- 43
- 362
- 69
शाम के सात बज चुके थे। शहर की नाइटलाइफ़ धीरे-धीरे अपनी रंगीनियत बिखेर रही थी। पेंटहाउस के भीतर रोशनी मद्धम थी।
रेखा अपने ड्रेसिंग रूम में शीशे के सामने खड़ी होकर तैयार हो रही थीं। स्मिता की बातें उनके दिमाग में किसी शराब की तरह चढ़ी हुई थीं। उन्होंने आज खुद को छुपाने के बजाय अपने हुस्न को पूरी तरह से नुमाइश करने का फैसला किया था। उन्होंने एक गहरे जामुनी और सुनहरे बॉर्डर वाली सिल्क की साड़ी चुनी, लेकिन उसके साथ जो ब्लाउज़ पहना, वह आधुनिकता और कामुकता की सारी हदें पार कर रहा था।
गहरे गले का बैकलेस ब्लाउज़, जिसमें सिर्फ दो पतली डोरियाँ उनकी गोरी, नग्न पीठ को थामे हुए थीं। ब्लाउज़ का कट इतना गहरा था कि रेखा के ३६D के भारी स्तनों का आधा हिस्सा बाहर छलकने को आतुर दिख रहा था। उनकी कमर पर थोड़ा सा मांस लटक रहा था, जो देसी और रसीलेपन का चरम रूप था। रेखा ने अपने बालों को एक ढीले जूड़े में बांधा, जिससे उनकी गोरी, सुराहीदार गर्दन पूरी तरह नंगी हो गई। होठों पर गहरी लाल लिपस्टिक और आँखों में गीला काजल लगाकर जब रेखा शीशे के सामने घूमीं, तो खुद उनकी आँखों में भी एक नशा तैर गया।
तभी ड्रेसिंग रूम का दरवाज़ा खुला और कबीर भीतर आया। कबीर ने एक कसी हुई डार्क ब्लू रंग की फॉर्मल शर्ट और ब्लैक ट्राउज़र पहन रखा था, जिसमें उसका लंबा, कसरती बदन बेहद हैंडसम लग रहा था।
लेकिन जैसे ही कबीर की नज़र अपनी माँ रेखा पर पड़ी, उसके कदम वहीं ठिठक गए। उसकी आँखें पूरी तरह फैल गईं। रेखा साड़ी के पल्लू को अपनी भारी छाती पर सलीके से ढालने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी नंगी पीठ और ब्लाउज़ से छलकते स्तनों का उभार किसी भी जवान मर्द का ईमान डोलने के लिए काफी था।
"वॉट द एफ... आई मीन, मॉम!" कबीर के मुंह से बेसाख्ता निकला। वह धीरे-धीरे चलकर रेखा के पीछे आकर खड़ा हो गया।
शीशे में दोनों की नजरें मिलीं। कबीर के सांवले, कड़े बदन के पीछे रेखा का यह रसीला, परिपक्व और बेबाक रूप एक अद्भुत कामुक दृश्य बना रहा था।
"क्या हुआ कबीर? मैं... मैं कैसी लग रही हूँ?" रेखा ने शीशे में कबीर की आँखों में अपनी काया के लिए पनपती हुई हवस और दीवानगी को साफ पढ़ते हुए पूछा। उनकी आवाज़ में लज्जा और नशा दोनों घुला था।
कबीर ने आगे बढ़कर अपने दोनों बड़े, गर्म हाथ रेखा की नंगी कमर पर रख दिए। जहाँ कबीर की उंगलियों की सांवली त्वचा रेखा की गोरी, मांसल कमर से छुई, वहाँ रेखा के बदन में एक सिहरन की बिजली दौड़ गई।
"मॉम... आप आज रात किसी भी सुपरमॉडल को चुटकियों में मात दे सकती हैं," कबीर ने फुसफुसाते हुए रेखा की नंगी पीठ पर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए कहा।
कबीर की इस बेहद बेबाक टिप्पणी से रेखा के गालों पर सुर्खी दौड़ गई। उनके बदन का रोआँ-रोआँ सुलग उठा। उन्होंने मुड़कर कबीर के सीने पर हाथ रखा, जो शर्ट के भीतर भी लोहे की तरह सख्त था।
"चल, बहुत बातें बनाना सीख गया है विदेश में रहकर," रेखा ने झूठी डांट डांटते हुए कहा, लेकिन उनके होठों की मुस्कान उनके भीतर छिपी कामुक तड़प को साफ बयां कर रही थी। "चलो, स्मिता और अर्जुन हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे।"
रात के आठ बजे कबीर अपनी कार चलाकर स्मिता के पोर्टिको में दाखिल हुआ। घर आलीशान और बत्तियों की रोशनी में नहाया हुआ था।
गाड़ी से उतरकर कबीर ने रेखा का हाथ थाम लिया। जब दोनों बंगले के मुख्य हॉल में पहुँचे, तो स्मिता उनका स्वागत करने के लिए सामने खड़ी थीं।
स्मिता को देखते ही कबीर की नजरें एक पल के लिए चकाचौंध हो गईं। स्मिता ने हल्के नीले (आइस ब्लू) रंग की एक बेहद पारदर्शी शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी। उस पतली, पारदर्शी शिफॉन की साड़ी के भीतर से स्मिता की ३६D की भारी, गोरी छातियों का भारी उभार, उनकी नाभि का गहरा गड्ढा और उनकी चौड़ी, मांसल जांघों का ढांचा पूरी तरह से छनकर बाहर आ रहा था। उनका ब्लाउज़ भी काफी गहरा था, जिससे रात के समागम के बाद उनके बदन पर आया निखार और सुर्खी साफ झलक रही थी।
"कबीर! ओ माई गॉड! मेरा बच्चा कितना बड़ा और हैंडसम हो गया है!" स्मिता ने अपनी भारी, रसीली आवाज़ में चहकते हुए कहा।
कबीर आगे बढ़ा, "मौसी! लॉन्ग टाइम!"

कबीर ने स्मिता को गले लगाने के लिए अपनी बाहें फैलाईं। स्मिता ने भी आगे बढ़कर अपने उस भारी, रसीले बदन को कबीर के कड़े, कसरती सीने से पूरी तरह से भींच लिया।
जैसे ही दोनों का आलिंगन हुआ, स्मिता के ३६D के भारी, नर्म और थलथलाते हुए उरोज कबीर की कसी हुई नीली शर्ट और उसकी छाती के मसल्स से बुरी तरह चपटे हो गए। स्मिता की पतली शिफॉन की साड़ी उनके बीच में कोई रुकावट ही नहीं बन पा रही थी। कबीर को अपने सीने पर स्मिता के स्तनों की वो अद्भुत, रसीली गर्माहट और कड़ापन साफ महसूस हुआ। स्मिता के महंगे परफ्यूम और उनके बदन की देसी खुशबू ने कबीर के नथुनों में प्रवेश किया, जिससे उसकी सासों की गति अचानक तेज हो गई।
कबीर के बड़े, मजबूत हाथ स्वाभाविक रूप से स्मिता की पतली शिफॉन से ढकी नंगी पीठ और उनकी कमर के ढलान पर थमे। शिफॉन का कपड़ा इतना महीन था कि कबीर को ऐसा लगा जैसे वह स्मिता की नंगी, गोरी त्वचा को ही छू रहा है।
"ओह मौसी... आप तो दिन-ब-दिन और भी ज़्यादा यंग और गॉर्जियस होती जा रही हैं," कबीर ने स्मिता की पीठ पर अपनी उंगलियों की पकड़ को थोड़ा कसते हुए कहा।
स्मिता ने कबीर को थोड़ा पीछे हटकर देखा, उनकी आँखों में एक नटखट और शरारती चमक थी। उन्होंने कबीर के कड़े बाइसेप्स पर हाथ फेरा और फिर रेखा की तरफ देखकर एक इशारेबाज़ मुस्कान दी।
"तारीफ तो तेरी मॉम की होनी चाहिए कबीर, देख तो सही आज कैसी कयामत ढा रही है मेरी बहन," स्मिता ने रेखा के गहरे गले के ब्लाउज़ और उनकी नंगी पीठ की तरफ इशारा करते हुए कहा।
तभी हॉल में अर्जुन दाखिल हुआ। ब्लैक कुर्ता-पायजामा में अर्जुन अपनी ६ फीट की चौड़ी, मर्दाना काया के साथ किसी राजा की तरह लग रहा था। उसकी आँखों में स्मिता के लिए एक मालिकाना हक और रेखा के प्रति एक गुप्त, कामुक तालमेल साफ दिख रहा था।
"कबीर भाई! वेलकम बैक!" अर्जुन ने आगे बढ़कर कबीर से हाथ मिलाया और उसे कसकर गले लगाया।
दो जवान, ताकतवर और रसूखदार मर्दो का यह मिलन माहौल में एक अलग ही ऊर्जा भर गया।

