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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

nain11ster

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111ramjain

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Surya_021

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Bhupinder Singh

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भाग:–184


नभीमन:– तुम यशस्वी रहो। आर्य एक मेरी भी गुजारिश है। जितनी भावना तुम्हे अपने परिवार के लिये उतनी ही भावना मुझे अपने साम्राज्य के खोए गौरव का है, जिसका दोषी मैं ही था। तुम मेरी बात समझ रहे हो ना...

आर्यमणि:– हां मैं समझ रहा हूं महाराज। मेरा वादा है आपसे की आपके साम्राज्य के गौरव को वापस लाने की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं। तब तक आप भी धैर्य बनाए रखिए और देह त्याग नही कीजिएगा...

नभीमन:– तुमने बोल दिया तो अब मैं युगों तक इंतजार करता रहूंगा। बस वो मेरा आखरी दिन होगा जब मैं नाग दंश को वापस अपने साम्राज्य में आते देखूंगा।

नभीमन अपनी बात कहते भावना विभोर हो गया। आर्यमणि ने उसके आंसू पोछे। दोनो के बीच थोड़ी और औपचारिक बातें हुई। अपने पिटारे नभीमन ने आर्यमणि को कुछ और उपहार दिये। आर्यमणि उन उपहारों को देख खुश हो गया। आर्यमणि वहां से वापस न लौटकर सीधा महासागर के तल में योगियों के प्रदेश पहुंचा। एक बार फिर ध्यान पर बैठने से पहले अल्फा पैक तक सूचना पहुंचा दिया की जब चलने के लिये तैयार हो जाओ, सूचना कर देना। आर्यमणि वहां अपनी साधना पर बैठा और इधर अल्फा पैक के सदस्य गुरियन प्लेनेट पर जाने की तैयारी में जोड़ों से जुट गये।

अल्फा पैक और सहयोगी दिन रात एक करके कई तरह के हथियार पर काम कर रहे थे। महा एक कुशल रणनीतिज्ञ थी जिसने हथियारों के हिसाब से अपने सेना की सजावट की योजना बना चुकी थी। हथियार डिजाइन करने से लेकर ऑटोमेटिक कमांड सेट करने में लगभग 8 दिन लग गये। बृहत पैमाने पर उन हथियारों को बनाने में अगला 5 दिन लग गया। चौदवे दिन सभी उड़ान भरने के लिये तैयार थे।

इसी बीच महा, पैट्रिक से एक लाख रिफ्लेक्टर ढाल की डिलेवरी ले चुकी थी। पैट्रिक एक कदम आगे बढ़कर अपनी दोस्ती निभाते, न सिर्फ एक करोड़ रिफ्लेक्टर ढाल दिया बल्कि लेजर तथा अन्य भीषण किरणों से बचने के लिये उसने 4 लाख बुलेट प्रूफ और लेजर प्रूफ सूट भी भेंट स्वरूप दे दिया। पूछने पर पता चला की सेना के लिये उनके पास ऐसे सूट की कोई कमी नही थी।

वहीं चैत्र मास में 11 दिन तक आर्यमणि ने देवी दुर्गा की साधना की थी। अपनी साधना से उठने के बाद उसने देवी दुर्गा की चरणों से गीली मिट्टी का विशाल भंडार उठाया और अंतर्ध्यान होकर सीधा नाग–लोक के भू–भाग पहुंचा। वहां उसने शेर माटुका और उसके परिवार से मिलकर इशारों में उसने अपनी योजना समझा दिया।

शेर माटुका सर झुकाकर पहले तो मिट्टी के सामने मानो नमन किया हो फिर ऊंची और लंबी दहाड़ के साथ उसने आर्यमणि के साथ जैसे युद्ध लड़ने की घोषणा कर दिया हो। शेर मटुका को लेकर आर्यमणि अंतर्ध्यान होकर सीधा एक बड़े से अंतरिक्ष विमान में पहुंचा। आर्यमणि पहली बार किसी अंतरिक्ष विमान में था। जगह मांग के हिसाब से भी कहीं ज्यादा बड़ी थी। इतनी बड़ी की आराम से उसपर 10 हजार लाख सैनिक सवार हो जाते।

आर्यमणि साधना पर बैठने से पहले ही अपस्यु से संपर्क कर चुका था। आर्यमणि ने जैसा बताया था बिलकुल एक हिस्सा उसी हिसाब से कर दिया गया था। पूर्णतः शुद्ध, पूर्णतः अभिमंत्रित और हवन–यज्ञ के पूर्ण समान के साथ। आर्यमणि जैसे ही उस हिस्से में पहुंचा, सही दिशा और सही स्थान का चुनाव करके अपने साथ लाये मिट्टी को वहां रख दिया।

उस स्थान पर पहले से ही देवी दुर्गा की एक सुंदर प्रतिमा स्थापित थी, जिसके चरणों में बैठकर आर्यमणि उन मिट्टी से छोटे–छोटे शेर का निर्माण करने लगा। 11 दिन की साधना और 2 दिन तक मिट्टी के शेर के निर्माण करने के बाद आर्यमणि भी चौदहवे दिन उड़ान भरने के लिये तैयार था।

सुबह–सुबह ही पूरा अल्फा पैक और उनके सहयोगियों को लेकर ऋषि शिवम उस विमान तक पहुंच चुके थे। आर्यमणि खुद बाहर आकर सबका स्वागत किया और सुबह के 9 बजे उनका विमान उड़ान भर चुकी थी। विमान को कैसे चलाना है उसका प्रशिक्षण पिछले 13 दिनो से चल रहा था। महा के कुशल पायलट 4 दिन में ही विमान उड़ाने की पूरी बारीकियों को एलियन से सिख चुके थे और एक साथ 21 विमान ढाई लाख सैनिक, तरह–तरह के हथियार और विस्फोटक के साथ उड़ान भर चुकी थी।

अंतरिक्ष की सीमा में घुसते ही पूरा अल्फा पैक अपने सभी सहयोगियों के साथ बड़े से राउंड टेबल पर बैठा था। सभी आपस में बात कर रहे थे। कुछ लोग पहली बार किसी युद्ध में हिस्सा ले रहे थे इसलिए उत्साहित भी उतना ज्यादा थे। सबके उत्साह और आपस के बातचीत को शांत करते हुये आर्यमणि उन सबके बीच बैठा।

आर्यमणि:– हम किस प्रकार के दुश्मन और किन हालातों का सामना करने जा रहे हैं, उसपर पहले ही चर्चा हो चुकी है। अभी हम इसलिए बैठे हैं ताकि एक जो सबसे ज्यादा परेशान करने वाला उनका हथियार है, हाइबर मेटल से बने आर्मर, उन्हे कैसे भेदा जाये। उम्मीद है इस पर कोई न कोई नतीजा निकल आया होगा।

पलक:– मेरे पास कुछ हाइबर धातु थे, उन पर हर किसी ने प्रयोग करके देख लिया। यहां तक की उसे सात्त्विक आश्रम भी ले गये लेकिन वहां से भी परिणाम वही निकला, इस धातु को किसी भी विधि तोड़ा नही जा सकता।

आर्यमणि:– और मंत्रों का असर। यदि कोई व्यक्ति आर्मर पहना हो तो क्या मंत्र उन पर असर करेगी?

ओजल:– नही बॉस, यदि आर्मर के पीछे कोई छिपा है तो मंत्र उसपर असर नही करती। हां लेकिन शरीर का जो भाग हाइबर मेटल के बाहर होगा उन पर मंत्र असर तो करेगी किंतु कुछ हाइबर मेटल के कारण बेअसर हो जायेगी।

आर्यमणि:– क्या ये धातु अपने आप अभिमंत्रित हो जाती है, जिसपर किसी भी प्रकार का मंत्र का काट अपने आप मिल जाता है।

ओजल:– हां ऐसा ही कुछ समझ लीजिए। यह धातु अपने आप में अलौकिक है। महाभारत में कर्ण के कवच का उल्लेख मिलता है, जिसे सूर्यदेव ने दिया था, वह कवच इसी धातु की बनी हुई थी। यह हाइबर धातु सदियों से सूर्यदेव की अग्नि में तपकर तैयार होता है, इसलिए इसका स्वरूप ऐसा है।

महा:– क्या मैं वरुण देवता को नमन कर एक बार इस धातु को नष्ट करने की कोशिश करूं क्या?

आर्यमणि, अजीब सी नजरों से घूरते.... “हां–हां कर लो कोशिश।”

महा:– ऐ जी ऐसे हीन नजरों से घुरकर क्यों कह रहे?

आर्यमणि:– पहले तुम अपना काम तो कर लो, फिर मैं अपनी नजरों का कारण भी बताता हूं।

महा ने अपने सर के जुड़े से एक छोटा सा पिन निकाली। जैसे ही उस छोटे से पिन को अपने हथेली पर रखी वह बड़ा सा दंश में तब्दील हो गया। महा के इस कारनामे पर ओजल बिना कहे रह नही पायी..... “दीदी कितने गुप्त हथियार अपने बदन में छिपा रखी हो?”.... ओजल के इस सवाल पर महा प्यारी सी मुस्कान के साथ उसे देखी और पाने काम में लग गयी।

वरुण देव को नमन करने के बाद महा ने अपना दंश चलाया। दंश हाइबर मेटल पर चला और अलार्म विमान का बजने लगा। दरअसल दंश से निकला कण हाइबर मेटल से टकराकर ऊपर के ओर विस्थापित हो गयी और सीधा जाकर विमान के छत से टकरा गयी। टकराने के साथ ही छोटा सा विस्फोट हुआ और विमान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया।

क्षति तो क्षति थी। इंजीनियर्स ने विमान का मुआयना किया और उसे ठीक करके चले गये। वहीं महा पूरी सभा से माफी मांगी। प्रयोग करने के लिये अलग से एक बड़े कमरे का निर्माण किया गया। महा एक बार फिर तैयार थी। बिना रुके फिर कोशिश चलती रही। अल्फा पैक और उनके सहायकों के लिये यह पहला मौका था जब वह महासागर के योद्धा को उसका दंश इस्तमाल करते हुये देख रहे थे।

दंश से लगातार घातक प्रहार होते रहे। ऐसे–ऐसे प्रहार जिसे देख सब आश्चर्यचकित थे। किंतु एक भी प्रहार सफलतापूर्वक उस हाइबर मेटल को भेद नहीं पायी। महा अफसोस भरी नजरों से सबके ओर देखती..... “बताए पतिदेव आपने उस वक्त मुझे औछी नजरों से क्यों देखा था?”

आर्यमणि:– यह आश्चर्य था.... किसी वस्तु पर यदि सूर्य देव का आशीर्वाद है तो उसे तुम वरुणदेव की माया से नष्ट कर सकती हो। क्या सूर्य देव और वरुण देव के बीच कोई स्पर्धा चल रही थी?

आर्यमणि अपनी बात समाप्त कर उस मेटल के साथ कुछ प्रयोग करना चाहा। प्रयोग करने के लिये सबसे पहले पलक को बुलाया गया। हाईवर मेटल के पीछे आर्यमणि खड़ा हो गया और पलक को मेटल के ऊपर बिजली प्रवाहित करने के लिये कहा। पलक ने नपा तुला बिजली की धारा को प्रवाह किया।

हाइबर मेटल अपना चौकाने वाले गुण दिखा रहा था। हाइबर मेटल में किसी लकड़ी की भांति गुण थे। इसपर पड़ने वाला बिजली का प्रवाह फैलता ही नही था। किसी ढीठ की तरह यह हायबर मेटल आर्यमणि के लिये सरदर्द सा बन गया था। आलम यह था की हाइबर मेटल का कोई तोड़ नही निकला और मन में कसक लिये सभी अधूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ने लगे।

खैर इस बाधा से सभी अपना ध्यान हटाकर अंतरिक्ष के सफर का लुफ्त उठाने लगे। अब यहां देखने को तो पेड़, खेत या रास्ता तो था नही, सभी लोग अंतरिक्ष में तैर रहे बड़े–बड़े पहाड़नुमा उल्का पिंड को ही देख रहे थे। तकरीबन 4 दिन के सफर के बाद सभी विमान ‘लोका एयर स्टेशन’ पर रुके। अंतरिक्ष का यह मध्य हिस्सा था, जहां से 2 दिन के सफर के बाद सफर की मंजिल थी।

लोका एयर स्टेशन पर एक दिन के विश्राम के बाद अंतरिक्ष के मध्य हिस्से से विमान पश्चिमी हिस्से में बढ़ चली, जहां नायज़ो समुदाय के 2 ग्रह गुरियन और सिलफर प्लेनेट बसे थे। अंतरिक्ष के उसी क्षेत्र में एक वीरान ग्रह भी बसता था, जिसपर नायजो का आबादी बढ़ाओ क्रायक्रम की शुरवात हुई थी। आबादी बढ़ाने वाले 4–5 ग्रहों में से एक ग्रह यह भी था।

