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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

nain11ster

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nain11ster

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भाग:–168


निमेषदर्थ कुछ देर के लिये रुका। वहां से जब सारे लोग हटे तब एक साथ हजार लोगो की कतार थी। ठीक सामने आर्यमणि खड़ा। निमेषदर्थ का एक इशारा हुआ और हजार हाथ आर्यमणि के सामने हमला करने के लिये तन गये। उसके अगले ही पल हर जलीय सैनिक के हाथ से काला धुआं निकल रहा था। निमेषदर्थ और हिमा के दंश से भी भीषण काला धुवां निकल रहा था। धुएं के बीच आर्यमणि कहीं गुम सा हो गया। कहीं किसी तरह की कोई हलचल नहीं।

लगभग 5 मिनट तक पूर्ण शांति छाई रही। तभी निमेषदर्थ ने इशारा किया और सैनिकों की छोटी टुकड़ी उस काले धुएं के बीच घुसी। बाहर सभी लोग टकटकी लगाये बस धुएं को ही देख रहे थे। सैनिक की वह टुकड़ी भी धुएं में कहीं गायब हो गयी। तकरीबन मिनट भर तक चीर शांति छाई रही, उसके बाद जो ही चीखने की आवाज आयी। माहौल ही पूरा अशांत हो गया।

सैनिकों के लगातार चीखने की आवाज आती रही और रेंगते हुये जब कुछ सैनिक धुवां के बाहर आ रहे थे, तब वहां मौजूद हर किसी का कलेजा कांप गया। असहाय सैनिक खून से लहू–लुहान किसी तरह उस काले धुएं से निकल रहे थे। किंतु जैसे ही धुएं के बाहर आते उनका शरीर फटकर चिथरा हो जाता और मांस के लोथड़े वही आस पास फैल जाते।

पूरी टुकड़ी का वही हश्र हुआ। मौत की चींखें जब शांत हुई तब एक पल नही लगा उस धुएं को छंटने में। जैसे ही धुवां छंटा आर्यमणि अपनी जगह पर खड़ा मंद–मंद मुस्कुरा रहा था। निमेषदर्थ और बाकी सभी की आंखें फटी की फटी रह गयी, क्योंकि जिस काले धुएं ने आर्यमणि का कुछ नही बिगड़ा, उस काले धुएं के मात्र एक हिस्से से तो 10 सोधक प्रजाति के जीव फट जया करते थे।

आर्यमणि ने बस अपना एक हाथ ऊपर किया और जड़ों में सभी सैनिक जकड़े हुये थे। उसके अगले ही पल वो सब कहां गायब हुये ये तो बस आर्यमणि ही जानता था। हां लेकिन अब हिमा और निमेषदर्थ के चेहरे पर भय साफ देखा जा सकता था। आर्यमणि पूरे विश्वास के साथ जैसे ही अपना कदम आगे बढ़ाया तभी एक बार फिर से उसपर हमला हुआ।

पानी में कई सारे तैरते चट्टान आर्यमणि के ओर बड़ी रफ्तार के साथ बढ़े। आर्यमणि ने न तो अपने बढ़ते कदम को रोका और न ही आ रहे विशालकाय चट्टान के रास्ते से हटने की कोशिश करी। बस वो अपने कदम आगे बढ़ता रहा। चट्टाने बहते हुये आर्यमणि के करीब जरूर पहुंची, लेकिन हर चट्टान आर्यमणि के करीब पहुंचते–पहुंचते अपना रास्ता बदल लेता। कुछ दाएं से निकल गये तो कुछ बाएं से और आर्यमणि उन दोनो भाई बहन के करीब पहुंच चुका था।

जैसे ही आर्यमणि निमेषदर्थ और हिमा के करीब पहुंचा, दोनो ने अपना बाहुबल का प्रयोग करने का सोचा। दोनो के हाथ हवा में भी आये किंतु उसके बाद जैसे जम गये हो। न तो उसका हाथ हिला और न ही शरीर। आर्यमणि बिलकुल उनके करीब पहुंचते..... “जैसे तुम अभी बेजान हो ठीक अंदर से मैं भी इतना ही बेजान था।”.... आर्यमणि अपनी बात कहने के साथ ही अपना पंजा झटका और उसके क्ला झट से निकल आये।

अपने क्ला के एक वार से हिमा का दायां हाथ काटकर नीचे गिराते.... “तुम्हे क्या लगता है, क्या तुम मुझे मार सकते हो?”.... इतना कहकर आर्यमणि ने फिर अपना क्ला चलाया और निमेषदर्थ का दायां पाऊं कटकर अलग हो गया। बहन का हाथ गया तो भाई का पाऊं। दोनो जमे हुये थे। अपने अंग को शरीर से अलग होते जरूर देखे परंतु दर्द दोनो में से किसी को नही हुआ।

इस से आगे कुछ होता उस से पहले ही आर्यमणि का अभिमंत्रित जाल टूट चुका था। निमेषदर्थ और हिमा भीषण पीड़ा मेहसूस करते जोर–जोर से चिल्लाते हुये नीचे गिर गये। वहीं आर्यमणि, 6 योगियों के बीच घिरा था और पीछे से विजयदर्थ चला आ रहा था। विजयदर्थ ने इशारा किया और उसके लोग निमेषदर्थ और हिमा को सहारा देकर वहां से ले जाने की तैयारी में लग गये।

विजयदर्थ:– तुमने क्या सोचा यहां आकर मेरे बच्चों को मार सकते हो?

