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आखिरकार हम अपने घर आ ही गए. मामा जी के घर का यात्रा बहुत रोमांचक रहा इस बार. एक चीज मैं जरूर याद करूंगा और वो था हर रात मम्मी के साथ सुकून से उसकी चूदाइ करना. लेकिन यहां किस्सा उल्टा था, यहां मुझे संगीता के साथ सोने का मौका मिलता है ना की मम्मी के साथ. हालांकि मैं मम्मी का दीवाना हूं लेकिन संगीता के लिए वासना भी अब मुझ में कूट-कूट कर भरती जा रही है. आखिर बेहन को चोदने का मौका मिले तो कोई कैसे पीछे रह सकता है. वहां तो उसने मेरे हाथ लगाते ही मुझे रोक दिया था पर अब मौका था उसे अच्छे से मनाने और बहलाने का.
शाम को पापा आए और नए शहर में उनके अनुभव के बारे में हमें बताया और साथ ही साथ एक खुशखबरी भी दिया कि उनका प्रमोशन हो गया है.
पापा: अगले महीने से हम अपने घर का काम शुरू कर सकते हैं बनाने का.
इस बात से हम सभी खुश थे.
मैं: और वो कार अपने लेने को बोला था उसका क्या हुआ? पापा: वो भी ले लेंगे थोड़ा सब्र रखो.
हमेशा की तरह हमने साथ खाना खाया. क्योंकि मम्मी के साथ अभी खेल खेलना मुश्किल था. लेकिन मैं भी उसे छोड़ नहीं सकता था. खाने के बाद मैंने बहाना करते हुए उसे बुलाया पीछे आंगन में.
मैं: मम्मी मेरे गाड़ी की चाबी नहीं मिल रही है आपको मालूम है क्या? मम्मी: तूने रखा होगा ना मुझे कैसे पता. जाकर पीछे देख ले कहीं गाड़ी में तो नहीं लगा है.
मम्मी ने आते ही मेरी मुस्कुराहट का अंदाजा लगा लिया था कि मैं क्या चाहता हूं.और कहने लगी,
मम्मी: देख अब इन चीजों पर बहुत कंट्रोल रखना होगा. मामा का घर नहीं है, तुझे तो पता ही है इस छोटे से घर में संगीता हमेशा रहती है आंखों के सामने और रात को तेरे पापा. मैं: अभी तो आ जाओ, यहां कोई नहीं है. मम्मी: पागल हो गया है, समझाने पर भी नहीं समझता है. मैं: बस एक बार-एक बार.
कहकर मैंने उसे अपनी बाहों में भरते हुए चूमना शुरू कर दिया और साथ ही चूचियों को भी मसलने लगा.
वो बीच-बीच में बोलती रही,
मम्मी: छोड़ना, कोई ना कोई आ जाएगा फंस जाएंगे बात समझ. बस हो गया. मैं: कैसे बताऊं आपको मम्मी आपके बिना रह नहीं पाता हूं. मम्मी: मेरे बिना या फिर मेरे उसके बिना? मैं: उसके मतलब? मम्मी: चल छोड़ जाने दे. मैं: बोल भी दो. मम्मी: तेरा मन तो मेरी बुर में लगता है. मैं: उसमें तो लगता ही है पर आप में भी लगता है. मम्मी: हो गया-हो गया बस चल अभी यहां से.
हम दोनों अंदर गए, मम्मी पापा के साथ सोने हॉल में चली गई और मैं कमरे का दरवाजा बंद करके संगीता के पास. मेरे दरवाजा बंद करते ही संगीता सावधान हो गई और उसका सावधान होना भी जरूरी था. क्योंकि अब तक तो हम सिर्फ चुम्मा-चाटी का खेल खेलते रहे मामा के घर पर. यह वो लम्हा था जैसे एक पति अपनी नई नवेली दुल्हन के पास आता है दरवाजे को बंद करके.
मेरे पास पूरा रात था अपनी बेहन को समझाने और प्यार मोहब्बत के लिए. मुझे देख वो शर्माती हुई उसने अपनी नजर नीचे झुका लिया, पैरों को मोड़ लिया और सोने का नाटक करने लगी. यह बिल्कुल भी डर का माहौल नहीं था बल्कि संगीता बेहद शर्मसार थी इन घटनाओं से जो हम दोनों के बीच घटित हुआ इसीलिए ऐसे मौके पर वो हिम्मत नहीं कर पा रही मुझसे नज़रे मिलाने की. मैं भी उसके पैरों के पास जाकर बैठा.
मैं: क्या हुआ संगीता नाराज हो क्या?
उसका कोई जवाब नहीं आया. मैं यह सोचकर परेशान था और किस तरह से शुरुआत की जाए क्योंकि वहां तो संगीता थोड़ा बहुत मेरे रंग में रंगने लगी थी. लेकिन यहां अचानक ऐसा क्यों कर रही है. कम से कम बात तो करें.
पर मैं शायद थोड़ा अंधेरा होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाया. मैं उठा और मैंने रूम का लाइट चालू किया. फिर से संगीता के पास जाकर बैठा तो देखा उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी. वो बहुत ज्यादा शर्मा रही थी. मैंने उससे कुछ बातें करना शुरू कर दिया कि वो थोड़ा हल्का महसूस कर सके. उसकी ऐसी प्यारी मुस्कान को देख मैंने भी अपना हाथ आगे बढाकर उसके गालों को प्यार से चिकोटी भरा.
मैं: अच्छा एक बात बताओ, कभी कोई लड़का तुम्हारे पीछे पागल हुआ है? संगीता: बहुत थे लेकिन मैंने किसी को भाव नहीं दिया. मैं: ऐसा क्यों? संगीता: अपनी और परिवार की इज्जत… आप जानते हो ना? एक बार अगर कहीं बदनामी हो गई तो फिर क्या होगा. मैं: मेरी गुड़िया तुम तो बहुत समझदार हो. अच्छा तुम्हें कैसा लड़का चाहिए बताओ? संगीता: (दबी हुई आवाज में) आपके जैसा जो मुझे प्यार करें पर मुझे शर्म आती है. मामा जी के घर जो कुछ भी हमारे बीच हुआ, उससे पहले तो मेरा और आपका रिश्ता कुछ और ही था ना. मैं: शरमाती क्यों हो? प्यार की कोई सीमा नहीं होती.
यह कहकर मैंने उसे बाहों में जकड़ लिया.
संगीता: आपकी गर्मी से तो मैं गर्म हो जाती हूं.
मैं भी उसके होठों को चूमना शुरू कर दिया.
मैं: और तुम्हारे गुलाबी होंठ मुझे बेचैन कर देते हैं.
उसके मुंह से हल्का संतरे का स्वाद आ रहा था क्योंकि कुछ देर पहले उसने संतरे का जूस पिया था. वो बहुत रसीली लग रही थी.
और फिर धीरे-धीरे अपने हाथ को उसके स्तनों पर ले जाकर टिका दिया. यह देख उसने धीरे से मेरे कान में कहा,
संगीता: आपने पहले कभी इसे देखा है?
संगीता बहुत अनजान थी, मैंने भी उसे झूठ बोल दिया क्योंकि मेरे दिल की धड़कन बहुत तेजी से धड़क रहा था पहली बार उसकी चूचियों को देखने के लिए.
संगीता: आपकी धड़कन कितनी तेज हो रही है. मुझे भी अजीब सा अच्छा लग रहा है.
अब और नहीं, मैं अपने हाथ से उसके टॉप को थोड़ा ऊपर उठाया. उसने नीले रंग की ब्रा में अपनी चूचियों को छुपाए रखा था. यह देख वो भी अचंभा रह गई.
संगीता: शांत मेरे भैया मैं दिखाती हूं.
मैं उस पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि संगीता अपने हाथों से खुद मुझे अपनी चूची दिखाने जा रही थी. उसने पीछे हाथ डालकर अपना ब्रा का हुक खोल दिया और बाहों से ब्रा की पट्टी को निकलती हुई अपनी चूचियों को मेरे सामने रख दिया. मेरा तो देख कर बुरा हाल था की क्या यह मेरी वही बेहन है.
मेरी हथेलियां उन चूचियों पर फैल गईं. मैं धीरे-धीरे उन्हें सहलाने लगा, मसलने लगा, दबाने लगा. संगीता की सांसें तेज हो गईं. मेरी मजबूत बांह संगीता की कमर के चारों ओर लिपटी हुई थी. उसका का सिर मेरे सीने पर टिका था. यह घटना हम दोनों के अंदर आग सुलगा रही थीं.
संगीता: (नशीली आवाज में) भैया…
उसकी उंगलियां मेरे छाती पर घूम रही थीं.
मैं: मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. तुम्हारी यह नरम त्वचा, सांसों की महक… सब मुझे दीवाना बना रहा है.
शर्म से उसने अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया.
मैं: तुम्हारी आंखें कितनी भोली हैं, लेकिन आज इनमें आग है. एक प्यास दिख रही है बताओ ना, तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हें वो सब दूंगा जो चाहिए. संगीता: मुझे प्यार करो भैया...
मैं फिर से उसका चेहरा दोनों हाथों में थामा और धीरे-धीरे अपने होंठ उसके गुलाबी होंठों पर रख दिए. संगीता सिहर उठी. फिर धीरे-धीरे उसके निचले होंठ को हल्के से काटा, संगीता ने आह भर दी और मेरे होंठों को चूसने लगी. हमारी जुबानें मिलीं, नाचने लगीं. कमरे में सिर्फ हमारी सांसों और होंठों के चुस्कियों की आवाज गूंज रही थी.
संगीता: उम्म्म… भैया… मेरे होठों को आप से पहले किसी ने नहीं चूमा है आप पहले हो.
उसके गुलाबी निप्पल्स कड़े हो चुके थे. मैंने उसकी चूची को अपने हाथ से सहलाया और अपने चेहरे को उसकी चूची के पास ले जाते हुए अपने जीभ से जैसे छुआ, संगीता कांप उठी.
संगीता: सी…सी… आह…भैया...
निप्पल को दांतों से हल्का-हल्का काटने लगा. संगीता ने मेरा सिर पकड़कर अपनी छाती से चिपका लिया. मैं
उसकी चूची को जोर-जोर से पीने लगा और दूसरी चूची को जोर-जोर से दबाने लगा संगीता मजे से सिसकारियां भर रही थी.
संगीता: आह्ह्ह… भैया… आपकी उंगलियां…
मैं दूसरे चूची पर भी वैसा ही प्यार बरसाने लगा. कभी चूसता, काटता, जुबान से घुमाता. संगीता की चूचियां लाल हो गईं. फिर मैं नीचे की ओर सरक गया. मेरी जुबान उसकी नाभि तक पहुंची और नाभि को चूसने लगा, चाटने लगा, चुमने लगा. संगीता तड़प से मचल रही थी.
तभी मैंने सही वक्त देखकर उसकी पैंटी की इलास्टिक में उंगली फंसाई और उसकी पैंटी और पैजामा सहित नीचे खींचने लगा. उसने भी अपना हाथ बढ़ा कर अपनी पैंटी को पकड़ने की कोशिश पर शायद वो भी नहीं चाहती थी कि मैं रुकूं, उसकी उंगलियां ढीली पड़ने लगी.
पैंटी के थोड़ा नीचे सरकते ही मेरी सांसे थम सी गई. मैं अपने आप पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि मैं इस हद तक आगे बढ़ चुका हूं की अपनी माँ की चूत जो की नामुमकिन था, उसे हासिल करने के बाद अपनी बेहन की चूत के इतने करीब हूं. बिना बालों वाली, गुलाबी, कुंवारी चूत सामने आई. पूरी तरह साफ, छोटी-सी, और अब थोड़ी नम हो चुकी थी. उसकी खुशबू – कामुक, जवान लड़की की – कमरे में फैल गई. उसका दाना सख्त होकर उभरा हुआ था. उसका रस चमक रहा था.
मेरी भोली संगीता को शायद जरा भी अंदाजा नहीं था की चूत को चाटा भी जाता है. जैसे ही मैंने अपना होंठ उसकी चूत पर रखा,
संगीता: भैया नहीं, क्या कर रहे हो? वो गंदा होता है. मुंह हटाओ उधर से.
यह सुन मैं तुरंत उसके चेहरे के पास जाकर बोला
मैं: तुम्हारा कुछ भी मेरे लिए गंदा नहीं है मेरी गुड़िया.संगीता: भैया पर वहां से टॉयलेट करते हैं. मैं: तुम आंखें बंद करो और सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो. संगीता: नहीं भैया मैं आपको इस तरह से नहीं देख सकती. मैं: मेरी प्यारी, इतना प्यार करती हो मुझसे. संगीता: मैंने हमेशा आपकी इज्जत की है आप सोचिए मुझे कैसा लगेगा कि आप मेरे सामने ऐसे झुकें वो भी वहां जहां से मैं पेशाब करती हूं.
चूत को चटना कामवासना का एक भाग है यह संगीता के समझ में नहीं था. हो सकता है कि उसे शायद और भी चीज पता नहीं हो. मुझे अब काफी संभाल कर उसे हर एक चीज का एहसास दिलाना जरूरी था.
मैं: शांत हो जाओ, तुम्हारा भाई जानता है कि तुम्हारे लिए क्या सही है. मुझ पर भरोसा करती हो? संगीता: हां भैया. मैं: तो अपनी आंखें बंद कर लो और दिमाग को शांत करो.
उसने मेरा कहना माना और अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. मैं फिर से एक बार तैयार था उसकी उड़ान को ऊंचाई की ओर ले जाने को.
मैंने अपनी जीभ उसकी कुंवारी चूत पर रखी और धीरे-धीरे चाटना शुरू किया. उसकी चूत का स्वाद हल्का नमकीन और उत्तेजक था. मैंने उसकी फाँकों को जीभ से अलग किया और उसके दाने को चूसने लगा.
संगीता: आह्ह… ओह्ह… भैया… ये तो… आह्ह…
मैंने देखा उसकी आवाज थोड़ी तेज हो रही है कहीं बाहर मम्मी पापा को कुछ भनक न लग जाए, चूत को चाटते वक्त अपने हाथ को आगे बढ़ाते हुए मैंने अपनी एक उंगली को उसके मुंह में रख दिया तुरंत उसे चूसने लगी.
संगीता: उम्म्म्म्म....
वो अपने गांड को हिलाने लगी, और मैंने अपनी जीभ को उसकी चूत के अंदर तक डाला और जीभ से चोदने लगा. अपनी ऊंगली उसकी मुंह से निकाल कर उसी की चूत में घुसा दिया. संगीता की टाइट कुंवारी चूत की खुरदरी चिकनी दीवारें उंगली को जकड़ रही थीं. मैं उंगली अंदर-बाहर करने लगा, जीभ से उसका दाना चूसता रहा. संगीता का शरीर थरथरा रहा था और उसकी खुशबू और भी तेज हो गई थी. जिसने मेरे लंड को सातवें आसमान पर ला खड़ा किया. उसका रस मेरे मुँह में मिश्री की तरह घुल रहा था, और मैं उसे चाट-चाटकर साफ कर रहा था। मैंने उसकी गांड के नीचे हाथ डाला और उसे थोड़ा ऊपर उठाया ताकि उसकी चूत मेरे मुँह में और गहराई तक जाए.
संगीता: आह्ह… भैया… उफ्फ…
मैंने अपनी मध्यमा उंगली उसकी दरार पर ऊपर-नीचे, और तर्जनी और अनामिका उंगली उसकी योनि के बाहरी हिस्से पर फेरनी शुरू कर दी. मेरा बायाँ हाथ उसके स्तनों को मसल रहा था और दायाँ हाथ उसके चूत के होंठों को चौड़ा करके फैला रहा था, उसके शरीर में मानो करंट लग रहा हो. मैंने अपनी मध्यमा उंगली अपनी छोटी बेहन की योनि में गहराई तक डाल दी अचानक हुए इस प्रवेश से वो सिहरने लगी,
मैंने अपने अंगूठे से उसकी चूत के ऊपरी हिस्से को सहलाना शुरू किया, और अपनी मध्यमा उंगली उसकी मीठी चूत में अंदर-बाहर करने लगा. वो अविश्वसनीय रूप से गर्म, कसी हुई और गीली थी.
अब मैं उसे चोदने के लिए बेताब हो चुका था. वो मेरे सामने नंगी लेटी हुई थी. मैं भी उसकी चूत से मुंह हटाता हुआ थोड़ा उठा और अपने लंड को अंडरवियर से आजाद करता हुआ उसकी आंखों के सामने ले आया.
लंड को देख उसकी आंखें आश्चर्य और भय से फैल गई.
संगीता: (कांपती हुई आवाज में) इतना बड़ा…भैया… यह क्या है? मैं: क्यों तुम्हें नहीं पता? संगीता: पता है पर मैंने पहली बार देखा है. सच में यह ऐसा होता है, कितना मोटा और बड़ा है. मैं: सोचो जब यह तुम्हारी चूत में जाएगा तब कैसा लगेगा? संगीता: (धीरे से फुसफुसाते हुए) नहीं भैया नहीं नहीं. आप क्या इसे अंदर डालने वाले हैं? मैं: यह चूत में ही तो डाला जाता है. संगीता: भैया मैं कैसे समझाऊं, मैं तैयार नहीं हूं इस चीज के लिए. मुझे बहुत डर लग रहा है. मैं: मुझ पर भरोसा रखो मेरी जान. कुछ नहीं होगा बस थोड़ा सा दर्द बर्दाश्त कर लो, सब ठीक हो जाएगा.
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए मेरे लंड का एहसास करने की कोशिश कर रही थी.
संगीता: कितना गरम और मजबूत है यह. मैं: तुम्हें अच्छा लगा?
यह सवाल सुनकर सुनकर वो शर्मा गई. तभी मैंने उसे चूमते हुए बिस्तर पर अच्छे से सुला कर,
मैं: संगीता, आज साथ दे दो मेरा.
उसका चेहरा यह सुनकर रोने जैसा हो गया.
संगीता: नहीं भैया, बहुत दर्द होगा. मैं: डरती क्यों हो? मैं हूं ना तुम अकेले नहीं हो. संगीता: भैया धीरे से करना प्लीज?
मैंने लंड को चूत के मुंहाने पर रगड़ा. संगीता काँप उठी, उसकी छोटी सी चूत के होंठों को खोलकर उसमें अपने लंड का सुपाड़ा फसाया और धीरे से दबाव डाला. मेरा मोटा लंड का सुपाड़ा संगीता की तंग, कुंवारी चूत में घुसा. वो जोर से कराही –
संगीता: आआआह्ह्ह… दर्द हो रहा है भैया…! मैं: शशशश...धीरे बोलो कोई सुन लेगा.
आधा इंच… एक इंच… लंड अंदर गया ही था कि संगीता की आँखों में आँसू आ गए. उसने मेरे पीठ पर नाखून गाड़ दिए. मैं भी उसके होंठों को चूमता रहा और उसके आँसू चाट कर बोला.
मैं: शांत हो जा मेरी जान… मैं तुम्हारा भैया हूँ… तुम्हें दर्द नहीं पहुँचाना चाहता हूँ.
यह सुन संगीता को थोड़ा राहत मिला. मैंने भी उसकी कमर पकड़ी और धीरे-धीरे दबाव डाला. मेरा लंड लगभग 2 इंच अंदर घुस गया था. दर्द की लकीरें संगीता के चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रही थी. मैंने धीरे से उसके माथे को चुमा. मैं अपने लंड को इस दो इंच में अंदर बाहर कर चोद रहा था. उसकी चूत ने मुझे पूरी तरह से जकड़ रखा था. जब और आगे बढ़ने की कोशिश किया तो मैंने देखा कहीं मेरा लंड फस रहा है. मैं समझ गया की यह मेरी बेहन की सील है पूरा मजा देने के लिए तोड़ना ही पड़ेगा और दर्द तो होगा ही.
उसको अभी दर्द नहीं देना चाहता था इसलिए वहीं रुक कर अपने तीन इंच लंड से धीरे-धीरे अंदर बाहर चोदता हुआ संगीता से बातें करने लगा.
मैं: चूत कितनी टाइट है तुम्हारी, बहुत मजा आ रहा है. तुम कैसा महसूस कर रही हो?
संगीता थोड़ा नॉर्मल हो गई थी और वो भी 2 से 3 इंच लंड को अपने चूत में अंदर बाहर चूदवाते हुए मजा ले रही थी. लेकिन उसे क्या पता अभी तो अच्छे से आधा लंड भी नहीं घुसा है.
संगीता: भैया, आह … बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसे ही धीरे-धीरे करते रहो. क्या आपने पूरा डाल दिया? मैं: अभी नहीं, अभी आधे से ही कर रहा हूं.
यह सुनकर वह चौंक गई,
संगीता: क्या अभी आधा ही गया है? मुझे तो अभी से रह रहकर दर्द हो रहा है. मैं: आगे तुम्हारी सील है जिसे तोड़ना है, बस एक बार थोड़ा सा दर्द होगा. क्या तुम तैयार हो? तुम यही चाहती थी ना की मैं तुम्हें प्यार करूं? संगीता: भैया आपका बहुत बड़ा है मुझे बहुत दर्द होगा. आप आराम से करना. मैं: बस एक बार और दर्द होगा. अपने भैया पर भरोसा रखो, चीखना नहीं वरना मम्मी पापा जग जायेंगे. संगीता: भैया मुझे बहुत दर्द होगा. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी, प्लीज आप धीरे से करना.
मैं और छोटे-छोटे धक्के लगाकर अब थोड़ा और अंदर घुसा दिया. संगीता की चूत की दीवारें बुरी तरह खिंच रही थीं, उसे लगा कि भैया का लंड उसकी चूत में छेद करता हुआ अंदर घुस रहा है.
संगीता: उफ्फ़… आह्ह्ह्ह… भैया… मैं मर जाऊँगी… बहुत जल रहा है… ऊं…ऊं…. आ..उई मां…. बहुत दर्द हो रहा है.
उसका पूरा शरीर पसीने से तर था. दर्द असहनीय था, लेकिन मेरा लंड अभी भी पूरा नहीं घुसा था.
मैं संगीता को बहला रहा था,
मैं: शांत मेरी जान… भैया है तुम्हारे पास डरो मत… बस थोड़ा और… मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ… मेरी बेहन…
मैंने थोड़ी देर उसकी चूचियों को सहलाया धीरे-धीरे मसला फिर निप्पल को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा उसका दिमाग भी थोड़ा शांत हो गया. तभी मैंने संगीता के कंधों को अच्छी तरह से पकड़ा और अपनी सारी ताकत इकट्ठा की धीरे से लंड को बाहर खींचा और पूरी ताकत से जोर का धक्का मारा.
अचानक एक झटके में पूरा लंड मेरी बेहन की चूत में सील तोड़ता हुआ अंदर बच्चेदानी तक घुस गया और इसके साथ उसकी सील टूट गई.
संगीता की चीख निकल गई – आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!! नहीं… आह्ह्ह्ह!!! बहुत दर्द… जल रहा है…!!!आआआह्ह्ह्ह!!! भैया… दर्द… बहुत दर्द… हो रहा है मैं मर जाऊंगी.
मैंने झट से उसके मुंह को दबा दिया की आवाज बाहर न जाए.
मैं: चुप... शशशश...चुप...हो जाओ, बस हो गया.
उसके आँसू बहने लगे. संगीता की चीख आज भी मेरे कान में गूंजती है. दर्द इतना तीखा और भयानक था कि जैसे कोई गर्म लोहे का सलाखा उसकी चूत में ठोंक दिया गया हो. उसकी सील के टूटने के साथ चूत से निकलते हुए खून ने मेरे लंड को भी रंग दिया.
