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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

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भाग:–161


थोड़ी बहुत बातचीत और ढेर सारा दिलासा देने के बाद, तब कही जाकर चहकिली चहकना शुरू की। महासागर की अनंत गहराई का सफर जारी रखते, ये लोग विजयदर्थ की राज्य सीमा में पहुंच गये। वुल्फ पैक प्रवेश द्वार पर खड़ा था और सामने का नजारा देख उनका मुंह खुला रह गया। दिमाग में एक ही बात आ रही थी, "क्या कोई विकसित देश यहां के 10% जितना भी विकसित है...

दो पहाड़ों के बीच से ही भव्य प्रवेश द्वार बना दिया गया था। श्वेत रंग के दो पहाड़ पर पूरी हरी भरी वनस्पति के साथ कई रंग बिरंगे पुष्प लगे थे, जिनके ऊपर लाइटिंग का इतना सुंदर काम किया गया था कि मन प्रफुल्लित हो जाए।

प्रवेश द्वार के दोनो ओर कई सुरक्षाकर्मी अपने हाथ में चमकीले धातु के हथियार के साथ तैनात थे। आर्यमणि और उसका पैक प्रवेश द्वार का नजारा देख रहा था, इसी बीच दोनो विशाल पर्वत पर अल्फा पैक पैक की तस्वीर फ्लैश होने लगी। दोनो किनारे खड़े सुरक्षाकर्मी अपना सिर झुकाकर उसका स्वागत करने लगे। सामने से महाती अपने कुछ सखियों के साथ खुद प्रवेश द्वार पर पहुंची.…. "दुनिया के सबसे बड़ी हीलर फैमिली का हमारे राष्ट्र में स्वागत है। आप सब अपने कदम आगे बढ़ाए"…

जैसे ही महाती अपनी बात समाप्त कर आर्यमणि को साथ चलने का न्योता दी, उनके ऊपर पुष्प की बारिश होने लगी। ऐसा भव्य स्वागत था की चारो (आर्यमणि, रूही, इवान और अलबेली) का मन प्रफुल्लित हो उठा। कुछ दूर आगे चले होंगे की उनके लिये शानदार सवारी भी आ गयी। यह कोई हाईटेक एयरक्राफ्ट लग रहा था, जो कार से थोड़ा बड़ा था। पानी को काटकर तेजी से आगे बढ़ने के लिए शायद यह आकर दिया गया था। अलबेली और इवान दोनो एक साथ सवार होते.… "आप लोग मेहमान नवाजी का मजा लीजिए। हम दोनो यहां अकेले घूमेंगे"…

इतना कहकर अलबेली और इवान निकल गये। रूही और आर्यमणि भी एक साथ सवार हो गये। वहीं महाती के जिद करने पर अमेया को उसके साथ जाने दिया। आर्यमणि और रूही महासागर के इस देश को बड़े ध्यान से देख रहे थे। आधुनिकता और टेक्नोलॉजी के मामले में ये लोग पृथ्वी से 500 साल आगे होंगे। शहरों की व्यवस्था और इनकी तेज रफ्तार जिंदगी कमाल की थी। यहां तो इन लोगों ने पानी पर ही सड़क बना दिया था। ऐसा लग रहा था पानी में सीसे का सड़क तैर रहा हो।

सड़क किनारे लगे बाजार, भीड़ भाड़ वाला इलाका और इनकी ऊंची–ऊंची इमारतें और इन इमारतों की लाइटिंग.. ऐसा लग रहा था पानी के अंदर किसी स्वप्न नगरी में पहुंच गये थे। चारो ओर भ्रमण करते रात हो गयी थी। महाती ने बीच में ही अपना कारवां रोककर एक आलीशान घर में सबके रुकने का प्रबंध करवाया। इवान और अलबेली भी शहर के दूसरे हिस्से में थे, जिनकी जानकारी महाती को थी। उनके भी रुकने का उतना ही शानदार व्यवस्था किया गया था।

अगली सुबह तो शहर की पूरी भिड़ जैसे अल्फा पैक के दरवाजे पर खड़ी थी। भले ही आर्यमणि, रूही और अलबेली, इवान शहर के अलग–अलग हिस्सों में थे, किंतु दोनो ही जगहों पर लोगों का उतना ही हुजूम लगा था। कई सड़कें जाम थी और लोग अल्फा पैक से हील करने का आग्रह कर रहे थे। शायद एक प्रयोग को सफल होते हुये अल्फा पैक देखना चाहते थे, इसलिए ये भिड़ इकट्ठा हुई थी।

आर्यमणि, इवान और अलबेली से मन के भीतर के संवादों से संपर्क करते.... “क्या तुम्हारे पास भी लोगों का हुजूम है?”..

अलबेली:– दादा मैं 2 किलोमीटर ऊपर से देख रही हूं, ऐसा लगता है पूरा शहर ही हमारे पास आने के लिये व्याकुल है।

आर्यमणि:– एमुलेट का प्रयोग करो और जड़ों जितना दूर फैलाने का कमांड दे सकती हो दो...

