# अध्याय 34: सुमित्रा देवी का पहला कदम - पड़ोसिन की चाहत
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## सारांश (पिछले अध्यायों का):
राकेश जी को पता चल गया था कि आकाश का कविता, मोनिका और शालिनी के साथ क्या चल रहा है। उन्होंने कविता जी को माफ कर दिया था—क्योंकि वह जानते थे कि वह उन्हें वो नहीं दे पाए जो वह चाहती थीं। उन्होंने आकाश को भी अपना आशीर्वाद दिया था—लेकिन चेतावनी दी थी कि समाज कभी नहीं समझेगा। अब एक और महिला अपनी चाहत लेकर आ रही थी—सुमित्रा देवी, पड़ोसिन, जो हर किसी पर नज़र रखती थी, और जिसने सब कुछ देख लिया था।
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## अध्याय 34: सुमित्रा देवी का पहला कदम - पड़ोसिन की चाहत
नागवा की गलियाँ—जहाँ हर कोई हर किसी को जानता था, और हर चीज़ पर नज़र रखी जाती थी। सुमित्रा देवी—50 साल की, 5'2", मोटी, हरी साड़ी में, हमेशा अपनी चौकी पर बैठी मूंगफली खोलती थीं। उनके बाल अब सफेद हो चुके थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी—जो उनके 50 साल की उम्र से कहीं ज़्यादा जवान थी। उनके 36C स्तन भारी थे, लेकिन ढीले—जैसे कई बच्चों को दूध पिलाने के बाद। उनकी 34 इंच की कमर पर हल्की चर्बी थी, और उनके 40 इंच के नितम्ब चौड़े और भारी थे।
सुमित्रा देवी ने पिछले कुछ महीनों में सब कुछ देखा था—आकाश का कविता जी के कमरे से निकलना, मोनिका और शालिनी का उसके इर्द-गिर्द रहना, आशा जी का उसे देखना, और आराध्या का उसके लिए पागल होना। उन्होंने सब कुछ देखा था—लेकिन वह चुप रही थी। क्योंकि उनके अंदर भी एक चाहत जाग रही थी—एक ऐसी चाहत जो उन्होंने कई सालों से महसूस नहीं की थी।
उनके पति की मृत्यु दस साल पहले हो गई थी। उनके बच्चे शहर से बाहर रहते थे। वह अकेली थीं—बहुत अकेली। और आकाश... आकाश उनके जीवन में एक ऐसी रोशनी लेकर आया था, जो उन्होंने कभी नहीं देखी थी।
आज शाम को, जब आकाश उनके घर के सामने से गुज़र रहा था, तो सुमित्रा देवी ने उसे आवाज़ दी—"आकाश बेटा! इधर आओ, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।"
आकाश उनके पास आया—उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी। सुमित्रा देवी ने उसे अपने आँगन में बैठाया—जहाँ एक पुरानी चारपाई थी, और उसके ऊपर आम का पेड़ था। उन्होंने उसे चाय दी—उनके हाथ काँप रहे थे, और उनकी आँखें उससे मिलाने से बच रही थीं।
"आकाश, मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ," सुमित्रा देवी ने कहा—उनकी आवाज़ में एक गहरी मिठास थी, लेकिन उसके नीचे एक गहरी झिझक भी थी। "मैं जानती हूँ कि तुम कविता के साथ हो... और मोनिका के साथ... और शालिनी के साथ... और आशा के साथ... और आराध्या के साथ... मैं सब जानती हूँ।"
आकाश का चेहरा पीला पड़ गया—"चाची... मैं..."
