शादी वाले घर पहुँचते-पहुँचते सब थक चुके थे।
मर्द लोग—दादाजी, पिताजी और मैं—पिछवाड़े के एक छोटे कमरे में आराम करने चले गए। सुजाता चाची और मनीषा चाची मेहमानों के स्वागत में व्यस्त हो गईं। कमरा तंग था, गर्मी ज़्यादा।
थोड़ी देर बाद एक औरत अंदर आई।
संजीवनी।
दादाजी के भाई की बहू। उम्र करीब पच्चीस। शरीर सुडौल था—न बहुत पतला, न भारी। कंधे गोल, कमर पतली, और स्तन साड़ी के अंदर भी अपनी गोल बनावट दिखा रहे थे। चेहरा संतुलित था। बड़ी आँखें, सीधी नाक, और होंठ ऐसे कि देखकर ही मुँह में पानी आ जाए। मोटे नहीं, लेकिन मुलायम और गुलाबी। कोई भी मर्द अगर उसे बोलते हुए देख ले तो बस देखते रह जाए। साड़ी जैसे अप्सरा ने पहन रखी हो—हलकी सी चमक, ठीक से पली हुई, और हर कदम पर कमर और स्तनों की हलचल साफ दिख रही थी। ब्लाउज़ पसीने से थोड़ा चिपका हुआ था। गोद में उसका छोटा बेटा था।
“मुझे कहा गया है कि तुम लोगों का ख्याल रखूँ,” उसने हँसते हुए कहा। आवाज़ भी वैसी ही थी—मीठी और धीमी।
दादाजी ने सिर उठाया।
“संजीवनी, मदद कर सकती हो? सुजाता और मनीषा घंटों से नज़र नहीं आ रहीं।”
संजीवनी पहले समझी नहीं।
“क्या मतलब?”
पिताजी ने हँसकर कहा—
“खाना नहीं। दूध। सुजाता और मनीषा हमेशा पिलाती हैं, लेकिन आज व्यस्त हैं।”
संजीवनी की आँखें बड़ी हो गईं। फिर वो हँस पड़ी। होंठ खुलते ही उनकी मुलायम लकीर और साफ दिखी।
“मतलब… सच में पिलाती हैं? तीनों को?”
दादाजी ने गर्व से कहा—
“हाँ। हमारी आदत है।”
संजीवनी थोड़ी देर सोचती रही, फिर बोली—
“ठीक है। पिला सकती हूँ। लेकिन सुजाता और मनीषा जितनी आसान नहीं हूँगी।”
उसका बेटा तभी रोने लगा। संजीवनी चटाई पर बैठ गई। साड़ी का पल्लू सरका तो उसका सुडौल शरीर और साफ नज़र आया। उसने ब्लाउज़ खोला और बच्चे को एक स्तन से लगा लिया। स्तन गोल और तने हुए थे। फिर दादाजी की तरफ़ देखा।
“कौन पहले?”
दादाजी तुरंत पास आ गए।
“मैं। उम्र में बड़ा हूँ।”
संजीवनी ने बच्चे को बाएँ स्तन पर शिफ्ट किया और दादाजी को दाएँ स्तन से लगा लिया। दादाजी ने ज़ोर से खींचा तो संजीवनी ने उनके कान पर थपकी दी।
“हल्के से बाबा! गाय नहीं हूँ मैं।”
पिताजी हँस रहे थे।
“अब तुम भी क्लब में आ गईं। ये दोनों ऐसे ही हैं।”
जब बच्चे ने छोड़ दिया तो संजीवनी ने उसे पास लिटा दिया और पिताजी को बुलाया। दादाजी तब तक एक स्तन खाली कर चुके थे।
“भैया, अब तुम। लेकिन दाँत मत लगाना।”
पिताजी लग गए। संजीवनी दोनों को पिलाते-पिलाते थक गईं। आखिर में उसने ब्लाउज़ बंद करते हुए कहा—
“बस। अब और नहीं। और चाहिए तो सुजाता-मनीषा को ढूँढो।”
मैं कोने से देख रहा था। हिम्मत करके धीरे से बोला—
“मैं…?”
