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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Avaran

एवरन - I am Unpredictable
Supreme
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महाशक्ति
रिव्यू का प्रारम्भ किया जाए|

पिछले अपडेट में मुझे ऐसा लगा कि गुरुत्व की बूँद बर्बाद हो गई, लेकिन यहाँ मैं ग़लत था। गुरुत्व की वह बूँद ने व्योम को एक नई ज़िंदगी प्रदान करी है,
पंचशूल ने लगभग व्योम की जीवन ली ही ली थी, वह तो भला हो गुरुत्व शक्ति की उस बूँद का, जिसने व्योम में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया।
और व्योम ने ठीक होने के उपरांत पंचशूल को धारण भी कर लिया। अब व्योम भी एक साधारण मानव नहीं रहा| व्योम के भीतर पंचशूल और गुरुत्व से रहस्यमयी शक्तियाँ अवश्य उत्पन्न हुई होंगी। अब वह शक्तियाँ किस प्रकार की होंगी, यह कहना अभी कठिन है।मेरा सोचना सही था कि व्योम, कहानी की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण किरदार है। देखो न, नियति ने कैसा खेल रचा। वह सुप्रीम पर मौजूद नहीं था, लेकिन वह द्वीप पर मौजूद है, और साथ ही जब वह तालाब में गया, तो एक समुद्री घोड़े ने उसे पंचशूल तक पहुँचाया। इस घटना से यह सिद्ध होता है कि व्योम ही उस पंचशूल का सही उत्तराधिकारी है।


शिन्ज़ो और रिन्ज़ो दोनों दुनिया को "आविष्कार"के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं, लेकिन इनका सच भी एक दिन अवश्य सामने आएगा।


कुल मिलाकर,यह अपडेट हमेशा की तरह शानदार था।
आपकी कहानी पढ़ते-पढ़ते मेरी हिंदी भाषा में और अधिक शुद्धता आ रही है।

BY
ETERNITY ARCEUS
 

Napster

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#114.

महाशक्ति (
11 जनवरी 2002, शुक्रवार, 15:10, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

व्योम को चलते हुए 1 दिन से भी ज्यादा हो चुका था। पिछली रात व्योम ने एक पेड़ पर सोकर गुजारी थी।
एक ही बात बेहतर थी कि अभी तक उसे किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं मिला था।

अकेला होने की वजह से व्योम को उस जंगल में काफी उलझन महसूस हो रही थी, फिर भी वह आगे बढ़ रहा था।

जिस मूर्ति को उसने पहाड़ से चढ़कर देखा था, व्योम को लगा था कि 2 घंटे में ही वह उस मूर्ति तक पहुंच जायेगा, पर जंगल के टेढ़े-मेढ़े रा स्ते की वजह से व्योम को अभी तक उस मूर्ति के दर्शन नहीं हुए थे।
वैसे वह जंगल इतना खूबसूरत था कि व्योम को थकान का अहसास नहीं हो रहा था। खाने-पीने की भी बहुत सारी चीजें आस-पा स थीं।

“मैं यहां ‘सुप्रीम’ के लोगों को बचाने आया था, पर मैं स्वयं ही इस रहस्यमय द्वीप पर फंस गया। पता नहीं मैं अब कभी अपने घर पहुंच भी पाऊंगा कि नहीं ?” व्योम मन ही मन बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था-
“ऊपर से इस द्वीप पर भी पता नहीं कैसे-कैसे रहस्य छुपे हुए हैं?”

तभी व्योम को उन लाल और हरे फलों का ध्यान आया जिसे खाकर वह हाथी, चूहे जितने आकार का हो गया था। यह सोच व्योम ने लाल रंग के फल को जेब से निकालकर देखा।

“देखने में तो साधारण फल जैसा ही लग रहा है। पता नहीं इस फल का खाने में स्वाद कैसा होगा ?”
तभी व्योम के दिमाग में एक खुराफात आयी।

“क्यों ना उस लाल फल को खाकर देखूं? आखिर पता तो चले कि चूहे जितना बनकर कितना मजा आता है? पर कहीं मैं हमेशा के लिये उतना ही बड़ा रह गया तो फिर क्या होगा ?” व्योम के दिमाग में यह सोचकर उथल-पुथल होने लगी।

आखिरकार दिल को कड़ाकर व्योम ने उस फल को खाने का निर्णय कर ही लिया।

“ठीक है, खा ही लेता हूं फल को, पर.... पर इसे किसी पेड़ पर बैठ कर खाना होगा, नहीं तो छोटा होते ही कोई पक्षी मुझ पर हमला ना कर दे?”

यह सोच व्योम एक ऊंचे से पेड़ की डाल पर चढ़कर बैठ गया। व्योम ने अब उस लाल फल को अपने वस्त्रों पर रगड़ कर साफ किया और फिर अपने मुंह में रख लिया।

व्योम ने उस फल को चबाया, उस फल का स्वाद खट्टा था। उसमें कोई बीज भी नहीं था।
तभी व्योम के शरीर को एक झटका लगा। अब उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह आसमान की ऊंचाइयों से नीचे गिर रहा हो।

उसके आसपास के पेड़-पौधे बड़े होते दिखने लगे, जबकि असल में व्योम के छोटे हो जाने की वजह से उसे ऐसा महसूस हो रहा था। कुछ ही देर में व्योम का आकार एक चींटी के बराबर का हो गया।

“अरे ये तो मैं चूहे से भी छोटा हो गया।” व्योम ने स्वयं को देखते हुए सोचा- “अच्छा वह हाथी बहुत बड़ा था, इसलिये वह चूहे के आकार का हो गया था। इंसान के शरीर को यह फल चींटी जितना छोटा कर देता है।”

व्योम ने अब अपनी जेब में पड़े सभी वस्तुओं को देखा, वह सारी वस्तुएं भी व्योम के अनुपात में ही छोटी हो गयीं थीं।

“यह कैसे सम्भव हो सकता है, इस फल को तो केवल मेरा शरीर छोटा करना चाहिये था, फिर मेरे कपड़े और जेब में रखा सामान कैसे छोटा हो गया?”

काफी देर सोचने के बाद भी जब व्योम को कुछ समझ नहीं आया तो वह सोचना छोड़ अपने इस सूक्ष्म रुप का आनन्द उठाने लगा।

तभी व्योम को कुछ अजीब सी खरखराने की आवाज सुनाई दी। व्योम ने अपने चारो ओर देखा। तभी व्योम की नजर अपनी डाल पर सामने से आ रही एक लाल रंग वाली चींटी पर पड़ी।

चींटी ने भी अब उसे देख लिया था। वह खूंखार नजरों से व्योम को घूर रही थी। यह देखकर व्योम के होश उड़ गये।
चींटी अब व्योम की ओर बढ़ने लगी थी। व्योम यह देखकर डाल के किनारे की ओर भागा। चींटी भी तेजी से व्योम के पीछे लपकी।

व्योम भागते हुए डाल के बिल्कुल किनारे तक पहुंच गया। आगे अब रास्ता खत्म हो गया था। चींटी अभी व्योम से कुछ दूरी पर थी।

व्योम ने अपनी नजरें ऊपर नीचे दौड़ाईं। व्योम को अपने ऊपर कुछ ऊंचाई पर एक दूसरी डाल दिखाई दी। पर वह डाल इतनी ऊंची थी कि व्योम उछलकर उस डाल तक नहीं पहुंच सकता था।

तभी व्योम का ध्यान अपने बैग में रखी नायलान की रस्सी की ओर गया। व्योम ने जल्दी से बैग की जिप खोलकर उसमें से रस्सी का गुच्छा निकाल लिया और उसका एक किनारा ऊपर की ओर उछाल दिया।

एक बार में ही रस्सी का वह सिरा एक डाल के ऊपर से होकर वापस व्योम के हाथ में आ गया।
व्योम ने रस्सी के दोनों सिरों को जोर से पकड़ा और उछलकर हवा में लहराते हुए, दूसरी पेड़ की डाल पर पहुंच गया।

चींटी को उम्मीद नहीं थी कि उसका शिकार इतनी आसानी से उसके हाथ से निकल जायेगा।
चींटी ने घूरकर एक बार व्योम को देखा और फिर दूसरे शिकार की खोज में चली गयी।

चींटी के जाने के बाद व्योम ने राहत की साँस ली। व्योम ने वापस रस्सी का गुच्छा बना कर अपने बैग में डाला और वहीं पेड़ की डाल पर बैठकर जंगल का नजारा देखने लगा। तभी व्योम को सूखे पत्ते के खड़कने की आवाज सुनाई दी।

व्योम ने नीचे झांककर देखा। वह 2 बौने थे, जो आकर उस पेड़ के नीचे खड़े हो गये थे।
उनमें से एक बौने के हाथ में एक छोटा सा लकड़ी का यंत्र था, जिसमें एक लाल रंग की लाइट लगी थी और वह यंत्र ‘बीप-बीप’ की आवाज कर रहा था।

वह आपस में बातें कर रहे थे।

“रिंजो, तू यह यंत्र लेकर मुझे बेकार में ही जंगल में घसीट रहा है, यहां नहीं मिलने वाली कोई शक्ति तुझे?” काली दाढ़ी वाले बौने ने कहा।

“तुझे तो कुछ मालूम ही नहीं है शिंजो ?” रिंजो ने कहा- “पिछली बार भी वह धरा शक्ति का कण मैंने ढूंढा था। अगर मैंने वह नहीं ढूंढा होता, तो हम जोडियाक वॉच कभी ना बना पाते।”

“ढूंढा नहीं चुराया था तूने।” शिंजो ने गुस्सा कर कहा।

“अरे चुप कर! अगर किसी ने सुन लिया तो हमारी रही सही इज्जत भी चली जायेगी।” रिंजो ने मुंह पर उंगली रख, शिंजो को चुप कराते हुए कहा- “वैसे भी उस अविष्कार का क्रेडिट हम दोनों ने ही लिया था।
अगर किरीट को पता चला तो वह हम दोनों की खाल उतार लेंगे।”

“ठीक है-ठीक है।” शिंजो भी बात की गम्भीरता को समझ चुप हो गया।

“किरीट और कलाट, हमें बहुत अच्छा वैज्ञानिक समझतें हैं, अब वो क्या जानें कि हम लोग छिपी हुई गुप्त शक्तियों को इस यंत्र के माध्यम से ढूंढते हैं? और फिर उसे अपने द्वारा बनाये किसी इलेक्ट्रानिक यंत्र में फिट करके, अपना अविष्कार बताकर उन्हें दिखा देते हैं।” रिंजो ने हंसते हुए कहा।

यह सुन शिंजो भी हंसते हुए बोला- “चाहे जो हो, पर बुड्ढे तेरी खोपड़ी बहुत कमाल की है।”

“तूने फिर मुझे बुड्ढा बोला।” रिंजो ने गुस्साते हुए कहा- “मैं सिर्फ तेरे से 1 मिनट ही बड़ा हूं।”

“पर तेरी दाढ़ी तो पककर भूरी हो गयी है, मेरी तो अभी भी काली-काली है।” शिंजो ने उछल-उछल कर अपनी काली दाढ़ी को दिखाते हुए, रिंजो को चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा।

यह सुन रिंजो गुस्से से पागल हो गया। उसने आगे बढ़कर शिंजो को पटक दिया और उसके सीने पर चढ़कर उसकी दाढ़ी नोचने लगा- “चल आज दाढ़ी का किस्सा ही खत्म करते हैं। ना रहेगी दाढ़ी....ना तू मुझे कभी चिढ़ायेगा।”

“अरे कमीने रिंजो... छोड़ मेरी दाढ़ी। अगर मेरी दाढ़ी का एक भी बाल टूटा, तो मैं तेरे सब जगह के बाल नोंच डालूंगा...तू अभी मुझे जानता नहीं है।”

यह कहकर दो नों बौने पटका-पटकी करके लड़ने लगे।

व्योम पेड़ के ऊपर बैठा दोनों बौंनों का हास्यास्पद युद्ध देख रहा था। तभी रिंजो का यंत्र पैर लगने की वजह से थोड़ी दूर जा गिरा और उससे एक तेज ‘बीप-बीप’ की आवाज आयी। यह सुन दोनो बौने लड़ना छोड़ तुरंत उठकर खड़े हो गये।

“रिंजो मेरे प्यारे भाई... तुम्हें कहीं चोट तो नहीं आयी ?” शिंजो ने एका एक सुर बदलते हुए कहा।

“नहीं मेरे प्यारे छोटे भाई। मुझे कहीं चोट नहीं आयी, पर अगर तुम्हें आयी हो तो अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को माफ कर देना।” रिंजो ने शिंजो को गले से लगाते हुए कहा।

व्योम को दोनो बौनों का यह प्रवृति समझ में नहीं आयी, पर उसे दो नों बौनों का कैरेक्टर बड़ा अच्छा लगा।

अब रिंजो ने यंत्र को जमीन से उठाते हुए कहा- “अरे बाप रे... इस गुप्त शक्ति के सिग्नल की स्ट्रेंथ तो देखो। आज तक हमें कभी इतनी ताकतवर शक्ति नहीं मिली?”

शिंजो भी उस यंत्र की तरफ देखते हुए बोला- “चलो भाई फिर जल्दी से चलकर उस गुप्त शक्ति पर अपना अधिकार कर लेते हैं।”

यह कहकर दोनों बौने उस यंत्र को उठा कर एक दिशा की ओर चल दिये, पर जैसे ही वह दोनों बौने व्योम के पेड़ के नीचे से निकले, ऊपर से व्योम रिंजो के सिर पर कूद गया।

चींटी जैसे व्योम के कूदने से रिंजो को कोई अहसास भी नहीं हुआ। व्योम ने कसकर रिंजो के सिर पर लगी टोपी को पकड़ लिया।

दोनों बौने यंत्र को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। कुछ ही देर में वह दोनों बौने एक छोटी सी झील के पास पहुंचकर रुक गये।

“गुप्त शक्ति के सिग्नल तो इस झील के अंदर से आ रहे हैं।” रिंजो ने शिंजो की ओर देखते हुए कहा- “अब क्या करें?”