"मुझे मत रोको, आकाश," सुमित्रा देवी ने कहा—उनकी आवाज़ में एक गहरी पीड़ा थी। "मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूँगी। मैं तुम्हें किसी को नहीं बताऊँगी। लेकिन... मैं भी अकेली हूँ, आकाश। बहुत अकेली। मेरे पति गुज़र गए—दस साल हो गए। मेरे बच्चे शहर में रहते हैं। और मैं... मैं इस घर में अकेली हूँ।"
उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर उसके सिर पर रखा—मुलायम, गर्म, और उनकी उँगलियाँ उसके बालों में उलझ गईं। उनकी आँखों में एक गहरी चमक थी—जो उनके 50 साल की उम्र से कहीं ज़्यादा जवान थी।
"मैं तुम्हें अपने बेटे की तरह देखती हूँ, आकाश," उन्होंने कहा—उनकी आवाज़ धीमी और कामुक हो गई थी। "लेकिन... मैं तुम्हें कुछ और भी महसूस करती हूँ। कुछ ऐसा, जो मैंने कई सालों से महसूस नहीं किया।"
आकाश ने कोई जवाब नहीं दिया—वह बस उन्हें देखता रहा। उसके अंतर्ज्ञान ने उसे बताया कि ये महिला खतरनाक है—लेकिन उसके शरीर में एक चाहत भी थी, जिसे वह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था।
सुमित्रा देवी ने अपनी साड़ी का पल्लू ढीला किया—उनके 36C स्तनों का ऊपरी हिस्सा दिखने लगा—भारी, ढीले, लेकिन अभी भी आकर्षक। "मुझे छुओ, आकाश," उन्होंने कहा—उनकी आवाज़ में एक गहरी प्यास थी। "मुझे वो दो, जो मैंने कई सालों से महसूस नहीं किया।"
आकाश के हाथ काँप रहे थे—लेकिन उसने उनके स्तन को छुआ—भारी, गर्म, मुलायम। सुमित्रा देवी ने कराहते हुए अपनी पीठ झुकाई—उनके निप्पल्स उसकी हथेली के नीचे सख्त हो गए।
"हाँ... ऐसे..." सुमित्रा देवी फुसफुसाईं—उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे खुशी के थे। "बहुत सालों बाद... किसी ने मुझे छुआ है..."
उन्होंने अपने होंठ उसके होठों पर रख दिए—गहरा, भावुक, और प्यासा चुम्बन। उनके होंठ काँप रहे थे—उन्होंने कई सालों बाद किसी को चूमा था। उनकी जीभ ने धीरे-धीरे उसके मुँह में प्रवेश किया, और वह पिघल गईं—उसकी बाँहों में, उसके शरीर में।
"मुझे अपना बना लो, आकाश," सुमित्रा देवी फुसफुसाईं—उनके होंठ उसके कान के पास, और उनकी साँसें गर्म थीं। "आज रात... इस आँगन में... मुझे एक औरत बना दो... जो चाही गई हो..."
आकाश ने उन्हें चारपाई पर लिटा दिया—और धीरे-धीरे उनकी साड़ी उतारी। उनके 36C स्तन खुले, भारी, ढीले, निप्पल्स गहरे भूरे, बड़े। उनकी 34 इंच की कमर पर हल्की चर्बी थी, और उनके 40 इंच के नितम्ब चारपाई पर फैल गए। उसने अपने होंठ उनके निप्पल्स पर रख दिए—और उसे चूसना शुरू कर दिया। सुमित्रा देवी ने कराहते हुए अपनी पीठ झुकाई—उनकी उँगलियाँ उसके बालों में, और उनके पैर काँप रहे थे।
"हाँ... हाँ... यही..." सुमित्रा देवी चीख रही थीं—लेकिन धीरे, ताकि कोई न सुन सके। "बहुत सालों बाद... मुझे प्यार मिला... मुझे जीवन मिला..."
आकाश ने अपने शरीर को उनके अंदर धकेला—धीरे-धीरे, लेकिन पूरी गहराई से। सुमित्रा देवी ने चीख़ी—लेकिन वह दर्द की चीख़ नहीं थी, बल्कि पूर्णता, संतुष्टि, और खुशी की चीख़ थी। उनकी उँगलियाँ उसकी पीठ में गड़ गईं, और उन्होंने उसे अपनी ओर खींचा—और गहरा, और गहरा।
"हाँ... हाँ... मुझे प्यार करो, आकाश..." सुमित्रा देवी चीख रही थीं—उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे खुशी के थे। "मुझे वो दो, जो मुझे कभी किसी ने नहीं दिया... मुझे प्यार करो..."
