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Fantasy वालवन का दूध

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RajuWalvan

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Update 1

मेरा नाम राजू है। मैं मुंबई से वालवन आया था।
माँ हमेशा इस परिवार को गाली देती थीं। “बिगड़े हुए हैं सब,” कहा करती थीं। मरते समय उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा—एक बार जाकर मिल ले अपने बाप के लोगों से। उनके जाने के कई महीने बाद मैं गाँव पहुँचा।
घर बीचोबीच था। सुबह-सुबह दो चाचियाँ मिलीं।
सुजाता चाची—लंबी, सांवली, तगड़ी।
मनीषा चाची—गोरी, पतली, शहर से आई हुई।
घर में दादाजी लाठी लेकर घूमते थे। पिताजी चुप रहते थे।
पहली ही सुबह वो बात सामने आ गई।
सुजाता चाची ने दादाजी को आवाज़ दी—
“चलो बाबा, दूध पिला देती हूँ। जल्दी निपटाओ।”
दादाजी आए और गोद में लेट गए। सुजाता चाची ने ब्लाउज़ खोला। जैसे ही स्तन बाहर आया, दादाजी ने एक हाथ से उसे पकड़ लिया और जोर से दबाने लगे। निपल उनकी उंगलियों में दब गया।
सुजाता चाची झट से बोलीं—
“बाबा! इतना जोर से क्यों मसल रहे हो? रोज़ की तरह हाथ मत फैलाओ।”
दादाजी ने हाथ नहीं हटाया। बल्कि और दबाया।
“दूध अच्छा निकलता है ऐसे।”
“मैंने कहा ना कम करो!” सुजाता चाची ने उनका हाथ पकड़कर हटाया। “सिर्फ़ पी लो। स्तन तोड़ने की ज़रूरत नहीं।”
दादाजी बुड़बुड़ाए लेकिन मुँह लगा लिया।
उधर मनीषा चाची ने पिताजी को बुलाया।
“भैया, आ जाओ।”
पिताजी आए तो सीधे स्तन के पास मुँह ले गए। लेकिन पीने के बजाय उन्होंने निपल को जीभ से चाटना शुरू कर दिया। फिर हल्के दाँतों से काटा।
मनीषा चाची झटके से पीछे हटीं।
“क्या कर रहे हो भैया? काट क्यों रहे हो? मैंने कितनी बार कहा है दाँत मत लगाना!”
पिताजी ने मुँह नहीं हटाया। निपल को फिर से जीभ से सहलाते हुए बोले—
“आदत है। बिना चाटे अच्छा नहीं लगता।”
“आदत छोड़ो!” मनीषा चाची ने उनका सर धक्का दिया। “पीना है तो साफ़-साफ़ पियो। नहीं तो हटो।”
पिताजी ने अनमने मन से मुँह लगाया, लेकिन बीच-बीच में फिर जीभ निकालकर निपल चाटने लगते। मनीषा चाची हर बार उनके सिर पर थपकी दे देतीं।
“फिर शुरू! एक दिन दाँत तोड़ दूँगी।”
मैं कोने में खड़ा ये सब देख रहा था। दोनों चाचियाँ साफ़ परेशान थीं। वे दूध पिला रही थीं, लेकिन मर्दों के हाथ और मुँह से लगातार लड़ रही थीं।
सुजाता चाची ने मेरी तरफ़ देखा। थकी हुई नज़रों से बोलीं—
“तेरी माँ भी यही झेलती थी। इसीलिए तो भाग गईं।”
दादाजी ने फिर से स्तन दबाने की कोशिश की तो सुजाता चाची ने उनका हाथ जोर से झटक दिया।
“आखिरी चेतावनी बाबा। फिर से दबाया तो आज नहीं पिलाऊँगी।”
दादाजी चुप हो गए।
पिताजी ने भी इस बार सिर्फ़ पीने की कोशिश की।
 
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RajuWalvan

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शाम को खाना लगा।
सब फ़र्श पर बैठे थे। थाली में रोटी-सब्ज़ी परोसी जा रही थी तभी पिताजी ने थाली आगे धकेल दी।
“आज खाना नहीं खाना। सिर्फ़ दूध चाहिए।”
मनीषा चाची की भौंहें चढ़ गईं।
“रोज़ की यही कहानी है भैया। पहले खाना खा लो।”
सुजाता चाची भी बोल उठीं—
“बच्चे की तरह मटके मत। खाना खाओ।”
लेकिन पिताजी अड़े रहे।
“नहीं। दूध ही चाहिए।”
सुमित चाचा ने बीच में कहा—
“मनीषा, अगर सुजाता व्यस्त है तो तुम ही पिला दो।”
मनीषा चाची ने भारी साँस ली और उठ खड़ी हुईं। ब्लाउज़ खोलते हुए बोलीं—
“आओ। लेकिन आज कोई शैतानी नहीं।”
पिताजी उनके पास आए। जैसे ही स्तन सामने आया, उन्होंने पहले निपल को जीभ से चाटा, फिर हल्के दाँतों से काटा।
मनीषा चाची झट से उनके सिर पर थपकी दी।
“फिर से दाँत! कितनी बार कहा है काटना बंद करो!”
पिताजी ने मुँह नहीं हटाया। निपल को फिर चाटते हुए बोले—
“आदत है यार…”
“आदत छोड़ो वरना हटा दूँगी!” मनीषा चाची ने उनका सर पकड़कर सीधा किया। “साफ़-साफ़ पियो। नहीं तो आज नहीं मिलेगा।”
पिताजी ने अनमने मन से मुँह लगाया। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर जीभ निकालकर निपल सहलाने लगे। मनीषा चाची ने दोबारा थपकी दी।
“फिर शुरू! एक दिन सच में काट लूँगी तुम्हारी जीभ।”
सुजाता चाची दूसरी तरफ़ बैठी ये सब देख रही थीं। उन्होंने सिर हिलाया।
“रोज़ का नाटक। कभी सीधा नहीं पीते।”
मैं चुपचाप देख रहा था। पिताजी दूध तो पी रहे थे, लेकिन बार-बार जीभ और दाँत से छेड़छाड़ कर रहे थे। मनीषा चाची लगातार डाँट रही थीं, थपकी दे रही थीं, लेकिन पिलाती जा रही थीं।
जब आखिर में पिताजी ने छोड़ा तो मनीषा चाची ने ब्लाउज़ झटके से बंद किया।
“अगली बार पहले खाना खाना। रोज़ का ये तमाशा बर्दाश्त नहीं होगा।”
पिताजी चुपचाप थाली अपने पास खींच ली। चेहरे पर शर्मिंदगी कम, संतुष्टि ज़्यादा थी।
सुजाता चाची ने मेरी तरफ़ देखा।
“अब समझा? ये लोग सिर्फ़ दूध नहीं माँगते। छेड़छाड़ भी ज़रूरी समझते हैं। हम डाँटते हैं, गाली देते हैं… फिर भी पिलाना पड़ता है।”
मैंने सिर हिलाया।
घर का नियम साफ होता जा रहा था।
औरतें गुस्सा करतीं।
मर्द फिर भी अपना काम निकाल लेते।

