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Adultery ठाकुर ज़ालिम और इच्छाधारी नाग

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Killerpanditji(pandit)

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चैप्टर -1, ठाकुर कि शादी, अपडेट -6

कालीपहाड़ी के मंदिर मे
रूपवती तांत्रिक के सामने अपने स्तन को हिला हिला के रिझा रही थी आज वजन कुछ ज्यादा ही बड़ गया था उसके सतनो का
निप्पल बिल्कुल टाइट हो के खड़े थेजिन्हे रूपवती ऊँगली और अंगूठे मे पकड़ के कुरेद रही थी.
रूपवती अपने दाएं स्तन को उठा के अपने मुँह के पास लाती है और जीभ बाहर निकल के निप्पल पे रख देती है, ऐसा करते ही लज्जत हवस से उसकी आंखे बंद हो जाती है.
एक सुकून था जो कि आज तक़ कहाँ छुपा था पता नहीं, रूपवती आंखे बंद कर निप्पल को चाटती है और उसकी मुँह से आह आआह निकल जाती है.
इस आह मे एक आह और शामिल थी जो तांत्रिक के मुँह से निकलती है ऐसा नजारा देख आहहहह फुट ही पड़ती है.
परन्तु तांत्रिक कि आह, रूपवती के हवस भारी गुरराहट मे दबा जाती है
रूपवती कहाँ थी किसके सामने थी उसे कुछ नहीं पता था उसे बस अपने शरीर से खेलने मे आनंद प्राप्त हो रहा था वो इस खेल को पूरा खेल लेना चाहती थी.
इसी चाहत मे वो अपना बाया स्तन पकड़ के अपने मुँह मे लगा देती है और निप्पल को अपने दांतो तले चबाने लगती है.
ऐसा लगता था जैसे उसमे दूध बह रहा हो और वो एक एक बून्द चूस लेना चाहती हो.
अपनी जबान से लगातार बारी बारी दोनों निप्पल्स को कुरैदे जा रही थी... आज एक अलग ही भूख जग गई थी रूपवती के तन बदन मे.
इस गर्मी और हवस से तांत्रिक का बचे रह पाना भी नामुमकिन था.
रूपवती बदहवास सी तांत्रिक के लटके लंड के बिल्कुल गरीब पहुंच जाती है और अपनी लम्बी काली जबान निकाल के लंड को बिना टच किये ही सुड़प सुड़प जीभ चलाने लगती है जैसे कि कोई कुतिया लंड चाट रही हो.
कुतिया बनी रूपवती अपनी मोटी काली गांड पीछे कि और पूरी तरह उठा लेती है, और मुँह पूरा नीचे कर के लपड़ लपड़ जीभ चला रही थी जिस वजह से गांड धलक धलक हिल रही थी.
ये नजारा देख के तांत्रिक उलजुलूल के मुँह से काम भारी सिसक निकल ही जाती है आआहहहहह... और लंड झटके खा के उठने लगता है, परन्तु जैसे ही लंड रूपवती को छूने को होता है वह पीछे हट जाती है,
तांत्रिक मन मसोस के रह जाता है, रूपवती के पीछे हटने से उसकी गांड बहुत जोर से हिलती है, तांत्रिक कि नजर पूरी तरह रूपवती कि गाण्ड पर टीक जाती है.
अब रूपवती समझ चुकी थी कि उसकी गांड तांत्रिक को आकर्षित कर ही है
अब वो और हौसले के साथ अपनी काम क्रिया को अंजाम देने का इरादा कर लेती है.
इसी फिराक मे रूपवती एक दम पीछे को पलट जाती है.
अपनी मोटी बड़ी काली गांड छलकाती हुई तांत्रिक के सामने प्रस्तुत कर देती है, ये नजारा देखते ही तो तांत्रिक कि आंखे फटी कि फटी रह जाती है.
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तांत्रिक :- हे देवता ये क्या नजारा दिखाया तूने, आअह्ह्ह..... मेरा लंड क्या हो रहा है इसे.
आआहहहहह
आवाज़ सुंन के गांड हिलाती रूपवती बड़ी अदा मदहोशि के साथ गर्दन पीछे घुमाती है
पीछे का नजारा देख रूपवती आश्चर्य से बोखला जाती है. हे भगवान इतना बड़ा लंड ये नजारा देख के रूपवती कि चुत पानी छोड़ने लगती है पूरी पैंटी गीली हो चुकी थी जैसे किसी ने तेल मे भिगो दी हो.
पीछे का नजारा था ही कुछ ऐसा तांत्रिक का 12इंच 5इंच मोटा लंड जाग्रत अवस्था मे आ चूका था, इतना भयानक काला लिंग देख के किसी भी औरत के होश उड़ जाते.
तांत्रिक :- आअह्ह्हह्ह्ह्ह..... रूपवती ये क्या किया तूने आज पुरे 10 साल बाद मेरा लिंग खड़ा हुआ है.
आअहहा..... लिंग बिल्कुल सीधा खड़ा हो चूका था.
रूपवती जानती थी अब मंजिल दूर नहीं है, लेकिन मुश्किल भी यही था कि बिना हाँथ लगाए वीर्य निकालना.
रूपवती तांत्रिक के सामने घोड़ी बनी हुई थी अपनी गांड उठाये मादक अवस्था मे. कामवासना मे गिरफ्तार थी आज.
रूपवती दोनों हाथ पीछे ले जाती है और दोनों अंगूठे पैंटी के दोनों तरफ फसा के नीचे करने लगती है.
ऐसा करते हुए कमरे मे सिसकारिया गूंज उठती है एक तांत्रिक कि थी जो ये नजारा देखने के लिए मरा जा रहा था और दूसरी आवाज़ खुद रूपवती कि थी जो पीछे गर्दन घुमाये तांत्रिक कि आँखों मे एकटक देखे जा रही थी
अब रूपवती अपनी पैंटी आधी गांड तक़ नीचे कर चुकी थी, गांड के बीच कि दरार दिखने लगी थी, ऐसा लगता था जैसे दो काली पहाड़ियों के बीच एक पतली पगडंडी है यदि कोई इसपे चलने कि कोशिश करता तो जरूर फिसल जाता.
तांत्रिक का लंड लगातार हवा मे झटके मार रहा था
रूपवती पीछे देखती हुई एक दम से अपनी पैंटी पूरी नीचे खिसका देती है....
आआहहहह.... आअह्ह्ह.... सिसकारी भरती रूपवती आंखे बंद कर लेती है, मदहोशी इस कदर सर पे सवार थी कि गांड किसी भट्टी कि तरह जल रही थी, चुत से पानी ऐसे रिस रहा था जैसे बरसो कि बारिश के बाद कोई झरना बह रहा हो.
धम से करती हुई गांड आज़ाद हो चुकी थी, गांड के दोनों पाट अलग हो चुके थे, दोनों ही हिस्से अलग अलग दिशा मे जाते तो कभी वापस आ के एक दूसरे को टक्कर जड़ देते..इस टकराहट मे बीच कि काली पगडंडी दिख रही थी इस पगडंडी मे एक काला कुआँ था, कुएं के नीचे चुत रूपी झरना था जो पता नहीं आज कितने बरसो के बाद भलभला के बह रहा था.
चुत से रिसता पानी जांघो को भीगा रहा था, अंधेर मध्यम रौशनी मे रूपवती कि काली मोटी चिकनी गांड चमक रही थी.

तांत्रिक इस चिकनाहट पे पक्का फिसलने वाला था.
ये नजारा देख के एक बार तो तांत्रिक अपने लोडे के साथ ही अपने सिंघाहसन पे उछल पड़ा.
तांत्रिक :- रूपवती ये क्या नजारा दिखा दिया तूने आहाहाहा..... मजा आ गया.
आज तांत्रिक को भी कामवासना ने घेर लिया था, उसके मन मे भी कही ना कही सम्भोग कि लालसा जन्म ले रही थी नजारा ही कुछ ऐसा था.
परन्तु वो सम्भोग नहीं कर सकता था,वो अपने वचन से बंधा हुआ था वो सिर्फ वीर्यरुपी आशीर्वाद ही दे सकता था.
रूपवती अपने दोनों हाथो को पीछे ले जा के अपनी गांड के दोनों हिस्सों को अलग करती है और वापस छोड़ देती है, गांड के हिलने से रूपवती का पूरा बदन हिला जाता है.
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ऐसा ही रूपवती दो तीन बार करती है फिर अपनी लार टपकाती चुत पे हाथ रख के मसल देती है और खुद ही चीख पड़ती है....
आअह्ह्ह्ह...... मममममम... हे भगवान
चुत और ज्यादा पानी छोड़ने लगती है, पूरी हथेली गीली हो जाती है.
रूपवती अपने हाथ को अपनी नाक के करीब ला के देखने लगती है उसने आज तक़ इतना पानी नहीं छोड़ा था.
अपनी चुत से निकले पानी को सुघती है... आहहहह क्या खुशबू है ये गंध उसे अंदर तक़ आनंदित कर देती है
रूपवती मदहोशी मे अपना पूरा मुँह खोल के अपना हाथ चाटने लगती है, चाट चाट के हाथ साफ कर देती है फिर वापस तांत्रिक कि आँखों मे देखती हुई अपनी गांड का छेद को ऊँगली से कुरेदने लगती है.. ऐसा मजा उसे आजतक कभी आया नहीं था, आज जिस सुख से वो परिचित हुई वो हैरान थी कि आज तक़ ऐसे सुख से कैसे वंचित रही.
तांत्रिक भी ऐसे नज़ारे को देख कर दंग था, ऐसी काया ऐसा मदहोश बदन, ऐसी गांड आज तक नहीं देखि थी.
लगता था अब टिक पाना मुश्किल है.
काम मे डूबी रूपवती अपनी चुत से निकले पानी को हाथ मे ले ले के अपने गांड पे मलते जा रही थी जैसे किसी तेल से गांड कि मालिश कर रही हो.
गांड चुत जाँघ सब कुछ चुत के पानी से भर चूका था, हलकी रौशनी मे चमक बिखेर रही थी रूपवती कि चिकनी काली चुत और गाण्ड, रूपवती इतनी गरम हो चुकी थी कि वो कभी भी झड सकती थी, परन्तु खुद के स्सखलित होने से पहले उसे तांत्रिक को स्सखालित करना था.
वो अपने चरम पे थी, एक ऊँगली अपने मुँह मे ले के थूक से अच्छे से गीली करती है और ऊँगली को गांड के छेद पे फिराने लगती है... पहले ही चुत के पानी से चिकने गुदा द्वारा मे ऊँगली पोक करती हुई एक दम से अंदर चली जाती है रूपवती कि जोरदार सिसकारी गूंज जाती है. आअह्ह्ह.... आहहहह....
तांत्रिक का लिंग भी एक तगड़ा झटका लेता है और झड़ने के करीब ही था कि खुद को रोक लेता है और लम्बी सांस लेते हुए रूपवती को अपने गुदाद्वारा से खेलता देख मुस्कुरा देता है.
ये देख के रूपवती एक बार को हिम्मत हारती हुई लगती है, क्युकी वो तांत्रिक से पहले स्सखालित हो गई तो फिर वो कैसे वीर्य ग्रहण कर पायेगी?
लेकिन हवस अपनी परकाष्ठा पे थी, रूपवती को लगने लगा कि कही उसके प्राण ही ना निकल जाये... खुद के स्सखलन को रोकना था.
उसे हवन कुंड के पास एक गोल लकड़ी पड़ी दिखाई देती है जो कि करीबन 5 इंच लम्बी होंगी.
आव देखा ना ताव रूपवती उस लकड़ी को उठा के सीधा अपनी गांड मे पूरा जड़ तक घुसा देती है,आआहहहहह.... अह्ह्ह्हह.... एक जोरदारचीख गूंज उठती है इस चीख मे दर्द के साथ हवस भी समाई हुई थी,
लकड़ी पूरी जड़ तक घुस चुकी थी रूपवती कि टाइट गांड मे.
तभी उसकी गांड के छेद पर बहुत ही तेज़ प्रेशर से कोई गीली चिपचिपी चीज टकराती है,
अचानक हुए हमले से रूपवती पलट के देखती है तो तांत्रिक चिंघाड़ रहा था.
तांत्रिक :- आअह्ह्हह्ह्ह्ह रूपवती मेरा वीर्य मेरा आशीर्वाद ग्रहण कर.
पचाक पाचक..... पिच पिच....
करती वीर्य कि मोटी गाढ़ी धार रूपवती कि गांड चुत जाँघ को नहलाती चली गई, वीर्य गांड से होता हुआ कमर के रास्ते स्तन तक पहुंचने लगा क्युकी रूपवती कि गांड ऊपर और धड नीचे था.
रूपवती पूरी तरह वीर्य मे सन चुकी थी, लकड़ी का टुकड़ा अभी भी गांड मे ही फसा हुआ था वो चौपया बनी हुई ही अपना मुँह तांत्रिक कि तरफ घुमा लेती है परन्तु अब तांत्रिक का लिंग थोड़ा नीचे आ के लिंग के नीचे कटोरे को भरने लगता है.
आह्हः... आह्हः. रूपवती
ऐसा कह कर कटोरा एक के बाद एक निकलती वीर्य कि पिचकारियों से भरने लगता है.
रूपवती हैरान थी कि इतना वीर्य कैसे निकल सकता है.
1ltr का कटोरा पूरा भर चूका था, आखिर 10 साल से जमा किया हुआ वीर्य आज निकला था.
रूपवती पूरी वीर्य से सनी हुई कुतिया कि तरह बैठी निकलते वीर्य को देख रही थी.....
तांत्रिक का स्सखालन बंद हो चूका था, वह पूरी तरह होश मे था परन्तु थकान का कोई नामोनिशान नहीं था उसके चेहरे पे.
रूपवती मन मे :- कैसा पुरुष है ये कि इतना वीर्य निकलने के बाद भी थकान नहीं है अभी भी स्थिर बैठा है.
तांत्रिक :-वाह रूपवती तुम वाकई कमाल कि स्त्री निकली जो काम कोई नहीं कर पाया वो आज तुमने कर दिखाया.
मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है लो वीर्य ग्रहण करो, ऐसा बोल के वीर्य से भरा कटोरा रूपवती कि तरफ बढ़ा दिया..
रूपवती अभी भी अपनी हवस कि खुमारी से बाहर नहीं आई थी, वो शांत होना चाहती थी, स्सखालित होना चाहती थी लेकिन तांत्रिक अपना वीर्य निकाल चूका था
वो तुरंत उठ बैठी है और तांत्रिक के हाथ से कटोरा ले के अपने होंठो से लगा लिया और गटागट पिने लगी.... गुलुप गुलुप कर के गाढ़ा वीर्य उसके हलक से नीचे उतरने लगा,
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जैसे जैसे वीर्य पीती गई उसकी कामवासना ठंडी होती गई उसकी गर्मी ठंडाई मे बदलने लगी बिना स्सखालित हुए ही.
आहहहह..... क्या स्वाद था वीर्य का बिल्कुल अनोखा. बचे खुचे वीर्य को रूपवती कटोरे मे जीभ डाल डाल के साफ कर दिया.
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अब रूपवती पूरी तरह शांत हो चुकी थी, चुत का झरना बहना बंद हो चूका था जैसे तूफान के बाद शांति छा जाती है वैसे ही शांति छा गई थी कमरे मे.
तांत्रिक :- शाबाश रूपवती तुम मेरी परीक्षा मे पास हो गई, अब तुम्हे वाकई रूपवती होने से कोई नहीं रह सकता.
रूपवती :- कैसी परीक्षा बाबा, रूपवती वीर्य मे भीगी नंगी ही तांत्रिक के सामने हाथ जोड़े बैठी थी उसे अपार शांति का अनुभव हो रहा था..
तांत्रिक :- मै देखना चाहता था किं तुम उस इच्छाधारी नाग को अपने साथ सहवास करने के लिए मजबूर भी कर पाओगी या नहीं.
परन्तु जिस स्त्री ने मेरा वीर्य बिना हाथ लगाए स्सखालित करवा दिया वो स्त्री क्या नहीं कर सकती. शाबाश रूपवती
जाओ मंदिर के पीछे जलाशय मे खुद को साफ कर लो फिर बताता हूँ कि कैसे वो इच्छाधारी नाग तुम्हे मिलेगा?

