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वो पहला अहसास, जैसे बरसों की प्यास बुझी हो,
जैसे मेरे अंदर एक नयी रोशनी सजी हो।
उसकी उंगलियों ने मेरी हथेली को क्या छुआ,
एक खामोश दुआ का जैसे असर हुआ।
न कोई बंदिश रही, न कोई पुराना डर,
बस उसकी सांसों का मेरी सांसों पर सफर।
वो नया जुनून, वो दबे पांव आयी आग,
जैसे सोयी हुई रूह में जाग उठा हो राग।
उसकी बाँहों की पनाह में सारा जहाँ मिल गया,
बरसों का भटकता दिल आज सुकून से खिल गया।