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Adultery शीला की लीला -५५ साल की शीला की जवानी (Completed)

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SONU69@INDORE

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वाखरिया भाई बहुत मस्त अपडेट हैं अब तो कविता भी रसिक का मोटा लण्ड को देखना चाहती हैं और देखने के बाद अपनी चूत में भी लेगी मस्त मज़ा आएगा।

वाखरिया भाई आप के इस अपडेट में बताया की कविता ने शिला को रसिक के साथ देख लिया और सवाल जवाब भी किये लेकिन वखरिया भाई कविता तो बहुत पहले ही देख चुकी थी शिला को रसिक के साथ

(पेज १५ पर जो अपडेट दिया हैं जिसमे शिला पहले जीवा और रघु से चुदती हैं फिर रसिक आता हैं तभी कविता भी आती हैं कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था..!! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया..और अपने घर में वापिस आकर अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

बाकि तो मस्त हैं
 

Dirty_mind

Enjoy sex without considering color, age or taboo
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उसके दो मटकियों जैसे बड़े स्तन देखकर तीनों की आँखें फटी की फटी रह गई..
रूखी ने मौसी के घाघरे के नाड़ा खींच निकाला.. और मौसी को नीचे से नंगा कर दिया.. शर्म से पानी पानी हो रही अनुमौसी अब कुछ विरोध नहीं कर सकी क्योंकी उन्होंने खुद ही सहमति दी थी। शीला और रेणुका ने रूखी का एक एक स्तन आपस में बाँट लिया और निप्पल चूसने लगी.. चूसते हुए उन्होंने रूखी का घाघरा उतारकर उसे पूरा नंगा कर दिया.. पूरा कमरा सिसकियों से गूंज रहा था..

तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. शीला ने तीनों को चुपके से बेडरूम में घुस जाने को कहा.. अपने कपड़े ठीक किए और दरवाजे के की-होल में से बाहर देखने लगी.. एक हाथ से ब्लाउस के हुक बंद करते हुए उसने देखा तो बाहर जीवा और रघु खड़े थे.. शीला ने तुरंत दरवाजा खोल दिया और दोनों को अंदर खींचकर तुरंत बंद कर दिया। जीवा और रघु दोनों को बारी बारी बाहों में लेकर शीला ने उन्हे चूमते हुए उनके लंड दबा लिए..

"कहाँ मर गए थे तुम दोनों?? कितना याद करती थी मैं तुम्हें?" जीवा और रघु शीला के स्तनों को ऊपर से मसल रहे थे

जीवा: "अरे भाभी.. आपको तो रोज याद करते हुए मैं लंड हिलाता हूँ.. हम इंतज़ार में थी की आप कब बुलाती हो.. पर आपने तो कभी कॉल ही नहीं किया.. इसलिए फिर मैंने रूखी से बोलकर यहाँ आपके घर मिलने का तय किया"

"चलो कोई बात नही.. आज पूरा दिन आराम से यहीं रहना है तुम दोनों को.. और मेरी सहेलियों को भी चोदना है.. बहुत गरम हो रही है सब की सब.. मेरी तरह.. तुम दोनों आज बेझिझक मजे करो यहाँ.. और हाँ.. उन सहेलियों में.. एक अनुमौसी नाम की बूढ़ी रांड भी है.. उसे बहुत खुजली है लोडा लेने की.. आज उसके बूढ़े भोसड़े की धज्जियां उड़ा देनी है.. समझे.. !!!"

रघु: "अरे भाभी.. बुढ़िया को क्यों बुलाया.. कोई कडक जवान माल हो तो बताओ.. बुढ़िया के ढीले भोसड़े में भला क्या मज़ा आएगा??"

शीला: "अबे भोसडी के.. जितना कहा गया है उतना कर.. ज्यादा ज्ञान मत चोद.. समझा.. वरना गांड पर लात मारकर घर के बाहर फेंक दूँगी.. और सुन.. आज के दिन अगर तेरा लंड मुरझाया.. तो समझ लेना.. तेरी मर्दानगी की नीलामी करवा दूँगी.. " कहते हुए शीला ने दोनों की चैन खोलकर उनके लंड बाहर निकाले.. बाम्बू की तरह सख्त डंडे शीला को सलामी देने लगे..

दो दो तगड़े लंड देखते ही शीला के तो मजे हो गई.. वह घुटनों के बाल बैठी गई और एक के बाद एक दोनों लंड को प्यार से चूसने लगी.. अपनी लार से लसलसित कर दोनों लंड को ऐसे लाचार कर दिया जैसे महीने के आखिरी दिनों में तनख्वाह की प्रतीक्षा करता कर्मचारी लाचार होता है। उन दोनों ने शीला को मादरजात नंगा कर दिया और उसके बबले दबाने लगे.. कामातुर शीला खड़ी हो गई.. जीवा और रघु के लंड को हाथों से पकड़कर खींचते हुए बेडरूम तक ले गई.. दो अनजान नंगे मर्दों को देखकर.. अनुमौसी को फिरसे शर्म का अटैक आ गया..

रेणुका जीवा के मजबूत और विशाल लंड को ललचाई नज़रों से देख रही थी.. वाह.. क्या लंड है यार!! मेरे पति के लंड से तीन गुना लंबा और मोटा है.. इतना बड़ा मेरी चुत के अंदर कैसे जाएगा भला.. !!

रूखी के स्तनों को सहलाते हुए मौसी ने अपनी चुत पर भी हाथ फेरना शुरू कर दिया था.. शीला जब बाहर के कमरे में जीवा और रघु के लंड की चुसाई करते हुए तैयार कर रही थी.. उस दौरान बेडरूम में रेणुका और रूखी ने अनुमौसी को चूम चाटकर बेहद गरम कर दिया था। रेणुका ने मौसी की झांटों भरी भोस पर जीभ फेरते हुए मौसी की वासना को तीव्रता से भड़का दिया था..

जीवा अनुमौसी के पास गया और उनको कंधों से पकड़कर नीचे बिठाया.. अपना मुसलदार लंड मौसी के मुंह के आगे झुलाने लगा.. इतना विकराल लंड देखकर अनुमौसी को एक पल के लिए चक्कर सा आ गया.. रूखी ने रघु का लंड मुठ्ठी में भर लिया.. और उसका लाल सुपाड़ा रेणुका ने मुंह में ले लिया.. रूखी के स्तनों से दूध टपकने लगा था.. जीवा ने जबरदस्ती अनुमौसी का मुंह खुलवाया और अपना लंड अंदर घुसाने लगा.. मौसी भी पूर्ण तरीके से उत्तेजित हो चुकी थी.. और समझ भी गई थी की अगर वो शरमाती रही तो उनका ही भोसड़ा भूखा रह जाएगा.. भाड़ में जाएँ सारी शर्म.. इधर भोस में आग लगी हो तब काहे की शर्म!!

अनुमौसी ने जीवा के लंड का अपने मुंह में स्वागत किया और लगातार २० मिनट तक चूसती ही रही.. इतना रसीला लंड उन्होंने पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा था.. बहोत भूखी थी बेचारी.. जीवा को तो मज़ा ही आ गया.. तभी रघु भी वहाँ आ गया और अनुमौसी के गाल पर अपना लंड थपथपाने लगा.. उफ्फ़.. एक साथ दो दो लंड सामने आ जाने से मौसी ने अपनी गांड उचक कर जांघों को भींच दिया.. जीवा का लंड मुंह से बाहर निकाला.. और बोली "उफ्फ़ शीला.. अब कुछ कर मेरा.. नीचे आग लग गई है.. रहा नहीं जाता.. उईई माँ.. ऐसे लंड मैंने जीवन में पहली बार देखे है.. हाय... आह्ह!! ऊपर वाला भला करे तेरा शीला.. के तूने मुझे आज.. " आगे के शब्द निकले ही नहीं मौसी के मुंह से

शीला ने पास पड़ा प्लास्टिक का झाड़ू उठाया और उसका हेंडल पीछे से अनुमौसी की भोस में घुसेड़ दिया..

"ऊहह माँ.. क्या डाल दिया तूने अंदर.. घोड़े के लंड जितना मोटा है ये तो.. पर अच्छा लग रहा है.. कुछ तो गया अंदर.. उस कमीने चिमनलाल के तीली जैसे लंड के मुकाबले लाख गुना अच्छा है.. आहह.. डाल जोर से शीला.. और जोर से आहह.. आह्ह.. आहह.. " रेणुका की चुत में तीन उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर करते हुए, अनुमौसी अपने भोसड़े में घुसे झाड़ू का पूरा आनंद लेने लगी.. रेणुका भी इस अंगुली-चोदन से मस्त हो गई.. और जीवा के आँड मुठ्ठी में पकड़कर दबाते हुए झुकी.. और अनुमौसी के दाने को चूम लिया.. "आह्ह रेणुका.. मज़ा आ गया.. ऐसा मज़ा तो ५० वर्ष के जीवन में पहली बार आया.. ओहहह!!"

जीवा ने अनुमौसी को बिस्तर पर सुला दिया.. उनके भोसड़े से झाड़ू निकाला.. उनके दोनों पैर अपने कंधों पर ले लिए.. और उनके ढीले भोसड़े के सुराख पर अपना तगड़ा लंड का सुपाड़ा रखकर एक जबरदस्त धक्का दिया.. मौसी का पूरा भोसड़ा एक ही पल में जीवा के लंड से भर गया.. जैसे बोतल के छेद में ढक्कन घुसेड़कर बंद कर दिया हो.. मौसी की बूढ़ी चुत ने पहली बार इतना बड़ा आकार अपने अंदर महसूस किया था..

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"ओ माँ.. शीला.. इसे बोल की बाहर निकाल दे.. बाप रे.. मुझे नहीं करवाना है.. छोड़ दो मुझे.. हाय मर गई मैं तो.. मेरा दिमाग खराब हो गया था जो मैं इधर आई.. छोड़ दे मुझे हरामी.. " पर जीवा कहाँ सुनने वाला था.. !! अनुमौसी की उसने एक ना सुनी.. और तेज गति से लंड के धक्के लगाने लगा..

दूसरी तरफ रघु रेणुका को घोड़ी बनाकर पीछे से शॉट लगा रहा था.. रेणुका ऐसे ही मजबूत लंड को तरस रही थी.. रघु के लंड से चौड़ी हो चुकी उसकी चुत के खुशी का कोई ठिकाना न था.. उसके मस्त बोबले, लंड के धक्कों के साथ, लयबद्ध तरीके से हवा में झूल रहे थे.. इस दौरान शीला और रूखी 69 पोज़िशन में एक दूसरे की चुत चाट रहे थे.. दूसरी तरफ जीवा अनुमौसी की घमासान चुदाई करते हुए उनके लटके हुए स्तनों को आटे की तरह गूँद रहा था.. अद्भुत काम महोत्सव चल रहा था शीला के बेडरूम में.. रूखी के विशाल स्तनों से दूध की धराएं शीला के पेट पर टपक रही थी.. वही दूध शीला की चुत की फांक से गुजरकर बिस्तर पर पड रही थी

अपने यार जीवा द्वारा की जा रही जबरदस्त चुदाई को देखकर रूखी खुश हो गई.. जीवा के देसी विकराल लंड की ताकत पर ये शहरी औरतें आफ़रीन हो गई थी.. कुतिया बनकर रघु से चुदवा रही रेणुका को देखकर.. जीवा से चुद रही मौसी और गरम हो रही थी.. रेणुका की गीली पुच्ची में रघु का लंड ऐसे अंदर बाहर हो रहा था जैसे ऑइल लगे इंजन में पिस्टन आसानी से अंदर बाहर होता है.. इतना अवर्णनीय आनंद रेणुका ने पहली बार महसूस किया था.. उसका भोसड़ा तृप्त होता जा रहा था.. जीवा मौसी के भोसड़े में इतनी तेजी से अंदर बाहर कर रहा था की लगता था कभी चिंगारियाँ निकालने लगेगी..

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शीला के मुंह से अपनी चुत झड़वाकर रूखी खड़ी हो गई.. और रघु से घोड़ी बनकर चुद रही रेणुका के मुंह में बारी बारी से दोनों निप्पल देकर.. अपना दूध मुफ़्त में पिलाने लगी.. और अपने स्तनों का भार हल्का करने लगी.. शीला अपनी क्लीनशेव चुत को रूखी के पुरातत्व खाते के किसी अपेक्षित अवशेष जैसी.. काले झांटों से भरपूर भोसड़े पर रगड़ने लगी.. दोनों की क्लिटोरिस एक दूसरे से रगड़ खाते हुए जबरदस्त आनंद दे रही थी.. साथ ही साथ शीला अपने अंगूठे से रूखी की क्लिटोरिस को घिस रही थी..

शीला की गुलाबी निप्पल को मुंह में लेकर काटते हुए रूखी ने अपनी असह्य उत्तेजना की घोषणा कर दी.. पूर्ण उत्तेजित स्त्री को देखना.. अपने आप में एक बड़ा अवसर है.. अनुमौसी ने पहली बार दो स्त्रियों को इस तरह संभोगरत देखा था.. अब तक वो यही सोचती थी की चुत की आग या तो लंड से बुझती है या फिर मूठ लगाने से.. !! दो स्त्री आपस में भी अपनी आग बुझा सकती है इसका उन्हे पता ही नहीं था.. सालों से एक ही भजन आलाप रही अनुमौसी को आज एक नया राग मिल गया..

मौसी दो बार झड़ चुकी थी.. उनकी विनती पर जीवा ने अपना लंड बाहर निकाला.. वो अबतक झड़ा नहीं था.. चुदकर तृप्त हो चुकी मौसी ने शर्म त्याग कर रूखी के नंगे स्तन को पकड़कर दबाया.. रूखी ने मौसी के हाथ को और जोर से अपने स्तन के साथ रगड़कर उनका दूसरा हाथ अपनी चुत पर रखवा दिया.. रूखी का "अत्यंत ज्वलनशील" भोसड़ा.. चुत की गंध वाला प्रवाही छोड़ने लगा था.. अनुमौसी की चुत ठंडी हो चुकी थी.. वो गरम सांसें छोड़ते हुए अपना भूतकाल याद कर रही थी.. इतने लंबे वैवाहिक जीवन में, चिमनलाल ने कभी उन्हे ऐसे तृप्त नहीं किया था.. चिमनलाल से वो इस कदर परेशान थी की मन ही मन नफरत करने लगी थी.. तंग आ गई थी..

जीवा और रघु ने अब रेणुका को रिमांड पर ले रखा था.. नए बॉलर को जिस तरह निशाने पे रखकर बल्लेबाज छक्के लगाता है.. उसी तरह जीवा और रघु ने रेणुका को इतनी बेरहमी से चोदा की रेणुका पस्त हो गई.. मदमस्त हो गई.. जीवा के प्रत्येक धक्के से रेणुका सातवे आसमान पर उड़ने लगती थी.. उसके गोरे गोरे बोब्बे को अपने खुरदरे मर्दाना हाथों से रघु मसल रहा था.. उस दौरान जीवा अपने गन्ने जैसे लंड से रेणुका की चुत का भोसड़ा बना रहा था.. शीला और रूखी, जीव और रघु के दमदार लंड को बड़े ही अहोभाव से देख रही थी.. वह दोनों एक दूसरे के आलिंगन में लिपटकर अपनी चुत खुजा रही थी..

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जीवा के दमदार धक्कों से रेणुका अनगिनत बार स्खलित हो गई थी.. जितनी बार वो स्खलित होती तब वह अपनी कमर को बिस्तर से एक फुट ऊपर उठा लेती.. और तभी जीवा रेणुका की कमर को मजबूती से पकड़कर बिस्तर पर फिर से पटक देता और चोदना जारी रखता.. अपनी मर्दानगी का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए.. जीवा अपने अजगर जैसे लंड को रेणुका की चुत में अंदर बाहर करते ही जा रहा था.. रेणुका की चुत और जीवा का लंड ऐसे उलझ गए थे जैसे प्रकृति ने उनका निर्माण एक दूसरे के लिए ही किया हो.. रेणुका की कराहें और सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंज रही थी.. मदमस्त होकर रेणुका जीवन के सबसे बेहतरीन आनंद को महसूस कर रही थी.. उसकी हरेक सिसक कामुकता से भरपूर थी..

रेणुका: "ओह्ह जीवा.. मर गई मैं तो.. मज़ा आ गया.. लगा धक्के.. आह्ह उहहह.. ऊई माँ.. ओह्ह शीला.. आज तो मैं धन्य हो गई.. यार.. कितने सालों से मैं ऐसा ही कुछ ढूंढ रही थी.. जबरदस्त है तेरा लंड जीवा.. अंदर तक ठोकर मार रहा है.. उहह उहह.. "

रघु के लंड को लोलिपोप की तरह चूस रही थी मौसी.. शीला और रूखी अपने बलबूते पर ही दो-तीन बार झड़ चुकी थी.. चुद रही रेणुका खुद ही अपने स्तनों को ऐसे मरोड़ रही थी जैसे उन्हे जिस्म से अलग कर देना चाहती हो.. जीवा "पच्च पच्च" की आवाज के साथ कातिल धक्के लगाता जा रहा था.. रेणुका फिर से किनारे पर पहुँचने वाली थी.. अब तो उससे स्खलन भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था.. अपने हाथ फैलाकर उसने जीवा के कंधों को पकड़कर अपनी ओर खींच लिया और उसे चूमने लगी.. रेणुका के होंठ चूसते हुए जीवा ने अपनी मजबूत बाहों में भरकर रेणुका को बिस्तर से उठा लिया.. चुत को लंड में घुसाये रखा

जीवा का ये बाहुबली प्रदर्शन देखकर.. रूखी, अनुमौसी और शीला की आह्ह निकल गई..

अनुमौसी: "बाप रे.. देख तो शीला.. इसने तो रेणुका को उठा लिया.. और खड़े खड़े नीचे से पेल रहा है.. इसका लंड तो जिसे मिल जाए उसका जीवन सार्थक बन जाएँ.. सांड जैसी ताकत है इसमें.. देखकर मुझे फिरसे नीचे खुली होने लगी है"

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रेणुका ने अपने दोनों पैरों को जीवा की कमर के इर्दगिर्द लपेट लिया.. चौड़ी चुत में जीवा का लंड अंदर बाहर हो रहा था.. जीवा का आधा लंड अंदर और आधा बाहर था.. जीवा ने रेणुका के कूल्हों को मजबूती से पकड़कर संतुलन बनाए रखा था.. रेणुका की चुत इतनी फैल चुकी थी की हाथ की मुठ्ठी भी आसानी से अंदर चली जाएँ.. जीवा के हर धक्के के साथ रेणुका की चुत का रस जमीन पर टपक रहा था... रेणुका ने अपने दोनों हाथ जीवा की गर्दन पर लपेट लिए थे.. और जीवा के होंठ कामुक अंदाज में चूसते हुए नीचे लग रहे धक्कों का आनंद ले रही थी.. जीवा की छाती से दबकर उसके दोनों स्तनों बगल से झाँकने लगे थे.. जीवा के इस रौद्र स्वरूप को देखकर उत्तेजित हो चुकी शीला और रूखी ने अनुमौसी के भोसड़े पर हमला कर दिया..

रेणुका को उठाकर चोदते हुए जीवा पूरे कमरे में यहाँ वहाँ घूम रहा था.. इतना ही नहीं.. वो चलते चलते किचन में आया.. और मटके से लोटा भरकर पानी निकालकर पीने लगा.. ये सबकुछ वो रेणुका को चोदते हुए ही कर रहा था.. किचन के प्लेटफ़ॉर्म पर पड़ी सब्जियों की टोकरी से जीवा ने एक खीरा उठाया.. और उसे रेणुका की गांड के छेद पर रगड़ने लगा.. रेणुका के दोनों चूतड़ पूरे फैल चुके थे.. खीरा गांड के छेद पर रगड़ते हुए जीवा रेणुका को लेकर वापस बेडरूम में आ गया.. शीला, रूखी और मौसी.. इस रोमांचक फाइनल मेच को देख रहे थे.. जीवा जिस तरह से रेणुका को उठाकर चोद रहा था.. ये अनुमौसी को बेहद पसंद आ गया.. एक बार जीवा से इसी तरह चुदवाने का मन बना बैठी वो..

अनुमौसी खड़े खड़े एकटक जीवा-रेणुका की चुदाई देख रही थी.. तभी रघु चुपके से उनके पीछे गया..उनके चूतड़ फैलाये और अपनी जीभ उनके छेद पर फेर दी..

"उईई माँ.. " मौसी और कुछ नहीं बोली.. रघु ने उनकी गांड से लेकर चुत तक चाटना शुरू कर दिया.. अनुमौसी का शरीर इस चटाई से कांपने लगा था.. रघु आसानी से चाट सके इसलिए वो थोड़ा सा झुक गई.. इसी के साथ रघु की जीभ ने मौसी की गांड में एंट्री मार दी.. जीभ के कुरेदने से मौसी को खुजली होने लगी.. और उन्होंने अपनी तीन उँगलियाँ अपनी चुत में रगड़ना शुरू कर दिया..

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"आह्ह.. ओह्ह.. हाँ रघु.. वही पर.. जरा दाईं तरफ.. हाँ वही.. उईई.. चाट मेरी.. आह्ह रघु.. " रघु उनके चूतड़ों को और फैलाकर जितना हो सकता था उतने अंदर अपनी जीभ घुसाता गया.. उत्तेजीत मौसी ने अपने शरीर को थोड़ा सा और झुकाया.. आज का दिन मौसी के लिए सबसे यादगार दिन बन रहा था..

रेणुका को अपने अलग अंदाज में उछाल उछालकर चोद रहे जीवा ने लंड की साइज़ का खीरा रेणुका की गांड के अंदर घुसाने की कोशिश की.. और बेरहमी से आधा खीरा अंदर घुसा दिया.. रेणुका को इतना दर्द हुआ की वो चिल्लाने लगी.. उसकी चीख को रोकने के लिए जीवा ने उसके होंठों पर अपने होंठ दबाकर उसे चुप करा दिया.. और इशारे से अपनी प्रेमीका रूखी को करीब बुलाया.. अपने स्तन और कूल्हें मटकाती हुई बड़ी ही मादक चाल से चलती रूखी जीवा के करीब आई और रेणुका तथा जीवा दोनों के कूल्हों को सहलाने लगी..

जीवा: "यार रूखी..तू इसकी गांड में उंगली करते हुए मेरे आँड चूस दे.. तेरी मदद के बगैर मेरा लंड झड़ने नहीं वाला.. " वो फिरसे रेणुका के होंठ चूसने लगा

अचानक अनुमौसी चीखने लगी "नहीं नहीं.. मर गई दर्द से मैं तो.. आहह शीला.. तू बोल ना इसे की मेरी गांड से निकाल ले.. मुझे पीछे नहीं करवाना.. बहोत दर्द होता है मुझे.. " सबकी नजर अनुमौसी की ओर गई.. रघु ने झुककर खड़ी मौसी की गांड में एक ही धक्के में अपना लंड घुसा दिया था.. मौसी को दिन में तारे नजर आने लगे.. रघु ने मौसी का जुड़ा खोल दिया और उनके लंबे बालों को खींचकर उन्हे पकड़ रखा था.. मौसी हिल भी नहीं पा रही थी.. रघु ने जोर से बालों के ऐसे खींचा की अनुमौसी की गर्दन ऊपर हो गई और उनकी चीख गले में ही अटक गई.. मौसी अब पूरी तरह से रघु की गिरफ्त में थी.. घोड़ी कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो.. लगाम खींचते ही काबू में आ ही जाती है.. अनुमौसी को पता चल गया था की रघु अपनी मनमानी करके ही रहेगा..

मौसी गिड़गिड़ाने लगी.. "रघु.. प्लीज.. निकाल दे बाहर.. दर्द से मरी जा रही हूँ.. हाथ जोड़ती हूँ तुझे.. आगे के छेद में जितना मर्जी डाल ले तू.. पर पीछे मत कर.. जलन हो रही है.. दया कर मुझ पर.. "

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मौसी का ये हाल देखकर शीला उनके करीब आकार नीचे बैठ गई.. पहले उसने मौसी के होंठ चूम लिए.. और उनके लटक रहे नारियल जैसे स्तनों को दबाने लगी.. ग्लाइकोड़ींन पीने से जैसे खांसी बंद हो जाती है.. वैसे ही शीला की हरकतों से मौसी शांत हो गई.. शीला ने मौसी की ऐसी खास जगहों पर स्पर्श किया की मौसी सिहरने लगी.. रघु मौसी की गांड में लंड घुसेड़कर ठुमक रहा था.. धक्कों से मौसी की गांड चौड़ी हो गई थी.. अब उनका दर्द काम होने लगा..

मौसी: "शीला.. मेरी चूचियाँ भी चूस दे थोड़ी सी" शीला को मौसी के पिचके हुए स्तन चूसने का बिल्कुल मन नहीं था.. बिना रस के आम कौन चूसेगा भला!! फिर भी शीला ने उनकी निप्पलों को मुंह में लेकर "बच बच" की आवाज के साथ चूसना शुरू कर दिया..

रूखी अपने प्रेमी के खूंखार लंड से चुद रही रेणुका की भोस को बड़े ही गर्व से देख रही थी.. जीवा के आँड को चूसते हुए.. रसिक के लंड से मोटे खीरे को रेणुका की गांड में डालती जा रही थी.. रूखी को रेणुका की गांड मारने में बड़ा ही मज़ा आ रहा था.. उसने खीरे को एक बार अपनी चुत पर भी रगड़कर देख लिया.. बहोत मज़ा आया.. आज घर जाकर ये प्रयोग जरूर करूंगी.. रूखी ने शीला को अपने पास बुलाया.. और रेणुका की गांड से निकली हुई ककड़ी उसकी चुत में दे मारी..

अनुमौसी की गांड फाड़ कर थक चुका रघु.. अपना लंड खींचकर.. रूखी की चुत पर टूट पड़ा.. मौसी बेचारी अपनी गांड बचाकर दूर भाग गई.. बड़ी मुश्किल से लँगड़ाते हुए चल आ रही थी मौसी... वो कपड़े पहनकर दूर बैठी ये चुदाई का भव्य खेल देखने लगी.. उनकी चुत और गांड दोनों ठंडे हो चुके थे.. और इस उत्सव से उन्होंने इस्तीफा देते हुए वी.आर.एस ले लिया था..

दर्शक बनकर बैठी मौसी.. बाकी बचे बल्लेबाजों के फटके देख रही थी.. उनकी सांस अब भी फुली हुई थी.. बेचारी मौसी!!! लेकिन शीला की मदद से उनके चुदाई जीवन को चार चाँद लग गए थे इसमें कोई दो राई नहीं थी..

रेणुका की हालत देखकर मौसी सोच रही थी.. "कितनी गर्मी है साली की चुत में!! इस जालिम जीवा के खूंखार लंड से चुद रही है फिर भी थकने का नाम नहीं ले रही.. वैसे रघु का लंड भी कुछ कम नहीं है" सभी प्रतिभागियों की क्षमता का पृथक्करण कर रही थी मौसी.. जीवा और रघु के लंड पर तो वो अब निबंध लिख सकती थी.. एक पल के लिए उन्हे ऐसा विचार आया की अगर जीवा और रघु को वियाग्रा की गोली खिला दी जाए और उनके लंड पर जापानी तेल की मालिश की जाएँ.. तो क्या होगा? बिना किसी मदद के भी उन्होंने मेरी गांड फाड़ दी.. अगर इन्हे गोली खिलाकर तेल लगाकर चुदवाएं तो ये दोनों माँ चोद देंगे मेरे भोसड़े की.. सीधा एम्बुलेंस से अस्पताल जाने की नोबत आ जाएँ.. गांड और चुत को टाँकें लगाकर सिलवाना पड़ जाएँ.."

