उधर अपनी नकचढ़ी जी भी विश्व और उसके अतीत की सच्चाई सुनने वाली हैं (इसीलिए एक और फ्लशबैक आने वाला है - नहींईई! हा हा हा हा!)! वो वैसे भी भैरव के हाथ से फिसलती जा रही है, जब से उसको प्रेम-व्रेम का बुखार हुआ है। अब तो आफत ही है। शुभ्रा दीदी तो पहले से ही विश्व को भाई मान चुकी हैं।
और अंदर ही अंदर का कोई आदमी वीर की गाँड मार रहा है। ये एक दिक्कत वाली बात है। वो आदमी/औरत विश्व के लिए भी समस्या खड़ी कर सकता है। वीर विश्व का मित्र है - और मित्र का शत्रु, अपना शत्रु होता है। बड़ी दुविधा है। बस, विक्रम ही एक चूतिया बचा हुआ है। कुछ पाठकों को उसको ले कर संवेदनाएँ हैं, लेकिन है तो वो चूतिया ही। धर्मयुद्ध में वो एक गलत पक्ष के साथ खड़ा हुआ नज़र आता है। सही कारणों से नहीं, भ्रांत होने के कारण। ऐसे व्यक्ति की बुरी तरह से लगती है।