उधर से अलबेली और इवान, इधर से आर्यमणि और रूही। चारो ने जब ध्यान लगाकर जड़ों में ढकना शुरू किया फिर 300 किलोमीटर के क्षेत्रफल में बसे पूरे शहर को ही जड़ों से ढककर, शहर के जर्रे–जर्रे को हील कर चुके थे। इतना टॉक्सिक सबने समेटा की हर किसी का बदन नीला पर चुका था।

लगभग आधा दिन लगा था। आधे दिन के बाद जो बड़े–बड़े बैनर में शहर के विभिन्न इलाकों की तस्वीर आ रही थी, हर कोई अल्फा पैक के लिये अपना सर झुका रहा था। शहर के लोगो ने अल्फा पैक के लिये भव्य मनोरंजन का भी प्रबंध करवाया। कारवां एक शहर से दूसरा और दूसरे शहर से तीसरे शहर पहुंचा और हर शहर की वही कहानी रहती।

अंत में आर्यमणि को महाती से आग्रह करना पड़ा की सफर यहीं समाप्त करते है। महाती को भी लगा की लोग कुछ ज्यादा ही आर्यमणि को परेशान करने लगे है, इसलिए वह आखरी पड़ाव राजधानी तक चलने के लिये कहने लगी। अगली सुबह फिर इनका काफिला बढ़ा। आधा दिन सफर तय करने के बाद ये लोग सीधा राजधानी पहुंचे। राजधानी के बीचों बीच एक भव्य महल बना हुआ था। महल इतना जीवंत बनाया गया था कि मानो नजरों को अपनी ओर आकर्षित कर रही हो। अदभुत और रोमांचक दृश्य.…

महल के द्वार पर अप्सराएं खड़ी होकर इनका स्वागत कर रही थी। पूरे साम्राज्य का सर्वे सर्वा विजयदर्थ, अपने प्रथम पुत्र निमेषदर्थ के साथ खुद स्वागत के लिये आगे खड़ा था। पूरे जोश के साथ स्वागत करते आर्यमणि और रूही को महल में लाया गया। आर्यमणि और रूही महल में बने कमाल की चित्रकारी को बस देखते ही रह गये। इसी बीच अप्सरा से भी ज्यादा सुंदर 5–6 जलपड़ी आर्यमणि से आकर लिपट गयी। उसपर भी उन जल पड़ियों की हालत... सभी ऊपर से नंगी हालत में थे, जिनके स्तन आर्यमणि के बदन से चिपके थे।

विजादर्थ हंसते हुये कहने लगा... "महल के मनोरंजन का आनंद लीजिए आर्यमणि"…

विजयदर्थ अपनी बात पूरी किया ही था कि अगले पल वह हवा में। रूही उसका गला दबोच कर हवा में उठा ली और उन अर्ध नग्न अप्सराओं को घूरती.… "मेरे पति से दूर रह वरना यहां पूरा ही समशान बना दूंगी। और तुम्हे भी बहुत मजा आ रहा था न चिपकने में... टापू पर वापस चलो फिर मैं तुम्हे बताती हूं"..

आर्यमणि:– अब मैंने क्या कर दिया... मैं तो दीवारों पर बनी कलाकारी देख रहा था, इसी बीच अचानक ही ये आकर मुझसे चिपक गयी... मेरी क्या गलती है?

आर्यमणि अपनी बात समाप्त ही किया था की चारो ओर से उन्हे सैनिक घेरने लगे। हथियारबंद लोगों को अपने करीब आते देख दोनो अपने नंगे पाऊं को ही वहां के सतह पर मार दिये। महल के सतह से उनके पाऊं टकराते ही जो जहां था, वहीं जड़ों में जकड़ गया। रूही वापस से आर्यमणि को घूरती.… “नंगी लड़कियां आकर तुमसे चिपक गयी, फिर भी तुम तस्वीर देखते रह गये... कमाल ही कर दिया जानू”.. कहते हुए रूही अपने दूसरे हाथ से घुसा चलाकर आर्यमणि की नाक तोड़ दी।

"अरे तुम मिया–बीवी के झगड़े में मेरे प्राण चले जायेंगे। रूही मेरा गला छोड़ दो दम घुट रहा है"… विजयदर्थ मिन्नतें करते हुये कहने लगा...

रूही:– आखिर क्या सोचकर नंगी लड़कियों को मेरे पति के ऊपर छोड़ा। तुम्हे तो पहले जान से मारूंगी...

