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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

whether this story to be continued?

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Lovely Anand

Love is life
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आह ....तनी धीरे से ...दुखाता
(Exclysively for Xforum)
यह उपन्यास एक ग्रामीण युवती सुगना के जीवन के बारे में है जोअपने परिवार में पनप रहे कामुक संबंधों को रोकना तो दूर उसमें शामिल होती गई। नियति के रचे इस खेल में सुगना अपने परिवार में ही कामुक और अनुचित संबंधों को बढ़ावा देती रही, उसकी क्या मजबूरी थी? क्या उसके कदम अनुचित थे? क्या वह गलत थी? यह प्रश्न पाठक उपन्यास को पढ़कर ही बता सकते हैं। उपन्यास की शुरुआत में तत्कालीन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए सेक्स को प्रधानता दी गई है जो समय के साथ न्यायोचित तरीके से कथानक की मांग के अनुसार दर्शाया गया है।

इस उपन्यास में इंसेस्ट एक संयोग है।
अनुक्रमणिका
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भाग 126 (मध्यांतर)
 
Last edited:

Dharmendra Kumar Patel

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आप की कहानी में जादू है जैसे पढ़ते रहने में मंत्रमुग्ध हो जाना होता है
 

Royal boy034

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भाग 56

परंतु लाली के घर में सुगना का इंतजार खत्म हो चुका था। लाली के खांसने की आवाज सुनकर सुगना का दिल तेजी से धड़कने लगा उसकी चूचियां और काम इंद्रियां सतर्क हो गई। आज पहली बार वह लाली के हाथों राजेश का वीर्य स्खलन देखने जा रही थी। देखने ही क्या उसे उस वीर्य को अपने गर्भ में आत्मसात भी करना था। सुगना का दिल और जिस्म एक दूसरे से सामंजस्य बैठा पाने में नाकाम थे। वह बदहवास सी अधूरे मन और गर्भधारण की आस लिए लाली के कमरे में प्रवेश कर गई…

अब आगे….

बिस्तर पर राजेश अर्धनग्न स्थिति में पड़ा हुआ था उसकी लूंगी कमर पर कसी अवश्य थी परंतु सामने से पूरी तरह खुली हुई थी।

राजेश का तना हुआ लण्ड लाली के खूबसूरत हाथों में आगे पीछे हो रहा था।

लाली ने अपनी उंगलियां होंठ पर रखते हुए सुगना को चुप रहने का इशारा किया और उन्हीं उंगलियों से उसे अपने पास भी बुला लिया।

कमरे में अब भी कुछ उजाला कायम था रेलवे कॉलोनी की खिड़कियों और दरवाजों को बंद करने के बावजूद सूरज की रोशनी को रोक पाना असंभव था।

सुगना बार-बार राजेश के चेहरे को देख रही थी जिस पर लाली ने अपना दुपट्टा डाल रखा था।

सुगना मन ही मन बेहद घबरा रही थी कहीं यदि राजेश जीजू के आंख पर से दुपट्टा हट गया तो?

सुगना सधे हुए कदमों से धीमे धीमे लाली के करीब आ गई। सुगना के सधे हुए कदमों ने पायल की छनक को भी रोक लिया। अपने अंतर्द्वंद से लड़ते हुए सुगना का मन मस्तिष्क थक चुका था और उसके कदम उसका अनुकरण कर रहे थे।

राजेश को यह अंदाजा भी ना हुआ की सुगना कमरे में आ चुकी है।

लाली ने अपनी हथेलियां राजेश के काले लण्ड पर फिराते हुए कहा…

"आज त कालू मल पूरा उछलत बाड़े…...सुगना खातिर का?" राजेश मुस्कुरा उठा

"धीरे बोल... सुगना बाहरे होइ"

"हमार बात मत टालीं ... ई इतना काहे फुदकता हमरा सब मालूम बा" लाली ने राजेश के लण्ड को दबा दिया और उसके सुपारे को अपने अंगूठे से सहला दिया।

राजेश ने लाली के प्रश्न का उत्तर न दिया अपितु लाली से पूछा…

"सुगना तोहार सहेली ह उकरे से काहे ना पूछ लूं कि छौ छौ महीना अकेले कैसे रहे ले? रतनवा सार पागल ह.. सुगना जैसन पुआ हमरा भेटाई रहित त…

"त..का…..का करतीं?" लाली ने राजेश के मुसल को मसल दिया

"आह..तनि धीरे से…..दुखाता….."

राजेश के मुख से निकले अंतिम वाक्यांश यूं ही नहीं निकले थे दरअसल सुगना की तारीफ सुनकर लाली थोड़ा नाराज हो गई थी उसने राजेश के लण्ड को कुछ ज्यादा ही तेजी से दबा दिया था और राजेश की उत्तेजना एक मीठी कराह में बदल गई थी।

लाली ने अपने हाथों का दबाव थोड़ा नरम किया और बोली..

"बताई बताई का करतीं...ओकरा पुआ के साथ?." लाली ने मुस्कुराते हुए सुगना को देखा

राजेश ने कुछ कहा नहीं पर अपने होठों को गोल कर अपनी जीभ को अपने होठों पर फिराने लगा...

राजेश की इस हरकत से सुगना की जांघों के बीच छुपे मालपुए पर एक अजीब सी संवेदना हुई और वह सिहर उठी। उसे लाली की बातें याद आ रही थी लाली सच कहती थी। राजेश जीजू उसके बारे में खुलकर गंदी बातें कर रहे थे।

सुगना असमंजस में थी। उसे लाली और राजेश के बीच उसे लेकर चल रही उत्तेजक बातों से ज्यादा सरोकार न था वह मन ही मन घबरा रही थी और लाली द्वारा राजेश के वीर्य स्खलन का इंतजार कर रही थी। उसने लाली को अपने हाथों की गति बढ़ाने का इशारा किया प्रत्युत्तर में लाली ने उसे ही अपने हाथ लगाने का आमंत्रण दे दिया सुगना ने झटपट अपने दोनों हाथ पीछे कर लिए और मुस्कुराने लगी.

सुगना राजेश के करीब हो या ना हो पर वह लाली से बेहद प्रेम करती थी वह उसकी प्रिय सहेली थी जिससे वह हर प्रकार की बातें साझा करती थी।

राजेश के अंडकोष में लावा उबलने लगा था लाली के हाथों की कुशलता और दिमाग में घूम रही सुगना ने लण्ड में करंट दौड़ा दी और राजेश का लण्ड झटके लेने लगा…

जैसे ही राजेश का स्खलन प्रारंभ हुआ सुगना थर थर कांपने लगी। लाली के वीर्य से सने हाथ को देखकर सुगना को एक अजीब सा एहसास हुआ उसे आज पहली बार उस श्वेत वीर्य से घृणा का एहसास हुआ यह क्यों हुआ यह तो सुनना ही जाने परंतु उसी समय सूरज के रोने की आवाज आई और सुगना उल्टे पैर हॉल वाले कमरे की तरफ दौड़ पड़ी। पुत्र मोह में वह यह भूल गई कि वह लाली के पास दबे पैर आई थी.

