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Adultery सज्जनपुर की कहानी

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Arthur Morgan

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मित्रगण कहानी का नया अध्याय नंबर 22, पेज संख्या 43 पर पोस्ट कर दिया है। अच्छे से रिव्यू दें लाइक करें।
अपडेट जल्दी जल्दी दे रहा हूं पर रिव्यू नहीं आ रहे हैं उस अनुसार, थोड़ा सा समय लगाएं जिससे मेरी भी इच्छा हो आगे और जल्दी लिखने की।
।।बहुत बहुत धन्यवाद।।
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“आसानी से नहीं मानेगी, तो थोड़ा ज़ोर लगाएँगे,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ कहा। “तुम लोग बस मेरे साथ रहो, सब मज़े मिलेंगे।”
सोनू और कम्मू कर्मा की बातों से प्रभावित थे, मगर मन्नू के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह चुप रहा। जीप गाँव की ओर बढ़ रही थी, और चारों अपनी-अपनी सोच में डूबे थे।

ग्यारहवाँ अध्याय
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जीप धूल भरी सड़कों पर उड़ती हुई आखिरकार सज्जनपुर पहुँची। कर्मा ने सोनू, कम्मू, और मन्नू को उनके घरों के बाहर छोड़ दिया। रात गहरी हो चुकी थी, और गाँव की गलियाँ सन्नाटे में डूबी थीं। मन्नू बिना कुछ बोले अपने घर की ओर चला गया, मगर कम्मू के चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी। वह ठिठका हुआ खड़ा था, और सोनू ने उसकी बेचैनी भाँप ली।

“क्या हुआ, तू क्या सोच रहा है?” सोनू ने पूछा।

“यार, देर हो गई है,” कम्मू ने उदास लहजे में कहा। “पापा डाँटेंगे।”

“अरे, वो तो अब तक सो गए होंगे,” सोनू ने हल्के से हँसते हुए कहा।

“अबे, किवाड़ खुलवाऊँगा, तो जाग जाएँगे न?” कम्मू ने चिंता से कहा।

सोनू ने एक पल सोचा और बोला, “तो मत खुलवा न। मेरे घर से दीवार फाँदकर चला जा।”

कम्मू को यह उपाय ठीक लगा। दोनों सोनू के घर की ओर बढ़े। सोनू ने किवाड़ खटखटाया, तो नींद भरी आँखों के साथ नेहा ने दरवाज़ा खोला। दोनों अंदर दाखिल हुए। आँगन में एक छोटी सी दीवार थी, जो सोनू के घर को कम्मू के घर से अलग करती थी। कम्मू ने चुपके से दीवार फाँदी और अपने आँगन में पहुँच गया। उसने नज़र घुमाई—सब सो रहे थे। उसके भाई-बहन खटिया पर गहरी नींद में थे, मगर पापा की खाट खाली थी। कम्मू का दिल धक् से रह गया। “पापा जाग रहे हैं?” उसने सोचा।

तभी उसकी नज़र अंदर के कमरे की ओर गई। किवाड़ के नीचे से हल्की सी रौशनी टिमटिमा रही थी। “माँ अभी तक जाग रही है?” कम्मू के मन में जिज्ञासा जागी। वह धीरे-धीरे कमरे की ओर बढ़ा। किवाड़ के पास पहुँचते ही उसे अंदर से कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ें सुनाई दीं—हल्की सिसकियाँ, जैसे कोई दबी हुई साँसें। कम्मू रुक गया। उसका मन उत्सुकता और संकोच के बीच झूल रहा था। उसने धीरे से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाई और अंदर झाँका। जो उसने देखा, उससे उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

बिस्तर पर उसके पापा अजीत थे, पूरी तरह नंगे। उनके नीचे उसकी माँ सुमन थी, जो भी नंगी थी। अजीत अपनी पत्नी की मोटी-मोटी चूचियों को मसल रहे थे, कभी उन्हें चूस रहे थे, तो कभी चाट रहे थे।

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सुमन की हल्की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं। उसका चेहरा आनंद और उत्तेजना से भरा था। कम्मू का मुँह सूखने लगा। उसका किशोर मन इस दृश्य को देखकर हिल गया। उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह गलत है। वह अपने माँ-बाप को इस तरह नहीं देख सकता। उसने जल्दी से आँखें हटाईं और पीछे हट गया।

आँगन में एक नज़र डाली—सब सो रहे थे। कम्मू का मन द्वंद्व में फँस गया। एक तरफ वह जानता था कि यह गलत है, मगर दूसरी तरफ उसकी जिज्ञासा उसे और देखने के लिए उकसा रही थी। पहली बार वह दो लोगों को काम रस में डूबे हुए देख रहा था। उसका किशोर मन उत्तेजना और उत्सुकता से भर उठा। कुछ देर सोचने के बाद उसकी जिज्ञासा जीत गई। उसने सोचा, “सब सो रहे हैं। थोड़ा देख लूँगा, तो किसी को पता नहीं चलेगा।”

वह फिर से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाकर अंदर देखने लगा। मगर अब नज़ारा बदल चुका था, और यह पहले से भी ज़्यादा उत्तेजक था। अब उसकी माँ सुमन उसकी ओर मुँह करके थी, पूरी तरह नंगी। उसके पापा अजीत पीछे से अपनी कमर हिला रहे थे। उनका एक हाथ सुमन की एक चूची पर था, जो उसे मसल रहा था, और दूसरा हाथ उसके मखमली पेट को सहला रहा था। कम्मू को अपनी माँ का पूरा नंगा बदन सामने से दिख रहा था—उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, जो हर धक्के के साथ हिल रही थीं, गहरी नाभि, मांसल पेट, और नीचे हल्की-हल्की झाँटों के बीच उसकी रसीली चूत, जिसमें उसके पापा का लंड अंदर-बाहर हो रहा था।

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कम्मू ने इससे पहले ऐसा उत्तेजक दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी माँ का चेहरा आनंद में डूबा था। उसकी आँखें बंद थीं, और वह अपने होंठों को काट रही थी। कम्मू का लंड पैंट में खड़ा हो गया, और उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ। वह बस आँखें फाड़े अंदर देख रहा था। उसका हाथ अनायास ही पैंट के ऊपर से अपने लंड को सहलाने लगा। अचानक उसे होश आया, और उसने जल्दी से हाथ हटा लिया। वह खुद को धिक्कारने लगा, “ये क्या कर रहा हूँ? अपने माँ-बाप को देखकर ये सब करना गलत है!”

तभी आँगन में किसी के खाँसने की आवाज़ आई। कम्मू तुरंत हरकत में आया और दबे पाँव अपनी खाट पर जाकर लेट गया। उसका लंड अभी भी पैंट में तंबू बनाए हुए था। उसके मन में एक साथ ढेर सारे विचार उमड़ रहे थे। उसकी आँखों के सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था—उसकी माँ का नंगा बदन, उसकी चूचियाँ, उसकी चूत, और पापा का लंड। उसने खुद को शांत करने की कोशिश की, मगर उसका लंड जस का तस खड़ा था।

वह सोचने लगा, “ऐसे नहीं चलेगा। इसे शांत करना पड़ेगा।” उसने चादर अपने ऊपर डाल ली और चुपके से पैंट खोलकर लंड बाहर निकाल लिया। उसने हल्के-हल्के मुठियाना शुरू किया। वह जोर लगाकर हलवाइन और लाली के बदन के बारे में सोचने की कोशिश करने लगा, मगर कुछ ही पल बाद उसकी माँ का नंगा बदन फिर से उसकी आँखों के सामने आ गया। उसका लंड उसके हाथ में और सख्त हो गया। इस बार वह खुद को रोक नहीं पाया। अपनी माँ के बदन को याद करते हुए वह मुठियाने लगा। जल्द ही उसके लंड ने उसकी मुट्ठी और पेट पर अपना रस उगल दिया। झड़ने के बाद उसे थोड़ी शांति मिली, मगर तुरंत ही ग्लानि ने उसे घेर लिया। वह सोचते-सोचते कब नींद में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।

---


सुबह की पहली किरण के साथ सज्जनपुर जाग उठा। गायों की रँभाहट और खेतों से मज़दूरों की आवाज़ों ने गाँव को जीवंत कर दिया। सोनू और रजनी समय पर हवेली पहुँच चुके थे। रजनी रसोई में बिमला के साथ मिलकर नाश्ता तैयार कर रही थी, और सोनू हवेली के बाहरी हिस्से में झाड़ू लगा रहा था। मगर उसका मन कहीं और था। रात का नाच, लाली की थिरकन, और कर्मा की बेपरवाह बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं।

हवेली की रसोई में रजनी आटा गूँध रही थी, तभी सरोज तैयार होकर आई। “रजनी, सुन,” सरोज ने कहा। “मैं और कर्मा के पापा शहर जा रहे हैं। बाबूजी की चाय तो मैंने बिमला के हाथों भेज दी है। तू कर्मा को जगा दे और उसे चाय दे देना। अभी तक सो रहा है वो।”

“ठीक है, जीजी,” रजनी ने जवाब दिया।

सरोज नीलेश के साथ चली गई। रजनी ने चाय बनाई, मगर मन ही मन वह सोच रही थी। वह कर्मा की नज़रों और उसकी आदतों से वाकिफ थी। वह हमेशा उससे बचकर रहती थी, मगर हवेली में काम करते हुए कब तक वह उससे नज़रें चुरा सकती थी? खैर, काम तो करना ही था। चाय तैयार हो गई। उसने एक कप में चाय भरी, ट्रे में रखी, और कर्मा के कमरे की ओर बढ़ गई।

कर्मा अभी भी गहरी नींद में था। वह सिर्फ़ बनियान और निक्कर पहने बिस्तर पर पड़ा था। रजनी ने उसे आवाज़ दी, “लल्ला, उठो! चाय ले लो।” मगर कर्मा पर कोई असर नहीं हुआ। रजनी ने मन में सोचा, “ये लड़का तो घोड़े बेचकर सोता है।” उसने चाय ट्रे में बगल की टेबल पर रख दी और कर्मा के कंधे को हल्के से सहलाकर उसे जगाने की कोशिश की।

कर्मा ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने रजनी को देखा। वह तुरंत सीधा होकर बैठ गया। “उठ गए, लल्ला,” रजनी ने कहा। “लो, चाय पी लो।”

“अभी पी लूँगा, चाची,” कर्मा ने आँखें मसलते हुए कहा।

“ठीक है,” रजनी ने कहा। “जीजी और साहब शहर गए हैं। तुझे जो कुछ खाना हो, बता दे। मैं बना दूँगी।”

“शहर? क्यों?” कर्मा ने पूछा।

“ये तो मुझे भी नहीं पता, लल्ला,” रजनी ने जवाब दिया। “चल, तू चाय पी ले। मैं बाकी काम निपटा लेती हूँ।”

रजनी जैसे ही जाने को मुड़ी, कर्मा ने उसे रोक लिया। “अरे, रुको न, चाची! काम तो होते रहेंगे। थोड़ी देर मेरे पास तो बैठो।”

“अरे, नहीं, लल्ला,” रजनी ने हल्के से कहा। “पहले काम निपटा लूँ, फिर आराम से बातें करेंगे।”

मगर कर्मा कहाँ मानने वाला था? उसने रजनी का हाथ पकड़कर खींच लिया। “अरे, नहीं, चाची! मुझे अकेले अच्छा नहीं लगता।” खींचने की वजह से रजनी का संतुलन बिगड़ा, और वह पीछे की ओर गिरने लगी। कर्मा ने उसे पकड़ लिया और अपनी गोद में बिठा लिया। रजनी का पल्लू सरक गया, और उसका भरा हुआ बदन कर्मा के सामने था। कर्मा ने मौके का फायदा उठाया और तुरंत रजनी के पेट और चूचियों को मसलने लगा।

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रजनी हैरान रह गई। “अरे, लल्ला, नहीं! छोड़ो मुझे!” उसने छूटने की कोशिश करते हुए कहा। “लल्ला, ऐसे नहीं करते!”

मगर कर्मा नहीं रुका। वह रजनी के बदन को मसलते हुए उत्तेजित हो रहा था। रजनी ने फिर से जोर लगाया और इस बार धक्का देकर उसकी पकड़ से छूट गई। वह खड़ी हो गई और जल्दी से अपना पल्लू ठीक किया। उसका चेहरा गुस्से और परेशानी से भरा था, मगर वह यह भी जानती थी कि कर्मा के साथ गुस्सा करना उसके लिए ठीक नहीं होगा। हवेली में काम करने की मजबूरी थी।

कर्मा ने बेपरवाही से कहा, “क्या हुआ, चाची? इतना क्या घबरा रही हो? मैं काटूँगा नहीं। आओ, बैठो न।”

रजनी ने खुद को शांत किया। वह कुछ सोचकर कर्मा के बगल में बिस्तर पर बैठ गई। कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये हुई न बात, चाची। वैसे, एक बात कहूँ?”

“हाँ, बोलो,” रजनी ने थोड़ा संभलते हुए कहा।

“तुम बहुत सुंदर हो, सच में,” कर्मा ने तारीफ भरे लहजे में कहा।

रजनी को उसकी बात सुनकर हँसी आ गई। “हट, लल्ला! मैं और सुंदर?” उसने हँसते हुए कहा। “सुंदर तो तेरी उम्र की लड़कियाँ होती हैं। तेरी दुल्हन होगी सुंदर।”

“मेरा वश चले, तो मैं तुम्हें ही अपनी दुल्हन बना लूँ,” कर्मा ने शरारत भरे लहजे में कहा।

रजनी फिर से मुस्कुरा दी। अपनी तारीफ सुनना हर औरत को अच्छा लगता है, और रजनी भी अपवाद नहीं थी। भले ही वह कर्मा के स्वभाव को जानती थी, मगर अपने बेटे की उम्र के लड़के से तारीफ सुनकर उसे अच्छा लग रहा था। “लल्ला, बातें बहुत बनाते हो तुम,” उसने हँसते हुए कहा।

“अच्छा, तो न करूँ बातें? कुछ और करूँ?” कर्मा ने शरारत से कहा।

“कुछ और क्या?” रजनी ने पूछा।

कर्मा उसकी ओर झुका और अचानक उसके कंधे और गर्दन पर हाथ रखकर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए। रजनी इस बार हैरान नहीं हुई, न ही पीछे हटी। कर्मा को यह देखकर खुशी हुई। वह रजनी के होंठों को चूसने लगा।

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रजनी जानती थी कि जो हो रहा है, वह गलत है, मगर वह कर्मा को रोक नहीं रही थी। कर्मा के होंठों का रस पीते हुए वह उसका साथ देने लगी। उसका बदन कर्मा के चुंबन का जवाब देने लगा। अपने से आधी उम्र के लड़के का साथ पाकर उसका बदन उत्तेजित हो रहा था।

कर्मा का चूमने का तरीका रजनी को हैरान कर रहा था। वह उसके होंठों को हल्के से दबाकर, बड़े आराम से चूस रहा था, बिना किसी आक्रामकता के। यह रजनी को बहुत भा रहा था। वह खुद को रोक नहीं पाई और कर्मा का साथ देने लगी। कर्मा का जोश और बढ़ गया। उसने अपनी जीभ रजनी के मुँह में डाल दी। रजनी भी अब पीछे हटने वाली नहीं थी। वह कर्मा की जीभ का जवाब अपनी जीभ से देने लगी। दोनों के बदन एक-दूसरे से सटे थे, और कमरे में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी।

