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Dosto

Jo log Looi ke panne padh rahe unko bata du ki fresh update posted.
 

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वाह क्या खूब सीन लिखा है । मुझे बिताए हुए 80 और 90 के दशक के दौर याद आ गया । ये वो वक्त था जब शोशल मीडिया जे नाम पर बस न्यूज पेपर हुआ करता था या फिर वो घुमक्कड़ दोस्त वुर बुजुर्ग जो बड़े शहरों में जाने की बातें वर्षों तक हर महफ़िल में नमक मिर्च और बत्तीस मसाले मिला कर सुनाया करते थे । हम में से कोई यार कभी दिल्ली बॉम्बे कलकत्ता या किसी बड़े शहर में जाता था तो वहाँ के रण्डी खाने, टूरिस्ट पैलेस बड़े मार्केट होटल खास कर जिसमे लडकिया सर्विस देती या सैलून जिसमे लडकिया कटिंग शेव करती थी । उनके ऐसे लंबे लंबे किस्से कहानिया और खर्चा बताया करते थे । अब उस जमाने मे मोबाइल ही नही होते थे जो सेल्फी ले कर दिखाते तो हम सभी अपनी अपनी इमेजिन से उस जगह की परिस्थितियों को समझते थे । अब छीटे शहरों कस्बो गांव के रहवासी इन किस्सों के बहुत रसिया होते थे । कहीँ टपरी पर बैठ कर चाय और सिगरेट का दौर चलता रहता और किससे कहानिया और लड़कियों के बारे में चटकारे ले लेकर किस्सागोई चलती रहती थी । ऐसा ही कुछ गुड्डी और उसकी छोटी बहन ने सेठ के बिगड़ैल दोनो लड़को से कलकत्ता की रण्डियों के बारे में ये बात पुख्ता करने के लिए पूछ लिया कि दोनों भाई रंडीबाज तो है ही सारे रिश्तेदारों को पता है मगर उन रंडियों में आखिर ऐसा क्या है जो हम घरेलू महिलाओं में नही है । आखिर क्या खास बात या राज है जो लोग इतना पैसा लुटाते है ।
खैर दोनो भाई इस शादी समारोह में आम के बाद से किसी ना किसी मादा की तलाश में तो थे ही आखिर दोनो को ही एक एक नवयौवना मिल ही गई है तो खेल तो खेलेंगे ही । आगे क्या क्या होता है देखते है । एक उबलते दूध से अपडेट के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।


आपकी इतनी विस्तृत और विचारपूर्ण प्रतिक्रिया पढ़कर सचमुच बहुत अच्छा लगा। आपने 80–90 के दशक के सामाजिक माहौल, लोगों की कल्पनाशक्ति और किस्सागोई की परंपरा को जिस तरह याद किया, वह अपने आप में एक जीवंत चित्र खींच देता है। उस दौर में सचमुच सुनी-सुनाई बातें ही लोगों की कल्पना का आधार बनती थीं और चौपाल, चाय की टपरी या शादी-ब्याह जैसी जगहें किस्सों का सबसे बड़ा मंच होती थीं। अरे वाह! आपकी टिप्पणी पढ़कर तो ऐसा लगा जैसे मैं भी चाय की टपरी पर बैठा उन पुराने किस्सागो दोस्तों की महफ़िल में पहुँच गई हूँ। वैसे मुझे उतना कुछ खास अनुभव नहीं है। हमें ऐसा करने की परमिशन भी तो नहीं थी उस जमाने में। तो इस बारे में ज्यादा विस्त्रुतिकरण नहीं दे पाऊँगी बस पढ़ा हुआ नोलेज है और कुछ नहीं

सच कहूँ तो आपने 80–90 के दशक की जो तस्वीर खींची है, वही इस सीन की असली प्रेरणा भी है। उस समय न मोबाइल थे, न सोशल मीडिया। किसी बड़े शहर से लौटने वाला आदमी ही चलता-फिरता "यूट्यूब" और "गूगल" होता था। उसकी बातें सुनकर हर श्रोता अपनी-अपनी कल्पना में पूरी फिल्म बना लिया करता था। शायद इसी वजह से उस दौर के किस्सों में एक अलग ही जादू हुआ करता था।

मेरा प्रयास भी यही रहता है कि कहानी केवल घटनाओं का क्रम न बने, बल्कि अपने समय, समाज और पात्रों की मानसिकता को भी स्वाभाविक रूप से सामने लाए। यदि किसी दृश्य ने आपको उस दौर की याद दिला दी, तो यह मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।

गुड्डी और उसकी छोटी बहन का सवाल भी केवल जिज्ञासा नहीं था, बल्कि उस मानसिकता की झलक है जहाँ घरेलू औरतें भी मन ही मन यह समझना चाहती थीं कि आखिर ऐसी कौन-सी बात है जो कुछ पुरुष घर की खुशियों के बावजूद बाहर भटक जाते हैं। कहानी में मेरा उद्देश्य उसी मनोविज्ञान और उस दौर की सोच को पात्रों के माध्यम से सामने लाना है। और पाठको को उस बारे में सोचने पर मजबूर करना थाअब कहानी उस मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ हर पात्र अपने स्वभाव और निर्णयों के अनुसार आगे बढ़ेगा। आगे के अध्यायों में रिश्तों की परतें, मनोवैज्ञानिक टकराव और कई अप्रत्याशित घटनाएँ सामने आएँगी, जो कहानी को नई दिशा देंगी। लेकिन सब कुछ पाठको के सोच पर निर्भर करेगा। मैं तो सिर्फ यह अश्लील माध्यम से एक छुपा हुआ सन्देश देना चाहूंगी और यही प्रयास इस कहानी में शुरू से है


और जहाँ तक सेठ के दोनों बिगड़ैल बेटों की बात है... आपने सही पकड़ लिया। शादी-ब्याह का माहौल, जवानी का जोश और मौका, ये तीनों जब एक साथ मिल जाएँ तो कहानी खुद शरारती मुस्कान के साथ आगे बढ़ने लगती है। लेकिन अभी तो यह सिर्फ शुरुआत है; आगे कौन किसके साथ कैसा खेल खेलता है और आखिर किस पर भारी पड़ता है, यही तो कहानी का असली मज़ा होगा।

आपके उत्साहवर्धक शब्दों और निरंतर साथ के लिए दिल से धन्यवाद। आशा है कि आने वाले अपडेट भी आपको इसी तरह बाँधे रखेंगे। आप जैसे पाठक जब इतनी बारीकी से हर दृश्य को महसूस करके अपनी प्रतिक्रिया लिखते हैं, तो लिखने का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। आपका यह स्नेह और साथ यूँ ही बना रहे। अगले "उबलते दूध" वाले अपडेट में फिर मुलाकात होगी।
दिल से आभार
 

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