखबू, हम सिखाईब तहराके गुड्डी दीदी।" ऐसा बोलके उसने गुड्डी के होठ को अपने होठ से छू लिया। गुड्डी राजू के होंठ का स्पर्श पाकर सिहर सी गयी। राजू के इस छुअन से, गुड्डी के अंग अंग में बिजली दौड़ने लगी। उसने राजू के होंठ पर होठ रख पुनः चुम्बन आरम्भ कर दिया। दोनों एक दूसरे को चूम रहे थे। गुड्डी राजू की मजबूत बांहों में लिपटके बेचैन हो उठी थी। दोनों कुछ देर तक ऐसे ही प्रगाढ़ और गहरे चुम्मे में खोए रहे। कभी वो उसके निचले होठ को चूसती तो कभी ऊपर के होठ को। कभी राजू की जीभ उसकी जीभ से टकराती और सांपो की तरह एक दूसरे से लिपट जाती। दोनों के मुंह के थूक एक दूसरे से मिल एक अलग ही स्वाद को जन्म दे रहे थे। दोनों थोड़ी देर के लिए भूल चुके थे कि वो घर में हैं। जिस्म की भूख की जो ज्वाला दोनों के भीतर जल रही थी, उसे सिर्फ उनका समागम ही बुझा सकता था। दोनों भूल गए थे, कि दोनों ने क्या निर्णय ले रखा है। तभी उन्हें महसूस हुआ कि, कोई उस तरफ ही आ रहा है। गुड्डी फौरन सचेत हो उठी। और हट कर अलग खड़ी हो गयी। राजू ने खुद को संभाला। धरमदेव खेती का कोई सामान भूल गए थे, तो वो लेने वो वापस आये थे। धरमदेव ने समान उठाया और पूछा," का बेटी राजू तहराके ठीक से सिखाता की ना?"
गुड्डी झेंपते हुए बोली," जी बाबूजी, सिखात बा बढ़िया से।"
धरमदेव," ठीक बा सीख लअ। राजू दीदी के बढ़िया से सिखा दे। हम जात हईं।" और वो निकल गए। गुड्डी भी वहां से निकलने लगी। राजू ने उसका हाथ पकड़ लिया। गुड्डी का दिल थम सा गया। वो पीछे मुड़के बोली," राजू जाय दे, देखला बाबूजी आ गईल रहनि ना। हम सांझ में फेर आईब तब सिखब।" राजू ने उसे जाने दिया और वो वापिस काम पर लग गया। गुड्डी ये समझ रही थी कि उन दोनों के लिए खुद को ज्यादे दिन रोकना मुश्किल होगा। वो डरी भी हुई थी और उत्साहित भी। राजू और गुड्डी दिनभर अपने काम में व्यस्त रहे। शाम को राजू फिर दूध निकालने के लिए खटाल की ओर चल पड़ा। पर गुड्डी उसे कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। राजू ने उसे बहुत तलाशा, पर जब वो नहीं मिली तो उसने माँ से पूछा," माई, गुड्डी दीदी कहां गईल ह?
बीना," अरे उ त कहत रहनि की उ बिजुरी के इँहा जात बिया। ओकरा कउनु काम रहे, अभी दस मिनट पहिले गईल बिया।"
राजू का ये सुनके मुंह लटक गया। वो बेमन से खटाल के अंदर गया और गाय को दूहने का इंतज़ाम करने लगा। राजू गाय का दूध निकालने लगा।

दूसरी ओर
गुड्डी और बिजुरी आपस में बात कर रही थी। बिजुरी गुड्डी से चहकते हुए बोली," तहरा खातिर एगो बढ़िया इंतज़ाम हो गइल बा गुड्डी।"
गुड्डी," का बोल ना जल्दी से"।
बिजुरी," सुन, काल रजनी के बियाह बा। हम तहार घर आके तहार माई से कहब कि दुनु बियाह में जाइब अउर भोरे आईब। तू राजू के कहके ऊंहा रात में बुला ले नौ या दस बजे। राजू से कह कोई जगह देख ली। ऊंहा उ तहरा ले जाई। फेर तू दुनु पूरा रतिया मज़ा करिहा। कोई देख भी ली राजू के साथ त शक ना करि, काहे की उ तहार भाई बा। का का बोलत हउ, गुड्डी रानी।"
गुड्डी आश्चर्यचकित हो बोली," ई त बहुत बढ़िया आइडिया बा बिजुरी, तहार दिमाग बड़ा चलेला।"
बिजुरी हंसते हुए," अरे ई सब तहरा खातिर गुड्डी। आखिर सहेली ही सहेली के काम आवेला। तू जाके राजू जीजा के बताई दिहा।" बिजुरी मजाक करते हुए बोली।"

राजू ने एक बाल्टी दूध निकाला और उसे रखने के लिए मुड़ा। तभी उसे लगा कि कोई उसके पीछे खड़ा है। उसने पलट के देखा, तो वहां कोई नहीं था। वो फिर काम करने लगा। तभी पीछे फिर दरवाज़े के अंधेरे से उसे पायल की छनछनाहट सुनाई दी। उसने मुड़के देखा तो, उसे एहसास हुआ कि कोई दरवाज़े के पीछे खड़ा है। वो धीरे कदमों से वहां पहुंचा। उसकी नज़र वहां अंधेरे में चमकते खूबसूरत नयनों से टकराई। वो उन आंखों को बहुत अच्छे से जानता था। बाहर अंधेरा होने लगा था, राजू ने लालटेन को उठा के देखा तो वो गुड्डी ही थी। गुड्डी ने होठों पर उंगली रख राजू को चुपने का इशारा किया। राजू ने लालटेन रख दिया और गुड्डी को खुद से चिपका लिया। गुड्डी खुद भी उसकी बांहों में सिमट उससे आत्मसात हो रही थी।
गुड्डी फिर धीरे से बोली," राजू आज दिन में त ना सिखनि, पर अभी दूध निकाले सिखा दे।"
राजू बोला," सिखा देब, पर अपना तरीका से।"
गुड्डी," का मतबल??
राजू," गाय के थन के केतना खींचेला अउर कइसे खींचेला उ कुल बताईब, पर.....
गुड्डी," का पर... बता दे।"
राजू," गुड्डी दीदी जब तलक तहरा महसूस ना होई, तब तक तहरा बुझाई ना कि केतना कसके खींचे पड़ेला। एहीसे तहके खुद गाय बनके, महसूस करेके पड़ी कि गाय कइसे महसूस करेला।"
गुड्डी जानती थी कि राजू बस मज़े लेना चाहता है, वो भी ये खेल में शामिल होते हुए बोली," ठीक कहेला तू राजू, पर हम गाय कइसे बनि। अउर तू का कहे चाहे तारअ?
राजू," दीदी तू पूरा नंगे हो जो, अउर हम तहार चुचिया के दुह के बताईब। तभी तू महसूस करबू, कि कइसे गैय्या दूहल जाला।"
गुड्डी," ओह्ह, राजू ई सच में करे के पड़ी का ?
राजू," दीदी, ई त करिके पड़ी। ना त ना सीख पैबु।"
गुड्डी," ठीक बा, हम उतार देत बानि, पर तु हमके अच्छा से सिखाइह।"
गुड्डी ने राजू को पीछे मुड़ने को बोला और अपने सारे कपड़े उतार के नंगी हो गयी। गुड्डी पूर्ण निर्वस्त्र हो राजू के पीछे खड़ी थी। गुड्डी ने राजू के कंधे पर हाथ रखा, तो राजू मुड़ गया।