रूपवती हाथ जोड़े नंगी ही अपनी मोटी काली भारीभरकम गांड मटकाती हुई कमरे से बाहर मंदिर के पीछे निकल पड़ती है.
अब उसकी चाल मे तब्दीली आ गई थी क्युकी अभी भी उसकी गांड मे लकड़ी का टुकड़ा फसा हुआ था.

उधर रंगा बिल्ला के अड्डे पर
रुखसाना जमीन पे पेट के बल लेटी हुई हांफ रही थी और आजु बाजू गिरे रंगा बिल्ला उसकी हालत देख के ठहाके लगा रहे थे.
रंगा :- क्यों रांड कैसा लगा?
रुखसना :- हाफ़ती हुई मालिक आप लोगो ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी.
बिल्ला पास बैठे रुखसाना कि गोरी मखमली गुदगुदी गांड को घूरे जा रहा था....रुखसाना के हाफने कि वजह से गांड ऊपर नीचे हो रही थी, गांड का छेद खुल बंद हो रहा था.
ऐसा नजारा देख के बिल्ला फिर से जोश मे आ जाता है और तुरंत उठ के रुखसाना कि गांड दबोच लेता है रुखसाना कुछ समझ पाती उस से पहले ही बिल्ला अपने खुटे जैसे लंड जो कि वीर्य और रुखसाना के थूक से चमक रहा था रुखसाना कि गांड मे जड़ तक ठूस चूका था
आअह्ह्हह्ह्ह्ह.... आहहहह. कि जोरदार के साथ रुखसाना अपनी गर्दन और सर उठा के चीख पड़ती है.
माल्ललिक ... आआआ हहहहहह .....
जैसे कोई भेड़िया हुंकार भर रहा हो.

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बिल्ला को कोई फर्क नहीं पड़ता वो धचा धच धचा धच गांड चोदे जा रहा था.
पूरा बाहर निकाल के एक ही बार मे जड़ तक पंहुचा दे रहा था. रुखसाना हवस से भरी बेहाल थी और कुतिया बनी सिसकारी मार रही थी.....
रुखसाना :- आहहहह.... मालिक आअह्ह्ह... धीरे मालिक धीरे
बिल्ला :- चुप रंडी.... ले धचा धच धचा धच..... फच फच फच
अब ऐसा खूबसूरत नजारा देख के रंगा कैसे पीछे रहता वो भी खड़ा हो के लंड मसलता हुआ रुखसाना के पीछे आ गया.
और अपना लंड रुखसाना कि गांड पे टच करने लगा..
रुखसाना रंगा के इरादे भाम्प जाती है, कहाँ बिल्ला का लंड ही भारी पड़ रहा था ये रंगा भी आ गया.
रुखसाना :- नहीं मालिक गांड मे नहीं, आप चुत मे डाल लीजिये जैसा हमेशा करते है.
अक्सर रंगा बिल्ला चुत गांड मे ही एक एक कर के लंड डाल के चोदा करते थे. परन्तु आज इनाम देना था रुखसाना को.
बिल्ला :-चुप छिनाल और ऐसा बोल के तडातड़ गांड मारने लगता है और एक पैर से रुखसाना के सर को दबा के गांड ऊपर कि तरफ पकड़े दबादब चोदे जा रहा था.
रुखसाना तो पहले ही गरम थी अब तो उसकी वासना चरम पे पहुंच गई थी उसकी चुत लगातार पानी छोड़े जा रही थी, बिल्ला के हर धक्के के साथ चुत का रस किसी फव्वारे कि तरह चुत से निकल निकल के जमीन भीगाने लगा..
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रंगा और इंतज़ार नहीं कर सकता था वो भी पीछे आता है और एक ही धक्के मे बिल्ला के साथ अपना लंड भी पूरा जड़ तक रुखसाना कि गांड मे डाल देता है.
सच मायनो मे आज रुखसाना कि गांड फटी थी.
रंगा बिल्ला एक साथ लंड बाहर निकलते फिर एक साथ जड़ तक पेल देते, बिल्ला ने रुखसाना कि गर्दन दबाई हुई थी बस उसके मुँह से रह रह के मालिक आअह्ह्ह मालिक आह्हः धीरे मालिक.... Aaaa अह्ह्हभ धीरे ही निकल पा रहा था.
धकाधक चोदते हुए 15 मिनट हो चुके थे अब रुकसाना कि गांड भी उनके लंड पे एडजस्ट हो चुकी थी अब रुखसना मजे मे थी ऐसा मजा ऐसा आंनद आज तक नहीं मिला था.
दर्द के बाद ही असली मजा है.... अब रुखसना भी अपनी गांड पीछे दोनों के लोडो पे पटक पटक के चुद रही थी
आह्हः.... मालिक फाड़ो अपनी रंडी कि गांड, और मारो और अंदर,, फाड़ के बिखेर दो मेरी गांड आअह्ह्ह.....
रंगा बिल्ला :- ले रंडी ले छिनाल चुद, चुद अपने मालिकों से
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धचाधच फका फ़क.... फच फच के साथ और आधे घंटे पेलते रहे, वासना अपने चरम पे थी.
एक जबरजस्त हुंकार गूंज उठी, इसी हुंकार के साथ रंगा बिल्ला एक साथ अपनी पिचकारी छोड़ने लगे.

आहहहह.... पीच पीच..... पीच लगातार पिचकारी छूटती गई और रुखसाना कि गांड भरती गई.
रुखसाना भी अति उत्तेजना मे वीर्य कि गर्मी पा के भरभरा के झड़ने लगी
आअह्ह्ह... मालिक पचच्चाक पचच्चाक.... करके चुत भलभालने लगी.
अब तीनो ही ढेर हो चुके थे रंगा बिल्ला के लंड गांड से बाहर आ चुके थे.
रुखसाना अपनी गांड भींच के वीर्य को बाहर गिरने से रोकती है, और जोर से गांड भींच लेती है.
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अब सुबह हो चली थी.... वासना और हवस भरी रात बीत चुकी थी.
धमाकेदार चुदाई के बाद रंगा बिल्ला गहरी नींद मे जा चुके थे, और रुखसाना मुस्कराती हुई रंगा बिल्ला को देखती है और गांड भिचे ही अपने कपडे पहन लेती है. वीर्य अभी भी रुखसाना के गांड मे ही कैद था.
उधर मंदिर ने रूपवती खुद को साफ कर के वापस तांत्रिक के सामने हाथ जोड़े बैठी थी, वो अब कपडे पहन चुकी थी.
तांत्रिक :- सुनो रूपवती तुम्हे वो इच्छाधारी नाग "विषरूप" गांव मे मिलेगा जहाँ कभी इच्छाधारी साँपो कि बस्ती थी.
उस इच्छाधारी सांप के पास एक मणि है जिसे तुम्हे प्राप्त करना होगा, मै तुम्हे मन्त्र दूंगा वो मन्त्र, मणि हाथ मे ले के उस इच्छाधारी सांप के सामने बोलोगी तो वो आंशिक रूप से तुम्हारे काबू मे होगा, फिर उसके बाद तुम्हे पता ही है क्या करना है.
तथास्तु
ऐसा कह के तांत्रिक उलजुलूल वापस ध्यान मे चला गया.
अब सुबह हो चुकी थी
रूपवती के मन मे बहुत सी उम्मीदें जग चुकी थी अतिसुंदरी होने कि, ठाकुर ज़ालिम सिंह से बदला लेने कि.
इन्ही उम्मीदो को सजाये रूपवती मंदिर से बाहर निकल जाती है.
उसका घोड़ा वीरा बाहर ही बघघी से बंधा हुआ था. वीरा रूपवती का वफादार घोड़ा था.
रूपवती तुरंत बघघी मे बैठ अपनी हवेली निकल पड़ती है, उसकी गांड मे अभी भी लकड़ी का टुकड़ा फंसा हुआ था जो कि रह रह के गुदगुदी मचा रहा था, वासना कि टिस उठ रही थी आज रूपवती मे काफ़ी परिवर्तन आ चुके थे.
उधर रुखसाना भी अपना चेहरा ढके हुए अपनी गांड मे रंगा बिल्ला का वीर्य लिए निकल चुकी थी.
रास्ते मे रूपवती और रुखसाना एक दूसरे को क्रॉस करते है लेकिन कोई किसी का चेहरा नहीं देख पाता.

ये रुखसाना अपनी गांड मे रंगा बिल्ला का वीर्य क्यों दबाई हुई है?
और अब रूपवती कि जिंदगी मे क्या परिवर्तन आएंगे?
मंगलवार का दिन भी नजदीक था.
क्या ठाकुर कामवती से शादी कर पाएंगे?
बने रहिये इस कालजायी सफर मे अपने दोस्त andy pndy के साथ.
Zabardast update dost 🤠🤠🤠
 

Killerpanditji(pandit)

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चैप्टर -1, ठाकुर कि शादी, अपडेट -7

मंगलवार का दिन भी आ चूका था,
ठाकुर ज़ालिम सिंह कि हवेली मे सुबह से ही चहल पहल हो रही थी, घोड़ा गाड़ी पे सामान बांधे जा रहे थे. खूब अन्न गेहूं चावल फल मिठाईया बांध ली गई थी.
ठाकुर :- अरे हरामियों कालू, बिल्लू, रामु कहाँ मर गये सब के सब मेरी पगड़ी कहाँ है?
सब के सब हरामखोर है सालो कोमुफ्त खाने कि आदत पड़ गई है.
ठाकुर साहेब कपडे पहने जा रहे थे और भुंभूनाते जा रहे थे.
तभी कमरे मे छन छन पायल छनकाती भूरी काकी पगड़ी लिए खड़ी थी.

भूरी काकी
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उम्र 50 साल लेकिन आज भी कसा हुआ बदन है.
साइज 34-26-38 है,
उम्र होने के बावजूद भी स्तन और गांड का कसाव बारकरारा है.
या यु कहिये भूरी काकी पुरानी शराब कि तरह है जो वक़्त के साथ और ज्यादा नशीली होती जा रही है.
गांव मे इनकी बहुत इज़्ज़त है, ठाकुर भी इज़्ज़त से ही पेश आते है इनके सामने.
परन्तु ये अंदर से है बिल्कुल सुलगती भट्टी, हवस हमेशा दबी रहती है बस आगे से पहल नहीं करती.
इनकी 16 साल कि उम्र मे ही शादी हो गई थी, शादी मात्र 4 साल ही चल पाई इनका पति वक़्त से पहले ही भरी जवानी मे खेत मे काम करते वक़्त सांप काटने कि वजह से मारा गया था.
तब से आज तक भूरी ने सम्भोग नहीं किया, हालांकि रोज़ रात ऊँगली, बेंगन, खीरा, बेलन जरूर डालती है चुत मे जैसे तैसे अपनी हवस मिटाती है लेकिन शर्माहाट और शराफत के कारण कभी बाहर चुदवा ना पाई.
हाय री किस्मत... ऐसे मस्त बदन को भोगने वाला कोई था ही नहीं.
ठाकुर ज़ालिम कि माँ ने भूरी को हवेली के काम काज के लिए रख लिया था.
तब से आज तक भूरी हवेली कि सेवा मे ही रह गई.

भूरी काकी :- ये लीजिये ठाकुर साहेब पगड़ी पहनिये, ऐसा बोल के खुद अपने हांथो से पहना देती है.
वाह ठाकुर साहेब क्या लग रहे है, जँच रहे है
कामवती आपको देखते ही पसंद कर लेगी, ऐसा कह के एक काला टिका ठाकुर साहेब को लगा देती है.
ठाकुर :- काकी आप भी ना, हालांकि ठाकुर और भूरी कि उम्र मे ज्यादा अंतर नहीं था.
लेकिन सब भूरी को काकी ही बोलते थे क्युकी भूरी ठाकुर कि माँ कि सेवादारनी थी.
तो ठाकुर भी बचपन से ही भूरी को काकी ही बोलते थे.
काकी आप ना होती तो ये हवेली कैसे चलती, बाकि सब साले हरामी हो गये है.
भूरी काकी :- छोडीये गुस्सा मै उन्हें देख लुंगी, आप अच्छे काम के लिए जा रहे है गुस्सा थूक दीजिये.

कालू, बिल्लू, रामु तीनो ही ठाकुर के आदमी थे वफादार थे
बस प्यार कि भाषा नहीं समझते थे, ठाकुर जब तक चिल्लाता नहीं इनसे काम होता नहीं.
तीनो एक नंबर के हरामी शराबखोर और चोदने के शौक़ीन थे.
लेकिन वफादार गजब के.
तीनो एक जैसे ही दीखते थे,मुछे रोबदार hight 5.8इंच,चौड़ी छाती.
बिल्कुल लथेट, लंड भी तीनो के एक सामान 7इंच के काले मोटे बेंगन जैसे लंड.

इतने मे डॉ. असलम हवेली मे प्रवेश करता है
डॉ. असलम :- क्या ठाकुर साहेब कितना सजेंगे चलना नहीं है क्या?
कहाँ रह गये.
ठाकुर :- आओ असलम आओ... मै तुंहारी ही राह देख रहा था.
मै तो तैयार ही हूँ लेकिन वो तीनो हरामी घोड़ा गाड़ी तो तैयार करे.
डॉ. असलम :-हाहाहाहाहा क्या ठाकुर साहेब उन बेचारो पे चिल्लाते हो उन्होंने गाड़ी तैयार भी कर दि है.
तभी बिल्लू अंदर आता है, और सर झुका के बोलता है ठाकुर साहेब गाड़ी तैयार है सारा सामान लाद दिया है और गाड़िवान भी आ चूका है.
आप प्रस्थान कर सकते है, और यादि इज़ाज़त हो तो हम तीनो भी साथ चले?
ठाकुर :- नहीं हम अच्छे काम के लिए जा रहे है तुम तीनो मनहूसो को ले जा के काम नहीं बिगाड़ना मुझे.
तुम लोग हवेली मे ही रहो कोई चोर लुटेरा घुस गया तो फिर हो गई शादी.
ठाकुर हमेशा ही तीनो को लताड़ते रहते थे, तीनो थे भी इसी लायक कोई काम ठीक से करते ही नहीं थे.
जो करते कुछ ना कुछ बिगाड़ ही देते.
बस ठाकुर के प्रति हद से ज्यादा वफादार थे इसलिए अब तक हवेली मे टीके हुए थे.
डॉ.असलम और ठाकुर घोड़ा गाड़ी पे सवार हो के निकल चुके थे..
और पीछे रह गये थे तीनो जमुरे और भूरी काकी.