चारों लोग लिविंग रूम में रखे आलीशान चमड़े के सोफे पर बैठ गए। रेखा और स्मिता एक साथ सोफे पर बैठी थीं। शिफॉन की साड़ी में स्मिता का रसीला बदन और सिल्क की साड़ी में रेखा का भारी, सम्मोहन से भरा रूप... दोनों बहनें किसी कामुकता की देवियों जैसी लग रही थीं। अर्जुन एक तरफ बैठा स्मिता के पारदर्शी शिफॉन के भीतर से झलकते स्तनों को अपनी गहरी नजरों से पी रहा था, जबकि कबीर बार-बार अपनी मॉम की नंगी पीठ और स्मिता की साड़ी से छलकती नाभि के गहरे गड्ढे को देखने से खुद को रोक नहीं पा रहा था।
रात के नौ बजे सभी लोग डाईनिंग टेबल पर इकट्ठा हुए। डार्क ग्लास की बनी बड़ी डाईनिंग टेबल पर तरह-तरह के लजीज देसी पकवान सजे हुए थे।
बैठने की व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि अर्जुन और स्मिता एक तरफ बैठे थे, जबकि कबीर और रेखा उनके ठीक सामने।

डिनर के दौरान बातचीत का दौर शुरू हुआ। स्मिता ने एक रोटी अर्जुन की प्लेट में रखी और अपने हाथों से अर्जुन की उंगलियों को हल्का सा दबाया। अर्जुन ने स्मिता की आँखों में देखा और टेबल के नीचे से अपना भारी, चौड़ा पैर आगे बढ़ा दिया। अर्जुन के नंगे पैर की उंगलियां स्मिता की पारदर्शी शिफॉन साड़ी के नीचे उनकी गोरी पिंडलियों और जांघों को धीरे-धीरे सहलाने लगीं। स्मिता के मुंह से खाना चबाते हुए एक मद्धम सी सिसकारी निकलने को हुई, जिसे उन्होंने वाइन का घूंट भरकर दबाया।
कबीर की नज़र टेबल के नीचे स्मिता की साड़ी की हल्की सी हलचल पर पड़ी, लेकिन वह समझ नहीं पाया। उसने अपनी मॉम रेखा की तरफ देखा।
रेखा अपनी प्लेट से पनीर कबाब उठाकर खा रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें कबीर के कड़े होठों और उसके चौड़े सीने पर ही टिकी थीं।
"वैसे... इस वीकेंड दिल्ली के उस बड़े रियल एस्टेट टायकून, सिंघानिया का बुलावा आया है। उसने अपने नए रीसॉर्ट के लॉन्च पर एक बेहद अजीब और अजीबोगरीब थीम वाली प्राइवेट पार्टी रखी है। माँ और मौसी तो साफ मना कर रही हैं, और मैं भी थोड़ा हिचकिचा रहा हूँ," अर्जुन ने पास पड़े कार्ड को देखते हुए कहा। "तुझे जाना है तो चले जाना।" कबीर की ओर देखते हुए अर्जुन ने कहा।
कबीर ने टेबल पर रखे उस चमकीले कार्ड को उठाया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—**'द वेनेशियन सीक्रेट: ए नकाबपोश वाइन गाला'**।
नीचे पार्टी के नियम लिखे थे: *चेहरे पर पूरा मास्क अनिवार्य है।*
कार्ड पढ़ते ही कबीर की आँखों में विदेश वाला रोमांच और एक जवान पुरुष की उत्सुकता चमक उठी। "अरे भाई! यह तो 'मास्क्युराइड सीक्रेट' पार्टी है! इसमें कतराना कैसा? विदेशों में—पेरिस, न्यूयॉर्क और मिलान के रईस सर्कल्स में ऐसी पार्टियां होना बहुत आम बात है। वहाँ के बड़े-बड़े कपल्स और रईस लोग अपने रोज़मर्रा के तनाव से बाहर निकलने और एक अनजाना, थ्रिलिंग अनुभव पाने के लिए ऐसी पार्टियां रखते हैं। कसम से भाई, चलो ना... बहुत मज़ा आएगा!"
स्मिता ने तुरंत एक झिझक भरी, झूठी हंसी हंसने का नाटक किया। "धत्त कबीर... तुम भी क्या कह रहे हो। हम ठहरे इस उम्र के लोग। वहाँ सब नकाब पहनकर अनजान बनकर घूमेंगे, कोई किसी की कमर में हाथ डालकर डांस कर रहा होगा, कोई किसी को छू रहा होगा... हमारी सोसाइटी के हिसाब से यह बहुत अजीब और बोल्ड थीम है।"
"अरे बड़ी माँ, यही तो इस पार्टी का असली मज़ा है!" कबीर ने अपनी वाइन का ग्लास टेबल पर रखा और थोड़ा आगे झुका, जिससे उसकी चौड़ी छाती रेखा के उभरे हुए ३६D स्तनों के ऊपरी हिस्से से हल्की सी छू गई। उसने रेखा का हाथ थाम लिया। "मॉम, आप बताओ... आप खुद इतनी मॉडर्न हो। इस पार्टी का नियम ही यही है कि वहाँ कोई किसी का चेहरा नहीं देख सकता। सब नकाबपोश होंगे। वहाँ कोई मर्यादा या जजमेंट नहीं होता। चलो न कुछ नया ट्राई करते है।"
कबीर के मुंह से 'कोई किसी का चेहरा नहीं देख सकता। सब नकाबपोश होंगे' सुनकर रेखा के बदन का तापमान अचानक बढ़ गया। उनकी ब्लाउज के भीतर उनकी छाती ज़ोर से ऊपर-नीचे होने लगी। उन्हें स्मिता की वो बात याद आई—*"कबीर को तेरी इस परिपक्व काया का स्वाद चखाना होगा।"*
रेखा ने स्मिता की तरफ देखा, स्मिता की आँखों में एक गुप्त, कामुक चमक तैर रही थी। स्मिता ने रेखा के पैर को सोफे के नीचे हल्के से दबाया, मानो कह रही हों कि *शिकार खुद जाल बुन रहा है, हाँ कर दे।*
रेखा ने अपनी ज़ुबान से अपने सूखे होठों को धीरे से चाटा, जिससे कबीर की नज़रें एक पल के लिए उनके गुलाबी होठों पर टिक गईं। रेखा ने कबीर का हाथ थोड़ा भींचते हुए कहा, "कबीर... तुम कह तो सही रहे हो। लेकिन अगर वहाँ अंधेरे में किसी ने... किसी अनजान मर्द ने मुझे डांस के लिए हाथ पकड़ लिया, या कुछ ज्यादा... तो?"
"मॉम, यही तो उस विदेशी थीम का थ्रिल (रोमांच) है!" कबीर ने हंसते हुए बेबाकी से कहा। वाइन का नशा और कमरे में फैली इन दो मैच्योर औरतों के बदन की महक उसके दिमाग पर हावी हो रही थी।
"वहाँ सब नकाब के पीछे छिपे बदन का असली रस ढूंढते हैं। कोई किसी को मजबूर नहीं करता, सब आपसी कशिश और स्पर्श के खेल से आगे बढ़ता है। भाई, आप मना मत करना प्लीज। हम चारों चलेंगे!"
अर्जुन ने अपने होठों को दबाकर अपनी मुस्कान छुपाई। कबीर जिसे अपनी मर्जी और विदेशी शौक समझ रहा था, वह असल में उसके जीवन का सबसे बड़ा और सबसे रसीला मोड़ बनने जा रहा था।
अर्जुन ने अपनी रौबदार आवाज़ में कहा, "ठीक है कबीर, अगर तेरी इतनी ही इच्छा है... तो डन रहा। इस वीकेंड हम चारों सिंघानिया के उस फार्महाउस पर जा रहे हैं। लेकिन याद रखना... कोई किसी के नकाब की जानकारी न ले, सब नकाब के पीछे अनजान होंगे।"
स्मिता ने कबीर के कंधे को एक आखिरी बार भींचते हुए रेखा की तरफ देखा, जिनकी नाभि के नीचे इस आने वाले खेल की कल्पना से ही काम-रस का एक कतरा पिघलकर बह चुका था। कबीर को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि वह खुद अपने हाथों से अपनी माँ के उस भारी, रसीले और नग्न बदन को छूने और उसे अपनी बाहों में भींचने का टिकट बुक कर चुका था। खेल की बिसात कबीर की ही मर्जी से बिछ चुकी थी।
कबीर की काट का इंजन स्टार्ट हुआ और लाल रंग की बैकलाइट्स पार्किंग से बाहर निकलकर शहर की सन्नाटे भरी सड़क पर गायब हो गईं। कबीर अपनी माँ रेखा को लेकर पेंटहाउस के लिए रवाना हो चुका था।
घर का दरवाज़ा बंद होते ही, माहौल की सारी औपचारिकताएं जैसे पल भर में ताश के पत्तों की तरह ढह गईं।
लिविंग रूम में अब सिर्फ दो लोग बचे थे—अर्जुन और स्मिता।
स्मिता ने अपनी आइस-ब्लू पारदर्शी शिफॉन की साड़ी का पल्लू, जिसे उन्होंने कबीर के सामने कुछ हद्द तक संभाल रखा था, एक ही झटके में पूरी तरह कंधे से नीचे गिरा दिया। शिफॉन का वह महीन कपड़ा उनके पेट की नाभि के नीचे सरक गया। उनके ३६D के भारी, थलथलाते हुए उरोज अब सिर्फ एक पतले, नीले रंग के गहरे गले के ब्लाउज़ की कैद में थे। उनकी भारी क्लीवेज की घाटी पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें जगमगा रही थीं, जो उनके भीतर सुलगती वासना की गवाही दे रही थीं।

