सरेंडर करने का आखिरी दिन
सुबह हुई। सुबह 5 बजे अलार्म की आवाज से शुभांगी की नींद खुली। वह बिस्तर से उठी और अपने कपड़े पहनकर खिड़की के पास चली गई। खिड़की के बाहर से आती पक्षियों की मधुर आवाज उसके मन को प्रफुल्लित कर रही थी। कुछ पल के लिए वह भूल चुकी थी कि उसे आज जेल में सरेंडर करना हैं। वह तो बस प्रकृति के मधुर संगीत और उसकी सुंदरता में खो जाना चाहती थी।
“शुभांगी….”
“शुभांगी….”
मनीष ने उसे दो बार आवाज लगाई।
‘हाँ, तुमने कुछ कहा?’ - शुभांगी का एकदम से ध्यान टूटा।
मनीष - “कहाँ खोई हुई हो?”
शुभांगी - ‘कही नही। बस यूँ ही।’
मनीष - “जल्दी से जाकर नहा लो। टाइम हो रहा हैं।”
शुभांगी - ‘हाँ, बस जा रही।’
मनीष के कहते ही शुभांगी नहाने के लिए चली गई। इधर घर के सब लोग भी तैयार होने लगे। वे लोग शुभांगी और मनीष को एयरपोर्ट तक छोड़ने जाने वाले थे। उनकी फ्लाइट सुबह 10 बजे की थी लेकिन उन्हें लगभग दो घंटे पहले ही एयरपोर्ट पहुँचना था। सभी के तैयार होने के बाद उन लोगो ने ब्रेकफास्ट किया और सुबह 7 बजे एयरपोर्ट के लिए निकल पड़े। रास्ते भर सभी लोग बिल्कुल चुपचाप बैठे रहे। उनके चेहरों पर उदासी की झलक साफ दिखाई दे रही थी। लगभग आधे घंटे का सफर तय करके उनकी गाड़ी रायपुर एयरपोर्ट पहुँची। एयरपोर्ट पर पहुँचते ही मनीष ने गाड़ी से अपना सामान निकाला और शुभांगी बच्चो से बाते करने लगी।
“पलक, भाई का ध्यान रखना बेटा और अच्छे से exam देना।” - शुभांगी ने पलक से कहा।
‘मम्मा, आप जल्दी से घर आ जाओ। मुझे अच्छा नही लगेगा आपके बिना।’ - पलक ने कहा।
“बस 1-2 दिन की तो बात हैं बेटा। फिर सब ठीक हो जाएगा। शिवांश, बेटा दीदी को परेशान नही करना।”
इतना कहकर उसने अपने दोनों बच्चो को गले से लगा लिया। उसे रोना तो बहुत आ रहा था लेकिन उसने अपने आप को कंट्रोल किया। शुभांगी अपने माँ-बाप और भाई-भाभी से भी मिली और फिर उन्हें बाय कहकर मनीष के साथ एयरपोर्ट के अंदर चली गई। वह अंदर जाते हुए लगातार अपने परिवार को देखती रही। फ्लाइट में बैठने से पहले उनकी पूरी सुरक्षा जाँच की गई जिसमें काफी समय लग गया। सुबह 10 बजे उनकी फ्लाइट रायपुर से दिल्ली के लिए रवाना हुई और लगभग 11:45 बजे वे लोग दिल्ली पहुँच गए। उन्होंने एयरपोर्ट से ही एक टैक्सी ली और जेल के लिए निकल पड़े। एयरपोर्ट से जेल की दूरी बहुत ज्यादा नही थी और केवल 15 मिनट बाद ही उनकी टैक्सी जेल के मेन गेट के सामने खड़ी थी।
महिला कारागार, दिल्ली
अपनी आँखों के सामने जेल को देखकर शुभांगी की धड़कने एकदम से तेज होने लगी और वह परेशान हो उठी। उसका दिल अंदर जाने के लिए बिल्कुल राजी नही था लेकिन उसने अपनी भावनाओं को काबू में रखा। उन्होंने देखा कि जेल के मेन गेट के ऊपर एक साइन बोर्ड लगा हुआ था जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में केंद्रीय कारागार दिल्ली लिखा हुआ था। गेट पर दो बंदूकधारी मेल गार्ड तैनात थे। मनीष ने उन्हें कोर्ट का आर्डर दिखाया और इस बात से अवगत कराया कि शुभांगी जेल में सरेंडर करने के लिए आई हैं। उन गार्डो ने आर्डर की कॉपी देखकर तुरंत ही अंदर सूचित किया जिसके बाद अंदर से एक महिला सिपाही बाहर आई और गेट पर आकर पूछने लगी - “सरेंडर करने कौन आई हैं?”