रूही पूरे तैश में थी। किसी तरह समझा बुझा कर रूही के चंगुल से विजयदर्थ को छुड़ाया गया। मजाल था उसके बाद एक भी लड़की उस महल में दिखी हो। इस छोटे से अल्प विराम के बाद सभी लोग आराम से बैठे। कुछ माहोल ठंडा हुआ, तब रूही को थोड़ा खराब लगा की एक पूरे साम्राज्य के मुखिया का गला इस प्रकार से पकड़ ली और वो हंसकर बस मिन्नत करता रहा।

रूही:– मुझे माफ कर दीजियेगा... वो मैं आवेश में आकर कुछ ज्यादा ही रिएक्ट कर गयी थी।

विजयदर्थ:– तुम सब मेरे परिवार जैसे हो। मै तो चाहता हूं आर्यमणि यहीं रहे। चाहे तो इस पूरे साम्राज्य की बागडोर संभाल ले।

आर्यमणि:– मुझे माफ कीजिए राजा साहब। आपकी दुनिया बहुत अनोखी और उतनी ही प्यारी है। भले ही रूही ने आपका गला दबोचकर उठा लिया हो, किंतु मुझे यह भी ज्ञात है कि आपके पास कई सिद्धियां है और बाहुबल तो कमाल का। आप अलौकिक अस्त्रों और शास्त्रों के मालिक है और आपका उत्तराधिकारी भी वही सब पायेगा। किंतु मैं इस दुनिया का नही इसलिए यहां मेरा दिल न लगेगा। हां लेकिन वादा रहा यहां आकर सबको मैं हील करता रहूंगा।

विजयदर्थ:– आपका इतना ही कहना काफी है। चलिए भोजन ग्रहण किया जाये...

एक रात की मेहमाननवाजी स्वीकारने के बाद एक बार फिर इन लोगों ने घूमना शुरू किया। राजधानी वाकई में कमाल की जगह थी। एक महादेश के बराबर तो इकलौती इनकी राजधानी थी। पूरे 4 दिन तक राजधानी घूमने के बाद सबसे आखरी में पहुंचे शोधक प्रजाति के गढ़ में।

शोधक प्रजाति के गढ़ में पहुंचना ही अपने आप में रोमांचित करने वाला दृश्य था। ऐसा लग रहा था चलती–फिरती पहाड़ियों के देश में चले आये थे। चहकिली को तो किसी तरह पूरा देख भी लिया था, लेकिन इनके व्यस्क को पूरा देख पाना संभव नही था। उनका आकार तो चहकिली के आकार से भी 10 गुना ज्यादा बड़ा था। नए उपचार पद्धति विकसित करने के बाद तो जैसे इन प्रजाति में जान आ गयी थी। चहकिली ने जैसे ही आर्यमणि और उसके पैक से सबका परिचय करवाया, हर कोई आर्यमणि को देखने के लिये व्याकुल हो गया। आलम ये था कि अल्फा पैक को जैसे इनलोगो ने किसी मजबूत पर्वतों के बीच घेर रखे हो। एक देखकर जाता तो दूसरा उसकी जगह ले लेते...

सबसे आखरी में चहकिली के अभिभावक ही पहुंचे थे। उनको इस बात इल्म नहीं था कि आर्यमणि और उसका पूरा पैक शोधक प्रजाति की बात समझ सकते हैं। वो तो अपनी बच्ची और अपने प्रजाति के जान बचाने वालों को धन्यवाद कह रहे थे। आर्यमणि, उनकी भावनात्मक बात सुनकर... "आपकी सेवा करना हमारे लिए सौभाग्य था। आप इतने भावुक ना हो।…"

सोधक अभिवावक.… "क्या तुम मेरी बात समझ सकते हो"…

आर्यमणि:– हां मैं आपकी बात समझ सकता हूं। मेरा नाम आर्यमणि है। मेरे साथ मेरी पत्नी रूही और 7 दिन की बेटी आमेया है।

शोधक:– मेरा नाम शावल है और अमेया 7 नही बल्कि 28 दिन की हो चुकी है...

रूही:– यहां आकर तो हम अपने दिन गिनती करना भूल गये। मुझे याद भी नहीं की ये कौन सा साल चल रहा..

शावल:– बहुत ही अलौकिक और प्यारी बच्ची है। क्या मैं इसे कुछ देर अपने पंख पर रख सकता हूं?

रूही:– हां बिलकुल... चहकिली इसे अपनी बहन मानती है, तो ये आप सबकी भी बच्ची हुई न...

शावल अपने छोटे से 5 फिट वाले पंख में अमेया को संभाल कर रखते, उसे प्यार से स्पर्श करने लगा। उसकी किलकारी एक बार फिर गूंज गयी जो न सिर्फ आर्यमणि और रूही को सुनाई दी, बल्कि ये किलकारी सुनकर तो एक बार फिर शोधक प्रजाति हरकत में आ गये। अमेया पानी के बिलकुल मध्य में थी और चारो ओर से शोधक जीव उसे घेरे प्यार से स्पर्श करते रहे...