अर्जुन ने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर स्मिता को पीछे से अपनी कसी हुई, मर्दाना बाहों में दबोच लिया। अर्जुन के दोनों बड़े, गर्म और सांवले हाथ सीधे स्मिता की साड़ी के ऊपर से उनकी छातियों पर पड़े और उसने उन्हें बेदर्दी से भींच दिया।
"अह्ह्ह... अर्जुन!" स्मिता के मुंह से एक तीखी, कामुक सिसकारी निकली। उन्होंने अपना सिर पीछे फेंककर अर्जुन के कड़े, चौड़े सीने पर टिका दिया।
अर्जुन ने अपनी भारी, रसीली आवाज़ में स्मिता के कान की लौ को अपने दांतों से दबाते हुए कहा, "देखा मां? जैसा तुमने कहा था, खेल बिल्कुल वैसा ही बिछ रहा है। कबीर खुद अपनी माँ को उस नकाबपोश रात की आग में झोंकने के लिए बेताब है।"
"उम्मम्म... अर्जुन, ज़रा धीरे..." स्मिता ने आंहें भरते हुए अर्जुन की दाढ़ी वाली गर्दन पर अपने हाथ फेरे। "कबीर को नहीं पता कि वहां उसे जन्नत महसूस होने वाली है।"
अर्जुन ने स्मिता को घुमाकर अपनी तरफ किया। स्मिता की आँखों में वाइन और कामुकता का एक तीखा, गंदा नशा चढ़ चुका था। अर्जुन ने अपने बड़े, भारी हाथ से स्मिता के बैकलेस ब्लाउज़ की डोरी खींच दी। डोरी खुलते ही वह भारी गोरा उरोज ब्लाउज़ की सीमा तोड़कर बाहर छलक आया। उनका भूरा, बड़ा निप्पल रात भर की मार और अभी की तपन से पूरी तरह अकड़ा हुआ था।
"सच बताओ मां..." अर्जुन ने अपने अंगूठे और उंगली की चुटकी में स्मिता के उस अकड़े हुए निप्पल को कसकर मरोड़ते हुए पूछा, "जब कबीर तुझे गले लगा रहा था, उसकी छाती तेरे इस भारी बदन से सट रही थी... तब तेरे मन में क्या चल रहा था?"
"अहह्ह... ओफ़्फ़... अर्जुन! मत पूछ..." स्मिता की सांसें फूलने लगीं, उनकी आँखों की पुतलियां ऊपर चढ़ गईं। "जब उसने मुझे भींचा, तो मेरे भी इस बदन में नीचे तक झनझनाहट हो गई। मुझे तो तभी समझ आ गया था कि जब यह कड़ा मर्दाना लंड रेखा की रसीली चूत के भीतर जाएगा ना... तो रेखा चीख उठेगी!"
अर्जुन ने एक दरिंदगी भरी, कामुक हंसी हंसते हुए स्मिता की साड़ी को कमर से नीच खींच दिया। स्मिता की भारी, चौड़ी चूतड़ों का उभार और उनकी जांघों का मांस पूरी तरह नंगा हो गया। अर्जुन ने अपने भारी हाथ का एक कड़ा थप्पड़ सीधे स्मिता के दाहिने चूतड़ पर दे मारा—**'चटाक!'**
"आहहह! अर्जुन... मारो मुझे!" स्मिता वासना में अंधी होकर सिसक उठीं।
"दोनों बहनों का बदन रसीला है," अर्जुन ने स्मिता की साड़ी के साये के भीतर अपना हाथ डालते हुए उनकी भीगी हुई, गर्म चूत की दरार में अपनी दो उंगलियां एक ही झटके में पूरी भीतर उतार दीं। "कबीर जब उस नकाबपोश अंधेरे में अपनी माँ की इस चूत में उंगलियां डालेगा, और रेखा को लगेगा कि कोई जवान मर्द खुद बेटा कबीर उसे चोदने वाला है... तब देखना असली मजा!"

अर्जुन ने स्मिता को वहीं सोफे पर उल्टा गिरा दिया। शिफॉन की साड़ी, पेटीकोट सब तहस-नहस होकर एक तरफ पड़ा था। अर्जुन ने अपना पजामा नीचे सरकाया और अपने भारी, अकड़े हुए काले लंड को सीधे स्मिता की काम-रस से लबालब भरी चूत के मुहाने पर टिकाकर एक ही धक्के में पूरा भीतर उतार दिया।
सोफे की स्प्रिंगें चरमरा उठीं और पूरे घर में स्मिता की बेबाक, गंदी सिसकारियां और अर्जुन के मर्दाना धक्कों की तीखी आवाज़ें गूंजने लगीं।
दूसरी तरफ, कार पेंटहाउस की पार्किंग में आकर रुकी।
पूरे रास्ते कबीर और रेखा के बीच एक अजीब सी खामोशी छाई रही थी। गाड़ी की एसी की ठंडक के बावजूद रेखा के बदन से एक अजीब सी तपन निकल रही थी। कबीर बीच-बीच में अपनी नीली शर्ट के कॉलर को ढीला करता और साइड ग्लास से रेखा की साड़ी के बैकलेस ब्लाउज़ से झांकती उनकी नंगी पीठ और उनकी गोरी गर्दन को निहारता रहा था।
जब दोनों पेंटहाउस के भीतर पहुँचे, तो पूरे घर में एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।
रेखा ने लिविंग रूम की मद्धम पीली लाइट्स ऑन कीं। साड़ी का सिल्क उनकी भारी जांघों और चूतड़ों से रगड़ खा रहा था।
"कबीर... तू जा, जाकर सो जा। बहुत देर हो गई है," रेखा ने बिना कबीर की तरफ देखे, अपनी कांपती आवाज़ में कहा। वह सीधे अपनी अलमारी या बेडरूम की तरफ भागना चाहती थीं, क्योंकि उनके भीतर की कामुक ज्वाला अब उनके नियंत्रण से बाहर हो रही थी।
लेकिन कबीर ने पीछे से आकर रेखा की कलाई पकड़ ली।
कबीर की सांवली, चौड़ी और गर्म हथेली का दबाव जब रेखा की पतली कलाई पर पड़ा, तो रेखा का पूरा वजूद वहीं जम गया। उन्होंने मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर एक जवान पुरुष का वह अधिकार भाव था, जो किसी भी औरत के सब्र को तोड़ दे।
"मॉम... कुछ सोच रही हो?" कबीर की भारी, रसीली आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया। वह एक कदम और आगे बढ़ा, जिससे उसकी कसी हुई शर्ट रेखा के साड़ी से ढके स्तनों के उभार को हल्की सी छूने लगी।
"आप उस नकाबपोश पार्टी की बात से डरी हुई हैं ना?" कबीर ने एक हल्की सी शरारती मुस्कान के साथ कहा। उसने रेखा की कलाई को छोड़ा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अपनी उंगलियों को सरकाते हुए रेखा की गोरी बांह से होते हुए उनके नंगे, सुडौल कंधे पर ले गया।