‘जी मैं हूँ…’ - शुभांगी ने जवाब दिया।
“चल अंदर आ…” - उसने बड़ी ही बदतमीजी से कहा।
शुभांगी को उसका बात करने का तरीका बड़ा ही बेकार लगा लेकिन मनीष ने उसे चुप रहने का इशारा कर दिया। वे दोनों उस लेडी काँस्टेबल के पीछे-पीछे अंदर चल दिए। मनीष के हाथ मे शुभांगी के सामान का बैग था और ऐसा लग रहा था जैसे वह उसे जेल में नही बल्कि हॉस्टल में छोड़ने आया हो।
मेन गेट से अंदर जाने पर सबसे पहले एक बड़ा सा मैदान था जहाँ कुछ गाड़ियाँ खड़ी थी। इसके बाद एक और बड़ा सा लोहे का गेट लगा हुआ था जिससे अंदर जाने पर एक तरफ पुरुष कारागार तथा दूसरी तरफ महिला कारागार था। शुभांगी को लेने आई काँस्टेबल उसे और मनीष को महिला कारागार वाले गेट से अंदर लेकर गई। उन दोनों के लिए जेल का माहौल बहुत ही घुटन भरा था। हर तरफ ऊँची-ऊँची दीवारे थी, लोहे के बड़े-बड़े गेट थे और कैदियों की निगरानी में तैनात बन्दूकधारी पुलिसकर्मी। महिला कारागार के अंदर आते ही उन्हें कोई भी पुरुष पुलिसकर्मी नजर नही आ रहा था। वहाँ केवल महिला पुलिसकर्मी ही मौजूद थी। अंदर जाने के बाद वह काँस्टेबल उन्हें सीधे जेलर के ऑफिस में लेकर गई। हालाँकि उस वक़्त जेलर अपने पारिवारिक कार्य के लिए कुछ दिनों की छुट्टी पर थी इसलिए डिप्टी जेलर प्रतिभा ने शुभांगी की सरेंडर प्रक्रिया पूरी की।
ऑफिस में जाने के बाद मनीष ने उसे कोर्ट के ऑर्डर की कॉपी दिखाई और उसे शुभांगी के केस के बारे में सारी बाते बताने लगा। वह शुभांगी के लिए बेहद चिंतित था। उसने प्रतिभा से विनती की कि शुभांगी को जेल में ज्यादा परेशानी ना हो।
“मैडम, बस आपसे एक छोटी सी रिक्वेस्ट हैं।” - उसने कहा।
‘हाँ, बोलिये।’
“देखिए, हम लोग सीधे-सादे शरीफ लोग हैं और ये भी (शुभांगी को ओर देखते हुए) कभी ऐसे माहौल में रही नही हैं। बस दो-तीन दिनों की बात हैं मैडम। फिर मैं इन्हें यहाँ से ले जाऊँगा लेकिन तब तक इन्हें यहाँ कोई परेशानी तो नही होगी ना?” - मनीष ने उससे पूछा।
‘No no. Don't worry. बिल्कुल परेशानी नही होगी। आप चिंता मत कीजिये।’ - प्रतिभा ने जवाब दिया।
“Thank you so much madam.” - मनीष ने कहा।