“करना क्या है, झील के अंदर जाओ और उस गुप्त शक्ति को बाहर लेकर आ जाओ।” शिंजो ने अपना ज्ञान बांटते हुए कहा।

“अच्छा... तो मैं झील के अंदर जाऊं और तू बाहर रहकर मेरा इंतजार करेगा। फिर जब मैं गुप्त शक्ति को लेकर आऊं, तो तू किरीट को बताएगा कि यह शक्ति तूने मेरे साथ मिलकर बनाई है।” रिंजो ने शिंजो को
घूरते हुए कहा- “मतलब जान मैं अपनी संकट में डालूं और मजा तू भी बराबर का लेगा।”

“पानी में घुसना, जान संकट में डालना होता है क्या?” शिंजो गुर्राया- “अरे मैं तो बाहर खड़े रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“तो फिर एक काम कर तू चला जा झील के अंदर।” रिंजो ने दुष्टता से भरी मुस्कान बिखेरते हुए कहा- “मैं बाहर रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“म....म...मैं क्यों जाऊं?” शिंजो यह सुनकर घबरा गया- “तू चला जा ना भाई, मैं 70 प्रतिशत उस अविष्कार का क्रेडिट तुझे ही दिलवा दूंगा। तू तो जानता है ना कि मैं पानी से कितना डरता हूं, मैं तो पिछले 50 वर्षों
से नहाया भी नहीं हूं।”

“तो मैं कौनसा रोज नहाता हूं, किरीट के डर से रोज बाथरुम में घुसता तो हूं, पर पानी गिरा कर बाहर आ जाता हूं।“ रिंजो ने भी घबराते हुए कहा- “भाई बताना मत मेरा यह राज किसी को।”

“अरे शांत हो जा, मैं किसी को नहीं बताऊंगा।” शिंजो ने डरकर झील को देखते हुए कहा- “पर अब ये बताओ कि फिर इस झील से उस गुप्त शक्ति को कैसे प्राप्त करेंगे?”

“मेरे हिसाब से हमें इस शक्ति को भूल जाना चाहिये और किसी दूसरी शक्ति को ढूंढना चाहिये। जो पहाड़, बर्फ, ज्वालामुखी कहीं भी हो, पर पानी में ना हो।” रिंजो ने हथियार डालते हुए कहा- “और मेरे प्यारे
भाई, मैंने तुम्हें जो भी अपशब्द कहे, उसके लिये अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को दिल से माफ कर देना।”

“भैया मैंने भी आपका दिल दुखाया है, चलो आज मैं आपके सोते समय पैर भी दबाऊंगा।” शिंजो ने भी माफी मांगते हुए कहा और वहां से जाने लगे।

उन्हें वहां से जाता देखकर व्योम रिंजों की टोपी से वहीं कूद गया।

दोनों बौने एक दूसरे के गले में हाथ डालकर वहां से चले गये। व्योम इतने कॉमेडी कैरेक्टर्स को देखकर मुस्कुरा उठा।

बौनों के जाने के बाद व्योम ने एक बार उस झील को देखा और फिर उसमें छलांग लगा दी।
जल्दी-जल्दी में व्योम यह भूल गया कि उसका आकार अभी छोटा ही है।

पानी में कूदते ही एक विशाल मछली को देख, व्योम को अपनी भूल का अहसास हो गया।
वह पलटकर तेजी से वापस किनारे की ओर चला, तभी व्योम को अपने पीछे एक 12 इंच बड़ा
समुद्री घोड़ा दिखाई दिया।

वह समुद्री घोड़ा वैसे तो सिर्फ 12 इंच ही बड़ा था, पर व्योम के चींटी जैसे आकार में होने के कारण वह व्योम को अपने से 100 गुना ज्यादा बड़ा नजर आ रहा था।

इससे पहले कि व्योम अपने बचाव में कुछ कर पाता, समुद्री घोड़े ने अपने हाथ में पकड़ी एक सुनहरी रस्सी से व्योम को बांध लिया और झील की तली की ओर लेकर चल दिया।

झील के पानी में कुछ मछलियाँ और समद्री घोड़े ही दिखाई दे रहे थे। व्योम पानी में सिर्फ 25 मिनट तक ही साँस ले सकता था, इसलिये उसे थोड़ा डर लग रहा था कि कहीं वह इतने समय में झील से बाहर नहीं
निकल पाया तो क्या होगा?

समुद्री घोड़ा व्योम को लेकर, अब झील की तली में पहुंच गया। तभी व्योम को पानी के अंदर कोई चमकती हुई चीज दिखाई दी। समुद्री घोड़ा उसी ओर जा रहा था।

कुछ ही देर में व्योम को वह सुनहरी चीज बिल्कुल साफ दिखाई देने लगी थी। वह एक सुनहरी धातु का बना पंचशूल था, जिस पर सूर्य की एक आकृति बनी दिखाई दे रही थी।

समुद्री घोड़े ने पंचशूल के पास पहुंचकर व्योम के हाथ की रस्सी खोल दी। व्योम को समुद्री घोड़े की यह हरकत समझ में नहीं आयी, पर वह इतना जरुर जान गया कि यही वह गुप्त शक्ति है, जिसके बारे में दोनो बौने बात कर रहे थे।

समुद्री घोड़ा व्योम को वहीं छोड़कर, स्वयं पानी में भागकर कहीं गायब हो गया। व्योम यह नहीं समझ पा रहा था कि अगर यह कोई शक्ति है? और समुद्री घोड़ा इसकी रक्षा करता है, तो वह व्योम को इस शक्ति के पास क्यों छोड़ गया?

तभी व्योम को उस पंचशूल से कुछ वाइब्रेशन जैसी तरंगे निकलती दिखाईं दीं। उन तरंगों में एक प्रकार की गूंज थी।

व्योम इस शब्द की ध्वनि को पहचानता था। यह ध्वनि ‘ओऽम्’ शब्द की थी।

व्योम ने धीरे से पहले, अपनी जेब से एक हरे रंग का फल निकाला और उस फल को अपने मुंह में रख लिया।

फल को चबाते ही व्योम का शरीर अपने वास्तविक आकार में आ गया। अब व्योम उस पंचशूल को उठाने के लिये आगे बढ़ा।

व्योम ने अपने दाहिने हाथ से जैसे ही उस पंचशूल को छुआ, उसके शरीर को हजारों वोल्ट के बराबर का, करंट जैसा झटका लगा। यह झटका इतना तेज था कि व्योम उछलकर झील से बाहर आ गिरा।

व्योम को असहनीय दर्द का अहसास हो रहा था। व्योम ने कराहते हुए एक नजर अपने शरीर पर मारी। व्योम का पूरा शरीर झुलस गया था। कई जगह से फटा हुआ मांस बाहर झांक रहा था।

उस पंचशूल से निकली ऊर्जा ने व्योम के शरीर के चिथड़े उड़ा दिये थे, पता नहीं वह कौन सी शक्ति थी, जिसने व्योम को अभी तक जिंदा रखा था।

एक पल में व्योम समझ गया कि अब उसका अंत निश्चित है। उसकी आँखों के सामने अपने परिवार के सदस्यों के चेहरे एक-एक कर घूमने लगे।

व्योम की आँखों से आँसू भी नहीं निकल पा रहे थे, शायद उसे भी उस असीम ऊर्जा ने सोख लिया था ?

धीरे-धीरे व्योम निढाल हो कर वहीं लुढ़क गया। अब व्योम के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी।
तभी आसमान में एक जोर की गड़गड़ा हट हुई। ऐसा लगा जैसे कोई विशालकाय वस्तु सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकराई हो।

कुछ ही पलों में आसमान से एक बूंद टपकी और वह व्योम के खुले मुंह में प्रवेश कर गयी।
व्योम को एक झटका लगा और उसकी साँसें पुनः चलने लगीं।

जी हाँ, यह बूंद और कुछ नहीं, वही गुरुत्व शक्ति की बूंद थी, जो लुफासा और हनुका के लड़ते समय सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकरा कर नीचे गिर गयी थी।

धीरे-धीरे गुरुत्व शक्ति ने अपना चमत्कार दिखाना शुरु कर दिया। व्योम के शरीर पर उत्पन्न हुये सभी घाव तेजी से भर रहे थे।

कुछ ही देर में व्योम ने कराह कर अपनी आँखें खोल दीं। कुछ देर तक व्योम को कुछ समझ नहीं आया? फिर उसने घबरा कर अपने शरीर की ओर देखा।
इस समय उसके शरीर पर एक भी घाव नजर नहीं आ रहा था। व्योम उठकर खड़ा हो गया और अपने चारों ओर देखने लगा। पर उसे कोई वहां नजर नहीं आया ?

इस समय व्योम को अपने शरीर में एक जबरदस्त शक्ति का अहसास हो रहा था। अब व्योम फिर से झील के पास आकर खड़ा हो गया। व्योम को लगा कि जरुर पंचशूल ने ही उसे ठीक किया है क्यों कि और कोई
चमत्कारी शक्ति तो आसपास है नहीं।

यह सोचकर व्योम ने वापस से झील में छलांग लगा दी। थोड़ी ही देर में वह एक बार फिर पंचशूल के पास था। व्योम ने फिर एक बार अपना हाथ आगे को बढ़ाया और पंचशूल को पकड़ लिया। इस बार व्योम को पंचशूल पकड़ने पर एक शीतल अहसास हुआ।

व्योम मुस्कुराया और पंचशूल लेकर झील से बाहर आ गया। मगर झील से निकलते ही पंचशूल हवा में गायब हो गया।

व्योम घबरा कर अपने चारो ओर देखने लगा, पर पंचशूल कहीं नहीं था। तभी व्योम की निगाह अपनी दाहिने हाथ की कलाई की ओर गयी।

व्योम की कलाई पर अब एक सुनहरे रंग का सूर्य का टैटू चमक रहा था। व्योम समझ गया कि वह शक्ति कहीं गई नहीं है, वह अब भी उसके पास है और वह भी अदृश्य रुप में।

व्योम के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आयी और वह पुनः आगे की ओर बढ़ गया।

जारी रहेगा__________
✍️
बहुत ही जबरदस्त लाजवाब और अद्भुत मनमोहक रोमांचक अपडेट है भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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महाशक्ति (
11 जनवरी 2002, शुक्रवार, 15:10, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

व्योम को चलते हुए 1 दिन से भी ज्यादा हो चुका था। पिछली रात व्योम ने एक पेड़ पर सोकर गुजारी थी।
एक ही बात बेहतर थी कि अभी तक उसे किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं मिला था।

अकेला होने की वजह से व्योम को उस जंगल में काफी उलझन महसूस हो रही थी, फिर भी वह आगे बढ़ रहा था।

जिस मूर्ति को उसने पहाड़ से चढ़कर देखा था, व्योम को लगा था कि 2 घंटे में ही वह उस मूर्ति तक पहुंच जायेगा, पर जंगल के टेढ़े-मेढ़े रा स्ते की वजह से व्योम को अभी तक उस मूर्ति के दर्शन नहीं हुए थे।
वैसे वह जंगल इतना खूबसूरत था कि व्योम को थकान का अहसास नहीं हो रहा था। खाने-पीने की भी बहुत सारी चीजें आस-पा स थीं।

“मैं यहां ‘सुप्रीम’ के लोगों को बचाने आया था, पर मैं स्वयं ही इस रहस्यमय द्वीप पर फंस गया। पता नहीं मैं अब कभी अपने घर पहुंच भी पाऊंगा कि नहीं ?” व्योम मन ही मन बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था-
“ऊपर से इस द्वीप पर भी पता नहीं कैसे-कैसे रहस्य छुपे हुए हैं?”

तभी व्योम को उन लाल और हरे फलों का ध्यान आया जिसे खाकर वह हाथी, चूहे जितने आकार का हो गया था। यह सोच व्योम ने लाल रंग के फल को जेब से निकालकर देखा।

“देखने में तो साधारण फल जैसा ही लग रहा है। पता नहीं इस फल का खाने में स्वाद कैसा होगा ?”
तभी व्योम के दिमाग में एक खुराफात आयी।

“क्यों ना उस लाल फल को खाकर देखूं? आखिर पता तो चले कि चूहे जितना बनकर कितना मजा आता है? पर कहीं मैं हमेशा के लिये उतना ही बड़ा रह गया तो फिर क्या होगा ?” व्योम के दिमाग में यह सोचकर उथल-पुथल होने लगी।

आखिरकार दिल को कड़ाकर व्योम ने उस फल को खाने का निर्णय कर ही लिया।

“ठीक है, खा ही लेता हूं फल को, पर.... पर इसे किसी पेड़ पर बैठ कर खाना होगा, नहीं तो छोटा होते ही कोई पक्षी मुझ पर हमला ना कर दे?”

यह सोच व्योम एक ऊंचे से पेड़ की डाल पर चढ़कर बैठ गया। व्योम ने अब उस लाल फल को अपने वस्त्रों पर रगड़ कर साफ किया और फिर अपने मुंह में रख लिया।

व्योम ने उस फल को चबाया, उस फल का स्वाद खट्टा था। उसमें कोई बीज भी नहीं था।
तभी व्योम के शरीर को एक झटका लगा। अब उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह आसमान की ऊंचाइयों से नीचे गिर रहा हो।

उसके आसपास के पेड़-पौधे बड़े होते दिखने लगे, जबकि असल में व्योम के छोटे हो जाने की वजह से उसे ऐसा महसूस हो रहा था। कुछ ही देर में व्योम का आकार एक चींटी के बराबर का हो गया।

“अरे ये तो मैं चूहे से भी छोटा हो गया।” व्योम ने स्वयं को देखते हुए सोचा- “अच्छा वह हाथी बहुत बड़ा था, इसलिये वह चूहे के आकार का हो गया था। इंसान के शरीर को यह फल चींटी जितना छोटा कर देता है।”

व्योम ने अब अपनी जेब में पड़े सभी वस्तुओं को देखा, वह सारी वस्तुएं भी व्योम के अनुपात में ही छोटी हो गयीं थीं।

“यह कैसे सम्भव हो सकता है, इस फल को तो केवल मेरा शरीर छोटा करना चाहिये था, फिर मेरे कपड़े और जेब में रखा सामान कैसे छोटा हो गया?”