संजीवनी मेरी तरफ़ देखी। थोड़ी हैरान हुई, फिर मुस्कुराई। उसके होंठ ऐसे मुड़े जैसे कोई आमंत्रण हो।
“तू भी? दूध तो खत्म हो गया। सूखा ही पिलाऊँगी।”
मैं उसकी गोद में लेट गया। संजीवनी ने स्तन मुँह में दिया। इस बार जल्दीबाज़ी नहीं थी। मैंने धीरे और संभलकर पिया। संजीवनी के चेहरे पर अजीब सा आराम दिखने लगा। उसके सुडौल शरीर की गर्माहट मेरे चेहरे पर पड़ रही थी।
“तू ठीक से पीता है,” उसने मेरे बाल सहलाते हुए कहा। “कोई ज़्यादा खींचता नहीं। अब से सिर्फ़ तुझे ही पिलाऊँगी। ये दोनों बहुत तंग करते हैं।”
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। सुजाता चाची और मनीषा चाची अंदर आ गईं।
“ये क्या चल रहा है?” सुजाता चाची ने पूछा।
संजीवनी ने सूखे स्वर में जवाब दिया—
“इन्होंने मुझे गाय बना दिया। अब समझ आया तुम रोज़ क्यों शिकायत करती हो।”
मनीषा चाची ने मर्दों को घूरते हुए कहा—
“हम कुछ घंटे छोड़कर गए और तुमने दूसरी औरत ढूँढ ली।”
दादाजी ने बचाव में कहा—
“तुम लोग व्यस्त थीं।”
सुजाता चाची ने सिर हिलाया।
“संजू, इनके चक्कर में मत पड़ना। वर्ना फुल-टाइम आया बना देंगी।”
संजीवनी हँसी। उसके होंठ फिर से उसी आकर्षक अंदाज़ में मुड़े।
“फिक्र मत करो। मैंने तय कर लिया। अब सिर्फ़ राजू को पिलाऊँगी। ये दोनों नामुमकिन हैं।”
सुजाता चाची संजीवनी के बेटे को अपनी गोद में ले गईं। मनीषा चाची मुझे कमरे के दूसरे कोने में ले गईं।
“राजू ज़्यादा लायक है हमारे ख्याल का,” उन्होंने हँसते हुए कहा।
शादी के घर में बहुत भीड़ थी।
हँसी-शोर, बर्तनों की आवाज़, ढोलक की थाप। सुजाता चाची और मनीषा चाची लगातार काम में लगी थीं। साड़ी कमर में तनी हुई, पल्लू पसीने से गीला। दादाजी बरामदे में कुर्सी पर बैठे चेहरा फुलाए हुए थे। लाठी ज़मीन पर पट-पट कर रहे थे।
सुजाता चाची जब लड्डू का थाल लेकर निकलीं तो दादाजी बड़बड़ाए—
“इतना खाना, इतना शोर। किसी को मेरी पड़ी नहीं। भूख लगी है।”
सुजाता चाची ने थाल रखा।
“बाबा, अब क्या? खाना तो चारों तरफ़ पड़ा है।”
“तुम जानती हो क्या चाहिए। पागल मत बनाओ।”
सुजाता चाची की भौंहें चढ़ गईं।
“अभी नहीं। घर भरा पड़ा है।”
“बहुत इंतज़ार कर लिया। गिर जाऊँगा यहाँ।”
मनीषा चाची भी आ गईं। हालत समझ गईं। माथा पोंछते हुए बोलीं—
“बाबा नामुमकिन हो। ठीक है, लेकिन जल्दी। कोई देख ले तो…”
दादाजी तुरंत उठ खड़े हुए। मनीषा चाची उन्हें घर के पिछले हिस्से के छोटे स्टोर रूम में ले गईं। अँधेरा-सा कमरा था। उन्होंने दादाजी को स्टूल पर बैठाया और खुद खड़ी होकर ब्लाउज़ खोला।
“ले लो। खड़े-खड़े ही निपटाना है।”
दादाजी लग गए। मनीषा चाची ने पल्लू उनके चेहरे पर डाल रखा था। कभी स्तन दबातीं, कभी उनके कान पकड़ लेतीं।
“ज़ोर से मत खींचो।”
थोड़ी देर बाद सुजाता चाची ने झाँककर देखा।
“मनीषा, कितनी देर लगाओगी? एक साथ गायब नहीं हो सकते।”
मनीषा चाची ने दादाजी का सर हटाया।
“लो बाबा, अब सुजाता की बारी।”
सुजाता चाची स्टूल पर बैठ गईं। दादाजी उनकी गोद में आ गए। उन्होंने भी ब्लाउज़ खोलकर पिलाना शुरू कर दिया।
“पी लो जितना पीना है। जल्दी।”
उधर पिताजी रसोई के पास घूम रहे थे। अचानक नाटकीय अंदाज़ में सिर पकड़ लिया।
“तबीयत खराब लग रही है। लेटना है।”
रिश्तेदार चारों तरफ़ जमा हो गए। मनीषा चाची ने समझ लिया। उन्होंने थाल नीचे रखा।
“मैं ले चलती हूँ।”
गेस्ट रूम में ले जाकर दरवाज़ा बंद करते ही पिताजी की अदाखारी खत्म हो गई। मुस्कुराते हुए बोले—
“भूख लगी है।”
मनीषा चाची ने झुंझलाते हुए ब्लाउज़ खोला।
“आखिरी बार आज। और खेलना शुरू मत करना।”
पिताजी लग गए। मनीषा चाची सिरहाने के सहारे बैठी थीं। तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।
“मनीषा? अंदर हो?”
