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एक बाप कि बसीयत
गरीब था बाप तेरा बेटा, तेरी बसीयत लिख रहा हूँ,
मज़बूरियाँ हर एक तेरे बाप कि बसीयत में लिख हूँ !!
ज़िन्दगी भर जो कमाई दोलत अपनी,
तमाम शौहरत तेरे नाम लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप जर-ज़मीन तो नहीं,
मज़बूरियाँ हर एक अपनी लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
जागती देखी जो सोयी तक़दीर अपनी ,
खुली आँखों का वो हर एक ख्वाब लिख रहा हूँ !!
तेरे नन्हे नन्हे हाथों से मिटता हुआ,
गरीबी का अपना वो अँधेरा लिख रहा हूँ !!
हर एक क़तरा ज़िगर-ए-लहू को,
तेरी माँ के दूध के हिसाब में लिख रहा हूँ !!
काट कर पेट अपना तेरी बुख मिटाई,
तेरी माँ के हाथ का वो हर एक निवाला लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
मेलों में वो जिद,खिलोनो में जो जान तेरी,
खुद कि नीलामी कि हर एक तारीख वो लिख रहा हूँ !!
तू भूल गया बेटा...... मगर,
तेरी हर एक छोटी छोटी उन खुशियों का मैं हिसाब लिख रहा हूँ !!
गरीब का बेटा था,और गरीब बाप तेरा,
मज़बूरियों को अपनी हर एक लिख रहा हूँ !!
तुझ पर उठाते हाथो से मेरे दिल पर जो चली छुरियाँ,
अपने दिल के हर एक ज़ख़्म को आज मैं लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
जवानी तेरी बनाते बनाते बिगड़ गया बुढ़ापा भी मेरा,
मेरी खोई जवानी के हर एक दिन लिख रहा हूँ !!
वक़्त कि करवटों पर ज़िन्दगी कि रातों से,
हाथ में आया मेरी जो अन्धेरा वो लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
गरीब का बेटा था, और गरीब ही रहा बाप तेरा,
मुझको मिली बसीयत अब तेरे नाम लिख रहा हूँ !!
क़ज़ा पर हूँ,और चंद आखरी मेरी दो साँसे,
दो गज़ कफ़न का अब तुझ पर बेटा मैं उधार लिख रहा हूँ !!
अदा दो मुठी मिटी कब्र पर मेरी कर देना,
अपनी आखरी ख्वाईश में एक ख्वाईश लिख रहा हूँ !!
ज़िन्दगी ये मेरी एक कम पड़ी तेरी खुशियों पर,
तेरा मुझ पर अब ये क़र्ज़ लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
घर में अब सबसे बड़ा है बेटा तू,
दर्ज़ा तुझको अब मैं बाप का लिख रहा हूँ !!
तेरी वशियत लिख रहा हूँ,
हिदायते एक बाप पर आज लिख रहा हूँ !!
कलम से "पुरव" कि उतरा लहू-दर्दे-ज़िगर एक बाप का,
बेटों का कल अब मैं आज में लिख रहा हूँ !!
मज़बूरियाँ लिख रहा हूँ,महोब्बत को लिख रहा हूँ,
बिगड़ते बुढ़ापे पर मिटते जवानी के दिन,
एक बाप कि बसीयत में लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी वशियत लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा, तेरी बसीयत लिख रहा हूँ,
मज़बूरियाँ हर एक तेरे बाप कि बसीयत में लिख हूँ !!
इस ग़ज़ल में गरीब का मतलब बाप के उस प्यार से है जो वो अपने बेटे को देना चाहता है,एक बाप हर हाल में अपने बेटे कि खुशियों के आगे गरीब ही होता है वो चाहता है कि वो अपने बेटे कि हथिलियों में पूरी कायनात ज़न्नत को सीमेट कर रख दे हर ख़ुशी दे
मज़बूरियाँ हर एक तेरे बाप कि बसीयत में लिख हूँ !!
ज़िन्दगी भर जो कमाई दोलत अपनी,
तमाम शौहरत तेरे नाम लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप जर-ज़मीन तो नहीं,
मज़बूरियाँ हर एक अपनी लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
जागती देखी जो सोयी तक़दीर अपनी ,
खुली आँखों का वो हर एक ख्वाब लिख रहा हूँ !!
तेरे नन्हे नन्हे हाथों से मिटता हुआ,
गरीबी का अपना वो अँधेरा लिख रहा हूँ !!
हर एक क़तरा ज़िगर-ए-लहू को,
तेरी माँ के दूध के हिसाब में लिख रहा हूँ !!
काट कर पेट अपना तेरी बुख मिटाई,
तेरी माँ के हाथ का वो हर एक निवाला लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
मेलों में वो जिद,खिलोनो में जो जान तेरी,
खुद कि नीलामी कि हर एक तारीख वो लिख रहा हूँ !!
तू भूल गया बेटा...... मगर,
तेरी हर एक छोटी छोटी उन खुशियों का मैं हिसाब लिख रहा हूँ !!
गरीब का बेटा था,और गरीब बाप तेरा,
मज़बूरियों को अपनी हर एक लिख रहा हूँ !!
तुझ पर उठाते हाथो से मेरे दिल पर जो चली छुरियाँ,
अपने दिल के हर एक ज़ख़्म को आज मैं लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
जवानी तेरी बनाते बनाते बिगड़ गया बुढ़ापा भी मेरा,
मेरी खोई जवानी के हर एक दिन लिख रहा हूँ !!
वक़्त कि करवटों पर ज़िन्दगी कि रातों से,
हाथ में आया मेरी जो अन्धेरा वो लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
गरीब का बेटा था, और गरीब ही रहा बाप तेरा,
मुझको मिली बसीयत अब तेरे नाम लिख रहा हूँ !!
क़ज़ा पर हूँ,और चंद आखरी मेरी दो साँसे,
दो गज़ कफ़न का अब तुझ पर बेटा मैं उधार लिख रहा हूँ !!
अदा दो मुठी मिटी कब्र पर मेरी कर देना,
अपनी आखरी ख्वाईश में एक ख्वाईश लिख रहा हूँ !!
ज़िन्दगी ये मेरी एक कम पड़ी तेरी खुशियों पर,
तेरा मुझ पर अब ये क़र्ज़ लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी बसीयत लिख रहा हूँ !!
घर में अब सबसे बड़ा है बेटा तू,
दर्ज़ा तुझको अब मैं बाप का लिख रहा हूँ !!
तेरी वशियत लिख रहा हूँ,
हिदायते एक बाप पर आज लिख रहा हूँ !!
कलम से "पुरव" कि उतरा लहू-दर्दे-ज़िगर एक बाप का,
बेटों का कल अब मैं आज में लिख रहा हूँ !!
मज़बूरियाँ लिख रहा हूँ,महोब्बत को लिख रहा हूँ,
बिगड़ते बुढ़ापे पर मिटते जवानी के दिन,
एक बाप कि बसीयत में लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा,तेरी वशियत लिख रहा हूँ !!
गरीब था बाप तेरा बेटा, तेरी बसीयत लिख रहा हूँ,
मज़बूरियाँ हर एक तेरे बाप कि बसीयत में लिख हूँ !!
इस ग़ज़ल में गरीब का मतलब बाप के उस प्यार से है जो वो अपने बेटे को देना चाहता है,एक बाप हर हाल में अपने बेटे कि खुशियों के आगे गरीब ही होता है वो चाहता है कि वो अपने बेटे कि हथिलियों में पूरी कायनात ज़न्नत को सीमेट कर रख दे हर ख़ुशी दे
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