वो तड़प-तड़पकर अपने नितंब हिला-हिलाकर लंड निकालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैंने उसे मजबूती से दोनों हाथों से जकड़ रखा था. यह बात तो मैं जानता था कि सिर्फ सील तोड़ना ही काफी नहीं है कुछ झटका और मारना जरूरी है तभी अगली बार के लिए वो तैयार हो पाएगी क्योंकि यह उसकी पहली चूदाइ है.
संगीता: भैया… प्लीज निकालो… मैं मर रही हूँ… आह्ह्ह… बहुत जलन… खून निकल रहा है…!
उसके आँसू लगातार बह रहे थे, होंठ काँप रहे थे. दर्द की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि संगीता का शरीर ढीला पड़ गया, बस हल्की-हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं.
मैंने अपना लंड बाहर नहीं निकाला और संगीता को धीरे धीरे चोदने लगा. उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. इसीलिए मैंने चार पांच धक्के और मारकर अपना लंड बाहर निकाल दिया.
मैं: क्या हुआ मेरी गुड़िया? अब तो दर्द नहीं हो रहा है ना? संगीता: (सीसकते हुए) बहुत जलन हो रहा है?
मैं: अच्छा रुको मैं कुछ करता हूं.
मैंने टेबल के ड्रॉ में से टिशू पेपर निकालकर उसकी चूत को अच्छे से साफ किया और थोड़ा नारियल तेल लगा दिया जिससे की जलन थोड़ा कम हो जाए. यह देख उसे थोड़ा अच्छा लगा. फिर उसे अपनी बाहों में भर उसके माथे को चूम कर उसे सुलाने की कोशिश करने लगा. वो कुछ भी नहीं बोल रही थी शायद यह उसके लिए एक सदमे की तरह था पर वो इस बात से निश्चिन्त हो चुकी थी कि उसका डर खत्म हो चुका है. आखिर में उसने भी अपना होंठ बढ़ाया और मेरे होठों को चुमा. उसके बाद चुपचाप मुझे पकड़ कर सो गई.
यह रात एक कयामत की रात थी क्योंकि मैंने आज अपनी बेहन को चोदा था और वो कोई आम चूदाइ नहीं बल्कि सील तोड़ने वाली चूदाइ थी. सच में यह मेरे लिए तीसरा चूत था लेकिन टाइट होने का इतना मजा मिलेगा मुझे पता नहीं, पर उस बेचारी के लिए तो यह काफी दर्द भरा रहा है.
अगले दिन संगीता ब्रश कर रही थी और मैं वैसे ही बेडरूम में लेटा था, मम्मी रूम में झाड़ू लगाने आई. हमसे एक बड़ी गलती हो गई कल रात सील तोड़ने के चक्कर में जो खून बेडशीट पर गिर गया था उसके धब्बे साफ दिख रहे थे. हम वो बेडशीट हटाना भूल गए. मम्मी की नजर उस पर पड़ गई.
मम्मी: संगीता इधर आना.
यह सुन मैं भी घबरा गया. लेकिन मैंने कोई गलत कदम ना उठाते हुए चुपचाप वैसे ही लेटा रहा आंख बंद करके. तभी संगीता के आने की आवाज भी मैंने सुनी बेडरूम में. मैंने फिर भी आंख नहीं खोला.
मम्मी: राहुल ...राहुल, उठ जा सुबह हो गई. जा 5 मिनट के लिए बाहर मुझे संगीता से बात करनी है.
मेरी घबराहट और बढ़ गई की कहीं मम्मी संगीता का चेहरा देखकर कुछ और ना समझ ले. मैं चुपचाप बाहर की ओर चला गया और अंदर क्या बात हुई मुझे कुछ नहीं पता, वो तो सिर्फ संगीता ही जानती थी. पर यह कोई ऐसी बात नहीं थी कि मैं मम्मी के सामने उससे पूछ पाता. मैंने सही समय का इंतजार किया और जैसे ही मम्मी नहाने के लिए बाथरुम में गई मैंने तुरंत संगीता को साइड में ले जाकर पूछा.
संगीता: मम्मी उस बेडशीट के बारे में पूछ रही थी. मैं: फिर तुमने क्या कहा? संगीता: मैं झूठ बोल दिया कि मेरा पीरियड था, मैं व्हिस्पर पैड लगाना भूल गई थी और डांट रही थी कि ध्यान रखूं उन चीजों पर. मैं: अब कैसा है दर्द? संगीता: चूत का?
उसके मुंह से यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, और मैं उसे देख मुस्कुरा दिया और साथ ही उसके होठों को भी चूम लिया, वो भी हल्का सा मुस्कुराई.
संगीता: दर्द कल रात से तो कम ही है. जलन हो रही है बस.
तभी मम्मी बाथरूम से आई,
मम्मी: जाओ संगीता नहा लो. संगीता: हां जा रही हूं.
कह कर मम्मी भी पीछे आंगन में चली गई बाल सुखाने के लिए. मैं भी उसके पीछे-पीछे उसके पास गया बात को संतुलित करने के लिए.
मैं: क्या हुआ, आप संगीता को डाट क्यों रही थी? मम्मी: कुछ नहीं, यह लड़की ध्यान रखती नहीं है किसी चीज का? उम्र हो गई है कम से कम पीरियड्स में पैड पहनना चाहिए था. पूरा बेडशीट गंदा कर दिया. मैं: बेडशीट? मुझे तो नहीं दिखा कुछ ऐसा. मम्मी: तुझे सोने से फुर्सत मिले तब तो दिखेगा ना. तू तो गहरी नींद में सोया था. मैं: अच्छा सुनो ना, बहुत मन कर रहा है आपसे प्यार करने का. मम्मी: अब यहां कैसे हो सकता है तू ही बता? मैं: बाहर चले? मम्मी: धीरे... क्या बोल रहा है? बाहर कहां जाएंगे? मैं: रुको मैं कुछ सोचता हूं, आप बस संगीता से बहाना बना दो कि हम मार्केट जा रहे हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) अगर कुछ गड़बड़ हुई तो तुझे छोडूंगी नहीं. मैं: भरोसा रखो कुछ नहीं होगा.
मम्मी ने मेरा कहना मानते हुए ठीक वैसा ही किया जैसा मैंने कहा था. वो सुंदर सी हरे रंग की साड़ी पहनकर चलने को तैयार हो गई. जाते वक्त मैं संगीता से नजरे मिलाते हुए उसे बाय कहने की कोशिश की. वो शर्म से मुस्कुराते हुए अंदर चली गई. अब मैं और मम्मी आजाद थे. रास्ते में,
मम्मी: हां तो क्या सोचा तुने? मैं: यही कुछ दूरी पर एक लॉज है. वहां चलते हैं. मम्मी: अरे पागल हो गया है. इधर कोई आसपास हमें देख लिया तो? मैं: फिक्र मत करो वो ऐसी जगह है जहां जल्दी लोग आते जाते नहीं है और खास करके प्यार मोहब्बत करने के लिए ही आते हैं. वो जगह चूदाइ के लिए मशहूर है. छोटा कमरा है पर ठीक है. मम्मी: (पीठ पर थपकी मारते हुए) तू भी ना क्या-क्या करवाएगा?
जब हम लॉज पहुंचे तो शायद वहां उस वक्त कोई नहीं था सिवाय लॉज मैनेजर के. मैंने मम्मी को लॉज के गेट के अंदर खड़ा रहने को कहा और फिर मैनेजर से बात करने गया जो कि बाहर ही छांव में काउंटर टेबल लगाकर बैठा था. उसकी नजर मुझ पर और मम्मी पर मम्मी पर था.
मैं: कमरा चाहिए? लॉज मैनेजर: हां हां समझ गया. कितने घंटे के लिए? मैं: 4 घंटे के लिए. लॉज मैनेजर: आज तो आंटी की जान लेकर रहोगे. कौन है यह? मैं: पड़ोस की ही एक औरत है. लॉज मैनेजर: कैसे पट गई यार इस उम्र में? इतनी मस्त माल तुमने कैसे पटाया?
मम्मी को देखकर उसकी नियत भी डगमगा गई. थोड़ा रुक कर धीरे से कहने लगा,
मैं: अच्छा अपना नाम तो बता दो? मैनेजर: तुम मुझे आदि कहकर बुला सकते हो.
क्योंकि वह एक बहुत छोटा सा लॉज था सब काम आदि ही देखा था, बस नाम का मैनेजर था.
आदि: यार आंटी से बात करो ना कोई उसके पहचान में और औरतें होगी. मेरी भी सेटिंग करवाओ. मैं: तुम्हारे यहां तो इतनी औरतें आती है फिर किसी से भी कर लो. आदि: यही तो रोना है. औरतें बहुत कम आती है जल्दी नहीं आती खास करके जवान लड़के और लड़कियां ही आते हैं. मुझे तो ऐसी ही रस भरी औरतें पसंद आती है. मैं: अच्छा ठीक है मैं बात करूंगा.
मम्मी यह सब दूर से देख रही थी और सोच रही थी कि "इतनी लंबी क्या बात चल रही है इन दोनों में."
आदि: अच्छा सुनो, आंटी से ही बात करो ना अगर पैसे लेकर कुछ कर दे मेरा... मैं: अरे यार वो ऐसी औरत नहीं है. बहुत मेहनत करनी पड़ती है पटाने के लिए. आदि: अच्छा ठीक है पर मेरा ध्यान रखना.
मैं: हां ठीक है. लाओ एक पानी की बोतल दो.
मैं जब उसे पैसा पूछा,
आदि: यार देखो वैसे तो मैं 4 घंटे के दो हजार रुपए लेता हूं तुम हजार ही दे दो. तुम्हारी आंटी मुझे बहुत पसंद आई और अपना नंबर भी दे दो मुझे.
वो सच में पागल हो चुका था. मम्मी को देखने के बाद उसके अंदर की सारी वासना जाग उठी. मैं जब पैसा चुका कर फिर मम्मी के पास गया, वो मेरे तरफ घूरते हुए बोली,
मम्मी: क्या बातें चल रही थी इतनी देर से? मैं: ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो बस उससे मोलभाव कर रहा था. मम्मी: कितना पैसा लिया? मैं: हजार में मान गया. मम्मी: फिर भी कितना महंगा है! मैं: चलो आप ज्यादा मत सोचो.
हम कमरे में पहुंचे तो बहुत छोटा था कमरा लेकिन हमें भी कौन सा पूरी जिंदगी रहना था. हमें तो चूदाइ की आग बुझाना था. मम्मी शरमाते हुए मेरी तरफ देखने लगी मैं भी उसे चुम्मा देकर आश्वासन दिया.
मैं: कुछ सोचने की जरूरत नहीं है. अपने आप को बस मेरे हवाले कर दो.
वो थोड़ी सी बेचैन थी उसके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था. आज से पहले कभी भी वो चूदाइ के लिए खास करके किसी गेस्ट हाउस, होटल या लॉज में नहीं आई थी.
मम्मी: तुझे पक्का पता है यहां कोई खतरा नहीं है? मैं: इतना सोचती क्यों हो? मम्मी: कैसे नहीं सोचूं. घर पर तेरी जवान बहन यह सोच रही होगी कि उसकी माँ मार्केट गई है. तेरे पापा इस बात से निश्चिंत होंगे कि उसकी बीवी घर पर उनका इंतजार कर रही होगी. और यहां मैं, लॉज में रंगरलिया मना रही हूं. मैं: मैंने कहा ना आप घबराहट छोड़ो और अपने आप को बस मेरे हवाले सौंप दो.
मैं भी उसे बाहों में कस कर चुम्मा लेना शुरू कर दिया, उसके मुंह के स्वाद को चखने लगा. एक दिन बिना चोदे जो बीता था ऐसा लग रहा था जैसे सदियों बीत गए हैं. उसने भी धीरे-धीरे गर्मी को महसूस करते हुए अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और फिर मुझे जकड़ने लगी. मैं भी उसे नीचे की तरफ बेड पर सुला दिया और फिर चूमना शुरू रखा साथी साथ उसके ब्लाउज के हुक भी खोलने लगा. उसने भी साथ देते हुए पेटीकोट में हाथ डालकर अपनी साड़ी को नाभि के नीचे से बाहर निकाल दिया और खोलकर साइड में फेंक दिया. मम्मी ने बहुत सुंदर सी एक बैंगनी रंग की ब्रा पहनी थी.
साड़ी की पूरी तरह से खुलने के बाद मैं भी अपना हाथ उसके जांघों पर सहलाने लगा. पीछे से मेरा लंड पैंट के अंदर से ही उसके गांड से चिपक गया तभी मैंने उसके कान को भी चूसना शुरू कर दिया जिससे उसकी हवस और बढ़ने लगी. और धीरे-धीरे सिसकारियां भी छूटने लगी.
मम्मी: इश्श्श्श....
मैं भी और तेजी से कभी उसके कान को काटता तो कभी चुस्ता. फिर धीरे से उसके पेटिकोट का नाडा भी खोल दिया. नाड़ा खुला तो देखा उसने काले रंग की पैंटी पहनी थी.
मैं: क्या बात है, आज मैचिंग मैचिंग नहीं पहनी? मम्मी: जो मिल गया वो पहन ली. क्यों अच्छा नहीं है?मैं: बहुत अच्छा है मेरी माँ.
माँ शब्द सुन के वो थोड़ा शरमाई. तभी मैं फिर से उसके गालों को पकड़ के एक बार फिर से उसके होठों को चूसा. और ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियां मसलने लगा. जैसे-जैसे ब्रा नीचे फिसलता गया उसकी चूचियां बाहर आने लगी, उसके हल्के भूरे गुलाबी रंग के निप्पल को मैंने चूसना शुरू कर दिया. उसके बदन में भी फिर से एक बार करंट दौड़ने लगा और दूसरी हाथ उसके पैंटी के अंदर डालकर उसकी चूत के बालों वाले हिस्से को और फिर उसकी चूत के दाने को सहलाने लगा. जिससे वो अब थोड़ा और बेचैन मालूम पढ़ने लगी.
मम्मी: उम्म् ...मम्म्म...ऊऊह्ह्ह्ह...
मैं भी उसकी बेचैनी बढ़ाता हुआ नीचे जा पहुंचा जहां उसके गुलाबी पंखुड़ियों वाली मुलायम चूत थी. कल रात जैसा प्यार मैंने संगीता की चूत को दिया था, मम्मी की चूत को भी ठीक ऐसा ही प्यार करने लगा. मम्मी ने भी अपना हाथ बढ़ाकर मेरे बालों को सहलाने लगी और मेरा जीभ उसकी चूत के मुहाने को चोदने लगा. उसके चूत के होंठ फड़फड़ाने लगे. मैंने उसे शांत करने के लिए तुरंत लपक कर उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया और बीच-बीच में अपना जीभ उसके मुतने की छेद पर
चलाने लगा.
अब तो वो पागल सी हो गई, मेरा सर पकड़ कर ऊपर खींचते हुए मेरे होठों को चाटने लगी. दूसरा हाथ मेरे पैंट में डालकर लंड को बाहर निकलने लगी. मैं भी तुरंत अपना टी-शर्ट और पेंट उतरना शुरू कर दिया लेकिन उसने मेरा लंड अभी भी नहीं छोड़ा और आगे पीछे हिलाते रही. आज मुझे उसकी आंखों में असली चूदाइ का प्यास नजर आ रहा था. मेरा लंड लोहे की तरह मजबूत हो चुका था उसने तुरंत उसे पड़कर अपनी चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया.
जब हम दोनों की नजर मिली तो वो मुस्कुराते हुए फिर लंड को चूत पर रगड़ रही और पता ही नहीं चला कैसे उसने अपने ही हाथ से लंड के सुपाडे को चूत के अंदर घुसा लिया. फिर देर किस बात की थी, मैंने भी जोरदार धक्का देते हुए चोदना शुरू कर दिया.
मैं उसे चोदता रहा वो सिसकारी भारती रही. मेरी हवस का भी ठिकाना नहीं था, जांघों से जांघे टकरा रही थी और चूत से लंड. उसके जुबान पर सिसकारी के साथ आंखों में हल्के आंसू भी थे लेकिन यह कोई दुख के आंसू नहीं बल्कि चर्मसुख का एहसास था.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह……. मैं: आह्ह्ह…कैसा लग रहा है मम्मी... मम्मी: आश्श्श्श...आअह्ह्ह्ह...बहुत अच्छा...आह्ह्ह्हह
और 10 से 12 झटको के बाद, मैंने कुछ ऐसा सुना जिससे मुझे अपने कान पर यकीन नहीं हुआ,
यह क्या मम्मी ने "चोद" कहा. क्या यह मेरी वही माँ है जो बहुत संस्कारी होने के साथ-साथ पतिव्रता भी थी और आज मुझे चोदने को कह रही है.
मैं: आअह्ह्ह्ह...मम्मी थोड़ा जोर से... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...बेटा..
.चोद मुझे...चोद अपनी माँ को...ऊऊह्ह्ह्ह मैं: ओ...हां माँ...देखो आपका बुर चोद रहा हूं... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...ओहो
... मेरा बुर...आअह्ह्ह्ह...कैसा है बेटा... मैं: आपका बुर तो जन्नत का रास्ता है मेरी माँ... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...मेरा बुर...चोद...ओहो...
मम्मी के मुंह से बोले हुए गंदे शब्दों ने और मेरा उन शब्दों का जवाब देने की वजह से मम्मी भी अपने चरम सुख के सीमा की आखरी सीढ़ी चढ़ चुकी थी और मैं भी उसके साथ सुर में सुर मिला रहा था. उसने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे दोनों गांड पड़कर अपनी चूत में दबाने लगी. चार-पांच झटके और हम दोनों पानी पानी हो गए.
हम बहुत थक गए थे मैंने मम्मी को पानी पिलाया और पूरा बिस्तर भी गीला हो गया था हम दोनों के तरल वीर्य निकलने से.
मम्मी: अब चले? मैं: अभी कहां,अभी तो दो ही घंटे हुए हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) मतलब मानेगा नहीं... राहुल बिस्तर बदलना होगा. मैं: रुको मैं बोल कर आता हूं मैनेजर को. मम्मी: मैं बाहर चली जाती हूं. मैं: नहीं घबराती क्यों हो यही रुको ना. मम्मी: वो यह सब देखेगा तो क्या सोचेगा? मैं: ओ मम्मी उसे पता है यहां सब क्यों आते हैं. मम्मी: चड्डी तो पहन लेने दे.
मम्मी ने कपड़े पहने और मैं फिर मैनेजर को बुलाने गया.
आदि: काम हो गया? मैं: अभी कहां अभी तो शुरू हुआ है. बिस्तर बदल दो खराब हो गया है. आदि: फिर भी अभी काम बाकी है? मैं: तुम होते तो दो घंटे में मान जाते क्या? आदि: नहीं यार. वो आंटी को तो मैं पूरा दिन रात चोदता रहूं. मैं: कहने की बात है, उसके सामने टिक नहीं पाओगे. आदि: तुम्हारी बात भी सही है. मैं: कुछ खाने को भी मंगा दो.
जैसे ही वो बिस्तर बदलने रूम में आया, मम्मी सावधान होकर खड़ी हो गई. उसकी आंखों में शर्मिंदगी था अपनी इज्जत को लेकर. आखिर दो जवान लड़के एक ही कमरे में उसके साथ खड़े थे जहां वो चूदी थी.
उसके जाते ही मम्मी ने राहत की सांस ली और फिर हमने हल्का-फुल्का नाश्ता किया.
मम्मी: शाम के 5 बज चुके हैं कब चलना है वापस? मैं: एक राउंड और करते हैं ना फिर चलेंगे. मम्मी: तूने तो मेरे बुर को ही थका दिया है. मैं: अच्छा आओ अब प्यार से धीरे-धीरे करते हैं.
मम्मी को फिर से एक बार नंगा करने के बाद इस बार दोनों चूचियों को सहलाना शुरू किया.
और फिर उसे बारी-बारी से चूसने लगा. वो भी में मेरे सीने पर चूम रही थी और बीच-बीच में निप्पल को चाट रही थी. कुछ देर की चुम्मा-चाटी के बाद इस बार मैंने मम्मी को पीछे घुमार अपनी बाहों में भरा. घुमा देने के बाद गांड के तरफ से उसकी एक जांघ को उठाकर अपने लंड को घुसाया. पहले की तरह नहीं लेकिन इस बार प्यार से धीरे-धीरे पूरी अंदर गहराई तक अपने लंड से उसके चूत को टटोलने लगा.
मम्मी को यह काफी आरामदायक और कामुक लग रहा था. उसने भी आह भरना शुरू कर दिया.
मैं: माँ क्या मैं आपके बुर को अच्छे से चोद रहा हूं ना.
मम्मी: इश्श्श्श...हां बेटा...
मैं साथ-साथ उसके गले को भी चूमने लगा और एक हाथ से उसके चूचि को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से चूत के दाने को सहला रहा था. और इन सब के साथ घपा घप लंड से उसकी चूत के सुरंग में अंदर तक चोद रहा था.
जिस तरह संगीता की चूत मुझे रोक रही थी अंदर डालने से, लंड को चारों ओर से पड़कर. मम्मी की चूत उससे बिल्कुल अलग था, क्योंकि पकड़ता तो मम्मी का चूत भी था मेरे लंड को. लेकिन बड़े प्यार से और जब मेरा लंड अंदर जाने की कोशिश करता तो वो उसे और अंदर आने की इजाजत देता था.
मैं: आज पहली बार ऐसा लगा जैसे आपने मुझे खुलकर अपना लिया हो. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) हो सकता है. मैं: खुलकर बोलो ना. मम्मी: आखिर सेक्स किसे अच्छा नहीं लगता. और वो भी जब उसका अपना बेटा ही चोद रहा हो. मैं: तो फिर आपने पहले इंकार क्यों किया था? मम्मी: क्योंकि मेरी भी तो इज्जत है ना बेटा और यह समाज. और एक चीज जो मुझे रोकती है वो है तेरे पापा. मुझे बहुत अजीब लगता है जब तुझसे सेक्स करते वक्त मुझे उनकी याद आ जाती है. क्योंकि मैं उनको धोखा दे रही हूं.
ऐसी खट्टी मीठी बातों के बीच चूदाइ का सिलसिला जारी था. मेरा लंड लगातार मध्यम रफ्तार उसकी चूत को गपा- गप चोदते जा रहा था.
मैं: अच्छा मेरी बात सुनो, मैं जानता हूं कि हम यह गलत कर रहे हैं. लेकिन एक माँ बेटा से पहले हम एक औरत-मर्द भी तो है. शरीर की कुछ ज़रूरतें होती है, और अगर वो घर में ही पूरी हो जाए तो उसमें क्या बुराई है? और किसी को पता थोड़ी ही चल रहा है. मम्मी: तेरा कहना तो ठीक है... पर. मैं: पर बर कुछ नहीं. बस अभी मेरे बाहों में आप ऐसे ही सुकून से रहो और हम दोनों एक दूसरे में खो जाए.
मेरी यह बात सुनकर, उसने भी कुछ कहना बंद कर दिया और मैं भी अपना मुंह बंद कर लिया और बस गहरी सुरंग की चूदाइ चालू थी. उसकी चूचियों को और हाथों से सहलाने लगा जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए. चूत भी गीला होकर पानी छोड़ रहा था और मेरा लंड उसकी गीले दलदल में अंदर बाहर फिसलता जा रहा था.