ठाकुर बहुत ख़ुश थे, उनका दिल चूहें कि तरह उछल रहा था,
ठाकुर :- असलम जैसा तुम बोलते हो क्या कामवती उतनी ही सुन्दर है?
असलम :- हाँ ठाकुर साहेब आप देखेंगे तो देखते ही रह जायेंगे.
ठाकुर का मन गुदगुदाने लगा,
सफ़र शुरू हो चूका था, ठाकुर जल्दी से जल्दी कामगंज गांव पहुंच जाना चाहते थे.

दूसरी तरफ कामगंज मे, रामनिवास का घर पे भी सुबह से गहमा गहेमी थी.
रामनिवास आज भी दारू पिने से बाज नहीं आया था, कामवती कि माँ रतीवती जब से रामनिवास को ढूंढे जा रही थी.
रतिवती :- कहाँ मर गया आज भी ये शराबी,कही शराब पिने तो नहीं बैठ गया कही.
अकेली ही सारी तैयारी करने मे लगी थी रतीवती.
गांव कि कुछ लड़किया भी आई हुई थी जो कामवती को सजाने मे लगी थी.
घर के एक तरफ हलवाई पकवान बना रहा था
तभी दरवाजे पे लड़खड़ाता रामनिवास आता है.
जिसे देख के रतीवती बुरी तरह आगबबूला हो जाती है.
रतिवती :- मै यहाँ अकेले मरी जा रही हूँ और ये हरामी शराब पी के मौज मे घूम रहा है.
ऐसा कह के रतीवती खूब खरी खोटी सुनाने लगती है.
लेकिन रामनिवास भी चिकना घड़ा था कहाँ असर पड़ता उसकी बातो का.
रामनिवास :- अरी भाग्यवान आज तो खुशी का मौका है, क्यों जल भून रही हो थोड़ी सी पी ली तो क्या गुनाह कर दिया.
वैसे भी ठाकुर साहेब अपनी कामवती को देखेंगे तो मना नहीं कर पाएंगे.
आखिर बेटी कि सुंदरता उसकी माँ पे जो गई है, ऐसा कह के रामनिवास गाल पे चीकूटी काट लेता है.
रतीवती घनघना जाती है उसके टच से, छोडो भी जाओ नहा धो लो हुलिया सुधारो ठाकुर साहेब कभी भी आते होंगे.
मै भी तैयार हो लेती हूँ, ऐसा कह के रतिवती अपने कमरे मे चली जाती है और रामनिवास बाथरूम कि तरफ बढ़ जाता है.


रतिवती आज बहुत ख़ुश थी क्युकी उसकि बेटी का रिश्ता बहुत बड़े घर मे होने वाला था, उसका सपना तो कभी पूरा हुआ नहीं कम से कम उसकी बेटी तो बड़े घर कि बहु बने, उसकी खूबसूरती तो काम आये.
कहाँ मै अभागी कुछ ना मिला मुझे ऐसा बोलते हुए शीशे के सामने खड़े हो कर वो अपनी साड़ी उतारने लगती है.
साड़ी उतारते ही उसके स्तन कि लकीर ब्लाउज मे से झाकने लगती है. क्या गोरे गोरे बड़े स्तन थे रतिवती के
स्तन के बीच लटकता मंगलसूत्र और भी ज्यादा कामुक लग रहा था.

ब्लाउज के नीचे बिल्कुल सपाट पेट, जिस पे कोई दाग़ नहीं नीचे चल के एक गहरी नाभि जिस से हमेशा खुशबू निकलती ही रहती थी एक मदहोश कर देने वाली खुशबू.
लेकिन किस्मत कि मार ऐसा कामुक गद्दाराये बदन कि किसी को कदर ही नहीं पती शराबी निकला.
शराब के अलवा कुछ दीखता ही नहीं.
रतिवती अपने ब्लाउज को उतार देती है रेड चोली मे कैद बड़े बड़े स्तन पूरी तरह छलक जाते है,
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रतिवती खुद को ही देख के शर्मा जाती है ऐसा ग़दराया बदन था रतिवती का. ना चाहते हुए भी एक हाथअपने दाये स्तन पे ले जाती है और सेहलाने लगती है आअह्ह्हह्म..... पुरे बदन मे सरसराहत चल पड़ती है स्तन से होती हुई नाभि के रास्ते एक करंट सीधा चुत तक पहुँचता है.
रतिवती बरसो से कामवासना कि आग मे जल रही थी, आज शादी के माहौल मे उसे कुछ कुछ हो रहा था लगता था जैसे उसकी बरसो से दबी इच्छा पूरी होने वाली हो.
तभी बाहर से आवाज़ आती है बीबी ज़ी ओह्ह्ह बीबी ज़ी.... सब्जी बना दि है चख के स्वाद देख ले.
ये हलवाई कल्लू राम था जो पास के ही गांव से आज रामनिवास के आग्रह पे खाना बनाने आया था...
रतिवती कि मदहोशी इस आवाज़ के साथ टूटती है... और वो पलट के सीधा दरवाजे के पास पहुंच के दरवाजा खोल देती है.
सामने हलवाई कल्लूराम खड़ा था... परन्तु ये क्या कल्लू राम अपना मुँह खोला एक टक रतिवती को देखे जा रहा था..
रतिवती हैरान थी कि ये कल्लूराम को क्या हुआ ये मूर्ति जैसा क्यों हो गया, अचानक उसे ध्यान आता है कि उसने तो साड़ी पहनी ही नहीं है वो तो सिर्फ ब्रा और पेटीकोट मे ही है.
रतिवती पे जो मदहोशी सवार थी उस चक्कर मे वो खुद को ही भूल गई थी कि किस अवस्था मे है और तुरंत दरवाज़ा खोल दिया था.
दरवाज़े के बाहर कल्लूराम ऐसा नजारा देख के आश्चर्य चकित था, ऐसा गोरा मखमली ग़दराया बदन उसने कभी देखा ही नहीं था वो अभी भी एकटक रतिवती के स्तन पे नजरें गाड़ाये सुध बुध खोये खड़ा था.
रतिवती तुरंत दरवाजा बंद कर देती है. और पलट के दरवाजे के सहारे टिक के लम्बी लम्बी सांसे खींचने लगती है.... हे भगवान ये क्या किया मैंने? इतनी बड़ी गलती? कल्लूराम हलवाई मेरे बारे मे क्या सोच रहा होगा?
कल्लूराम अभी भी दरवाजे के बाहर मूर्ति बने जस का तस खड़ा था.
तभी पीछे से बाथरूम से रामनिवास नहा के निकलता है और कल्लूराम को देख के आवाज़ देता है ओह कल्लूराम.... कल्लूराम ओह कल्लूराम
लेकिन कल्लूराम होश मे कहाँ था वो तो मन्त्रमुग्ध दरवाजे को घुरा जा रहा था जैसे कि वो पल थम गया हो उसके लिए.
तभी रामनिवास पास आ के कल्लूराम के कंधे पे हाथ रखता है, क्या हुआ कल्लूराम कुछ काम था क्या?
कल्लूराम :- वो वो वो वो..... बबबबबब मै क्या.... वो मै.... हाँ मै भाभीजी को बोलने आया था कि सब्जी चख लेती.
कल्लूराम हकलाता अटकता बोल ही चूका था.
रामनिवास :- हाँ तो खड़े क्यों हो दरवाजे पे, बोल दो अपनी भाभी को?
रतिवती ये सब बाते अंदर सुन रही थी वो अभी भी थोड़ी देर पहले हुए किस्से को अपने जेहन से निकाल नहीं पा रही थी. हे राम मै भी कैसी अंधी पागल हूँ जो ब्रा पेटीकोट मे ही दरवाजा खोल दिया, क्या सोचा होगा मेरे बारे मे?
तभी बाहर से रामनिवास कि आवाज़ अति है अरी भाग्यवन दरवाजा तो खोल दो, देखो कल्लूराम आया है सब्जी चख लो, वरना बाद मे मुझे ही बोलोगी कि कैसा हलवाई ले आया.
हुँह.... मै चलता हूँ कपडे पहन के बैठक कि तैयारी देख लेता हूँ.
ऐसा कह के रामनिवास वहाँ से चला जाता है.
कल्लूराम अब भी दरवाजे के बाहर सकपाकाया रतीवती का इंतज़ार कर रहा था.
रतिवती अब तक़ थोड़ा संभल चुकी थी...
Mast update bro 🤠🤠🤠
 

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अपडेट 7 contd....

रतीवती अपनी सांसे दुरुस्त करती है और तुरंत भाग के अपना ब्लाउज पहन लेती है इस गहमा गहमी मे पसीने से तर हो जाती है इतना पसीना आने मे कुछ हाथ थोड़ी देर पहले हुई घटना का भी था,
रतीवती पसीने मे भीगी सकपाकाहाट मे दरवाजे कि और बढ़ती है,एक अजीब उत्तेजना पुरे बदन को हिला रही थी.
रतीवती कापते हाथो से दरवाजा खोल देती है, कल्लूराम अभी भी बाहर मुँह खोले खड़ा था.
रतीवती को समझ नहीं आ रहा था कि वो हलवाई से कैसे कुछ बोले?
कल्लूराम अभी भी मूर्ति बने ही खड़ा था.
रतीवती को उसकी ये हालत देख के खुद पे घमंड होता है कि मेरे बदन मे आज भी वो बात है कि किसी मर्द को जडवत कर दू, हैरान कर दू.
काका ओ काका.... कहाँ खो गये ऐसा बोलते हुए रतीवती दरवाजे से बाहर हो के निकलती है, कल्लूराम ऐसे खड़ा था कि जगह ही नहीं थी, रतीवती निकलते वक़्त कल्लूराम से रगड़ जाती है.
इस रगड़ाहट से एक उत्तेजक चिंगारी निकलती है जो दोनों के ही शरीर को हिला देती है.
उत्तेजना का करंट लगने से हलवाई होश मे आता है और पहले से ही खड़े लंड को सँभालने के लिए उसे हाथ से दबाता है.
रतीवती उसे ऐसा करते देख लेती है, लेकिन बिना कुछ बोले पलट के आगे आगे चलने लगती है जहाँ खाना बन रहा था, रतीवती चलते हुए मुस्कुरा रही थी
मन मे "कैसे काका अपना लंड दबा रहे थे, क्या मै अभी भी सुन्दर हूँ?"

इतना सोचना था कि रतीवती कि चाल मे अचानक परिवर्तन आ गया अब वो और ज्यादा अपनी बड़ी गांड मटकाये जा रही थी.
जिसे पीछे पीछे आता कल्लूराम एक टक देख रहा था, जब गांड दाये जाती तो कल्लूराम का सर भी दाये जाता, और जब गांड बाएं जाती तो सर भी बाएं को झुकता.
ऐसा लगता था जैसे रातीवती कि गांड मे कोई रिमोट फिट है जो कल्लूराम कि गर्दन को हिला रहा है.
रतीवती समझ चुकी थी कि बुड्ढा हलवाई उसका दीवाना हो गया है.
तभी रतीवती एक दम से पीछे गर्दन घुमा के बड़ी अदा से बुड्ढे हलवाई को देखती है, समझ जाती है कि वो उसकी लचकती गांड को ही घूर रहा है
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उसे भी मजा आ रहा था उसे अपना बदन दिखाने मे, अब जिसे मेरी बदन कि कद्र है उसे तो सुख दे ही सकती हूँ थोड़ा वो ऐसा सिर्फ खुद को दिलासा देने के लिए सोच रही थी जबकि असल मे कल्लूराम के दीवानेपन और उसकी हरकतों कि वजह से उसके शरीर गर्म हो रहा था, गर्म हो भी क्यों ना उसका शराबी पती तो उसकी तरफ देखता तक़ नहीं था तारीफ और प्यार क्या खाक करता और स्वभाव तो था ही चंचल
खाने का पंडाल आ चूका था,
रतिवती :-चखाइये ना काका, क्या चखा रहे थे? बड़ी अदा के साथ वापस पीछे हलवाई कि तरफ घूम जाती है.
कल्लूराम :- वो मै मै..... वो मै.. बबबब.... क्या था मै.
रातीवती हॅस पड़ती है, काका क्या बात है ऐसे हकला क्यों रहे है.
हलवाई हसती हुई रतीवती को देखता ही रह जाता है, क्या खूबसूरत है बीबी ज़ी ऐसी खूबरत तो दूर दूर के गांव मे भी नहीं होंगी.
तभी कही से एक हवा का झोंका आता है और रतीवती का पल्लू सरक जाता है,
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रतीवती ने जल्दबाज़ी मे साड़ी अच्छे से नहीं पहनी थी और ना ही ब्लाउज के पुरे बटन लगाए थे.
हलवाई फिर से ये नजारा घूरता ही रह जाता है, उतने मे ही रतीवती साड़ी संभल लेती है यदि आज साड़ी सँभालने मे थोड़ी से भी देर हुई होती तो पक्का बुड्ढे हलवाई को दिल का दौरा पड़ जाता.
कल्लूराम :- कितनी.... कितनी.. बबबब... मै... क्या... कितनी सुन्दर हो बीबी ज़ी आप, पता नहीं किस आवेश या उत्तेजना मे वह ये बात कह गया.
रतीवती अपनी तारीफ सुन के शर्म से अपना सर नीचे चूका लेती है तभी उसकी नजरें अपने ब्लाउज पे पड़ती है ऊपर के दो बटन खुले हुए थे तो क्या काका ने मेरे स्तन फिर से देख लिए.
क्या हो रहा है मेरे साथ ये सुबह से उफ्फ्फ्फ़.....
ऐसा सोच के वो जल्दी से अपनी साड़ी से स्तन के ऊपरी हिस्से को ढक के नार्मल होने कि कोशिश करती है.
रतीवती :- क्या कह रहे थे काका आप? उसकी आवाज़ ने एक कंपकपी थी मदहोशी से आवाज़ थोड़ी अटक रही थी.
रतीवती को नाराज ना होता देख कल्लूराम मे थोड़ी हिम्मत आति है
कल्लूराम:- वो बीबी ज़ी आप कितनी सुन्दर है.इस बार हलवाई ने बिना अटके ही बोल दिया था रतीवती कि मुस्कुराहट से उसमे आत्मविश्वास आ गया था.
रतीवती :- क्या काका आप भी अब तो मै बूढ़ी हो चली हूँ, देखो अब तो मेरी बेटी कि भी शादी होने वाली है.
कल्लूराम :- अजी छोड़िये क्यों मुँह खुलवाती है मेरा? कौन कहता है आप बूढ़ी हो गई है.
भगवान कसम आप तो आज भी जवान लड़कियों को फ़ैल कर दे, क्या जवानी है आपकी. साक्षात् रती देवी का अवतार है आप.
ऐसा बोल के हलवाई अपने खड़े लंड को मसल देता है.
रतीवती अपनी ऐसी तारीफ सुन के उत्तेजित होने लगती है ऊपर से वो हलवाई को अपना लंड सहलाते देख लेती है.
दबी हुई वासना हिलोरे मारने लगी थी, सांसे थोड़ी तेज़ हो चली थी इसका सबूत रतीवती के ऊपर नीचे होते गोरे बड़े स्तन दे रहे थे.
आअह्ह्ह l...हलवाई के मुँह से ऊपर नीचे होते स्तन देख के आह्हःम... निकल जाती है, जिसे रतीवती सुन नहीं पाती.
रतीवती :- चलिए छोड़िये ये सब बाते, अब इस सुंदरता कि कोई कदर नहीं, आप तो चखाइये क्या चखा रहे थे?क्या किस्मत है रतीवती कि पति ध्यान देता नहीं और यहाँ बुढ़ा मरा जा रहा है उसके लिए.
वाह री किस्मत....
कल्लूराम :- हाँ आइये बीवी ज़ी, ऐसा बोल के पंडाल के पीछे जाने लगता है,
जहाँ एक बड़ा सा भगोना रखा था जिसमे सब्जी बनी हुई थी, हलवाई उसका ढक्कन खोल देता है और थोड़ा सा पीछे हटता है.
कल्लूराम :- लो बीवी ज़ी देख लीजिये.
रतीवती जा के कलकुराम के आगे खड़े हो जाती है और भागोने पे झुकने लगती है, सब्जी कि खुशबू लेने के लिए

