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इतना सब कुछ होने के बाद जब अगले दिन मेरी नींद खुली तो मैं काफी तरोताजा सा महसूस कर रहा था. कमरे में कोई नहीं था मैं निकल कर बाहर की ओर गया. फ्रेश होने और मुंह वगैरा धोने के बाद देखा सारी औरतें किचन में काम कर रही थी तभी मेरी नजर संगीता पर भी पड़ी, उन सब की बातें शोर-शराबे से भरी हुई थी मैं धीरे से संगीता के पास जाकर उसे बाहर चलने को बोला.
संगीता: क्या हुआ?
मैं: कुछ बात करना है, चलो यहां से.
मैं उसे घर के पीछे की ओर ले गया.
संगीता: क्या हुआ आप बहुत चिंता में दिखाई पड़ रहे हो?
मैं: मेरे समझ में नहीं आ रहा कि कैसे पूछूं तुमसे...
संगीता: ओहो...भाई इतना क्यों सोच रहे होंगे पूछो ना. क्या बात हो गई?
मैं: कल रात तुम और प्रिया क्या कर रहे थे?
मेरा यह पूछते ही संगीता के चेहरे की हवा उड़ गई. संगीता: (हिचकीचाते हुए) कुछ भी तो नहीं, आप ऐसा क्यों पूछ रहे हो?
मैं: मुझसे झूठ मत बोलो, मैंने देखा था तुम लोगों को किस करते हुए.
वो पूरी तरह से डर गई यह सुनकर और घबराते हुए...
संगीता: भैया मुझे माफ कर दो, किसी से मत कहना प्लीज.
मैं: इसमें बात कहने सुनने की क्या रह गई संगीता, मैं तुम्हें कितना अच्छा समझता था लेकिन तुमने भरोसा तोड़ दिया.
संगीता: भैया मैं जानती हूं मैं नादानी की है अब नहीं होगी गलती ऐसी.
मैं: होगी या नहीं होगी उससे मतलब नहीं है पर तुमने किया ना.
संगीता: मैं माफी मांगती हूं मैं नहीं करूंगी मैं बहक गई थी.
मैं: बहकने की वजह क्या है?
संगीता: मैं सच में नहीं करूंगी, मुझे बस माफ कर दो.
मैं: मैंने तुम्हें इससे पहले भी एक बार फोन में पकड़ा था एक लड़के से बात करते हुए याद है? उस वक्त भी तुमने ऐसी ही माफी मांगी थी.
संगीता: समझ में नहीं आ रहा कैसे बताऊं. भैया मैं आपको नहीं बता सकती मुझे शर्म आती है.
मैं: देखो सच नहीं बोलोगी तो तुम्हारे लिए मुश्किलें बढ़ जाएगी
संगीता: भैया एक दो को छोड़कर मेरी सारे दोस्तों के पास उनके बॉयफ्रेंड हैं. (हल्के आंखों में आंसू भरते हुए) पर मैंने आज तक ऐसा कुछ नहीं किया, लड़की की इच्छा होती है की कोई उससे प्यार करें, उसका साथ दे मैं भी अपने दोस्तों को देखकर यह महसूस करती हूं कि क्या मुझे कोई हक नहीं है ऐसी खुशी पाने का.
मैं: तो क्या लड़कियों के साथ ही सब करोगी. यह बात कितनी गलत है, यह बेशर्मी है. मुझे इस बारे में मम्मी से बात करनी ही होगी.
संगीता: नहीं नहीं... प्लीज मैं आपके हाथ जोड़ती हूं. आपने हर वक्त मेरा साथ दिया है, आज भी दे दो ऐसा मत करो. मैंने कहा ना आप जो बोलोगे मैं वो करूंगी,
आपकी भी तो गर्लफ्रेंड नहीं है. आप बोले तो मैं अपने दोस्त पलक से बात करूं, पसंद है आपको?
उसकी ऐसी बातें सुनकर अब मेरा मन भी बहकने लगा. लेकिन संगीता के सामने तो अंजलि उसकी पैरों के धूल बराबर भी नहीं थी.
मैं: मैं जो बोलूंगा वो करोगी?
संगीता: हां, फिर तो आप मान जाओगे ना?
संगीता को जरा भी अंदाजा नहीं था की मैं क्या मांग करने वाला हूं.
मैं: अच्छा तो मुझे किस करके दिखाओ.
उसे शायद ऐसा लगा कि मैं एक मामूली भाई बहन के रिश्ते की हद में उससे चुम्मा मांग रहा हूं. वो तुरंत मेरे पास आकर मेरे गाल पर चुम्मा दे दी.
मैं: इसे किस कहते हैं? मैंने तो वैसा किस मांगा था जो कल तुम और प्रिया कर रहे थे.
यह सुन वो हक्का-बक्का रह गई.
संगीता: (आंखें बड़ी करके लंबी सांस भरते हुए) धत्…. भैया अपनी बहन से कोई ऐसी बातें करता है.
मैं: तुमने जो सुना है सही सुना है.
संगीता: यह गलत है, मैं आपकी बहन हूं मैं नहीं कर सकती.
मैं: कल भी तो तुम प्रिया की बहन ही थी. अभी तो तुमने वादा किया था मैं जो बोलूंगा वो करोगी.
वो काफी असमंजस में दिखाई दे रही थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करें. एक तरफ उसे डर था कि मैं किसी को रात वाली बात कह ना दूं और दूसरी तरफ मेरी मांग, उसका किया हुआ वादा. आखिरकार वो घबराते हुए नजरे झुका कर,
संगीता: कहीं कोई आना जाए?
मैं: कोई नहीं आएगा सब काम कर रहे हैं.
तभी उसने तुरंत मेरे होठों पर अपने होंठ को रखकर और हटा लिया.
संगीता: बस भैया हो गया, अब नहीं. कोई देख ना ले.
मैंने परवाह न करते हुए उसे कमर से पड़कर अपने करीब लाया और बाहों में भरकर उसके बदन को अपने बदन से जकड़ कर उसकी चूची मेरे सीने में दबाती हुई, मेरा होंठ जबरदस्ती उसकी होठों को रगड़ हुआ उसे चूसने लगा.
इससे वो सन्न रह गई. उसे यकीन नहीं हुआ कि अभी-अभी उसके भाई ने उसे अपनी बाहों में भरकर चुम्मा लिया है कुछ ही सेकंड में वो अपने आप को संभालते हुए थोड़ी मुझसे दूर हुई और उसकी आंखें बता रही थी कि वो शर्म से पानी पानी हो चुकी थी.
मैं: क्या हुआ कैसा लगा?
वो कुछ ना बोलते हुए शर्मा कर वहां से भाग गई.
मेरे चुमने से मुझे यह तो पता चला कि इसमें संगीता का विरोध बहुत कम था लेकिन शर्म और हया के कारण वो थोड़ा कतरा रही थी.
मैं उसके पीछे फिर से किचन में गया जहां सारी औरतें काम कर रही थी और जाकर नॉर्मल तरीके से बर्ताव करने लगा. मैंने देखा वो मुझसे नज़रे चुराती हुई घर का काम कर रही थी और बाकी लोगों से बातें कर रही थी जैसे कि कुछ हुआ ही ना हो. मेरे और उसके बीच एक चुम्मे की वजह से काफी चीज बदल चुकी थी और सच में उसके बदन का एहसास भी कोई कम न था. आखिरकार वो एक जवान और हसीन लड़की थी.
शाम को लगभग 4:00 बजे मामा जी आए और उन्होंने कहा,
मामा: आप सब तैयार हो जाइए, हम कहीं घूमने चलते हैं.
मैं भी इस बात से काफी खुश था कि मेरे हाथ में मम्मी का प्यार तो था ही और अब बहन को पाने की चाहत भी बढ़ गई थी. लेकिन साथ ही साथ एक धर्म संकट भी था, मम्मी को संगीता के बारे नहीं पता चलना चाहिए और ना तो संगीता को मम्मी के बारे में.
हम सभी तैयार हो गए, सब ने बहुत सुंदर-सुंदर कपड़े पहने थे मम्मी ने भी सुनहरी और लाल रंग की साड़ी पहनी थी और संगीता बैंगनी रंग का लिबास और प्रिया भी काफी जच रही थी और मामी को कैसे भूल सकते हैं उनका स्लिम ट्रिम फिगर भी कुछ कम नहीं था.
मैंने कार में संगीता के साथ सबसे पीछे बैठने का फैसला किया.
मम्मी: तू आगे बैठ जा ना, पीछे दिक्कत होगी.
मैं: नहीं पीछे काफी जगह है कोई दिक्कत वाली बात नहीं है.
संगीता अब भी नजरे झुकाए हुए चुपचाप गाड़ी में बैठ गई. कार चलना शुरू हुआ और इधर मेरे दिमाग में खुराफात. सब अपनी बातों में लगे हुए थे की तभी स्पीड ब्रेकर आया और ब्रेक लगते ही मैं संतुलन करने के बहाने संगीता के घुटनों पर हाथ रख दिया और कपड़े के ऊपर से ही अपने हाथ को सहलाता हुआ उसकी मुलायम जांघों तक ले गया. इससे वो मेरे हाथ को हटाने लगी कि कहीं कोई देख ना ले. तभी,
मामी: क्या हुआ राहुल, संगीता तुम दोनों इतना चुप क्यों क्यों हो?
मम्मी: हां क्या बात हो गई?
मैंने तुरंत संगीता के जांघों से हाथ को हटाया.
संगीता: नहीं कहां कुछ, ऐसे ही बस नींद आ रही थी.
मैं: हां मुझे तो और भी ज्यादा नींद आ रही है.
मम्मी को भी लगा कि कल शायद रात के इतनी देर जागने की वजह से मुझे नींद आ रही होगी.
मम्मी: अच्छा ठीक है थोड़ी देर आराम कर लो.
प्रिया: संगीता तुम तो टाइम पर सो गई थी तुम्हें क्यों नींद आ रहा है?
संगीता से रहा नहीं गया वो बोल पड़ी पर फिर बात को बदल दिया.
संगीता: अच्छा तुमने सोने दिया था मुझे टाइम पर?
प्रिया: क्या बोल रही हो मैं क्या किया, मैं भला क्यों नहीं सोने दूंगी?
मम्मी: क्यों तुम दोनों रात भर मस्ती कर रहे थे क्या?
संगीता: हां जब मैं सोने जा रही थी तब मुझे बात करके जगा देती थी.
मामी: प्रिया मत परेशान किया करो ऐसे.
यह सुन प्रिया हंसने लगी क्योंकि उसे भी पता था संगीता क्यों नहीं सोई थी. माहौल शांत हो गया सब अपनी बातों में फिर से लग गेए लेकिन यहां मैं कुछ नहीं कर सकता था इसीलिए मैंने संगीता के जांघों को सहलाता रहा.
बीच-बीच में कभी वो मेरे हाथ को जोर से पकड़ लेती कि मैं कोई और हरकत ना करूं तो कभी-कभी हाथों को ढीला छोड़ देती लेकिन इस दौरान उसने अपनी नज़रें शर्मिंदगी से खिड़की के तरफ घुमाए रखा जैसे कि वो पूरी तरह से इसमें शामिल होना नहीं चाहती.
यहां एक बात समझना जरूरी है की मम्मी और संगीता में काफी फर्क था. जैसे मम्मी शुरुआत से इस रिश्ते के बिलकुल खिलाफ थी लेकिन संगीता यहां पर भ्रमित थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह क्या करें एक तरफ मम्मी की तरह उसे भी भाई बहन के रिश्ते बचाने का डर तो था. लेकिन दूसरी तरफ उसकी कमसिन जवानी का जोश उसे आगे की तरफ भी धकेल रहा था.
कुछ देर बाद हम एक बड़े मंदिर में पहुंचे जहां की खूबसूरती देखते ही बनती थी हर तरफ रंगीन रोशनी जगमगा रही थी ढोल नगाड़ों की गूंज के साथ.
मम्मी के साथ न रहकर मैं संगीता के करीब रह रहा था लेकिन इससे मम्मी को फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वो तो यही चाहती थी की मैं हर जगह उससे ना चिपक के रहूं नहीं तो लोगों को शक होता है. लेकिन उसे क्या पता मेरा निशाना तो अब संगीता के तरफ था. वैसे तो मम्मी के मम्मी का शरीर बहुत लुभावना था और उसकी रसीली चूत का तो क्या कहना. लेकिन यहां पर संगीता के गर्म जवान और टाइट गरम चूत को ठुकराया नहीं जा सकता.
अगर संगीता की चूत मुझे मिल जाती है तो यह मेरे रिश्ते में तीसरी घर की चूत होगी. पहले तो अपर्णा भाभी उसके बाद मम्मी और अब संगीता, यह सोचकर मेरी प्यास और बढ़ने लगी कि घर की तीन औरतों पर तो मेरा कब्जा हो ही जाएगा और वो भी अलग-अलग उम्र की.
मेरे इन सोच विचारों के बीच संगीता ने मुझे टोका.
संगीता: बहुत प्यास लग रहा है चलो ना कहीं चलते हैं पानी पीने के लिए.
मैं: हां ठीक है चलो.
हम दोनों पास ही मे जहां पानी पीने की सुविधा थी वहां पर गए.
मैं: तो क्या सोचा तुमने?
संगीता: किस बारे में?
मैं: अच्छा तो अब यह बताना पड़ेगा?
संगीता: भैया देखो मैं एक बात जानती हूं हम दोनों भाई बहन हैं और इस नाते उस तरह से प्यार तो नहीं कर सकते ना, मुझे डर लग रहा है.
मैं: लेकिन तुम्हारे ख्वाहिशों का क्या?
संगीता: मैं अपने आप को मना लूंगी और आप ही बताओ मैं क्या करूं?
मैं संगीता के साथ जोर जबरदस्ती किए बिना बस उसे अपनी बातों से ही मना लेना चाहता था क्योंकि वो इनकार भी नहीं कर रही थी पूरी तरह से
मैं: मैं तुम्हें परेशान नहीं देख सकता, देखो जब तुम्हें जरूरत लगे मुझसे बात करने की तुम मुझे खुलकर कह सकती हो आखिरकार तुम मेरी प्यारी बहन हो. मैं तुम्हारा हमेशा साथ दूंगा.