मम्मी: उम्म्... हां बेटा ऐसे ही...मम्म्म...ऐसे ही...ओह... मैं: मजा आ रहा है मम्मी... मम्मी: (हाँफते हुए)हां बेटा...मम्म्म...कैसी लगती है मम्मी तुझे? मैं: ओह...आप सबसे बेस्ट हो...
चोदते चोदते कब चार घंटा पूरा हो गया पता ही नहीं चला.
मम्मी: बेटा टाइम हो गया है. जल्दी-जल्दी कर...
तो मैंने फिर से एक बार अपने आप को उसके दोनों जांघों के बीच रखा और लंड को अंदर घुसाकर चूत को जबरदस्त तरीके से चोदने लगा और साथ ही साथ उसके दोनों चूचियों को पकड़ के दबाने लगा.
ऐसे ही लंड और चूत के घर्षण से हम दोनों फिर एक बार जोर से कराहते हुए चर्मसुख तक पहुंच गए और कुछ मिनट तक एक दूसरे के मुंह पर ही सांस छोड़ते रहे. बाद में मम्मी ने पीठ थपथपाया और चुम्मा देकर उठने को कहा.
मम्मी: जल्दी चल नहीं तो तेरे पापा भी आ जाएंगे उनका आने का टाइम हो गया है. मुझे नहीं देखेंगे तो फिर फोन आना शुरू हो जाएगा उनका.
मैं भी मम्मी का कहना मानकर तुरंत उठ खड़ा हुआ घर जाने के लिए. रास्ते में जाते वक्त मम्मी ने कुछ हरी सब्जियां ली और संगीता के लिए बर्गर. वैसे तो हमें कुछ लेना नहीं था क्योंकि हम कोई मार्केट करने तो नहीं निकले थे. लेकिन कुछ तो चाहिए था बहाना बनाने के लिए. शुक्र था पापा के आने से पहले हम घर पहुंच चुके थे. संगीता बैठकर टीवी देख रही थी.
संगीता: इतना लेट कैसे हो गया? मैं: वो रास्ते में मोटरसाइकिल बिगड़ गया था उसे ठीक करने में इतना टाइम लग गया. संगीता: ओह... मम्मी, सब्जी क्या बनाना है? मम्मी: रुक जा पापा से पूछ लेते हैं उनका क्या मूड है.
मुझे पता था संगीता को कल रात बहुत तकलीफ हुई थी और आज तो मम्मी ने भी लॉज में काफी मेहनत की थी.
मैं: क्यों ना आज हम सब बाहर खाने चले. संगीता: हां यह अच्छा आईडिया है. मम्मी: अच्छा रुको पापा से कह देती हूं. संगीता: नया सनशाइन रेस्टोरेंट खुला है ना, क्यों ना वहां का खाना ट्राई किया जाए.
मैं: हां हां चलते हैं मजा आएगा बहुत दिन हो गए ऐसे भी साथ बाहर गए हुए. संगीता: क्या भैया अभी तो मामा के यहां गए थे तो कितने बार तो हम बाहर जा चुके. मैं: मेरा मतलब वो जाना नहीं अपने परिवार के साथ जाने की बात कर रहा हूं.
फिर क्या था पापा भी घर आ गए थे और हम सब तैयार होकर रेस्टोरेंट के लिए निकल गए. हम सब में खाने का लुत्फ उठाया और हंसी मजाक करते हुए एक दूसरे के मन को हल्का किया. वाकई में खाना लाजवाब था सनशाइन रेस्टोरेंट का. और मेरी खुशी का तो ठिकाना नहीं था. क्योंकि मेरे पास तो दुनिया की सबसे बड़ी दौलत हाथ लग गई थी, मेरी माँ और बेहन.
देर रात हम सब घर लौटने के बाद थके हारे सोने चले गए. लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां... मुझे तो अभी नई नवेली पत्नी की तरह मेरी बेहन मिली थी जिसकी कुंवारी चूत के सील को कल ही मैंने तोड़ा था. क्या कसी हुई चूत थी. पिछली रात की तरह इस रात भी वो शर्मा रही थी लेकिन उसका अंदाज थोड़ा बदला बदला हुआ था.
संगीता: भैया जो हम कर रहे हैं क्या वो सही है? क्योंकि मैंने आज तक कभी ऐसा नहीं सुना की भाई बेहन का रिश्ता रोमांस में बदल जाए. मैं: तुम्हें एक बात बताऊं, यह आजकल बहुत नॉर्मल है. संगीता: आप झूठ बोल रहे हो, ऐसा भी कभी हो सकता है भला? मैं: क्यों नहीं है यकीन. संगीता: नहीं है, मैं कैसे मान लूं?
मैंने तुरंत अपना फोन उठाया और भाई बेहन वाले पॉर्न वीडियो लगा दिया. जब वो वीडियो शुरू हुआ तब तो सब कुछ नॉर्मल था. लेकिन जैसे ही कहानी रोमांस की तरफ बढ़ने लगी, किसिंग सीन देखकर संगीता ने मेरी हथेली को अपने हाथों में पकड़ लिया. लेकिन जैसे ही दोनों के नंगे होकर चूदाइ वाला सीन आया, यह देख संगीता की आंखें बड़ी हो गई. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इस तरह के अश्लील वीडियो भी होते हैं. वो भरोसा नहीं कर पा रही थी कि वाकई में वो अकेली नहीं है. ऐसे भाई बहन भी हैं जो आपस में प्यार करते हैं. यह देख उसने दांतो तले होंठ दबा लिया.
मैं भी देर ना करते हुए फोन को साइड में हटाया और उसे अपनी बाहों में भरकर चूमने लगा. उसके वही मुलायम रसीले होठों ने कल रात की याद ताजा कर दी.
मैं: (धीरे से उसके कान में) अब क्या हाल है चूत का? संगीता: क्या कहूं, बहुत जलन हो रहा है टॉयलेट करते वक्त. मैं: आओ मैं आराम दिला देता हूं. संगीता: (हल्की मुस्कुराहट के साथ) अच्छा, वो कैसे?
तभी मैंने उसे धीरे से बेड पर सुलाया और उसके होठों, कानों, गले को और कंधे को छटना और चूसना शुरू कर दिया. उसे भी अब अच्छा लगने लगा फिर धीरे-धीरे उसकी चूचियों को ऊपर से ही मसाले लगा उसकी भी गर्म सांसे मेरे मुंह पर छूटने लगी.
संगीता: और कौन सा जादू आता है आपको? मैं: देखना है? संगीता: हां.
उसके हां कहते ही मैं उसे गुदगुदी करने लगा और वो हंस पड़ी. जब उसकी हंसी शांत हुई, हम दोनों ने एक दूसरे को नशीली निगाहों से देखा. मेरा हाथ उसके शॉट पैंट को नीचे की तरफ खींच रहा था. यह देख उसने हाथों से अपनी आंखें छुपा ली और शर्म से जांघे दबाने लगी. मैं भी उसके नाभि के हिस्से को सहलाना शुरू किया जिससे उसके तन बदन में आग लगना फिर से शुरू हो गया. धीरे-धीरे जांघों को ढीला छोड़ दिया उसने तभी उसके कमर के नीचे हाथ लगाकर उसके शॉट पैंट ढीला करते हुए उसके पैंटी को भी सरका दिया, जिससे उसकी वो मासूम गुलाबी चूत का नजारा मेरे आंखों के सामने आ गया.
उसकी चूत ने अपने होंठ बंद कर रखे थे, सिर्फ एक हल्की लकीर सी दिखाई पड़ रही थी जो खुलने का इंतजार कर रही थी. चूचियां संतरे जैसी बीच में छोटा सा निप्पल गुलाबी रंग का मेरा तो रोम रोम खड़ा हो गया. आप खुद ही अंदाजा लगाइए मेरा क्या हाल हुआ होगा उस लड़की को कल रात चोद कर.
मुझे रहा नहीं गया, मैंने अपना मुंह फिर से उसके चूत की तरफ बढ़ाया उसे चाटने के लिए और अपनी बेहन का स्वाद फिर से चखने लगा. उसका स्वाद वैसा ही नमकीन और नशीला था. जब जीभ को उसकी चूत के दाने पर चलाना शुरु किया उसकी सिसकारियां निकलने लगी.
संगीता: आह्श्श्श्श...भैय्याआआ... मैं: अब तो जलन कम हो गया ना? संगीता: आह...हां...भैया ऐसे ही...
अपनी मध्यमा उंगली उसकी चूत के दरार पर रखता हुआ मैं दूसरी उंगली का सहारा लेकर उसकी होठों को फैलाया. फिर अपना पूरा जीभ निकाल कर उसकी चूत के छेद में घुसाने लगा. उसके पैरों में हलचल होना शुरू हो गया. मैं जीभ को अंदर बाहर करता रहा और वो भी खुलकर मजा लेने लगी, आखिर उसकी चूत की जलन थोड़ी शांत तो हो ही गई.
इधर मेरा लंड बेताब था उसे फिर से चोदने के लिए, इसीलिए मैंने भी अपने लंड को बाहर निकाल दिया. वो भी साथ दिखाते हुए उठकर मेरे लंड को पकड़ सहलाना शुरू कर दी.
संगीता: भैया मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मेरे हाथ में एक लंड है, वो भी अपने भाई का. मैं: किस्मत वालों को मिलता है संगीता यह.
उसने अपना कमर उठाते हुए मेरे लंड को चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया. उसकी गरम-गरम मुलायम चूत को महसूस कर मेरे बदन में जैसे चीटियां कटने लगी, लंड का तनाव पूरी तरह बढ़ चुका था. जैसे ही मैंने उसके पैर को फैलाते हुए लंड अंदर डालने की कोशिश की वो मुझे रोकने लगी. उसे कल रात का डर अभी भी सता रहा था.
संगीता: भैया बहुत दर्द होता है, रहने दो. मैं: अब थोड़ी होगा अब सब कुछ ठीक है. संगीता: नहीं-नहीं आपका बहुत मोटा है, कल मेरे अंदर गया था तो जैसे जान ही निकल गई थी. मैं: गुड़िया कल पहली बार था पर आज तुम्हारी चूत इस लंड को अपनाने के लिए तैयार है.
यह आश्वासन देते हुए, मैंने अपने लंड को उसकी चूत की रस से गिला करके अंदर डालने लगा. धीरे-धीरे लंड थोड़ा आगे बढ़ता गया, उसकी सांसे फिर से हल्की थम सी गई. वो अभी भी बहुत कसी हुई थी. कल जैसा तो नहीं पर लंड की चौड़ाई लंबाई को वो महसूस कर रही थी. अभी भी उसकी चूत काफी तंग थी, लंड को घुसने का रास्ता नहीं मिल रहा था.
संगीता: भैया बोला था मैंने, थोड़ा दर्द हो रहा है फिर से. मैं: एक काम करो मुझे थोड़ा तेल दो, तुम्हारी चूत को बहुत चिकनाई की जरूरत है.
उसने ढूँढते हुए ड्रॉअर से मुझे नारियल तेल दिया. मैंने उसे बेड का सहारा लेते हुए झुकने को कहा और पीछे की तरफ से तेल उसकी चूत में मसलने लगा. उसकी मखमली मुलायम चूत पूरी तरह तेल से सनी हुई थी.
फिर अपने लंड को चूत पर टीकाते अंदर की तरफ धक्का देने लगा और धीरे-धीरे फिसलन के कारण लंड भी उसकी चूत के मांसपेशियों को चौड़ा करता हुआ अंदर तक घुस रहा था. संगीता इस मीठे दर्द का एहसास कर सकती थी, उसके लिए थोड़ा अलग था. यह उसकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा खुशी पाने का अनुभव था. उसकी सिसकारियां अब आह में बदल गई.
संगीता: आह...भैय्या…..आअह्ह्ह्ह…..आअह्ह्ह्ह. मैं: मज़ा आ रहा है मेरी रानी को? संगीता: हां...भैया...मम्म्म...आह...
मैं उसके मीठे दर्द का एहसास खराब नहीं करना चाहता था. लेकिन अभी तक तो मैंने मध्यम रफ्तार भी नहीं पकड़ी थी और लंड अभी भी पूरा अंदर घुसना बाकी था. इसलिए मैं उसके कान के पास गया और उसके कान को चुमने लगा. क्या फूलों जैसी खुशबू थी उसके बालों की और उसके बदन की.
जब वो चुंबन और लंड का मज़ा एक साथ ले रही. तभी मैं थोड़ा तेजी बढ़ाते हुए और धक्का लगाते हुए अपने लंड को अपनी छोटी बेहन की चूत में पूरे अंदर तक पेल दिया.
संगीता: आआह्ह्ह्ह!!! भैया… और दर्द… हो रहा है...उफ्फ़… मैं: शांत हो जा मेरी जान… मेरी गुड़िया... थोड़ा दर्द सह लो, सब अच्छा हो जाएगा... संगीता: आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!!बस…बस्… और नहीं आह्ह्ह… मैं सह नहीं पा रही… बहुत दर्द… हो रहा है.
चूत की अंदरूनी दीवारें बुरी तरह खिंच चुकी थीं लंड का सुपाड़ा बच्चेदानी के मुंह पर ठोकर मार रहा था.
मैं: तुम्हारी चूत मेरे लंड को पूरा अंदर ले रही है… तुम बहुत टाइट हो… बहुत हिम्मती हो …बस आखिरी थोड़ा सा… फिर दर्द कम हो जाएगा और मजा आएगा… मैं तुम्हारा भैया हूँ… डरो मत…
धीरे-धीरे दर्द की तीव्रता कम होने लगी और उसकी जगह एक गहरी, भारी कामुकता ने ले ली. अब संगीता का दर्द कम हो गया था और उसे मजा आने लगा. मेरी भी गति धीरे-धीरे बढ़ी, पूरा लंड अब अंदर-बाहर होने लगा. संगीता की चूत पूरी तरह फैल चुकी थी और अब उसकी चिकनी, गीली, तंग दीवारें मेरे लंड को जकड़ रही थीं.
हर धक्के पर संगीता की छोटी चूत का मुंह बाहर निकलता, फिर अंदर चला जाता. हम दोनों की सांसें एक हो गईं. कमरे में चूत की गीली “पच-पच-पच” आवाज, संगीता की कामुक सिसकारीयां और मेरी गुर्राहट थोड़े मध्यम आवाज में गूंज रही थी क्योंकि बाहर मम्मी पापा भी तो थे.
तब मैं उसकी चूचियों को पकड़ कर जोर जोर से चोदने लगा. उसका चूत भी पानी छोड़ने लगा. अब कमरे में सिसकारियों के साथ शरीरों के टकराने की आवाज़ और गीली चुदाई की छप-छप की आवाज रह गई थी. संगीता के साथ ही मैं भी चरम पर पहुंच गया और हम दोनों एक साथ झड़ गए. अपना लंड बाहर खींच कर पूरा वीर्य उसकी गांड पर गिरा दिया. हम दोनों के पैरों में अब जान नहीं बची थी कि हम और देर खड़े रह पाए. संगीता ने जल्दी से अपने गांड पर गिरे हुए वीर्य को पोछा. कल रात की तरह कोई गलती ना हो जाए इसीलिए संगीता ने समझदारी दिखाते हुए बेडशीट बदल दिया और मेरे साथ बिस्तर पर गिर गई.
हम देर तक एक-दूसरे से चिपटे रहे. मैं संगीता को चूमता रहा.
संगीता: भैया… यह दर्द और मजे का मिश्रण… मैं कभी नहीं भूलूंगी.
हम दोनों पसीने से भीगे नंगे ही एक-दूसरे की बाहों में सो गए.
Bahut lajwab update Diya hai bhai ..maza aagaya . Bus ab kahin jab do inko pata chale ki akela dono ke sath maze le raha hai ... dono ka dil na toot jaye ..
Maa ka apne bete ko apana walla idea aaccha laga...but dil na toote aur pyar hi bade
आखिरकार हम अपने घर आ ही गए. मामा जी के घर का यात्रा बहुत रोमांचक रहा इस बार. एक चीज मैं जरूर याद करूंगा और वो था हर रात मम्मी के साथ सुकून से उसकी चूदाइ करना. लेकिन यहां किस्सा उल्टा था, यहां मुझे संगीता के साथ सोने का मौका मिलता है ना की मम्मी के साथ. हालांकि मैं मम्मी का दीवाना हूं लेकिन संगीता के लिए वासना भी अब मुझ में कूट-कूट कर भरती जा रही है. आखिर बेहन को चोदने का मौका मिले तो कोई कैसे पीछे रह सकता है. वहां तो उसने मेरे हाथ लगाते ही मुझे रोक दिया था पर अब मौका था उसे अच्छे से मनाने और बहलाने का.
शाम को पापा आए और नए शहर में उनके अनुभव के बारे में हमें बताया और साथ ही साथ एक खुशखबरी भी दिया कि उनका प्रमोशन हो गया है.
पापा: अगले महीने से हम अपने घर का काम शुरू कर सकते हैं बनाने का.
इस बात से हम सभी खुश थे.
मैं: और वो कार अपने लेने को बोला था उसका क्या हुआ? पापा: वो भी ले लेंगे थोड़ा सब्र रखो.
हमेशा की तरह हमने साथ खाना खाया. क्योंकि मम्मी के साथ अभी खेल खेलना मुश्किल था. लेकिन मैं भी उसे छोड़ नहीं सकता था. खाने के बाद मैंने बहाना करते हुए उसे बुलाया पीछे आंगन में.
मैं: मम्मी मेरे गाड़ी की चाबी नहीं मिल रही है आपको मालूम है क्या? मम्मी: तूने रखा होगा ना मुझे कैसे पता. जाकर पीछे देख ले कहीं गाड़ी में तो नहीं लगा है.
मम्मी ने आते ही मेरी मुस्कुराहट का अंदाजा लगा लिया था कि मैं क्या चाहता हूं.और कहने लगी,
मम्मी: देख अब इन चीजों पर बहुत कंट्रोल रखना होगा. मामा का घर नहीं है, तुझे तो पता ही है इस छोटे से घर में संगीता हमेशा रहती है आंखों के सामने और रात को तेरे पापा. मैं: अभी तो आ जाओ, यहां कोई नहीं है. मम्मी: पागल हो गया है, समझाने पर भी नहीं समझता है. मैं: बस एक बार-एक बार.
कहकर मैंने उसे अपनी बाहों में भरते हुए चूमना शुरू कर दिया और साथ ही चूचियों को भी मसलने लगा.
वो बीच-बीच में बोलती रही,
मम्मी: छोड़ना, कोई ना कोई आ जाएगा फंस जाएंगे बात समझ. बस हो गया. मैं: कैसे बताऊं आपको मम्मी आपके बिना रह नहीं पाता हूं. मम्मी: मेरे बिना या फिर मेरे उसके बिना? मैं: उसके मतलब? मम्मी: चल छोड़ जाने दे. मैं: बोल भी दो. मम्मी: तेरा मन तो मेरी बुर में लगता है. मैं: उसमें तो लगता ही है पर आप में भी लगता है. मम्मी: हो गया-हो गया बस चल अभी यहां से.
हम दोनों अंदर गए, मम्मी पापा के साथ सोने हॉल में चली गई और मैं कमरे का दरवाजा बंद करके संगीता के पास. मेरे दरवाजा बंद करते ही संगीता सावधान हो गई और उसका सावधान होना भी जरूरी था. क्योंकि अब तक तो हम सिर्फ चुम्मा-चाटी का खेल खेलते रहे मामा के घर पर. यह वो लम्हा था जैसे एक पति अपनी नई नवेली दुल्हन के पास आता है दरवाजे को बंद करके.
मेरे पास पूरा रात था अपनी बेहन को समझाने और प्यार मोहब्बत के लिए. मुझे देख वो शर्माती हुई उसने अपनी नजर नीचे झुका लिया, पैरों को मोड़ लिया और सोने का नाटक करने लगी. यह बिल्कुल भी डर का माहौल नहीं था बल्कि संगीता बेहद शर्मसार थी इन घटनाओं से जो हम दोनों के बीच घटित हुआ इसीलिए ऐसे मौके पर वो हिम्मत नहीं कर पा रही मुझसे नज़रे मिलाने की. मैं भी उसके पैरों के पास जाकर बैठा.
मैं: क्या हुआ संगीता नाराज हो क्या?
उसका कोई जवाब नहीं आया. मैं यह सोचकर परेशान था और किस तरह से शुरुआत की जाए क्योंकि वहां तो संगीता थोड़ा बहुत मेरे रंग में रंगने लगी थी. लेकिन यहां अचानक ऐसा क्यों कर रही है. कम से कम बात तो करें.
पर मैं शायद थोड़ा अंधेरा होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाया. मैं उठा और मैंने रूम का लाइट चालू किया. फिर से संगीता के पास जाकर बैठा तो देखा उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी. वो बहुत ज्यादा शर्मा रही थी. मैंने उससे कुछ बातें करना शुरू कर दिया कि वो थोड़ा हल्का महसूस कर सके. उसकी ऐसी प्यारी मुस्कान को देख मैंने भी अपना हाथ आगे बढाकर उसके गालों को प्यार से चिकोटी भरा.
मैं: अच्छा एक बात बताओ, कभी कोई लड़का तुम्हारे पीछे पागल हुआ है? संगीता: बहुत थे लेकिन मैंने किसी को भाव नहीं दिया. मैं: ऐसा क्यों? संगीता: अपनी और परिवार की इज्जत… आप जानते हो ना? एक बार अगर कहीं बदनामी हो गई तो फिर क्या होगा. मैं: मेरी गुड़िया तुम तो बहुत समझदार हो. अच्छा तुम्हें कैसा लड़का चाहिए बताओ? संगीता: (दबी हुई आवाज में) आपके जैसा जो मुझे प्यार करें पर मुझे शर्म आती है. मामा जी के घर जो कुछ भी हमारे बीच हुआ, उससे पहले तो मेरा और आपका रिश्ता कुछ और ही था ना. मैं: शरमाती क्यों हो? प्यार की कोई सीमा नहीं होती.
यह कहकर मैंने उसे बाहों में जकड़ लिया.
संगीता: आपकी गर्मी से तो मैं गर्म हो जाती हूं.
मैं भी उसके होठों को चूमना शुरू कर दिया.
मैं: और तुम्हारे गुलाबी होंठ मुझे बेचैन कर देते हैं.
उसके मुंह से हल्का संतरे का स्वाद आ रहा था क्योंकि कुछ देर पहले उसने संतरे का जूस पिया था. वो बहुत रसीली लग रही थी.
और फिर धीरे-धीरे अपने हाथ को उसके स्तनों पर ले जाकर टिका दिया. यह देख उसने धीरे से मेरे कान में कहा,
संगीता: आपने पहले कभी इसे देखा है?
संगीता बहुत अनजान थी, मैंने भी उसे झूठ बोल दिया क्योंकि मेरे दिल की धड़कन बहुत तेजी से धड़क रहा था पहली बार उसकी चूचियों को देखने के लिए.
संगीता: आपकी धड़कन कितनी तेज हो रही है. मुझे भी अजीब सा अच्छा लग रहा है.
अब और नहीं, मैं अपने हाथ से उसके टॉप को थोड़ा ऊपर उठाया. उसने नीले रंग की ब्रा में अपनी चूचियों को छुपाए रखा था. यह देख वो भी अचंभा रह गई.
संगीता: शांत मेरे भैया मैं दिखाती हूं.