वह मुस्कुराई और उसे बेफिक्र होकर घर जाने को कहा। उसका व्यवहार देखकर मनीष को थोड़ी राहत महसूस हुई और वह कुछ हद तक शुभांगी के लिए थोड़ा निश्चिन्त हुआ। उसने सारी फॉर्मेलिटीस पूरी की और वहाँ से जाने लगा। जाने से पहले उसने शुभांगी को गले लगाया और उसे हिम्मत देते हुए अपना ख्याल रखने को कहा। शुभांगी का दिल वहाँ पर रुकने के लिए बिल्कुल नही मान रह था लेकिन वह कुछ बोल नही पाई। मनीष भी नियमो की वजह से मजबूर था और उसे शुभांगी को अकेले छोड़कर जाना पड़ा।
मनीष जा चुका था लेकिन शुभांगी का मन इस बात पर यकीन ही नही कर पा रहा था कि अब वह बिल्कुल अकेली हैं और जेल के अंदर एक कैदी के तौर पर खड़ी हैं। मनीष के जाते ही वह पूरी तरह से जेल के अधीन हो गई। वह कुछ देर तक दरवाजे के बाहर ताकती रही और फिर जेलर से बोली -
“मैडम, क्या मैं थोड़ी देर के लिए बाहर जा सकती हूँ? बस अपने हसबैंड से मिलके वापस आ जाऊँगी।”
‘अपने बाप की शादी में आई हैं क्या साली…’
प्रतिभा का रवैया एकदम से बदल गया। उसकी आवाज में सख्ती थी और उसने एकाएक जिस गंदे तरीके से शुभांगी से बात की, वह बिल्कुल हैरान रह गई। अब तक उसे सब कुछ सामान्य लग रहा था लेकिन अब उसकी जिंदगी पूरी तरह करवट लेने वाली थी।
“मैडम ये कैसी भाषा मे बात कर रही हैं आप?” - शुभांगी ने गुस्से से कहा।
‘साली रंडी, तेरी इतनी हिम्मत कि मेरे से ऊँची आवाज में बात करेगी। ये जेल हैं। तेरे बाप का घर नही है जो इतनी जुबान चल रही है तेरी।’
शुभांगी अब थोड़ी शांत हुई और सभ्यतापूर्वक प्रतिभा से बोली - “देखिए मैडम, आप गलत समझ रही हैं। मैं कोई क्रिमिनल नही हूँ। कोई ना कोई गलती की वजह से मेरा नाम इस केस में आ गया है। मेरे हसबैंड कोर्ट में अपील करने वाले हैं। फिर सब क्लीयर हो जायेगा।’
जेलर - ‘तू क्रिमिनल हैं या नही, इससे मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता। यहाँ आने वाली सब मेरी नजर में क्रिमिनल ही हैं। उस गेट के अंदर जितनी भी औरते है ना, वो सब हमारे लिए इंसान नही हैं। सिर्फ भेड़-बकरियाँ हैं। और अब तू भी उनमे से एक हैं। समझी।’
इसके बाद उसने शुभांगी की कोई भी बात नही सुनी और वहाँ मौजूद काँस्टेबल से उसे चेकिंग रूम में ले जाने को कहा। जेलर के कहते ही काँस्टेबल ने उसका एक हाथ पकड़ा और उसे खींचकर चेकिंग रूम में लेकर गई। प्रतिभा भी उनके साथ चेकिंग रूम में आ गई।
“नाम बोल?” - पहली टेबल पर बैठी महिला सिपाही ने कहा।
‘शुभांगी गुप्ता..’ - शुभांगी ने जवाब दिया।
“पति का नाम?”
‘मनीष गुप्ता…’
“उमर कितनी हैं?”
‘जी, 44 साल…’
“कौन से क्राइम में आई हैं अंदर?”