रात हो गई।
खाना खत्म होने के बाद सब सोने की तैयारी करने लगे। दादाजी लाठी टेकते हुए उठे और सीधे बोले—
“आज तुम्हारे बीच में सोऊँगा। और पहले दूध भी चाहिए।”
मनीषा चाची ने आँखें घुमाईं।
“बाबा, अब रात को भी? दिन भर पी चुके हो।”
दादाजी ने लाठी ज़मीन पर पटकाई।
“पीना है। जल्दी करो।”
सुजाता चाची ने बिस्तर ठीक करते हुए कहा—
“आ जाओ। लेकिन आज कोई मसलाई-दबाई नहीं। सिर्फ़ पीना।”
दादाजी दोनों चाचियों के बीच लेट गए। मनीषा चाची ने ब्लाउज़ खोला। जैसे ही स्तन बाहर आया, दादाजी ने एक हाथ से उसे पकड़ लिया और जोर से दबाने लगे।
मनीषा चाची ने झट से उनका हाथ झटक दिया।
“बाबा! फिर वही! हाथ मत लगाओ।”
दादाजी बुड़बुड़ाए—
“दबाए बिना अच्छा नहीं लगता।”
“लगे या न लगे, आज नहीं दबाओगे।” मनीषा चाची ने उनका सर पकड़कर स्तन मुँह में दे दिया। “सिर्फ़ पियो।”
दादाजी अनमने मन से पीने लगे। बीच-बीच में हाथ फिर स्तन की तरफ़ जाता तो मनीषा चाची थपकी दे देतीं।
“हाथ रोको वरना हटा दूँगी।”
सुजाता चाची दूसरी तरफ़ से देख रही थीं। उन्होंने भी ब्लाउज़ खोला और कहा—
“इधर भी आ जाओ बाबा। लेकिन शर्त वही है—हाथ दूर।”
दादाजी ने मनीषा का स्तन छोड़ा और सुजाता की तरफ़ खिसक गए। इस बार उन्होंने दबाने की कोशिश नहीं की, लेकिन मुँह लगाते ही निपल को जीभ से जोर से चाटने लगे।
सुजाता चाची ने उनका सर धक्का दिया।
“चाटना बंद करो! रोज़ की तरह गंदी आदत मत निकालो।”
दादाजी ने मुँह हटाकर कहा—
“तेरे स्तन मीठे लगते हैं।”
“मीठे लगें तो चुपचाप पियो। जीभ मत चलाओ।”
थोड़ी देर बाद दादाजी की आँखें बंद होने लगीं। दोनों चाचियाँ उन्हें सुलाकर उठ खड़ी हुईं। मनीषा चाची ने ब्लाउज़ बंद करते हुए गाली दी—
“रोज़ का यही चक्कर। दबाओ, चाटो, काटो… कभी सीधा नहीं पीते ये लोग।”
सुजाता चाची ने सिर हिलाया।
“चल, राजू के पास चलते हैं। कम से कम वो इतनी शैतानी नहीं करता।”
दोनों मेरे बिस्तर के पास आईं। मनीषा चाची ने हँसते हुए पूछा—
“गर्लफ्रेंड है कोई?”
मैंने सिर नकारात्मक में हिलाया। दोनों हँसीं। सुजाता चाची ने ब्लाउज़ थोड़ा नीचे किया और निपल उंगलियों में पकड़कर मेरे मुँह के पास ले आईं।
“पी ले। रात का हिस्सा भी तेरा है।”
मैंने लगा लिया। इस बार कोई हाथ नहीं दबाने आया, कोई जीभ नहीं चली। सिर्फ़ दूध था। दोनों चाचियाँ पास बैठी हल्के स्वर में बातें करती रहीं। कभी-कभी एक-दूसरे के स्तन छूकर हँस पड़तीं।
जब मैंने छोड़ा तो सुजाता चाची ने कहा—
“अब सो जा। सुबह बाबा फिर से शुरू हो जाएँगे।”

सुबह की पहली रोशनी खिड़की से आ रही थी।
आँख खुली तो दोनों चाचियाँ मेरे दोनों तरफ़ सोई मिलीं। सुजाता चाची और मनीषा चाची। उनकी साड़ियाँ बिखरी हुई थीं और ब्लाउज़ अभी भी खुले थे। रात का सिलसिला जैसे अधूरा रह गया हो।
सुजाता चाची के स्तन भारी और गोल थे। सांवली त्वचा पर गहरे रंग के निपल। लेटी हुई अवस्था में वो दोनों तरफ़ थोड़े ढलके हुए थे। साँस लेने पर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहे थे। एक स्तन का निपल चादर के किनारे से रगड़ खा रहा था।
मनीषा चाची के स्तन छोटे लेकिन बहुत गोल और तने हुए थे। गोरी त्वचा पर हल्के गुलाबी निपल। जब उन्होंने करवट बदली तो उनका एक स्तन मेरे बाजू की तरफ़ लुढ़क आया। नरम और गर्म। साँस के साथ हल्का सा काँप रहा था।
मैं सावधानी से उठने की कोशिश कर रहा था कि मनीषा चाची ने आँखें खोल दीं।
“जल्दी उठ गया?” स्वर में नींद बाकी थी। उन्होंने बिना किसी झिझक के साड़ी ठीक करनी शुरू की। जब वो उठीं तो उनके स्तन भी साथ में हिले—गोल और सख्त। ब्रा के हुक लगाते समय उन्होंने दोनों हाथों से स्तनों को समेटकर ऊपर उठाया। निपल उनकी उंगलियों के बीच दब गए।
सुजाता चाची भी आवाज़ सुनकर जाग गईं। उन्होंने अंगड़ाई ली तो उनके भारी स्तन एक साथ ऊपर उठे और फिर धीरे से नीचे बैठ गए। साड़ी ठीक करते समय एक स्तन साड़ी के पल्लू से बाहर रह गया। उन्होंने लापरवाही से उसे अंदर किया। निपल अभी भी थोड़ा खड़ा था।
“भूख लगी है?” उन्होंने पूछा। “थोड़ा इंतज़ार कर। बाबा अभी उठेंगे। पहले उनको पिलाना है। उसके बाद तेरी बारी।”
मनीषा चाची बाल सँवारते हुए बोलीं—
“सुबह-सुबह ये शांत रहता है। बाकी लोग ऐसे नहीं होते।” उन्होंने झुककर मेरे माथे पर हल्का चुंबन ले लिया। झुकते समय उनके दोनों स्तन नीचे की तरफ़ लटक गए और फिर वापस अपनी जगह पर आ गए।
“फिक्र मत कर। सबके लिए काफी है।”
मैं बिस्तर पर बैठा रहा। दोनों चाचियाँ उठकर कमरे में घूमने लगीं। उनके स्तन साड़ी के अंदर भी अपनी हलचल दिखा रहे थे—सुजाता के भारी और धीमे, मनीषा के छोटे और फुर्तीले।
बाबा के उठने का इंतज़ार था।