सुगना की छनकती पायल ने सारी कहानी बयां कर दी। राजेश ने लाली के वचन को तोड़ अपनी आंखों पर पड़ा दुपट्टा हटा लिया और दरवाजे से बाहर जाती हुई सुगना को देख लिया। वह अवाक रह गया उसने लाली से पूछा

"सुगना एहजे रहली का?"

लाली ने कुछ नहीं कहा। अपने दोनों हाथों में वीर्य लपेटे हुए अजीब सी स्थिति में आ चुकी ही। वह किस मुंह से यह बात बताती कि वह इन्हीं उंगलियों से सुगना की बुर में उसके वीर्य को प्रवेश करा कर सुगना को गर्भधारण करने में मदद करने वाली थी।

सारा खेल खराब हो चुका था।

( कुछ तो पाठको ने किया कुछ नियति ने किया)

सुगना के गर्भधारण की आस टूट चुकी थी अद्भुत निषेचन क्रिया होते होते रुक गई थी। लाली सोच रही थी कि जब राजेश के वीर्य से गर्भधारण में सुगना को आपत्ति नही है तो काश सुगना एक बार के लिए उसके पति की इच्छा भी पूरी कर देती……पर सुगना अपनी अपनी अद्भुत निषेचन क्रियाविधि से ही संतुष्ट थी पर आज यह अवसर भी जा चुका था।

कुछ ही देर बाद राजेश ने खाना खाया और वापस ड्यूटी के लिए निकल पड़ा।

सुगना सूरज को दूध पिलाते हुए लाली के वीर्य से सने हाथों की याद कर रही थी यदि सूरज न होता तो शायद लाली की वीर्य से सनी उंगलियां उसकी बुर में राजेश के वीर्य को पहुंचा चुकी होती…

सुगना को समझ ही नही आ रहा था कि वह खुश हो या दुखी…

थोड़ा आराम करने के पश्चात सुगना और लाली दोनों बनारस महोत्सव जाने के लिए तैयार होने लगी।

लाली के दोनों बच्चे पड़ोस में खेलने चले गए। लाली अपनी नयी साड़ी पहनकर झटपट तैयार हुई… तभी सुगना ने कहा...

"रुक जा हमु नहा ले तानी"

"काहे नहा तारे ते त असहीं चमकते रहेंले

अपनी तारीफ सुनकर सुगना मुस्कुरा उठी। वह खूबसूरत तो थी ही और मुस्कुराहट ने उसमे चार चांद लगा दिए।

सुगना ने अपनी साड़ी उतारी लाली की निगाहें उसके खूबसूरत जिस्म को निहार रहीं थीं जिसे सुगना ने ताड़ लिया और पलटते हुए बोली

" का देखा तारे.."

लाली शर्मा गई लाली सुगना की पतली कमर और भरे भरे नितंबों के बीच खो गई थी नितंबों के बीच छुपी सुगना की रानी की कल्पना जितना उसके पति राजेश ने की थी उतना लाली ने भी। उसने अपने मन और मस्तिष्क में अनायास ही उसकी छवि बिठा ली थी।

वह अपनी तुलना सुगना से कर रही थी भगवान ने दोनों एक जैसी काया दी थी परंतु सुगना के शरीर की चमक और कसाव उसे एक अलग ही पहचान देता था।

सुगना ने लाली की नाइटी ली और बाथरूम की तरफ जाने लगी। लाली ने भी आज बिल्कुल नई साड़ी पहनी थी वह बाहर जाते हुए बोली

"सूरज के भी ले ले जा तानी। पूजा में चढ़ावे खातिर कुछ सामान खरीद ले तानी। ते आराम से नहा ले"

"दरवाजा सटा दे" सुगना ने कहा और गुसल खाने में प्रवेश कर गई।

नियति सुगना को नग्न होते हुए देख रही थी सुगना ने अपने शरीर के सारे वस्त्र उतार दिए और अपनी जन्मजात अवस्था में आकर अपने खूबसूरत शरीर का अवलोकन करने लगी । एक बच्चे की मां बनने के बाद भीभी सुगना बिना अपने हांथों का प्रयोग किये अपनी आंखों से अपनी बुर की दरार देख पाती थी उसने अपने पेट पर उभार आने नहीं दिया था और चुचियों का कसाव भी बरकरार रखा था।

सुगना के चमकते हुए शरीर को देखकर नियति भी स्वयं अपनी कृति पर प्रफुल्लित हो रही थी यदि उसके बस में होता तो वह स्वयं ही उससे संभोग कर उसकी मनोकामना पूर्ण कर देती।

सुगना के तन मन में एक अजब सी आग थी अपने बाबुजी सरयू सिह से संभोग किये उसे कई महीने बीत चुके थे। जब भी उसका मन खुशहाल होता उसकी जांघों के बीच छुपी हुई बुर मुस्कुराने लगती। पिछले दो-तीन दिनों से उसे हर घड़ी अपने बाबूजी की याद आ रही थी। विद्यानंद से मिलने के पश्चात एक-एक दिन उसने सरयू सिंह को याद करते हुए गुजारे थे। परंतु किसी न किसी कारण उसे उनका संसर्ग नहीं मिल पा रहा था।

हर समय उसका अंतरमन ऊपर वाले से एक ही प्रार्थना करता काश उसके बाबु जी उसे अपनी गोद में उठाते और उसकी नग्न पीठ पर अपनी खुरदरी हथेलियां फिराते हुए उसे अपने आलिंगन में लेते। गालों से गाल सटाते होठों से होठ चूमते और ……..आह ….

सुगना की उंगलियों ने उसके मनोभावों को पढ़ लिया वह अपनी निगोड़ी बुर को समझाने के लिए उसे थपथपाने लगी। परंतु प्यासी बुर सुगना के झांसे में आने को तैयार न थी उसने अपना मुंह खोल दिया और सुगना की उंगलिया उसकी कोमल गहराइयों में उतर गयीं। सुगना की बुर ने न जाने उंगलियों पर ऐसा कौन सा निर्वात बल कायम किया हुआ था, सुनना चाह कर भी अपनी उंगलियां बाहर न निकाल पायीं। उसकी उंगलियां अंदर थिरकती रहीं और सुगना के निप्पल तनते चले गए।

अपने ही हाथों अपनी चुचियों को सांत्वना देने के लिए सुगना ने उन्हें सहलाना चाहा और अनचाहे में ही अपनी उत्तेजना को अंजाम तक पहुंचा दिया। सुगना के दिलों दिमाग पर सरयू सिंह के साथ बिताए गए अंतरंग पल छाते चले गए...

काश बाबूजी अपने मजबूत मुसल से उसकी जांघों के बीच चटनी कूटते….मुसल का कार्य उंगलिया न कर सकीं पर …

सुगना की बुर ने अपना रस छोड़ना शुरू कर दिया। सुगना ऐंठती रही उसकी जाँघे तन गयी.. उसकी मांसल बुर ने अंदर रिस रहे सारे प्रेम रस को बुर् के होठों पर लाकर छोड़ दिया जो सुगना द्वारा लोटे से डाले जा रहे शीतल जल के साथ विलीन हो गया।

सुगना ने अपना स्नान पूरा किया और लाली की नाइटी पहन कर लाली के कमरे में आ गई अपने बाल सुखाते हैं सुखना दरवाजे की तरफ पीठ करके खड़ी थी ..