आर्यमणि, विजयदर्थ की बात सुनकर मुस्कुराया और प्रतिउत्तर में सिर्फ इतना ही कहा.... “अपनी विधि से दोषियों को सजा दे रहा हूं। आप बीच में न ही पड़े तो बेहतर होगा।”

विजयदर्थ:– गुरुदेव पहले इसे काबू करे, बाद में सोचते है इसका क्या करना है?

आर्यमणि:– विजयदर्थ ना तो मेरे यहां होने का कारण पूछे और न ही मुझसे इतने दिनो बाद मिलने की कोई खुशी जाहिर किये। अपने बच्चों के मोह में सब भूल गये?

विजयदर्थ:– आर्यमणि तुमसे मिलने की खुशी को मैं बयां नही कर सकता। तुम समझ नही सकते की तुम्हे सुरक्षित देखकर मैं अंदर से कैसा महसूस कर रहा हूं। किंतु इस वक्त तुम अपने आपे में नहीं हो।

आर्यमणि:– तुम्हारे कपूत बच्चे यहां एक सोधक जीव का शिकर कर रहे थे। इन्होंने मेरे परिवार को मुझसे दूर कर दिया और उसके बावजूद भी तुम्हारे नालायक बच्चों को मारने के बदले मैं तुमसे बात कर रहा हूं, ये मेरे धैर्य का परिचय है।

हिमा, दर्द से कर्राहती हुई कहने लगी..... “पिताजी यदि आरोप तय हो गया तो मृत्यु दण्ड भोगने के तैयार हूं, लेकिन बिना किसी सुनवाई के ऐसी बर्बरता।”...

विजयदर्थ:– गुरुदेव कृपा आर्यमणि को काबू में करे। यह अनुचित न्याय है।

विजयदर्थ के साथ आये योगी, आर्यमणि को घेरकर बैठ गये। आर्यमणि, हाथ जोड़कर वहां आये सभी योगियों को नमन करते.... “उम्मीद है योग और आध्यात्म किसी राजा के अधीन नही अपितु सत्य और न्याय के लिये प्रयोग में लाये जाते हो।”...

इतना कहकर आर्यमणि वहीं आसान लगाकर बैठे। उसके चारो ओर 6 योगी बैठ हुये थे। मंत्र उच्चारण शुरू हो गया। मंत्र से मंत्र का काट चलता रहा। लगातार 22 दिनो तक मंत्र से मंत्र टकराते रहे। एक अकेला आर्यमणि कई वर्षो से सिद्ध प्राप्त किये हुये 6 योगियों से टकरा रहा था और अकेले ही उनपर भारी पड़ रहा था। बाईसवें दिन की समाप्ति के साथ ही 6 योगियों ने मिलकर आर्यमणि के दिमाग पर काबू पा लिया।

काबू पाने के बाद सभी योगियों की इच्छा हुई की आखिर इतनी कम उम्र में एक लड़का इतनी सिद्धि कैसे प्राप्त कर कर सकता है, उसकी जांच की जाये। इच्छा हुई तो सभी मंत्र जाप करते आर्यमणि के दिमाग में भी घुस गये। आर्यमणि के दिमाग में जब वो घुसे तब उनके आश्चर्य की कोई सीमा ही नही रही। आर्यमणि की किसी भी याद को वो लोग नही देख पाये, सिवाय एक याद के जिसमे अल्फा पैक को लगभग समाप्त कर दिया गया था।

सभी योगी विचलित होकर आर्यमणि के दिमाग से बाहर निकले। वो लोग आर्यमणि को जगाते उस से पहले बहुत देर हो चुकी थी। राजा विजयदर्थ आर्यमणि के दिमाग पर काबू पा चुका था। 6 योगियों के मुखिया योगी पशुपति नाथ जी विजयदर्थ के समक्ष खड़े होते.... “हम इस लड़के से कई गुणा ज्यादा मंत्रो के प्रयोग को जानते थे। कई मंत्र और साधना के विषय में तो शायद इसे ज्ञान भी नही, फिर भी इसके सुरक्षा मंत्रो की सिद्धि हमसे कई गुणा ऊंची थी। परंतु तुमने क्या किया विजय?”...

विजयदर्थ:– मैने क्या किया गुरुदेव...

योगी पशुपतिनाथ:– तुम्हारे बेटी और बेटे ने मिलकर गुरु आर्यमणि के परिवार की हत्या कर डाली। उनमें से एक (अलबेली) गर्भवती भी थी। जिस हथियार से गुरु आर्यमणि के परिवार को मारा गया वह रीछ स्त्री महाजनीका की दिव्य खंजर थी। इसका अर्थ समझ भी रहे हो। वही स्त्री जो कभी महासागर पर काबू पाने के इरादे से आयी थी। जिसे बांधने में न जाने कितने साधुओं ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। उसी के खंजर से पूरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया। तुम्हारे बच्चे जाकर असुर प्रवृति के लोगों से मिल गये और तुमने बिना जांच किये उल्टा गुरु आर्यमणि पर काबू किया।

विजयदर्थ अपने दोनो हाथ जोड़ते.... “गुरुवर क्या वाकई महाजनिका की खंजर से गुरु आर्यमणि के परिवार को मारा गया था।”..