संगीता: सच में!
यह सुनकर उसके चेहरे पर बेहद सुकून और खुशी नजर आ रही थी. फिर हम मंदिर घूमने के बाद बाहर रेस्टोरेंट में खाना खाने भी गए.
इन्हीं सब चक्करों में घर लौटने में रात के 12:00 बज चुके थे. सब अपने-अपने कमरे को चले गए और इधर मेरे और मम्मी का कामुक खेल फिर से एक बार शुरू होने वाला था. अंदर आते ही मैंने मम्मी को अपने बाहों में भर लिया और चूमने लगा.
मम्मी: आज लेकिन कुछ नहीं हो सकता.
मैं: क्यों अब क्या प्रॉब्लम है?
मम्मी: आज मेरा पीरियड है और अब अगले चार-पांच दिन कुछ भी नहीं, तो कंट्रोल रख अपने आप पर.
मैं: हां तो क्या हुआ चुम्मा तो ले ही सकते हैं.
मम्मी: (हंसते हुए) हां वो तो हो सकता है.
फिर क्या था मैं भी उसे अपने बाहों में भरकर चूमने लगा और उससे लिपटकर ही उस रात सो कर गुजारा किया.
सुबह का समय, गाँव का शांत वातावरण, आँगन में तुलसी का चौरा, रस्सी पर सूखते कपड़े, रसोई से आती पराठों की खुशबू और घर में लोगों की चहल-पहल.
मैं धीरे से संगीता के पास गया,
मैं (धीरे से): इतने लोगों के बीच तुमसे दो मिनट अकेले बात करना भी किसी मिशन से कम नहीं है।
संगीता (हल्की मुस्कान दबाते हुए): क्या जरूरत है बात करने की, यहाँ तो सब साथ रहते हैं. आपको तो पता है यहां 2 मिनट भी अगर हट जाओ तो सब पूछने लगते हैं—'संगीता कहाँ गई?
उसी समय प्रिया पीछे से आ जाती है।
प्रिया (मुस्कुराते हुए): अरे भैया, क्या सीक्रेट मीटिंग चल रही है?
मैं: न... नहीं... बस गाँव के बारे में बातें चल रही थी.
प्रिया: गाँव बाद में देख लीजिएगा, पहले आइए... मामा बुला रहे हैं.
संगीता हँसी रोकने की कोशिश करती है और मुझे देखकर आँखों ही आँखों में "मैंने कहा था" का इशारा करती है.
दोपहर का समय, सब लोग खाना खा रहे थे और मेरी नज़र बार-बार संगीता पर जा रही थी. संगीता जानबूझकर नज़रें झुका लेती. सच में मैं अपनी बहन के लिए कभी इतना बेकरार नहीं हुआ था. खाना खत्म होने के बाद मैं मौका देखकर उसके पास गया.
मैं: सुनो... शाम को खेतों की तरफ चलते हैं.
संगीता: अकेले?
मैं: हाँ... बस थोड़ी देर.
संगीता (फौरन): बिल्कुल नहीं.
मैं: क्यों?
संगीता: क्योंकि अगर किसी ने देख लिया तो पूरे गाँव में खबर पहुँच जाएगी।"
मैं: हम तो वैसे भी भाई बहन हैं, किसी को क्या पता चलेगा?
संगीता: हाँ, लेकिन आप यह कैसे भूल सकते हो की यहाँ लोग रिश्ते से ज़्यादा मर्यादा देखते हैं.
मैं: मैं बस तुम्हारे साथ थोड़ा समय बिताना चाहता हूँ.
संगीता (धीरे से): मुझे भी अच्छा लगता अगर हम आराम से बातें कर पाते...
शाम को मामी आवाज़ लगाती हैं,
मामी: संगीता बेटा, मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर आना और दिया भी जला देना.
संगीता तैयार होने लगती है. मैं भी बोल पड़ा
मैं: मैं भी साथ में जाऊंगा.
मम्मी और मामी दोनों एक ही सूर में.
मामी: हाँ चले जाओ, वैसे भी कभी-कभी तो गांव आते हो, घूम भी लोगे.
प्रिया भी उठने लगती है.
प्रिया: मैं भी चलती हूँ।
मैं (मन में): हे भगवान... ये तो हर जगह साथ रहती है!
तभी मामा आवाज़ देते हैं—
मामा: प्रिया, इधर आना... ज़रा चाय बना दो.
प्रिया रुक जाती है और मैं इस बात से बहुत खुश हो गया कि चलो आखिर मौका तो मिल गया.
क्योंकि मंदिर बहुत ज्यादा दूर नहीं था इसलिए हमने पैदल जाने का फैसला किया. गाँव के मंदिर की ओर जाने वाला रास्ता काफी शांत था. चारों तरफ हरियाली, ठंडी हवा और डूबता सूरज. कुछ देर हम दोनों बिना बोले चलते हैं. फिर,
मैं: देखो... आखिर दो मिनट तो मिल ही गए।
संगीता मुस्कुरा देती है.
संगीता: बस दो मिनट... उससे ज़्यादा नहीं.
मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और संगीता के कंधे पर रख दिया. संगीता इधर-उधर देखा तो रास्ता खाली था.
वो हल्की झिझक के साथ मेरा हाथ कंधे से हटाकर अपने हाथ में थाम लेती है.
संगीता: मुझे तो यकीन नहीं होता है कि आप मेरे वही भाई हो.
मैं: अच्छा और यही सवाल मैं तुमसे करूं तो?
संगीता यह सुनकर शर्मा गई और फिर से नीचे की ओर देखने लगी और कोई गाना दबे मुंह के साथ गुनगुनाने लगी यह देखने में काफी रोमांटिक था. क्योंकि संगीता मुझसे बस एक साल ही छोटी थी इसीलिए समझदारी में वो कुछ कम भी नहीं थी.
मंदिर की बजती घंटियां और फिर संगीता का वहां दिया जलाना, वहां दर्शन करने के बाद हम फिर वापस रास्ते को लौट गए. अंधेरा हो चुका था संगीता खुद मेरा हाथ पकड़ कर चल रही थी और मैं अपने फोन में फ्लैशलाइट चालू किया था की कुछ दूर चलते ही हम दोनों को पता नहीं क्या हुआ कि अचानक से उस घने अंधेरे में एक दूसरे को पकड़ चूमने लगे जितनी मेरी पकड़ मजबूत थी उतनी ही उसकी भी.
हम दोनों एक दूसरे के होठों को चूसे जा रहे थे. चूसने के साथ ही साथ एक दूसरे के पीठ को भी सलाह रहे थे. इस दौरान मैं उसके ब्रा के स्ट्रैप को भी महसूस कर रहा था. मैं तो पहले यह सब कर चुका था लेकिन संगीता के लिए यह बहुत नया था, वो इस चुंबन को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी और खड़े ही खड़े अपना एक पैर उठाकर मेरे पैरों में लपेटने लगी जैसे कि वो मेरे गोद में आना चाहती हो. तभी मैं अपने दूसरे हाथ से उसके गांड को सहलाने लगा. इससे मेरा तो लंड खड़ा हो गया और उसकी चूत वाले हिस्से से टकराने लगा.
फिर उसे पीछे घूमा कर उसके कंधे को चूमते हुए उसकी चोली को नीचे सरकाने लगा. उसके ब्रा के काले रंग की पट्टी नजर आई, क्या कयामत लग रही थी वो उसके गोरे बदन पर काली पट्टी. मैंने उसे ज़ोर से अपनी और पकड़ कर उसकी ब्रा को चूमना शुरू कर दिया.
शायद उसने मेरे लंड को भी महसूस कर लिया और वो थोड़ी चौकन्ना हो गई, अपने आप को छुड़ाते हुए काबू किया.
फिर वही झुकी नजर के साथ,
संगीता: घर चलते हैं काफी देर हो गई है.
घर पहुंचे तो फिर प्रिया मिल गई सबसे पहले.
प्रिया: इतनी देर क्यों लग गई?
मैं: अरे रास्ता देखा है तुमने ऊपर से कोई लाइट नहीं पूरा अंधेरा वक्त तो लगेगा ना...
घर में सब लोग चारपाई पर बैठे बातें कर रहे थे. मामा पुराने किस्से सुना रहे थे और मामी सबको गरम-गरम पकौड़े परोस रही थी. मैं मम्मी से नजरे बचाता हुआ संगीता को बीच-बीच में देख रहा था. संगीता भी एक पल के लिए मेरी तरफ देखती और फिर नज़रें फेर लेती.
रात को तो कुछ कर नहीं सकते क्योंकि मम्मी का पीरियड जो चल रहा था इसीलिए बस चुम्मे से ही संतुष्टि करनी होगी.
मम्मी: आज तुझे देखकर बहुत खुशी हुई। अब तू पहले से ज़्यादा समझदार हो गया है.
मैं: ये सब आपकी सीख का ही असर है, अगर आपने मुश्किल समय में मेरा साथ नहीं दिया होता तो मेरा क्या होता...
उस पल में न कोई शिकायत थी, न कोई दूरी—सिर्फ़ अपनापन.
सुबह मैं काफी गहरी नींद में और काफी देर तक सोया हुआ था इसलिए शायद किसी ने संगीता को मुझे उठाने के लिए भेजा था.
संगीता: भइया उठो सुबह हो गई कितना सोओगे...
मैं नहीं उठा तो उसने मेरे कंधे को हल्का हिलाया तभी मेरी नींद अचानक खुली और उसे कमरे में अकेला देखकर मन बहकने लगा
लेकिन उसने जगाने के लिए गुदगुदी शुरू कर दी मैं भी उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचा तो वो मेरे ऊपर गिर गई तभी मैंने उसके गले को चूमना शुरू कर दिया.
संगीता: क्या कर रहे हो, कोई आ जाएगा.
मैं तब भी नहीं रुका फिर उसे नीचे की तरफ सुला कर मैं उसके ऊपर आ गया और फिर उसके सीने को चूमने लगा और एक हाथ से उसके स्तनों को भी दबाने लगा. यह देख उसने अपनी आंखें बड़ी कर ली और पैंट में ही सही लेकिन मेरा लंड उसकी चूत से रगड़ खाने लगा. जिससे उसकी बेकरारी बढ़ गई.
मम्मी: संगीता कहां गई, उठाने गई थी खुद भी सो गई क्या?
संगीता: हटो-हटो, चलो ना जल्दी बाहर...
मैं तो उसे हल्के में ले रहा था, सच में संगीता के जवान बदन की गर्मी और उसकी खुशबू का जवाब नहीं. संगीता भले ही इतनी आगे बढ़ गई थी लेकिन वो अभी भी चूदाइ जैसी चीजों से वाकिफ नहीं थी यह उसके हावभाव से पता चल रहा था. उसे ऐसा लग रहा था शायद चुम्मा लेना और एक दूसरे की इतना करीब रहना ही सब कुछ है. और वैसे भी यह चीज पता भी हो तो उसके लिए यह काफी मुश्किल था मुझसे खुलकर बातें करने का क्योंकि आज से पहले यह सब उसके साथ कभी नहीं हुआ.
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए, जब मुझे मौका मिलता तब मैं उसे चूम लेता और मम्मी के साथ तो लिपटकर सोने की आजादी थी ही. जिस दिन मम्मी का पीरियड खत्म हुआ, उस रात मैंने भी जोरो से अपनी पूरी कामुक अंदाज में मम्मी के साथ संभोग किया उसके बदन को चूमना उसकी चूचियां दबाना और उसकी चूत को तब तक चोदना जब तक पानी न निकल जाए.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह…
तभी मैंने उसे बेड से उठाकर दीवारों से टिका दिया और फिर पीछे से उसकी चूत में लंड घुसा कर चोदने लगा. उसके कमर पर बंधा हुआ पेटिकोट बार-बार अड़चन पैदा कर रहा था. तभी मैंने उसका पेटिकोट उठाते हुए अपने दांत में दबाया और कमर पकड़ कर जोरदार झटका मारने लगा.
इससे पैदा हुई जोरदार थपकियों से उसकी गांड लाल हो गई. लेकिन वो भी परिपक्व औरत थी, उसने हार नहीं माना. मेरी मदद करने के लिए मम्मी ने तुरंत अपना पेटिकोट खोल और अपनी गांड को मेरी तरफ उठा दिया.
जिससे थपकियों की आवाज उसकी चूड़ी की खनखनाहट से मिलकर एक मधुर संगीत पैदा कर रही थी. मेरा लंड भी पूरी गहराई में डुबकी लगा रहा था, उसकी गीले सुरंग ने भी अपना मुंह खोल रखा था लंड को लपकने के लिए.
काफी जोरदार धक्कों के बाद जैसे ही उसका चूत पानी छोड़ने वाला था उसने अपने टांगों को चौड़ा करते हुए अपना गांड आगे की ओर खींच लिया और फर्श पर ही उसकी चूत से बूंदे टपकती रही और इधर मेरे लंड का पानी उसके गांड को भिगो रहा था. उसने अपना पेटिकोट समेटते हुए गांड को तोलिए से पोछा और फिर हम दोनों एक दूसरे की आगोश में सो गए.
हमारे बीच चूदाइ का खेल खेलना बहुत आम हो गया था. अगली रात भी मैंने मम्मी को चोदने में कोई कसर नहीं छोड़ा. मम्मी अपनी जांघों को मेरे कमर में जकड़ी हुई थी और आधा बिस्तर पर सोई हुई थी मैं खड़ा-खड़ा उसे चोदता रहा है. वो भी आहे भरती रही, मैंने देखा मम्मी कामुक आग में पूरी तरह से दहक चुकी थी. वो अपने दोनों चूचियों को खुद ही दबा रही थी और मसल रही थी और अपने होठों को दांतों तले दबा रही थी. मैं भी उसके इस नशीले तेवर को देखकर उसकी दोनों जांघों को पकड़ कर धक्का मारता रहा. जांघों से टकराती हुई थपकियों की आवाज वैसे ही शोर मचा रही थी. हम दोनों पूरी तरह से नंगे थे, सारे कपड़े इधर-उधर बिखरे हुए थे.