#####################################

उधर सोनू सोनी को पांडाल में छोड़ने के बाद कुछ देर अपने दोस्तों के साथ रहा परंतु उसका मन कहीं न लग रहा था। सुबह लाली को जी भर कर चोदने के पश्चात उसका मन नहीं भरा था। जाने यह कैसी आग थी जितना सोनू लाली के करीब आ रहा था उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी। आज लाली के घर में सुगना भी उपस्थित थी इसलिए सोनू जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

परंतु चतुर सोनू चूत के चस्कर में चकोर की भांति, चित्त में लाली की छवि बसाये, चूत के आकर्षण में बंधा लाली की कालोनी में आ गया।

लाली के घर से कुछ ही दूर उसे नई साड़ी में लिपटी सुगना के कंधे पर से झांकता हुआ सूरज का चेहरा उसे दिखाई पड़ गया। उसे लगा जैसे सुगना दीदी सूरज को लेकर कुछ सामान खरीद रही है। सोनू तेजी से भागता हुआ लाली के घर पहुंच गया और सटे हुए दरवाजे को धीरे से खोलते हुए अंदर आ गया।

घर में एकांत पाकर सोनू ने मन ही मन ऊपर वाले से अपनी अनुनय विनय कर डाली और ऊपर वाले ने भी उसकी इच्छा पूरी कर दी। उसके मनो मस्तिष्क में चल रही लाली को उसने अंदर अपने बाल सुखाते देख लिया। नाइटी में लाली न होकर सोनू की सुगना दीदी थी पर सोनू इस बात से अनजान था। नाइटी के झीने आवरण में ढकी गदराई जवानी उसे ललचाने लगी। सोंग का लण्ड स्प्रिंग की तरह तुरंत ही खड़ा हो गया वह सधे हुए कदमों से उस कामनीय शरीर के पीछे गया और उसे पीछे से अपने आलिंगन में ले लिया।

सुगना के पेट पर अपने हाथों से पकड़ बनाते हुए उसने सुगना को लगभग ऊपर उठा दिया। सुगना के पैर हवा में आ गए। सोनू के लण्ड ने सुगना के नितंबों के बीच में जगह बनाने की कोशिश की और सोनू के मजबूत लिंग ने अपनी उपस्थिति का एहसास सुगना को करा दिया।

सुगना ने पीछे पलट कर देखा...

सोनू सकपका गया।

"हम जननी हा की लाली ….."

सोनू जो कहना चाहता उसे कह पाना भी उतना ही कठिन था वह अपने वाक्य को पूरा न कर सका।

उसने सुगना को तुरंत ही नीचे छोड़ दिया और बिना कुछ कहे उलटे पैर कमरे से बाहर निकल गया।

कुछ देर के आलिंगन ने भाई बहन की बीच के पवित्र रिश्ते में एक ऐसा एहसास डाल दिया था जो दोनों के लिए बिल्कुल ही नया था।

सोनू थरथर कांप रहा था वह सबकी नजर बचाकर भाग जाना चाह रहा था परंतु ऐसा हो ना सका दुकान से आ रही लाली ने उसे देख लिया और बोला...

"कहां जा रहे हो ? दरवाजा तो खुला ही था अंदर सुगना है ना..

"मुझे कुछ काम है मैं थोड़ी देर बाद आता हूं…"

"जा पहले रिक्शा लेकर आ हम लोग बनारस महोत्सव जाएंगे.."

सोनू फंस चुका था वह रिक्शा लेने के लिए सड़क की तरफ बढ़ गया। उसके हाथ अभी भी उस अद्भुत स्पर्श.. को याद कर रहे थे। ऐसा नही था कि सुगना को सोनू ने छुआ न था पर वह आलिंगन अलग था वासना से ओतप्रोत...सोनू की बाहों पर अपना भार छोड़ती चुचियों का कोमल स्पर्श सोनू को अपने दिमाग मे चल रहे के कामुक द्वंद में और कमजोर कर रहा था।

सुगना के शरीर की कोमलता उसके लिए बेहद नई थी। इतनी उत्तेजना उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। लाली और सुगना के शरीर के अंतर को सोनू ने कुछ ही पलों में पहचान लिया था।

यह अंतर बिल्ली और खरगोश के बच्चे की तरह था दोनों ही कोमल और मुलायम थे पर अंतर अपनी जगह था।

उधर सुगना भी सिहर उठी थी।। कुछ ही पलों के आलिंगन में उसे सोनू के पूर्ण वयस्क होने का एहसास करा दिया था। अपने नितंबों में उसके खड़े लिंग की चुभन को उसने बखूबी महसूस किया था और मजबूत आलिंगन के कसाब को भी।

उसका भाई अब उतना छोटा न था जितना अब वो उसे समझती थी। जिस तरह बचपन मे वह उसे झूला झुलाया करती थी आज ठीक उसी तरह सोनु ने उसे कुछ पलों के लिए ही सही पर वही झूला झूला दिया था। पर भाव मे अंतर स्पस्ट था। प्रेम प्रेम में अंतर था।

सुगना और सोनू का प्यार वात्सल्य रस से अचानक श्रृंगार रस की तरफ मुड़ता प्रतीत हो रहा था।

इस आलिंगन ने सुगना के मन में सोनू के प्रति भाव बदल दिए। सोनू से नजरें मिलाने में खुद को नाकाम पा रही थी।

कुछ ही देर में लाली और सुगना सोनू द्वारा लाए रिक्शे में बैठकर बनारस महोत्सव के लिए चल पड़ीं। पीछे एक और रिक्शे में सोनू अपनी लाली दीदी के दोनों बच्चों को लेकर एक सेवक की भांति पीछे पीछे चलने लगा। रिक्से में बैठी हुई दोनों स्त्रियों की पीठ देखकर सोनू आज पहली बार इन दोनों की तुलना कर रहा था।

आज सोनू की निगाहे अपनी सगी बहन में कामुकता खोज रही थी। वह जितना ही ध्यान सुगना की पीठ पर से हटा कर लाली पर ले जाता परंतु उसका अवचेतन मन सुगना की पीठ पर ही निगाहों को घसीट लाता।

सुगना जब-जब सोनू के बारे में सोचती उसका दिल धक धक करने लगा। वह बार बार अपने कपड़ों को व्यवस्थित कर अपनी नंगी पीठ को ढकने का प्रयास करती। सोनू के सामने बिंदास और निर्विकार भाव से घूमने वाली अब सचेत हो गयी थी।

पंडाल में उतरने के बाद वह सीधा महिलाओं वाले भाग में चली गई। उसने सोनू की तरफ पलट कर नहीं देखा वह देखती भी कैसे? अभी भी उसके स्पर्श का वह एहसास उसके दिलो-दिमाग पर छाया हुआ था।

बनारस महोत्सव का पांचवा दिन भी बीत रहा था। संध्या वंदन के उपरांत सुगना ने अपने इष्ट देव के समक्ष अपना निर्णय सुना दिया…

जब तक उसके बाबूजी सरयू सिंह उसे अपने हांथो से पानी नही पिलायेंगे वह पानी नही पीयेगी। सुगना जो बात अपने इष्ट से कहना चाहती थी उसने अपने तरीके से वह बात उन पहुंचा दी थी। सुगना ने मन ही मन सोच लिया था कि वह सरयू सिह के आते ही तुरंत ही उनकी गोद मे आ जाएगी..