योगी पशुपतिनाथ:– हां, और इस पूरे घटने का रचायता और कोई नही तुम्हारा पुत्र निमेशदर्थ था। आज हमने अपने योग को किसी राजा के अधीन कर दिया। इसलिए इसी वक्त मैं अपने प्राण त्यागता हूं।

इतना कहकर योगी पशुपतिनाथ जी ने कुछ मंत्रो का प्रयोग खुद पर ही कर लिया और जहां वो खड़े थे वहां मात्र राख बची थी। विजयदर्थ अपने घुटने पर आकर उस राख को छूते.... “ये मैने क्या कर दिया गुरुदेव। मैने कभी ऐसा तो न चाहा था। मुझे लगा आर्यमणि अपने परिवार की मृत्यु में बौखलाया था इसलिए मुझे इसपर काबू चाहिए था। ये मुझसे कौन सा पाप हो गया?”..

उन्ही योगियों में से एक योगी वशुकीनाथ जी.... "क्या वाकई सिर्फ इतनी सी बात थी विजय। तुम झूठ किस से बोल रहे?”

विजयदर्थ:– गुरुवर आर्यमणि कुछ देर पहले तक मेरे लिये मरा ही हुआ था। उसे काबू में करने की और क्या मनसा हो सकती है?

योगी वशुकीनाथ:– खड़े हो जाओ विजय। तुम अब भी पूरा सच नहीं कह रहे। आर्यमणि को यहां जल में रोक के रखने की चाह में जितने धूर्त तुम हो चुके थे, योगी पशुपतिनाथ जी को उसी की सजा मिली है। गुरु आर्यमणि का परिवार रहा नहीं। तुम्हे उन जैसा हीलर हर कीमत पर अपने पास चाहिए था। मौका उन्होंने खुद तुम्हे दिया, जब वो तुम्हारे बच्चे को मारने पहुंच गये। तुमने भी मौके को पूरा भुनाते हमारे जरिए उनके दिमाग पर काबू पा लिया। देख लो तुम्हारी बुरी नियत का क्या परिणाम हुआ?”

विजयदर्थ, योगी वशुकिनाथ जी के पाऊं में दोबारा गिरते..... “गुरुवर मुझे माफ कर दे। मै घोर पश्चाताप में हूं। मेरी लालच बस इतनी सी थी कि जलीय साम्राज्य फलता–फूलता रहे। कोई भी दुश्मन हमारी दुनिया को तबाह न करे।”

योगी वशुकीनाथ:– महासागर की भलाई को लेकर तुम्हारी नियत पर कभी शक नही था विजय। तभी तो हमने गुरु आर्यमणि को बांधा। लेकिन तुम भी कहां विश्वास पात्र रहे। सत्य और न्याय के बीच हमें ला खड़ा किया। हम सब के पापों की जिम्मेदारी योगी पशुपतिनाथ जी ने ली। जानते हो हमारे पाप की सजा तो उन्होंने खुद को दे दी। साथ ही साथ गुरु आर्यमणि के साथ जो गलत किया, उसके भरपाई में उन्होंने अपना सारा ज्ञान उनके मस्तिष्क में निहित कर दिया। अब हम अपनी साधना में जा रहे है। दोबारा अब हमसे किसी भी प्रकार के मदद की उम्मीद मत रखना।

विजयदर्थ, योगी वशुकीनाथ के चरणों को भींचते.... “ऐसा न कहे गुरुवर। आप हमे छोड़ चले जायेंगे तब यहां के जलीय तंत्र पूर्ण रूप से टूट जायेगा। विश्वास मानिए किसी योग्य उत्तराधिकारी के मिलते ही अपने पाप की सजा मैं भी खुद को स्वयं दूंगा। किंतु आप हमसे मुंह न मोरे।”

योगी वशुकीनाथ:– तुम्हारे निर्णय ने मुझे प्रसन्न जरूर किया है किंतु गुरु आर्यमणि का क्या? उनके साथ जो गलत हुआ है, उसकी भरपाई कैसे करोगे? तुमने तो मौका मिलते ही उनके दिमाग को भी अपने वश में कर लिया।

विजयदर्थ:– मैं एक पिता हूं, इसलिए मोह नहीं जायेगा। उपचार के उपरांत जब मेरे दोनो बच्चे ठीक हो जाएंगे तब मैं उन्हे जलीय तंत्र से पूर्ण निष्कासित कर दूंगा। न वो मेरे आंखों के सामने होंगे और न ही मैं आर्यमणि के प्रतिसोध के बीच आऊंगा। यही नही आर्यमणि का विवाह मैं अपने सबसे योग्य पुत्री महाती के साथ करवा दूंगा। और जिस दिन आर्यमणि की तंद्रा टूटेगी, उसी दिन मैं उन्हे यहां का राजा घोषित करके अपनी मृत्यु को स्वयं गले लगा लूंगा।

योगी वशुकीनाथ:– क्या कोई ऐसी शक्ति है जो तुम्हारे राज्य में घुसकर गुरु आर्यमणि को तुम्हारे वश से अलग कर सके? तुम उन्हे अभी क्यों नही छोड़ देते...