लगभग एक घंटे चोदने के बाद मेरा वीर्य छूट ही गया इस बार पूरा पानी उसकी चूत के ऊपर गिरा दिया जिससे उसकी चूत और रसीली दिखने लगी मेरे नमकीन पानी से.
मम्मी: ओहो क्या करता है, पूरा गीला कर दिया...
मैं: आप ही बताओ कहां गिरा दूं? अच्छा सुनो मैं पेशाब करके आता हूं.
मम्मी: हां हां ठीक है जा.
मैं घर से बाहर की तरफ निकल गया पीछे की ओर जहां एक छोटा सा टॉयलेट बना हुआ था. मैं जैसे ही करीब पहुंचा तो अंदर से आवाज आ रही थी, ऐसा लग रहा था कोई पहले से ही टॉयलेट में है. मैं भी रुक गया यह सुनकर कुछ देर बाद जब दरवाजा खुला तो मैं भी हैरानी भरी नजरों से देखता रह गया. वो और कोई नहीं बल्कि संगीता थी और वो भी उतनी ही हैरान थी. इतनी रात में हम दोनों का इस तरह संयोग से मिलना कुछ और ही इशारा कर रहा था.
संगीता शर्माती हुई नजर झुकाने लगी. मैं भी उसका हाथ पकड़ कर उसे अपने करीब लाया, वो हल्की सी मुस्कुराई.
संगीता: (धीरे से मेरे कान में) जाने दो ना कोई आ जाएगा, रात का वक्त है.
मैं: रात है तभी तो कोई नहीं आएगा.
बिना कुछ सोचे समझे उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया. उसका मुलायम कमसिन बदन मेरी आग को फिर से हवा देने लगा, हालांकि मैं अभी-अभी मम्मी को चोदा था फिर भी मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया. ऐसी ठंडी रात में उसे भी इस तरह का एहसास कभी नहीं हुआ था. मैंने अपने आपको दीवार से टीकाते हुए उसे पीछे की तरफ घुमा दिया और मेरा लंड उसकी गांड से रगड़ खा रहा था साथ ही उसके दोनों स्तनों को दबाते हुए उसके गले को चूम रहा था. मेरे लंड को पीछे से महसूस करते हुए उसके शरीर में अजीब सी सनसनाहट होने लगी एसा लगने लगा जैसे शरीर में कुछ चल रहा है, उसकी सिसकियां निकल गई.
संगीता: आह्ह अहह...छोड़ो कोई आ जाएगा.
मैं जितना उसकी चूचियों को दबा रहा था, उतने बार संगीता कसमसा रही थी. उसने मुड़कर मेरी तरफ नजर फेरी तो मैंने देखा उस हल्के रोशनी में उसकी आंखें एकदम नशीली मालूम पड़ती थी. मैं देर ना करते हुए एक बार फिर उसके होठों को चूसने लगा और गहरा, जीभ से जीभ मिलाकर उसकी साँस मेरी साँस में घुलती रही और उसके मुँह का स्वाद हल्का नमकीन लगता.
मैं: मेरी प्यारी गुड़िया, इसी की जरूरत थी ना तुम्हें?
संगीता: जरूरत तो थी पर भैया ये गलत है. मेरे समझ में नहीं आ रहा है मैं क्या करूं? हम भाई-बहन हैं, अगर मम्मी-पापा को पता चला तो?
मैं: तुम बस मुझ पर भरोसा रखो और मेरा साथ दो, बहुत मजा आएगा, घर की बात घर में रहेगी.
संगीता: ठीक है, भैया, पर किसी को पता नहीं चलना चाहिए.
मैं: फिक्र छोड़ दो, मेरा वादा है.
इसके बाद मैं हिम्मत करके अपना हाथ उसकी टॉप के अंदर घुसा कर पजामे के नाडे को खोलने के लिए बढ़ा रहा था कि तभी,
संगीता: नहीं-नहीं, यह सब नहीं...
मैं: क्या हुआ? अभी तो तुम मान गई थी.
संगीता: नहीं भैया मुझे बहुत डर लग रहा है, और इन सब चीजों के लिए तो तैयार नहीं हूं.
मैं: अच्छा ठीक है, शांत हो जाओ मेरी गुड़िया.
मेरे इस हरकत से वो काफी डरी हुई लग रही थी मैं उसे इस तरह डराना नहीं चाहता था. आखिर संगीता एक मासूम लड़की थी उसने कभी यह सब नहीं सोचा था मेरे साथ करने के लिए इसीलिए वो शायद सहमी हुई थी. मैंने उसे शांत कराया और कुछ देर बाद उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान नजर आई और आंखों से इशारे करते हुए जाने की इजाजत मांग रही थी. मैं भी उसकी होठों को चूमते हुए उसे जाने के लिए कहा.
जब मैं वापस लौटा तो मेरा लंड अभी भी बेकरार था. मम्मी ने कपड़े पहने ही थे कि मैं वापस जाकर उसे चूमता हुआ कपड़े उतारने लगा.
मम्मी: अरे क्या हो गया है? अब क्या है?
उसे क्या बताता की संगीता की जवानी ने मुझे और घायल कर दिया है.
वो कुछ और आगे बोले इससे पहले मैंने उसके होठों पर होठ रख दिया और अपने घुटनों से उसके दोनों जांघों को चौड़ा किया. अपना लंड चूत में फिर से घुसेड़ा, इस बार जोर-जोर से धक्के देना शुरू कर दिया. क्योंकि सामने मम्मी थी और दिमाग में संगीता का ख्याल. मैं तो यह सोच रहा था कि इसकी रसीली चूत चोदने में इतना मजा आता है तो संगीता की टाइट चूत का मजा क्या होगा.
मैंने और जोरदार धक्के मारे,
मम्मी: आआआह…आज क्या जान लेगा अपनी माँ की...ओह्ह्ह…
मैं चोदता रहा और उसकी चूचियां उछलती रही हवा में. ऐसी ठंड मौसम में भी हम दोनों एक बार फिर से पसीने से लटपट हो चुके थे. यह सिलसिला आधे घंटे तक चला और आखिर में मैंने लगातार आठ-दस झटके मारे और हम दोनों एक साथ आनंद के शिखर तक पहुँच गए,
मम्मी भी काफी थक चुकी थी लेकिन आज रात उसने मेरा भरपूर साथ दिया और मैं भी थकाहारा उसके ऊपर ही सो गया.
सुबह गाँव में सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था कि मामा ने आँगन में आकर जोर से आवाज लगाई—
मामा: अरे दीदी! सब लोग जल्दी बाहर आओ. आज एक जरूरी फैसला करना है!
मम्मी: सुबह-सुबह ऐसी कौन-सी पंचायत बुला ली?
मामा: आज पंचायत नहीं, पिकनिक की योजना है. आज पूरा परिवार हमारे पुराने बगीचे में जाएगा। सुबह से शाम तक!
संगीता: सच में मामा? तालाब वाले बगीचे में?
मामा: हाँ! वही बगीचा. दीदी आप और अंजलि, लकड़ियाँ और चूल्हे की तैयारी करना, संगीता और प्रिया फल, पानी और चादरें संभालेंगी और सबसे खास—आज मिट्टी के बर्तन में चिकन बनेगा!
मामा के चेहरे की चमक देखकर मैं हँस पड़ा.
राहुल: मामा, बगीचे की सैर के लिए जा रहे हैं या चिकन खाने?
मामा: दोनों! परिवार के साथ घूमना भी जरूरी है और अच्छा खाना भी.
कुछ ही देर में पूरा परिवार तैयारी में लग गया. सुबह होते-होते हम सभी गाँव के कच्चे रास्ते पर निकल पड़े. रास्ते के दोनों ओर हरे-भरे खेत थे, हवा में मिट्टी की खुशबू थी. पक्षियों की आवाजें और दूर से आती बैलों की घंटियाँ पूरे रास्ते को सुंदर बना रही थीं. करीब एक घंटे बाद बगीचा दिखाई दिया.
जैसे ही हम सभी अंदर पहुँचे, कुछ पल के लिए रुक गए. चारों तरफ घनी हरियाली थी, ऊँचे आम के पेड़, जामुन की शाखाएँ, अमरूद के पेड़, बेर की झाड़ियाँ, नींबू, आंवला और कटहल—पूरा बगीचा किसी छोटे जंगल जैसा लग रहा था. थोड़ा आगे बढ़ते ही छोटा-सा तालाब दिखाई दिया, उसके ऊपर लकड़ी का पुल बना था. संगीता और प्रिया पुल पर जाकर नीचे पानी में तैरती छोटी मछलियाँ देखने लगीं.
मम्मी: ध्यान से, ज्यादा किनारे मत जाना.
उधर मम्मी और मामी ने पेड़ की छाया में चूल्हा तैयार किया. तभी संगीता और प्रिया दौड़कर मेरे पास आए और पेड़ पर चढ़ के जामुन तोड़ने की जिद करने लगी.
संगीता: पेड़ पर चढ़कर जामुन तोड़ते हैं ना.
मैं: हां चलो.
प्रिया: नहीं हम ऊपर चलेंगे आप नीचे से हमारी मदद करो.
मैं: पागल, ऊपर चढ़ने में गिर जाओगे.
संगीता: तभी तो आपको कह रहे हैं मदद के लिए.
पहले संगीता ऊपर चढ़ने की कोशिश की उसने पेड़ को पकड़े रखा और नीचे से मैंने उसकी मुलायम गांड को दबाते हुए ऊपर की और धक्का दिया, क्या मुलायम मक्खन जैसी गांड थी उसकी. सच में उसकी गोल मटोल गांड दबा कर मेरा लंड और तड़पने लगा. जैसे तैसे संगीता पेड़ की टहनियों पर पहुंच गई और अब बारी थी प्रिया की. उसने भी अपना एक पैर ऊपर उठाया और अपने गांड को मेरे भरोसे ढीला छोड़ दिया. दो दो जवान बहनों की गांड अगर एक साथ दबाने को मिल जाए तो इससे अच्छा और क्या होगा! मेरा तो लंड पूरा पत्थर की तरह मजबूत हो चुका था. प्रिया की गांड अपनी दोनों हाथों में दबोच ऊपर की तरफ धकेल ही रहा था कि उसका शायद संतुलन बिगड़ गया है और वो मेरे ऊपर ही गिर पड़ी.
नीचे गिरते ही मेरा लंड उसकी गांड से टकरा गया जो पूरी तरह से खड़ा था. प्रिया ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि वो अब तक मेरे ख्यालों से अनजान थी. लेकिन मुझे तो मानो जन्नत मिल गया था कुछ सेकेंड के लिए जब उसके स्पंजी गांड के बीच मेरा लंड फस गया. लेकिन संगीता मेरे ख्यालों से अनजान नहीं थी यह नजारा देख उसकी हंसी छूट गई.
कुछ देर बाद संगीता ने सलाह दिया
संगीता: क्यों ना हम लुका छुपी खेलें...
मैं भी उनके साथ खेल में शामिल हो गया. इसमें अब बारी था मेरे और प्रिया के छुपने का, संगीता हमें ढूंढने वाली थी मैं भी उसे घने बगीचे के बीच झाड़ियों के पीछे छुप गया. खेल शुरू हुआ और कुछ मिनट में ही प्रिया पकड़ी गई. पकड़े जाने के बाद प्रिय परिवार वालों के पास चली गई उनकी मदद करने के लिए लेकिन संगीता अभी भी नहीं ढूंढ़ पा रही थी मुझे.
संगीता का ढूंढना अभी भी जारी था. वो भटकते भटकते मेरे थोड़े करीब तो आई पर फिर वापस लौटने लगी मुझे बिना देखे. तभी उन झाड़ियों के बीच से मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा.
संगीता: ओहो, भैया गिर जाऊंगी...
और हुआ भी ऐसा ही उसका पैर थोड़ा फिसल गया और वो मेरे ऊपर आ गिरी जिससे एक रोमांटिक नजारा बन गया.
मैंने उसके होठों पर उंगली रखकर उसे चुप रहने को कहा. वो भी मेरे करीब आकर काफी शांत हो गई. वो एक पल के लिए उलझन में दिखी, लेकिन जब उसने मेरे चेहरे पर वासना की मुस्कान देखी, तो वासना उस पर हावी हो गई. इस समय मेरा लंड पूरी तरह से सख्त हो चुका था. मैंने उसे बार-बार चूमा कभी उसके होठों को तो कभी नाक को तो कभी उसके कान को , एक हाथ उसकी गांड की कसी हुई मांसपेशियों पर और दूसरा उसकी पीठ पर.
संगीता की सांसें तेज़ हो गई थीं, एकदम गर्म, भारी और उत्तेजित अवस्था को बयान कर रही थीं. संगीता ने शरारत करते हुए अपने पजामे की जेब से एक जामुन निकाला और आधा अपने मुंह में दबाकर आधा मुझे चूसने को इशारा कर रही थी. मैं भी उसका कहा मान कर जामुन सहित उसके होठों को भी चूसने लगा. शुरुआत नरम थी, जैसे फूल को छूना. संगीता सिहर उठी और चुंबन गहरा होता गया.
हम तो भूल ही गए थे कि हमारा परिवार भी साथ है संगीता भी मुस्कुराते हुए मेरे ऊपर से उठी और मुझे जल्दी चलने को कहने लगी. हम दोनों भाग कर सब लोगों के पास गए तो.
मामी: कहां थे तुम दोनों इतनी देर से?
प्रिया: हम लुका छुपी खेल रहे थे, संगीता ने मुझे तो ढूंढ लिया पर भैया ना जाने कहां छुप गए थे.
संगीता ने बहाना करते हुए बोला,
संगीता: हां पता नहीं मैं तो आखिर तक नहीं ढूंढ पाई. मामा: अच्छा छोड़ो यह सब, आज गांव के तौर तरीके से पकाए हुए इस भोजन का आनंद लो.