इस ग्रह पर पिछले सकड़ों वर्षों से नयजो काम कर रहे थे। यहां उन्होंने जीवन को अनुकूल बनाया। वीरान से इस ग्रह को पूरा जंगलों से ढक दिया। जीवन बसने के अनुकूल सभी पारिस्थिक तंत्र को स्थापित करने के बाद नायजो सकडों वर्ष तक केवल प्रतीक्षा में रहे। मौसम के चक्र को पूरा विकसित होने दिया। ग्रीन हाउस गैस को खुद से विकसित होने के लिये छोड़ दिया गया। जब यह सुनिश्चित हो गया की अब यहां की प्रकृति पूर्ण रूप से जीवन संजोने योग्य हो चुकी है तब कहीं जाकर नायजो समुदाय ने अपने लोग यहां भेजे।

नई अल्फा पैक और उसके सहायक सभी वीरान से इस टापू पर रुके जिसका नाम करेभू था। करेभु ग्रह पर यूं तो कई करोड़ नायजो स्त्रियां प्रजनन के लिये पहले से पहुंच चुकी थी। ग्रह पर सुरक्षा इंतजाम भी काफी थे। किंतु वो सब इंतजाम बस उन खास हिस्सों में थे, जहां पर आबादी बसी हुई थी।

जंगल के बहुत सारे हिस्सों में भी कई अजीब तरह के दैत्य और खूंखार जानवरों से भरा पड़ा था। किंतु पूरा पारिस्थितिक तंत्र को सुचारू रूप से काम करने के लिये ग्रह के एक बड़े से हिस्से में रेगिस्तान और बंजर पहाड़ियों की श्रृंखला को छोड़ दिया गया था, जहां वीरान से इस टापू पर बसने वाले खतरनाक कीड़े और जानवर, सिकुड़ी सी इस जगह में रहने के लिये विवश थे।

आर्यमणि का काफिला भी उन्ही क्षेत्रों में उतरा। हां लेकिन उनके उतरने से लेकर रहने तक का पूरा इंतजाम पहले से कर दिया गया था। इस जगह पर लैंड करने से पहले आर्यमणि इस ग्रह को एक झलक देख चुका था और इसकी एक झलक ने ही उसका मन मोह लिया था।

विमान जमीन पर उतरा। उसकी सीढियां नीचे तक आयी। आर्यमणि सबसे आगे और उनके पीछे नई अल्फा टीम और उनके सहायक कतार में उतरने के लिये खड़े हो गये। आर्यमणि जैसे ही विमान से बाहर आया दोनो बांह फैलाए एक अनजाना चेहरा उनका स्वागत कर रहा था। आर्यमणि के ठीक पीछे उसकी पत्नी और महासागर की राजकुमारी महा थी। जिसकी एक झलक मिलते ही उस अनजान शक्स के पीछे खड़े लाखो की भीड़ एक साथ आवाज लगाकर महा की जय जयकार करने लगे।

महा, आर्यमणि के पीछे खड़े रहकर ही अपने दोनो हाथ ऊपर उठाती सबको शांत होकर अपने जगह बैठने का इशारा कर दी। महा का इस गर्मजोशी से स्वागत करने वाले और कोई नही बल्कि महा के कुशल सैनिक थे, जिनकी संख्या 5 लाख थी। यूं तो महा ने सैनिकों की संख्या कुछ और रखी थी परंतु महासागर के महाराज और महा के पिता विजयदर्थ ने अपने मन मुताबिक 5 लाख सैनिक को भेज दिया था।

आर्यमणि अपना गर्दन थोड़ा पीछे घुमाकर महा को घूरते..... “सारी वाह वाही अपने लिये बटोर ली। मैं तुम्हारा पति हूं इन लोगों को पता है ना?”

महा, प्यारी सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाती..... “पतिदेव मेरे साथी जो मेरा सम्मान कर रहे है उसे मैने कमाया है। आपको भी वो सम्मान कामना होगा। महज मेरे पति होने से ये लोग सम्मान नही करने वाले।”..

बातें करते हुये जब तक दोनो बाहर चले आये थे। आर्यमणि और महा के ठीक पीछे ओजल और निशांत थे। बाकी सभी को एक इशारा मिला और वो लोग विमान से नीचे नही उतरे। इधर वो अनजाना चेहरे वाला शक्स महा की बातों का समर्थन करते हुये कहने लगा.... “बहुत खूब कहा है आपने।”

महा:– आप कौन...

जैसे ही महा का यह सवाल आया वह आदमी अपने चेहरे को अजीब ही तरह से बदला। ऐसा लगा जैसे चेहरे का पूरा सिस्टम ही ऊपर–नीचे हो गया और वह शक्स कोई और नही बल्कि गुरियन ग्रह का मुखौटे वाला राजा करेनाराय था। आर्यमणि उसे देखकर थोड़ा सा हैरान होते या फिर हैरान होने का नाटक करते.... “करेनाराय तुम!!!!”

करेनाराय:– हां भेड़िया राजा। मैने सोचा आप जैसे महान भेड़िया राजा के स्वागत में मैं नही खड़ा रहा फिर थू है मेरी ज़िंदगी पर।

आर्यमणि:– हां लेकिन ऐसे रूप बदल कर आने की क्या आवश्यकता थी?

करेनाराय:– गुरियन प्लेनेट का असली शासक मसेदश क्वॉस और उसका चमचा सेनापति बिरजोली चप्पे चप्पे पर नजर रखे है। उन्हे पता है कि आपलोग पहले मुझसे मिलेंगे और उसके बाद विषपर प्लेनेट पर हमला करेंगे। इसलिए आपकी रणनीतियों को समझने कर लिये उन लोगों ने चप्पे–चप्पे पर नजर बनाए हुये है।

आर्यमणि:– तो क्या मैं यहीं से सीधा विषपर प्लेनेट निकल जाऊं?

करेनाराय:– अब किसी को मरने का इतना ही शौक है तो उन्हें मैं बिलकुल नहीं रोकूंगा। लेकिन क्या आप अपने सेना के बिना ही चले जायेंगे?

आर्यमणि:– मैं क्यों सेना के बिना चला जाऊं? मैं यहां से निकलता हूं, और तुम गुरियन प्लेनेट पहुंचकर मेरे सेना को विषपर प्लेनेट के लिये रवाना कर दो।

करेनाराय:– पूरे 5 करोड़ खूंखार लोगों को जो कैदियों के प्रदेश से भेजे थे, उन्हे मैने प्रशिक्षित कर दिया है। किंतु नायजो के पास बहुत सी ऐसी कलाएं है, जिनका तोड़ मुझे आपको बताना है। उस जानकारी को अब तक मैने उन 5 कड़ोड़ सैनिकों के साथ साझा नही किया। सोचा जब सब साथ होंगे तभी बताऊंगा। उम्मीद है पलक ने बहुत सी बातें बताई होगी। पलक ने आपसे तरह–तरह के हमले का वर्णन किया होगा। किंतु उन हमलों से न सिर्फ बचने के कारगर उपाय बल्कि पलटवार, और घातक कैसे हो उसकी पूरी जानकारी मेरे पास है।

करेनाराय की बात को सुनकर आर्यमणि खामोशी से खड़े होकर उसे एक टक देखे जा जा रहा था। करेनाराय अपनी ललाट ऊपर कर सवालिया नजरों से आर्यमणि को देख भी रहा था और उसके जवाब की प्रतीक्षा भी कर रहा था। लेकिन करेनाराय की प्रतीक्षा काफी लंबी हो गयी और आर्यमणि चुप चाप उसे एक टक देखे जा रहा था। करेनाराय से रहा नही गया और जिज्ञासावश उसने पूछ लिया.... “भेड़िया राजा कुछ तो कहो?”
Nice update
 

subodh Jain

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संदर एक दम रैपचिक
बोले तो झकाआस
पर अब एक दो से मन नहीं भरेगा
इस लिए जल्दी जल्दी अपडेट दो
 
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गुरियन प्लेनेट पर आर्य और उसके साथियों का जाना ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे शेर के मांद मे मेमनो का जाना।
आर्य ने निश्चय ही तैयारी काफी अच्छी की है लेकिन फिर भी उनके कवच रूपी हाईबर मेटल का काट नही निकाल सका।
जब उनके पुरे शरीर इस हाईबर मेटल से ढके रहेंगे तो फिर उनके शरीरों पर जख्मों के निशान कैसे बनेंगे ? महा ने अवश्य कुछ कोशिश की थी लेकिन वह भी कामयाब न हो सकी। इसके अलावा उनके अस्त्र शस्त्र और उनकी विशालकाय एवं खुंखार सेना से भी पार पाना है।

जब सारे रास्ते बंद हो जाते है तब सिर्फ मां भवानी ही है जो नए रास्ते खोल देती है। आर्य का प्लेन के अंदर मां दुर्गा की मुर्ति का स्थापना करना और मिट्टी का शेर स्थापित करना आर्य की ताकत और बुद्धी मे करोड़ो गुना इजाफा करेगा।
इसके अलावा हमारे प्रिय माटुका शेर तो हैं ही।
वगैर कुदरती शक्ति के इन विकृत एलियन से पार नही पाया जा सकता।
शायद करेनाराय साहब हाईबर मेटल का तोड़ बता पाए !

रूही और उसके भाई बहन के मृत शरीर पर दरिन्दों ने कब्जा कर रखा है और उस जगह पर स्थापित कर दिया है जिसे विपरीत दुनिया मे जाने का द्वार कहते है।
शायद इस युद्ध के दरम्यान ही उनके मृत शरीर का उद्धार हो सके क्योंकि महाजनिका से युद्ध किए वगैर इस युद्ध की समाप्ति नही हो सकती और महाजनिका उसी जगह मौजूद है जहां आर्य के मृत पैक मौजूद है।

बहुत ही खूबसूरत अपडेट नैन भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड जगमग जगमग।

वैसे बिहार के किस शहर मे इन्टरनेट सेवा कई दिनो से बंद था और क्यों ?
 
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krish1152

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नभीमन:– तुम यशस्वी रहो। आर्य एक मेरी भी गुजारिश है। जितनी भावना तुम्हे अपने परिवार के लिये उतनी ही भावना मुझे अपने साम्राज्य के खोए गौरव का है, जिसका दोषी मैं ही था। तुम मेरी बात समझ रहे हो ना...

आर्यमणि:– हां मैं समझ रहा हूं महाराज। मेरा वादा है आपसे की आपके साम्राज्य के गौरव को वापस लाने की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं। तब तक आप भी धैर्य बनाए रखिए और देह त्याग नही कीजिएगा...

नभीमन:– तुमने बोल दिया तो अब मैं युगों तक इंतजार करता रहूंगा। बस वो मेरा आखरी दिन होगा जब मैं नाग दंश को वापस अपने साम्राज्य में आते देखूंगा।

नभीमन अपनी बात कहते भावना विभोर हो गया। आर्यमणि ने उसके आंसू पोछे। दोनो के बीच थोड़ी और औपचारिक बातें हुई। अपने पिटारे नभीमन ने आर्यमणि को कुछ और उपहार दिये। आर्यमणि उन उपहारों को देख खुश हो गया। आर्यमणि वहां से वापस न लौटकर सीधा महासागर के तल में योगियों के प्रदेश पहुंचा। एक बार फिर ध्यान पर बैठने से पहले अल्फा पैक तक सूचना पहुंचा दिया की जब चलने के लिये तैयार हो जाओ, सूचना कर देना। आर्यमणि वहां अपनी साधना पर बैठा और इधर अल्फा पैक के सदस्य गुरियन प्लेनेट पर जाने की तैयारी में जोड़ों से जुट गये।

अल्फा पैक और सहयोगी दिन रात एक करके कई तरह के हथियार पर काम कर रहे थे। महा एक कुशल रणनीतिज्ञ थी जिसने हथियारों के हिसाब से अपने सेना की सजावट की योजना बना चुकी थी। हथियार डिजाइन करने से लेकर ऑटोमेटिक कमांड सेट करने में लगभग 8 दिन लग गये। बृहत पैमाने पर उन हथियारों को बनाने में अगला 5 दिन लग गया। चौदवे दिन सभी उड़ान भरने के लिये तैयार थे।

इसी बीच महा, पैट्रिक से एक लाख रिफ्लेक्टर ढाल की डिलेवरी ले चुकी थी। पैट्रिक एक कदम आगे बढ़कर अपनी दोस्ती निभाते, न सिर्फ एक करोड़ रिफ्लेक्टर ढाल दिया बल्कि लेजर तथा अन्य भीषण किरणों से बचने के लिये उसने 4 लाख बुलेट प्रूफ और लेजर प्रूफ सूट भी भेंट स्वरूप दे दिया। पूछने पर पता चला की सेना के लिये उनके पास ऐसे सूट की कोई कमी नही थी।

वहीं चैत्र मास में 11 दिन तक आर्यमणि ने देवी दुर्गा की साधना की थी। अपनी साधना से उठने के बाद उसने देवी दुर्गा की चरणों से गीली मिट्टी का विशाल भंडार उठाया और अंतर्ध्यान होकर सीधा नाग–लोक के भू–भाग पहुंचा। वहां उसने शेर माटुका और उसके परिवार से मिलकर इशारों में उसने अपनी योजना समझा दिया।

