चैप्टर -3 नागमणि कि खोज अपडेट -30
सुबह हो चुकी थी, सुहाना मौसम हो रहा था अभी सूरज नहीं निकला था सिरद उसकी लालिमा फ़ैल गई थी चारो तरफ.
सभी जगह तूफान शांत हो चूका था, रूपवती और वीरा कि आँखों मे आँसू थे, वीरा अपनी दर्दनाक कहानी सुना चूका था उसका लंड सिकुड़ के रूपवती कि चुत से बाहर आ गया था रात भर उसका लंड रूपवतीं कि चुत मे ही पड़ा रहा था.
गांड चुत के छेद पुरे खुल चुके थे वीरा ने मार मार के गुफा बना दिया था.
तभी टक टाकक की आवाज़ होती है जैसे कोई दरवाजे को टटोल rha हो..
रूपवती जल्दी से उठती है पुच कि आवाज़ के साथ ढेर सारा वीर्य उसके चुत के रास्ते बाहर निकलने लगता है जिसे देख वो वीरा कि तरफ देख शर्मा जाती है और एक कामुक मुस्कान चेहरे ोे दौड़ जाती है.
जैसे कहना चाहती हो जो हो गया सौ हो गया अब मै हूँ ना वीरा.
वीरा भी हिनहिना के हामी भरता है.
रूपवती कपडे संभाल के दरवाज़े कि और बढ़ती है कोई काली परछाई दरवाजा के ऊपर चढ़ के अंदर हवेली मे कूद जाती है..
रूपवती स्तंभ रह जाती है उसे थोड़ा डर लगता है कि चोर आ गया है.
वही दूसरी तरफ बिल्ला कि रात बहुत मुश्किल कटी उसे असहनीय पीड़ा हो रही थी बार बार रास्ते मे गिर पड़ता था, बिल्ला का मददगार शख्श खुद थक चूका था.
अब संभालना मुश्किल था फिर भी जैसे तैसे वो शख्स बिल्ला को लिए गांव कामगंज पहुँचता है मौलवी के घर.
ठाक ठाक ठाक....
मौलवी :- इतनी सुबह कौन है? दरवाजा खोलता है
सामने रुखसाना किसी भीमकाय आदमी को थामे खड़ी थी.
मौलवी :- अरे बेटी जल्दी अंदर आ ये कौन है? क्या हुआ इसे? तू रात भर कहाँ थी?
रुखसाना अन्दर आती है "पिताजी ये बिल्ला है इसे गोली लगी है, रंगा गिरफ्तार है "
कल रात शादी मे मैंने दरोगा वीरप्रताप सिंह को देख लिया था तो मै भी किसी अनहोनी के अंदेशे मे बारात के पीछे चल पड़ी थी..
मेरा जाना व्यर्थ नहीं गया.
मौलवी :- बेटी ये क्या किया इसे यहाँ क्यों लाइ हम लोग भी बेमौत मारे जायेंगे.
रुखसाना :- पिताजी मैंने इनकी सेवा कि है आज भी कर रही हूँ, ऐसा बोल बिल्ला को बिस्तर पे लेटा देती है उसकी सलवार कमीज़ पूरी खून से लाल हो चुकी थी.
कातिलाना बदन हलके उजाले मे चमक रहा था.
मौलवी :- बेटा गोली निकालनी होंगी वरना जहर फ़ैल जायेगा.
जा जा के इंतज़ाम कर पानी गरम कर.
रुखसाना थोड़ी देर मे सभी औजार ले आती है.
कुछ वक़्त बाद
मौलवी :- गोली तो निकाल दि है बेटी लेकिन अभी भी कमजोरी है खून बहुत ज्यादा बह गया है, जख्म भी बहुत गहरा है तुझे किसी डॉक्टर के पास जा के कुछ दवाइया लानी होंगी.
रुखसाना :- पिताजी लेकिन यहाँ दूर दूर तक तो कोई डॉक्टर है ही नहीं?
मौलवी :- बेटी विष रूप गांव मे एक डॉ है डॉ. असलम मै कल सुबह उनसे मिला था तुझे बताया तो था.
तुझे विष रूप ही जाना होगा यदि बिल्ला को बचाना है तो.
रुखसाना :- इसे तो बचाना ही होगा पिताजी तभी तो ये मुझे अपने मतलब के आदमी से मिला पाएंगे.
मै दवाई ले आउंगी पिताजी
ऐसा बोल रुखसाना नहाने निकाल पड़ती है उसे आज ही विष रूप के लिए निकलना था..
गांव घुड़पुर मे
रूपवती स्थिर चुपचाप खड़ी उस परछाई को हवेली मे अंदर आती देख रही थी.
"ये क्या ये परछाई भाई विचित्र सिंह के कमरे मे क्यों जा रहा है, जबकि उसके आगे मेरा भी कमरा है"
पीछे जाना होगा
रूपवतीं उस परछाई के पीछे चल देती है...
वो शख्स बड़े आराम से विचित्र सिंह के कमरे का दरवाजा खोल देता है और अंदर चला जाता है उसने पीछे वापस दरवाजा बंद करने कि जहमत भी नहीं उठाई थी.
वो सीधा विचित्र सिंह के बिस्तर पे गिरता है और जेब से एक हार निकाल के निहारने लगता है.
वाह क्या औरत थी चुत के साथ साथ गहने भी दे दिए...