के सुगना चल खाना खा ले…

"ना मां हमारा भूख नइखे"

सुगना को जिस चीज की भूख थी वह सर्वविदित था।

#####################################

उधर सुबह सुबह सरयू सिंह सलेमपुर की तरफ बढ़ रहे थे.. आज वह किसी भी हाल में सुगना को छोड़कर सलेमपुर नहीं जाना चाह रहे थे परंतु उनका कर्तव्य और मनोरमा का निर्देश उनकी निजी आकांक्षाओं पर भारी पड़ रहा था। सलेमपुर पर आई इस प्राकृतिक विपदा से अपने गांव वालों को निकालना और उन्हें राहत पहुंचाना सरयू सिंह ने ज्यादा जरूरी समझा और अपने मन का मलाल त्याग कर अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए निकल पड़े। काश कि वह सुगना की मनोदशा और उसके अंतर्द्वंद को जान पाते तो वह अपनी नौकरी को ताक पर रखकर सुगना के साथ खड़े रहते बल्कि उसे तब तक लगातार संभोग करते जब तक कि वह गर्भवती ना हो जाती।

उन्होंने निकलते वक्त सुगना के साथ रंगरेलियां मनाने के लिए निर्धारित होटल मैं जाकर अपने ना आने की सूचना दे दी और काफी जद्दोजहद करने के पश्चात अपनी गाढ़ी कमाई का कुछ पैसा वापस ले आए।

सलेमपुर पहुंच कर उन्होंने गांव वालों को यथोचित मदद पहुंचायी और साथ आए पुलिसवालों के साथ मिलकर उग्र गांव वालों को शांत करने में मदद की। इस दुरूह कार्य को करते करते रात गहरा गई।

सरयु सिंह का कार्य अभी अधूरा था सलेमपुर में भी और सुगना द्वारा किये वादे का सुख लेने का भी... परंतु बनारस महोत्सव का पांचवा दिन बीत चुका था।

सरयू सिंह सुगना के लिए अधीर हो रहे थे परंतु नियति भी सुगना के हाँथ की लकीरों के आगे मजबूर थी।

#####################################

विद्यानंद के पंडाल में रात गहरा रही थी। पंडाल में सारी महिलाएं सो चुकी थी सिर्फ सुगना की आंखों से नींद गायब थी भूखी प्यासी सुगना अपने इष्ट देव से अपने बाबू जी के आगमन के लिए प्रार्थना कर रही थी अपने मन में इतना झंझावात लिए सुगना सो गई.. और एक निराली दुनिया मे पहूँच गयी।

पंडाल में जमीन पर चटाई बिछी हुई थी। पंगत में कई सारे लोग बैठे हुए थे। महिलाएं पुरुषों को खाना परोस रही थी। सुगना को भी खाना परोसने के लिए बुलाया गया। सुगना अपने हाथ में मीठा मालपुआ लिए पंगत की तरफ बढ़ चली।

अचानक सुगना को अपनी साड़ी की सरकती हुई महसूस हुई। यह क्या... उसकी साड़ी अचानक ही शरीर से गायब हो चुकी थी थी. ब्लाउज और पेटीकोट सुगना के शरीर को मर्यादित आवरण देने में पूरी तरह नाकाम थे।

सामने बैठे पुरुष उसे एकटक घूरे जा रहे थे तभी पीछे से कजरी की आवाज आई

"सुगना बेटा.. सब के मालपुआ खिया द"

कजरी के मुख से मालपुआ शब्द सुनकर सुगना ने एक पल के लिए शर्म से पानी पानी हो गई और अगले ही पल अपनी शर्म को ताक पर रखकर सामने बैठे व्यक्तियों को पहचानने की कोशिश करने लगी..

जैसे जैसे उसकी आंखें पुरुषों को पहचानने की कोशिश करती गई उसकी आंखें आश्चर्य से फटती चली गयीं।

पंगत में सबसे पहले रतन था उसके पश्चात राजेश और सोनू था। सबसे आखरी में सुगना के प्यारे बाबू जी पालथी मारे बैठे हुए थे और उनकी गोद में छोटा सूरज बैठा हुआ था।

सुगना अपनी अर्धनग्न अवस्था में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी। तभी कजरी की आवाज एक बार फिर आयी..

"सुगना बेटा सब आपने ही परिवार के ह मालपुआ दे द"

सुगना आगे झुकी और रतन के पत्तल में मालपुआ रख दिया उसकी चूचियां बरबस ही रतन की निगाहों के सामने आ गयीं। सुगना के दोनों हाथ व्यस्त थे वह चाह कर भी अपनी चुचियों पर अपने हाथों का आवरण न दे पायी। सुगना थरथर कांप रही थी। उसकी चूचियां ब्लाउज से बाहर आकर रतन को ललचा रही थीं।

अगली बारी राजेश की थी। पत्तल में मालपुआ डालते समय सुगना कि दोनों चूचियां उछल कर बाहर आ गई…

सुगना ने जैसे ही मालपुआ सोनू की थाली में डाला पेटीकोट जैसे गायब हो गया। अपने छोटे भाई के सामने खुद को नग्न पाकर सुगना के पैर कांपने लगे सुगना बेसुध होकर गिर पड़ी उसने खुद को सरयू सिह की गोद में पाया..

सरयू सिंह की एक जंघा पर पूर्ण नग्न सुगना थी दूसरे पर सूरज था…

अपने ही अबोध बालक के सामने सुगना पूर्ण नग्न अवस्था में बैठी हुई थी। उसकी मालपुआ की थाली न जाने कहां गायब हो गयी थी..

सुगना के मन में अभी भी कजरी की बात घूम रही थी सुगना मालपुआ खोजने लगी तभी उसे सरयु सिंह की कड़कती आवाज सुनाई पड़ी

"सुगना बाबू का खोजा तारू?"

"मालपुआ"

"ई त बा"

सरयू सिंह की हथेलियां सुगना की जांघो के बीच आ चुकी थीं।

छोटा सूरज अपनी माँ को इस नए रूप में देख कर आश्चर्य चकित था ..सुगना की आंख सूरज से मिलते ही सुगणा की नींद खुल गयी...


शेष अगले भाग में...
बहुत बढिया अपडेट मिळ गया writer जी वेटिंग फॉर नेक्स्ट अपडेट
 

Lovely Anand

Love is life
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Nice update
Gajab update, niyati kho ya readers demand lekin Rajesh se bachna kafi intersted hai aur sonu ka aagamn sugna ki sex life me achha laga,

आप की कहानी में जादू है जैसे पढ़ते रहने में मंत्रमुग्ध हो जाना होता है

Sugna or sonu ki chudai ka intezar
आप सभी को धन्यवाद जुड़े रहें
 

Curiousbull

Active Member
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भाग 56

परंतु लाली के घर में सुगना का इंतजार खत्म हो चुका था। लाली के खांसने की आवाज सुनकर सुगना का दिल तेजी से धड़कने लगा उसकी चूचियां और काम इंद्रियां सतर्क हो गई। आज पहली बार वह लाली के हाथों राजेश का वीर्य स्खलन देखने जा रही थी। देखने ही क्या उसे उस वीर्य को अपने गर्भ में आत्मसात भी करना था। सुगना का दिल और जिस्म एक दूसरे से सामंजस्य बैठा पाने में नाकाम थे। वह बदहवास सी अधूरे मन और गर्भधारण की आस लिए लाली के कमरे में प्रवेश कर गई…

अब आगे….