कर्मा के होंठ रजनी के होंठों को चूस रहे थे, और उसकी उंगलियाँ रजनी की साड़ी के पल्लू को धीरे-धीरे नीचे सरका रही थीं। रजनी उत्तेजना के समंदर में डूब चुकी थी। उसका मन, उसका शरीर, सब कर्मा की हरकतों में खो चुके थे।
कर्मा की चालाक उंगलियों ने रजनी के ब्लाउज़ के बटन खोलने शुरू किए। उसकी हर हरकत में एक कुशल कारीगर की तरह निपुणता थी। कुछ ही पलों में ब्लाउज़ रजनी के बदन से अलग होकर बिस्तर पर गिर गया। कर्मा ने होंठों को छोड़ा और रजनी की ओर देखा। रजनी ने जब अपनी स्थिति का अंदाज़ा लगाया, तो उसकी आँखें शर्म और हैरानी से फैल गईं। वह ऊपर से पूरी तरह नंगी थी। उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ कर्मा की आँखों के सामने थीं, जो पके हुए आमों की तरह भारी और रसीली थीं। रजनी ने तुरंत अपने हाथों से उन्हें ढक लिया।

कर्मा को रजनी की यह हरकत देखकर हँसी आ गई। उसकी शरारती मुस्कान और गहरी नज़रों ने रजनी को और बेचैन कर दिया। रजनी के हाथ व्यस्त होने का फायदा उठाते हुए कर्मा ने उसकी साड़ी को भी खींच लिया। साड़ी फर्श पर गिर पड़ी, और अब रजनी के बदन पर सिर्फ़ एक पेटीकोट बचा था। उसने अपनी चूचियों को अब भी हाथों से ढके रखा था, मगर कर्मा का इरादा रुकने का नहीं था। उसने एक बार फिर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए और उसे धीरे से बिस्तर पर पीछे की ओर लिटा दिया। वह खुद रजनी के ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूसने लगा। कर्मा के हाथ रजनी के नंगे बदन पर फिसल रहे थे, जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार का आनंद ले रहा हो।

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रजनी की साँसें तेज़ हो रही थीं। कर्मा ने होंठों को चूसते हुए उसके हाथ उसकी चूचियों से हटा दिए और उन्हें अपने मज़बूत हाथों में भर लिया। उसने धीरे-धीरे, मगर ज़ोर से, रजनी की चूचियों को दबाना शुरू किया। रजनी मचल उठी। उसका बदन उत्तेजना की लहरों में डूब रहा था। हर दबाव के साथ उसकी साँसें और भारी हो रही थीं। कर्मा की उंगलियाँ उसकी चूचियों को मसल रही थीं, और रजनी का शरीर जवाब दे रहा था। उसकी सारी मर्यादा, संस्कार, और सही-गलत का बोध इस आनंद के सामने फीका पड़ गया था। कर्मा, जो उसकी बेटे की उम्र का था, उसके बदन को मसल रहा था, चूस रहा था, और रजनी को यह सब अच्छा लग रहा था। उसका मन ग्लानि और उत्तेजना के बीच झूल रहा था, मगर उत्तेजना भारी पड़ रही थी।

कर्मा ने रजनी के होंठों को छोड़ा और उसकी आँखों में देखते हुए बोला, “आह, चाची, बहुत रसीली हो तुम! मज़ा आ गया।” उसकी आवाज़ में वासना और शरारत दोनों थी। वह नीचे सरका और रजनी की गर्दन को चूमने लगा। उसकी जीभ रजनी की नरम त्वचा पर फिसल रही थी, और फिर वह और नीचे गया। उसने रजनी की छाती को चाटा और आखिरकार उसकी एक चूची को अपने मुँह में भर लिया। दूसरी चूची को वह अपने हाथ से दबा रहा था। रजनी के लिए अब खुद को संभालना असंभव हो गया। वह कर्मा के नीचे मचल रही थी, उसका बदन झटके खा रहा था। उसके मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं। “आह… लल्ला… आराम से… ओह… ह्म्म… आह… चूसो…” उसकी आवाज़ में आनंद और बेचैनी दोनों थी। उसके हाथ कर्मा के सिर पर चल रहे थे, जैसे वह उसे और करीब खींचना चाहती हो।

कर्मा ने एक चूची को जी भरकर चूसा, फिर दूसरी को मुँह में लिया। वह हर पल रजनी की उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। रजनी का बदन अब पूरी तरह कर्मा के हवाले था। चूचियों को चूसने के बाद कर्मा ने उन्हें छोड़ा। रजनी ने शर्म से फिर से अपनी चूचियों को हाथों से ढक लिया, मगर कर्मा ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वह और नीचे सरका और रजनी के मखमली पेट को चूमने और चाटने लगा।

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उसकी जीभ रजनी की गहरी नाभि के आसपास घूम रही थी। रजनी तड़प उठी। “आह… आह…” उसकी आहें कमरे में गूँज रही थीं। कर्मा का एक हाथ उसके पेट को मसल रहा था, और दूसरा उसके नंगे कंधों और छाती पर फिसल रहा था। रजनी को ऐसा आनंद पहले कभी नहीं मिला था। उसके पति दिलीप ने कभी उसके बदन का इस तरह स्वाद नहीं लिया था। कर्मा जैसे उसके हर अंग को पूज रहा था।

कर्मा ने रजनी की आँखों में देखा। उसकी नज़रों में वासना की चमक थी। “आह, चाची, क्या बदन है तुम्हारा!” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इतना स्वादिष्ट! पूरी मलाई हो तुम।” रजनी यह सुनकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा दी। उसकी साँसें और तेज़ हो गईं। कर्मा ने अपना हाथ नीचे बढ़ाया और रजनी के पेटीकोट को ऊपर खींचने लगा। रजनी की साँसें और चढ़ गईं। कर्मा ने धीरे-धीरे पेटीकोट को उसकी जाँघों तक चढ़ा दिया और फिर अपने हाथ को उसकी टाँगों के बीच ले गया। उसने रजनी की गरम, बहती हुई चूत को सहलाना शुरू किया। रजनी कर्मा का हाथ अपनी चूत पर महसूस करते ही पागल सी हो गई। “ओह… लल्ला… आह… उम्म… नहीं… आह… कर्मा…” उसकी आहें अब और तेज़ हो रही थीं।

कर्मा ने उसकी आहों को शांत करने के लिए एक बार फिर उसके होंठों को चूसना शुरू किया। वह रजनी की जीभ को अपनी जीभ से लपेट रहा था, उसकी गर्दन को पागलों की तरह चूस रहा था।

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रजनी का अनैतिक रिश्ता उसे और उत्तेजित कर रहा था। यह गलत था, मगर यही गलतपन उसे और आनंद दे रहा था। हवेली शांत पड़ी थी। बाहर सोनू अपने काम में व्यस्त था, अनजान कि उसकी माँ और उसका नया दोस्त कर्मा अंदर वासना के खेल में डूबे हुए थे।

कर्मा अब रजनी की टाँगों के बीच जगह ले चुका था। वह उसकी जाँघों को चूमते हुए धीरे-धीरे ऊपर बढ़ रहा था। रजनी का पेटीकोट अब उसकी कमर पर इकट्ठा हो चुका था। कर्मा ने उसकी चूत के आसपास के हिस्से को चाटना और चूमना शुरू किया। रजनी उत्तेजना से पागल हो रही थी। वह अपनी चूचियों को खुद मसल रही थी और आहें भर रही थी। “ओह… कर्मा… आह… लल्ला… ओह… ऐसे ही… आह… खा जा… आह…” उसकी आवाज़ में तड़प थी। कर्मा जानबूझकर उसकी चूत को छेड़ रहा था, उसके आसपास चाट रहा था, ताकि उसकी तड़प और बढ़े। उसका एक हाथ रजनी के नंगे पेट और छाती पर फिसल रहा था, और दूसरा उसकी जाँघों को सहला रहा था।

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रजनी ने कभी नहीं सोचा था कि उसके बेटे की उम्र का लड़का उसे ऐसा सुख दे सकता है। उसके पति दिलीप का तरीका हमेशा जल्दबाज़ी भरा था। वह चढ़ता, धक्के लगाता, और अपने आनंद में खोकर हट जाता। रजनी के सुख की उसने कभी परवाह नहीं की। नीलेश ने उसे पहली बार संभोग के सुख से परिचित कराया था, मगर कर्मा उसे उस सुख के समंदर में डुबकी लगवा रहा था। उसका पूरा बदन वासना के पानी में तर हो चुका था।

जैसे ही कर्मा ने अपनी जीभ रजनी की चूत पर फिराई, रजनी का बदन पूरा ऐंठ गया। उसकी साँसें रुक सी गईं, और अगले ही पल वह स्खलित हो गई। उसका शरीर काँप रहा था, और वह बिस्तर पर बुरी तरह हाँफने लगी। कर्मा ने उसकी टाँगों के बीच से सिर निकाला और सीधा होकर अपने कपड़े उतारने लगा। कुछ ही पलों में वह पूरी तरह नंगा हो गया। उसका मोटा, लंबा लंड फनफनाता हुआ रजनी की चूत की ओर देख रहा था। कर्मा से अब रुका नहीं जा रहा था। उसने रजनी की टाँगों के बीच फिर से जगह ली। रजनी अभी भी आँखें बंद करके अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी।

कर्मा ने अपने लंड को रजनी की चूत के द्वार पर रखा और एक धक्के के साथ उसे अंदर सरका दिया। रजनी की आँखें झटके से खुल गईं, और उसका मुँह आनंद और हैरानी से खुला रह गया। “आह… लल्ला… ओह… ये क्या… आह…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“बहुत गरम चूत है तुम्हारी, चाची,” कर्मा ने वासना भरी आवाज़ में कहा। “आह, अब रुका नहीं जाता।” उसने एक-दो धक्के और लगाए और अपना लंड जड़ तक रजनी की चूत में घुसा दिया। रजनी की चूत कर्मा के मोटे लंड से पूरी तरह भर गई थी। उसका बदन जैसे बिजली के झटके खा रहा था। कर्मा ने रजनी की चूचियों को थाम लिया और धक्के लगाना शुरू कर दिया। वह उसकी चूचियों को मसलते हुए उसे चोदने लगा।

रजनी कर्मा के हर धक्के को अपनी चूत में महसूस कर रही थी। उसका शरीर आनंद की लहरों में डूब रहा था। “आह… लल्ला… आह… ऐसे ही…” वह आहें भर रही थी। कर्मा की गति बढ़ रही थी, और उसकी उंगलियाँ रजनी की चूचियों को मसल रही थीं।

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“ओह… आह… चाची, कितना मज़ा आ रहा है तुम्हारी चूत में,” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा। “आह, कितनी कसी हुई है।”

“आह… लल्ला… ऐसे ही… मुझे भी… आह…” रजनी ने जवाब दिया। वह अब सारी शर्म और झिझक भूल चुकी थी। वह बस उस आनंद में डूब रही थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है, आह… बोलो?”

“ओह… आह… हाँ, लल्ला… ओह… कर्मा, मुझे भी मज़ा आ रहा है,” रजनी ने काँपती आवाज़ में कहा।

“तो खुलकर बोलो न, चाची,” कर्मा ने उसे उकसाया। “आह, बोलो तुम्हें चुदाई में मज़ा आ रहा है। अपनी चूत में मेरा लंड लेकर मज़ा आ रहा है।”

रजनी ने बिना रुके कहा, “हाँ… आह… लल्ला, मज़ा आ रहा है… इसमें…”

कर्मा ने अचानक खुद को रोका और अपना लंड रजनी की चूत से बाहर निकाल लिया। रजनी को अपनी चूत का खाली होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। “आह… लल्ला, नहीं… डालो अंदर…” उसने तड़पते हुए कहा।

कर्मा सोफे पर टिककर बैठ गया और शरारती मुस्कान के साथ बोला, “चाची, लंड चाहिए, तो खुलकर बोलो और आओ, ले लो।”

रजनी जानती थी कि कर्मा उसे अपनी ताकत दिखा रहा है, मगर उसकी चूत में उठ रही आग उसे बेचैन कर रही थी। वह एक पल के लिए सकुचाई, फिर बोली, “हाँ, लल्ला… मुझे दे दो… अपना… वो… लंड…” वह कर्मा के पास आई।

“अपनी किसमें लोगी, चाची?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।

रजनी थोड़ा शरमाई, मगर बोली, “अपनी… वो… अपनी चूत में…”

कर्मा ने उसे अपने ऊपर आने का इशारा किया। रजनी तुरंत उसके ऊपर आ गई और उसकी ओर पीठ करके नीचे बैठी। कर्मा का लंड एक बार फिर उसकी चूत में समा गया। दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली। रजनी ने धीरे-धीरे खुद को कर्मा के लंड पर उछालना शुरू किया। कर्मा ने उसकी चूचियों को पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर उछालने में मदद करने लगा।

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“ओह… चाची… आह… ऐसे ही… आह… ऐसे ही…” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा।

“आह… आह… लल्ला… कितना मोटा है…” रजनी ने तड़पते हुए जवाब दिया।

“तुम्हारी चूत भी बड़ी कसी हुई है, आह… चाची,” कर्मा ने कहा। “लगता है, चुदाई नहीं हुई तुम्हारी ठीक से।”

“हाँ… आह… लल्ला, तेरा चाचा तो शराबी है,” रजनी ने हाँफते हुए कहा। “वो बस दो-चार धक्के लगाकर हट जाता था।”

“हाँ, चाची, पर तुम्हारे जैसे बदन वाली को तो अच्छे से, मज़े से, मसल-मसलकर चोदना चाहिए,” कर्मा ने जोश में कहा।

“हाँ… लल्ला… जैसे तू चोद रहा है… आह… ऐसे ही…” रजनी ने जवाब दिया।

“आह, चाची, और गंदी बातें करो न,” कर्मा ने उकसाया। “अपने अंदर की गर्मी और गंदगी को बाहर निकालो।”

रजनी, जिसे कर्मा के साथ इतना मज़ा आ रहा था, अब किसी बात से मना नहीं कर सकती थी। “आह… लल्ला… ओह… चोद… अपनी चाची की प्यासी चूत को… आह… कबसे प्यासी थी ये मोटे लंड के लिए… आह… ऐसे ही भर दे…” उसकी आवाज़ में तड़प और वासना दोनों थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुमने पापा से भी चुदवाया है न? आह, कैसा लग रहा है बाप के बाद बेटे से चुदवाने में?”

रजनी यह सुनकर और उत्तेजित हो गई। यह अनैतिक रिश्ता, यह गलतपन, उसे और आनंद दे रहा था। उसने बाप और बेटे, दोनों के लंड अपनी चूत में लिए थे। “हाँ… लल्ला… आह… पहले बाप और अब बेटा मुझे चोद रहा है… आह… और मैं दोनों के ही लंड को अपनी प्यासी चूत में समा रही हूँ…” उसने तड़पते हुए कहा।

“मज़ा आ रहा है तुम्हें, चाची?” कर्मा ने पूछा। “अब रोज़ चुदोगी न?”