काफी देर सोचने के बाद भी जब व्योम को कुछ समझ नहीं आया तो वह सोचना छोड़ अपने इस सूक्ष्म रुप का आनन्द उठाने लगा।

तभी व्योम को कुछ अजीब सी खरखराने की आवाज सुनाई दी। व्योम ने अपने चारो ओर देखा। तभी व्योम की नजर अपनी डाल पर सामने से आ रही एक लाल रंग वाली चींटी पर पड़ी।

चींटी ने भी अब उसे देख लिया था। वह खूंखार नजरों से व्योम को घूर रही थी। यह देखकर व्योम के होश उड़ गये।
चींटी अब व्योम की ओर बढ़ने लगी थी। व्योम यह देखकर डाल के किनारे की ओर भागा। चींटी भी तेजी से व्योम के पीछे लपकी।

व्योम भागते हुए डाल के बिल्कुल किनारे तक पहुंच गया। आगे अब रास्ता खत्म हो गया था। चींटी अभी व्योम से कुछ दूरी पर थी।

व्योम ने अपनी नजरें ऊपर नीचे दौड़ाईं। व्योम को अपने ऊपर कुछ ऊंचाई पर एक दूसरी डाल दिखाई दी। पर वह डाल इतनी ऊंची थी कि व्योम उछलकर उस डाल तक नहीं पहुंच सकता था।

तभी व्योम का ध्यान अपने बैग में रखी नायलान की रस्सी की ओर गया। व्योम ने जल्दी से बैग की जिप खोलकर उसमें से रस्सी का गुच्छा निकाल लिया और उसका एक किनारा ऊपर की ओर उछाल दिया।

एक बार में ही रस्सी का वह सिरा एक डाल के ऊपर से होकर वापस व्योम के हाथ में आ गया।
व्योम ने रस्सी के दोनों सिरों को जोर से पकड़ा और उछलकर हवा में लहराते हुए, दूसरी पेड़ की डाल पर पहुंच गया।

चींटी को उम्मीद नहीं थी कि उसका शिकार इतनी आसानी से उसके हाथ से निकल जायेगा।
चींटी ने घूरकर एक बार व्योम को देखा और फिर दूसरे शिकार की खोज में चली गयी।

चींटी के जाने के बाद व्योम ने राहत की साँस ली। व्योम ने वापस रस्सी का गुच्छा बना कर अपने बैग में डाला और वहीं पेड़ की डाल पर बैठकर जंगल का नजारा देखने लगा। तभी व्योम को सूखे पत्ते के खड़कने की आवाज सुनाई दी।

व्योम ने नीचे झांककर देखा। वह 2 बौने थे, जो आकर उस पेड़ के नीचे खड़े हो गये थे।
उनमें से एक बौने के हाथ में एक छोटा सा लकड़ी का यंत्र था, जिसमें एक लाल रंग की लाइट लगी थी और वह यंत्र ‘बीप-बीप’ की आवाज कर रहा था।

वह आपस में बातें कर रहे थे।

“रिंजो, तू यह यंत्र लेकर मुझे बेकार में ही जंगल में घसीट रहा है, यहां नहीं मिलने वाली कोई शक्ति तुझे?” काली दाढ़ी वाले बौने ने कहा।

“तुझे तो कुछ मालूम ही नहीं है शिंजो ?” रिंजो ने कहा- “पिछली बार भी वह धरा शक्ति का कण मैंने ढूंढा था। अगर मैंने वह नहीं ढूंढा होता, तो हम जोडियाक वॉच कभी ना बना पाते।”

“ढूंढा नहीं चुराया था तूने।” शिंजो ने गुस्सा कर कहा।

“अरे चुप कर! अगर किसी ने सुन लिया तो हमारी रही सही इज्जत भी चली जायेगी।” रिंजो ने मुंह पर उंगली रख, शिंजो को चुप कराते हुए कहा- “वैसे भी उस अविष्कार का क्रेडिट हम दोनों ने ही लिया था।
अगर किरीट को पता चला तो वह हम दोनों की खाल उतार लेंगे।”

“ठीक है-ठीक है।” शिंजो भी बात की गम्भीरता को समझ चुप हो गया।

“किरीट और कलाट, हमें बहुत अच्छा वैज्ञानिक समझतें हैं, अब वो क्या जानें कि हम लोग छिपी हुई गुप्त शक्तियों को इस यंत्र के माध्यम से ढूंढते हैं? और फिर उसे अपने द्वारा बनाये किसी इलेक्ट्रानिक यंत्र में फिट करके, अपना अविष्कार बताकर उन्हें दिखा देते हैं।” रिंजो ने हंसते हुए कहा।

यह सुन शिंजो भी हंसते हुए बोला- “चाहे जो हो, पर बुड्ढे तेरी खोपड़ी बहुत कमाल की है।”

“तूने फिर मुझे बुड्ढा बोला।” रिंजो ने गुस्साते हुए कहा- “मैं सिर्फ तेरे से 1 मिनट ही बड़ा हूं।”

“पर तेरी दाढ़ी तो पककर भूरी हो गयी है, मेरी तो अभी भी काली-काली है।” शिंजो ने उछल-उछल कर अपनी काली दाढ़ी को दिखाते हुए, रिंजो को चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा।

यह सुन रिंजो गुस्से से पागल हो गया। उसने आगे बढ़कर शिंजो को पटक दिया और उसके सीने पर चढ़कर उसकी दाढ़ी नोचने लगा- “चल आज दाढ़ी का किस्सा ही खत्म करते हैं। ना रहेगी दाढ़ी....ना तू मुझे कभी चिढ़ायेगा।”

“अरे कमीने रिंजो... छोड़ मेरी दाढ़ी। अगर मेरी दाढ़ी का एक भी बाल टूटा, तो मैं तेरे सब जगह के बाल नोंच डालूंगा...तू अभी मुझे जानता नहीं है।”

यह कहकर दो नों बौने पटका-पटकी करके लड़ने लगे।

व्योम पेड़ के ऊपर बैठा दोनों बौंनों का हास्यास्पद युद्ध देख रहा था। तभी रिंजो का यंत्र पैर लगने की वजह से थोड़ी दूर जा गिरा और उससे एक तेज ‘बीप-बीप’ की आवाज आयी। यह सुन दोनो बौने लड़ना छोड़ तुरंत उठकर खड़े हो गये।

“रिंजो मेरे प्यारे भाई... तुम्हें कहीं चोट तो नहीं आयी ?” शिंजो ने एका एक सुर बदलते हुए कहा।

“नहीं मेरे प्यारे छोटे भाई। मुझे कहीं चोट नहीं आयी, पर अगर तुम्हें आयी हो तो अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को माफ कर देना।” रिंजो ने शिंजो को गले से लगाते हुए कहा।

व्योम को दोनो बौनों का यह प्रवृति समझ में नहीं आयी, पर उसे दो नों बौनों का कैरेक्टर बड़ा अच्छा लगा।

अब रिंजो ने यंत्र को जमीन से उठाते हुए कहा- “अरे बाप रे... इस गुप्त शक्ति के सिग्नल की स्ट्रेंथ तो देखो। आज तक हमें कभी इतनी ताकतवर शक्ति नहीं मिली?”

शिंजो भी उस यंत्र की तरफ देखते हुए बोला- “चलो भाई फिर जल्दी से चलकर उस गुप्त शक्ति पर अपना अधिकार कर लेते हैं।”

यह कहकर दोनों बौने उस यंत्र को उठा कर एक दिशा की ओर चल दिये, पर जैसे ही वह दोनों बौने व्योम के पेड़ के नीचे से निकले, ऊपर से व्योम रिंजो के सिर पर कूद गया।

चींटी जैसे व्योम के कूदने से रिंजो को कोई अहसास भी नहीं हुआ। व्योम ने कसकर रिंजो के सिर पर लगी टोपी को पकड़ लिया।

दोनों बौने यंत्र को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। कुछ ही देर में वह दोनों बौने एक छोटी सी झील के पास पहुंचकर रुक गये।

“गुप्त शक्ति के सिग्नल तो इस झील के अंदर से आ रहे हैं।” रिंजो ने शिंजो की ओर देखते हुए कहा- “अब क्या करें?”

“करना क्या है, झील के अंदर जाओ और उस गुप्त शक्ति को बाहर लेकर आ जाओ।” शिंजो ने अपना ज्ञान बांटते हुए कहा।

“अच्छा... तो मैं झील के अंदर जाऊं और तू बाहर रहकर मेरा इंतजार करेगा। फिर जब मैं गुप्त शक्ति को लेकर आऊं, तो तू किरीट को बताएगा कि यह शक्ति तूने मेरे साथ मिलकर बनाई है।” रिंजो ने शिंजो को
घूरते हुए कहा- “मतलब जान मैं अपनी संकट में डालूं और मजा तू भी बराबर का लेगा।”

“पानी में घुसना, जान संकट में डालना होता है क्या?” शिंजो गुर्राया- “अरे मैं तो बाहर खड़े रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“तो फिर एक काम कर तू चला जा झील के अंदर।” रिंजो ने दुष्टता से भरी मुस्कान बिखेरते हुए कहा- “मैं बाहर रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“म....म...मैं क्यों जाऊं?” शिंजो यह सुनकर घबरा गया- “तू चला जा ना भाई, मैं 70 प्रतिशत उस अविष्कार का क्रेडिट तुझे ही दिलवा दूंगा। तू तो जानता है ना कि मैं पानी से कितना डरता हूं, मैं तो पिछले 50 वर्षों
से नहाया भी नहीं हूं।”

“तो मैं कौनसा रोज नहाता हूं, किरीट के डर से रोज बाथरुम में घुसता तो हूं, पर पानी गिरा कर बाहर आ जाता हूं।“ रिंजो ने भी घबराते हुए कहा- “भाई बताना मत मेरा यह राज किसी को।”

“अरे शांत हो जा, मैं किसी को नहीं बताऊंगा।” शिंजो ने डरकर झील को देखते हुए कहा- “पर अब ये बताओ कि फिर इस झील से उस गुप्त शक्ति को कैसे प्राप्त करेंगे?”

“मेरे हिसाब से हमें इस शक्ति को भूल जाना चाहिये और किसी दूसरी शक्ति को ढूंढना चाहिये। जो पहाड़, बर्फ, ज्वालामुखी कहीं भी हो, पर पानी में ना हो।” रिंजो ने हथियार डालते हुए कहा- “और मेरे प्यारे
भाई, मैंने तुम्हें जो भी अपशब्द कहे, उसके लिये अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को दिल से माफ कर देना।”

“भैया मैंने भी आपका दिल दुखाया है, चलो आज मैं आपके सोते समय पैर भी दबाऊंगा।” शिंजो ने भी माफी मांगते हुए कहा और वहां से जाने लगे।

उन्हें वहां से जाता देखकर व्योम रिंजों की टोपी से वहीं कूद गया।

दोनों बौने एक दूसरे के गले में हाथ डालकर वहां से चले गये। व्योम इतने कॉमेडी कैरेक्टर्स को देखकर मुस्कुरा उठा।

बौनों के जाने के बाद व्योम ने एक बार उस झील को देखा और फिर उसमें छलांग लगा दी।
जल्दी-जल्दी में व्योम यह भूल गया कि उसका आकार अभी छोटा ही है।

पानी में कूदते ही एक विशाल मछली को देख, व्योम को अपनी भूल का अहसास हो गया।
वह पलटकर तेजी से वापस किनारे की ओर चला, तभी व्योम को अपने पीछे एक 12 इंच बड़ा
समुद्री घोड़ा दिखाई दिया।

वह समुद्री घोड़ा वैसे तो सिर्फ 12 इंच ही बड़ा था, पर व्योम के चींटी जैसे आकार में होने के कारण वह व्योम को अपने से 100 गुना ज्यादा बड़ा नजर आ रहा था।

इससे पहले कि व्योम अपने बचाव में कुछ कर पाता, समुद्री घोड़े ने अपने हाथ में पकड़ी एक सुनहरी रस्सी से व्योम को बांध लिया और झील की तली की ओर लेकर चल दिया।

झील के पानी में कुछ मछलियाँ और समद्री घोड़े ही दिखाई दे रहे थे। व्योम पानी में सिर्फ 25 मिनट तक ही साँस ले सकता था, इसलिये उसे थोड़ा डर लग रहा था कि कहीं वह इतने समय में झील से बाहर नहीं
निकल पाया तो क्या होगा?

समुद्री घोड़ा व्योम को लेकर, अब झील की तली में पहुंच गया। तभी व्योम को पानी के अंदर कोई चमकती हुई चीज दिखाई दी। समुद्री घोड़ा उसी ओर जा रहा था।

कुछ ही देर में व्योम को वह सुनहरी चीज बिल्कुल साफ दिखाई देने लगी थी। वह एक सुनहरी धातु का बना पंचशूल था, जिस पर सूर्य की एक आकृति बनी दिखाई दे रही थी।

समुद्री घोड़े ने पंचशूल के पास पहुंचकर व्योम के हाथ की रस्सी खोल दी। व्योम को समुद्री घोड़े की यह हरकत समझ में नहीं आयी, पर वह इतना जरुर जान गया कि यही वह गुप्त शक्ति है, जिसके बारे में दोनो बौने बात कर रहे थे।

समुद्री घोड़ा व्योम को वहीं छोड़कर, स्वयं पानी में भागकर कहीं गायब हो गया। व्योम यह नहीं समझ पा रहा था कि अगर यह कोई शक्ति है? और समुद्री घोड़ा इसकी रक्षा करता है, तो वह व्योम को इस शक्ति के पास क्यों छोड़ गया?

तभी व्योम को उस पंचशूल से कुछ वाइब्रेशन जैसी तरंगे निकलती दिखाईं दीं। उन तरंगों में एक प्रकार की गूंज थी।

व्योम इस शब्द की ध्वनि को पहचानता था। यह ध्वनि ‘ओऽम्’ शब्द की थी।

व्योम ने धीरे से पहले, अपनी जेब से एक हरे रंग का फल निकाला और उस फल को अपने मुंह में रख लिया।

फल को चबाते ही व्योम का शरीर अपने वास्तविक आकार में आ गया। अब व्योम उस पंचशूल को उठाने के लिये आगे बढ़ा।

व्योम ने अपने दाहिने हाथ से जैसे ही उस पंचशूल को छुआ, उसके शरीर को हजारों वोल्ट के बराबर का, करंट जैसा झटका लगा। यह झटका इतना तेज था कि व्योम उछलकर झील से बाहर आ गिरा।

व्योम को असहनीय दर्द का अहसास हो रहा था। व्योम ने कराहते हुए एक नजर अपने शरीर पर मारी। व्योम का पूरा शरीर झुलस गया था। कई जगह से फटा हुआ मांस बाहर झांक रहा था।

उस पंचशूल से निकली ऊर्जा ने व्योम के शरीर के चिथड़े उड़ा दिये थे, पता नहीं वह कौन सी शक्ति थी, जिसने व्योम को अभी तक जिंदा रखा था।

एक पल में व्योम समझ गया कि अब उसका अंत निश्चित है। उसकी आँखों के सामने अपने परिवार के सदस्यों के चेहरे एक-एक कर घूमने लगे।

व्योम की आँखों से आँसू भी नहीं निकल पा रहे थे, शायद उसे भी उस असीम ऊर्जा ने सोख लिया था ?