‘मम्म मर्डर…’ - शुभांगी ने हिचकिचाते हुए जवाब दिया।
“मुँह में दही जमाके रखी हैं क्या? जोर से बोल..” - उस महिला सिपाही ने उस पर चिल्लाते हुए कहा।
शुभांगी को मजबूरन उसके सवालों का जवाब देना पड़ा। उस महिला सिपाही ने उससे इसी तरह के कुछ और सवाल पूछे और उसकी सारी जानकारी रजिस्टर में दर्ज कर उस पर शुभांगी के साईन करवाये। इसके बाद उसने उसे अगली टेबल पर भेज दिया।
अगली टेबल पर जाते ही वहाँ बैठी काँस्टेबल ने उसे सारे गहने उतारकर टेबल पर रखने को कहा जिसके बाद शुभांगी ने अपने सारे गहने उतारकर टेबल पर रख दिये। उसने अपनी चूड़ियाँ, मंगलसूत्र, कान के बूँदे, पायल और अँगूठी उतार दी और टेबल पर रख दी। पीछे से एक काँस्टेबल जेलर के ऑफिस से उसका बैग भी लेकर आ गई और उसे टेबल पर खाली करने लगी। जब उन लोगो ने उसका बैग खाली किया तो उसमें से साड़ियाँ, ब्लाउज, पेटिकोट, अंडरगारमेंट्स और कुछ फोटोज निकली। चूँकि वह एक सज़ायाफ्ता कैदी थी इसलिए उसे घर को कोई भी सामान या कपड़े इस्तेमाल करने की इजाजत नही थी। वह तो अपना मोबाइल भी बैग में रखने वाली थी लेकिन मनीष के कहने पर उसने अपना फोन उसे दे दिया।
“रेखा, लगता हैं इसने जेल को हॉटल समझ लिया हैं..” - प्रतिभा उसका मजाक उड़ाते हुए बोली।
‘हाँ मैडम जी। देखो तो, कितनी महँगी-महँगी साड़ियाँ लेकर आई हैं..’
“अरे माताजी, अब ये सब चीजें तेरे काम की नही हैं। भूल जा इन सब चीजों को।" - प्रतिभा ने उसकी ओर देखते हुए कहा।
शुभांगी कुछ न बोल पाई और शांत खड़ी रही। गहने जमा करने के बाद उसकी ऊँचाई तथा वजन की जाँच की गई और फिर उसे तलाशी के लिए पास खड़ी एक लेडी काँस्टेबल के पास भेज दिया गया।
“चल कपड़े उतार…” - काँस्टेबल ने सख्त लहजे में कहा।
कपड़े उतारने की बात सुनकर शुभांगी एक पल के लिए तो बिल्कुल स्तब्ध रह गई लेकिन उसके पास कोई और रास्ता नही था। उस कमरे का माहौल उसके लिए इतना डरावना था कि उसकी हिम्मत ही नही हुई कि वह अपने कपड़े उतारने के लिए मना कर पाती। वह नियमो को मानने के लिए बाध्य थी और उसे काँस्टेबल के सामने अपने कपड़े उतारने पड़े।
उसने सबसे पहले अपनी साड़ी उतारी। हल्के नीले रंग की साड़ी और नीले ब्लाउज में वह गजब की खूबसूरत लग रही थी। उसने जैसे ही अपनी साड़ी का पल्लू अपने सीने से नीचे सरकाया, उसके बड़े-बड़े स्तन उभरकर सामने आने लगे और उसका क्लीवेज दिखने लगा। औरतो की खूबसूरती होती ही कमाल की हैं। किसी भी पुरुष की नजर औरत के चेहरे के बाद सबसे पहले उसके स्तनों पर ही जाती हैं और अगर महिला के स्तन बड़े-बड़े और सुडौल आकार के हो तो पुरुष अपने आपको कंट्रोल नही कर पाता। उस वक़्त यदि वहाँ कोई पुरुष मौजूद होता तो शुभांगी को देखकर मुठ मारे बिना नही रह पाता।
शुभांगी ने अपनी साड़ी उतारकर नीचे जमीन पर रख दी और फिर एक-एक कर अपने सारे कपड़े उतारने लगी। उसने अपना ब्लाउज और पेटिकोट उतार दिया और सिर्फ ब्रा-पेंटी में अपनी जगह पर खड़ी हो गई। उसने अंदर गुलाबी रंग की ब्रा व पेंटी पहनी हुई थी और इतनी कमाल की लग रही थी जैसे कोई अप्सरा जमीन पर उतर आई हो। हालाँकि काँस्टेबल इतने में ही संतुष्ट नही थी। उसने उससे ब्रा व पेंटी भी उतारने को कहा और उसे पूरी तरह नग्न होने के लिए बाध्य किया। काँस्टेबल के कहने पर उसे अपनी ब्रा-पेंटी भी उतारनी पड़ी और अब वह किसी नवजात बच्चे की तरह पूर्ण नग्न अवस्था मे खड़ी हो गई।