रेणुका का काम तमाम हो गया.. आखिरी कुछ धक्कों ने तो उसे लगभग रुला दिया था.. रेणुका की चुत पर ऐसे भयानक प्रहार पहली बार हुए थे.. जीवा को ऐसी टाइट कडक चुत मिलने पर वो भी दोहरे जोर से धक्के लगा रहा था.. जब तक रेणुका उत्तेजित थी तब तक उसे मज़ा आ रहा था.. पर अब ५-६ बार स्खलित हो जाने के बाद उसे दर्द होने लगा था.. चुत भी जल रही थी.. पेट भर जाने के कोई जबरदस्ती खिलाएं और जो हाल होता है वही हाल रेणुका का हो रहा था.. जीवा के लंड के प्राहर अब उसे आनंद के बजाए पीड़ा दे रहे थे

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"ओहह ओहह आह्ह मर गई.. बस बहोत हुआ जीवा.. मेरा हो गया.. अब निकाल ले बाहर.. बस अब ओर नहीं.. मेरे पेट में दर्द होने लगा है.. मैं झड़ चुकी हूँ.. धीरे धीरे.. ओ माँ.. स्टॉप ईट जीवा.. शीला.. इससे कहों के बाहर निकाले.. " रेणुका की हालत बद से बदतर होती जा रही थी.. जीवा किसी खूंखार जंगली जानवर की तरह रेणुका की सारी बातें अनसुनी कर बेरहमी से चोदता ही गया.. रेणुका का नंगा बदन चुदते चुदते पसीने से तरबतर हो गया था..

अनगिनत बार झड़ जाने के बाद भी रेणुका को जीवा ने नहीं छोड़ा.. अंत में उसे बिस्तर पर पटक दिया और अपना मूसल लंड बाहर खींच लिया.. खतरनाक धक्के खा खा कर रेणुका की हालत खराब हो गई.. थोड़ी देर आराम करने के बाद उसकी सांसें ठीक हुई.. वासना का तूफान शांत हो गया.. रेणुका अब चुपचाप मौसी के पास आकर बैठ गई.. अब रूखी-शीला और जीवा-रघु के बीच घमासान चल रहा था

शीला और रूखी की हवस तो मौसी और रेणुका के मुकाबले कई ज्यादा थी.. रघु शीला को उलटी लिटाकर उनकी चुत को धमाधम चोदते हुए पावन कर रहा था.. इस दौरान अनुमौसी चुपके से अपने घर चली गई..

शीला और रूखी की हवस को देखकर रेणुका स्तब्ध हो गई.. रूखी का देसी कसरती शरीर का सौन्दर्य उसे प्रभावित कर गया.. तो दूसरी तरफ शीला की गोरे खंबे जैसी जांघें.. पुष्ट पयोधर मदमस्त स्तन.. सपाट गोरी और दागरहित पीठ.. लचकदार कमर.. और मटके जैसे कूल्हें..

रेणुका ने नीचे हाथ फेरकर अपनी चुत के हालचाल चेक किए.. कहीं ज्यादा नुकसान तो नहीं हुआ ना!! जीवा ने तो आज हद ही कर दी.. ऐसे भी भला कोई चोदता है.. !! रूखी अब जीवा का काले सांप जैसा लंड चूस रही थी.. देखकर ही रेणुका के पसीने छूट गए.. बाप रे.. इतना बड़ा लिया था क्या मैंने !!!

शीला रघु के लंड से फूल स्पीड में चुद रही थी.. "आह्ह रघु.. बहोत मज़ा आ रहा है.. और जोर से.. शाबबास.. वाह मेरे राजा.. क्या ताकत है तेरी.. मस्त धक्के लगा रहा है.. ओह.. फाड़ दे मेरी चुत.. आहह आहह.. ओर जोर से ठोक.. उहह उहह.. और तेज.. जल्दी जल्दी.. हाँ हाँ.. वैसे ही.. आहह आह्ह.. मैं झड़नेवाली हूँ.. रुकना मत.. आह्हहह आह्ह आईईईईईई.. !!!!" शीला झड गई

शीला: "मेरा पानी निकल गया और तू अब तक नहीं झड़ा रघु??"

रघु: "भाभी.. आज गांड नहीं मारने दोगी क्या??" कहते हुए रघु ने शीला की गांड में उंगली डालकर हिलाया

शीला: "नहीं रघु.. आज नहीं.. आज तो भोस को ही तृप्त करना है.. गांड मरवाने का मूड नहीं है मेरा"

"रघु.. तुम मेरी गांड मार लो" जीवा का लंड चूसते हुए रूखी ने कहा

रघु शीला के शरीर से उतरकर रूखी के पास गया.. घोड़ी बनकर जीवा का लंड चूस रही रूखी के चूतड़ों को हाथ से चौड़ा किया.. रूखी के सुंदर अंजीर जैसे गांड के छेद पर अपना गरम सुपाड़ा रख दिया.. रूखी ने एक पल के लिए जीवा का लंड मुंह से निकालकर कहा "आहह.. कितना गरम है तेरा लंड रघु.. अंगारे जितना गरम लग रहा है पीछे.. थोड़ा सा थूक लगाकर डालना.. सुख मत पेल देना.. मैं जानती हूँ तेरी आदत.. गांड को देखकर ही गुर्राए सांड की तरह टूट पड़ता है तू.. मरवाने वाली के बारे में सोचता तक नहीं.." रूखी ने फिरसे जीवा का लंड मुंह में ले लिया..

एक ही दिन में शीला और रेणुका एकदम खास सहेलियाँ बन गई.. रात को दोनों ने ब्लू फिल्म की डीवीडी देखते हुए लेसबियन सेक्स का मज़ा लिया.. फिर एक ही बिस्तर पर नंगी होकर दोनों पड़ी रही.. एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए देर तक बातें करती रही.. समाज की.. घर की.. पति की.. पड़ोसियों की.. बातें करते करते एक दूसरे की बाहों में कब सो गई दोनों को पता ही नहीं चला..
कहानी की हिरोइन भले ही शीला हो लेकिन असली मजा अब अनु मौसी की चुदाई से सुरु होगा
रूखी की सास को कब चुदवा रहे हो भाई
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बिस्तर तो पहले से ही शराब गिरने से गीला था.. जीवा ने शीला के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और जबरदस्त उत्तेजित होकर चूसने लगा.. शीला भी इस चुंबन का प्रति-उत्तर देते हुए... जीवा के होंठ चूसने लगी.. शीला को चूमते हुए जीवा अब भी उसके भोसड़े में शराब की बोतल अंदर बाहर किए जा रहा था.. शीला भी उत्तेजित होकर अपनी गांड को गोलाकार में घुमाते हुए बोतल से चुदने का मज़ा ले रही थी...

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"आहहह.. ऊँहह.. हाय जीवा... अब रहा नही जाता... घुसेड़ दे बोतल पूरी की पूरी अंदर...फाड़ दो इसे" शीला बेकाबू होकर बकवास किए जा रही थी।

बोतल से चुदवाते हुए शीला रघु का लोडा पूरी हवस के साथ चूसने लगी... अब वह अपने आप पर आपा खो रही थी..

"जल्दी मूत बोतल के अंदर बहनचोद.. तेरी माँ को चोदू" जीवा ने हिंसक होकर शीला के स्तनों पर थूक दिया और बड़ी ही आक्रामकता से उसका गला दबा दिया... शीला की आँखें फट गई.. एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसकी जान ही निकल जाएगी.. दूसरी तरफ रघु अपनी ओलिम्पिक की मशाल जैसा साढ़े दस इंच लंबा लंड, शीला के मुंह के अंदर तेजी से अंदर बाहर करते हुए चुसवा रहा था और साथ ही साथ उसकी निप्पलों को अपने नाखून से कुरेद भी रहा था

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शीला से अपने मूत्राशय का दबाव और बर्दाश्त न हुआ.. वह अपनी चुत में घुसी बोतल में मूतने लगी.. ५५ साल की शीला की भोस से मूत ऐसे निकल रहा था जैसे ४ हॉर्सपावर के सबमर्सीबल पंप से पानी निकल रहा हो... भख भख मूत निकलने लगा और कुछ ही पल में बोतल भर गई..

"अब बस भी कर मादरजात... इतना सारा मूत!! यार रघु.. इसका भोसड़ा है या ९ इंच का बोर..!! कितना मूत रही है ये तो!! " पर शीला अपना मूत रोक ही नही पाई

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जीवा का लंड अभी भी पतलून में ही था और शीला ने देखा नही था.. उसे रघु के लंड से फुरसत मिले तो जीवा का लंड देखें!! शराब की बोतल शीला की चुत से निकालकर जीवा ने कमरे में चारों ओर उस मूत्र-मदिरा के मिक्स्चर को छिड़क दिया.. अब जिस तरह की गंध कमरे से आ रही थी उसने इन तीनों की कामवासना को भड़का दिया.. आहहह... चुत से बोतल निकल जाने पर शीला को राहत मिली

पर यह कमीना रघु.. शीला के मुंह से लंड बाहर निकालने ही नही दे रहा था.. जीवा शीला की चुत पर उंगली फेरकर उसकी गांड के छेद तक ले गया और फिर गुर्राया "चल बे कुत्तिया... उलटी लेट जा.. तुझे तो आज मैं पीछे से ठोंकूँगा.. ओ रघु.. तू जा और अपनी वाली देसी दारू लेकर आ.. यह मूत जैसा दारू तो अंग्रेजों के लिये है.. अपुन को तो चाहिए असली देसी माल.."

शीला दो घड़ी जीवा को देखकर सोच रही थी "साले ये बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद!! माँ चुदाये ये दोनों.. मुझे क्या!! मुझे तो इनके लंड मिल गए बस... भला हो रूखी का.. की वो मेरे घर आई.. और यह दो लंड मिल गए.. वरना मूठ मार मारकर मेरी तो चुत ही छील जाती.. "

रघु तुरंत बाइक की डिकी से ५-६ प्लास्टिक की थैली में भरी देसी दारू लेकर आ गया.. और दोनों एक के बाद एक ३-४ थैलियाँ पी गए!!

"अब मज़ा आएगा जीवा.. " दारू लगा हुआ मुंह पोंछते हुए रघु ने कहा

"हाँ यार रघु... असली मज़ा तो देसी पीने में ही आता है" कहते हुए जीवा खड़ा हो गया और अपनी पतलून उतार दी..

अरी मोरी अम्मा...!! जीवा का लंड देखकर शीला के पसीने छूट गए.. क्रिकेट के स्टम्प जैसा जीवा का लंड देखकर वह सोच रही थी की रूखी ऐसे लंड से चुदवाकर गदरा गई थी... ऐसे लंड से चुदवाने की आदत लगने के बाद अगर चुदाई बंद हो जाए तो औरत पराए लंड ढूँढे वह लाजमी ही था..

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"शीला, चल उलटी होकर कुत्तिया बन जा.." शीला के मस्त मखमली चूतड़ों पर थप्पड़ मारते हुए जीवा ने कहा

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रघु ने ५०१ पताका बीड़ी सुलगाई.. और दम मारते हुए अपना लोडा शीला के हाथ में थमा दिया.. शीला को ऐसा लगा मानो लोहे का गरम सरिया हाथ में पकड़ लिया हो

"बाप रे.. इतना बड़ा मेरी चुत में कैसे जाएगा!!"

"सिर्फ चुत में ही नही.. गांड में भी जाएगा मेरी रानी.. एकाध देसी दारू की थैली पी ले.. तो ताकत आ जाएगी मरवाने की.. नहीं तो गांड फट जाएगी हमारा लेते लेते.. समझी!!"

"मैं शराब नही पीती.. " शीला ने कहा

"बहनचोद... ज़बान लड़ाती है.. आज तो जो हम कहेंगे वही तुझे करना पड़ेगा, समझी कुत्तिया.. " कहते हुए रघु ने शीला के गालों पर सटाक से एक तमाचा धर दिया.. रघु ने तुरंत देसी दारू की थैली खोली और जबरन शीला के मुंह को पकड़कर उसे पीला दिया...

आक थू.. इतना गंदा स्वाद.. !! शीला ने जीवन में पहली बार शराब चखी.. और वो भी देसी.. पूरा मुंह कड़वा हो गया... उसे उलटी आने लगी..

"वाह शीला वाह... ले अब इस बीड़ी के दो दम लगा.. " हँसते हुए रघु ने शीला को जबरदस्ती बीड़ी का दम खींचने पर मजबूर किया

खाँसती हुई शीला इस सदमे से उभरती उससे पहले जीवा ने शीला को धक्का देकर उल्टा सुला दिया और उसके कूल्हों को पकड़कर ऊंचा कर दिया.. शीला थरथर कांप रही थी.. अपने पूरे जीवन में उसने इतने लंबे और तगड़े लंड की कल्पना नही की थी.. कभी कभार बीपी फिल्मों में कल्लुओ के विकराल लंड से गोरी राँडों को ठुकवाते देखा जरूर था.. तब वह सोचती की कैसा लगता होगा ऐसे मूसल लंड से चुदवाकर!! और अब जब वैसे ही विकराल लंड उसे चोदने की तैयारी में थे तब उसकी गांड फट गई!!

शीला की कमर को कसकर पकड़कर जीवा ने अपना अजगर जैसा लंड शीला की चुत के सुराख पर रखा..

"ऊई माँ.. " शीला की क्लिटोरिस को जैसे अंगारे ने छु लिया.. उसके चूतड़ थरथराने लगे.. चुत में गजब की चूल मचनी शुरू हो गई.. जीवा उसे तड़पा रहा था.. शीला इंतज़ार में थी की कब एक दमदार धक्का लगे और उसकी चुत चौड़ी हो जाएँ!! पर जीवा भी जैसे शीला को अपने लंड की अहमियत समझाना चाहता हो वैसे शीला की पुत्ती और जामुन पर अपना देसी सुपाड़ा रगड़े जा रहा था.. उसके लोडे का यह घर्षण शीला की चुत को ओर दीवाना और गीला बना रहा था। शीला अब बेकाबू सी होने लगी थी


"जीवा... आहहह.. ऐसे तड़पा मत मुझे.. जल्दी डाल दे अंदर.. जीवा!!" जीवा ने अपनी जलती हुई बीड़ी शीला के चूतड़ पर लगा दी और जोर जोर से हंसने लगा.. शीला की आँख में आँसू आ गए.. पर भोसड़े की भूख इतनी तीव्र थी की बीड़ी की जलन को अनदेखा कर उसने अपनी गांड को और ऊपर कर लिया

"प्लीज.. जल्दी डाल.. क्यों तड़पा रहा है मुझे.. मुझसे नही रहा जाता.. जीवा कब तक अपने लंड को यूँ ही घिसता रहेगा!! मेरी चुत में हाहाकार मचा हुआ है... जल्दी कर भड़वे.. " झुमर की तरह लटक रही अपनी चूचियों को शीला खुद ही मसलते हुए दर्द भरी विनती की.. और अपनी उंगलियों से अपना भगोष्ठ रगड़ने लगी..

"आह्हहह... " चिल्लाते हुए जीवा ने एक जबरदस्त धक्का लगाया.. उस धक्के से शीला एक फुट जितनी आगे चली गई.. ये तो अच्छा हुआ की जीवा ने उसे कमर से पकड़कर रखा था.. वरना वो बिस्तर से नीचे गिर जाती.. एक धक्के में जीवा ने अपना पूरा लंड शीला के भोसड़े में दे मारा..!!

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शीला की आँखों के सामने अंधेरा छा गया.। "ऊई माँ... जीवा मादरचोद... जरा धीरे से.. दीवार में कील ठोक रहा है क्या? ऐसे भला कौन डालता है!!"

"ऐसे ही मज़ा आता है... शीलू मेरी जान.. अब देख.. मैं तुझे कैसे कैसे चोदता हूँ... " कहते हुए जीवा ने अपने डीजल इंजन का पिस्टन चलाना शुरू किया। हरएक धक्के पर शीला का शरीर उत्तेजना से उछलने लगा.. "आहहह आहहह जीवा.. चोद मुझे.. बहोत भूखी हूँ.. ओह जीवा.. जबरदस्त है लंड तेरा... रूखी सच कहती थी.. बड़ा दमदार है तेरा लोडा.. भोसडा फाड़ दिया आज तो... तेरे बाप ने कीस चक्की का आटा खाकर तुझे पैदा किया था..!! हरामी साले!! क्या मस्त ठुकाई करता है रे तू!! माँ चुदाने गया मदन.. आज से तू ही मेरा पति है.. कुत्तिया बनाकर पूरी रात चोद मुझे.. आहहह आहहह आहहह...डाल जोर से... और जोर से घुसा.. " कमर को कसकर पकड़कर जीवा शीला के ईवीएम में धड़ाधड़ मतदान करने लगा.. शीला भी अनुभवी रांड की तरह अपनी हवस मिटाने के लिए इस बोगस मतदान में सहयोग देने लगी..

उनके सामने रघु शराब पीते हुए तले हुए काजू खा रहा था.. और ५५५ सिगरेट के कश लगा रहा था.. उसका लंड, मस्त कलंदर की तरह सख्त खड़ा हुआ था.. जिसे मुठ्ठी में पकड़कर संतुलित रख रहा था वोह..

शीला की चुत उस दौरान कई बार झड़ गई.. मदमस्त हथनी की तरह जीवा और रघु के बीच सेन्डविच बनकर मजे लेने लगी।

घड़ी में रात के २ बज चुके थे.. और अभी तो रसिक का आना बाकी था.. उसे आना में अभी दो घंटे थे.. इसलिए शीला निश्चिंत थी..

लगातार मूसल चुदाई के कारण शीला को पेट में थोड़ा दर्द होने लगा.. इन मर्दों को ये डॉगी स्टाइल क्यों इतनी पसंद है? पूरा लंड बच्चेदानी तक जाके टकरा रहा है.. लंड का सुपाड़ा ऐसे टकरा रहा है जैसे आरसीसी से बनी छत तोड़ रहा हो..

रघु खड़ा होकर शीला के पास आया.. और उसके मुंह के आगे अपना लंड धर दिया.. क्या मदमस्त काले नाग जैसा लंड था रघु का!! अद्भुत.. !! शीला की आँखों से बस ६ इंच की दूरी पर.. ठुमकते हुए ऊपर नीचे हो रहा था। शीला उस लंड को देखकर जैसे खो ही गई.. सोच रही थी.. क्या रघु का लंड मदन से बड़ा है?? नही.. लगभग उतना ही है.. क्या पता... मदन के लंड को देखे हुए दो साल हो गए थे.. कमीने के लंड की साइज़ भी भूल गई।

झूलते मिनारे जैसे रघु के लंड को देखकर वह रघु की हिंसक ठुकाई का दर्द भूल गई.. और धीरे से रघु के टमाटर जीतने बड़े सुपाड़े को चूम लिया.. रघु के लंड ने भी ठुमका लगाकर शीला के चुंबन का अभिवादन किया.. जिस तरह कुल्फी को देखकर छोटा बच्चा लार टपकाता है बिल्कुल वैसे ही रघु के लंड की नोक पर वीर्य की एक बूंद उभर आई..

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रघु अपना लंड शीला के मुंह के ओर करीब ले गया.. और शीला के होंठों पर.. उस वीर्य की बूंद को पोंछ दिया.. कुत्ति बनकर जीवा के हथोड़ाछाप लंड से चुदती हुई शीला अब रघु के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी। जिस तरह उसने बीपी फिल्मों में देखा था उस तरह हर नए तरीके से उसने रघु के लंड को चूसते हुए... उसके पानी-पूरी की पूरी जैसे अंडकोशों के साथ खेलने लगी।

"आहाहाहा.. जीवा देख तो जरा.. क्या मस्त चूस रही है ये तो.. साली पूरा का पूरा निगल गई.. आहहह" रघु ने जीवा से कहा

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शीला अपने मुंह और चुत दोनों को एक साथ बड़ी ही मस्ती से चुदवा रही थी। दो दो मस्ताने मर्द शीला को काबू में करने के लिए जैसे असमर्थ से दिख रहे थे.. उनके विकराल लंड को अब वह इतनी आसानी से झेल रही थी जैसे मलिंगा के यॉर्कर को सचिन एक झटके में बाउंड्री के पार फेंक देता है..

जीवा भी शीला की अदाओं से बेहद उत्तेजित हो रहा था.. इस गंवार अनपढ़ ने आजतक शहर की फैशनेबल स्त्री को चोदने के बारे में सपने में भी नही सोचा था.. रूखी को चोदते चोदते उसे शीला मिल गई थी.. अंधा मांगे एक आँख और मिल जाए दो..!! रघु ने तो बीवी की मौत के बाद चुदाई के सपने देखना तक छोड़ दिया था.. पर अब शीला ने उसका लंड चूसचूस कर उसे अपना गुलाम बना दिया था।

इस दुनिया में अगर किसी भी मर्द को गुलाम बनाना हो तो रोज उसका लंड अच्छे से चूसना चाहिए.. और अगर स्त्री को पूरा जीवन अपनी गिरफ्त में रखना हो तो उसकी चुत को रोज चाटकर उसे मस्त करना चाहिए

अधिकतर शादीशुदा जोड़े मुख-मैथुन से दूर रहते है.. मर्द कभी चुत नही चाटता.. ऐसी बेतुकी बातें करते है.. पर हकीकत तो यह है की रात के १० बजे के बाद यही सारे शूरवीर, अपनी बीवी के घाघरे में घुस जाते है और उसकी चुत चाटते है.. बीवी की चुत की गर्मी के आगे, अच्छे अच्छे मर्द ठंडे पड़ जाते है!!

अब जीवा ने शीला की चुत से लंड बाहर निकाला.. और उसके नितंबों को अपने लंड से ठोककर झटकाया.. अचानक चुत में से लंड निकल जाने से शीला बावरी हो गई.. और उसकी भूखी चुत के होंठ खुलना-बंद होना शुरू हो गए.. साथ ही साथ वह अपने कूल्हे भी थीरकाने लगी...

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जीवा ने शीला के गोरे गोरे चूतड़ों को दोनों हाथों से चौड़ा किया.. जैसे किसी किले के मजबूत द्वार को खोल रहा हो.. मन ही मन खुश हो गया जीवा.. शीला की गांड के बादामी रंग के छेद को देखकर जीवा के अंदर का जानवर बाहर आने लगा.. उस टाइट छेद में अपनी छोटी उंगली डालकर उसने शीला को बेबस बना दिया.. एक तो चुत से लंड बाहर निकल गया था.. ऊपर से ये जीवा गांड के छेद पर नाखून मार रहा था..

शीला ने रघु का लंड अपने मुंह से निकाला और बोली

"जीवा.. इतनी ही देर में झड़ गया क्या तू?? भड़वे.. लंड क्यों निकाल लिया बाहर.. डाल दे अंदर.. घुसेड़ फिर से.. आहहह!!"

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जीवा ने शीला की गांड में अपनी आधी उंगली घुसेड़ दी और उसके गोरे चूतड़ पर जोर से चपत लगाई... स..टा..कक!!

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"चुप बे भोंसड़ीवाली.. " जीवा चिल्लाया

"ऊईईई माँ... मर गई.. साले जीवा, तुझे जो चाहिए वो करने तो दे रही हूँ तुझे.. मार क्यों रहा है साले भड़वे?" चपत के दर्द से शीला भी तप गई

जीवा ने जवाब नही दिया। शीला की गांड के छेद को उंगली से चौड़ा करते हुए उसने अपने मुंह से थूक निकाला और छेद पर लगा दिया। गरम थूक का अनुभव गांड पर होते ही शीला सहम गई.. उसने फिरसे रघु का लंड मुंह से निकाला और हाथों से हिलाते हुए बोली

"देख जीवा.. और जो भी करना है कर... पर गांड के साथ मस्ती नही। तेरा बहोत ही मोटा है... तू समझ यार.. नही जाएगा अंदर.. तू मेरे छेद की साइज़ तो देख!! और अपने गधे जैसे लंड को देख... " शीला ने घबराते हुए कहा

शीला की विनती को अनसुना कर जीवा ने अपने सुपाड़े को गांड के छेद पर टेक दिया.. और धीरे से दबाया.. उसका मोटा सुपाड़ा शीला की गांड के अंदर घुस गया... और शीला को तारे नजर आने लगे...

"जीवा प्लीज... ऐसा मत कर.. इतना बड़ा लंड किसी भी सूरत में अंदर नही जाएगा.. रघु.. तू जीवा को समझा जरा.. मेरी गांड फट जाएगी.. खुजली चुत में हो रही है तो वहाँ घुसा ना... !! गांड पर क्यों जुल्म कर रहा है!! तू समज जरा.. जियो के सिमकार्ड पर एयरटेल का रिचार्ज मत कर... ऊईईई माँ...मर गई !!!" बिलखते हुए शीला ने कहा

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जीवा ने एक झटके में उसका ६ इंच जितना लंड गांड के छेद में घुसेड़ दिया.. शीला के मुंह से चीख निकल गई... उसकी चीख सुनकर रघु डर गया.. कहीं अगल बगल में किसी पड़ोसी ने शीला की चीख सुन ली तो!! उसने तुरंत अपना महाकाय लंड शीला के खुले मुंह में डालकर उसके मुंह का ढक्कन बंद कर दिया..

शीला की आवाज बंद होते ही जीवा ने दूसरा दमदार धक्का लगाया.. और शीला की गांड में अपना पूरा लोडा कील की तरह ठोक दिया..

"अममम... अघहगहह.. उम्ममम.. " शीला के लंड ठूँसे मुंह से ऐसी विचित्र आवाज़ें निकल रही थी। जीवा ने शीला की गांड में लगातार फटके लगाने शुरू कर दिए.. एक तरफ रघु का लंड मुंह में.. और जीवा का लंड गांड में.. दोनों ने शीला को दो हिस्सों में बाँट लिया था और अंधाधुन चोद रहे थे..

शीला के भोसड़े में जबरदस्त खुली हो रही थी.. जीवा ने शीला की गांड में अंदर बाहर करते हुए.. उसके लटकते हुए खरबूजों जैसे स्तनों को पकड़ लिया.. और उसकी निप्पलों को मसलते हुए... धक्कों की गति बढ़ा दी.. हर धक्के के साथ जीवा के आँड शीला की चुत को जाकर टकराने लगे.. और इसी कारण शीला को थोड़ा बहुत आनंद मिल रहा था..

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जीवा की मर्दानगी पर शीला फिदा हो गई.. उसकी गाँड़ अचानक जीवा के गरमागरम वीर्य से भर गई.. और गांड के छेद से छलक कर वीर्य की धाराए, चुत के होंठों के बीच से गुजरते हुए नीचे बिस्तर पर नीचे टपकने लगी.. जीवा थककर शीला की पीठ के ऊपर ढह गया.. और हांफने लगा.. पर रघु अब भी शीला के मुंह से लंड निकालने को तैयार न था.. अब शीला ने अपना सारा ध्यान रघु के लंड को चूसने पर केंद्रित किया..