ऐसा करने से उसकी गांड बाहर को निकल जाती है, उसके झुकने से गांड पीछे जाती हुई किसी सख्त लम्बी चीज से टकराती है.
अब ऐसा रतीवती ने जान बुझ के किया था या खुद से हो गया कह नहीं सकते.
वो सख्त चीज हलवाई का लोड़ा था जो कि ऐसी हाहाकारी मदमस्त गांड देख के तनतना गया था.
उसका बूढ़ा लंड कभी भी वीर्य कि बौछार कर सकता था, बूढ़े के लंड ने आज कितने सालो बाद अंगड़ाई ली थी.
रतीवती सब्जी कि खुशबू लेती है और जानबूझ के अपनी गांड थोड़ा पीछे धकेल देती है, बिल्कुल कल्लूराम कि धोती से चिपक जाती है.
कल्लूराम का लंड तनतनाया रतीवती कि गांड कि दरार मे साड़ी के ऊपर से ही दब जाता है.
अब बुढ़ा मरा लगता है...
रतीवती खुशबू के के वॉयस खड़ी होने लगती है और बहाने से अपनी गांड दो बार हलवाई के लंड पे ऊपर नीचे घिस देती है...
हलवाई चीख पड़ता है. आआआहहहहह..... आअह्ह्ह....
पीच पीच पीछाक... हलवाई धोती मे ही स्सखलित ही चूका था और पीछे पड़ी कुर्सी पे ढेर हो जाता है लगता था जैसे किसी ने प्राण ही खींच लिए हो कल्लूराम के.
रतीवती:- सब्जी कि खुशबू तो अच्छी है, ऐसा बोल के जैसे ही पीछे देखती है हलवाई पीछे कुर्सी पे ढेर पड़ा था.
बुड्ढा कहाँ रतीवती जैसे गरम कामुक औरत को संभल पाता, साड़ी के ऊपर से ही गांड कि गर्मी ना झेल सका.
उतने मे ही रामनिवास कि आवाज़ आती है "अरी भगवान सब्जी चखी नहीं क्या अभी तक़? जल्दी करो ठाकुर साहेब का आने का टाइम हो ही गया है "
रतीवती आई कम्मो के बापू, रतीवती हलवाई को वैसे ही मुर्दा अवस्था मे छोड़ के निकल पड़ती है.
रामनिवास :- कैसी बनी सब्जी?
रतीवती :- सब्जी चखती उस से पहले ही चखाने वाला ढह गया.
और मंद मंद मुस्कुरा देती है.
रामनिवास बैल बुद्धि को कुछ समझ नहीं आता.
रामनिवास :- अच्छा चलो तैयार हो लो तुम भी जल्दी से और देखो कि कामवती तैयार हुई या नहीं?
रतीवती अपने कमरे मे चल पड़ती है.
अब उसकी चाल से मादकता झलक रही थी बुड्ढा खुद तो ढेर हो गया था परन्तु रतीवती कि जिस्म मे आग लगा गया था काम कि आग.....
कहानी जारी है
Nice update
 

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चैप्टर -1, ठाकुर कि शादी, अपडेट -8

गांव कामगंज
ठाकुर ज़ालिम सिंह रामनिवास के घर पहुंच चुके थे, रामनिवास और गांव वालो ने बड़े धूमधाम से स्वागत किया,
रामनिवास :- धन्य भाग हमारे, आईये ठाकुर साहेब आइये.
अंदर आइये
ठाकुर और डॉ. असलम को अंदर बैठक मे बैठा दिया गया, सभी का अभिवादन का दौर चला

गाड़िवान ने सारे अनाज फल वगैरह गांव वालो कि मदद से अंदर रखवा दिए.
ठाकुर साहेब रामनिवास कि खातिरदारी से अतिप्रश्नन और प्रभावित हुए.
परन्तु इन सब मे ठाकुर साहेब कि नजरें किसी को ढूंढ रही थी, वो कामवती को देख लेना चाहते थे क्युकी जो तारीफ, जो कामवती कि सुंदरता का बखान उन्होंने सुना था उस वजह से वो अतिउत्सुक नजर आ रहे थे.
बार बार बात करते हुए पहलु बदल रहे थे.
उनकी बेचैनी को डॉ. असलम अच्छे से समझ रहे थे.
रामनिवास :- अरी भाग्यवान... अरी भाग्यवन भई जल्दी लाओ नाश्ता पानी ठाकुर साहेब दूर से आये है थके होंगे.
थोड़ी देर बाद रतिवती सजी धजी बलखाती, छनछनाती हुई हाथ मे पानी और नाश्ते कि प्लेट ले के आई.
और झुकते हुए टेबल पे रख के सभी को हाथ जोड़ के नमस्कार किया.
रामनिवास :- ठाकुर साहेब ये मेरी धर्मपत्नी है सभी तैयारी इन्होने ही कि है.
ठाकुर साहेब औपचारिक तौर पे अभिवादन करते है, और रतिवती को सुंदरता से प्रभावित होते हुए सोचते है जब माँ इतनी सुन्दर है तो बेटी कितनी सुन्दर होंगी?
रतीवती नमस्कार करती डॉ. असलम के सामने अति है तो उनका काला भद्दा रूप देख के थोड़ा चौक जाती है और चौकने से पल्लू थोड़ा खिसक जाता है, असलम इस बात को भाप जाते है और शर्मिदा होके जैसे ही नजर नीचे करने वाले होते है कि उनकी नजर रतीवती के स्तन मे बनती घाटियों मे पड़ती है.
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इतने गोरे, इतने बड़े स्तन आज टक नहीं देखे, आह्ह.... कितने कोमल दिख रहे है.
रतीवती तब तक सीधी हो चुकी थी और संभल चुकी थी.
ठाकुर साहेब :- रामनिवास ये मेरे अजीज दोस्त, सलाहकार सब यही है डॉ. असलम.
पेशे से डॉक्टर है.
रतीवती असलम को ही देखे जा रही थी कि कहाँ ठाकुर साहेब लम्बे चोडे रोबदार, कहाँ उनका दोस्त डॉ. असलम
नाटा, काला बेहद कुरूप.
थोड़ी देर इधर उधर कि बात करते हुए रतीवती कमरे से बाहर निकल जाती है.
डॉ असलम जाती हुई रतीवती कि मटकती, उछाल भरती मदमस्त गांड को घूरते रहते है.
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और सबसे नजर बचा के अपने बड़े लंड कों थोड़ा एडजस्ट करते है ताकि कोई देख ना ले.
लेकिन उन्हें पता था कि उनकी किस्मत का कि किस कदर ख़राब है, उनका रूप ही ऐसा था कि लड़की औरते डर जाती थी पास आने का तो सवाल ही नहीं था.
उनकी किस्मत मे ऐसी मटकती गांड देख के लंड हिलना ही था.
या शायद नहीं...? ये तो वक़्त बताएगा
रतीवती :- अरी नालायको कामिनीयों अभी टक मेरी बेटी को तैयार किया या नहीं? ठाकुर साहेब कब के आ गये है.

बोलते हुए कामवती के कमरे मे चल पड़ती है.
अंदर घुसते ही उसकी नजर जैसे ही अपनी बेटी पे पड़ती है दंग रह जाती है क्या सुन्दर लग रही थी कामवती एक दम अप्सरा.
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रतीवती :- हाय री मेरी बच्ची तू तो पूरी जवान हो गई है, मैंने तो कभी ध्यान दिया ही नहीं. तुझे देख के तो ठाकुर साहेब तुरंत हाँ बोल देंगे. काजल का एक टिका लगा देती है नजर ना लगे मेरी कम्मो को किसी कि.
अच्छा सुन ठाकुर साहेब के सामने नजर झुका के बात करना, जो बोले उसका जवाब हाँ ना मे देना.
ऐसा सब समझाती जा रही थी.
अब कामवती ठहरी बिल्कुल अनाड़ी अबोध हाँ हाँ मे सर हिलती रही.
अब वक़्त आ चूका था कि ठाकुर साहेब को बेचैनी का अंत हो.
रातीवती सब समझा के कामवती को ले के चल पड़ती है.
रामनिवास :- आओ कम्मो बेटी... ठाकुर साहेब ये है मेरी एकलौती बेटी
कमरे मे सन्नाटा छा जाता है, एक मस्त कर देने वाली खुशबू ठाकुर साहेब के नाथूनो से आ के टकराती है.
ठाकुर साहेब एकटक कामवती को देखते हि रह जाते है.
ऐसी काया ऐसा सुन्दर पन ऐसी अप्सरा देखि ही नहीं आज तक़.
कामवती लाल लहंगे मे बिल्कुल स्वर्ग से उरती परी लग रही थी.
सुन्दर चेहरा, बड़ी आंखे, गुलाबी होंठ, नीचे सुराहीदार गर्दन.
गर्दन से नीचे उतरते रास्ते पर दो चमकिले उभर लिए हुए पहाड़ जो कि जबरजस्ती चोली मे कैसे हुए प्रतीत होते थे.
पहाड़ो के नीचे सपाट पेट, पेट पे खुशबूदार गहरी गोल नाभि.
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वाह वाह .. ठाकुर साहेब हक्के बक्के एक टक देखे जा रहे थे.
और इधर असलम रतीवती को तिरछी आँखों से देखे जा रहा था
डॉ. असलम :- माँ बेटी दोनों ही अप्सरा है, अल्लाह ने खुल्ले हाथ से यौवन का खजाना बाटा है.
ठाकुर साहेब कि तो लॉटरी लग गई.
या अल्लाह इस बहती गंगा मे मुझे भी नहला दे.
अब असलम को क्या पता था कि अल्लाह ने उसकी दुआ कबूल कर ली है.
रामनिवास :- ठाकुर साहेब ये मेरी बेटी है कामवती, ठाकुर साहेब... ठाकुर साहेब

आप कुछ पूछना चाहे तो पूछ सकते है?
ठाकुर ज़ालिम सिंह अपनी दुनिया से लौटता है.
ठाकुर :- वो वो... मै मै... बबब... बबब... कुछ नहीं रामनिवास मुझे कुछ नहीं पूछना.
ठाकुर साहेब कामवती कि सुंदरता के आगे कांप गये थे, जो बोलना था कुछ बोल ना सके.
रामनिवास :- कैसे लगी आपको हमारी बिटिया रानी?
ठाकुर :- बहुत सुन्दर सुशील है रामनिवास हमें खुशी होंगी कि कामवती हमारी हवेली कि शोभा बढाये.
हमें ये रिश्ता मंजूर है. ठाकुर साहेब इस रिश्ते को कबूल करने मे थोड़ी भी देर नहीं करना चाहते थे.
जबकि कामवती भी ठाकुर ज़ालिम सिंह के रोबदार चेहरे से प्रभावित हुई.
अब उसे तो अपनी माँ बाप कि इच्छा से ही मतलब था उन्होंने जहाँ बोला शादी करनी ही थी सब करते है वो भी कर रही थी और कोई विशेष नहीं था कामवती के दिल मे.
बहुत भोली है हमारी कामवती.
रामनिवास और रतीवती ठाकुर का कबूलनामा सुन के उछल पड़े.
रामनिवास :- धन्यवाद ठाकुर साहेब धन्यवाद आपकी बहुत कृपा हुई हम पे
ठाकुर :- कृपा कैसे रामनिवास आपकी बेटी है ही इतनी सुन्दर कि कैसे मना करते, कामवती तो हमारी हवेली कि शान बनेगी, हमारे वंश को आगे बढ़ायेगी.
इतना सुन कर कामवती शर्मा के कमरे से बाहर चली जाती है.
रतीवती मन मे :- वाह री किस्मत मेरी बेटी बहुत किस्मत वाली है अब हमारे पास भी पैसा होगा, मेरी बेटी इतनी बड़ी हवेली जमीन जायदाद कि मालकिन बनेगी वाह.
मै खाने पिने कि तैयारी करवाती हूँ.
रतीवती भी कामवती के पीछे कमरे से बाहर चली जाती है.
रतीवती के जाने से असलम का ध्यान टूटता है तब जाके उसे मालूम पड़ता है कि यहाँ क्या हो गया है, ठाकुर साहेब ने तुरंत रिश्ता कबूल कर लिया है, कामवती को पसंद कर लिया है.
रामनिवास असलम और ठाकुर साहेब को मिठाई खिलता है.
तभी कमरे मे गांव का पंडित आता है.
और शादी कि तारीख तय होबे लगती है.
पंडित :- देखिये ठाकुर साहेब आज से 6दिन बाद मतलब कि अगले मंगलवार को बहुत शुभ मुहर्त है शादी का.
उसके बाद सब अशुभ है, उसी दिन लड़की इस घर से विदा हो जानी चाहिए एक पल के भी देर हू तो संकट आ सकता है.
रामनिवस :- पंडित ज़ी ये क्या कह रहे है आप इतनी जल्दी कैसे होगा सब?
ठाकुर :- रामनिवास आप चिंता ना करे सब मै संभल लूंगा.पंडित ज़ी शादी और विदाई मे बिल्कुल विलम्ब नहीं होगा.
सब समय पे ही होगा.
तो तय हो चूका था कि शादी अगले मंगलवार को ही होंगी.
अब खाने पिने का दौर शुरू हो चूका था,
खाना पीना कर के थोड़ा आराम कर के ठाकुर साहेब " अच्छा रामनिवास हमें चलना चाहिए शादी कि तैयारी भी करनी है "
इतना कहना था कि आसमान मे एका एक बदल गरज उठते है बिजली चमक पड़ती है.
रामनिवास :- अरे ये क्या मौसम कैसे बदल गया यकायक, ठाकुर साहेब आप से विनती है कि आज रात यही रूक जाइये.
लगता है जोरदार तूफान आने को है.
ठाकुर साहेब रुकना तो नहीं चाहते थे परन्तु ख़राब मौसम और कामवती कि लालसा मे रूकने का फैसला किया.
इधर असलम भी ख़ुश था कि रतीवती को थोड़ा और ताड़ लेगा.

उधार गांव विषरूप मे भी मौसम ने करवट बदल ली थी
भूरी काकी बड़ी से हवेली मे अकेली थी, सभी नौकर चकर जा चुके थे
शाम हो चुकी थीं, रात के वक़्त हवेली मे भूरी काकी और तीनो जमुरे ही होते थे.
बारिश होने लगी थी, तूफान जोरदार चल रहा था.
भूरी काकी पे भी इस मौसम से अछूती नहीं थी, ये भीगा भीगा मौसम उनकी पैंटी को रह रह के भिगो रहा था.