मैं उस पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि संगीता अपने हाथों से खुद मुझे अपनी चूची दिखाने जा रही थी. उसने पीछे हाथ डालकर अपना ब्रा का हुक खोल दिया और बाहों से ब्रा की पट्टी को निकलती हुई अपनी चूचियों को मेरे सामने रख दिया. मेरा तो देख कर बुरा हाल था की क्या यह मेरी वही बेहन है.
मेरी हथेलियां उन चूचियों पर फैल गईं. मैं धीरे-धीरे उन्हें सहलाने लगा, मसलने लगा, दबाने लगा. संगीता की सांसें तेज हो गईं. मेरी मजबूत बांह संगीता की कमर के चारों ओर लिपटी हुई थी. उसका का सिर मेरे सीने पर टिका था. यह घटना हम दोनों के अंदर आग सुलगा रही थीं.
संगीता: (नशीली आवाज में) भैया…
उसकी उंगलियां मेरे छाती पर घूम रही थीं.
मैं: मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. तुम्हारी यह नरम त्वचा, सांसों की महक… सब मुझे दीवाना बना रहा है.
शर्म से उसने अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया.
मैं: तुम्हारी आंखें कितनी भोली हैं, लेकिन आज इनमें आग है. एक प्यास दिख रही है बताओ ना, तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हें वो सब दूंगा जो चाहिए. संगीता: मुझे प्यार करो भैया...
मैं फिर से उसका चेहरा दोनों हाथों में थामा और धीरे-धीरे अपने होंठ उसके गुलाबी होंठों पर रख दिए. संगीता सिहर उठी. फिर धीरे-धीरे उसके निचले होंठ को हल्के से काटा, संगीता ने आह भर दी और मेरे होंठों को चूसने लगी. हमारी जुबानें मिलीं, नाचने लगीं. कमरे में सिर्फ हमारी सांसों और होंठों के चुस्कियों की आवाज गूंज रही थी.
संगीता: उम्म्म… भैया… मेरे होठों को आप से पहले किसी ने नहीं चूमा है आप पहले हो.
उसके गुलाबी निप्पल्स कड़े हो चुके थे. मैंने उसकी चूची को अपने हाथ से सहलाया और अपने चेहरे को उसकी चूची के पास ले जाते हुए अपने जीभ से जैसे छुआ, संगीता कांप उठी.
संगीता: सी…सी… आह…भैया...
निप्पल को दांतों से हल्का-हल्का काटने लगा. संगीता ने मेरा सिर पकड़कर अपनी छाती से चिपका लिया. मैं
उसकी चूची को जोर-जोर से पीने लगा और दूसरी चूची को जोर-जोर से दबाने लगा संगीता मजे से सिसकारियां भर रही थी.
संगीता: आह्ह्ह… भैया… आपकी उंगलियां…
मैं दूसरे चूची पर भी वैसा ही प्यार बरसाने लगा. कभी चूसता, काटता, जुबान से घुमाता. संगीता की चूचियां लाल हो गईं. फिर मैं नीचे की ओर सरक गया. मेरी जुबान उसकी नाभि तक पहुंची और नाभि को चूसने लगा, चाटने लगा, चुमने लगा. संगीता तड़प से मचल रही थी.
तभी मैंने सही वक्त देखकर उसकी पैंटी की इलास्टिक में उंगली फंसाई और उसकी पैंटी और पैजामा सहित नीचे खींचने लगा. उसने भी अपना हाथ बढ़ा कर अपनी पैंटी को पकड़ने की कोशिश पर शायद वो भी नहीं चाहती थी कि मैं रुकूं, उसकी उंगलियां ढीली पड़ने लगी.
पैंटी के थोड़ा नीचे सरकते ही मेरी सांसे थम सी गई. मैं अपने आप पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि मैं इस हद तक आगे बढ़ चुका हूं की अपनी माँ की चूत जो की नामुमकिन था, उसे हासिल करने के बाद अपनी बेहन की चूत के इतने करीब हूं. बिना बालों वाली, गुलाबी, कुंवारी चूत सामने आई. पूरी तरह साफ, छोटी-सी, और अब थोड़ी नम हो चुकी थी. उसकी खुशबू – कामुक, जवान लड़की की – कमरे में फैल गई. उसका दाना सख्त होकर उभरा हुआ था. उसका रस चमक रहा था.
मेरी भोली संगीता को शायद जरा भी अंदाजा नहीं था की चूत को चाटा भी जाता है. जैसे ही मैंने अपना होंठ उसकी चूत पर रखा,
संगीता: भैया नहीं, क्या कर रहे हो? वो गंदा होता है. मुंह हटाओ उधर से.
यह सुन मैं तुरंत उसके चेहरे के पास जाकर बोला
मैं: तुम्हारा कुछ भी मेरे लिए गंदा नहीं है मेरी गुड़िया.संगीता: भैया पर वहां से टॉयलेट करते हैं. मैं: तुम आंखें बंद करो और सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो. संगीता: नहीं भैया मैं आपको इस तरह से नहीं देख सकती. मैं: मेरी प्यारी, इतना प्यार करती हो मुझसे. संगीता: मैंने हमेशा आपकी इज्जत की है आप सोचिए मुझे कैसा लगेगा कि आप मेरे सामने ऐसे झुकें वो भी वहां जहां से मैं पेशाब करती हूं.
चूत को चटना कामवासना का एक भाग है यह संगीता के समझ में नहीं था. हो सकता है कि उसे शायद और भी चीज पता नहीं हो. मुझे अब काफी संभाल कर उसे हर एक चीज का एहसास दिलाना जरूरी था.
मैं: शांत हो जाओ, तुम्हारा भाई जानता है कि तुम्हारे लिए क्या सही है. मुझ पर भरोसा करती हो? संगीता: हां भैया. मैं: तो अपनी आंखें बंद कर लो और दिमाग को शांत करो.
उसने मेरा कहना माना और अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. मैं फिर से एक बार तैयार था उसकी उड़ान को ऊंचाई की ओर ले जाने को.
मैंने अपनी जीभ उसकी कुंवारी चूत पर रखी और धीरे-धीरे चाटना शुरू किया. उसकी चूत का स्वाद हल्का नमकीन और उत्तेजक था. मैंने उसकी फाँकों को जीभ से अलग किया और उसके दाने को चूसने लगा.
संगीता: आह्ह… ओह्ह… भैया… ये तो… आह्ह…
मैंने देखा उसकी आवाज थोड़ी तेज हो रही है कहीं बाहर मम्मी पापा को कुछ भनक न लग जाए, चूत को चाटते वक्त अपने हाथ को आगे बढ़ाते हुए मैंने अपनी एक उंगली को उसके मुंह में रख दिया तुरंत उसे चूसने लगी.
संगीता: उम्म्म्म्म....
वो अपने गांड को हिलाने लगी, और मैंने अपनी जीभ को उसकी चूत के अंदर तक डाला और जीभ से चोदने लगा. अपनी ऊंगली उसकी मुंह से निकाल कर उसी की चूत में घुसा दिया. संगीता की टाइट कुंवारी चूत की खुरदरी चिकनी दीवारें उंगली को जकड़ रही थीं. मैं उंगली अंदर-बाहर करने लगा, जीभ से उसका दाना चूसता रहा. संगीता का शरीर थरथरा रहा था और उसकी खुशबू और भी तेज हो गई थी. जिसने मेरे लंड को सातवें आसमान पर ला खड़ा किया. उसका रस मेरे मुँह में मिश्री की तरह घुल रहा था, और मैं उसे चाट-चाटकर साफ कर रहा था। मैंने उसकी गांड के नीचे हाथ डाला और उसे थोड़ा ऊपर उठाया ताकि उसकी चूत मेरे मुँह में और गहराई तक जाए.
संगीता: आह्ह… भैया… उफ्फ…
मैंने अपनी मध्यमा उंगली उसकी दरार पर ऊपर-नीचे, और तर्जनी और अनामिका उंगली उसकी योनि के बाहरी हिस्से पर फेरनी शुरू कर दी. मेरा बायाँ हाथ उसके स्तनों को मसल रहा था और दायाँ हाथ उसके चूत के होंठों को चौड़ा करके फैला रहा था, उसके शरीर में मानो करंट लग रहा हो. मैंने अपनी मध्यमा उंगली अपनी छोटी बेहन की योनि में गहराई तक डाल दी अचानक हुए इस प्रवेश से वो सिहरने लगी,
मैंने अपने अंगूठे से उसकी चूत के ऊपरी हिस्से को सहलाना शुरू किया, और अपनी मध्यमा उंगली उसकी मीठी चूत में अंदर-बाहर करने लगा. वो अविश्वसनीय रूप से गर्म, कसी हुई और गीली थी.
अब मैं उसे चोदने के लिए बेताब हो चुका था. वो मेरे सामने नंगी लेटी हुई थी. मैं भी उसकी चूत से मुंह हटाता हुआ थोड़ा उठा और अपने लंड को अंडरवियर से आजाद करता हुआ उसकी आंखों के सामने ले आया.
लंड को देख उसकी आंखें आश्चर्य और भय से फैल गई.
संगीता: (कांपती हुई आवाज में) इतना बड़ा…भैया… यह क्या है? मैं: क्यों तुम्हें नहीं पता? संगीता: पता है पर मैंने पहली बार देखा है. सच में यह ऐसा होता है, कितना मोटा और बड़ा है. मैं: सोचो जब यह तुम्हारी चूत में जाएगा तब कैसा लगेगा? संगीता: (धीरे से फुसफुसाते हुए) नहीं भैया नहीं नहीं. आप क्या इसे अंदर डालने वाले हैं? मैं: यह चूत में ही तो डाला जाता है. संगीता: भैया मैं कैसे समझाऊं, मैं तैयार नहीं हूं इस चीज के लिए. मुझे बहुत डर लग रहा है. मैं: मुझ पर भरोसा रखो मेरी जान. कुछ नहीं होगा बस थोड़ा सा दर्द बर्दाश्त कर लो, सब ठीक हो जाएगा.
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए मेरे लंड का एहसास करने की कोशिश कर रही थी.
संगीता: कितना गरम और मजबूत है यह. मैं: तुम्हें अच्छा लगा?
यह सवाल सुनकर सुनकर वो शर्मा गई. तभी मैंने उसे चूमते हुए बिस्तर पर अच्छे से सुला कर,
मैं: संगीता, आज साथ दे दो मेरा.
उसका चेहरा यह सुनकर रोने जैसा हो गया.
संगीता: नहीं भैया, बहुत दर्द होगा. मैं: डरती क्यों हो? मैं हूं ना तुम अकेले नहीं हो. संगीता: भैया धीरे से करना प्लीज?
मैंने लंड को चूत के मुंहाने पर रगड़ा. संगीता काँप उठी, उसकी छोटी सी चूत के होंठों को खोलकर उसमें अपने लंड का सुपाड़ा फसाया और धीरे से दबाव डाला. मेरा मोटा लंड का सुपाड़ा संगीता की तंग, कुंवारी चूत में घुसा. वो जोर से कराही –
संगीता: आआआह्ह्ह… दर्द हो रहा है भैया…! मैं: शशशश...धीरे बोलो कोई सुन लेगा.
आधा इंच… एक इंच… लंड अंदर गया ही था कि संगीता की आँखों में आँसू आ गए. उसने मेरे पीठ पर नाखून गाड़ दिए. मैं भी उसके होंठों को चूमता रहा और उसके आँसू चाट कर बोला.
मैं: शांत हो जा मेरी जान… मैं तुम्हारा भैया हूँ… तुम्हें दर्द नहीं पहुँचाना चाहता हूँ.
यह सुन संगीता को थोड़ा राहत मिला. मैंने भी उसकी कमर पकड़ी और धीरे-धीरे दबाव डाला. मेरा लंड लगभग 2 इंच अंदर घुस गया था. दर्द की लकीरें संगीता के चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रही थी. मैंने धीरे से उसके माथे को चुमा. मैं अपने लंड को इस दो इंच में अंदर बाहर कर चोद रहा था. उसकी चूत ने मुझे पूरी तरह से जकड़ रखा था. जब और आगे बढ़ने की कोशिश किया तो मैंने देखा कहीं मेरा लंड फस रहा है. मैं समझ गया की यह मेरी बेहन की सील है पूरा मजा देने के लिए तोड़ना ही पड़ेगा और दर्द तो होगा ही.
उसको अभी दर्द नहीं देना चाहता था इसलिए वहीं रुक कर अपने तीन इंच लंड से धीरे-धीरे अंदर बाहर चोदता हुआ संगीता से बातें करने लगा.
मैं: चूत कितनी टाइट है तुम्हारी, बहुत मजा आ रहा है. तुम कैसा महसूस कर रही हो?
संगीता थोड़ा नॉर्मल हो गई थी और वो भी 2 से 3 इंच लंड को अपने चूत में अंदर बाहर चूदवाते हुए मजा ले रही थी. लेकिन उसे क्या पता अभी तो अच्छे से आधा लंड भी नहीं घुसा है.
संगीता: भैया, आह … बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसे ही धीरे-धीरे करते रहो. क्या आपने पूरा डाल दिया? मैं: अभी नहीं, अभी आधे से ही कर रहा हूं.
यह सुनकर वह चौंक गई,
संगीता: क्या अभी आधा ही गया है? मुझे तो अभी से रह रहकर दर्द हो रहा है. मैं: आगे तुम्हारी सील है जिसे तोड़ना है, बस एक बार थोड़ा सा दर्द होगा. क्या तुम तैयार हो? तुम यही चाहती थी ना की मैं तुम्हें प्यार करूं? संगीता: भैया आपका बहुत बड़ा है मुझे बहुत दर्द होगा. आप आराम से करना. मैं: बस एक बार और दर्द होगा. अपने भैया पर भरोसा रखो, चीखना नहीं वरना मम्मी पापा जग जायेंगे. संगीता: भैया मुझे बहुत दर्द होगा. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी, प्लीज आप धीरे से करना.
मैं और छोटे-छोटे धक्के लगाकर अब थोड़ा और अंदर घुसा दिया. संगीता की चूत की दीवारें बुरी तरह खिंच रही थीं, उसे लगा कि भैया का लंड उसकी चूत में छेद करता हुआ अंदर घुस रहा है.
संगीता: उफ्फ़… आह्ह्ह्ह… भैया… मैं मर जाऊँगी… बहुत जल रहा है… ऊं…ऊं…. आ..उई मां…. बहुत दर्द हो रहा है.
उसका पूरा शरीर पसीने से तर था. दर्द असहनीय था, लेकिन मेरा लंड अभी भी पूरा नहीं घुसा था.
मैं संगीता को बहला रहा था,
मैं: शांत मेरी जान… भैया है तुम्हारे पास डरो मत… बस थोड़ा और… मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ… मेरी बेहन…
मैंने थोड़ी देर उसकी चूचियों को सहलाया धीरे-धीरे मसला फिर निप्पल को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा उसका दिमाग भी थोड़ा शांत हो गया. तभी मैंने संगीता के कंधों को अच्छी तरह से पकड़ा और अपनी सारी ताकत इकट्ठा की धीरे से लंड को बाहर खींचा और पूरी ताकत से जोर का धक्का मारा.
अचानक एक झटके में पूरा लंड मेरी बेहन की चूत में सील तोड़ता हुआ अंदर बच्चेदानी तक घुस गया और इसके साथ उसकी सील टूट गई.
संगीता की चीख निकल गई – आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!! नहीं… आह्ह्ह्ह!!! बहुत दर्द… जल रहा है…!!!आआआह्ह्ह्ह!!! भैया… दर्द… बहुत दर्द… हो रहा है मैं मर जाऊंगी.
मैंने झट से उसके मुंह को दबा दिया की आवाज बाहर न जाए.
मैं: चुप... शशशश...चुप...हो जाओ, बस हो गया.
उसके आँसू बहने लगे. संगीता की चीख आज भी मेरे कान में गूंजती है. दर्द इतना तीखा और भयानक था कि जैसे कोई गर्म लोहे का सलाखा उसकी चूत में ठोंक दिया गया हो. उसकी सील के टूटने के साथ चूत से निकलते हुए खून ने मेरे लंड को भी रंग दिया.
वो तड़प-तड़पकर अपने नितंब हिला-हिलाकर लंड निकालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैंने उसे मजबूती से दोनों हाथों से जकड़ रखा था. यह बात तो मैं जानता था कि सिर्फ सील तोड़ना ही काफी नहीं है कुछ झटका और मारना जरूरी है तभी अगली बार के लिए वो तैयार हो पाएगी क्योंकि यह उसकी पहली चूदाइ है.
संगीता: भैया… प्लीज निकालो… मैं मर रही हूँ… आह्ह्ह… बहुत जलन… खून निकल रहा है…!
उसके आँसू लगातार बह रहे थे, होंठ काँप रहे थे. दर्द की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि संगीता का शरीर ढीला पड़ गया, बस हल्की-हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं.
मैंने अपना लंड बाहर नहीं निकाला और संगीता को धीरे धीरे चोदने लगा. उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. इसीलिए मैंने चार पांच धक्के और मारकर अपना लंड बाहर निकाल दिया.
मैं: क्या हुआ मेरी गुड़िया? अब तो दर्द नहीं हो रहा है ना? संगीता: (सीसकते हुए) बहुत जलन हो रहा है?
मैं: अच्छा रुको मैं कुछ करता हूं.
मैंने टेबल के ड्रॉ में से टिशू पेपर निकालकर उसकी चूत को अच्छे से साफ किया और थोड़ा नारियल तेल लगा दिया जिससे की जलन थोड़ा कम हो जाए. यह देख उसे थोड़ा अच्छा लगा. फिर उसे अपनी बाहों में भर उसके माथे को चूम कर उसे सुलाने की कोशिश करने लगा. वो कुछ भी नहीं बोल रही थी शायद यह उसके लिए एक सदमे की तरह था पर वो इस बात से निश्चिन्त हो चुकी थी कि उसका डर खत्म हो चुका है. आखिर में उसने भी अपना होंठ बढ़ाया और मेरे होठों को चुमा. उसके बाद चुपचाप मुझे पकड़ कर सो गई.
यह रात एक कयामत की रात थी क्योंकि मैंने आज अपनी बेहन को चोदा था और वो कोई आम चूदाइ नहीं बल्कि सील तोड़ने वाली चूदाइ थी. सच में यह मेरे लिए तीसरा चूत था लेकिन टाइट होने का इतना मजा मिलेगा मुझे पता नहीं, पर उस बेचारी के लिए तो यह काफी दर्द भरा रहा है.
अगले दिन संगीता ब्रश कर रही थी और मैं वैसे ही बेडरूम में लेटा था, मम्मी रूम में झाड़ू लगाने आई. हमसे एक बड़ी गलती हो गई कल रात सील तोड़ने के चक्कर में जो खून बेडशीट पर गिर गया था उसके धब्बे साफ दिख रहे थे. हम वो बेडशीट हटाना भूल गए. मम्मी की नजर उस पर पड़ गई.
मम्मी: संगीता इधर आना.
यह सुन मैं भी घबरा गया. लेकिन मैंने कोई गलत कदम ना उठाते हुए चुपचाप वैसे ही लेटा रहा आंख बंद करके. तभी संगीता के आने की आवाज भी मैंने सुनी बेडरूम में. मैंने फिर भी आंख नहीं खोला.
मम्मी: राहुल ...राहुल, उठ जा सुबह हो गई. जा 5 मिनट के लिए बाहर मुझे संगीता से बात करनी है.
मेरी घबराहट और बढ़ गई की कहीं मम्मी संगीता का चेहरा देखकर कुछ और ना समझ ले. मैं चुपचाप बाहर की ओर चला गया और अंदर क्या बात हुई मुझे कुछ नहीं पता, वो तो सिर्फ संगीता ही जानती थी. पर यह कोई ऐसी बात नहीं थी कि मैं मम्मी के सामने उससे पूछ पाता. मैंने सही समय का इंतजार किया और जैसे ही मम्मी नहाने के लिए बाथरुम में गई मैंने तुरंत संगीता को साइड में ले जाकर पूछा.
संगीता: मम्मी उस बेडशीट के बारे में पूछ रही थी. मैं: फिर तुमने क्या कहा? संगीता: मैं झूठ बोल दिया कि मेरा पीरियड था, मैं व्हिस्पर पैड लगाना भूल गई थी और डांट रही थी कि ध्यान रखूं उन चीजों पर. मैं: अब कैसा है दर्द? संगीता: चूत का?
उसके मुंह से यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, और मैं उसे देख मुस्कुरा दिया और साथ ही उसके होठों को भी चूम लिया, वो भी हल्का सा मुस्कुराई.
संगीता: दर्द कल रात से तो कम ही है. जलन हो रही है बस.
तभी मम्मी बाथरूम से आई,
मम्मी: जाओ संगीता नहा लो. संगीता: हां जा रही हूं.
कह कर मम्मी भी पीछे आंगन में चली गई बाल सुखाने के लिए. मैं भी उसके पीछे-पीछे उसके पास गया बात को संतुलित करने के लिए.
मैं: क्या हुआ, आप संगीता को डाट क्यों रही थी? मम्मी: कुछ नहीं, यह लड़की ध्यान रखती नहीं है किसी चीज का? उम्र हो गई है कम से कम पीरियड्स में पैड पहनना चाहिए था. पूरा बेडशीट गंदा कर दिया. मैं: बेडशीट? मुझे तो नहीं दिखा कुछ ऐसा. मम्मी: तुझे सोने से फुर्सत मिले तब तो दिखेगा ना. तू तो गहरी नींद में सोया था. मैं: अच्छा सुनो ना, बहुत मन कर रहा है आपसे प्यार करने का. मम्मी: अब यहां कैसे हो सकता है तू ही बता? मैं: बाहर चले? मम्मी: धीरे... क्या बोल रहा है? बाहर कहां जाएंगे? मैं: रुको मैं कुछ सोचता हूं, आप बस संगीता से बहाना बना दो कि हम मार्केट जा रहे हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) अगर कुछ गड़बड़ हुई तो तुझे छोडूंगी नहीं. मैं: भरोसा रखो कुछ नहीं होगा.
मम्मी ने मेरा कहना मानते हुए ठीक वैसा ही किया जैसा मैंने कहा था. वो सुंदर सी हरे रंग की साड़ी पहनकर चलने को तैयार हो गई. जाते वक्त मैं संगीता से नजरे मिलाते हुए उसे बाय कहने की कोशिश की. वो शर्म से मुस्कुराते हुए अंदर चली गई. अब मैं और मम्मी आजाद थे. रास्ते में,
मम्मी: हां तो क्या सोचा तुने? मैं: यही कुछ दूरी पर एक लॉज है. वहां चलते हैं. मम्मी: अरे पागल हो गया है. इधर कोई आसपास हमें देख लिया तो? मैं: फिक्र मत करो वो ऐसी जगह है जहां जल्दी लोग आते जाते नहीं है और खास करके प्यार मोहब्बत करने के लिए ही आते हैं. वो जगह चूदाइ के लिए मशहूर है. छोटा कमरा है पर ठीक है. मम्मी: (पीठ पर थपकी मारते हुए) तू भी ना क्या-क्या करवाएगा?
जब हम लॉज पहुंचे तो शायद वहां उस वक्त कोई नहीं था सिवाय लॉज मैनेजर के. मैंने मम्मी को लॉज के गेट के अंदर खड़ा रहने को कहा और फिर मैनेजर से बात करने गया जो कि बाहर ही छांव में काउंटर टेबल लगाकर बैठा था. उसकी नजर मुझ पर और मम्मी पर मम्मी पर था.