जैसे ही शीला ने अपनी जीभ का जादू शुरू किया, रघु के लंड ने भी अपना त्यागपत्र दे दिया.. शीला के मुंह से लेकर कंठ तक वीर्य का सैलाब सा फैला हुआ था.. रघु ने लंड बाहर निकाला और वही फर्श पर बैठ गया.. जीवा ने शीला की गांड से लंड बाहर निकाल लिया.. दो दो योद्धाओं को पराजित कर विजयी मुस्कान के साथ शीला नंगे बदन बिस्तर पर लेटी रही.. और अपना हाथ पीछे ले जाकर गांड के छेद को हुए नुकसान का जायजा लेने लगी..

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घड़ी में तीन बज रहे थे.. थकान के उतरते ही वह तीनों फिर से एक दूसरे को छेड़ने लगे.. शीला सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं को जीवा और रघु के मुंह पर छोड़ रही थी... सिगरेट की राख को जीवा के लंड पर गिराते हुए उसने कहा "मुझे अब मेरी चुत और गांड में एक साथ लंड डलवाना है.. चलो आ जाओ दोनों.. और लग जाओ काम पर.. अब ज्यादा समय नही है हमारे पास.. जल्दी करो"

पड़ोस में रहती अनु मौसी... रात के इस समय.. शीला के घर की दीवार पर कान रखकर.. सारी बातें सुन रही थी..
बहुत ही कामुक गरमागरम और उत्तेजना से भरपूर अपडेट है
शीला की तो दमदार चुदाई कर दी जीवा और रघु ने
दो दो घोड़े की सवारी करने के बाद भी शीला की प्यास बुझाने में असमर्थ दिख रहे हैं शीला ने जीवा और रघु को पानी पिला दिया लगता है अब अनु मौसी भी घोड़े की सवारी करने वाली हैं
 

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घड़ी में तीन बज रहे थे.. थकान के उतरते ही वह तीनों फिर से एक दूसरे को छेड़ने लगे.. शीला सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं को जीवा और रघु के मुंह पर छोड़ रही थी... सिगरेट की राख को जीवा के लंड पर गिराते हुए उसने कहा "मुझे अब मेरी चुत और गांड में एक साथ लंड डलवाना है.. चलो आ जाओ दोनों.. और लग जाओ काम पर.. अब ज्यादा समय नही है हमारे पास.. जल्दी करो"

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पड़ोस में रहती अनु मौसी... रात के इस समय.. शीला के घर की दीवार पर कान रखकर.. सारी बातें सुन रही थी..
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शीला के गले से हल्की सी चीख निकल गई.. "आह्हहहह... !!" पर रघु ने जरा सा भी दयाभाव नही दिखाया.. और एक जोरदार धक्के के साथ अपना पूरा लंड शीला की गांड में घुसा दिया.. शीला की सेन्डविच बन गई.. और वह तीनों बड़ी ही मस्ती से चोदने लगे.. शीला के मुंह से सिसकियाँ निकल रही थी... और अपने दोनों सुराखों में चुदवाते वक्त उसका सारा ध्यान घड़ी के काँटों पर ही था..

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दो दो विकराल लंड के भीषण धक्के खा खा कर शीला की गांड और भोस दोनों ही थक चुके थे.. शीला पसीने से तरबतर हो गई थी.. फिर भी उछल उछल कर चुदवा रही थी.. उसकी उछलने की गति बढ़ने के साथ ही जीवा समझ गया की शीला झड़ने की कगार पर थी.. इसलिए.. जिस तरह धोनी ने २०११ की वर्ल्डकप फाइनल की मेच में सिक्सर लगाई थी... वैसे ही जीवा ने अपने लंड से एक जोरदार शॉट लगाया..

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शीला को कमर से कसकर पकड़कर जीवा ने अपने ताकतवर हाथों से शीला को हवा में उठा लिया.. लगभग एक फुट ऊपर.. और वैसे ही उसे हवा में पकड़े रख.. नीचे से जबरदस्त धक्का लगाया शीला की भोसड़े में.. "ओह.. ह.. ह.. ह.. ले मेरी शीला रानी.. आहहहहहह..!!" कहते हुए जीवा ने पिचकारी मार दी.. शीला की चुत में गरम गरम वीर्य गिरते ही वह ठंडी होने लगी.. शीला ने अपनी गांड की मांसपेशियों को बेहद कस लिया और उसी के साथ रघु का लंड भी उसकी गांड के अंदर बर्बाद होते हुए झड़ गया...

तीनों ऐसे हांफ रहे थे जैसे मेरेथॉन दौड़कर आयें हों.. शीला की गांड और चुत दोनों में से वीर्य टपक रहा था.. गांड में अभी भी दर्द हो रहा था फिर भी शीला बहुत खुश थी.. आखिरकार उसका दो मर्दों से चुदने का सपना सच हो गया था..

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चार बजने में सिर्फ पाँच मिनट की देरी थी.. और तभी शीला के घर की डोरबेल बजी..

"इसकी माँ का.. रसिक ही होगा, जीवा.. अब क्या करेंगे?" शीला डर गई.. पूरे घर की हालत उसके भोसड़े जैसी ही थी.. सब तहस नहस हो रखा था... अब क्या होगा?

शीला ने तुरंत रघु और जीवा को कहा " तुम दोनों किचन में छुप जाओ.. में रसिक को लेकर बेडरूम में जाऊँगी तब तुम लोग धीरे से निकल जाना.. और हाँ.. बाइक को बिना चालू किए थोड़े दूर ले जाना.. और फिर स्टार्ट करना.. नही तो उस रंडवे को पता चल जाएगा.. जाओ जल्दी से.. "

शीला ने बेडरूम से जीवा और रघु को भगाया.. वह दोनों अपने कपड़े काँख में दबाकर किचन की ओर भागे.. उन दोनों के मुरझाए लटकते लंड देखकर शीला की हंसी निकल गई..

कपड़े पहनने का समय नही था.. और वैसे भी रसिक के अंदर आते ही फिर से उतारने थे.. ऐसा सोचकर शीला ने बिना ब्लाउस और घाघरे के.. अपने नंगे जिस्म पर सिर्फ साड़ी लपेट ली.. और अपने बबलों को साड़ी के नीचे दबाते हुए दरवाजा खोला...

"अरे, कविता तू... ??" शीला बोखला गई.. कपड़ों को ठीक करते हुए उसने पूछा

कविता पड़ोस में रहते अनु मौसी के बेटे पीयूष की पत्नी थी.. ४ महीनों पहले ही उनकी शादी हुई थी। अच्छा हुआ की बहुत अंधेरा था.. नही तो शीला को इस तरह देखकर, पता नही कविता क्या सोचती!!

"शीला भाभी, मेरे मामाजी ससुर को हार्ट-अटेक आया है.. और पीयूष मेरे सास ससुर के साथ उनके शहर गए है.. मम्मीजी ने मुझ से कहा था की अगर अकेले में डर लगे तो आपके घर आकर सो जाऊँ.. २ घंटों की ही बात है.. आपको अगर एतराज न हो तो क्या में आपके घर सो जाऊँ??" निर्दोष भाव से कविता ने इजाजत मांगी

शीला मन ही मन कांप उठी.. आज तो इज्जत का जनाज़ा निकल जाएगा.. माँ चुद जाने वाली थी..

"हाँ हाँ.. क्यों नही.. मैं हूँ ना तेरे साथ.. चिंता मत कर!!" शीला का शैतानी दिमाग काम पर लग गया... अब इस समस्या का कोई हल तो निकालना ही पड़ेगा.. वह सोचने लगी... क्या करूँ!!!!

"कविता, एक काम करते है.. " शीला ने अपने पत्ते बिछाना शुरू किया

"हाँ कहिए ना भाभी!!"

"मेरा बिस्तर हम दोनों के लिए छोटा पड़ेगा.. एक साथ सो नही पाएंगे... ऐसा करते है की तेरे ही घर हम दोनों सो जाते है"

"मैं आपको वही कहने वाली थी पर संकोच हो रहा था की कैसे कहूँ... वैसे भी मुझे अपने बिस्तर के बगैर नींद नही आती.. " कविता ने कहा

"तू अपने घर जा... मैं बाथरूम होकर अभी आती हूँ.. "

"जल्दी आना भाभी... मुझे अकेले में बहोत डर लगता है.. " कविता बोली

"हाँ.. हाँ.. तू जा.. मैं तुरंत पहुँचती हूँ.. "

बच गए!! शीला ने राहत की सांस ली.. वह तुरंत किचन में गई.. जीव और रघु को कहा "जल्दी निकलो तुम दोनों... रसिक नही था.. मेरी पड़ोसन थी.. "

"हाँ... वो तो हमने आप दोनों की बातें सुनी.. हम जा रहे है.. फिर किसी दिन.. बुलाते रहना.. भूल मत जाना" जीवा ने कहा

"कैसे भूल सकती हूँ!! जरूर बुलाऊँगी.. आप दोनों निकलों.. और वह देसी दारू की थैलियाँ लेते जाना.."

रघु वो थैलियाँ लेने अंदर गया तब जीवा ने शीला को बाहों में भरकर चूम लिया.. उसके आगोश में शीला दबकर रह गई.. उसने पतलून के ऊपर से जीवा लंड पकड़ लिया... "गजब का लंड है रे तेरा जीवा.. " जीवा ने शीला के साड़ी में लिपटे स्तनों को मसल दिया और उसके गाल पर हल्के से काटते हुए अपने प्रेम से उसे सराबोर कर दिया.. वापिस आए रघु भी शीला को पीछे से लिपट पड़ा.. शीला ने उसके लंड को भी प्यार से सहलाया..

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दोनों गए.. शीला की धड़कनें शांत हो गई.. अब दूसरी समस्या यह थी की रसिक का क्या करें!!

तभी रसिक की साइकिल की घंटी बजने की आवाज आई.. हाथ के इशारे से उसे घर के अंदर आने के लिए कहते हुए शीला अंदर आई.. जैसे ही रसिक घर के अंदर आया.. शीला उससे लिपट पड़ी.. और अपने स्तनों को रसिक की छाती पर रगड़ने लगी..

रसिक का लंड तुरंत ही सख्त हो गया. शीला ने घुटनों पर बैठकर उसका लंड पतलून से निकाला और चूसने लग गई.. काले डंडे जैसा उसका पूरा लंड शीला की लार से लसलसित होकर चमकने लगा..

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"रसिक, मुझे आज बहोत ही जल्दी है.. बगल वाले अनु मौसी के घर उसके बेटे की बीवी अकेली है.. उन्हे अचानक शहर के बाहर जाना पड़ा.. तू फटाफट मुझे चोदे दे.. और निकल.. फिर में घर बंद कर भागूँ.. वहाँ कविता मेरा इंतज़ार कर रही है"

"ठीक है भाभी, पर बिस्तर पर चलते है ना!! यहाँ कोई देख लेगा!!" रसिक ने कहा

रसिक का लंड मुठ्ठी में भरकर आगे पीछे करते हुए शीला ने कहा "उतना टाइम नही है रसिक.. जल्दी कर.. पेल दे फटाफट" कहते हुए शीला ने दीवार पर अपने हाथ टेक दिए और साड़ी को ऊपर उठा लिया.. रसिक उसके पीछे आ गया और शीला की जांघों को थोड़ा सा चौड़ा कर अपने लंड को उसकी चुत में घुसाकर धक्के लगाने लगा.. उसे मज़ा तो नही आ रहा था पर क्या करता!!


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"देख रसिक.. जल्दी कर.. और हाँ.. तुरंत घर मत पहुँच जाना वरना रूखी को शक हो जाएगा" शीला का गणित रसिक समझ नही पाया और वह बिना समझे हाँ हाँ करता जा रहा था.. उसके घर पर उसकी बीवी जीवा और रघु से चुदवा रही होगी.. और यहाँ वह शीला की हाँ में हाँ मिलाते चोदे जा रहा था

अपने कूल्हों को ऊपर उठाते हुए शीला ने कहा "अरे जल्दी कर न रसिक!! कितनी देर लगा रहा है तू? क्या टेस्ट मेच की तरह खेल रहा है!! देख आज तो में फंसी हुई हूँ.. इसलिए जल्दी करना पड़ रहा है.. पर कल तू जल्दी आ जाना.. फिर इत्मीनान से मजे करेंगे.. ठीक है.. कल चार बजे आ जाना"

"ठीक है भाभी.. " शीला की चुत में लंड अंदर बाहर करते हुए रसिक ने कहा

रसिक ने धक्के लगाने की गति बढ़ा दी.. "वाहह... आह्हह.. मज़ा आ रहा है.. घुसा अंदर तक.. ईशश.. " शीला की सिसकियाँ सुनकर रसिक झड़ गया.. शीला ने तुरंत उसका लंड अपनी चुत से बाहर निकाला.. और रसिक के सामने ही ब्लाउस और घाघरा पहनने लगी..

"भाभी आपने कपड़े नही पहने थे?" रसिक के मन में सवाल उठा

"कितनी गर्मी है.. और वैसे भी तू आने वाला था इसलिए कपड़े उतारकर तैयार बैठी थी.. तू बेकार की बातें बंद कर और निकल यहाँ से!!" शीला ने अपने जूठ को छिपाते हुए कहा

रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..


पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. और अपने घर में वापिस आकर अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."
बहुत ही कामुक और उत्तेजनापूर्ण अपडेट है
सारी रात चुदने के बाद भी शीला ने रसिक से भी चूदवा लिया ये तो पक्की वाली रांड़ निकली कविता ने सब कुछ देख लिया है अब तो शीला को इस खेल में कविता को भी शामिल करना पड़ेगा
 
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रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..

पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. वह भागकर अपने घर वापिस आई और अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

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तभी शीला कविता के घर आ पहुंची.. "अरे मुझे ताला ही नही मिल रहा था... इसलिए देर लग गई मुझे.. " शीला ने सफाई देते हुए कहा

यह सुनकर कविता मन ही मन में मुस्कुराने लगी..

"चलिए भाभी... अब सो जाते है.. " शीला और कविता बेडरूम में गए और बिस्तर पर लेटे लेटे बातें करने लगे

"कब से बारिश हो रही है.. रुक ही नही रही!!" कविता ने कहा

"अब बारिश की सीजन है.. पानी तो बरसेगा ही.. तुम लोगों को तो बारिश पसंद होनी चाहिए.. नए शादीशुदा जोड़ों को तो बारिश में बहुत मज़ा आता है.. हमारे जैसे पुराने चावलों को जरुर बारिश में परेशानी होती है.. " शीला ने कहा

कविता २४ साल की जवान छोकरी थी.. एकदम कोरा माल.. ३४ इंच के स्तन.. मस्त कडक संतरे जैसे.. पतली सी कमर.. सीधी सी लड़की... चुदाई के मामले में जिसे नौसिखिया कहा जा सकता है.. वही श्रेणी में थी कविता.. थोड़ी दुबली पतली.. अब तक उसके कूल्हे बड़े नही हुए थे.. प्रायः चुदाई के एकाद साल के बाद नितंबों का विकास होता है.. जो अब तक कविता का नही हुआ था.. एकदम गोरी त्वचा.. देखते ही पसंद आ जाएँ ऐसा रूप.. नई नई शादी हुई थी इसलिए सब बातें जानने की बेहद जिज्ञासा थी कविता में..

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घर में बूढ़े सास और ससुर.. पड़ोस में उसकी उम्र की अन्य लड़कियां थी पर कविता का उनसे ज्यादा परिचय नही हुआ था.. कविता का पति पीयूष.. कविता को "गरीबों की बचत" की तरह इस्तेमाल करता था.. कविता को कभी कभी ही चोदता था.. कभी कभी मोबाइल पर व्हाट्सएप पर आई हुई पॉर्न क्लिपिंग कविता को दिखाकर उत्तेजित करता.. उन विडिओ को कविता बड़े ही ध्यान से देखती.. और उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करती..

कुछ दिन पहले ही उसने विडिओ में देखकर पीयूष का लँड चूसना शुरू किया था.. वैसे कविता को इसमे ज्यादा मज़ा नही आता था.. वह सोचती थी की लंड जैसी चीज को क्यों चूसना चाहिए?? इसमें भला क्या मज़ा? कोई स्वाद तो आता नही.. पर पीयूष जब उसकी चुत को चूमता था तब उसे ऐसा लगता था जैसे उसका जीवन सफल हो गया.. चुत चटवाना उसे इतना पसंद था की उसके लिए वह पीयूष का लंड चूसने के लिए तैयार हो जाती। वह चाहती थी की पीयूष पूरी रात उसकी चुत चाटता रहे.. पर पूरे दिन की थकान के बाद पीयूष, कविता पर चढ़कर थोड़ी बहोत उछलकूद करके सो जाता.. वैसे तो कविता भी पूरा दिन घर का काम कर थक जाती थी.. पर जिस्म की भूख सब हिसाब मांगती है.. दो तीन दिन बिना चुदे निकल जाने के बाद कविता ऐसी ऐसी जगहों पर छेड़ती की पीयूष उत्तेजित होकर उसे चोद देता.. कविता के लिए पीयूष ही उसका सर्वस्व था..

शीला और कविता आज अच्छा खासा समय साथ बिताने वाले थे.. शीला के शरीर से वीर्य की गंध आ रही थी.. और इस गंध से कविता भलीभाँति वाकिफ थी.. शीला को रात के अंधेरे में खुले दरवाजे के पास खड़े खड़े रसिक से जिस तरह चुदवाते देखा था.. वह द्रश्य कविता की आँखों से हट ही नही रहा था...


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शीला कविता के बदन को अहोभाव से देखने लगी.. दिवाली में बेंक से मिले १०० रुपये के नए नोट के बंडल जैसी दिख रही थी कविता..

"एक बार नींद उड़ जाएँ तो वापिस जल्दी आती ही नही" कविता बोली

"हाँ कविता.. कभी कभी मेरी नींद भी आधी रात को उड़ जाती है.. फिर सुबह तक करवटें बदलती रहती हूँ" शीला ने अपना दुख सुनाया

"फिर आपको ताला मिला की नही?" कविता ने पूछा

"हाँ मिला आखिर.. घर में ही था.. थोड़ा ढूँढना पड़ा.. "शीला ने कहा

"मुझे तो ऐसा लगा की आप चाबी ढूंढ रही थी.. ताला तो आपके पास पहले से ही है" कविता ने गूढ भाषा में सिक्सर लगाई

"नही नही.. ताला ही नही मिल रहा था.. चाबी तो थी मेरे पास" कविता की द्विअर्थी बात का भावार्थ नही समझ पाई शीला

"भाभी, एक बात पूछूँ?"

"पूछ ना... जो भी पूछना है.. " शीला ने कहा

"जब हम पिरियड्स में हो... तब कर सकते है?" कविता ने थोड़ी सी शर्म के साथ कहा

"क्यों? तेरा पीयूष बहुत जिद करता है क्या?" शीला ने शरारत करते हुए कहा

"नही भाभी.. पर मुझे ही उस दौरान बहुत मन करता है करवाने का.. पर में अगर ज्यादा फोर्स करती हूँ तो पीयूष नाराज हो जाता है " कविता ने कहा
कविता की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा "तू तो जोरदार खिलाड़ी निकली कविता.. हमारी जवानी में तो पति जिद करता और हम मना करते थे.. फिर आखिर वह हाथ से हिलाकर... छातियों पर झड़कर शांत हो जाते.. पर अब तो पूरा माहोल ही बदल चुका है"

कविता: "अब मेरा मन करता है तो में क्या करूँ भाभी!! पीयूष तो उन दिनों में मुझसे दूर ही रहता है"

शीला: "हम्म.. इसका एक इलाज है मेरा पास, कविता"

कविता: "वो क्या भाभी?"

शीला: "तुझे अपनी उंगली से ही काम चलाना होगा.. जब भी तू अपना सैनिटेरी पेड़ बदलने जाएँ.. तब नीचे पानी से बराबर साफ करके.. उंगली से कर लेने के बाद.. नया सैनिटेरी पेड़ लगा लेना"

कविता: "पर भाभी, उसमें असली चीज जैसा मज़ा तो नही आएगा ना!!"

शीला: "ओहो.. अब तुझे उंगली से असली मर्द वाला मज़ा लेना है.. वो तो मुमकिन नही है.... एक बात समझ ले कविता.. उंगली में लंड जैसा मज़ा तो आने से रहा.." शीला को अचानक एहसास हुआ की सामने रघु या जीवा नही थे.. वह शरमा गई "माफ करना.. मेरे मुंह से ऐसे शब्द निकल गए"

कविता: "अरे, उसमें क्या है भाभी.. अभी तो हम दोनों अकेले ही है ना.. रात को बेडरूम में पीयूष भी बहुत गालियां बकता है.. अच्छा भाभी.. मदन भाई कब वापिस लौटने वाले है?"

शीला ने एक भारी सांस छोड़कर कहा "अभी और चार महीने बाकी है उसे आने को कविता"

शीला के बायें स्तन पर कविता की कुहनी छु रही थी.. शीला ने जानबूझकर अपने शरीर को कविता की दिशा में ओर झुकाया.. उसका स्तन अब कविता की कुहनी से ओर ज्यादा दब गया.. कविता ने अपनी टांगें चौड़ी की और शीला की ओर करवट करते हुए शीला के स्तनों के बिल्कुल सामने आ गई.. शीला के पर्वत जैसे दोनों स्तनों को वह एकटक देखने लगी..

अपनी एक टांग शीला की जांघ पर रखते हुए कविता ने पूछा "भाभी.. आपको भी मन तो करता होगा ना"

शीला: "मन तो बड़ा करता है.. पर क्या कर सकती हूँ?"

कविता: "तो आप फिर उंगली का सहारा नही लेती?"

शीला: "उम्र हो गई है कविता.. अब उंगली से काम नही बनता मेरा.. "

कविता: "तो फिर आप क्या करती है?"

शीला: "तू क्या करेगी जानकर? बड़ी मुश्किल से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा है मैंने.. तू तो ये सब बातें करते हुए मेरी आग भड़का देगी.. तेरा क्या है.. तू तो अपने पीयूष के नीचे घुसकर अपनी आग बुझा लेगी.. तड़पना तो फिर मुझे ही पड़ेगा ना!!"

कविता: "तो फिर आप अपनी आग बुझाने के लिए रसिक को क्यों नही बुला लेती?" आखिर उसने बॉम्ब फोड़ ही दिया

शीला स्तब्ध होकर बोली "कौन... वो दूधवाला?? वो कैसे बुझाएगा मेरी आग भला?"

कविता: "कैसे बुझाएगा?? दरवाजे पर हाथ रखकर.. पीछे से करते हुए.. और कैसे?" उसने शरारती मुस्कान के साथ शीला का भंडाफोड़ कर दिया

शीला के पैरों तले से जमीन खिसक गई। कविता के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए उसने कहा

"बस बस.. चुप हो जा तू.. और किसी को बताना मत.. समझी!!" कहकर शीला ने कविता को अपने आगोश में भर लिया और पूरा जोर लगाकर मसल दिया..

शीला का शातिर दिमाग काम पर लग गया.... अब कविता को पटाकर अपने वश में रखना पड़ेगा.. ताकि यह कमीनी किसी को बता न दे..

कविता: "ये क्या कर रही हो भाभी? ओह्ह.. "

शीला ने करीब आकर कविता के होंठों पर अपने गरम होंठ रखकर एक जबरदस्त चुंबन रसीद कर दिया.. और फिर कविता का मुंह अपने दोनों स्तनों के बीच दबा दिया

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शीला की मखमल के तकिये जैसी नरम छातियों से चिपक कर कविता ने भी शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और फिर शीला के गालों को चूमते हुए उसके मम्मे दबाने लगी... "भाभी, मेरे बॉल इतने बड़े कब होंगे? पीयूष को बड़े बॉल बहोत पसंद है"

यह सुनते ही शीला ने अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. और अपनी जायदाद कविता के सामने खोल दी.. कविता की आँखें फट गई

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"देख क्या रही है कविता? चूसना शुरू कर.. "

कविता शीला के गोरे गोरे स्तनों की निप्पल को चूमकर बोली "भाभी.. क्या आप मेरी नीचे चाटोगे? कल रात को पीयूष को कितनी बार कहा.. पर वो इतना थका हुआ था की उसने चाटने से मना कर दिया.. कल रात से खुजली हो रही है मुझे.. प्लीज भाभी"

कविता का हाथ हटाकर शीला ने उसके दोनों संतरों को मसल दिया और कहा


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"कविता, तेरे स्तन भी मेरी तरह बड़े बड़े हो जाएंगे.. तू रोज मेरे घर आकर तिल के तेल से मालिश करवा लेना.. फिर देखना तेरे बॉल कितने बड़े बन जाते है"

कविता: "वो छोड़ो भाभी... आप मेरी चाटिए ना!!"

कविता के गाउन में हाथ डालकर शीला ने उसकी चुत में दो उंगली घुसा दी.. और अंदर बाहर करने लगी

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कविता अब शीला के मदमस्त स्तनों को चूमकर गीली हो चुकी थी.. उससे रहा न गया.. वह खड़ी हो गई.. अपने गाउन को कमर तक उठा लिया.. और अपनी चुत को शीला के मुंह पर रखकर बैठ गई.. उसके कूल्हे शीला के स्तनों से रगड़ खा रहे थे.. वह शीला के होंठों पर.. गालों पर.. अपनी चुत घिसने लगी.. शीला ने कविता के गुलाबी छेद को चौड़ा किया और अंदर अपनी जीभ डाल दी..

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कविता अब बावरी बन गई.. शीला के मुंह पर दबाव बनाकर घिसने लगी.. अब उसने अपनी हथेलियों से शीला के बालों को पकड़ लिया और उसके मुँह पर अपनी चुत दबाते हुए झड़ गई.. !!

"आहहह आहहह... आह्हह!!" कविता बड़बड़ा रही थी.. सांसें नियंत्रित होने तक वह कुछ बोल नही पाई। कविता की चुत ठंडी हो जाने के बावजूद शीला उसे चाटती रही.. चाटती ही रही...

थोड़ी देर बाद कविता शीला के ऊपर से उतर गई.. और फिर अपने गाउन से शीला का गीला मुंह पोंछकर बोली

"ओह भाभी... आपने तो... अब क्या कहूँ आपसे? इस तरह तो पीयूष ने भी मुझे मज़ा नही दिया है आज तक.. बहोत मज़ा आया भाभी"

स्खलन से थकी कविता की आँखें बंद होने लगी.. जबरदस्त ऑर्गजम का आनंद लेकर, शीला के बोबलों को सहलाते हुए, कविता गहरी नींद सो गई..

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शीला भी पूरी रात की भीषण चुदाईयों से बहोत थक चुकी थी.. कविता के नाजुक स्तनों को मसलते हुए वह भी सो गई।

सुबह होते ही कविता और शीला दोनों जाग गए.. पर बिस्तर में ही पड़े पड़े एक दूसरे के अंगों से खेलते रहे

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"भाभी, रसिक के साथ सेटिंग कैसे की आपने?" कविता ने पूछा

"कविता, मैं दो सालों से बिना लंड के तड़प रही थी.. अब इस उम्र में कहाँ लंड ढूँढने जाती!! ये तो अच्छा हुआ की रसिक की बीवी रूखी के साथ मेरी दोस्ती हो गई.. और मेरी तकलीफों का अंत आया.. नहीं तो पता नही क्या होता" कविता बड़े ही ध्यान से शीला की बातें सुन रही थी और शीला के स्तनों के साथ खेल रही थी

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कविता: "भाभी, आप मेरी एक मदद करोगी?"

शीला: "बता ना.. क्या चाहिए तुझे?"