राजू गुड्डी को इस तरह निर्वस्त्र देख बेचैन हो उठा। गुड्डी बिल्कुल नंगी खड़ी थी, अपने भाई के सामने। उसने अपना सर झुका रखा था, और वो नीचे देख रही थी, इस बात की उम्मीद में कि राजू उसकी ओर आगे बढ़ेगा। राजू गुड्डी की ओर आगे बढ़ने लगा तो गुड्डी उसकी आहट महसूस कर बेसब्र हो उठी। गुड्डी के एकदम पास आकर राजू रुक गया। उसने गुड्डी के हाथ जो उसके स्तनों/चूचियों को ढके हुए थे उसे कलाई से पकड़कर हटा दिया। गुड्डी ने जो प्रतिरोध दिखाया उसमें विरोध कम और सहमति ज्यादा थी।
गुड्डी ने दूसरे हाथ से अपनी बूर को ढक रखा था। राजू ने अपनी दीदी के उस सुंदर खजाने से भी हथेली का पहरा हटा दिया। इस तरह गुड्डी का खिला यौवन अपने छोटे भाई के सामने पूरी तरह खिल उठा। राजू ने गुड्डी के उन्नत चूचियों के ऊपर कड़े चूचकों को गौर से निहारा। उसने गुड्डी के मटर के दाने जैसे चूचकों को अपनी उंगलियों से छेड़ा, तो गुड्डी सिहर उठी और उसके मुंह से सिसकारी छूट गयी। गुड्डी को राजू की छेड़छाड़ से मज़ा और मस्ती दोनों चढ़ रही थी।
तभी राजू बोला," दीदी अब तू गाय जइसन दुनु हाथ दुनु ठेहुना पर चौपाया बन जो। तब तोरा बताईब की गाय के चुच्ची के केतना जोर से दबावे के बा अउर केतना खींचे के बा। तहके पूरा जानकारी तभी मिली।"
गुड्डी भी अनजान बनते हुए बोली," सही कहला तू राजू, जइसे तू कहलु हम कुल कपड़ा उतारके पूरा लँगटे हो गइल बानि। जइसे गाय जानवर ह, अउर ओकरा के देहिया पर कपड़ा ना होखेला, वइसे ही हम भी बिना कपड़ा के लँगटे रहब। हम बिल्कुल अपना के गाय जइसन बूझके चौपाया हो जात हईं।"
ये बोलके गुड्डी पुआल के ढ़ेर पर अपने घुटनों और हथेली जमीन पर टिका के चौपाया बन गई। गुड्डी फिर राजू की ओर देख बोली," देखअ, राजू हम ठीक से चौपाया बन गईल बानि ना, जइसे की आपन गाय बारि।" राजू अपनी दीदी के करीब उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोला," हॉं, दीदी अब तू हमार गुड्डी दीदी ना बल्कि गाय बुझातिया। गाय बेचारी असही लंगटे रहेलि अउर सब ओकरा देखत हई। अब तू एगो गाय बिया, जेकर दूध हम निकालब अउर तू महसूस करिहा कि गाय के लोग जब दुहेला त ओकरा कइसन बुझावेला। ऐसे तहरा इहो पता चल जाई, कि गाय के थन के केतना जोर से अउर कइसे मीज के दूध निकाले के बा।"
ऐसा बोलके राजू ने गुड्डी के लटकते चूचियों को अपने हाथों से सहलाया और उन्हें अपने पंजों में रख गुड्डी रूपी गाय के थनों/चूचियों के भारीपन का अनुमान लगाया। गुड्डी अपने स्तनों के पकड़े जाने से अच्छा महसूस कर रही थी। राजू उसके पास बाल्टी से पानी अपने हथेलियों में भरके उसके लटकते तने भूरे मोटे चूचकों पर पानी मारा। गुड्डी पे पानी का हर छींटा आग के ऊपर पानी की फव्वारे की तरह गिर रहा था। आग पर पानी गिरने से छन की आवाज़ आती है और यहां गुड्डी की तेज सिसकारियों ने उसकी जगह ले ली थी। गुड्डी सिसकारी भरते हुए," राजू ई पानी तू काहे मारलस, हमार थन पर??
राजू," दीदी पानी मारला से चूचक बढ़िया से पकड़ाई अउर बढ़िया से चुच्ची से दूध दुहाई। ई बहुत जरूरी बा, ना त गाय कभू बिदक जायी।"
गुड्डी," ठीक बा, हमार चुच्ची के घुंडी कड़ा हो रहल बा। तू बड़ा बढ़िया से पानी से भिजइले बा।"
राजू अब अपनी बड़ी बहन को चौपाया बनाके, उसकी चूचियाँ उंगलियों में थामे, दुहने के बहाने उसे मज़े से मीज रहा था। गुड्डी की चूचियाँ और चूचक दोनों कड़े हो चुके थे, राजू के स्पर्श से। उसके स्तन सामान्य से बड़े लग रहे थे। राजू गुड्डी के भोलेपन का पूरा फायदा उठा रहा था। उसे लग रहा था कि गुड्डी को इस बात का पता नहीं है कि वो दूध दूहने के बहाने उसकी चूचियों के मज़े ले रहा था। सच तो ये था कि गुड्डी को राजू से ज़्यादा मज़ा आ रहा था। उसके मुंह से निकलती आँहें इस बात का प्रमाण थी। राजू उसकी आहों से काफी उत्तेजित हो रहा था। राजू चूचियाँ मीजते हुए पूछा," दीदी, देखत बारू, महसूस करत बारू, कइसे गैय्या के दुहे के??
गुड्डी," आह.... ओह्ह..हाँ राजू, बड़ा ही टेढ़ काम बा। तू केतना सफाई और बढ़िया से कर रहल बारू। लेकिन अभी अउर बढ़िया से दुह ले आपन बहिन के, बता दे गाय के कइसे दूहल जाता।"
राजू," गुड्डी दीदी, तू जब तक ना कहबू, तब तक हम तहके चुच्ची दुहत रहब। तहार दुनु चुच्ची मस्त बा। जब तू माँ बनबु, त खूब दूध होई।"
गुड्डी," राजू बछड़ा गाय के कुल दूध ना पी पावेला, हमनी के पियल जात बानि। अगर हमरा भी गाय जइसन दूध होई, त के उ दूध पीई।"
राजू ने जब उसके लंपट सवाल को सुना तो उसने, गुड्डी की चुच्ची में मुंह लगा दिया और चूचक को चूसने लगा। गुड्डी की आँहें और सिसकारियां राजू के कान में मिश्री की तरह घुल रही थी। गुड्डी बिल्कुल नंगी, अपने भाई को चौपाया हो, अपना दूध पिला रही थी या यूं कहें कि चुच्ची से दूध पिलाने के बहाने काम रस का लाभ उठा रही थी। गुड्डी," आह... राजू पी लअ हमार चुचिया के दूध। देख तू हमार बछड़ा बा अउर हम तहार गाय माँ। ले थाम के पिलअ आह.... गाय के केतना मज़ा आत होई, जब बछड़ा दूध पियत होही। हमहुँ हमार बच्चा के असही दूध पियाईब।" राजू उसे कहां छोड़ने वाला था। उसे तो बहुत अधिक उत्तेजना हो रही थी। उसने मन में सोचा कि एक दिन तू इसी घर में मेरे ही बच्चे की मां बनेगी और उसे और मुझे अपना दूध पिलाएगी। राजू उसके नीचे लेटा हुया था, और गुड्डी वैसे ही चौपाया बनी हुई थी। वो अपने चूचियाँ झूला झूला के उसे दूध पिला रही थी। काफी देर से नंगी होने की वजह से गुड्डी को पेशाब लग गयी। गुड्डी सिसयायते हुए राजू से बोली," राजू हमके मूते के बा, बड़ी जोर से पेशाब लाग गईल बा।"
राजू उसकी चुच्ची छोड़ते हुए बोला," गुड्डी दीदी, तू गाय बारू अउर गाय जहां रहेला जइसन रहेला उंहे मूतेली। तू भी मूत ना रानी।"
गुड्डी," उ त ठीक बा, पर अईसे नीक ना लागी। तहार देहिया भीज जायी।"
राजू," तू ओकर चिंता मत कर। हमार खातिर उ अमृत बा। जइसे गौ मूत्र पवित्र होखेला, वइसे ही तहार मूत्र भी पवित्र अउर अमूल्य बा।"
गुड्डी," केतना प्यार करेलु तू हमरा से राजू। ले अब हम मूतत बानि। तहार हिस्सा के पवित्र और अमूल्य गुड्डी मूत्र।" और जोर से हंसने लगी। उसकी बूर की फांके पहले तो हल्की फरकी, फिर उसकी कमर मूत निकालने के लिए थोड़ी प्रेशर के लिए झुकी। फिर बूर से बुलबुला के मूत की धार ऐसे बही, जैसे चट्टानों के बीच से अविरल धारा। गुड्डी का पेशाब अब छर छर कर नीचे राजू के लण्ड पर चू रहा था। राजू गुड्डी की गर्म मूत अपने पैंट के ऊपर से महसूस कर रहा था जो पूरी तरह गीली हो चुकी थी। राजू ने फिर गुड्डी को अपनी बांहों में भर लिया, गुड्डी की मूत बंद हो चुकी थी। वो राजू के गोद में बैठी थी। राजू ने दूध से भरे बाल्टी में लोटा से एक लोटा दूध निकाला और गुड्डी के माथे पर दूध का लोटा धीरे धीरे खाली करने लगा। गुड्डी राजू के कंधे थामे हुई थी, राजू उसे सर से दूध से नहलाने लगा। गुड्डी के बदन से फिसलता दूध उसके गोरे रंग में चार चांद लगा रहा था। गुड्डी की आंखे बंद थी, उसका नंगा बदन दूध की क्षणिक चादर ओढ़ फिर नंगा हो जाता। राजू ने उसके ऊपर एक के बाद एक तीन चार लोटा दूध डाल दिया। गुड्डी किसी राजकुमारी की तरह दूध से स्नान कर रही थी। उसका पूरा बदन दूध से गीला हो चुका था। राजू उसके गाल और होठों पर जीभ फेरते हुए दूध चाटने लगा। गुड्डी को उसके चाटने से गुदगुदी हो रही थी, वो हल्के हल्के मुस्कुरा रही थी। वैसे तो गुड्डी खुद ही बहुत मलाईदार थी, पर दूध ने उसे गीला कर और भी मलाईदार बना दिया था। राजू अब अपनी बहन को चूम रहा था। होठ भी दूध के स्पर्श से अधूरे नहीं थे। गुड्डी के होठ राजू के प्यास को बुझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। गुड्डी अपने भाई के बांहों में सिमट सी गयी थी। उसके चेहरे पर काम वासना साफ झलक रही थी। दोनों काफी देर तक चुम्बन में लीन थे। राजू फिर उसकी गर्दन को चाटने लगा। गुड्डी वासनामयी हो अपने सर को दांये बांये कर रही थी। उसके चूचकों से दूध की बूंदे मोतियों की तरह चमक और टपक रही थी। राजू उसके चूचियों को फिर से मुंह में समाए चूसने लगा। दोनों भाई बहन एक दूजे में खो चुके थे।
राजू ने फिर बेझिजक गुड्डी को वापस गाय बना दिया और उसके शानदार बूर को पीछे से आके चूमने लगा। गुड्डी उसकी बूर को चूमते राजू की शक्ल भले ही ना देख पा रही थी, पर उसके जीभ और होठ बूर पर अपनी छाप जरूर छोड़ रहे थे। गुड्डी की बूर अत्यधिक गीली और लसलसी हो रही थी। ऐसी चिपचिपी बूर उसी स्त्री की हो सकती है, जो खुद चुदवाने के लिए बेक़रार और बेताब हो। गुड्डी की बूर की दोनों फांके ग्रीज़नुमा चिपचिपा बूर के पानी से तर थी। उसके बूर से उठती, रहस्मयी खुशबू राजू के नाक को उसे सूंघने का आमंत्रण दे रही थी। बूर शायद स्त्री का वो अभिन्न हिस्सा है, जो पुरुष के लिंग के लिए ही नहीं बल्कि उसकी जीभ के लिए भी बना है। राजू की लपलपाती जीभ देख कोई भी यही कहता, कि बूर पानी लण्ड के लिए कम और चाटने के लिए ज्यादा छोड़ती है।
जैसे किसी कुत्ती के बूर को कुत्ते सूंघते और चाटते है, ठीक वैसे ही गुड्डी की कसमसाई बूर राजू के भूखे मुंह का चखना बनी हुई थी। बूर का पानी, निरंतर लण्ड के आगमन की प्रतीक्षा में बह रहा था, जिसे राजू हलक में उतार लें रहा था। वैसे तो बूर किसी की भी हो कुत्ते सूंघते और चाटते तो जरूर हैं, पर बूर के पानी का स्वाद उस वक़्त और आता गई जब वो बहन की हो। गुड्डी की आँहें और कामुक सिसकारी राजू के फेरती जीभ से खुलकर बाहर आ रही थी। उसके बूर की गुलाबी पत्तियां और फांकों को अलग कर जीभ को छेद में आगे पीछे कर रहा था। उसे पूरी तरह खोल ऊपर से लेकर नीचे तक चाट रहा था। ऐसे में कौनसी लडक़ी ज्यादा देर टिक पाती। अपने बूर की सीमाएं तोड़ गुड्डी की धार बह निकली। गुड्डी ने गहरी लंबी सांस ली और आह आह आह करते हुए झड़ गयी। गुड्डी अभी भी हांफ रही थी। उसकी थकान में भी मुस्कान साफ पता चल रही थी।
राजू ने गुड्डी को वहीं बिठा दिया और नंगा हो गया। राजू का शानदार कड़क लण्ड देख गुड्डी के मुंह से पानी टपकने लगा। उसके कुछ कहने से पहले ही गुड्डी उसका लण्ड थाम चुकी थी। राजू के तने हुए लण्ड को जीभ से चाटने लगी। राजू के मस्त लण्ड को देख गुड्डी ने सोचा क्यों ना आज चुद जाऊं, ये जवानी की तड़पती आग बर्दाश्त नहीं हो रही। घर में इतना मस्त लौड़ा मुझे चोदने को बेताब है, और मैं ही उस सुख से वंचित हूँ। गुड्डी पूरे मन से किसी लण्डखोर प्यासी रंडी सी भाई के लण्ड को चूस रही थी।
राजू उसके मुंह को बहुत देर तक चोदता रहा। थोड़ी देर में राजू के लण्ड की मलाई गुड्डी के मुंह मे गिर गयी।
राजू अपनी बहन की लगन देख उसे गोद में उठा लिया। गुड्डी ने अपने भाई की बांहों में खुद को सौंप दिया। राजू का तना हुआ लण्ड गुड्डी की बूर को छू रहा था। तभी गुड्डी ने राजू से कहा," राजू, उ दिन कब आयी जब हमार तहार मिलन होई। दुनु के किस्मत देख, एक ही माई के कोख से जन्म लेनी भाई बहिन कहात बानि, लेकिन भाई बहिन के रिश्ता त धूमिल हो गइल। हमके अपन रानी बना ले, अउर हमार राजा बन जो। जाने का किस्मत में लिखल बाटे मोर राजा।"
राजू," अरे मोर रानी, तहार हमार मिलन जरूर होई। तहरा के हम सबके सामने से ले जाइब अउर केकरो पता भी ना चली, कि तहरा संगे का सब करब। हमार तन मन सबमें तू बस गईलु गुड्डी रानी। अगर तू कहबू त आजे मिलन हो जाई, अभी, इँहा, एहि बेरा।"
गुड्डी," तहरा का लागेला राजा, अईसे नंगे तहार बांहिया में बानि, हमके चुदाबे के मन नइखे। राजा हमार प्यास तहरा से कम नइखे। पर तु ही सोचआ अईसे डर के माहौल में मज़ा ले पाईबु।"
राजू गुड्डी के चूतड़ों को सहलाते हुए बोला," गुड्डी दीदी, पर साला मौका नइखे मिलत, ना त अब तक तहके बीस बेर चोद देले रहति।"
गुड्डी मुस्कुरा उठी," सुन हम बिजुरी से मिलके आईल बानि। काल रात गांव में रजनी मोर सहेली के बियाह बा। बिजुरी माई से कहके हमरा ले जाई, रजनी के घर। ऊंहा तू आके हमरा ले चलहि। अब त बदन के गर्मी हमरा से भी बर्दाश्त नइखे होता। कउनो जगह देख ले।"
राजू की आंखों में चमक थी, उसने गुड्डी की ओर देखा और बोला," सुन, काल रात हम माँ बाबूजी के सुते के बाद, रजनी के घर से ले लेब। खेत में जउन अपन ट्यूबवेल वाला घर बा ऊंहा मस्त रही। राते कोई ना आई। ऊंहा.....
गुड्डी उसकी आँखों में देखते हुए बोली," राजू, ई ठीक रही। ऊंहा सारा रात........
इतने में बाहर से आवाज़ गूंजी तो गुड्डी और राजू निर्वस्त्र अवस्था में अलग हुए। गुड्डी भाग के अपने कपड़े उठायी और फौरन पहन ली। फिर राजू की ओर देखके बोली," हम कल रात रजनी के घर तहार इंतज़ार करब, मोर बलम भैया।"