आँह! क्या गजब का बदन था उसका। खूबसूरत चेहरा, गोरा शरीर, बड़े-बड़े सुडौल स्तन, उभरे हुए कूल्हे और चिकने-चिकने चूतड़। उसके बदन पर वसा का जमाव अधिक था जिसकी वजह से वह और भी ज्यादा सेक्सी लग रही थी। उसकी कमर बहुत ज्यादा पतली नही थी लेकिन फिर भी किसी पुरुष को मदहोश करने के लिए काफी थी। उसके कपड़े उतारते ही काँस्टेबल ने उसकी जाँच शुरू कर दी।
सबसे पहले उस काँस्टेबल ने उसके बालो पर हाथ फेरा और उन्हें बिखेर दिया। फिर उसके मुँह, कान और नाक को अच्छी तरह से चेक किया और फिर उसके स्तनों को अपने हाथों के सहारे ऊपर उठाकर उन्हें दबाने लगी। जैसे ही उसने शुभांगी स्तनों को दबाया, शुभांगी एकदम से असहज हो उठी और उसके हाथो को पकड़ लिया।
“मैडम, ये क्या कर रही है आप?” - शुभांगी बोली।
‘ऐ, क्या हैं। चुपचाप खड़ी रह।’ - काँस्टेबल उस पर चिढ़ते हुए बोली।
“आप ब्रेस्ट मत दबाइये प्लीज। मुझे अच्छा नही लग रहा..” - शुभांगी ने फिर कहा।
‘ये जेल हैं। तेरा घर नही हैं। यहाँ ऐसे ही चेकिंग होती हैं। अब ज्यादा नाटक मत कर और सीधी खड़ी रह।’ - काँस्टेबल ने जवाब दिया।
शुभांगी के पास आगे बोलने के लिए कुछ नही था और वह चुपचाप खड़ी हो गई। वह काँस्टेबल फिर से उसके स्तनों को दबाने लगी लेकिन इस बार शुभांगी कुछ नही बोल पाई। उसके बाद उसने शुभांगी को आगे झुककर तीन बार खाँसने को कहा। वह आगे की ओर झुकी और तीन बार खाँसने लगी और फिर शुरू हुआ जाँच प्रक्रिया का वह हिस्सा जो शुभांगी के लिए बेहद शर्मिंदगी भरा था।
काँस्टेबल ने उसे अपनी दोनो टाँगे फैलाकर दीवार पर हाथ टिकाने को कहा। शुभांगी ने अपना चेहरा दीवार की तरफ किया और अपनी दोनो टाँगों को फैलाकर दीवार पर हाथ टिकाकर खड़ी हो गई जिसके बाद उस काँस्टेबल ने उसकी गाँड़ और योनि के छेद में ऊँगली डालकर यह सुनिश्चित किया कि उसने अपने पास कुछ छुपाया तो नही हैं। शुभांगी के लिए वह क्षण बहुत ही शर्मनाक व मुश्किल भरा था। उसने अपनी आँखें बंद कर ली। उसकी आँखें नम हो चुकी थी और आँखों से आँसू बहने लगे। उसका दिल कर रहा था कि वहाँ से भाग जाए और फिर कभी वापस लौटकर ना आये। उसके चेहरे पर डर और शर्मिंदगी के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। उस काँस्टेबल ने जब उसकी योनि को छुआ तो उसे ऐसा लगा मानो जैसे एक पल में ही उसकी सारी इज्जत लूट ली गई हो।
खैर, शुभांगी की जाँच प्रक्रिया पूरी हुई। जाँच प्रक्रिया पूरी होने के बाद वहाँ मौजूद एक अन्य लेडी काँस्टेबल अंदर से एक कैमरा लेकर आई और शुभांगी को नग्न अवस्था मे ही दीवार के सामने खड़ा करवा दिया गया।
“ऐ, सीधी खड़ी हो और कैमरे में देख..” - उस काँस्टेबल ने कहा।
शुभांगी को अब कुछ अजीब लगने लगा था। उसे समझ नही आ रहा था कि उसकी नग्न तस्वीरे क्यो खिंची जा रही हैं। उसने थोड़ी हिम्मत की और उस काँस्टेबल से पूछा - “मैडम, मेरी ऐसी फोटोज क्यो ले रहे हो आप?”