सभी एक बड़े पेड़ की छाया में साथ बैठ गए. चावल, सलाद, चटनी और मिट्टी के बर्तन में बना गरम चिकन—साधारण भोजन था, लेकिन परिवार के साथ होने के कारण उसे सबने बेहद खास महसूस किया.
खाने के बाद कुछ देर सभी पेड़ के नीचे आराम करते रहे.
मामा ने शांत आवाज में कहा—
मामा: देखा, घर से बाहर निकलना कितना जरूरी है. आज सबने साथ समय बिताया। यही असली खुशी है.
गाँव पहुँचते-पहुँचते रात हो चुकी थी. घर के आँगन में सामान रखते हुए संगीता ने थकी हुई आवाज में कहा—
संगीता: आज बहुत थक गई... लेकिन मजा बहुत आया.
मैं: हां सबसे ज्यादा मेहनत तो जैसे तुम्हीं ने किया है.
सच में गांव में रहना हर दिन एक नया रोमांच पैदा कर रहा था. ऐसे ही एक दिन मामी ने कहा,
मामी: क्यों ना आज हम सब नदी किनारे चले नहाने आज धूप भी बढ़िया खिला-खिला है.
मामा: नहीं अंजलि मुझे थोड़ा काम है, आज एक काम करो तुम सबको लेकर जाओ. मैं अपना काम निपटा लूं.
वाह यह तो बहुत ही अच्छा मौका था घर की औरतों के साथ नहाने का. सुबह हम सभी जरूरी सामान लेकर नदी की तरफ निकल पड़े. बारिश के बाद नदी चौड़ी और शांत दिखाई दे रही थी.
मम्मी, मामी, संगीता और प्रिया नदी के एक सुरक्षित, अलग किनारे की ओर चली गईं और मुझे भी साथ आने को कहा. फिर क्या था ऐसा मौका मैं कहां छोड़ने वाला था जहां चार खूबसूरत हसीन औरतों के साथ नहाने का मौका मिले.
नदी में उतरते ही हम सब के बदन गीले हो गए और ठंडा पानी शरीर से टकराते ही मैंने गौर किया, चारों औरतों की चूचियां ठंडे पानी के वजह से खड़ी हो गई उनके हल्के कपड़े के अंदर ब्रा साफ़-साफ़ दिख रहा था. उन सब में सबसे बड़ी चूची मम्मी की थी. काश उन चारों का स्तन एक साथ चूसने को मिल जाता. मैं भी उन सब से नजरे बचा कर चुपके-चुपके उनके स्तनों को निहार रहा था. पानी के अंदर तो मेरा लंड खड़ा हो चुका था.
यह एक हंसी मजाक का माहौल था जो अक्सर मामी ही बनाती है.
मामी: राहुल आजा मैं नहला देती हूं तुझे आज.
संगीता छेड़ते हुए,
संगीता: क्या मामी,भैया को तो आज तक हमने कभी नहीं नहलाया. आपको क्यों इतनी बेचैनी है?
मामी: क्यों तू उसकी बीवी है जो जल रही है?
संगीता: नहीं मैं तो नहीं बन सकती आप ही बन जाओ. मामी: हां हां बन जाऊंगी.
यह सुन सब हंसने लगे. मामी मेरे पीछे आकर मेरे कंधे को रगड़ने लगी, वो मेरे काफी करीब थी उसका पूरा गीला बदन मेरे नंगे बदन से रगड़ खा रहा था. और अब तो उनकी चूचियां भी मुझे पीठ पर दबी हुई महसूस हो रही थी. ब्लाउज पर से ही सही पर फिर से आखिर थी तो यह घर की ही एक और औरत जिसके स्तनों को मैं पहली बार महसूस कर सकता था. मेरा खड़ा लंड तो बस चूत में घुसने बेताब था. अगर वहां सिर्फ मैं और मामी होते तो शायद में जरूर उसे चोदने का तरीका ढूंढ निकालता.
दिन ऐसे ही बीतते गए. लेकिन मम्मी को चोदने का सिलसिला हर रात जारी था. ऐसे ही एक रात उसे चोदते वक्त,
मैं: मम्मी क्या सभी औरतों की बुर ऐसी ही होती है?
मम्मी: आज सभी औरतों की याद कैसे आ रही है?
मैं: नहीं बस पूछना था.
मम्मी: अच्छा तो बीवी की तैयारी हो रही है अभी से? फिक्र मत कर मुझसे अच्छी होगी उसकी.
मैं: बात अच्छी कि नहीं नहीं है, मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या ऐसा ही एहसास हर एक बुर का होता है?
मम्मी: तुझे पता है ना मुझे अच्छा नहीं लगता इन सब का जिक्र करना.
मैं: बोलो ना प्लीज...
मम्मी: सबकी एक जैसी ही होती है, बस उम्र के हिसाब से कुछ थोड़ी ढीली हो जाती है और जवानी में टाइट होती है.
मैं: आपकी तो अभी भी बहुत टाइट लगती है.
मम्मी: वो इसीलिए कि तुम लोग ऑपरेशन से पैदा हुए थे.
मैं: मतलब आपका बुर एक जवान लड़की को टक्कर दे सकता है.
मम्मी: (शरमाते हुए) धत, क्या कहता रहता है? तेरी बीवी आएगी तब उसका देखते रहना कितना टाइट है.
मैं भी उसे लिपटकर उसे चोदता रहा. उसकी बातें सुनकर जब रफ्तार बढ़ाई तो उसने भी मेरे कमर को पकड़ के अपनी तरफ खींचते हुए चूत की गहराई में जाने का इशारा दिया. जिससे मेरी रफ्तार और तेज हो गई और उसकी चूत को गहरा चोदने लगा. अचानक से लंड पूरा बाहर की तरफ निकाला और जल्दबाजी के चक्कर में फिर से धक्का मारने के कारण उसकी गांड के छेद से टकरा गया. जिसका दर्द वो बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसकी चीख निकल गई.
मम्मी: ऊऊह्ह्ह्ह...नही...क्या कर रहा है आराम से...आह्ह्ह.
मैं भी फिर उसे संभाल कर चोदने लगा.
ऐसे ही कुछ दिन बीतने के बाद एक दिन पापा का फोन आया कि वो घर वापस आ रहे हैं. उनका काम खत्म हो गया है. मेरे लिए कोई बड़ी खुशखबरी नहीं थी क्योंकि यहां गांव में हर एक सुविधा मुझे मिलता था और हर रात मम्मी को चोदने का मजा अलग, जो घर पर होना मुश्किल था. हमें भी अब अगले दिन ही घर जाना था क्योंकि पापा घर वापस आ रहे थे. इसीलिए अगले दिन हम सबने सामान पैक किया. मामा, मामी और प्रिया सबसे विदा लेकर वापस घर के लिए लौट गए.
Wow bro bhaut accha liikh the ho
Bs scene ko toda lmba kro agar mom ke sath sex scene hai to kuch bate eetc specially jaise mom ko jada bate krena accha ni lgta during sex to son use bate krte hue open kre slowly
आखिरकार हम अपने घर आ ही गए. मामा जी के घर का यात्रा बहुत रोमांचक रहा इस बार. एक चीज मैं जरूर याद करूंगा और वो था हर रात मम्मी के साथ सुकून से उसकी चूदाइ करना. लेकिन यहां किस्सा उल्टा था, यहां मुझे संगीता के साथ सोने का मौका मिलता है ना की मम्मी के साथ. हालांकि मैं मम्मी का दीवाना हूं लेकिन संगीता के लिए वासना भी अब मुझ में कूट-कूट कर भरती जा रही है. आखिर बेहन को चोदने का मौका मिले तो कोई कैसे पीछे रह सकता है. वहां तो उसने मेरे हाथ लगाते ही मुझे रोक दिया था पर अब मौका था उसे अच्छे से मनाने और बहलाने का.
शाम को पापा आए और नए शहर में उनके अनुभव के बारे में हमें बताया और साथ ही साथ एक खुशखबरी भी दिया कि उनका प्रमोशन हो गया है.
पापा: अगले महीने से हम अपने घर का काम शुरू कर सकते हैं बनाने का.
इस बात से हम सभी खुश थे.
मैं: और वो कार अपने लेने को बोला था उसका क्या हुआ? पापा: वो भी ले लेंगे थोड़ा सब्र रखो.
हमेशा की तरह हमने साथ खाना खाया. क्योंकि मम्मी के साथ अभी खेल खेलना मुश्किल था. लेकिन मैं भी उसे छोड़ नहीं सकता था. खाने के बाद मैंने बहाना करते हुए उसे बुलाया पीछे आंगन में.
मैं: मम्मी मेरे गाड़ी की चाबी नहीं मिल रही है आपको मालूम है क्या? मम्मी: तूने रखा होगा ना मुझे कैसे पता. जाकर पीछे देख ले कहीं गाड़ी में तो नहीं लगा है.
मम्मी ने आते ही मेरी मुस्कुराहट का अंदाजा लगा लिया था कि मैं क्या चाहता हूं.और कहने लगी,
मम्मी: देख अब इन चीजों पर बहुत कंट्रोल रखना होगा. मामा का घर नहीं है, तुझे तो पता ही है इस छोटे से घर में संगीता हमेशा रहती है आंखों के सामने और रात को तेरे पापा. मैं: अभी तो आ जाओ, यहां कोई नहीं है. मम्मी: पागल हो गया है, समझाने पर भी नहीं समझता है. मैं: बस एक बार-एक बार.
कहकर मैंने उसे अपनी बाहों में भरते हुए चूमना शुरू कर दिया और साथ ही चूचियों को भी मसलने लगा.
वो बीच-बीच में बोलती रही,
मम्मी: छोड़ना, कोई ना कोई आ जाएगा फंस जाएंगे बात समझ. बस हो गया. मैं: कैसे बताऊं आपको मम्मी आपके बिना रह नहीं पाता हूं. मम्मी: मेरे बिना या फिर मेरे उसके बिना? मैं: उसके मतलब? मम्मी: चल छोड़ जाने दे. मैं: बोल भी दो. मम्मी: तेरा मन तो मेरी बुर में लगता है. मैं: उसमें तो लगता ही है पर आप में भी लगता है. मम्मी: हो गया-हो गया बस चल अभी यहां से.
हम दोनों अंदर गए, मम्मी पापा के साथ सोने हॉल में चली गई और मैं कमरे का दरवाजा बंद करके संगीता के पास. मेरे दरवाजा बंद करते ही संगीता सावधान हो गई और उसका सावधान होना भी जरूरी था. क्योंकि अब तक तो हम सिर्फ चुम्मा-चाटी का खेल खेलते रहे मामा के घर पर. यह वो लम्हा था जैसे एक पति अपनी नई नवेली दुल्हन के पास आता है दरवाजे को बंद करके.
मेरे पास पूरा रात था अपनी बेहन को समझाने और प्यार मोहब्बत के लिए. मुझे देख वो शर्माती हुई उसने अपनी नजर नीचे झुका लिया, पैरों को मोड़ लिया और सोने का नाटक करने लगी. यह बिल्कुल भी डर का माहौल नहीं था बल्कि संगीता बेहद शर्मसार थी इन घटनाओं से जो हम दोनों के बीच घटित हुआ इसीलिए ऐसे मौके पर वो हिम्मत नहीं कर पा रही मुझसे नज़रे मिलाने की. मैं भी उसके पैरों के पास जाकर बैठा.
मैं: क्या हुआ संगीता नाराज हो क्या?
उसका कोई जवाब नहीं आया. मैं यह सोचकर परेशान था और किस तरह से शुरुआत की जाए क्योंकि वहां तो संगीता थोड़ा बहुत मेरे रंग में रंगने लगी थी. लेकिन यहां अचानक ऐसा क्यों कर रही है. कम से कम बात तो करें.
पर मैं शायद थोड़ा अंधेरा होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाया. मैं उठा और मैंने रूम का लाइट चालू किया. फिर से संगीता के पास जाकर बैठा तो देखा उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी. वो बहुत ज्यादा शर्मा रही थी. मैंने उससे कुछ बातें करना शुरू कर दिया कि वो थोड़ा हल्का महसूस कर सके. उसकी ऐसी प्यारी मुस्कान को देख मैंने भी अपना हाथ आगे बढाकर उसके गालों को प्यार से चिकोटी भरा.
मैं: अच्छा एक बात बताओ, कभी कोई लड़का तुम्हारे पीछे पागल हुआ है? संगीता: बहुत थे लेकिन मैंने किसी को भाव नहीं दिया. मैं: ऐसा क्यों? संगीता: अपनी और परिवार की इज्जत… आप जानते हो ना? एक बार अगर कहीं बदनामी हो गई तो फिर क्या होगा. मैं: मेरी गुड़िया तुम तो बहुत समझदार हो. अच्छा तुम्हें कैसा लड़का चाहिए बताओ? संगीता: (दबी हुई आवाज में) आपके जैसा जो मुझे प्यार करें पर मुझे शर्म आती है. मामा जी के घर जो कुछ भी हमारे बीच हुआ, उससे पहले तो मेरा और आपका रिश्ता कुछ और ही था ना. मैं: शरमाती क्यों हो? प्यार की कोई सीमा नहीं होती.
यह कहकर मैंने उसे बाहों में जकड़ लिया.
संगीता: आपकी गर्मी से तो मैं गर्म हो जाती हूं.
मैं भी उसके होठों को चूमना शुरू कर दिया.
मैं: और तुम्हारे गुलाबी होंठ मुझे बेचैन कर देते हैं.
उसके मुंह से हल्का संतरे का स्वाद आ रहा था क्योंकि कुछ देर पहले उसने संतरे का जूस पिया था. वो बहुत रसीली लग रही थी.
और फिर धीरे-धीरे अपने हाथ को उसके स्तनों पर ले जाकर टिका दिया. यह देख उसने धीरे से मेरे कान में कहा,
संगीता: आपने पहले कभी इसे देखा है?