मैं: कमरा चाहिए? लॉज मैनेजर: हां हां समझ गया. कितने घंटे के लिए? मैं: 4 घंटे के लिए. लॉज मैनेजर: आज तो आंटी की जान लेकर रहोगे. कौन है यह? मैं: पड़ोस की ही एक औरत है. लॉज मैनेजर: कैसे पट गई यार इस उम्र में? इतनी मस्त माल तुमने कैसे पटाया?
मम्मी को देखकर उसकी नियत भी डगमगा गई. थोड़ा रुक कर धीरे से कहने लगा,
मैं: अच्छा अपना नाम तो बता दो? मैनेजर: तुम मुझे आदि कहकर बुला सकते हो.
क्योंकि वह एक बहुत छोटा सा लॉज था सब काम आदि ही देखा था, बस नाम का मैनेजर था.
आदि: यार आंटी से बात करो ना कोई उसके पहचान में और औरतें होगी. मेरी भी सेटिंग करवाओ. मैं: तुम्हारे यहां तो इतनी औरतें आती है फिर किसी से भी कर लो. आदि: यही तो रोना है. औरतें बहुत कम आती है जल्दी नहीं आती खास करके जवान लड़के और लड़कियां ही आते हैं. मुझे तो ऐसी ही रस भरी औरतें पसंद आती है. मैं: अच्छा ठीक है मैं बात करूंगा.
मम्मी यह सब दूर से देख रही थी और सोच रही थी कि "इतनी लंबी क्या बात चल रही है इन दोनों में."
आदि: अच्छा सुनो, आंटी से ही बात करो ना अगर पैसे लेकर कुछ कर दे मेरा... मैं: अरे यार वो ऐसी औरत नहीं है. बहुत मेहनत करनी पड़ती है पटाने के लिए. आदि: अच्छा ठीक है पर मेरा ध्यान रखना.
मैं: हां ठीक है. लाओ एक पानी की बोतल दो.
मैं जब उसे पैसा पूछा,
आदि: यार देखो वैसे तो मैं 4 घंटे के दो हजार रुपए लेता हूं तुम हजार ही दे दो. तुम्हारी आंटी मुझे बहुत पसंद आई और अपना नंबर भी दे दो मुझे.
वो सच में पागल हो चुका था. मम्मी को देखने के बाद उसके अंदर की सारी वासना जाग उठी. मैं जब पैसा चुका कर फिर मम्मी के पास गया, वो मेरे तरफ घूरते हुए बोली,
मम्मी: क्या बातें चल रही थी इतनी देर से? मैं: ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो बस उससे मोलभाव कर रहा था. मम्मी: कितना पैसा लिया? मैं: हजार में मान गया. मम्मी: फिर भी कितना महंगा है! मैं: चलो आप ज्यादा मत सोचो.
हम कमरे में पहुंचे तो बहुत छोटा था कमरा लेकिन हमें भी कौन सा पूरी जिंदगी रहना था. हमें तो चूदाइ की आग बुझाना था. मम्मी शरमाते हुए मेरी तरफ देखने लगी मैं भी उसे चुम्मा देकर आश्वासन दिया.
मैं: कुछ सोचने की जरूरत नहीं है. अपने आप को बस मेरे हवाले कर दो.
वो थोड़ी सी बेचैन थी उसके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था. आज से पहले कभी भी वो चूदाइ के लिए खास करके किसी गेस्ट हाउस, होटल या लॉज में नहीं आई थी.
मम्मी: तुझे पक्का पता है यहां कोई खतरा नहीं है? मैं: इतना सोचती क्यों हो? मम्मी: कैसे नहीं सोचूं. घर पर तेरी जवान बहन यह सोच रही होगी कि उसकी माँ मार्केट गई है. तेरे पापा इस बात से निश्चिंत होंगे कि उसकी बीवी घर पर उनका इंतजार कर रही होगी. और यहां मैं, लॉज में रंगरलिया मना रही हूं. मैं: मैंने कहा ना आप घबराहट छोड़ो और अपने आप को बस मेरे हवाले सौंप दो.
मैं भी उसे बाहों में कस कर चुम्मा लेना शुरू कर दिया, उसके मुंह के स्वाद को चखने लगा. एक दिन बिना चोदे जो बीता था ऐसा लग रहा था जैसे सदियों बीत गए हैं. उसने भी धीरे-धीरे गर्मी को महसूस करते हुए अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और फिर मुझे जकड़ने लगी. मैं भी उसे नीचे की तरफ बेड पर सुला दिया और फिर चूमना शुरू रखा साथी साथ उसके ब्लाउज के हुक भी खोलने लगा. उसने भी साथ देते हुए पेटीकोट में हाथ डालकर अपनी साड़ी को नाभि के नीचे से बाहर निकाल दिया और खोलकर साइड में फेंक दिया. मम्मी ने बहुत सुंदर सी एक बैंगनी रंग की ब्रा पहनी थी.
साड़ी की पूरी तरह से खुलने के बाद मैं भी अपना हाथ उसके जांघों पर सहलाने लगा. पीछे से मेरा लंड पैंट के अंदर से ही उसके गांड से चिपक गया तभी मैंने उसके कान को भी चूसना शुरू कर दिया जिससे उसकी हवस और बढ़ने लगी. और धीरे-धीरे सिसकारियां भी छूटने लगी.
मम्मी: इश्श्श्श....
मैं भी और तेजी से कभी उसके कान को काटता तो कभी चुस्ता. फिर धीरे से उसके पेटिकोट का नाडा भी खोल दिया. नाड़ा खुला तो देखा उसने काले रंग की पैंटी पहनी थी.
मैं: क्या बात है, आज मैचिंग मैचिंग नहीं पहनी? मम्मी: जो मिल गया वो पहन ली. क्यों अच्छा नहीं है?मैं: बहुत अच्छा है मेरी माँ.
माँ शब्द सुन के वो थोड़ा शरमाई. तभी मैं फिर से उसके गालों को पकड़ के एक बार फिर से उसके होठों को चूसा. और ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियां मसलने लगा. जैसे-जैसे ब्रा नीचे फिसलता गया उसकी चूचियां बाहर आने लगी, उसके हल्के भूरे गुलाबी रंग के निप्पल को मैंने चूसना शुरू कर दिया. उसके बदन में भी फिर से एक बार करंट दौड़ने लगा और दूसरी हाथ उसके पैंटी के अंदर डालकर उसकी चूत के बालों वाले हिस्से को और फिर उसकी चूत के दाने को सहलाने लगा. जिससे वो अब थोड़ा और बेचैन मालूम पढ़ने लगी.
मम्मी: उम्म् ...मम्म्म...ऊऊह्ह्ह्ह...
मैं भी उसकी बेचैनी बढ़ाता हुआ नीचे जा पहुंचा जहां उसके गुलाबी पंखुड़ियों वाली मुलायम चूत थी. कल रात जैसा प्यार मैंने संगीता की चूत को दिया था, मम्मी की चूत को भी ठीक ऐसा ही प्यार करने लगा. मम्मी ने भी अपना हाथ बढ़ाकर मेरे बालों को सहलाने लगी और मेरा जीभ उसकी चूत के मुहाने को चोदने लगा. उसके चूत के होंठ फड़फड़ाने लगे. मैंने उसे शांत करने के लिए तुरंत लपक कर उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया और बीच-बीच में अपना जीभ उसके मुतने की छेद पर
चलाने लगा.
अब तो वो पागल सी हो गई, मेरा सर पकड़ कर ऊपर खींचते हुए मेरे होठों को चाटने लगी. दूसरा हाथ मेरे पैंट में डालकर लंड को बाहर निकलने लगी. मैं भी तुरंत अपना टी-शर्ट और पेंट उतरना शुरू कर दिया लेकिन उसने मेरा लंड अभी भी नहीं छोड़ा और आगे पीछे हिलाते रही. आज मुझे उसकी आंखों में असली चूदाइ का प्यास नजर आ रहा था. मेरा लंड लोहे की तरह मजबूत हो चुका था उसने तुरंत उसे पड़कर अपनी चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया.
जब हम दोनों की नजर मिली तो वो मुस्कुराते हुए फिर लंड को चूत पर रगड़ रही और पता ही नहीं चला कैसे उसने अपने ही हाथ से लंड के सुपाडे को चूत के अंदर घुसा लिया. फिर देर किस बात की थी, मैंने भी जोरदार धक्का देते हुए चोदना शुरू कर दिया.
मैं उसे चोदता रहा वो सिसकारी भारती रही. मेरी हवस का भी ठिकाना नहीं था, जांघों से जांघे टकरा रही थी और चूत से लंड. उसके जुबान पर सिसकारी के साथ आंखों में हल्के आंसू भी थे लेकिन यह कोई दुख के आंसू नहीं बल्कि चर्मसुख का एहसास था.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह……. मैं: आह्ह्ह…कैसा लग रहा है मम्मी... मम्मी: आश्श्श्श...आअह्ह्ह्ह...बहुत अच्छा...आह्ह्ह्हह
और 10 से 12 झटको के बाद, मैंने कुछ ऐसा सुना जिससे मुझे अपने कान पर यकीन नहीं हुआ,
यह क्या मम्मी ने "चोद" कहा. क्या यह मेरी वही माँ है जो बहुत संस्कारी होने के साथ-साथ पतिव्रता भी थी और आज मुझे चोदने को कह रही है.
मैं: आअह्ह्ह्ह...मम्मी थोड़ा जोर से... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...बेटा..
.चोद मुझे...चोद अपनी माँ को...ऊऊह्ह्ह्ह मैं: ओ...हां माँ...देखो आपका बुर चोद रहा हूं... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...ओहो
... मेरा बुर...आअह्ह्ह्ह...कैसा है बेटा... मैं: आपका बुर तो जन्नत का रास्ता है मेरी माँ... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...मेरा बुर...चोद...ओहो...
मम्मी के मुंह से बोले हुए गंदे शब्दों ने और मेरा उन शब्दों का जवाब देने की वजह से मम्मी भी अपने चरम सुख के सीमा की आखरी सीढ़ी चढ़ चुकी थी और मैं भी उसके साथ सुर में सुर मिला रहा था. उसने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे दोनों गांड पड़कर अपनी चूत में दबाने लगी. चार-पांच झटके और हम दोनों पानी पानी हो गए.
हम बहुत थक गए थे मैंने मम्मी को पानी पिलाया और पूरा बिस्तर भी गीला हो गया था हम दोनों के तरल वीर्य निकलने से.
मम्मी: अब चले? मैं: अभी कहां,अभी तो दो ही घंटे हुए हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) मतलब मानेगा नहीं... राहुल बिस्तर बदलना होगा. मैं: रुको मैं बोल कर आता हूं मैनेजर को. मम्मी: मैं बाहर चली जाती हूं. मैं: नहीं घबराती क्यों हो यही रुको ना. मम्मी: वो यह सब देखेगा तो क्या सोचेगा? मैं: ओ मम्मी उसे पता है यहां सब क्यों आते हैं. मम्मी: चड्डी तो पहन लेने दे.
मम्मी ने कपड़े पहने और मैं फिर मैनेजर को बुलाने गया.
आदि: काम हो गया? मैं: अभी कहां अभी तो शुरू हुआ है. बिस्तर बदल दो खराब हो गया है. आदि: फिर भी अभी काम बाकी है? मैं: तुम होते तो दो घंटे में मान जाते क्या? आदि: नहीं यार. वो आंटी को तो मैं पूरा दिन रात चोदता रहूं. मैं: कहने की बात है, उसके सामने टिक नहीं पाओगे. आदि: तुम्हारी बात भी सही है. मैं: कुछ खाने को भी मंगा दो.
जैसे ही वो बिस्तर बदलने रूम में आया, मम्मी सावधान होकर खड़ी हो गई. उसकी आंखों में शर्मिंदगी था अपनी इज्जत को लेकर. आखिर दो जवान लड़के एक ही कमरे में उसके साथ खड़े थे जहां वो चूदी थी.
उसके जाते ही मम्मी ने राहत की सांस ली और फिर हमने हल्का-फुल्का नाश्ता किया.
मम्मी: शाम के 5 बज चुके हैं कब चलना है वापस? मैं: एक राउंड और करते हैं ना फिर चलेंगे. मम्मी: तूने तो मेरे बुर को ही थका दिया है. मैं: अच्छा आओ अब प्यार से धीरे-धीरे करते हैं.
मम्मी को फिर से एक बार नंगा करने के बाद इस बार दोनों चूचियों को सहलाना शुरू किया.
और फिर उसे बारी-बारी से चूसने लगा. वो भी में मेरे सीने पर चूम रही थी और बीच-बीच में निप्पल को चाट रही थी. कुछ देर की चुम्मा-चाटी के बाद इस बार मैंने मम्मी को पीछे घुमार अपनी बाहों में भरा. घुमा देने के बाद गांड के तरफ से उसकी एक जांघ को उठाकर अपने लंड को घुसाया. पहले की तरह नहीं लेकिन इस बार प्यार से धीरे-धीरे पूरी अंदर गहराई तक अपने लंड से उसके चूत को टटोलने लगा.
मम्मी को यह काफी आरामदायक और कामुक लग रहा था. उसने भी आह भरना शुरू कर दिया.
मैं: माँ क्या मैं आपके बुर को अच्छे से चोद रहा हूं ना.
मम्मी: इश्श्श्श...हां बेटा...
मैं साथ-साथ उसके गले को भी चूमने लगा और एक हाथ से उसके चूचि को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से चूत के दाने को सहला रहा था. और इन सब के साथ घपा घप लंड से उसकी चूत के सुरंग में अंदर तक चोद रहा था.
जिस तरह संगीता की चूत मुझे रोक रही थी अंदर डालने से, लंड को चारों ओर से पड़कर. मम्मी की चूत उससे बिल्कुल अलग था, क्योंकि पकड़ता तो मम्मी का चूत भी था मेरे लंड को. लेकिन बड़े प्यार से और जब मेरा लंड अंदर जाने की कोशिश करता तो वो उसे और अंदर आने की इजाजत देता था.
मैं: आज पहली बार ऐसा लगा जैसे आपने मुझे खुलकर अपना लिया हो. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) हो सकता है. मैं: खुलकर बोलो ना. मम्मी: आखिर सेक्स किसे अच्छा नहीं लगता. और वो भी जब उसका अपना बेटा ही चोद रहा हो. मैं: तो फिर आपने पहले इंकार क्यों किया था? मम्मी: क्योंकि मेरी भी तो इज्जत है ना बेटा और यह समाज. और एक चीज जो मुझे रोकती है वो है तेरे पापा. मुझे बहुत अजीब लगता है जब तुझसे सेक्स करते वक्त मुझे उनकी याद आ जाती है. क्योंकि मैं उनको धोखा दे रही हूं.
ऐसी खट्टी मीठी बातों के बीच चूदाइ का सिलसिला जारी था. मेरा लंड लगातार मध्यम रफ्तार उसकी चूत को गपा- गप चोदते जा रहा था.
मैं: अच्छा मेरी बात सुनो, मैं जानता हूं कि हम यह गलत कर रहे हैं. लेकिन एक माँ बेटा से पहले हम एक औरत-मर्द भी तो है. शरीर की कुछ ज़रूरतें होती है, और अगर वो घर में ही पूरी हो जाए तो उसमें क्या बुराई है? और किसी को पता थोड़ी ही चल रहा है. मम्मी: तेरा कहना तो ठीक है... पर. मैं: पर बर कुछ नहीं. बस अभी मेरे बाहों में आप ऐसे ही सुकून से रहो और हम दोनों एक दूसरे में खो जाए.
मेरी यह बात सुनकर, उसने भी कुछ कहना बंद कर दिया और मैं भी अपना मुंह बंद कर लिया और बस गहरी सुरंग की चूदाइ चालू थी. उसकी चूचियों को और हाथों से सहलाने लगा जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए. चूत भी गीला होकर पानी छोड़ रहा था और मेरा लंड उसकी गीले दलदल में अंदर बाहर फिसलता जा रहा था.
मम्मी: उम्म्... हां बेटा ऐसे ही...मम्म्म...ऐसे ही...ओह... मैं: मजा आ रहा है मम्मी... मम्मी: (हाँफते हुए)हां बेटा...मम्म्म...कैसी लगती है मम्मी तुझे? मैं: ओह...आप सबसे बेस्ट हो...
चोदते चोदते कब चार घंटा पूरा हो गया पता ही नहीं चला.
मम्मी: बेटा टाइम हो गया है. जल्दी-जल्दी कर...
तो मैंने फिर से एक बार अपने आप को उसके दोनों जांघों के बीच रखा और लंड को अंदर घुसाकर चूत को जबरदस्त तरीके से चोदने लगा और साथ ही साथ उसके दोनों चूचियों को पकड़ के दबाने लगा.
ऐसे ही लंड और चूत के घर्षण से हम दोनों फिर एक बार जोर से कराहते हुए चर्मसुख तक पहुंच गए और कुछ मिनट तक एक दूसरे के मुंह पर ही सांस छोड़ते रहे. बाद में मम्मी ने पीठ थपथपाया और चुम्मा देकर उठने को कहा.
मम्मी: जल्दी चल नहीं तो तेरे पापा भी आ जाएंगे उनका आने का टाइम हो गया है. मुझे नहीं देखेंगे तो फिर फोन आना शुरू हो जाएगा उनका.
मैं भी मम्मी का कहना मानकर तुरंत उठ खड़ा हुआ घर जाने के लिए. रास्ते में जाते वक्त मम्मी ने कुछ हरी सब्जियां ली और संगीता के लिए बर्गर. वैसे तो हमें कुछ लेना नहीं था क्योंकि हम कोई मार्केट करने तो नहीं निकले थे. लेकिन कुछ तो चाहिए था बहाना बनाने के लिए. शुक्र था पापा के आने से पहले हम घर पहुंच चुके थे. संगीता बैठकर टीवी देख रही थी.
संगीता: इतना लेट कैसे हो गया? मैं: वो रास्ते में मोटरसाइकिल बिगड़ गया था उसे ठीक करने में इतना टाइम लग गया. संगीता: ओह... मम्मी, सब्जी क्या बनाना है? मम्मी: रुक जा पापा से पूछ लेते हैं उनका क्या मूड है.
मुझे पता था संगीता को कल रात बहुत तकलीफ हुई थी और आज तो मम्मी ने भी लॉज में काफी मेहनत की थी.
मैं: क्यों ना आज हम सब बाहर खाने चले. संगीता: हां यह अच्छा आईडिया है. मम्मी: अच्छा रुको पापा से कह देती हूं. संगीता: नया सनशाइन रेस्टोरेंट खुला है ना, क्यों ना वहां का खाना ट्राई किया जाए.
मैं: हां हां चलते हैं मजा आएगा बहुत दिन हो गए ऐसे भी साथ बाहर गए हुए. संगीता: क्या भैया अभी तो मामा के यहां गए थे तो कितने बार तो हम बाहर जा चुके. मैं: मेरा मतलब वो जाना नहीं अपने परिवार के साथ जाने की बात कर रहा हूं.
फिर क्या था पापा भी घर आ गए थे और हम सब तैयार होकर रेस्टोरेंट के लिए निकल गए. हम सब में खाने का लुत्फ उठाया और हंसी मजाक करते हुए एक दूसरे के मन को हल्का किया. वाकई में खाना लाजवाब था सनशाइन रेस्टोरेंट का. और मेरी खुशी का तो ठिकाना नहीं था. क्योंकि मेरे पास तो दुनिया की सबसे बड़ी दौलत हाथ लग गई थी, मेरी माँ और बेहन.
देर रात हम सब घर लौटने के बाद थके हारे सोने चले गए. लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां... मुझे तो अभी नई नवेली पत्नी की तरह मेरी बेहन मिली थी जिसकी कुंवारी चूत के सील को कल ही मैंने तोड़ा था. क्या कसी हुई चूत थी. पिछली रात की तरह इस रात भी वो शर्मा रही थी लेकिन उसका अंदाज थोड़ा बदला बदला हुआ था.
संगीता: भैया जो हम कर रहे हैं क्या वो सही है? क्योंकि मैंने आज तक कभी ऐसा नहीं सुना की भाई बेहन का रिश्ता रोमांस में बदल जाए. मैं: तुम्हें एक बात बताऊं, यह आजकल बहुत नॉर्मल है. संगीता: आप झूठ बोल रहे हो, ऐसा भी कभी हो सकता है भला? मैं: क्यों नहीं है यकीन. संगीता: नहीं है, मैं कैसे मान लूं?
मैंने तुरंत अपना फोन उठाया और भाई बेहन वाले पॉर्न वीडियो लगा दिया. जब वो वीडियो शुरू हुआ तब तो सब कुछ नॉर्मल था. लेकिन जैसे ही कहानी रोमांस की तरफ बढ़ने लगी, किसिंग सीन देखकर संगीता ने मेरी हथेली को अपने हाथों में पकड़ लिया. लेकिन जैसे ही दोनों के नंगे होकर चूदाइ वाला सीन आया, यह देख संगीता की आंखें बड़ी हो गई. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इस तरह के अश्लील वीडियो भी होते हैं. वो भरोसा नहीं कर पा रही थी कि वाकई में वो अकेली नहीं है. ऐसे भाई बहन भी हैं जो आपस में प्यार करते हैं. यह देख उसने दांतो तले होंठ दबा लिया.
मैं भी देर ना करते हुए फोन को साइड में हटाया और उसे अपनी बाहों में भरकर चूमने लगा. उसके वही मुलायम रसीले होठों ने कल रात की याद ताजा कर दी.
मैं: (धीरे से उसके कान में) अब क्या हाल है चूत का? संगीता: क्या कहूं, बहुत जलन हो रहा है टॉयलेट करते वक्त. मैं: आओ मैं आराम दिला देता हूं. संगीता: (हल्की मुस्कुराहट के साथ) अच्छा, वो कैसे?
तभी मैंने उसे धीरे से बेड पर सुलाया और उसके होठों, कानों, गले को और कंधे को छटना और चूसना शुरू कर दिया. उसे भी अब अच्छा लगने लगा फिर धीरे-धीरे उसकी चूचियों को ऊपर से ही मसाले लगा उसकी भी गर्म सांसे मेरे मुंह पर छूटने लगी.
संगीता: और कौन सा जादू आता है आपको? मैं: देखना है? संगीता: हां.
उसके हां कहते ही मैं उसे गुदगुदी करने लगा और वो हंस पड़ी. जब उसकी हंसी शांत हुई, हम दोनों ने एक दूसरे को नशीली निगाहों से देखा. मेरा हाथ उसके शॉट पैंट को नीचे की तरफ खींच रहा था. यह देख उसने हाथों से अपनी आंखें छुपा ली और शर्म से जांघे दबाने लगी. मैं भी उसके नाभि के हिस्से को सहलाना शुरू किया जिससे उसके तन बदन में आग लगना फिर से शुरू हो गया. धीरे-धीरे जांघों को ढीला छोड़ दिया उसने तभी उसके कमर के नीचे हाथ लगाकर उसके शॉट पैंट ढीला करते हुए उसके पैंटी को भी सरका दिया, जिससे उसकी वो मासूम गुलाबी चूत का नजारा मेरे आंखों के सामने आ गया.
उसकी चूत ने अपने होंठ बंद कर रखे थे, सिर्फ एक हल्की लकीर सी दिखाई पड़ रही थी जो खुलने का इंतजार कर रही थी. चूचियां संतरे जैसी बीच में छोटा सा निप्पल गुलाबी रंग का मेरा तो रोम रोम खड़ा हो गया. आप खुद ही अंदाजा लगाइए मेरा क्या हाल हुआ होगा उस लड़की को कल रात चोद कर.