‘ऐसी मतलब कैसी?” - काँस्टेबल ने हँसते हुए कहा।
“‘मतलब बिना कपड़ों के..” - शुभांगी ने जवाब दिया।
‘सिर्फ तेरी ही नही ले रहे हैं। सबकी लेते हैं। रूल हैं जेल का।’
शुभांगी को लगा कि शायद हो सकता हैं कैदियों की नग्न तस्वीरे लेने का कोई नियम हो लेकिन उसे यह बात बहुत देर तक खटकती रही। हालाँकि उस वक़्त उसे बहुत ज्यादा सोचने का मौका नही मिला और यह बात उसके दिमाग से बिल्कुल निकल गई। उसकी तस्वीरे खींचने के बाद उसे कुछ सामान व जेल के कपड़े दिए गए जिन्हें पहनने के बाद उसका मगशॉट (जेल के रिकॉर्ड के लिए तस्वीर) लिया गया और फिर उसे अंदर वार्ड की ओर ले जाया गया।
उसे दिए गए कपड़ो में तीन जोड़ी सफेद रंग की साड़ी (जिस पर नीले रंग का बॉर्डर था), सफेद ब्लाउज, सफेद पेटिकोट व सफेद रंग की ही ब्रा व पेंटी शामिल थी। इसके अतिरिक्त उसे कुछ सामान भी दिया गया जिसमें एक थाली, एक मग, एक बाल्टी, एक कंबल, चादर व एक टॉवेल शामिल था। शुभांगी भले ही किसी गलती की वजह से जेल पहुँची थी लेकिन अब वह एक सज़ायाफ्ता कैदी थी। वह अपने घर के कपड़े नही पहन सकती थी, घर का खाना नही खा सकती थी और ना ही अपनी मर्जी से कोई काम कर सकती थी। हालाँकि उसे पूरी उम्मीद थी कि उसे दो से तीन दिन ही जेल में रहना पड़ेगा और कोर्ट में उसके नाम की गलती का पता चलने के बाद वह अपने घर जा सकेगी।
उसे अंदर ले जाया गया। वह बीच मे थी और दो लेडी काँस्टेबल्स उसके इर्द-गिर्द चल रही थी। उसके बदन पर कैदियों वाले कपड़े थे और हाथो में जेल का सामान। डिप्टी जेलर प्रतिभा पहले ही जेलर को फोन पर शुभांगी के बारे में सूचित कर चुकी थी और जेलर ने उसे वार्ड नंबर 4 में डालने के लिए कहा। जेलर के कहे अनुसार दोनो काँस्टेबल्स उसे सीधे वार्ड 4 में लेकर गई।
शुभांगी के लिए पहली मुसीबत यही उसका इंतजार कर रही थी, जब उसका सामना वार्ड 4 की वार्डन शोभना से हुआ। ऊँची कद-काठी, मजबूत शरीर और सख्त मिजाज वाली शोभना पिछले छः सालो से जेल में वार्डन के पद पर पदस्थ थी। महिला जेल परिसर के 8 वार्डो की सभी वार्डनों में शोभना सबसे अधिक क्रूर और अनुशासन पसंद महिला थी। उसे यह बात बिल्कुल पसंद नही थी कि उसके वार्ड की कोई भी कैदी अनुशासनहीनता करे या नियमो का पालन ना करे।
"मैडम, ये नई कैदी हैं। जेलर मैडम ने इसे आपके वार्ड में डालने बोला हैं।" - काँस्टेबल ने शोभना से कहा।
शोभना ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोली - "नाम क्या हैं तेरा?"