बिस्तर पर राजेश अर्धनग्न स्थिति में पड़ा हुआ था उसकी लूंगी कमर पर कसी अवश्य थी परंतु सामने से पूरी तरह खुली हुई थी।

राजेश का तना हुआ लण्ड लाली के खूबसूरत हाथों में आगे पीछे हो रहा था।

लाली ने अपनी उंगलियां होंठ पर रखते हुए सुगना को चुप रहने का इशारा किया और उन्हीं उंगलियों से उसे अपने पास भी बुला लिया।

कमरे में अब भी कुछ उजाला कायम था रेलवे कॉलोनी की खिड़कियों और दरवाजों को बंद करने के बावजूद सूरज की रोशनी को रोक पाना असंभव था।

सुगना बार-बार राजेश के चेहरे को देख रही थी जिस पर लाली ने अपना दुपट्टा डाल रखा था।

सुगना मन ही मन बेहद घबरा रही थी कहीं यदि राजेश जीजू के आंख पर से दुपट्टा हट गया तो?

सुगना सधे हुए कदमों से धीमे धीमे लाली के करीब आ गई। सुगना के सधे हुए कदमों ने पायल की छनक को भी रोक लिया। अपने अंतर्द्वंद से लड़ते हुए सुगना का मन मस्तिष्क थक चुका था और उसके कदम उसका अनुकरण कर रहे थे।

राजेश को यह अंदाजा भी ना हुआ की सुगना कमरे में आ चुकी है।

लाली ने अपनी हथेलियां राजेश के काले लण्ड पर फिराते हुए कहा…

"आज त कालू मल पूरा उछलत बाड़े…...सुगना खातिर का?" राजेश मुस्कुरा उठा

"धीरे बोल... सुगना बाहरे होइ"

"हमार बात मत टालीं ... ई इतना काहे फुदकता हमरा सब मालूम बा" लाली ने राजेश के लण्ड को दबा दिया और उसके सुपारे को अपने अंगूठे से सहला दिया।

राजेश ने लाली के प्रश्न का उत्तर न दिया अपितु लाली से पूछा…

"सुगना तोहार सहेली ह उकरे से काहे ना पूछ लूं कि छौ छौ महीना अकेले कैसे रहे ले? रतनवा सार पागल ह.. सुगना जैसन पुआ हमरा भेटाई रहित त…

"त..का…..का करतीं?" लाली ने राजेश के मुसल को मसल दिया

"आह..तनि धीरे से…..दुखाता….."

राजेश के मुख से निकले अंतिम वाक्यांश यूं ही नहीं निकले थे दरअसल सुगना की तारीफ सुनकर लाली थोड़ा नाराज हो गई थी उसने राजेश के लण्ड को कुछ ज्यादा ही तेजी से दबा दिया था और राजेश की उत्तेजना एक मीठी कराह में बदल गई थी।

लाली ने अपने हाथों का दबाव थोड़ा नरम किया और बोली..

"बताई बताई का करतीं...ओकरा पुआ के साथ?." लाली ने मुस्कुराते हुए सुगना को देखा

राजेश ने कुछ कहा नहीं पर अपने होठों को गोल कर अपनी जीभ को अपने होठों पर फिराने लगा...

राजेश की इस हरकत से सुगना की जांघों के बीच छुपे मालपुए पर एक अजीब सी संवेदना हुई और वह सिहर उठी। उसे लाली की बातें याद आ रही थी लाली सच कहती थी। राजेश जीजू उसके बारे में खुलकर गंदी बातें कर रहे थे।

सुगना असमंजस में थी। उसे लाली और राजेश के बीच उसे लेकर चल रही उत्तेजक बातों से ज्यादा सरोकार न था वह मन ही मन घबरा रही थी और लाली द्वारा राजेश के वीर्य स्खलन का इंतजार कर रही थी। उसने लाली को अपने हाथों की गति बढ़ाने का इशारा किया प्रत्युत्तर में लाली ने उसे ही अपने हाथ लगाने का आमंत्रण दे दिया सुगना ने झटपट अपने दोनों हाथ पीछे कर लिए और मुस्कुराने लगी.

सुगना राजेश के करीब हो या ना हो पर वह लाली से बेहद प्रेम करती थी वह उसकी प्रिय सहेली थी जिससे वह हर प्रकार की बातें साझा करती थी।

राजेश के अंडकोष में लावा उबलने लगा था लाली के हाथों की कुशलता और दिमाग में घूम रही सुगना ने लण्ड में करंट दौड़ा दी और राजेश का लण्ड झटके लेने लगा…

जैसे ही राजेश का स्खलन प्रारंभ हुआ सुगना थर थर कांपने लगी। लाली के वीर्य से सने हाथ को देखकर सुगना को एक अजीब सा एहसास हुआ उसे आज पहली बार उस श्वेत वीर्य से घृणा का एहसास हुआ यह क्यों हुआ यह तो सुनना ही जाने परंतु उसी समय सूरज के रोने की आवाज आई और सुगना उल्टे पैर हॉल वाले कमरे की तरफ दौड़ पड़ी। पुत्र मोह में वह यह भूल गई कि वह लाली के पास दबे पैर आई थी.

सुगना की छनकती पायल ने सारी कहानी बयां कर दी। राजेश ने लाली के वचन को तोड़ अपनी आंखों पर पड़ा दुपट्टा हटा लिया और दरवाजे से बाहर जाती हुई सुगना को देख लिया। वह अवाक रह गया उसने लाली से पूछा

"सुगना एहजे रहली का?"

लाली ने कुछ नहीं कहा। अपने दोनों हाथों में वीर्य लपेटे हुए अजीब सी स्थिति में आ चुकी ही। वह किस मुंह से यह बात बताती कि वह इन्हीं उंगलियों से सुगना की बुर में उसके वीर्य को प्रवेश करा कर सुगना को गर्भधारण करने में मदद करने वाली थी।

सारा खेल खराब हो चुका था।

( कुछ तो पाठको ने किया कुछ नियति ने किया)

सुगना के गर्भधारण की आस टूट चुकी थी अद्भुत निषेचन क्रिया होते होते रुक गई थी। लाली सोच रही थी कि जब राजेश के वीर्य से गर्भधारण में सुगना को आपत्ति नही है तो काश सुगना एक बार के लिए उसके पति की इच्छा भी पूरी कर देती……पर सुगना अपनी अपनी अद्भुत निषेचन क्रियाविधि से ही संतुष्ट थी पर आज यह अवसर भी जा चुका था।

कुछ ही देर बाद राजेश ने खाना खाया और वापस ड्यूटी के लिए निकल पड़ा।

सुगना सूरज को दूध पिलाते हुए लाली के वीर्य से सने हाथों की याद कर रही थी यदि सूरज न होता तो शायद लाली की वीर्य से सनी उंगलियां उसकी बुर में राजेश के वीर्य को पहुंचा चुकी होती…

सुगना को समझ ही नही आ रहा था कि वह खुश हो या दुखी…

थोड़ा आराम करने के पश्चात सुगना और लाली दोनों बनारस महोत्सव जाने के लिए तैयार होने लगी।

लाली के दोनों बच्चे पड़ोस में खेलने चले गए। लाली अपनी नयी साड़ी पहनकर झटपट तैयार हुई… तभी सुगना ने कहा...