"मॉम... आप भूल रही हैं कि उस पार्टी में आप अकेली नहीं होंगी," कबीर ने फुसफुसाते हुए अपना चेहरा रेखा के चेहरे के इतना करीब कर लिया कि उसकी गर्म, शराब से महकती सांसें रेखा के सुर्खी लगे होठों पर टकराने लगीं। "मैं वहाँ रहूँगा। अगर कोई अनजान मर्द आपको छूने की कोशिश करेगा... तो पहले उसे मुझसे गुज़रना होगा।"
"कबीर... ऐसी बात नहीं पर... थोड़ा अजीब लगेगा न" रेखा की आवाज़ गड़गड़ा गई।
"मैं समझता हूं मॉम, चिल, आराम करो और जिंदगी बिना टेंशन जियो। जो होगा देखा जाएगा। हम अकेले तो होंगे नहीं पार्टी में, सब बड़े और अपने लेवल के ही तो होंगे।" कबीर ने बेबाकी सें कहा और अपना दूसरा हाथ रेखा की नंगी कमर पर रख दिया।
"गुड नाइट, मॉम..." कबीर फुसफुसाते हुए एक मदमस्त चाल से अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गया।
रेखा वहीं लिविंग रूम के बीचों-बीच खड़ी रह गईं। उनका पूरा बदन थर-थर कांप रहा था। कबीर के हाथों का वो भारी दबाव अभी भी उनकी नंगी कमर पर छपा हुआ महसूस हो रहा था। उनकी साड़ी के भीतर उनकी पैंटी पूरी तरह से भीगकर चिपक चुकी थी।
रेखा ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर भींचा और अपने कमरे की तरफ बढ़ीं। उस आने वाले वीकेंड की 'मास्क्युराइड प्राइवेट पार्टी' की कल्पना मात्र से ही उनके बदन के हर एक पोर से हवस का रस छलकने लगा था। उन्हें पता था कि नकाब के पीछे उस रात कोई मर्यादा नहीं बचेगी—माँ और बेटे के बीच का आखिरी पर्दा भी उसी फार्महाउस की रोशनी में जलकर राख होने वाला था।
अपने मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा बंद करते ही रेखा ने पीछे मुड़कर लॉक लगा दिया। 'क्लिक' की वह हल्की सी आवाज़ सन्नाटे में गूंजी, और उसी के साथ रेखा की बची-कुची रोक-टोक और सामाजिक मर्यादा की दीवार ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
कमरे का वातानुकूलित सन्नाटा और उसमें तैरती हुई लैवेंडर की ठंडी खुशबू रेखा के भीतर उठती हुई भयंकर आग को शांत करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही थी। कबीर की सांवली उंगलियों की तपन, उसका वह ६ फीट का कसरती बदन, और उसकी शराब से महकती बेबाक बातें रेखा के पूरे वजूद में किसी ज़हर की तरह फैल चुकी थीं।
रेखा मखमली कदमों से चलकर ड्रेसिंग टेबल के बड़े से शीशे के सामने आकर खड़ी हो गईं।
पीली, मद्धम डिम-लाइट में शीशे के भीतर उनका अपना ही रूप एक अद्भुत, सम्मोहक और कामुक दृश्य बना रहा था। सिल्क की साड़ी, जो अब तक उन्हें एक रसूखदार औरत की पहचान दे रही थी, अब उनके बदन पर किसी लोहे की जंजीर की तरह चुभने लगी थी।
उनकी ४९ साल की परिपक्व काया का रोआँ-रोआँ उस एक स्पर्श के बाद से सुलग रहा था।
कांपती, गोरी उंगलियों से रेखा ने अपनी साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे सरकाया। पिन की तीखी चुभन के साथ ही साड़ी फर्श पर एक ढेर बनकर गिर गई।

अब वह सिर्फ अपने बैकलेस ब्लाउज़ और पेटीकोट में खड़ी थीं। रेखा ने शीशे में अपनी नंगी पीठ को देखा, उन्होंने उंगलियों को पीछे ले जाकर ब्लाउज़ की पतली डोरियों को खींचा।
डोरियाँ खुलते ही ब्लाउज़ का कसाव ढीला पड़ा, और रेखा ने उसे अपनी बाहों से उतारकर नीचे फेंक दिया।
३६D के वे भारी, मखमली और थलथलाते हुए गोरे उरोज ब्लाउज की बंदिश से पूरी तरह आज़ाद होकर नीचे लटक गए। रात भर की तपन और कबीर की कसी हुई छाती के दबाव की वजह से उनके बड़े, भूरे निप्पलों पर एक तीखा कड़ापन और सुर्खी साफ दिख रही थी। रेखा के भारी स्तनों की क्लीवेज में पसीने का एक रसीला कतरा जगमगा रहा था।
रेखा ने एक लंबी, कांपती हुई सांस ली। उनकी नाभि का गहरा गड्ढा और कमर का मांसल उभार हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था।
"अहह्ह... गॉड..." रेखा के मुंह से एक दबी हुई सिसकारी निकल गई।
उन्होंने अपने पेटीकोट के नाड़े को एक ही झटके में खोल दिया। रेशमी पेटीकोट और उसके नीचे छिपी भीगी हुई मखमली पैंटी एक साथ सरकते हुए उनकी भारी, गोरी जांघों से होकर पैरों के पास फर्श पर जमा हो गए।
रेखा अब अपने विशाल बेडरूम के शीशे के सामने पूरी तरह नग्न अवस्था में खड़ी थीं। ४९ साल की उम्र का वह भारी, थलथलाता और काम-रस से सराबोर देसी बदन—चौड़े चूतड़, गोरी-मांंसल जांघें, और उनके बीच कामुकता से दमकता हुआ वह रसीला रसातल।
रेखा धीरे-धीरे चलकर अपने किंग-साइज़ बेड पर पहुँचीं और मखमली चादरों पर पीठ के बल ढह गईं। बंद आँखों के अंधेरे में उन्हें सिर्फ और सिर्फ कबीर का चेहरा दिखाई दे रहा था।
कबीर के सांवले, कड़े बाइसेप्स, उसकी शर्ट के भीतर दबे लोहे जैसे कड़े मसल्स, और जब उसने रेखा की कमर को अपने हाथ के पकड़ा था, रेखा के दिमाग में एक तीखा नशा घोल रहा था।
"उफ़्फ़... कबीर..." रेखा ने सिसकते हुए अपने दोनों भारी, गोरे हाथों को अपनी ही ३६D छातियों पर रख दिया।

उनकी अपनी गोरी उंगलियां जब उनके भूरे, अकड़े हुए निप्पलों को कसकर मरोड़ने लगीं, तो रेखा ने अपनी आँखें और कसकर मूंद लीं। उन्हें महसूस हुआ जैसे यह हाथ उनका अपना नहीं, बल्कि उनके २८ साल के जवान बेटे कबीर का है। उन्हें लगा जैसे कबीर का भारी, सांवला बदन उनके ऊपर झुका हुआ है और अपनी भारी मर्दाना छाती से उनके इन थलथलाते स्तनों को कुचल रहा है।
"अहह्ह... दबाओ... कबीर... अपनी मॉम को कसकर भींच लो..." रेखा बेडशीट को अपने गोरे पैरों की उंगलियों से भींचते हुए बड़बड़ाने लगीं।
उनकी एक हथेली धीरे-धीरे छाती से नीचे सरकती हुई, उनकी नाभि के रसीले गड्ढे को पार कर, उनकी भारी जांघों के बीच जा पहुँची।
कबीर के उस एक स्पर्श और उसकी बेबाक बातों के जादू से रेखा की जांघों के बीच की दरार पूरी तरह काम-रस से लबालब भरी हुई थी। काम-रस का एक गरम, गाढ़ा कतरा पिघलकर उनकी जांघों की ढलान पर बह रहा था।
रेखा ने बिना किसी झिझक के अपनी दो उंगलियां अपनी उस भीगी हुई, गर्म और सुलगती हुई चुत के भीतर एक ही झटके में उतार दीं।