धीरे-धीरे व्योम निढाल हो कर वहीं लुढ़क गया। अब व्योम के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी।
तभी आसमान में एक जोर की गड़गड़ा हट हुई। ऐसा लगा जैसे कोई विशालकाय वस्तु सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकराई हो।

कुछ ही पलों में आसमान से एक बूंद टपकी और वह व्योम के खुले मुंह में प्रवेश कर गयी।
व्योम को एक झटका लगा और उसकी साँसें पुनः चलने लगीं।

जी हाँ, यह बूंद और कुछ नहीं, वही गुरुत्व शक्ति की बूंद थी, जो लुफासा और हनुका के लड़ते समय सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकरा कर नीचे गिर गयी थी।

धीरे-धीरे गुरुत्व शक्ति ने अपना चमत्कार दिखाना शुरु कर दिया। व्योम के शरीर पर उत्पन्न हुये सभी घाव तेजी से भर रहे थे।

कुछ ही देर में व्योम ने कराह कर अपनी आँखें खोल दीं। कुछ देर तक व्योम को कुछ समझ नहीं आया? फिर उसने घबरा कर अपने शरीर की ओर देखा।
इस समय उसके शरीर पर एक भी घाव नजर नहीं आ रहा था। व्योम उठकर खड़ा हो गया और अपने चारों ओर देखने लगा। पर उसे कोई वहां नजर नहीं आया ?

इस समय व्योम को अपने शरीर में एक जबरदस्त शक्ति का अहसास हो रहा था। अब व्योम फिर से झील के पास आकर खड़ा हो गया। व्योम को लगा कि जरुर पंचशूल ने ही उसे ठीक किया है क्यों कि और कोई
चमत्कारी शक्ति तो आसपास है नहीं।

यह सोचकर व्योम ने वापस से झील में छलांग लगा दी। थोड़ी ही देर में वह एक बार फिर पंचशूल के पास था। व्योम ने फिर एक बार अपना हाथ आगे को बढ़ाया और पंचशूल को पकड़ लिया। इस बार व्योम को पंचशूल पकड़ने पर एक शीतल अहसास हुआ।

व्योम मुस्कुराया और पंचशूल लेकर झील से बाहर आ गया। मगर झील से निकलते ही पंचशूल हवा में गायब हो गया।

व्योम घबरा कर अपने चारो ओर देखने लगा, पर पंचशूल कहीं नहीं था। तभी व्योम की निगाह अपनी दाहिने हाथ की कलाई की ओर गयी।

व्योम की कलाई पर अब एक सुनहरे रंग का सूर्य का टैटू चमक रहा था। व्योम समझ गया कि वह शक्ति कहीं गई नहीं है, वह अब भी उसके पास है और वह भी अदृश्य रुप में।

व्योम के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आयी और वह पुनः आगे की ओर बढ़ गया।

जारी रहेगा__________
✍️
बहुत ही बढ़िया अपडेट👌👌👌
 

Dhakad boy

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#113.

चैपटर-3: स्पाइनो-सोरस
(
11 जनवरी 2002, शुक्रवार, 14:45, मायावन, अराका द्वीप)

सुयश की टीम में सुयश को मिला कर अब सिर्फ 6 लोग ही बचे थे।

घास का मैदान पार करके अब सभी पहाड़ी रास्ते पर आ गये थे। पहाड़ी पर एक पतली पगडंडी पर इन्हें आगे बढ़ना पड़ रहा था। रास्ते में चढ़ान होने की वजह से सभी के चेहरे थके-थके से लग रहे थे।

एक तो पिछले कुछ दिनों से वह लगातार चल रहे थे, दूसरे उनके साथियों के मरने या फिर बिछड़ जाने के कारण उनके जोड़े भी टूट गये थे, जिससे उनका मनोबल कुछ टूट सा गया था।

एक शैफाली थी, जो अभी भी सबको बीच-बीच में कुछ ना कुछ कहकर उनका हौसला बढ़ाये हुए थी।
अलबर्ट को अपनी उम्र के कारण सबसे ज्यादा तकलीफ हो रही थी। उन्होंने शायद ही कभी अपनी जिंदगी में इतना चला होगा।

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पोसाईडन की मूर्ति कभी-कभी किसी मोड़ पर, दूर दिखाई दे जाती थी।

पथरीला रास्ता होने के कारण हरियाली भी थोड़ी कम हो गयी थी, जिसकी वजह से सभी को दिन में गर्मी भी ज्यादा लग रही थी। ये तो भला हो कि जंगल में पर्याप्त पानी मिल जाने से, सभी ने अपनी बोतलें पूरी भर ली थीं नहीं तो इतनी गर्मी में इन सबका एक कदम भी बढ़ा पाना मुश्किल हो जाता।

सभी अब पहाड़ की चोटी पर पहुंच गये थे। यहां पर बाकी रास्ते की अपेक्षा जगह कुछ ज्यादा थी। एक तरफ कुछ ऊंची-ऊंची चट्टानें थी, तो दूसरी ओर गहरी खाईं। गहरी खाईं की ओर एक विशाल छायादार पेड़ लगा था, जिसे देखकर अलबर्ट से रहा ना गया और वह बोल उठा-

“कैप्टेन! कुछ देर आराम कर लिया जाये। थकान बहुत ज्यादा हो रही है, अब एक कदम भी आगे बढ़ना मुश्किल लग रहा है।”

“आप ठीक कह रहे हैं प्रोफेसर।” सुयश ने भी सभी पर नजर डालते हुए कहा- “सभी थक गये हैं। हम कुछ देर यहां पर आराम करेंगे फिर आगे बढ़ेंगे। तब तक कुछ खा-पी भी लेते हैं।”

सुयश की बात सुन सबकी जान में जान आयी। सब वहीं पेड़ के नीचे एक पत्थर पर बैठ गये। क्रिस्टी ने बैग से कुछ फल निकालकर सभी में बांट दिये।

सबने फल खा के पेट भर पानी पिया और 10 मिनट आराम करने के लिये उसी पेड़ के नीचे लेट गये।
सुयश सबको लेटे देख एक ऊंची सी चट्टान की ओर चल दिया।

सुयश उस ऊंची सी चट्टान पर चढ़कर दूर-दूर तक देखने की कोशिश करने लगा।
तभी सुयश का पैर फिसल गया और वह जमीन पर गिर पड़ा। भला हो कि खाईं थोड़ी दूर थी, नहीं तो सुयश खाईं में भी गिर सकता था।

सुयश धीरे से खड़ा हो कर वापस नीचे दूर-दूर तक फैली हुई घाटी को देखने लगा। पर सुयश के फिसलने से एक बड़ा सा पत्थर पहाड़ से नीचे की ओर गिर गया।


वह पत्थर लुढ़कता हुआ उस पहाड़ के दूसरी ओर के रास्ते में सो रहे एक विशाल डायनासोर पर गिरा।
पत्थर के शरीर पर लगते ही डायना सोर ने अपनी आँखें खोल दी।

उसने एक क्षण के लिये अपनी नाक को ऊपर उठा कर सूंघा और उठकर खड़ा हो गया।

सुयश का ध्यान इस समय दूसरी ओर था, तभी सुयश के पीछे एक विशालकाय 2 आँखें दिखाई दीं। वह आँखें अकेली नहीं थीं, उनके साथ भारी-भरकम शरीर लिये वही डायनोसोर भी था।

हांलाकि डायनोसोर पहाड़ के दूसरी ओर था, फिर भी उसकी ऊंचाई अधिक होने के कारण वह जेनिथ को दिखाई दे गया।

डायनासोर को देखकर जेनिथ के मुंह से चीख निकल गयी। जेनिथ की चीख सुन सभी का ध्यान उस चट्टान की ओर गया, जिस पर सुयश इस समय खड़ा था।

अब सभी चीखकर सुयश को वहां से भागने के लिये बोलने लगे। सभी को चीखते देख सुयश पीछे पलटा। पीछे पलटते ही उसके सारे रोंगटे खड़े हो गये। डायनासोर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसी को घूर रहा था।

सुयश ने धीरे से डायनासोर को देखते हुए अपने कदमों को पीछे करने की कोशिश की। तभी डायनासोर के मुंह से एक तेज गुर्राहट निकली, अब उसने अपने बड़े-बड़े दाँत दिखाकर सुयश को डराने की कोशिश की।

उसका एक दाँत ही सुयश से बड़ा दिख रहा था। डायनासोर ने अपना मुंह तेजी से सुयश की ओर बढ़ाया, पर सुयश पूरी ताकत लगा कर उस चट्टान से कूद गया। डायनोसोर अपने शिकार को भागता देख, दूसरी ओर से उस चट्टान पर चढ़ने की कोशिश करने लगा।

“नक्षत्रा !” जेनिथ ने अपने मन में नक्षत्रा पुकारा- “क्या तुम इस समय कोई मदद करके हमें बचा सकते हो?”

“मैं एक दिन में सिर्फ आधा घंटा ही समय को रोकना सीख पाया हूं।” नक्षत्रा ने कहा- “पर इस आधे घंटे में तुम सबको उठाकर यहां से भाग नहीं सकती। अब रही बात इस डायनासोर की, तो तुम्हें यह बता दूं कि इस डायनासोर को स्पाइनोसोरस कहते हैं। यह सभी डायनासोर का राजा है।

यह उन सबमें सबसे बड़ा भी होता है। यह पानी और जमीन दोनों पर ही शिकार कर सकता है। इसके सूंघने की शक्ति भी बहुत ज्यादा है, इसलिये तुम किसी को कहीं छिपा भी नहीं सकती। अब बची बात इसे मारने की, तो वह भी संभव नहीं है क्यों कि तुम इतने बड़े स्पाइनोसोरस को बिना किसी हथियार के कैसे मार पाओगी? हां अगर तुम सिर्फ स्वयं बचना चाहो तो आधे घंटे में यहां से दूर भाग सकती हो, जिससे यह स्पाइनोसोरस तुम्हारी गंध नहीं सूंघ पायेगा।”

“असंभव!” जेनिथ ने नक्षत्रा से कहा- “मैं यहां से किसी को भी छोड़कर नहीं भागने वाली। तुम एक काम करना नक्षत्रा, फिलहाल जैसे मैं तुम्हें इशारा करुं, तुम बस समय को रोक देना, बाकी मैं स्वयं से देखती हूं
कि इस स्पाइनोसोरस से कैसे निपटना है?”

तब तक सुयश भागकर, बाकी सभी लोगों के पास आकर, दूसरी चट्टान के पीछे छिप गया।

“कैप्टेन!” अलबर्ट ने डरते-डरते कहा- “यह तो स्पाइनोसोरस है। यह तो लाखों वर्ष पहले ही विलुप्त हो गया था। हे भगवान कैसा है यह द्वीप? अब हम इतने बड़े खतरे से कैसे निपटेंगे?”

“शांत हो जा इये प्रोफेसर, नहीं तो वह हमारी आवाज सुन लेगा।” क्रिस्टी ने कहा।

उधर स्पाइनोसोरस चट्टान पर चढ़ने में कामयाब हो गया। अब वह चट्टान के आसपास सुयश को ढूंढने लगा। जेनिथ जानती थी कि ज्यादा देर तक वह छिपे नहीं रह पायेंगे। वह तेजी से इधर-उधर देखते हुए, स्पाइनोसोरस से बचने के लिये अपना दिमाग चला रही थी।

हथियार के नाम पर तौफीक के पास बस एक चाकू बचा था, पर उससे कुछ नहीं होना था।

चट्टान पर चढ़ा स्पाइनोसोरस अब अपनी नाक उठाकर हवा में कुछ सूंघने की कोशिश करने लगा।
कुछ ही देर में स्पाइनोसोरस को उनकी गंध मिल गयी, अब वह तेजी से चट्टान से उतरने की कोशिश करने लगा।

तभी उसके भारी-भरकम शरीर की वजह से एक बड़ा सा पत्थर हवा में उछला और क्रिस्टी की ओर बढ़ा।

“नक्षत्रा ! समय को रोक दो।” जेनिथ ने एक सेकेण्ड से भी कम समय में नक्षत्रा को समय रोकने के लिये कहा।

नक्षत्रा ने समय को रोक दिया। अब जेनिथ के आसपास की हर चीज फ्रीज हो गयी थी। वह पत्थर क्रिस्टी के बिल्कुल सिर के पास पहुंच गया था, अगर नक्षत्रा एक सेकेण्ड की भी देरी कर देता तो क्रिस्टी का सिर फट जाना था।

जेनिथ ने क्रिस्टी को पकड़कर दूसरी ओर खींचा और नक्षत्रा को समय रिलीज करने को बोल दिया।
उछला हुआ पत्थर क्रिस्टी के बगल में आकर गिरा। क्रिस्टी को लगा जैसे उसे किसी ने पकड़कर खींचा हो।

“यहां पर और भी कोई है?” क्रिस्टी ने फुसफुसा कर सभी से कहा- “मुझे अभी किसी ने पकड़कर खींचा है। अगर वह शक्ति ऐसा ना करती तो मैं तो मर ही जाती।”

सुयश, अलबर्ट और तौफीक ने अपनी दृष्टि चारो ओर दौड़ाई, पर उन्हें कोई नजर नहीं आया।
अभी आश्चर्य व्यक्त करने का समय भी नहीं था, क्यों कि स्पाइनोसोरस अब चट्टान से नीचे आ गया था और फिर से उन्हें सूंघने की कोशिश कर रहा था।

अब वह स्पाइनोसोरस उनसे ज्यादा दूरी पर नहीं था। तभी जेनिथ ने नक्षत्रा को फिर से समय फ्रीज करने को कहा। नक्षत्रा के समय फ्रीज करते ही जेनिथ ने तौफीक के हाथ से चाकू को छीना और भागकर स्पाइनोसोरस के नीचे पहुंच गयी।

अब उसने चाकू से स्पाइनोसोरस के पिछले दोनों पैर को घायल कर दिया और भागकर वापस अपनी जगह पर आकर समय को रिलीज कर दिया।

सुयश सहित सभी की निगाहें स्पाइनोसोरस पर थीं। अचानक स्पाइनोसोरस के पिछले दोनों पैर से खून निकलने लगा और वह लहरा कर धड़ाम से जमीन पर गिर गया।

तभी जेनिथ ने फिर से समय को फ्रीज किया और भागकर गिरे पड़े स्पाइनोसोरस पर चढ़कर, चाकू से उसकी गर्दन पर वार करने लगी। पर स्पाइनोसोरस के गर्दन के पास की त्वचा काफी कठोर थी और
जेनिथ का हाथ बहुत कोमल था, इसलिये चाकू के वार से स्पाइनोसोरस की गर्दन पर कुछ छोटी-मोटी खरोंच ही आ रहीं थीं।

यह देख जेनिथ ने समय ना बर्बाद करते हुए, एक-एक कर स्पाइनोसोरस की दोनों आँखें फोड़ दीं और सबके पास पहुंचकर समय को फिर रिलीज कर दिया।

स्पाइनोसोरस के जमीन पर गिरते ही एक-एक कर, उसकी दोनों आँखें फूट गयीं और उनसे खून की धारा बह निकली। किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि स्पाइनोसोरस को नुकसान कौन पहुंचा रहा है?