मुझे रहा नहीं गया, मैंने अपना मुंह फिर से उसके चूत की तरफ बढ़ाया उसे चाटने के लिए और अपनी बेहन का स्वाद फिर से चखने लगा. उसका स्वाद वैसा ही नमकीन और नशीला था. जब जीभ को उसकी चूत के दाने पर चलाना शुरु किया उसकी सिसकारियां निकलने लगी.
संगीता: आह्श्श्श्श...भैय्याआआ... मैं: अब तो जलन कम हो गया ना? संगीता: आह...हां...भैया ऐसे ही...
अपनी मध्यमा उंगली उसकी चूत के दरार पर रखता हुआ मैं दूसरी उंगली का सहारा लेकर उसकी होठों को फैलाया. फिर अपना पूरा जीभ निकाल कर उसकी चूत के छेद में घुसाने लगा. उसके पैरों में हलचल होना शुरू हो गया. मैं जीभ को अंदर बाहर करता रहा और वो भी खुलकर मजा लेने लगी, आखिर उसकी चूत की जलन थोड़ी शांत तो हो ही गई.
इधर मेरा लंड बेताब था उसे फिर से चोदने के लिए, इसीलिए मैंने भी अपने लंड को बाहर निकाल दिया. वो भी साथ दिखाते हुए उठकर मेरे लंड को पकड़ सहलाना शुरू कर दी.
संगीता: भैया मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मेरे हाथ में एक लंड है, वो भी अपने भाई का. मैं: किस्मत वालों को मिलता है संगीता यह.
उसने अपना कमर उठाते हुए मेरे लंड को चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया. उसकी गरम-गरम मुलायम चूत को महसूस कर मेरे बदन में जैसे चीटियां कटने लगी, लंड का तनाव पूरी तरह बढ़ चुका था. जैसे ही मैंने उसके पैर को फैलाते हुए लंड अंदर डालने की कोशिश की वो मुझे रोकने लगी. उसे कल रात का डर अभी भी सता रहा था.
संगीता: भैया बहुत दर्द होता है, रहने दो. मैं: अब थोड़ी होगा अब सब कुछ ठीक है. संगीता: नहीं-नहीं आपका बहुत मोटा है, कल मेरे अंदर गया था तो जैसे जान ही निकल गई थी. मैं: गुड़िया कल पहली बार था पर आज तुम्हारी चूत इस लंड को अपनाने के लिए तैयार है.
यह आश्वासन देते हुए, मैंने अपने लंड को उसकी चूत की रस से गिला करके अंदर डालने लगा. धीरे-धीरे लंड थोड़ा आगे बढ़ता गया, उसकी सांसे फिर से हल्की थम सी गई. वो अभी भी बहुत कसी हुई थी. कल जैसा तो नहीं पर लंड की चौड़ाई लंबाई को वो महसूस कर रही थी. अभी भी उसकी चूत काफी तंग थी, लंड को घुसने का रास्ता नहीं मिल रहा था.
संगीता: भैया बोला था मैंने, थोड़ा दर्द हो रहा है फिर से. मैं: एक काम करो मुझे थोड़ा तेल दो, तुम्हारी चूत को बहुत चिकनाई की जरूरत है.
उसने ढूँढते हुए ड्रॉअर से मुझे नारियल तेल दिया. मैंने उसे बेड का सहारा लेते हुए झुकने को कहा और पीछे की तरफ से तेल उसकी चूत में मसलने लगा. उसकी मखमली मुलायम चूत पूरी तरह तेल से सनी हुई थी.
फिर अपने लंड को चूत पर टीकाते अंदर की तरफ धक्का देने लगा और धीरे-धीरे फिसलन के कारण लंड भी उसकी चूत के मांसपेशियों को चौड़ा करता हुआ अंदर तक घुस रहा था. संगीता इस मीठे दर्द का एहसास कर सकती थी, उसके लिए थोड़ा अलग था. यह उसकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा खुशी पाने का अनुभव था. उसकी सिसकारियां अब आह में बदल गई.
संगीता: आह...भैय्या…..आअह्ह्ह्ह…..आअह्ह्ह्ह. मैं: मज़ा आ रहा है मेरी रानी को? संगीता: हां...भैया...मम्म्म...आह...
मैं उसके मीठे दर्द का एहसास खराब नहीं करना चाहता था. लेकिन अभी तक तो मैंने मध्यम रफ्तार भी नहीं पकड़ी थी और लंड अभी भी पूरा अंदर घुसना बाकी था. इसलिए मैं उसके कान के पास गया और उसके कान को चुमने लगा. क्या फूलों जैसी खुशबू थी उसके बालों की और उसके बदन की.
जब वो चुंबन और लंड का मज़ा एक साथ ले रही. तभी मैं थोड़ा तेजी बढ़ाते हुए और धक्का लगाते हुए अपने लंड को अपनी छोटी बेहन की चूत में पूरे अंदर तक पेल दिया.
संगीता: आआह्ह्ह्ह!!! भैया… और दर्द… हो रहा है...उफ्फ़… मैं: शांत हो जा मेरी जान… मेरी गुड़िया... थोड़ा दर्द सह लो, सब अच्छा हो जाएगा... संगीता: आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!!बस…बस्… और नहीं आह्ह्ह… मैं सह नहीं पा रही… बहुत दर्द… हो रहा है.
चूत की अंदरूनी दीवारें बुरी तरह खिंच चुकी थीं लंड का सुपाड़ा बच्चेदानी के मुंह पर ठोकर मार रहा था.
मैं: तुम्हारी चूत मेरे लंड को पूरा अंदर ले रही है… तुम बहुत टाइट हो… बहुत हिम्मती हो …बस आखिरी थोड़ा सा… फिर दर्द कम हो जाएगा और मजा आएगा… मैं तुम्हारा भैया हूँ… डरो मत…
धीरे-धीरे दर्द की तीव्रता कम होने लगी और उसकी जगह एक गहरी, भारी कामुकता ने ले ली. अब संगीता का दर्द कम हो गया था और उसे मजा आने लगा. मेरी भी गति धीरे-धीरे बढ़ी, पूरा लंड अब अंदर-बाहर होने लगा. संगीता की चूत पूरी तरह फैल चुकी थी और अब उसकी चिकनी, गीली, तंग दीवारें मेरे लंड को जकड़ रही थीं.
हर धक्के पर संगीता की छोटी चूत का मुंह बाहर निकलता, फिर अंदर चला जाता. हम दोनों की सांसें एक हो गईं. कमरे में चूत की गीली “पच-पच-पच” आवाज, संगीता की कामुक सिसकारीयां और मेरी गुर्राहट थोड़े मध्यम आवाज में गूंज रही थी क्योंकि बाहर मम्मी पापा भी तो थे.
तब मैं उसकी चूचियों को पकड़ कर जोर जोर से चोदने लगा. उसका चूत भी पानी छोड़ने लगा. अब कमरे में सिसकारियों के साथ शरीरों के टकराने की आवाज़ और गीली चुदाई की छप-छप की आवाज रह गई थी. संगीता के साथ ही मैं भी चरम पर पहुंच गया और हम दोनों एक साथ झड़ गए. अपना लंड बाहर खींच कर पूरा वीर्य उसकी गांड पर गिरा दिया. हम दोनों के पैरों में अब जान नहीं बची थी कि हम और देर खड़े रह पाए. संगीता ने जल्दी से अपने गांड पर गिरे हुए वीर्य को पोछा. कल रात की तरह कोई गलती ना हो जाए इसीलिए संगीता ने समझदारी दिखाते हुए बेडशीट बदल दिया और मेरे साथ बिस्तर पर गिर गई.
हम देर तक एक-दूसरे से चिपटे रहे. मैं संगीता को चूमता रहा.
संगीता: भैया… यह दर्द और मजे का मिश्रण… मैं कभी नहीं भूलूंगी.
हम दोनों पसीने से भीगे नंगे ही एक-दूसरे की बाहों में सो गए.
आखिरकार हम अपने घर आ ही गए. मामा जी के घर का यात्रा बहुत रोमांचक रहा इस बार. एक चीज मैं जरूर याद करूंगा और वो था हर रात मम्मी के साथ सुकून से उसकी चूदाइ करना. लेकिन यहां किस्सा उल्टा था, यहां मुझे संगीता के साथ सोने का मौका मिलता है ना की मम्मी के साथ. हालांकि मैं मम्मी का दीवाना हूं लेकिन संगीता के लिए वासना भी अब मुझ में कूट-कूट कर भरती जा रही है. आखिर बेहन को चोदने का मौका मिले तो कोई कैसे पीछे रह सकता है. वहां तो उसने मेरे हाथ लगाते ही मुझे रोक दिया था पर अब मौका था उसे अच्छे से मनाने और बहलाने का.
शाम को पापा आए और नए शहर में उनके अनुभव के बारे में हमें बताया और साथ ही साथ एक खुशखबरी भी दिया कि उनका प्रमोशन हो गया है.
पापा: अगले महीने से हम अपने घर का काम शुरू कर सकते हैं बनाने का.
इस बात से हम सभी खुश थे.
मैं: और वो कार अपने लेने को बोला था उसका क्या हुआ? पापा: वो भी ले लेंगे थोड़ा सब्र रखो.
हमेशा की तरह हमने साथ खाना खाया. क्योंकि मम्मी के साथ अभी खेल खेलना मुश्किल था. लेकिन मैं भी उसे छोड़ नहीं सकता था. खाने के बाद मैंने बहाना करते हुए उसे बुलाया पीछे आंगन में.
मैं: मम्मी मेरे गाड़ी की चाबी नहीं मिल रही है आपको मालूम है क्या? मम्मी: तूने रखा होगा ना मुझे कैसे पता. जाकर पीछे देख ले कहीं गाड़ी में तो नहीं लगा है.
मम्मी ने आते ही मेरी मुस्कुराहट का अंदाजा लगा लिया था कि मैं क्या चाहता हूं.और कहने लगी,
मम्मी: देख अब इन चीजों पर बहुत कंट्रोल रखना होगा. मामा का घर नहीं है, तुझे तो पता ही है इस छोटे से घर में संगीता हमेशा रहती है आंखों के सामने और रात को तेरे पापा. मैं: अभी तो आ जाओ, यहां कोई नहीं है. मम्मी: पागल हो गया है, समझाने पर भी नहीं समझता है. मैं: बस एक बार-एक बार.
कहकर मैंने उसे अपनी बाहों में भरते हुए चूमना शुरू कर दिया और साथ ही चूचियों को भी मसलने लगा.
वो बीच-बीच में बोलती रही,
मम्मी: छोड़ना, कोई ना कोई आ जाएगा फंस जाएंगे बात समझ. बस हो गया. मैं: कैसे बताऊं आपको मम्मी आपके बिना रह नहीं पाता हूं. मम्मी: मेरे बिना या फिर मेरे उसके बिना? मैं: उसके मतलब? मम्मी: चल छोड़ जाने दे. मैं: बोल भी दो. मम्मी: तेरा मन तो मेरी बुर में लगता है. मैं: उसमें तो लगता ही है पर आप में भी लगता है. मम्मी: हो गया-हो गया बस चल अभी यहां से.
हम दोनों अंदर गए, मम्मी पापा के साथ सोने हॉल में चली गई और मैं कमरे का दरवाजा बंद करके संगीता के पास. मेरे दरवाजा बंद करते ही संगीता सावधान हो गई और उसका सावधान होना भी जरूरी था. क्योंकि अब तक तो हम सिर्फ चुम्मा-चाटी का खेल खेलते रहे मामा के घर पर. यह वो लम्हा था जैसे एक पति अपनी नई नवेली दुल्हन के पास आता है दरवाजे को बंद करके.
मेरे पास पूरा रात था अपनी बेहन को समझाने और प्यार मोहब्बत के लिए. मुझे देख वो शर्माती हुई उसने अपनी नजर नीचे झुका लिया, पैरों को मोड़ लिया और सोने का नाटक करने लगी. यह बिल्कुल भी डर का माहौल नहीं था बल्कि संगीता बेहद शर्मसार थी इन घटनाओं से जो हम दोनों के बीच घटित हुआ इसीलिए ऐसे मौके पर वो हिम्मत नहीं कर पा रही मुझसे नज़रे मिलाने की. मैं भी उसके पैरों के पास जाकर बैठा.
मैं: क्या हुआ संगीता नाराज हो क्या?
उसका कोई जवाब नहीं आया. मैं यह सोचकर परेशान था और किस तरह से शुरुआत की जाए क्योंकि वहां तो संगीता थोड़ा बहुत मेरे रंग में रंगने लगी थी. लेकिन यहां अचानक ऐसा क्यों कर रही है. कम से कम बात तो करें.
पर मैं शायद थोड़ा अंधेरा होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाया. मैं उठा और मैंने रूम का लाइट चालू किया. फिर से संगीता के पास जाकर बैठा तो देखा उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी. वो बहुत ज्यादा शर्मा रही थी. मैंने उससे कुछ बातें करना शुरू कर दिया कि वो थोड़ा हल्का महसूस कर सके. उसकी ऐसी प्यारी मुस्कान को देख मैंने भी अपना हाथ आगे बढाकर उसके गालों को प्यार से चिकोटी भरा.
मैं: अच्छा एक बात बताओ, कभी कोई लड़का तुम्हारे पीछे पागल हुआ है? संगीता: बहुत थे लेकिन मैंने किसी को भाव नहीं दिया. मैं: ऐसा क्यों? संगीता: अपनी और परिवार की इज्जत… आप जानते हो ना? एक बार अगर कहीं बदनामी हो गई तो फिर क्या होगा. मैं: मेरी गुड़िया तुम तो बहुत समझदार हो. अच्छा तुम्हें कैसा लड़का चाहिए बताओ? संगीता: (दबी हुई आवाज में) आपके जैसा जो मुझे प्यार करें पर मुझे शर्म आती है. मामा जी के घर जो कुछ भी हमारे बीच हुआ, उससे पहले तो मेरा और आपका रिश्ता कुछ और ही था ना. मैं: शरमाती क्यों हो? प्यार की कोई सीमा नहीं होती.
यह कहकर मैंने उसे बाहों में जकड़ लिया.
संगीता: आपकी गर्मी से तो मैं गर्म हो जाती हूं.
मैं भी उसके होठों को चूमना शुरू कर दिया.
मैं: और तुम्हारे गुलाबी होंठ मुझे बेचैन कर देते हैं.
उसके मुंह से हल्का संतरे का स्वाद आ रहा था क्योंकि कुछ देर पहले उसने संतरे का जूस पिया था. वो बहुत रसीली लग रही थी.
और फिर धीरे-धीरे अपने हाथ को उसके स्तनों पर ले जाकर टिका दिया. यह देख उसने धीरे से मेरे कान में कहा,
संगीता: आपने पहले कभी इसे देखा है?
संगीता बहुत अनजान थी, मैंने भी उसे झूठ बोल दिया क्योंकि मेरे दिल की धड़कन बहुत तेजी से धड़क रहा था पहली बार उसकी चूचियों को देखने के लिए.
संगीता: आपकी धड़कन कितनी तेज हो रही है. मुझे भी अजीब सा अच्छा लग रहा है.
अब और नहीं, मैं अपने हाथ से उसके टॉप को थोड़ा ऊपर उठाया. उसने नीले रंग की ब्रा में अपनी चूचियों को छुपाए रखा था. यह देख वो भी अचंभा रह गई.
संगीता: शांत मेरे भैया मैं दिखाती हूं.
मैं उस पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि संगीता अपने हाथों से खुद मुझे अपनी चूची दिखाने जा रही थी. उसने पीछे हाथ डालकर अपना ब्रा का हुक खोल दिया और बाहों से ब्रा की पट्टी को निकलती हुई अपनी चूचियों को मेरे सामने रख दिया. मेरा तो देख कर बुरा हाल था की क्या यह मेरी वही बेहन है.
मेरी हथेलियां उन चूचियों पर फैल गईं. मैं धीरे-धीरे उन्हें सहलाने लगा, मसलने लगा, दबाने लगा. संगीता की सांसें तेज हो गईं. मेरी मजबूत बांह संगीता की कमर के चारों ओर लिपटी हुई थी. उसका का सिर मेरे सीने पर टिका था. यह घटना हम दोनों के अंदर आग सुलगा रही थीं.
संगीता: (नशीली आवाज में) भैया…
उसकी उंगलियां मेरे छाती पर घूम रही थीं.
मैं: मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. तुम्हारी यह नरम त्वचा, सांसों की महक… सब मुझे दीवाना बना रहा है.
शर्म से उसने अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया.
मैं: तुम्हारी आंखें कितनी भोली हैं, लेकिन आज इनमें आग है. एक प्यास दिख रही है बताओ ना, तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हें वो सब दूंगा जो चाहिए. संगीता: मुझे प्यार करो भैया...
मैं फिर से उसका चेहरा दोनों हाथों में थामा और धीरे-धीरे अपने होंठ उसके गुलाबी होंठों पर रख दिए. संगीता सिहर उठी. फिर धीरे-धीरे उसके निचले होंठ को हल्के से काटा, संगीता ने आह भर दी और मेरे होंठों को चूसने लगी. हमारी जुबानें मिलीं, नाचने लगीं. कमरे में सिर्फ हमारी सांसों और होंठों के चुस्कियों की आवाज गूंज रही थी.
संगीता: उम्म्म… भैया… मेरे होठों को आप से पहले किसी ने नहीं चूमा है आप पहले हो.
उसके गुलाबी निप्पल्स कड़े हो चुके थे. मैंने उसकी चूची को अपने हाथ से सहलाया और अपने चेहरे को उसकी चूची के पास ले जाते हुए अपने जीभ से जैसे छुआ, संगीता कांप उठी.
संगीता: सी…सी… आह…भैया...
निप्पल को दांतों से हल्का-हल्का काटने लगा. संगीता ने मेरा सिर पकड़कर अपनी छाती से चिपका लिया. मैं
उसकी चूची को जोर-जोर से पीने लगा और दूसरी चूची को जोर-जोर से दबाने लगा संगीता मजे से सिसकारियां भर रही थी.
संगीता: आह्ह्ह… भैया… आपकी उंगलियां…
मैं दूसरे चूची पर भी वैसा ही प्यार बरसाने लगा. कभी चूसता, काटता, जुबान से घुमाता. संगीता की चूचियां लाल हो गईं. फिर मैं नीचे की ओर सरक गया. मेरी जुबान उसकी नाभि तक पहुंची और नाभि को चूसने लगा, चाटने लगा, चुमने लगा. संगीता तड़प से मचल रही थी.
तभी मैंने सही वक्त देखकर उसकी पैंटी की इलास्टिक में उंगली फंसाई और उसकी पैंटी और पैजामा सहित नीचे खींचने लगा. उसने भी अपना हाथ बढ़ा कर अपनी पैंटी को पकड़ने की कोशिश पर शायद वो भी नहीं चाहती थी कि मैं रुकूं, उसकी उंगलियां ढीली पड़ने लगी.
पैंटी के थोड़ा नीचे सरकते ही मेरी सांसे थम सी गई. मैं अपने आप पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि मैं इस हद तक आगे बढ़ चुका हूं की अपनी माँ की चूत जो की नामुमकिन था, उसे हासिल करने के बाद अपनी बेहन की चूत के इतने करीब हूं. बिना बालों वाली, गुलाबी, कुंवारी चूत सामने आई. पूरी तरह साफ, छोटी-सी, और अब थोड़ी नम हो चुकी थी. उसकी खुशबू – कामुक, जवान लड़की की – कमरे में फैल गई. उसका दाना सख्त होकर उभरा हुआ था. उसका रस चमक रहा था.
मेरी भोली संगीता को शायद जरा भी अंदाजा नहीं था की चूत को चाटा भी जाता है. जैसे ही मैंने अपना होंठ उसकी चूत पर रखा,
संगीता: भैया नहीं, क्या कर रहे हो? वो गंदा होता है. मुंह हटाओ उधर से.
यह सुन मैं तुरंत उसके चेहरे के पास जाकर बोला
मैं: तुम्हारा कुछ भी मेरे लिए गंदा नहीं है मेरी गुड़िया.संगीता: भैया पर वहां से टॉयलेट करते हैं. मैं: तुम आंखें बंद करो और सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो. संगीता: नहीं भैया मैं आपको इस तरह से नहीं देख सकती. मैं: मेरी प्यारी, इतना प्यार करती हो मुझसे. संगीता: मैंने हमेशा आपकी इज्जत की है आप सोचिए मुझे कैसा लगेगा कि आप मेरे सामने ऐसे झुकें वो भी वहां जहां से मैं पेशाब करती हूं.
चूत को चटना कामवासना का एक भाग है यह संगीता के समझ में नहीं था. हो सकता है कि उसे शायद और भी चीज पता नहीं हो. मुझे अब काफी संभाल कर उसे हर एक चीज का एहसास दिलाना जरूरी था.
मैं: शांत हो जाओ, तुम्हारा भाई जानता है कि तुम्हारे लिए क्या सही है. मुझ पर भरोसा करती हो? संगीता: हां भैया. मैं: तो अपनी आंखें बंद कर लो और दिमाग को शांत करो.
उसने मेरा कहना माना और अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. मैं फिर से एक बार तैयार था उसकी उड़ान को ऊंचाई की ओर ले जाने को.
मैंने अपनी जीभ उसकी कुंवारी चूत पर रखी और धीरे-धीरे चाटना शुरू किया. उसकी चूत का स्वाद हल्का नमकीन और उत्तेजक था. मैंने उसकी फाँकों को जीभ से अलग किया और उसके दाने को चूसने लगा.
संगीता: आह्ह… ओह्ह… भैया… ये तो… आह्ह…
मैंने देखा उसकी आवाज थोड़ी तेज हो रही है कहीं बाहर मम्मी पापा को कुछ भनक न लग जाए, चूत को चाटते वक्त अपने हाथ को आगे बढ़ाते हुए मैंने अपनी एक उंगली को उसके मुंह में रख दिया तुरंत उसे चूसने लगी.
संगीता: उम्म्म्म्म....
वो अपने गांड को हिलाने लगी, और मैंने अपनी जीभ को उसकी चूत के अंदर तक डाला और जीभ से चोदने लगा. अपनी ऊंगली उसकी मुंह से निकाल कर उसी की चूत में घुसा दिया. संगीता की टाइट कुंवारी चूत की खुरदरी चिकनी दीवारें उंगली को जकड़ रही थीं. मैं उंगली अंदर-बाहर करने लगा, जीभ से उसका दाना चूसता रहा. संगीता का शरीर थरथरा रहा था और उसकी खुशबू और भी तेज हो गई थी. जिसने मेरे लंड को सातवें आसमान पर ला खड़ा किया. उसका रस मेरे मुँह में मिश्री की तरह घुल रहा था, और मैं उसे चाट-चाटकर साफ कर रहा था। मैंने उसकी गांड के नीचे हाथ डाला और उसे थोड़ा ऊपर उठाया ताकि उसकी चूत मेरे मुँह में और गहराई तक जाए.
संगीता: आह्ह… भैया… उफ्फ…
मैंने अपनी मध्यमा उंगली उसकी दरार पर ऊपर-नीचे, और तर्जनी और अनामिका उंगली उसकी योनि के बाहरी हिस्से पर फेरनी शुरू कर दी. मेरा बायाँ हाथ उसके स्तनों को मसल रहा था और दायाँ हाथ उसके चूत के होंठों को चौड़ा करके फैला रहा था, उसके शरीर में मानो करंट लग रहा हो. मैंने अपनी मध्यमा उंगली अपनी छोटी बेहन की योनि में गहराई तक डाल दी अचानक हुए इस प्रवेश से वो सिहरने लगी,
मैंने अपने अंगूठे से उसकी चूत के ऊपरी हिस्से को सहलाना शुरू किया, और अपनी मध्यमा उंगली उसकी मीठी चूत में अंदर-बाहर करने लगा. वो अविश्वसनीय रूप से गर्म, कसी हुई और गीली थी.