राजू और गुड्डी के मिलन का शायद इंतज़ाम हो चुका था।
Awesome Awesome Awesome update ...Aapki story mai quantity ke saath saath quality bhi rahti hai ...akhir Raju aur guddi ka chapter shuru ho jaya...shuru hote hi lund khada kar diya is update ne ..mast likhte ho bhai ..aap kahani ke quality mai koi compromise nahi karte late hota hai per maza ata hai padhne mai aapka har update ko.....

Iss update mai to pura gaav wala feeling dila Diya hai..Dost mile to bijuri jaise apni dost guddi ki choot ka kitna khyaal rakhti hai ..guddi ki chudai ke liye wo badhiya plaan banai hai jaha Raju aur guddi akele Bina kisi ke dar se aram se guddi ki seal toote ...

Aur guddi ko gay banaker doodh niklane wala uffff bhai 🔥🔥🔥💦💦💦💦pani nikal Diya hai lund ka ...Raju apni bahen ko gay ki tarah treat kar raha tha jaise gay kahi bhi moot deti hai usi tarah guddi ko bhi mootne ko bola sach mai maza aajyaa bro..:happy::goteam::jerker:..

Bhai aram se agla update likho koi jaldi nahi hai jab aapka mood banega tabhi ache ache line milega hum logo ko read karne ko ..negative comments ko ignore karna bhai ..