शावल:– आह दिल खुश हो गया आर्यमणि… अब मैं समझ सकता हूं कि क्यों थल वासी को महाती ने जलवाशी होने का पूर्ण गुण दिया।

आर्यमणि:– वैसे यदि आप मेरी कुछ दुविधा दूर कर सके तो बड़ा एहसान होगा। बहुत सी बातें हैं जिनकी मैं समीक्षा नही कर पा रहा। मैं खुद भी किसी जानकार से अपनी शंका का समाधान ढूंढ रहा था...

शावल:– यूं तो मुझे गहरे महासागर के राज नही बताना चाहिए। लेकिन तुम्हारी सेवा भावना देखते हुये मैं हर संभव मदद करूंगा। हां लेकिन याद रहे, जो भी बातें तुम जानो उसे कभी जाहिर मत होने देना...

आर्यमणि:– ऐसा ही होगा... क्या आप मुझे बता सकते हैं कि विजयदर्थ क्यों आप सबका इलाज नहीं ढूंढ पाया, जबकि उसके शोधकर्ता मुझसे कहीं ज्यादा काबिल थे?

शावल:– “कभी–कभी ईर्ष्या में बड़ी ताकत होती है। विजय यूं तो थोड़ा स्वार्थी है, लेकिन उसका स्वार्थ केवल अपने जलीय साम्राज्य का हित है। जबकि उसका बेटा निमेषदर्थ पूर्ण रूप से स्वार्थी है जो केवल शक्ति का भूखा है। वह न सिर्फ शक्ति का भूखा है बल्कि जलीय जीव को हमेशा निचले स्तर का समझता है।”

“पूरे विज्ञान अनुसंधान की बागडोर निमेषदर्थ के हाथ में है और हर काबिल सोधकर्ता से केवल शक्ति बढ़ाने के उपाय खोज करवाता है। अब जब सभी काबिल शोधकर्ता को एक ही काम में लगाओगे तो नतीजा ऐसा ही होता है। ऐसा नही था कि विजय को निमेषदर्थ के बारे में पता नही, लेकिन उस बेचारे के हाथ बंधे है। एक तो पुत्र मोह दूसरा जब भी विजय सोधक प्रजाति की गिरती हालत को देखकर इलाज करने कहे, तो इलाज करने के बदले उन्हें मार ही दिया करता था और साफ शब्दों में कह देता उसका इलाज संभव नहीं। चाहकीली को भी तो मरने के लिये छोड़ दिया था।

आर्यमणि:– फिर राजा विजयदार्थ, अपने बेटे को विज्ञान प्रमुख के ओहदे से हटा क्यों नही देते?

शावल:– कोई चारा नही। निमेषदर्थ क्या गलत कर रहा है वो सबको पता है, पर कोई प्रमाण नहीं। कैसे साबित कर सकते है कि शोधक जीव के विषय में जान बूझकर सोध नही करना चाहते। इसलिए तो कहा ईर्ष्या... जब तुमने मेरी बच्ची चहकीली का इलाज कर दिया, तब विजय को भी मौका मिल गया इस अवसर को भुनाने का। उन्होंने भी महाती को तुम्हारा शागिर्द बनाकर भेज दिया। अब यदि महाती आगे निकल जाती तब तो विजय, निमेषदर्थ को सीधा उसके ओहदे से हटा देते, इसलिए काबिल लोगों की टीम को सीखने भेजा, ताकि निमेषदर्थ यह कह सके की आर्यमणि एक काबिल शोधकर्ता है जिसके मार्गदर्शन में हमारी टीम ने सोधक जीव का इलाज ढूंढ निकाला।

आर्यमणि:– आपने कहा ईर्ष्या, तो क्या निमेषदर्थ और महाती के बीच कुछ चल रहा है क्या?

शावल:– हां गहरी शत्रुता चल रही है। विजय के 10 बेटे और 2 बेटियां एक तरफ और अकेली महाती दूसरी तरफ। महाती विजय की तीसरी पत्नी की इकलौती संतान है जो 13 बच्चों में सबसे योग्य है। सभी भाई–बहन के साथ जब उसकी शिक्षा चल रही थी, उस वक्त वही अव्वल रहा करती थी। यूं तो पिता के लिये सब बच्चे बराबर थे किंतु एक राजा के नजर में महाती सबसे चहेती हुई जा रही थी।

यही से सबकी दुश्मनी शुरू हुई। ऐसा नही था की महाती को यह दुश्मनी समझ में नही आयी किंतु वह अकेली थी और सब उसके खिलाफ। शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब शासन में सबकी भागीदारी का आवंटन हुआ तब महाती के जिम्मे कैदियों का प्रदेश मिला। ऐसी जगह की जिम्मेदारी जहां नकारा बच्चों को सजा के तौर पर भेज दिया करते थे। वहीं निमेषदर्थ ने बड़ी चालाकी से शासन के मुख्य प्रबंधन का काम लिया। विज्ञान के अपने कबजे में रखा और बाकी भाई–बहिनों को शासन के प्रमुख ओहदे दिलवाये।