कविता: "बात दरअसल ऐसी है की मेरे मायके में मेरा एक बॉयफ्रेंड है.. पिंटू.. मुझसे ६ साल छोटा है.. "

शीला ने आश्चर्य से पूछा.. "तुझसे ६ साल छोटा बॉयफ्रेंड है तेरा??"

कविता: "वो हमारे पड़ोस में रहता है.. कई बार मेरे घर आता था.. और पढ़ाई में मेरी मदद भी करता था.. पढ़ते पढ़ते मैं उसके प्यार में कब पड़ गई मुझे पता ही नही चला.. "

शीला: "तूने चुदवाया है उस लड़के से?"

कविता: "ऊपर ऊपर से सब किया है.. वो मेरे बॉल दबाता.. होंठ चूमता.. पर उससे चुदवा नही पाई.. मैंने उसे कई बार कहा चोदने को.. पर उसने ही मना कर दिया.. वो कहता था की पहली चुदाई तो मुझे मेरी पति के साथ ही करनी है.. उसके बाद ही वो मुझे चोदेगा"

शीला: "बड़ा अच्छा लड़का है.. वरना लड़की सामने से टांगें खोल रही हो तब कौन मना करता है भला?? लोग चोदने के लिए कितने पैसे भी खर्च कर देते है"

कविता: "इसी लिए तो मुझे बहोत पसंद है पिंटू"

शीला: "तू अभी भी चाहती है उसे? तो फिर शादी के बाद चुदवाया क्यों नही उस लड़के से!!"

कविता: "उसकी याद तो मुझे रोज आती है भाभी.. पर मायके जाना नसीब ही नही हुआ अब तक.. वो मुझे कभी फोन भी नही करता.. मैं ही फोन करती रहती हूँ उसे.. जब भी टाइम मिले.. मुझे पिंटू से चुदवाने का बहोत मन है.. पर कुछ सेटिंग ही नही हो रहा"

शीला: "क्या कभी तूने उसका लंड पकड़ा था?"

कविता: "हाँ.. वैसे एक बार मुंह में लेकर चूसा भी था.. अब मुझे बहोत जोर से मन कर रहा है पिंटू से चुदने का.. "

शीला: "चिंता मत कर पगली.. बुला ले उसे मेरे घर.. दोपहर को जब तेरी सास सो जाएँ तब मेरे घर आ जाना.. और अपना काम निपटाकर निकल जाना"

कविता: "बस यही मदद चाहती थी मैं भाभी.. आप कितनी अच्छी हो!! आप कहों तो आज ही बुला लूँ पिंटू को? अभी सुबह के ६:३० बजे है.. अपने रूम में सो रहा होगा.. फोन कर देती हूँ.. आठ बजे निकलेगा तो भी डेढ़ घंटे में यहाँ पहुँच जाएगा" कविता बड़े ही उत्साह से कह रही थी.. अपने प्रेमी से मिलने के लिए वह उतावली हो रही थी.. शीला ने कविता की बिना झांटों वाली बुर को सहला सहला कर गीली कर दी।

शीला: कविता.. प्रेमीओ को मदद करना तो बड़े पुण्य का काम है.. तू बुला ले उसे.. आज तो तेरे सास-ससुर और पति तीनों बाहर है.. ऐसा मौका फिर नही मिलेगा.. तू पूरा दिन आराम से पिंटू के संग मजे करना.. तुम दोनों का खाना मेरे घर पर बना दूँगी.. अब खुश!!"

कविता ने खुश होकर शीला को गले लगा लिया.. शीला ने कविता का सिर पकड़कर अपने जिस्म पर दबा दिया..

"चल इसी बात पर मेरी चुत चाट दे.. कब से मेरे बबले मसल मसल कर गरम कर दिया मुझे.. "

कविता ने पालतू कुत्तिया की तरह शीला के आदेश अनुसार उसकी चुत चुत चाटना शुरू कर दिया.. शीला अब वासना के समंदर में गोते खाने लगी.. बिस्तर से १ फुट ऊपर अपने चूतड़ उठाकर वह कविता से अपनी चुत चटवाने लगी.. थोड़ी ही देर में सिसकियाँ भरते हुए शीला झड़ गई.. और कविता के सिर को अपनी दोनों जांघों के बीच दबा दिया.. शीला की चुत चाटते हुए कविता भी अपनी चुत को गुदगुदाते हुए स्खलित हो गई.. पिंटू के साथ.. रंगरेलियाँ मनाने का अवसर मिलने के खयाल मात्र से, कविता का रोम रोम रोमांचित हो उठाया.. उसने पिंटू को मोबाइल पर कॉल लगाया।

"पिंटू आ रहा है भाभी" खुशी से उछलते हुए कविता ने कहा.. ६ महीने बाद मिलूँगी.. कविता के चेहरे पर छलकती खुशी को देखकर शीला को भी अच्छा लगा..

"मैं घर पहुंचकर थोड़ी सफाई कर लेटी हूँ.. पिंटू और तेरे लिए बिस्तर भी ठीक-ठाक करना होगा.."

"ठीक है भाभी... मैं भी नहाकर फ्रेश हो जाती हूँ.."

"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी


"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई
कविता ने रसिक के साथ शीला की चुदाई
रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..

पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. वह भागकर अपने घर वापिस आई और अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

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तभी शीला कविता के घर आ पहुंची.. "अरे मुझे ताला ही नही मिल रहा था... इसलिए देर लग गई मुझे.. " शीला ने सफाई देते हुए कहा

यह सुनकर कविता मन ही मन में मुस्कुराने लगी..

"चलिए भाभी... अब सो जाते है.. " शीला और कविता बेडरूम में गए और बिस्तर पर लेटे लेटे बातें करने लगे

"कब से बारिश हो रही है.. रुक ही नही रही!!" कविता ने कहा

"अब बारिश की सीजन है.. पानी तो बरसेगा ही.. तुम लोगों को तो बारिश पसंद होनी चाहिए.. नए शादीशुदा जोड़ों को तो बारिश में बहुत मज़ा आता है.. हमारे जैसे पुराने चावलों को जरुर बारिश में परेशानी होती है.. " शीला ने कहा

कविता २४ साल की जवान छोकरी थी.. एकदम कोरा माल.. ३४ इंच के स्तन.. मस्त कडक संतरे जैसे.. पतली सी कमर.. सीधी सी लड़की... चुदाई के मामले में जिसे नौसिखिया कहा जा सकता है.. वही श्रेणी में थी कविता.. थोड़ी दुबली पतली.. अब तक उसके कूल्हे बड़े नही हुए थे.. प्रायः चुदाई के एकाद साल के बाद नितंबों का विकास होता है.. जो अब तक कविता का नही हुआ था.. एकदम गोरी त्वचा.. देखते ही पसंद आ जाएँ ऐसा रूप.. नई नई शादी हुई थी इसलिए सब बातें जानने की बेहद जिज्ञासा थी कविता में..

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घर में बूढ़े सास और ससुर.. पड़ोस में उसकी उम्र की अन्य लड़कियां थी पर कविता का उनसे ज्यादा परिचय नही हुआ था.. कविता का पति पीयूष.. कविता को "गरीबों की बचत" की तरह इस्तेमाल करता था.. कविता को कभी कभी ही चोदता था.. कभी कभी मोबाइल पर व्हाट्सएप पर आई हुई पॉर्न क्लिपिंग कविता को दिखाकर उत्तेजित करता.. उन विडिओ को कविता बड़े ही ध्यान से देखती.. और उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करती..

कुछ दिन पहले ही उसने विडिओ में देखकर पीयूष का लँड चूसना शुरू किया था.. वैसे कविता को इसमे ज्यादा मज़ा नही आता था.. वह सोचती थी की लंड जैसी चीज को क्यों चूसना चाहिए?? इसमें भला क्या मज़ा? कोई स्वाद तो आता नही.. पर पीयूष जब उसकी चुत को चूमता था तब उसे ऐसा लगता था जैसे उसका जीवन सफल हो गया.. चुत चटवाना उसे इतना पसंद था की उसके लिए वह पीयूष का लंड चूसने के लिए तैयार हो जाती। वह चाहती थी की पीयूष पूरी रात उसकी चुत चाटता रहे.. पर पूरे दिन की थकान के बाद पीयूष, कविता पर चढ़कर थोड़ी बहोत उछलकूद करके सो जाता.. वैसे तो कविता भी पूरा दिन घर का काम कर थक जाती थी.. पर जिस्म की भूख सब हिसाब मांगती है.. दो तीन दिन बिना चुदे निकल जाने के बाद कविता ऐसी ऐसी जगहों पर छेड़ती की पीयूष उत्तेजित होकर उसे चोद देता.. कविता के लिए पीयूष ही उसका सर्वस्व था..

शीला और कविता आज अच्छा खासा समय साथ बिताने वाले थे.. शीला के शरीर से वीर्य की गंध आ रही थी.. और इस गंध से कविता भलीभाँति वाकिफ थी.. शीला को रात के अंधेरे में खुले दरवाजे के पास खड़े खड़े रसिक से जिस तरह चुदवाते देखा था.. वह द्रश्य कविता की आँखों से हट ही नही रहा था...


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शीला कविता के बदन को अहोभाव से देखने लगी.. दिवाली में बेंक से मिले १०० रुपये के नए नोट के बंडल जैसी दिख रही थी कविता..

"एक बार नींद उड़ जाएँ तो वापिस जल्दी आती ही नही" कविता बोली

"हाँ कविता.. कभी कभी मेरी नींद भी आधी रात को उड़ जाती है.. फिर सुबह तक करवटें बदलती रहती हूँ" शीला ने अपना दुख सुनाया

"फिर आपको ताला मिला की नही?" कविता ने पूछा

"हाँ मिला आखिर.. घर में ही था.. थोड़ा ढूँढना पड़ा.. "शीला ने कहा

"मुझे तो ऐसा लगा की आप चाबी ढूंढ रही थी.. ताला तो आपके पास पहले से ही है" कविता ने गूढ भाषा में सिक्सर लगाई

"नही नही.. ताला ही नही मिल रहा था.. चाबी तो थी मेरे पास" कविता की द्विअर्थी बात का भावार्थ नही समझ पाई शीला

"भाभी, एक बात पूछूँ?"

"पूछ ना... जो भी पूछना है.. " शीला ने कहा

"जब हम पिरियड्स में हो... तब कर सकते है?" कविता ने थोड़ी सी शर्म के साथ कहा

"क्यों? तेरा पीयूष बहुत जिद करता है क्या?" शीला ने शरारत करते हुए कहा

"नही भाभी.. पर मुझे ही उस दौरान बहुत मन करता है करवाने का.. पर में अगर ज्यादा फोर्स करती हूँ तो पीयूष नाराज हो जाता है " कविता ने कहा
कविता की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा "तू तो जोरदार खिलाड़ी निकली कविता.. हमारी जवानी में तो पति जिद करता और हम मना करते थे.. फिर आखिर वह हाथ से हिलाकर... छातियों पर झड़कर शांत हो जाते.. पर अब तो पूरा माहोल ही बदल चुका है"

कविता: "अब मेरा मन करता है तो में क्या करूँ भाभी!! पीयूष तो उन दिनों में मुझसे दूर ही रहता है"

शीला: "हम्म.. इसका एक इलाज है मेरा पास, कविता"

कविता: "वो क्या भाभी?"

शीला: "तुझे अपनी उंगली से ही काम चलाना होगा.. जब भी तू अपना सैनिटेरी पेड़ बदलने जाएँ.. तब नीचे पानी से बराबर साफ करके.. उंगली से कर लेने के बाद.. नया सैनिटेरी पेड़ लगा लेना"

कविता: "पर भाभी, उसमें असली चीज जैसा मज़ा तो नही आएगा ना!!"

शीला: "ओहो.. अब तुझे उंगली से असली मर्द वाला मज़ा लेना है.. वो तो मुमकिन नही है.... एक बात समझ ले कविता.. उंगली में लंड जैसा मज़ा तो आने से रहा.." शीला को अचानक एहसास हुआ की सामने रघु या जीवा नही थे.. वह शरमा गई "माफ करना.. मेरे मुंह से ऐसे शब्द निकल गए"

कविता: "अरे, उसमें क्या है भाभी.. अभी तो हम दोनों अकेले ही है ना.. रात को बेडरूम में पीयूष भी बहुत गालियां बकता है.. अच्छा भाभी.. मदन भाई कब वापिस लौटने वाले है?"

शीला ने एक भारी सांस छोड़कर कहा "अभी और चार महीने बाकी है उसे आने को कविता"

शीला के बायें स्तन पर कविता की कुहनी छु रही थी.. शीला ने जानबूझकर अपने शरीर को कविता की दिशा में ओर झुकाया.. उसका स्तन अब कविता की कुहनी से ओर ज्यादा दब गया.. कविता ने अपनी टांगें चौड़ी की और शीला की ओर करवट करते हुए शीला के स्तनों के बिल्कुल सामने आ गई.. शीला के पर्वत जैसे दोनों स्तनों को वह एकटक देखने लगी..

अपनी एक टांग शीला की जांघ पर रखते हुए कविता ने पूछा "भाभी.. आपको भी मन तो करता होगा ना"

शीला: "मन तो बड़ा करता है.. पर क्या कर सकती हूँ?"

कविता: "तो आप फिर उंगली का सहारा नही लेती?"

शीला: "उम्र हो गई है कविता.. अब उंगली से काम नही बनता मेरा.. "

कविता: "तो फिर आप क्या करती है?"

शीला: "तू क्या करेगी जानकर? बड़ी मुश्किल से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा है मैंने.. तू तो ये सब बातें करते हुए मेरी आग भड़का देगी.. तेरा क्या है.. तू तो अपने पीयूष के नीचे घुसकर अपनी आग बुझा लेगी.. तड़पना तो फिर मुझे ही पड़ेगा ना!!"

कविता: "तो फिर आप अपनी आग बुझाने के लिए रसिक को क्यों नही बुला लेती?" आखिर उसने बॉम्ब फोड़ ही दिया

शीला स्तब्ध होकर बोली "कौन... वो दूधवाला?? वो कैसे बुझाएगा मेरी आग भला?"

कविता: "कैसे बुझाएगा?? दरवाजे पर हाथ रखकर.. पीछे से करते हुए.. और कैसे?" उसने शरारती मुस्कान के साथ शीला का भंडाफोड़ कर दिया

शीला के पैरों तले से जमीन खिसक गई। कविता के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए उसने कहा

"बस बस.. चुप हो जा तू.. और किसी को बताना मत.. समझी!!" कहकर शीला ने कविता को अपने आगोश में भर लिया और पूरा जोर लगाकर मसल दिया..

शीला का शातिर दिमाग काम पर लग गया.... अब कविता को पटाकर अपने वश में रखना पड़ेगा.. ताकि यह कमीनी किसी को बता न दे..

कविता: "ये क्या कर रही हो भाभी? ओह्ह.. "

शीला ने करीब आकर कविता के होंठों पर अपने गरम होंठ रखकर एक जबरदस्त चुंबन रसीद कर दिया.. और फिर कविता का मुंह अपने दोनों स्तनों के बीच दबा दिया

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शीला की मखमल के तकिये जैसी नरम छातियों से चिपक कर कविता ने भी शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और फिर शीला के गालों को चूमते हुए उसके मम्मे दबाने लगी... "भाभी, मेरे बॉल इतने बड़े कब होंगे? पीयूष को बड़े बॉल बहोत पसंद है"

यह सुनते ही शीला ने अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. और अपनी जायदाद कविता के सामने खोल दी.. कविता की आँखें फट गई

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"देख क्या रही है कविता? चूसना शुरू कर.. "

कविता शीला के गोरे गोरे स्तनों की निप्पल को चूमकर बोली "भाभी.. क्या आप मेरी नीचे चाटोगे? कल रात को पीयूष को कितनी बार कहा.. पर वो इतना थका हुआ था की उसने चाटने से मना कर दिया.. कल रात से खुजली हो रही है मुझे.. प्लीज भाभी"

कविता का हाथ हटाकर शीला ने उसके दोनों संतरों को मसल दिया और कहा


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"कविता, तेरे स्तन भी मेरी तरह बड़े बड़े हो जाएंगे.. तू रोज मेरे घर आकर तिल के तेल से मालिश करवा लेना.. फिर देखना तेरे बॉल कितने बड़े बन जाते है"

कविता: "वो छोड़ो भाभी... आप मेरी चाटिए ना!!"

कविता के गाउन में हाथ डालकर शीला ने उसकी चुत में दो उंगली घुसा दी.. और अंदर बाहर करने लगी

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कविता अब शीला के मदमस्त स्तनों को चूमकर गीली हो चुकी थी.. उससे रहा न गया.. वह खड़ी हो गई.. अपने गाउन को कमर तक उठा लिया.. और अपनी चुत को शीला के मुंह पर रखकर बैठ गई.. उसके कूल्हे शीला के स्तनों से रगड़ खा रहे थे.. वह शीला के होंठों पर.. गालों पर.. अपनी चुत घिसने लगी.. शीला ने कविता के गुलाबी छेद को चौड़ा किया और अंदर अपनी जीभ डाल दी..

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कविता अब बावरी बन गई.. शीला के मुंह पर दबाव बनाकर घिसने लगी.. अब उसने अपनी हथेलियों से शीला के बालों को पकड़ लिया और उसके मुँह पर अपनी चुत दबाते हुए झड़ गई.. !!

"आहहह आहहह... आह्हह!!" कविता बड़बड़ा रही थी.. सांसें नियंत्रित होने तक वह कुछ बोल नही पाई। कविता की चुत ठंडी हो जाने के बावजूद शीला उसे चाटती रही.. चाटती ही रही...

थोड़ी देर बाद कविता शीला के ऊपर से उतर गई.. और फिर अपने गाउन से शीला का गीला मुंह पोंछकर बोली

"ओह भाभी... आपने तो... अब क्या कहूँ आपसे? इस तरह तो पीयूष ने भी मुझे मज़ा नही दिया है आज तक.. बहोत मज़ा आया भाभी"

स्खलन से थकी कविता की आँखें बंद होने लगी.. जबरदस्त ऑर्गजम का आनंद लेकर, शीला के बोबलों को सहलाते हुए, कविता गहरी नींद सो गई..

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शीला भी पूरी रात की भीषण चुदाईयों से बहोत थक चुकी थी.. कविता के नाजुक स्तनों को मसलते हुए वह भी सो गई।

सुबह होते ही कविता और शीला दोनों जाग गए.. पर बिस्तर में ही पड़े पड़े एक दूसरे के अंगों से खेलते रहे

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"भाभी, रसिक के साथ सेटिंग कैसे की आपने?" कविता ने पूछा

"कविता, मैं दो सालों से बिना लंड के तड़प रही थी.. अब इस उम्र में कहाँ लंड ढूँढने जाती!! ये तो अच्छा हुआ की रसिक की बीवी रूखी के साथ मेरी दोस्ती हो गई.. और मेरी तकलीफों का अंत आया.. नहीं तो पता नही क्या होता" कविता बड़े ही ध्यान से शीला की बातें सुन रही थी और शीला के स्तनों के साथ खेल रही थी

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कविता: "भाभी, आप मेरी एक मदद करोगी?"

शीला: "बता ना.. क्या चाहिए तुझे?"

कविता: "बात दरअसल ऐसी है की मेरे मायके में मेरा एक बॉयफ्रेंड है.. पिंटू.. मुझसे ६ साल छोटा है.. "

शीला ने आश्चर्य से पूछा.. "तुझसे ६ साल छोटा बॉयफ्रेंड है तेरा??"

कविता: "वो हमारे पड़ोस में रहता है.. कई बार मेरे घर आता था.. और पढ़ाई में मेरी मदद भी करता था.. पढ़ते पढ़ते मैं उसके प्यार में कब पड़ गई मुझे पता ही नही चला.. "

शीला: "तूने चुदवाया है उस लड़के से?"

कविता: "ऊपर ऊपर से सब किया है.. वो मेरे बॉल दबाता.. होंठ चूमता.. पर उससे चुदवा नही पाई.. मैंने उसे कई बार कहा चोदने को.. पर उसने ही मना कर दिया.. वो कहता था की पहली चुदाई तो मुझे मेरी पति के साथ ही करनी है.. उसके बाद ही वो मुझे चोदेगा"

शीला: "बड़ा अच्छा लड़का है.. वरना लड़की सामने से टांगें खोल रही हो तब कौन मना करता है भला?? लोग चोदने के लिए कितने पैसे भी खर्च कर देते है"

कविता: "इसी लिए तो मुझे बहोत पसंद है पिंटू"

शीला: "तू अभी भी चाहती है उसे? तो फिर शादी के बाद चुदवाया क्यों नही उस लड़के से!!"

कविता: "उसकी याद तो मुझे रोज आती है भाभी.. पर मायके जाना नसीब ही नही हुआ अब तक.. वो मुझे कभी फोन भी नही करता.. मैं ही फोन करती रहती हूँ उसे.. जब भी टाइम मिले.. मुझे पिंटू से चुदवाने का बहोत मन है.. पर कुछ सेटिंग ही नही हो रहा"

शीला: "क्या कभी तूने उसका लंड पकड़ा था?"

कविता: "हाँ.. वैसे एक बार मुंह में लेकर चूसा भी था.. अब मुझे बहोत जोर से मन कर रहा है पिंटू से चुदने का.. "

शीला: "चिंता मत कर पगली.. बुला ले उसे मेरे घर.. दोपहर को जब तेरी सास सो जाएँ तब मेरे घर आ जाना.. और अपना काम निपटाकर निकल जाना"

कविता: "बस यही मदद चाहती थी मैं भाभी.. आप कितनी अच्छी हो!! आप कहों तो आज ही बुला लूँ पिंटू को? अभी सुबह के ६:३० बजे है.. अपने रूम में सो रहा होगा.. फोन कर देती हूँ.. आठ बजे निकलेगा तो भी डेढ़ घंटे में यहाँ पहुँच जाएगा" कविता बड़े ही उत्साह से कह रही थी.. अपने प्रेमी से मिलने के लिए वह उतावली हो रही थी.. शीला ने कविता की बिना झांटों वाली बुर को सहला सहला कर गीली कर दी।

शीला: कविता.. प्रेमीओ को मदद करना तो बड़े पुण्य का काम है.. तू बुला ले उसे.. आज तो तेरे सास-ससुर और पति तीनों बाहर है.. ऐसा मौका फिर नही मिलेगा.. तू पूरा दिन आराम से पिंटू के संग मजे करना.. तुम दोनों का खाना मेरे घर पर बना दूँगी.. अब खुश!!"

कविता ने खुश होकर शीला को गले लगा लिया.. शीला ने कविता का सिर पकड़कर अपने जिस्म पर दबा दिया..

"चल इसी बात पर मेरी चुत चाट दे.. कब से मेरे बबले मसल मसल कर गरम कर दिया मुझे.. "

कविता ने पालतू कुत्तिया की तरह शीला के आदेश अनुसार उसकी चुत चुत चाटना शुरू कर दिया.. शीला अब वासना के समंदर में गोते खाने लगी.. बिस्तर से १ फुट ऊपर अपने चूतड़ उठाकर वह कविता से अपनी चुत चटवाने लगी.. थोड़ी ही देर में सिसकियाँ भरते हुए शीला झड़ गई.. और कविता के सिर को अपनी दोनों जांघों के बीच दबा दिया.. शीला की चुत चाटते हुए कविता भी अपनी चुत को गुदगुदाते हुए स्खलित हो गई.. पिंटू के साथ.. रंगरेलियाँ मनाने का अवसर मिलने के खयाल मात्र से, कविता का रोम रोम रोमांचित हो उठाया.. उसने पिंटू को मोबाइल पर कॉल लगाया।

"पिंटू आ रहा है भाभी" खुशी से उछलते हुए कविता ने कहा.. ६ महीने बाद मिलूँगी.. कविता के चेहरे पर छलकती खुशी को देखकर शीला को भी अच्छा लगा..

"मैं घर पहुंचकर थोड़ी सफाई कर लेटी हूँ.. पिंटू और तेरे लिए बिस्तर भी ठीक-ठाक करना होगा.."

"ठीक है भाभी... मैं भी नहाकर फ्रेश हो जाती हूँ.."

"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी


"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई
बहुत ही शानदार और मजेदार अपडेट है कविता ने रसिक के शीला की चुदाई देख ली है उसने ये बात बता कर शीला पर बॉम्ब फोड़ दिया है कविता ने अपने दिल की बात कह दी है कविता अपने बॉयफ्रेंड से चूदवाना चाहती है और उसने ये बात शीला को बोल दी है शिला के पास अब कविता की बात मानने के सिवा कोई और चारा नहीं है अब देखते हैं क्या कविता के साथ शीला भी पिंटू से चुदती है या नही
 

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रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..

पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. वह भागकर अपने घर वापिस आई और अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

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तभी शीला कविता के घर आ पहुंची.. "अरे मुझे ताला ही नही मिल रहा था... इसलिए देर लग गई मुझे.. " शीला ने सफाई देते हुए कहा

यह सुनकर कविता मन ही मन में मुस्कुराने लगी..

"चलिए भाभी... अब सो जाते है.. " शीला और कविता बेडरूम में गए और बिस्तर पर लेटे लेटे बातें करने लगे

"कब से बारिश हो रही है.. रुक ही नही रही!!" कविता ने कहा

"अब बारिश की सीजन है.. पानी तो बरसेगा ही.. तुम लोगों को तो बारिश पसंद होनी चाहिए.. नए शादीशुदा जोड़ों को तो बारिश में बहुत मज़ा आता है.. हमारे जैसे पुराने चावलों को जरुर बारिश में परेशानी होती है.. " शीला ने कहा

कविता २४ साल की जवान छोकरी थी.. एकदम कोरा माल.. ३४ इंच के स्तन.. मस्त कडक संतरे जैसे.. पतली सी कमर.. सीधी सी लड़की... चुदाई के मामले में जिसे नौसिखिया कहा जा सकता है.. वही श्रेणी में थी कविता.. थोड़ी दुबली पतली.. अब तक उसके कूल्हे बड़े नही हुए थे.. प्रायः चुदाई के एकाद साल के बाद नितंबों का विकास होता है.. जो अब तक कविता का नही हुआ था.. एकदम गोरी त्वचा.. देखते ही पसंद आ जाएँ ऐसा रूप.. नई नई शादी हुई थी इसलिए सब बातें जानने की बेहद जिज्ञासा थी कविता में..

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घर में बूढ़े सास और ससुर.. पड़ोस में उसकी उम्र की अन्य लड़कियां थी पर कविता का उनसे ज्यादा परिचय नही हुआ था.. कविता का पति पीयूष.. कविता को "गरीबों की बचत" की तरह इस्तेमाल करता था.. कविता को कभी कभी ही चोदता था.. कभी कभी मोबाइल पर व्हाट्सएप पर आई हुई पॉर्न क्लिपिंग कविता को दिखाकर उत्तेजित करता.. उन विडिओ को कविता बड़े ही ध्यान से देखती.. और उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करती..

कुछ दिन पहले ही उसने विडिओ में देखकर पीयूष का लँड चूसना शुरू किया था.. वैसे कविता को इसमे ज्यादा मज़ा नही आता था.. वह सोचती थी की लंड जैसी चीज को क्यों चूसना चाहिए?? इसमें भला क्या मज़ा? कोई स्वाद तो आता नही.. पर पीयूष जब उसकी चुत को चूमता था तब उसे ऐसा लगता था जैसे उसका जीवन सफल हो गया.. चुत चटवाना उसे इतना पसंद था की उसके लिए वह पीयूष का लंड चूसने के लिए तैयार हो जाती। वह चाहती थी की पीयूष पूरी रात उसकी चुत चाटता रहे.. पर पूरे दिन की थकान के बाद पीयूष, कविता पर चढ़कर थोड़ी बहोत उछलकूद करके सो जाता.. वैसे तो कविता भी पूरा दिन घर का काम कर थक जाती थी.. पर जिस्म की भूख सब हिसाब मांगती है.. दो तीन दिन बिना चुदे निकल जाने के बाद कविता ऐसी ऐसी जगहों पर छेड़ती की पीयूष उत्तेजित होकर उसे चोद देता.. कविता के लिए पीयूष ही उसका सर्वस्व था..