“हाँ… लल्ला… बहुत मज़ा… अब तो जब तू बोलेगा, तब चोदूँगी…” रजनी ने हाँफते हुए जवाब दिया।

कर्मा उसकी बातें सुनकर और उत्तेजित हो गया। उसने रजनी को सीधा किया और खुद सोफे से पैर लटकाकर बैठ गया। रजनी को उसने अपनी कमर से थाम लिया और उसे अपने लंड पर उछालना शुरू किया। रजनी को इस आसन में खुलकर उछलने की आज़ादी मिली। उसकी चूचियाँ हर झटके के साथ नाच रही थीं। उसका पूरा बदन लहर मार रहा था। कर्मा उसे अपनी कमर से थामकर ज़ोर-ज़ोर से उछाल रहा था, और उसका लंड रजनी की चूत में जड़ तक जा रहा था।

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दोनों की उत्तेजना अपने चरम पर थी। रजनी का शरीर काँपने लगा। वह फिर से स्खलित होने वाली थी। कर्मा भी अब खुद को रोक नहीं पा रहा था। उसका लंड रजनी की चूत में पिचकारी मारने लगा, और उसने रजनी की चूत को अपने रस से भर दिया। दोनों पीछे की ओर लेट गए, बुरी तरह हाँफते हुए। उनकी साँसें कमरे में गूँज रही थीं। रजनी का बदन पसीने और आनंद में तर था, और कर्मा की आँखों में संतुष्टि की चमक थी। दोनों अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे।

रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।

जारी रहेगी
बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गया
ये साला कम्मु अपनी माँ और बाप की चुदाई का खेल देखकर पुरी तरहा से बावला हो गया हैं
वही हवेली में कर्मा ने रजनी की गदराई चुद पर अपने मोटे लंबे और तगडे लंड की मोहर ठोक कर उसे चुदाई के असीम आनंद से पहली बार रुबरु करा कर अपने लंड के लिये एक और चुद का इंतजाम बडी ही चालाकी से कर लिया
बडा ही जबरदस्त अपडेट हैं
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 

sunoanuj

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“आसानी से नहीं मानेगी, तो थोड़ा ज़ोर लगाएँगे,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ कहा। “तुम लोग बस मेरे साथ रहो, सब मज़े मिलेंगे।”
सोनू और कम्मू कर्मा की बातों से प्रभावित थे, मगर मन्नू के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह चुप रहा। जीप गाँव की ओर बढ़ रही थी, और चारों अपनी-अपनी सोच में डूबे थे।

ग्यारहवाँ अध्याय​


जीप धूल भरी सड़कों पर उड़ती हुई आखिरकार सज्जनपुर पहुँची। कर्मा ने सोनू, कम्मू, और मन्नू को उनके घरों के बाहर छोड़ दिया। रात गहरी हो चुकी थी, और गाँव की गलियाँ सन्नाटे में डूबी थीं। मन्नू बिना कुछ बोले अपने घर की ओर चला गया, मगर कम्मू के चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी। वह ठिठका हुआ खड़ा था, और सोनू ने उसकी बेचैनी भाँप ली।

“क्या हुआ, तू क्या सोच रहा है?” सोनू ने पूछा।

“यार, देर हो गई है,” कम्मू ने उदास लहजे में कहा। “पापा डाँटेंगे।”

“अरे, वो तो अब तक सो गए होंगे,” सोनू ने हल्के से हँसते हुए कहा।

“अबे, किवाड़ खुलवाऊँगा, तो जाग जाएँगे न?” कम्मू ने चिंता से कहा।

सोनू ने एक पल सोचा और बोला, “तो मत खुलवा न। मेरे घर से दीवार फाँदकर चला जा।”

कम्मू को यह उपाय ठीक लगा। दोनों सोनू के घर की ओर बढ़े। सोनू ने किवाड़ खटखटाया, तो नींद भरी आँखों के साथ नेहा ने दरवाज़ा खोला। दोनों अंदर दाखिल हुए। आँगन में एक छोटी सी दीवार थी, जो सोनू के घर को कम्मू के घर से अलग करती थी। कम्मू ने चुपके से दीवार फाँदी और अपने आँगन में पहुँच गया। उसने नज़र घुमाई—सब सो रहे थे। उसके भाई-बहन खटिया पर गहरी नींद में थे, मगर पापा की खाट खाली थी। कम्मू का दिल धक् से रह गया। “पापा जाग रहे हैं?” उसने सोचा।

तभी उसकी नज़र अंदर के कमरे की ओर गई। किवाड़ के नीचे से हल्की सी रौशनी टिमटिमा रही थी। “माँ अभी तक जाग रही है?” कम्मू के मन में जिज्ञासा जागी। वह धीरे-धीरे कमरे की ओर बढ़ा। किवाड़ के पास पहुँचते ही उसे अंदर से कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ें सुनाई दीं—हल्की सिसकियाँ, जैसे कोई दबी हुई साँसें। कम्मू रुक गया। उसका मन उत्सुकता और संकोच के बीच झूल रहा था। उसने धीरे से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाई और अंदर झाँका। जो उसने देखा, उससे उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

बिस्तर पर उसके पापा अजीत थे, पूरी तरह नंगे। उनके नीचे उसकी माँ सुमन थी, जो भी नंगी थी। अजीत अपनी पत्नी की मोटी-मोटी चूचियों को मसल रहे थे, कभी उन्हें चूस रहे थे, तो कभी चाट रहे थे।

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सुमन की हल्की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं। उसका चेहरा आनंद और उत्तेजना से भरा था। कम्मू का मुँह सूखने लगा। उसका किशोर मन इस दृश्य को देखकर हिल गया। उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह गलत है। वह अपने माँ-बाप को इस तरह नहीं देख सकता। उसने जल्दी से आँखें हटाईं और पीछे हट गया।

आँगन में एक नज़र डाली—सब सो रहे थे। कम्मू का मन द्वंद्व में फँस गया। एक तरफ वह जानता था कि यह गलत है, मगर दूसरी तरफ उसकी जिज्ञासा उसे और देखने के लिए उकसा रही थी। पहली बार वह दो लोगों को काम रस में डूबे हुए देख रहा था। उसका किशोर मन उत्तेजना और उत्सुकता से भर उठा। कुछ देर सोचने के बाद उसकी जिज्ञासा जीत गई। उसने सोचा, “सब सो रहे हैं। थोड़ा देख लूँगा, तो किसी को पता नहीं चलेगा।”

वह फिर से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाकर अंदर देखने लगा। मगर अब नज़ारा बदल चुका था, और यह पहले से भी ज़्यादा उत्तेजक था। अब उसकी माँ सुमन उसकी ओर मुँह करके थी, पूरी तरह नंगी। उसके पापा अजीत पीछे से अपनी कमर हिला रहे थे। उनका एक हाथ सुमन की एक चूची पर था, जो उसे मसल रहा था, और दूसरा हाथ उसके मखमली पेट को सहला रहा था। कम्मू को अपनी माँ का पूरा नंगा बदन सामने से दिख रहा था—उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, जो हर धक्के के साथ हिल रही थीं, गहरी नाभि, मांसल पेट, और नीचे हल्की-हल्की झाँटों के बीच उसकी रसीली चूत, जिसमें उसके पापा का लंड अंदर-बाहर हो रहा था।

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कम्मू ने इससे पहले ऐसा उत्तेजक दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी माँ का चेहरा आनंद में डूबा था। उसकी आँखें बंद थीं, और वह अपने होंठों को काट रही थी। कम्मू का लंड पैंट में खड़ा हो गया, और उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ। वह बस आँखें फाड़े अंदर देख रहा था। उसका हाथ अनायास ही पैंट के ऊपर से अपने लंड को सहलाने लगा। अचानक उसे होश आया, और उसने जल्दी से हाथ हटा लिया। वह खुद को धिक्कारने लगा, “ये क्या कर रहा हूँ? अपने माँ-बाप को देखकर ये सब करना गलत है!”

तभी आँगन में किसी के खाँसने की आवाज़ आई। कम्मू तुरंत हरकत में आया और दबे पाँव अपनी खाट पर जाकर लेट गया। उसका लंड अभी भी पैंट में तंबू बनाए हुए था। उसके मन में एक साथ ढेर सारे विचार उमड़ रहे थे। उसकी आँखों के सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था—उसकी माँ का नंगा बदन, उसकी चूचियाँ, उसकी चूत, और पापा का लंड। उसने खुद को शांत करने की कोशिश की, मगर उसका लंड जस का तस खड़ा था।

वह सोचने लगा, “ऐसे नहीं चलेगा। इसे शांत करना पड़ेगा।” उसने चादर अपने ऊपर डाल ली और चुपके से पैंट खोलकर लंड बाहर निकाल लिया। उसने हल्के-हल्के मुठियाना शुरू किया। वह जोर लगाकर हलवाइन और लाली के बदन के बारे में सोचने की कोशिश करने लगा, मगर कुछ ही पल बाद उसकी माँ का नंगा बदन फिर से उसकी आँखों के सामने आ गया। उसका लंड उसके हाथ में और सख्त हो गया। इस बार वह खुद को रोक नहीं पाया। अपनी माँ के बदन को याद करते हुए वह मुठियाने लगा। जल्द ही उसके लंड ने उसकी मुट्ठी और पेट पर अपना रस उगल दिया। झड़ने के बाद उसे थोड़ी शांति मिली, मगर तुरंत ही ग्लानि ने उसे घेर लिया। वह सोचते-सोचते कब नींद में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।

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सुबह की पहली किरण के साथ सज्जनपुर जाग उठा। गायों की रँभाहट और खेतों से मज़दूरों की आवाज़ों ने गाँव को जीवंत कर दिया। सोनू और रजनी समय पर हवेली पहुँच चुके थे। रजनी रसोई में बिमला के साथ मिलकर नाश्ता तैयार कर रही थी, और सोनू हवेली के बाहरी हिस्से में झाड़ू लगा रहा था। मगर उसका मन कहीं और था। रात का नाच, लाली की थिरकन, और कर्मा की बेपरवाह बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं।

हवेली की रसोई में रजनी आटा गूँध रही थी, तभी सरोज तैयार होकर आई। “रजनी, सुन,” सरोज ने कहा। “मैं और कर्मा के पापा शहर जा रहे हैं। बाबूजी की चाय तो मैंने बिमला के हाथों भेज दी है। तू कर्मा को जगा दे और उसे चाय दे देना। अभी तक सो रहा है वो।”

“ठीक है, जीजी,” रजनी ने जवाब दिया।

सरोज नीलेश के साथ चली गई। रजनी ने चाय बनाई, मगर मन ही मन वह सोच रही थी। वह कर्मा की नज़रों और उसकी आदतों से वाकिफ थी। वह हमेशा उससे बचकर रहती थी, मगर हवेली में काम करते हुए कब तक वह उससे नज़रें चुरा सकती थी? खैर, काम तो करना ही था। चाय तैयार हो गई। उसने एक कप में चाय भरी, ट्रे में रखी, और कर्मा के कमरे की ओर बढ़ गई।

कर्मा अभी भी गहरी नींद में था। वह सिर्फ़ बनियान और निक्कर पहने बिस्तर पर पड़ा था। रजनी ने उसे आवाज़ दी, “लल्ला, उठो! चाय ले लो।” मगर कर्मा पर कोई असर नहीं हुआ। रजनी ने मन में सोचा, “ये लड़का तो घोड़े बेचकर सोता है।” उसने चाय ट्रे में बगल की टेबल पर रख दी और कर्मा के कंधे को हल्के से सहलाकर उसे जगाने की कोशिश की।

कर्मा ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने रजनी को देखा। वह तुरंत सीधा होकर बैठ गया। “उठ गए, लल्ला,” रजनी ने कहा। “लो, चाय पी लो।”

“अभी पी लूँगा, चाची,” कर्मा ने आँखें मसलते हुए कहा।

“ठीक है,” रजनी ने कहा। “जीजी और साहब शहर गए हैं। तुझे जो कुछ खाना हो, बता दे। मैं बना दूँगी।”

“शहर? क्यों?” कर्मा ने पूछा।

“ये तो मुझे भी नहीं पता, लल्ला,” रजनी ने जवाब दिया। “चल, तू चाय पी ले। मैं बाकी काम निपटा लेती हूँ।”

रजनी जैसे ही जाने को मुड़ी, कर्मा ने उसे रोक लिया। “अरे, रुको न, चाची! काम तो होते रहेंगे। थोड़ी देर मेरे पास तो बैठो।”

“अरे, नहीं, लल्ला,” रजनी ने हल्के से कहा। “पहले काम निपटा लूँ, फिर आराम से बातें करेंगे।”

मगर कर्मा कहाँ मानने वाला था? उसने रजनी का हाथ पकड़कर खींच लिया। “अरे, नहीं, चाची! मुझे अकेले अच्छा नहीं लगता।” खींचने की वजह से रजनी का संतुलन बिगड़ा, और वह पीछे की ओर गिरने लगी। कर्मा ने उसे पकड़ लिया और अपनी गोद में बिठा लिया। रजनी का पल्लू सरक गया, और उसका भरा हुआ बदन कर्मा के सामने था। कर्मा ने मौके का फायदा उठाया और तुरंत रजनी के पेट और चूचियों को मसलने लगा।

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रजनी हैरान रह गई। “अरे, लल्ला, नहीं! छोड़ो मुझे!” उसने छूटने की कोशिश करते हुए कहा। “लल्ला, ऐसे नहीं करते!”

मगर कर्मा नहीं रुका। वह रजनी के बदन को मसलते हुए उत्तेजित हो रहा था। रजनी ने फिर से जोर लगाया और इस बार धक्का देकर उसकी पकड़ से छूट गई। वह खड़ी हो गई और जल्दी से अपना पल्लू ठीक किया। उसका चेहरा गुस्से और परेशानी से भरा था, मगर वह यह भी जानती थी कि कर्मा के साथ गुस्सा करना उसके लिए ठीक नहीं होगा। हवेली में काम करने की मजबूरी थी।

कर्मा ने बेपरवाही से कहा, “क्या हुआ, चाची? इतना क्या घबरा रही हो? मैं काटूँगा नहीं। आओ, बैठो न।”

रजनी ने खुद को शांत किया। वह कुछ सोचकर कर्मा के बगल में बिस्तर पर बैठ गई। कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये हुई न बात, चाची। वैसे, एक बात कहूँ?”