 

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भाग:–162


शावल:– यही से सबकी दुश्मनी शुरू हुई। ऐसा नही था की महाती को यह दुश्मनी समझ में नही आयी किंतु वह अकेली थी और सब उसके खिलाफ। शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब शासन में सबकी भागीदारी का आवंटन हुआ तब महाती के जिम्मे कैदियों का प्रदेश मिला। ऐसी जगह की जिम्मेदारी जहां नकारा बच्चों को सजा के तौर पर भेज दिया करते थे। वहीं निमेषदर्थ ने बड़ी चालाकी से शासन के मुख्य प्रबंधन का काम लिया। विज्ञान के अपने कबजे में रखा और बाकी भाई–बहिनों को शासन के प्रमुख ओहदे दिलवाये।

आर्यमणि:– साले कीड़े... दूसरों की तरक्की से जलने वाले। खुद की क्षमता विकसित नही किये तो दूसरे प्रतिभावान को ही दबा दो।

शावल:– “बिलकुल सही कहे। पर कहते है ना प्रतिभा को कितना भी दबा दो, उसकी झलक दिखती रहती है। पूरे महासागर तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिये हर 5 वर्षों पर योगियों द्वारा शास्त्रों का आवंटन होता है। 100 अलौकिक दंश हर योग्य युवाओं में बांटा जाता था। हर दंश की शक्ति अपार होती है और हथियारखाने में लाखो मजदूर काम करके 5 साल में ये 100 दंश तैयार कर पाते है। दंश जिसे भी मिलता है, उसकी आत्मा दंश से जुड़ जाती है और उसके मरने के साथ ही दंश का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।”

“दंश के अलावा 2 ऐसे अस्त्र है, जो आवंटन के लिये हर 5 वर्षों पर निकाले जाते है, किंतु सदियों में किसी एक को मिलता था वह अस्त्र। दिव्य त्रिशूल और दिव्य धनुष। माना जाता है कि महासागर की उत्पत्ति के साथ ही उन दो अस्त्रों का उदय हुआ था। जिसे भी यह दिव्य शस्त्र मिला, उन्होंने कई यशस्वी कार्य किये थे। इकलौता दिव्य अस्त्र धारक में ही वह शक्ति होती है जो किसी स्थल वासी को जलीय जीवन का वर दे सकता था। जहां दंश अपने मालिक के आत्मा से जुड़ने के बाद समाप्ति के ओर चला जाता है, वहीं ये दिव्य शस्त्र उसके धारक की आत्मा से जुड़ता तो जरूर है, किंतु उसके मरणोपरांत गायब होकर वहीं पहुंच जाता है, जहां से इसे निकला जाता है। योगियों ने लगभग 10 चक्र (330 वर्ष) बाद महाती के योग्यता को मेहसूस कर उसे दिव्य धनुष और त्रिशूल सौंप दिया।”

एक बार जब दिव्य अस्त्र महाती को मिल गया, फिर कौन भाई–बहन उसका क्या बिगाड़ लेता। दिव्य अस्त्र मिलते ही महाती प्रबंधन की मुखिया बनी और धीरे–धीरे सभी अयोग्य अधिकारी को उसके औहदे से बर्खास्त करती चली गयी। हालांकि महाती के लिये कभी ये आसन नही रहा। एक राजा के पुत्र अथवा पुत्री को उसके पद से हटाने के क्रम में 1000 बाधाएं सामने आ जाती। किंतु महाती भी डटी रही। वक्त लगा परंतु लंबे समय तक लड़कर, हर बाधा को पार कर, हर अयोग्य को हटाती चली गयी। अब तुम समझ ही सकते हो महाती और निमेषदर्थ के बीच किस हद की दुश्मनी होगी।”

आर्यमणि:– महाती और निमेष की दुश्मनी समझ में आ गयी। अब तक सोधक प्रजाति का इलाज क्यों नही ढूंढ पाये थे, वो भी समझ में आ गया। अब मेरी एक और दुविधा दूर कर दीजिए।

शावल:– हां क्यों नही। जो मै जानता हूं वो जरूर बताऊंगा ..

आर्यमणि:– कैदियों के प्रदेश से विजयदर्थ किसी को जाने क्यों नही देना चाहता? हर रोज अंतरिक्ष के कितने विमान यहां आते होंगे? आखिर विजयदर्थ का मकसद क्या है...