वाह चोर मंगूस वाह... मंगूस खुद को शाबाशी दे रहा था.
तभी अचानक कमरे मे चिमनी जल उठती है, खिड़की से पर्दा हट जाता है
चिमनी रूपवती के हाथ मे थी...
मंगूस चौक जाता है "दीदी आप.... इतनी सुबह "
ऐसा बोल हाड़बड़ाहट मे हार और सभी गहने तकिये के नीचे छुपा देता है.
रूपवती :- तू रात भर कहाँ था? और चोरो कि तरह क्यों आया? वो तेरे हाथ मे क्या है? और ये मजदूरों कि तरह कपडे क्यों पहने है?
ममंगूस को काटो तो खून नहीं उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था इतने सालो बाद उसका राज खुल गया था.
विचित्र सिंह :- दीदी वो मै... वो मै... हाँ शादी मे गया था.
रूपवती :- ऐसे कपड़ो मे? ठाकुर हो के मजदूर के कपड़ो मे. और कल तक तो तेरी मूँछ नहीं थी एक रात मे कैसे उग गई?
रूपवती तुरंत उसके सिरहाने के पास जा के उसका तकिया खींच लेती है, गहने हार जमीन पे गिर पड़ते है. रूपवती का दूसरा हाथ विचित्र सिंह कि मूछों पे जाता है एक झटके मे निकल जाती है नकली मुछ.
अब खेल ख़त्म हो गया था मंगूस का उसका पर्दाफाश हो गया था.
विचित्र सिंह :- दीदी वो मै....दीदी मै...
रूपवती :-चुप कर... आज तक तेरी चोरी कि आदत नहीं गई, अपनी माँ तेरी इसी आदत कि वजह से चल बसी, पिताजी जीवन से विरक्त हो गये.
कही कही.... तू ही तो वो बहरूपिया कुख्यात चोर मंगूस तो नहीं? ऐसा बोलते हुए रूपवती का कलेजा काँप रहा था,
उसे पता लग गया था कि यही है चोर मंगूस फिर भी एक कसक थी कि विचित्र मना कर दे कि मै चोर नहीं हूँ.
लेकिन ऐसा हुआ नहीं...
विचित्र :- अपना सर झुकाये... मै ही हूँ चोर मंगूस
रूपवती वही धम से बैठ जाती है अपना माथा पिट लेती है
हे भगवान... ये क्या हो रहा है
विचित्र सिंह अपनी बहन से बहुत प्यार करता था उसका दुख नहीं देख सकता था
उठ के उसके पास बैठता है उसके सर को पकड़ के उठाता है
विचित्र :- दीदी मुझे माफ़ कर दो.... लेकिन मै क्या करू मेरी आदत अब लत बन चुकी है जब तक मै चोरी नहीं कर लेता मुझे नींद नहीं आती मै बेचैन हो जाता हूँ.
कही भी हीरे मोती सोना चांदी देखता हूँ तो खुद को रोक नहीं पाता.
बिना चोरी के मै मर जाऊंगा दीदी.मैंने कभी किसी का अहित नहीं किया, कभी किसी गरीब के घर चोरी नहीं कि.
विचित्र सिंह कि आँखों मे आँसू थे होंठो पे सचाई थी.
रूपवती :- क्या तू मेरे कहने पे भी चोरी नहीं रोक सकता
विचित्र :- जिस दिन कोई बड़ा खजाना हाथ लग जाये मेरा मन भर जाये तो हो सकता है मेरी चोरी कि तम्मना खत्म हो जाये.
दोनों भाई बहन के आँखों मे आँसू थे,
मंगूस मजबूर था बाहर से विचित्र सिंह था लेकिन वो असल मे था ही चोर मंगूस.
"दीदी मै आपको दुख नहीं दे सकता आप वैसे ही बहुत दुखी है " भले मै मार जाऊ लेकिन अब चोरी नहीं करूंगा.
रूपवती अपना हाथ उसके मुँह पे रख देती है "मरे हमारे दुश्मन "
उसके दिमाग़ मे एक विचार चल रहा था.
रूपवती :- अच्छा तुझे कोई अनमोल खजाना मिल जाये तो तू चोरी छोड़ देगा?
विचित्र सिंह :- बिल्कुल दीदी
रूपवती :- अच्छा सुन एक चीज चोरी करनी है तुझे तेरी जीवन कि आखरी चोरी
जिसमे तेरी दीदी का भी भला है.बोल करेगा?
विचित्र :- आपके लिए जान हाजिर है दीदी, वैसे भी चोरी जितनी मुश्किल हो मुझे उतना ही मजा आता है.
वैसे मुझे चुराना क्या है?
रूपवती :- नागमणि कि चोरी
विचित्र :- नागमणि कि चोरी? ये कहाँ है?
रूपवती अपनी आपबीती सुना देती है, तांत्रिक उलजुलूल से मिली जानकारी दे देती है,
सिर्फ वीरा से हुए सम्भोग को छोड़ नागवंश और घुड़वंश कि सबकुछ बता देती है.
विचित्र सिंह कि तो बांन्छे खिल जाती है सुनते सुनते.
"वाह दीदी उस ज़ालिम सिंह को सबक सिखाने और आपकी सुंदरता के लिए आपका ये छोटा भाई जरूर चुराएगा नागमणि.
"अब चोर मंगूस जायेगा विष रूप "
बने रहिये
कथा जारी है....