भूरी अपने कमरे मे बिस्तर पे लेती बेचैनी के साथ करवट बदल रही थी. अकेलापन और मौसम कि मार से उनका बदन जल रहा था, सुलग रहा था..
अब ये तूफान क्या गुल खिलायेगा...?
शादी तो होंगी ना?
पंडित किस संकट कि बात कर रहा था?
बने रहिये कथा जारी है
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गांव कामगंज मे रामनिवास ठाकुर और डॉ. असलम के सोने कि तैयारी कर चूका था. दोनों को बाहर वाले कमरे मे सोने को बोल दिया गया था.
बाहर तूफान जोरो पे था मौसम बिल्कुल ठंडा हो चूका था, मौसम ऐसा रुमानी था कि बुड्ढ़ो के लंड भी खड़ा कर दे.
ठाकुर साहेब तो अपने आने वाले हसीन दिनों के बारे मे सोच सोच के सो गये थे.
उनके सपने मे भी कामवती ही थी जो उनका वंश बढ़ा रही थी पुरे चार लड़के पैदा किये थे कामवती ने.
लेकिन हक़ीक़त तो ये है कि चार क्या एक मच्छर भी पैदा नहीं कर सकते ठाकुर साहेब अपने 3 इंच कि लुल्ली से.
डॉ. असलम भी सोने कि कोशिश कर रहे थे लेकिन बार बार उनके जहन मे रतीवती का झुक के नमस्कार करने वालादृश्य चल रहा था,
क्या गोरे गोरे बड़े स्तन थे, कितना रस भरा था उनमे.

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दिन कि सभी बाते सोच सोच के असलम अपना लंड मसले जा रहे थे ऊपर से रूहानी मौसम कि मार... लंड पूरा खड़ा हो चूका था इतना कड़क कि दर्द देने लगा था.
ठाकुर साहेब बाजु मे लेटे थे तो हिला भी नहीं सकता था. अजीब दुविधा और कामोंउत्तेजना से घिरे थे डॉ असलम.
डॉ. असलम :- ऐसे तो मेरा लंड फट ही जायेगा, थोड़ा बाहर टहल लेता हूँ ध्यान हटे मेरा इन सब पे से वैसे भी में किस्मत कहाँ कि औरत का सुख मिले.
असलम निराश मन से बाहर को निकल पड़ते है.
दूसरे कमरे मे रतीवतीं रामनिवास के साथ लेटी थी,वो आज सुबह से ही गरम थी, ये आग बुड्ढे हलवाई ने लगाई थी लेकिन वो ये आज बुझाता उस से पहले ही खुद बुझ गया.
आज इस खुशी के मौके पे रामनिवास ज्यादा शराब पी आया था और रतीवती के बगल मे ओंधा पड़ा खर्राटे मार रहा था.
रतीवती :- इस हरामी को शराब पिने से ही फुर्सत नहीं है मै यहाँ मरे जा रही हूँ.
रतीवती अपना ब्लाउज उतार देती है और अपने बड़े गोरे स्तन से खेलने लगती है, उसकी आग उसे जला रही थी... अपने दोनों हाथो से अपने दोनों स्तनों को पकड़ के दबा रही थी, मसल रही थी, नोच रही थी... जैसे आज नोच के शरीर से अलग ही कर देगी.
आअह्ह्ह..... आह्हः.... निप्पल को अपनी ऊँगली से पकड़ पकड़ के खींच रही थी आज दिन मे हुए हलवाई के किस्से और बाहर होती बारिश मे गजब कि हवस पैदा कर दिया था रतीवती के कामुक जिस्म मे.
इसी मदहोशी मे वो एक बार मे ही अपनी साड़ी, पेटीकोट निकाल फेंकती है अब ये गर्मी बर्दाश्त के बाहर हो चुकी थी
अपना एक हाथ अपनी मखमली चुत पे रख देती है और जोर जोर से मसलने लगती है आअह्ह्हम.. आह्हः...
परन्तु आज मसलने रगड़ने मे वो मजा नहीं आ रहा था....उसे लंड चाहिए था जो उसकी चुत और गांड फाड़ दे.
जिस्म कि आग है ही ऐसी चीज.... ये जिस्म कि आग तो कही और भी लगी हुई थी

गांव विषरूप, ठाकुर कि हवेली
भूरी काकी अकेली तन्हा हवस कि आग मे तड़पे जा रही थी, बैचैनी से करवट बदल रही थी.
भले भूरी काकी कि उम्र 50 साल थी लेकिन उसे पिछले 30 सालो से किसी मर्द का अहसाह नहीं हुआ था.
वो तड़पती थी तरसती थी लेकिन शर्माहत और इज़्ज़त के कारण कुछ कर नहीं पाती थी बस कभी जब उत्तेजना ज्यादा बढ़ जाती तो बेंगन, लोकि बेलन चुत मे डाल के काम चला लेती थी.
इसी उत्तेजना मे वो अपना ब्लाउज खोल फेंकती है, दोनों बड़े और टाइट स्तन उछल के बाहरआ जाते है

जैसे ही स्तनों पे थोड़ी हवा पड़ती है, निप्पल खड़े हो के तन जाते है और सलामी देने लगते है. भूरी अपने निप्पल को पकड़ के जोर से मरोड़ देती है.
आह्हः.... आआआआहहहहह..
आज तो उतत्तेजना अपने चरम पे थी, ऐसी उत्तेजना उसने आज तक़ कभी महसूस नहीं कि.
लगता था आज मर ही जाएगी उत्तेजना से.
ऐसे रूहानी मौसम मे भी भूरी पसीने से भीगी हुई थी सांसे तेज़ तेज़ चल रही थी.
अब बर्दाश्त के बाहर था भूरी तुरंत उठती है और रसोई कि तरफ भागती है जहाँ कुछ लोकि बैंगन मिल जाये.
परन्तु हाये री फूटी किस्मत आज रसोई मे ऐसा कुछ नहीं था जिसे चुत मे डाल के प्यास बुझाई जा सके.
बाहर बगीची मे लोकि, तरोई, बैगन उगे हुए थे, लेकिन जोरदार बारिश हो रही थी कैसे जाये बाहर... क्या करे ये चुत जीने नहीं देगी.
खूब पानी छोड़े जा रही थी... भूरी पागल हुए जा रही थी.
भूरी निर्णय ले लेती है और हवेली का दरवाजा खोल अर्द्धनंग अवस्था मे ही बाहर लोकि तोड़ने निकल पड़ती है उसे कोई सुध बुध नहीं थी, थी तो सिर्फ हवस जो कि उस कि जान लेने पे उतारू थी.
हवेली के दरवाजे के बाहर बगीची थी, बगीची के आगे बरामदा था उसके आगे मुख्य दरवाजे से लग के एक झोपडी नुमा कमरा था जो कि कालू, बिल्लू और रामु का था वही रह के तीनो हवेली कि सुरक्षा करते थे.
परन्तु आज ठाकुर साहेब हवेली मे नहीं थे तो तीनो मौज मे थे कोई डांटने वाला नहीं कोई रोक टॉक नहीं.

बिल्लू :- यार एक एक बॉटल दारू और हो जाये तो ऐसे मौसम मे मजा आ जाये, साला क्या मौसम बना है आज ऊपर से ठाकुर साहेब भी नहीं है जम के पीते है, क्यों भाई लोग?
कालू, रामु भी बिल्लू कि बात से सहमत थे,
कालू :- ठीक है बिल्लू हम लोग दारू और साथ मे कुछ खाने को लाते है तू तब तक़ नजर रख हवेली पे.
ऐसा बोल के कालू रामु निकल जाते है दारू लेने.
इधर भूरी काकी हवस के उन्माद मे भागी भागी लोकि तोड़ने का रही थी, अपने स्तन को उछालती हुई, सिर्फ पेटीकोट मे ऊपर से बिल्कुल नंगी, मस्त सुडोल बड़े स्तन उछल रहे थे ऊपर नीचे
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तभी अचानक उसका पैर फिसलता है और धड़ाम से पीठ के बल गिर पड़ती है और जमीन पे जोरदार टकराती है.
आअह्ह्ह आआहहहह...... चीख के साथ बेहोश हो जाती है.


गांव कामगंज मे रामनिवास के घर पे भी हवस छाई हुई थी
रतीवती पूर्ण रूप से नंगी हो चुकी थी, बस मंगल सूत्र, माथे पे बिंदी, हाथों मे मेहंदी और मांग मे सिंदूर ही बचा था.
वो अपनी चुत रगड़े जा रही थी, पूरी चुत पानी से पच पच कर रही थी चुत से पानी निकल निकल के नीचे गांड के रास्ते होता हुआ बिस्तर को भिगो रहा था. चुत मे ऊँगली करते हुए चूडियो कि छन छानहत गूंज रही थी, ये छन छानहत माहौल मे मादकता घोल रही थी, खुद कि चूडियो का मधुर संगीत सुन के रतीवती हवस के सातवे आसमान पे पहुंच चुकी थी,उसे लंड चाहिए था किसी भी कीमत पे..
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वो अपना एक हाथ रामनिवास कि धोती पे रख उसका लंड टटोलने लगती है परन्तु लंड का कोई नामोनिशान नहीं
रतीवती उसकी धोती खोल देती है शायद कोई उम्मीद हो शायद लंड खड़ा हो जाये.
धोती हटा के देखती है तो मरा हुआ चूहा दीखता है जो अब कभी जिन्दा नहीं होगा.
रतीवती बहुत ज्यादा निराश हो जाती है, उसकी किस्मत मे ही यही था... शायद भगवान ने उसकी जिंदगी मे सम्भोग लिखा ही नहीं था.
उसकी उत्तेजना वापस से दब जाती है या यु कहिये वो अपनी इच्छा अपनी हवस को किस्मत का लेखा समझ के दबा लेती है.अपनी उत्तेजना को कम करने के लिए वो मूतना चाहती थी परन्तु बाहर बारिश हो रही थी.
रतीवती :- बाहर बारिश हो रही है, घर के पीछे ही चली जाती हूँ वैसे भी इस तूफानी बरसाती रात मे कौन जग रहा होगा, उसके कमरे से ही पीछे का रास्ता था जिसे खोल के वो नंगी ही मूतने निकल पड़ती है.
क्युकी बाहर तो कौन होगा.
क्या कोई होगा?
Khubsurat update bro 🤠🤠🤠
 

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विषरूप, ठाकुर कि हवेली मे... भूरी मदहोशी, हवस मे भरी स्तन उछालती भागे जा रही थी. और गिर पड़ी.
धमममममम...... और किसी कि चीखने कि आवाज़ गूंज उठी
ये आवाज़ झोपडीनुमा कमरे मे बैठे बिल्लू तक़ भी पहुंची उसके कान खड़े हो गये. उसे लगा जैसे कोई चोर उच्चका हवेली मे घुस आया है , वाह फ़ौरन अपनी लाठी उठा के आवाज़ कि दिशा मे भागा.. उसे दूर से ही कोई ज़मीन पे चित लेता हुआ दिखाई दिया.दौड़ के वो इस आकृती के पास पंहुचा, तभी बिजली जोर से चमकी और जो उसे दिखाई दिया उस चीज ने उसके रोंगटे खड़े कर दिए, ऐसा आदमय नजारा उसने कभी देखा ही नहीं था.
नीचे भूरी गिरी पड़ी थी बिल्कुल चित बारिश मे भीगी हुई, एक बार तो वो उसे एकटक देखता ही रह गया इतनी गोरी, सुडोल वक्ष स्थल एक दम गोल, कही कोई लचक नहीं सपाट पेट, बीच मे पतली से नाभि.
उसके नीचे पेटीकोट भीग के बिल्कुल कमर से चिपक गया था, थोड़ी नीचे नजर पड़ते ही उसके होश ही उड़ गये.
वो बूत बना खड़ा बराबर उस उभरी जगह को देखने लगा, भूरी का पेटीकोट उसकी चुत से भीगे होने के कारण बिल्कुल चिपक गया था, चुत भी ऐसी कि क्या कहने बिल्कुल उभरी हुई जैसे किसी ने समोसा रख दिया हो.
ऐसा नजर ऐसा कामुक बदन बिल्लू क्या उसके पुरखो ने भी कभी नहीं देखा होगा,दुनिया पता नहीं क्यों भूरी को काकी काकी कहती है.
बिल्लू बेसुध भूरी के हुस्न का दीदार कर रहा था बारिश मे भीगता हुआ, तभी नीचे पड़ी भूरी कि एक हलकी से आह निकली, थोड़ा हिली.
उसके हिलता देख बिल्लू जड़ अवस्था से बाहर आया और तुरंत भूरी को अपनी बलिष्ट बाहो मे उठा लिया, भूरी को उठाने से उसके भीगे स्तन बिल्लू कि छाती से चिपक गये, बिल्लू का एक हाथ भरी कि बड़ी गद्देदार गांड पे था.
भूरी के शरीर से निकलती खुशबू और गर्मी बिल्लू के बदन मे आने लगी और उसका लंड तन तनाने लगा जो कि भूरी कि कमर मे धसा जा रहा था, भूरी बेसुध बिल्लू कि बाहों मे झूली पड़ी थी.
बिल्लू भूरी को ले के अपने कमरे कि और चल पड़ता है, कमरे मे रखे बड़े से पलंग पे लिटा देता है, ये पलंग बहुत बड़ा था क्युकी तीनो लोग इसी पे सोते थे इसलिए ठाकुर साहेब ने बड़ा पलंग बनवा के दिया था.
बिल्लू भूरी को लेटाने के बाद भी उसके मखमली बदन को घूरे जाता है, सांस लेने कि वजह से भूरी के सुडोल स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे,
ऐसा नजारा बिल्लू का दिल रोक सकता था उसका लंड फटने पे आतुर था. क्या करे क्या ना करे कुछ समझ नहीं आ रहा था.
तभी धड़ाम से कमरे का दरवाजा खुलता है,
बिल्लू चौक के पीछे देखता है तो कालू रामु दो बॉटल और हाथ मे खाना लिए खड़े थे.
कालू रामु कभी बिल्लू को देखते कभी पीछे पलंग पे पड़ी भूरी काकी को. उनके समझ से सबकुछ बाहर था.
बिल्लू मूर्ति बने खड़ा था उसके तो इन सब मे होश उड़ गये थे...
कालू :- अबे बिल्लू ये सब क्या है? क्या किया तूने भूरी काकी के साथ?
रामु :- साले कही तूने इसे नशे मे मार तो नहीं दिया?
हरामी ठाकुर साहेब हमें जिन्दा नहीं छोड़ेंगे.
बिल्लू जस का तस खड़ा था.
रामु और कालू अंदर आ जाते है और दरवाजा बंद कर देते है.कालू उसका खड़ा लंड देख लेता है.
रामु :- बोल बे हरामी क्या किया तूने? कालू उसे झकझोरता है.
तब बिल्लू होश मे आता है. म..... मै.... मैंने......