"आहह्हह... स्मिता... तू सही कह रही थी..." रेखा का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। उनकी कमर बेड से एक इंच ऊपर उठ गई। उनकी उंगलियां तेजी से भीतर-बाहर होने लगीं, जिससे कमरे के सन्नाटे में एक तीखी,
रेखा अपने ड्रेसिंग रूम में शीशे के सामने खड़ी होकर तैयार हो रही थीं। स्मिता की बातें उनके दिमाग में किसी शराब की तरह चढ़ी हुई थीं। उन्होंने आज खुद को छुपाने के बजाय अपने हुस्न को पूरी तरह से नुमाइश करने का फैसला किया था। उन्होंने एक गहरे जामुनी और सुनहरे बॉर्डर वाली सिल्क की साड़ी चुनी, लेकिन उसके साथ जो ब्लाउज़ पहना, वह आधुनिकता और कामुकता की सारी हदें पार कर रहा था।
गहरे गले का बैकलेस ब्लाउज़, जिसमें सिर्फ दो पतली डोरियाँ उनकी गोरी, नग्न पीठ को थामे हुए थीं। ब्लाउज़ का कट इतना गहरा था कि रेखा के ३६D के भारी स्तनों का आधा हिस्सा बाहर छलकने को आतुर दिख रहा था। उनकी कमर पर थोड़ा सा मांस लटक रहा था, जो देसी और रसीलेपन का चरम रूप था। रेखा ने अपने बालों को एक ढीले जूड़े में बांधा, जिससे उनकी गोरी, सुराहीदार गर्दन पूरी तरह नंगी हो गई। होठों पर गहरी लाल लिपस्टिक और आँखों में गीला काजल लगाकर जब रेखा शीशे के सामने घूमीं, तो खुद उनकी आँखों में भी एक नशा तैर गया।
तभी ड्रेसिंग रूम का दरवाज़ा खुला और कबीर भीतर आया। कबीर ने एक कसी हुई डार्क ब्लू रंग की फॉर्मल शर्ट और ब्लैक ट्राउज़र पहन रखा था, जिसमें उसका लंबा, कसरती बदन बेहद हैंडसम लग रहा था।
लेकिन जैसे ही कबीर की नज़र अपनी माँ रेखा पर पड़ी, उसके कदम वहीं ठिठक गए। उसकी आँखें पूरी तरह फैल गईं। रेखा साड़ी के पल्लू को अपनी भारी छाती पर सलीके से ढालने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी नंगी पीठ और ब्लाउज़ से छलकते स्तनों का उभार किसी भी जवान मर्द का ईमान डोलने के लिए काफी था।
"वॉट द एफ... आई मीन, मॉम!" कबीर के मुंह से बेसाख्ता निकला। वह धीरे-धीरे चलकर रेखा के पीछे आकर खड़ा हो गया।
शीशे में दोनों की नजरें मिलीं। कबीर के सांवले, कड़े बदन के पीछे रेखा का यह रसीला, परिपक्व और बेबाक रूप एक अद्भुत कामुक दृश्य बना रहा था।
"क्या हुआ कबीर? मैं... मैं कैसी लग रही हूँ?" रेखा ने शीशे में कबीर की आँखों में अपनी काया के लिए पनपती हुई हवस और दीवानगी को साफ पढ़ते हुए पूछा। उनकी आवाज़ में लज्जा और नशा दोनों घुला था।
कबीर ने आगे बढ़कर अपने दोनों बड़े, गर्म हाथ रेखा की नंगी कमर पर रख दिए। जहाँ कबीर की उंगलियों की सांवली त्वचा रेखा की गोरी, मांसल कमर से छुई, वहाँ रेखा के बदन में एक सिहरन की बिजली दौड़ गई।
"मॉम... आप आज रात किसी भी सुपरमॉडल को चुटकियों में मात दे सकती हैं," कबीर ने फुसफुसाते हुए रेखा की नंगी पीठ पर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए कहा।
कबीर की इस बेहद बेबाक टिप्पणी से रेखा के गालों पर सुर्खी दौड़ गई। उनके बदन का रोआँ-रोआँ सुलग उठा। उन्होंने मुड़कर कबीर के सीने पर हाथ रखा, जो शर्ट के भीतर भी लोहे की तरह सख्त था।
"चल, बहुत बातें बनाना सीख गया है विदेश में रहकर," रेखा ने झूठी डांट डांटते हुए कहा, लेकिन उनके होठों की मुस्कान उनके भीतर छिपी कामुक तड़प को साफ बयां कर रही थी। "चलो, स्मिता और अर्जुन हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे।"
रात के आठ बजे कबीर अपनी कार चलाकर स्मिता के पोर्टिको में दाखिल हुआ। घर आलीशान और बत्तियों की रोशनी में नहाया हुआ था।
गाड़ी से उतरकर कबीर ने रेखा का हाथ थाम लिया। जब दोनों बंगले के मुख्य हॉल में पहुँचे, तो स्मिता उनका स्वागत करने के लिए सामने खड़ी थीं।
स्मिता को देखते ही कबीर की नजरें एक पल के लिए चकाचौंध हो गईं। स्मिता ने हल्के नीले (आइस ब्लू) रंग की एक बेहद पारदर्शी शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी। उस पतली, पारदर्शी शिफॉन की साड़ी के भीतर से स्मिता की ३६D की भारी, गोरी छातियों का भारी उभार, उनकी नाभि का गहरा गड्ढा और उनकी चौड़ी, मांसल जांघों का ढांचा पूरी तरह से छनकर बाहर आ रहा था। उनका ब्लाउज़ भी काफी गहरा था, जिससे रात के समागम के बाद उनके बदन पर आया निखार और सुर्खी साफ झलक रही थी।
"कबीर! ओ माई गॉड! मेरा बच्चा कितना बड़ा और हैंडसम हो गया है!" स्मिता ने अपनी भारी, रसीली आवाज़ में चहकते हुए कहा।
कबीर आगे बढ़ा, "मौसी! लॉन्ग टाइम!"

कबीर ने स्मिता को गले लगाने के लिए अपनी बाहें फैलाईं। स्मिता ने भी आगे बढ़कर अपने उस भारी, रसीले बदन को कबीर के कड़े, कसरती सीने से पूरी तरह से भींच लिया।
जैसे ही दोनों का आलिंगन हुआ, स्मिता के ३६D के भारी, नर्म और थलथलाते हुए उरोज कबीर की कसी हुई नीली शर्ट और उसकी छाती के मसल्स से बुरी तरह चपटे हो गए। स्मिता की पतली शिफॉन की साड़ी उनके बीच में कोई रुकावट ही नहीं बन पा रही थी। कबीर को अपने सीने पर स्मिता के स्तनों की वो अद्भुत, रसीली गर्माहट और कड़ापन साफ महसूस हुआ। स्मिता के महंगे परफ्यूम और उनके बदन की देसी खुशबू ने कबीर के नथुनों में प्रवेश किया, जिससे उसकी सासों की गति अचानक तेज हो गई।
कबीर के बड़े, मजबूत हाथ स्वाभाविक रूप से स्मिता की पतली शिफॉन से ढकी नंगी पीठ और उनकी कमर के ढलान पर थमे। शिफॉन का कपड़ा इतना महीन था कि कबीर को ऐसा लगा जैसे वह स्मिता की नंगी, गोरी त्वचा को ही छू रहा है।
"ओह मौसी... आप तो दिन-ब-दिन और भी ज़्यादा यंग और गॉर्जियस होती जा रही हैं," कबीर ने स्मिता की पीठ पर अपनी उंगलियों की पकड़ को थोड़ा कसते हुए कहा।
स्मिता ने कबीर को थोड़ा पीछे हटकर देखा, उनकी आँखों में एक नटखट और शरारती चमक थी। उन्होंने कबीर के कड़े बाइसेप्स पर हाथ फेरा और फिर रेखा की तरफ देखकर एक इशारेबाज़ मुस्कान दी।
"तारीफ तो तेरी मॉम की होनी चाहिए कबीर, देख तो सही आज कैसी कयामत ढा रही है मेरी बहन," स्मिता ने रेखा के गहरे गले के ब्लाउज़ और उनकी नंगी पीठ की तरफ इशारा करते हुए कहा।
तभी हॉल में अर्जुन दाखिल हुआ। ब्लैक कुर्ता-पायजामा में अर्जुन अपनी ६ फीट की चौड़ी, मर्दाना काया के साथ किसी राजा की तरह लग रहा था। उसकी आँखों में स्मिता के लिए एक मालिकाना हक और रेखा के प्रति एक गुप्त, कामुक तालमेल साफ दिख रहा था।
"कबीर भाई! वेलकम बैक!" अर्जुन ने आगे बढ़कर कबीर से हाथ मिलाया और उसे कसकर गले लगाया।
दो जवान, ताकतवर और रसूखदार मर्दो का यह मिलन माहौल में एक अलग ही ऊर्जा भर गया।