शेर माटुका सर झुकाकर पहले तो मिट्टी के सामने मानो नमन किया हो फिर ऊंची और लंबी दहाड़ के साथ उसने आर्यमणि के साथ जैसे युद्ध लड़ने की घोषणा कर दिया हो। शेर मटुका को लेकर आर्यमणि अंतर्ध्यान होकर सीधा एक बड़े से अंतरिक्ष विमान में पहुंचा। आर्यमणि पहली बार किसी अंतरिक्ष विमान में था। जगह मांग के हिसाब से भी कहीं ज्यादा बड़ी थी। इतनी बड़ी की आराम से उसपर 10 हजार लाख सैनिक सवार हो जाते।

आर्यमणि साधना पर बैठने से पहले ही अपस्यु से संपर्क कर चुका था। आर्यमणि ने जैसा बताया था बिलकुल एक हिस्सा उसी हिसाब से कर दिया गया था। पूर्णतः शुद्ध, पूर्णतः अभिमंत्रित और हवन–यज्ञ के पूर्ण समान के साथ। आर्यमणि जैसे ही उस हिस्से में पहुंचा, सही दिशा और सही स्थान का चुनाव करके अपने साथ लाये मिट्टी को वहां रख दिया।

उस स्थान पर पहले से ही देवी दुर्गा की एक सुंदर प्रतिमा स्थापित थी, जिसके चरणों में बैठकर आर्यमणि उन मिट्टी से छोटे–छोटे शेर का निर्माण करने लगा। 11 दिन की साधना और 2 दिन तक मिट्टी के शेर के निर्माण करने के बाद आर्यमणि भी चौदहवे दिन उड़ान भरने के लिये तैयार था।

सुबह–सुबह ही पूरा अल्फा पैक और उनके सहयोगियों को लेकर ऋषि शिवम उस विमान तक पहुंच चुके थे। आर्यमणि खुद बाहर आकर सबका स्वागत किया और सुबह के 9 बजे उनका विमान उड़ान भर चुकी थी। विमान को कैसे चलाना है उसका प्रशिक्षण पिछले 13 दिनो से चल रहा था। महा के कुशल पायलट 4 दिन में ही विमान उड़ाने की पूरी बारीकियों को एलियन से सिख चुके थे और एक साथ 21 विमान ढाई लाख सैनिक, तरह–तरह के हथियार और विस्फोटक के साथ उड़ान भर चुकी थी।

अंतरिक्ष की सीमा में घुसते ही पूरा अल्फा पैक अपने सभी सहयोगियों के साथ बड़े से राउंड टेबल पर बैठा था। सभी आपस में बात कर रहे थे। कुछ लोग पहली बार किसी युद्ध में हिस्सा ले रहे थे इसलिए उत्साहित भी उतना ज्यादा थे। सबके उत्साह और आपस के बातचीत को शांत करते हुये आर्यमणि उन सबके बीच बैठा।

आर्यमणि:– हम किस प्रकार के दुश्मन और किन हालातों का सामना करने जा रहे हैं, उसपर पहले ही चर्चा हो चुकी है। अभी हम इसलिए बैठे हैं ताकि एक जो सबसे ज्यादा परेशान करने वाला उनका हथियार है, हाइबर मेटल से बने आर्मर, उन्हे कैसे भेदा जाये। उम्मीद है इस पर कोई न कोई नतीजा निकल आया होगा।

पलक:– मेरे पास कुछ हाइबर धातु थे, उन पर हर किसी ने प्रयोग करके देख लिया। यहां तक की उसे सात्त्विक आश्रम भी ले गये लेकिन वहां से भी परिणाम वही निकला, इस धातु को किसी भी विधि तोड़ा नही जा सकता।

आर्यमणि:– और मंत्रों का असर। यदि कोई व्यक्ति आर्मर पहना हो तो क्या मंत्र उन पर असर करेगी?

ओजल:– नही बॉस, यदि आर्मर के पीछे कोई छिपा है तो मंत्र उसपर असर नही करती। हां लेकिन शरीर का जो भाग हाइबर मेटल के बाहर होगा उन पर मंत्र असर तो करेगी किंतु कुछ हाइबर मेटल के कारण बेअसर हो जायेगी।

आर्यमणि:– क्या ये धातु अपने आप अभिमंत्रित हो जाती है, जिसपर किसी भी प्रकार का मंत्र का काट अपने आप मिल जाता है।

ओजल:– हां ऐसा ही कुछ समझ लीजिए। यह धातु अपने आप में अलौकिक है। महाभारत में कर्ण के कवच का उल्लेख मिलता है, जिसे सूर्यदेव ने दिया था, वह कवच इसी धातु की बनी हुई थी। यह हाइबर धातु सदियों से सूर्यदेव की अग्नि में तपकर तैयार होता है, इसलिए इसका स्वरूप ऐसा है।

महा:– क्या मैं वरुण देवता को नमन कर एक बार इस धातु को नष्ट करने की कोशिश करूं क्या?

आर्यमणि, अजीब सी नजरों से घूरते.... “हां–हां कर लो कोशिश।”

महा:– ऐ जी ऐसे हीन नजरों से घुरकर क्यों कह रहे?

आर्यमणि:– पहले तुम अपना काम तो कर लो, फिर मैं अपनी नजरों का कारण भी बताता हूं।

महा ने अपने सर के जुड़े से एक छोटा सा पिन निकाली। जैसे ही उस छोटे से पिन को अपने हथेली पर रखी वह बड़ा सा दंश में तब्दील हो गया। महा के इस कारनामे पर ओजल बिना कहे रह नही पायी..... “दीदी कितने गुप्त हथियार अपने बदन में छिपा रखी हो?”.... ओजल के इस सवाल पर महा प्यारी सी मुस्कान के साथ उसे देखी और पाने काम में लग गयी।

वरुण देव को नमन करने के बाद महा ने अपना दंश चलाया। दंश हाइबर मेटल पर चला और अलार्म विमान का बजने लगा। दरअसल दंश से निकला कण हाइबर मेटल से टकराकर ऊपर के ओर विस्थापित हो गयी और सीधा जाकर विमान के छत से टकरा गयी। टकराने के साथ ही छोटा सा विस्फोट हुआ और विमान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया।

क्षति तो क्षति थी। इंजीनियर्स ने विमान का मुआयना किया और उसे ठीक करके चले गये। वहीं महा पूरी सभा से माफी मांगी। प्रयोग करने के लिये अलग से एक बड़े कमरे का निर्माण किया गया। महा एक बार फिर तैयार थी। बिना रुके फिर कोशिश चलती रही। अल्फा पैक और उनके सहायकों के लिये यह पहला मौका था जब वह महासागर के योद्धा को उसका दंश इस्तमाल करते हुये देख रहे थे।

दंश से लगातार घातक प्रहार होते रहे। ऐसे–ऐसे प्रहार जिसे देख सब आश्चर्यचकित थे। किंतु एक भी प्रहार सफलतापूर्वक उस हाइबर मेटल को भेद नहीं पायी। महा अफसोस भरी नजरों से सबके ओर देखती..... “बताए पतिदेव आपने उस वक्त मुझे औछी नजरों से क्यों देखा था?”

आर्यमणि:– यह आश्चर्य था.... किसी वस्तु पर यदि सूर्य देव का आशीर्वाद है तो उसे तुम वरुणदेव की माया से नष्ट कर सकती हो। क्या सूर्य देव और वरुण देव के बीच कोई स्पर्धा चल रही थी?

आर्यमणि अपनी बात समाप्त कर उस मेटल के साथ कुछ प्रयोग करना चाहा। प्रयोग करने के लिये सबसे पहले पलक को बुलाया गया। हाईवर मेटल के पीछे आर्यमणि खड़ा हो गया और पलक को मेटल के ऊपर बिजली प्रवाहित करने के लिये कहा। पलक ने नपा तुला बिजली की धारा को प्रवाह किया।

हाइबर मेटल अपना चौकाने वाले गुण दिखा रहा था। हाइबर मेटल में किसी लकड़ी की भांति गुण थे। इसपर पड़ने वाला बिजली का प्रवाह फैलता ही नही था। किसी ढीठ की तरह यह हायबर मेटल आर्यमणि के लिये सरदर्द सा बन गया था। आलम यह था की हाइबर मेटल का कोई तोड़ नही निकला और मन में कसक लिये सभी अधूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ने लगे।

खैर इस बाधा से सभी अपना ध्यान हटाकर अंतरिक्ष के सफर का लुफ्त उठाने लगे। अब यहां देखने को तो पेड़, खेत या रास्ता तो था नही, सभी लोग अंतरिक्ष में तैर रहे बड़े–बड़े पहाड़नुमा उल्का पिंड को ही देख रहे थे। तकरीबन 4 दिन के सफर के बाद सभी विमान ‘लोका एयर स्टेशन’ पर रुके। अंतरिक्ष का यह मध्य हिस्सा था, जहां से 2 दिन के सफर के बाद सफर की मंजिल थी।

लोका एयर स्टेशन पर एक दिन के विश्राम के बाद अंतरिक्ष के मध्य हिस्से से विमान पश्चिमी हिस्से में बढ़ चली, जहां नायज़ो समुदाय के 2 ग्रह गुरियन और सिलफर प्लेनेट बसे थे। अंतरिक्ष के उसी क्षेत्र में एक वीरान ग्रह भी बसता था, जिसपर नायजो का आबादी बढ़ाओ क्रायक्रम की शुरवात हुई थी। आबादी बढ़ाने वाले 4–5 ग्रहों में से एक ग्रह यह भी था।

इस ग्रह पर पिछले सकड़ों वर्षों से नयजो काम कर रहे थे। यहां उन्होंने जीवन को अनुकूल बनाया। वीरान से इस ग्रह को पूरा जंगलों से ढक दिया। जीवन बसने के अनुकूल सभी पारिस्थिक तंत्र को स्थापित करने के बाद नायजो सकडों वर्ष तक केवल प्रतीक्षा में रहे। मौसम के चक्र को पूरा विकसित होने दिया। ग्रीन हाउस गैस को खुद से विकसित होने के लिये छोड़ दिया गया। जब यह सुनिश्चित हो गया की अब यहां की प्रकृति पूर्ण रूप से जीवन संजोने योग्य हो चुकी है तब कहीं जाकर नायजो समुदाय ने अपने लोग यहां भेजे।

नई अल्फा पैक और उसके सहायक सभी वीरान से इस टापू पर रुके जिसका नाम करेभू था। करेभु ग्रह पर यूं तो कई करोड़ नायजो स्त्रियां प्रजनन के लिये पहले से पहुंच चुकी थी। ग्रह पर सुरक्षा इंतजाम भी काफी थे। किंतु वो सब इंतजाम बस उन खास हिस्सों में थे, जहां पर आबादी बसी हुई थी।

जंगल के बहुत सारे हिस्सों में भी कई अजीब तरह के दैत्य और खूंखार जानवरों से भरा पड़ा था। किंतु पूरा पारिस्थितिक तंत्र को सुचारू रूप से काम करने के लिये ग्रह के एक बड़े से हिस्से में रेगिस्तान और बंजर पहाड़ियों की श्रृंखला को छोड़ दिया गया था, जहां वीरान से इस टापू पर बसने वाले खतरनाक कीड़े और जानवर, सिकुड़ी सी इस जगह में रहने के लिये विवश थे।

आर्यमणि का काफिला भी उन्ही क्षेत्रों में उतरा। हां लेकिन उनके उतरने से लेकर रहने तक का पूरा इंतजाम पहले से कर दिया गया था। इस जगह पर लैंड करने से पहले आर्यमणि इस ग्रह को एक झलक देख चुका था और इसकी एक झलक ने ही उसका मन मोह लिया था।

विमान जमीन पर उतरा। उसकी सीढियां नीचे तक आयी। आर्यमणि सबसे आगे और उनके पीछे नई अल्फा टीम और उनके सहायक कतार में उतरने के लिये खड़े हो गये। आर्यमणि जैसे ही विमान से बाहर आया दोनो बांह फैलाए एक अनजाना चेहरा उनका स्वागत कर रहा था। आर्यमणि के ठीक पीछे उसकी पत्नी और महासागर की राजकुमारी महा थी। जिसकी एक झलक मिलते ही उस अनजान शक्स के पीछे खड़े लाखो की भीड़ एक साथ आवाज लगाकर महा की जय जयकार करने लगे।

महा, आर्यमणि के पीछे खड़े रहकर ही अपने दोनो हाथ ऊपर उठाती सबको शांत होकर अपने जगह बैठने का इशारा कर दी। महा का इस गर्मजोशी से स्वागत करने वाले और कोई नही बल्कि महा के कुशल सैनिक थे, जिनकी संख्या 5 लाख थी। यूं तो महा ने सैनिकों की संख्या कुछ और रखी थी परंतु महासागर के महाराज और महा के पिता विजयदर्थ ने अपने मन मुताबिक 5 लाख सैनिक को भेज दिया था।

आर्यमणि अपना गर्दन थोड़ा पीछे घुमाकर महा को घूरते..... “सारी वाह वाही अपने लिये बटोर ली। मैं तुम्हारा पति हूं इन लोगों को पता है ना?”