संगीता बहुत अनजान थी, मैंने भी उसे झूठ बोल दिया क्योंकि मेरे दिल की धड़कन बहुत तेजी से धड़क रहा था पहली बार उसकी चूचियों को देखने के लिए.
संगीता: आपकी धड़कन कितनी तेज हो रही है. मुझे भी अजीब सा अच्छा लग रहा है.
अब और नहीं, मैं अपने हाथ से उसके टॉप को थोड़ा ऊपर उठाया. उसने नीले रंग की ब्रा में अपनी चूचियों को छुपाए रखा था. यह देख वो भी अचंभा रह गई.
संगीता: शांत मेरे भैया मैं दिखाती हूं.
मैं उस पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि संगीता अपने हाथों से खुद मुझे अपनी चूची दिखाने जा रही थी. उसने पीछे हाथ डालकर अपना ब्रा का हुक खोल दिया और बाहों से ब्रा की पट्टी को निकलती हुई अपनी चूचियों को मेरे सामने रख दिया. मेरा तो देख कर बुरा हाल था की क्या यह मेरी वही बेहन है.
मेरी हथेलियां उन चूचियों पर फैल गईं. मैं धीरे-धीरे उन्हें सहलाने लगा, मसलने लगा, दबाने लगा. संगीता की सांसें तेज हो गईं. मेरी मजबूत बांह संगीता की कमर के चारों ओर लिपटी हुई थी. उसका का सिर मेरे सीने पर टिका था. यह घटना हम दोनों के अंदर आग सुलगा रही थीं.
संगीता: (नशीली आवाज में) भैया…
उसकी उंगलियां मेरे छाती पर घूम रही थीं.
मैं: मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. तुम्हारी यह नरम त्वचा, सांसों की महक… सब मुझे दीवाना बना रहा है.
शर्म से उसने अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया.
मैं: तुम्हारी आंखें कितनी भोली हैं, लेकिन आज इनमें आग है. एक प्यास दिख रही है बताओ ना, तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हें वो सब दूंगा जो चाहिए. संगीता: मुझे प्यार करो भैया...
मैं फिर से उसका चेहरा दोनों हाथों में थामा और धीरे-धीरे अपने होंठ उसके गुलाबी होंठों पर रख दिए. संगीता सिहर उठी. फिर धीरे-धीरे उसके निचले होंठ को हल्के से काटा, संगीता ने आह भर दी और मेरे होंठों को चूसने लगी. हमारी जुबानें मिलीं, नाचने लगीं. कमरे में सिर्फ हमारी सांसों और होंठों के चुस्कियों की आवाज गूंज रही थी.
संगीता: उम्म्म… भैया… मेरे होठों को आप से पहले किसी ने नहीं चूमा है आप पहले हो.
उसके गुलाबी निप्पल्स कड़े हो चुके थे. मैंने उसकी चूची को अपने हाथ से सहलाया और अपने चेहरे को उसकी चूची के पास ले जाते हुए अपने जीभ से जैसे छुआ, संगीता कांप उठी.
संगीता: सी…सी… आह…भैया...
निप्पल को दांतों से हल्का-हल्का काटने लगा. संगीता ने मेरा सिर पकड़कर अपनी छाती से चिपका लिया. मैं
उसकी चूची को जोर-जोर से पीने लगा और दूसरी चूची को जोर-जोर से दबाने लगा संगीता मजे से सिसकारियां भर रही थी.
संगीता: आह्ह्ह… भैया… आपकी उंगलियां…
मैं दूसरे चूची पर भी वैसा ही प्यार बरसाने लगा. कभी चूसता, काटता, जुबान से घुमाता. संगीता की चूचियां लाल हो गईं. फिर मैं नीचे की ओर सरक गया. मेरी जुबान उसकी नाभि तक पहुंची और नाभि को चूसने लगा, चाटने लगा, चुमने लगा. संगीता तड़प से मचल रही थी.
तभी मैंने सही वक्त देखकर उसकी पैंटी की इलास्टिक में उंगली फंसाई और उसकी पैंटी और पैजामा सहित नीचे खींचने लगा. उसने भी अपना हाथ बढ़ा कर अपनी पैंटी को पकड़ने की कोशिश पर शायद वो भी नहीं चाहती थी कि मैं रुकूं, उसकी उंगलियां ढीली पड़ने लगी.
पैंटी के थोड़ा नीचे सरकते ही मेरी सांसे थम सी गई. मैं अपने आप पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि मैं इस हद तक आगे बढ़ चुका हूं की अपनी माँ की चूत जो की नामुमकिन था, उसे हासिल करने के बाद अपनी बेहन की चूत के इतने करीब हूं. बिना बालों वाली, गुलाबी, कुंवारी चूत सामने आई. पूरी तरह साफ, छोटी-सी, और अब थोड़ी नम हो चुकी थी. उसकी खुशबू – कामुक, जवान लड़की की – कमरे में फैल गई. उसका दाना सख्त होकर उभरा हुआ था. उसका रस चमक रहा था.
मेरी भोली संगीता को शायद जरा भी अंदाजा नहीं था की चूत को चाटा भी जाता है. जैसे ही मैंने अपना होंठ उसकी चूत पर रखा,
संगीता: भैया नहीं, क्या कर रहे हो? वो गंदा होता है. मुंह हटाओ उधर से.
यह सुन मैं तुरंत उसके चेहरे के पास जाकर बोला
मैं: तुम्हारा कुछ भी मेरे लिए गंदा नहीं है मेरी गुड़िया.संगीता: भैया पर वहां से टॉयलेट करते हैं. मैं: तुम आंखें बंद करो और सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो. संगीता: नहीं भैया मैं आपको इस तरह से नहीं देख सकती. मैं: मेरी प्यारी, इतना प्यार करती हो मुझसे. संगीता: मैंने हमेशा आपकी इज्जत की है आप सोचिए मुझे कैसा लगेगा कि आप मेरे सामने ऐसे झुकें वो भी वहां जहां से मैं पेशाब करती हूं.
चूत को चटना कामवासना का एक भाग है यह संगीता के समझ में नहीं था. हो सकता है कि उसे शायद और भी चीज पता नहीं हो. मुझे अब काफी संभाल कर उसे हर एक चीज का एहसास दिलाना जरूरी था.
मैं: शांत हो जाओ, तुम्हारा भाई जानता है कि तुम्हारे लिए क्या सही है. मुझ पर भरोसा करती हो? संगीता: हां भैया. मैं: तो अपनी आंखें बंद कर लो और दिमाग को शांत करो.
उसने मेरा कहना माना और अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. मैं फिर से एक बार तैयार था उसकी उड़ान को ऊंचाई की ओर ले जाने को.
मैंने अपनी जीभ उसकी कुंवारी चूत पर रखी और धीरे-धीरे चाटना शुरू किया. उसकी चूत का स्वाद हल्का नमकीन और उत्तेजक था. मैंने उसकी फाँकों को जीभ से अलग किया और उसके दाने को चूसने लगा.
संगीता: आह्ह… ओह्ह… भैया… ये तो… आह्ह…
मैंने देखा उसकी आवाज थोड़ी तेज हो रही है कहीं बाहर मम्मी पापा को कुछ भनक न लग जाए, चूत को चाटते वक्त अपने हाथ को आगे बढ़ाते हुए मैंने अपनी एक उंगली को उसके मुंह में रख दिया तुरंत उसे चूसने लगी.
संगीता: उम्म्म्म्म....
वो अपने गांड को हिलाने लगी, और मैंने अपनी जीभ को उसकी चूत के अंदर तक डाला और जीभ से चोदने लगा. अपनी ऊंगली उसकी मुंह से निकाल कर उसी की चूत में घुसा दिया. संगीता की टाइट कुंवारी चूत की खुरदरी चिकनी दीवारें उंगली को जकड़ रही थीं. मैं उंगली अंदर-बाहर करने लगा, जीभ से उसका दाना चूसता रहा. संगीता का शरीर थरथरा रहा था और उसकी खुशबू और भी तेज हो गई थी. जिसने मेरे लंड को सातवें आसमान पर ला खड़ा किया. उसका रस मेरे मुँह में मिश्री की तरह घुल रहा था, और मैं उसे चाट-चाटकर साफ कर रहा था। मैंने उसकी गांड के नीचे हाथ डाला और उसे थोड़ा ऊपर उठाया ताकि उसकी चूत मेरे मुँह में और गहराई तक जाए.
संगीता: आह्ह… भैया… उफ्फ…
मैंने अपनी मध्यमा उंगली उसकी दरार पर ऊपर-नीचे, और तर्जनी और अनामिका उंगली उसकी योनि के बाहरी हिस्से पर फेरनी शुरू कर दी. मेरा बायाँ हाथ उसके स्तनों को मसल रहा था और दायाँ हाथ उसके चूत के होंठों को चौड़ा करके फैला रहा था, उसके शरीर में मानो करंट लग रहा हो. मैंने अपनी मध्यमा उंगली अपनी छोटी बेहन की योनि में गहराई तक डाल दी अचानक हुए इस प्रवेश से वो सिहरने लगी,
मैंने अपने अंगूठे से उसकी चूत के ऊपरी हिस्से को सहलाना शुरू किया, और अपनी मध्यमा उंगली उसकी मीठी चूत में अंदर-बाहर करने लगा. वो अविश्वसनीय रूप से गर्म, कसी हुई और गीली थी.
अब मैं उसे चोदने के लिए बेताब हो चुका था. वो मेरे सामने नंगी लेटी हुई थी. मैं भी उसकी चूत से मुंह हटाता हुआ थोड़ा उठा और अपने लंड को अंडरवियर से आजाद करता हुआ उसकी आंखों के सामने ले आया.
लंड को देख उसकी आंखें आश्चर्य और भय से फैल गई.
संगीता: (कांपती हुई आवाज में) इतना बड़ा…भैया… यह क्या है? मैं: क्यों तुम्हें नहीं पता? संगीता: पता है पर मैंने पहली बार देखा है. सच में यह ऐसा होता है, कितना मोटा और बड़ा है. मैं: सोचो जब यह तुम्हारी चूत में जाएगा तब कैसा लगेगा? संगीता: (धीरे से फुसफुसाते हुए) नहीं भैया नहीं नहीं. आप क्या इसे अंदर डालने वाले हैं? मैं: यह चूत में ही तो डाला जाता है. संगीता: भैया मैं कैसे समझाऊं, मैं तैयार नहीं हूं इस चीज के लिए. मुझे बहुत डर लग रहा है. मैं: मुझ पर भरोसा रखो मेरी जान. कुछ नहीं होगा बस थोड़ा सा दर्द बर्दाश्त कर लो, सब ठीक हो जाएगा.
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए मेरे लंड का एहसास करने की कोशिश कर रही थी.
संगीता: कितना गरम और मजबूत है यह. मैं: तुम्हें अच्छा लगा?
यह सवाल सुनकर सुनकर वो शर्मा गई. तभी मैंने उसे चूमते हुए बिस्तर पर अच्छे से सुला कर,
मैं: संगीता, आज साथ दे दो मेरा.
उसका चेहरा यह सुनकर रोने जैसा हो गया.
संगीता: नहीं भैया, बहुत दर्द होगा. मैं: डरती क्यों हो? मैं हूं ना तुम अकेले नहीं हो. संगीता: भैया धीरे से करना प्लीज?
मैंने लंड को चूत के मुंहाने पर रगड़ा. संगीता काँप उठी, उसकी छोटी सी चूत के होंठों को खोलकर उसमें अपने लंड का सुपाड़ा फसाया और धीरे से दबाव डाला. मेरा मोटा लंड का सुपाड़ा संगीता की तंग, कुंवारी चूत में घुसा. वो जोर से कराही –
संगीता: आआआह्ह्ह… दर्द हो रहा है भैया…! मैं: शशशश...धीरे बोलो कोई सुन लेगा.
आधा इंच… एक इंच… लंड अंदर गया ही था कि संगीता की आँखों में आँसू आ गए. उसने मेरे पीठ पर नाखून गाड़ दिए. मैं भी उसके होंठों को चूमता रहा और उसके आँसू चाट कर बोला.
मैं: शांत हो जा मेरी जान… मैं तुम्हारा भैया हूँ… तुम्हें दर्द नहीं पहुँचाना चाहता हूँ.
यह सुन संगीता को थोड़ा राहत मिला. मैंने भी उसकी कमर पकड़ी और धीरे-धीरे दबाव डाला. मेरा लंड लगभग 2 इंच अंदर घुस गया था. दर्द की लकीरें संगीता के चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रही थी. मैंने धीरे से उसके माथे को चुमा. मैं अपने लंड को इस दो इंच में अंदर बाहर कर चोद रहा था. उसकी चूत ने मुझे पूरी तरह से जकड़ रखा था. जब और आगे बढ़ने की कोशिश किया तो मैंने देखा कहीं मेरा लंड फस रहा है. मैं समझ गया की यह मेरी बेहन की सील है पूरा मजा देने के लिए तोड़ना ही पड़ेगा और दर्द तो होगा ही.
उसको अभी दर्द नहीं देना चाहता था इसलिए वहीं रुक कर अपने तीन इंच लंड से धीरे-धीरे अंदर बाहर चोदता हुआ संगीता से बातें करने लगा.
मैं: चूत कितनी टाइट है तुम्हारी, बहुत मजा आ रहा है. तुम कैसा महसूस कर रही हो?
संगीता थोड़ा नॉर्मल हो गई थी और वो भी 2 से 3 इंच लंड को अपने चूत में अंदर बाहर चूदवाते हुए मजा ले रही थी. लेकिन उसे क्या पता अभी तो अच्छे से आधा लंड भी नहीं घुसा है.
संगीता: भैया, आह … बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसे ही धीरे-धीरे करते रहो. क्या आपने पूरा डाल दिया? मैं: अभी नहीं, अभी आधे से ही कर रहा हूं.