शीला और कविता आज अच्छा खासा समय साथ बिताने वाले थे.. शीला के शरीर से वीर्य की गंध आ रही थी.. और इस गंध से कविता भलीभाँति वाकिफ थी.. शीला को रात के अंधेरे में खुले दरवाजे के पास खड़े खड़े रसिक से जिस तरह चुदवाते देखा था.. वह द्रश्य कविता की आँखों से हट ही नही रहा था...


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शीला कविता के बदन को अहोभाव से देखने लगी.. दिवाली में बेंक से मिले १०० रुपये के नए नोट के बंडल जैसी दिख रही थी कविता..

"एक बार नींद उड़ जाएँ तो वापिस जल्दी आती ही नही" कविता बोली

"हाँ कविता.. कभी कभी मेरी नींद भी आधी रात को उड़ जाती है.. फिर सुबह तक करवटें बदलती रहती हूँ" शीला ने अपना दुख सुनाया

"फिर आपको ताला मिला की नही?" कविता ने पूछा

"हाँ मिला आखिर.. घर में ही था.. थोड़ा ढूँढना पड़ा.. "शीला ने कहा

"मुझे तो ऐसा लगा की आप चाबी ढूंढ रही थी.. ताला तो आपके पास पहले से ही है" कविता ने गूढ भाषा में सिक्सर लगाई

"नही नही.. ताला ही नही मिल रहा था.. चाबी तो थी मेरे पास" कविता की द्विअर्थी बात का भावार्थ नही समझ पाई शीला

"भाभी, एक बात पूछूँ?"

"पूछ ना... जो भी पूछना है.. " शीला ने कहा

"जब हम पिरियड्स में हो... तब कर सकते है?" कविता ने थोड़ी सी शर्म के साथ कहा

"क्यों? तेरा पीयूष बहुत जिद करता है क्या?" शीला ने शरारत करते हुए कहा

"नही भाभी.. पर मुझे ही उस दौरान बहुत मन करता है करवाने का.. पर में अगर ज्यादा फोर्स करती हूँ तो पीयूष नाराज हो जाता है " कविता ने कहा
कविता की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा "तू तो जोरदार खिलाड़ी निकली कविता.. हमारी जवानी में तो पति जिद करता और हम मना करते थे.. फिर आखिर वह हाथ से हिलाकर... छातियों पर झड़कर शांत हो जाते.. पर अब तो पूरा माहोल ही बदल चुका है"

कविता: "अब मेरा मन करता है तो में क्या करूँ भाभी!! पीयूष तो उन दिनों में मुझसे दूर ही रहता है"

शीला: "हम्म.. इसका एक इलाज है मेरा पास, कविता"

कविता: "वो क्या भाभी?"

शीला: "तुझे अपनी उंगली से ही काम चलाना होगा.. जब भी तू अपना सैनिटेरी पेड़ बदलने जाएँ.. तब नीचे पानी से बराबर साफ करके.. उंगली से कर लेने के बाद.. नया सैनिटेरी पेड़ लगा लेना"

कविता: "पर भाभी, उसमें असली चीज जैसा मज़ा तो नही आएगा ना!!"

शीला: "ओहो.. अब तुझे उंगली से असली मर्द वाला मज़ा लेना है.. वो तो मुमकिन नही है.... एक बात समझ ले कविता.. उंगली में लंड जैसा मज़ा तो आने से रहा.." शीला को अचानक एहसास हुआ की सामने रघु या जीवा नही थे.. वह शरमा गई "माफ करना.. मेरे मुंह से ऐसे शब्द निकल गए"

कविता: "अरे, उसमें क्या है भाभी.. अभी तो हम दोनों अकेले ही है ना.. रात को बेडरूम में पीयूष भी बहुत गालियां बकता है.. अच्छा भाभी.. मदन भाई कब वापिस लौटने वाले है?"

शीला ने एक भारी सांस छोड़कर कहा "अभी और चार महीने बाकी है उसे आने को कविता"

शीला के बायें स्तन पर कविता की कुहनी छु रही थी.. शीला ने जानबूझकर अपने शरीर को कविता की दिशा में ओर झुकाया.. उसका स्तन अब कविता की कुहनी से ओर ज्यादा दब गया.. कविता ने अपनी टांगें चौड़ी की और शीला की ओर करवट करते हुए शीला के स्तनों के बिल्कुल सामने आ गई.. शीला के पर्वत जैसे दोनों स्तनों को वह एकटक देखने लगी..

अपनी एक टांग शीला की जांघ पर रखते हुए कविता ने पूछा "भाभी.. आपको भी मन तो करता होगा ना"

शीला: "मन तो बड़ा करता है.. पर क्या कर सकती हूँ?"

कविता: "तो आप फिर उंगली का सहारा नही लेती?"

शीला: "उम्र हो गई है कविता.. अब उंगली से काम नही बनता मेरा.. "

कविता: "तो फिर आप क्या करती है?"

शीला: "तू क्या करेगी जानकर? बड़ी मुश्किल से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा है मैंने.. तू तो ये सब बातें करते हुए मेरी आग भड़का देगी.. तेरा क्या है.. तू तो अपने पीयूष के नीचे घुसकर अपनी आग बुझा लेगी.. तड़पना तो फिर मुझे ही पड़ेगा ना!!"

कविता: "तो फिर आप अपनी आग बुझाने के लिए रसिक को क्यों नही बुला लेती?" आखिर उसने बॉम्ब फोड़ ही दिया

शीला स्तब्ध होकर बोली "कौन... वो दूधवाला?? वो कैसे बुझाएगा मेरी आग भला?"

कविता: "कैसे बुझाएगा?? दरवाजे पर हाथ रखकर.. पीछे से करते हुए.. और कैसे?" उसने शरारती मुस्कान के साथ शीला का भंडाफोड़ कर दिया

शीला के पैरों तले से जमीन खिसक गई। कविता के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए उसने कहा

"बस बस.. चुप हो जा तू.. और किसी को बताना मत.. समझी!!" कहकर शीला ने कविता को अपने आगोश में भर लिया और पूरा जोर लगाकर मसल दिया..

शीला का शातिर दिमाग काम पर लग गया.... अब कविता को पटाकर अपने वश में रखना पड़ेगा.. ताकि यह कमीनी किसी को बता न दे..

कविता: "ये क्या कर रही हो भाभी? ओह्ह.. "

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शीला की मखमल के तकिये जैसी नरम छातियों से चिपक कर कविता ने भी शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और फिर शीला के गालों को चूमते हुए उसके मम्मे दबाने लगी... "भाभी, मेरे बॉल इतने बड़े कब होंगे? पीयूष को बड़े बॉल बहोत पसंद है"

यह सुनते ही शीला ने अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. और अपनी जायदाद कविता के सामने खोल दी.. कविता की आँखें फट गई

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"देख क्या रही है कविता? चूसना शुरू कर.. "

कविता शीला के गोरे गोरे स्तनों की निप्पल को चूमकर बोली "भाभी.. क्या आप मेरी नीचे चाटोगे? कल रात को पीयूष को कितनी बार कहा.. पर वो इतना थका हुआ था की उसने चाटने से मना कर दिया.. कल रात से खुजली हो रही है मुझे.. प्लीज भाभी"

कविता का हाथ हटाकर शीला ने उसके दोनों संतरों को मसल दिया और कहा


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कविता: "वो छोड़ो भाभी... आप मेरी चाटिए ना!!"

कविता के गाउन में हाथ डालकर शीला ने उसकी चुत में दो उंगली घुसा दी.. और अंदर बाहर करने लगी

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कविता अब शीला के मदमस्त स्तनों को चूमकर गीली हो चुकी थी.. उससे रहा न गया.. वह खड़ी हो गई.. अपने गाउन को कमर तक उठा लिया.. और अपनी चुत को शीला के मुंह पर रखकर बैठ गई.. उसके कूल्हे शीला के स्तनों से रगड़ खा रहे थे.. वह शीला के होंठों पर.. गालों पर.. अपनी चुत घिसने लगी.. शीला ने कविता के गुलाबी छेद को चौड़ा किया और अंदर अपनी जीभ डाल दी..

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कविता अब बावरी बन गई.. शीला के मुंह पर दबाव बनाकर घिसने लगी.. अब उसने अपनी हथेलियों से शीला के बालों को पकड़ लिया और उसके मुँह पर अपनी चुत दबाते हुए झड़ गई.. !!

"आहहह आहहह... आह्हह!!" कविता बड़बड़ा रही थी.. सांसें नियंत्रित होने तक वह कुछ बोल नही पाई। कविता की चुत ठंडी हो जाने के बावजूद शीला उसे चाटती रही.. चाटती ही रही...

थोड़ी देर बाद कविता शीला के ऊपर से उतर गई.. और फिर अपने गाउन से शीला का गीला मुंह पोंछकर बोली

"ओह भाभी... आपने तो... अब क्या कहूँ आपसे? इस तरह तो पीयूष ने भी मुझे मज़ा नही दिया है आज तक.. बहोत मज़ा आया भाभी"

स्खलन से थकी कविता की आँखें बंद होने लगी.. जबरदस्त ऑर्गजम का आनंद लेकर, शीला के बोबलों को सहलाते हुए, कविता गहरी नींद सो गई..

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सुबह होते ही कविता और शीला दोनों जाग गए.. पर बिस्तर में ही पड़े पड़े एक दूसरे के अंगों से खेलते रहे

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"भाभी, रसिक के साथ सेटिंग कैसे की आपने?" कविता ने पूछा

"कविता, मैं दो सालों से बिना लंड के तड़प रही थी.. अब इस उम्र में कहाँ लंड ढूँढने जाती!! ये तो अच्छा हुआ की रसिक की बीवी रूखी के साथ मेरी दोस्ती हो गई.. और मेरी तकलीफों का अंत आया.. नहीं तो पता नही क्या होता" कविता बड़े ही ध्यान से शीला की बातें सुन रही थी और शीला के स्तनों के साथ खेल रही थी

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कविता: "भाभी, आप मेरी एक मदद करोगी?"

शीला: "बता ना.. क्या चाहिए तुझे?"

कविता: "बात दरअसल ऐसी है की मेरे मायके में मेरा एक बॉयफ्रेंड है.. पिंटू.. मुझसे ६ साल छोटा है.. "

शीला ने आश्चर्य से पूछा.. "तुझसे ६ साल छोटा बॉयफ्रेंड है तेरा??"

कविता: "वो हमारे पड़ोस में रहता है.. कई बार मेरे घर आता था.. और पढ़ाई में मेरी मदद भी करता था.. पढ़ते पढ़ते मैं उसके प्यार में कब पड़ गई मुझे पता ही नही चला.. "

शीला: "तूने चुदवाया है उस लड़के से?"

कविता: "ऊपर ऊपर से सब किया है.. वो मेरे बॉल दबाता.. होंठ चूमता.. पर उससे चुदवा नही पाई.. मैंने उसे कई बार कहा चोदने को.. पर उसने ही मना कर दिया.. वो कहता था की पहली चुदाई तो मुझे मेरी पति के साथ ही करनी है.. उसके बाद ही वो मुझे चोदेगा"

शीला: "बड़ा अच्छा लड़का है.. वरना लड़की सामने से टांगें खोल रही हो तब कौन मना करता है भला?? लोग चोदने के लिए कितने पैसे भी खर्च कर देते है"

कविता: "इसी लिए तो मुझे बहोत पसंद है पिंटू"

शीला: "तू अभी भी चाहती है उसे? तो फिर शादी के बाद चुदवाया क्यों नही उस लड़के से!!"

कविता: "उसकी याद तो मुझे रोज आती है भाभी.. पर मायके जाना नसीब ही नही हुआ अब तक.. वो मुझे कभी फोन भी नही करता.. मैं ही फोन करती रहती हूँ उसे.. जब भी टाइम मिले.. मुझे पिंटू से चुदवाने का बहोत मन है.. पर कुछ सेटिंग ही नही हो रहा"

शीला: "क्या कभी तूने उसका लंड पकड़ा था?"

कविता: "हाँ.. वैसे एक बार मुंह में लेकर चूसा भी था.. अब मुझे बहोत जोर से मन कर रहा है पिंटू से चुदने का.. "

शीला: "चिंता मत कर पगली.. बुला ले उसे मेरे घर.. दोपहर को जब तेरी सास सो जाएँ तब मेरे घर आ जाना.. और अपना काम निपटाकर निकल जाना"

कविता: "बस यही मदद चाहती थी मैं भाभी.. आप कितनी अच्छी हो!! आप कहों तो आज ही बुला लूँ पिंटू को? अभी सुबह के ६:३० बजे है.. अपने रूम में सो रहा होगा.. फोन कर देती हूँ.. आठ बजे निकलेगा तो भी डेढ़ घंटे में यहाँ पहुँच जाएगा" कविता बड़े ही उत्साह से कह रही थी.. अपने प्रेमी से मिलने के लिए वह उतावली हो रही थी.. शीला ने कविता की बिना झांटों वाली बुर को सहला सहला कर गीली कर दी।

शीला: कविता.. प्रेमीओ को मदद करना तो बड़े पुण्य का काम है.. तू बुला ले उसे.. आज तो तेरे सास-ससुर और पति तीनों बाहर है.. ऐसा मौका फिर नही मिलेगा.. तू पूरा दिन आराम से पिंटू के संग मजे करना.. तुम दोनों का खाना मेरे घर पर बना दूँगी.. अब खुश!!"

कविता ने खुश होकर शीला को गले लगा लिया.. शीला ने कविता का सिर पकड़कर अपने जिस्म पर दबा दिया..

"चल इसी बात पर मेरी चुत चाट दे.. कब से मेरे बबले मसल मसल कर गरम कर दिया मुझे.. "

कविता ने पालतू कुत्तिया की तरह शीला के आदेश अनुसार उसकी चुत चुत चाटना शुरू कर दिया.. शीला अब वासना के समंदर में गोते खाने लगी.. बिस्तर से १ फुट ऊपर अपने चूतड़ उठाकर वह कविता से अपनी चुत चटवाने लगी.. थोड़ी ही देर में सिसकियाँ भरते हुए शीला झड़ गई.. और कविता के सिर को अपनी दोनों जांघों के बीच दबा दिया.. शीला की चुत चाटते हुए कविता भी अपनी चुत को गुदगुदाते हुए स्खलित हो गई.. पिंटू के साथ.. रंगरेलियाँ मनाने का अवसर मिलने के खयाल मात्र से, कविता का रोम रोम रोमांचित हो उठाया.. उसने पिंटू को मोबाइल पर कॉल लगाया।

"पिंटू आ रहा है भाभी" खुशी से उछलते हुए कविता ने कहा.. ६ महीने बाद मिलूँगी.. कविता के चेहरे पर छलकती खुशी को देखकर शीला को भी अच्छा लगा..

"मैं घर पहुंचकर थोड़ी सफाई कर लेटी हूँ.. पिंटू और तेरे लिए बिस्तर भी ठीक-ठाक करना होगा.."

"ठीक है भाभी... मैं भी नहाकर फ्रेश हो जाती हूँ.."

"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी


"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई
कविता ने रसिक के साथ शीला की चुदाई
रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..

पर तब तक बहोत देर हो गई थी.. कविता ने यह सारा द्रश्य देख लिया था.. !! भाभी अब तक क्यों नही आए!! देखने के लिए वह शीला के घर के तरफ आई.. और शीला को खुले दरवाजे के पास रसिक से चुदवाते हुए देख लिया.. वह भागकर अपने घर वापिस आई और अचरज से सोचने लगी.. उसने जो देखा था वह अकल्पनीय था.. शीला भाभी?? एक दूधवाले के साथ? बाप रे.. विश्वास ही नही होता..."

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तभी शीला कविता के घर आ पहुंची.. "अरे मुझे ताला ही नही मिल रहा था... इसलिए देर लग गई मुझे.. " शीला ने सफाई देते हुए कहा

यह सुनकर कविता मन ही मन में मुस्कुराने लगी..

"चलिए भाभी... अब सो जाते है.. " शीला और कविता बेडरूम में गए और बिस्तर पर लेटे लेटे बातें करने लगे

"कब से बारिश हो रही है.. रुक ही नही रही!!" कविता ने कहा

"अब बारिश की सीजन है.. पानी तो बरसेगा ही.. तुम लोगों को तो बारिश पसंद होनी चाहिए.. नए शादीशुदा जोड़ों को तो बारिश में बहुत मज़ा आता है.. हमारे जैसे पुराने चावलों को जरुर बारिश में परेशानी होती है.. " शीला ने कहा

कविता २४ साल की जवान छोकरी थी.. एकदम कोरा माल.. ३४ इंच के स्तन.. मस्त कडक संतरे जैसे.. पतली सी कमर.. सीधी सी लड़की... चुदाई के मामले में जिसे नौसिखिया कहा जा सकता है.. वही श्रेणी में थी कविता.. थोड़ी दुबली पतली.. अब तक उसके कूल्हे बड़े नही हुए थे.. प्रायः चुदाई के एकाद साल के बाद नितंबों का विकास होता है.. जो अब तक कविता का नही हुआ था.. एकदम गोरी त्वचा.. देखते ही पसंद आ जाएँ ऐसा रूप.. नई नई शादी हुई थी इसलिए सब बातें जानने की बेहद जिज्ञासा थी कविता में..

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घर में बूढ़े सास और ससुर.. पड़ोस में उसकी उम्र की अन्य लड़कियां थी पर कविता का उनसे ज्यादा परिचय नही हुआ था.. कविता का पति पीयूष.. कविता को "गरीबों की बचत" की तरह इस्तेमाल करता था.. कविता को कभी कभी ही चोदता था.. कभी कभी मोबाइल पर व्हाट्सएप पर आई हुई पॉर्न क्लिपिंग कविता को दिखाकर उत्तेजित करता.. उन विडिओ को कविता बड़े ही ध्यान से देखती.. और उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करती..

कुछ दिन पहले ही उसने विडिओ में देखकर पीयूष का लँड चूसना शुरू किया था.. वैसे कविता को इसमे ज्यादा मज़ा नही आता था.. वह सोचती थी की लंड जैसी चीज को क्यों चूसना चाहिए?? इसमें भला क्या मज़ा? कोई स्वाद तो आता नही.. पर पीयूष जब उसकी चुत को चूमता था तब उसे ऐसा लगता था जैसे उसका जीवन सफल हो गया.. चुत चटवाना उसे इतना पसंद था की उसके लिए वह पीयूष का लंड चूसने के लिए तैयार हो जाती। वह चाहती थी की पीयूष पूरी रात उसकी चुत चाटता रहे.. पर पूरे दिन की थकान के बाद पीयूष, कविता पर चढ़कर थोड़ी बहोत उछलकूद करके सो जाता.. वैसे तो कविता भी पूरा दिन घर का काम कर थक जाती थी.. पर जिस्म की भूख सब हिसाब मांगती है.. दो तीन दिन बिना चुदे निकल जाने के बाद कविता ऐसी ऐसी जगहों पर छेड़ती की पीयूष उत्तेजित होकर उसे चोद देता.. कविता के लिए पीयूष ही उसका सर्वस्व था..

शीला और कविता आज अच्छा खासा समय साथ बिताने वाले थे.. शीला के शरीर से वीर्य की गंध आ रही थी.. और इस गंध से कविता भलीभाँति वाकिफ थी.. शीला को रात के अंधेरे में खुले दरवाजे के पास खड़े खड़े रसिक से जिस तरह चुदवाते देखा था.. वह द्रश्य कविता की आँखों से हट ही नही रहा था...


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शीला कविता के बदन को अहोभाव से देखने लगी.. दिवाली में बेंक से मिले १०० रुपये के नए नोट के बंडल जैसी दिख रही थी कविता..

"एक बार नींद उड़ जाएँ तो वापिस जल्दी आती ही नही" कविता बोली

"हाँ कविता.. कभी कभी मेरी नींद भी आधी रात को उड़ जाती है.. फिर सुबह तक करवटें बदलती रहती हूँ" शीला ने अपना दुख सुनाया

"फिर आपको ताला मिला की नही?" कविता ने पूछा

"हाँ मिला आखिर.. घर में ही था.. थोड़ा ढूँढना पड़ा.. "शीला ने कहा

"मुझे तो ऐसा लगा की आप चाबी ढूंढ रही थी.. ताला तो आपके पास पहले से ही है" कविता ने गूढ भाषा में सिक्सर लगाई

"नही नही.. ताला ही नही मिल रहा था.. चाबी तो थी मेरे पास" कविता की द्विअर्थी बात का भावार्थ नही समझ पाई शीला

"भाभी, एक बात पूछूँ?"

"पूछ ना... जो भी पूछना है.. " शीला ने कहा

"जब हम पिरियड्स में हो... तब कर सकते है?" कविता ने थोड़ी सी शर्म के साथ कहा

"क्यों? तेरा पीयूष बहुत जिद करता है क्या?" शीला ने शरारत करते हुए कहा

"नही भाभी.. पर मुझे ही उस दौरान बहुत मन करता है करवाने का.. पर में अगर ज्यादा फोर्स करती हूँ तो पीयूष नाराज हो जाता है " कविता ने कहा
कविता की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा "तू तो जोरदार खिलाड़ी निकली कविता.. हमारी जवानी में तो पति जिद करता और हम मना करते थे.. फिर आखिर वह हाथ से हिलाकर... छातियों पर झड़कर शांत हो जाते.. पर अब तो पूरा माहोल ही बदल चुका है"

कविता: "अब मेरा मन करता है तो में क्या करूँ भाभी!! पीयूष तो उन दिनों में मुझसे दूर ही रहता है"

शीला: "हम्म.. इसका एक इलाज है मेरा पास, कविता"

कविता: "वो क्या भाभी?"

शीला: "तुझे अपनी उंगली से ही काम चलाना होगा.. जब भी तू अपना सैनिटेरी पेड़ बदलने जाएँ.. तब नीचे पानी से बराबर साफ करके.. उंगली से कर लेने के बाद.. नया सैनिटेरी पेड़ लगा लेना"

कविता: "पर भाभी, उसमें असली चीज जैसा मज़ा तो नही आएगा ना!!"

शीला: "ओहो.. अब तुझे उंगली से असली मर्द वाला मज़ा लेना है.. वो तो मुमकिन नही है.... एक बात समझ ले कविता.. उंगली में लंड जैसा मज़ा तो आने से रहा.." शीला को अचानक एहसास हुआ की सामने रघु या जीवा नही थे.. वह शरमा गई "माफ करना.. मेरे मुंह से ऐसे शब्द निकल गए"

कविता: "अरे, उसमें क्या है भाभी.. अभी तो हम दोनों अकेले ही है ना.. रात को बेडरूम में पीयूष भी बहुत गालियां बकता है.. अच्छा भाभी.. मदन भाई कब वापिस लौटने वाले है?"

शीला ने एक भारी सांस छोड़कर कहा "अभी और चार महीने बाकी है उसे आने को कविता"

शीला के बायें स्तन पर कविता की कुहनी छु रही थी.. शीला ने जानबूझकर अपने शरीर को कविता की दिशा में ओर झुकाया.. उसका स्तन अब कविता की कुहनी से ओर ज्यादा दब गया.. कविता ने अपनी टांगें चौड़ी की और शीला की ओर करवट करते हुए शीला के स्तनों के बिल्कुल सामने आ गई.. शीला के पर्वत जैसे दोनों स्तनों को वह एकटक देखने लगी..

अपनी एक टांग शीला की जांघ पर रखते हुए कविता ने पूछा "भाभी.. आपको भी मन तो करता होगा ना"

शीला: "मन तो बड़ा करता है.. पर क्या कर सकती हूँ?"

कविता: "तो आप फिर उंगली का सहारा नही लेती?"

शीला: "उम्र हो गई है कविता.. अब उंगली से काम नही बनता मेरा.. "

कविता: "तो फिर आप क्या करती है?"

शीला: "तू क्या करेगी जानकर? बड़ी मुश्किल से अपनी इच्छाओं को दबाकर रखा है मैंने.. तू तो ये सब बातें करते हुए मेरी आग भड़का देगी.. तेरा क्या है.. तू तो अपने पीयूष के नीचे घुसकर अपनी आग बुझा लेगी.. तड़पना तो फिर मुझे ही पड़ेगा ना!!"

कविता: "तो फिर आप अपनी आग बुझाने के लिए रसिक को क्यों नही बुला लेती?" आखिर उसने बॉम्ब फोड़ ही दिया

शीला स्तब्ध होकर बोली "कौन... वो दूधवाला?? वो कैसे बुझाएगा मेरी आग भला?"

कविता: "कैसे बुझाएगा?? दरवाजे पर हाथ रखकर.. पीछे से करते हुए.. और कैसे?" उसने शरारती मुस्कान के साथ शीला का भंडाफोड़ कर दिया

शीला के पैरों तले से जमीन खिसक गई। कविता के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए उसने कहा

"बस बस.. चुप हो जा तू.. और किसी को बताना मत.. समझी!!" कहकर शीला ने कविता को अपने आगोश में भर लिया और पूरा जोर लगाकर मसल दिया..

शीला का शातिर दिमाग काम पर लग गया.... अब कविता को पटाकर अपने वश में रखना पड़ेगा.. ताकि यह कमीनी किसी को बता न दे..

कविता: "ये क्या कर रही हो भाभी? ओह्ह.. "

शीला ने करीब आकर कविता के होंठों पर अपने गरम होंठ रखकर एक जबरदस्त चुंबन रसीद कर दिया.. और फिर कविता का मुंह अपने दोनों स्तनों के बीच दबा दिया

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शीला की मखमल के तकिये जैसी नरम छातियों से चिपक कर कविता ने भी शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और फिर शीला के गालों को चूमते हुए उसके मम्मे दबाने लगी... "भाभी, मेरे बॉल इतने बड़े कब होंगे? पीयूष को बड़े बॉल बहोत पसंद है"

यह सुनते ही शीला ने अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. और अपनी जायदाद कविता के सामने खोल दी.. कविता की आँखें फट गई

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"देख क्या रही है कविता? चूसना शुरू कर.. "

कविता शीला के गोरे गोरे स्तनों की निप्पल को चूमकर बोली "भाभी.. क्या आप मेरी नीचे चाटोगे? कल रात को पीयूष को कितनी बार कहा.. पर वो इतना थका हुआ था की उसने चाटने से मना कर दिया.. कल रात से खुजली हो रही है मुझे.. प्लीज भाभी"

कविता का हाथ हटाकर शीला ने उसके दोनों संतरों को मसल दिया और कहा


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"कविता, तेरे स्तन भी मेरी तरह बड़े बड़े हो जाएंगे.. तू रोज मेरे घर आकर तिल के तेल से मालिश करवा लेना.. फिर देखना तेरे बॉल कितने बड़े बन जाते है"

कविता: "वो छोड़ो भाभी... आप मेरी चाटिए ना!!"