शावल:– हर रोज तो अंतरिक्षयान यहां नही आता, लेकिन जिस दिन भी यहां अंतरिक्ष से यान आना शुरू होता है, फिर एक साथ 20–30 यान तक आ जाते है। रही बात कैदियों को क्यों नही जाने देता तो उसके पीछे का कारण बहुत ही साधारण है। जो लोग यहां फंसे है, ब्लैक होल में घुसने के कारण उनकी मृत्यु लगभग तय थी। वो तो विजयदर्थ ने अपने दिव्य अस्त्रों से एक रास्ता महासागर में तिलिस्मी रास्ता खोल दिया था, इसलिए वो लोग सुरक्षित जिंदा बचकर यहां पहुंच जाते है।”

“जैसा की मैं पहले भी बताया था स्वार्थ। विजयदर्थ महासागर के हित में पूर्ण रूप से स्वार्थी हो सकता है। ये फसे हुये कैदी महासागर के अनंत कामों को अंजाम देते है। इसलिए विजादर्थ कभी भी कैदियों को बाहर नही जाने देता।

आर्यमणि:– तो क्या विजयदर्थ अपने स्वार्थ के लिये किसी को मार भी सकता है?

शावल:– स्वार्थ के कारण मारना... कोई मरता हुआ इंसान भी ये बात कहे तो मैं न मानू। विजय ऐसा नहीं कर सकता...

आर्यमणि:– ऐसा हो चुका है। जब हमारी पहली मुलाकात थी तब मुझ पर 5 लोगों ने अपने नजरों से हमला किया था।

शावल:– तो फिर तुम्हारी नजदीकियां महाती और विजय से किसी को देखी नही गयी होगी। तुमसे मिलने से पहले ही ये दोनो तुम्हारे कायल हो चुके थे। और तुम कड़ियों को जोड़ना चाहो तो जोड़ लो की कौन तुम्हे सोधक जीव के ऊपर किसी भी प्रकार के सोध करने से रोकना चाहेगा।

आर्यमणि:– ओह अब पूरा माजरा समझ में आ गया। उस कांड के पीछे निमेषदर्थ था और मै समझा विजयदर्थ है।

शावल:– हां अब सही समझे हो। उस धूर्त से जरा बचकर रहना। तुम्हारे ऊपर विजय का हाथ होने से वो भले तुम्हे न कुछ कर पाये, लेकिन सक्षम लोगों को वह टापू तक ला भी सकता है और बिना कोई सबूत छोड़े अपना काम करवाकर उन्हे वापस भी भेज सकता है।

आर्यमणि:– कुल मिलाकर अब ये जगह छोड़ने में ही ज्यादा भलाई है।

शावल:– पृथ्वी के किस हिस्से में जाना है हमसे कह दो, हम तुम्हे वहां छोड़ आते है।

आर्यमणि:– नही मैं यहां से सीधा नही जा सकता। पहले टापू पर जाकर सारा सामान समेटूंगा और अपने क्रूज को लेकर वापस जाऊंगा। एक काम हो सकता है, आप रूही, अलबेली और इवान को आश्रम तक छोड़ सकते हैं।

रूही:– मैं क्यों जाऊं... मैं तो क्रूज पर तुम्हारे साथ आऊंगी... एक काम करते है, अलबेली और इवान को भेज देते है।…

आर्यमणि:– हां, पर वो दोनो है कहां... अभी तक विजयदर्थ की राजधानी ही घूम रहे होंगे?

रूही:– हां तो सब साथ ही क्रूज से चलते है।

आर्यमणि:– आपसे मिलकर अच्छा लगा शावल। मेरे पास कुछ है जो आश्रम तक पहुंचाना जरूरी है। चहकिली वो पता जानती है। क्या वो मेरा सामान वहां तक पहुंचा देगी...

चहकिली:– अरे आप मुझे समान दो चाचू, मैं जानती हूं उसे कहां पहुंचाना है...

आर्यमणि:– चहकिली जरा संभल कर ले जाना... जब तक वो रक्षक पत्थर शुद्ध नही किया जाता, तब तक उसे छूना काफी खतरनाक हो सकता है...

चहकिली:– आप चिंता मत करो। जैसा देंगे ठीक वैसे ही पहुंचा दूंगी.…

आर्यमणि:– बहुत–बहुत धन्यवाद चहकिली। मैं शावल जी के साथ सतह तक चला जाऊंगा तुम इसे लेकर अभी चली जाओ। मैं नही चाहता कोई भी शापित वस्तु ज्यादा देर किसी के पास रहे...

चहकिली हामी भरती आर्यमणि से पत्थर ली और अपने मुंह में दबाकर मानसरोवर झील के उदगम स्थान के ओर बढ़ चली। वहीं रूही और आर्यमणि शावल पर सवार होकर वापस विजयदर्थ के महल पहुंचे। वहां पहुंचकर पता चला की इवान और अलबेली तो पहले ही सतह पर जा चुके है। यह खबर मिलते ही आर्यमणि भी वहां से निकला।

महासागर मंथन में उन्हे तकरीबन 28 दिन लग गये थे। इस बीच पूरे संसार और दुनिया जहां से बेखबर आर्यमणि एक नई और रोमांचित दुनिया का लुफ्त उठा रहा था। सतह पर जब वो लोग पहुंचे तब रात का वक्त था।

