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“अद्भुत दिव्यास्त्र"
दोस्तों सर्वप्रथम मैं आप सभी का दिल से आभारी हूं कि आपने इतने कम समय में, मेरे जैसे एक नये लेखक को इतना सारा प्यार दिया।
मैं आशा करता हूं, अपने नेत्रों की कृपा दृष्टि से अभिसिंचित कर मुझे उत्साहित करते रहेंगे।
दोस्तों आज से 200 वर्ष पहले तक सभी लोग देवताओं पर विश्वास करते थे, उन्हें मानते थे और उनकी हृदय से पूजा करते थे।
पर जैसे-जैसे विज्ञान अपने पाँव पसारता गया, ईश्वर की तस्वीर लोगों के समक्ष धुंधली होती चली गई।
बहुत से मनुष्यों को लगने लगा कि इस ब्रह्मांड में ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं है, वह सभी तो एक जैविक रचना हैं।
उधर हमारे कुछ धर्मगुरुओं के द्वारा गढ़े गए, झूठे मिथकों ने हमारे अविश्वास को और भी बढ़ा दिया।
हमारे मस्तिष्क में ईश्वर के लिये गलत धारणाएं बनने लगीं। हमें सभी ईश्वरीय कथाएं कपोल-कल्पित लगने लगीं।
विज्ञान का पर्दा हमारी आँखों पर पड़ जाने के बाद, हमने ये भी नहीं सोचा कि क्या हम अभी तक सप्त तत्व को समझ पायें हैं? अग्नि क्या है? क्या जल मात्र एक तत्व है? क्या हवा के कण सिर्फ वायुमण्डल में घूमने के लिये बने हैं? क्या धरती के मूल सिद्धान्तों को हम पूर्णतया समझ चुके हैं? क्या ध्वनि हमारी श्रवणेन्द्रिय में घूमने वाली एक ऊर्जा मात्र है? प्रकाश और आकाश के बारे में तो बात ही क्या करना ? उनकी तो जानकारी भी हमारे पास नगण्य है।
हम अभी आत्मा और मानव शरीर को पूर्णतया नहीं समझे हैं ईश्वर पर प्रश्नचिंह कैसे उठा सकते हैं? क्या कुछ भद्रजनों के द्वारा लिखी गई, काल्पनिक कहानियों से, हम ईश्वर के अस्तित्व को नकार सकते हैं? इस अनन्त ब्रह्मांड के आकार के आगे, हम एक धूल के कण जितने बड़े भी नहीं हैं।
इसलिये हे विज्ञान के पुजारियों, झूठी कहानियों पर विश्वास मत करो.......परंतु ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती भी मत दो....... वह निराकार है........वह ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है.......उसको ढूंढने के लिये हमको अपने धर्मस्थलों पर जाने की जरुरत नहीं है, उसे ढूंढने के लिये तो हमारा मन और विश्वास ही काफी है।
तो फिर इंतजार किजिए अगले आध्याय का, जो कि बोहोत जल्द शुरु हो रहा है।
तो दोस्तों इन शब्दों के साथ मैं अपना यह लेख यहीं समाप्त करूंगा।
आपका दोस्त "राज शर्मा"
दोस्तों सर्वप्रथम मैं आप सभी का दिल से आभारी हूं कि आपने इतने कम समय में, मेरे जैसे एक नये लेखक को इतना सारा प्यार दिया।
मैं आशा करता हूं, अपने नेत्रों की कृपा दृष्टि से अभिसिंचित कर मुझे उत्साहित करते रहेंगे।
दोस्तों आज से 200 वर्ष पहले तक सभी लोग देवताओं पर विश्वास करते थे, उन्हें मानते थे और उनकी हृदय से पूजा करते थे।
पर जैसे-जैसे विज्ञान अपने पाँव पसारता गया, ईश्वर की तस्वीर लोगों के समक्ष धुंधली होती चली गई।
बहुत से मनुष्यों को लगने लगा कि इस ब्रह्मांड में ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं है, वह सभी तो एक जैविक रचना हैं।
उधर हमारे कुछ धर्मगुरुओं के द्वारा गढ़े गए, झूठे मिथकों ने हमारे अविश्वास को और भी बढ़ा दिया।
हमारे मस्तिष्क में ईश्वर के लिये गलत धारणाएं बनने लगीं। हमें सभी ईश्वरीय कथाएं कपोल-कल्पित लगने लगीं।
विज्ञान का पर्दा हमारी आँखों पर पड़ जाने के बाद, हमने ये भी नहीं सोचा कि क्या हम अभी तक सप्त तत्व को समझ पायें हैं? अग्नि क्या है? क्या जल मात्र एक तत्व है? क्या हवा के कण सिर्फ वायुमण्डल में घूमने के लिये बने हैं? क्या धरती के मूल सिद्धान्तों को हम पूर्णतया समझ चुके हैं? क्या ध्वनि हमारी श्रवणेन्द्रिय में घूमने वाली एक ऊर्जा मात्र है? प्रकाश और आकाश के बारे में तो बात ही क्या करना ? उनकी तो जानकारी भी हमारे पास नगण्य है।
हम अभी आत्मा और मानव शरीर को पूर्णतया नहीं समझे हैं ईश्वर पर प्रश्नचिंह कैसे उठा सकते हैं? क्या कुछ भद्रजनों के द्वारा लिखी गई, काल्पनिक कहानियों से, हम ईश्वर के अस्तित्व को नकार सकते हैं? इस अनन्त ब्रह्मांड के आकार के आगे, हम एक धूल के कण जितने बड़े भी नहीं हैं।
इसलिये हे विज्ञान के पुजारियों, झूठी कहानियों पर विश्वास मत करो.......परंतु ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती भी मत दो....... वह निराकार है........वह ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है.......उसको ढूंढने के लिये हमको अपने धर्मस्थलों पर जाने की जरुरत नहीं है, उसे ढूंढने के लिये तो हमारा मन और विश्वास ही काफी है।
तो फिर इंतजार किजिए अगले आध्याय का, जो कि बोहोत जल्द शुरु हो रहा है।
तो दोस्तों इन शब्दों के साथ मैं अपना यह लेख यहीं समाप्त करूंगा।
आपका दोस्त "राज शर्मा"

Baaki aage ke updates or bhi badhiya hai, Thank you very much for your valuable review and support bhai 