मनीषा चाची ने झट से पिताजी को हटाया और साड़ी ठीक की।
“हाँ, आ रही हूँ!”
दरवाज़ा खुला तो घर की एक मोटी-सी कामवाली खड़ी थी। पसीने से चमकता चेहरा। उसकी नज़र मनीषा चाची के खुले ब्लाउज़ पर गई।
“कोई मदद चाहिए?”
मनीषा चाची ने एक पल सोचा, फिर मुस्कुराईं।
“हाँ। तुम इन्हें थोड़ी देर अपना दूध पिला दो।”
कामवाली हैरान हुई, फिर हँस पड़ी।
“दूध तो नहीं है। लेकिन ठीक है।”
वो बैठ गई और ब्लाउज़ उतारने लगी। मनीषा चाची कमरे से बाहर निकल गईं। पीछे मुड़कर देखा तो पिताजी कामवाली के बड़े स्तनों पर लग चुके थे।
शाम को जब पिताजी वापस आए तो चेहरा बहुत संतुष्ट था। मनीषा चाची ने घूरकर देखा लेकिन कुछ नहीं बोलीं।
रात को जब थोड़ी राहत मिली तो सुजाता चाची ने मनीषा के कान में कहा—
“अगली बार इन्हें घर पर ही छोड़कर आना चाहिए था।”
मनीषा चाची अपने स्तनों पर दाँत के निशान जाँचते हुए हँसीं।
“अगली बार सच में छोड़ दूँगी।”
शादी खत्म होने के बाद दादाजी के छोटे भाई ने कहा—
“मैं गाड़ी में छोड़ दूँगा। अकेले मत जाना।”
उन्होंने अपनी बहू संजीवनी की तरफ़ देखा।
“तू भी साथ चल। नहीं तो मुझे वापस अकेले आना पड़ेगा।”
संजीवनी ने पति से इजाज़त ली और तैयार हो गई। गाड़ी में सब बैठे। मर्द लोग थककर जल्दी सो गए। सुजाता चाची और मनीषा चाची को भी कुछ देर की नींद मिल गई।
रात के अँधेरे में घर पहुँचे। आँगन में नीम की छाया पड़ रही थी। दादाजी और पिताजी चारपाई पर गिरकर लेट गए। संजीवनी का बच्चा उसकी साड़ी पकड़े खड़ा था। मैं भी पास ही था।
सुजाता चाची ने कहा—
“हम दोनों नहा-धोकर आते हैं। तुम थोड़ी देर इनका ख्याल रखना संजीवनी।”
संजीवनी की आँखें बड़ी हो गईं।
“मैं?”
“हाँ। बेटे जैसा ही सँभाल लेना।”
दोनों चाचियाँ अंदर चली गईं। कमरे में सिर्फ़ संजीवनी, उसका बच्चा, दादाजी, पिताजी और मैं रह गए।
दादाजी ने करवट बदली।
“कहाँ गईं वो?”
“अभी आएँगी बाबा। आराम करो।”
दादाजी उठकर बैठ गए।
“प्यास लगी है।”
संजीवनी ने चारों तरफ़ देखा। फिर अनाज की बोरियों वाले कोने का इशारा किया।
“वहाँ चलो। यहाँ कोई देख लेगा।”
दादाजी लड़खड़ाते हुए कोने में गए। संजीवनी ने ब्लाउज़ खोला और जल्दी-जल्दी स्तन उनके मुँह में दे दिया।
“जल्दी निपटाओ।”
दादाजी ज़ोर से पीने लगे। संजीवनी कभी उनका हाथ हटातीं, कभी खुद का संतुलन संभालतीं। तभी पिताजी भी दरवाज़े पर आ खड़े हुए।
“मेरी भी बारी।”
संजीवनी ने सिर पकड़ लिया।
“सुजाता-मनीषा का इंतज़ार नहीं कर सकते?”