“हाँ, बोलो,” रजनी ने थोड़ा संभलते हुए कहा।

“तुम बहुत सुंदर हो, सच में,” कर्मा ने तारीफ भरे लहजे में कहा।

रजनी को उसकी बात सुनकर हँसी आ गई। “हट, लल्ला! मैं और सुंदर?” उसने हँसते हुए कहा। “सुंदर तो तेरी उम्र की लड़कियाँ होती हैं। तेरी दुल्हन होगी सुंदर।”

“मेरा वश चले, तो मैं तुम्हें ही अपनी दुल्हन बना लूँ,” कर्मा ने शरारत भरे लहजे में कहा।

रजनी फिर से मुस्कुरा दी। अपनी तारीफ सुनना हर औरत को अच्छा लगता है, और रजनी भी अपवाद नहीं थी। भले ही वह कर्मा के स्वभाव को जानती थी, मगर अपने बेटे की उम्र के लड़के से तारीफ सुनकर उसे अच्छा लग रहा था। “लल्ला, बातें बहुत बनाते हो तुम,” उसने हँसते हुए कहा।

“अच्छा, तो न करूँ बातें? कुछ और करूँ?” कर्मा ने शरारत से कहा।

“कुछ और क्या?” रजनी ने पूछा।

कर्मा उसकी ओर झुका और अचानक उसके कंधे और गर्दन पर हाथ रखकर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए। रजनी इस बार हैरान नहीं हुई, न ही पीछे हटी। कर्मा को यह देखकर खुशी हुई। वह रजनी के होंठों को चूसने लगा।

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रजनी जानती थी कि जो हो रहा है, वह गलत है, मगर वह कर्मा को रोक नहीं रही थी। कर्मा के होंठों का रस पीते हुए वह उसका साथ देने लगी। उसका बदन कर्मा के चुंबन का जवाब देने लगा। अपने से आधी उम्र के लड़के का साथ पाकर उसका बदन उत्तेजित हो रहा था।

कर्मा का चूमने का तरीका रजनी को हैरान कर रहा था। वह उसके होंठों को हल्के से दबाकर, बड़े आराम से चूस रहा था, बिना किसी आक्रामकता के। यह रजनी को बहुत भा रहा था। वह खुद को रोक नहीं पाई और कर्मा का साथ देने लगी। कर्मा का जोश और बढ़ गया। उसने अपनी जीभ रजनी के मुँह में डाल दी। रजनी भी अब पीछे हटने वाली नहीं थी। वह कर्मा की जीभ का जवाब अपनी जीभ से देने लगी। दोनों के बदन एक-दूसरे से सटे थे, और कमरे में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी।

कर्मा के होंठ रजनी के होंठों को चूस रहे थे, और उसकी उंगलियाँ रजनी की साड़ी के पल्लू को धीरे-धीरे नीचे सरका रही थीं। रजनी उत्तेजना के समंदर में डूब चुकी थी। उसका मन, उसका शरीर, सब कर्मा की हरकतों में खो चुके थे।
कर्मा की चालाक उंगलियों ने रजनी के ब्लाउज़ के बटन खोलने शुरू किए। उसकी हर हरकत में एक कुशल कारीगर की तरह निपुणता थी। कुछ ही पलों में ब्लाउज़ रजनी के बदन से अलग होकर बिस्तर पर गिर गया। कर्मा ने होंठों को छोड़ा और रजनी की ओर देखा। रजनी ने जब अपनी स्थिति का अंदाज़ा लगाया, तो उसकी आँखें शर्म और हैरानी से फैल गईं। वह ऊपर से पूरी तरह नंगी थी। उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ कर्मा की आँखों के सामने थीं, जो पके हुए आमों की तरह भारी और रसीली थीं। रजनी ने तुरंत अपने हाथों से उन्हें ढक लिया।

कर्मा को रजनी की यह हरकत देखकर हँसी आ गई। उसकी शरारती मुस्कान और गहरी नज़रों ने रजनी को और बेचैन कर दिया। रजनी के हाथ व्यस्त होने का फायदा उठाते हुए कर्मा ने उसकी साड़ी को भी खींच लिया। साड़ी फर्श पर गिर पड़ी, और अब रजनी के बदन पर सिर्फ़ एक पेटीकोट बचा था। उसने अपनी चूचियों को अब भी हाथों से ढके रखा था, मगर कर्मा का इरादा रुकने का नहीं था। उसने एक बार फिर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए और उसे धीरे से बिस्तर पर पीछे की ओर लिटा दिया। वह खुद रजनी के ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूसने लगा। कर्मा के हाथ रजनी के नंगे बदन पर फिसल रहे थे, जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार का आनंद ले रहा हो।

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रजनी की साँसें तेज़ हो रही थीं। कर्मा ने होंठों को चूसते हुए उसके हाथ उसकी चूचियों से हटा दिए और उन्हें अपने मज़बूत हाथों में भर लिया। उसने धीरे-धीरे, मगर ज़ोर से, रजनी की चूचियों को दबाना शुरू किया। रजनी मचल उठी। उसका बदन उत्तेजना की लहरों में डूब रहा था। हर दबाव के साथ उसकी साँसें और भारी हो रही थीं। कर्मा की उंगलियाँ उसकी चूचियों को मसल रही थीं, और रजनी का शरीर जवाब दे रहा था। उसकी सारी मर्यादा, संस्कार, और सही-गलत का बोध इस आनंद के सामने फीका पड़ गया था। कर्मा, जो उसकी बेटे की उम्र का था, उसके बदन को मसल रहा था, चूस रहा था, और रजनी को यह सब अच्छा लग रहा था। उसका मन ग्लानि और उत्तेजना के बीच झूल रहा था, मगर उत्तेजना भारी पड़ रही थी।

कर्मा ने रजनी के होंठों को छोड़ा और उसकी आँखों में देखते हुए बोला, “आह, चाची, बहुत रसीली हो तुम! मज़ा आ गया।” उसकी आवाज़ में वासना और शरारत दोनों थी। वह नीचे सरका और रजनी की गर्दन को चूमने लगा। उसकी जीभ रजनी की नरम त्वचा पर फिसल रही थी, और फिर वह और नीचे गया। उसने रजनी की छाती को चाटा और आखिरकार उसकी एक चूची को अपने मुँह में भर लिया। दूसरी चूची को वह अपने हाथ से दबा रहा था। रजनी के लिए अब खुद को संभालना असंभव हो गया। वह कर्मा के नीचे मचल रही थी, उसका बदन झटके खा रहा था। उसके मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं। “आह… लल्ला… आराम से… ओह… ह्म्म… आह… चूसो…” उसकी आवाज़ में आनंद और बेचैनी दोनों थी। उसके हाथ कर्मा के सिर पर चल रहे थे, जैसे वह उसे और करीब खींचना चाहती हो।

कर्मा ने एक चूची को जी भरकर चूसा, फिर दूसरी को मुँह में लिया। वह हर पल रजनी की उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। रजनी का बदन अब पूरी तरह कर्मा के हवाले था। चूचियों को चूसने के बाद कर्मा ने उन्हें छोड़ा। रजनी ने शर्म से फिर से अपनी चूचियों को हाथों से ढक लिया, मगर कर्मा ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वह और नीचे सरका और रजनी के मखमली पेट को चूमने और चाटने लगा।

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उसकी जीभ रजनी की गहरी नाभि के आसपास घूम रही थी। रजनी तड़प उठी। “आह… आह…” उसकी आहें कमरे में गूँज रही थीं। कर्मा का एक हाथ उसके पेट को मसल रहा था, और दूसरा उसके नंगे कंधों और छाती पर फिसल रहा था। रजनी को ऐसा आनंद पहले कभी नहीं मिला था। उसके पति दिलीप ने कभी उसके बदन का इस तरह स्वाद नहीं लिया था। कर्मा जैसे उसके हर अंग को पूज रहा था।

कर्मा ने रजनी की आँखों में देखा। उसकी नज़रों में वासना की चमक थी। “आह, चाची, क्या बदन है तुम्हारा!” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इतना स्वादिष्ट! पूरी मलाई हो तुम।” रजनी यह सुनकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा दी। उसकी साँसें और तेज़ हो गईं। कर्मा ने अपना हाथ नीचे बढ़ाया और रजनी के पेटीकोट को ऊपर खींचने लगा। रजनी की साँसें और चढ़ गईं। कर्मा ने धीरे-धीरे पेटीकोट को उसकी जाँघों तक चढ़ा दिया और फिर अपने हाथ को उसकी टाँगों के बीच ले गया। उसने रजनी की गरम, बहती हुई चूत को सहलाना शुरू किया। रजनी कर्मा का हाथ अपनी चूत पर महसूस करते ही पागल सी हो गई। “ओह… लल्ला… आह… उम्म… नहीं… आह… कर्मा…” उसकी आहें अब और तेज़ हो रही थीं।

कर्मा ने उसकी आहों को शांत करने के लिए एक बार फिर उसके होंठों को चूसना शुरू किया। वह रजनी की जीभ को अपनी जीभ से लपेट रहा था, उसकी गर्दन को पागलों की तरह चूस रहा था।

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रजनी का अनैतिक रिश्ता उसे और उत्तेजित कर रहा था। यह गलत था, मगर यही गलतपन उसे और आनंद दे रहा था। हवेली शांत पड़ी थी। बाहर सोनू अपने काम में व्यस्त था, अनजान कि उसकी माँ और उसका नया दोस्त कर्मा अंदर वासना के खेल में डूबे हुए थे।

कर्मा अब रजनी की टाँगों के बीच जगह ले चुका था। वह उसकी जाँघों को चूमते हुए धीरे-धीरे ऊपर बढ़ रहा था। रजनी का पेटीकोट अब उसकी कमर पर इकट्ठा हो चुका था। कर्मा ने उसकी चूत के आसपास के हिस्से को चाटना और चूमना शुरू किया। रजनी उत्तेजना से पागल हो रही थी। वह अपनी चूचियों को खुद मसल रही थी और आहें भर रही थी। “ओह… कर्मा… आह… लल्ला… ओह… ऐसे ही… आह… खा जा… आह…” उसकी आवाज़ में तड़प थी। कर्मा जानबूझकर उसकी चूत को छेड़ रहा था, उसके आसपास चाट रहा था, ताकि उसकी तड़प और बढ़े। उसका एक हाथ रजनी के नंगे पेट और छाती पर फिसल रहा था, और दूसरा उसकी जाँघों को सहला रहा था।

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रजनी ने कभी नहीं सोचा था कि उसके बेटे की उम्र का लड़का उसे ऐसा सुख दे सकता है। उसके पति दिलीप का तरीका हमेशा जल्दबाज़ी भरा था। वह चढ़ता, धक्के लगाता, और अपने आनंद में खोकर हट जाता। रजनी के सुख की उसने कभी परवाह नहीं की। नीलेश ने उसे पहली बार संभोग के सुख से परिचित कराया था, मगर कर्मा उसे उस सुख के समंदर में डुबकी लगवा रहा था। उसका पूरा बदन वासना के पानी में तर हो चुका था।

जैसे ही कर्मा ने अपनी जीभ रजनी की चूत पर फिराई, रजनी का बदन पूरा ऐंठ गया। उसकी साँसें रुक सी गईं, और अगले ही पल वह स्खलित हो गई। उसका शरीर काँप रहा था, और वह बिस्तर पर बुरी तरह हाँफने लगी। कर्मा ने उसकी टाँगों के बीच से सिर निकाला और सीधा होकर अपने कपड़े उतारने लगा। कुछ ही पलों में वह पूरी तरह नंगा हो गया। उसका मोटा, लंबा लंड फनफनाता हुआ रजनी की चूत की ओर देख रहा था। कर्मा से अब रुका नहीं जा रहा था। उसने रजनी की टाँगों के बीच फिर से जगह ली। रजनी अभी भी आँखें बंद करके अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी।

कर्मा ने अपने लंड को रजनी की चूत के द्वार पर रखा और एक धक्के के साथ उसे अंदर सरका दिया। रजनी की आँखें झटके से खुल गईं, और उसका मुँह आनंद और हैरानी से खुला रह गया। “आह… लल्ला… ओह… ये क्या… आह…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“बहुत गरम चूत है तुम्हारी, चाची,” कर्मा ने वासना भरी आवाज़ में कहा। “आह, अब रुका नहीं जाता।” उसने एक-दो धक्के और लगाए और अपना लंड जड़ तक रजनी की चूत में घुसा दिया। रजनी की चूत कर्मा के मोटे लंड से पूरी तरह भर गई थी। उसका बदन जैसे बिजली के झटके खा रहा था। कर्मा ने रजनी की चूचियों को थाम लिया और धक्के लगाना शुरू कर दिया। वह उसकी चूचियों को मसलते हुए उसे चोदने लगा।

रजनी कर्मा के हर धक्के को अपनी चूत में महसूस कर रही थी। उसका शरीर आनंद की लहरों में डूब रहा था। “आह… लल्ला… आह… ऐसे ही…” वह आहें भर रही थी। कर्मा की गति बढ़ रही थी, और उसकी उंगलियाँ रजनी की चूचियों को मसल रही थीं।

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“ओह… आह… चाची, कितना मज़ा आ रहा है तुम्हारी चूत में,” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा। “आह, कितनी कसी हुई है।”

“आह… लल्ला… ऐसे ही… मुझे भी… आह…” रजनी ने जवाब दिया। वह अब सारी शर्म और झिझक भूल चुकी थी। वह बस उस आनंद में डूब रही थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है, आह… बोलो?”

“ओह… आह… हाँ, लल्ला… ओह… कर्मा, मुझे भी मज़ा आ रहा है,” रजनी ने काँपती आवाज़ में कहा।

“तो खुलकर बोलो न, चाची,” कर्मा ने उसे उकसाया। “आह, बोलो तुम्हें चुदाई में मज़ा आ रहा है। अपनी चूत में मेरा लंड लेकर मज़ा आ रहा है।”

रजनी ने बिना रुके कहा, “हाँ… आह… लल्ला, मज़ा आ रहा है… इसमें…”

कर्मा ने अचानक खुद को रोका और अपना लंड रजनी की चूत से बाहर निकाल लिया। रजनी को अपनी चूत का खाली होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। “आह… लल्ला, नहीं… डालो अंदर…” उसने तड़पते हुए कहा।

कर्मा सोफे पर टिककर बैठ गया और शरारती मुस्कान के साथ बोला, “चाची, लंड चाहिए, तो खुलकर बोलो और आओ, ले लो।”

रजनी जानती थी कि कर्मा उसे अपनी ताकत दिखा रहा है, मगर उसकी चूत में उठ रही आग उसे बेचैन कर रही थी। वह एक पल के लिए सकुचाई, फिर बोली, “हाँ, लल्ला… मुझे दे दो… अपना… वो… लंड…” वह कर्मा के पास आई।

“अपनी किसमें लोगी, चाची?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।

रजनी थोड़ा शरमाई, मगर बोली, “अपनी… वो… अपनी चूत में…”

कर्मा ने उसे अपने ऊपर आने का इशारा किया। रजनी तुरंत उसके ऊपर आ गई और उसकी ओर पीठ करके नीचे बैठी। कर्मा का लंड एक बार फिर उसकी चूत में समा गया। दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली। रजनी ने धीरे-धीरे खुद को कर्मा के लंड पर उछालना शुरू किया। कर्मा ने उसकी चूचियों को पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर उछालने में मदद करने लगा।

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“ओह… चाची… आह… ऐसे ही… आह… ऐसे ही…” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा।

“आह… आह… लल्ला… कितना मोटा है…” रजनी ने तड़पते हुए जवाब दिया।

“तुम्हारी चूत भी बड़ी कसी हुई है, आह… चाची,” कर्मा ने कहा। “लगता है, चुदाई नहीं हुई तुम्हारी ठीक से।”

“हाँ… आह… लल्ला, तेरा चाचा तो शराबी है,” रजनी ने हाँफते हुए कहा। “वो बस दो-चार धक्के लगाकर हट जाता था।”

“हाँ, चाची, पर तुम्हारे जैसे बदन वाली को तो अच्छे से, मज़े से, मसल-मसलकर चोदना चाहिए,” कर्मा ने जोश में कहा।

“हाँ… लल्ला… जैसे तू चोद रहा है… आह… ऐसे ही…” रजनी ने जवाब दिया।

“आह, चाची, और गंदी बातें करो न,” कर्मा ने उकसाया। “अपने अंदर की गर्मी और गंदगी को बाहर निकालो।”

रजनी, जिसे कर्मा के साथ इतना मज़ा आ रहा था, अब किसी बात से मना नहीं कर सकती थी। “आह… लल्ला… ओह… चोद… अपनी चाची की प्यासी चूत को… आह… कबसे प्यासी थी ये मोटे लंड के लिए… आह… ऐसे ही भर दे…” उसकी आवाज़ में तड़प और वासना दोनों थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुमने पापा से भी चुदवाया है न? आह, कैसा लग रहा है बाप के बाद बेटे से चुदवाने में?”