महा, प्यारी सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाती..... “पतिदेव मेरे साथी जो मेरा सम्मान कर रहे है उसे मैने कमाया है। आपको भी वो सम्मान कामना होगा। महज मेरे पति होने से ये लोग सम्मान नही करने वाले।”..

बातें करते हुये जब तक दोनो बाहर चले आये थे। आर्यमणि और महा के ठीक पीछे ओजल और निशांत थे। बाकी सभी को एक इशारा मिला और वो लोग विमान से नीचे नही उतरे। इधर वो अनजाना चेहरे वाला शक्स महा की बातों का समर्थन करते हुये कहने लगा.... “बहुत खूब कहा है आपने।”

महा:– आप कौन...

जैसे ही महा का यह सवाल आया वह आदमी अपने चेहरे को अजीब ही तरह से बदला। ऐसा लगा जैसे चेहरे का पूरा सिस्टम ही ऊपर–नीचे हो गया और वह शक्स कोई और नही बल्कि गुरियन ग्रह का मुखौटे वाला राजा करेनाराय था। आर्यमणि उसे देखकर थोड़ा सा हैरान होते या फिर हैरान होने का नाटक करते.... “करेनाराय तुम!!!!”

करेनाराय:– हां भेड़िया राजा। मैने सोचा आप जैसे महान भेड़िया राजा के स्वागत में मैं नही खड़ा रहा फिर थू है मेरी ज़िंदगी पर।

आर्यमणि:– हां लेकिन ऐसे रूप बदल कर आने की क्या आवश्यकता थी?

करेनाराय:– गुरियन प्लेनेट का असली शासक मसेदश क्वॉस और उसका चमचा सेनापति बिरजोली चप्पे चप्पे पर नजर रखे है। उन्हे पता है कि आपलोग पहले मुझसे मिलेंगे और उसके बाद विषपर प्लेनेट पर हमला करेंगे। इसलिए आपकी रणनीतियों को समझने कर लिये उन लोगों ने चप्पे–चप्पे पर नजर बनाए हुये है।

आर्यमणि:– तो क्या मैं यहीं से सीधा विषपर प्लेनेट निकल जाऊं?

करेनाराय:– अब किसी को मरने का इतना ही शौक है तो उन्हें मैं बिलकुल नहीं रोकूंगा। लेकिन क्या आप अपने सेना के बिना ही चले जायेंगे?

आर्यमणि:– मैं क्यों सेना के बिना चला जाऊं? मैं यहां से निकलता हूं, और तुम गुरियन प्लेनेट पहुंचकर मेरे सेना को विषपर प्लेनेट के लिये रवाना कर दो।

करेनाराय:– पूरे 5 करोड़ खूंखार लोगों को जो कैदियों के प्रदेश से भेजे थे, उन्हे मैने प्रशिक्षित कर दिया है। किंतु नायजो के पास बहुत सी ऐसी कलाएं है, जिनका तोड़ मुझे आपको बताना है। उस जानकारी को अब तक मैने उन 5 कड़ोड़ सैनिकों के साथ साझा नही किया। सोचा जब सब साथ होंगे तभी बताऊंगा। उम्मीद है पलक ने बहुत सी बातें बताई होगी। पलक ने आपसे तरह–तरह के हमले का वर्णन किया होगा। किंतु उन हमलों से न सिर्फ बचने के कारगर उपाय बल्कि पलटवार, और घातक कैसे हो उसकी पूरी जानकारी मेरे पास है।

करेनाराय की बात को सुनकर आर्यमणि खामोशी से खड़े होकर उसे एक टक देखे जा जा रहा था। करेनाराय अपनी ललाट ऊपर कर सवालिया नजरों से आर्यमणि को देख भी रहा था और उसके जवाब की प्रतीक्षा भी कर रहा था। लेकिन करेनाराय की प्रतीक्षा काफी लंबी हो गयी और आर्यमणि चुप चाप उसे एक टक देखे जा रहा था। करेनाराय से रहा नही गया और जिज्ञासावश उसने पूछ लिया.... “भेड़िया राजा कुछ तो कहो?”
Nice update
 

spritemathews

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भाग:–149


इसके पूर्व आर्यमणि जैसे ही उन कीड़ों की कैद से आजाद हुआ सबसे पहला ख्याल रूही पर ही गया। अचेत अवस्था में वो बुरी तरह से कर्राह रही थी। विवियन और बाकी एलियन को तो यकीन तक नही हुआ की आर्यमणि के शरीर से कीड़े निकल चुके है। वो लोग झुंड बनाकर आर्यमणि पर हमला करने लगे, किंतु आर्यमणि के शरीर की हर कोशिका सक्रिय थी और किसी भी प्रकार के टॉक्सिक को खुद में समाने के लिये उतने ही सक्षम। बदन के जिस हिस्से पर लेजर की किरण और उन किरणों के साथ कितने भी भीषण प्रकोप क्यों नही बरसते, सब आर्यमणि के शरीर में गायब हो जाते।

विवियन और उसके सकड़ो साथी परेशान से हो गये। वहीं आर्यमणि रूही की हालत देखकर अंदर से रो रहा था। किसी तरह खुद पर काबू रखकर आर्यमणि ने आस–पास के माहोल को भांपा। उसपर लगातार एलियन के हमले हो रहे थे। सादिक यालविक और उसका बड़ा सा पैक आराम से वहीं बैठकर तमाशा देख रहा था। आर्यमणि पूरी समीक्षा करने के बाद तेज दौड़ने के लिये पोजिशन किया। किंतु जैसे ही 2 कदम आगे बढ़ाया वह तेज टकराकर नीचे रेत पर बिछ गया।

आर्यमणि को ध्यान न रहा की वह किरणों के एक घेरे में कैद था। किरणों का एक विचित्र गोल घेरा जिसे आर्यमणि पार ना कर सका। आर्यमणि हर संभव कोशिश कर लिया किंतु किरणों के उस गोल घेरे से बाहर नही निकल सका। विवियन और उसकी टीम भी जब लेजर की किरणों से आर्यमणि को मार न पाये, तब उन लोगों ने भी विश्राम लिया। वो सब भी आर्यमणि की नाकाम कोशिश देख रहे थे और हंस रहे थे।

विवियन:– क्या हुआ प्योर अल्फा, किरणों की जाल से निकल नही पा रहे?

आर्यमणि:– यदि निकल गया होता तो क्या तू मुझसे ऐसे बात कर रहा होता।

विवियन:– अकड़ नही गयी हां। आर्यमणि सर तो बड़े टसन वाले वेयरवोल्फ निकले भाई। सुनिए आर्यमणि सर यहां हमे कोई मारकर भी चला जाये, तो भी तुम उस घेरे को पार ना कर पाओगे। चलो अब तुम्हे मै एक और कमाल दिखाता हूं। दिखाता हूं कि कैसे हम घेरे में फसाकर अपने किसी भी शक्तिशाली दुश्मन को पहले निर्बल करते है, उसके बाद उसके प्राण निकालते हैं।

आर्यमणि:– फिर रुके क्यों हो? तुम अपना काम करो और मैं अपना...

आर्यमणि अपनी बात कहकर आसान लगाकर बैठ गया। वहीं विवियन ने गोल घेरे के चारो ओर छोटे–छोटे रॉड को गाड़ दिया, जिसके सर पर अलग–अलग तरह के पत्थर लगे हुये थे। गोल घेरे के चारो ओर रॉड लगाने के बाद विवियन पीछे हटा। देखते ही देखते रॉड पर लगे उन पत्थरों से रौशनी निकलने लगी जो आर्यमणि के सर से जाकर कनेक्ट हो गयी।

आर्यमणि ने वायु विघ्न मंत्र का जाप तो किया पर उन किरणों पर कुछ भी असर न हुआ। फिर आर्यमणि ने उन किरणों को किसी टॉक्सिक की तरह समझकर खुद में समाने लगा। जितनी तेजी से वह किरण आर्यमणि के शरीर में समाती, उतनी ही तेजी से उसके शरीर से काला धुवां निकल रहा था। यह काला धुवां कुछ और नहीं बल्कि आर्यमणि के शरीर में जमा टॉक्सिक था, जो बाहर निकल रहा था।

पहले काला धुवां बाहर निकला उसके बाद उजला धुवां। उजला धुवां आर्यमणि के शरीर का शुद्ध ऊर्जा था, जो शरीर से निकलकर हवा में विलीन हो रहा था। धीरे–धीरे उसकी शक्तियां हवा में विलीन होने लगी। आर्यमणि खुद में कमजोर, काफी कमजोर महसूस करने लगा। आसान लगाकर बैठा आर्यमणि कब रेत पर लुढ़का उसे खुद पता नही चला।

आर्यमणि के शरीर की ऊर्जा, उजली रौशनी बनकर लगातार निकल रही थी। वह पूर्ण रूपेण कमजोर पड़ चुका था। आंखें खुली थी और होश में था, इस से ज्यादा आर्यमणि के पास कुछ न बचा था। तभी वहां आर्यमणि के जोर–जोर से हंसने की आवाज गूंजने लगी। किसी तरह वह खुद में हिम्मत करके अट्टहास से परिपूर्ण हंसी हंस रहा था।

विवियन:– लगता है मृत्यु को करीब देख इसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।

आर्यमणि बिना कोई जवाब दिये हंसता ही रहा काफी देर तक सबने उसकी हंसी सुनी। जब बर्दास्त नही हुआ तब यालविक पैक का मुखिया सादिक यालविक चिल्लाते हुये पूछने लगा..... “क्यों बे ऐसे पागल की तरह क्यों हंस रहा है?”...

आर्यमणि:– अपने परिवार को धोखा दिया। नेरमिन से दुश्मनी भी हो ही जाना है, लेकिन जिस शक्ति के लिये तूने शिकारियों का साथ दिया, वो तुझे नही मिलेगी।

आर्यमणि इतना धीमे बोला की सबको कान लगाकर सुनना पड़ा। 3 बार में सबको उसकी बात समझ में आयी। आर्यमणि की बात पर विवियन ठहाके मारकर हंसते हुये..... “तुझे क्या लगता है हम अपनी बात पर कायम न रहेंगे। सादिक न सिर्फ तेरी शक्तियां लेगा बल्कि सरदार खान की तरह ही वह भी एक बीस्ट अल्फा बनेगा। बस थोड़ा वक्त और दे। अभी तेरी थोड़ी और अकड़ हवा होगी, फिर तू खुद भी देख लेगा, कैसे तेरी शक्तियां सादिक की होती है।”

आर्यमणि समझ चुका था कि विवियन खुद ये घेरा खोलने वाला है। पूरे मामले में सबसे अच्छी ये बात रही की किसी का भी ध्यान रूही पर नही गया। आर्यमणि ने सबका ध्यान अपनी ओर ही बनवाए रखा। वह कमजोर तो पड़ ही चुका था बस दिमाग को संतुलित रखे हुये था। आर्यमणि सोच चुका था कि घेरा खुलते ही उसे क्या करना है।

10 मिनट का और इंतजार करना पड़ा। आर्यमणि की जब आंखे बंद हो रही थी, ठीक उसी वक्त किरणों का वह घेरा खुला। किरणों का घेरा जैसे ही खुला, पंजे के एक इशारे मात्र से ही आर्यमणि ने सबको जड़ों में ढक दिया। आर्यमणि के अंदर इतनी जान नही बाकी थी कि वह खड़ा भी हो सके। यह बात आर्यमणि खुद भी समझता था, इसलिए सबकुछ जैसे पहले से ही सोच रखा हो।

सबको जड़ों में ढकने के बाद खुद को और रूही को भी जड़ों में ढका। कास्टल के रास्ते पर जड़ों की लंबी पटरी ही जैसे आर्यमणि ने बिछा रखी थी। जड़ें दोनो को आगे भी धकेल रही थी और उन्हे जरूरी पोषण भी दे रही थी। लगभग 3 किलोमीटर तक जड़ों पर खिसकने के बाद आर्यमणि के अंदर कुछ जान वापस आयी और वह रूही को उठाकर कैस्टल के ओर दौड़ लगा दिया।

आर्यमणि जैसे ही कास्टल के अंदर पहुंचा, इवान उसकी गोद से रूही को उठाकर सीधा बेड पर रखा। संन्यासी शिवम् भी उतनी ही तेजी से अपना काम करने लगे। और इधर आर्यमणि, जैसे ही उसकी नजर अपने लोगों पर पड़ी... वो घुटनो पर आ गया और फूट–फूट कर रोने लगा। ओजल नीचे बैठकर, अपने दोनो हाथ से आर्यमणि के आंसू पूछती... "बॉस, दीदी को कुछ नही हुआ है... उसका इलाज चल रहा है।"…

"सब मेरी गलती है... सब मेरी गलती है... मुझे इतने लोगों से दुश्मनी करनी ही नही चाहिए थी"… आर्यमणि विलाप करते हुये बड़बड़ाने लगा।

ओजल:– संभालो बॉस, खुद को संभालो...