“व्यस्त हैं।”
संजीवनी ने दूसरा स्तन खोला।
“लो। लेकिन जल्दी।”
दोनों मर्द एक साथ उसके स्तनों पर लगे थे। तभी बाहर से कदमों की आवाज़ आई। संजीवनी ने झट से दोनों को हटाया और ब्लाउज़ बंद किया। सुजाता चाची दरवाज़े पर थीं।
“क्या हो रहा है यहाँ?”
संजीवनी ने राहत की साँस ली।
“अच्छे हुए आप आ गईं।”
सुजाता चाची ने मर्दों को चारपाई पर भेज दिया। संजीवनी का बच्चा गोद में लेकर बोलीं—
“सावधान रहना। कोई और देख ले तो सवाल उठेंगे।”
संजीवनी ने सिर हिलाया। गाल लाल हो रहे थे।
सुबह की रोशनी घर में फैल रही थी।
संजीवनी चटाई पर बैठी थी। बच्चा पास में खिलौने से खेल रहा था। साड़ी का पल्लू ढीला था। मैं उसकी गोद में लेटा हुआ था। सिर उसके बाजू पर टिका था। होंठ उसके निपल पर लगे हुए थे। आँखें आधी बंद।
संजीवनी एक हाथ से मेरे सर को सहला रही थी। कभी-कभी बालों में उंगलियाँ फेर देती। मैंने थोड़ा जोर से खींचा तो उसने हल्की सिसकी ली, लेकिन कुछ नहीं बोली। बस हाथ से और पास खींच लिया। ब्लाउज़ ऊपर तक खुला था। पल्लू से ढक रखा था, लेकिन अंदर से गर्माहट साफ महसूस हो रही थी।
कमरे में सिर्फ़ मेरे चूसने की धीमी आवाज़ और बच्चे की हल्की किलकारियाँ थीं। संजीवनी की साँसें भी शांत थीं। पसीने की छोटी बूँदें उसके माथे पर चमक रही थीं, लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की।
तभी तेज़ आवाज़ आई—
“संजीवनी!”
वो चौंक गई। पल्लू झट से खींच लिया। मैंने मुँह हटाया। बच्चा रोने लगा।
उसके ससुर दरवाज़े पर खड़े थे। आँखें फटी हुईं। नज़र खुले ब्लाउज़, गीले निपल और मेरे चेहरे पर गई।
“ये क्या चल रहा है?”
संजीवनी काँपते हाथों से ब्लाउज़ बंद करने लगीं।
“कुछ नहीं बाबा। तबीयत ठीक नहीं थी इनकी। बस दिलासा दे रही थी।”
“दिलासा? इतने बड़े लड़के को दूध पिलाकर? पागल हो गई हो क्या?”
संजीवनी सिर झुकाए खड़ी रही। गाल लाल हो गए थे।
तभी सुजाता चाची और मनीषा चाची आ गईं। आवाज़ सुनकर। सुजाता चाची ने शांत स्वर में कहा—
“सासुरजी, गुस्सा मत कीजिए। आप समझ नहीं पाएँगे।”
“क्या नहीं समझूँगा? जवान लड़के को बच्चा बना रखा है! शर्म की बात है!”
मनीषा चाची ने बाँहें जोड़ लीं।
“खाना खिलाना कोई जुर्म है क्या?”
“खाना? ये खाना है? लोग जान जाएँ तो क्या कहेंगे?”
सुजाता चाची ने साफ़ कहा—
“इस घर में परिवार का ख्याल रखने का तरीका अलग है। गलत कुछ नहीं किया संजीवनी ने।”
ससुरजी हाथ हिलाते हुए बाहर चले गए।
“हम जा रहे हैं। अभी।”
कमरे में चुप्पी छा गई। संजीवनी के गाल जल रहे थे। मनीषा चाची ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“परवाह मत करो। वो समझ नहीं सकते।”
सुजाता चाची ने भी सिर हिलाया।
“जो सोचना है सोचें। हमें पता है अपने बच्चों के लिए क्या सही है।”
संजीवनी ने मेरी तरफ़ देखा। मैं सिर झुकाए खड़ा था। उसने माथे पर हल्का सा चुंबन लिया।
“कोई बात नहीं बेटा। तुम्हें बुरा नहीं लगना चाहिए।”