मैंने..... मम... कुछ नहीं किया.
कालू :- साले पहले होश मे आ, हरामखोर
बिल्लू खुद को संभालता है और सारा वाक्य बयान कर देता है.
तब कालू और रामु भी भूरी के नजदीक आते है और देखते है दंग रह जाते है ये भूरी काकी है? अपनी भूरी काकी?
कपड़ो मे तो ऐसी नहीं लगती.
भूरी के सुडोल स्तन, उभरी हुई चुत देख के उन दोनों कि हालात भी बिल्लू जैसी हो जाती है.
कालू थोड़ा समझदार था उन तीनो मे.
कालू :- एक बात समझ नहीं अति ये साली इतनी रात को नंगी बाहर करने क्या आई थी?
बिल्लू :- साला मेरा तो दिमाग़ ही भंड हो गया है इसे देख के लोड़ा बैठने का नाम ही नहीं ले रहा.
पहले दारू पीते है फिर सोचते है.
कालू ने जल्दी से एक एक पग बनाया और तीनो एक ही सांस मे नीट पी गये.
गरमागरम दारू गले के नीचे गई तब जा के तीनो नार्मल हुए....
कालू :- मुझे तो लगता है ऐसे मौसम मे काकी को भी गर्मी चढ़ी होंगी तभी गर्मी उतरने बाहर आई.
रामु :- साले काकी तो मत बोल उसे, देख उसके दूध, उसकी चुत देखि है कभी ऐसी? किसी नई नवेली जवान लड़की को भी मात दे दे.
बिल्लू :- बात तो तुम दोनों कि सही है लेकिन अब करे क्या?
कालू :- करना क्या है चल इसकी गर्मी उतारते है.
Ramu- साले पागल हो गया है क्या? मरवाएगा इसने ठाकुर को बता दिया तो हम तीनो को मौत नसीब होंगी समझा.
कालू :- अरे कुछ नहीं होगा मै जो देख रहा हूँ वो तुम नहीं देख रहे, कालू कि आँखों मे हवस थी आखिर हो भी क्यों ना
इन तीनो ने पिछली बार कब चुत मारी थी इन्हे खुद नहीं पता...
अच्छा सुनो एक काम करते है.... जिसमे हमारी कोई गलती भी नहीं होंगी.

उधर गांव कामगंज ने डॉ. असलम बेचैन थे और कमरे के बाहर टहल रहे थे, परन्तु मौसम और ठंडी हवा ने उत्तेजना कम करने के बदले और बड़ा थी थी ऐसी उत्तेजना खुमारी पहले कभी नहीं चढ़ी थी असलम को, ये आग अब सहन से बाहर थी लंड अकडे अकडे दर्द देने लगा था.
डॉ. असलम आस पास नजर दौड़ाते है बरामदा खाली था किन्तु बारिश हो रही थी तभी बरामदे से लगी एक गली दिखती है जिसके अंत मे छज्जा था,
डॉ. असलम :- वो जगह ठीक लगती है, वहाँ अंधेरा भी है कोई देखेगा नहीं वही जा के हस्थमैथुन कर लेता हूँ थोड़ी शांति तो आये.
डॉ. असलम चल पड़ते है ये वही गली थी जिस से रतीवती का कमरा लगा हुआ था.
डॉ. असलम जल्दी से वहाँ पहुंच कर अपना पजामा पूरा नीचे सरका के लंड आज़ाद कर देते है, आज लंड फूल के कुप्पा हो गया था नसे फटने पे आतुर थी, एकदम कड़क था लंड.
इधर रतीवती भी दरवाजा खोल के जल्दी से बाहर निकलती है, बारिश हो रही थी तो वो जल्दी से मूत के भाग लेना चाहती थी.
रतीवती कमरे से पूर्ण नग्न ही बाहर निकल पड़ती है सिर्फ मंगलसूत्र और चुडिया अँधेर मे चमक रही थी वो अँधेर मे जल्दी से जा के गली के आगे अपनी बड़ी सी गांड फैला के मूतने बैठ जाती है.
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इन सब बातो से अनजान डॉ असलम आंख बंद करे ठीक रतीवती के पीछे अपना लंड जोर जोर से रगड़ रहे थे.
उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है, तभी उन के कान मे सूररररररर.... सुरररमररर.. कर के किसी सिटी कि आवाज़ पड़ती है. वो घबरा के आंखे खोलते है.
आंखे खोलते ही उनकी आंखे फटी कि फटी रह जाती है, शरीर का सारा खून लंड मे इकठ्ठा हो जाता है मुँह खुला का खुला रह जाता है, उनके सामने रतीवती कि बिजली मे चमकती सुन्दर चिकनी बड़ी गांड थी, सुररर कि आवाज़ के साथ हिल रही थी....आआआह्हःम्म... वाहहहह... उनके मुँह से ना चाहते हुए भी हवस भरी सिसकारी निकल पड़ती है.
जिसे सुन के रतीवती एकदम चौक जाती है, और खड़ी हो के तुरंत पीछे मूड जाती है.
उसकी चीख निकल जाती है डर से.... ये चीख बादल कि गर्ज़ीना मे दब जाती है. डर के मारे उसका मूत खड़े खड़े ही निकलने लगता है,
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रतीवती अभी पूरी तरह मूत भी नहीं पाई थी कि सिसकारी सुन के खड़ी हो गई थी.
डॉ. असलम एकटक खड़े खड़े पेशाब करती रतीवती कि चुत को घूरे जा रहे थे,
तभी बिजली जोरदार चमकती है डॉ. असलम का बदन उजाले से नहा जाता है जो कि अभी तक़ अँधेरे मे था,एक पल के उजाले मे रतीवती डॉ असलम को देखती है, फिर बिजली चमकती है इस बार रतीवती कि नजर सीधा डॉ. असलम के तूफानी काले मोटे लंड पे पड़ती है.
पहले से ही कामउत्तेजना मे जल रही रतीवती कि चुत लंड देखते ही फड़फड़ा जाती है उसका मूत बंद हो जाता है.
वापस से गर्मी हवस उसके शरीर को घेर लेटी है, ठंडी हवा से निप्पल खड़े हो के टाइट हो जाते है.
पता नहीं किस सम्मोहन मे बँधी वो छज्जे कि तरफ बढ़ जाती है, डॉ असलम स्तम्भ खड़े थे उन्हें समझ नहीं आ रहा था इतनी सुन्दर स्त्री, इतनी सुन्दर काया, उन्नत सुडोल स्तन, बिल्कुल चिकने मुलायल, सपाट पेट, जिसके बारे मे सपने मे भी नहीं सोचा था वो पूर्ण नंगी उनके सामने खड़ी है, अजी खड़ी क्या है ये तो पास चली आ रही है.
ना ना न..... ये तो सपना है हक़ीक़त नहीं हो सकता मेरी ऐसी किस्मत कहाँ.
अब तक़ रतीवती, डॉ असलम के बिल्कुल नजदीक पहुंच चुकी थी.
इतनी पास कि डॉ. असलम कि गरम गरम सांस अपने स्तनों पे महुसूस कर रही थी. डॉ असलम कि hight ही इतनी थी कि उनका मुँह रतीवती के स्तन के सामने थे, वो मुँह फाडे खड़े थे.
रतीवती ना जाने किस नशे मे थी कोई सम्मोहन तो जरूर था, हवस का सम्मोहन, बरसो से सम्भोग ना करने का सम्मोहन.
उसकी नजर सिर्फ डॉ. असलम के लंड पे थी इतना बढ़ा, कड़क लंड उसने कभी देखा ही नहीं था, वो कड़क लंड सीधा रतीवती कि फूली चुत पे टकरा जाता है.
दोनों के मुँह से सिसकारी फुट पड़ती है आहहहह.... बारिश के छींटे दोनों जिस्म को भीगा के ठंडा करने कि कोशिश कर रहे थे कि कही फट ना पड़े.
परन्तु बारिश का ये अहसान बेकार ही था उल्टा ये छींटे गर्मी बड़ा दे रहे थे.
जैसे गर्म तवे पे पानी के छींटे मार देने से तवा ठंडा नहीं हो जाता, तवा तैयार ही तब होता है जब उसपे पानी के ठन्डे छींटे मारे जाये.
वही हाल रतीवती का था वो अपने आपे मे नहीं थी, देखते ही देखते वो असलम के लंड को अपने एक हाथ से पकड़ लेती है, लंड पकड़ते ही उसकी चुत टप टप कर के टपकने लगती है, इतनी गर्मी थी चुत मे कि पानी सीधा भाँप बन के उड़ता प्रतीत होता था..
रतीवती कामुत्तेजना मे घुटनो के बल बैठ जाती है, और असलम के कड़क लम्बे मोटे लंड को टटोल टटोल के देखने लगती है वो निश्चित कर लेना चाहती थी कि ये चीज लंड हि है ना..
दोनों मे से कोई कुछ बोल नहीं रहा था.... या शायद उनके कंठ जाम हो गये थे, भरी बरसात मे गला सुख गया था.
डॉ. असलम मन्त्रमुग्ध खड़े थे बस रतीवती कि हरकत देखे जा रहे थे.
रतीवती अपनी नाक पास ला के लंड को सुघटी है.... मम..... आआआहहहह... पूरी सांस खींच लेती है अंदर तक़
लंड कि खुशबू से रतीवती झंझना जाती है. उसकी जीभ स्वतः ही बाहर निकलती है, जीभ कि नौक से लंड के ऊपरी हिस्से को हलके से चाट लेती है...
डॉ. असलम काँप जाते है उनके लंड को पहली बार किसी औरत ने हाथ लगाया था हाथ क्या यहाँ तो जीभ भी लगाई थी..वो भी कोई ऐरी गैरी औरत नहीं साक्षात् स्वर्ग कि अप्सरा के समान रतीवती उनका लंड पकड़े बैठी थी
पहली बार के इस अहसास को वो अपने अंदर समेट लेना चाहते थे.
अब जो होना है होने दिया जाये.... ये सोच के डॉ. असलम अपनी आंखे बंद कर रतीवती के सर पे हाथ रख देते है.
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पहली बार तो विषरूप मे ठाकुर कि हवेली पे भी हो रहा था.
कालू, रामु, बिल्लू तीनो भूरी को घेरे खड़े थे.तीनो एक एक पैग और ले चुके थे तीनो के लंड तनतनाये हुए थे
होते भी क्यों ना जिस्म था ही कुछ ऐसा.
कथा जारी है.....
Gajab ka update 🤠🤠🤠
 

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अपडेट -9 contd....

पहली बार तो विषरूप मे ठाकुर कि हवेली पे भी हो रहा था.
कालू, रामु, बिल्लू तीनो भूरी को घेरे खड़े थे.तीनो एक एक पैग और ले चुके थे तीनो के लंड तनतनाये हुए रहे
होते भी क्यों ना जिस्म था ही कुछ ऐसा.
कालू :- मित्रो भूरी काकी अर्धनग्न अवस्था मे बाहर आई थी, कही इसका कोई यार तो नहीं जिस से मिलने जा रही हो और अपना लंड मसलने लगा.
बिल्लू :-अरे अपने को क्या मेरा तो भूरी के दूध देख के लंड बैठने का नाम ही नहीं ले रहा, बिल्लू अपना लंड धोती से बाहर निकाल के मसलने लगता है,
रामु कालू का हाल भी कुछ ऐसा हि था,
कालू उत्तेजना के जोश मे भूरी के स्तन कि और हाथ बढ़ा देता है उस से रुका नहीं जा रहा था.
रामु :- क्या कर रहा है उसको होश आ गया तो?
कालू :- कुछ नही होगा वो खुद नंगी बाहर आई थी, सोच इतनी रात को ये नंगी हवेली से बाहर क्या कर रही थी...
इन तीनो उल्लू के चरखो को कौन बताये कि भूरी तो तब ही होश मे आ गई थी जब बिल्लू ने उसे गोंद मे उठाया था, वो थोड़ा सा करहि थी.
लेकिन क्या जवाब देती कि वो अर्धनग्न बारिश मे क्या करने आई थी?
अपनी बरसो कि इज़्ज़त उसे तार तार होती दिखाई दे रही थी,
भूरी काकी चुपचाप आंख बंद किये बिल्लू कि गोंद मे पड़ी रही थी.
परन्तु अब उसकी हालात ख़राब थी, उन तीनो कि बाते सुन के जो उसके कड़क कसे हुए बदन को घूरे जा रहे थे, उसके स्तन से खेलने पे आतुर थे.
भूरी तो पहले से ही गरम थी, बिल्लू का लंड धोती से बाहर झूल रहा था इस बात का अहसास होते ही उसकी चुत चुपचाप टपक पड़ती है,वो आंख बंद किये पड़ी रहती है दिल कि धड़कन धाड़ धाड़ कर के चल रही थी.
कालू :- पहले थोड़ी दारू पी लेते है, कालू के दिमाग़ मे कुछ तो चल रहा था वो कुछ भाँप चूका था.
रामु :- लेकिन.... पर....
कालू :- लेकिन वेकीन कुछ नहीं आओ तुम्हे आज नये तरीके से पिलाता हूँ.
कालू तीन कांच के गिलास भूरी के सपाट पेट पे रख देता है.
ठंडे गिलास पड़ते ही भूरी का दिल बाहर निकलने को होता है.वो हल्का सा कसमसती है परन्तु आंख नहीं खोलती.
पेट से होती हुई ठंडाई सीधा चुत कि लकीर मे स्थित दाने को छेड़ रही थी.
पहले से गरम भूरी का बदन तपने लगता है.
जिसे कालू भाँप लेता है.
पेट पे रखे ठन्डे गिलासो मे कालू दारू डालता है और तिनों भूरी के इर्द गिर्द बैठ जाते है तीनो ही भगवान कि बनाई इस नक्कासी किये जिस्म को घूर रहे थे.
बिल्लू दारू पिता हुआ एक हाथ भूरी के स्तन पे हलके से रखता है, आह्हःम... कितना मखमली अहसास था ये अहसास कभी महसूस ही नहीं हुआ था.
अंदर भूरी भी सिहर उठती है आज पुरे 30 साल बाद किसी मर्द का कड़क हाथ उसके स्तन पे लगा था, लेकिन विडंबना देखिये वो खुल के कुछ बोल भी नहीं सकती थी सिसकारी भी नहीं ले सकती थी.
होंठो के अंदर ही उसकी सिसकारी घुटी रह जाती है.
भूरी की कोई भी हरकत ना पाकर बिल्लू जोर से एक स्तन को दबा देता है.
बिल्लू :- यार क्या दूध है देख कैसे उछल रहे है, जैसे कोई गेंद हो.
मजा आ गया.
रामु भी बिल्लू कि बात सुन के अपना हाथ दूसरे स्तन पे रख देता है
रामु :- आअह्ह्ह.... हाँ यार रामु क्या मुलायम है.
अब हमला दो तरफ़ा हो गया था कहाँ एक मर्द को तरसती थी भूरी आज दो अलग अलग मर्दो के हाथो ने दोनों स्तनों को दबोच रखा था.
दारू का शुरूर सर चढ़ रहा था, रामु कालू कि हिम्मत बढ़ने लगी थी.
जबकि कालू चुपचाप शराब चूसक चूसक के पी रहा था.
रामु कालू अब भूरी के स्तनों को रगड़ने लगते है, भूरी के निप्पल टाइट हो के दर्द करने लगे थे, उसके निप्पल बार बार दोनों के सख्त हाथो से रगड़ खा रहे थे,
भूरी को सहन से बाहर हो रहा था, उसकी चुत छलछला के पानी बहा रही थी.
उत्तेजना के मारे उसकी चुत फुले जा रही थी जो कि भीगे हुए पेटीकोट से साफ दिख रही थी,पेटीकोट चुत कि दरार मे घुसा हुआ था,चुत दो हिस्सों मे बटी हुई थी, अब कहना मुश्किल था कि पेटीकोट का वो हिस्सा चुत के पानी से गिला हो के चिपका था या पहले से ही गिला था.
कालू रस बहती चुत को एकटक देखे जा रहा था, तभी वो अपनी उत्तेजना मे सर नीचे झुका के अपनी नाक चुत के उभार के ऊपर रख देता है.
भूरी को अपनी चुत पे गरम हवा का झोका सा महुसूस होता है, ऊपर से स्तन मर्दन, रगड़ाई चालू ही थी. भूरी अब मर जाएगी यदि वो जल्दी ना उठी तो अब सहन नहीं कर पायेगी.
30 साल कि गर्मी मार ही डालेगी, उसके मन मे आता है आंखे खोल दे उठ जाये और बोल ही दे कि चोदो मुझे गांड चुत सब फाड़ दो, परन्तु कैसे कहे बरसो कि इज़्ज़त दाव पे थी.
परन्तु आज ये तीनो जमुरे ठान के ही बैठे थे कि रगड़ के रख देंगे.
कालू चुत को सुंघे जा रहा था, वाह क्या खुशबू है साली दारू भी फ़ैल है इसके सामने, फिर गहरी सांस लेता है और अंदर तक़ तृप्त हो जाता है.
बिल्लू रामु कि नजर भी जैसे ही कालू कि सिसकारी सुन के नीचे कि और जाती है तो दोनों ही स्तन रगड़ना भूल जाते है नशा दिमाग़ मे चढ़ जाता है.
क्या उभार था चुत का, इतनी मोटी चुत.... गीले कपड़े मे साफ झलक रही थी.
अब तीनो के बर्दाश्त के बाहर कि बात हो चली थी बिल्लू हाथ आगे बढ़ा के पेटीकोट का नाड़ा एक झटके मे खोल देता है, जैसे ही पेटीकोट के नाड़े का खुलने का अहसास भूरी को होता है वो अंदर तक़ सिहर जाती है दिल का दौरा पड़ना अब लाजमी था इनती मदहोसी इतनी उत्तेजना क्या करू क्या करू? मै मर ना जाऊ?
इस उत्तेजना के मारे भूरी कि चुत पानी कि जोरदार उलटी कर देती है.
अब उठना ही होगा... भूरी मन बना ही लेती है.
परन्तु देर हो चुकी थी बिल्लू पेटीकोट को घुटने तक सरका चूका था लेकिन सामने जो नजारा था उसे देख के तीनो पलंग से गिर पड़ते है, धड़द्दाम्म्म..... हे भगवान ऐसी चुत इस उम्र मे ऐसी मोटी फूली हुई चुत इतनी छोटी सी.चुत पे एक भी बाल का नामोनिशान नहीं था, एकदम चिकनी चुत...
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तीनो को कोई होश नहीं था नीचे पड़े पड़े लम्बी सांस ले रहे थे...
तभी नह्ह्ह्हईई कि चीख के साथ भूरी उठ बैठती है अपने दोनों हाथो से अपने स्तन और चुत को ढक लेती है बिल्कुल नंगी तीनो के सामने खड़ी थी अपने हाथो का सहारा था सिर्फ....
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उधर गांव कामगंज मे भी सिर्फ हाथो का ही सहारा था... रतीवती अपने हाथो मे डॉ. असलम का लंड पकड़े हैरानी से आगे पीछे कर रही थी उसके लिए तो आश्चर्य कि बात यही थी कि लंड इतना भयानक भी होता है, वो नजर ही नहीं हटा पा रही थी पागलो कि तरह अलट पलट के लंड देखे जा रही थी.
कभी सुघती, कभी जीभ से चाट लेती,
डॉ. असलम आंख बंद किये इस सपने जैसी हक़ीक़त का मजा ले रहे थे.
उनका हाथ रतीवती के सर के पीछे था जैसे वो कुछ बोल रहे हो.
दोनों मुँह से कुछ नहीं बोल रहे थे बस उनका बदन बोल रहा था उनकी उत्तेजना काम कर रही थी.
तभी रतीवती कमावेश उत्तेजना से भर के पूरी जीभ निकाल के नीचे से ऊपर कि तरफ पूरा लंड चाट लेती है.
मदहोश कर देने वाला स्वाद महसूस होता है रतीवती को, वो अब पागल हो चुकी थी, स्थति ऐसी थी कि कोई आ भी जाता तो वो लंड ना छोड़ती.
डॉ. असलम थोड़ी सी आंखे खोलते है और देख के दंग रह जाते है कि इनका लंड पूरा गिला था रतीवती के थूक से.
अब वो भी इस नज़ारे को देखना चाहते थे नजर नीची किये रतीवती के सुन्दर होंठ से निकली लपलपाति जीभ देख रहे थे जो लगातार उनका लंड ऊपर नीचे चाटी जा रही थी जैसे किसी बच्चे को सालो बाद उसकी फेवरेट मिठाई मिली हो.
डॉ. असलम अपने हाँथ से रतीवती के सर के पीछे थोड़ा दबाव बढ़ाते है.
रतीवती स्वतः ही अपना सुन्दर मुँह खोल देती है और पुरे सुपाडे को अपने गरम मुँह मे भर लेती है
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उसे इतना पसंद आ रहा था कि वो सुपडे को मुँह मे लिए अंदर से सुपाडे के चारो तरफ जीभ चलाने लगती है
असलम का हाल बहुत बुरा था उनके मुँह से जोरदार आअह्ह्ह... हुंकार निकल जाती है जो बादल कि गरजना मे कही दब जाती है.
हुंकार सुन के रतीवती लंड मुँह मे पकडे ही ऊपर देखती है असलम तो नीचे ही देख रहे थे दोनों कि नजर टकरा जाती है ये पहला मौका था जब दोनों कि नजरें एक दूसरे से मिली थी, इस मिलन मे सिर्फ हवस थी, प्यास थी.
वो प्यास जो दोनों को एक दूसरे कि आँखों मे नजर आ रही थी, असलम के लंड के आगे उनकी कुरूपता खो गई थी असली सौंदर्य उनका काला भसंड लंड ही था.
दोनों ही नजरों नजरों मे एक दूसरे को स्वस्कृति दे चुके थे, बोल चुके थे कि ये लंड तुम्हारा है रतीवती मेरी प्यास बुझाओ.