विजयदर्थ:– विश्वास मानिए मैं चाहता तो हूं लेकिन उत्साह में मुझसे भूल हो गयी।

योगी वशुकीनाथ:– “हां मैं समझ गया। तुमने त्वरण वशीकरण का प्रयोग कर दिया। अब या तो कोई बाहरी त्वरित शक्ति आर्यमणि के दिमाग में घुसकर उसे तुम्हारे वशीकरण से निकलेगी या फिर जब आर्यमणि का जीवन स्थिर होगा तभी वो तुम्हारे जाल से निकलेगा। तुम इतना कैसे गिर सकते हो, मुझे अब तक समझ में नही आ रहा।”

“मेरा श्राप है तुम्हे, तुम हर वर्ष अपने परिवार के एक व्यक्ति का मरा हुआ मुंह देखोगे। सिवाय अपनी बेटी महाती के जिसके विवाह की योजना तुमने बनाई है और तुम्हारे दोनो पुत्र और पुत्री (निमेष और हिमा) जो गुरु आर्यमणि के दोषी है। अब मेरी नजरो से दूर हो जाओ इस से पहले की आवेश में आकर मैं कुछ और बोल जाऊं।”

विजयदर्थ:– क्षमा कीजिए गुरुदेव... मुझे क्षमा कीजिए...

योगी वशुकीनाथ:– तुम्हारे पाप की कोई क्षमा नही। एक आखरी शब्द तुम्हारे लिये है, तुम और तुम्हारे समुदाय के लोग अब जमीन का मुंह कभी नहीं देख सकते और इलाज के उपरांत निमेषदर्थ और हिमा कभी जल में नही रह सकते। बस तुम्हारे कुल से जिसका विवाह गुरु आर्यमणि के साथ होगा, उसकी शक्तियां पूर्ण निहित होगी।

विजयदर्थ, रोते हुये योगी वशुकीनाथ के पाऊं को जकड़ लिया। न जाने कितनी ही मिन्नते उसने की तब जाकर योगी वशुकीनाथ ने अपने श्राप का तोड़ में केवल इतना ही कहे की... “यदि गुरु आर्यमणि ने तुम्हे क्षमा कर दिया तो ही तुम श्राप से मुक्त होगे, लेकिन शर्त यही होगी विजयदर्थ की तुम खुद को सजा नही दोगे। बल्कि तुम्हारी सजा स्वयं गुरु आर्यमणि तय करेंगे और उसी दिन हम वापस फिर तुम्हारे राज्य में कदम रखेंगे।”

योगी अपनी बात समाप्त कर वहां से अंतर्ध्यान हो गये और विजयदर्थ नीचे तल को तकता रह गया। जैसे ही वह आर्यमणि के साथ अपने महल में पहुंचा, महल से एक अप्रिय घटना की खबर आ गयी। विजयदर्थ के सबसे छोटे पुत्र का देहांत हो गया था। विजयदर्थ के पास सिवाय रोने के और कुछ नही बचा था।

विजयदर्थ तो मानो जैसे गहरे वियोग में चला गया हो। कुछ दिन बीते होंगे जब उसके दो अपंग बच्चे (निमेषदर्थ और हिमा) को महासागर से निकालकर किसी वीरान टापू पर फेंक दिया गया। जल में विचरण करने की सिद्धि निमेषदर्थ और हिमा से छीन चुकी थी। कुछ दिन और बीते होंगे जब महाती अपने पिता से मिलन पहुंची। कारण था बीते कुछ दिनों से शासन के अंदेखेपन की बहुत सी खबरे और हर खबर का अंत विजयदार्थ के नाम से हो जाता। महाती आते ही उनके इस अनदेखेपन का कारण पूछने लगी। तब विजयदर्थ ने उसे पूरी कहानी बता दी।

अपने सौतेले भाई बहन की करतूत तो महाती पहले से जानती थी। अपने पिता की लालच भरी छल सुनकर तो महाती अचरज में ही पर गयी, जबकि आर्यमणि के बारे में तो विजयदर्थ को भी पूरी बात पता थी। महाती अपने पिता को वियोग में छोड़कर, उसी क्षण पूरे शासन का कार्य भार अपने ऊपर ली। मुखौटे के लिये बस अब उसके पिताजी राजा थे, बाकी सारे फैसले महाती खुद करने लगी।

लगभग 2 महीने बीते होंगे जब राजधानी में जश्न का माहोल था। एक बड़े से शोक के बाद इस जश्न ने जैसे विजयदर्थ को प्रायश्चित का मौका दिया था। वह मौका था आर्यमणि और महाती के विवाह का। जबसे विजयदर्थ ने आर्यमणि पर त्वरित सम्मोहन किया था, उसके कुछ दिन बाद से ही आर्यमणि, महाती के साथ रह रहा था। यूं तो चटपटे खबरों में महाती का नाम अक्सर आर्यमणि के साथ जोड़ा जाता। किंतु महाती ने किसी भी बात की परवाह नही की।

 

spritemathews

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💐Nice story 🎉
 
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Surya_021

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Superb update 😍
 
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Parthh123

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Kamal ka update nain bhai. Aryamani ke es twarit sammohan ka ilaz orza aur nishal ke mahasagar me pahuchne ke bad hota hai aur tabhi kisi beech pe niklta hai. Aage ke updates ka bechaini ke sath intzar hai.
 