थोड़ी देर में घर में हलचल शुरू हो गई।
सुजाता चाची दरवाज़े के पास चटाई पर बैठकर साड़ी ठीक कर रही थीं। तभी दादाजी लाठी टेकते हुए कमरे में आ गए। आँखें अभी पूरी तरह खुली नहीं थीं।
“सुजाता,” उन्होंने कर्कश स्वर में कहा। “इधर आ।”
सुजाता चाची ने साँस छोड़ी लेकिन मुस्कुरा दीं।
“कभी आराम नहीं करते बाबा?”
दादाजी चटाई पर बैठ गए। सुजाता चाची ने साड़ी के अंदर हाथ डालकर ब्लाउज़ खोला। उनके भारी स्तन बाहर आए—गोल, भरे हुए, निपल अभी भी थोड़े सख्त। उन्होंने दोनों हाथों से स्तन संभाले और दादाजी के मुँह के पास ले गईं।
“धीरे पीना। रोज़ की तरह जल्दी-जल्दी मत करना।”
दादाजी ने मुँह खोला। सुजाता चाची ने निपल अंदर दिया। उनके बड़े स्तन का निचला हिस्सा दादाजी के चेहरे पर भारी पड़ रहा था। वो धीरे-धीरे पीने लगे। सुजाता चाची एक हाथ से उनका सर पकड़े हुए थीं, दूसरे हाथ से स्तन को हल्के से ऊपर उठाए हुए।
मनीषा चाची झाड़ू लगाते हुए बोलीं—
“बाबा कहते हैं बच्चा नहीं हूँ, लेकिन डाँट उतनी ही पड़ती है।”
सुजाता चाची हँसीं। दूध का एक कतरा दादाजी के मुँह से गिरा तो उन्होंने हथेली से पोंछकर साड़ी पर पोंछ दिया।
“हमारे बच्चों से भी ज़्यादा तंग करते हैं ये।”
जब दादाजी ने छोड़ा तो सुजाता चाची उठ खड़ी हुईं। स्तन अभी भी बाहर थे। उन्होंने मुझे आवाज़ दी—
“राजू, अगर पीना है तो आ जा।”
मैं उनके पास बैठ गया। सुजाता चाची फिर से बैठ गईं। उनके स्तन अभी भी खुले थे—रात के बाद थोड़े हल्के, लेकिन निपल गीले और संवेदनशील। उन्होंने एक स्तन मेरे मुँह के पास लाया।
“अब शर्माने की ज़रूरत नहीं। रात को दोनों तरफ़ से खाली कर दिए थे तूने। मनीषा को भी लगाना पड़ा था।”
मैंने लगा लिया। सुजाता चाची मेरे बाल सहलाती रहीं। उनके स्तन की गर्माहट और वजन मेरे चेहरे पर महसूस हो रहा था।
उधर मनीषा चाची के छोटे बेटे चिंटू ने आकर उनकी साड़ी खींची।
“आई, भूख लगी है।”
मनीषा चाची ने झाड़ू एक तरफ़ रखी। ब्लाउज़ खोला। उनके छोटे लेकिन गोल और तने हुए स्तन बाहर आए। निपल हल्के गुलाबी। उन्होंने पल्लू से जल्दी से स्तन पोंछा और चिंटू को लगा लिया।
“धीरे,” उन्होंने कहा। “अब से घर में बच्चों को पहले पिलाना चाहिए।”
चिंटू पी रहा था। मनीषा चाची ने उसकी बाँह पर हल्की थपकी दी।
“दाँत मत लगा। होठ पूरे निपल पर रख।”
फिर उन्होंने मुझे देखा और बोलीं—
“आज से काम करते समय ब्लाउज़ खुला ही रखूँगी। बार-बार बटन खोलने में समय बर्बाद होता है। जो पीना चाहे, आ जाए।”
सुजाता चाची ने सिर हिलाया। उनके स्तन अभी भी खुले थे। वो उठकर रसोई की तरफ़ बढ़ीं। चलते समय उनके भारी स्तन धीरे-धीरे हिले।
“नाश्ता करके बाहर बैठना,” उन्होंने कहा। “आज खेत में भी जाना है।”
मैं मुँह पोंछता हुआ उठ खड़ा हुआ।
सुबह की शुरुआत हो चुकी थी।
 