Superb superb update 🔥🔥🔥🔥
 
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vyabhichari

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एक मंज़िल राही दो - भाग १

मंज़िल तक पहुंचने के लिए राही को सब्र रखना पड़ता है। वो चलते हैं, वो गिरते हैं, फिर उठते हैं और फिर चलते हैं। इस सफ़र का भी अपना अलग आनंद होता है। कई बार मंज़िल सामने दिखती है, पर किसी मृगतृष्णा कि तरह दूर चली जाती है। ऐसे में धीरज- सैय्यम, विश्वास और एक दूजे का साथ ही राही का राहों में सहारा होता है। मंज़िल भी उन्ही लोगों को मिलती है। दिलचस्प सफ़र वही है, जिसकी राहों में मुश्किलें, बाधाएं अपने साथ रोमांच लाये।मंज़िल जब सामने दिखने लगती है, तो हर कोई दौड़के वहां तक पहुंचना चाहता है और मंज़िल को पा लेना चाहता है। पर कहते हैं ना कि, मंज़िल राही को चुनता है, ना कि राही मंज़िल को। कुदरत ही सबकी क़िस्मत लिखती है। आज तक किसी को भी वक़्त से पहले और किस्मत से ज़्यादा नहीं मिला, चाहे कोई कुछ भी करले। और सफलता भी उन्ही को मिलती है जो राहों की मुश्किलों को हंस के गले लगाते हैं और घबराते नहीं।
गुड्डी और राजू का सफ़र कुछ ऐसा ही रहा था। और शायद उनका सफ़र अब खत्म होनेवाला था। उन्हें मंज़िल नज़र आने लगी थी।
उन दोनों को मिलन की रात का बेसब्री से इंतज़ार था। अब उनका सैय्यम जवाब देने लगा था। उस रात ना राजू के और ना गुड्डी के आंखों में नींद थी। दोनों करवटें बदल कर रात काट रहे थे, बार बार उस चांद को देख रहे थे, जो शायद आनेवाली रात को उन दोनों के मिलन का गवाह बनेगा। राजू और गुड्डी की तड़प छेड़खानियों का रूप तो पहले ही ले चुकी थी। लेकिन ओस चाटने से कभी प्यास नहीं मरती, उसी तरह उन्हें भी इन छेड़खानियों से उनको तृप्ति नहीं मिलती थी। गुड्डी ना जाने कैसे खुद को रोके हुए थी। अपने बिस्तर में अपनी बूर को सहलाते हुए वो राजू के लण्ड को ही याद कर रही थी। उसे राजू के साथ हुई एक एक घटना और उसका रोमांच अपने बदन में महसूस हो रहा था। अगर उसके घर में कोई ना होता तो शायद वो खुद राजू को अपने बिस्तर में सोने का न्योता देती। उधर राजू भी अपनी बड़ी बहन की प्यासी अनचुदी बूर के लिए लण्ड को मुठिया रहा था। ना जाने क्या जादू था कि दोनों भाई बहन एक दूसरे के जिस्म के प्रति आकर्षित हो चुके थे। दोनों की रात जैसे तैसे गुजरी।
सुबह हुई दिन निकला पर गुड्डी और राजू बेसब्री से शाम का इंतजार कर रहे थे। दोनों आज एक दूसरे को देखते तो नज़रें फेर लेते। उनकी बातें भी आज काम से काम वाली हो रही थी। जब मंज़िल एकदम सामने आ जाये तो, अच्छे अच्छे दबाव में आ जाते हैं। यही दोनों को महसूस हो रहा था। दोनों के अंदर आज एक उत्साह, रोमांच और डर का मिश्रित भाव पनप रहा था। राजू को अपने कोचिंग क्लास के लिए निकलना पड़ा। गुड्डी भी बिजुरी के साथ अपने स्कूल चली गयी। गुड्डी के प्री बोर्ड्स के पेपर अगले तीन चार दिन में शुरू होने वाले थे। लेकिन उसका मन तो बस अब एक ही जगह अटका था। आज राजू का भी मन क्लास में बिल्कुल नहीं था। शाम को जब वो घर वापिस आया तो, देखा गुड्डी घर में बर्तन धो रही थी। इस वक़्त शाम के साढ़े चार पांच बज रहे थे। वो गुड्डी के पास जाकर धीरे से दूसरी ओर देख बोला," बिजुरी दीदी कब आई गुड्डी दीदी? गुड्डी उसके सवाल को सुन थोड़ा चौंकी फिर मुस्कुराते हुए बोली," जब आई त पता चल जाइ। बड़ा बेताब बारू तू।"
राजू ने गुड्डी को देखा और मुस्कुराते हुए बोला," हाँ, बेताबी अउर बेसब्री दुनु बा, आज रात में बताईब।"
गुड्डी," अच्छा, देखब।"
राजू फिर गाय का दूध निकालने चला गया। दोनों काम में व्यस्त थे। गुड्डी की माँ घर के अन्य काम में व्यस्त थी। शाम के ठीक छः बजे गुड्डी की दोस्त बिजुरी आ गयी और सीधे जाके गुड्डी की माँ बीना से बोली," चाची आज हमार क्लास में रजनी ना ह, उ गंगा चाची के लइकी ओकर बियाह बा, उ हमरा अउर गुड्डी के बजौले बिया। गुड्डी के हमरा साथे जाय दी, चाची।"
बीना," लेकिन, चार पांच दिन में त परीक्षा बा, तहार लोगन के, ई बियाह शादी में का करबा।"
बिजुरी," अरे चाची बियाह एक बेर होखेला ना, उ हम दुनु के पक्की सहेली बिया। अगर हमनी के ना जाईब, त ठीक ना लागी। वइसे भी रातभर के बात बा, सुबह बिदाई जइसे हो जाई, हम गुड्डी के लेके चल आईब। रउवा चिंता ना करि।"
बीना एक पल को गुड्डी की ओर देखी, फिर बोली," एकर बाबूजी आत होइन्हे। हुनके से पूछे के पड़ी।"
तभी राजू बाल्टी से भरा दूध लेकर वहां आ पहुंचा, बिजुरी को देख बोला," अरे बिजुरी दीदी तू इँहा ई सांझ में, का बात बा?
बिजुरी भी अनजान बनते हुए बोली," तहार दीदी के लेवे खातिर आईल बानि, एगो बियाह में जायके बा। ले जाई तहार दीदी के?
राजू सकपकाते हुए बोला," हॉं, काहे ना। ले जो शादी बियाह में त सहेली सब एक साथ जाते बारि।"
बिजुरी," तहार माई मना करत बिया। समझा ना चाची के।"
राजू अंदर उत्साहित तो था,पर उत्साह पर धीरज का आवरण चढ़ा के बोला," माई, के का बताई। सब त जानते बारि, गांव घर के बियाह में त जाहि के पड़ी। माई जाय द, गुड्डी दीदी के बिजुरी दीदी संगे रही त कउनो दिक्कत नइखे।"
बीना कुछ बोलती उससे पहले ही उसके पति, धरमदेव का आगमन हुआ। उन्होंने सब सुन लिया था। आते ही उन्होंने कहा," गुड्डी, बेटी जो चल जो। लेकिन वापिस आके अब मन से पढे के बा। जा मोर गुड़िया जो।"
बिजुरी गुड्डी के साथ उसके कमरे में चली गयी। बिजुरी गुड्डी की तैयार होने में मदद करने लगी। गुड्डी ने रक्षाबंधन के दिन वाला लहँगा और चोली डाला। बिजुरी उसके बाल बनाने लगी और गुड्डी खुद मेक अप करने लगी। दोनों आधे घंटे में तैयार हो गए। आंखों में काजल, गालों पर लाली, होंठों पर लिपस्टिक, माथे पर बिंदी, पैरों में पायल, हाथों में कंगन, और इनसब पर उसका भोला मासूम खूबसूरत चेहरा। वो तो किसी हीरोइन को मात दे रही थी। शायद आज राजू से मिलने की चाह में वो खुदको और भी अधिक तैयार कर बैठी थी। बिजुरी," आय हाय गुड्डी आज त तू एकदम गुड़िया लागेलु रानी। तहार नज़र उतारे के पड़ी।" ऐसा बोलके उसने गुड्डी के कान के पीछे काला टिका लगा दिया।
गुड्डी शर्माते हुए बोली," जो गुड्डी तू त खाली मज़ाक में बात कहत बारू। हम एतना सुंदर कहां बानि ?
बिजुरी उसके गाल सहलाते हुए बोली," अरे गुड़िया रानी आज देखिहा, केतना लइका शादी में तहरा पीछे लट्टू बनिहनस।" दोनों फिर एक दूजे का हाथ थामे बाहर निकली। बाहर निकलकर गुड्डी ने राजू को खोजा तो राजू वहां नहीं था। दरअसल राजू को उसके पिताजी ने कुछ काम से भेज दिया था। गुड्डी अपने आशिक़ को अपना रूप दिखा भी ना पाई। बिजुरी उसे बोली," चल ना गुड्डी, राजू आ जाई, उ त तहरा जइसन ही बेचैन बा। अभी चल इँहा से।"
गुड्डी," लेकिन बिजुरी राजू ऊंहा आई त जाने हमनी कहां रहब, हमनी के पास मोबाइल भी नइखे। उ हमनी के खोजी कइसे?
बिजुरी उसे समझाते हुए बोली," अगर तू दुनु के प्यार सच्चा बा त, उ तहरा के हज़ार के भीड़ में भी ढूंढ ली।"
गुड्डी जिसके चेहरे पर हल्की उदासी थी और बिजुरी एक दूजे का हाथ थामे शादी वाले घर की ओर बढ़ चली।