आर्यमणि:– रूही.. कहां है... कहां है रूही"…

ओजल:– यहीं पास में है।

आर्यमणि:– हटो मुझे उसे हील करना है... सब पीछे हटो..

तभी संन्यासी शिवम पीछे मुड़े और दंश को भूमि पर पटकते... "अशांत मन केवल तबाही लाता है। अभी रूही का जिस्म हील करेंगे तो हमेशा के लिये 10 छेद उसके बदन में रह जाएंगे। खुद को शांत करो"…

संन्यासी शिवम की बात सुनने के बाद आर्यमणि पूरा हताश हो गया। वहीं जमीन पर बैठकर रूही, रूही बड़बड़ाने लगा। दूसरी ओर जड़ों में फसे एलियन ने पहले खुद को जड़ों से आजाद किया, बाद में सादिक यालक और उसके पूरे पैक को। कुछ ही देर में कास्टल के दरवाजे पर पूरी फौज खड़ी थी। फौज लगातार अंदर घुसने का प्रयास कर रही थी, लेकिन दरवाजे के 10 कदम आगे ही हवा में जैसे किसी ने दीवार बना दिया हो। सभी दरवाजे से 10 कदम की दूरी पर खड़े थे।

संन्यासी शिवम्:– गुरुदेव दुश्मन द्वार खड़े है। मैं रूही को देखता हूं, आपलोग उन बाहर वाले दुश्मनों को देखिए।

आर्यमणि:– हां सही कह रहे आप।

संन्यासी शिवम्:– ओजल अपने दंश से सामने की सुरक्षा दीवार गिरा दो।

कास्टल के ग्राउंड फ्लोर पर संन्यासी शिवम, रूही का इलाज शुरू कर चुके थे। पूरी अल्फा पैक कास्टल के दरवाजे से बाहर कतार लगाये खड़ी थी। उधर से विवियन चिल्लाया.... “तुम लोग बहुत टेढ़ी जान हो... तुम्हारी दुर्दशा हो गयी फिर भी बच गये। तुम्हारी बाजारू पत्नी के शरीर में इतने छेद हुये, लेकिन लेजर के साथ–साथ उसके भीषण जहर से भी बच गयी। कमाल ही कर दिया। अच्छा हुआ जो तुम और तुम्हारे लोग कतार लगाकर अपनी मौत के लिये पहले ही सामने आ गये।”

इवान कुछ तो कहना चाह रहा था किंतु आर्यमणि ने इशारे में बस चुप रहने के लिये कहा। उधर निशांत इशारे में सबको समझा चुका था कि आस पास का दायरा पूरे भ्रम जाल में घिरा हुआ है। तभी एक बड़े विस्फोट के साथ बाहर की अदृश्य दीवार टूट गयी। जब रेत और धूल छंटा तब वहां इकलौत आर्यमणि अपना पाऊं जमाए खड़ा था। बाकी अल्फा पैक सदस्य पर विस्फोट का ऐसा असर हुआ की वो लोग कई फिट पीछे जाकर कास्टल की दीवार से टकराये। दरअसल मंत्र उच्चारण के बाद ओजल द्वारा कल्पवृक्ष दंश को संतुलित रूप से भूमि पर पटकना था, किंतु ओजल से थोड़ी सी चूक हो गयी और दीवार गिराने वाले विस्फोट का असर न सिर्फ विपक्षी को हुआ बल्कि आंशिक रूप से अल्फा पैक पर भी पड़ा।

असर तो आर्यमणि पर भी होता लेकिन विस्फोट के ठीक पहले आर्यमणि के हाथ में उसका एम्यूलेट पहुंच चुका था। बाकी के अल्फा पैक अपना धूल झाड़ते खड़े हुये। सबसे ज्यादा गुस्सा निशांत को ही आया। गुस्से में झुंझलाते हुये..... “तुम (ओजल) कभी भी नही सिख सकती क्या? विस्फोट का असर खुद के खेमे पर भी कर दी।”..

ओजल:– निशांत सर अभी सिख ही रही हूं। किसी वक्त आप भी कच्चे होंगे...

निशांत:– कच्चा था लेकिन अपनी बेवकूफी से अपने लोगों के परखच्चे नही उड़ाता था। पागल कहीं की...

इवान:– अरे वाह एमुलेट वापस आ गया।

दरअसल एक–एक करके सबके एमुलेट लौट आये थे। हवा में बिखरे रेत जब आंखों के आगे से हटा, दृष्टि पूरी साफ हो चुकी थी। विपक्ष दुश्मनों के आगे की कतार तो जैसे गायब हो चुकी थी, लेकिन बाकी बचे लोग हमला बोल चुके थे। बेचारे एलियन और यालवीक की सेना अपनी मौत को मारने की कोशिश में जुटे थे।

इनकी कोशिश तो एक कदम आगे की थी। जिस जगह अल्फा पैक खड़ी थी उसके आस पास की जगह पर गोल–गोल घेरे बन रहे थे। गोला इतना बड़ा था कि उसमे आराम से 4–5 लोग घिर जाये। हर कोई जमीन पर किरणों के बने गोल घेरे साफ देख सकते थे। एक प्रकार का एलियन महा जाल था, जिसमे अल्फा पैक को फसाकर मारने की कोशिश की जा रही थी।

किंतु निशांत के भ्रम जाल में पूरे एलियन उलझ कर रह गये। विवियन को भी समझ में आ गया की उनका पाला किस से पड़ा है। किरणों के गोल जाल में जब अल्फा पैक नही फंसा तब विवियन ने टर्की के स्थानीय वेयरवोल्फ को इशारा किया। वुल्फ पैक का मुखिया सादिक यालविक, इशारा मिलते ही आर्यमणि पर हमला करने के लिये कूद गया।

सादिक याल्विक लंबी दहाड़ लगाकर सीधा आर्यमणि के ऊपर छलांग लगा चुका था। किंतु भ्रम जाल के कारण सादिक यालविक को लग रहा था कि वह आर्यमणि के ऊपर कूद रहा है और आर्यमणि साफ देख सकता था कि सादिक ने एक हाथ बाएं छलांग लगाया था। आर्यमणि ने पंजा झटक कर अपने क्ला को बाहर निकाला और जैसे ही सादिक याल्विक उसके हाथ के रेंज में आया फिर तो आर्यमणि ने अपना पंजा सीधा सादिक यालविक के सीने में घुसेड़ कर उसे हवा में ही टांग दिया। पूरा यालविक पैक ही दर्द भरी दहाड़ लगाते आर्यमणि के ऊपर हमला कर चुका था।

अल्फा पैक जो पीछे खड़ी थी, वह बिना वक्त गवाए तेज दौड़ लगा चुके थे। एमुलेट के पावर स्टोन ने फिर तो सबको ऐसा गतिमान किया की सभी कुछ दूर के दौड़ने के बाद जब छलांग लगाये, फिर तो हवा में कई फिट ऊंचा उठे और सीधा जाकर वुल्फ के भिड़ में गिरे। ओजल अपना कल्पवृक्ष दंश जब चलाना शुरू की फिर तो सभी वुल्फ ऐसे कट रहे थे, मानो गाजर मूली कटना शुरू हो चुके हो।

अलबेली और इवान तो पंजों से सबको ऐसे फाड़ रहे थे कि उसे देखकर यालविक पैक के दूसरे वुल्फ स्थूल पड़ जाते। भय से हृदय में ऐसा कंपन पैदा होता की डर से अपना मल–मूत्र त्याग कर देते। महज 5 मिनट में ही यालविक पैक को चिड़ने के बाद सभी एक साथ गरजते..... “बॉस यालविक पैक साफ हो गया। बेचारा सादिक आपके पंजों पर टंगा अकेला जिंदा रह बचा है।”...

“फिर ये अकेला वुल्फ बिना अपने पैक के करेगा क्या?”.... कहते हुये आर्यमणि ने अपना दूसरा पंजा सीधा उसके गर्दन में घुसाया और ऊपर के ओर खींचकर ऐसे फाड़ा जैसे किसी कपड़े में पंजे फंसाकर फाड़ते हो। पूरा चेहरा आड़ा तिरछा होते हुये फटा। सादिक यालविक का पार्थिव शरीर वहीं रेत पर फेंककर आर्यमणि चिल्लाया..... “ये हरमजादे एलियन अब तब अपने पाऊं पर क्यों है? वायु विघ्न मंत्र के साथ आगे बढ़ो और अपने क्ला से सबके बदन को चीड़ फाड़ दो। जलने का सुख तो बहुत से एलियन ने प्राप्त किया है, आज इन्हे दिखा दो की हम फाड़ते कैसे है। याद रहे इनके शरीर में एसिड दौड़ता है, इसलिए जब तुम इन्हें फाड़ो तो तुम्हारे पंजों में एसिड को भी जो गला दे, ऐसा टॉक्सिक दौड़ना चाहिए। चलो–चलो जल्दी करो, मेरे कानो में चीख की आवाज नही आ रही।”....

इवान अपनी तेज दहाड़ के साथ एलियन के ओर दौड़ते..... “बॉस बस एक मिनट में यहां का माहौल चींख और पुकार वाली होगी। और उसके अगले 5 मिनट में पूरा माहौल शांत।”...

अलबेली भी इवान के साथ दौड़ती..... “क्या बात है मेरे पतिदेव। आई लव यू”...

इवान एक पल रुककर अलबेली को झपट्टा मारकर चूमा और उसके अगले ही पल लंबी छलांग लगाकर धम्म से सीधा एलियन के बीच कूदा। इवान के पीछे अलबेली भी कुद चुकी थी। और उन दोनो के पीछे ओजल। इवान और अलबेली जबतक एक को चीड़–फाड़ रहे थे, तब तक ओजल अपने दंश को लहराकर जब शांत हुई चारो ओर कटे सर हवा में थे।

ओजल एक भीड़ को शांत कर दूसरे भिड़ को काटने निकल गयी। न तो क्ला निकला न ही फेंग। न ही एलियन के लेजर असर किये ना ही फसाने वाले गोल किरणे। बस ओजल का कल्पवृक्ष दंश था और चींख के साथ हवा में उड़ते धर से अलग सर। जबतक इवान और अलबेली दूसरी भिड़ तक पहुंचते तब तक ओजल दूसरी भिड़ काटकर तीसरी भिड़ के ओर प्रस्थान कर चुकी थी। पूर्ण रौद्र रूप में ओजल जैसे भद्र काली का रूप ले चुकी थी।

तीसरे भिड़ की ओर आगे बढ़ने के बजाय इवान और अलबेली वापस आकर निशांत के पास खड़े हो गये और चिल्लाते हुये बस ओजल को प्रोत्साहन दे रहे थे। एक बार जब ओजल शुरू हुई फिर तो महज 5 मिनट में एलियन को तादाद मात्र 1 बची थी। वो भी विवियन जीवित इसलिए बचा क्योंकि बदले मौहौल को देखकर वह सब छोड़ कर भाग रहा था।

ओजल भी उसे मारने के लिये दौड़ी ही थी कि इतने में पुलिस सायरन सुनकर वह रुक गयी। टर्की की स्थानीय पुलिस पहुंच चुकी थी। पुलिस को बुलाने में भी विवियन का ही हाथ था। आर्यमणि ने महज इशारे किये और पल भर में ही निशांत समझ चुका था कि क्या करना है। पुलिस आयी और गयी इस बीच में निशांत ने उसे वही दिखाया जिस से पुलिस जल्दी चली जाये। मौहौल जब शांत हुआ तब हर किसी में एक ही रोष था, विवियन जिंदा भाग गया।
Awesome update
 

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भाग:–149


इसके पूर्व आर्यमणि जैसे ही उन कीड़ों की कैद से आजाद हुआ सबसे पहला ख्याल रूही पर ही गया। अचेत अवस्था में वो बुरी तरह से कर्राह रही थी। विवियन और बाकी एलियन को तो यकीन तक नही हुआ की आर्यमणि के शरीर से कीड़े निकल चुके है। वो लोग झुंड बनाकर आर्यमणि पर हमला करने लगे, किंतु आर्यमणि के शरीर की हर कोशिका सक्रिय थी और किसी भी प्रकार के टॉक्सिक को खुद में समाने के लिये उतने ही सक्षम। बदन के जिस हिस्से पर लेजर की किरण और उन किरणों के साथ कितने भी भीषण प्रकोप क्यों नही बरसते, सब आर्यमणि के शरीर में गायब हो जाते।

विवियन और उसके सकड़ो साथी परेशान से हो गये। वहीं आर्यमणि रूही की हालत देखकर अंदर से रो रहा था। किसी तरह खुद पर काबू रखकर आर्यमणि ने आस–पास के माहोल को भांपा। उसपर लगातार एलियन के हमले हो रहे थे। सादिक यालविक और उसका बड़ा सा पैक आराम से वहीं बैठकर तमाशा देख रहा था। आर्यमणि पूरी समीक्षा करने के बाद तेज दौड़ने के लिये पोजिशन किया। किंतु जैसे ही 2 कदम आगे बढ़ाया वह तेज टकराकर नीचे रेत पर बिछ गया।

आर्यमणि को ध्यान न रहा की वह किरणों के एक घेरे में कैद था। किरणों का एक विचित्र गोल घेरा जिसे आर्यमणि पार ना कर सका। आर्यमणि हर संभव कोशिश कर लिया किंतु किरणों के उस गोल घेरे से बाहर नही निकल सका। विवियन और उसकी टीम भी जब लेजर की किरणों से आर्यमणि को मार न पाये, तब उन लोगों ने भी विश्राम लिया। वो सब भी आर्यमणि की नाकाम कोशिश देख रहे थे और हंस रहे थे।

विवियन:– क्या हुआ प्योर अल्फा, किरणों की जाल से निकल नही पा रहे?