कविता के गाउन में हाथ डालकर शीला ने उसकी चुत में दो उंगली घुसा दी.. और अंदर बाहर करने लगी

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कविता अब शीला के मदमस्त स्तनों को चूमकर गीली हो चुकी थी.. उससे रहा न गया.. वह खड़ी हो गई.. अपने गाउन को कमर तक उठा लिया.. और अपनी चुत को शीला के मुंह पर रखकर बैठ गई.. उसके कूल्हे शीला के स्तनों से रगड़ खा रहे थे.. वह शीला के होंठों पर.. गालों पर.. अपनी चुत घिसने लगी.. शीला ने कविता के गुलाबी छेद को चौड़ा किया और अंदर अपनी जीभ डाल दी..

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कविता अब बावरी बन गई.. शीला के मुंह पर दबाव बनाकर घिसने लगी.. अब उसने अपनी हथेलियों से शीला के बालों को पकड़ लिया और उसके मुँह पर अपनी चुत दबाते हुए झड़ गई.. !!

"आहहह आहहह... आह्हह!!" कविता बड़बड़ा रही थी.. सांसें नियंत्रित होने तक वह कुछ बोल नही पाई। कविता की चुत ठंडी हो जाने के बावजूद शीला उसे चाटती रही.. चाटती ही रही...

थोड़ी देर बाद कविता शीला के ऊपर से उतर गई.. और फिर अपने गाउन से शीला का गीला मुंह पोंछकर बोली

"ओह भाभी... आपने तो... अब क्या कहूँ आपसे? इस तरह तो पीयूष ने भी मुझे मज़ा नही दिया है आज तक.. बहोत मज़ा आया भाभी"

स्खलन से थकी कविता की आँखें बंद होने लगी.. जबरदस्त ऑर्गजम का आनंद लेकर, शीला के बोबलों को सहलाते हुए, कविता गहरी नींद सो गई..

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शीला भी पूरी रात की भीषण चुदाईयों से बहोत थक चुकी थी.. कविता के नाजुक स्तनों को मसलते हुए वह भी सो गई।

सुबह होते ही कविता और शीला दोनों जाग गए.. पर बिस्तर में ही पड़े पड़े एक दूसरे के अंगों से खेलते रहे

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"भाभी, रसिक के साथ सेटिंग कैसे की आपने?" कविता ने पूछा

"कविता, मैं दो सालों से बिना लंड के तड़प रही थी.. अब इस उम्र में कहाँ लंड ढूँढने जाती!! ये तो अच्छा हुआ की रसिक की बीवी रूखी के साथ मेरी दोस्ती हो गई.. और मेरी तकलीफों का अंत आया.. नहीं तो पता नही क्या होता" कविता बड़े ही ध्यान से शीला की बातें सुन रही थी और शीला के स्तनों के साथ खेल रही थी

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कविता: "भाभी, आप मेरी एक मदद करोगी?"

शीला: "बता ना.. क्या चाहिए तुझे?"

कविता: "बात दरअसल ऐसी है की मेरे मायके में मेरा एक बॉयफ्रेंड है.. पिंटू.. मुझसे ६ साल छोटा है.. "

शीला ने आश्चर्य से पूछा.. "तुझसे ६ साल छोटा बॉयफ्रेंड है तेरा??"

कविता: "वो हमारे पड़ोस में रहता है.. कई बार मेरे घर आता था.. और पढ़ाई में मेरी मदद भी करता था.. पढ़ते पढ़ते मैं उसके प्यार में कब पड़ गई मुझे पता ही नही चला.. "

शीला: "तूने चुदवाया है उस लड़के से?"

कविता: "ऊपर ऊपर से सब किया है.. वो मेरे बॉल दबाता.. होंठ चूमता.. पर उससे चुदवा नही पाई.. मैंने उसे कई बार कहा चोदने को.. पर उसने ही मना कर दिया.. वो कहता था की पहली चुदाई तो मुझे मेरी पति के साथ ही करनी है.. उसके बाद ही वो मुझे चोदेगा"

शीला: "बड़ा अच्छा लड़का है.. वरना लड़की सामने से टांगें खोल रही हो तब कौन मना करता है भला?? लोग चोदने के लिए कितने पैसे भी खर्च कर देते है"

कविता: "इसी लिए तो मुझे बहोत पसंद है पिंटू"

शीला: "तू अभी भी चाहती है उसे? तो फिर शादी के बाद चुदवाया क्यों नही उस लड़के से!!"

कविता: "उसकी याद तो मुझे रोज आती है भाभी.. पर मायके जाना नसीब ही नही हुआ अब तक.. वो मुझे कभी फोन भी नही करता.. मैं ही फोन करती रहती हूँ उसे.. जब भी टाइम मिले.. मुझे पिंटू से चुदवाने का बहोत मन है.. पर कुछ सेटिंग ही नही हो रहा"

शीला: "क्या कभी तूने उसका लंड पकड़ा था?"

कविता: "हाँ.. वैसे एक बार मुंह में लेकर चूसा भी था.. अब मुझे बहोत जोर से मन कर रहा है पिंटू से चुदने का.. "

शीला: "चिंता मत कर पगली.. बुला ले उसे मेरे घर.. दोपहर को जब तेरी सास सो जाएँ तब मेरे घर आ जाना.. और अपना काम निपटाकर निकल जाना"

कविता: "बस यही मदद चाहती थी मैं भाभी.. आप कितनी अच्छी हो!! आप कहों तो आज ही बुला लूँ पिंटू को? अभी सुबह के ६:३० बजे है.. अपने रूम में सो रहा होगा.. फोन कर देती हूँ.. आठ बजे निकलेगा तो भी डेढ़ घंटे में यहाँ पहुँच जाएगा" कविता बड़े ही उत्साह से कह रही थी.. अपने प्रेमी से मिलने के लिए वह उतावली हो रही थी.. शीला ने कविता की बिना झांटों वाली बुर को सहला सहला कर गीली कर दी।

शीला: कविता.. प्रेमीओ को मदद करना तो बड़े पुण्य का काम है.. तू बुला ले उसे.. आज तो तेरे सास-ससुर और पति तीनों बाहर है.. ऐसा मौका फिर नही मिलेगा.. तू पूरा दिन आराम से पिंटू के संग मजे करना.. तुम दोनों का खाना मेरे घर पर बना दूँगी.. अब खुश!!"

कविता ने खुश होकर शीला को गले लगा लिया.. शीला ने कविता का सिर पकड़कर अपने जिस्म पर दबा दिया..

"चल इसी बात पर मेरी चुत चाट दे.. कब से मेरे बबले मसल मसल कर गरम कर दिया मुझे.. "

कविता ने पालतू कुत्तिया की तरह शीला के आदेश अनुसार उसकी चुत चुत चाटना शुरू कर दिया.. शीला अब वासना के समंदर में गोते खाने लगी.. बिस्तर से १ फुट ऊपर अपने चूतड़ उठाकर वह कविता से अपनी चुत चटवाने लगी.. थोड़ी ही देर में सिसकियाँ भरते हुए शीला झड़ गई.. और कविता के सिर को अपनी दोनों जांघों के बीच दबा दिया.. शीला की चुत चाटते हुए कविता भी अपनी चुत को गुदगुदाते हुए स्खलित हो गई.. पिंटू के साथ.. रंगरेलियाँ मनाने का अवसर मिलने के खयाल मात्र से, कविता का रोम रोम रोमांचित हो उठाया.. उसने पिंटू को मोबाइल पर कॉल लगाया।

"पिंटू आ रहा है भाभी" खुशी से उछलते हुए कविता ने कहा.. ६ महीने बाद मिलूँगी.. कविता के चेहरे पर छलकती खुशी को देखकर शीला को भी अच्छा लगा..

"मैं घर पहुंचकर थोड़ी सफाई कर लेटी हूँ.. पिंटू और तेरे लिए बिस्तर भी ठीक-ठाक करना होगा.."

"ठीक है भाभी... मैं भी नहाकर फ्रेश हो जाती हूँ.."

"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी


"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई
बहुत ही शानदार और मजेदार अपडेट है कविता ने रसिक के शीला की चुदाई देख ली है उसने ये बात बता कर शीला पर बॉम्ब फोड़ दिया है कविता ने अपने दिल की बात कह दी है कविता अपने बॉयफ्रेंड से चूदवाना चाहती है और उसने ये बात शीला को बोल दी है शिला के पास अब कविता की बात मानने के सिवा कोई और चारा नहीं है अब देखते हैं क्या कविता के साथ शीला भी पिंटू से चुदती है या नही
 

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"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"

"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी

"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई

पूरा घर अस्त-व्यस्त पड़ा था.. अभी भी देसी दारू की बदबू आ रही थी.. शीला ने तुरंत ही अगरबत्ती जलाई.. जन्नत-ए-फ़िरदौस का इत्र छिड़का.. पूरा कमरा सुगंधित हो गया..

किचन में जीवा और रघु के कारनामों की निशानी हर जगह दिख रही थी.. शीला ने सफाई करके सब ठीक-ठाक कर दिया.. मेहमानों के लिए नाश्ता भी तैयार कर दिया.. और सब कुछ फिर से चेक कर लिया.. कल रात की कोई निशानी कहीं छूट न गई हो!!

अब तक कविता का फोन क्यों नही आया? शीला सोच रही थी.. काफी देर लगा दी पिंटू ने आने में.. पता नही वो चूतिया कहाँ गांड मरवा रहा होगा? ऐसा मौका जब हाथ लगने वाला हो तब कौन बेवकूफ देर करता है!! लोग कब समय का महत्व समझेंगे!! शीला मन ही मन पिंटू को गालियां दे रही थी..

तभी फोन बजा.. कविता का ही फोन था..

"भाभी, पिंटू आ गया.. में उसे सीधे आपके घर ही भेज रही हूँ" कविता की आवाज में घबराहट थी

"तू चिंता मत कर.. भेज दे उसे.. मैं हूँ ना.. कुछ नही होगा" शीला ने ढाढ़स बांधते हुए कविता से कहा

थोड़ी ही देर में.. एक अठारह उन्नीस साल का.. हल्की हल्की मुछ वाला जवान लड़का, शीला के घर की डोरबेल बजाकर खड़ा रहा.. शीला ने अपने बड़े बोबलों को साड़ी से ठीक से ढंका और दरवाजा खोला.. उसे डर था की कहीं पिंटू ने उसकी शॉपिंग मॉल जैसी उन्नत चूचियाँ देख ली तो कविता के छोटे स्तन उसे रास्ते की रेहड़ी जैसे लगेंगे..

"आ जाओ.. तुम ही हो ना पिंटू?" जानते हुए भी अनजान बन रही थी शीला

"जी हाँ.. मैं ही हूँ पिंटू" शरमाते हुए उस लड़के ने कहा.. वह अंदर आकर सोफ़े के कोने पर बैठ गया

शीला उसके लिए पानी लेकर आई.. थोड़ा सा पानी पीकर उसने ग्लास वापिस दिया.. शरारती शीला ने ग्लास लेटे वक्त पिंटू का हाथ पकड़कर दबा दिया..

"इतना शरमा क्यों रहा है? जरा आराम से बैठ.. मैंने बिस्तर भी सजा दिया है.. तुम दोनों के लिए" अनुभवी रंडी की अदा से साड़ी के पल्लू को छाती में दबाते हुए शीला ने कहा.. सफेद रंग के ब्लाउस के अंदर उसने ब्रा नही पहनी थी.. अरवल्ली की पर्वत शृंखला के दो पहाड़ों जैसे स्तनों को पिंटू हतप्रभ होकर देखता ही रह गया.. उसका गला सूखने लगा

"तू आराम से बैठ.. अपना ही घर समझ इसे.. " कातिल मुस्कान के साथ, भारी कूल्हे मटकाती हुई शीला किचन की ओर चली गई। उसके नितंबों की लचक देखकर पिंटू के होश उड़ गए

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किचन में ग्लास रखकर शीला वापिस आई और सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई.. उसने अपने हाथों को इस तरह जोड़ रखा था की उसके दोनों स्तन उभरकर बाहर झांक रहे थे..

"आज से पहले तूने कभी ये किया है पिंटू?" शीला ने पूछा

गर्दन घुमाकर पिंटू ने "नही" का इशारा किया

तभी कविता आ गई.. शीला को बात अधूरी छोड़नी पड़ी यह उसे अच्छा नही लगा.. कविता अगर थोड़ी देर से आती तो वह इस शर्मीले लड़के के साथ कुछ गरमागरम बातें कर पाती

कविता और पिंटू को एकांत देने के हेतु से शीला घर के बाहर निकल गई। दूध या सब्जी कुछ लेना तो था नही.. सिर्फ कुछ लेने के बहाने वह घर से बाहर निकल गई.. अब क्या करूँ?? कहाँ जाऊँ? कैसे टाइम पास करूँ?? शीला सोच रही थी... तभी उसके करीब से कोई गुजरा और शीला की कमर पर चिमटी काटते हुए कहा

"किसके खयालों में यहाँ रास्ते के बीच खड़ी हुई है!! मदन भैया के बारे में ज्यादा मत सोच.. वो तो विदेश में किसी गोरी के साथ मजे कर रहे होंगे"

शीला ने चोंककर पीछे देखा.. वह चेतना थी.. उसकी पुरानी पड़ोसन

"अरे चेतना तू ?? कितने साल हो गए तुझे देखे हुए.. कितनी मोटी हो गई है तू.. लगता है तेरा पति बड़ा अच्छे से रोज इंजेक्शन दे रहा है"

चेतन ने हँसते हुए कहा "हाँ.. इंजेक्शन का ही कमाल है ... पर तू बिना इंजेक्शन की इतनी खुश कैसे लग रही है!! कहीं किसी पराये इंजेक्शन का सहारा तो नही ले रही हो ना!! कमीनी हरामखोर.. मैं सालों से जानती हूँ तुझे.. तू इतने लंबे समय तक बिना कुछ किए रह ही नही सकती.. सच सच बता मुझे"

चेतना और शीला पुरानी सहेलियाँ थी.. दोनों बहुत अच्छी मित्रता थी.. उन दोनों के पति भी दोस्त थे.. शीला और चेतन एक दूसरे के साथ बीपी की सी.डी. की लेन-देन भी चलती रहती थी.. और जब दोनों के पति ऑफिस जाते थे तब दोनों एक दूसरे के साथ खूब मस्ती भी किया करती थी। कुछ समय बाद चेतना और उसका पति, नए घर में शिफ्ट हो गए.. फिर मिलना बहुत काम हो गया.. आज काफी सालों के बाद दोनों मिलकर खुश हो गए

चेतना: "अब मुझे यहीं बीच रास्ते खड़ा ही रखेगी या घर ले जाकर चाय भी पिलाएगी!!"

शीला अब फंस गई.. घर में तो कविता और पिंटू.. ना जाने क्या कर रहे होंगे.. पर शीला और चेतना के संबंध काफी घनिष्ठ थे.. शीला उसे कोने में ले गई और कहा

"यार चेतना.. अभी मेरे घर नहीं जा सकते"

चेतना: "क्यों? कीसे घुसाकर रखा है घर पर?"

शीला ने हँसते हँसते कहा "घुसाकर तो रखा है.. पर मेरे लिए नही.. मेरे पड़ोस में एक नवविवाहित लड़की रहती है.. कविता.. उसका प्रेमी उसे मिलने आया है.. वो दोनों बैठकर बातें कर रहे है मेरे घर पर"

चेतना: "साली बहनचोद.. तू अब दल्ली भी बन गई?"

शीला: "नही यार.. अब हालात ही ऐसे थे की मुझे मदद करनी पड़ी"

चेतना: "हम्म.. तब तो जरूर तेरा कोई राज जान लिया होगा उस लड़की ने.. सच सच बता !!"

शीला: "तू थोड़ा इत्मीनान रख.. सब बताती हूँ तुझे"

शीला ने शुरुआत से लेकर अंत तक.. रूखी, जीवा, रघु औ रसिक की सारी कहानी चेतना को विस्तारपूर्वक बताई..

बातें करते करते अचानक शीला की नजर उनकी गली के नाके पर गई.. और उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई

"बाप रे.. ये लोग अभी कहाँ से टपक पड़े??!!" सामने से कविता का पति पीयूष और उसके सास ससुर आते दिखाई दिए..

"मुझे अभी के अभी उस कविता को खबर करनी पड़ेगी..वरना लोड़े लग जाएंगे.. चेतना, तू घर चल.. फिर आराम से बाकी की बातें करते है.. "

दोनों सहेलियाँ दौड़कर शीला के घर पहुंची.. अपनी चाबी से लेच-लोक खोलकर शीला ने दरवाजा खोल दिया..

इन दोनों को देखकर, कविता और पीयूष चोंक पड़े.. कविता नंग-धड़ंग पिंटू की गोद में बैठकर ऊपर नीचे करते हुए सोफ़े पर ही चुदवा रही थी। पिंटू की पतलून घुटनों तक उतरी हुई थी.. और कविता के ब्लाउस से उसके सफेद कबूतर जैसे गोरे स्तन बाहर निकले हुए थे।

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कविता को शीला भाभी के सामने नग्न होने में कोई शर्म नही थी.. पर पिंटू की हालत खराब हो गई.. वह बिचारा दो अनजान औरतों के सामने नंगे चुदाई करते हुए देख लिया गया था। एक ही पल में उसका लंड मुरझाकर पिचक गया..

शीला ने कविता की तरफ देखकर कहा "तेरे सास ससुर और पीयूष घर पहुँच रहे है.. तू भाग यहाँ से.. जल्दी घर जा"

"अरे बाप रे!! इतनी देर में वापिस भी आ गए!!" कविता ने अपने कपड़े ठीक किए और पीछे के रास्ते बाहर भागी.. पिंटू उल्टा घूम गया और अपनी पतलून पहनने लगा..

शर्मसार होते हुए पिंटू ने कहा "सॉरी भाभी.. आप लोग ऐसे अचानक आ जाएंगे इसका मुझे अंदाजा नही था"

"हम नही.. वो लोग अचानक आ टपके.. इसमें कोई क्या कर सकता है?? कोई बात नही.. तू आराम से बैठ और ये बता.. मज़ा आया की नही?"

"अरे भाभी.. क्या कहूँ आप से!! मेरे लिए तो ये पहली बार था.. और कविता मुझे कुछ सिखाती ही नहीं की कैसे करना है..!! मैं कुंवारा हूँ.. पर वो तो शादीशुदा है ना!! उसे तो मुझे सिखाना चाहिए ना!!"

शीला: "मतलब? तुम लोगों ने ज्यादा कुछ नही किया??"

चेतना: "शीला, बेचारा नादान है.. अभी तो.. उसका छोटा सा है.. नून्नी जैसा.." अपनी उंगली से पिंटू के लंड की साइज़ का इशारा करते हुए चेतन ने कहा

शीला: "तूने देख भी लिया इतनी देर में? मैं ही देख नही पाई.. पिंटू.. तू चिंता मत कर.. मैं तुझे सब सीखा दूँगी.. बता.. सीखेगा मुझसे??"

चेतना: "मैं भी मदद करूंगी सिखाने में.. "

चेतना के स्तन देखकर पिंटू ललचा गया..

शीला: "देख पिंटू.. कविता तुझसे चुदवाने आई.. तो क्या वह अपने पति को बता कर आई थी क्या!! नहीं ना!! बस वैसे ही तू भी कविता को मत बताना.. की तू हमसे सिख रहा है"

पिंटू के चेहरे पर अब भी झिझक थी..

चेतना: "अबे चूतिये.. इतनी दूर से आया है.. और बिना चोदे वापिस लौट जाएगा?? ना तुझे चोदना आता है.. और ना ही तेरी छोटी सी पूपली में कोई दम.. बेटा.. इतनी छोटी नून्नी से किसी लड़की को कैसे खुश कर पाएगा!!"

पिंटू शर्म से लाल लाल हो गया.. उस बेचारे नादान लड़के को ऐसी अभद्र भाषा सुनकर बुरा लग गया.. आँख से आँसू टपकने लगे..

शीला: "चेतना बेवकूफ.. तुझे बात करने का तरीका नही आता क्या!! पिंटू का लंड छोटा है तो क्या हुआ??"

शीला पिंटू के पास आकर बैठ गई.. उसकी जांघ पर हाथ फेरते हुए उसने पिंटू का हाथ अपने गुंबज जैसे स्तनों पर रख दिया और बोली

"चिंता मत कर पिंटू.. चेतना तो पागल है.. देख.. छोटी उम्र में सब के अंग छोटे छोटे ही होते है.. तू कविता के स्तन के मुकाबले मेरे स्तन देख.. कितना फरक है!! ये तो होता ही है.. इसमे चिंता करने लायक कोई बात नही है"

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सुनकर पिंटू को थोड़ा अच्छा लगा.. उसने शीला की छातियों से अपना हाथ हटा लिया..

"भाभी, मैं आपसे ये सब सीखूँगा तो कविता बुरा मान जाएगी.. "

पिंटू की दूसरी तरफ चेतना आकर बैठ गई.. और शीला का अनुकरण करते हुए वह भी पिंटू की दूसरी जांघ को सहलाने लगी.. धीरे से उसने अपने ब्लाउस की एक तरफ की कटोरी खोल दी.. पिंटू बेचारा हक्का बक्का रह गया.. !!

शीला: "अरे पिंटू, तुझे कहाँ कुछ गलत करना है.. तुझे तो बस सीखना है.. है ना!! और तू यहाँ कविता की लेने आया है.. तो क्या ये कविता के पति को पसंद आएगा!! नहीं ना!!"

पिंटू: "पर भाभी, कविता के पति को ये कहाँ पता चलने वाला है??"

शीला: "वही तो कह रही हूँ.. तू हम दोनों के पास ट्यूशन ले रहा है.. ये बात कविता को कहाँ पता चलने वाली है!! देख बेटा.. हर कोई ऐसे ही सीखता है.. अगर तुझे भी सीखना हो तो बताया.. हमारी कोई जबरदस्ती नहीं है तुझ पर.."

शीला और पिंटू के बीच इस संवाद के दौरान चेतना ने अपने ब्लाउस के दो हुक खोल दिए.. और अपने स्तनों को बाहर निकाल दिया.. पिंटू तो चेतना के बड़ी निप्पलों वाले स्तन देखकर उत्तेजित हो गया.. और उसके अंदर का किशोर विद्यार्थी जाग उठा..उसकी छोटी सी नुन्नी में जान आने लगी।

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चेतना ने पिंटू के लंड पर हाथ सहलाते हुए शीला से कहा "ये तो मस्त हो गया शीला.. देख तो जरा.. पतला है तो क्या हुआ!!"

शीला ने भी पिंटू का लंड हाथ में लेकर दबाकर देखा

"आह आहह भाभी.." कहते हुए पिंटू चेतना के नग्न स्तनों को पकड़कर मसलने लगा.. शीला ने पिंटू की आधी उतरी पतलून को पूरी उतार दी.. और पिंटू का लंड पकड़कर हिलाने लगी.. पिंटू सिसकियाँ भरता गया और चेतना के स्तनों को दबाता गया.. शीला ने भी अपने ब्लाउस के बटन खोल दिए और अपनी गुलाबी निप्पल को पिंटू के मुंह में देते हुए कहा

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"थोड़ा चूस ले बेटा.. तो चोदने की ताकत आ जाएगी"

पिंटू छोटे बच्चे की तरह शीला की निप्पल चूसने लगा.. "बच बच" की आवाज करते हुए कभी वह शीला की निप्पल चूसता तो कभी चेतना की.. चेतना ने अपनी निप्पल छुड़वाई.. और उसका लंड चूसना शुरू कर दिया

शीला: "अबे चूतिये.. तुझे चोदना तो नहीं आता.. लेकिन चूसना भी नहीं आता क्या!! चूसते हुए ऐसे काट रहा है जैसे पपीता खा रहा हो.. ठीक से चूस"

पिंटू बेचारा.. नादान था.. ज्यादा देर अखाड़े में इन दोनों पहलवानों के सामने टीक पाने की उसकी हैसियत नहीं थी.. चेतना के मुंह में ही उसका लंड वीर्य-स्त्राव कर बैठा.. चेतना बड़ी मस्ती से.. अनुभवी रांड की तरह.. पिंटू के लंड को चाट चाट कर साफ करने लगी। पिंटू तो शीला के मदमस्त खरबूजे जैसे स्तनों में खो सा गया था.. कविता के छोटे छोटे कबूतर जैसे स्तनों के मुकाबले शीला के उभारों ने उसका दिल जीत लिया था।

चेतना: "छोकरा नादान है.. पर तैयार हो जाएगा.. थोड़ा सा ट्रेन करना पड़ेगा"

शीला: "कितना माल निकला उसके लंड से?"

चेतना: "एक चम्मच जितना.. पर मेरे पति के वीर्य के मुकाबले स्वाद में बड़ा ही रसीला था" अपनी उँगलियाँ चाटते हुए चेतना ने कहा

शीला: "हम्म.. बच्चा बोर्नवीटा पीता होगा तभी उसका माल इतना स्वादिष्ट है!!" कहते हुए शीला हंस दी.. "लंड पतला जरूर है.. पर है मजबूत.. अंबुजा सीमेंट जैसा.. देख देख.. झड़ने के बाद भी पूरी तरह से नरम भी नहीं हुआ"

चेतन ने झुककर पिंटू के अर्ध जागृत लंड की पप्पी ले ली..

"अरे पिंटू, तूने कविता की चुत चाटी है कभी?" अपना घाघरा उतारते हुए शीला ने पिंटू से पूछा.. शीला की गोरी गोरी मदमस्त जांघों को देखकर पिंटू का लंड उछलने लगा..

पिंटू: "एकाध बार किस किया है.. पर अंदर से चाटकर नहीं देखा कभी"

शीला: "देख पिंटू, अगर औरत को खुश करना है तो सब से पहला पाठ यह सिख ले.. चुत को चौड़ी करके अंदर तक जीभ डालते हुए चाटना सीखना पड़ेगा.. "

पिंटू बड़े ही अहोभाव से इन दोनों मादरजात नंगी स्त्रीओं को देखता रहा.. जैसे स्कूल के मैडम से अभ्यास की बातें सिख रहा हो.. शीला और चेतना पिंटू को प्रेम, कामवासना, चुदाई, मुख मैथुन वगैरह के पाठ पढ़ाने लगे.. तीनों एक दूसरे के सामने पूरी तरह नंगी अवस्था में थे.. उत्तेजित होकर शीला और चेतना, पिंटू के जिस्म को जगह जगह पर चूमते हुए उसके शरीर से खेलने लगे। पिंटू का लंड अब सख्त होकर झूलने लगा..

शीला: "देख ले ठीक से पिंटू.. इस तरह चुत को चाटते है" कहते हुए शीला ने चेतना को लिटा दिया और उसकी चुत पर अपनी जीभ फेरने लगी

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चेतना: "ओह्ह शीला.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. "

चेतना की निप्पल उत्तेजना के मारे सख्त कंकर जैसी हो गई थी। पिंटू एकटक शीला और चेतना की इन हरकतों को देख रहा था।

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चेतना: "ठीक से देख ले पिंटू.. आह्ह.. बिल्कुल इसी तरह कविता की पुच्ची को चाटना.. नहीं तो तेरी कविता किसी और से सेटिंग करके अपनी चटवा लेगी"

काफी देर तक शीला ने चेतना के भोसड़े के हर हिस्से को चाटा.. अब उसने एक साथ चार उँगलियाँ अंदर घुसेड़ दी और चाटती रही

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चेतना ने थोड़े गुस्से से कहा "बहनचोद.. क्या देख रहा है!! कम से कम मेरी चूचियाँ तो मसल दे.. ऐसे ही निठल्ले की तरह बैठा रहेगा तो कुछ नहीं होगा तेरा.. !!"