और रतीवती पूरा मुँह खोल के लंड अंदर धकेल लेती है.
आहाहाहा म.क्या आनंद था, जितनी गरम रतीवती थी उस से कही ज्यादा उसका मुँह गरम था बिल्कुल कोई भट्टी जिसमे असलम का लंड आज पिघलने का था.
ऊपर से ये मौसम कि मार.... पानी के छींटे जमीन से टकरा के वापस रतीवती कि गांड और चुत पे लग रहे थे. रतीवती अपनी ऐड़ी के बल पूरी गांड फैलाये बैठी थी.
छींटे किसी छोटे छोटे तीर कि तरह चुत और गांड के छेद पे हमला कर रहे थे.
उत्तेजना से भरी रतीवती का एक हाँथ नीचे अपनी चुत के करीब पहुंच जाता है. और लकीर के बीच मौजूद दाने को सहलाने लगता है. उफ्फ्फ्फ़ .. करती रतीवती असलम के लंड को जड़तक़ मुँह मे भर लेती है उसके होंठ असलम के भारी टट्टो से टकरा जाते है, उसकी नजर टट्टो पे पड़ती है तो दंग रह जाती है इतने बड़े टट्टे?
अब हो भी क्यों ना बरसो का माल जमा कर रखा था इन टट्टो मे डॉ. असलम ने.
रतीवती कि सांस थामती महसूस होती है तो वो अपना सर पीछे कि और खिंचती है परन्तु लंड मुँह से बाहर नहीं निकालती.
अब एक हाथ चुत पे चल रहा था, दूसरे हाथ से वो असलम के बड़े भारी टट्टो को पकड़ के जोर दार झटके से वापस लंड गले तक़ उतार लेती है,
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डॉ. असलम हौरान थे कि ऐसा भी हो सकता है कोई औरत इस कदर कामुक हो सकती है.
उन्हें क्या पता कि औरत नंगेपन पे आ जाये तो क्या नहीं करती, वो इन मामलो मे बिल्कुल अनाड़ी थे. उनको तो ये सब बर्दाश्त के बाहर लग रहा था....
वो सिर्फ एकटक रतीवती कि काम क्रीड़ा को देखे जा रहे थे,
अब रतीवती इतनी गरम हो चुकी थी कि जोर जोर से धचा धच अपनी दो ऊँगली चुत मे चला रही थी वो अब रुकना नहीं चाहती थी उसे कैसे भी स्सखलित होना था.
नीचे चुत मे चलता हाथ, ऊपर मुँह मे सटासट जाता लंड और दूसरा हाथ टट्टो को मसल रहा था.
ऐसा कारनामा, ऐसी कामुक औरत नसीब वालो को ही मिलती है लेकिन जिसके नसीब मे थी वो दारू पी के लुड़का पड़ा था कमरे मे..
जिसको ऐसे खजाने कि कद्र नहीं वो खजाना कोई और लूट लेता है, जबकि यहाँ तो डॉ. असलम पे खुद रतीवती अपना यौवन का खजाना लूटा रही थी... जी भर के लूटा रही थी.
अब लंड पूरी रफ़्तार से मुँह मे जा रहा था, डॉ. असलम ने अपने दोनों हांथो से रतीवती का सर पकड़ के अपने लंड पे धकेले जा रहे थे, रतीवती भी क्या कम थी वो भी असलम के टट्टे पकडे धचा धच मुँह जड़ तक़ मारे जा रही थी.
एक बार मे लंड गले तक अंदर जाता एक बार मे बाहर.
रतीवती का थूक से लंड लिसलिसा गया था थूक टपक टपक के स्तन के रास्ते चुत तक पहुंच रहा था जहाँ रतीवती कि उंगलियां उस थूक का फायदा उठा के फचा फच चुत मे ऊँगली मारे जा रही थी...
फच फच फच.... आअह्ह्हह्ह्ह्ह....
अब वो छड़ आ चूका था जब इस गर्मी का अंत हो, असलम और रतीवती ही इस रगड़ाई को बर्दाश्त नहीं कर पाते और एक साथ भलभला के झड़ने लगते है. रतीवती कि चुत से सफ़ेद पानी का जोरदार फाव्वारा निकल के सीधा असलम के पैर पे चोट करता है.
अह्ह्ह्ह...... मै मरी पहली बार रतीवती के मुँह से शब्द फूटे थे.
असलम भी गर्मी बर्दास्त नहीं कर पाता पीच पीच पीछाक.... के साथ पहली धार वो रतीवती के मुँह के अंदर ही मार देता है परन्तु रतीवती के स्सखालन कि वजह से वो धम्म से गांड के बल बैठ जाती है... असलम कि पिचकारी एक के बाद एक रतीवती का बदन भिगोने लगती है..
रतीवती ने अभी भी असलम का लंड पकडे हुई थी, उसका हाथ और असलम का काला भयानक लंड वीर्य से भीगा हुआ था
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इतना वीर्य था कि पूरा शरीर नहा जाता है... रतीवती जैसे ही गरम वीर्य का स्पर्श अपने जलते बदन पे महसूस करते ही एक लम्बी धार अपनी चुत से छोड़ देती है रतीवती का वीर्य असलम के पैरो को भिगो रहा था.
रतीवती आजतक ऐसा कभी नहीं झड़ी थी उसकी तो जान ही निकल गई थी वो दिवार के सहरे निढाल बैठी अपनी टांग फैलाये लम्बी लम्बी सांसे ले रही थी, वीर्य जो मुँह मे था वो गले से नीचे जा चूका था.
असलम भी ढेर हो गया था उसका तो पहली बार ही था ऊपर से ऐसी कामुक औरत के साथ जो सिर्फ लंड चूस के ही किसी कि जान लेे ले.
असलम पीछे दिवार के साहरे खड़ा हांफ रहा था.
दोनों मे से अभी भी कोई कुछ नहीं बोल रहा था बस एक दूसरे को लम्बी लम्बी सांस लिए देखे जा रहे थे.
रतीवती कि जीभ अपने होंठो के चारो तरफ चल रही थी उसे वीर्य का स्वाद पसंद आया था. सारा चाट जाना चाहती थी..
तभी जोरदार बिजली कड़कती है दोनों के जिस्म रौशनी मे नहा जाते है, रतीवती का वीर्य से भरा जिस्म और असलम का थूक से भरा लंड ऐसा नजारा अच्छो अच्छो कि जान ले लेता.
दोनों को किसी से कोई शिकायत नहीं थी, तभी कमरे से कुछ गिरने कि आवाज़ आति है. रतीवती तुरंत खुद को संभालती है और जल्दी से खड़ी हो के अपनी मस्तानी गांड हिलाती गली से बाहर अपने कमरे कि और निकल पड़ती है.
जाते जाते वो मुड़ के असलम को देख मुस्कुरा देती है जैसे धन्यवाद कह रही हो...
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असलम तो मूर्ति बना एकटक उस बला कि खूबसूरत कामुक स्त्री को जाता देखता रह जाता है.
कथा जारी है.....
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Killerpanditji(pandit)

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अपडेट -9 contd....