काली अंधेरी अमावस्या की वो रात थी। आर्यमणि के सतह पर आते ही तेज बिजली और तूफानी बारिश ने उसका स्वागत किया। रूही अपने आंचल से अमेया को ढकती हुई तेजी से कॉटेज के ओर बढ़ी। शावल से बिदाई लेकर पीछे से आर्यमणि भी चल दिया।

पंछियों के मधुर चहक से आर्यमणि की नींद खुल गई। बाहर हल्का अंधेरा था, पास में रूही और अमेया गहरी नींद में सो रही थी। आर्यमणि दोनो के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और बाहर हॉल वाले हिस्से में चला आया। आर्यमणि अनंत कीर्ति की पुस्तक को उठाकर अपने महासागर और पाताल लोक का अनुभव, और वहां मिले जीव के बारे में विस्तार पूर्वक लिखने लगा।

लिखते हुए काफी वक्त हो गया था। बाहर हल्का हल्की रोशनी हो रही थी। रात भर घनघोर बारिश के बाद जमीन जैसे तृप्त हो चुकी थी। चारो ओर हरियाली प्रतीत हो रही थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आर्यमणि जिस टापू पर था दरअसल वो मात्र छोटा सा टापू न होकर एक बड़ा भू भाग था जो नागलोक के अधीन था। यह जगह तरह–तरह के नायब जीवों का घर हुआ करता था।

टापू की तरह दिख रहा यह भू–भाग क्यों पूरा नही दिख रहा था, वह कारण तो समझ में आ चुका था। पर पाताल लोक से निकलते समय नाभिमन ने पूरा भू–भाग वापस बाहर लाने का वादा किया था। आर्यमणि को इक्छा हुई की चलकर वह एक बार इस जगह का भ्रमण कर ले। देख तो आये की नभीमन ने पूरे भू–भाग को ऊपर किया या नहीं। इवान के साथ भ्रमण पर निकलने की सोचकर वह इवान के कॉटेज के दरवाजे पर पहुंचा... बाहर से कुछ देर आवाज लगाने के बाद आर्यमणि कॉटेज में दाखिल हुआ।

सोचा तो था इवान के साथ पूरा क्षेत्र भ्रमण करने की, परंतु अलबेली और इवान दोनो ही अपने कॉटेज में नही थे। वहीं कल रात इतनी तूफानी बारिश हो रही थी कि आर्यमणि और रूही सीधे अपने कॉटेज में चले गये, अलबेली और इवान के बारे में कोई जानकारी ही नहीं लिया। आर्यमणि को थोड़ी चिंता सताने लगी... पैक के मुखिया ने "वूऊऊऊऊ" का तेज वुल्फ साउंड दिया...

जवाबी प्रतिक्रिया ने 3 वुल्फ साउंड वापस सुनाई दिये। एक तो पास में ही खड़ी रूही ने वुल्फ साउंड लगाया और 2 वुल्फ साउंड पहाड़ों के ओर से आ रहे थे। रूही कॉटेज के बाहर आती... "क्या हुआ आर्य.. ऐसे बुलावा क्यों दे रहे। क्या पैक के मुखिया होने का एहसास करवा रहे?"..

आर्यमणि:– अरे नही, अलबेली और इवान कॉटेज में कहीं दिखे नही, इसलिए थोड़ी चिंता होने लगी...

रूही, हंसती हुई.… "तुम्हारा ढीला तूफान रात को ही इंडोर खत्म हो गया था। दोनो अभी गरम खून वाले हैं... उनका तूफान आउटडोर में कहीं चालू होगा... क्यों परेशान कर रहे।"

आर्यमणि, रूही के ओर लपकते.… "क्या बोली रे, ढीला तूफान"….

रूही, अमेया को तेजी से बरामदे के पालने में रखी और कॉटेज गोल–गोल चक्कर लगाने लगी। रूही के खीखीखीखी की आवाज चारो ओर गूंज रही थी.… "क्या हुआ आर्य, ढीले तूफान के साथ–साथ अब तुम भी पूरा ढीला पड़ चुके। कहां पहले एक छलांग में पकड़ लेते... अभी तो बिलकुल बूढ़े घोड़े की तरह हो गये"…

"तेरी तो... मुझे ही उकसा रही हो"…. इतना कहने के साथ ही आर्यमणि ने रूही को घर दबोचा। कॉटेज के पीछे की दीवार पर एक जोड़दार धम्म की आवाज हुई। रूही का सीना दीवार से चिपका था और आर्यमणि ठीक उसे पीछे से दबोचे। दोनो काफी तेज हाँफ रहे थे। दोनो अपने श्वांस सामान्य करने की कोशिश में जुटे थे की तभी एक जोड़दार चूरररररररर की आवाज आयी।

आर्यमणि पीठ पर पंजा डालकर पीछे से पूरे कपड़े को ही फाड़ दिया.… "हिहिही.. काफी जोश में हो जान। रुको तो यहां नही... कमरे में चलते है।"…