आँख के फूट जाने की वजह से स्पाइनोसोरस और खतरनाक हो गया। वह जोर से चिल्लाया और अपनी पूंछ को जमीन पर इधर-उधर पटकने लगा।

स्पाइनोसोरस के ऐसा करने से उसके आसपास के पेड़ टूट-टूट कर जमीन पर गिरने लगे। जेनिथ के पास अब समय रोकने के लिये 15 मिनट ही बचा था। अब उस स्पाइनोसोरस से निपटने के लिये जेनिथ को किसी ठोस प्लान की आवश्यकता थी।

तभी जेनिथ की निगाह खाईं के पास लगे उस पेड़ की एक बहुत ही लचीली, मगर मजबूत शाख पर गयी। जेनिथ के दिमाग में तुरंत एक विचार कौंधा।

उसने समय को एक बार फिर से फ्रीज किया और सुयश की पीठ पर रखे बैग में से एक खाली बैग निकाल लिया। जेनिथ ने जल्दी-जल्दी उस खाली बैग में पेड़ की सूखी पत्तियां भर दीं और उसे खाईं के पास पेड़ के नीचे रख दिया। अब जेनिथ ने उस लचीली शाख को पूरी ताकत लगा कर खींचा और एक जड़ के सहारे उसे पेड़ के एक तने से बांध दिया।

“जेनिथ जल्दी करो अब बस 5 मिनट ही बचा है।" नक्षत्रा ने कहा- “मैं आज समय को इससे ज्यादा नहीं रोक सकता।"

“हां... हां बस हो गया।” इतना कहकर जेनिथ ने चाकू से अपना हाथ एक जगह से काट लिया और अपने खून की बूंदें, पेड़ के नीचे रखे उस काले बैग पर गिराने लगी।

अब जेनिथ के खून से बैग लाल हो गया था। जेनिथ भागकर वापस सभी के पास पहुंची और फर्स्ट एड बॉक्स खोलकर अपने हाथ पर एक दवा छिड़क लिया। दवा की तेज गंध वातावरण में फैल गयी।

अभी भी 2 मिनट का समय शेष था। तभी जेनिथ ने नक्षत्रा को समय को रिलीज करने को बोला।
समय के रिलीज होते ही स्पाइनोसोरस गुस्से में उठ खड़ा हुआ। अंधा हो जाने की वजह से उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, इसलिये वह हवा में जोर-जोर से कुछ सूंघने लगा।

अब उसे जेनिथ के खून की गंध मिल गयी थी और वह लंगड़ाते हुए पेड़ के नीचे रखे उस काले बैग की ओर बढ़ने लगा। जैसे ही स्पाइनोसोरस खाईं के पास रखे उस काले बैग के पास पहुंचा, जेनिथ फिर समय रोककर तेजी से उस पेड़ के पास पहुंची और चाकू के एक वार से उसने पेड़ से बंधी जड़ों को काट दिया।

जड़ों के काटते ही जेनिथ वापस भागकर सबके पास पहुंच गयी और उसने समय को फिर से रिलीज कर दिया। समय को रिलीज करते ही वह लचीली डाल तेजी से हवा में लहराई और ‘सटाक’ की आवाज करती हुई स्पाइनोसोरस से जा टकराई।

स्पाइनोसोरस इस वार को झेल नहीं पाया और लड़खड़ा कर खाईं की ओर गिरने लगा।
आखिरी समय पर स्पाइनोसोरस ने अपने अगले पैरों को पत्थर में फंसा कर स्वयं को खाईं में गिरने से बचा लिया।

सुयश, तौफीक, शैफाली और क्रिस्टी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, पर स्पाइनोसोरस को ना गिरता देख जेनिथ की साँस जरुर रुक गयी। क्यों कि अब उसके पास सबको बचाने का कोई तरीका नहीं बचा था।

तभी जेनिथ की निगाह अपने हाथ में पकड़े चाकू की ओर गयी।
उसने एक पल भी ना सो चा और तेजी से भागती हुई खाईं में लटके डायनासोर के पास पहुंच गई।

इससे पहले कि खाईं में लटका स्पाइनोसोरस वापस ऊपर चढ़ पाता, जेनिथ ने उसके आगे के दोनों पैरों पर चाकू से तेज वार करने शुरु कर दिये।

स्पाइनोसोरस के पैर से खून का फव्वारा निकला और असहनीय दर्द की वजह से स्पाइनोसोरस ने अपने पैरों की पकड़ को ढीला कर दिया। इसी के साथ स्पाइनोसोरस एक गुर्राहट के साथ पहाड़ से नीचे गिर
गया।

जेनिथ इन सब कामों से इतना थक गयी थी कि वहीं पेड़ के पास ही जमीन पर लेट गयी। स्पाइनोसोरस को नीचे गिरता देख सभी भागकर जेनिथ के पास आ गये।

तौफीक की आँखों में जेनिथ के लिये बेइन्तहा आश्चर्य के भाव थे। कोई यकीन भी नहीं कर पा रहा था कि जेनिथ चाकू लेकर स्पाइनोसोरस को पहाड़ के नीचे गिरा देगी।

“तुम ठीक तो होना जेनिथ?” तौफीक ने जमीन पर लेटी हुई जेनिथ के हाथ से चाकू लेते हुए पूछा।
जेनिथ ने धीरे से अपना सिर हां में हिला दिया।

“वाह जेनिथ दीदी ! आपने तो कमाल ही कर दिया।” शैफाली ने जेनिथ की ओर पानी की बोतल को बढ़ाते हुए कहा।

सुयश की आँखों में भी जेनिथ के लिये तारीफ के भाव उभरे, पर उन आँखों में कुछ सवाल भी थे? जैसे ही जेनिथ पानी पीकर थोड़ा नार्मल हो गई, सुयश ने उस पर सवालों की बौछार कर दी-

“अगर हम शुरु से इस घटना के बारे में बात करें तो स्पाइनोसोरस के हमला करते ही क्रिस्टी के
सिर पर जब पत्थर गिरने वाला था, तो किसी अदृश्य शक्ति ने उसे बचाया, फिर हमारी ओर आ रहे स्पाइनोसोरस के पैर से अचानक खून निकलने लगा, फिर उसकी आँखें भी अपने आप फूट गयीं। इसके बाद हमारा काला बैग उसी अदृश्य शक्ति ने खाईं के किनारे रखकर, स्पाइनोसोरस के ऊपर लचीली पेड़ की डाल से हमला किया। यह सभी बातें ये शो कर रहीं हैं कि यहां पर हम लोगों के अलावा भी कोई था? क्या तुम्हें उसके बारे में कुछ पता है जेनिथ?”

“अभी किसी से मेरे बारे में कुछ भी मत बताना जेनिथ।” नक्षत्रा ने जेनिथ को सावधान किया।

“नहीं मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता?” जेनिथ ने सुयश को जवाब दिया- “मैंने तो आखिर में स्पाइनोसोरस पर चाकू से हमला किया बस इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं पता।”

“तो फिर तुम्हारे हाथ में मेरा चाकू कैसे आया ?” तौफीक ने शंकित निगाहों से जेनिथ को घूरते हुए पूछा- “मैंने तो तुम्हें अपना चाकू दिया भी नहीं था।”

“मुझे भी नहीं पता कि मेरे हाथ में तुम्हारा चाकू कब और कैसे आया ?” जेनिथ ने सफाई देते हुए कहा।

“तुम्हा रे हाथ पर यह पट्टी क्यों बंधी है?” सुयश ने पूछा- “इस पर से दवा की खुशबू भी आ रही है। हमने तो तुम्हें चोट लगते या पट्टी बांधते नहीं देखा।”

“यह पट्टी मेरे हाथ में कैसे बंधी ? मुझे भी इसकी कोई जानकारी नहीं है?” कहकर जेनिथ ने अपने हाथ में बंधी पट्टी को खोल दिया। उसे लगा कि अब सभी उसके हाथ की चोट के बारे में जान जायेंगे।

पर पट्टी खोलते ही वह स्वयं आश्चर्यचकित हो गई। उसके हाथ पर कोई भी घाव नहीं था।

“ज्यादा आश्चर्य मत व्यक्त करो दोस्त।” नक्षत्रा ने कहा- “मैंने तुमसे कहा था कि समय आने पर मैं तुम्हें अपनी कुछ और शक्तियों के बारे में बता दूंगा। तो ये है मेरी एक और शक्ति, जिसमें मैं तुम्हारे शरीर को
नुकसान होने पर उन पर उभरे घावों को भी भर सकता हूं।” जेनिथ यह सुनकर खुश हो गई।

“मुझे लगता है कि कोई अदृश्य शक्ति हम लोगों के साथ है? जो कि समय-समय पर हमें अंजाने खतरों से बचा रही है।” अलबर्ट ने कहा-“और वह शक्ति बहुत तेजी से कार्य करती है, जिससे हम उसको देख नहीं
पाते, बस उसे अपने आसपास महसूस कर पाते हैं।”

“आप सही कह रहे हैं प्रोफेसर।” सुयश ने कहा- “मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है।”

“ऐ अदृश्य शक्ति, हमें ऐसे ही अंजान खतरों से बचाते रहना और हमारा मार्गदर्शन करते रहना। हम सदैव तेरे आभारी रहेंगे।” क्रिस्टी ने आसमान की ओर हाथ जोड़कर अदृश्य शक्ति को धन्यवाद दिया।

इसके बाद सभी पुनः आगे की ओर बढ़ गये।


जारी रहेगा..........
Bhut hi badhiya update Bhai

Spainosourc ke hamle se sabhi ki jaan katre me thi vo to jenith ne apne dimag aur nakshtra ki madad se sabhi ki jaan bacha li aur us dinosour ko khai me girva diya
Aur sabhi ke sawalo se bhi aasani se jhuth bol kar bach gayi
Dekhte hai ab aage kya hota hai
 

Dhakad boy

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#114.

महाशक्ति (
11 जनवरी 2002, शुक्रवार, 15:10, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

व्योम को चलते हुए 1 दिन से भी ज्यादा हो चुका था। पिछली रात व्योम ने एक पेड़ पर सोकर गुजारी थी।
एक ही बात बेहतर थी कि अभी तक उसे किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं मिला था।

अकेला होने की वजह से व्योम को उस जंगल में काफी उलझन महसूस हो रही थी, फिर भी वह आगे बढ़ रहा था।

जिस मूर्ति को उसने पहाड़ से चढ़कर देखा था, व्योम को लगा था कि 2 घंटे में ही वह उस मूर्ति तक पहुंच जायेगा, पर जंगल के टेढ़े-मेढ़े रा स्ते की वजह से व्योम को अभी तक उस मूर्ति के दर्शन नहीं हुए थे।
वैसे वह जंगल इतना खूबसूरत था कि व्योम को थकान का अहसास नहीं हो रहा था। खाने-पीने की भी बहुत सारी चीजें आस-पा स थीं।

“मैं यहां ‘सुप्रीम’ के लोगों को बचाने आया था, पर मैं स्वयं ही इस रहस्यमय द्वीप पर फंस गया। पता नहीं मैं अब कभी अपने घर पहुंच भी पाऊंगा कि नहीं ?” व्योम मन ही मन बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था-
“ऊपर से इस द्वीप पर भी पता नहीं कैसे-कैसे रहस्य छुपे हुए हैं?”

तभी व्योम को उन लाल और हरे फलों का ध्यान आया जिसे खाकर वह हाथी, चूहे जितने आकार का हो गया था। यह सोच व्योम ने लाल रंग के फल को जेब से निकालकर देखा।

“देखने में तो साधारण फल जैसा ही लग रहा है। पता नहीं इस फल का खाने में स्वाद कैसा होगा ?”
तभी व्योम के दिमाग में एक खुराफात आयी।

“क्यों ना उस लाल फल को खाकर देखूं? आखिर पता तो चले कि चूहे जितना बनकर कितना मजा आता है? पर कहीं मैं हमेशा के लिये उतना ही बड़ा रह गया तो फिर क्या होगा ?” व्योम के दिमाग में यह सोचकर उथल-पुथल होने लगी।

आखिरकार दिल को कड़ाकर व्योम ने उस फल को खाने का निर्णय कर ही लिया।

“ठीक है, खा ही लेता हूं फल को, पर.... पर इसे किसी पेड़ पर बैठ कर खाना होगा, नहीं तो छोटा होते ही कोई पक्षी मुझ पर हमला ना कर दे?”

यह सोच व्योम एक ऊंचे से पेड़ की डाल पर चढ़कर बैठ गया। व्योम ने अब उस लाल फल को अपने वस्त्रों पर रगड़ कर साफ किया और फिर अपने मुंह में रख लिया।

व्योम ने उस फल को चबाया, उस फल का स्वाद खट्टा था। उसमें कोई बीज भी नहीं था।
तभी व्योम के शरीर को एक झटका लगा। अब उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह आसमान की ऊंचाइयों से नीचे गिर रहा हो।

उसके आसपास के पेड़-पौधे बड़े होते दिखने लगे, जबकि असल में व्योम के छोटे हो जाने की वजह से उसे ऐसा महसूस हो रहा था। कुछ ही देर में व्योम का आकार एक चींटी के बराबर का हो गया।

“अरे ये तो मैं चूहे से भी छोटा हो गया।” व्योम ने स्वयं को देखते हुए सोचा- “अच्छा वह हाथी बहुत बड़ा था, इसलिये वह चूहे के आकार का हो गया था। इंसान के शरीर को यह फल चींटी जितना छोटा कर देता है।”

व्योम ने अब अपनी जेब में पड़े सभी वस्तुओं को देखा, वह सारी वस्तुएं भी व्योम के अनुपात में ही छोटी हो गयीं थीं।

“यह कैसे सम्भव हो सकता है, इस फल को तो केवल मेरा शरीर छोटा करना चाहिये था, फिर मेरे कपड़े और जेब में रखा सामान कैसे छोटा हो गया?”