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शाम को खाना लगा।
सब फ़र्श पर बैठे थे। थाली में रोटी-सब्ज़ी परोसी जा रही थी तभी पिताजी ने थाली आगे धकेल दी।
“आज खाना नहीं खाना। सिर्फ़ दूध चाहिए।”
मनीषा चाची की भौंहें चढ़ गईं।
“रोज़ की यही कहानी है भैया। पहले खाना खा लो।”
सुजाता चाची भी बोल उठीं—
“बच्चे की तरह मटके मत। खाना खाओ।”
लेकिन पिताजी अड़े रहे।
“नहीं। दूध ही चाहिए।”
सुमित चाचा ने बीच में कहा—
“मनीषा, अगर सुजाता व्यस्त है तो तुम ही पिला दो।”
मनीषा चाची ने भारी साँस ली और उठ खड़ी हुईं। ब्लाउज़ खोलते हुए बोलीं—
“आओ। लेकिन आज कोई शैतानी नहीं।”
पिताजी उनके पास आए। जैसे ही स्तन सामने आया, उन्होंने पहले निपल को जीभ से चाटा, फिर हल्के दाँतों से काटा।
मनीषा चाची झट से उनके सिर पर थपकी दी।
“फिर से दाँत! कितनी बार कहा है काटना बंद करो!”
पिताजी ने मुँह नहीं हटाया। निपल को फिर चाटते हुए बोले—
“आदत है यार…”
“आदत छोड़ो वरना हटा दूँगी!” मनीषा चाची ने उनका सर पकड़कर सीधा किया। “साफ़-साफ़ पियो। नहीं तो आज नहीं मिलेगा।”
पिताजी ने अनमने मन से मुँह लगाया। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर जीभ निकालकर निपल सहलाने लगे। मनीषा चाची ने दोबारा थपकी दी।
“फिर शुरू! एक दिन सच में काट लूँगी तुम्हारी जीभ।”
सुजाता चाची दूसरी तरफ़ बैठी ये सब देख रही थीं। उन्होंने सिर हिलाया।
“रोज़ का नाटक। कभी सीधा नहीं पीते।”
मैं चुपचाप देख रहा था। पिताजी दूध तो पी रहे थे, लेकिन बार-बार जीभ और दाँत से छेड़छाड़ कर रहे थे। मनीषा चाची लगातार डाँट रही थीं, थपकी दे रही थीं, लेकिन पिलाती जा रही थीं।
जब आखिर में पिताजी ने छोड़ा तो मनीषा चाची ने ब्लाउज़ झटके से बंद किया।
“अगली बार पहले खाना खाना। रोज़ का ये तमाशा बर्दाश्त नहीं होगा।”
पिताजी चुपचाप थाली अपने पास खींच ली। चेहरे पर शर्मिंदगी कम, संतुष्टि ज़्यादा थी।
सुजाता चाची ने मेरी तरफ़ देखा।
“अब समझा? ये लोग सिर्फ़ दूध नहीं माँगते। छेड़छाड़ भी ज़रूरी समझते हैं। हम डाँटते हैं, गाली देते हैं… फिर भी पिलाना पड़ता है।”
मैंने सिर हिलाया।
घर का नियम साफ होता जा रहा था।
औरतें गुस्सा करतीं।
मर्द फिर भी अपना काम निकाल लेते।

रात हो गई।
खाना खत्म होने के बाद सब सोने की तैयारी करने लगे। दादाजी लाठी टेकते हुए उठे और सीधे बोले—
“आज तुम्हारे बीच में सोऊँगा। और पहले दूध भी चाहिए।”
मनीषा चाची ने आँखें घुमाईं।
“बाबा, अब रात को भी? दिन भर पी चुके हो।”
दादाजी ने लाठी ज़मीन पर पटकाई।
“पीना है। जल्दी करो।”
सुजाता चाची ने बिस्तर ठीक करते हुए कहा—
“आ जाओ। लेकिन आज कोई मसलाई-दबाई नहीं। सिर्फ़ पीना।”
दादाजी दोनों चाचियों के बीच लेट गए। मनीषा चाची ने ब्लाउज़ खोला। जैसे ही स्तन बाहर आया, दादाजी ने एक हाथ से उसे पकड़ लिया और जोर से दबाने लगे।
मनीषा चाची ने झट से उनका हाथ झटक दिया।
“बाबा! फिर वही! हाथ मत लगाओ।”
दादाजी बुड़बुड़ाए—
“दबाए बिना अच्छा नहीं लगता।”
“लगे या न लगे, आज नहीं दबाओगे।” मनीषा चाची ने उनका सर पकड़कर स्तन मुँह में दे दिया। “सिर्फ़ पियो।”
दादाजी अनमने मन से पीने लगे। बीच-बीच में हाथ फिर स्तन की तरफ़ जाता तो मनीषा चाची थपकी दे देतीं।
“हाथ रोको वरना हटा दूँगी।”
सुजाता चाची दूसरी तरफ़ से देख रही थीं। उन्होंने भी ब्लाउज़ खोला और कहा—
“इधर भी आ जाओ बाबा। लेकिन शर्त वही है—हाथ दूर।”
दादाजी ने मनीषा का स्तन छोड़ा और सुजाता की तरफ़ खिसक गए। इस बार उन्होंने दबाने की कोशिश नहीं की, लेकिन मुँह लगाते ही निपल को जीभ से जोर से चाटने लगे।
सुजाता चाची ने उनका सर धक्का दिया।
“चाटना बंद करो! रोज़ की तरह गंदी आदत मत निकालो।”
दादाजी ने मुँह हटाकर कहा—
“तेरे स्तन मीठे लगते हैं।”
“मीठे लगें तो चुपचाप पियो। जीभ मत चलाओ।”
थोड़ी देर बाद दादाजी की आँखें बंद होने लगीं। दोनों चाचियाँ उन्हें सुलाकर उठ खड़ी हुईं। मनीषा चाची ने ब्लाउज़ बंद करते हुए गाली दी—
“रोज़ का यही चक्कर। दबाओ, चाटो, काटो… कभी सीधा नहीं पीते ये लोग।”
सुजाता चाची ने सिर हिलाया।
“चल, राजू के पास चलते हैं। कम से कम वो इतनी शैतानी नहीं करता।”
दोनों मेरे बिस्तर के पास आईं। मनीषा चाची ने हँसते हुए पूछा—
“गर्लफ्रेंड है कोई?”
मैंने सिर नकारात्मक में हिलाया। दोनों हँसीं। सुजाता चाची ने ब्लाउज़ थोड़ा नीचे किया और निपल उंगलियों में पकड़कर मेरे मुँह के पास ले आईं।
“पी ले। रात का हिस्सा भी तेरा है।”
मैंने लगा लिया। इस बार कोई हाथ नहीं दबाने आया, कोई जीभ नहीं चली। सिर्फ़ दूध था। दोनों चाचियाँ पास बैठी हल्के स्वर में बातें करती रहीं। कभी-कभी एक-दूसरे के स्तन छूकर हँस पड़तीं।
जब मैंने छोड़ा तो सुजाता चाची ने कहा—
“अब सो जा। सुबह बाबा फिर से शुरू हो जाएँगे।”