'शुभांगी...' - शुभांगी ने कहा।
"कौन से केस में आई हैं?" - उसने काँस्टेबल से पूछा।
'मर्डर केस में आई है मैडम। उमरकैद है। खुद ही सरेंडर किया हैं।' - काँस्टेबल ने जवाब दिया।
"अच्छा। साली देखने मे तो बड़ी मासूम और अच्छे घर की लगती हैं। लगता नही कि मर्डर कर सकती है।"
तभी शुभांगी ने उसकी बात को बीच मे काटते हुए कहा - 'नही मैडम, आप जैसा समझ रही हैं, वैसा कुछ भी नही हैं। मैंने कोई मर्डर नही किया हैं।'
उसके बीच मे बोलने पर शोभना गुस्से से आग बबूला हो उठी और उस पर चिल्लाने लगी - "हरामजादी, मैंने बोलने को कहा तुझे? कहा बोलने को? जब तक बोलने को ना कहा जाये, तब तक जुबान से एक भी आवाज नही निकलनी चाहिये।"
शुभांगी बिल्कुल चुप हो गई। शोभना ने दोनो काँस्टेबल्स से शुभांगी को अंदर लेकर चलने को कहा जिसके बाद उन्होंने शुभांगी को पकड़ा और सेल की ओर लेकर बढ़ गई।
जेल की बनावट कुछ इस प्रकार की थी कि जेलर के ऑफिस से अंदर जाने पर वार्डो का एक अलग परिसर था जिसके गेट पर चौबीसों घंटे महिला सिपाही तैनात रहती थी। किसी भी कैदी को बिना अनुमति के इस परिसर के गेट से बाहर जाने की सख्त मनाही थी। गेट से अंदर जाने पर सबसे पहले एक बड़ा सा मैदान था जहाँ कैदियों की गिनती व प्रार्थना आदि की जाती थी। खाली वक़्त में कैदी औरते इसी मैदान में टहलती थी और उन्हें खाना भी यही दिया जाता था। इसी मैदान के बाद कैदियों को रखे जाने के लिए वार्ड बने हुए थे जिसमे प्रत्येक वार्ड में 15 सेल अथवा कोठरियाँ थी। वार्डो के पीछे की ओर कैदियों के नहाने की व्यवस्था थी जबकि काम के लिए कैदियों को बाहर ले जाया जाता था।
शुभांगी को वार्ड 4 की सेल नंबर 10 में ले जाया गया और अंदर बंद कर दिया गया। तीन तरफ से दीवारों से घिरी उस सेल में सामने की तरफ लोहे की सलाखें लगी हुई थी और उसी के बीच मे एक लोहे का दरवाजा था। ऊपर एक पंखा और एक बल्ब लगा हुआ था तथा एक तरफ पीने के पानी के लिए मटका रखा था। दूसरे कोने में ही शौचालय शीट लगी हुई थी जिसके आसपास छोटी सी दीवार थी। अंदर मनोरंजन के कोई साधन मौजूद नही थे और ना ही अन्य कैदियों की मौजूदगी थी। हालाँकि सेल में रखे कपड़े व सामान देखकर शुभांगी समझ गई थी उस सेल में और भी कैदी बंद हैं।
वार्डन शोभना ने उसे सेल में बंद कर दिया और ताला लगाकर वहाँ से बाहर चली आई। शुभांगी अब सेल में बिल्कुल अकेली थी। उसे बेहद अजीब लगने लगा था और घुटन सी महसूस हो रही थी। वह पहले कभी भी इस तरह एक बंद कमरे में नही रही थी। वह सलाखों से बाहर झाँकने की कोशिश करने लगी लेकिन उसे सामने की कुछ सेलो के अलावा कुछ भी दिखाई नही दे रहा था।