अब मैं उसे चोदने के लिए बेताब हो चुका था. वो मेरे सामने नंगी लेटी हुई थी. मैं भी उसकी चूत से मुंह हटाता हुआ थोड़ा उठा और अपने लंड को अंडरवियर से आजाद करता हुआ उसकी आंखों के सामने ले आया.
लंड को देख उसकी आंखें आश्चर्य और भय से फैल गई.
संगीता: (कांपती हुई आवाज में) इतना बड़ा…भैया… यह क्या है? मैं: क्यों तुम्हें नहीं पता? संगीता: पता है पर मैंने पहली बार देखा है. सच में यह ऐसा होता है, कितना मोटा और बड़ा है. मैं: सोचो जब यह तुम्हारी चूत में जाएगा तब कैसा लगेगा? संगीता: (धीरे से फुसफुसाते हुए) नहीं भैया नहीं नहीं. आप क्या इसे अंदर डालने वाले हैं? मैं: यह चूत में ही तो डाला जाता है. संगीता: भैया मैं कैसे समझाऊं, मैं तैयार नहीं हूं इस चीज के लिए. मुझे बहुत डर लग रहा है. मैं: मुझ पर भरोसा रखो मेरी जान. कुछ नहीं होगा बस थोड़ा सा दर्द बर्दाश्त कर लो, सब ठीक हो जाएगा.
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए मेरे लंड का एहसास करने की कोशिश कर रही थी.
संगीता: कितना गरम और मजबूत है यह. मैं: तुम्हें अच्छा लगा?
यह सवाल सुनकर सुनकर वो शर्मा गई. तभी मैंने उसे चूमते हुए बिस्तर पर अच्छे से सुला कर,
मैं: संगीता, आज साथ दे दो मेरा.
उसका चेहरा यह सुनकर रोने जैसा हो गया.
संगीता: नहीं भैया, बहुत दर्द होगा. मैं: डरती क्यों हो? मैं हूं ना तुम अकेले नहीं हो. संगीता: भैया धीरे से करना प्लीज?
मैंने लंड को चूत के मुंहाने पर रगड़ा. संगीता काँप उठी, उसकी छोटी सी चूत के होंठों को खोलकर उसमें अपने लंड का सुपाड़ा फसाया और धीरे से दबाव डाला. मेरा मोटा लंड का सुपाड़ा संगीता की तंग, कुंवारी चूत में घुसा. वो जोर से कराही –
संगीता: आआआह्ह्ह… दर्द हो रहा है भैया…! मैं: शशशश...धीरे बोलो कोई सुन लेगा.
आधा इंच… एक इंच… लंड अंदर गया ही था कि संगीता की आँखों में आँसू आ गए. उसने मेरे पीठ पर नाखून गाड़ दिए. मैं भी उसके होंठों को चूमता रहा और उसके आँसू चाट कर बोला.
मैं: शांत हो जा मेरी जान… मैं तुम्हारा भैया हूँ… तुम्हें दर्द नहीं पहुँचाना चाहता हूँ.
यह सुन संगीता को थोड़ा राहत मिला. मैंने भी उसकी कमर पकड़ी और धीरे-धीरे दबाव डाला. मेरा लंड लगभग 2 इंच अंदर घुस गया था. दर्द की लकीरें संगीता के चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रही थी. मैंने धीरे से उसके माथे को चुमा. मैं अपने लंड को इस दो इंच में अंदर बाहर कर चोद रहा था. उसकी चूत ने मुझे पूरी तरह से जकड़ रखा था. जब और आगे बढ़ने की कोशिश किया तो मैंने देखा कहीं मेरा लंड फस रहा है. मैं समझ गया की यह मेरी बेहन की सील है पूरा मजा देने के लिए तोड़ना ही पड़ेगा और दर्द तो होगा ही.
उसको अभी दर्द नहीं देना चाहता था इसलिए वहीं रुक कर अपने तीन इंच लंड से धीरे-धीरे अंदर बाहर चोदता हुआ संगीता से बातें करने लगा.
मैं: चूत कितनी टाइट है तुम्हारी, बहुत मजा आ रहा है. तुम कैसा महसूस कर रही हो?
संगीता थोड़ा नॉर्मल हो गई थी और वो भी 2 से 3 इंच लंड को अपने चूत में अंदर बाहर चूदवाते हुए मजा ले रही थी. लेकिन उसे क्या पता अभी तो अच्छे से आधा लंड भी नहीं घुसा है.
संगीता: भैया, आह … बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसे ही धीरे-धीरे करते रहो. क्या आपने पूरा डाल दिया? मैं: अभी नहीं, अभी आधे से ही कर रहा हूं.
यह सुनकर वह चौंक गई,
संगीता: क्या अभी आधा ही गया है? मुझे तो अभी से रह रहकर दर्द हो रहा है. मैं: आगे तुम्हारी सील है जिसे तोड़ना है, बस एक बार थोड़ा सा दर्द होगा. क्या तुम तैयार हो? तुम यही चाहती थी ना की मैं तुम्हें प्यार करूं? संगीता: भैया आपका बहुत बड़ा है मुझे बहुत दर्द होगा. आप आराम से करना. मैं: बस एक बार और दर्द होगा. अपने भैया पर भरोसा रखो, चीखना नहीं वरना मम्मी पापा जग जायेंगे. संगीता: भैया मुझे बहुत दर्द होगा. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी, प्लीज आप धीरे से करना.
मैं और छोटे-छोटे धक्के लगाकर अब थोड़ा और अंदर घुसा दिया. संगीता की चूत की दीवारें बुरी तरह खिंच रही थीं, उसे लगा कि भैया का लंड उसकी चूत में छेद करता हुआ अंदर घुस रहा है.
संगीता: उफ्फ़… आह्ह्ह्ह… भैया… मैं मर जाऊँगी… बहुत जल रहा है… ऊं…ऊं…. आ..उई मां…. बहुत दर्द हो रहा है.
उसका पूरा शरीर पसीने से तर था. दर्द असहनीय था, लेकिन मेरा लंड अभी भी पूरा नहीं घुसा था.
मैं संगीता को बहला रहा था,
मैं: शांत मेरी जान… भैया है तुम्हारे पास डरो मत… बस थोड़ा और… मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ… मेरी बेहन…
मैंने थोड़ी देर उसकी चूचियों को सहलाया धीरे-धीरे मसला फिर निप्पल को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा उसका दिमाग भी थोड़ा शांत हो गया. तभी मैंने संगीता के कंधों को अच्छी तरह से पकड़ा और अपनी सारी ताकत इकट्ठा की धीरे से लंड को बाहर खींचा और पूरी ताकत से जोर का धक्का मारा.
अचानक एक झटके में पूरा लंड मेरी बेहन की चूत में सील तोड़ता हुआ अंदर बच्चेदानी तक घुस गया और इसके साथ उसकी सील टूट गई.
संगीता की चीख निकल गई – आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!! नहीं… आह्ह्ह्ह!!! बहुत दर्द… जल रहा है…!!!आआआह्ह्ह्ह!!! भैया… दर्द… बहुत दर्द… हो रहा है मैं मर जाऊंगी.
मैंने झट से उसके मुंह को दबा दिया की आवाज बाहर न जाए.
मैं: चुप... शशशश...चुप...हो जाओ, बस हो गया.
उसके आँसू बहने लगे. संगीता की चीख आज भी मेरे कान में गूंजती है. दर्द इतना तीखा और भयानक था कि जैसे कोई गर्म लोहे का सलाखा उसकी चूत में ठोंक दिया गया हो. उसकी सील के टूटने के साथ चूत से निकलते हुए खून ने मेरे लंड को भी रंग दिया.
वो तड़प-तड़पकर अपने नितंब हिला-हिलाकर लंड निकालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैंने उसे मजबूती से दोनों हाथों से जकड़ रखा था. यह बात तो मैं जानता था कि सिर्फ सील तोड़ना ही काफी नहीं है कुछ झटका और मारना जरूरी है तभी अगली बार के लिए वो तैयार हो पाएगी क्योंकि यह उसकी पहली चूदाइ है.
संगीता: भैया… प्लीज निकालो… मैं मर रही हूँ… आह्ह्ह… बहुत जलन… खून निकल रहा है…!
उसके आँसू लगातार बह रहे थे, होंठ काँप रहे थे. दर्द की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि संगीता का शरीर ढीला पड़ गया, बस हल्की-हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं.
मैंने अपना लंड बाहर नहीं निकाला और संगीता को धीरे धीरे चोदने लगा. उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. इसीलिए मैंने चार पांच धक्के और मारकर अपना लंड बाहर निकाल दिया.
मैं: क्या हुआ मेरी गुड़िया? अब तो दर्द नहीं हो रहा है ना? संगीता: (सीसकते हुए) बहुत जलन हो रहा है?
मैं: अच्छा रुको मैं कुछ करता हूं.
मैंने टेबल के ड्रॉ में से टिशू पेपर निकालकर उसकी चूत को अच्छे से साफ किया और थोड़ा नारियल तेल लगा दिया जिससे की जलन थोड़ा कम हो जाए. यह देख उसे थोड़ा अच्छा लगा. फिर उसे अपनी बाहों में भर उसके माथे को चूम कर उसे सुलाने की कोशिश करने लगा. वो कुछ भी नहीं बोल रही थी शायद यह उसके लिए एक सदमे की तरह था पर वो इस बात से निश्चिन्त हो चुकी थी कि उसका डर खत्म हो चुका है. आखिर में उसने भी अपना होंठ बढ़ाया और मेरे होठों को चुमा. उसके बाद चुपचाप मुझे पकड़ कर सो गई.
यह रात एक कयामत की रात थी क्योंकि मैंने आज अपनी बेहन को चोदा था और वो कोई आम चूदाइ नहीं बल्कि सील तोड़ने वाली चूदाइ थी. सच में यह मेरे लिए तीसरा चूत था लेकिन टाइट होने का इतना मजा मिलेगा मुझे पता नहीं, पर उस बेचारी के लिए तो यह काफी दर्द भरा रहा है.
अगले दिन संगीता ब्रश कर रही थी और मैं वैसे ही बेडरूम में लेटा था, मम्मी रूम में झाड़ू लगाने आई. हमसे एक बड़ी गलती हो गई कल रात सील तोड़ने के चक्कर में जो खून बेडशीट पर गिर गया था उसके धब्बे साफ दिख रहे थे. हम वो बेडशीट हटाना भूल गए. मम्मी की नजर उस पर पड़ गई.
मम्मी: संगीता इधर आना.
यह सुन मैं भी घबरा गया. लेकिन मैंने कोई गलत कदम ना उठाते हुए चुपचाप वैसे ही लेटा रहा आंख बंद करके. तभी संगीता के आने की आवाज भी मैंने सुनी बेडरूम में. मैंने फिर भी आंख नहीं खोला.
मम्मी: राहुल ...राहुल, उठ जा सुबह हो गई. जा 5 मिनट के लिए बाहर मुझे संगीता से बात करनी है.
मेरी घबराहट और बढ़ गई की कहीं मम्मी संगीता का चेहरा देखकर कुछ और ना समझ ले. मैं चुपचाप बाहर की ओर चला गया और अंदर क्या बात हुई मुझे कुछ नहीं पता, वो तो सिर्फ संगीता ही जानती थी. पर यह कोई ऐसी बात नहीं थी कि मैं मम्मी के सामने उससे पूछ पाता. मैंने सही समय का इंतजार किया और जैसे ही मम्मी नहाने के लिए बाथरुम में गई मैंने तुरंत संगीता को साइड में ले जाकर पूछा.
संगीता: मम्मी उस बेडशीट के बारे में पूछ रही थी. मैं: फिर तुमने क्या कहा? संगीता: मैं झूठ बोल दिया कि मेरा पीरियड था, मैं व्हिस्पर पैड लगाना भूल गई थी और डांट रही थी कि ध्यान रखूं उन चीजों पर. मैं: अब कैसा है दर्द? संगीता: चूत का?
उसके मुंह से यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, और मैं उसे देख मुस्कुरा दिया और साथ ही उसके होठों को भी चूम लिया, वो भी हल्का सा मुस्कुराई.
संगीता: दर्द कल रात से तो कम ही है. जलन हो रही है बस.
तभी मम्मी बाथरूम से आई,
मम्मी: जाओ संगीता नहा लो. संगीता: हां जा रही हूं.
कह कर मम्मी भी पीछे आंगन में चली गई बाल सुखाने के लिए. मैं भी उसके पीछे-पीछे उसके पास गया बात को संतुलित करने के लिए.
मैं: क्या हुआ, आप संगीता को डाट क्यों रही थी? मम्मी: कुछ नहीं, यह लड़की ध्यान रखती नहीं है किसी चीज का? उम्र हो गई है कम से कम पीरियड्स में पैड पहनना चाहिए था. पूरा बेडशीट गंदा कर दिया. मैं: बेडशीट? मुझे तो नहीं दिखा कुछ ऐसा. मम्मी: तुझे सोने से फुर्सत मिले तब तो दिखेगा ना. तू तो गहरी नींद में सोया था. मैं: अच्छा सुनो ना, बहुत मन कर रहा है आपसे प्यार करने का. मम्मी: अब यहां कैसे हो सकता है तू ही बता? मैं: बाहर चले? मम्मी: धीरे... क्या बोल रहा है? बाहर कहां जाएंगे? मैं: रुको मैं कुछ सोचता हूं, आप बस संगीता से बहाना बना दो कि हम मार्केट जा रहे हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) अगर कुछ गड़बड़ हुई तो तुझे छोडूंगी नहीं. मैं: भरोसा रखो कुछ नहीं होगा.
मम्मी ने मेरा कहना मानते हुए ठीक वैसा ही किया जैसा मैंने कहा था. वो सुंदर सी हरे रंग की साड़ी पहनकर चलने को तैयार हो गई. जाते वक्त मैं संगीता से नजरे मिलाते हुए उसे बाय कहने की कोशिश की. वो शर्म से मुस्कुराते हुए अंदर चली गई. अब मैं और मम्मी आजाद थे. रास्ते में,
मम्मी: हां तो क्या सोचा तुने? मैं: यही कुछ दूरी पर एक लॉज है. वहां चलते हैं. मम्मी: अरे पागल हो गया है. इधर कोई आसपास हमें देख लिया तो? मैं: फिक्र मत करो वो ऐसी जगह है जहां जल्दी लोग आते जाते नहीं है और खास करके प्यार मोहब्बत करने के लिए ही आते हैं. वो जगह चूदाइ के लिए मशहूर है. छोटा कमरा है पर ठीक है. मम्मी: (पीठ पर थपकी मारते हुए) तू भी ना क्या-क्या करवाएगा?
जब हम लॉज पहुंचे तो शायद वहां उस वक्त कोई नहीं था सिवाय लॉज मैनेजर के. मैंने मम्मी को लॉज के गेट के अंदर खड़ा रहने को कहा और फिर मैनेजर से बात करने गया जो कि बाहर ही छांव में काउंटर टेबल लगाकर बैठा था. उसकी नजर मुझ पर और मम्मी पर मम्मी पर था.
मैं: कमरा चाहिए? लॉज मैनेजर: हां हां समझ गया. कितने घंटे के लिए? मैं: 4 घंटे के लिए. लॉज मैनेजर: आज तो आंटी की जान लेकर रहोगे. कौन है यह? मैं: पड़ोस की ही एक औरत है. लॉज मैनेजर: कैसे पट गई यार इस उम्र में? इतनी मस्त माल तुमने कैसे पटाया?
मम्मी को देखकर उसकी नियत भी डगमगा गई. थोड़ा रुक कर धीरे से कहने लगा,
मैं: अच्छा अपना नाम तो बता दो? मैनेजर: तुम मुझे आदि कहकर बुला सकते हो.
क्योंकि वह एक बहुत छोटा सा लॉज था सब काम आदि ही देखा था, बस नाम का मैनेजर था.
आदि: यार आंटी से बात करो ना कोई उसके पहचान में और औरतें होगी. मेरी भी सेटिंग करवाओ. मैं: तुम्हारे यहां तो इतनी औरतें आती है फिर किसी से भी कर लो. आदि: यही तो रोना है. औरतें बहुत कम आती है जल्दी नहीं आती खास करके जवान लड़के और लड़कियां ही आते हैं. मुझे तो ऐसी ही रस भरी औरतें पसंद आती है. मैं: अच्छा ठीक है मैं बात करूंगा.
मम्मी यह सब दूर से देख रही थी और सोच रही थी कि "इतनी लंबी क्या बात चल रही है इन दोनों में."
आदि: अच्छा सुनो, आंटी से ही बात करो ना अगर पैसे लेकर कुछ कर दे मेरा... मैं: अरे यार वो ऐसी औरत नहीं है. बहुत मेहनत करनी पड़ती है पटाने के लिए. आदि: अच्छा ठीक है पर मेरा ध्यान रखना.
मैं: हां ठीक है. लाओ एक पानी की बोतल दो.
मैं जब उसे पैसा पूछा,
आदि: यार देखो वैसे तो मैं 4 घंटे के दो हजार रुपए लेता हूं तुम हजार ही दे दो. तुम्हारी आंटी मुझे बहुत पसंद आई और अपना नंबर भी दे दो मुझे.
वो सच में पागल हो चुका था. मम्मी को देखने के बाद उसके अंदर की सारी वासना जाग उठी. मैं जब पैसा चुका कर फिर मम्मी के पास गया, वो मेरे तरफ घूरते हुए बोली,
मम्मी: क्या बातें चल रही थी इतनी देर से? मैं: ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो बस उससे मोलभाव कर रहा था. मम्मी: कितना पैसा लिया? मैं: हजार में मान गया. मम्मी: फिर भी कितना महंगा है! मैं: चलो आप ज्यादा मत सोचो.
हम कमरे में पहुंचे तो बहुत छोटा था कमरा लेकिन हमें भी कौन सा पूरी जिंदगी रहना था. हमें तो चूदाइ की आग बुझाना था. मम्मी शरमाते हुए मेरी तरफ देखने लगी मैं भी उसे चुम्मा देकर आश्वासन दिया.
मैं: कुछ सोचने की जरूरत नहीं है. अपने आप को बस मेरे हवाले कर दो.
वो थोड़ी सी बेचैन थी उसके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था. आज से पहले कभी भी वो चूदाइ के लिए खास करके किसी गेस्ट हाउस, होटल या लॉज में नहीं आई थी.
मम्मी: तुझे पक्का पता है यहां कोई खतरा नहीं है? मैं: इतना सोचती क्यों हो? मम्मी: कैसे नहीं सोचूं. घर पर तेरी जवान बहन यह सोच रही होगी कि उसकी माँ मार्केट गई है. तेरे पापा इस बात से निश्चिंत होंगे कि उसकी बीवी घर पर उनका इंतजार कर रही होगी. और यहां मैं, लॉज में रंगरलिया मना रही हूं. मैं: मैंने कहा ना आप घबराहट छोड़ो और अपने आप को बस मेरे हवाले सौंप दो.
मैं भी उसे बाहों में कस कर चुम्मा लेना शुरू कर दिया, उसके मुंह के स्वाद को चखने लगा. एक दिन बिना चोदे जो बीता था ऐसा लग रहा था जैसे सदियों बीत गए हैं. उसने भी धीरे-धीरे गर्मी को महसूस करते हुए अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और फिर मुझे जकड़ने लगी. मैं भी उसे नीचे की तरफ बेड पर सुला दिया और फिर चूमना शुरू रखा साथी साथ उसके ब्लाउज के हुक भी खोलने लगा. उसने भी साथ देते हुए पेटीकोट में हाथ डालकर अपनी साड़ी को नाभि के नीचे से बाहर निकाल दिया और खोलकर साइड में फेंक दिया. मम्मी ने बहुत सुंदर सी एक बैंगनी रंग की ब्रा पहनी थी.
साड़ी की पूरी तरह से खुलने के बाद मैं भी अपना हाथ उसके जांघों पर सहलाने लगा. पीछे से मेरा लंड पैंट के अंदर से ही उसके गांड से चिपक गया तभी मैंने उसके कान को भी चूसना शुरू कर दिया जिससे उसकी हवस और बढ़ने लगी. और धीरे-धीरे सिसकारियां भी छूटने लगी.
मम्मी: इश्श्श्श....
मैं भी और तेजी से कभी उसके कान को काटता तो कभी चुस्ता. फिर धीरे से उसके पेटिकोट का नाडा भी खोल दिया. नाड़ा खुला तो देखा उसने काले रंग की पैंटी पहनी थी.
मैं: क्या बात है, आज मैचिंग मैचिंग नहीं पहनी? मम्मी: जो मिल गया वो पहन ली. क्यों अच्छा नहीं है?मैं: बहुत अच्छा है मेरी माँ.
माँ शब्द सुन के वो थोड़ा शरमाई. तभी मैं फिर से उसके गालों को पकड़ के एक बार फिर से उसके होठों को चूसा. और ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियां मसलने लगा. जैसे-जैसे ब्रा नीचे फिसलता गया उसकी चूचियां बाहर आने लगी, उसके हल्के भूरे गुलाबी रंग के निप्पल को मैंने चूसना शुरू कर दिया. उसके बदन में भी फिर से एक बार करंट दौड़ने लगा और दूसरी हाथ उसके पैंटी के अंदर डालकर उसकी चूत के बालों वाले हिस्से को और फिर उसकी चूत के दाने को सहलाने लगा. जिससे वो अब थोड़ा और बेचैन मालूम पढ़ने लगी.
मम्मी: उम्म् ...मम्म्म...ऊऊह्ह्ह्ह...
मैं भी उसकी बेचैनी बढ़ाता हुआ नीचे जा पहुंचा जहां उसके गुलाबी पंखुड़ियों वाली मुलायम चूत थी. कल रात जैसा प्यार मैंने संगीता की चूत को दिया था, मम्मी की चूत को भी ठीक ऐसा ही प्यार करने लगा. मम्मी ने भी अपना हाथ बढ़ाकर मेरे बालों को सहलाने लगी और मेरा जीभ उसकी चूत के मुहाने को चोदने लगा. उसके चूत के होंठ फड़फड़ाने लगे. मैंने उसे शांत करने के लिए तुरंत लपक कर उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया और बीच-बीच में अपना जीभ उसके मुतने की छेद पर
चलाने लगा.
अब तो वो पागल सी हो गई, मेरा सर पकड़ कर ऊपर खींचते हुए मेरे होठों को चाटने लगी. दूसरा हाथ मेरे पैंट में डालकर लंड को बाहर निकलने लगी. मैं भी तुरंत अपना टी-शर्ट और पेंट उतरना शुरू कर दिया लेकिन उसने मेरा लंड अभी भी नहीं छोड़ा और आगे पीछे हिलाते रही. आज मुझे उसकी आंखों में असली चूदाइ का प्यास नजर आ रहा था. मेरा लंड लोहे की तरह मजबूत हो चुका था उसने तुरंत उसे पड़कर अपनी चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया.