सुबह की पहली रोशनी खिड़की से आ रही थी।
आँख खुली तो दोनों चाचियाँ मेरे दोनों तरफ़ सोई मिलीं। सुजाता चाची और मनीषा चाची। उनकी साड़ियाँ बिखरी हुई थीं और ब्लाउज़ अभी भी खुले थे। रात का सिलसिला जैसे अधूरा रह गया हो।
सुजाता चाची के स्तन भारी और गोल थे। सांवली त्वचा पर गहरे रंग के निपल। लेटी हुई अवस्था में वो दोनों तरफ़ थोड़े ढलके हुए थे। साँस लेने पर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहे थे। एक स्तन का निपल चादर के किनारे से रगड़ खा रहा था।
मनीषा चाची के स्तन छोटे लेकिन बहुत गोल और तने हुए थे। गोरी त्वचा पर हल्के गुलाबी निपल। जब उन्होंने करवट बदली तो उनका एक स्तन मेरे बाजू की तरफ़ लुढ़क आया। नरम और गर्म। साँस के साथ हल्का सा काँप रहा था।
मैं सावधानी से उठने की कोशिश कर रहा था कि मनीषा चाची ने आँखें खोल दीं।
“जल्दी उठ गया?” स्वर में नींद बाकी थी। उन्होंने बिना किसी झिझक के साड़ी ठीक करनी शुरू की। जब वो उठीं तो उनके स्तन भी साथ में हिले—गोल और सख्त। ब्रा के हुक लगाते समय उन्होंने दोनों हाथों से स्तनों को समेटकर ऊपर उठाया। निपल उनकी उंगलियों के बीच दब गए।
सुजाता चाची भी आवाज़ सुनकर जाग गईं। उन्होंने अंगड़ाई ली तो उनके भारी स्तन एक साथ ऊपर उठे और फिर धीरे से नीचे बैठ गए। साड़ी ठीक करते समय एक स्तन साड़ी के पल्लू से बाहर रह गया। उन्होंने लापरवाही से उसे अंदर किया। निपल अभी भी थोड़ा खड़ा था।
“भूख लगी है?” उन्होंने पूछा। “थोड़ा इंतज़ार कर। बाबा अभी उठेंगे। पहले उनको पिलाना है। उसके बाद तेरी बारी।”
मनीषा चाची बाल सँवारते हुए बोलीं—
“सुबह-सुबह ये शांत रहता है। बाकी लोग ऐसे नहीं होते।” उन्होंने झुककर मेरे माथे पर हल्का चुंबन ले लिया। झुकते समय उनके दोनों स्तन नीचे की तरफ़ लटक गए और फिर वापस अपनी जगह पर आ गए।
“फिक्र मत कर। सबके लिए काफी है।”
मैं बिस्तर पर बैठा रहा। दोनों चाचियाँ उठकर कमरे में घूमने लगीं। उनके स्तन साड़ी के अंदर भी अपनी हलचल दिखा रहे थे—सुजाता के भारी और धीमे, मनीषा के छोटे और फुर्तीले।
बाबा के उठने का इंतज़ार था।

थोड़ी देर में घर में हलचल शुरू हो गई।
सुजाता चाची दरवाज़े के पास चटाई पर बैठकर साड़ी ठीक कर रही थीं। तभी दादाजी लाठी टेकते हुए कमरे में आ गए। आँखें अभी पूरी तरह खुली नहीं थीं।
“सुजाता,” उन्होंने कर्कश स्वर में कहा। “इधर आ।”
सुजाता चाची ने साँस छोड़ी लेकिन मुस्कुरा दीं।
“कभी आराम नहीं करते बाबा?”
दादाजी चटाई पर बैठ गए। सुजाता चाची ने साड़ी के अंदर हाथ डालकर ब्लाउज़ खोला। उनके भारी स्तन बाहर आए—गोल, भरे हुए, निपल अभी भी थोड़े सख्त। उन्होंने दोनों हाथों से स्तन संभाले और दादाजी के मुँह के पास ले गईं।
“धीरे पीना। रोज़ की तरह जल्दी-जल्दी मत करना।”
दादाजी ने मुँह खोला। सुजाता चाची ने निपल अंदर दिया। उनके बड़े स्तन का निचला हिस्सा दादाजी के चेहरे पर भारी पड़ रहा था। वो धीरे-धीरे पीने लगे। सुजाता चाची एक हाथ से उनका सर पकड़े हुए थीं, दूसरे हाथ से स्तन को हल्के से ऊपर उठाए हुए।
मनीषा चाची झाड़ू लगाते हुए बोलीं—
“बाबा कहते हैं बच्चा नहीं हूँ, लेकिन डाँट उतनी ही पड़ती है।”
सुजाता चाची हँसीं। दूध का एक कतरा दादाजी के मुँह से गिरा तो उन्होंने हथेली से पोंछकर साड़ी पर पोंछ दिया।
“हमारे बच्चों से भी ज़्यादा तंग करते हैं ये।”
जब दादाजी ने छोड़ा तो सुजाता चाची उठ खड़ी हुईं। स्तन अभी भी बाहर थे। उन्होंने मुझे आवाज़ दी—
“राजू, अगर पीना है तो आ जा।”
मैं उनके पास बैठ गया। सुजाता चाची फिर से बैठ गईं। उनके स्तन अभी भी खुले थे—रात के बाद थोड़े हल्के, लेकिन निपल गीले और संवेदनशील। उन्होंने एक स्तन मेरे मुँह के पास लाया।
“अब शर्माने की ज़रूरत नहीं। रात को दोनों तरफ़ से खाली कर दिए थे तूने। मनीषा को भी लगाना पड़ा था।”
मैंने लगा लिया। सुजाता चाची मेरे बाल सहलाती रहीं। उनके स्तन की गर्माहट और वजन मेरे चेहरे पर महसूस हो रहा था।
उधर मनीषा चाची के छोटे बेटे चिंटू ने आकर उनकी साड़ी खींची।
“आई, भूख लगी है।”
मनीषा चाची ने झाड़ू एक तरफ़ रखी। ब्लाउज़ खोला। उनके छोटे लेकिन गोल और तने हुए स्तन बाहर आए। निपल हल्के गुलाबी। उन्होंने पल्लू से जल्दी से स्तन पोंछा और चिंटू को लगा लिया।
“धीरे,” उन्होंने कहा। “अब से घर में बच्चों को पहले पिलाना चाहिए।”
चिंटू पी रहा था। मनीषा चाची ने उसकी बाँह पर हल्की थपकी दी।
“दाँत मत लगा। होठ पूरे निपल पर रख।”
फिर उन्होंने मुझे देखा और बोलीं—
“आज से काम करते समय ब्लाउज़ खुला ही रखूँगी। बार-बार बटन खोलने में समय बर्बाद होता है। जो पीना चाहे, आ जाए।”
सुजाता चाची ने सिर हिलाया। उनके स्तन अभी भी खुले थे। वो उठकर रसोई की तरफ़ बढ़ीं। चलते समय उनके भारी स्तन धीरे-धीरे हिले।
“नाश्ता करके बाहर बैठना,” उन्होंने कहा। “आज खेत में भी जाना है।”
मैं मुँह पोंछता हुआ उठ खड़ा हुआ।
सुबह की शुरुआत हो चुकी थी।
 
