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जिन्दगी कारवां हैं, और मोत साकुन की नीन्द
थक चुका हू मै अब मुझको सोना है
थक चुका हू मै अब मुझको सोना है
Bahut khooob,,,,,एक उम्र वो थी कि,
जादू में भी यक़ीन था.
एक उम्र ये है कि,
हक़ीक़त पर भी शक़ है
Waaah bahut khoob,,,,,सांसों की "पायल" पहन के ज़िंदगी निकली तो है,
क्या पता कब छनके, ना जाने कब टूट जाये...
बहोत खूब , क्या बात कही है ,जिन्दगी कारवां हैं, और मोत साकुन की नीन्द
थक चुका हू मै अब मुझको सोना है
Waaah bahut khoob nik bhai,,,,,मुझे नादिम किया कल रात दरवाज़े ने ये कहकर
शरीफ़ इंसान घर से देर तक, बाहर नहीं रहते
नाज़ ख़्याल्वी
हद-ए-शहर से निकली तो गाँव गाँव चली,
कुछ यादें मेरे संग पाँव पाँव चली,
सफ़र जो धूप का किया तो तजुर्बा हुआ,
वो जिंदगी ही क्या जो छाँव छाँव चली
Shukriya Shubham bhaiBahut khooob,,,,,
Shukriya Komal ji tareef ke liyeबहोत खूब , क्या बात कही है ,
चंद अशआर इस नाचीज़ की ओर से
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अय जिन्दगी खुदा के लिए अब मुआफ कर,
बैठी हुई है मौत मेरे इन्तिजार में।
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उम्र फानी है तो मौत से डरना कैसा,
इक न इक रोज यह हंगामा हुआ रखा है।
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उसी को हम जहाँ में रहरवे-कामिल समझते हैं,
जो हस्ती को सफर और कब्र को मंजिल समझते हैं।
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मौत जब तक नजर नहीं आती,
जिन्दगी राह पर नहीं आती।
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मर्ग मांदगी का इक वक्फा है,
यानी आगे बढ़ेंगे दम लेकर।
-मीरतकी मीर
1.मर्ग- मृत्यु, मौत 2 मांदगी - शिथिलता, थकावट
3. वक्फा - दो कामों के बीच में ठहराव का समय, विराम, इन्टरवल, ठहराव