चारों लोग लिविंग रूम में रखे आलीशान चमड़े के सोफे पर बैठ गए। रेखा और स्मिता एक साथ सोफे पर बैठी थीं। शिफॉन की साड़ी में स्मिता का रसीला बदन और सिल्क की साड़ी में रेखा का भारी, सम्मोहन से भरा रूप... दोनों बहनें किसी कामुकता की देवियों जैसी लग रही थीं। अर्जुन एक तरफ बैठा स्मिता के पारदर्शी शिफॉन के भीतर से झलकते स्तनों को अपनी गहरी नजरों से पी रहा था, जबकि कबीर बार-बार अपनी मॉम की नंगी पीठ और स्मिता की साड़ी से छलकती नाभि के गहरे गड्ढे को देखने से खुद को रोक नहीं पा रहा था।
रात के नौ बजे सभी लोग डाईनिंग टेबल पर इकट्ठा हुए। डार्क ग्लास की बनी बड़ी डाईनिंग टेबल पर तरह-तरह के लजीज देसी पकवान सजे हुए थे।
बैठने की व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि अर्जुन और स्मिता एक तरफ बैठे थे, जबकि कबीर और रेखा उनके ठीक सामने।

डिनर के दौरान बातचीत का दौर शुरू हुआ। स्मिता ने एक रोटी अर्जुन की प्लेट में रखी और अपने हाथों से अर्जुन की उंगलियों को हल्का सा दबाया। अर्जुन ने स्मिता की आँखों में देखा और टेबल के नीचे से अपना भारी, चौड़ा पैर आगे बढ़ा दिया। अर्जुन के नंगे पैर की उंगलियां स्मिता की पारदर्शी शिफॉन साड़ी के नीचे उनकी गोरी पिंडलियों और जांघों को धीरे-धीरे सहलाने लगीं। स्मिता के मुंह से खाना चबाते हुए एक मद्धम सी सिसकारी निकलने को हुई, जिसे उन्होंने वाइन का घूंट भरकर दबाया।
कबीर की नज़र टेबल के नीचे स्मिता की साड़ी की हल्की सी हलचल पर पड़ी, लेकिन वह समझ नहीं पाया। उसने अपनी मॉम रेखा की तरफ देखा।
रेखा अपनी प्लेट से पनीर कबाब उठाकर खा रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें कबीर के कड़े होठों और उसके चौड़े सीने पर ही टिकी थीं।
"वैसे... इस वीकेंड दिल्ली के उस बड़े रियल एस्टेट टायकून, सिंघानिया का बुलावा आया है। उसने अपने नए रीसॉर्ट के लॉन्च पर एक बेहद अजीब और अजीबोगरीब थीम वाली प्राइवेट पार्टी रखी है। माँ और मौसी तो साफ मना कर रही हैं, और मैं भी थोड़ा हिचकिचा रहा हूँ," अर्जुन ने पास पड़े कार्ड को देखते हुए कहा। "तुझे जाना है तो चले जाना।" कबीर की ओर देखते हुए अर्जुन ने कहा।
कबीर ने टेबल पर रखे उस चमकीले कार्ड को उठाया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—**'द वेनेशियन सीक्रेट: ए नकाबपोश वाइन गाला'**।
नीचे पार्टी के नियम लिखे थे: *चेहरे पर पूरा मास्क अनिवार्य है।*
कार्ड पढ़ते ही कबीर की आँखों में विदेश वाला रोमांच और एक जवान पुरुष की उत्सुकता चमक उठी। "अरे भाई! यह तो 'मास्क्युराइड सीक्रेट' पार्टी है! इसमें कतराना कैसा? विदेशों में—पेरिस, न्यूयॉर्क और मिलान के रईस सर्कल्स में ऐसी पार्टियां होना बहुत आम बात है। वहाँ के बड़े-बड़े कपल्स और रईस लोग अपने रोज़मर्रा के तनाव से बाहर निकलने और एक अनजाना, थ्रिलिंग अनुभव पाने के लिए ऐसी पार्टियां रखते हैं। कसम से भाई, चलो ना... बहुत मज़ा आएगा!"
स्मिता ने तुरंत एक झिझक भरी, झूठी हंसी हंसने का नाटक किया। "धत्त कबीर... तुम भी क्या कह रहे हो। हम ठहरे इस उम्र के लोग। वहाँ सब नकाब पहनकर अनजान बनकर घूमेंगे, कोई किसी की कमर में हाथ डालकर डांस कर रहा होगा, कोई किसी को छू रहा होगा... हमारी सोसाइटी के हिसाब से यह बहुत अजीब और बोल्ड थीम है।"
"अरे बड़ी माँ, यही तो इस पार्टी का असली मज़ा है!" कबीर ने अपनी वाइन का ग्लास टेबल पर रखा और थोड़ा आगे झुका, जिससे उसकी चौड़ी छाती रेखा के उभरे हुए ३६D स्तनों के ऊपरी हिस्से से हल्की सी छू गई। उसने रेखा का हाथ थाम लिया। "मॉम, आप बताओ... आप खुद इतनी मॉडर्न हो। इस पार्टी का नियम ही यही है कि वहाँ कोई किसी का चेहरा नहीं देख सकता। सब नकाबपोश होंगे। वहाँ कोई मर्यादा या जजमेंट नहीं होता। चलो न कुछ नया ट्राई करते है।"
कबीर के मुंह से 'कोई किसी का चेहरा नहीं देख सकता। सब नकाबपोश होंगे' सुनकर रेखा के बदन का तापमान अचानक बढ़ गया। उनकी ब्लाउज के भीतर उनकी छाती ज़ोर से ऊपर-नीचे होने लगी। उन्हें स्मिता की वो बात याद आई—*"कबीर को तेरी इस परिपक्व काया का स्वाद चखाना होगा।"*
रेखा ने स्मिता की तरफ देखा, स्मिता की आँखों में एक गुप्त, कामुक चमक तैर रही थी। स्मिता ने रेखा के पैर को सोफे के नीचे हल्के से दबाया, मानो कह रही हों कि *शिकार खुद जाल बुन रहा है, हाँ कर दे।*
रेखा ने अपनी ज़ुबान से अपने सूखे होठों को धीरे से चाटा, जिससे कबीर की नज़रें एक पल के लिए उनके गुलाबी होठों पर टिक गईं। रेखा ने कबीर का हाथ थोड़ा भींचते हुए कहा, "कबीर... तुम कह तो सही रहे हो। लेकिन अगर वहाँ अंधेरे में किसी ने... किसी अनजान मर्द ने मुझे डांस के लिए हाथ पकड़ लिया, या कुछ ज्यादा... तो?"
"मॉम, यही तो उस विदेशी थीम का थ्रिल (रोमांच) है!" कबीर ने हंसते हुए बेबाकी से कहा। वाइन का नशा और कमरे में फैली इन दो मैच्योर औरतों के बदन की महक उसके दिमाग पर हावी हो रही थी।
"वहाँ सब नकाब के पीछे छिपे बदन का असली रस ढूंढते हैं। कोई किसी को मजबूर नहीं करता, सब आपसी कशिश और स्पर्श के खेल से आगे बढ़ता है। भाई, आप मना मत करना प्लीज। हम चारों चलेंगे!"
अर्जुन ने अपने होठों को दबाकर अपनी मुस्कान छुपाई। कबीर जिसे अपनी मर्जी और विदेशी शौक समझ रहा था, वह असल में उसके जीवन का सबसे बड़ा और सबसे रसीला मोड़ बनने जा रहा था।
अर्जुन ने अपनी रौबदार आवाज़ में कहा, "ठीक है कबीर, अगर तेरी इतनी ही इच्छा है... तो डन रहा। इस वीकेंड हम चारों सिंघानिया के उस फार्महाउस पर जा रहे हैं। लेकिन याद रखना... कोई किसी के नकाब की जानकारी न ले, सब नकाब के पीछे अनजान होंगे।"
स्मिता ने कबीर के कंधे को एक आखिरी बार भींचते हुए रेखा की तरफ देखा, जिनकी नाभि के नीचे इस आने वाले खेल की कल्पना से ही काम-रस का एक कतरा पिघलकर बह चुका था। कबीर को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि वह खुद अपने हाथों से अपनी माँ के उस भारी, रसीले और नग्न बदन को छूने और उसे अपनी बाहों में भींचने का टिकट बुक कर चुका था। खेल की बिसात कबीर की ही मर्जी से बिछ चुकी थी।
कबीर की काट का इंजन स्टार्ट हुआ और लाल रंग की बैकलाइट्स पार्किंग से बाहर निकलकर शहर की सन्नाटे भरी सड़क पर गायब हो गईं। कबीर अपनी माँ रेखा को लेकर पेंटहाउस के लिए रवाना हो चुका था।
घर का दरवाज़ा बंद होते ही, माहौल की सारी औपचारिकताएं जैसे पल भर में ताश के पत्तों की तरह ढह गईं।
लिविंग रूम में अब सिर्फ दो लोग बचे थे—अर्जुन और स्मिता।
स्मिता ने अपनी आइस-ब्लू पारदर्शी शिफॉन की साड़ी का पल्लू, जिसे उन्होंने कबीर के सामने कुछ हद्द तक संभाल रखा था, एक ही झटके में पूरी तरह कंधे से नीचे गिरा दिया। शिफॉन का वह महीन कपड़ा उनके पेट की नाभि के नीचे सरक गया। उनके ३६D के भारी, थलथलाते हुए उरोज अब सिर्फ एक पतले, नीले रंग के गहरे गले के ब्लाउज़ की कैद में थे। उनकी भारी क्लीवेज की घाटी पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें जगमगा रही थीं, जो उनके भीतर सुलगती वासना की गवाही दे रही थीं।