"रुक जा हमु नहा ले तानी"

"काहे नहा तारे ते त असहीं चमकते रहेंले

अपनी तारीफ सुनकर सुगना मुस्कुरा उठी। वह खूबसूरत तो थी ही और मुस्कुराहट ने उसमे चार चांद लगा दिए।

सुगना ने अपनी साड़ी उतारी लाली की निगाहें उसके खूबसूरत जिस्म को निहार रहीं थीं जिसे सुगना ने ताड़ लिया और पलटते हुए बोली

" का देखा तारे.."

लाली शर्मा गई लाली सुगना की पतली कमर और भरे भरे नितंबों के बीच खो गई थी नितंबों के बीच छुपी सुगना की रानी की कल्पना जितना उसके पति राजेश ने की थी उतना लाली ने भी। उसने अपने मन और मस्तिष्क में अनायास ही उसकी छवि बिठा ली थी।

वह अपनी तुलना सुगना से कर रही थी भगवान ने दोनों एक जैसी काया दी थी परंतु सुगना के शरीर की चमक और कसाव उसे एक अलग ही पहचान देता था।

सुगना ने लाली की नाइटी ली और बाथरूम की तरफ जाने लगी। लाली ने भी आज बिल्कुल नई साड़ी पहनी थी वह बाहर जाते हुए बोली

"सूरज के भी ले ले जा तानी। पूजा में चढ़ावे खातिर कुछ सामान खरीद ले तानी। ते आराम से नहा ले"

"दरवाजा सटा दे" सुगना ने कहा और गुसल खाने में प्रवेश कर गई।

नियति सुगना को नग्न होते हुए देख रही थी सुगना ने अपने शरीर के सारे वस्त्र उतार दिए और अपनी जन्मजात अवस्था में आकर अपने खूबसूरत शरीर का अवलोकन करने लगी । एक बच्चे की मां बनने के बाद भीभी सुगना बिना अपने हांथों का प्रयोग किये अपनी आंखों से अपनी बुर की दरार देख पाती थी उसने अपने पेट पर उभार आने नहीं दिया था और चुचियों का कसाव भी बरकरार रखा था।

सुगना के चमकते हुए शरीर को देखकर नियति भी स्वयं अपनी कृति पर प्रफुल्लित हो रही थी यदि उसके बस में होता तो वह स्वयं ही उससे संभोग कर उसकी मनोकामना पूर्ण कर देती।

सुगना के तन मन में एक अजब सी आग थी अपने बाबुजी सरयू सिह से संभोग किये उसे कई महीने बीत चुके थे। जब भी उसका मन खुशहाल होता उसकी जांघों के बीच छुपी हुई बुर मुस्कुराने लगती। पिछले दो-तीन दिनों से उसे हर घड़ी अपने बाबूजी की याद आ रही थी। विद्यानंद से मिलने के पश्चात एक-एक दिन उसने सरयू सिंह को याद करते हुए गुजारे थे। परंतु किसी न किसी कारण उसे उनका संसर्ग नहीं मिल पा रहा था।

हर समय उसका अंतरमन ऊपर वाले से एक ही प्रार्थना करता काश उसके बाबु जी उसे अपनी गोद में उठाते और उसकी नग्न पीठ पर अपनी खुरदरी हथेलियां फिराते हुए उसे अपने आलिंगन में लेते। गालों से गाल सटाते होठों से होठ चूमते और ……..आह ….

सुगना की उंगलियों ने उसके मनोभावों को पढ़ लिया वह अपनी निगोड़ी बुर को समझाने के लिए उसे थपथपाने लगी। परंतु प्यासी बुर सुगना के झांसे में आने को तैयार न थी उसने अपना मुंह खोल दिया और सुगना की उंगलिया उसकी कोमल गहराइयों में उतर गयीं। सुगना की बुर ने न जाने उंगलियों पर ऐसा कौन सा निर्वात बल कायम किया हुआ था, सुनना चाह कर भी अपनी उंगलियां बाहर न निकाल पायीं। उसकी उंगलियां अंदर थिरकती रहीं और सुगना के निप्पल तनते चले गए।

अपने ही हाथों अपनी चुचियों को सांत्वना देने के लिए सुगना ने उन्हें सहलाना चाहा और अनचाहे में ही अपनी उत्तेजना को अंजाम तक पहुंचा दिया। सुगना के दिलों दिमाग पर सरयू सिंह के साथ बिताए गए अंतरंग पल छाते चले गए...

काश बाबूजी अपने मजबूत मुसल से उसकी जांघों के बीच चटनी कूटते….मुसल का कार्य उंगलिया न कर सकीं पर …

सुगना की बुर ने अपना रस छोड़ना शुरू कर दिया। सुगना ऐंठती रही उसकी जाँघे तन गयी.. उसकी मांसल बुर ने अंदर रिस रहे सारे प्रेम रस को बुर् के होठों पर लाकर छोड़ दिया जो सुगना द्वारा लोटे से डाले जा रहे शीतल जल के साथ विलीन हो गया।

सुगना ने अपना स्नान पूरा किया और लाली की नाइटी पहन कर लाली के कमरे में आ गई अपने बाल सुखाते हैं सुखना दरवाजे की तरफ पीठ करके खड़ी थी ..

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उधर सोनू सोनी को पांडाल में छोड़ने के बाद कुछ देर अपने दोस्तों के साथ रहा परंतु उसका मन कहीं न लग रहा था। सुबह लाली को जी भर कर चोदने के पश्चात उसका मन नहीं भरा था। जाने यह कैसी आग थी जितना सोनू लाली के करीब आ रहा था उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी। आज लाली के घर में सुगना भी उपस्थित थी इसलिए सोनू जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

परंतु चतुर सोनू चूत के चस्कर में चकोर की भांति, चित्त में लाली की छवि बसाये, चूत के आकर्षण में बंधा लाली की कालोनी में आ गया।

लाली के घर से कुछ ही दूर उसे नई साड़ी में लिपटी सुगना के कंधे पर से झांकता हुआ सूरज का चेहरा उसे दिखाई पड़ गया। उसे लगा जैसे सुगना दीदी सूरज को लेकर कुछ सामान खरीद रही है। सोनू तेजी से भागता हुआ लाली के घर पहुंच गया और सटे हुए दरवाजे को धीरे से खोलते हुए अंदर आ गया।

घर में एकांत पाकर सोनू ने मन ही मन ऊपर वाले से अपनी अनुनय विनय कर डाली और ऊपर वाले ने भी उसकी इच्छा पूरी कर दी। उसके मनो मस्तिष्क में चल रही लाली को उसने अंदर अपने बाल सुखाते देख लिया। नाइटी में लाली न होकर सोनू की सुगना दीदी थी पर सोनू इस बात से अनजान था। नाइटी के झीने आवरण में ढकी गदराई जवानी उसे ललचाने लगी। सोंग का लण्ड स्प्रिंग की तरह तुरंत ही खड़ा हो गया वह सधे हुए कदमों से उस कामनीय शरीर के पीछे गया और उसे पीछे से अपने आलिंगन में ले लिया।

सुगना के पेट पर अपने हाथों से पकड़ बनाते हुए उसने सुगना को लगभग ऊपर उठा दिया। सुगना के पैर हवा में आ गए। सोनू के लण्ड ने सुगना के नितंबों के बीच में जगह बनाने की कोशिश की और सोनू के मजबूत लिंग ने अपनी उपस्थिति का एहसास सुगना को करा दिया।

सुगना ने पीछे पलट कर देखा...