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RajuWalvan

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शादी वाले घर पहुँचते-पहुँचते सब थक चुके थे।
मर्द लोग—दादाजी, पिताजी और मैं—पिछवाड़े के एक छोटे कमरे में आराम करने चले गए। सुजाता चाची और मनीषा चाची मेहमानों के स्वागत में व्यस्त हो गईं। कमरा तंग था, गर्मी ज़्यादा।
थोड़ी देर बाद एक औरत अंदर आई।
संजीवनी।
दादाजी के भाई की बहू। उम्र करीब पच्चीस। शरीर सुडौल था—न बहुत पतला, न भारी। कंधे गोल, कमर पतली, और स्तन साड़ी के अंदर भी अपनी गोल बनावट दिखा रहे थे। चेहरा संतुलित था। बड़ी आँखें, सीधी नाक, और होंठ ऐसे कि देखकर ही मुँह में पानी आ जाए। मोटे नहीं, लेकिन मुलायम और गुलाबी। कोई भी मर्द अगर उसे बोलते हुए देख ले तो बस देखते रह जाए। साड़ी जैसे अप्सरा ने पहन रखी हो—हलकी सी चमक, ठीक से पली हुई, और हर कदम पर कमर और स्तनों की हलचल साफ दिख रही थी। ब्लाउज़ पसीने से थोड़ा चिपका हुआ था। गोद में उसका छोटा बेटा था।
“मुझे कहा गया है कि तुम लोगों का ख्याल रखूँ,” उसने हँसते हुए कहा। आवाज़ भी वैसी ही थी—मीठी और धीमी।
दादाजी ने सिर उठाया।
“संजीवनी, मदद कर सकती हो? सुजाता और मनीषा घंटों से नज़र नहीं आ रहीं।”
संजीवनी पहले समझी नहीं।
“क्या मतलब?”
पिताजी ने हँसकर कहा—
“खाना नहीं। दूध। सुजाता और मनीषा हमेशा पिलाती हैं, लेकिन आज व्यस्त हैं।”
संजीवनी की आँखें बड़ी हो गईं। फिर वो हँस पड़ी। होंठ खुलते ही उनकी मुलायम लकीर और साफ दिखी।
“मतलब… सच में पिलाती हैं? तीनों को?”
दादाजी ने गर्व से कहा—
“हाँ। हमारी आदत है।”
संजीवनी थोड़ी देर सोचती रही, फिर बोली—
“ठीक है। पिला सकती हूँ। लेकिन सुजाता और मनीषा जितनी आसान नहीं हूँगी।”
उसका बेटा तभी रोने लगा। संजीवनी चटाई पर बैठ गई। साड़ी का पल्लू सरका तो उसका सुडौल शरीर और साफ नज़र आया। उसने ब्लाउज़ खोला और बच्चे को एक स्तन से लगा लिया। स्तन गोल और तने हुए थे। फिर दादाजी की तरफ़ देखा।
“कौन पहले?”
दादाजी तुरंत पास आ गए।
“मैं। उम्र में बड़ा हूँ।”
संजीवनी ने बच्चे को बाएँ स्तन पर शिफ्ट किया और दादाजी को दाएँ स्तन से लगा लिया। दादाजी ने ज़ोर से खींचा तो संजीवनी ने उनके कान पर थपकी दी।
“हल्के से बाबा! गाय नहीं हूँ मैं।”
पिताजी हँस रहे थे।
“अब तुम भी क्लब में आ गईं। ये दोनों ऐसे ही हैं।”
जब बच्चे ने छोड़ दिया तो संजीवनी ने उसे पास लिटा दिया और पिताजी को बुलाया। दादाजी तब तक एक स्तन खाली कर चुके थे।
“भैया, अब तुम। लेकिन दाँत मत लगाना।”
पिताजी लग गए। संजीवनी दोनों को पिलाते-पिलाते थक गईं। आखिर में उसने ब्लाउज़ बंद करते हुए कहा—
“बस। अब और नहीं। और चाहिए तो सुजाता-मनीषा को ढूँढो।”
मैं कोने से देख रहा था। हिम्मत करके धीरे से बोला—
“मैं…?”
संजीवनी मेरी तरफ़ देखी। थोड़ी हैरान हुई, फिर मुस्कुराई। उसके होंठ ऐसे मुड़े जैसे कोई आमंत्रण हो।
“तू भी? दूध तो खत्म हो गया। सूखा ही पिलाऊँगी।”
मैं उसकी गोद में लेट गया। संजीवनी ने स्तन मुँह में दिया। इस बार जल्दीबाज़ी नहीं थी। मैंने धीरे और संभलकर पिया। संजीवनी के चेहरे पर अजीब सा आराम दिखने लगा। उसके सुडौल शरीर की गर्माहट मेरे चेहरे पर पड़ रही थी।
“तू ठीक से पीता है,” उसने मेरे बाल सहलाते हुए कहा। “कोई ज़्यादा खींचता नहीं। अब से सिर्फ़ तुझे ही पिलाऊँगी। ये दोनों बहुत तंग करते हैं।”
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। सुजाता चाची और मनीषा चाची अंदर आ गईं।
“ये क्या चल रहा है?” सुजाता चाची ने पूछा।
संजीवनी ने सूखे स्वर में जवाब दिया—
“इन्होंने मुझे गाय बना दिया। अब समझ आया तुम रोज़ क्यों शिकायत करती हो।”
मनीषा चाची ने मर्दों को घूरते हुए कहा—
“हम कुछ घंटे छोड़कर गए और तुमने दूसरी औरत ढूँढ ली।”
दादाजी ने बचाव में कहा—
“तुम लोग व्यस्त थीं।”
सुजाता चाची ने सिर हिलाया।
“संजू, इनके चक्कर में मत पड़ना। वर्ना फुल-टाइम आया बना देंगी।”
संजीवनी हँसी। उसके होंठ फिर से उसी आकर्षक अंदाज़ में मुड़े।
“फिक्र मत करो। मैंने तय कर लिया। अब सिर्फ़ राजू को पिलाऊँगी। ये दोनों नामुमकिन हैं।”
सुजाता चाची संजीवनी के बेटे को अपनी गोद में ले गईं। मनीषा चाची मुझे कमरे के दूसरे कोने में ले गईं।
“राजू ज़्यादा लायक है हमारे ख्याल का,” उन्होंने हँसते हुए कहा।