krish1152

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भाग:–168


निमेषदर्थ कुछ देर के लिये रुका। वहां से जब सारे लोग हटे तब एक साथ हजार लोगो की कतार थी। ठीक सामने आर्यमणि खड़ा। निमेषदर्थ का एक इशारा हुआ और हजार हाथ आर्यमणि के सामने हमला करने के लिये तन गये। उसके अगले ही पल हर जलीय सैनिक के हाथ से काला धुआं निकल रहा था। निमेषदर्थ और हिमा के दंश से भी भीषण काला धुवां निकल रहा था। धुएं के बीच आर्यमणि कहीं गुम सा हो गया। कहीं किसी तरह की कोई हलचल नहीं।

लगभग 5 मिनट तक पूर्ण शांति छाई रही। तभी निमेषदर्थ ने इशारा किया और सैनिकों की छोटी टुकड़ी उस काले धुएं के बीच घुसी। बाहर सभी लोग टकटकी लगाये बस धुएं को ही देख रहे थे। सैनिक की वह टुकड़ी भी धुएं में कहीं गायब हो गयी। तकरीबन मिनट भर तक चीर शांति छाई रही, उसके बाद जो ही चीखने की आवाज आयी। माहौल ही पूरा अशांत हो गया।

सैनिकों के लगातार चीखने की आवाज आती रही और रेंगते हुये जब कुछ सैनिक धुवां के बाहर आ रहे थे, तब वहां मौजूद हर किसी का कलेजा कांप गया। असहाय सैनिक खून से लहू–लुहान किसी तरह उस काले धुएं से निकल रहे थे। किंतु जैसे ही धुएं के बाहर आते उनका शरीर फटकर चिथरा हो जाता और मांस के लोथड़े वही आस पास फैल जाते।

पूरी टुकड़ी का वही हश्र हुआ। मौत की चींखें जब शांत हुई तब एक पल नही लगा उस धुएं को छंटने में। जैसे ही धुवां छंटा आर्यमणि अपनी जगह पर खड़ा मंद–मंद मुस्कुरा रहा था। निमेषदर्थ और बाकी सभी की आंखें फटी की फटी रह गयी, क्योंकि जिस काले धुएं ने आर्यमणि का कुछ नही बिगड़ा, उस काले धुएं के मात्र एक हिस्से से तो 10 सोधक प्रजाति के जीव फट जया करते थे।

आर्यमणि ने बस अपना एक हाथ ऊपर किया और जड़ों में सभी सैनिक जकड़े हुये थे। उसके अगले ही पल वो सब कहां गायब हुये ये तो बस आर्यमणि ही जानता था। हां लेकिन अब हिमा और निमेषदर्थ के चेहरे पर भय साफ देखा जा सकता था। आर्यमणि पूरे विश्वास के साथ जैसे ही अपना कदम आगे बढ़ाया तभी एक बार फिर से उसपर हमला हुआ।

पानी में कई सारे तैरते चट्टान आर्यमणि के ओर बड़ी रफ्तार के साथ बढ़े। आर्यमणि ने न तो अपने बढ़ते कदम को रोका और न ही आ रहे विशालकाय चट्टान के रास्ते से हटने की कोशिश करी। बस वो अपने कदम आगे बढ़ता रहा। चट्टाने बहते हुये आर्यमणि के करीब जरूर पहुंची, लेकिन हर चट्टान आर्यमणि के करीब पहुंचते–पहुंचते अपना रास्ता बदल लेता। कुछ दाएं से निकल गये तो कुछ बाएं से और आर्यमणि उन दोनो भाई बहन के करीब पहुंच चुका था।

जैसे ही आर्यमणि निमेषदर्थ और हिमा के करीब पहुंचा, दोनो ने अपना बाहुबल का प्रयोग करने का सोचा। दोनो के हाथ हवा में भी आये किंतु उसके बाद जैसे जम गये हो। न तो उसका हाथ हिला और न ही शरीर। आर्यमणि बिलकुल उनके करीब पहुंचते..... “जैसे तुम अभी बेजान हो ठीक अंदर से मैं भी इतना ही बेजान था।”.... आर्यमणि अपनी बात कहने के साथ ही अपना पंजा झटका और उसके क्ला झट से निकल आये।

अपने क्ला के एक वार से हिमा का दायां हाथ काटकर नीचे गिराते.... “तुम्हे क्या लगता है, क्या तुम मुझे मार सकते हो?”.... इतना कहकर आर्यमणि ने फिर अपना क्ला चलाया और निमेषदर्थ का दायां पाऊं कटकर अलग हो गया। बहन का हाथ गया तो भाई का पाऊं। दोनो जमे हुये थे। अपने अंग को शरीर से अलग होते जरूर देखे परंतु दर्द दोनो में से किसी को नही हुआ।

इस से आगे कुछ होता उस से पहले ही आर्यमणि का अभिमंत्रित जाल टूट चुका था। निमेषदर्थ और हिमा भीषण पीड़ा मेहसूस करते जोर–जोर से चिल्लाते हुये नीचे गिर गये। वहीं आर्यमणि, 6 योगियों के बीच घिरा था और पीछे से विजयदर्थ चला आ रहा था। विजयदर्थ ने इशारा किया और उसके लोग निमेषदर्थ और हिमा को सहारा देकर वहां से ले जाने की तैयारी में लग गये।

विजयदर्थ:– तुमने क्या सोचा यहां आकर मेरे बच्चों को मार सकते हो?