काफी देर सोचने के बाद भी जब व्योम को कुछ समझ नहीं आया तो वह सोचना छोड़ अपने इस सूक्ष्म रुप का आनन्द उठाने लगा।

तभी व्योम को कुछ अजीब सी खरखराने की आवाज सुनाई दी। व्योम ने अपने चारो ओर देखा। तभी व्योम की नजर अपनी डाल पर सामने से आ रही एक लाल रंग वाली चींटी पर पड़ी।

चींटी ने भी अब उसे देख लिया था। वह खूंखार नजरों से व्योम को घूर रही थी। यह देखकर व्योम के होश उड़ गये।
चींटी अब व्योम की ओर बढ़ने लगी थी। व्योम यह देखकर डाल के किनारे की ओर भागा। चींटी भी तेजी से व्योम के पीछे लपकी।

व्योम भागते हुए डाल के बिल्कुल किनारे तक पहुंच गया। आगे अब रास्ता खत्म हो गया था। चींटी अभी व्योम से कुछ दूरी पर थी।

व्योम ने अपनी नजरें ऊपर नीचे दौड़ाईं। व्योम को अपने ऊपर कुछ ऊंचाई पर एक दूसरी डाल दिखाई दी। पर वह डाल इतनी ऊंची थी कि व्योम उछलकर उस डाल तक नहीं पहुंच सकता था।

तभी व्योम का ध्यान अपने बैग में रखी नायलान की रस्सी की ओर गया। व्योम ने जल्दी से बैग की जिप खोलकर उसमें से रस्सी का गुच्छा निकाल लिया और उसका एक किनारा ऊपर की ओर उछाल दिया।

एक बार में ही रस्सी का वह सिरा एक डाल के ऊपर से होकर वापस व्योम के हाथ में आ गया।
व्योम ने रस्सी के दोनों सिरों को जोर से पकड़ा और उछलकर हवा में लहराते हुए, दूसरी पेड़ की डाल पर पहुंच गया।

चींटी को उम्मीद नहीं थी कि उसका शिकार इतनी आसानी से उसके हाथ से निकल जायेगा।
चींटी ने घूरकर एक बार व्योम को देखा और फिर दूसरे शिकार की खोज में चली गयी।

चींटी के जाने के बाद व्योम ने राहत की साँस ली। व्योम ने वापस रस्सी का गुच्छा बना कर अपने बैग में डाला और वहीं पेड़ की डाल पर बैठकर जंगल का नजारा देखने लगा। तभी व्योम को सूखे पत्ते के खड़कने की आवाज सुनाई दी।

व्योम ने नीचे झांककर देखा। वह 2 बौने थे, जो आकर उस पेड़ के नीचे खड़े हो गये थे।
उनमें से एक बौने के हाथ में एक छोटा सा लकड़ी का यंत्र था, जिसमें एक लाल रंग की लाइट लगी थी और वह यंत्र ‘बीप-बीप’ की आवाज कर रहा था।

वह आपस में बातें कर रहे थे।

“रिंजो, तू यह यंत्र लेकर मुझे बेकार में ही जंगल में घसीट रहा है, यहां नहीं मिलने वाली कोई शक्ति तुझे?” काली दाढ़ी वाले बौने ने कहा।

“तुझे तो कुछ मालूम ही नहीं है शिंजो ?” रिंजो ने कहा- “पिछली बार भी वह धरा शक्ति का कण मैंने ढूंढा था। अगर मैंने वह नहीं ढूंढा होता, तो हम जोडियाक वॉच कभी ना बना पाते।”

“ढूंढा नहीं चुराया था तूने।” शिंजो ने गुस्सा कर कहा।

“अरे चुप कर! अगर किसी ने सुन लिया तो हमारी रही सही इज्जत भी चली जायेगी।” रिंजो ने मुंह पर उंगली रख, शिंजो को चुप कराते हुए कहा- “वैसे भी उस अविष्कार का क्रेडिट हम दोनों ने ही लिया था।
अगर किरीट को पता चला तो वह हम दोनों की खाल उतार लेंगे।”

“ठीक है-ठीक है।” शिंजो भी बात की गम्भीरता को समझ चुप हो गया।

“किरीट और कलाट, हमें बहुत अच्छा वैज्ञानिक समझतें हैं, अब वो क्या जानें कि हम लोग छिपी हुई गुप्त शक्तियों को इस यंत्र के माध्यम से ढूंढते हैं? और फिर उसे अपने द्वारा बनाये किसी इलेक्ट्रानिक यंत्र में फिट करके, अपना अविष्कार बताकर उन्हें दिखा देते हैं।” रिंजो ने हंसते हुए कहा।

यह सुन शिंजो भी हंसते हुए बोला- “चाहे जो हो, पर बुड्ढे तेरी खोपड़ी बहुत कमाल की है।”

“तूने फिर मुझे बुड्ढा बोला।” रिंजो ने गुस्साते हुए कहा- “मैं सिर्फ तेरे से 1 मिनट ही बड़ा हूं।”

“पर तेरी दाढ़ी तो पककर भूरी हो गयी है, मेरी तो अभी भी काली-काली है।” शिंजो ने उछल-उछल कर अपनी काली दाढ़ी को दिखाते हुए, रिंजो को चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा।

यह सुन रिंजो गुस्से से पागल हो गया। उसने आगे बढ़कर शिंजो को पटक दिया और उसके सीने पर चढ़कर उसकी दाढ़ी नोचने लगा- “चल आज दाढ़ी का किस्सा ही खत्म करते हैं। ना रहेगी दाढ़ी....ना तू मुझे कभी चिढ़ायेगा।”

“अरे कमीने रिंजो... छोड़ मेरी दाढ़ी। अगर मेरी दाढ़ी का एक भी बाल टूटा, तो मैं तेरे सब जगह के बाल नोंच डालूंगा...तू अभी मुझे जानता नहीं है।”

यह कहकर दो नों बौने पटका-पटकी करके लड़ने लगे।

व्योम पेड़ के ऊपर बैठा दोनों बौंनों का हास्यास्पद युद्ध देख रहा था। तभी रिंजो का यंत्र पैर लगने की वजह से थोड़ी दूर जा गिरा और उससे एक तेज ‘बीप-बीप’ की आवाज आयी। यह सुन दोनो बौने लड़ना छोड़ तुरंत उठकर खड़े हो गये।

“रिंजो मेरे प्यारे भाई... तुम्हें कहीं चोट तो नहीं आयी ?” शिंजो ने एका एक सुर बदलते हुए कहा।

“नहीं मेरे प्यारे छोटे भाई। मुझे कहीं चोट नहीं आयी, पर अगर तुम्हें आयी हो तो अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को माफ कर देना।” रिंजो ने शिंजो को गले से लगाते हुए कहा।

व्योम को दोनो बौनों का यह प्रवृति समझ में नहीं आयी, पर उसे दो नों बौनों का कैरेक्टर बड़ा अच्छा लगा।

अब रिंजो ने यंत्र को जमीन से उठाते हुए कहा- “अरे बाप रे... इस गुप्त शक्ति के सिग्नल की स्ट्रेंथ तो देखो। आज तक हमें कभी इतनी ताकतवर शक्ति नहीं मिली?”

शिंजो भी उस यंत्र की तरफ देखते हुए बोला- “चलो भाई फिर जल्दी से चलकर उस गुप्त शक्ति पर अपना अधिकार कर लेते हैं।”

यह कहकर दोनों बौने उस यंत्र को उठा कर एक दिशा की ओर चल दिये, पर जैसे ही वह दोनों बौने व्योम के पेड़ के नीचे से निकले, ऊपर से व्योम रिंजो के सिर पर कूद गया।

चींटी जैसे व्योम के कूदने से रिंजो को कोई अहसास भी नहीं हुआ। व्योम ने कसकर रिंजो के सिर पर लगी टोपी को पकड़ लिया।

दोनों बौने यंत्र को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। कुछ ही देर में वह दोनों बौने एक छोटी सी झील के पास पहुंचकर रुक गये।

“गुप्त शक्ति के सिग्नल तो इस झील के अंदर से आ रहे हैं।” रिंजो ने शिंजो की ओर देखते हुए कहा- “अब क्या करें?”

“करना क्या है, झील के अंदर जाओ और उस गुप्त शक्ति को बाहर लेकर आ जाओ।” शिंजो ने अपना ज्ञान बांटते हुए कहा।

“अच्छा... तो मैं झील के अंदर जाऊं और तू बाहर रहकर मेरा इंतजार करेगा। फिर जब मैं गुप्त शक्ति को लेकर आऊं, तो तू किरीट को बताएगा कि यह शक्ति तूने मेरे साथ मिलकर बनाई है।” रिंजो ने शिंजो को
घूरते हुए कहा- “मतलब जान मैं अपनी संकट में डालूं और मजा तू भी बराबर का लेगा।”

“पानी में घुसना, जान संकट में डालना होता है क्या?” शिंजो गुर्राया- “अरे मैं तो बाहर खड़े रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“तो फिर एक काम कर तू चला जा झील के अंदर।” रिंजो ने दुष्टता से भरी मुस्कान बिखेरते हुए कहा- “मैं बाहर रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“म....म...मैं क्यों जाऊं?” शिंजो यह सुनकर घबरा गया- “तू चला जा ना भाई, मैं 70 प्रतिशत उस अविष्कार का क्रेडिट तुझे ही दिलवा दूंगा। तू तो जानता है ना कि मैं पानी से कितना डरता हूं, मैं तो पिछले 50 वर्षों
से नहाया भी नहीं हूं।”

“तो मैं कौनसा रोज नहाता हूं, किरीट के डर से रोज बाथरुम में घुसता तो हूं, पर पानी गिरा कर बाहर आ जाता हूं।“ रिंजो ने भी घबराते हुए कहा- “भाई बताना मत मेरा यह राज किसी को।”

“अरे शांत हो जा, मैं किसी को नहीं बताऊंगा।” शिंजो ने डरकर झील को देखते हुए कहा- “पर अब ये बताओ कि फिर इस झील से उस गुप्त शक्ति को कैसे प्राप्त करेंगे?”

“मेरे हिसाब से हमें इस शक्ति को भूल जाना चाहिये और किसी दूसरी शक्ति को ढूंढना चाहिये। जो पहाड़, बर्फ, ज्वालामुखी कहीं भी हो, पर पानी में ना हो।” रिंजो ने हथियार डालते हुए कहा- “और मेरे प्यारे
भाई, मैंने तुम्हें जो भी अपशब्द कहे, उसके लिये अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को दिल से माफ कर देना।”

“भैया मैंने भी आपका दिल दुखाया है, चलो आज मैं आपके सोते समय पैर भी दबाऊंगा।” शिंजो ने भी माफी मांगते हुए कहा और वहां से जाने लगे।

उन्हें वहां से जाता देखकर व्योम रिंजों की टोपी से वहीं कूद गया।

दोनों बौने एक दूसरे के गले में हाथ डालकर वहां से चले गये। व्योम इतने कॉमेडी कैरेक्टर्स को देखकर मुस्कुरा उठा।

बौनों के जाने के बाद व्योम ने एक बार उस झील को देखा और फिर उसमें छलांग लगा दी।
जल्दी-जल्दी में व्योम यह भूल गया कि उसका आकार अभी छोटा ही है।

पानी में कूदते ही एक विशाल मछली को देख, व्योम को अपनी भूल का अहसास हो गया।
वह पलटकर तेजी से वापस किनारे की ओर चला, तभी व्योम को अपने पीछे एक 12 इंच बड़ा
समुद्री घोड़ा दिखाई दिया।

वह समुद्री घोड़ा वैसे तो सिर्फ 12 इंच ही बड़ा था, पर व्योम के चींटी जैसे आकार में होने के कारण वह व्योम को अपने से 100 गुना ज्यादा बड़ा नजर आ रहा था।

इससे पहले कि व्योम अपने बचाव में कुछ कर पाता, समुद्री घोड़े ने अपने हाथ में पकड़ी एक सुनहरी रस्सी से व्योम को बांध लिया और झील की तली की ओर लेकर चल दिया।

झील के पानी में कुछ मछलियाँ और समद्री घोड़े ही दिखाई दे रहे थे। व्योम पानी में सिर्फ 25 मिनट तक ही साँस ले सकता था, इसलिये उसे थोड़ा डर लग रहा था कि कहीं वह इतने समय में झील से बाहर नहीं
निकल पाया तो क्या होगा?

समुद्री घोड़ा व्योम को लेकर, अब झील की तली में पहुंच गया। तभी व्योम को पानी के अंदर कोई चमकती हुई चीज दिखाई दी। समुद्री घोड़ा उसी ओर जा रहा था।

कुछ ही देर में व्योम को वह सुनहरी चीज बिल्कुल साफ दिखाई देने लगी थी। वह एक सुनहरी धातु का बना पंचशूल था, जिस पर सूर्य की एक आकृति बनी दिखाई दे रही थी।

समुद्री घोड़े ने पंचशूल के पास पहुंचकर व्योम के हाथ की रस्सी खोल दी। व्योम को समुद्री घोड़े की यह हरकत समझ में नहीं आयी, पर वह इतना जरुर जान गया कि यही वह गुप्त शक्ति है, जिसके बारे में दोनो बौने बात कर रहे थे।

समुद्री घोड़ा व्योम को वहीं छोड़कर, स्वयं पानी में भागकर कहीं गायब हो गया। व्योम यह नहीं समझ पा रहा था कि अगर यह कोई शक्ति है? और समुद्री घोड़ा इसकी रक्षा करता है, तो वह व्योम को इस शक्ति के पास क्यों छोड़ गया?

तभी व्योम को उस पंचशूल से कुछ वाइब्रेशन जैसी तरंगे निकलती दिखाईं दीं। उन तरंगों में एक प्रकार की गूंज थी।

व्योम इस शब्द की ध्वनि को पहचानता था। यह ध्वनि ‘ओऽम्’ शब्द की थी।

व्योम ने धीरे से पहले, अपनी जेब से एक हरे रंग का फल निकाला और उस फल को अपने मुंह में रख लिया।

फल को चबाते ही व्योम का शरीर अपने वास्तविक आकार में आ गया। अब व्योम उस पंचशूल को उठाने के लिये आगे बढ़ा।

व्योम ने अपने दाहिने हाथ से जैसे ही उस पंचशूल को छुआ, उसके शरीर को हजारों वोल्ट के बराबर का, करंट जैसा झटका लगा। यह झटका इतना तेज था कि व्योम उछलकर झील से बाहर आ गिरा।

व्योम को असहनीय दर्द का अहसास हो रहा था। व्योम ने कराहते हुए एक नजर अपने शरीर पर मारी। व्योम का पूरा शरीर झुलस गया था। कई जगह से फटा हुआ मांस बाहर झांक रहा था।

उस पंचशूल से निकली ऊर्जा ने व्योम के शरीर के चिथड़े उड़ा दिये थे, पता नहीं वह कौन सी शक्ति थी, जिसने व्योम को अभी तक जिंदा रखा था।

एक पल में व्योम समझ गया कि अब उसका अंत निश्चित है। उसकी आँखों के सामने अपने परिवार के सदस्यों के चेहरे एक-एक कर घूमने लगे।

व्योम की आँखों से आँसू भी नहीं निकल पा रहे थे, शायद उसे भी उस असीम ऊर्जा ने सोख लिया था ?