सुनते ही पिंटू ने तुरंत चेतना के स्तनों को पकड़कर दबाना शुरू कर दिया.. शीला की चुत चटाई से आनंदित होते हुए.. अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर चेतना झड गई.. पिंटू सब कुछ बड़े ही ध्यान से देख रहा था।

चेतना की चुत से मुंह हटाते हुए शीला ने कहा "देखा पिंटू!! लंड छोटा हो या बड़ा.. पतला हो या मोटा.. कुछ फरक नहीं पड़ता.. अगर अच्छे से चुत चाटने की कला सिख ली..तो अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को खुश रख पाएगा"

पिंटू: "पर भाभी.. लड़की को असली मज़ा तो तब ही आता है ना अगर लंड लंबा और मोटा हो!!" बड़ी ही निर्दोषता से पिंटू ने पूछा

चेतना: "बात तो तेरी सही है बेटा.. मुझे यह बता.. की तुझे ५ रुपये वाली कुल्फी पसंद है या १० रुपये वाली?"

पिंटू: "जाहीर सी बात है.. १० रुपये वाली"

शीला: "बिल्कुल वैसे ही.. हम औरतों को भी १० रुपये वाली कुल्फी ज्यादा पसंद है.. पर उसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है की हमें ५ रुपये वाली कुल्फी से मज़ा नहीं आता.. कुल्फी छोटी हो तो उसे धीरे धीरे चूसकर मज़ा लेना भी आता है.. और कई बिनअनुभवी औरतों को १० रुपये वाली कुल्फी भी ठीक से खाना नहीं आता.. पिघलाकर नीचे गिरा देती है"

पिंटू: "पर भाभी.. अगर मुझे अपना लंड मोटा और तगड़ा बनाना हो तो क्या करू?"

इतना समझाने के बावजूद पिंटू घूम फिर कर वहीं आ गया.. शीला ने अपना सिर पीट लिया..

शीला: "अबे लोडुचंद.. जैसे जैसे तू बड़ा होगा वैसे वैसे तेरा वो भी बड़ा हो जाएगा.. चिंता मत कर.. देख.. अब जिस तरह मैंने चेतना की चुत चाटी थी वैसे ही तू मेरी चाटकर दिखा.. देखूँ तो सही तूने कितना सिख लिया.. समज ले की यह तेरी परीक्षा है.. अगर ठीक से नहीं चाटी तो मैं कविता को सबकुछ बताया दूँगी"

कविता का नाम सुनते ही पिंटू भड़क गया.. और शीला की जांघें चौड़ी करके बीच में बैठ गया.. शीला का फैला हुआ भोसड़ा देखकर पिंटू सोच रहा था.. कहाँ मेरी कविता की मोगरे के फूल जैसी नाजुक चुत.. और कहाँ ये धतूरे के फूल जैसा शीला भाभी का भोसड़ा !!

शीला: "यही सोच रहा है ना की कविता के मुकाबले कितनी बड़ी है मेरी!! जब मैं कविता की उम्र की थी तब मेरी भी कविता की तरह मस्त संकरी सी थी.. पर मेरे पति ने ठोक ठोक कर ऐसे रानीबाई की बावरी जैसा बना दिया.. वो तो कविता की चुत भी उसका पति चोद चोद कर चौड़ी कर ही देगा.. तू चाटना शुरू कर.. जल्दी कर बहनचोद.. इतना गुस्सा आ रहा है की तेरी गांड पर एक लात मारकर तुझे गली के नुक्कड़ पर फेंक दूँ.. " कहते हुए शीला ने अपने गुफा जैसे भोसड़े पर पिंटू को मुंह दबा दिया..

पिंटू भी शीला को खुश करने के इरादे से.. चुत चटाई की नेट-प्रेक्टिस करते हुए.. चब चब चाटने लगा.. शीला के तानों ने अपना काम कर दिया.. पिंटू कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता था.. अपनी जीभ को अंदर तक घुसेड़कर उसने शीला के भोसड़े को धन्य कर दिया.. कराहते हुए शीला अपनी गदराई जांघों को आपस में घिसने लगी..

बगल में बैठी चेतना अपने स्तनों को शीला के बबलों से रगड़ने लगी.. और शीला ने उसे खींचकर अपने होंठ चेतना के होंठों पर रखते हुए चूम लिया..

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शीला ने अपनी दोनों विशाल जांघों के बीच पिंटू को दबोच लिया.. अपना स्खलन हासिल करने के बाद ही उसने पिंटू को जांघों की मजबूत पकड़ से मुक्त किया.. शीला की पकड़ से छूटते ही पिंटू दूर खड़ा होकर हांफने लगा.. बाप रे!! ये तो औरत है या फांसी का फंदा.. जान निकल जाती अभी.. पिंटू कोने में जाकर बैठ गया..

उसे बैठा हुआ देखकर चेतना उसके पास आई.. और उसे कंधे से पकड़कर खड़ा किया


चेतना: "बेटा.. डरने की जरूरत नहीं है.. देख कितनी मस्त गीली हो गई है शीला की चुत!! जा.. उसके छेद में अपना लंड पेल दे.. और धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर.. और सुन.. पूरा जोर लगाना.. ठीक है.. तुझे बस ऐसा सोचना है की ट्यूशन पहुँचने में देर हो गई है और तू तेज गति से साइकिल के पेडल लगा रहा है.. जा जल्दी कर"
कविता के पति और सास के जल्दी आने से पिंटू का काम आधा ही रह गया है लेकिन अब जो काम अधूरा रह गया था वह काम अब चेतना और शीला के साथ पूरा हो जाएगा पिंटू को एक से बढ़कर एक टीचर मिली है जो उसे पूरी तरह से ट्रैंड कर देगी पिंटू के मजे ही मजे होने वाले हैं
 

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चेतना: "बेटा.. डरने की जरूरत नहीं है.. देख कितनी मस्त गीली हो गई है शीला की चुत!! जा.. उसके छेद में अपना लंड पेल दे.. और धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर.. और सुन.. पूरा जोर लगाना.. ठीक है.. तुझे बस ऐसा सोचना है की ट्यूशन पहुँचने में देर हो गई है और तू तेज गति से साइकिल के पेडल लगा रहा है.. जा जल्दी कर"

चेतना की बात सुनकर पिंटू खड़ा हुआ.. और शीला के दो पैरों के बीच सटकर.. लंड घुसाते हुए अंदर बाहर करने लगा.. शीला को पिंटू के चोदने से कोई फरक नहीं पड़ा.. उसकी चुत में अब तक काफी लोग निवेश कर चुके थे.. और ये तो अग्रीमन्ट भी घबराते हुए कर रहा था.. बिना हिले डुले लाश की तरह पड़ी रही शीला.. और पिंटू उस पर कूदता रहा.. जैसे बिना हवा के पतंग उड़ाने का प्रयत्न कर रहा हो!!

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दो तीन मिनट तक ऐसे ही बेजान धक्के लगाकर.. वह बेचारा छोकरा थक गया.. चेतन कमरे के कोने में नंगी बैठी हुई चुत में उंगली कर रही थी.. शीला बिस्तर पर नंगी पड़ी थी.. और नंगा पिंटू झड़कर शीला के जिस्म के ऊपर गिरा हुआ था.. तीनों स्खलित होकर तंद्रावस्था में पहुँच गए थे..


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तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. डींग डोंगगगग.. !!

तीनों नंगे थे.. तेजी से कपड़े पहनने लगे.. शीला ने भागकर दरवाजा खोल दिया.. दरवाजे पर अनुमौसी थी.. कविता की सास..

अनुमौसी: "इतनी देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में?" शक की निगाह से देखते हुए वह बोली

शीला: "अरे मौसी.. मेरी सहेली आई है.. हम दोनों बातों में ऐसी उलझ गई थी की डोरबेल की आवाज ही नहीं सुनी मैंने.. आइए ना अंदर"

अनुमौसी अंदर आ गई.. "दूध फट गया था.. थोड़ा सा मिलेगा तेरे पास?"

शीला ने फ्रिज से पतीली निकाली और अनुमौसी को दूध दिया.. अनुमौसी से उनके बीमार भाई की तबीयत के बारे में भी पूछा.. थोड़ी देर यहाँ वहाँ की बातें करने के बाद अनुमौसी निकल गई.. पर सोफ़े पर कुशन के पीछे पड़ी हुई गीली पेन्टी.. उनकी नज़रों से बच ना सकी.. वह कुछ बोली नहीं.. और चुपचाप वहाँ से चली गई..

पिछले ६० सालों में मौसी ने भी की खेल खेले थे.. वह इतनी नादान तो थी नहीं की चुत के स्खलन की और पुरुष के वीर्य की गंध को पहचान ना सके.. शीला के घर में जरूर कुछ पक रहा था.. पर अनुभवी मौसी फिलहाल बिना कुछ कहे दूध लेकर चली गई.. डोरबेल बजते ही चेतना और पिंटू बाथरूम में छुप गए थे.. जब तक अनुमौसी शीला से बातें कर रही थी.. तब तक वह दोनों चुपचाप अंदर खड़े रहे..

चेतना ने इस मौके का फायदा उठाया.. पिंटू को बाहों में लेकर अपने स्तनों को उसकी छाती पर रगड़कर.. उस नादान लड़के को उत्तेजित कर दिया.. पिंटू भी चेतना की छातियाँ दबाते हुए उसके होंठ चूस रहा था.. चेतना ने पिंटू के पेंट में हाथ डालकर उसका लंड मसलना शुरू किया.. पिंटू भी चेतना के पेटीकोट में हाथ डालकर उसकी गरम चुत में उंगली अंदर बाहर करने लगा.. कामरस से गीली हो रखी चुत में बड़े ही आराम से उंगली जा रही थी।

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शीला ने बाथरूम को दरवाजा खटखटाकर खोलने के लिए हरी झंडी दिखाई.. चेतना ने पिंटू को चूमते हुए दरवाजे की कुंडी खोल दी.. इन दोनों को लिपटे हुए देखकर शीला ने कहा

शीला: "क्या बात है!! तुम दोनों तो बाथरूम में ही शुरू हो गए!! बड़ी जल्दी सिख गया तू पिंटू.. औरत को खुश रखने का दूसरा नियम जान ले.. जहां और जब मौका मिले.. चोद देना.. "

चेतना: "देख शीला.. तूने अभी अभी चटवा ली है.. और झड भी चुकी है.. अब मुझे अपनी चटवाने दे.. फिर मैं घर के लिए निकलूँ.. मुझे देर हो रही है"

शीला: "अरे, पर मेरा अभी भी बाकी है.. उसका क्या?? तेरे घर तो तेरा पति भी है.. मेरे वाला तो चार महीने बाद आने वाला है"

चेतना: "वो सब मैं नहीं जानती.. पिंटू अब मेरी चुत चाटेगा.. बस.. !! बड़ी लालची है तू शीला.. एक बार पानी निकलवा लिया फिर भी तसल्ली नहीं हुई तुझे.."

पिंटू के छोटे से लंड के लिए दोनों झगड़ने लगी..

चेतना: "क्या बताऊँ तुझे शीला!! मेरे पति को डायाबीटीस है.. काफी समय हो गया.. वो बेचारे अब पहले की तरह.. नहीं कर पाते है"

शीला: "मतलब? उनका खड़ा नहीं होता क्या?"

चेतना: "बड़ी मुश्किल से खड़ा होता है.. वो भी काफी देर तक चूसने के बाद.. अब क्या करू मैं.. किससे कहूँ? रोज मुझे बाहों में भरकर चूम चूम कर गरम कर देते है.. पर उनका लोंडा साथ ही नहीं देता.. इसलिए करवट बदलकर सो जाते है बेचारे.. प्लीज.. अभी मुझे चटवा लेने दे" कहकर चेतना ने बाथरूम में ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया.. और अपने एक पैर को कमोड पर रख दिया.. अपनी चुत खुजाते हुए उसने पिंटू को गिरहबान से पकड़कर खींचा और नीचे बैठा दिया.. पिंटू पालतू कुत्ते की तरह चेतना की बुर की फाँकें चाटने लगा.. शीला ने चेतना के बाहर लटक रहे पपीते जैसे स्तनों को मसलते हुए.. उसकी बादामी रंग की निप्पल को दांतों के बीच दबाते हुए काट लिया..

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दर्द से कराह उठी चेतना.. फिर भी शीला और पिंटू ने अपना काम जारी रखा.. शीला अपने दूसरे हाथ से अपनी बुर खुजाने लगी.. पिंटू ने भी शीला की गुफा को सहला दिया.. "आह्ह.. शाबाश पिंटू मेरे लाल.. बिना कहे ही समझ गया तू मेरे बेटे.. सहला और सहला वहाँ.. आह्ह.. "

शीला भी अपनी चुत खुजाते हुए आनंद के महासागर में गोते खाने लगी.. और डूब गई.. शीला ने चेतना के होंठों पर कामुक चुंबन जड़ दिया.. चेतना भी वासना के सागर में अपनी पतवार चलाते हुए किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गई.. पिंटू को अपनी दोनों जांघों के बीच दबोच कर.. शीला के चुचे दबाते हुए.. जोर से हांफने लगी.. पिंटू का पूरा मुंह.. चेतना के चिपचिपे चुत-रस से भर गया। उस छोटे लड़के ने अपने छोटे लंड के उपयोग के बिना ही चेतना को ठंडी कर दिया..

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स्खलित हुई चेतना की सांसें बड़ी ही तेज चल रही थी.. उसकी हांफती हुई बड़ी बड़ी छाती.. और बिखरे हुए बाल.. बड़े ही सुंदर लग रहे थे। उसका काम निपट गया था.. उसने अपने कपड़े उठाए और बाथरूम के बाहर निकली तब शीला.. कोने में पड़ी कपड़े धोने की थप्पी का मोटा हेंडल तेजी से अपनी चुत में घुसेड़कर मूठ मार रही थी।

पिंटू बड़े ही आश्चर्य से शीला के भोसड़े में उस मोटे डंडे को अंदर बाहर होते हुए देखता रहा.. इतना मोटा डंडा भी बड़े आराम से अंदर ले रही शीला को देखकर पिंटू को अपने छोटे से औज़ार की मर्यादा का एहसास हुआ.. फिर भी बिना निराश हुए.. उसने शीला के हाथ से उस थप्पी को खींचकर बगल में रख दिया.. शीला को पलटा कर झुका दिया.. शीला कमोड पर हाथ टिकाते हुए झुक गई.. उसके नरम गोल बड़े बड़े उरोज बड़ी सुंदरता से लटक रहे थे.. जैसे खुद के स्तनों का ही भार लग रहा हो.. शीला ने अपने एक स्तन को हाथों में पकड़ लिया और फ्लश टँक पर हाथ टेक कर अपने चूतड़ उठाकर खड़ी हो गई।

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अब पिंटू.. उकड़ूँ होकर नीचे बैठ गया.. शीला के भव्य कूल्हों को दोनों हाथों से अलग करते ही.. उसे शीला का गुलाबी रंग का गांड का छेद दिखने लगा.. शीला को खुश करने के लिए पिंटू के पास उस थप्पी के हेंडल जैसा मोटा हथियार तो नहीं था.. उसे अपने छोटे से मर्यादित कद के हथियार से ही युद्ध लड़ना था.. और जीतना भी था.. हालांकि.. इस युद्ध मैं पिंटू की दशा.. अमरीका के सामने बांग्लादेश जैसी थी..

बिना एक पल का विलंब किए.. पिंटू ने शीला की गांड के छेद को उत्तेजना से चूम लिया.. और अपनी जीभ की नोक उस छेद पर फेर दी.. फिर उसने थोड़ा सा नीचे जाकर.. शीला की लसलसित चुत की लकीर पर आक्रमण शुरू किया.. उस दौरान उसने शीला के दोनों चूतड़ों को फैलाकर पकड़ रखा था.. जैसे किसी मोटे ग्रंथ की किताब को खोलकर पढ़ रहा हो..

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चुत की लकीर चौड़ी होते ही.. अंदर का लाल गुलाबी विश्व द्रश्यमान होने लगा.. देखते ही पिंटू की सांसें फूल गई.. पिंटू चुत पर जीभ फेरने लगा और शीला तड़पने लगी.. और वासना से बेबस हो गई.. उत्तेजना के कारण शीला के पैर कांप रहे थे.. और वह बड़ी हिंसक तरीके से अपने स्तन मसल रही थी.. निप्पल तो ऐसे खींच रही थी मानों उसे अपने स्तन से अलग कर देना चाहती हो..

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तीन घंटे पहले.. शीला के घर आया ये नादान छोकरा.. अब किसी अनुभवी मर्द की अदा से शीला की रसभरी.. स्ट्रॉबेरी जैसी चुत को चाट रहा था। शीला के स्तन उत्तेजना के कारण कठोर हो गए थे.. और निप्पल सख्त होकर बेर जैसी हो गई थी.. पिंटू को इतना तो पता चल गया की उसकी छिपकली जैसी लोड़ी से शीला के किले को फतह कर पाना नामुमकिन सा था.. इसी लिए वो उसे चाट चाटकर शांत करने का प्रयास कर रहा था।

वो कहावत तो सुनी ही होगी "काम ही काम को सिखाता है" बस उसी तर्ज पर.. पिंटू के दिमाग में कुछ आया.. और उसने शीला की गांड में अपनी उंगली घुसा दी.. शीला को अपनी गांड में जबरदस्त खुजली हो रही थी.. बिना सिखाए की गई इस हरकत से शीला खुश हो गई.. और खुद ही अपनी गांड को आगे पीछे करते हुए पिंटू की उंगली को चोदने लगी..

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"आह्ह.. ओह्ह.. ओह्ह.. चाट पिंटू.. अंदर तक जीभ डाल दे.. ऊईई..मर गई.. मज़ा आ रहा है.. उईई माँ.. तेज तेज डाल.. जीभ फेर जल्दी.. मैं झड़नेवाली हूँ.. आह्ह आह्ह आह्ह.. मैं गईईईईईई......!!!!!!!!" कहते ही शीला का शरीर ऐसे कांपने लगा जैसे उसे बिजली का झटका लगा हो.. उसका पूरा शरीर खींचकर तन गया.. और दूसरे ही पल एकदम ढीला हो गया.. शीला वहीं फर्श पर ढेर होकर गिर गई.. पिंटू भी चाट चाट कर थक गया था.. शीला के अनुभवी भोसड़े को शांत करना मतलब.. शातिर गुनेहगार से अपने जुर्म का इकरार करवाने जितना कठिन काम था.. पर पिंटू की महेनत रंग लाई.. शीला और चेतना.. दोनों को मज़ा आया..

चेतना तो कपड़े पहनकर कब से ड्रॉइंगरूम में इन दोनों का इंतज़ार कर रही थी.. उसकी चुत मस्त ठंडी हो चुकी थी.. वह जानती थी की शीला तब तक बाहर नहीं निकलेगी जब तक की उसके भोसड़े को ठंडक नहीं मिल जाती!!

"पिंटू.. मेरे हुक बंद कर दे.. मुझे ओर भी काम है बेटा.. " कहते हुए शीला घूम गई.. पिंटू उनकी संगेमरमर जैसी पीठ को देखतय ही रह गया.. उस चिकनी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसने ब्रा के दोनों छोर को पकड़कर खींचा ताकि हुक बंद कर सकें.. ब्रा के पट्टों को खींचकर करीब लाते हुए ऐसा महसूस हो रहा था जैसे रस्साकशी का खेल चल रहा हो!! पिंटू को हंसी आ गई.. आईने में पिंटू को देख रही शीला ने पूछा..

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"क्यों रे छोकरे? हंस क्यों रहा है?"

"भाभी, मैं ये सोचकर हंस रहा था की इतनी छोटी सी ब्रा में इतने बड़े बड़े गोले कैसे समाएंगे भला??"

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शीला: "भोसडी के..मादरचोद.. उसमें हसने वाली क्या बात है!!"

पिंटू: "भाभी.. ऐसे ही बड़े बड़े बबलों ने मुझे हिन्दी की परीक्षा में १५ मार्क दिलवाए थे.. "

शीला (आश्चर्य से): "वो कैसे?"

पिंटू: "बोर्ड की परीक्षा में हिन्दी के पेपर में एक निबंध पूछा गया था "बढ़ती हुई आबादी से होते नुकसान".. क्या लिखूँ कुछ सूझ ही नहीं रहा था.. इतने में मेरी नजर सुपरवाइज़र मैडम पर पड़ी.. उनके स्तन भी आपकी तरह बड़े बड़े थे और ब्लाउस मैं संभल नहीं रहे थे.. उन्हे देखकर मैंने निबंध लिखना शुरू कर दिया.. आबादी के बढ़ने से लोगों को होती परेशानियाँ.. दो तीन वाक्य लिखने के बाद.. मैंने दूसरा अनुच्छेद छोटे से घर में ज्यादा लोगों को रहने पर पड़ती तकलीफ की ऊपर लिख दिया.. और उपसंहार आबादी के चलते जरूरत की चीजों की किल्लत पर लिख दिया.. सब कुछ उस सुपरवाइज़र मैडम के मम्मों की प्रेरणा की वजह से.. वो बात याद आ गई.. इसलिए हंसी आई.. वो बात छोड़िए.. आप ये बताइए की अब ब्रा के हुक को बंद कैसे करू? ज्यादा खिचूँगा तो टूट जाएंगे.."

पिंटू की बकवास सुनकर बोर हो चुकी शीला ने अपनी दोनों कटोरियों में से स्तनों को निकाल दिया.. उसके उरोज ब्रा के नीचे झूलने लगे.. स्टेशन आते ही जैसे लोकल ट्रेन में जगह हो जाती है वैसे ही अब जगह हो गई और हुक आसानी से बंद हो गए.. शीला के स्तन अभी भी ब्रा के बाहर झूल रहे थे।

शीला: "चल पिंटू.. अब इन दोनों को अंदर डाल दे.. "

पिंटू ने शीला का दोनों स्तनों को पकड़कर पहले तो थोड़ी देर दबाया.. शीला आँखें बंद करके स्तन मर्दन का आनद लेने लगी

शीला: "जरा जोर से मसल.. आह्ह!!"

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पिंटू ने शीला को अपनी ओर खींच लिया.. और उसके गालों को चूम कर अपने होंठों को शीला के कान के करीब ले गया और फुसफुसाते हुए बोला

पिंटू: "आप का तो हो गया भाभी.. पर मेरा अभी बाकी है.. मेरा पानी निकलवाने का भी कोई जुगाड़ लगाइए.."

शीला अपना हाथ नीचे ले गई और पिंटू का लंड पकड़कर बोली " सच कहूँ पिंटू?? तू मेरे बच्चों से भी छोटा है.. तेरी नुन्नी से छेड़खानी करते हुए भी मुझे शर्म आ रही है.. पर क्या करती? ये सब इतना अचानक हो गया की.. वरना तेरे ये सीटी जैसे लंड से मेरा क्या भला होगा!! अभी देखा था ना तूने.. उस थप्पी का हेंडल कैसे अंदर समा गया था!! अब तू ही बता.. तेरी छोटी सी लोड़ी से मुझे कैसे संतोष मिलेगा??"

पिंटू: "पर उसमें मेरी क्या गलती है? मैंने आपको और चेतना भाभी को.. मुझे जितना आता था वह सब कर के दिया ना!! और ठंडा भी कर दिया!!"

शीला: "तेरी बात सही है पिंटू.. पर तेरा छोटा सा लंड पकड़ने में मुझे शर्म आती है.. तू खुद ही इसे हिला ले.. क्यों की अगर मैं गरम हो गई.. तो फिर तुझे चूस लूँगी पूरा.. इससे अच्छा तो तू मेरे स्तनों को चूसते हुए अपना लंड हिलाते हुए पानी गिरा दे" कहते ही शीला ने अपना एक स्तन पिंटू के मुंह में दे दिया.. बेचारा पिंटू!! शीला की निप्पल चूसते हुए अपना लंड हिलाए जा रहा था..

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शीला: "जल्दी जल्दी कर.. मेरी चुत में फिर से खाज होनी शुरू हो गई है"

"उहह भाभी.. आह्ह.. ओह्ह.. " पिंटू स्खलित हो गया.. शीला बड़े ताज्जुब से देखती रही.. इतने छोटे लंड की पिचकारी दो फुट दूर जाकर गिरी!! उस फेविकोल जैसे वीर्य को देखकर शीला की चुत में झटका लगा.. अंदर दलवाया होता तो मज़ा आता.. कितने फोर्स से पिचकारी लगाई इसने!! अंदर बच्चेदानी तक जाकर लगती.. मज़ा आ जाता.. पर उसके ये सिगरेट जैसे लंड से वह कहाँ ठंडी होने वाली थी!! चलो, जो हुआ अच्छा ही हुआ!!

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शीला और पिंटू कपड़े पहनकर ड्रॉइंगरूम में आए.. चेतना सोफ़े पर बैठे बैठे आराम से अखबार पढ़ रही थी..

शीला: "आप दोनों बातें करो.. मैं अभी कुछ नाश्ता बना कर लाती हूँ.. बेचारे पिंटू को भूख लगी होगी"

पिंटू: "नहीं नहीं.. मुझे भूख नहीं लगी.. मैं अब निकलता हूँ.. घर पहुँचने में देर होगी तो मम्मी डाँटेगी.. "

शीला: "अब आधे घंटे में कोई देरी नहीं हो जाने वाली.. आराम से बैठ.. नाश्ता कर के ही जा.. आज तो तुझे पूरा निचोड़ दिया हमने!!"

चेतना जिस अखबार को पढ़ रही थी उसमें एक इश्तिहार छपा हुआ था.. जिसमें एक मॉडल छोटी सी ब्रा पहने अपने बड़े बड़े उभार दिखा रही थी..

चेतना: "ये अखबार वाले भी कैसी कैसी अधनंगी एडवर्टाइज़मेंट छापते है!! फिर खुद ही बीभत्सता के खिलाफ लंबे लंबे आर्टिकल लिखते है.. और इन मॉडलों को तो देखो.. कैसे अपने बबले दिखाकर फ़ोटो खिंचवाई है!! इन्हे देखकर तो मर्दों के लंड पतलून फाड़कर बाहर निकल जाते होंगे!! खुद ही आधे कपड़ों में घूमेगी.. फिर कुछ उंच-नीच हो जाए तो चिल्लाएगी.. "

पिंटू आराम से सुनता रहा.. अखबार पढ़ रही चेतना का पल्लू नीचे गिर गया था.. उसकी ओर इशारा करते हुए उसने कहा

पिंटू: "भाभी.. पहले तो आप अपनी दोनों हेडलाइट को ढँक लो.. कहीं मैं ही कुछ कर बैठा तो यहीं पर उंच-नीच हो जाएगी और आप चिल्लाएगी"

चेतना: "तुझे जो मन में आए वो कर इनके साथ... मैं कहाँ मना कर रही हूँ!!" कहते हुए चेतना ने पिंटू की जांघ को सहलाया और उसके करीब आ गई.. अपने आप को थोड़ा सा ऊपर किया.. और अपनी छाती से पल्लू गिरा दिया.. कमर के ऊपर अब केवल ब्लाउस के अंदर कैद स्तनों का उभार देखकर कोई भी बेकाबू बन जाता.. चेतना ने बड़ी ही कातिल अदा से अंगड़ाई ली.. और मदहोश कामुक नज़रों से.. अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाया,. होंठों पर अपनी जीभ फेर ली.. और अपने स्लीवलेसस ब्लाउस में से पसीनेदार काँखों को दिखाकर.. पिंटू की मर्दानगी को.. एक ही पल में नीलाम कर दीया।

अखबार को सोफ़े पर फेंककर चेतना पिंटू की जांघों पर सवार हो गई.. और उसके बिल्कुल सामने की तरफ हो गई। पिंटू के मासूम चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में भरते हुए उसके गालों को सहलाने लगी और बड़ी ही कामुक अदा से बोली

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चेतना: "हाय रे पिंटू.. कितना चिकना है रे तू!! तुझे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा है मेरा" कहते हुए चेतना ने पिंटू के होंठों को चूम लिया.. चिंटू ने अपने दोनों हाथों से चेतना के कूल्हें पकड़ लिए.. और उन्हे सहलाने लगा..