आर्यमणि, विजयदर्थ की बात सुनकर मुस्कुराया और प्रतिउत्तर में सिर्फ इतना ही कहा.... “अपनी विधि से दोषियों को सजा दे रहा हूं। आप बीच में न ही पड़े तो बेहतर होगा।”

विजयदर्थ:– गुरुदेव पहले इसे काबू करे, बाद में सोचते है इसका क्या करना है?

आर्यमणि:– विजयदर्थ ना तो मेरे यहां होने का कारण पूछे और न ही मुझसे इतने दिनो बाद मिलने की कोई खुशी जाहिर किये। अपने बच्चों के मोह में सब भूल गये?

विजयदर्थ:– आर्यमणि तुमसे मिलने की खुशी को मैं बयां नही कर सकता। तुम समझ नही सकते की तुम्हे सुरक्षित देखकर मैं अंदर से कैसा महसूस कर रहा हूं। किंतु इस वक्त तुम अपने आपे में नहीं हो।

आर्यमणि:– तुम्हारे कपूत बच्चे यहां एक सोधक जीव का शिकर कर रहे थे। इन्होंने मेरे परिवार को मुझसे दूर कर दिया और उसके बावजूद भी तुम्हारे नालायक बच्चों को मारने के बदले मैं तुमसे बात कर रहा हूं, ये मेरे धैर्य का परिचय है।

हिमा, दर्द से कर्राहती हुई कहने लगी..... “पिताजी यदि आरोप तय हो गया तो मृत्यु दण्ड भोगने के तैयार हूं, लेकिन बिना किसी सुनवाई के ऐसी बर्बरता।”...

विजयदर्थ:– गुरुदेव कृपा आर्यमणि को काबू में करे। यह अनुचित न्याय है।

विजयदर्थ के साथ आये योगी, आर्यमणि को घेरकर बैठ गये। आर्यमणि, हाथ जोड़कर वहां आये सभी योगियों को नमन करते.... “उम्मीद है योग और आध्यात्म किसी राजा के अधीन नही अपितु सत्य और न्याय के लिये प्रयोग में लाये जाते हो।”...

इतना कहकर आर्यमणि वहीं आसान लगाकर बैठे। उसके चारो ओर 6 योगी बैठ हुये थे। मंत्र उच्चारण शुरू हो गया। मंत्र से मंत्र का काट चलता रहा। लगातार 22 दिनो तक मंत्र से मंत्र टकराते रहे। एक अकेला आर्यमणि कई वर्षो से सिद्ध प्राप्त किये हुये 6 योगियों से टकरा रहा था और अकेले ही उनपर भारी पड़ रहा था। बाईसवें दिन की समाप्ति के साथ ही 6 योगियों ने मिलकर आर्यमणि के दिमाग पर काबू पा लिया।

काबू पाने के बाद सभी योगियों की इच्छा हुई की आखिर इतनी कम उम्र में एक लड़का इतनी सिद्धि कैसे प्राप्त कर कर सकता है, उसकी जांच की जाये। इच्छा हुई तो सभी मंत्र जाप करते आर्यमणि के दिमाग में भी घुस गये। आर्यमणि के दिमाग में जब वो घुसे तब उनके आश्चर्य की कोई सीमा ही नही रही। आर्यमणि की किसी भी याद को वो लोग नही देख पाये, सिवाय एक याद के जिसमे अल्फा पैक को लगभग समाप्त कर दिया गया था।

सभी योगी विचलित होकर आर्यमणि के दिमाग से बाहर निकले। वो लोग आर्यमणि को जगाते उस से पहले बहुत देर हो चुकी थी। राजा विजयदर्थ आर्यमणि के दिमाग पर काबू पा चुका था। 6 योगियों के मुखिया योगी पशुपति नाथ जी विजयदर्थ के समक्ष खड़े होते.... “हम इस लड़के से कई गुणा ज्यादा मंत्रो के प्रयोग को जानते थे। कई मंत्र और साधना के विषय में तो शायद इसे ज्ञान भी नही, फिर भी इसके सुरक्षा मंत्रो की सिद्धि हमसे कई गुणा ऊंची थी। परंतु तुमने क्या किया विजय?”...

विजयदर्थ:– मैने क्या किया गुरुदेव...

योगी पशुपतिनाथ:– तुम्हारे बेटी और बेटे ने मिलकर गुरु आर्यमणि के परिवार की हत्या कर डाली। उनमें से एक (अलबेली) गर्भवती भी थी। जिस हथियार से गुरु आर्यमणि के परिवार को मारा गया वह रीछ स्त्री महाजनीका की दिव्य खंजर थी। इसका अर्थ समझ भी रहे हो। वही स्त्री जो कभी महासागर पर काबू पाने के इरादे से आयी थी। जिसे बांधने में न जाने कितने साधुओं ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। उसी के खंजर से पूरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया। तुम्हारे बच्चे जाकर असुर प्रवृति के लोगों से मिल गये और तुमने बिना जांच किये उल्टा गुरु आर्यमणि पर काबू किया।

विजयदर्थ अपने दोनो हाथ जोड़ते.... “गुरुवर क्या वाकई महाजनिका की खंजर से गुरु आर्यमणि के परिवार को मारा गया था।”..