आकाश ने उन्हें गहराई से भरा—हर बार पूरी ताकत से, हर बार पूरी गहराई से, और हर बार और प्यार से। सुमित्रा देवी उसके नीचे पिघल रही थीं—उनके स्तन उसकी छाती पर, उनके नितम्ब उसके हाथों में, और उनकी जाँघें उसकी कमर पर।
जब वे थक गए, तो सुमित्रा देवी आकाश की बाँहों में लेटी हुई थीं—उनके स्तन उसकी छाती पर दबे हुए, और उनके हाथ उसकी कमर पर। "अब मैं अकेली नहीं हूँ," उन्होंने कहा—उनकी आवाज़ में संतुष्टि और प्यार था। "तुमने मुझे जीवित कर दिया, आकाश। तुमने मुझे वो दिया, जो मैं कभी भूल नहीं सकती।"
लेकिन उनकी आँखों में एक चमक थी—वह जानती थीं कि यह सिर्फ शुरुआत है। वह आकाश को अपने पास रखना चाहती थीं—और वह किसी के साथ उसे शेयर नहीं करना चाहती थीं।
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## अध्याय 35: काजल की साजिश - आराध्या को आकाश से दूर करने की कोशिश
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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की कैंटीन—दोपहर का समय था, और भीड़ थी। काजल—20 साल की, 5'4", 32B स्तन, 26 इंच कमर, 34 इंच नितम्ब, गोरी त्वचा, लंबे काले बाल, भूरी आँखें, छोटे गुलाबी होंठ—आराध्या की दोस्त थी, लेकिन अब वह उसकी दुश्मन बन चुकी थी। उसने आकाश के साथ एक रात बिताई थी, और अब वह उसे अपना बनाना चाहती थी—लेकिन आराध्या उसके रास्ते में थी।
काजल ने आराध्या को कैंटीन में अकेले में बुलाया—"आराध्या, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। बहुत ज़रूरी है।"
आराध्या उसके पास आई—उसकी हरी-सुनहली आँखों में संदेह था। "क्या हुआ, काजल?"
काजल ने अपनी कुर्सी करीब खींची—"तुम जानती हो कि आकाश क्या कर रहा है?" उसने सीधे सवाल किया। "वह सिर्फ तुम्हारे साथ नहीं है। वह मेरे साथ भी है। और तुम्हारी माँ के साथ... और तुम्हारी बहन के साथ... और चाची के साथ... और कविता चाची के साथ... और मोनिका के साथ... और शालिनी के साथ... और..."
आराध्या का चेहरा पीला पड़ गया—"तुम झूठ बोल रही हो!"
"मैं झूठ नहीं बोल रही," काजल ने कहा—उसकी आँखों में विजय की चमक थी। "मैंने खुद उसके साथ वो किया है, जो तुम सोच भी नहीं सकती। और वह मुझसे प्यार करता है। तुमसे ज़्यादा।"
आराध्या की आँखों में आँसू आ गए—"तुम... तुम मुझे चोट पहुँचाना चाहती हो, है ना?"
"हाँ," काजल ने कहा—उसकी आवाज़ में कोई शर्म नहीं थी। "तुम्हारे पास सब कुछ है—सुंदरता, बुद्धि, प्यार। लेकिन मुझे क्या? मैं तो बस तुम्हारी दोस्त हूँ। अब मैं वही चाहती हूँ, जो तुम्हारे पास है। और मुझे मिल गया।"
आराध्या ने अपनी कुर्सी से उठकर, काजल को थप्पड़ मारा—"तुम चालाक हो, काजल! तुमने मेरा दोस्त होने का नाटक किया, बस मुझे चोट पहुँचाने के लिए!"
वह वहाँ से भाग गई—उसके आँसू बह रहे थे, और उसका दिल टूट रहा था। काजल ने उसे जाते हुए देखा—और उसके चेहरे पर एक गहरी, विजयी मुस्कान थी।
लेकिन काजल की साजिश यहीं खत्म नहीं हुई—उसने आराध्या के खिलाफ एक और चाल चली। उसने कॉलेज के सारे छात्रों को बताना शुरू कर दिया कि आराध्या और आकाश के बीच कुछ गलत चल रहा है—कि आराध्या अपने ही परिवार के एक लड़के के साथ संबंध बना रही है। उसने यह भी बताया कि आराध्या की माँ भी उसी लड़के के साथ है।
कॉलेज में गपशप फैलने लगी—लोग आराध्या को ऐसे देखने लगे जैसे वह कोई अपराधी हो। आराध्या के दोस्त उससे दूर होने लगे। और आराध्या—जो पहले से ही अपने पिता की मृत्यु से टूटी हुई थी—अब और टूट गई।
शाम को, जब आकाश ने आराध्या को कॉलेज के बाहर अकेले रोते हुए देखा, तो वह उसके पास गया—"आराध्या, क्या हुआ?"