सोनू सकपका गया।

"हम जननी हा की लाली ….."

सोनू जो कहना चाहता उसे कह पाना भी उतना ही कठिन था वह अपने वाक्य को पूरा न कर सका।

उसने सुगना को तुरंत ही नीचे छोड़ दिया और बिना कुछ कहे उलटे पैर कमरे से बाहर निकल गया।

कुछ देर के आलिंगन ने भाई बहन की बीच के पवित्र रिश्ते में एक ऐसा एहसास डाल दिया था जो दोनों के लिए बिल्कुल ही नया था।

सोनू थरथर कांप रहा था वह सबकी नजर बचाकर भाग जाना चाह रहा था परंतु ऐसा हो ना सका दुकान से आ रही लाली ने उसे देख लिया और बोला...

"कहां जा रहे हो ? दरवाजा तो खुला ही था अंदर सुगना है ना..

"मुझे कुछ काम है मैं थोड़ी देर बाद आता हूं…"

"जा पहले रिक्शा लेकर आ हम लोग बनारस महोत्सव जाएंगे.."

सोनू फंस चुका था वह रिक्शा लेने के लिए सड़क की तरफ बढ़ गया। उसके हाथ अभी भी उस अद्भुत स्पर्श.. को याद कर रहे थे। ऐसा नही था कि सुगना को सोनू ने छुआ न था पर वह आलिंगन अलग था वासना से ओतप्रोत...सोनू की बाहों पर अपना भार छोड़ती चुचियों का कोमल स्पर्श सोनू को अपने दिमाग मे चल रहे के कामुक द्वंद में और कमजोर कर रहा था।

सुगना के शरीर की कोमलता उसके लिए बेहद नई थी। इतनी उत्तेजना उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। लाली और सुगना के शरीर के अंतर को सोनू ने कुछ ही पलों में पहचान लिया था।

यह अंतर बिल्ली और खरगोश के बच्चे की तरह था दोनों ही कोमल और मुलायम थे पर अंतर अपनी जगह था।

उधर सुगना भी सिहर उठी थी।। कुछ ही पलों के आलिंगन में उसे सोनू के पूर्ण वयस्क होने का एहसास करा दिया था। अपने नितंबों में उसके खड़े लिंग की चुभन को उसने बखूबी महसूस किया था और मजबूत आलिंगन के कसाब को भी।

उसका भाई अब उतना छोटा न था जितना अब वो उसे समझती थी। जिस तरह बचपन मे वह उसे झूला झुलाया करती थी आज ठीक उसी तरह सोनु ने उसे कुछ पलों के लिए ही सही पर वही झूला झूला दिया था। पर भाव मे अंतर स्पस्ट था। प्रेम प्रेम में अंतर था।

सुगना और सोनू का प्यार वात्सल्य रस से अचानक श्रृंगार रस की तरफ मुड़ता प्रतीत हो रहा था।

इस आलिंगन ने सुगना के मन में सोनू के प्रति भाव बदल दिए। सोनू से नजरें मिलाने में खुद को नाकाम पा रही थी।

कुछ ही देर में लाली और सुगना सोनू द्वारा लाए रिक्शे में बैठकर बनारस महोत्सव के लिए चल पड़ीं। पीछे एक और रिक्शे में सोनू अपनी लाली दीदी के दोनों बच्चों को लेकर एक सेवक की भांति पीछे पीछे चलने लगा। रिक्से में बैठी हुई दोनों स्त्रियों की पीठ देखकर सोनू आज पहली बार इन दोनों की तुलना कर रहा था।

आज सोनू की निगाहे अपनी सगी बहन में कामुकता खोज रही थी। वह जितना ही ध्यान सुगना की पीठ पर से हटा कर लाली पर ले जाता परंतु उसका अवचेतन मन सुगना की पीठ पर ही निगाहों को घसीट लाता।

सुगना जब-जब सोनू के बारे में सोचती उसका दिल धक धक करने लगा। वह बार बार अपने कपड़ों को व्यवस्थित कर अपनी नंगी पीठ को ढकने का प्रयास करती। सोनू के सामने बिंदास और निर्विकार भाव से घूमने वाली अब सचेत हो गयी थी।

पंडाल में उतरने के बाद वह सीधा महिलाओं वाले भाग में चली गई। उसने सोनू की तरफ पलट कर नहीं देखा वह देखती भी कैसे? अभी भी उसके स्पर्श का वह एहसास उसके दिलो-दिमाग पर छाया हुआ था।

बनारस महोत्सव का पांचवा दिन भी बीत रहा था। संध्या वंदन के उपरांत सुगना ने अपने इष्ट देव के समक्ष अपना निर्णय सुना दिया…

जब तक उसके बाबूजी सरयू सिंह उसे अपने हांथो से पानी नही पिलायेंगे वह पानी नही पीयेगी। सुगना जो बात अपने इष्ट से कहना चाहती थी उसने अपने तरीके से वह बात उन पहुंचा दी थी। सुगना ने मन ही मन सोच लिया था कि वह सरयू सिह के आते ही तुरंत ही उनकी गोद मे आ जाएगी..