अर्जुन ने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर स्मिता को पीछे से अपनी कसी हुई, मर्दाना बाहों में दबोच लिया। अर्जुन के दोनों बड़े, गर्म और सांवले हाथ सीधे स्मिता की साड़ी के ऊपर से उनकी छातियों पर पड़े और उसने उन्हें बेदर्दी से भींच दिया।
"अह्ह्ह... अर्जुन!" स्मिता के मुंह से एक तीखी, कामुक सिसकारी निकली। उन्होंने अपना सिर पीछे फेंककर अर्जुन के कड़े, चौड़े सीने पर टिका दिया।
अर्जुन ने अपनी भारी, रसीली आवाज़ में स्मिता के कान की लौ को अपने दांतों से दबाते हुए कहा, "देखा मां? जैसा तुमने कहा था, खेल बिल्कुल वैसा ही बिछ रहा है। कबीर खुद अपनी माँ को उस नकाबपोश रात की आग में झोंकने के लिए बेताब है।"
"उम्मम्म... अर्जुन, ज़रा धीरे..." स्मिता ने आंहें भरते हुए अर्जुन की दाढ़ी वाली गर्दन पर अपने हाथ फेरे। "कबीर को नहीं पता कि वहां उसे जन्नत महसूस होने वाली है।"
अर्जुन ने स्मिता को घुमाकर अपनी तरफ किया। स्मिता की आँखों में वाइन और कामुकता का एक तीखा, गंदा नशा चढ़ चुका था। अर्जुन ने अपने बड़े, भारी हाथ से स्मिता के बैकलेस ब्लाउज़ की डोरी खींच दी। डोरी खुलते ही वह भारी गोरा उरोज ब्लाउज़ की सीमा तोड़कर बाहर छलक आया। उनका भूरा, बड़ा निप्पल रात भर की मार और अभी की तपन से पूरी तरह अकड़ा हुआ था।
"सच बताओ मां..." अर्जुन ने अपने अंगूठे और उंगली की चुटकी में स्मिता के उस अकड़े हुए निप्पल को कसकर मरोड़ते हुए पूछा, "जब कबीर तुझे गले लगा रहा था, उसकी छाती तेरे इस भारी बदन से सट रही थी... तब तेरे मन में क्या चल रहा था?"
"अहह्ह... ओफ़्फ़... अर्जुन! मत पूछ..." स्मिता की सांसें फूलने लगीं, उनकी आँखों की पुतलियां ऊपर चढ़ गईं। "जब उसने मुझे भींचा, तो मेरे भी इस बदन में नीचे तक झनझनाहट हो गई। मुझे तो तभी समझ आ गया था कि जब यह कड़ा मर्दाना लंड रेखा की रसीली चूत के भीतर जाएगा ना... तो रेखा चीख उठेगी!"
अर्जुन ने एक दरिंदगी भरी, कामुक हंसी हंसते हुए स्मिता की साड़ी को कमर से नीच खींच दिया। स्मिता की भारी, चौड़ी चूतड़ों का उभार और उनकी जांघों का मांस पूरी तरह नंगा हो गया। अर्जुन ने अपने भारी हाथ का एक कड़ा थप्पड़ सीधे स्मिता के दाहिने चूतड़ पर दे मारा—**'चटाक!'**
"आहहह! अर्जुन... मारो मुझे!" स्मिता वासना में अंधी होकर सिसक उठीं।
"दोनों बहनों का बदन रसीला है," अर्जुन ने स्मिता की साड़ी के साये के भीतर अपना हाथ डालते हुए उनकी भीगी हुई, गर्म चूत की दरार में अपनी दो उंगलियां एक ही झटके में पूरी भीतर उतार दीं। "कबीर जब उस नकाबपोश अंधेरे में अपनी माँ की इस चूत में उंगलियां डालेगा, और रेखा को लगेगा कि कोई जवान मर्द खुद बेटा कबीर उसे चोदने वाला है... तब देखना असली मजा!"

अर्जुन ने स्मिता को वहीं सोफे पर उल्टा गिरा दिया। शिफॉन की साड़ी, पेटीकोट सब तहस-नहस होकर एक तरफ पड़ा था। अर्जुन ने अपना पजामा नीचे सरकाया और अपने भारी, अकड़े हुए काले लंड को सीधे स्मिता की काम-रस से लबालब भरी चूत के मुहाने पर टिकाकर एक ही धक्के में पूरा भीतर उतार दिया।
सोफे की स्प्रिंगें चरमरा उठीं और पूरे घर में स्मिता की बेबाक, गंदी सिसकारियां और अर्जुन के मर्दाना धक्कों की तीखी आवाज़ें गूंजने लगीं।
दूसरी तरफ, कार पेंटहाउस की पार्किंग में आकर रुकी।
पूरे रास्ते कबीर और रेखा के बीच एक अजीब सी खामोशी छाई रही थी। गाड़ी की एसी की ठंडक के बावजूद रेखा के बदन से एक अजीब सी तपन निकल रही थी। कबीर बीच-बीच में अपनी नीली शर्ट के कॉलर को ढीला करता और साइड ग्लास से रेखा की साड़ी के बैकलेस ब्लाउज़ से झांकती उनकी नंगी पीठ और उनकी गोरी गर्दन को निहारता रहा था।
जब दोनों पेंटहाउस के भीतर पहुँचे, तो पूरे घर में एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।
रेखा ने लिविंग रूम की मद्धम पीली लाइट्स ऑन कीं। साड़ी का सिल्क उनकी भारी जांघों और चूतड़ों से रगड़ खा रहा था।
"कबीर... तू जा, जाकर सो जा। बहुत देर हो गई है," रेखा ने बिना कबीर की तरफ देखे, अपनी कांपती आवाज़ में कहा। वह सीधे अपनी अलमारी या बेडरूम की तरफ भागना चाहती थीं, क्योंकि उनके भीतर की कामुक ज्वाला अब उनके नियंत्रण से बाहर हो रही थी।
लेकिन कबीर ने पीछे से आकर रेखा की कलाई पकड़ ली।
कबीर की सांवली, चौड़ी और गर्म हथेली का दबाव जब रेखा की पतली कलाई पर पड़ा, तो रेखा का पूरा वजूद वहीं जम गया। उन्होंने मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर एक जवान पुरुष का वह अधिकार भाव था, जो किसी भी औरत के सब्र को तोड़ दे।
"मॉम... कुछ सोच रही हो?" कबीर की भारी, रसीली आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया। वह एक कदम और आगे बढ़ा, जिससे उसकी कसी हुई शर्ट रेखा के साड़ी से ढके स्तनों के उभार को हल्की सी छूने लगी।
"आप उस नकाबपोश पार्टी की बात से डरी हुई हैं ना?" कबीर ने एक हल्की सी शरारती मुस्कान के साथ कहा। उसने रेखा की कलाई को छोड़ा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अपनी उंगलियों को सरकाते हुए रेखा की गोरी बांह से होते हुए उनके नंगे, सुडौल कंधे पर ले गया।