शादी
बड़ी दूर से ही रजनी के घर से डी जे का शोर सुनाई दे रहा था। गली और सड़क पर लोगों की हलचल साफ पता चल रही थी। अभी रात के आठ बजे थे। भोजपुरी गाने बड़ी तेज़ आवाज़ में बज रहे थे। लोग बाहर सड़क से ही बिछे लंबे लाल रंग के कालीन को अपने धूल भरे जूते चप्पलों से गंदा करते हुए चले आ रहे थे। मुख्य दरवाजे पर फूलों का बहुत बड़ा चार फीट का गुलदस्ता रखा हुआ था और लोगों के ऊपर इत्र मशीनों से छिड़का जा रहा था। गुड्डी और बिजुरी अन्य सहेलियों के साथ हंसी मजाक करते हुए अंदर प्रवेश कर गयी। अंदर काफी हलचल और चहल पहल थी। कई लोग इधर से उधर आ जा रहे थे। काफी शोर था, कोई कहीं से चिल्ला रहा था तो कोई लाउडस्पीकर और साउंड बॉक्स के पास खड़ा सुन ही नहीं पा रहा था। इधर उधर लोग चाय के कप से चाय की चुस्कियां ले रहे थे। कुछ लोग समान ले जाने और ले आने में व्यस्त थे। बाहर ही शामियाने में शादी के लिए भोजन बन रहा था। रसोइए बड़ा सा पेट लेकर बड़ी बड़ी कड़ाहियाँ में करछी चला रहे थे। गुड्डी और सहेलियां सीधे अंदर रंग बिरंगी चमचमाती लाइटों से सजे रजनी के मकान के अंदर गए। वहां रजनी की मां अन्य महिलाओं के साथ रजनी में व्यस्त थी। वो लोग वहां पहुंचते ही रजनी की माँ को कहा," हमरा लोगिन के रहते रउवा ई सब करब, रउवा जाईं चाची अउर दोसर काज करि। अब हमनी आ गईल बानि, हम सब देख लेब।" रजनी की माँ उनकी ओर मुस्कुरा दी और बोली," जुग जुग जिया बिटिया, हम अउर काम देखत हईं।" वहां और भी घरेलू महिलाएं थी, जो हंसी मजाक कर रही थी। रजनी लाल जोड़े में काफी जच रही थी। सब लड़कियां आपस में मज़ाक कर रही थी और गुड्डी को सजाने में भी लगी थी।
गुड्डी बोली," रजनी तहार लहँगा बड़ा सुंदर बा रजनी आज त तू सच में परी जइसन लागेलु। चोली भी बड़ा सुंदर बा।"
बिजुरी बोली," रजनी, अभी त हमलोग ई चोली तहरा पिन्हा देत बानि, पर रतिया में जीजाजी, कहीं चोलिया फाड़ ना दे।"
रजनी उनके मज़ाक को सुन शरमा जाती और फिर पलट के उनको जवाब भी दे रही थी। पूरा माहौल खुशगवार था। पर एक चेहरा जो हंसी के पीछे बेचैनी छुपाए था, वो गुड्डी का था। उसे हर पल आज राजू का ही इंतज़ार था। वो मन ही मन ये सोच रही थी, कि कहीं राजू उसे ढूंढ ना पाए तो क्या होगा? इतना बढ़िया मौका उनके हाथ से निकल जायेगा। बिजुरी उसकी आँखों में बेचैनी देख रही थी और उसे इशारे से सब्र रखने को कह रही थी। गुड्डी उससे कुछ ना कहती और रजनी को सजाने में लग जाती।

उधर आस पड़ोस के लोग खाना खा रहे थे। रात के दस बजने वाले थे, कि पटाखों का शोर अचानक तेज हो गया। गानों का शोर भी तेज होने लगा। बारात आ चुकी थी। बारात के आगे कुछ मनचले लड़के बेतहाशा नाच रहे थे। कुछ देर बाद रजनी की माँ ने, लड़के का स्वागत किया। उसकी आरती उतारी। बाद में रजनी का भाई राजन और उसके दोस्त सब लड़के को उठाके अंदर ले गए। गुड्डी और उसकी सहेलियां वहीं पीछे खड़ी सब देख रही थी। तभी गुड्डी की नज़र एक चेहरे पर पड़ी, उसे पहचानते देर नहीं लगी कि ये वही पिंटू है, जो राखी के मेले में उसके भाई के हाथों पिट चुका था। पिंटू की नज़र भी उससे टकराई, उसने गुड्डी को देखते ही भद्दी सी मुस्कान दी। उसने बदतमीज़ी में गुड्डी को आंख भी मार दी। गुड्डी गुस्से में मुंह बना के अपनी नज़र फेर ली। एक तो राजू के इंतज़ार में, वो बेचैन थी और दूसरा ये पिंटू सिंह आज फिर आ धमका था। गुड्डी और उसकी सहेलियां वापिस, कमरे में चली गयी। पिंटू और उसके दो दोस्त भी मौका देख अंदर जाने के फिराक में थे। पर उनको अंदर जाने को नहीं मिला। वो लोग फिर किसी कोने में दारू पीने का जुगाड़ करने लगे। दारू के एक दो पेग लगाने के बाद पिंटू अपने दोस्तों से बोला," अरे उ साली माल गजब बिया, साली के चोदे में गजब के मज़ा आयी। मन त होता कि लांड घुसाके बूर फाड़ दी उ रंडी के।"
" लेकिन ओकरा चक्कड़ में पिछला बेर पिटा गईल रहलु, बिसर गइला का।" उसका दोस्त हंसते हुए बोला।
" एहीसे त उ छिनार के हमरा चोदे के बा, एतना सुंदर लइकी हम कहूँ ना देखनि हो। किस्मत आज फेर मिला दिहलस ओकरा से।"