रजनी यह सुनकर और उत्तेजित हो गई। यह अनैतिक रिश्ता, यह गलतपन, उसे और आनंद दे रहा था। उसने बाप और बेटे, दोनों के लंड अपनी चूत में लिए थे। “हाँ… लल्ला… आह… पहले बाप और अब बेटा मुझे चोद रहा है… आह… और मैं दोनों के ही लंड को अपनी प्यासी चूत में समा रही हूँ…” उसने तड़पते हुए कहा।

“मज़ा आ रहा है तुम्हें, चाची?” कर्मा ने पूछा। “अब रोज़ चुदोगी न?”

“हाँ… लल्ला… बहुत मज़ा… अब तो जब तू बोलेगा, तब चोदूँगी…” रजनी ने हाँफते हुए जवाब दिया।

कर्मा उसकी बातें सुनकर और उत्तेजित हो गया। उसने रजनी को सीधा किया और खुद सोफे से पैर लटकाकर बैठ गया। रजनी को उसने अपनी कमर से थाम लिया और उसे अपने लंड पर उछालना शुरू किया। रजनी को इस आसन में खुलकर उछलने की आज़ादी मिली। उसकी चूचियाँ हर झटके के साथ नाच रही थीं। उसका पूरा बदन लहर मार रहा था। कर्मा उसे अपनी कमर से थामकर ज़ोर-ज़ोर से उछाल रहा था, और उसका लंड रजनी की चूत में जड़ तक जा रहा था।

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दोनों की उत्तेजना अपने चरम पर थी। रजनी का शरीर काँपने लगा। वह फिर से स्खलित होने वाली थी। कर्मा भी अब खुद को रोक नहीं पा रहा था। उसका लंड रजनी की चूत में पिचकारी मारने लगा, और उसने रजनी की चूत को अपने रस से भर दिया। दोनों पीछे की ओर लेट गए, बुरी तरह हाँफते हुए। उनकी साँसें कमरे में गूँज रही थीं। रजनी का बदन पसीने और आनंद में तर था, और कर्मा की आँखों में संतुष्टि की चमक थी। दोनों अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे।

रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।


जारी रहेगी

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Arthur Morgan

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रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।

बारहवाँ अध्याय​


रजनी कर्मा की बाहों में लेटी थी, दोनों अभी भी नंगे थे। कर्मा के हाथ में एक किताब थी, जिसमें चुदाई के अलग-अलग आसनों और कामुक क्रियाओं की तस्वीरें थीं। रजनी की आँखें आश्चर्य से फैली हुई थीं। “हाय दईया, ये सब भी होता है?” उसने हैरानी भरे लहजे में कहा।

“और क्या, चाची? और बहुत मज़ा भी आता है, करके देखो,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, किताब की तस्वीरों को और करीब से दिखाते हुए।

“अच्छा, बोल तो ऐसे रहे हो जैसे सब किया हो तुमने,” रजनी ने हँसते हुए तंज कसा।

“किया नहीं है, पर कर तो सकता हूँ—तुम्हारे साथ,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा।

“धत्त, बदमाश!” रजनी ने हँसते हुए कहा, मगर उसकी आँखों में शरारत और उत्तेजना की चमक थी।

कर्मा ने रजनी को अपने लंड की ओर धकेलते हुए कहा, “चाची, करो ना, लो ना अपने मुँह में।”

रजनी ने कर्मा की आँखों में देखा, थोड़ा शरमाते हुए बोली, “छी, ये मुँह में लेने वाली चीज़ थोड़े ही है!”

“अच्छा, एक बार लेकर देखो,” कर्मा ने उकसाया। “अगर अच्छा न लगे, तो मत करना।”

“बस एक बार?” रजनी ने संकोच भरे लहजे में पूछा।

“हाँ, पक्का,” कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा। “पर अगर अच्छा लगे, तो रुकना भी मत।”

रजनी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कर्मा की ओर देखा। वह कर्मा की बेपरवाह और खिलंदड़ी बातों में खो चुकी थी। कर्मा का व्यवहार उसे किसी तरह का दबाव नहीं देता था; वह उसके साथ खेलता था, बराबरी का व्यवहार करता था। रजनी को लगता था जैसे वह फिर से एक जवान, कुंवारी लड़की बन गई हो। शायद यही वजह थी कि वह कर्मा को कुछ भी मना नहीं कर पाती थी। दूसरी बात, उसकी उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। नीलेश और फिर सरोज-बिमला के साथ के अनुभवों ने उसे अपने बदन के सुख से परिचित करा दिया था। अब वह उस सुख का पूरा आनंद लेना चाहती थी। सही-गलत, समाज, मर्यादा—ये सब अब उसके लिए फीके पड़ चुके थे। जब तक उसने इनकी परवाह की थी, उसे सिर्फ़ दुख और दुत्कार मिली थी। मगर जब से उसने अपने बदन की सुनना शुरू किया, उसे सुख ही सुख मिल रहा था। उसकी परेशानियाँ जैसे गायब हो गई थीं।

रजनी ने अपना सिर झुकाया और कर्मा के लंड पर अपने होंठ टिका दिए। कर्मा उस गर्म, मुलायम स्पर्श से मचल उठा। “आह… चाची… ओह… अहम्म…” उसकी आहें कमरे में गूँज उठीं। रजनी को यह ताकत अच्छी लग रही थी—वह अपने होंठों से एक मर्द को, या यों कहें, अपने बेटे की उम्र के लड़के को तड़पा सकती थी। वह उसके साथ खेल सकती थी। उसने थोड़ा और मुँह खोला और कर्मा के लंड के टोपे को अपने मुँह में भर लिया। उसका कड़क, गर्म अहसास और हल्का सा नमकीन स्वाद पहले तो रजनी को अजीब लगा। मगर कुछ पल बाद उसे यह उतना बुरा भी नहीं लगा। उसने लंड को मुँह से निकाला और कर्मा की ओर देखा।

“क्या हुआ, चाची? अच्छा नहीं लगा?” कर्मा ने पूछा, उसकी आँखों में शरारत थी।

“थोड़ा अलग सा है,” रजनी ने कहा। “पर इतना बुरा भी नहीं।”

“तो वापस लो न,” कर्मा ने उकसाया।

“कितना बेसब्र है तू, लल्ला,” रजनी ने हँसते हुए कहा। उसने फिर से लंड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे वह अभ्यस्त हो गई। पहले वह हल्के से चूसती, फिर निकाल लेती।

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हर बार वह थोड़ा और गहराई तक लेने लगी। कर्मा आहें भर रहा था। “आह… चाची… ओह…” उसकी सिसकियाँ रजनी को और उत्तेजित कर रही थीं। वह अब पूरी लगन से कर्मा का लंड चूस रही थी, उसका आधे से ज़्यादा लंड उसके मुँह में समा रहा था। कर्मा का बदन मचल रहा था। उसने रजनी का सिर पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर दबा दिया। अगले ही पल वह गुर्राते हुए झड़ने लगा। एक के बाद एक पिचकारी रजनी के मुँह में भरने लगी। रजनी, जिसका मुँह दबा हुआ था, के पास कोई चारा नहीं था। उसने कर्मा का रस गटक लिया। उसे उसकी गंध और स्वाद बुरा नहीं लगा, बल्कि यह उसे और उत्तेजित कर गया।

झड़ने के बाद कर्मा ने रजनी का सिर छोड़ा। रजनी ने लंड निकाला और हाँफते हुए पीछे हट गई। दोनों बिस्तर पर लेटे, हाँफते हुए एक-दूसरे के बगल में। कुछ देर बाद रजनी उठी और अपने कपड़े पहनने लगी।

“अभी से जा रही हो?” कर्मा ने पूछा, उसकी आवाज़ में शरारत अब भी बाकी थी।

“हाँ, और अब तू भी उठ। नहा ले, बदन पसीने से महक रहा है,” रजनी ने हल्के से डाँटते हुए कहा। उसने कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई। कर्मा लेटा रहा, चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान लिए। फिर वह उठा और नहाने चला गया।

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**कम्मू का घर**

सुबह की पहली किरण के साथ कम्मू की आँखें खुलीं। उसे रात का दृश्य सता रहा था—उसके माँ-पापा की चुदाई, और फिर उसकी माँ के नंगे बदन को याद करके उसने जो किया। ग्लानि उसके मन को खाए जा रही थी। “हाय, मैंने अपनी माँ को सोचकर हिलाया। ये कितना बड़ा पाप है!” वह खुद को कोस रहा था। मगर उसकी आँखों के सामने अब भी वही दृश्य था—सुमन का भरा हुआ बदन, उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, गहरी नाभि, और रसीली चूत। वह खुद को समझाने की कोशिश करता हुआ उठा और सुबह के काम निपटाने लगा।

आज का दिन बादलों से घिरा हुआ था। फूल सिंह के घर में चहल-पहल थी। अजीत और कुसुम शहर जा रहे थे, धीरज की शादी के लिए कपड़े और दूसरा सामान लेने। फूल सिंह सुबह-सुबह खेतों की ओर निकल चुके थे। उन्हें शहर जाना और खरीदारी करना पसंद नहीं था, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी अजीत पर थी। सुमन, अनामिका, और अंजू को घर की दीवारें पोतने का काम था। धीरज, जतन, और कम्मू को बारिश से पहले उपले और भूसा झोपड़ी में रखने का काम मिला था। कुल मिलाकर, सबके पास कोई न कोई काम था।


सज्जनपुर से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क आती थी, जहाँ से शहर के लिए बस मिलती थी। सज्जनपुर और सड़क के बीच सिर्फ़ खेत और जंगल थे। अजीत और कुसुम सुबह जल्दी निकल पड़े। कुसुम ने लाल साड़ी पहनी थी, जो उसके भरे हुए बदन को और निखार रही थी। अजीत ने नीला कुरता-पायजामा पहना था, और कंधे पर गमछा डाला हुआ था।

“इस लाल साड़ी में तो बिल्कुल लाल परी लग रही हो, भाभी,” अजीत ने गाँव से बाहर निकलते ही मज़ाक में छेड़ा।

“तुम भी इस नीले कुरते में नीले कबूतर लग रहे हो, देवर जी,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया।

दोनों मज़ाक करते हुए चल रहे थे। करीब डेढ़ किलोमीटर चले होंगे कि अचानक बादल गरजने लगे, और बारिश शुरू हो गई। “धत्त, तेरी की! लो, हो गई खरीदारी!” कुसुम ने झल्लाते हुए कहा।

“अरे, भाभी, उधर जंगल में चलो,” अजीत ने कहा। “पेड़ों के नीचे थोड़ा बच जाएँगे।”

“हाँ, यहाँ तो तुरंत भीग जाएँगे,” कुसुम ने सहमति जताई।

दोनों रास्ते से हटकर जंगल की ओर बढ़ गए। वे घने पेड़ों की तलाश में थे, मगर बारिश तेज़ थी। जंगल में घुसने के बावजूद वे ज़्यादा देर नहीं बच पाए। दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। कुसुम की साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी, और उसका भरा हुआ बदन अब और उभर रहा था। उसका ब्लाउज़ उसकी मोटी चूचियों को तान रहा था, और गीली साड़ी उसकी गहरी नाभि और मांसल पेट को उघाड़ रही थी। अजीत का कुरता भी भीगकर चिपक गया था, और वह बार-बार अपनी भाभी की ओर देख रहा था।

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वे एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो गए, मगर बारिश की बूँदें अब भी उनकी देह को भिगो रही थीं। कुसुम ने अपनी साड़ी निचोड़ी और हँसते हुए कहा, “हाय, अब तो सारा मज़ा खराब हो गया।”

अजीत ने उसकी ओर देखा। उसकी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिक गईं। “अरे, भाभी, मज़ा तो अब शुरू हुआ है,” उसने शरारत भरे लहजे में कहा।

कुसुम ने उसकी ओर देखा और हँस पड़ी। “तूम भी न, देवर जी, मौके का फायदा उठाने से चूकते नहीं।”

दोनों हँसते हुए पेड़ के नीचे खड़े थे, मगर बारिश की ठंडक और उनके भीगे हुए बदनों ने माहौल को एक नई गर्मी दे दी थी।

कुसुम की लाल साड़ी उसके बदन से चिपककर उसकी मोटी चूचियों, गहरी नाभि, और भरे हुए चूतड़ों को और उभार रही थी। अजीत का नीला कुरता भीगकर उसकी देह से लिपट गया था, और उसकी आँखों में वासना की चमक साफ़ झलक रही थी। दोनों के बीच मज़ाकिया छेड़छाड़ अब एक अलग ही रंग ले रही थी।
“वैसे, भाभी, इस बारिश में तुम्हें कुछ करने का मन नहीं कर रहा?” अजीत ने शरारत भरे लहजे में पूछा, अपनी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिकाते हुए।
“कर रहा है न, घर जाने का मन कर रहा है,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया, अपनी साड़ी निचोड़ते हुए।
“अरे, ऐसी बारिश में घर जाने का क्या मतलब?” अजीत ने पास आते हुए कहा। “ऐसी बारिश तो आग शांत करने के लिए होती है।”
“अच्छा, इतना भीग गए, फिर कौन सी आग है जो बुझी नहीं तुम्हारी?” कुसुम ने भौंहें चढ़ाकर, मज़ाक में तंज कसा।
“अंदर की आग है, भाभी,” अजीत ने अपनी आवाज़ को और गहरा करते हुए कहा।
“अंदर की कौन सी? खुलकर बताओ,” कुसुम ने शरारत से पूछा, उसकी आँखों में भी अब एक चमक थी।
“अरे, भाभी, बनो मत। तुम सब जानती हो,” अजीत ने हँसते हुए कहा।
“नहीं तो, मैं कुछ नहीं जानती। तुम ही बताओ,” कुसुम ने मासूमियत का नाटक करते हुए कहा।
“क्यों, भैया ने कभी आग नहीं बुझाई तुम्हारी, बारिश में भीगते हुए?” अजीत ने और पास आते हुए पूछा।
“अरे, वो और बारिश में भीगेंगे, वो भी मेरे साथ?” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया। “तुम अपने भैया को नहीं जानते क्या?”
“जानता हूँ, पर बदन की आग कुछ भी करवा सकती है,” अजीत ने अपनी नज़रें कुसुम की चूचियों पर टिकाते हुए कहा।
“लगता है, बहुत जोर की आग है तुम्हारे अंदर, देवर जी,” कुसुम ने छेड़ते हुए कहा। “बुझा क्यों नहीं लेते?”
“बुझा तो लूँ, पर तुम हाँ ही नहीं कहती,” अजीत ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया।
“अरे, आग तुम्हारी है, इसमें मैं क्या हाँ-ना कहूँ? बुझा लो,” कुसुम ने हँसते हुए कहा।
“पक्का?” अजीत ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।
“हाँ, पक्का,” कुसुम ने बेपरवाही से कहा, मगर उसकी आवाज़ में एक हल्की सी काँप थी।
अजीत ने कुसुम की ओर देखा, और फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए। कुसुम एक पल के लिए हैरान रह गई। उसे लगा था कि यह सिर्फ़ मज़ाक था, जैसा वह और अजीत अक्सर करते थे। मगर आज पहली बार उसके देवर ने हद पार कर दी थी। बारिश का मौसम, उनके भीगे हुए बदन, या कुसुम के अंदर की उत्तेजना—कुछ तो था, जिसने उसे अजीत का साथ देने के लिए मजबूर कर दिया। वह धीरे-धीरे अजीत के होंठों का जवाब देने लगी।