यह सुनकर वह चौंक गई,
संगीता: क्या अभी आधा ही गया है? मुझे तो अभी से रह रहकर दर्द हो रहा है. मैं: आगे तुम्हारी सील है जिसे तोड़ना है, बस एक बार थोड़ा सा दर्द होगा. क्या तुम तैयार हो? तुम यही चाहती थी ना की मैं तुम्हें प्यार करूं? संगीता: भैया आपका बहुत बड़ा है मुझे बहुत दर्द होगा. आप आराम से करना. मैं: बस एक बार और दर्द होगा. अपने भैया पर भरोसा रखो, चीखना नहीं वरना मम्मी पापा जग जायेंगे. संगीता: भैया मुझे बहुत दर्द होगा. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी, प्लीज आप धीरे से करना.
मैं और छोटे-छोटे धक्के लगाकर अब थोड़ा और अंदर घुसा दिया. संगीता की चूत की दीवारें बुरी तरह खिंच रही थीं, उसे लगा कि भैया का लंड उसकी चूत में छेद करता हुआ अंदर घुस रहा है.
संगीता: उफ्फ़… आह्ह्ह्ह… भैया… मैं मर जाऊँगी… बहुत जल रहा है… ऊं…ऊं…. आ..उई मां…. बहुत दर्द हो रहा है.
उसका पूरा शरीर पसीने से तर था. दर्द असहनीय था, लेकिन मेरा लंड अभी भी पूरा नहीं घुसा था.
मैं संगीता को बहला रहा था,
मैं: शांत मेरी जान… भैया है तुम्हारे पास डरो मत… बस थोड़ा और… मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ… मेरी बेहन…
मैंने थोड़ी देर उसकी चूचियों को सहलाया धीरे-धीरे मसला फिर निप्पल को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा उसका दिमाग भी थोड़ा शांत हो गया. तभी मैंने संगीता के कंधों को अच्छी तरह से पकड़ा और अपनी सारी ताकत इकट्ठा की धीरे से लंड को बाहर खींचा और पूरी ताकत से जोर का धक्का मारा.
अचानक एक झटके में पूरा लंड मेरी बेहन की चूत में सील तोड़ता हुआ अंदर बच्चेदानी तक घुस गया और इसके साथ उसकी सील टूट गई.
संगीता की चीख निकल गई – आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!! नहीं… आह्ह्ह्ह!!! बहुत दर्द… जल रहा है…!!!आआआह्ह्ह्ह!!! भैया… दर्द… बहुत दर्द… हो रहा है मैं मर जाऊंगी.
मैंने झट से उसके मुंह को दबा दिया की आवाज बाहर न जाए.
मैं: चुप... शशशश...चुप...हो जाओ, बस हो गया.
उसके आँसू बहने लगे. संगीता की चीख आज भी मेरे कान में गूंजती है. दर्द इतना तीखा और भयानक था कि जैसे कोई गर्म लोहे का सलाखा उसकी चूत में ठोंक दिया गया हो. उसकी सील के टूटने के साथ चूत से निकलते हुए खून ने मेरे लंड को भी रंग दिया.
वो तड़प-तड़पकर अपने नितंब हिला-हिलाकर लंड निकालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैंने उसे मजबूती से दोनों हाथों से जकड़ रखा था. यह बात तो मैं जानता था कि सिर्फ सील तोड़ना ही काफी नहीं है कुछ झटका और मारना जरूरी है तभी अगली बार के लिए वो तैयार हो पाएगी क्योंकि यह उसकी पहली चूदाइ है.
संगीता: भैया… प्लीज निकालो… मैं मर रही हूँ… आह्ह्ह… बहुत जलन… खून निकल रहा है…!
उसके आँसू लगातार बह रहे थे, होंठ काँप रहे थे. दर्द की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि संगीता का शरीर ढीला पड़ गया, बस हल्की-हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं.
मैंने अपना लंड बाहर नहीं निकाला और संगीता को धीरे धीरे चोदने लगा. उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. इसीलिए मैंने चार पांच धक्के और मारकर अपना लंड बाहर निकाल दिया.
मैं: क्या हुआ मेरी गुड़िया? अब तो दर्द नहीं हो रहा है ना? संगीता: (सीसकते हुए) बहुत जलन हो रहा है?
मैं: अच्छा रुको मैं कुछ करता हूं.
मैंने टेबल के ड्रॉ में से टिशू पेपर निकालकर उसकी चूत को अच्छे से साफ किया और थोड़ा नारियल तेल लगा दिया जिससे की जलन थोड़ा कम हो जाए. यह देख उसे थोड़ा अच्छा लगा. फिर उसे अपनी बाहों में भर उसके माथे को चूम कर उसे सुलाने की कोशिश करने लगा. वो कुछ भी नहीं बोल रही थी शायद यह उसके लिए एक सदमे की तरह था पर वो इस बात से निश्चिन्त हो चुकी थी कि उसका डर खत्म हो चुका है. आखिर में उसने भी अपना होंठ बढ़ाया और मेरे होठों को चुमा. उसके बाद चुपचाप मुझे पकड़ कर सो गई.
यह रात एक कयामत की रात थी क्योंकि मैंने आज अपनी बेहन को चोदा था और वो कोई आम चूदाइ नहीं बल्कि सील तोड़ने वाली चूदाइ थी. सच में यह मेरे लिए तीसरा चूत था लेकिन टाइट होने का इतना मजा मिलेगा मुझे पता नहीं, पर उस बेचारी के लिए तो यह काफी दर्द भरा रहा है.
अगले दिन संगीता ब्रश कर रही थी और मैं वैसे ही बेडरूम में लेटा था, मम्मी रूम में झाड़ू लगाने आई. हमसे एक बड़ी गलती हो गई कल रात सील तोड़ने के चक्कर में जो खून बेडशीट पर गिर गया था उसके धब्बे साफ दिख रहे थे. हम वो बेडशीट हटाना भूल गए. मम्मी की नजर उस पर पड़ गई.
मम्मी: संगीता इधर आना.
यह सुन मैं भी घबरा गया. लेकिन मैंने कोई गलत कदम ना उठाते हुए चुपचाप वैसे ही लेटा रहा आंख बंद करके. तभी संगीता के आने की आवाज भी मैंने सुनी बेडरूम में. मैंने फिर भी आंख नहीं खोला.
मम्मी: राहुल ...राहुल, उठ जा सुबह हो गई. जा 5 मिनट के लिए बाहर मुझे संगीता से बात करनी है.
मेरी घबराहट और बढ़ गई की कहीं मम्मी संगीता का चेहरा देखकर कुछ और ना समझ ले. मैं चुपचाप बाहर की ओर चला गया और अंदर क्या बात हुई मुझे कुछ नहीं पता, वो तो सिर्फ संगीता ही जानती थी. पर यह कोई ऐसी बात नहीं थी कि मैं मम्मी के सामने उससे पूछ पाता. मैंने सही समय का इंतजार किया और जैसे ही मम्मी नहाने के लिए बाथरुम में गई मैंने तुरंत संगीता को साइड में ले जाकर पूछा.
संगीता: मम्मी उस बेडशीट के बारे में पूछ रही थी. मैं: फिर तुमने क्या कहा? संगीता: मैं झूठ बोल दिया कि मेरा पीरियड था, मैं व्हिस्पर पैड लगाना भूल गई थी और डांट रही थी कि ध्यान रखूं उन चीजों पर. मैं: अब कैसा है दर्द? संगीता: चूत का?
उसके मुंह से यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, और मैं उसे देख मुस्कुरा दिया और साथ ही उसके होठों को भी चूम लिया, वो भी हल्का सा मुस्कुराई.
संगीता: दर्द कल रात से तो कम ही है. जलन हो रही है बस.
तभी मम्मी बाथरूम से आई,
मम्मी: जाओ संगीता नहा लो. संगीता: हां जा रही हूं.
कह कर मम्मी भी पीछे आंगन में चली गई बाल सुखाने के लिए. मैं भी उसके पीछे-पीछे उसके पास गया बात को संतुलित करने के लिए.
मैं: क्या हुआ, आप संगीता को डाट क्यों रही थी? मम्मी: कुछ नहीं, यह लड़की ध्यान रखती नहीं है किसी चीज का? उम्र हो गई है कम से कम पीरियड्स में पैड पहनना चाहिए था. पूरा बेडशीट गंदा कर दिया. मैं: बेडशीट? मुझे तो नहीं दिखा कुछ ऐसा. मम्मी: तुझे सोने से फुर्सत मिले तब तो दिखेगा ना. तू तो गहरी नींद में सोया था. मैं: अच्छा सुनो ना, बहुत मन कर रहा है आपसे प्यार करने का. मम्मी: अब यहां कैसे हो सकता है तू ही बता? मैं: बाहर चले? मम्मी: धीरे... क्या बोल रहा है? बाहर कहां जाएंगे? मैं: रुको मैं कुछ सोचता हूं, आप बस संगीता से बहाना बना दो कि हम मार्केट जा रहे हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) अगर कुछ गड़बड़ हुई तो तुझे छोडूंगी नहीं. मैं: भरोसा रखो कुछ नहीं होगा.
मम्मी ने मेरा कहना मानते हुए ठीक वैसा ही किया जैसा मैंने कहा था. वो सुंदर सी हरे रंग की साड़ी पहनकर चलने को तैयार हो गई. जाते वक्त मैं संगीता से नजरे मिलाते हुए उसे बाय कहने की कोशिश की. वो शर्म से मुस्कुराते हुए अंदर चली गई. अब मैं और मम्मी आजाद थे. रास्ते में,
मम्मी: हां तो क्या सोचा तुने? मैं: यही कुछ दूरी पर एक लॉज है. वहां चलते हैं. मम्मी: अरे पागल हो गया है. इधर कोई आसपास हमें देख लिया तो? मैं: फिक्र मत करो वो ऐसी जगह है जहां जल्दी लोग आते जाते नहीं है और खास करके प्यार मोहब्बत करने के लिए ही आते हैं. वो जगह चूदाइ के लिए मशहूर है. छोटा कमरा है पर ठीक है. मम्मी: (पीठ पर थपकी मारते हुए) तू भी ना क्या-क्या करवाएगा?
जब हम लॉज पहुंचे तो शायद वहां उस वक्त कोई नहीं था सिवाय लॉज मैनेजर के. मैंने मम्मी को लॉज के गेट के अंदर खड़ा रहने को कहा और फिर मैनेजर से बात करने गया जो कि बाहर ही छांव में काउंटर टेबल लगाकर बैठा था. उसकी नजर मुझ पर और मम्मी पर मम्मी पर था.
मैं: कमरा चाहिए? लॉज मैनेजर: हां हां समझ गया. कितने घंटे के लिए? मैं: 4 घंटे के लिए. लॉज मैनेजर: आज तो आंटी की जान लेकर रहोगे. कौन है यह? मैं: पड़ोस की ही एक औरत है. लॉज मैनेजर: कैसे पट गई यार इस उम्र में? इतनी मस्त माल तुमने कैसे पटाया?
मम्मी को देखकर उसकी नियत भी डगमगा गई. थोड़ा रुक कर धीरे से कहने लगा,
मैं: अच्छा अपना नाम तो बता दो? मैनेजर: तुम मुझे आदि कहकर बुला सकते हो.
क्योंकि वह एक बहुत छोटा सा लॉज था सब काम आदि ही देखा था, बस नाम का मैनेजर था.
आदि: यार आंटी से बात करो ना कोई उसके पहचान में और औरतें होगी. मेरी भी सेटिंग करवाओ. मैं: तुम्हारे यहां तो इतनी औरतें आती है फिर किसी से भी कर लो. आदि: यही तो रोना है. औरतें बहुत कम आती है जल्दी नहीं आती खास करके जवान लड़के और लड़कियां ही आते हैं. मुझे तो ऐसी ही रस भरी औरतें पसंद आती है. मैं: अच्छा ठीक है मैं बात करूंगा.
मम्मी यह सब दूर से देख रही थी और सोच रही थी कि "इतनी लंबी क्या बात चल रही है इन दोनों में."
आदि: अच्छा सुनो, आंटी से ही बात करो ना अगर पैसे लेकर कुछ कर दे मेरा... मैं: अरे यार वो ऐसी औरत नहीं है. बहुत मेहनत करनी पड़ती है पटाने के लिए. आदि: अच्छा ठीक है पर मेरा ध्यान रखना.
मैं: हां ठीक है. लाओ एक पानी की बोतल दो.
मैं जब उसे पैसा पूछा,
आदि: यार देखो वैसे तो मैं 4 घंटे के दो हजार रुपए लेता हूं तुम हजार ही दे दो. तुम्हारी आंटी मुझे बहुत पसंद आई और अपना नंबर भी दे दो मुझे.
वो सच में पागल हो चुका था. मम्मी को देखने के बाद उसके अंदर की सारी वासना जाग उठी. मैं जब पैसा चुका कर फिर मम्मी के पास गया, वो मेरे तरफ घूरते हुए बोली,
मम्मी: क्या बातें चल रही थी इतनी देर से? मैं: ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो बस उससे मोलभाव कर रहा था. मम्मी: कितना पैसा लिया? मैं: हजार में मान गया. मम्मी: फिर भी कितना महंगा है! मैं: चलो आप ज्यादा मत सोचो.
हम कमरे में पहुंचे तो बहुत छोटा था कमरा लेकिन हमें भी कौन सा पूरी जिंदगी रहना था. हमें तो चूदाइ की आग बुझाना था. मम्मी शरमाते हुए मेरी तरफ देखने लगी मैं भी उसे चुम्मा देकर आश्वासन दिया.
मैं: कुछ सोचने की जरूरत नहीं है. अपने आप को बस मेरे हवाले कर दो.
वो थोड़ी सी बेचैन थी उसके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था. आज से पहले कभी भी वो चूदाइ के लिए खास करके किसी गेस्ट हाउस, होटल या लॉज में नहीं आई थी.