आराध्या ने अपना चेहरा उठाया—उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। "काजल ने सबको बता दिया, आकाश," उसने कहा—उसकी आवाज़ टूट रही थी। "उसने सबको बता दिया कि हमारे बीच क्या चल रहा है। और अब... अब पूरा कॉलेज मुझे ऐसे देखता है जैसे मैं कोई गलत काम कर रही हूँ।"
आकाश ने उसे गले लगा लिया—"आराध्या, सुनो," उसने कहा—उसकी आवाज़ में दृढ़ता थी। "काजल जो चाहे करे, मैं तुम्हारे साथ हूँ। और मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा।"
आराध्या ने अपना चेहरा ऊपर उठाया—उसकी हरी-सुनहली आँखों में आँसू थे, लेकिन उनमें एक गहरी चाहत भी थी। "तो मुझे अपना बना लो, आकाश," उसने कहा—उसकी आवाज़ में एक गहरी प्यास थी। "आज रात... मुझे भूल जाने दो कि काजल कौन है... आज रात बस मेरे हो..."
आकाश ने उसे अपने कमरे में ले जाया—और उस रात, उसने आराध्या के दुःख को प्यार में बदल दिया। उसने उसे चूमा—गहरा, भावुक, और प्यासा चुम्बन। उसने उसके कपड़े उतारे—उसके 34B स्तन खुले, पुष्ट, गोल, निप्पल्स गुलाबी। उसने उसके निप्पल्स को चूसा, उसकी गर्दन को चूमा, उसकी छाती को सहलाया। आकाश ने उसे अपने अंदर समा लिया—और वे एक हो गए, उस रात, उस प्यार में, जो किसी भी बंधन से मुक्त था।
जब वे थक गए, तो आराध्या आकाश की बाँहों में लेटी हुई थी—उसके स्तन उसकी छाती पर दबे हुए, और उसके हाथ उसकी कमर पर। "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, आकाश," उसने कहा—उसकी आवाज़ में संतुष्टि और प्यार था। "चाहे काजल कुछ भी करे... मैं तुम्हारी हूँ। हमेशा के लिए।"
लेकिन काजल की साजिश ने एक बीज बो दिया था—और वह बीज धीरे-धीरे पूरे परिवार को निगलने वाला था।
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## अध्याय 36: डॉ. रमेश की सलाह - परिवार का स्वास्थ्य और तनाव
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वाराणसी के लंका इलाके में डॉ. रमेश का क्लिनिक था—55 साल के, 5'7", दुबले-पतले, चश्मा, सफेद बाल, और एक गहरी समझदारी लिए हुए। वह शर्मा और माथुर परिवार का भरोसेमंद डॉक्टर था—कई सालों से। उसने इस परिवार को बढ़ते देखा था, और उसने इस परिवार के हर सदस्य का इलाज किया था।
आज आशा जी डॉ. रमेश के पास आईं—उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। उन्हें चक्कर आ रहे थे, और उनका ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ था। डॉ. रमेश ने उन्हें जाँचा, और फिर गंभीरता से कहा—"आशा जी, आपका ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ा हुआ है। और आपका तनाव... वह बहुत ज़्यादा है। आपको आराम की ज़रूरत है।"
आशा जी ने अपनी आँखें नीची कर लीं—"डॉक्टर, मैं... मैं बहुत तनाव में हूँ। बहुत।"
डॉ. रमेश ने उनका हाथ पकड़ा—"आशा जी, मैं आपको कई सालों से जानता हूँ। आप हमेशा से एक मजबूत महिला रही हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों में... आप कुछ छिपा रही हैं। और वह छिपाना आपको अंदर से खा रहा है।"
आशा जी की आँखों से आँसू बहने लगे—"डॉक्टर, मैं... मैं कुछ नहीं कह सकती।"
डॉ. रमेश ने उन्हें टिश्यू दिया—"आपको कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, आशा जी। लेकिन मैं आपको एक सलाह दूँगा—अगर आप इस तनाव को कम नहीं करेंगी, तो यह आपकी सेहत के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है। आपको अपने परिवार से बात करनी चाहिए। आपको अपनी भावनाओं को व्यक्त करना चाहिए।"