गुड्डी बार बार बाहर झांकती जाने राजू कब आएगा। अब तो बिजुरी को भी बेचैनी होने लगी, क्योंकि ये प्लान उसीका था। योजना के अनुसार राजू को अब तक आ जाना चाहिए था। थोड़ी देर बाद जयमाला की रश्म होने वाली थी जो कि घर के सामने खाली मैदान में होनी थी। वहां एक फूलों से सजा स्टेज और दो राजा महाराजा जैसे कुर्सियां लगी थी। सामने लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। गुड्डी और उसकी सहेलियां रजनी को लेके स्टेज की ओर जा रही थी। वहां पहुंच कर सब रजनी के पीछे खड़े थे। रजनी ने दूल्हे को हार पहनाया और उसने रजनी को। फिर रजनी ने उसकी आरती उतारी। सब तरफ तालियां बज रही थी। इतने में डी जे ने भोजपुरी गाना बजा दिया। दूल्हे के दोस्त नाचने लगे। गुड्डी और उसकी सहेलियां भी गाने की धुन पर थिरक रही थी। अचानक सब नाचने लगी। सब मिलकर नाचने लगे। गुड्डी भी नाचने लगी। उस वक़्त जो गाना चल रहा था वो था," पागल बनाइबे का रे पतरकी पागल बनाइबे का तहरा देह में चुम्बक लागल छुआ के पागल बनाइबे का।" गुड्डी को इस गाने के बोल और स्टेप्स पूरी तरह याद थे। वो मस्ती माहौल में नाचने लगी। उसके डांस को सब सांसे रोक कर देखने लगे। सबकी नजर गुड्डी पर ही थी। गुड्डी के थिरकते बदन और हिलते उभारों को देखने लोगों की भीड़ जमा हो गयी। गुड्डी की सहेलियां भी पीछे नाच रही थी, पर गुड्डी के हिलते चूतड़ और चूचियाँ अलग ही कहर ढा रहे थे। गुड्डी पूरे गाने पर नाचती रही। जब गाना खत्म हुआ, तो उसकी नज़र सब ओर गयी, पर वो जिसे ढूंढ रही थी वो अब तक नहीं दिखा था।
गुड्डी अब बिजुरी की ओर देख घूर रही थी, जैसे कह रही हो कि देखो तुम्हारा प्लान फेल हो गया।" गुड्डी को बड़ी जोर से पेशाब लगी, तो उसने कुछ महिलाओं से पूछा तो सबने घर के बाहर ही, बना हुआ एक बाथरूम था, वहां जाने को कहा। गुड्डी उस ओर बिना किसी को बताए चली गयी। गुड्डी सीधे दरवाज़ा खोल अंदर लहँगा उठाई। फिर चड्डी सरकाते हुए घुटनों से नीचे ले आयी। उसके बैठते ही पेशाब का खाड़ा पानी सीटी की आवाज़ से, बूर की दीवारों से टकराते हुए झड़ने से फूट पड़ी। बूर से छुर छुड़ाते हुए बहता मूत की धार, गुड्डी के मन को शांत कर रहा था। वो दो मिनट तक ऐसे ही बैठी रही, जब तक मूत खत्म नहीं हो गया। फिर बूर को पानी से साफ कर वो उठ गई, और चड्डी पहन लहँगा को ठीक किया। वो बाहर निकली, और बाथरूम के दरवाज़े पर बनी दोनों सीढियां उतर गई कि अचानक वो पिंटू सिंह फिर उसके सामने आ गया। इस जगह रोशनी कम थी, और लोग भी कम आते जाते थे। गुड्डी उसे देख घबरा गई। पिंटू ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला," चल ना रानी, तहरा मज़ा कराईब। तहरा पर हमार दिल आ गईल बा। का नाचेलु रानी। आज त तू आग लगा देले बारू। हमार दिल के रानी बन गईल बारू।"
गुड्डी," लागत बा कि पिछला मार भूल गईलु का?
पिंटू," अरे रानी तहरा खातिर, त हम जहर खा लेब, मार कउनो बड़का बात नइखे।"
इतने में पीछे से आवाज़ आई," कउनु बात नइखे, आज फेर एक बेर मार खा ले, तू इहे लायक बारू।" गुड्डी ने बांयी ओर गर्दन झुका के देखा पीछे से राजू पिंटू के कॉलर पर हाथ रखे हुए था। गुड्डी उसे देख खुश हो गयी। राजू ने उसे दूर हटने का इशारा किया। उसने खींच के दो घूंसे और घुटने से दो लात उसके पेट पर मारी। वो वैसे ही दारू के नशे में था, वहीं बेहोश होकर गिर गया। राजू गुस्से में था वो पिंटू को और दो लात मारा और बोला," साला हरामी, तहार हिम्मत कइसे भईल कि तू एकरा छू देले, मादरचोद।" गुड्डी राजू के पास आई, और बोली," राजू छोड़ एकरा, तू कहां रह गईल रहलु। हम तहार इंतज़ार करत रही।" गुड्डी उसके गले लग गयी। राजू उसे गले लगा बोला," बाबूजी काम से भेज देले रहले, उहे में देरी हो गइल।" गुड्डी उससे बोली," हमरा ले चल इँहा से।"
राजू गुड्डी के लटों को कान के पीछे रखते हुए बोला," गुड्डी दीदी, आज रात तहार हमार जीवन के सबसे हसीन रात होई।"
तब तक बिजुरी भी आ चुकी थी। बिजुरी बोली," पहिले कुछ खा त ले, रात में ताकत के जरूरत पड़ी।" गुड्डी शरमा गयी। फिर वो गुड्डी के साथ खाने वाले शामियाने की ओर बढ़ गए। बिजुरी उन दोनों को खाने के लिए अलग कमरे में ले गयी। वो छोटा सा कमरा था, जहां कोई नहीं आता था। बिजुरी बोली," गुड्डी तू दुनु इँहा बइठ के खाना खा ले। राजू ओहहो... जीजाजी रउवा बाइक लेके आईल बानि ना। जल्दी से खाना खाई अउर निकली इँहा से।" बिजुरी ने जब राजू को जीजाजी बोला तो गुड्डी शरमा गयी। गुड्डी और राजू वहीं खाना खाने लगे। बिजुरी ने उन दोनों को दरवाज़ा लगाने को बोला। राजू ने उठके दरवाजा बंद कर लिया। उस कमरे में बस छोटी टेबल और कुर्सी लगी थी। राजू ने गुड्डी को बैठने बोला लेकिन गुड्डी ने राजू को उसपर बिठाया और खुद उसके गोद में बैठ गयी। राजू के लण्ड पर गुड्डी के गाँड़ का भारी बोझ आ गिरा। लेकिन ये बोझ हर मर्द को सुकून देता है। राजू ने गुड्डी के कमर पर हाथ रख दिया और गुड्डी उसे अपने हाथों से पूरी सब्जी खिलाने लगी। राजू गुड्डी के हाथों खाना खाने लगा। फिर उसने गुड्डी के मुंह में खाने का निवाला दिया। गुड्डी निवाला चबाते हुए बोली," राजू तू कहां रह गईल रहला, पता बा हम तहरा के केतना खोजनी हअ। जब घर पर तैयार भयनि तब से तू गायब रहला।"
राजू गुड्डी के कमर सहलाते हुए बोला," अरे गुड्डी रानी बाबूजी खाद बीज लावे हमरा भेज देने रहुवे। बड़ा जल्दी जल्दी कोशिश कइनी, तब जाके साढ़े आठ बजे अयनि। फेर अरुण से बाइक लेके आवत रहनि त गाड़ी खराब हो गइल। बड़ा मुश्किल से गाड़ी ठीक करवईनी और तब पहुंचनी।"
गुड्डी मुंह बनाके बोली," तू लेट आइलु, त हमार डांस ना देख पाइलु, राजा। तनि जल्दी आवे के चाही तहरा के।"
राजू मुस्कुराते हुए," हमका त लागत बा, हम ठीक टाइम पर पहुंच गइनी गुड्डी दीदी, ना त जाने का गजब भईल रहित।"
गुड्डी राजू के गाल सहलाते हुए," ना मोर राजा भैया तू जब तक बारू, हमरा केहू कुछ ना कर सकेले। तू हमार हीरो बारू।
राजू," अउर तू हमार हीरोइन रानी, आज के रात ई बात सोलह आना सच करब।"
गुड्डी उसकी आँखों में देखते हुए बोली," त करा ना, अब समय इँहा बर्बाद करे से कउनो फायदा ना ह राजा।"
राजू ने उसी समय गुड्डी का हाथ पकड़ा और गुड्डी के साथ चुपके से रास्ते से निकल गया। उसने गुड्डी को पिछले रास्ते पर खड़ा होने को कहा और बोला वहीं बाइक लेकर वो आएगा। गुड्डी बिजुरी के साथ पिछले रास्ते पर उसका इंतजार करने लगी। थोड़ी देर में राजू बाइक लेकर वहां पहुंच गया। बिजुरी ने गुड्डी को बाइक पर बैठने में मदद की। फिर बोली," गुड्डी, सुबह पांच बजे तक आ जहिया। अभी साढ़े दस हो रहल बा। बहुत टाइम बा। राजू जीजू हमार सहेली के ज़्यादा परेशान ना करिहा।"
राजू मुस्कुरा दिया। गुड्डी राजू के कंधे पर हाथ रख बैठ गयी। राजू ने फिर एक बार पूछा," ठीक से बइठ गईलु।"
गुड्डी ने जवाब दिया," हां।" राजू ने फिर गाड़ी भगा दी। गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगी। हवा का झोंका उन दोनों के चेहरे को छू रहा था। देखते देखते बिजुरी की नज़रों से ओझल हो चुके थे। उनकी कानों से भी शादी का शोर दूर हो गया था। गुड्डी राजू के पीछे बैठी आनेवाले लम्हों के बारे में सोच रही थी। रास्ता कोई बीस मिनट का था। दोनों चुपचाप ही थे। सफर कट गया और पता भी नहीं चला। थोड़ी देर में राजू के खेतों के बीच ट्यूबवेल वाले कमरे के बाहर दोनों खड़े थे। वहां दूर दूर तक कोई नहीं था, ये जगह रात में पूरी सुनसान होती थी। राजू ने इसीलिए ये जगह चुनी थी। राजू पहले बाइक को साइड में लगाया और फिर कमरे का दरवाजा खोला, और अंदर आ गया। राजू ने फिर गुड्डी को आवाज़ लगाई," भीतर आवा ना गुड्डी दीदी।"