आर्यमणि:– यदि निकल गया होता तो क्या तू मुझसे ऐसे बात कर रहा होता।

विवियन:– अकड़ नही गयी हां। आर्यमणि सर तो बड़े टसन वाले वेयरवोल्फ निकले भाई। सुनिए आर्यमणि सर यहां हमे कोई मारकर भी चला जाये, तो भी तुम उस घेरे को पार ना कर पाओगे। चलो अब तुम्हे मै एक और कमाल दिखाता हूं। दिखाता हूं कि कैसे हम घेरे में फसाकर अपने किसी भी शक्तिशाली दुश्मन को पहले निर्बल करते है, उसके बाद उसके प्राण निकालते हैं।

आर्यमणि:– फिर रुके क्यों हो? तुम अपना काम करो और मैं अपना...

आर्यमणि अपनी बात कहकर आसान लगाकर बैठ गया। वहीं विवियन ने गोल घेरे के चारो ओर छोटे–छोटे रॉड को गाड़ दिया, जिसके सर पर अलग–अलग तरह के पत्थर लगे हुये थे। गोल घेरे के चारो ओर रॉड लगाने के बाद विवियन पीछे हटा। देखते ही देखते रॉड पर लगे उन पत्थरों से रौशनी निकलने लगी जो आर्यमणि के सर से जाकर कनेक्ट हो गयी।

आर्यमणि ने वायु विघ्न मंत्र का जाप तो किया पर उन किरणों पर कुछ भी असर न हुआ। फिर आर्यमणि ने उन किरणों को किसी टॉक्सिक की तरह समझकर खुद में समाने लगा। जितनी तेजी से वह किरण आर्यमणि के शरीर में समाती, उतनी ही तेजी से उसके शरीर से काला धुवां निकल रहा था। यह काला धुवां कुछ और नहीं बल्कि आर्यमणि के शरीर में जमा टॉक्सिक था, जो बाहर निकल रहा था।

पहले काला धुवां बाहर निकला उसके बाद उजला धुवां। उजला धुवां आर्यमणि के शरीर का शुद्ध ऊर्जा था, जो शरीर से निकलकर हवा में विलीन हो रहा था। धीरे–धीरे उसकी शक्तियां हवा में विलीन होने लगी। आर्यमणि खुद में कमजोर, काफी कमजोर महसूस करने लगा। आसान लगाकर बैठा आर्यमणि कब रेत पर लुढ़का उसे खुद पता नही चला।

आर्यमणि के शरीर की ऊर्जा, उजली रौशनी बनकर लगातार निकल रही थी। वह पूर्ण रूपेण कमजोर पड़ चुका था। आंखें खुली थी और होश में था, इस से ज्यादा आर्यमणि के पास कुछ न बचा था। तभी वहां आर्यमणि के जोर–जोर से हंसने की आवाज गूंजने लगी। किसी तरह वह खुद में हिम्मत करके अट्टहास से परिपूर्ण हंसी हंस रहा था।

विवियन:– लगता है मृत्यु को करीब देख इसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।

आर्यमणि बिना कोई जवाब दिये हंसता ही रहा काफी देर तक सबने उसकी हंसी सुनी। जब बर्दास्त नही हुआ तब यालविक पैक का मुखिया सादिक यालविक चिल्लाते हुये पूछने लगा..... “क्यों बे ऐसे पागल की तरह क्यों हंस रहा है?”...

आर्यमणि:– अपने परिवार को धोखा दिया। नेरमिन से दुश्मनी भी हो ही जाना है, लेकिन जिस शक्ति के लिये तूने शिकारियों का साथ दिया, वो तुझे नही मिलेगी।

आर्यमणि इतना धीमे बोला की सबको कान लगाकर सुनना पड़ा। 3 बार में सबको उसकी बात समझ में आयी। आर्यमणि की बात पर विवियन ठहाके मारकर हंसते हुये..... “तुझे क्या लगता है हम अपनी बात पर कायम न रहेंगे। सादिक न सिर्फ तेरी शक्तियां लेगा बल्कि सरदार खान की तरह ही वह भी एक बीस्ट अल्फा बनेगा। बस थोड़ा वक्त और दे। अभी तेरी थोड़ी और अकड़ हवा होगी, फिर तू खुद भी देख लेगा, कैसे तेरी शक्तियां सादिक की होती है।”

आर्यमणि समझ चुका था कि विवियन खुद ये घेरा खोलने वाला है। पूरे मामले में सबसे अच्छी ये बात रही की किसी का भी ध्यान रूही पर नही गया। आर्यमणि ने सबका ध्यान अपनी ओर ही बनवाए रखा। वह कमजोर तो पड़ ही चुका था बस दिमाग को संतुलित रखे हुये था। आर्यमणि सोच चुका था कि घेरा खुलते ही उसे क्या करना है।

10 मिनट का और इंतजार करना पड़ा। आर्यमणि की जब आंखे बंद हो रही थी, ठीक उसी वक्त किरणों का वह घेरा खुला। किरणों का घेरा जैसे ही खुला, पंजे के एक इशारे मात्र से ही आर्यमणि ने सबको जड़ों में ढक दिया। आर्यमणि के अंदर इतनी जान नही बाकी थी कि वह खड़ा भी हो सके। यह बात आर्यमणि खुद भी समझता था, इसलिए सबकुछ जैसे पहले से ही सोच रखा हो।

सबको जड़ों में ढकने के बाद खुद को और रूही को भी जड़ों में ढका। कास्टल के रास्ते पर जड़ों की लंबी पटरी ही जैसे आर्यमणि ने बिछा रखी थी। जड़ें दोनो को आगे भी धकेल रही थी और उन्हे जरूरी पोषण भी दे रही थी। लगभग 3 किलोमीटर तक जड़ों पर खिसकने के बाद आर्यमणि के अंदर कुछ जान वापस आयी और वह रूही को उठाकर कैस्टल के ओर दौड़ लगा दिया।

आर्यमणि जैसे ही कास्टल के अंदर पहुंचा, इवान उसकी गोद से रूही को उठाकर सीधा बेड पर रखा। संन्यासी शिवम् भी उतनी ही तेजी से अपना काम करने लगे। और इधर आर्यमणि, जैसे ही उसकी नजर अपने लोगों पर पड़ी... वो घुटनो पर आ गया और फूट–फूट कर रोने लगा। ओजल नीचे बैठकर, अपने दोनो हाथ से आर्यमणि के आंसू पूछती... "बॉस, दीदी को कुछ नही हुआ है... उसका इलाज चल रहा है।"…

"सब मेरी गलती है... सब मेरी गलती है... मुझे इतने लोगों से दुश्मनी करनी ही नही चाहिए थी"… आर्यमणि विलाप करते हुये बड़बड़ाने लगा।

ओजल:– संभालो बॉस, खुद को संभालो...

आर्यमणि:– रूही.. कहां है... कहां है रूही"…

ओजल:– यहीं पास में है।

आर्यमणि:– हटो मुझे उसे हील करना है... सब पीछे हटो..

तभी संन्यासी शिवम पीछे मुड़े और दंश को भूमि पर पटकते... "अशांत मन केवल तबाही लाता है। अभी रूही का जिस्म हील करेंगे तो हमेशा के लिये 10 छेद उसके बदन में रह जाएंगे। खुद को शांत करो"…

संन्यासी शिवम की बात सुनने के बाद आर्यमणि पूरा हताश हो गया। वहीं जमीन पर बैठकर रूही, रूही बड़बड़ाने लगा। दूसरी ओर जड़ों में फसे एलियन ने पहले खुद को जड़ों से आजाद किया, बाद में सादिक यालक और उसके पूरे पैक को। कुछ ही देर में कास्टल के दरवाजे पर पूरी फौज खड़ी थी। फौज लगातार अंदर घुसने का प्रयास कर रही थी, लेकिन दरवाजे के 10 कदम आगे ही हवा में जैसे किसी ने दीवार बना दिया हो। सभी दरवाजे से 10 कदम की दूरी पर खड़े थे।

संन्यासी शिवम्:– गुरुदेव दुश्मन द्वार खड़े है। मैं रूही को देखता हूं, आपलोग उन बाहर वाले दुश्मनों को देखिए।

आर्यमणि:– हां सही कह रहे आप।

संन्यासी शिवम्:– ओजल अपने दंश से सामने की सुरक्षा दीवार गिरा दो।

कास्टल के ग्राउंड फ्लोर पर संन्यासी शिवम, रूही का इलाज शुरू कर चुके थे। पूरी अल्फा पैक कास्टल के दरवाजे से बाहर कतार लगाये खड़ी थी। उधर से विवियन चिल्लाया.... “तुम लोग बहुत टेढ़ी जान हो... तुम्हारी दुर्दशा हो गयी फिर भी बच गये। तुम्हारी बाजारू पत्नी के शरीर में इतने छेद हुये, लेकिन लेजर के साथ–साथ उसके भीषण जहर से भी बच गयी। कमाल ही कर दिया। अच्छा हुआ जो तुम और तुम्हारे लोग कतार लगाकर अपनी मौत के लिये पहले ही सामने आ गये।”

इवान कुछ तो कहना चाह रहा था किंतु आर्यमणि ने इशारे में बस चुप रहने के लिये कहा। उधर निशांत इशारे में सबको समझा चुका था कि आस पास का दायरा पूरे भ्रम जाल में घिरा हुआ है। तभी एक बड़े विस्फोट के साथ बाहर की अदृश्य दीवार टूट गयी। जब रेत और धूल छंटा तब वहां इकलौत आर्यमणि अपना पाऊं जमाए खड़ा था। बाकी अल्फा पैक सदस्य पर विस्फोट का ऐसा असर हुआ की वो लोग कई फिट पीछे जाकर कास्टल की दीवार से टकराये। दरअसल मंत्र उच्चारण के बाद ओजल द्वारा कल्पवृक्ष दंश को संतुलित रूप से भूमि पर पटकना था, किंतु ओजल से थोड़ी सी चूक हो गयी और दीवार गिराने वाले विस्फोट का असर न सिर्फ विपक्षी को हुआ बल्कि आंशिक रूप से अल्फा पैक पर भी पड़ा।

असर तो आर्यमणि पर भी होता लेकिन विस्फोट के ठीक पहले आर्यमणि के हाथ में उसका एम्यूलेट पहुंच चुका था। बाकी के अल्फा पैक अपना धूल झाड़ते खड़े हुये। सबसे ज्यादा गुस्सा निशांत को ही आया। गुस्से में झुंझलाते हुये..... “तुम (ओजल) कभी भी नही सिख सकती क्या? विस्फोट का असर खुद के खेमे पर भी कर दी।”..

ओजल:– निशांत सर अभी सिख ही रही हूं। किसी वक्त आप भी कच्चे होंगे...

निशांत:– कच्चा था लेकिन अपनी बेवकूफी से अपने लोगों के परखच्चे नही उड़ाता था। पागल कहीं की...