चेतना ने पिंटू के पतलून की चैन खोली और उसके सख्त लंड को बाहर निकाला.. बिना वक्त गँवाए उसने अपना घाघरा उठाया और अपनी रसीली चुत की दरार पर पिंटू के सुपाड़े को सेट करते हुए अपने जिस्म का वज़न पिंटू की जांघों पर रख दिया.. पिंटू का लंड चेतना की चुत में ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सर से सिंग!!

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शीला एक प्लेट में गरमागरम पकोड़े लेकर बाहर आई तब इन दोनों को चुदाई करते हुए देखकर हंस पड़ी.. और मन ही मन बोली.. साली ये चेतना भी.. इस बेचारे बच्चे की जान ही ले लेगी आज.. शीला ने एक गरम पकोड़ा लिया और चेतना के खुले नितंब पर दबा दिया

चेतना: "उईई माँ.. क्या कर रही है हरामी साली!!!" बोलते हुए चेतन उछल पड़ी.. उसके उछलते ही पिंटू का लंड उसकी चुत से बाहर निकल गया.. वह उत्तेजना से थर-थर कांप रही थी.. पिंटू का लंड भी झूल रहा था..

शीला ने पकोड़े की डिश को टेबल पर रखा और पिंटू के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. शीला के मुंह की गर्मी.. पिंटू और बर्दाश्त न कर सका.. और बस दस सेकंड में उसके लंड ने इस्तीफा दे दिया.. पिंटू का वीर्य मुंह में भरकर शीला किचन में चली गई। चेतन से अब और रहा न गया.. अपना घाघरा ऊपर करते हुए वह क्लिटोरिस को रगड़ने लगी.. अपनी चुत की आग को बुझाने की भरसक कोशिश कारणे लगी.. पर उसकी चुत झड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी।

आखिरकार उसने पिंटू को सोफ़े पर लिटा दिया और उसके मुंह पर सवार हो गई.. और इससे पहले की पिंटू कुछ कर पाता.. वह उसके मुंह पर अपनी चुत रगड़ने लगी.. करीब पाँच मिनट तक असहाय पिंटू के मुंह पर चुत रगड़ते रहने के बाद.. उसकी चुत का फव्वारा निकल गया.. बेचारा पिंटू.. चेतना के इस अचानक हमले से हतप्रभ सा रह गया..

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थोड़ी देर यूं ही लेते रहने के बाद वह उठा और कपड़े ठीक किए.. उसकी हालत खराब हो गई थी.. वह बुरी तरह थक चुका था.. अपने लंड को पेंट में डालकर उसने चैन बंद की और बिना कुछ कहे वह दरवाजा खोलकार चला गया.. नाश्ता करने भी नहीं रुका.. इन दोनों भूखे भोसड़ों की कामवासना ने उसे डरा दिया था... वह दुम दबाकर भाग गया

शीला और चेतना ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की.. क्यों करती!! उनका काम तो हो गया था.. अनमोल ऑर्गैज़म प्राप्त कर दोनों सहेलियाँ पकोड़े खाते हुए बातों में मशरूफ़ हो गई।

चेतना: "मस्त पकोड़े बनाए है तूने" खाते हुए बोली

शीला: "चेतना.. क्या सच में तेरे पति का खड़ा नहीं होता?"

चेतना: "इतना निकम्मा भी नहीं हुआ है अब तक.. पर हाँ.. पहले की तरह जल्दी सख्त नहीं होता.. और होता भी है तो एकाध मिनट में बैठ जाता है"

कहते हुए चेतना उदास हो गई.. शीला ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.. "मैं समझ सकती हूँ की तुझ पर क्या बीत रही होगी.. मैंने भी मदन की गैरमौजूदगी में दो साल बिताए है.. तू अब से मेरे घर आया कर.. तुझे तड़पना नहीं पड़ेगा.. "

चेतना: "इसी लिए तो मैं घर पर आकर बात करने के लिए बोल रही थी.. ऐसी बातें बाहर खुले में करना ठीक नहीं"

शीला: "सच कहा तूने चेतना.. इस उम्र में जब जिस्म की भूख सताती है तब ऐसी स्थिति होती है की ना सहा जाता है और ना कहा जाता है"

चेतना: "एक बात पूछूँ शीला? सच सच बताना.. मदन भाई दो साल से गए हुए.. इतने समय तू बिना कुछ किए रह पाई यह बात मैं मान नहीं सकती"

शीला: "सच कह रही है तू.. मैंने तो अपने दूधवाले को जुगाड़ लिया है.. रोज सुबह सुबह तगड़ा लंड मिल जाता है"

चेतना: "मेरा भी उसके साथ कुछ चक्कर चला दे शीला.. " विनती करते हुए चेतना ने कहा.. तगड़े लंड का नाम सुनकर उसके दो पैरों के बीच के तंदूर से धुआँ निकलने लगा

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शीला: "अरे तू भी ना.. ऐसे कैसे सेटिंग करवा दूँ.. मैंने भी अभी अभी शुरू किया है उसके साथ!!"

थोड़ी देर के लिए दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला

चेतना एकदम धीमी आवाज में बोली "बेटे से तो बाप अच्छा है"

"मतलब??" शीला समझ नहीं पाई

"कुछ नहीं.. जाने दे यार.. चलती हूँ.. वरना मेरी सास फिर से चिल्लाएगी... जैसे मैं किसी के साथ भाग जाने वाली हूँ" चेतना ने एक भारी सांस छोड़कर कहा

"तो बोल दे अपनी सास को.. की अपने बेटे से कहे की तुझे ठीक से चोदे.. वरना सचमुच भाग जाऊँगी.. एक औरत बिना आटे के जीवन गुजार लेगी पर बिना खूँटे के तो एक पल नहीं चलेगा" शीला ने कहा

"बिना खूँटे के तो मेरी सास को भी नहीं चलता.. दिन में दो दो बार अपनी चुत चटवाती है मेरे ससुर से.. "

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"बाप रे!! क्या बात कर रही है तू!! तुझे कैसे पता चला?" शीला आश्चर्यसह चेतन की ओर देखती रही

"कई बार रात को उनके कमरे में चल रही गुसपुस सुनती हूँ.. मेरा ससुर भी कुछ काम नहीं है.. खड़े हुए ऊंट की गांड मार ले ऐसा वाला हरामी है कुत्ता.. साला" चेतना ने कहा

"कमाल है यार!! इस उम्र में भी!! तेरा ससुर रंगीला तो था ही.. याद है.. तेरे देवर की शादी में मेरे बूब्स को कैसे घूर घूर कर देख रहा था" शीला ने कहा

"हाँ यार.. चल अब मैं चलती हूँ.. बहोत देर हो गई.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे मेरा.. "

"ठीक है.. पर आती रहना.. "

"तू बुलाएगी तो जरूर आऊँगी.. और ऐसा कुछ भी मौका मिले तो मुझे याद करना.. अकेली अकेली मजे करती रहेगी तो एड्स से मर जाएगी.. मिल बांटकर खाने में ही मज़ा है.. मेरी चुत का भला करेगी तो उपरवाला तेरा भी ध्यान रखेगा" हँसते हुए चेतना ने कहा और चली गई


शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही
शीला और चेतना ने पिंटू को निचोड़ लिया बेचारे का लन्ड दोनो के लिए बहुत ही छोटा था लेकिन उसने दोनो को संतुष्ट करने की पूरी कोशिश की लेकिन नही कर पाया अब देखते हैं शीला चेतना की मदद कैसे करती हैं
 
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शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही

शीला का शातिर तेज दिमाग दौड़ने लगा.. उसका दिमाग हर तरह के हलकट विचार करने के लिए सक्षम था.. और जब वह अपने दिमाग और चुत, दोनों का उपयोग कर सोचती.. तब उसे कोई न कोई तरकीब सूझ ही जाती।

उस रात को शीला ने पिंटू को फोन लगाया और उससे गरमागरम बातें करते हुए अपनी चुत में उंगली घिसकर उसे शांत कर दिया।

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रसिक अब हर रोज थोड़ा जल्दी आ जाता और पंद्रह मिनट में शीला को चोदकर दूध देने निकल जाता.. पर शीला को इस जल्दबाजी वाली ठुकाई में ज्यादा मज़ा नहीं आता था। पर बिना सेक्स के रहने से तो ये अच्छा ही था..कम से कम खेलने, चूसने और चुदवाने के लिए एक तगड़ा लंड तो मिला.. यही सोचकर वह समय व्यतीत कर रही थी।

एक दिन सवेरे सवेरे मंदिर जाते हुए उसे अनुमौसी मिल गई। शीला को देखते ही उससे बातें करने रुक गई।

अनुमौसी: "अगले रविवार को हमारा महिला मण्डल यात्रा पर जा रहा है... तुझे चलना है?"

शीला: "हाँ मौसी.. मेरा नाम भी लिखवा देना.. मैं जरूर चलूँगी"

अनुमौसी: "ठीक है.. सुबह सात बजे निकलना है.. तू तैयार रहना.. फिर से वो दूधवाले के साथ उलझ मत जाना.. वरना देर हो जाएगी तो बस छूट जाएगी"

रसिक का जिक्र होते ही शीला के कान चार हो गए.. जिस तरह सवार की एडी लगते ही घोड़े के कान चौकन्ने हो जाते है.. बिल्कुल उसी तरह

शीला: "अरे नहीं नहीं मौसी.. मैं आपसे पहले तैयार हो जाऊँगी.. आप देखना!!"

अनुमौसी: "कितना बोलती है रे तू!! ठीक है.. तू तैयार हो जाएँ फिर हम साथ में निकलेंगे" कहते हुए अनुमौसी मंदिर की ओर चल दी

शीला पूरे दिन सोचती रही.. मौसी ने रसिक का जिक्र क्यों किया!!! कुछ तो राज था.. वरना अनुमौसी ऐसे ही उसका नाम नहीं लेती.. कल रसिक को पूछती हूँ इसके बारे में

जैसे तैसे शीला ने दोपहर तक का समय निकाल ही दिया.. पर फिर उससे रहा नहीं गया.. दोपहर के तीन बजे उसने रसिक को फोन किया.. पर उस चूतिये ने फोन उठाया ही नहीं। पक्का खेत में किसी मज़दूरन की टांगें चौड़ी कर उसकी चुत को पावन कर रहा होगा!!

शीला ने रूखी को फोन मिलाया..

रूखी: "अरे भाभी आप?? कैसे है? आप तो मुझे भूल ही गए!!"

शीला: "नहीं भूली हूँ तुझे.. पर लगता है तू मुझे भूल गई है शायद.. जीवा का डंडा क्या मिल गया तू तो मुझे याद ही नहीं करती!!"

रूखी: "सच कहूँ तो भाभी मैं आपको ही याद कर रही थी.. आप अभी फ्री हो?"

शीला: "हाँ बता.. कुछ खास काम था क्या?"

रूखी: "हाँ भाभी.. आपको एक चीज दिखानी थी.. पर उसके लिए आपको यहाँ मेरे घर पर आना पड़ेगा"

शीला: "तेरे घर?? पर किस बहाने आऊँ तेरे घर रूखी??"

रूखी: "आप एक काम कीजिए.. साथ में एक पतीली लेकर आइए.. कोई पूछे तो कहना की दूध लेने आई हो"

शीला: "ठीक है फिर"

रूखी: "कितनी देर में आओगी भाभी?"

शीला: "१५-२० मिनट में पहुँचती हूँ"

रूखी: "ठीक है.. पर जल्दी आना"

शीला मोबाइल कट करते हुए सोचने लगी.. ऐसा क्या होगा जो रूखी मुझे दिखाना चाहती है!! और जल्दी आने के लिए क्यों कहा!! क्या पता!! जाकर देखती हूँ तब सब पता चल जाएगा..

शीला झटपट तैयार हो गई.. और हात में पतीली लेकर निकल पड़ी.. वैसे तो अगर चल कर जाएंग तो २५-३० मिनट में रूखी के घर पहुँच सकती थी पर शीला ने ऑटो बुला ली.. कमीना ऑटो वाला मिरर सेट करके उसके स्तनों को अपनी नज़रो से ही चूस रहा था.. इस उम्र में भी उसके स्तन पुरुषों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे ये देखकर शीला को अच्छा लगा.. उसने जानबूझकर अपना पल्लू गिरा दिया.. और विंध्य पर्वतों के बीच जैसी खाई होती है वैसी अपने स्तनों के बीच की खाई को उजागर कर दिया..

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स्त्री के स्तनों को देखकर मर्द लोग सदियों से उत्तेजित होते आए है.. स्त्री कितनी भी भद्दी क्यों न हो.. उसके उरोज हमेशा आकर्षक होते है। और हर स्त्री को यह पता होता है की इस अमोघ शस्त्र का उपयोग कर कैसे अपने काम निकलवाए जा सकते है

रिक्शा वाला भी सीटी बजाते हुए शीला के दोनों गुंबजों को ताक रहा था.. जान बूझकर वो रिक्शा को धीमी गति पर चला रहा था ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक शीला के स्तनों को देख सकें.. जानबूझकर खड्डे वाले रास्ते पर ऑटो चलाता था ताकि उन स्तनों को उछलते हुए देख सकें। अब वह गीत भी गुनगुनाने लगा था "चोली के पीछे क्या है.. चुनरी के नीचे"

शीला समझ गई की वह क्या देखकर गाना गा रहा था.. १० मिनट के रास्ते में भी कमीने ने २० मिनट लगा दिए.. पहुंचकर जब शीला ने भाड़ा देने के लिए अपने ब्लाउस से पर्स निकाला तब रिक्शा वाले ने पैसे लेने से माना क्या और कहा "मैडम, आपके जैसे ग्राहक मिल जाएँ तो पूरा दिन अच्छा जाता है" आँख मारते हुए वह रिक्शा लेकर चला गया..

शीला रूखी के घर पहुंची.. और दरवाजा खटखटाया.. रूखी ने दरवाजा खोलकर शीला को हाथ से खींचकर अंदर लिया और दरवाजा बंद कर लिया।

"इतनी देर क्यों लगा दी भाभी?" प्यार से शीला के उभारों पर चिमटी काटते हुए रूखी ने कहा

"अरी जल्दी आने के लिए मैंने ऑटो ली थी.. पर वह हरामी रिक्शा वाला मेरे ये दूध के कनस्तर देखकर पागल हो गया.. और जानबूझकर ऑटो आराम से चला रहा था.. क्या करती!! भाड़ा भी नहीं लिया उसने.. सोच तू.. कितना पागल हो गया होगा इन्हे देखकर!!"

रूखी: "बेचारे की बीवी के छोटे छोटे होंगे.. तभी इन्हे देखकर पागल हो गया.. आपके तो पैसे बच गए ना!! वो सब छोड़िए.. भाभी, अब आप उस कोने में छुपकर खड़े हो जाइए.. अभी आपको बढ़िया वाला पिक्चर दिखाती हूँ.. अभी शुरू होगा.. देखकर आप मुझे बताना की मुझे क्या करना चाहिए"

शीला रूखी के दूध भरे स्तनों को देखकर उत्तेजित हो गई.. उसने रूखी से कहा "तेरा दूध पिए कितने दिन हो गए यार.. पहले थोड़ा सा दूध पी लेने दे मुझे.. "

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रूखी: " भाभी.. वो रसिक भी मुझे कितने दिनों से हाथ नहीं लगाता.. मेरा भी बड़ा मन कर रहा है.. पर क्या करू!!"

शीला ने रूखी का हाथ पकड़कर अपने करीब खींच लिया और कोने में ले जाकर पूछा "फिर कैसा रहा उस रात रघु और जीवा के साथ??"

जवाब देने से पहली रूखी ने अपनी तंग चोली के दो हुक खोल दिए और नारियल जैसी चूचियों में से एक बाहर निकालकर शीला के हाथ में थमा दी..

रूखी: "जीवा की तो क्या ही बात करू मैं भाभी.. पूरी रात चोदा था मुझे.. और रघु भी कुछ कम नहीं था.. वो भी मुआ पीछे से उंगली करता रहा"

रूखी की चुची को मसलते हुए शीला ने कहा "तेरे बोबे तो वाकई जबरदस्त है रूखी.." शीला रूखी की निप्पल से खेलते हुए बोली

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रूखी ने शीला का सर पकड़कर अपनी निप्पल के करीब खींचा और बोली "जो भी करना है जल्दी करो भाभी.. अभी पिक्चर बस शुरू होने ही वाला है.. फिर मौका हाथ से निकल जाएगा.. फटाफट चूस लो जितना चाहिए.. फिर घर पर आऊँगी तब इत्मीनान से पीना मेरा दूध.. "

शीला ने रूखी के स्तन को पकड़कर उठाने की कोशिश की.. कम से कम ढाई किलो का वज़न था एक स्तन का!!

"जल्दी कीजिए भाभी.. इसे बाद में नाप लेना.. " रूखी ने बेसब्री से कहा

"रूखी मुझे ये तो बता की आखिर तूने मुझे यहाँ पर किस लिए बुलाया है??"

"सब बताऊँगी भाभी.. थोड़ी शांति रखिए.. आप खुद ही देख पाओगी.. मुझे बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी" कहते हुए रूखी ने शीला को अपनी बाहो में भर लिया..

शीला ने रूखी की निप्पल को दबाकर दूध की एक चुस्की लगाई.. और फिर भागकर पिलर के पीछे छुप गई.. और पीछे से देखने लगी की आखिर वो क्या था जो रूखी उसे दिखाना चाहती थी।

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थोड़ी देर के बाद.. ६० साल का एक बूढ़ा घर के अंदर आया.. उम्र भले ही ज्यादा था पर दिलडोल काफी चुस्त और तंदूरस्त था.. उसकी खुली छाती पर घुँघराले सफेद बाल नजर आ रहे थे और कमर के नीचे उसने धोती बांध रखी थी..

पास में रूखी खटिया पर बैठे हुए अपने बच्चे को दूध पीला रही थी

"बहु, क्या कर रहा है मेरा लल्ला?? तुझे तंग तो नहीं करता है ना!! " कहते हुए वह बूढ़ा रूखी के करीब जा पहुंचा और झुककर उस दूध पीते बच्चे के गाल को सहलाने लगा.. रूखी का एक स्तन बाहर लटक रहा था.. यह पूरा द्रश्य शीला पिलर के पीछे छुपकर देख रही थी.. उसे सबकुछ साफ साफ दिखाई दे रहा था.. रूखी के स्तन से बस आधे फुट की दूरी पर था वो बूढ़ा..

शीला समझ गई की वह बूढ़ा.. रूखी का ससुर था..

"तेरी सास जब मंदिर जाती है.. तभी में शांति से इसे देख पाता हूँ.. " कहते हुए वह बूढ़ा खटिया पर रूखी के बगल में बैठ गया

"बहु, मुझे हमारा लल्ला बहोत प्यारा है.. वो कहते है ना.. पूंजी से ज्यादा ब्याज की किंमत होती है.. बस वैसे ही.. " कहते हुए वह रूखी के बेहद आकर्षक दूध टपकाते स्तन को घूरने लगा.. उस बूढ़े की आँखों में बालक की भूख और मर्द की हवस का जलद मिश्रण था..

रूखी: "बापू, अभी माँ लौट आएगी और ऐसे देखेगी तो उन्हे गलतफहमी हो जाएगी.. आप अपने कमरे में चले जाइए.. लल्ला का पेट भर जाए बाद में उसे आप को सौंप दूँगी.. जितना मर्जी खेल लेना फिर"

रूखी का एक स्तन बाहर और एक चोली के अंदर था.. उस १००० वॉल्ट के एलईडी बल्ब जैसे स्तन को देखकर रूखी का ससुर पागल सा हो रहा था.. उस छोटे बच्चे के सिर के बालों को सहलाने के बहाने वो बार बार रूखी के स्तन को छु रहा था.. तभी उस दूध पीते बच्चे के मुंह से निप्पल छूट गई.. वह पीते पीते सो गया था.. रूखी की गुलाबी निप्पल से दूध की तीन चार बूंदें बच्चे के गाल पर गिर गई.. और आखिरी बूंद निप्पल पर अभी भी चिपकी हुई थी..

"अरे अरे बहु.. ऐसे तो कपड़े खराब हो जाएंगे.. साथ में एक रुमाल रखा करो तुम.. " ससुर ने रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रख दी

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रूखी के पूरी शरीर में झुनजूनाहट होने लगी.. अपनी सख्त निप्पल पर ससुर के हाथ का स्पर्श होती ही उसका दूसरा स्तन कठोर होकर चोली को फाड़कर बाहर निकलने की धमकी देने लगा.. जो स्तन पहले से बाहर था वो भी सख्त हो गया.. मानों बम की तरह फटने वाला हो

रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रखकर ससुर ने दूध की उस बूंद को उंगली पर ले लिया और फिर उसे रूखी के चेहरे के पास लेजकर बोला

"लल्ला को तो रोज दूध पिलाती हो.. कभी खुद भी चखकर देखा है क्या??"

रूखी शर्म से पानी पानी हो गई

"मुझे भला क्या जरूरत है इसे चखने की.. " रूखी ने सिर झुकाकर जवाब दिया

"अरे बेटा.. तुम्हें रोज सबसे पहली बूंद खुद ही चख लेनी चाहिए.. उसके बाद ही लल्ला को पिलाना चाहिए.. क्या पता हमें कोई बीमारी हो और दूध खराब हो गया हो तो लल्ला बेचारा बीमार हो सकता है.. ये ले.. चख कर देख" कहते हुए ससुर ने उस दूध वाली उंगली का स्पर्श रूखी के होंठों से करवाया। रूखी ने अपना मुंह खोला.. ससुर ने अपनी उंगली अंदर डाल दी और थोड़ी देर तक वैसे ही रहने दी.. उंगली को चूसते हुए रूखी की आँखें बंद हो गई.. वह गहरी सांसें लेने लगी.. हर सांस के साथ उसके मादक उन्नत उरोज ऊपर नीचे होने लगे..

अनजाने में रूखी ने अपने ससुर की उंगली को ऐसे चूस लिया जैसे जीवा के लंड को चूस रही हो.. अपने ससुर को उंगली को उसने चाट चाट कर साफ किया.. अब उस बुढ़ऊ ने अपनी दूसरी उंगली भी रूखी के मुंह के अंदर डाली और अंदर बाहर करने लगा.. जैसे अपने लंड को रूखी के मुंह में दे रहा हो.. रूखी की आँखें अभी भी बंद थी..

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रूखी: "बापू.. फिर से दूध की बूंदें टपकने की तैयारी में है.. जल्दी से अपनी उंगली से पोंछ लीजिए वरना मेरे कपड़े गीले हो जाएंगे" रूखी ने अपने ससुर को सेक्स के शतरंज में अप्रत्यक्ष रूप से आमंत्रित कर ही दिया

रूखी ने नजर झुकाकर देखा तो उसके ससुर का लंड धोती के अंदर खड़ा हो चुका था.. भला हो उसकी लंगोट का जिसने उस थिरकते हुए घोड़े जैसे लंड को बांध कर रखा था..

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बूढ़े ने आगे बढ़ने का फैसला किया.. और निप्पल को हल्के से दबाकर अपनी उंगली पर दूध लेकर खुद के मुंह तक ले गया और बोला

"बहु.. मैं चखकर देखूँ एक बार???"

रूखी का यह नया रूप देखकर शीला अचंभित रह गई.. खटिया पर बैठी रूखी का बदन इतना सुंदर लग रहा था.. कुछ ही महीनों पहले हुई डिलीवरी के कारण उसका मांसल शरीर और गदरा गया था..

बूढ़े ससुर ने खुद की उंगली चूसकर रूखी का दूध चख लिया... रूखी शर्म से लाल लाल हो गई..

"बापू.. आपने तो पहले चखा ही होगा ना!! अम्मा का दूध.. जब लल्ला के पापा का जनम हुआ तब.. " रूखी ने धीरे से कहा

"बेटा.. क्या बताऊँ तुझे.. जब रसिक पैदा हुआ था तब तेरी सास के बोब्बे भी तेरी ही तरह सुंदर और रसीले थे.. रसिक ज्यादा दूध नहीं पी पाता था.. इसलिए तेरी सास की छाती दूध से भर जाती.. रात को जब उसकी छाती दर्द करने लगती.. तब वो मुझे आधी रात को जगा देती.. मैं चूस चूस कर उसके बबले खाली कर देता तब जाकर बेचारी को नींद आती थी..

"बापू, लल्ला के पापा तो अब भी ज्यादा नहीं पी पाते.. मुझे भी कभी कभी रात को दर्द होने लगता है.. पर वो पीते ही नहीं है.. पूरी रात मैं दर्द के मारे तड़पती रहती हूँ.. और क्या कर सकती हूँ मैं.. तड़पने के अलावा.. " रूखी ने अपने पत्ते बिछाने शुरू कर दिए

"अरे बहु.. अब मैं मेरे बेटे से ये तो नहीं कह सकता ना.. की अपनी बीवी का दूध चूस दे.. पर हाँ.. एक काम हो सकता है.. रात को जब दूध से तेरी छाती फटने लगे तब मुझे जगा देना.. मैं सारा दूध चूसकर तेरा दर्द कम कर दूंगा.. ठीक है!!"

"आप कितने अच्छे है.. बापू!! देखिए ना.. मेरी छाती दूध से फटी जा रही है.. और लल्ला भी थोड़ा सा ही पीकर सो गया.. अब पता नहीं ये कब जागेगा और दूध पिएगा.. "

"अरे बेटा.. क्यों चिंता कर रही हो!! मैं हूँ ना.. ला मैं तेरा दूध चूसकर तेरी छातियाँ हल्की कर देता हूँ"

"पर बापू.. मुझे बड़ी लाज आती है.. " शरमाते हुए रूखी ने कहा

"अब शर्म करोगी तो फिर दर्द भुगतना पड़ेगा.. और तो मैं कुछ नहीं कर सकता!!"

"नहीं नहीं बापू.. ये लीजिए.. चूस लीजिए.. बहोत दर्द हो रहा है.. " रूखी ने तोप के नाले जैसे दोनों स्तन खोलकर अपने ससुर के सामने पेश कर दिए


रूखी के मदमस्त स्तनों को देखकर उसका ससुर पानी पानी हो गया.. यौवन के कलश जैसे बेहद सुंदर चरबीदार बोब्बे.. बड़े सुंदर लग रहे थे

RUKHI5
अनु मौसी को रसिक और शीला के बारे में पता चल गया है रूखी अपने बूढ़े ससुर को अपना दूध पिला कर तंदुरुस्त करके चुदने वाली है और साथ में लगता है शीला का भी नंबर लगने वाला है
 
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