गुड्डी धड़कते दिल के साथ उस कमरे में दाखिल हुई। कमरे में राजू उसका इंतजार कर रहा था। गुड्डी और राजू दोनों को इस लम्हे का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था। गुड्डी राजू के पास आकर खड़ी हो गयी। गुड्डी की ओर देख, राजू ने उसका हाथ थाम लिया। गुड्डी आज किसी परी सी लग रही थी। बिजुरी ने उसका पूरा मेक अप किया था। उसकी आँखों में काजल, गालों पर रूज, होंठों पर लिपस्टिक की लाली उसे किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती थी। गुड्डी की रेशमी काली जुल्फें लहरा रही थी। हाथों में कंगन और पैरों में पायल की आवाज़ अभी भी राजू के कानों में शोर मचा रही थी। गुड्डी और बिजुरी के नाच ने शादी में एक शमा सा बांध दिया था। राजू ने गुड्डी की जुल्फों को हाथों से ठीक करते हुए कहा," हमरा नइखे बूझल रहले, कि तू इतना बढ़िया नाचत बारू दीदी।"
गुड्डी," तू आपन दीदी पर ध्यान ना देले एहीसे, तू खाली पढ़ाई में ध्यान देत बारू। कभू जाने के कोशिश कइले कि दीदी के का बढ़िया लागेला अउर का पसंद नापसंद बा।"
राजू," दीदी, माफ कर दे, त बता रानी तहरा का पसंद बा?
गुड्डी," हमरा पढ़ाई में मन नइखे लागत, हमरा नाचे गाबे में बड़ा मजा आवेला। घर संभाले के काम में मन लागेला।"
राजू," झूठ मत बोल दीदी तहरा पढ़े में मज़ा त आवेला, हई ई कितबिया।" ऐसा बोलके उसने चुदाई की किताबें दिखाई जो वो अपने साथ यहां छुपाके रखता था।
गुड्डी वो किताबें देख शर्मा गयी। आखिर ये सारी उसकी ही किताबें थी, जो अब राजू भी पढ़ता था।
गुड्डी," राजू ई किताब पढ़े में सबके मन लागेला हो। एमे पूरा नंगा नंगा चुदाई के मस्त मस्त चित्र बा। भाई बहिन के बीच गंदा गंदा चुदाई के कहानी बा। जानत बारू एहीसे त हम तहरा प्रति आकर्षित भईल बानि। भाई बहन के बीच शारीरिक संबंध हो सकेला ई एहि कितबिया से पता लागल राजा।"
राजू," हम कभू ई ना सोचने रहनि कि तू तहरा जइसन घरेलू संस्कारी लइकी अइसन किताब पढ़त बिया अउर अइसन आपन छोट भाई के बारे में सोचत बिया। गुड्डी दीदी आज उ अधूरा काम पूरा करब जेकरा पूरा करे खातिर दुनु बड़ा दिन से इंतज़ार करत बानि।"
गुड्डी," राजू एहि खातिर त दुनु बेचैन बानि।"
राजू ने फिर अपनी जेब से, एक छोटा डब्बा निकाला उसने गुड्डी की ओर बढ़ाते हुए बोला," हमार दिल के रानी तू बानि गुड्डी दीदी, एहीसे तहरा खातिर एगो तोहफा लउनी। तहार पैर में मस्त लागी, पहन के देख।" राजू ने डब्बे से चांदी के पायल का जोड़ा निकाला और गुड्डी के हथेली में रख दिया। गुड्डी चौंक गई, क्योंकि पायल महँगे थे और राजू ने जाने कहाँ से इतने पैसे लिए थे क्योंकि वो कमाता तो था नहीं। राजू उसके चेहरे के हाव भाव पढ़ लिया था, और इससे पहले गुड्डी उससे कुछ पूछती वो खुद ही बोल पड़ा," गुड्डी दीदी, ई मत पूछिहा कि हम कहां से अउर कइसे ई लावनी। काहे कि हम तोहसे झूठ ना बोल सकेनी। बस ई समझ ल ई पायल ना हमार दिल बा।"
गुड्डी ने उसे गले लगा लिया। फिर बोली," तू खुद पिन्हा दअ हमार पैर में।" ऐसा बोल उसने लहँगा घुटनों तक उठा लिया। राजू ने उसके पैरों को अपनी जांघ पर रखा और उसके पैरों में एक एक कर पायल पहना दिया। राजू उसके पैरों को चूम लिया। गुड्डी को गुदगुदी महसूस हो रही थी, पर अपने भाई की आशिक़ी देख वो भी उसे चूम लेना चाहती थी। गुड्डी खड़ी हो गयी और राजू को अपने पैरों में सजी पायल और उसकी छन छन सुनाने लगी। गुड्डी बोली," बहुत सुंदर बा राजू, तू सच में हमरा से बहुत प्यार करेलु। हम आज तहके बहुत प्यार करब मोर करेजा।"
राजू," लेकिन उसे पहिले तहार नाच एक बेर देखब रानी जउन हमरा से छूट गईल। ई लहँगा चोली में तू त एकदम क़यामत लागत बारू। रुक गाना लगात बानि।" ऐसा कहते हुए राजू ने मोबाइल पर गाना लगाया," कूलर कुर्ती में लगा लअ कि कूलिंग करत रही।" गुड्डी ने जब ये गाना सुना त उसके होंठों पर मुस्कान तैर गयी। गुड्डी ने अपना लहँगा उठाया अउर राजू को खाट के ऊपर धक्का दे दी। राजू खाट पर बैठ गया और गुड्डी ने अपना दुपट्टा निकालके राजू की ओर फेंक दिया। वो दुपट्टा राजू के मुंह पर गिरा था। राजू ने झट से दुपट्टा सूंघते हुए गले मे लपेट लिया। उस दुपट्टे से गुड्डी की परफ्यूम की महक आ रही थी। गुड्डी अब राजू के सामने नाचने के लिए पूरी तरह तैयार थी। गुड्डी ने धुन पकड़ते ही अपनी सेक्सी कमर और हाथ हिलाना शुरू कर दिया।

होठ के लाली बह जाता हो, मेक अप कुली बह जाता हो-२
तरे तरे चुवता पसीना खोजे बेना, कब ले गर्मी से जरत रही,
गुड्डी की आंखों में एक्सप्रेशन साफ झलक रहा था, उसकी कमर और हाथ गाने की धुन के साथ ताल मिला रहे थे। होंठों पर गाने के बोल छाए हुए थे। गुड्डी की बड़ी बड़ी चूचियाँ चोली में खलबली मचा रही थी। उसका नंगा पेट और कमर हर ठुमके पर राजू के दिल पर छुरी चला रहे थे। गुड्डी की जुल्फें लहराते हुए कभी उसके बांये गाल को छूती तो कभी दांये। वो बार बार झटककर बालों को सेक्सी अंदाज़ में लहराती।

इतने में राजू गुड्डी के पास आकर कमर पर हाथ रख गाने के बोल दोहराते हुए बोला

कूलर कुर्ती में लगालआ कि कूलिंग करत रही।

राजू उसके चोली के ऊपर के खुले हिस्से में जहां चूचियाँ की गोलाई दिख रही थी वहां फूंकते हुए ये लाइन दोहरा रहा था।
राजू और गुड्डी एक दूजे के साथ चिपककर गाने की धुन पर नाचने लगे। गुड्डी खुद अपने भाई की बांहों में बांहे डाल नाच रही थी। राजू गुड्डी की कमर और पेट पर अपने हाथ फेर रहा था। गुड्डी को राजू के छुवन में अश्लीलता और वासना की झलक मिल रही थी पर, वो आज खुद उसके साथ हर हद पार करने के इरादे से आई थी। लेकिन उसके पहले वो माहौल को और भी उत्तेजक और कामुक बनाना चाहती थी, जिससे आनंद की पराकाष्ठा तक पहुंचा जा सके। राजू और गुड्डी एक दूसरे की आंखों में देख गाने की धुन पर नाच रहे थे। गुड्डी की पायल और कंगन का शोर साफ साफ सुनाई दे रहा था, जिसे सुनने को राजू बेताब था।

उखी बिखी भईल बा मनवा बहे न कवनो हवा
जरेला ऐसे देहिया जैसे जरे चुल्ही पे तवा…

गुड्डी पूरे अश्लील हाव भाव के साथ अपने बदन को ऊपर नीचे सहलाते हुए गाने के बोल दोहरा रही थी। वो अपनी चुच्ची और गाँड़ हिलाते हुए राजू को ललचा रही थी। गुड्डी के थिरकते हुए चूचियाँ और हिलते गाँड़ को देख राजू पागल सा होने लगा। वो गुड्डी के फूहर नाच पर उसके बेहद करीब आके चूतड़ों को दबोच लिया। गुड्डी ने हंसते हुए राजू के हाथ पर हाथ रख उसके सीने से अपनी चूचियाँ टकराने लगी।

ऐ हो .. चल चला रानी तू बगिएचा
चला हवा ताज़ा ताज़ा मिली
पूर्वी बयरिया झुहुर झुहुर
बही पिपरा के पतवा हिली

राजू गुड्डी को अपने गोद में उठा ये लाइन गाने लगा। गुड्डी उसकी ओर देख मुस्कुरा रही थी। फिर उसने गुड्डी को उतारते हुए उसके कान के पास फूंकते हुए आखरी लाइन गाई। गुड्डी पूरी सिहर गयी। तभी वो आगे की लाइन गाते हुए अपनी चोली को हाथों से सहलाते हुए और भद्दे इशारे करते हुए बोली,

होखे चुनचुनी बड़ा चोलिया के भीतरी
केतना पाउडर दरत रही दरत रही…
अरे दरत रही….

राजू ने फिर उसके चोली के ऊपर से उसकी चूचियाँ पकड़ ली और उसके चूचियों को दबाते हुए उसकी आँखों में झाँकके बोला.....

कूलर कुर्ती में लगा ला
कूलर कुर्ती में लगा ला की कुलिंग करत रही
कूलर कुर्ती में लगा ला की कुलिंग करत रही

गुड्डी उसके साथ अब कामुक अंदाज़ में थिरक रही थी और फिर अपनी केशुओं को झटकते हुए, अपने निचले होंठ को दांतों तले चबाते हुए कामुकता से कमर हिला रही थी। फिर उसने आगे के बोल बुदबुदाने शुरू किए जैसे ही गाने के बोल शुरू हुए.....

एक त जुल्मी गर्मी बावे ऊपर से जरता लाइट
बढ़नी मार मुवना दरजिया
सियले बा कुर्ती टाइट

अपने दोनों हाथ ऊपर उठाके पसीने से भीग चुकी बगलों से चोली भी उस जगह भीग चुकी थी, चूतड़ हिलाते हुए थिरक रही थी। राजू उसके बगलों को सूंघ कर चूम लिया और उसके ढोढ़ी ( नाभि) में उंगली डालके, उसकी नंगी कमर को मसलते हुए गाने के बोल दोहराते हुए बोला....