इवान:– अरे वाह एमुलेट वापस आ गया।

दरअसल एक–एक करके सबके एमुलेट लौट आये थे। हवा में बिखरे रेत जब आंखों के आगे से हटा, दृष्टि पूरी साफ हो चुकी थी। विपक्ष दुश्मनों के आगे की कतार तो जैसे गायब हो चुकी थी, लेकिन बाकी बचे लोग हमला बोल चुके थे। बेचारे एलियन और यालवीक की सेना अपनी मौत को मारने की कोशिश में जुटे थे।

इनकी कोशिश तो एक कदम आगे की थी। जिस जगह अल्फा पैक खड़ी थी उसके आस पास की जगह पर गोल–गोल घेरे बन रहे थे। गोला इतना बड़ा था कि उसमे आराम से 4–5 लोग घिर जाये। हर कोई जमीन पर किरणों के बने गोल घेरे साफ देख सकते थे। एक प्रकार का एलियन महा जाल था, जिसमे अल्फा पैक को फसाकर मारने की कोशिश की जा रही थी।

किंतु निशांत के भ्रम जाल में पूरे एलियन उलझ कर रह गये। विवियन को भी समझ में आ गया की उनका पाला किस से पड़ा है। किरणों के गोल जाल में जब अल्फा पैक नही फंसा तब विवियन ने टर्की के स्थानीय वेयरवोल्फ को इशारा किया। वुल्फ पैक का मुखिया सादिक यालविक, इशारा मिलते ही आर्यमणि पर हमला करने के लिये कूद गया।

सादिक याल्विक लंबी दहाड़ लगाकर सीधा आर्यमणि के ऊपर छलांग लगा चुका था। किंतु भ्रम जाल के कारण सादिक यालविक को लग रहा था कि वह आर्यमणि के ऊपर कूद रहा है और आर्यमणि साफ देख सकता था कि सादिक ने एक हाथ बाएं छलांग लगाया था। आर्यमणि ने पंजा झटक कर अपने क्ला को बाहर निकाला और जैसे ही सादिक याल्विक उसके हाथ के रेंज में आया फिर तो आर्यमणि ने अपना पंजा सीधा सादिक यालविक के सीने में घुसेड़ कर उसे हवा में ही टांग दिया। पूरा यालविक पैक ही दर्द भरी दहाड़ लगाते आर्यमणि के ऊपर हमला कर चुका था।

अल्फा पैक जो पीछे खड़ी थी, वह बिना वक्त गवाए तेज दौड़ लगा चुके थे। एमुलेट के पावर स्टोन ने फिर तो सबको ऐसा गतिमान किया की सभी कुछ दूर के दौड़ने के बाद जब छलांग लगाये, फिर तो हवा में कई फिट ऊंचा उठे और सीधा जाकर वुल्फ के भिड़ में गिरे। ओजल अपना कल्पवृक्ष दंश जब चलाना शुरू की फिर तो सभी वुल्फ ऐसे कट रहे थे, मानो गाजर मूली कटना शुरू हो चुके हो।

अलबेली और इवान तो पंजों से सबको ऐसे फाड़ रहे थे कि उसे देखकर यालविक पैक के दूसरे वुल्फ स्थूल पड़ जाते। भय से हृदय में ऐसा कंपन पैदा होता की डर से अपना मल–मूत्र त्याग कर देते। महज 5 मिनट में ही यालविक पैक को चिड़ने के बाद सभी एक साथ गरजते..... “बॉस यालविक पैक साफ हो गया। बेचारा सादिक आपके पंजों पर टंगा अकेला जिंदा रह बचा है।”...

“फिर ये अकेला वुल्फ बिना अपने पैक के करेगा क्या?”.... कहते हुये आर्यमणि ने अपना दूसरा पंजा सीधा उसके गर्दन में घुसाया और ऊपर के ओर खींचकर ऐसे फाड़ा जैसे किसी कपड़े में पंजे फंसाकर फाड़ते हो। पूरा चेहरा आड़ा तिरछा होते हुये फटा। सादिक यालविक का पार्थिव शरीर वहीं रेत पर फेंककर आर्यमणि चिल्लाया..... “ये हरमजादे एलियन अब तब अपने पाऊं पर क्यों है? वायु विघ्न मंत्र के साथ आगे बढ़ो और अपने क्ला से सबके बदन को चीड़ फाड़ दो। जलने का सुख तो बहुत से एलियन ने प्राप्त किया है, आज इन्हे दिखा दो की हम फाड़ते कैसे है। याद रहे इनके शरीर में एसिड दौड़ता है, इसलिए जब तुम इन्हें फाड़ो तो तुम्हारे पंजों में एसिड को भी जो गला दे, ऐसा टॉक्सिक दौड़ना चाहिए। चलो–चलो जल्दी करो, मेरे कानो में चीख की आवाज नही आ रही।”....

इवान अपनी तेज दहाड़ के साथ एलियन के ओर दौड़ते..... “बॉस बस एक मिनट में यहां का माहौल चींख और पुकार वाली होगी। और उसके अगले 5 मिनट में पूरा माहौल शांत।”...

अलबेली भी इवान के साथ दौड़ती..... “क्या बात है मेरे पतिदेव। आई लव यू”...

इवान एक पल रुककर अलबेली को झपट्टा मारकर चूमा और उसके अगले ही पल लंबी छलांग लगाकर धम्म से सीधा एलियन के बीच कूदा। इवान के पीछे अलबेली भी कुद चुकी थी। और उन दोनो के पीछे ओजल। इवान और अलबेली जबतक एक को चीड़–फाड़ रहे थे, तब तक ओजल अपने दंश को लहराकर जब शांत हुई चारो ओर कटे सर हवा में थे।

ओजल एक भीड़ को शांत कर दूसरे भिड़ को काटने निकल गयी। न तो क्ला निकला न ही फेंग। न ही एलियन के लेजर असर किये ना ही फसाने वाले गोल किरणे। बस ओजल का कल्पवृक्ष दंश था और चींख के साथ हवा में उड़ते धर से अलग सर। जबतक इवान और अलबेली दूसरी भिड़ तक पहुंचते तब तक ओजल दूसरी भिड़ काटकर तीसरी भिड़ के ओर प्रस्थान कर चुकी थी। पूर्ण रौद्र रूप में ओजल जैसे भद्र काली का रूप ले चुकी थी।

तीसरे भिड़ की ओर आगे बढ़ने के बजाय इवान और अलबेली वापस आकर निशांत के पास खड़े हो गये और चिल्लाते हुये बस ओजल को प्रोत्साहन दे रहे थे। एक बार जब ओजल शुरू हुई फिर तो महज 5 मिनट में एलियन को तादाद मात्र 1 बची थी। वो भी विवियन जीवित इसलिए बचा क्योंकि बदले मौहौल को देखकर वह सब छोड़ कर भाग रहा था।

ओजल भी उसे मारने के लिये दौड़ी ही थी कि इतने में पुलिस सायरन सुनकर वह रुक गयी। टर्की की स्थानीय पुलिस पहुंच चुकी थी। पुलिस को बुलाने में भी विवियन का ही हाथ था। आर्यमणि ने महज इशारे किये और पल भर में ही निशांत समझ चुका था कि क्या करना है। पुलिस आयी और गयी इस बीच में निशांत ने उसे वही दिखाया जिस से पुलिस जल्दी चली जाये। मौहौल जब शांत हुआ तब हर किसी में एक ही रोष था, विवियन जिंदा भाग गया।
Awesome update
भाग:–150


पुलिस आयी और गयी इस बीच में निशांत ने उसे वही दिखाया जिस से पुलिस जल्दी चली जाये। मौहौल जब शांत हुआ तब हर किसी में एक ही रोष था, विवियन जिंदा भाग गया।

युद्ध का रेतीला मैदान पूरा साफ था। पुलिस भी धीरे–धीरे नजरों से ओझल हो रही थी। जैसे ही पुलिस अल्फा पैक के दृष्टि से ओझल हुई, आर्यमणि भागता हुआ कैसल पहुंचा। रूही अब भी अचेत अवस्था में थी। आर्यमणि, संन्यासी शिवम के आगे हाथ जोड़कर खड़ा होते... "मुझे माफ कर दीजिए, रूही के गम ने पागल कर दिया था।"…

संन्यासी शिवम:– आप मोह से बंधे है जो किसी भी परिस्थिति में नही जायेगी। माफी मत मांगिए गुरुदेव। मैं पूरी परिस्थिति का अवलोकन करने के बाद यही कहूंगा की आप जल्द से जल्द भारत लौट आइये। मारने की कोशिश करने वालों को केवल एक बार नसीब चाहिए।

आर्यमणि:– हां मैं समझ रहा हूं शिवम् सर। इसलिए तो मैं एकांतवास में प्रस्थान कर रहा हूं, जहां आप टेलीपोर्टेशन के जरिए भी नही पहुंच सकते। जहां के पारिस्थितिक तंत्र को वहां के निवासी जीव के अलावा कोई छेड़ नही सकता। जब वहां से लौटूंगा तब अपनी पूर्ण सिद्धि में रहूंगा और तब शुरू होगा इन परिग्रही को उनके सही स्थान पर भेजना।

संन्यासी शिवम्:– क्या आप शेषनाग लोक में जाने की सोच रहे है?

आर्यमणि:– हां बिलकुल सही समझे है। एक पूरी दुनिया जो आज भी नागराज की कुंडली पर घूमता है। पृथ्वी ग्रह के अंदर का एक ग्रह जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है।

संन्यासी शिवम्:– अनंत कीर्ति की पुस्तक को साथ लिये जाइएगा। वहां का विवरण मैं भी पढ़ना चाहूंगा। वैसे सिद्धि प्राप्त करने के लिये आपने काफी अनुकूल जगह को चुना है।

आर्यमणि:– आपका धन्यवाद। अब आप यदि रूही के विषय में कुछ बता देते तो मन को थोड़ी संतुष्टि मिल जाती। एक मन तो रूही पर ही अटका है।

संन्यासी शिवम्:– रूही की हालत ठीक है। आप दोनो का बच्चा भी स्वास्थ्य है। शायद रूही जानती थी कि कहां हमला हो रहा है इसलिए उसने अपने बच्चे को सुरक्षा देना पहली प्राथमिकता समझी...

आर्यमणि:– क्या वो लोग मेरे बच्चे को मार रहे थे...

संन्यासी:– अनजाने में ही सही लेकिन हां, उनका हमला पेट पर ही हुआ था... शिकारी का कुरुर नियम.. शिकार का पेट फाड़ दो... धीरे, धीरे खून बहने से शिकार दर्द और तड़प के साथ मरेगा और उनके साथी बौखलाहट में फसेंगे।

संन्यासी की बात सुनकर तो आर्यमणि के खून ने जैसे उबाल मार दिया हो। सन्यासी शिवम्, आर्यमणि के कंधे पर हाथ रखते... "गुरुदेव इतना गुस्सा जायज नहीं।”

आर्यमणि:– हम्मम… रूही कब तक होश में आयेगी...

संन्यासी:– रूही के नब्ज में जो जा रहा है उसे "सेल बॉडी सब्सटेंस" कहते है। शरीर में जहां कहीं भी क्षतिग्रस्त अंग हो, या शरीर का कोई हिस्सा पहले था, लेकिन बाद में किसी कारणवश पूर्ण रूप से गायब हो गया, उनकी जगह ये "सेल बॉडी सब्सटेंस" ले लेगा। ये “सेल बॉडी सब्सटेंस” शरीर का नेचुरल सेल ही होता है, जो शरीर के सभी क्षतिग्रस्त अंगों की कोशिकाओं को विकसित कर देता है। यही नहीं कोई अंग कट गया हो तो ये कोशिकाएं आपस में जुड़ती हुई उस पूरे अंग तक को विकसित कर सकती है। हां लेकिन रूही के बदन में आर–पार छेद हुआ था, इसलिए वह जगह नई कोशिकाओं से भर तो गई है किंतु पूरी तरह से हील होने में समय लगेगा...

आर्यमणि:– क्या मैं उसे हील कर दूं..

संन्यासी:– नही, कोशिकाएं आपस में जुड़ेंगी और फिर वहां के पूरे हिस्से को विकसित करेगी। यूं समझो की गड्ढे में कोई द्रव्य भरा है। आप हील करोगे तो वो द्रव्य सुख जायेगा। कोशिकाएं जुड़ तो जायेगी लेकिन गड्ढा पूरा भरेगा नही, जो रूही को तमाम उम्र परेशान करेगा। आप चिंता मत करो, उसकी खुद की हीलिंग ऐसी है कि वो कल तक लगभग पूरी रिकवर हो जायेगी। कल ही रूही को होश में आने दीजिए तो ज्यादा बेहतर होगा।

आर्यमणि:– मेरी पत्नी को बाजारू बनाया। उसके वस्त्र नोचे गये। पूरे परिवार को भी निशाना बनाया गया। यदि एलियन हमें मारने में सफल रहते, फिर वो लोग परिवार और दोस्तों को भी कहां छोड़ते। जिन्हे डराया था, वो तो मुझे ही डराने आ गये। रूही के जागने में अभी एक दिन का वक्त है, मुझे क्या करना चाहिए शिवम् सर?

संन्यासी शिवम:– सात्विक आश्रम पूरी दुनिया को काली शक्तियों से सुरक्षा का क्या भरोसा देगा, जब उसका रक्षक अपना और अपने कुटुंब की रक्षा ही न कर पाये। आप जो भी फैसला लीजिएगा उम्मीद है सबके हित में होगा।

आर्यमणि:– अल्फा पैक, ये नायजो जहां भी होंगे पेड़ पौधों की वहां कोई कमी नही होगी। हमे नायजो के किसी भी प्लेनेट पर जड़ों से खेलने का पूरा मौका मिलेगा। वहां हमे निशांत के भ्रम जाल का सहारा मिलेगा, तो नायजो के ऊपर ओजल की मंत्र शक्ति भी काम करेगी। अभी हमारे पास पूरे 24 घंटे है और इन 24 घंटों में हम नायजो को वह सबक सिखा सकते है, जिसको कल्पना किसी ने भी की न होगी।

निशांत:– तू करना क्या चाहता है?