मम्मी: तुझे पक्का पता है यहां कोई खतरा नहीं है? मैं: इतना सोचती क्यों हो? मम्मी: कैसे नहीं सोचूं. घर पर तेरी जवान बहन यह सोच रही होगी कि उसकी माँ मार्केट गई है. तेरे पापा इस बात से निश्चिंत होंगे कि उसकी बीवी घर पर उनका इंतजार कर रही होगी. और यहां मैं, लॉज में रंगरलिया मना रही हूं. मैं: मैंने कहा ना आप घबराहट छोड़ो और अपने आप को बस मेरे हवाले सौंप दो.
मैं भी उसे बाहों में कस कर चुम्मा लेना शुरू कर दिया, उसके मुंह के स्वाद को चखने लगा. एक दिन बिना चोदे जो बीता था ऐसा लग रहा था जैसे सदियों बीत गए हैं. उसने भी धीरे-धीरे गर्मी को महसूस करते हुए अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और फिर मुझे जकड़ने लगी. मैं भी उसे नीचे की तरफ बेड पर सुला दिया और फिर चूमना शुरू रखा साथी साथ उसके ब्लाउज के हुक भी खोलने लगा. उसने भी साथ देते हुए पेटीकोट में हाथ डालकर अपनी साड़ी को नाभि के नीचे से बाहर निकाल दिया और खोलकर साइड में फेंक दिया. मम्मी ने बहुत सुंदर सी एक बैंगनी रंग की ब्रा पहनी थी.
साड़ी की पूरी तरह से खुलने के बाद मैं भी अपना हाथ उसके जांघों पर सहलाने लगा. पीछे से मेरा लंड पैंट के अंदर से ही उसके गांड से चिपक गया तभी मैंने उसके कान को भी चूसना शुरू कर दिया जिससे उसकी हवस और बढ़ने लगी. और धीरे-धीरे सिसकारियां भी छूटने लगी.
मम्मी: इश्श्श्श....
मैं भी और तेजी से कभी उसके कान को काटता तो कभी चुस्ता. फिर धीरे से उसके पेटिकोट का नाडा भी खोल दिया. नाड़ा खुला तो देखा उसने काले रंग की पैंटी पहनी थी.
मैं: क्या बात है, आज मैचिंग मैचिंग नहीं पहनी? मम्मी: जो मिल गया वो पहन ली. क्यों अच्छा नहीं है?मैं: बहुत अच्छा है मेरी माँ.
माँ शब्द सुन के वो थोड़ा शरमाई. तभी मैं फिर से उसके गालों को पकड़ के एक बार फिर से उसके होठों को चूसा. और ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियां मसलने लगा. जैसे-जैसे ब्रा नीचे फिसलता गया उसकी चूचियां बाहर आने लगी, उसके हल्के भूरे गुलाबी रंग के निप्पल को मैंने चूसना शुरू कर दिया. उसके बदन में भी फिर से एक बार करंट दौड़ने लगा और दूसरी हाथ उसके पैंटी के अंदर डालकर उसकी चूत के बालों वाले हिस्से को और फिर उसकी चूत के दाने को सहलाने लगा. जिससे वो अब थोड़ा और बेचैन मालूम पढ़ने लगी.
मम्मी: उम्म् ...मम्म्म...ऊऊह्ह्ह्ह...
मैं भी उसकी बेचैनी बढ़ाता हुआ नीचे जा पहुंचा जहां उसके गुलाबी पंखुड़ियों वाली मुलायम चूत थी. कल रात जैसा प्यार मैंने संगीता की चूत को दिया था, मम्मी की चूत को भी ठीक ऐसा ही प्यार करने लगा. मम्मी ने भी अपना हाथ बढ़ाकर मेरे बालों को सहलाने लगी और मेरा जीभ उसकी चूत के मुहाने को चोदने लगा. उसके चूत के होंठ फड़फड़ाने लगे. मैंने उसे शांत करने के लिए तुरंत लपक कर उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया और बीच-बीच में अपना जीभ उसके मुतने की छेद पर
चलाने लगा.
अब तो वो पागल सी हो गई, मेरा सर पकड़ कर ऊपर खींचते हुए मेरे होठों को चाटने लगी. दूसरा हाथ मेरे पैंट में डालकर लंड को बाहर निकलने लगी. मैं भी तुरंत अपना टी-शर्ट और पेंट उतरना शुरू कर दिया लेकिन उसने मेरा लंड अभी भी नहीं छोड़ा और आगे पीछे हिलाते रही. आज मुझे उसकी आंखों में असली चूदाइ का प्यास नजर आ रहा था. मेरा लंड लोहे की तरह मजबूत हो चुका था उसने तुरंत उसे पड़कर अपनी चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया.
जब हम दोनों की नजर मिली तो वो मुस्कुराते हुए फिर लंड को चूत पर रगड़ रही और पता ही नहीं चला कैसे उसने अपने ही हाथ से लंड के सुपाडे को चूत के अंदर घुसा लिया. फिर देर किस बात की थी, मैंने भी जोरदार धक्का देते हुए चोदना शुरू कर दिया.
मैं उसे चोदता रहा वो सिसकारी भारती रही. मेरी हवस का भी ठिकाना नहीं था, जांघों से जांघे टकरा रही थी और चूत से लंड. उसके जुबान पर सिसकारी के साथ आंखों में हल्के आंसू भी थे लेकिन यह कोई दुख के आंसू नहीं बल्कि चर्मसुख का एहसास था.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह……. मैं: आह्ह्ह…कैसा लग रहा है मम्मी... मम्मी: आश्श्श्श...आअह्ह्ह्ह...बहुत अच्छा...आह्ह्ह्हह
और 10 से 12 झटको के बाद, मैंने कुछ ऐसा सुना जिससे मुझे अपने कान पर यकीन नहीं हुआ,
यह क्या मम्मी ने "चोद" कहा. क्या यह मेरी वही माँ है जो बहुत संस्कारी होने के साथ-साथ पतिव्रता भी थी और आज मुझे चोदने को कह रही है.
मैं: आअह्ह्ह्ह...मम्मी थोड़ा जोर से... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...बेटा..
.चोद मुझे...चोद अपनी माँ को...ऊऊह्ह्ह्ह मैं: ओ...हां माँ...देखो आपका बुर चोद रहा हूं... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...ओहो
... मेरा बुर...आअह्ह्ह्ह...कैसा है बेटा... मैं: आपका बुर तो जन्नत का रास्ता है मेरी माँ... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...मेरा बुर...चोद...ओहो...
मम्मी के मुंह से बोले हुए गंदे शब्दों ने और मेरा उन शब्दों का जवाब देने की वजह से मम्मी भी अपने चरम सुख के सीमा की आखरी सीढ़ी चढ़ चुकी थी और मैं भी उसके साथ सुर में सुर मिला रहा था. उसने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे दोनों गांड पड़कर अपनी चूत में दबाने लगी. चार-पांच झटके और हम दोनों पानी पानी हो गए.
हम बहुत थक गए थे मैंने मम्मी को पानी पिलाया और पूरा बिस्तर भी गीला हो गया था हम दोनों के तरल वीर्य निकलने से.
मम्मी: अब चले? मैं: अभी कहां,अभी तो दो ही घंटे हुए हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) मतलब मानेगा नहीं... राहुल बिस्तर बदलना होगा. मैं: रुको मैं बोल कर आता हूं मैनेजर को. मम्मी: मैं बाहर चली जाती हूं. मैं: नहीं घबराती क्यों हो यही रुको ना. मम्मी: वो यह सब देखेगा तो क्या सोचेगा? मैं: ओ मम्मी उसे पता है यहां सब क्यों आते हैं. मम्मी: चड्डी तो पहन लेने दे.
मम्मी ने कपड़े पहने और मैं फिर मैनेजर को बुलाने गया.
आदि: काम हो गया? मैं: अभी कहां अभी तो शुरू हुआ है. बिस्तर बदल दो खराब हो गया है. आदि: फिर भी अभी काम बाकी है? मैं: तुम होते तो दो घंटे में मान जाते क्या? आदि: नहीं यार. वो आंटी को तो मैं पूरा दिन रात चोदता रहूं. मैं: कहने की बात है, उसके सामने टिक नहीं पाओगे. आदि: तुम्हारी बात भी सही है. मैं: कुछ खाने को भी मंगा दो.
जैसे ही वो बिस्तर बदलने रूम में आया, मम्मी सावधान होकर खड़ी हो गई. उसकी आंखों में शर्मिंदगी था अपनी इज्जत को लेकर. आखिर दो जवान लड़के एक ही कमरे में उसके साथ खड़े थे जहां वो चूदी थी.
उसके जाते ही मम्मी ने राहत की सांस ली और फिर हमने हल्का-फुल्का नाश्ता किया.
मम्मी: शाम के 5 बज चुके हैं कब चलना है वापस? मैं: एक राउंड और करते हैं ना फिर चलेंगे. मम्मी: तूने तो मेरे बुर को ही थका दिया है. मैं: अच्छा आओ अब प्यार से धीरे-धीरे करते हैं.
मम्मी को फिर से एक बार नंगा करने के बाद इस बार दोनों चूचियों को सहलाना शुरू किया.
और फिर उसे बारी-बारी से चूसने लगा. वो भी में मेरे सीने पर चूम रही थी और बीच-बीच में निप्पल को चाट रही थी. कुछ देर की चुम्मा-चाटी के बाद इस बार मैंने मम्मी को पीछे घुमार अपनी बाहों में भरा. घुमा देने के बाद गांड के तरफ से उसकी एक जांघ को उठाकर अपने लंड को घुसाया. पहले की तरह नहीं लेकिन इस बार प्यार से धीरे-धीरे पूरी अंदर गहराई तक अपने लंड से उसके चूत को टटोलने लगा.
मम्मी को यह काफी आरामदायक और कामुक लग रहा था. उसने भी आह भरना शुरू कर दिया.
मैं: माँ क्या मैं आपके बुर को अच्छे से चोद रहा हूं ना.
मम्मी: इश्श्श्श...हां बेटा...
मैं साथ-साथ उसके गले को भी चूमने लगा और एक हाथ से उसके चूचि को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से चूत के दाने को सहला रहा था. और इन सब के साथ घपा घप लंड से उसकी चूत के सुरंग में अंदर तक चोद रहा था.
जिस तरह संगीता की चूत मुझे रोक रही थी अंदर डालने से, लंड को चारों ओर से पड़कर. मम्मी की चूत उससे बिल्कुल अलग था, क्योंकि पकड़ता तो मम्मी का चूत भी था मेरे लंड को. लेकिन बड़े प्यार से और जब मेरा लंड अंदर जाने की कोशिश करता तो वो उसे और अंदर आने की इजाजत देता था.
मैं: आज पहली बार ऐसा लगा जैसे आपने मुझे खुलकर अपना लिया हो. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) हो सकता है. मैं: खुलकर बोलो ना. मम्मी: आखिर सेक्स किसे अच्छा नहीं लगता. और वो भी जब उसका अपना बेटा ही चोद रहा हो. मैं: तो फिर आपने पहले इंकार क्यों किया था? मम्मी: क्योंकि मेरी भी तो इज्जत है ना बेटा और यह समाज. और एक चीज जो मुझे रोकती है वो है तेरे पापा. मुझे बहुत अजीब लगता है जब तुझसे सेक्स करते वक्त मुझे उनकी याद आ जाती है. क्योंकि मैं उनको धोखा दे रही हूं.
ऐसी खट्टी मीठी बातों के बीच चूदाइ का सिलसिला जारी था. मेरा लंड लगातार मध्यम रफ्तार उसकी चूत को गपा- गप चोदते जा रहा था.
मैं: अच्छा मेरी बात सुनो, मैं जानता हूं कि हम यह गलत कर रहे हैं. लेकिन एक माँ बेटा से पहले हम एक औरत-मर्द भी तो है. शरीर की कुछ ज़रूरतें होती है, और अगर वो घर में ही पूरी हो जाए तो उसमें क्या बुराई है? और किसी को पता थोड़ी ही चल रहा है. मम्मी: तेरा कहना तो ठीक है... पर. मैं: पर बर कुछ नहीं. बस अभी मेरे बाहों में आप ऐसे ही सुकून से रहो और हम दोनों एक दूसरे में खो जाए.
मेरी यह बात सुनकर, उसने भी कुछ कहना बंद कर दिया और मैं भी अपना मुंह बंद कर लिया और बस गहरी सुरंग की चूदाइ चालू थी. उसकी चूचियों को और हाथों से सहलाने लगा जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए. चूत भी गीला होकर पानी छोड़ रहा था और मेरा लंड उसकी गीले दलदल में अंदर बाहर फिसलता जा रहा था.
मम्मी: उम्म्... हां बेटा ऐसे ही...मम्म्म...ऐसे ही...ओह... मैं: मजा आ रहा है मम्मी... मम्मी: (हाँफते हुए)हां बेटा...मम्म्म...कैसी लगती है मम्मी तुझे? मैं: ओह...आप सबसे बेस्ट हो...
चोदते चोदते कब चार घंटा पूरा हो गया पता ही नहीं चला.
मम्मी: बेटा टाइम हो गया है. जल्दी-जल्दी कर...
तो मैंने फिर से एक बार अपने आप को उसके दोनों जांघों के बीच रखा और लंड को अंदर घुसाकर चूत को जबरदस्त तरीके से चोदने लगा और साथ ही साथ उसके दोनों चूचियों को पकड़ के दबाने लगा.
ऐसे ही लंड और चूत के घर्षण से हम दोनों फिर एक बार जोर से कराहते हुए चर्मसुख तक पहुंच गए और कुछ मिनट तक एक दूसरे के मुंह पर ही सांस छोड़ते रहे. बाद में मम्मी ने पीठ थपथपाया और चुम्मा देकर उठने को कहा.
मम्मी: जल्दी चल नहीं तो तेरे पापा भी आ जाएंगे उनका आने का टाइम हो गया है. मुझे नहीं देखेंगे तो फिर फोन आना शुरू हो जाएगा उनका.