आशा जी ने सिर हिलाया—"मैं कोशिश करूँगी, डॉक्टर।"
उसी दिन, डॉ. रमेश ने आकाश को भी बुलाया—"आकाश, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।"
आकाश डॉ. रमेश के पास आया—उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी। डॉ. रमेश ने उसे बैठाया, और उसकी आँखों में देखा—"आकाश, मैं तुम्हें कई सालों से जानता हूँ। तुम एक अच्छे लड़के हो। लेकिन... मुझे पता है कि इस परिवार में कुछ गलत हो रहा है। और मैं तुम्हें एक सलाह दूँगा—इस परिवार को बचाओ। इन सबको बचाओ। और खुद को भी।"
आकाश ने सिर हिलाया—"मैं कोशिश कर रहा हूँ, डॉक्टर।"
डॉ. रमेश ने उसका कंधा थपथपाया—"तुम एक अच्छे लड़के हो, आकाश। और मैं जानता हूँ कि तुम इस परिवार को कभी नहीं टूटने दोगे। लेकिन एक बात याद रखना—कभी-कभी, सबको खुश रखने के लिए, हमें खुद को खोना पड़ता है। और वह सही नहीं है।"
आकाश ने गहरी साँस ली—"मुझे पता है, डॉक्टर। लेकिन मैं इन सबसे प्यार करता हूँ। और मैं इन्हें कभी नहीं छोड़ सकता।"
डॉ. रमेश ने उसे देखा—उनकी आँखों में एक गहरी करुणा थी। "तुम बहुत बहादुर हो, आकाश। और मैं तुम्हारे साथ हूँ। चाहे कुछ भी हो।"
उस रात, जब आकाश घर लौटा, तो उसने देखा कि आशा जी उसका इंतज़ार कर रही थीं—उनकी आँखों में आँसू थे, और उनके हाथ काँप रहे थे।
"आकाश, मुझे तुमसे कुछ कहना है," उन्होंने कहा—उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैं बहुत तनाव में हूँ। और डॉक्टर ने कहा है कि अगर मैंने अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं किया, तो यह मेरी सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है।"
आकाश ने उन्हें गले लगा लिया—"आशा, मैं तुम्हारे साथ हूँ। तुम मुझे कुछ भी बता सकती हो।"
आशा जी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया—उनकी आँखों में एक गहरी चाहत थी। "तो मुझे अपना बना लो, आकाश," उन्होंने कहा—उनकी आवाज़ में एक गहरी प्यास थी। "आज रात... मुझे भूल जाने दो कि मैं किस तनाव में हूँ... आज रात बस मेरे हो..."
आकाश ने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया—और उस रात, उसने आशा जी के तनाव को प्यार में बदल दिया। उसने उन्हें चूमा—गहरा, भावुक, और प्यासा चुम्बन। उसने उनके कपड़े उतारे—उनके 38C स्तन खुले, भारी, ढीले, निप्पल्स गहरे भूरे। उसने उनके निप्पल्स को चूसा, उनकी गर्दन को चूमा, उनकी छाती को सहलाया। आकाश ने उन्हें अपने अंदर समा लिया—और वे एक हो गए, उस रात, उस प्यार में, जो किसी भी बंधन से मुक्त था।
जब वे थक गए, तो आशा जी आकाश की बाँहों में लेटी हुई थीं—उनके स्तन उसकी छाती पर दबे हुए, और उनके हाथ उसकी कमर पर। "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, आकाश," उन्होंने कहा—उनकी आवाज़ में संतुष्टि और प्यार था। "चाहे कुछ भी हो... मैं तुम्हारी हूँ। हमेशा के लिए।"
लेकिन डॉ. रमेश की बात आकाश के दिमाग में गूँज रही थी—"कभी-कभी, सबको खुश रखने के लिए, हमें खुद को खोना पड़ता है। और वह सही नहीं है।" आकाश जानता था कि वह सही थे—लेकिन वह इन सबसे प्यार करता था, और वह इन्हें कभी नहीं छोड़ सकता था।
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**[अध्याय 34, 35, 36 समाप्त]**