आर्यमणि:– इनका मूल ग्रह, जिसे नायजो समुदाय अपना गृह ग्रह मानते है विषपर, वहां घुसकर उसके मुखिया को साफ कर देना।

अलबेली:– क्या एक देश के मुखिया को मार देना आसान होगा? और यदि आसान भी हो तो इसका परिणाम पृथ्वी पर क्या होगा?

आर्यमणि:– हम्मम... ठीक है पलक से कॉन्टैक्ट करो। कोई एक नाम और पता लो जहां वार करने से इनको पूरा अक्ल आ जाये।

निशांत:– उतना करने की जरूरत नही है। 24 घंटे में भारत से नायजो की जितनी आबादी साफ कर सकते हो कर दो। हम अंत में ये संदेश छोड़ देंगे की अगली बारी निशाना पृथ्वी के नायजो नही, बल्कि उनके मूल ग्रह जहां से खुद की उत्पत्ति मानते है, विषपर ग्रह के नाजयो का ये हाल करेंगे।

संन्यासी शिवम्:– गुरुदेव निशांत का सुझाव भी अच्छा है। बाकी अंतिम फैसला आपका।

आर्यमणि:– मुझे भी निशांत का सुझाव ज्यादा सही लगा। तो फिर चलो वन डे एक्शन खेलने...

एक बार जो फैसला हुआ उसका बाद तो जैसे अल्फा पैक कहर बनकर बरसे। अच्छे लोग जब बेरहम होते है, फिर कितने बेरहम हो सकते है, उसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण तो अल्फा पैक ने जर्मनी में दे ही दिया था। एक बार फिर अल्फा पैक अपने कुरुरता के चरम पर थे और जहां भी गये सबको जड़ों में लिटाकर कैस्टर ऑयल प्लांट के जहर का मजा देते चले।

आज ना तो किसी को जलाकर उसकी मौत को आसान किया गया और न ही मुंह बांधकर उनके चिल्लाने को बंद किया गया। जड़ों में लिपटे कांटों की अर्थी पर कैस्टर ऑयल का जहर नायजो के शरीर में उतर रहा था। और उनका कान फाड़ चिल्लाना सुनकर ही बचाने के लिये पहुंचे नायजो के हाथ और पाऊं कांपने लगे थे।

नायजो के 22 वर्किंग स्टेशन को महज 24 घंटे में मौत की भावायवाह पुकार में बदलकर अल्फा पैक वापस से रूही के पास पहुंच चुके थे, जिसकी सुरक्षा के लिये वहां ओजल को छोड़ दिया गया था। भारत में लगभग 60 हजार नायजो तकरीबन 6 से 8 घंटे तक गला फाड़ चिंखते ही रहे। जो उन्हे बचाने पहुंचे उन्होंने जड़ों को काटने की कोशिश किये, परंतु जितना जड़ों को काटते उस से दुगना जड़ पल भर में उग आता।

जैसे आर्यमणि के पास नाजयो के किरणों के गोल घेरे का तोड़ नही था, ठीक उसी प्रकार नायजो के पास अल्फा पैक के जड़ों का तोड़ नही था। जबकि नायजो खुद को पेड़ पौधों के संरक्षक पुकारते थे। जड़ों को काटकर हटाने के लिये सारे टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके देख लिये। पेट्रोल में डुबाकर जड़ों में आग तक लगाकर देख लिये, किंतु आर्यमणि ने सबके किस्मत में धीमा मौत लिख दिया था और उन्हे वही भायवाह मौत मिली। दर्द भरी चींख के बीच शरीर के एक–एक कोशिकाओं को खराब करते आगे बढ़ता कैस्टर ऑयल प्लांट का जहर।

हर वर्किंग स्टेशन में किसी को भी हाथ लगाने से पहले पलक से संपर्क किया गया, ताकि जो नायजो अपने समुदाय को गलत मानते है और पलक के साथ उनसे लड़ने की सोच रहे थे, उनके साथ कुछ भी गलत न हो। नागपुर वर्किंग स्टेशन को छोड़कर महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल के लगभग हर उस स्टेशन में मौत का मंजर दिखा, जहां भी नायजो बहुतुल्य थे।

हर वर्किंग स्टेशन की दीवार पर बड़े–बड़े अक्षरों से लिख दिया गया.... “यदि अगली बार कोई तुच्ची हरकत हुई फिर आज का 24 घंटे का एक्शन 240 दिनो का होगा और नायजो बसने वाले सभी 5 प्लेनेट पर हम बराबर–बराबर 48 दिन तक का मौत का तांडव होगा। बस एक बार और जर्मनी की संधि का उल्लंघन करके तो दिखाओ।”

इतना बड़ा कांड था, हाई–टेबल की बैठक तुरंत ही बिठाई गयी। देश, दुनिया और ग्रहों के सभी नेता सभा करने बैठ गये। सभा के बीच में ही नायजो के आम लोग झुंड बनाकर पहुंच गये। आक्रोशित भिड़ ने अपने हाई–टेबल पर बैठे नेताओं को खूब गालियां दी। हाई–टेबल की बैठक दूसरे नायजो प्लेनेट से भी हो रही थी। वहां बैठे नेताओं को भी सबने खूब खरी–खोटी सुना दिया।

हाई–टेबल पर बैठे नेता, आर्यमणि को सबक सिखाने की बात कर रहे थे, जिसके जवाब में पूरी भिड़ अपने नेताओं के गले में रस्सी फसाकर उसे दीवार से टांगकर साफ कहने लगे.... “बात चीत से मसला हल करो। अब यदि आर्यमणि के जर्मनी संधि का उल्लघंन हुआ तो आर्यमणि बाद में अपना 48 दिन का तांडव दिखाएगा, उस से पहले हम सब तुम नेताओं को मारकर आत्महत्या कर लेंगे। आर्यमणि की दी हुई मौत दुश्मन को भी नसीब न हो।”..

पलक और उसके साथी भी भिड़ का हिस्सा थे। आर्यमणि का खौफ और उसका परिणाम देखकर सभी अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहे थे और उन्होंने पूरे मीटिंग का नतीजा आर्यमणि तक पहुंचा दिया।

महज 24 घंटा और पलक ने जब अल्फा पैक के उठाए कदम का परिणाम बताया, तब पूरा अल्फा पैक सुकून में था। वहीं से सभी फिर टेलीपोर्ट होकर सीधा लॉस एंजिल्स पहुंच गये। 22 दिसंबर की शाम, लॉस एंजिल्स के किसी होटल में आर्यमणि, रूही के पास बैठा था। बेहोसी की दावा दिन में ही दी गई थी, इसलिए उसका असर खत्म होने को था। रूही अपनी चेतना में लौट रही थी। उसके बदन में हलचल को देख आर्यमणि उसका हाथ थामे आंख खोलने का इंतजार कर रहा था।

जैसे ही रूही की आंखें खुली वो झटके के साथ उठी और अपना पेट टटोलने लगी। जब उसे अपना बच्चा सुरक्षित महसूस हुआ, आंखों से झर, झर करते झरना बहना शुरू हो गया। आर्यमणि रूही को गले लगाकर उसे सांत्वना देता रहा... "आर्य, जिन्होंने हम पर हमला किया था, उन सबका क्या हुआ?"..

आर्यमणि:– उस मौजूदा घटना का मुखिया विवियन बस भाग गया, बाकी कोई नही बचा...

रूही, आर्यमणि से लिपट कर उसे काफी जोर से पकड़ ली... "आर्य, मुझे लगा अब हम दोबारा कभी यूं गले नही लग पाएंगे। अभी तो जिंदगी ने खुशियां देनी शुरू की थी, और इतनी जल्दी मैं मर जाऊंगी"…

आर्यमणि:– शांत हो जाओ... तुम्हे कुछ नही होगा। और याद है ना हम एक दूसरे से बोर होने तक साथ रहेंगे...

"आह" की दर्द भरी चींख रूही के मुंह से निकल गई। आर्यमणि अलग होते... "तुम ठीक तो हो न"..

रूही:– कंधे के पास दर्द उठा था...

आर्यमणि अपने हाथो से रूही का दर्द खिंचते.… "चिंता की कोई बात नही। अकेले शायद मैं तुम्हे खो देता। लेकिन सन्यासी शिवम् पहले ही खतरे को भांप गये थे। उसी ने पहले अपने पूरे परिवार को निकाला फिर निशांत, इवान, अलबेली और ओजल के साथ हमारी मदद के लिए पहुंच गये..."

रूही:– अपना पूरा परिवार अभी कहां है?...

आर्यमणि:– सभी यहीं, लॉस एंजिल्स में ही है। लेकिन हम दूसरे होटल में है और वो दूसरे... किसी को भी हमले के बारे में पता नही। मां, पापा, भूमि दीदी, चित्रा और माधव को यहां किसी प्रकार के सरप्राइज़ का झांसा देकर सबने पहले भेज दिया था।

रूही:– हां मेरे बदन का छेद ही उनके लिये सरप्राइज़ होगा..

आर्यमणि एक बॉटल आगे बढ़ाते… "वो तो सरप्राइज नही हो सकता, चाहो तो खुद जाकर आईने में देख लो। और ये बॉटल अपने पास रखो.. 20 एमएल सीरप दिन में कम से कम 5 बार पीना”

आर्यमणि की बात सुनकर रूही भागती हुई आईने के पास पहुंची और कंधे से अपने ड्रेस को सरकाकर देखने लगी। काफी हैरानी से वो अपने कंधे के छेद के बारे में पूछी। तब आर्यमणि ने बताया की उसका इलाज सन्यास शिवम् ने किया था। उनके पास कोई "सेल बॉडी सब्सटेंस" थे जो डैमेज सेल की जगह ले लेते हैं। बॉटल में पड़ा सीरप वही सेल बॉडी सब्सटेंस ही है।

रूही जितनी हैरान थी, उतनी ही खुश भी। अपनी दोनो बांह, आर्यमणि के गले में डालकर उसे प्यार से चूमती... "हर वक्त तुम मेरे पास ही रहना जान"….

"हां बाबा मैं तुम्हे छोड़कर कहीं नही जा रहा"…

आर्यमणि सुकून से बिस्तर पर टेक लगाए थे और रूही अपना सर उसके सीने से टिकाकर चैन का श्वांस ले रही थी। दोनो खामोश थे लेकिन धड़कने जैसे सुरमई संगीत बजा रही हो। कब दोनो की आंख लग गई पता ही नही चला।

अगली सुबह दोनो की नींद खुली। आर्यमणि आंख खोलते ही प्यार से रूही के होंठ चूमा और उसके जख्म देखने लगा... रूही भी मुस्कुराती हुई अपनी आंखें खोल दी और प्यार से गले में हाथ डालती... "क्या देख रहे हो जान"..

"जख्म भर गये है और निशान भी नही। दर्द हो रहा है क्या?"..

"हां जान दर्द हो रहा है"…

आर्यमणि अपने हाथ से दर्द खिंचते… "मुझे तो पता नहीं चल रहा"…

आर्यमणि टेक लगाए बैठा था, रूही ठीक उसके ऊपर आकर, अपने ड्रेस को कंधे से सरकाई और ब्रा का हुक खोलकर, आर्यमणि का हाथ अपने स्तन पर डालती... "यहां हाथों की मालिश चाहिए और"…

आर्यमणि, प्यार से स्तन को दबाते... "और क्या"..

रूही, प्यारी सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाते, अपने कमर को आर्यमणि के कमर से थोड़ा ऊपर उठाई। हाथ नीचे ले जाकर उसके लोअर को नीचे खिसकती लिंग को मुट्ठी में दबोच कर उससे प्यार से सहलाने लगी। आर्यमणि का बदन सिहर गया, उसका लिंग पूरा खड़ा... रूही अपने गाउन को कमर के ऊपर लाती, लिंग को अपने योनि पर रखती... "और जान यहां अंदर हलचल मचा है"…

"आउच.. ओह्ह्ह…"… तेज झटके के साथ लिंग अंदर और रूही की सिसकारियां बाहर। आर्यमणि रूही को अपने ऊपर लिटा दिया। दोनो के होंठ एक दूसरे को चूस रहे थे और प्रेम लीला का मधुर आनंद उठा रहे थे।

चरम सुख प्राप्ति के बाद दोनो जैसे तृप्त हो गये हो। रूही आर्यमणि के ऊपर ही सुकून से लेट गई। दोनो की मध्यम चलती धड़कने एक दूसरे के होने का मधुर एहसास करवा रही थी। सुबह के 11 बज रहे होंगे, जब बिना दरवाजा खट–खटाए एक बार फिर ओजल, इवान और अलबेली अंदर घुस चुके थे। अंदर घुसते ही तीनो दरवाजे की ओर मुंह कर लिए.… "बॉस याद तो होना चाहिए था की एक चाबी हमे ये कहकर दिये थे कि दरवाजा मत खट–खटाना, रूही की नींद खुल सकती है।"…
Lazwaab update
 
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