पहली बार तो विषरूप मे ठाकुर कि हवेली पे भी हो रहा था.
कालू, रामु, बिल्लू तीनो भूरी को घेरे खड़े थे.तीनो एक एक पैग और ले चुके थे तीनो के लंड तनतनाये हुए रहे
होते भी क्यों ना जिस्म था ही कुछ ऐसा.
कालू :- मित्रो भूरी काकी अर्धनग्न अवस्था मे बाहर आई थी, कही इसका कोई यार तो नहीं जिस से मिलने जा रही हो और अपना लंड मसलने लगा.
बिल्लू :-अरे अपने को क्या मेरा तो भूरी के दूध देख के लंड बैठने का नाम ही नहीं ले रहा, बिल्लू अपना लंड धोती से बाहर निकाल के मसलने लगता है,
रामु कालू का हाल भी कुछ ऐसा हि था,
कालू उत्तेजना के जोश मे भूरी के स्तन कि और हाथ बढ़ा देता है उस से रुका नहीं जा रहा था.
रामु :- क्या कर रहा है उसको होश आ गया तो?
कालू :- कुछ नही होगा वो खुद नंगी बाहर आई थी, सोच इतनी रात को ये नंगी हवेली से बाहर क्या कर रही थी...
इन तीनो उल्लू के चरखो को कौन बताये कि भूरी तो तब ही होश मे आ गई थी जब बिल्लू ने उसे गोंद मे उठाया था, वो थोड़ा सा करहि थी.
लेकिन क्या जवाब देती कि वो अर्धनग्न बारिश मे क्या करने आई थी?
अपनी बरसो कि इज़्ज़त उसे तार तार होती दिखाई दे रही थी,
भूरी काकी चुपचाप आंख बंद किये बिल्लू कि गोंद मे पड़ी रही थी.
परन्तु अब उसकी हालात ख़राब थी, उन तीनो कि बाते सुन के जो उसके कड़क कसे हुए बदन को घूरे जा रहे थे, उसके स्तन से खेलने पे आतुर थे.
भूरी तो पहले से ही गरम थी, बिल्लू का लंड धोती से बाहर झूल रहा था इस बात का अहसास होते ही उसकी चुत चुपचाप टपक पड़ती है,वो आंख बंद किये पड़ी रहती है दिल कि धड़कन धाड़ धाड़ कर के चल रही थी.
कालू :- पहले थोड़ी दारू पी लेते है, कालू के दिमाग़ मे कुछ तो चल रहा था वो कुछ भाँप चूका था.
रामु :- लेकिन.... पर....
कालू :- लेकिन वेकीन कुछ नहीं आओ तुम्हे आज नये तरीके से पिलाता हूँ.
कालू तीन कांच के गिलास भूरी के सपाट पेट पे रख देता है.
ठंडे गिलास पड़ते ही भूरी का दिल बाहर निकलने को होता है.वो हल्का सा कसमसती है परन्तु आंख नहीं खोलती.
पेट से होती हुई ठंडाई सीधा चुत कि लकीर मे स्थित दाने को छेड़ रही थी.
पहले से गरम भूरी का बदन तपने लगता है.
जिसे कालू भाँप लेता है.
पेट पे रखे ठन्डे गिलासो मे कालू दारू डालता है और तिनों भूरी के इर्द गिर्द बैठ जाते है तीनो ही भगवान कि बनाई इस नक्कासी किये जिस्म को घूर रहे थे.
बिल्लू दारू पिता हुआ एक हाथ भूरी के स्तन पे हलके से रखता है, आह्हःम... कितना मखमली अहसास था ये अहसास कभी महसूस ही नहीं हुआ था.
अंदर भूरी भी सिहर उठती है आज पुरे 30 साल बाद किसी मर्द का कड़क हाथ उसके स्तन पे लगा था, लेकिन विडंबना देखिये वो खुल के कुछ बोल भी नहीं सकती थी सिसकारी भी नहीं ले सकती थी.
होंठो के अंदर ही उसकी सिसकारी घुटी रह जाती है.
भूरी की कोई भी हरकत ना पाकर बिल्लू जोर से एक स्तन को दबा देता है.
बिल्लू :- यार क्या दूध है देख कैसे उछल रहे है, जैसे कोई गेंद हो.
मजा आ गया.
रामु भी बिल्लू कि बात सुन के अपना हाथ दूसरे स्तन पे रख देता है
रामु :- आअह्ह्ह.... हाँ यार रामु क्या मुलायम है.
अब हमला दो तरफ़ा हो गया था कहाँ एक मर्द को तरसती थी भूरी आज दो अलग अलग मर्दो के हाथो ने दोनों स्तनों को दबोच रखा था.
दारू का शुरूर सर चढ़ रहा था, रामु कालू कि हिम्मत बढ़ने लगी थी.
जबकि कालू चुपचाप शराब चूसक चूसक के पी रहा था.
रामु कालू अब भूरी के स्तनों को रगड़ने लगते है, भूरी के निप्पल टाइट हो के दर्द करने लगे थे, उसके निप्पल बार बार दोनों के सख्त हाथो से रगड़ खा रहे थे,
भूरी को सहन से बाहर हो रहा था, उसकी चुत छलछला के पानी बहा रही थी.
उत्तेजना के मारे उसकी चुत फुले जा रही थी जो कि भीगे हुए पेटीकोट से साफ दिख रही थी,पेटीकोट चुत कि दरार मे घुसा हुआ था,चुत दो हिस्सों मे बटी हुई थी, अब कहना मुश्किल था कि पेटीकोट का वो हिस्सा चुत के पानी से गिला हो के चिपका था या पहले से ही गिला था.
कालू रस बहती चुत को एकटक देखे जा रहा था, तभी वो अपनी उत्तेजना मे सर नीचे झुका के अपनी नाक चुत के उभार के ऊपर रख देता है.
भूरी को अपनी चुत पे गरम हवा का झोका सा महुसूस होता है, ऊपर से स्तन मर्दन, रगड़ाई चालू ही थी. भूरी अब मर जाएगी यदि वो जल्दी ना उठी तो अब सहन नहीं कर पायेगी.
30 साल कि गर्मी मार ही डालेगी, उसके मन मे आता है आंखे खोल दे उठ जाये और बोल ही दे कि चोदो मुझे गांड चुत सब फाड़ दो, परन्तु कैसे कहे बरसो कि इज़्ज़त दाव पे थी.
परन्तु आज ये तीनो जमुरे ठान के ही बैठे थे कि रगड़ के रख देंगे.
कालू चुत को सुंघे जा रहा था, वाह क्या खुशबू है साली दारू भी फ़ैल है इसके सामने, फिर गहरी सांस लेता है और अंदर तक़ तृप्त हो जाता है.
बिल्लू रामु कि नजर भी जैसे ही कालू कि सिसकारी सुन के नीचे कि और जाती है तो दोनों ही स्तन रगड़ना भूल जाते है नशा दिमाग़ मे चढ़ जाता है.
क्या उभार था चुत का, इतनी मोटी चुत.... गीले कपड़े मे साफ झलक रही थी.
अब तीनो के बर्दाश्त के बाहर कि बात हो चली थी बिल्लू हाथ आगे बढ़ा के पेटीकोट का नाड़ा एक झटके मे खोल देता है, जैसे ही पेटीकोट के नाड़े का खुलने का अहसास भूरी को होता है वो अंदर तक़ सिहर जाती है दिल का दौरा पड़ना अब लाजमी था इनती मदहोसी इतनी उत्तेजना क्या करू क्या करू? मै मर ना जाऊ?
इस उत्तेजना के मारे भूरी कि चुत पानी कि जोरदार उलटी कर देती है.
अब उठना ही होगा... भूरी मन बना ही लेती है.
परन्तु देर हो चुकी थी बिल्लू पेटीकोट को घुटने तक सरका चूका था लेकिन सामने जो नजारा था उसे देख के तीनो पलंग से गिर पड़ते है, धड़द्दाम्म्म..... हे भगवान ऐसी चुत इस उम्र मे ऐसी मोटी फूली हुई चुत इतनी छोटी सी.चुत पे एक भी बाल का नामोनिशान नहीं था, एकदम चिकनी चुत...
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तीनो को कोई होश नहीं था नीचे पड़े पड़े लम्बी सांस ले रहे थे...
तभी नह्ह्ह्हईई कि चीख के साथ भूरी उठ बैठती है अपने दोनों हाथो से अपने स्तन और चुत को ढक लेती है बिल्कुल नंगी तीनो के सामने खड़ी थी अपने हाथो का सहारा था सिर्फ....
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उधर गांव कामगंज मे भी सिर्फ हाथो का ही सहारा था... रतीवती अपने हाथो मे डॉ. असलम का लंड पकड़े हैरानी से आगे पीछे कर रही थी उसके लिए तो आश्चर्य कि बात यही थी कि लंड इतना भयानक भी होता है, वो नजर ही नहीं हटा पा रही थी पागलो कि तरह अलट पलट के लंड देखे जा रही थी.
कभी सुघती, कभी जीभ से चाट लेती,
डॉ. असलम आंख बंद किये इस सपने जैसी हक़ीक़त का मजा ले रहे थे.
उनका हाथ रतीवती के सर के पीछे था जैसे वो कुछ बोल रहे हो.
दोनों मुँह से कुछ नहीं बोल रहे थे बस उनका बदन बोल रहा था उनकी उत्तेजना काम कर रही थी.
तभी रतीवती कमावेश उत्तेजना से भर के पूरी जीभ निकाल के नीचे से ऊपर कि तरफ पूरा लंड चाट लेती है.
मदहोश कर देने वाला स्वाद महसूस होता है रतीवती को, वो अब पागल हो चुकी थी, स्थति ऐसी थी कि कोई आ भी जाता तो वो लंड ना छोड़ती.
डॉ. असलम थोड़ी सी आंखे खोलते है और देख के दंग रह जाते है कि इनका लंड पूरा गिला था रतीवती के थूक से.
अब वो भी इस नज़ारे को देखना चाहते थे नजर नीची किये रतीवती के सुन्दर होंठ से निकली लपलपाति जीभ देख रहे थे जो लगातार उनका लंड ऊपर नीचे चाटी जा रही थी जैसे किसी बच्चे को सालो बाद उसकी फेवरेट मिठाई मिली हो.
डॉ. असलम अपने हाँथ से रतीवती के सर के पीछे थोड़ा दबाव बढ़ाते है.
रतीवती स्वतः ही अपना सुन्दर मुँह खोल देती है और पुरे सुपाडे को अपने गरम मुँह मे भर लेती है
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उसे इतना पसंद आ रहा था कि वो सुपडे को मुँह मे लिए अंदर से सुपाडे के चारो तरफ जीभ चलाने लगती है
असलम का हाल बहुत बुरा था उनके मुँह से जोरदार आअह्ह्ह... हुंकार निकल जाती है जो बादल कि गरजना मे कही दब जाती है.
हुंकार सुन के रतीवती लंड मुँह मे पकडे ही ऊपर देखती है असलम तो नीचे ही देख रहे थे दोनों कि नजर टकरा जाती है ये पहला मौका था जब दोनों कि नजरें एक दूसरे से मिली थी, इस मिलन मे सिर्फ हवस थी, प्यास थी.
वो प्यास जो दोनों को एक दूसरे कि आँखों मे नजर आ रही थी, असलम के लंड के आगे उनकी कुरूपता खो गई थी असली सौंदर्य उनका काला भसंड लंड ही था.
दोनों ही नजरों नजरों मे एक दूसरे को स्वस्कृति दे चुके थे, बोल चुके थे कि ये लंड तुम्हारा है रतीवती मेरी प्यास बुझाओ.

और रतीवती पूरा मुँह खोल के लंड अंदर धकेल लेती है.
आहाहाहा म.क्या आनंद था, जितनी गरम रतीवती थी उस से कही ज्यादा उसका मुँह गरम था बिल्कुल कोई भट्टी जिसमे असलम का लंड आज पिघलने का था.
ऊपर से ये मौसम कि मार.... पानी के छींटे जमीन से टकरा के वापस रतीवती कि गांड और चुत पे लग रहे थे. रतीवती अपनी ऐड़ी के बल पूरी गांड फैलाये बैठी थी.
छींटे किसी छोटे छोटे तीर कि तरह चुत और गांड के छेद पे हमला कर रहे थे.
उत्तेजना से भरी रतीवती का एक हाँथ नीचे अपनी चुत के करीब पहुंच जाता है. और लकीर के बीच मौजूद दाने को सहलाने लगता है. उफ्फ्फ्फ़ .. करती रतीवती असलम के लंड को जड़तक़ मुँह मे भर लेती है उसके होंठ असलम के भारी टट्टो से टकरा जाते है, उसकी नजर टट्टो पे पड़ती है तो दंग रह जाती है इतने बड़े टट्टे?
अब हो भी क्यों ना बरसो का माल जमा कर रखा था इन टट्टो मे डॉ. असलम ने.
रतीवती कि सांस थामती महसूस होती है तो वो अपना सर पीछे कि और खिंचती है परन्तु लंड मुँह से बाहर नहीं निकालती.
अब एक हाथ चुत पे चल रहा था, दूसरे हाथ से वो असलम के बड़े भारी टट्टो को पकड़ के जोर दार झटके से वापस लंड गले तक़ उतार लेती है,
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डॉ. असलम हौरान थे कि ऐसा भी हो सकता है कोई औरत इस कदर कामुक हो सकती है.
उन्हें क्या पता कि औरत नंगेपन पे आ जाये तो क्या नहीं करती, वो इन मामलो मे बिल्कुल अनाड़ी थे. उनको तो ये सब बर्दाश्त के बाहर लग रहा था....
वो सिर्फ एकटक रतीवती कि काम क्रीड़ा को देखे जा रहे थे,
अब रतीवती इतनी गरम हो चुकी थी कि जोर जोर से धचा धच अपनी दो ऊँगली चुत मे चला रही थी वो अब रुकना नहीं चाहती थी उसे कैसे भी स्सखलित होना था.
नीचे चुत मे चलता हाथ, ऊपर मुँह मे सटासट जाता लंड और दूसरा हाथ टट्टो को मसल रहा था.
ऐसा कारनामा, ऐसी कामुक औरत नसीब वालो को ही मिलती है लेकिन जिसके नसीब मे थी वो दारू पी के लुड़का पड़ा था कमरे मे..
जिसको ऐसे खजाने कि कद्र नहीं वो खजाना कोई और लूट लेता है, जबकि यहाँ तो डॉ. असलम पे खुद रतीवती अपना यौवन का खजाना लूटा रही थी... जी भर के लूटा रही थी.
अब लंड पूरी रफ़्तार से मुँह मे जा रहा था, डॉ. असलम ने अपने दोनों हांथो से रतीवती का सर पकड़ के अपने लंड पे धकेले जा रहे थे, रतीवती भी क्या कम थी वो भी असलम के टट्टे पकडे धचा धच मुँह जड़ तक़ मारे जा रही थी.
एक बार मे लंड गले तक अंदर जाता एक बार मे बाहर.
रतीवती का थूक से लंड लिसलिसा गया था थूक टपक टपक के स्तन के रास्ते चुत तक पहुंच रहा था जहाँ रतीवती कि उंगलियां उस थूक का फायदा उठा के फचा फच चुत मे ऊँगली मारे जा रही थी...
फच फच फच.... आअह्ह्हह्ह्ह्ह....
अब वो छड़ आ चूका था जब इस गर्मी का अंत हो, असलम और रतीवती ही इस रगड़ाई को बर्दाश्त नहीं कर पाते और एक साथ भलभला के झड़ने लगते है. रतीवती कि चुत से सफ़ेद पानी का जोरदार फाव्वारा निकल के सीधा असलम के पैर पे चोट करता है.
अह्ह्ह्ह...... मै मरी पहली बार रतीवती के मुँह से शब्द फूटे थे.
असलम भी गर्मी बर्दास्त नहीं कर पाता पीच पीच पीछाक.... के साथ पहली धार वो रतीवती के मुँह के अंदर ही मार देता है परन्तु रतीवती के स्सखालन कि वजह से वो धम्म से गांड के बल बैठ जाती है... असलम कि पिचकारी एक के बाद एक रतीवती का बदन भिगोने लगती है..
रतीवती ने अभी भी असलम का लंड पकडे हुई थी, उसका हाथ और असलम का काला भयानक लंड वीर्य से भीगा हुआ था
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इतना वीर्य था कि पूरा शरीर नहा जाता है... रतीवती जैसे ही गरम वीर्य का स्पर्श अपने जलते बदन पे महसूस करते ही एक लम्बी धार अपनी चुत से छोड़ देती है रतीवती का वीर्य असलम के पैरो को भिगो रहा था.
रतीवती आजतक ऐसा कभी नहीं झड़ी थी उसकी तो जान ही निकल गई थी वो दिवार के सहरे निढाल बैठी अपनी टांग फैलाये लम्बी लम्बी सांसे ले रही थी, वीर्य जो मुँह मे था वो गले से नीचे जा चूका था.
असलम भी ढेर हो गया था उसका तो पहली बार ही था ऊपर से ऐसी कामुक औरत के साथ जो सिर्फ लंड चूस के ही किसी कि जान लेे ले.
असलम पीछे दिवार के साहरे खड़ा हांफ रहा था.
दोनों मे से अभी भी कोई कुछ नहीं बोल रहा था बस एक दूसरे को लम्बी लम्बी सांस लिए देखे जा रहे थे.
रतीवती कि जीभ अपने होंठो के चारो तरफ चल रही थी उसे वीर्य का स्वाद पसंद आया था. सारा चाट जाना चाहती थी..
तभी जोरदार बिजली कड़कती है दोनों के जिस्म रौशनी मे नहा जाते है, रतीवती का वीर्य से भरा जिस्म और असलम का थूक से भरा लंड ऐसा नजारा अच्छो अच्छो कि जान ले लेता.
दोनों को किसी से कोई शिकायत नहीं थी, तभी कमरे से कुछ गिरने कि आवाज़ आति है. रतीवती तुरंत खुद को संभालती है और जल्दी से खड़ी हो के अपनी मस्तानी गांड हिलाती गली से बाहर अपने कमरे कि और निकल पड़ती है.
जाते जाते वो मुड़ के असलम को देख मुस्कुरा देती है जैसे धन्यवाद कह रही हो...
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असलम तो मूर्ति बना एकटक उस बला कि खूबसूरत कामुक स्त्री को जाता देखता रह जाता है.
कथा जारी है.....
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