धीरे-धीरे व्योम निढाल हो कर वहीं लुढ़क गया। अब व्योम के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी।
तभी आसमान में एक जोर की गड़गड़ा हट हुई। ऐसा लगा जैसे कोई विशालकाय वस्तु सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकराई हो।

कुछ ही पलों में आसमान से एक बूंद टपकी और वह व्योम के खुले मुंह में प्रवेश कर गयी।
व्योम को एक झटका लगा और उसकी साँसें पुनः चलने लगीं।

जी हाँ, यह बूंद और कुछ नहीं, वही गुरुत्व शक्ति की बूंद थी, जो लुफासा और हनुका के लड़ते समय सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकरा कर नीचे गिर गयी थी।

धीरे-धीरे गुरुत्व शक्ति ने अपना चमत्कार दिखाना शुरु कर दिया। व्योम के शरीर पर उत्पन्न हुये सभी घाव तेजी से भर रहे थे।

कुछ ही देर में व्योम ने कराह कर अपनी आँखें खोल दीं। कुछ देर तक व्योम को कुछ समझ नहीं आया? फिर उसने घबरा कर अपने शरीर की ओर देखा।
इस समय उसके शरीर पर एक भी घाव नजर नहीं आ रहा था। व्योम उठकर खड़ा हो गया और अपने चारों ओर देखने लगा। पर उसे कोई वहां नजर नहीं आया ?

इस समय व्योम को अपने शरीर में एक जबरदस्त शक्ति का अहसास हो रहा था। अब व्योम फिर से झील के पास आकर खड़ा हो गया। व्योम को लगा कि जरुर पंचशूल ने ही उसे ठीक किया है क्यों कि और कोई
चमत्कारी शक्ति तो आसपास है नहीं।

यह सोचकर व्योम ने वापस से झील में छलांग लगा दी। थोड़ी ही देर में वह एक बार फिर पंचशूल के पास था। व्योम ने फिर एक बार अपना हाथ आगे को बढ़ाया और पंचशूल को पकड़ लिया। इस बार व्योम को पंचशूल पकड़ने पर एक शीतल अहसास हुआ।

व्योम मुस्कुराया और पंचशूल लेकर झील से बाहर आ गया। मगर झील से निकलते ही पंचशूल हवा में गायब हो गया।

व्योम घबरा कर अपने चारो ओर देखने लगा, पर पंचशूल कहीं नहीं था। तभी व्योम की निगाह अपनी दाहिने हाथ की कलाई की ओर गयी।

व्योम की कलाई पर अब एक सुनहरे रंग का सूर्य का टैटू चमक रहा था। व्योम समझ गया कि वह शक्ति कहीं गई नहीं है, वह अब भी उसके पास है और वह भी अदृश्य रुप में।

व्योम के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आयी और वह पुनः आगे की ओर बढ़ गया।

जारी रहेगा__________
✍️
Bhut hi jabardast update bhai

To vyom us panchsul Ki shakti se mar hi gaya tha vo to us gurutva shakti se bach gaya aur ab uske pass vo panchsul ki shakti bhi hai
 

Gaurav1969

\\\“मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहम्”///
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#114.

महाशक्ति (
11 जनवरी 2002, शुक्रवार, 15:10, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

व्योम को चलते हुए 1 दिन से भी ज्यादा हो चुका था। पिछली रात व्योम ने एक पेड़ पर सोकर गुजारी थी।
एक ही बात बेहतर थी कि अभी तक उसे किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं मिला था।

अकेला होने की वजह से व्योम को उस जंगल में काफी उलझन महसूस हो रही थी, फिर भी वह आगे बढ़ रहा था।

जिस मूर्ति को उसने पहाड़ से चढ़कर देखा था, व्योम को लगा था कि 2 घंटे में ही वह उस मूर्ति तक पहुंच जायेगा, पर जंगल के टेढ़े-मेढ़े रा स्ते की वजह से व्योम को अभी तक उस मूर्ति के दर्शन नहीं हुए थे।
वैसे वह जंगल इतना खूबसूरत था कि व्योम को थकान का अहसास नहीं हो रहा था। खाने-पीने की भी बहुत सारी चीजें आस-पा स थीं।

“मैं यहां ‘सुप्रीम’ के लोगों को बचाने आया था, पर मैं स्वयं ही इस रहस्यमय द्वीप पर फंस गया। पता नहीं मैं अब कभी अपने घर पहुंच भी पाऊंगा कि नहीं ?” व्योम मन ही मन बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था-
“ऊपर से इस द्वीप पर भी पता नहीं कैसे-कैसे रहस्य छुपे हुए हैं?”

तभी व्योम को उन लाल और हरे फलों का ध्यान आया जिसे खाकर वह हाथी, चूहे जितने आकार का हो गया था। यह सोच व्योम ने लाल रंग के फल को जेब से निकालकर देखा।

“देखने में तो साधारण फल जैसा ही लग रहा है। पता नहीं इस फल का खाने में स्वाद कैसा होगा ?”
तभी व्योम के दिमाग में एक खुराफात आयी।

“क्यों ना उस लाल फल को खाकर देखूं? आखिर पता तो चले कि चूहे जितना बनकर कितना मजा आता है? पर कहीं मैं हमेशा के लिये उतना ही बड़ा रह गया तो फिर क्या होगा ?” व्योम के दिमाग में यह सोचकर उथल-पुथल होने लगी।

आखिरकार दिल को कड़ाकर व्योम ने उस फल को खाने का निर्णय कर ही लिया।

“ठीक है, खा ही लेता हूं फल को, पर.... पर इसे किसी पेड़ पर बैठ कर खाना होगा, नहीं तो छोटा होते ही कोई पक्षी मुझ पर हमला ना कर दे?”

यह सोच व्योम एक ऊंचे से पेड़ की डाल पर चढ़कर बैठ गया। व्योम ने अब उस लाल फल को अपने वस्त्रों पर रगड़ कर साफ किया और फिर अपने मुंह में रख लिया।

व्योम ने उस फल को चबाया, उस फल का स्वाद खट्टा था। उसमें कोई बीज भी नहीं था।
तभी व्योम के शरीर को एक झटका लगा। अब उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह आसमान की ऊंचाइयों से नीचे गिर रहा हो।

उसके आसपास के पेड़-पौधे बड़े होते दिखने लगे, जबकि असल में व्योम के छोटे हो जाने की वजह से उसे ऐसा महसूस हो रहा था। कुछ ही देर में व्योम का आकार एक चींटी के बराबर का हो गया।

“अरे ये तो मैं चूहे से भी छोटा हो गया।” व्योम ने स्वयं को देखते हुए सोचा- “अच्छा वह हाथी बहुत बड़ा था, इसलिये वह चूहे के आकार का हो गया था। इंसान के शरीर को यह फल चींटी जितना छोटा कर देता है।”

व्योम ने अब अपनी जेब में पड़े सभी वस्तुओं को देखा, वह सारी वस्तुएं भी व्योम के अनुपात में ही छोटी हो गयीं थीं।

“यह कैसे सम्भव हो सकता है, इस फल को तो केवल मेरा शरीर छोटा करना चाहिये था, फिर मेरे कपड़े और जेब में रखा सामान कैसे छोटा हो गया?”

काफी देर सोचने के बाद भी जब व्योम को कुछ समझ नहीं आया तो वह सोचना छोड़ अपने इस सूक्ष्म रुप का आनन्द उठाने लगा।

तभी व्योम को कुछ अजीब सी खरखराने की आवाज सुनाई दी। व्योम ने अपने चारो ओर देखा। तभी व्योम की नजर अपनी डाल पर सामने से आ रही एक लाल रंग वाली चींटी पर पड़ी।

चींटी ने भी अब उसे देख लिया था। वह खूंखार नजरों से व्योम को घूर रही थी। यह देखकर व्योम के होश उड़ गये।
चींटी अब व्योम की ओर बढ़ने लगी थी। व्योम यह देखकर डाल के किनारे की ओर भागा। चींटी भी तेजी से व्योम के पीछे लपकी।

व्योम भागते हुए डाल के बिल्कुल किनारे तक पहुंच गया। आगे अब रास्ता खत्म हो गया था। चींटी अभी व्योम से कुछ दूरी पर थी।

व्योम ने अपनी नजरें ऊपर नीचे दौड़ाईं। व्योम को अपने ऊपर कुछ ऊंचाई पर एक दूसरी डाल दिखाई दी। पर वह डाल इतनी ऊंची थी कि व्योम उछलकर उस डाल तक नहीं पहुंच सकता था।

तभी व्योम का ध्यान अपने बैग में रखी नायलान की रस्सी की ओर गया। व्योम ने जल्दी से बैग की जिप खोलकर उसमें से रस्सी का गुच्छा निकाल लिया और उसका एक किनारा ऊपर की ओर उछाल दिया।

एक बार में ही रस्सी का वह सिरा एक डाल के ऊपर से होकर वापस व्योम के हाथ में आ गया।
व्योम ने रस्सी के दोनों सिरों को जोर से पकड़ा और उछलकर हवा में लहराते हुए, दूसरी पेड़ की डाल पर पहुंच गया।

चींटी को उम्मीद नहीं थी कि उसका शिकार इतनी आसानी से उसके हाथ से निकल जायेगा।
चींटी ने घूरकर एक बार व्योम को देखा और फिर दूसरे शिकार की खोज में चली गयी।

चींटी के जाने के बाद व्योम ने राहत की साँस ली। व्योम ने वापस रस्सी का गुच्छा बना कर अपने बैग में डाला और वहीं पेड़ की डाल पर बैठकर जंगल का नजारा देखने लगा। तभी व्योम को सूखे पत्ते के खड़कने की आवाज सुनाई दी।

व्योम ने नीचे झांककर देखा। वह 2 बौने थे, जो आकर उस पेड़ के नीचे खड़े हो गये थे।
उनमें से एक बौने के हाथ में एक छोटा सा लकड़ी का यंत्र था, जिसमें एक लाल रंग की लाइट लगी थी और वह यंत्र ‘बीप-बीप’ की आवाज कर रहा था।

वह आपस में बातें कर रहे थे।

“रिंजो, तू यह यंत्र लेकर मुझे बेकार में ही जंगल में घसीट रहा है, यहां नहीं मिलने वाली कोई शक्ति तुझे?” काली दाढ़ी वाले बौने ने कहा।

“तुझे तो कुछ मालूम ही नहीं है शिंजो ?” रिंजो ने कहा- “पिछली बार भी वह धरा शक्ति का कण मैंने ढूंढा था। अगर मैंने वह नहीं ढूंढा होता, तो हम जोडियाक वॉच कभी ना बना पाते।”

“ढूंढा नहीं चुराया था तूने।” शिंजो ने गुस्सा कर कहा।

“अरे चुप कर! अगर किसी ने सुन लिया तो हमारी रही सही इज्जत भी चली जायेगी।” रिंजो ने मुंह पर उंगली रख, शिंजो को चुप कराते हुए कहा- “वैसे भी उस अविष्कार का क्रेडिट हम दोनों ने ही लिया था।
अगर किरीट को पता चला तो वह हम दोनों की खाल उतार लेंगे।”

“ठीक है-ठीक है।” शिंजो भी बात की गम्भीरता को समझ चुप हो गया।

“किरीट और कलाट, हमें बहुत अच्छा वैज्ञानिक समझतें हैं, अब वो क्या जानें कि हम लोग छिपी हुई गुप्त शक्तियों को इस यंत्र के माध्यम से ढूंढते हैं? और फिर उसे अपने द्वारा बनाये किसी इलेक्ट्रानिक यंत्र में फिट करके, अपना अविष्कार बताकर उन्हें दिखा देते हैं।” रिंजो ने हंसते हुए कहा।

यह सुन शिंजो भी हंसते हुए बोला- “चाहे जो हो, पर बुड्ढे तेरी खोपड़ी बहुत कमाल की है।”

“तूने फिर मुझे बुड्ढा बोला।” रिंजो ने गुस्साते हुए कहा- “मैं सिर्फ तेरे से 1 मिनट ही बड़ा हूं।”

“पर तेरी दाढ़ी तो पककर भूरी हो गयी है, मेरी तो अभी भी काली-काली है।” शिंजो ने उछल-उछल कर अपनी काली दाढ़ी को दिखाते हुए, रिंजो को चिढ़ाने वाले अंदाज में कहा।

यह सुन रिंजो गुस्से से पागल हो गया। उसने आगे बढ़कर शिंजो को पटक दिया और उसके सीने पर चढ़कर उसकी दाढ़ी नोचने लगा- “चल आज दाढ़ी का किस्सा ही खत्म करते हैं। ना रहेगी दाढ़ी....ना तू मुझे कभी चिढ़ायेगा।”

“अरे कमीने रिंजो... छोड़ मेरी दाढ़ी। अगर मेरी दाढ़ी का एक भी बाल टूटा, तो मैं तेरे सब जगह के बाल नोंच डालूंगा...तू अभी मुझे जानता नहीं है।”

यह कहकर दो नों बौने पटका-पटकी करके लड़ने लगे।

व्योम पेड़ के ऊपर बैठा दोनों बौंनों का हास्यास्पद युद्ध देख रहा था। तभी रिंजो का यंत्र पैर लगने की वजह से थोड़ी दूर जा गिरा और उससे एक तेज ‘बीप-बीप’ की आवाज आयी। यह सुन दोनो बौने लड़ना छोड़ तुरंत उठकर खड़े हो गये।

“रिंजो मेरे प्यारे भाई... तुम्हें कहीं चोट तो नहीं आयी ?” शिंजो ने एका एक सुर बदलते हुए कहा।

“नहीं मेरे प्यारे छोटे भाई। मुझे कहीं चोट नहीं आयी, पर अगर तुम्हें आयी हो तो अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को माफ कर देना।” रिंजो ने शिंजो को गले से लगाते हुए कहा।

व्योम को दोनो बौनों का यह प्रवृति समझ में नहीं आयी, पर उसे दो नों बौनों का कैरेक्टर बड़ा अच्छा लगा।

अब रिंजो ने यंत्र को जमीन से उठाते हुए कहा- “अरे बाप रे... इस गुप्त शक्ति के सिग्नल की स्ट्रेंथ तो देखो। आज तक हमें कभी इतनी ताकतवर शक्ति नहीं मिली?”

शिंजो भी उस यंत्र की तरफ देखते हुए बोला- “चलो भाई फिर जल्दी से चलकर उस गुप्त शक्ति पर अपना अधिकार कर लेते हैं।”

यह कहकर दोनों बौने उस यंत्र को उठा कर एक दिशा की ओर चल दिये, पर जैसे ही वह दोनों बौने व्योम के पेड़ के नीचे से निकले, ऊपर से व्योम रिंजो के सिर पर कूद गया।

चींटी जैसे व्योम के कूदने से रिंजो को कोई अहसास भी नहीं हुआ। व्योम ने कसकर रिंजो के सिर पर लगी टोपी को पकड़ लिया।

दोनों बौने यंत्र को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। कुछ ही देर में वह दोनों बौने एक छोटी सी झील के पास पहुंचकर रुक गये।

“गुप्त शक्ति के सिग्नल तो इस झील के अंदर से आ रहे हैं।” रिंजो ने शिंजो की ओर देखते हुए कहा- “अब क्या करें?”