मैं भी मम्मी का कहना मानकर तुरंत उठ खड़ा हुआ घर जाने के लिए. रास्ते में जाते वक्त मम्मी ने कुछ हरी सब्जियां ली और संगीता के लिए बर्गर. वैसे तो हमें कुछ लेना नहीं था क्योंकि हम कोई मार्केट करने तो नहीं निकले थे. लेकिन कुछ तो चाहिए था बहाना बनाने के लिए. शुक्र था पापा के आने से पहले हम घर पहुंच चुके थे. संगीता बैठकर टीवी देख रही थी.
संगीता: इतना लेट कैसे हो गया? मैं: वो रास्ते में मोटरसाइकिल बिगड़ गया था उसे ठीक करने में इतना टाइम लग गया. संगीता: ओह... मम्मी, सब्जी क्या बनाना है? मम्मी: रुक जा पापा से पूछ लेते हैं उनका क्या मूड है.
मुझे पता था संगीता को कल रात बहुत तकलीफ हुई थी और आज तो मम्मी ने भी लॉज में काफी मेहनत की थी.
मैं: क्यों ना आज हम सब बाहर खाने चले. संगीता: हां यह अच्छा आईडिया है. मम्मी: अच्छा रुको पापा से कह देती हूं. संगीता: नया सनशाइन रेस्टोरेंट खुला है ना, क्यों ना वहां का खाना ट्राई किया जाए.
मैं: हां हां चलते हैं मजा आएगा बहुत दिन हो गए ऐसे भी साथ बाहर गए हुए. संगीता: क्या भैया अभी तो मामा के यहां गए थे तो कितने बार तो हम बाहर जा चुके. मैं: मेरा मतलब वो जाना नहीं अपने परिवार के साथ जाने की बात कर रहा हूं.
फिर क्या था पापा भी घर आ गए थे और हम सब तैयार होकर रेस्टोरेंट के लिए निकल गए. हम सब में खाने का लुत्फ उठाया और हंसी मजाक करते हुए एक दूसरे के मन को हल्का किया. वाकई में खाना लाजवाब था सनशाइन रेस्टोरेंट का. और मेरी खुशी का तो ठिकाना नहीं था. क्योंकि मेरे पास तो दुनिया की सबसे बड़ी दौलत हाथ लग गई थी, मेरी माँ और बेहन.
देर रात हम सब घर लौटने के बाद थके हारे सोने चले गए. लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां... मुझे तो अभी नई नवेली पत्नी की तरह मेरी बेहन मिली थी जिसकी कुंवारी चूत के सील को कल ही मैंने तोड़ा था. क्या कसी हुई चूत थी. पिछली रात की तरह इस रात भी वो शर्मा रही थी लेकिन उसका अंदाज थोड़ा बदला बदला हुआ था.
संगीता: भैया जो हम कर रहे हैं क्या वो सही है? क्योंकि मैंने आज तक कभी ऐसा नहीं सुना की भाई बेहन का रिश्ता रोमांस में बदल जाए. मैं: तुम्हें एक बात बताऊं, यह आजकल बहुत नॉर्मल है. संगीता: आप झूठ बोल रहे हो, ऐसा भी कभी हो सकता है भला? मैं: क्यों नहीं है यकीन. संगीता: नहीं है, मैं कैसे मान लूं?
मैंने तुरंत अपना फोन उठाया और भाई बेहन वाले पॉर्न वीडियो लगा दिया. जब वो वीडियो शुरू हुआ तब तो सब कुछ नॉर्मल था. लेकिन जैसे ही कहानी रोमांस की तरफ बढ़ने लगी, किसिंग सीन देखकर संगीता ने मेरी हथेली को अपने हाथों में पकड़ लिया. लेकिन जैसे ही दोनों के नंगे होकर चूदाइ वाला सीन आया, यह देख संगीता की आंखें बड़ी हो गई. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इस तरह के अश्लील वीडियो भी होते हैं. वो भरोसा नहीं कर पा रही थी कि वाकई में वो अकेली नहीं है. ऐसे भाई बहन भी हैं जो आपस में प्यार करते हैं. यह देख उसने दांतो तले होंठ दबा लिया.
मैं भी देर ना करते हुए फोन को साइड में हटाया और उसे अपनी बाहों में भरकर चूमने लगा. उसके वही मुलायम रसीले होठों ने कल रात की याद ताजा कर दी.
मैं: (धीरे से उसके कान में) अब क्या हाल है चूत का? संगीता: क्या कहूं, बहुत जलन हो रहा है टॉयलेट करते वक्त. मैं: आओ मैं आराम दिला देता हूं. संगीता: (हल्की मुस्कुराहट के साथ) अच्छा, वो कैसे?
तभी मैंने उसे धीरे से बेड पर सुलाया और उसके होठों, कानों, गले को और कंधे को छटना और चूसना शुरू कर दिया. उसे भी अब अच्छा लगने लगा फिर धीरे-धीरे उसकी चूचियों को ऊपर से ही मसाले लगा उसकी भी गर्म सांसे मेरे मुंह पर छूटने लगी.
संगीता: और कौन सा जादू आता है आपको? मैं: देखना है? संगीता: हां.
उसके हां कहते ही मैं उसे गुदगुदी करने लगा और वो हंस पड़ी. जब उसकी हंसी शांत हुई, हम दोनों ने एक दूसरे को नशीली निगाहों से देखा. मेरा हाथ उसके शॉट पैंट को नीचे की तरफ खींच रहा था. यह देख उसने हाथों से अपनी आंखें छुपा ली और शर्म से जांघे दबाने लगी. मैं भी उसके नाभि के हिस्से को सहलाना शुरू किया जिससे उसके तन बदन में आग लगना फिर से शुरू हो गया. धीरे-धीरे जांघों को ढीला छोड़ दिया उसने तभी उसके कमर के नीचे हाथ लगाकर उसके शॉट पैंट ढीला करते हुए उसके पैंटी को भी सरका दिया, जिससे उसकी वो मासूम गुलाबी चूत का नजारा मेरे आंखों के सामने आ गया.
उसकी चूत ने अपने होंठ बंद कर रखे थे, सिर्फ एक हल्की लकीर सी दिखाई पड़ रही थी जो खुलने का इंतजार कर रही थी. चूचियां संतरे जैसी बीच में छोटा सा निप्पल गुलाबी रंग का मेरा तो रोम रोम खड़ा हो गया. आप खुद ही अंदाजा लगाइए मेरा क्या हाल हुआ होगा उस लड़की को कल रात चोद कर.
मुझे रहा नहीं गया, मैंने अपना मुंह फिर से उसके चूत की तरफ बढ़ाया उसे चाटने के लिए और अपनी बेहन का स्वाद फिर से चखने लगा. उसका स्वाद वैसा ही नमकीन और नशीला था. जब जीभ को उसकी चूत के दाने पर चलाना शुरु किया उसकी सिसकारियां निकलने लगी.
संगीता: आह्श्श्श्श...भैय्याआआ... मैं: अब तो जलन कम हो गया ना? संगीता: आह...हां...भैया ऐसे ही...
अपनी मध्यमा उंगली उसकी चूत के दरार पर रखता हुआ मैं दूसरी उंगली का सहारा लेकर उसकी होठों को फैलाया. फिर अपना पूरा जीभ निकाल कर उसकी चूत के छेद में घुसाने लगा. उसके पैरों में हलचल होना शुरू हो गया. मैं जीभ को अंदर बाहर करता रहा और वो भी खुलकर मजा लेने लगी, आखिर उसकी चूत की जलन थोड़ी शांत तो हो ही गई.
इधर मेरा लंड बेताब था उसे फिर से चोदने के लिए, इसीलिए मैंने भी अपने लंड को बाहर निकाल दिया. वो भी साथ दिखाते हुए उठकर मेरे लंड को पकड़ सहलाना शुरू कर दी.
संगीता: भैया मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मेरे हाथ में एक लंड है, वो भी अपने भाई का. मैं: किस्मत वालों को मिलता है संगीता यह.
उसने अपना कमर उठाते हुए मेरे लंड को चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया. उसकी गरम-गरम मुलायम चूत को महसूस कर मेरे बदन में जैसे चीटियां कटने लगी, लंड का तनाव पूरी तरह बढ़ चुका था. जैसे ही मैंने उसके पैर को फैलाते हुए लंड अंदर डालने की कोशिश की वो मुझे रोकने लगी. उसे कल रात का डर अभी भी सता रहा था.
संगीता: भैया बहुत दर्द होता है, रहने दो. मैं: अब थोड़ी होगा अब सब कुछ ठीक है. संगीता: नहीं-नहीं आपका बहुत मोटा है, कल मेरे अंदर गया था तो जैसे जान ही निकल गई थी. मैं: गुड़िया कल पहली बार था पर आज तुम्हारी चूत इस लंड को अपनाने के लिए तैयार है.
यह आश्वासन देते हुए, मैंने अपने लंड को उसकी चूत की रस से गिला करके अंदर डालने लगा. धीरे-धीरे लंड थोड़ा आगे बढ़ता गया, उसकी सांसे फिर से हल्की थम सी गई. वो अभी भी बहुत कसी हुई थी. कल जैसा तो नहीं पर लंड की चौड़ाई लंबाई को वो महसूस कर रही थी. अभी भी उसकी चूत काफी तंग थी, लंड को घुसने का रास्ता नहीं मिल रहा था.
संगीता: भैया बोला था मैंने, थोड़ा दर्द हो रहा है फिर से. मैं: एक काम करो मुझे थोड़ा तेल दो, तुम्हारी चूत को बहुत चिकनाई की जरूरत है.
उसने ढूँढते हुए ड्रॉअर से मुझे नारियल तेल दिया. मैंने उसे बेड का सहारा लेते हुए झुकने को कहा और पीछे की तरफ से तेल उसकी चूत में मसलने लगा. उसकी मखमली मुलायम चूत पूरी तरह तेल से सनी हुई थी.
फिर अपने लंड को चूत पर टीकाते अंदर की तरफ धक्का देने लगा और धीरे-धीरे फिसलन के कारण लंड भी उसकी चूत के मांसपेशियों को चौड़ा करता हुआ अंदर तक घुस रहा था. संगीता इस मीठे दर्द का एहसास कर सकती थी, उसके लिए थोड़ा अलग था. यह उसकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा खुशी पाने का अनुभव था. उसकी सिसकारियां अब आह में बदल गई.
संगीता: आह...भैय्या…..आअह्ह्ह्ह…..आअह्ह्ह्ह. मैं: मज़ा आ रहा है मेरी रानी को? संगीता: हां...भैया...मम्म्म...आह...
मैं उसके मीठे दर्द का एहसास खराब नहीं करना चाहता था. लेकिन अभी तक तो मैंने मध्यम रफ्तार भी नहीं पकड़ी थी और लंड अभी भी पूरा अंदर घुसना बाकी था. इसलिए मैं उसके कान के पास गया और उसके कान को चुमने लगा. क्या फूलों जैसी खुशबू थी उसके बालों की और उसके बदन की.
जब वो चुंबन और लंड का मज़ा एक साथ ले रही. तभी मैं थोड़ा तेजी बढ़ाते हुए और धक्का लगाते हुए अपने लंड को अपनी छोटी बेहन की चूत में पूरे अंदर तक पेल दिया.
संगीता: आआह्ह्ह्ह!!! भैया… और दर्द… हो रहा है...उफ्फ़… मैं: शांत हो जा मेरी जान… मेरी गुड़िया... थोड़ा दर्द सह लो, सब अच्छा हो जाएगा... संगीता: आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!!बस…बस्… और नहीं आह्ह्ह… मैं सह नहीं पा रही… बहुत दर्द… हो रहा है.
चूत की अंदरूनी दीवारें बुरी तरह खिंच चुकी थीं लंड का सुपाड़ा बच्चेदानी के मुंह पर ठोकर मार रहा था.
मैं: तुम्हारी चूत मेरे लंड को पूरा अंदर ले रही है… तुम बहुत टाइट हो… बहुत हिम्मती हो …बस आखिरी थोड़ा सा… फिर दर्द कम हो जाएगा और मजा आएगा… मैं तुम्हारा भैया हूँ… डरो मत…
धीरे-धीरे दर्द की तीव्रता कम होने लगी और उसकी जगह एक गहरी, भारी कामुकता ने ले ली. अब संगीता का दर्द कम हो गया था और उसे मजा आने लगा. मेरी भी गति धीरे-धीरे बढ़ी, पूरा लंड अब अंदर-बाहर होने लगा. संगीता की चूत पूरी तरह फैल चुकी थी और अब उसकी चिकनी, गीली, तंग दीवारें मेरे लंड को जकड़ रही थीं.
हर धक्के पर संगीता की छोटी चूत का मुंह बाहर निकलता, फिर अंदर चला जाता. हम दोनों की सांसें एक हो गईं. कमरे में चूत की गीली “पच-पच-पच” आवाज, संगीता की कामुक सिसकारीयां और मेरी गुर्राहट थोड़े मध्यम आवाज में गूंज रही थी क्योंकि बाहर मम्मी पापा भी तो थे.
तब मैं उसकी चूचियों को पकड़ कर जोर जोर से चोदने लगा. उसका चूत भी पानी छोड़ने लगा. अब कमरे में सिसकारियों के साथ शरीरों के टकराने की आवाज़ और गीली चुदाई की छप-छप की आवाज रह गई थी. संगीता के साथ ही मैं भी चरम पर पहुंच गया और हम दोनों एक साथ झड़ गए. अपना लंड बाहर खींच कर पूरा वीर्य उसकी गांड पर गिरा दिया. हम दोनों के पैरों में अब जान नहीं बची थी कि हम और देर खड़े रह पाए. संगीता ने जल्दी से अपने गांड पर गिरे हुए वीर्य को पोछा. कल रात की तरह कोई गलती ना हो जाए इसीलिए संगीता ने समझदारी दिखाते हुए बेडशीट बदल दिया और मेरे साथ बिस्तर पर गिर गई.
हम देर तक एक-दूसरे से चिपटे रहे. मैं संगीता को चूमता रहा.
संगीता: भैया… यह दर्द और मजे का मिश्रण… मैं कभी नहीं भूलूंगी.
हम दोनों पसीने से भीगे नंगे ही एक-दूसरे की बाहों में सो गए.