शादी के घर में बहुत भीड़ थी।
हँसी-शोर, बर्तनों की आवाज़, ढोलक की थाप। सुजाता चाची और मनीषा चाची लगातार काम में लगी थीं। साड़ी कमर में तनी हुई, पल्लू पसीने से गीला। दादाजी बरामदे में कुर्सी पर बैठे चेहरा फुलाए हुए थे। लाठी ज़मीन पर पट-पट कर रहे थे।
सुजाता चाची जब लड्डू का थाल लेकर निकलीं तो दादाजी बड़बड़ाए—
“इतना खाना, इतना शोर। किसी को मेरी पड़ी नहीं। भूख लगी है।”
सुजाता चाची ने थाल रखा।
“बाबा, अब क्या? खाना तो चारों तरफ़ पड़ा है।”
“तुम जानती हो क्या चाहिए। पागल मत बनाओ।”
सुजाता चाची की भौंहें चढ़ गईं।
“अभी नहीं। घर भरा पड़ा है।”
“बहुत इंतज़ार कर लिया। गिर जाऊँगा यहाँ।”
मनीषा चाची भी आ गईं। हालत समझ गईं। माथा पोंछते हुए बोलीं—
“बाबा नामुमकिन हो। ठीक है, लेकिन जल्दी। कोई देख ले तो…”
दादाजी तुरंत उठ खड़े हुए। मनीषा चाची उन्हें घर के पिछले हिस्से के छोटे स्टोर रूम में ले गईं। अँधेरा-सा कमरा था। उन्होंने दादाजी को स्टूल पर बैठाया और खुद खड़ी होकर ब्लाउज़ खोला।
“ले लो। खड़े-खड़े ही निपटाना है।”
दादाजी लग गए। मनीषा चाची ने पल्लू उनके चेहरे पर डाल रखा था। कभी स्तन दबातीं, कभी उनके कान पकड़ लेतीं।
“ज़ोर से मत खींचो।”
थोड़ी देर बाद सुजाता चाची ने झाँककर देखा।
“मनीषा, कितनी देर लगाओगी? एक साथ गायब नहीं हो सकते।”
मनीषा चाची ने दादाजी का सर हटाया।
“लो बाबा, अब सुजाता की बारी।”
सुजाता चाची स्टूल पर बैठ गईं। दादाजी उनकी गोद में आ गए। उन्होंने भी ब्लाउज़ खोलकर पिलाना शुरू कर दिया।
“पी लो जितना पीना है। जल्दी।”
उधर पिताजी रसोई के पास घूम रहे थे। अचानक नाटकीय अंदाज़ में सिर पकड़ लिया।
“तबीयत खराब लग रही है। लेटना है।”
रिश्तेदार चारों तरफ़ जमा हो गए। मनीषा चाची ने समझ लिया। उन्होंने थाल नीचे रखा।
“मैं ले चलती हूँ।”
गेस्ट रूम में ले जाकर दरवाज़ा बंद करते ही पिताजी की अदाखारी खत्म हो गई। मुस्कुराते हुए बोले—
“भूख लगी है।”
मनीषा चाची ने झुंझलाते हुए ब्लाउज़ खोला।
“आखिरी बार आज। और खेलना शुरू मत करना।”
पिताजी लग गए। मनीषा चाची सिरहाने के सहारे बैठी थीं। तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।
“मनीषा? अंदर हो?”
मनीषा चाची ने झट से पिताजी को हटाया और साड़ी ठीक की।
“हाँ, आ रही हूँ!”
दरवाज़ा खुला तो घर की एक मोटी-सी कामवाली खड़ी थी। पसीने से चमकता चेहरा। उसकी नज़र मनीषा चाची के खुले ब्लाउज़ पर गई।
“कोई मदद चाहिए?”
मनीषा चाची ने एक पल सोचा, फिर मुस्कुराईं।
“हाँ। तुम इन्हें थोड़ी देर अपना दूध पिला दो।”
कामवाली हैरान हुई, फिर हँस पड़ी।
“दूध तो नहीं है। लेकिन ठीक है।”
वो बैठ गई और ब्लाउज़ उतारने लगी। मनीषा चाची कमरे से बाहर निकल गईं। पीछे मुड़कर देखा तो पिताजी कामवाली के बड़े स्तनों पर लग चुके थे।
शाम को जब पिताजी वापस आए तो चेहरा बहुत संतुष्ट था। मनीषा चाची ने घूरकर देखा लेकिन कुछ नहीं बोलीं।
रात को जब थोड़ी राहत मिली तो सुजाता चाची ने मनीषा के कान में कहा—
“अगली बार इन्हें घर पर ही छोड़कर आना चाहिए था।”
मनीषा चाची अपने स्तनों पर दाँत के निशान जाँचते हुए हँसीं।
“अगली बार सच में छोड़ दूँगी।”
शादी खत्म होने के बाद दादाजी के छोटे भाई ने कहा—
“मैं गाड़ी में छोड़ दूँगा। अकेले मत जाना।”
उन्होंने अपनी बहू संजीवनी की तरफ़ देखा।
“तू भी साथ चल। नहीं तो मुझे वापस अकेले आना पड़ेगा।”
संजीवनी ने पति से इजाज़त ली और तैयार हो गई। गाड़ी में सब बैठे। मर्द लोग थककर जल्दी सो गए। सुजाता चाची और मनीषा चाची को भी कुछ देर की नींद मिल गई।
रात के अँधेरे में घर पहुँचे। आँगन में नीम की छाया पड़ रही थी। दादाजी और पिताजी चारपाई पर गिरकर लेट गए। संजीवनी का बच्चा उसकी साड़ी पकड़े खड़ा था। मैं भी पास ही था।
सुजाता चाची ने कहा—
“हम दोनों नहा-धोकर आते हैं। तुम थोड़ी देर इनका ख्याल रखना संजीवनी।”
संजीवनी की आँखें बड़ी हो गईं।
“मैं?”
“हाँ। बेटे जैसा ही सँभाल लेना।”
दोनों चाचियाँ अंदर चली गईं। कमरे में सिर्फ़ संजीवनी, उसका बच्चा, दादाजी, पिताजी और मैं रह गए।
दादाजी ने करवट बदली।
“कहाँ गईं वो?”
“अभी आएँगी बाबा। आराम करो।”
दादाजी उठकर बैठ गए।
“प्यास लगी है।”
संजीवनी ने चारों तरफ़ देखा। फिर अनाज की बोरियों वाले कोने का इशारा किया।
“वहाँ चलो। यहाँ कोई देख लेगा।”
दादाजी लड़खड़ाते हुए कोने में गए। संजीवनी ने ब्लाउज़ खोला और जल्दी-जल्दी स्तन उनके मुँह में दे दिया।
“जल्दी निपटाओ।”
दादाजी ज़ोर से पीने लगे। संजीवनी कभी उनका हाथ हटातीं, कभी खुद का संतुलन संभालतीं। तभी पिताजी भी दरवाज़े पर आ खड़े हुए।
“मेरी भी बारी।”
संजीवनी ने सिर पकड़ लिया।
“सुजाता-मनीषा का इंतज़ार नहीं कर सकते?”
“व्यस्त हैं।”
संजीवनी ने दूसरा स्तन खोला।
“लो। लेकिन जल्दी।”
दोनों मर्द एक साथ उसके स्तनों पर लगे थे। तभी बाहर से कदमों की आवाज़ आई। संजीवनी ने झट से दोनों को हटाया और ब्लाउज़ बंद किया। सुजाता चाची दरवाज़े पर थीं।
“क्या हो रहा है यहाँ?”
संजीवनी ने राहत की साँस ली।
“अच्छे हुए आप आ गईं।”
सुजाता चाची ने मर्दों को चारपाई पर भेज दिया। संजीवनी का बच्चा गोद में लेकर बोलीं—
“सावधान रहना। कोई और देख ले तो सवाल उठेंगे।”
संजीवनी ने सिर हिलाया। गाल लाल हो रहे थे।