ऐ..हो.. आव आव धनिया हम दही
के मठा तोहरा के पिलाई दिही
हो जयेबू कूल आव नियारा
हवा गमछा से हिलाई दिही

गुड्डी अपने भाई की हरकत से सिसकारी लेते हुए बोली.....

कबले इ देह जरी जले मरकरी हई
कपरा के उपर बरत रही बरत रही..
अरे बरत रही….

कूलर कुर्ती में लगा ला
कूलर कुर्ती में लगा ला की कुलिंग करत रही
कूलर कुर्ती में लगा ला की कुलिंग करत रही

दोनों भाई बहन गाने के धीमे पड़ते संगीत के साथ साथ कमर और हाथ हिला रहे थे। गुड्डी राजू के आगे खड़ी थी, उसकी गाँड़ ठीक राजू के लण्ड से रगड़ खा रही थी। राजू उसकी कमर और पेट को दोनों हाथों से थाम खुद से चिपकाए हुआ था। गुड्डी खुद भी बेहिचक उसके साथ किसी प्रेमिका की भांति चिपकी हुई थी। उसके अर्ध तुम्बाकार से उभरे चूतड़ राजू को आमंत्रण दे रहे थे। राजू ने गुड्डी को वहीं चारपाई पर पेट के बल लिटा दिया। ऐसा करने से उसकी पीठ राजू की ओर थी। राजू ने उसकी जुल्फ़े हटा दी और उसकी चोली की डोरियां खोलने लगा। गुड्डी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया।

गाना खत्म होते ही, गुड्डी की तेज साँसों के साथ उसकी चूचियाँ भी हिल रही थी। राजू ने उसके कमर को अपने हाथों में थाम लिया था। गुड्डी ने राजू के सर को अपने उन्नत चूचियों पर रख लिया और कलेजे से लगाये थी। तब गुड्डी ने उसके बालों को सहलाते हुए बोला," राजू, कइसन लागल तहरा हमार डांस?
राजू," गुड्डी दीदी काजल राघवानी फेल बारि, तहरा सामने। अइसन छमिया जइसन नाचलु तू, कि मन तृप्त हो गइल।"
गुड्डी," आह, दीदी के छमिया कहत बारू, तहरा के लाज ना आवत बा का। बेशरम लइका हो गइल बारे तू।"
राजू," अभी बेशर्मी कहां देखले बारे तू, उ त आज रात बताईब दीदी।"
गुड्डी," अच्छा का करबू आज रात?
राजू," तू नइखे जानत बारू का, अभी तक तहरा अधूरा माफी देले बानि, पूरा ना रानी।"
गुड्डी उसकी आँखों में देखते हुए बोली," अच्छा, त कइसे मिली पूरा माफी राजा, तहार बड़ बहिन के।"
राजू ने उसकी चोली की खुली हुई डोरी को खींचते हुए बोला," पहिले चोलिया उतार फेर लहँगा, हमहुँ नंगे हो जाइब, पूरा रतिया हम अउर तू आज रात उ रतिया के काम पूरा करब। आज त तहार बूर में लांड घुसाईब गुड्डी दीदी। आज ना छोड़ब।"
गुड्डी अपनी बाजुओं से चोली उतारके फेंकते हुए बोली," हम कब कहनी, कि हमके छोड़ द। आज तहार बहिन भाई से चुदाई।" वो अपनी भवों को उठाके बोली।"
राजू ने गुड्डी की लाल ब्रा में कैद चूचियों को ऊपर से ही मसल दिया। गुड्डी के मुंह से कामुक आह और सिसकारी दोनों फूटी। उसे पता था, कि आज रात उसे इस तरह कई बार मसला जाएगा। वो खुद ही तो उसके लिए चलके आयी थी। गुड्डी ने राजू की शर्ट और बनियान उतार दी। राजू ने उसके पूरा सहयोग दिया। राजू ने गुड्डी की ब्रा के हुक खोलने को हाथ बढ़ाया तो गुड्डी ने उसके पहले ही ब्रा की क्लिप खोल दी। ब्रा की स्ट्राप खुलके ब्रा ढीली हो गयी। राजू ने ब्रा हटानी चाही तो गुड्डी ने उसके हाथ, पर थप्पड़ मार दिया। फिर गुड्डी ने ब्रा को चूचियों पर थामे, कामुक मुस्कान दी और पीछे मुड़ के अपनी नंगी गदराई पीठ उसे दिखा दी। फिर वो राजू की ओर गर्दन घुमाई और कामुक मुस्कान देते हुए, ब्रा राजू की ओर फेंक दी। राजू ने उसकी ब्रा को नाक से लगा सूंघा और होठों से लगा उसके कप को चूम लिया। कमरे की मद्धम रोशनी में भी गुड्डी के बदन से अलग ही आभा निकल रही थी। राजू ने अपनी पैंट के बेल्ट और बटन खोल अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। फिर उसकी ब्रा को लण्ड पर रगड़ने लगा। राजू को ऐसा करते देख, गुड्डी ने उसकी ओर एक उड़ता चुम्मा पेश की।
राजू," उफ़्फ़फ़फ़ हमार जान, तहार ई ऊपर अधनंगा बदन देख, हमार लांड फटअ ता। आजो हमार लांड पर अपन गाँड़ के टिका के बइठ गुड्डी दीदी।"
गुड्डी बेझिजक उल्टे ही चलते हुए, उसके पास आई। फिर लहँगा का नारा राजू की ओर करते हुए बोली," अइसन भाग हर भाई के ना होखेला, जब उ अपन दीदी के लहँगा खोलके मज़ा लेता।"
राजू ने उसके लहँगा का नारा खोल दिया और गुड्डी ने गाँड़ पर चुस्त लहँगे को उतारने लगा। पर गुड्डी की बड़ी गाँड़ में फंस सी गयी। गुड्डी ने कमर और गाँड़ हिलाके झटके देकर उसे उतारने की कोशिश की। उसकी आधी गाँड़ नंगी हो गयी, पर लहँगा अटका रहा। उसके गाँड़ की दरार राजू के लण्ड को और कड़क कर गयी। राजू ने गाँड़ की दरार में उंगली घुसा दी, और बोला," गुड्डी दीदी, लहँगा के नीचे उतारे में मदद करत बानि।" उसने गुड्डी के गाँड़ की दरार में पसीने की चिपचिपाहट, महसूस की। गुड्डी ने कहा," हे भगवान तहरा त, कपड़ा भी उतारे नइखे बूझल राजू, अरे हमार चूतड़, बड़ा बा, तनि धीरे से आराम से दुनु साइड से पकड़ के घिंचा।"
राजू ने फिर मजबूर हो, उंगली निकाल ली और गुड्डी के लहँगे को पकड़ खींचने लगा। थोड़ी मसक्कत के बाद, गुड्डी का लहँगा उसके पैरों में था। गुड्डी अब राजू के सामने अपने अधनंगे चूतड़ों की नुमाइश कर खड़ी थी। उसने राजू की दी हुई चड्डी ही पहनी थी, जो उसके चूतड़ के निचले हिस्से को ही ढक पा रही थी। इस समय करीब तीन चौथाई, चूतड़ नंगे होकर अपनी ओर आमंत्रण दे रहे थे। राजू ने गुड्डी की ओर देखा और गुड्डी ने राजू की ओर। दोनों की नजरें मिली, राजू जैसे आंखों से बोल रहा हो, कि ये चड्डी भी उतार दूं क्या? गुड्डी की आंखों की मौन सहमति पाकर राजू ने उसकी चड्डी एक साथ इलास्टिक पकड़ उतार दिया। गुड्डी के पैरों में पड़ी चड्डी, अपनी किस्मत पर रो रहा था, थोड़ी देर पहले तक वो गुड्डी की बूर और गाँड़ से चिपका था और अब उसके पैरों में पड़ा था। गुड्डी ने पहले दांया और फिर बांया पैर उठाके चड्डी तलवों से निकाल फेंकी। एक बहन अपने भाई के सामने सब कुछ लुटाने को पूरी नंगी हो चुकी थी। राजू ने अपनी पैंट और चड्डी उतार दी। गुड्डी ने उसकी ओर देखा वो भी पूरा नंगा हो चुका था। अब उन दोनों के बीच ना कोई लोग, ना कपड़ा और ना रिश्ते का बंधन था, थी तो बस एक दूसरे के तड़पते जिस्मों को प्राप्त करने की कामना। दोनों ने एक दूसरे की आंखों में देख अपने अंदर की कामुक इच्छाओं की चिंगारी सुलगा दी। राजू ने गुड्डी के करीब आ उसका हाथ उसके चूचियों से हटा दिया। गुड्डी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया।
राजू ने गुड्डी को अपनी बांहों में उठाके, खटिया की ओर चल दिया।
 
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