के सुगना चल खाना खा ले…

"ना मां हमारा भूख नइखे"

सुगना को जिस चीज की भूख थी वह सर्वविदित था।

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उधर सुबह सुबह सरयू सिंह सलेमपुर की तरफ बढ़ रहे थे.. आज वह किसी भी हाल में सुगना को छोड़कर सलेमपुर नहीं जाना चाह रहे थे परंतु उनका कर्तव्य और मनोरमा का निर्देश उनकी निजी आकांक्षाओं पर भारी पड़ रहा था। सलेमपुर पर आई इस प्राकृतिक विपदा से अपने गांव वालों को निकालना और उन्हें राहत पहुंचाना सरयू सिंह ने ज्यादा जरूरी समझा और अपने मन का मलाल त्याग कर अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए निकल पड़े। काश कि वह सुगना की मनोदशा और उसके अंतर्द्वंद को जान पाते तो वह अपनी नौकरी को ताक पर रखकर सुगना के साथ खड़े रहते बल्कि उसे तब तक लगातार संभोग करते जब तक कि वह गर्भवती ना हो जाती।

उन्होंने निकलते वक्त सुगना के साथ रंगरेलियां मनाने के लिए निर्धारित होटल मैं जाकर अपने ना आने की सूचना दे दी और काफी जद्दोजहद करने के पश्चात अपनी गाढ़ी कमाई का कुछ पैसा वापस ले आए।

सलेमपुर पहुंच कर उन्होंने गांव वालों को यथोचित मदद पहुंचायी और साथ आए पुलिसवालों के साथ मिलकर उग्र गांव वालों को शांत करने में मदद की। इस दुरूह कार्य को करते करते रात गहरा गई।

सरयु सिंह का कार्य अभी अधूरा था सलेमपुर में भी और सुगना द्वारा किये वादे का सुख लेने का भी... परंतु बनारस महोत्सव का पांचवा दिन बीत चुका था।

सरयू सिंह सुगना के लिए अधीर हो रहे थे परंतु नियति भी सुगना के हाँथ की लकीरों के आगे मजबूर थी।

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विद्यानंद के पंडाल में रात गहरा रही थी। पंडाल में सारी महिलाएं सो चुकी थी सिर्फ सुगना की आंखों से नींद गायब थी भूखी प्यासी सुगना अपने इष्ट देव से अपने बाबू जी के आगमन के लिए प्रार्थना कर रही थी अपने मन में इतना झंझावात लिए सुगना सो गई.. और एक निराली दुनिया मे पहूँच गयी।

पंडाल में जमीन पर चटाई बिछी हुई थी। पंगत में कई सारे लोग बैठे हुए थे। महिलाएं पुरुषों को खाना परोस रही थी। सुगना को भी खाना परोसने के लिए बुलाया गया। सुगना अपने हाथ में मीठा मालपुआ लिए पंगत की तरफ बढ़ चली।

अचानक सुगना को अपनी साड़ी की सरकती हुई महसूस हुई। यह क्या... उसकी साड़ी अचानक ही शरीर से गायब हो चुकी थी थी. ब्लाउज और पेटीकोट सुगना के शरीर को मर्यादित आवरण देने में पूरी तरह नाकाम थे।

सामने बैठे पुरुष उसे एकटक घूरे जा रहे थे तभी पीछे से कजरी की आवाज आई

"सुगना बेटा.. सब के मालपुआ खिया द"

कजरी के मुख से मालपुआ शब्द सुनकर सुगना ने एक पल के लिए शर्म से पानी पानी हो गई और अगले ही पल अपनी शर्म को ताक पर रखकर सामने बैठे व्यक्तियों को पहचानने की कोशिश करने लगी..

जैसे जैसे उसकी आंखें पुरुषों को पहचानने की कोशिश करती गई उसकी आंखें आश्चर्य से फटती चली गयीं।

पंगत में सबसे पहले रतन था उसके पश्चात राजेश और सोनू था। सबसे आखरी में सुगना के प्यारे बाबू जी पालथी मारे बैठे हुए थे और उनकी गोद में छोटा सूरज बैठा हुआ था।

सुगना अपनी अर्धनग्न अवस्था में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी। तभी कजरी की आवाज एक बार फिर आयी..

"सुगना बेटा सब आपने ही परिवार के ह मालपुआ दे द"

सुगना आगे झुकी और रतन के पत्तल में मालपुआ रख दिया उसकी चूचियां बरबस ही रतन की निगाहों के सामने आ गयीं। सुगना के दोनों हाथ व्यस्त थे वह चाह कर भी अपनी चुचियों पर अपने हाथों का आवरण न दे पायी। सुगना थरथर कांप रही थी। उसकी चूचियां ब्लाउज से बाहर आकर रतन को ललचा रही थीं।

अगली बारी राजेश की थी। पत्तल में मालपुआ डालते समय सुगना कि दोनों चूचियां उछल कर बाहर आ गई…

सुगना ने जैसे ही मालपुआ सोनू की थाली में डाला पेटीकोट जैसे गायब हो गया। अपने छोटे भाई के सामने खुद को नग्न पाकर सुगना के पैर कांपने लगे सुगना बेसुध होकर गिर पड़ी उसने खुद को सरयू सिह की गोद में पाया..

सरयू सिंह की एक जंघा पर पूर्ण नग्न सुगना थी दूसरे पर सूरज था…

अपने ही अबोध बालक के सामने सुगना पूर्ण नग्न अवस्था में बैठी हुई थी। उसकी मालपुआ की थाली न जाने कहां गायब हो गयी थी..

सुगना के मन में अभी भी कजरी की बात घूम रही थी सुगना मालपुआ खोजने लगी तभी उसे सरयु सिंह की कड़कती आवाज सुनाई पड़ी

"सुगना बाबू का खोजा तारू?"

"मालपुआ"

"ई त बा"

सरयू सिंह की हथेलियां सुगना की जांघो के बीच आ चुकी थीं।

छोटा सूरज अपनी माँ को इस नए रूप में देख कर आश्चर्य चकित था ..सुगना की आंख सूरज से मिलते ही सुगणा की नींद खुल गयी...


शेष अगले भाग में...
Aapki lekhni alaukik hai. Jo is update ka ant hai phir hame chaurahe pe chhod gaya hai. Ati uttam
 
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sunoanuj

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Bahut. Hee jabardast update… niyati khel niyati jaane …
 

Lovely Anand

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बहुत बढिया अपडेट मिळ गया writer जी वेटिंग फॉर नेक्स्ट अपडेट

Nice update

Aapki lekhni alaukik hai. Jo is update ka ant hai phir hame chaurahe pe chhod gaya hai. Ati uttam

Bahut. Hee jabardast update… niyati khel niyati jaane …
आप सभी को धन्यवाद।

कहानी का अगला अपडेट तैयार हो चुका है पाठकों की प्रतिक्रिया का इंतजार जारी है...

आपकी प्रतिक्रियाओं से मेरा मन भर जाने के पश्चात अगला अपडेट पोस्ट कर दिया जाएगा परंतु आपको पता ही है मैं अपने पारिश्रमिक के रूप में आपकी प्रतिक्रियाओं का बेहद भूखा हूं ..

भूखे भजन न होय गोपाला यह लो अपनी कंठी माला

मुस्कुराते रहे और अपनी उत्तेजना को कायम रखे...

इंतजार में
 

Lucky..

“ɪ ᴋɴᴏᴡ ᴡʜᴏ ɪ ᴀᴍ, ᴀɴᴅ ɪ ᴀᴍ ᴅᴀᴍɴ ᴘʀᴏᴜᴅ ᴏꜰ ɪᴛ.”
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AWESOME FANTASTIC MINDBLOWING AND SANDAAR UPDATE
 

Lutgaya

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:rock: कुछ तो पाठको ने किया कुछ नियति ने किया
पाठकों को इसी बहाने कहानी में किरदार निभाने का मौका तो मिला,
सरयूसिंह को मनोरमा से पुर्नमिलन करवा कर ही वापस लायें तो मजा आ जाये और सोनू तो तैयार हो ही चुका है अपनी दीदी सुगना के साथ मल्ल युद्ध के लिए।
धन्यवाद लवली भाई
 
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