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दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे के होंठों को चूमते रहे। जब उनके होंठ अलग हुए, तो कुसुम को शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने नज़रें दूसरी ओर कर लीं।
अजीत अभी भी अपनी भाभी को देख रहा था। बारिश की बूँदें उसके बदन को और उत्तेजित कर रही थीं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। कुसुम का मखमली पेट और गहरी नाभि अब अजीत की आँखों के सामने थी। कुसुम आँखें नीचे किए खड़ी रही, उसका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल था। अजीत ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम के पेट पर रख दिया। कुसुम के बदन में जैसे बिजली सी दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। अजीत ने फिर से अपने होंठ कुसुम के होंठों से मिला दिए और उसके पेट को सहलाने लगा।

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कुसुम इस आनंद में इतनी खो गई कि उसे होश तब आया, जब वह अजीत की गोद में थी। उसकी साड़ी और ब्लाउज़ बदन से अलग पेड़ के नीचे पड़े थे। वह अब सिर्फ़ पेटीकोट और ब्रा में थी। वह कुछ सोच पाती, इससे पहले अजीत ने फिर से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

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कुसुम की शर्म अब धीरे-धीरे उत्तेजना में बदल रही थी। अजीत ने उसकी ब्रा को खींचकर उतार दिया, और कुसुम की मोटी-मोटी चूचियाँ अब पूरी तरह नंगी थीं। बारिश की बूँदें उन पर टपक रही थीं, जिससे वे और चमक रही थीं। अजीत ने कुसुम की चूचियों को अपने हाथों में लिया और उन्हें मसलने लगा। “आह… भाभी… क्या मस्त चूचियाँ हैं तुम्हारी,” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इनका रस तो मैं कबसे चखना चाहता था।”
कुसुम ने हल्के से विरोध किया। “अरे… देवर जी… नहीं… ये गलत है…” उसकी आवाज़ में शर्म थी, मगर उसका बदन अजीत के स्पर्श का जवाब दे रहा था।
“गलत क्या, भाभी?” अजीत ने उसकी चूचियों को और ज़ोर से दबाते हुए कहा। “जब बदन मज़ा ले रहा है, तो गलत क्या? बोलो, मज़ा नहीं आ रहा तुम्हें?”
कुसम शरमाते हुए चुप रही, मगर उसकी साँसें तेज़ थीं। अजीत ने उसका पेटीकोट ऊपर खींचा और उसे कमर तक इकट्ठा कर दिया। कुसुम की चूत अब बारिश में भीगकर और रसीली हो गई थी। अजीत ने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत पर फेरनी शुरू कीं। “आह… भाभी… कितनी गीली है तुम्हारी चूत… ये तो मुझसे मिलने को तड़प रही है,” उसने कहा।
“अरे… नहीं… अजीत… छोड़ो…” कुसुम ने हल्के से कहा, मगर उसका विरोध अब कमज़ोर पड़ रहा था। उसका बदन अजीत के स्पर्श में पिघल रहा था।
अजीत ने कुसुम को पेड़ के तने से टिका दिया और अपनी धोती खोल दी। उसका मोटा, कड़क लंड बारिश में चमक रहा था। “देखो, भाभी, ये कितना तड़प रहा है तुम्हारी चूत के लिए,” उसने वासना भरे लहजे में कहा। उसने कुसुम की टाँगें फैलाईं और अपने लंड को उसकी चूत के द्वार पर रखा। कुसुम ने एक आखिरी बार शरमाते हुए कहा, “अजीत… नहीं… ये ठीक नहीं…”
मगर अजीत ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसने एक ज़ोरदार धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में जड़ तक समा गया। कुसुम की चीख निकल गई। “आह… अजीत… ओह…” उसकी साँसें काँप रही थीं। अजीत ने उसकी कमर थाम ली और धक्के लगाना शुरू कर दिया। “आह… भाभी… कितनी कसी हुई चूत है तुम्हारी… आह… मज़ा आ रहा है… बोलो, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है न?” उसने गंदी बातें करते हुए कहा।

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कुसुम की शुरुआती शर्म अब पूरी तरह टूट चुकी थी। वह अजीत के धक्कों का जवाब अपनी कमर हिलाकर दे रही थी। “आह… हाँ… अजीत… आह… मज़ा आ रहा है…” उसने हाँफते हुए कहा। उसका बदन बारिश और वासना में तर था। अजीत ने उसकी चूचियों को मसलते हुए और ज़ोर से धक्के लगाए। “आह… भाभी… तुम्हारी चूत को तो मैं रोज़ चोदना चाहता हूँ… आह… कितना रस है इसमें…” वह गुर्राते हुए बोला।
“आह… अजीत… चोदो… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को भर दो…” कुसुम ने भी अब खुलकर गंदी बातें शुरू कर दीं। उसकी सारी शर्म, सारी मर्यादा बारिश के पानी के साथ बह चुकी थी। वह अजीत के लंड के हर धक्के का आनंद ले रही थी।
अजीत ने कुसुम को ज़मीन पर लिटा दिया और उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उसने और तेज़ी से धक्के लगाना शुरू किया। “आह… भाभी… तुम्हारी चूचियाँ देख… कैसे नाच रही हैं… आह… साली, तू तो पूरी मलाई है…” उसने कहा। कुसुम की चूचियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं, और उसका मखमली पेट बारिश में चमक रहा था।
“आह… अजीत… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को फाड़ दो…” कुसुम ने तड़पते हुए कहा। उसका बदन अब पूरी तरह अजीत के हवाले था। बारिश की बूँदें उनके नंगे बदनों पर टपक रही थीं, और जंगल का सन्नाटा उनकी आहों और सिसकियों से गूँज रहा था।
अजीत ने कुसुम की चूत में अपने लंड को और ज़ोर से ठूँसा। “आह… भाभी… तुम्हारा बदन तो स्वर्ग है… आह… अब रोज़ चोदूँगा…” उसने गुर्राते हुए कहा। कुसुम की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसका बदन काँपने लगा, और वह स्खलित होने वाली थी। “आह… अजीत… मैं… आह… मैं जा रही हूँ…” उसने चीखते हुए कहा। उसी पल अजीत भी अपने चरम पर था। उसने एक आखिरी धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में पिचकारी मारने लगा। दोनों एक साथ स्खलित हो गए।
वे ज़मीन पर लेट गए, बारिश में भीगे हुए, हाँफते हुए। कुसुम की साँसें अभी भी तेज़ थीं। उसका मन ग्लानि और आनंद के बीच झूल रहा था। यह गलत था, मगर इस सुख ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। अजीत ने कुसुम की ओर देखा और मुस्कुराया। “क्या बात है, भाभी… ये बारिश तो सचमुच आग बुझाने वाली थी।”
कुसुम ने शरमाते हुए उसकी ओर देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी साड़ी उठाकर पहनने लगी। बारिश अब धीमी पड़ रही थी, मगर उनके बदनों की गर्मी अभी बाकी थी। पर गर्मी के साथ साथ अभी जो हुआ उसकी ग्लानि के बादल भी छाने लगे थे।


हवेली के बाहर सोनू का मन काम में नहीं लग रहा था। बारिश की वजह से काम कम था, मगर उसका दिमाग कहीं और था। हलवाइन की मोटी चूचियाँ, लाली की थिरकती कमर, और कभी-कभी कम्मू की माँ सुमन और ताई कुस के भरे हुए बदन उसके मन में कौंध रहे थे। कर्मा ने उसके मन में यह बीज बो दिया था, और अब वह इन खयालों से परेशान था। वह सोच रहा था कि इन विचारों का क्या करे। उसे लगा कि अगर कोई उसकी मदद कर सकता है, तो वह कर्मा ही है। वह बेसब्री से कर्मा के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।
जल्द ही कर्मा हवेली से बाहर निकला। सोनू उसे देखते ही खुश हो गया। “अरे, कर्मा भैया, आज बड़ी देर लगा दी अंदर!”
कर्मा ने सोनू को मुस्कुराकर देखा और मन ही मन सोचा, “अगर तुझे पता होता कि मैं अंदर क्या कर रहा था, तो ये सवाल नहीं पूछता।” उसने बेपरवाही से कहा, “अरे, हाँ, थोड़ा देर से उठा। तू बता, काम हो गया?”
“बारिश की वजह से काम ही नहीं है कुछ,” सोनू ने जवाब दिया।
“हाँ, ये तो है,” कर्मा ने कहा।
सोनू ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कुछ बात करनी थी।”
“हाँ, बोल न, इतना शरमा क्या रहा है?” कर्मा ने हँसते हुए कहा।
सोनू ने हिम्मत जुटाकर अपने खयालों के बारे में बताया। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “लड़का बड़ा हो रहा है। ये तो होगा ही, और होना भी चाहिए।”
“पर, भैया, मुझे लगता है मैं गलत कर रहा हूँ,” सोनू ने उदास लहजे में कहा।
“अरे, इसमें गलत क्या है?” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “जवान है, लंड तो खड़ा होगा ही। तू बता, भूख लगती है तो क्या करता है?”
“खाना खाता हूँ,” सोनू ने जवाब दिया।
“वैसे ही, जैसे वो पेट की भूख है, ये बदन की भूख है,” कर्मा ने समझाया। “जब पेट की भूख गलत नहीं, तो बदन की गलत कैसे हो सकती है?”
“हाँ, ये भी है,” सोनू ने कर्मा की बातों से प्रभावित होकर कहा।
“तभी तो कहता हूँ, खुलकर मज़े ले,” कर्मा ने कहा। “सही-गलत के चक्कर में रहा, तो हाथ मलता रह जाएगा।”
“पर कभी-कभी किसी ऐसे के लिए भी गलत खयाल आ जाते हैं, जिसके लिए नहीं आने चाहिए,” सोनू ने संकोच से कहा। “फिर ग्लानि होती है।”
“अरे, ग्लानि कैसी?” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “तुझे भूख लगी है और खाना सामने है, तो खाने का मन करेगा ही। अब ये थोड़े सोचेगा कि खाना किसी और का है, इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए।”
“फिर क्या करना चाहिए?” सोनू ने पूछा।
“झिझक खत्म कर,” कर्मा ने कहा। “जिसके बारे में चाहे, सोच। हिला। और मौका मिले, तो चोदने से भी पीछे मत रह।”
“पर अगर उनके और मेरे बीच ऐसा रिश्ता हो, जिसमें ये सब गलत हो या पाप हो?” सोनू ने चिंता से पूछा।
“देख, लंड और चूत का रिश्ता सिर्फ़ एक ही होता है—चुदाई का,” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “बाकी सारे रिश्ते समाज के बनाए हुए हैं। अगर किसी को देखकर लंड खड़ा हो रहा है, तो उसे चोदने में कोई बुराई नहीं।”
कर्मा की बातें सोनू के दिमाग पर गहरा असर कर रही थीं। “वैसे, बता तो, किसके बारे में सोच रहा था?” कर्मा ने पूछा।
“कई सारे लोगों के,” सोनू ने शरमाते हुए कहा।
“कौन-कौन?” कर्मा ने उत्साह से पूछा।
“हलवाइन, लाली… और…” सोनू रुक गया।
“और?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।
सोनू थोड़ा सोच में पड़ गया। कर्मा ने हँसकर कहा, “इतना सोच में रहेगा, तो कैसे मज़े ले पाएगा?”
सोनू ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुमन और कुसum चाची के बारे में।”
कर्मा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अरे, वाह! कम्मू की माँ और ताई? वैसे, इसमें गलत क्या है? दोनों तो एक से बढ़कर एक हैं।”
“कुछ गलत नहीं है? दोस्त की माँ के बारे में सोचना?” सोनू ने संकोच से पूछा।
“क्या तुझे यकीन है कि वो तेरी माँ के बारे में ऐसा नहीं सोचते होंगे?” कर्मा ने सवाल दागा।
यह सुनकर सोनू सोच में पड़ गया। तभी बिमला दोनों के लिए चाय लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। सोनू के दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, और कर्मा के होंठों पर एक चालाक मुस्कान थी।


जारी रहेगी
 

Arthur Morgan

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Bhai story par update aygi ki nhi

Most eagerly awaiting for update guruji

Bahut hi shandar update he Arthur Morgan Bro,

Sonu aur Kammu ab Karma ke rang me rangte ja rahe he.........

Usiki tarah vo bhi apne ghar ki aurato ko sex ki nazar se dekhne lag gaye he.......

Keep rocking Bro

धन्यवाद मित्र

Bhai kitne hafte ho gye??

अगले अपडेट के लिए क्या खबर है, उपलब्ध होने के लिए कितना समय चाहिए, कृपया हमें सूचित करें. धन्यवाद

Update to mast hai
Lekin dekhte hain agla update kab aaega
Late update Dene se padhne mein achcha nahin lagta

Romanchak. Pratiksha agle rasprad update ki

Wonderful update bro

Gajab ..... zabardast update...bhai agar sonu in dono ko dekh leta tab or twist aata...keep it up ❤️👍💯

Bahut hi mast likh rahe ho dost, gifs ka use bhi mast hai isi tarah karte raho

Hamesha ki तरह लाजवाब update.... karma ne akhir rajni ko chod hi diya.... gajab.... ab dekho agla nishana kon hoga aur kiska

Waiting...

Next update

Update kb doge

Update bhai

Update broo...

बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गया
ये साला कम्मु अपनी माँ और बाप की चुदाई का खेल देखकर पुरी तरहा से बावला हो गया हैं
वही हवेली में कर्मा ने रजनी की गदराई चुद पर अपने मोटे लंबे और तगडे लंड की मोहर ठोक कर उसे चुदाई के असीम आनंद से पहली बार रुबरु करा कर अपने लंड के लिये एक और चुद का इंतजाम बडी ही चालाकी से कर लिया
बडा ही जबरदस्त अपडेट हैं
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा

बहुत ही शानदार और कामुक अपडेट है !
अध्याय बारह पेज संख्या 16 पर पोस्ट कर दिया है पढ़ कर प्रतिक्रिया अवश्य दें।
 

Vandana_

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“आसानी से नहीं मानेगी, तो थोड़ा ज़ोर लगाएँगे,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ कहा। “तुम लोग बस मेरे साथ रहो, सब मज़े मिलेंगे।”
सोनू और कम्मू कर्मा की बातों से प्रभावित थे, मगर मन्नू के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह चुप रहा। जीप गाँव की ओर बढ़ रही थी, और चारों अपनी-अपनी सोच में डूबे थे।

ग्यारहवाँ अध्याय​


जीप धूल भरी सड़कों पर उड़ती हुई आखिरकार सज्जनपुर पहुँची। कर्मा ने सोनू, कम्मू, और मन्नू को उनके घरों के बाहर छोड़ दिया। रात गहरी हो चुकी थी, और गाँव की गलियाँ सन्नाटे में डूबी थीं। मन्नू बिना कुछ बोले अपने घर की ओर चला गया, मगर कम्मू के चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी। वह ठिठका हुआ खड़ा था, और सोनू ने उसकी बेचैनी भाँप ली।

“क्या हुआ, तू क्या सोच रहा है?” सोनू ने पूछा।

“यार, देर हो गई है,” कम्मू ने उदास लहजे में कहा। “पापा डाँटेंगे।”

“अरे, वो तो अब तक सो गए होंगे,” सोनू ने हल्के से हँसते हुए कहा।

“अबे, किवाड़ खुलवाऊँगा, तो जाग जाएँगे न?” कम्मू ने चिंता से कहा।

सोनू ने एक पल सोचा और बोला, “तो मत खुलवा न। मेरे घर से दीवार फाँदकर चला जा।”

कम्मू को यह उपाय ठीक लगा। दोनों सोनू के घर की ओर बढ़े। सोनू ने किवाड़ खटखटाया, तो नींद भरी आँखों के साथ नेहा ने दरवाज़ा खोला। दोनों अंदर दाखिल हुए। आँगन में एक छोटी सी दीवार थी, जो सोनू के घर को कम्मू के घर से अलग करती थी। कम्मू ने चुपके से दीवार फाँदी और अपने आँगन में पहुँच गया। उसने नज़र घुमाई—सब सो रहे थे। उसके भाई-बहन खटिया पर गहरी नींद में थे, मगर पापा की खाट खाली थी। कम्मू का दिल धक् से रह गया। “पापा जाग रहे हैं?” उसने सोचा।

तभी उसकी नज़र अंदर के कमरे की ओर गई। किवाड़ के नीचे से हल्की सी रौशनी टिमटिमा रही थी। “माँ अभी तक जाग रही है?” कम्मू के मन में जिज्ञासा जागी। वह धीरे-धीरे कमरे की ओर बढ़ा। किवाड़ के पास पहुँचते ही उसे अंदर से कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ें सुनाई दीं—हल्की सिसकियाँ, जैसे कोई दबी हुई साँसें। कम्मू रुक गया। उसका मन उत्सुकता और संकोच के बीच झूल रहा था। उसने धीरे से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाई और अंदर झाँका। जो उसने देखा, उससे उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

बिस्तर पर उसके पापा अजीत थे, पूरी तरह नंगे। उनके नीचे उसकी माँ सुमन थी, जो भी नंगी थी। अजीत अपनी पत्नी की मोटी-मोटी चूचियों को मसल रहे थे, कभी उन्हें चूस रहे थे, तो कभी चाट रहे थे।

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सुमन की हल्की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं। उसका चेहरा आनंद और उत्तेजना से भरा था। कम्मू का मुँह सूखने लगा। उसका किशोर मन इस दृश्य को देखकर हिल गया। उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह गलत है। वह अपने माँ-बाप को इस तरह नहीं देख सकता। उसने जल्दी से आँखें हटाईं और पीछे हट गया।

आँगन में एक नज़र डाली—सब सो रहे थे। कम्मू का मन द्वंद्व में फँस गया। एक तरफ वह जानता था कि यह गलत है, मगर दूसरी तरफ उसकी जिज्ञासा उसे और देखने के लिए उकसा रही थी। पहली बार वह दो लोगों को काम रस में डूबे हुए देख रहा था। उसका किशोर मन उत्तेजना और उत्सुकता से भर उठा। कुछ देर सोचने के बाद उसकी जिज्ञासा जीत गई। उसने सोचा, “सब सो रहे हैं। थोड़ा देख लूँगा, तो किसी को पता नहीं चलेगा।”

वह फिर से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाकर अंदर देखने लगा। मगर अब नज़ारा बदल चुका था, और यह पहले से भी ज़्यादा उत्तेजक था। अब उसकी माँ सुमन उसकी ओर मुँह करके थी, पूरी तरह नंगी। उसके पापा अजीत पीछे से अपनी कमर हिला रहे थे। उनका एक हाथ सुमन की एक चूची पर था, जो उसे मसल रहा था, और दूसरा हाथ उसके मखमली पेट को सहला रहा था। कम्मू को अपनी माँ का पूरा नंगा बदन सामने से दिख रहा था—उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, जो हर धक्के के साथ हिल रही थीं, गहरी नाभि, मांसल पेट, और नीचे हल्की-हल्की झाँटों के बीच उसकी रसीली चूत, जिसमें उसके पापा का लंड अंदर-बाहर हो रहा था।

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कम्मू ने इससे पहले ऐसा उत्तेजक दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी माँ का चेहरा आनंद में डूबा था। उसकी आँखें बंद थीं, और वह अपने होंठों को काट रही थी। कम्मू का लंड पैंट में खड़ा हो गया, और उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ। वह बस आँखें फाड़े अंदर देख रहा था। उसका हाथ अनायास ही पैंट के ऊपर से अपने लंड को सहलाने लगा। अचानक उसे होश आया, और उसने जल्दी से हाथ हटा लिया। वह खुद को धिक्कारने लगा, “ये क्या कर रहा हूँ? अपने माँ-बाप को देखकर ये सब करना गलत है!”

तभी आँगन में किसी के खाँसने की आवाज़ आई। कम्मू तुरंत हरकत में आया और दबे पाँव अपनी खाट पर जाकर लेट गया। उसका लंड अभी भी पैंट में तंबू बनाए हुए था। उसके मन में एक साथ ढेर सारे विचार उमड़ रहे थे। उसकी आँखों के सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था—उसकी माँ का नंगा बदन, उसकी चूचियाँ, उसकी चूत, और पापा का लंड। उसने खुद को शांत करने की कोशिश की, मगर उसका लंड जस का तस खड़ा था।

वह सोचने लगा, “ऐसे नहीं चलेगा। इसे शांत करना पड़ेगा।” उसने चादर अपने ऊपर डाल ली और चुपके से पैंट खोलकर लंड बाहर निकाल लिया। उसने हल्के-हल्के मुठियाना शुरू किया। वह जोर लगाकर हलवाइन और लाली के बदन के बारे में सोचने की कोशिश करने लगा, मगर कुछ ही पल बाद उसकी माँ का नंगा बदन फिर से उसकी आँखों के सामने आ गया। उसका लंड उसके हाथ में और सख्त हो गया। इस बार वह खुद को रोक नहीं पाया। अपनी माँ के बदन को याद करते हुए वह मुठियाने लगा। जल्द ही उसके लंड ने उसकी मुट्ठी और पेट पर अपना रस उगल दिया। झड़ने के बाद उसे थोड़ी शांति मिली, मगर तुरंत ही ग्लानि ने उसे घेर लिया। वह सोचते-सोचते कब नींद में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।

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सुबह की पहली किरण के साथ सज्जनपुर जाग उठा। गायों की रँभाहट और खेतों से मज़दूरों की आवाज़ों ने गाँव को जीवंत कर दिया। सोनू और रजनी समय पर हवेली पहुँच चुके थे। रजनी रसोई में बिमला के साथ मिलकर नाश्ता तैयार कर रही थी, और सोनू हवेली के बाहरी हिस्से में झाड़ू लगा रहा था। मगर उसका मन कहीं और था। रात का नाच, लाली की थिरकन, और कर्मा की बेपरवाह बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं।

हवेली की रसोई में रजनी आटा गूँध रही थी, तभी सरोज तैयार होकर आई। “रजनी, सुन,” सरोज ने कहा। “मैं और कर्मा के पापा शहर जा रहे हैं। बाबूजी की चाय तो मैंने बिमला के हाथों भेज दी है। तू कर्मा को जगा दे और उसे चाय दे देना। अभी तक सो रहा है वो।”

“ठीक है, जीजी,” रजनी ने जवाब दिया।

सरोज नीलेश के साथ चली गई। रजनी ने चाय बनाई, मगर मन ही मन वह सोच रही थी। वह कर्मा की नज़रों और उसकी आदतों से वाकिफ थी। वह हमेशा उससे बचकर रहती थी, मगर हवेली में काम करते हुए कब तक वह उससे नज़रें चुरा सकती थी? खैर, काम तो करना ही था। चाय तैयार हो गई। उसने एक कप में चाय भरी, ट्रे में रखी, और कर्मा के कमरे की ओर बढ़ गई।

कर्मा अभी भी गहरी नींद में था। वह सिर्फ़ बनियान और निक्कर पहने बिस्तर पर पड़ा था। रजनी ने उसे आवाज़ दी, “लल्ला, उठो! चाय ले लो।” मगर कर्मा पर कोई असर नहीं हुआ। रजनी ने मन में सोचा, “ये लड़का तो घोड़े बेचकर सोता है।” उसने चाय ट्रे में बगल की टेबल पर रख दी और कर्मा के कंधे को हल्के से सहलाकर उसे जगाने की कोशिश की।

कर्मा ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने रजनी को देखा। वह तुरंत सीधा होकर बैठ गया। “उठ गए, लल्ला,” रजनी ने कहा। “लो, चाय पी लो।”

“अभी पी लूँगा, चाची,” कर्मा ने आँखें मसलते हुए कहा।

“ठीक है,” रजनी ने कहा। “जीजी और साहब शहर गए हैं। तुझे जो कुछ खाना हो, बता दे। मैं बना दूँगी।”

“शहर? क्यों?” कर्मा ने पूछा।

“ये तो मुझे भी नहीं पता, लल्ला,” रजनी ने जवाब दिया। “चल, तू चाय पी ले। मैं बाकी काम निपटा लेती हूँ।”

रजनी जैसे ही जाने को मुड़ी, कर्मा ने उसे रोक लिया। “अरे, रुको न, चाची! काम तो होते रहेंगे। थोड़ी देर मेरे पास तो बैठो।”

“अरे, नहीं, लल्ला,” रजनी ने हल्के से कहा। “पहले काम निपटा लूँ, फिर आराम से बातें करेंगे।”

मगर कर्मा कहाँ मानने वाला था? उसने रजनी का हाथ पकड़कर खींच लिया। “अरे, नहीं, चाची! मुझे अकेले अच्छा नहीं लगता।” खींचने की वजह से रजनी का संतुलन बिगड़ा, और वह पीछे की ओर गिरने लगी। कर्मा ने उसे पकड़ लिया और अपनी गोद में बिठा लिया। रजनी का पल्लू सरक गया, और उसका भरा हुआ बदन कर्मा के सामने था। कर्मा ने मौके का फायदा उठाया और तुरंत रजनी के पेट और चूचियों को मसलने लगा।

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रजनी हैरान रह गई। “अरे, लल्ला, नहीं! छोड़ो मुझे!” उसने छूटने की कोशिश करते हुए कहा। “लल्ला, ऐसे नहीं करते!”

मगर कर्मा नहीं रुका। वह रजनी के बदन को मसलते हुए उत्तेजित हो रहा था। रजनी ने फिर से जोर लगाया और इस बार धक्का देकर उसकी पकड़ से छूट गई। वह खड़ी हो गई और जल्दी से अपना पल्लू ठीक किया। उसका चेहरा गुस्से और परेशानी से भरा था, मगर वह यह भी जानती थी कि कर्मा के साथ गुस्सा करना उसके लिए ठीक नहीं होगा। हवेली में काम करने की मजबूरी थी।

कर्मा ने बेपरवाही से कहा, “क्या हुआ, चाची? इतना क्या घबरा रही हो? मैं काटूँगा नहीं। आओ, बैठो न।”

रजनी ने खुद को शांत किया। वह कुछ सोचकर कर्मा के बगल में बिस्तर पर बैठ गई। कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये हुई न बात, चाची। वैसे, एक बात कहूँ?”

“हाँ, बोलो,” रजनी ने थोड़ा संभलते हुए कहा।

“तुम बहुत सुंदर हो, सच में,” कर्मा ने तारीफ भरे लहजे में कहा।

रजनी को उसकी बात सुनकर हँसी आ गई। “हट, लल्ला! मैं और सुंदर?” उसने हँसते हुए कहा। “सुंदर तो तेरी उम्र की लड़कियाँ होती हैं। तेरी दुल्हन होगी सुंदर।”

“मेरा वश चले, तो मैं तुम्हें ही अपनी दुल्हन बना लूँ,” कर्मा ने शरारत भरे लहजे में कहा।

रजनी फिर से मुस्कुरा दी। अपनी तारीफ सुनना हर औरत को अच्छा लगता है, और रजनी भी अपवाद नहीं थी। भले ही वह कर्मा के स्वभाव को जानती थी, मगर अपने बेटे की उम्र के लड़के से तारीफ सुनकर उसे अच्छा लग रहा था। “लल्ला, बातें बहुत बनाते हो तुम,” उसने हँसते हुए कहा।

“अच्छा, तो न करूँ बातें? कुछ और करूँ?” कर्मा ने शरारत से कहा।

“कुछ और क्या?” रजनी ने पूछा।

कर्मा उसकी ओर झुका और अचानक उसके कंधे और गर्दन पर हाथ रखकर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए। रजनी इस बार हैरान नहीं हुई, न ही पीछे हटी। कर्मा को यह देखकर खुशी हुई। वह रजनी के होंठों को चूसने लगा।

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रजनी जानती थी कि जो हो रहा है, वह गलत है, मगर वह कर्मा को रोक नहीं रही थी। कर्मा के होंठों का रस पीते हुए वह उसका साथ देने लगी। उसका बदन कर्मा के चुंबन का जवाब देने लगा। अपने से आधी उम्र के लड़के का साथ पाकर उसका बदन उत्तेजित हो रहा था।

कर्मा का चूमने का तरीका रजनी को हैरान कर रहा था। वह उसके होंठों को हल्के से दबाकर, बड़े आराम से चूस रहा था, बिना किसी आक्रामकता के। यह रजनी को बहुत भा रहा था। वह खुद को रोक नहीं पाई और कर्मा का साथ देने लगी। कर्मा का जोश और बढ़ गया। उसने अपनी जीभ रजनी के मुँह में डाल दी। रजनी भी अब पीछे हटने वाली नहीं थी। वह कर्मा की जीभ का जवाब अपनी जीभ से देने लगी। दोनों के बदन एक-दूसरे से सटे थे, और कमरे में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी।

कर्मा के होंठ रजनी के होंठों को चूस रहे थे, और उसकी उंगलियाँ रजनी की साड़ी के पल्लू को धीरे-धीरे नीचे सरका रही थीं। रजनी उत्तेजना के समंदर में डूब चुकी थी। उसका मन, उसका शरीर, सब कर्मा की हरकतों में खो चुके थे।
कर्मा की चालाक उंगलियों ने रजनी के ब्लाउज़ के बटन खोलने शुरू किए। उसकी हर हरकत में एक कुशल कारीगर की तरह निपुणता थी। कुछ ही पलों में ब्लाउज़ रजनी के बदन से अलग होकर बिस्तर पर गिर गया। कर्मा ने होंठों को छोड़ा और रजनी की ओर देखा। रजनी ने जब अपनी स्थिति का अंदाज़ा लगाया, तो उसकी आँखें शर्म और हैरानी से फैल गईं। वह ऊपर से पूरी तरह नंगी थी। उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ कर्मा की आँखों के सामने थीं, जो पके हुए आमों की तरह भारी और रसीली थीं। रजनी ने तुरंत अपने हाथों से उन्हें ढक लिया।