योगी पशुपतिनाथ:– हां, और इस पूरे घटने का रचायता और कोई नही तुम्हारा पुत्र निमेशदर्थ था। आज हमने अपने योग को किसी राजा के अधीन कर दिया। इसलिए इसी वक्त मैं अपने प्राण त्यागता हूं।

इतना कहकर योगी पशुपतिनाथ जी ने कुछ मंत्रो का प्रयोग खुद पर ही कर लिया और जहां वो खड़े थे वहां मात्र राख बची थी। विजयदर्थ अपने घुटने पर आकर उस राख को छूते.... “ये मैने क्या कर दिया गुरुदेव। मैने कभी ऐसा तो न चाहा था। मुझे लगा आर्यमणि अपने परिवार की मृत्यु में बौखलाया था इसलिए मुझे इसपर काबू चाहिए था। ये मुझसे कौन सा पाप हो गया?”..

उन्ही योगियों में से एक योगी वशुकीनाथ जी.... "क्या वाकई सिर्फ इतनी सी बात थी विजय। तुम झूठ किस से बोल रहे?”

विजयदर्थ:– गुरुवर आर्यमणि कुछ देर पहले तक मेरे लिये मरा ही हुआ था। उसे काबू में करने की और क्या मनसा हो सकती है?

योगी वशुकीनाथ:– खड़े हो जाओ विजय। तुम अब भी पूरा सच नहीं कह रहे। आर्यमणि को यहां जल में रोक के रखने की चाह में जितने धूर्त तुम हो चुके थे, योगी पशुपतिनाथ जी को उसी की सजा मिली है। गुरु आर्यमणि का परिवार रहा नहीं। तुम्हे उन जैसा हीलर हर कीमत पर अपने पास चाहिए था। मौका उन्होंने खुद तुम्हे दिया, जब वो तुम्हारे बच्चे को मारने पहुंच गये। तुमने भी मौके को पूरा भुनाते हमारे जरिए उनके दिमाग पर काबू पा लिया। देख लो तुम्हारी बुरी नियत का क्या परिणाम हुआ?”

विजयदर्थ, योगी वशुकिनाथ जी के पाऊं में दोबारा गिरते..... “गुरुवर मुझे माफ कर दे। मै घोर पश्चाताप में हूं। मेरी लालच बस इतनी सी थी कि जलीय साम्राज्य फलता–फूलता रहे। कोई भी दुश्मन हमारी दुनिया को तबाह न करे।”

योगी वशुकीनाथ:– महासागर की भलाई को लेकर तुम्हारी नियत पर कभी शक नही था विजय। तभी तो हमने गुरु आर्यमणि को बांधा। लेकिन तुम भी कहां विश्वास पात्र रहे। सत्य और न्याय के बीच हमें ला खड़ा किया। हम सब के पापों की जिम्मेदारी योगी पशुपतिनाथ जी ने ली। जानते हो हमारे पाप की सजा तो उन्होंने खुद को दे दी। साथ ही साथ गुरु आर्यमणि के साथ जो गलत किया, उसके भरपाई में उन्होंने अपना सारा ज्ञान उनके मस्तिष्क में निहित कर दिया। अब हम अपनी साधना में जा रहे है। दोबारा अब हमसे किसी भी प्रकार के मदद की उम्मीद मत रखना।

विजयदर्थ, योगी वशुकीनाथ के चरणों को भींचते.... “ऐसा न कहे गुरुवर। आप हमे छोड़ चले जायेंगे तब यहां के जलीय तंत्र पूर्ण रूप से टूट जायेगा। विश्वास मानिए किसी योग्य उत्तराधिकारी के मिलते ही अपने पाप की सजा मैं भी खुद को स्वयं दूंगा। किंतु आप हमसे मुंह न मोरे।”

योगी वशुकीनाथ:– तुम्हारे निर्णय ने मुझे प्रसन्न जरूर किया है किंतु गुरु आर्यमणि का क्या? उनके साथ जो गलत हुआ है, उसकी भरपाई कैसे करोगे? तुमने तो मौका मिलते ही उनके दिमाग को भी अपने वश में कर लिया।

विजयदर्थ:– मैं एक पिता हूं, इसलिए मोह नहीं जायेगा। उपचार के उपरांत जब मेरे दोनो बच्चे ठीक हो जाएंगे तब मैं उन्हे जलीय तंत्र से पूर्ण निष्कासित कर दूंगा। न वो मेरे आंखों के सामने होंगे और न ही मैं आर्यमणि के प्रतिसोध के बीच आऊंगा। यही नही आर्यमणि का विवाह मैं अपने सबसे योग्य पुत्री महाती के साथ करवा दूंगा। और जिस दिन आर्यमणि की तंद्रा टूटेगी, उसी दिन मैं उन्हे यहां का राजा घोषित करके अपनी मृत्यु को स्वयं गले लगा लूंगा।

योगी वशुकीनाथ:– क्या कोई ऐसी शक्ति है जो तुम्हारे राज्य में घुसकर गुरु आर्यमणि को तुम्हारे वश से अलग कर सके? तुम उन्हे अभी क्यों नही छोड़ देते...