थक हारकर वह जमीन पर ही एक कोने में बैठ गई। जेल स्टॉफ का अपने प्रति बर्ताव देखकर उसे बहुत ही बुरा महसूस हो रहा था। वह कोई अपराधी नही थी और उसे यकीन था कि उसे जेल में ज्यादा दिन नही रहना पड़ेगा। उसे अपने परिवार की याद सताने लगी। बेटी पलक और बेटे शिवांश का चेहरा उसकी आँखों के सामने तैरने लगा। उसे चिंता होने लगी कि उसके जेल जाने की वजह से उसकी बेटी की परीक्षा खराब ना हो जाये।
सेल के अंदर करने को कुछ काम नही था और शुभांगी को कुछ ही देर में बोरियत महसूस होने लगी। वह सेल के अंदर ही यहाँ-वहाँ टहलने लगी। वहाँ समय काटना बिल्कुल भी आसान नही था और वह भी तब जब सेल में उसके अलावा एक भी कैदी मौजूद नही थी। उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करे। वह बाहर जाना चाहती थी लेकिन सेल में ताला लगा हुआ था। वह सलाखों के पास खड़ी हो गई और बाहर तैनात महिला सिपाही को आवाज देने लगी।
"मैडम, सुनिए। कोई हैं। प्लीज मेरी बात सुनिए।"
उसकी आवाज सुनकर बाहर खड़ी एक लेडी काँस्टेबल अंदर आई और उसे डाँटते हुए बोली - 'ऐ, क्या है रे? साली आये हुए एक घंटा भी नही हुआ और नाटक शुरू कर दी तूने।'
"मैडम, प्लीज मुझे बाहर निकालिये। मेरा दम घुट रहा हैं यहाँ पर। मैं पहले कभी भी ऐसे बंद कमरे में नही रही हूँ।" - उसने काँस्टेबल से विनती की।
'ये जेल हैं। तेरा घर नही हैं जो तेरे को अलग से कमरा देंगे। यहाँ सबको ऐसे ही रहना पड़ता हैं। मर्डर करते समय याद नही आया कि जेल में क्या नसीब होता है।' - काँस्टेबल्स बोली।
"मैडम, मैडम, प्लीज मैडम। मैं आपके पैर पड़ती हूँ। प्लीज थोड़ी देर के लिए ही बाहर जाने दीजिए।"
'अब ज्यादा चूं चपड़ की ना तो ये डंडा दिख रहा हैं। गाँड़ से डालूँगी और मुँह से निकालूँगी। समझी। चुपचाप पड़ी रह उधर।' - उसने शुभांगी पर चिल्लाते हुए कहा और वहाँ से बाहर चली गई।
शुभांगी के पास अब सेल में बंद रहने के अलावा कोई चारा नही था। वह चुपचाप एक कोने में बैठ गई और अपने परिवार को याद करने लगी। वह कभी सोने की कोशिश करती तो कभी चलने लगती। उसे लगने लगा था कि उसे सरेंडर नही करना चाहिए था और उसका सरेंडर करने का फैसला बिल्कुल गलत था। वह मन ही मन सोचने लगी कि जब उसने कोई गलत काम किया ही नही हैं तो वह अपने साथ ऐसा व्यवहार बिल्कुल भी deserve नही करती। जो भी हो लेकिन जेल में उसके अनुसार तो कुछ नही होने वाला था। आखिर वह एक कैदी ही तो थी। अन्य कैदियों की तरह एक बिल्कुल साधारण कैदी।