कर्मा को रजनी की यह हरकत देखकर हँसी आ गई। उसकी शरारती मुस्कान और गहरी नज़रों ने रजनी को और बेचैन कर दिया। रजनी के हाथ व्यस्त होने का फायदा उठाते हुए कर्मा ने उसकी साड़ी को भी खींच लिया। साड़ी फर्श पर गिर पड़ी, और अब रजनी के बदन पर सिर्फ़ एक पेटीकोट बचा था। उसने अपनी चूचियों को अब भी हाथों से ढके रखा था, मगर कर्मा का इरादा रुकने का नहीं था। उसने एक बार फिर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए और उसे धीरे से बिस्तर पर पीछे की ओर लिटा दिया। वह खुद रजनी के ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूसने लगा। कर्मा के हाथ रजनी के नंगे बदन पर फिसल रहे थे, जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार का आनंद ले रहा हो।

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रजनी की साँसें तेज़ हो रही थीं। कर्मा ने होंठों को चूसते हुए उसके हाथ उसकी चूचियों से हटा दिए और उन्हें अपने मज़बूत हाथों में भर लिया। उसने धीरे-धीरे, मगर ज़ोर से, रजनी की चूचियों को दबाना शुरू किया। रजनी मचल उठी। उसका बदन उत्तेजना की लहरों में डूब रहा था। हर दबाव के साथ उसकी साँसें और भारी हो रही थीं। कर्मा की उंगलियाँ उसकी चूचियों को मसल रही थीं, और रजनी का शरीर जवाब दे रहा था। उसकी सारी मर्यादा, संस्कार, और सही-गलत का बोध इस आनंद के सामने फीका पड़ गया था। कर्मा, जो उसकी बेटे की उम्र का था, उसके बदन को मसल रहा था, चूस रहा था, और रजनी को यह सब अच्छा लग रहा था। उसका मन ग्लानि और उत्तेजना के बीच झूल रहा था, मगर उत्तेजना भारी पड़ रही थी।

कर्मा ने रजनी के होंठों को छोड़ा और उसकी आँखों में देखते हुए बोला, “आह, चाची, बहुत रसीली हो तुम! मज़ा आ गया।” उसकी आवाज़ में वासना और शरारत दोनों थी। वह नीचे सरका और रजनी की गर्दन को चूमने लगा। उसकी जीभ रजनी की नरम त्वचा पर फिसल रही थी, और फिर वह और नीचे गया। उसने रजनी की छाती को चाटा और आखिरकार उसकी एक चूची को अपने मुँह में भर लिया। दूसरी चूची को वह अपने हाथ से दबा रहा था। रजनी के लिए अब खुद को संभालना असंभव हो गया। वह कर्मा के नीचे मचल रही थी, उसका बदन झटके खा रहा था। उसके मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं। “आह… लल्ला… आराम से… ओह… ह्म्म… आह… चूसो…” उसकी आवाज़ में आनंद और बेचैनी दोनों थी। उसके हाथ कर्मा के सिर पर चल रहे थे, जैसे वह उसे और करीब खींचना चाहती हो।

कर्मा ने एक चूची को जी भरकर चूसा, फिर दूसरी को मुँह में लिया। वह हर पल रजनी की उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। रजनी का बदन अब पूरी तरह कर्मा के हवाले था। चूचियों को चूसने के बाद कर्मा ने उन्हें छोड़ा। रजनी ने शर्म से फिर से अपनी चूचियों को हाथों से ढक लिया, मगर कर्मा ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वह और नीचे सरका और रजनी के मखमली पेट को चूमने और चाटने लगा।

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उसकी जीभ रजनी की गहरी नाभि के आसपास घूम रही थी। रजनी तड़प उठी। “आह… आह…” उसकी आहें कमरे में गूँज रही थीं। कर्मा का एक हाथ उसके पेट को मसल रहा था, और दूसरा उसके नंगे कंधों और छाती पर फिसल रहा था। रजनी को ऐसा आनंद पहले कभी नहीं मिला था। उसके पति दिलीप ने कभी उसके बदन का इस तरह स्वाद नहीं लिया था। कर्मा जैसे उसके हर अंग को पूज रहा था।

कर्मा ने रजनी की आँखों में देखा। उसकी नज़रों में वासना की चमक थी। “आह, चाची, क्या बदन है तुम्हारा!” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इतना स्वादिष्ट! पूरी मलाई हो तुम।” रजनी यह सुनकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा दी। उसकी साँसें और तेज़ हो गईं। कर्मा ने अपना हाथ नीचे बढ़ाया और रजनी के पेटीकोट को ऊपर खींचने लगा। रजनी की साँसें और चढ़ गईं। कर्मा ने धीरे-धीरे पेटीकोट को उसकी जाँघों तक चढ़ा दिया और फिर अपने हाथ को उसकी टाँगों के बीच ले गया। उसने रजनी की गरम, बहती हुई चूत को सहलाना शुरू किया। रजनी कर्मा का हाथ अपनी चूत पर महसूस करते ही पागल सी हो गई। “ओह… लल्ला… आह… उम्म… नहीं… आह… कर्मा…” उसकी आहें अब और तेज़ हो रही थीं।

कर्मा ने उसकी आहों को शांत करने के लिए एक बार फिर उसके होंठों को चूसना शुरू किया। वह रजनी की जीभ को अपनी जीभ से लपेट रहा था, उसकी गर्दन को पागलों की तरह चूस रहा था।

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रजनी का अनैतिक रिश्ता उसे और उत्तेजित कर रहा था। यह गलत था, मगर यही गलतपन उसे और आनंद दे रहा था। हवेली शांत पड़ी थी। बाहर सोनू अपने काम में व्यस्त था, अनजान कि उसकी माँ और उसका नया दोस्त कर्मा अंदर वासना के खेल में डूबे हुए थे।

कर्मा अब रजनी की टाँगों के बीच जगह ले चुका था। वह उसकी जाँघों को चूमते हुए धीरे-धीरे ऊपर बढ़ रहा था। रजनी का पेटीकोट अब उसकी कमर पर इकट्ठा हो चुका था। कर्मा ने उसकी चूत के आसपास के हिस्से को चाटना और चूमना शुरू किया। रजनी उत्तेजना से पागल हो रही थी। वह अपनी चूचियों को खुद मसल रही थी और आहें भर रही थी। “ओह… कर्मा… आह… लल्ला… ओह… ऐसे ही… आह… खा जा… आह…” उसकी आवाज़ में तड़प थी। कर्मा जानबूझकर उसकी चूत को छेड़ रहा था, उसके आसपास चाट रहा था, ताकि उसकी तड़प और बढ़े। उसका एक हाथ रजनी के नंगे पेट और छाती पर फिसल रहा था, और दूसरा उसकी जाँघों को सहला रहा था।

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रजनी ने कभी नहीं सोचा था कि उसके बेटे की उम्र का लड़का उसे ऐसा सुख दे सकता है। उसके पति दिलीप का तरीका हमेशा जल्दबाज़ी भरा था। वह चढ़ता, धक्के लगाता, और अपने आनंद में खोकर हट जाता। रजनी के सुख की उसने कभी परवाह नहीं की। नीलेश ने उसे पहली बार संभोग के सुख से परिचित कराया था, मगर कर्मा उसे उस सुख के समंदर में डुबकी लगवा रहा था। उसका पूरा बदन वासना के पानी में तर हो चुका था।

जैसे ही कर्मा ने अपनी जीभ रजनी की चूत पर फिराई, रजनी का बदन पूरा ऐंठ गया। उसकी साँसें रुक सी गईं, और अगले ही पल वह स्खलित हो गई। उसका शरीर काँप रहा था, और वह बिस्तर पर बुरी तरह हाँफने लगी। कर्मा ने उसकी टाँगों के बीच से सिर निकाला और सीधा होकर अपने कपड़े उतारने लगा। कुछ ही पलों में वह पूरी तरह नंगा हो गया। उसका मोटा, लंबा लंड फनफनाता हुआ रजनी की चूत की ओर देख रहा था। कर्मा से अब रुका नहीं जा रहा था। उसने रजनी की टाँगों के बीच फिर से जगह ली। रजनी अभी भी आँखें बंद करके अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी।

कर्मा ने अपने लंड को रजनी की चूत के द्वार पर रखा और एक धक्के के साथ उसे अंदर सरका दिया। रजनी की आँखें झटके से खुल गईं, और उसका मुँह आनंद और हैरानी से खुला रह गया। “आह… लल्ला… ओह… ये क्या… आह…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“बहुत गरम चूत है तुम्हारी, चाची,” कर्मा ने वासना भरी आवाज़ में कहा। “आह, अब रुका नहीं जाता।” उसने एक-दो धक्के और लगाए और अपना लंड जड़ तक रजनी की चूत में घुसा दिया। रजनी की चूत कर्मा के मोटे लंड से पूरी तरह भर गई थी। उसका बदन जैसे बिजली के झटके खा रहा था। कर्मा ने रजनी की चूचियों को थाम लिया और धक्के लगाना शुरू कर दिया। वह उसकी चूचियों को मसलते हुए उसे चोदने लगा।

रजनी कर्मा के हर धक्के को अपनी चूत में महसूस कर रही थी। उसका शरीर आनंद की लहरों में डूब रहा था। “आह… लल्ला… आह… ऐसे ही…” वह आहें भर रही थी। कर्मा की गति बढ़ रही थी, और उसकी उंगलियाँ रजनी की चूचियों को मसल रही थीं।

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“ओह… आह… चाची, कितना मज़ा आ रहा है तुम्हारी चूत में,” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा। “आह, कितनी कसी हुई है।”

“आह… लल्ला… ऐसे ही… मुझे भी… आह…” रजनी ने जवाब दिया। वह अब सारी शर्म और झिझक भूल चुकी थी। वह बस उस आनंद में डूब रही थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है, आह… बोलो?”

“ओह… आह… हाँ, लल्ला… ओह… कर्मा, मुझे भी मज़ा आ रहा है,” रजनी ने काँपती आवाज़ में कहा।

“तो खुलकर बोलो न, चाची,” कर्मा ने उसे उकसाया। “आह, बोलो तुम्हें चुदाई में मज़ा आ रहा है। अपनी चूत में मेरा लंड लेकर मज़ा आ रहा है।”

रजनी ने बिना रुके कहा, “हाँ… आह… लल्ला, मज़ा आ रहा है… इसमें…”

कर्मा ने अचानक खुद को रोका और अपना लंड रजनी की चूत से बाहर निकाल लिया। रजनी को अपनी चूत का खाली होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। “आह… लल्ला, नहीं… डालो अंदर…” उसने तड़पते हुए कहा।

कर्मा सोफे पर टिककर बैठ गया और शरारती मुस्कान के साथ बोला, “चाची, लंड चाहिए, तो खुलकर बोलो और आओ, ले लो।”

रजनी जानती थी कि कर्मा उसे अपनी ताकत दिखा रहा है, मगर उसकी चूत में उठ रही आग उसे बेचैन कर रही थी। वह एक पल के लिए सकुचाई, फिर बोली, “हाँ, लल्ला… मुझे दे दो… अपना… वो… लंड…” वह कर्मा के पास आई।

“अपनी किसमें लोगी, चाची?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।

रजनी थोड़ा शरमाई, मगर बोली, “अपनी… वो… अपनी चूत में…”

कर्मा ने उसे अपने ऊपर आने का इशारा किया। रजनी तुरंत उसके ऊपर आ गई और उसकी ओर पीठ करके नीचे बैठी। कर्मा का लंड एक बार फिर उसकी चूत में समा गया। दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली। रजनी ने धीरे-धीरे खुद को कर्मा के लंड पर उछालना शुरू किया। कर्मा ने उसकी चूचियों को पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर उछालने में मदद करने लगा।

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“ओह… चाची… आह… ऐसे ही… आह… ऐसे ही…” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा।

“आह… आह… लल्ला… कितना मोटा है…” रजनी ने तड़पते हुए जवाब दिया।

“तुम्हारी चूत भी बड़ी कसी हुई है, आह… चाची,” कर्मा ने कहा। “लगता है, चुदाई नहीं हुई तुम्हारी ठीक से।”

“हाँ… आह… लल्ला, तेरा चाचा तो शराबी है,” रजनी ने हाँफते हुए कहा। “वो बस दो-चार धक्के लगाकर हट जाता था।”

“हाँ, चाची, पर तुम्हारे जैसे बदन वाली को तो अच्छे से, मज़े से, मसल-मसलकर चोदना चाहिए,” कर्मा ने जोश में कहा।

“हाँ… लल्ला… जैसे तू चोद रहा है… आह… ऐसे ही…” रजनी ने जवाब दिया।

“आह, चाची, और गंदी बातें करो न,” कर्मा ने उकसाया। “अपने अंदर की गर्मी और गंदगी को बाहर निकालो।”

रजनी, जिसे कर्मा के साथ इतना मज़ा आ रहा था, अब किसी बात से मना नहीं कर सकती थी। “आह… लल्ला… ओह… चोद… अपनी चाची की प्यासी चूत को… आह… कबसे प्यासी थी ये मोटे लंड के लिए… आह… ऐसे ही भर दे…” उसकी आवाज़ में तड़प और वासना दोनों थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुमने पापा से भी चुदवाया है न? आह, कैसा लग रहा है बाप के बाद बेटे से चुदवाने में?”

रजनी यह सुनकर और उत्तेजित हो गई। यह अनैतिक रिश्ता, यह गलतपन, उसे और आनंद दे रहा था। उसने बाप और बेटे, दोनों के लंड अपनी चूत में लिए थे। “हाँ… लल्ला… आह… पहले बाप और अब बेटा मुझे चोद रहा है… आह… और मैं दोनों के ही लंड को अपनी प्यासी चूत में समा रही हूँ…” उसने तड़पते हुए कहा।

“मज़ा आ रहा है तुम्हें, चाची?” कर्मा ने पूछा। “अब रोज़ चुदोगी न?”

“हाँ… लल्ला… बहुत मज़ा… अब तो जब तू बोलेगा, तब चोदूँगी…” रजनी ने हाँफते हुए जवाब दिया।

कर्मा उसकी बातें सुनकर और उत्तेजित हो गया। उसने रजनी को सीधा किया और खुद सोफे से पैर लटकाकर बैठ गया। रजनी को उसने अपनी कमर से थाम लिया और उसे अपने लंड पर उछालना शुरू किया। रजनी को इस आसन में खुलकर उछलने की आज़ादी मिली। उसकी चूचियाँ हर झटके के साथ नाच रही थीं। उसका पूरा बदन लहर मार रहा था। कर्मा उसे अपनी कमर से थामकर ज़ोर-ज़ोर से उछाल रहा था, और उसका लंड रजनी की चूत में जड़ तक जा रहा था।

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दोनों की उत्तेजना अपने चरम पर थी। रजनी का शरीर काँपने लगा। वह फिर से स्खलित होने वाली थी। कर्मा भी अब खुद को रोक नहीं पा रहा था। उसका लंड रजनी की चूत में पिचकारी मारने लगा, और उसने रजनी की चूत को अपने रस से भर दिया। दोनों पीछे की ओर लेट गए, बुरी तरह हाँफते हुए। उनकी साँसें कमरे में गूँज रही थीं। रजनी का बदन पसीने और आनंद में तर था, और कर्मा की आँखों में संतुष्टि की चमक थी। दोनों अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे।

रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।


जारी रहेगी
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DB Singh

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Thakuro ko upper hand de rha story me..kammo ko hero bnao thakuro ke ghar ki bahu betiyo ko chod kr gaon walo ke izzat ka badla lena bnta Hai.. sonu jese chutiyo ke gaand faad de..sonu ki maa behan ki chud gand sab faad de humara kammo
 
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