विजयदर्थ:– विश्वास मानिए मैं चाहता तो हूं लेकिन उत्साह में मुझसे भूल हो गयी।

योगी वशुकीनाथ:– “हां मैं समझ गया। तुमने त्वरण वशीकरण का प्रयोग कर दिया। अब या तो कोई बाहरी त्वरित शक्ति आर्यमणि के दिमाग में घुसकर उसे तुम्हारे वशीकरण से निकलेगी या फिर जब आर्यमणि का जीवन स्थिर होगा तभी वो तुम्हारे जाल से निकलेगा। तुम इतना कैसे गिर सकते हो, मुझे अब तक समझ में नही आ रहा।”

“मेरा श्राप है तुम्हे, तुम हर वर्ष अपने परिवार के एक व्यक्ति का मरा हुआ मुंह देखोगे। सिवाय अपनी बेटी महाती के जिसके विवाह की योजना तुमने बनाई है और तुम्हारे दोनो पुत्र और पुत्री (निमेष और हिमा) जो गुरु आर्यमणि के दोषी है। अब मेरी नजरो से दूर हो जाओ इस से पहले की आवेश में आकर मैं कुछ और बोल जाऊं।”

विजयदर्थ:– क्षमा कीजिए गुरुदेव... मुझे क्षमा कीजिए...

योगी वशुकीनाथ:– तुम्हारे पाप की कोई क्षमा नही। एक आखरी शब्द तुम्हारे लिये है, तुम और तुम्हारे समुदाय के लोग अब जमीन का मुंह कभी नहीं देख सकते और इलाज के उपरांत निमेषदर्थ और हिमा कभी जल में नही रह सकते। बस तुम्हारे कुल से जिसका विवाह गुरु आर्यमणि के साथ होगा, उसकी शक्तियां पूर्ण निहित होगी।

विजयदर्थ, रोते हुये योगी वशुकीनाथ के पाऊं को जकड़ लिया। न जाने कितनी ही मिन्नते उसने की तब जाकर योगी वशुकीनाथ ने अपने श्राप का तोड़ में केवल इतना ही कहे की... “यदि गुरु आर्यमणि ने तुम्हे क्षमा कर दिया तो ही तुम श्राप से मुक्त होगे, लेकिन शर्त यही होगी विजयदर्थ की तुम खुद को सजा नही दोगे। बल्कि तुम्हारी सजा स्वयं गुरु आर्यमणि तय करेंगे और उसी दिन हम वापस फिर तुम्हारे राज्य में कदम रखेंगे।”

योगी अपनी बात समाप्त कर वहां से अंतर्ध्यान हो गये और विजयदर्थ नीचे तल को तकता रह गया। जैसे ही वह आर्यमणि के साथ अपने महल में पहुंचा, महल से एक अप्रिय घटना की खबर आ गयी। विजयदर्थ के सबसे छोटे पुत्र का देहांत हो गया था। विजयदर्थ के पास सिवाय रोने के और कुछ नही बचा था।

विजयदर्थ तो मानो जैसे गहरे वियोग में चला गया हो। कुछ दिन बीते होंगे जब उसके दो अपंग बच्चे (निमेषदर्थ और हिमा) को महासागर से निकालकर किसी वीरान टापू पर फेंक दिया गया। जल में विचरण करने की सिद्धि निमेषदर्थ और हिमा से छीन चुकी थी। कुछ दिन और बीते होंगे जब महाती अपने पिता से मिलन पहुंची। कारण था बीते कुछ दिनों से शासन के अंदेखेपन की बहुत सी खबरे और हर खबर का अंत विजयदार्थ के नाम से हो जाता। महाती आते ही उनके इस अनदेखेपन का कारण पूछने लगी। तब विजयदर्थ ने उसे पूरी कहानी बता दी।

अपने सौतेले भाई बहन की करतूत तो महाती पहले से जानती थी। अपने पिता की लालच भरी छल सुनकर तो महाती अचरज में ही पर गयी, जबकि आर्यमणि के बारे में तो विजयदर्थ को भी पूरी बात पता थी। महाती अपने पिता को वियोग में छोड़कर, उसी क्षण पूरे शासन का कार्य भार अपने ऊपर ली। मुखौटे के लिये बस अब उसके पिताजी राजा थे, बाकी सारे फैसले महाती खुद करने लगी।

लगभग 2 महीने बीते होंगे जब राजधानी में जश्न का माहोल था। एक बड़े से शोक के बाद इस जश्न ने जैसे विजयदर्थ को प्रायश्चित का मौका दिया था। वह मौका था आर्यमणि और महाती के विवाह का। जबसे विजयदर्थ ने आर्यमणि पर त्वरित सम्मोहन किया था, उसके कुछ दिन बाद से ही आर्यमणि, महाती के साथ रह रहा था। यूं तो चटपटे खबरों में महाती का नाम अक्सर आर्यमणि के साथ जोड़ा जाता। किंतु महाती ने किसी भी बात की परवाह नही की।
Nice update
 
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Fir se chhal ho gaya arya k sath....
Amaya ki koi khabar??

Aapane Apne kahaniyon mein Kai Tarah Ke khalnayakon ko dikhaya hai Un khalnayakon ka bhi Ek mainn leader Hota Hai..

AryaMani ki is Kahani mein Kai Tarah Ke Khalnayak Aaye Aur Gaye lekin Abhi Tak Kisi Ek main Khalnayak ka Parichay Nahin hua??

Abhi tak men Khalnayak ke roop mein Puri NayeJo samuday hi dekhi gayi hai...

Kya abhi bhi koi parde k piche chupa hai???
 

Samar2154

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Yeh kya tha bhai har baar aryamani aise pastha jayega toh maha yudh kab jeet payega.

Kuch bhi ho par Vijaydrath ko maafi nahi milni chahiye bas guzarish hai aapse. Aise swaarthi logon ko sazaa hi mile toh hi achha rahega baaki apki ichha.
 
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