"आज तो यहीं आउटडोर तूफान आने वाला है।"… कहते हुए आर्यमणि ने अपनी एक उंगली को जैसे ही ऊपर किया उस उंगली का धारदार क्ला बाहर और अगले ही पल रूही के नीचे पहने कपड़े भी फटकर 2 हिस्सों में.… "ओय मेरे जंगली सैय्यां, यहां नही... कुछ तो शर्म करो"…

आर्यमणि, तेजी में नीचे से नग्न होते, अपना हाथ रूही के गर्दन पर डाल दिया। जैसे किसी मुर्गी की चोंच को जमीन में चिपका दिया जाता है, आर्यमणि ने ठीक वैसे ही पीछे से रूही के गर्दन पर हाथ डाला और आगे से उसका चेहरा कॉटेज की दीवार में चिपक गया... और अगले ही पल रूही का चेहरा कॉटेज की दीवार से चिपके ही इतना तेज घर्षण करते ऊपर हुआ की रूही की तेज चीख निकल गई.…

"आव… माआआआआआ, जंगली पूरा चेहरा छिल गया... उफ्फ आर्य... अपनी बीवी की कोई ऐसे लेता है..."

आर्यमणि लगातार तेज–तेज धक्का मार रहा था। कॉटेज के लकड़ी की पूरी दीवार... खट–पिट खट–पिट कर रही थी। लिंग जब तेजी के साथ योनि की पूरी गहराई में उतरता तब आर्यमणि के जांघ और रूही के नितंब से टकराता... थप–थप, थप–थप… की तेज आवाज करता...

माहोल में लगातार "खट–पिट, खट–पिट" और "थप–थप, थप–थप" की तेज आवाज गूंज रही थी। इसी आवाज के साथ रूही भी खुलकर अपनी आवाज निकालती… "आह्हहहहहहहहहहहहह, आर्य... बहुत दिन हो गए तुम्हे ऐसे जोश में करते.… उफ्फफफफफफफफ.. मेरी जान.. रुकना मत मजा आ रहा"…

दोनो हांफ रहे थे। रूही लगातार सिसकारियां भरती आर्यमणि के अंदर पूरा जोश भर रही थी। इसी बीच दोनो के चिंघारने की आवाज उस पूरे मोहोल में गूंजने लगे... आवाज और भी तेज होती गयी... लिंग राजधानी की रफ्तार में अंदर बाहर होने लगा... और फिर अंत में ज्वालामुखी का लावा दोनो के अंगों से फूटते ही, दोनो ही दीवार से टेक लगाकर हाफने लगे...

रूही, हंसती हुई पलट कर आर्यमणि के ओर देखती... "आज हुआ क्या था"…

आर्यमणि, रूही के होंठ पर प्यार से पप्पी लेते.… "बस 2–3 महीने का गैप था, वही पूरा कर रहा हूं। (रूही के गर्भवती होने के सातवे महीने से कल रात तक का वक्त)

दोनो की नजरें मिल रही थी। एक दूसरे को प्यार से देखकर मुस्कुरा रहे थे। तभी अचानक जैसे दोनो के दिल में तेज पीड़ा उठी हो और अगले ही क्षण दर्द में डूबा वुल्फ साउंड आर्यमणि और रूही के कानो में पड़ रहा था... आर्यमणि, रूही को कंधे से हिलाकर मानो होश में रहने कह रहा हो…. "रूही तुम अमेया को लेकर अंदर जाओ। कुछ भी हो तुम कॉटेज के बाहर मत आना"…

"लेकिन आर्य"…. रूही ने इतना ही कहा, और अगले ही पल आर्यमणि की तेज दहाड़ उन फिजाओं में गूंज गयी। यह आर्यमणि की गुस्से से भरी प्रतिक्रिया थी जिसके जवाब में रूही बस अपना सिर नीचे कर उसकी बात मान ली। आर्यमणि तेज दहाड़ने के साथ ही दर्द और वियोग वाली आवाज के ओर चल दिया।
 
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subodh Jain

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किस के लिए धन्यवाद:पता नहीं:
आप इतनी अच्छी कहानियाँ हैं हमारे लिए इस लिए बहुत सारी कहानियाँ लिखी हैं
बहुत सलो से पढ़ रहा हूँ
बहुत ही अच्छे लिखते हो आप
।मै आप आप का जबरा वाला पंखा हूं
 

king cobra

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Aur main na :?:
Tum nainu nautanki ho bilkul waise ek writer ke taur par aap superb ho
 

CFL7897

Be lazy
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Adventur se bhra samudri safar lagata hai ab apne samapan ki taraf hai...

Lagata hai Aarya k dusmano ne hamala bol hi diya ..Albeli aur Iwan abhi bahar hai aur wo kis halat me pata nahi..

Shandar raha bhai.
 

king cobra

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Superb update dost
 
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