सुबह की रोशनी घर में फैल रही थी।
संजीवनी चटाई पर बैठी थी। बच्चा पास में खिलौने से खेल रहा था। साड़ी का पल्लू ढीला था। मैं उसकी गोद में लेटा हुआ था। सिर उसके बाजू पर टिका था। होंठ उसके निपल पर लगे हुए थे। आँखें आधी बंद।
संजीवनी एक हाथ से मेरे सर को सहला रही थी। कभी-कभी बालों में उंगलियाँ फेर देती। मैंने थोड़ा जोर से खींचा तो उसने हल्की सिसकी ली, लेकिन कुछ नहीं बोली। बस हाथ से और पास खींच लिया। ब्लाउज़ ऊपर तक खुला था। पल्लू से ढक रखा था, लेकिन अंदर से गर्माहट साफ महसूस हो रही थी।
कमरे में सिर्फ़ मेरे चूसने की धीमी आवाज़ और बच्चे की हल्की किलकारियाँ थीं। संजीवनी की साँसें भी शांत थीं। पसीने की छोटी बूँदें उसके माथे पर चमक रही थीं, लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की।
तभी तेज़ आवाज़ आई—
“संजीवनी!”
वो चौंक गई। पल्लू झट से खींच लिया। मैंने मुँह हटाया। बच्चा रोने लगा।
उसके ससुर दरवाज़े पर खड़े थे। आँखें फटी हुईं। नज़र खुले ब्लाउज़, गीले निपल और मेरे चेहरे पर गई।
“ये क्या चल रहा है?”
संजीवनी काँपते हाथों से ब्लाउज़ बंद करने लगीं।
“कुछ नहीं बाबा। तबीयत ठीक नहीं थी इनकी। बस दिलासा दे रही थी।”
“दिलासा? इतने बड़े लड़के को दूध पिलाकर? पागल हो गई हो क्या?”
संजीवनी सिर झुकाए खड़ी रही। गाल लाल हो गए थे।
तभी सुजाता चाची और मनीषा चाची आ गईं। आवाज़ सुनकर। सुजाता चाची ने शांत स्वर में कहा—
“सासुरजी, गुस्सा मत कीजिए। आप समझ नहीं पाएँगे।”
“क्या नहीं समझूँगा? जवान लड़के को बच्चा बना रखा है! शर्म की बात है!”
मनीषा चाची ने बाँहें जोड़ लीं।
“खाना खिलाना कोई जुर्म है क्या?”
“खाना? ये खाना है? लोग जान जाएँ तो क्या कहेंगे?”
सुजाता चाची ने साफ़ कहा—
“इस घर में परिवार का ख्याल रखने का तरीका अलग है। गलत कुछ नहीं किया संजीवनी ने।”
ससुरजी हाथ हिलाते हुए बाहर चले गए।
“हम जा रहे हैं। अभी।”
कमरे में चुप्पी छा गई। संजीवनी के गाल जल रहे थे। मनीषा चाची ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“परवाह मत करो। वो समझ नहीं सकते।”
सुजाता चाची ने भी सिर हिलाया।
“जो सोचना है सोचें। हमें पता है अपने बच्चों के लिए क्या सही है।”
संजीवनी ने मेरी तरफ़ देखा। मैं सिर झुकाए खड़ा था। उसने माथे पर हल्का सा चुंबन लिया।
“कोई बात नहीं बेटा। तुम्हें बुरा नहीं लगना चाहिए।”
 
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