"मॉम... आप भूल रही हैं कि उस पार्टी में आप अकेली नहीं होंगी," कबीर ने फुसफुसाते हुए अपना चेहरा रेखा के चेहरे के इतना करीब कर लिया कि उसकी गर्म, शराब से महकती सांसें रेखा के सुर्खी लगे होठों पर टकराने लगीं। "मैं वहाँ रहूँगा। अगर कोई अनजान मर्द आपको छूने की कोशिश करेगा... तो पहले उसे मुझसे गुज़रना होगा।"
"कबीर... ऐसी बात नहीं पर... थोड़ा अजीब लगेगा न" रेखा की आवाज़ गड़गड़ा गई।
"मैं समझता हूं मॉम, चिल, आराम करो और जिंदगी बिना टेंशन जियो। जो होगा देखा जाएगा। हम अकेले तो होंगे नहीं पार्टी में, सब बड़े और अपने लेवल के ही तो होंगे।" कबीर ने बेबाकी सें कहा और अपना दूसरा हाथ रेखा की नंगी कमर पर रख दिया।
"गुड नाइट, मॉम..." कबीर फुसफुसाते हुए एक मदमस्त चाल से अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गया।
रेखा वहीं लिविंग रूम के बीचों-बीच खड़ी रह गईं। उनका पूरा बदन थर-थर कांप रहा था। कबीर के हाथों का वो भारी दबाव अभी भी उनकी नंगी कमर पर छपा हुआ महसूस हो रहा था। उनकी साड़ी के भीतर उनकी पैंटी पूरी तरह से भीगकर चिपक चुकी थी।
रेखा ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी के पल्लू को सीने पर भींचा और अपने कमरे की तरफ बढ़ीं। उस आने वाले वीकेंड की 'मास्क्युराइड प्राइवेट पार्टी' की कल्पना मात्र से ही उनके बदन के हर एक पोर से हवस का रस छलकने लगा था। उन्हें पता था कि नकाब के पीछे उस रात कोई मर्यादा नहीं बचेगी—माँ और बेटे के बीच का आखिरी पर्दा भी उसी फार्महाउस की रोशनी में जलकर राख होने वाला था।
अपने मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा बंद करते ही रेखा ने पीछे मुड़कर लॉक लगा दिया। 'क्लिक' की वह हल्की सी आवाज़ सन्नाटे में गूंजी, और उसी के साथ रेखा की बची-कुची रोक-टोक और सामाजिक मर्यादा की दीवार ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
कमरे का वातानुकूलित सन्नाटा और उसमें तैरती हुई लैवेंडर की ठंडी खुशबू रेखा के भीतर उठती हुई भयंकर आग को शांत करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही थी। कबीर की सांवली उंगलियों की तपन, उसका वह ६ फीट का कसरती बदन, और उसकी शराब से महकती बेबाक बातें रेखा के पूरे वजूद में किसी ज़हर की तरह फैल चुकी थीं।
रेखा मखमली कदमों से चलकर ड्रेसिंग टेबल के बड़े से शीशे के सामने आकर खड़ी हो गईं।
पीली, मद्धम डिम-लाइट में शीशे के भीतर उनका अपना ही रूप एक अद्भुत, सम्मोहक और कामुक दृश्य बना रहा था। सिल्क की साड़ी, जो अब तक उन्हें एक रसूखदार औरत की पहचान दे रही थी, अब उनके बदन पर किसी लोहे की जंजीर की तरह चुभने लगी थी।
उनकी ४९ साल की परिपक्व काया का रोआँ-रोआँ उस एक स्पर्श के बाद से सुलग रहा था।
कांपती, गोरी उंगलियों से रेखा ने अपनी साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे सरकाया। पिन की तीखी चुभन के साथ ही साड़ी फर्श पर एक ढेर बनकर गिर गई।

अब वह सिर्फ अपने बैकलेस ब्लाउज़ और पेटीकोट में खड़ी थीं। रेखा ने शीशे में अपनी नंगी पीठ को देखा, उन्होंने उंगलियों को पीछे ले जाकर ब्लाउज़ की पतली डोरियों को खींचा।
डोरियाँ खुलते ही ब्लाउज़ का कसाव ढीला पड़ा, और रेखा ने उसे अपनी बाहों से उतारकर नीचे फेंक दिया।
३६D के वे भारी, मखमली और थलथलाते हुए गोरे उरोज ब्लाउज की बंदिश से पूरी तरह आज़ाद होकर नीचे लटक गए। रात भर की तपन और कबीर की कसी हुई छाती के दबाव की वजह से उनके बड़े, भूरे निप्पलों पर एक तीखा कड़ापन और सुर्खी साफ दिख रही थी। रेखा के भारी स्तनों की क्लीवेज में पसीने का एक रसीला कतरा जगमगा रहा था।
रेखा ने एक लंबी, कांपती हुई सांस ली। उनकी नाभि का गहरा गड्ढा और कमर का मांसल उभार हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था।
"अहह्ह... गॉड..." रेखा के मुंह से एक दबी हुई सिसकारी निकल गई।
उन्होंने अपने पेटीकोट के नाड़े को एक ही झटके में खोल दिया। रेशमी पेटीकोट और उसके नीचे छिपी भीगी हुई मखमली पैंटी एक साथ सरकते हुए उनकी भारी, गोरी जांघों से होकर पैरों के पास फर्श पर जमा हो गए।
रेखा अब अपने विशाल बेडरूम के शीशे के सामने पूरी तरह नग्न अवस्था में खड़ी थीं। ४९ साल की उम्र का वह भारी, थलथलाता और काम-रस से सराबोर देसी बदन—चौड़े चूतड़, गोरी-मांंसल जांघें, और उनके बीच कामुकता से दमकता हुआ वह रसीला रसातल।
रेखा धीरे-धीरे चलकर अपने किंग-साइज़ बेड पर पहुँचीं और मखमली चादरों पर पीठ के बल ढह गईं। बंद आँखों के अंधेरे में उन्हें सिर्फ और सिर्फ कबीर का चेहरा दिखाई दे रहा था।
कबीर के सांवले, कड़े बाइसेप्स, उसकी शर्ट के भीतर दबे लोहे जैसे कड़े मसल्स, और जब उसने रेखा की कमर को अपने हाथ के पकड़ा था, रेखा के दिमाग में एक तीखा नशा घोल रहा था।
"उफ़्फ़... कबीर..." रेखा ने सिसकते हुए अपने दोनों भारी, गोरे हाथों को अपनी ही ३६D छातियों पर रख दिया।

उनकी अपनी गोरी उंगलियां जब उनके भूरे, अकड़े हुए निप्पलों को कसकर मरोड़ने लगीं, तो रेखा ने अपनी आँखें और कसकर मूंद लीं। उन्हें महसूस हुआ जैसे यह हाथ उनका अपना नहीं, बल्कि उनके २८ साल के जवान बेटे कबीर का है। उन्हें लगा जैसे कबीर का भारी, सांवला बदन उनके ऊपर झुका हुआ है और अपनी भारी मर्दाना छाती से उनके इन थलथलाते स्तनों को कुचल रहा है।
"अहह्ह... दबाओ... कबीर... अपनी मॉम को कसकर भींच लो..." रेखा बेडशीट को अपने गोरे पैरों की उंगलियों से भींचते हुए बड़बड़ाने लगीं।
उनकी एक हथेली धीरे-धीरे छाती से नीचे सरकती हुई, उनकी नाभि के रसीले गड्ढे को पार कर, उनकी भारी जांघों के बीच जा पहुँची।
कबीर के उस एक स्पर्श और उसकी बेबाक बातों के जादू से रेखा की जांघों के बीच की दरार पूरी तरह काम-रस से लबालब भरी हुई थी। काम-रस का एक गरम, गाढ़ा कतरा पिघलकर उनकी जांघों की ढलान पर बह रहा था।
रेखा ने बिना किसी झिझक के अपनी दो उंगलियां अपनी उस भीगी हुई, गर्म और सुलगती हुई चुत के भीतर एक ही झटके में उतार दीं।

"आहह्हह... स्मिता... तू सही कह रही थी..." रेखा का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया। उनकी कमर बेड से एक इंच ऊपर उठ गई। उनकी उंगलियां तेजी से भीतर-बाहर होने लगीं, जिससे कमरे के सन्नाटे में एक तीखी,