जब हम दोनों की नजर मिली तो वो मुस्कुराते हुए फिर लंड को चूत पर रगड़ रही और पता ही नहीं चला कैसे उसने अपने ही हाथ से लंड के सुपाडे को चूत के अंदर घुसा लिया. फिर देर किस बात की थी, मैंने भी जोरदार धक्का देते हुए चोदना शुरू कर दिया.
मैं उसे चोदता रहा वो सिसकारी भारती रही. मेरी हवस का भी ठिकाना नहीं था, जांघों से जांघे टकरा रही थी और चूत से लंड. उसके जुबान पर सिसकारी के साथ आंखों में हल्के आंसू भी थे लेकिन यह कोई दुख के आंसू नहीं बल्कि चर्मसुख का एहसास था.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह……. मैं: आह्ह्ह…कैसा लग रहा है मम्मी... मम्मी: आश्श्श्श...आअह्ह्ह्ह...बहुत अच्छा...आह्ह्ह्हह
और 10 से 12 झटको के बाद, मैंने कुछ ऐसा सुना जिससे मुझे अपने कान पर यकीन नहीं हुआ,
यह क्या मम्मी ने "चोद" कहा. क्या यह मेरी वही माँ है जो बहुत संस्कारी होने के साथ-साथ पतिव्रता भी थी और आज मुझे चोदने को कह रही है.
मैं: आअह्ह्ह्ह...मम्मी थोड़ा जोर से... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...बेटा..
.चोद मुझे...चोद अपनी माँ को...ऊऊह्ह्ह्ह मैं: ओ...हां माँ...देखो आपका बुर चोद रहा हूं... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...ओहो
... मेरा बुर...आअह्ह्ह्ह...कैसा है बेटा... मैं: आपका बुर तो जन्नत का रास्ता है मेरी माँ... मम्मी: आअह्ह्ह्ह...हां बेटा...मेरा बुर...चोद...ओहो...
मम्मी के मुंह से बोले हुए गंदे शब्दों ने और मेरा उन शब्दों का जवाब देने की वजह से मम्मी भी अपने चरम सुख के सीमा की आखरी सीढ़ी चढ़ चुकी थी और मैं भी उसके साथ सुर में सुर मिला रहा था. उसने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे दोनों गांड पड़कर अपनी चूत में दबाने लगी. चार-पांच झटके और हम दोनों पानी पानी हो गए.
हम बहुत थक गए थे मैंने मम्मी को पानी पिलाया और पूरा बिस्तर भी गीला हो गया था हम दोनों के तरल वीर्य निकलने से.
मम्मी: अब चले? मैं: अभी कहां,अभी तो दो ही घंटे हुए हैं. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) मतलब मानेगा नहीं... राहुल बिस्तर बदलना होगा. मैं: रुको मैं बोल कर आता हूं मैनेजर को. मम्मी: मैं बाहर चली जाती हूं. मैं: नहीं घबराती क्यों हो यही रुको ना. मम्मी: वो यह सब देखेगा तो क्या सोचेगा? मैं: ओ मम्मी उसे पता है यहां सब क्यों आते हैं. मम्मी: चड्डी तो पहन लेने दे.
मम्मी ने कपड़े पहने और मैं फिर मैनेजर को बुलाने गया.
आदि: काम हो गया? मैं: अभी कहां अभी तो शुरू हुआ है. बिस्तर बदल दो खराब हो गया है. आदि: फिर भी अभी काम बाकी है? मैं: तुम होते तो दो घंटे में मान जाते क्या? आदि: नहीं यार. वो आंटी को तो मैं पूरा दिन रात चोदता रहूं. मैं: कहने की बात है, उसके सामने टिक नहीं पाओगे. आदि: तुम्हारी बात भी सही है. मैं: कुछ खाने को भी मंगा दो.
जैसे ही वो बिस्तर बदलने रूम में आया, मम्मी सावधान होकर खड़ी हो गई. उसकी आंखों में शर्मिंदगी था अपनी इज्जत को लेकर. आखिर दो जवान लड़के एक ही कमरे में उसके साथ खड़े थे जहां वो चूदी थी.
उसके जाते ही मम्मी ने राहत की सांस ली और फिर हमने हल्का-फुल्का नाश्ता किया.
मम्मी: शाम के 5 बज चुके हैं कब चलना है वापस? मैं: एक राउंड और करते हैं ना फिर चलेंगे. मम्मी: तूने तो मेरे बुर को ही थका दिया है. मैं: अच्छा आओ अब प्यार से धीरे-धीरे करते हैं.
मम्मी को फिर से एक बार नंगा करने के बाद इस बार दोनों चूचियों को सहलाना शुरू किया.
और फिर उसे बारी-बारी से चूसने लगा. वो भी में मेरे सीने पर चूम रही थी और बीच-बीच में निप्पल को चाट रही थी. कुछ देर की चुम्मा-चाटी के बाद इस बार मैंने मम्मी को पीछे घुमार अपनी बाहों में भरा. घुमा देने के बाद गांड के तरफ से उसकी एक जांघ को उठाकर अपने लंड को घुसाया. पहले की तरह नहीं लेकिन इस बार प्यार से धीरे-धीरे पूरी अंदर गहराई तक अपने लंड से उसके चूत को टटोलने लगा.
मम्मी को यह काफी आरामदायक और कामुक लग रहा था. उसने भी आह भरना शुरू कर दिया.
मैं: माँ क्या मैं आपके बुर को अच्छे से चोद रहा हूं ना.
मम्मी: इश्श्श्श...हां बेटा...
मैं साथ-साथ उसके गले को भी चूमने लगा और एक हाथ से उसके चूचि को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से चूत के दाने को सहला रहा था. और इन सब के साथ घपा घप लंड से उसकी चूत के सुरंग में अंदर तक चोद रहा था.
जिस तरह संगीता की चूत मुझे रोक रही थी अंदर डालने से, लंड को चारों ओर से पड़कर. मम्मी की चूत उससे बिल्कुल अलग था, क्योंकि पकड़ता तो मम्मी का चूत भी था मेरे लंड को. लेकिन बड़े प्यार से और जब मेरा लंड अंदर जाने की कोशिश करता तो वो उसे और अंदर आने की इजाजत देता था.
मैं: आज पहली बार ऐसा लगा जैसे आपने मुझे खुलकर अपना लिया हो. मम्मी: (मुस्कुराते हुए) हो सकता है. मैं: खुलकर बोलो ना. मम्मी: आखिर सेक्स किसे अच्छा नहीं लगता. और वो भी जब उसका अपना बेटा ही चोद रहा हो. मैं: तो फिर आपने पहले इंकार क्यों किया था? मम्मी: क्योंकि मेरी भी तो इज्जत है ना बेटा और यह समाज. और एक चीज जो मुझे रोकती है वो है तेरे पापा. मुझे बहुत अजीब लगता है जब तुझसे सेक्स करते वक्त मुझे उनकी याद आ जाती है. क्योंकि मैं उनको धोखा दे रही हूं.
ऐसी खट्टी मीठी बातों के बीच चूदाइ का सिलसिला जारी था. मेरा लंड लगातार मध्यम रफ्तार उसकी चूत को गपा- गप चोदते जा रहा था.
मैं: अच्छा मेरी बात सुनो, मैं जानता हूं कि हम यह गलत कर रहे हैं. लेकिन एक माँ बेटा से पहले हम एक औरत-मर्द भी तो है. शरीर की कुछ ज़रूरतें होती है, और अगर वो घर में ही पूरी हो जाए तो उसमें क्या बुराई है? और किसी को पता थोड़ी ही चल रहा है. मम्मी: तेरा कहना तो ठीक है... पर. मैं: पर बर कुछ नहीं. बस अभी मेरे बाहों में आप ऐसे ही सुकून से रहो और हम दोनों एक दूसरे में खो जाए.
मेरी यह बात सुनकर, उसने भी कुछ कहना बंद कर दिया और मैं भी अपना मुंह बंद कर लिया और बस गहरी सुरंग की चूदाइ चालू थी. उसकी चूचियों को और हाथों से सहलाने लगा जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए. चूत भी गीला होकर पानी छोड़ रहा था और मेरा लंड उसकी गीले दलदल में अंदर बाहर फिसलता जा रहा था.
मम्मी: उम्म्... हां बेटा ऐसे ही...मम्म्म...ऐसे ही...ओह... मैं: मजा आ रहा है मम्मी... मम्मी: (हाँफते हुए)हां बेटा...मम्म्म...कैसी लगती है मम्मी तुझे? मैं: ओह...आप सबसे बेस्ट हो...
चोदते चोदते कब चार घंटा पूरा हो गया पता ही नहीं चला.
मम्मी: बेटा टाइम हो गया है. जल्दी-जल्दी कर...
तो मैंने फिर से एक बार अपने आप को उसके दोनों जांघों के बीच रखा और लंड को अंदर घुसाकर चूत को जबरदस्त तरीके से चोदने लगा और साथ ही साथ उसके दोनों चूचियों को पकड़ के दबाने लगा.
ऐसे ही लंड और चूत के घर्षण से हम दोनों फिर एक बार जोर से कराहते हुए चर्मसुख तक पहुंच गए और कुछ मिनट तक एक दूसरे के मुंह पर ही सांस छोड़ते रहे. बाद में मम्मी ने पीठ थपथपाया और चुम्मा देकर उठने को कहा.
मम्मी: जल्दी चल नहीं तो तेरे पापा भी आ जाएंगे उनका आने का टाइम हो गया है. मुझे नहीं देखेंगे तो फिर फोन आना शुरू हो जाएगा उनका.
मैं भी मम्मी का कहना मानकर तुरंत उठ खड़ा हुआ घर जाने के लिए. रास्ते में जाते वक्त मम्मी ने कुछ हरी सब्जियां ली और संगीता के लिए बर्गर. वैसे तो हमें कुछ लेना नहीं था क्योंकि हम कोई मार्केट करने तो नहीं निकले थे. लेकिन कुछ तो चाहिए था बहाना बनाने के लिए. शुक्र था पापा के आने से पहले हम घर पहुंच चुके थे. संगीता बैठकर टीवी देख रही थी.
संगीता: इतना लेट कैसे हो गया? मैं: वो रास्ते में मोटरसाइकिल बिगड़ गया था उसे ठीक करने में इतना टाइम लग गया. संगीता: ओह... मम्मी, सब्जी क्या बनाना है? मम्मी: रुक जा पापा से पूछ लेते हैं उनका क्या मूड है.
मुझे पता था संगीता को कल रात बहुत तकलीफ हुई थी और आज तो मम्मी ने भी लॉज में काफी मेहनत की थी.
मैं: क्यों ना आज हम सब बाहर खाने चले. संगीता: हां यह अच्छा आईडिया है. मम्मी: अच्छा रुको पापा से कह देती हूं. संगीता: नया सनशाइन रेस्टोरेंट खुला है ना, क्यों ना वहां का खाना ट्राई किया जाए.
मैं: हां हां चलते हैं मजा आएगा बहुत दिन हो गए ऐसे भी साथ बाहर गए हुए. संगीता: क्या भैया अभी तो मामा के यहां गए थे तो कितने बार तो हम बाहर जा चुके. मैं: मेरा मतलब वो जाना नहीं अपने परिवार के साथ जाने की बात कर रहा हूं.
फिर क्या था पापा भी घर आ गए थे और हम सब तैयार होकर रेस्टोरेंट के लिए निकल गए. हम सब में खाने का लुत्फ उठाया और हंसी मजाक करते हुए एक दूसरे के मन को हल्का किया. वाकई में खाना लाजवाब था सनशाइन रेस्टोरेंट का. और मेरी खुशी का तो ठिकाना नहीं था. क्योंकि मेरे पास तो दुनिया की सबसे बड़ी दौलत हाथ लग गई थी, मेरी माँ और बेहन.
देर रात हम सब घर लौटने के बाद थके हारे सोने चले गए. लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां... मुझे तो अभी नई नवेली पत्नी की तरह मेरी बेहन मिली थी जिसकी कुंवारी चूत के सील को कल ही मैंने तोड़ा था. क्या कसी हुई चूत थी. पिछली रात की तरह इस रात भी वो शर्मा रही थी लेकिन उसका अंदाज थोड़ा बदला बदला हुआ था.
संगीता: भैया जो हम कर रहे हैं क्या वो सही है? क्योंकि मैंने आज तक कभी ऐसा नहीं सुना की भाई बेहन का रिश्ता रोमांस में बदल जाए. मैं: तुम्हें एक बात बताऊं, यह आजकल बहुत नॉर्मल है. संगीता: आप झूठ बोल रहे हो, ऐसा भी कभी हो सकता है भला? मैं: क्यों नहीं है यकीन. संगीता: नहीं है, मैं कैसे मान लूं?
मैंने तुरंत अपना फोन उठाया और भाई बेहन वाले पॉर्न वीडियो लगा दिया. जब वो वीडियो शुरू हुआ तब तो सब कुछ नॉर्मल था. लेकिन जैसे ही कहानी रोमांस की तरफ बढ़ने लगी, किसिंग सीन देखकर संगीता ने मेरी हथेली को अपने हाथों में पकड़ लिया. लेकिन जैसे ही दोनों के नंगे होकर चूदाइ वाला सीन आया, यह देख संगीता की आंखें बड़ी हो गई. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इस तरह के अश्लील वीडियो भी होते हैं. वो भरोसा नहीं कर पा रही थी कि वाकई में वो अकेली नहीं है. ऐसे भाई बहन भी हैं जो आपस में प्यार करते हैं. यह देख उसने दांतो तले होंठ दबा लिया.
मैं भी देर ना करते हुए फोन को साइड में हटाया और उसे अपनी बाहों में भरकर चूमने लगा. उसके वही मुलायम रसीले होठों ने कल रात की याद ताजा कर दी.
मैं: (धीरे से उसके कान में) अब क्या हाल है चूत का? संगीता: क्या कहूं, बहुत जलन हो रहा है टॉयलेट करते वक्त. मैं: आओ मैं आराम दिला देता हूं. संगीता: (हल्की मुस्कुराहट के साथ) अच्छा, वो कैसे?
तभी मैंने उसे धीरे से बेड पर सुलाया और उसके होठों, कानों, गले को और कंधे को छटना और चूसना शुरू कर दिया. उसे भी अब अच्छा लगने लगा फिर धीरे-धीरे उसकी चूचियों को ऊपर से ही मसाले लगा उसकी भी गर्म सांसे मेरे मुंह पर छूटने लगी.
संगीता: और कौन सा जादू आता है आपको? मैं: देखना है? संगीता: हां.
उसके हां कहते ही मैं उसे गुदगुदी करने लगा और वो हंस पड़ी. जब उसकी हंसी शांत हुई, हम दोनों ने एक दूसरे को नशीली निगाहों से देखा. मेरा हाथ उसके शॉट पैंट को नीचे की तरफ खींच रहा था. यह देख उसने हाथों से अपनी आंखें छुपा ली और शर्म से जांघे दबाने लगी. मैं भी उसके नाभि के हिस्से को सहलाना शुरू किया जिससे उसके तन बदन में आग लगना फिर से शुरू हो गया. धीरे-धीरे जांघों को ढीला छोड़ दिया उसने तभी उसके कमर के नीचे हाथ लगाकर उसके शॉट पैंट ढीला करते हुए उसके पैंटी को भी सरका दिया, जिससे उसकी वो मासूम गुलाबी चूत का नजारा मेरे आंखों के सामने आ गया.
उसकी चूत ने अपने होंठ बंद कर रखे थे, सिर्फ एक हल्की लकीर सी दिखाई पड़ रही थी जो खुलने का इंतजार कर रही थी. चूचियां संतरे जैसी बीच में छोटा सा निप्पल गुलाबी रंग का मेरा तो रोम रोम खड़ा हो गया. आप खुद ही अंदाजा लगाइए मेरा क्या हाल हुआ होगा उस लड़की को कल रात चोद कर.
मुझे रहा नहीं गया, मैंने अपना मुंह फिर से उसके चूत की तरफ बढ़ाया उसे चाटने के लिए और अपनी बेहन का स्वाद फिर से चखने लगा. उसका स्वाद वैसा ही नमकीन और नशीला था. जब जीभ को उसकी चूत के दाने पर चलाना शुरु किया उसकी सिसकारियां निकलने लगी.
संगीता: आह्श्श्श्श...भैय्याआआ... मैं: अब तो जलन कम हो गया ना? संगीता: आह...हां...भैया ऐसे ही...
अपनी मध्यमा उंगली उसकी चूत के दरार पर रखता हुआ मैं दूसरी उंगली का सहारा लेकर उसकी होठों को फैलाया. फिर अपना पूरा जीभ निकाल कर उसकी चूत के छेद में घुसाने लगा. उसके पैरों में हलचल होना शुरू हो गया. मैं जीभ को अंदर बाहर करता रहा और वो भी खुलकर मजा लेने लगी, आखिर उसकी चूत की जलन थोड़ी शांत तो हो ही गई.
इधर मेरा लंड बेताब था उसे फिर से चोदने के लिए, इसीलिए मैंने भी अपने लंड को बाहर निकाल दिया. वो भी साथ दिखाते हुए उठकर मेरे लंड को पकड़ सहलाना शुरू कर दी.
संगीता: भैया मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मेरे हाथ में एक लंड है, वो भी अपने भाई का. मैं: किस्मत वालों को मिलता है संगीता यह.
उसने अपना कमर उठाते हुए मेरे लंड को चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया. उसकी गरम-गरम मुलायम चूत को महसूस कर मेरे बदन में जैसे चीटियां कटने लगी, लंड का तनाव पूरी तरह बढ़ चुका था. जैसे ही मैंने उसके पैर को फैलाते हुए लंड अंदर डालने की कोशिश की वो मुझे रोकने लगी. उसे कल रात का डर अभी भी सता रहा था.
संगीता: भैया बहुत दर्द होता है, रहने दो. मैं: अब थोड़ी होगा अब सब कुछ ठीक है. संगीता: नहीं-नहीं आपका बहुत मोटा है, कल मेरे अंदर गया था तो जैसे जान ही निकल गई थी. मैं: गुड़िया कल पहली बार था पर आज तुम्हारी चूत इस लंड को अपनाने के लिए तैयार है.
यह आश्वासन देते हुए, मैंने अपने लंड को उसकी चूत की रस से गिला करके अंदर डालने लगा. धीरे-धीरे लंड थोड़ा आगे बढ़ता गया, उसकी सांसे फिर से हल्की थम सी गई. वो अभी भी बहुत कसी हुई थी. कल जैसा तो नहीं पर लंड की चौड़ाई लंबाई को वो महसूस कर रही थी. अभी भी उसकी चूत काफी तंग थी, लंड को घुसने का रास्ता नहीं मिल रहा था.
संगीता: भैया बोला था मैंने, थोड़ा दर्द हो रहा है फिर से. मैं: एक काम करो मुझे थोड़ा तेल दो, तुम्हारी चूत को बहुत चिकनाई की जरूरत है.
उसने ढूँढते हुए ड्रॉअर से मुझे नारियल तेल दिया. मैंने उसे बेड का सहारा लेते हुए झुकने को कहा और पीछे की तरफ से तेल उसकी चूत में मसलने लगा. उसकी मखमली मुलायम चूत पूरी तरह तेल से सनी हुई थी.
फिर अपने लंड को चूत पर टीकाते अंदर की तरफ धक्का देने लगा और धीरे-धीरे फिसलन के कारण लंड भी उसकी चूत के मांसपेशियों को चौड़ा करता हुआ अंदर तक घुस रहा था. संगीता इस मीठे दर्द का एहसास कर सकती थी, उसके लिए थोड़ा अलग था. यह उसकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा खुशी पाने का अनुभव था. उसकी सिसकारियां अब आह में बदल गई.
संगीता: आह...भैय्या…..आअह्ह्ह्ह…..आअह्ह्ह्ह. मैं: मज़ा आ रहा है मेरी रानी को? संगीता: हां...भैया...मम्म्म...आह...
मैं उसके मीठे दर्द का एहसास खराब नहीं करना चाहता था. लेकिन अभी तक तो मैंने मध्यम रफ्तार भी नहीं पकड़ी थी और लंड अभी भी पूरा अंदर घुसना बाकी था. इसलिए मैं उसके कान के पास गया और उसके कान को चुमने लगा. क्या फूलों जैसी खुशबू थी उसके बालों की और उसके बदन की.
जब वो चुंबन और लंड का मज़ा एक साथ ले रही. तभी मैं थोड़ा तेजी बढ़ाते हुए और धक्का लगाते हुए अपने लंड को अपनी छोटी बेहन की चूत में पूरे अंदर तक पेल दिया.
संगीता: आआह्ह्ह्ह!!! भैया… और दर्द… हो रहा है...उफ्फ़… मैं: शांत हो जा मेरी जान… मेरी गुड़िया... थोड़ा दर्द सह लो, सब अच्छा हो जाएगा... संगीता: आआआआह्ह्ह्ह्ह!!! भैया…!!!बस…बस्… और नहीं आह्ह्ह… मैं सह नहीं पा रही… बहुत दर्द… हो रहा है.
चूत की अंदरूनी दीवारें बुरी तरह खिंच चुकी थीं लंड का सुपाड़ा बच्चेदानी के मुंह पर ठोकर मार रहा था.
मैं: तुम्हारी चूत मेरे लंड को पूरा अंदर ले रही है… तुम बहुत टाइट हो… बहुत हिम्मती हो …बस आखिरी थोड़ा सा… फिर दर्द कम हो जाएगा और मजा आएगा… मैं तुम्हारा भैया हूँ… डरो मत…
धीरे-धीरे दर्द की तीव्रता कम होने लगी और उसकी जगह एक गहरी, भारी कामुकता ने ले ली. अब संगीता का दर्द कम हो गया था और उसे मजा आने लगा. मेरी भी गति धीरे-धीरे बढ़ी, पूरा लंड अब अंदर-बाहर होने लगा. संगीता की चूत पूरी तरह फैल चुकी थी और अब उसकी चिकनी, गीली, तंग दीवारें मेरे लंड को जकड़ रही थीं.
हर धक्के पर संगीता की छोटी चूत का मुंह बाहर निकलता, फिर अंदर चला जाता. हम दोनों की सांसें एक हो गईं. कमरे में चूत की गीली “पच-पच-पच” आवाज, संगीता की कामुक सिसकारीयां और मेरी गुर्राहट थोड़े मध्यम आवाज में गूंज रही थी क्योंकि बाहर मम्मी पापा भी तो थे.
तब मैं उसकी चूचियों को पकड़ कर जोर जोर से चोदने लगा. उसका चूत भी पानी छोड़ने लगा. अब कमरे में सिसकारियों के साथ शरीरों के टकराने की आवाज़ और गीली चुदाई की छप-छप की आवाज रह गई थी. संगीता के साथ ही मैं भी चरम पर पहुंच गया और हम दोनों एक साथ झड़ गए. अपना लंड बाहर खींच कर पूरा वीर्य उसकी गांड पर गिरा दिया. हम दोनों के पैरों में अब जान नहीं बची थी कि हम और देर खड़े रह पाए. संगीता ने जल्दी से अपने गांड पर गिरे हुए वीर्य को पोछा. कल रात की तरह कोई गलती ना हो जाए इसीलिए संगीता ने समझदारी दिखाते हुए बेडशीट बदल दिया और मेरे साथ बिस्तर पर गिर गई.
हम देर तक एक-दूसरे से चिपटे रहे. मैं संगीता को चूमता रहा.
संगीता: भैया… यह दर्द और मजे का मिश्रण… मैं कभी नहीं भूलूंगी.
हम दोनों पसीने से भीगे नंगे ही एक-दूसरे की बाहों में सो गए.