“करना क्या है, झील के अंदर जाओ और उस गुप्त शक्ति को बाहर लेकर आ जाओ।” शिंजो ने अपना ज्ञान बांटते हुए कहा।

“अच्छा... तो मैं झील के अंदर जाऊं और तू बाहर रहकर मेरा इंतजार करेगा। फिर जब मैं गुप्त शक्ति को लेकर आऊं, तो तू किरीट को बताएगा कि यह शक्ति तूने मेरे साथ मिलकर बनाई है।” रिंजो ने शिंजो को
घूरते हुए कहा- “मतलब जान मैं अपनी संकट में डालूं और मजा तू भी बराबर का लेगा।”

“पानी में घुसना, जान संकट में डालना होता है क्या?” शिंजो गुर्राया- “अरे मैं तो बाहर खड़े रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“तो फिर एक काम कर तू चला जा झील के अंदर।” रिंजो ने दुष्टता से भरी मुस्कान बिखेरते हुए कहा- “मैं बाहर रहकर तेरी सुरक्षा करुंगा।”

“म....म...मैं क्यों जाऊं?” शिंजो यह सुनकर घबरा गया- “तू चला जा ना भाई, मैं 70 प्रतिशत उस अविष्कार का क्रेडिट तुझे ही दिलवा दूंगा। तू तो जानता है ना कि मैं पानी से कितना डरता हूं, मैं तो पिछले 50 वर्षों
से नहाया भी नहीं हूं।”

“तो मैं कौनसा रोज नहाता हूं, किरीट के डर से रोज बाथरुम में घुसता तो हूं, पर पानी गिरा कर बाहर आ जाता हूं।“ रिंजो ने भी घबराते हुए कहा- “भाई बताना मत मेरा यह राज किसी को।”

“अरे शांत हो जा, मैं किसी को नहीं बताऊंगा।” शिंजो ने डरकर झील को देखते हुए कहा- “पर अब ये बताओ कि फिर इस झील से उस गुप्त शक्ति को कैसे प्राप्त करेंगे?”

“मेरे हिसाब से हमें इस शक्ति को भूल जाना चाहिये और किसी दूसरी शक्ति को ढूंढना चाहिये। जो पहाड़, बर्फ, ज्वालामुखी कहीं भी हो, पर पानी में ना हो।” रिंजो ने हथियार डालते हुए कहा- “और मेरे प्यारे
भाई, मैंने तुम्हें जो भी अपशब्द कहे, उसके लिये अपने इस 1 मिनट बड़े भाई को दिल से माफ कर देना।”

“भैया मैंने भी आपका दिल दुखाया है, चलो आज मैं आपके सोते समय पैर भी दबाऊंगा।” शिंजो ने भी माफी मांगते हुए कहा और वहां से जाने लगे।

उन्हें वहां से जाता देखकर व्योम रिंजों की टोपी से वहीं कूद गया।

दोनों बौने एक दूसरे के गले में हाथ डालकर वहां से चले गये। व्योम इतने कॉमेडी कैरेक्टर्स को देखकर मुस्कुरा उठा।

बौनों के जाने के बाद व्योम ने एक बार उस झील को देखा और फिर उसमें छलांग लगा दी।
जल्दी-जल्दी में व्योम यह भूल गया कि उसका आकार अभी छोटा ही है।

पानी में कूदते ही एक विशाल मछली को देख, व्योम को अपनी भूल का अहसास हो गया।
वह पलटकर तेजी से वापस किनारे की ओर चला, तभी व्योम को अपने पीछे एक 12 इंच बड़ा
समुद्री घोड़ा दिखाई दिया।

वह समुद्री घोड़ा वैसे तो सिर्फ 12 इंच ही बड़ा था, पर व्योम के चींटी जैसे आकार में होने के कारण वह व्योम को अपने से 100 गुना ज्यादा बड़ा नजर आ रहा था।

इससे पहले कि व्योम अपने बचाव में कुछ कर पाता, समुद्री घोड़े ने अपने हाथ में पकड़ी एक सुनहरी रस्सी से व्योम को बांध लिया और झील की तली की ओर लेकर चल दिया।

झील के पानी में कुछ मछलियाँ और समद्री घोड़े ही दिखाई दे रहे थे। व्योम पानी में सिर्फ 25 मिनट तक ही साँस ले सकता था, इसलिये उसे थोड़ा डर लग रहा था कि कहीं वह इतने समय में झील से बाहर नहीं
निकल पाया तो क्या होगा?

समुद्री घोड़ा व्योम को लेकर, अब झील की तली में पहुंच गया। तभी व्योम को पानी के अंदर कोई चमकती हुई चीज दिखाई दी। समुद्री घोड़ा उसी ओर जा रहा था।

कुछ ही देर में व्योम को वह सुनहरी चीज बिल्कुल साफ दिखाई देने लगी थी। वह एक सुनहरी धातु का बना पंचशूल था, जिस पर सूर्य की एक आकृति बनी दिखाई दे रही थी।

समुद्री घोड़े ने पंचशूल के पास पहुंचकर व्योम के हाथ की रस्सी खोल दी। व्योम को समुद्री घोड़े की यह हरकत समझ में नहीं आयी, पर वह इतना जरुर जान गया कि यही वह गुप्त शक्ति है, जिसके बारे में दोनो बौने बात कर रहे थे।

समुद्री घोड़ा व्योम को वहीं छोड़कर, स्वयं पानी में भागकर कहीं गायब हो गया। व्योम यह नहीं समझ पा रहा था कि अगर यह कोई शक्ति है? और समुद्री घोड़ा इसकी रक्षा करता है, तो वह व्योम को इस शक्ति के पास क्यों छोड़ गया?

तभी व्योम को उस पंचशूल से कुछ वाइब्रेशन जैसी तरंगे निकलती दिखाईं दीं। उन तरंगों में एक प्रकार की गूंज थी।

व्योम इस शब्द की ध्वनि को पहचानता था। यह ध्वनि ‘ओऽम्’ शब्द की थी।

व्योम ने धीरे से पहले, अपनी जेब से एक हरे रंग का फल निकाला और उस फल को अपने मुंह में रख लिया।

फल को चबाते ही व्योम का शरीर अपने वास्तविक आकार में आ गया। अब व्योम उस पंचशूल को उठाने के लिये आगे बढ़ा।

व्योम ने अपने दाहिने हाथ से जैसे ही उस पंचशूल को छुआ, उसके शरीर को हजारों वोल्ट के बराबर का, करंट जैसा झटका लगा। यह झटका इतना तेज था कि व्योम उछलकर झील से बाहर आ गिरा।

व्योम को असहनीय दर्द का अहसास हो रहा था। व्योम ने कराहते हुए एक नजर अपने शरीर पर मारी। व्योम का पूरा शरीर झुलस गया था। कई जगह से फटा हुआ मांस बाहर झांक रहा था।

उस पंचशूल से निकली ऊर्जा ने व्योम के शरीर के चिथड़े उड़ा दिये थे, पता नहीं वह कौन सी शक्ति थी, जिसने व्योम को अभी तक जिंदा रखा था।

एक पल में व्योम समझ गया कि अब उसका अंत निश्चित है। उसकी आँखों के सामने अपने परिवार के सदस्यों के चेहरे एक-एक कर घूमने लगे।

व्योम की आँखों से आँसू भी नहीं निकल पा रहे थे, शायद उसे भी उस असीम ऊर्जा ने सोख लिया था ?

धीरे-धीरे व्योम निढाल हो कर वहीं लुढ़क गया। अब व्योम के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी।
तभी आसमान में एक जोर की गड़गड़ा हट हुई। ऐसा लगा जैसे कोई विशालकाय वस्तु सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकराई हो।

कुछ ही पलों में आसमान से एक बूंद टपकी और वह व्योम के खुले मुंह में प्रवेश कर गयी।
व्योम को एक झटका लगा और उसकी साँसें पुनः चलने लगीं।

जी हाँ, यह बूंद और कुछ नहीं, वही गुरुत्व शक्ति की बूंद थी, जो लुफासा और हनुका के लड़ते समय सामरा राज्य की अदृश्य दीवार से टकरा कर नीचे गिर गयी थी।

धीरे-धीरे गुरुत्व शक्ति ने अपना चमत्कार दिखाना शुरु कर दिया। व्योम के शरीर पर उत्पन्न हुये सभी घाव तेजी से भर रहे थे।

कुछ ही देर में व्योम ने कराह कर अपनी आँखें खोल दीं। कुछ देर तक व्योम को कुछ समझ नहीं आया? फिर उसने घबरा कर अपने शरीर की ओर देखा।
इस समय उसके शरीर पर एक भी घाव नजर नहीं आ रहा था। व्योम उठकर खड़ा हो गया और अपने चारों ओर देखने लगा। पर उसे कोई वहां नजर नहीं आया ?

इस समय व्योम को अपने शरीर में एक जबरदस्त शक्ति का अहसास हो रहा था। अब व्योम फिर से झील के पास आकर खड़ा हो गया। व्योम को लगा कि जरुर पंचशूल ने ही उसे ठीक किया है क्यों कि और कोई
चमत्कारी शक्ति तो आसपास है नहीं।

यह सोचकर व्योम ने वापस से झील में छलांग लगा दी। थोड़ी ही देर में वह एक बार फिर पंचशूल के पास था। व्योम ने फिर एक बार अपना हाथ आगे को बढ़ाया और पंचशूल को पकड़ लिया। इस बार व्योम को पंचशूल पकड़ने पर एक शीतल अहसास हुआ।

व्योम मुस्कुराया और पंचशूल लेकर झील से बाहर आ गया। मगर झील से निकलते ही पंचशूल हवा में गायब हो गया।

व्योम घबरा कर अपने चारो ओर देखने लगा, पर पंचशूल कहीं नहीं था। तभी व्योम की निगाह अपनी दाहिने हाथ की कलाई की ओर गयी।

व्योम की कलाई पर अब एक सुनहरे रंग का सूर्य का टैटू चमक रहा था। व्योम समझ गया कि वह शक्ति कहीं गई नहीं है, वह अब भी उसके पास है और वह भी अदृश्य रुप में।

व्योम के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आयी और वह पुनः आगे की ओर बढ़ गया।

जारी रहेगा__________
✍️
अपडेट हमेशा की तरह लाजवाब था गुरूजी 🧡। मेरा पूर्वानुमान की गुरुत्व शक्ति गिरने के बाद नष्ट नही हुई होगी ,सत्य हो गया इस अपडेट में। रिंजो और शिंजो की जोड़ी अपने में ही अलग है, अतरंगी तथा हास्यास्पद कृत्य करने में अव्वल है दोनो, द्वीप पर घूम घूम कर शक्ति को खोजना और उसे अपने किसी यंत्र में प्रयोग करके उसे अपनी खोज बताना यही उनका मुख्य काम है, किरीट से शाबाशी जो मिलती है इन सबसे। व्योम भी समय के साथ शक्तिशाली होता जा रहा है पहले उस दिव्य पेड़ से , फिर गुरुत्व शक्ति और अब पंचशूल , व्योम का क्या किरदार होने वाला है आने वाले समय में ये तो लेखक ही जाने पर इतना तो जरूर है की व्योम, सुयश, शैफ़ाली हमें दिखेंगे ही लगातार बाकी का सफर कहा तक रहेगा ये अभी कहा नही जा सकता। अब व्योम और बाकी के सदस्यों का मेल मिलाप कब होगा ये भी देखने योग्य दृश्य होगा।

एक चीज़ जिसपे मैने गौर किया है की ये 114 अपडेट्स कहानी के समय के 1 महीने से भी कम समय के हैं ।

बहुत ही कमाल की कहानी है इंतजार रहे अगले प्रसंग का।
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Raj_sharma

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Raj_sharma

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बहुत ही सुंदर लाजवाब और एक और अद्भुत मनमोहक रोमांचकारी अपडेट है भाई मजा आ गया
Thank you very much for your valuable review and support bhai :thanx:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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रिव्यू का प्रारम्भ किया जाए|
☺️
पिछले अपडेट में मुझे ऐसा लगा कि गुरुत्व की बूँद बर्बाद हो गई, लेकिन यहाँ मैं ग़लत था। गुरुत्व की वह बूँद ने व्योम को एक नई ज़िंदगी प्रदान करी है,
:approve:
पंचशूल ने लगभग व्योम की जीवन ली ही ली थी, वह तो भला हो गुरुत्व शक्ति की उस बूँद का, जिसने व्योम में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया।
और व्योम ने ठीक होने के उपरांत पंचशूल को धारण भी कर लिया। अब व्योम भी एक साधारण मानव नहीं रहा| व्योम के भीतर पंचशूल और गुरुत्व से रहस्यमयी शक्तियाँ अवश्य उत्पन्न हुई होंगी। अब वह शक्तियाँ किस प्रकार की होंगी, यह कहना अभी कठिन है।मेरा सोचना सही था कि व्योम, कहानी की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण किरदार है। देखो न, नियति ने कैसा खेल रचा। वह सुप्रीम पर मौजूद नहीं था, लेकिन वह द्वीप पर मौजूद है, और साथ ही जब वह तालाब में गया, तो एक समुद्री घोड़े ने उसे पंचशूल तक पहुँचाया। इस घटना से यह सिद्ध होता है कि व्योम ही उस पंचशूल का सही उत्तराधिकारी है।
आपका सोचना निरर्थक नहीं है मित्र, व्योम एक अलग ही किरदार है, ओर अब तो वह रहस्यमय शक्तियों का स्वामि भी बन चुका है।
उसकी विशेषतायें तो नहीं बताउॅगा पर इतना जरूर कह सकता हूॅ कि अटलांटिस वृक्ष से जो कुछ भी निकल कर उसमें समाया है, वो रहस्यमई है, ओर किसी विशेष कार्य हेतू ही हुआ है।

शिन्ज़ो और रिन्ज़ो दोनों दुनिया को "आविष्कार"के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं, लेकिन इनका सच भी एक दिन अवश्य सामने आएगा।
बिल्कुल ऐसा ही है।
कुल मिलाकर,यह अपडेट हमेशा की तरह शानदार था।
आपकी कहानी पढ़ते-पढ़ते मेरी हिंदी भाषा में और अधिक शुद्धता आ रही है।


BY
ETERNITY ARCEUS
आपके इस शानदार मंतव्य के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद मित्र। 🙏🏼🙏🏼 साथ बने रहिए, अगला अपडेट जल्द ही।
 
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