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Erotica साइको कविता (psycho Kavita)

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Shetan

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Hamka maafi daido maidam, hum aapka gunahgaar hu, bekaar hu, Aadat se laachaar hu, :pray:
चलिए कोई बात नहीं. बहोत बहोत धन्यवाद. थर्ड पर आने के लिए.
 
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Shetan

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Deko Carry0, pahli baat to ye clear kar du ki ye wahi shetan ji hai jo tumhe meri sayri wali thread pe mili thi, doosri baat main bhi wahi Raj hu, and sabse important baat, tum ab bhi kisi writer ki dis respect nahi kar sakte, and is baar isko warning hi samajhna. Aur ab is topic per yaha or koi discussion nahi hoga, agar aapko baat karni ho to chit chat thread me milo.
Dhanyawaad
तुम दूसरी दिशा में जा रहे हो मेरे दोस्त, में तो यह पूछ रहा था कि ये शैतान जो हैं ये कोई नया है या वो पुराने वाले हमारी शैतान भाभी है?
और तुम भी शायद नए हो, में एक पुराने राज शर्मा को जनता था।
तुम जो गाली की बात कर रहे हो ना, उसके बारे में तो में कुछ कह ही नहीं रहा हूं क्योंकि वो इसी लायक है।
कोई बात नहीं पंडितजी. मै अगली स्टोरी साईको कैर्री लिख लुंगी.

Carry0 मै आप को पहले भी बता चुकी थी की मुझे भाभी वगेरा वर्ड पसंद नहीं. कल भी बोला. पर पहले बोलते थे. तो अब क्या प्रॉब्लम है. ऐसा नहीं होता. और जरुरी भी नहीं की मै कारण बताऊ. यहां मेरा नाम Shetan है. और मै चाहती हु की आप मुझे कोई कॉल दो तो इसी नाम से दो. कॉल देना ना देना आप की मर्जी है.

दरसल मै नहीं चाहती की मेरी इमेज भाभी वाली हो. मेरी इमेज एक राइटर की ही रहे. बाकि आप खुद समजदार हो.
 

Carry0

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कोई बात नहीं पंडितजी. मै अगली स्टोरी साईको कैर्री लिख लुंगी.

Carry0 मै आप को पहले भी बता चुकी थी की मुझे भाभी वगेरा वर्ड पसंद नहीं. कल भी बोला. पर पहले बोलते थे. तो अब क्या प्रॉब्लम है. ऐसा नहीं होता. और जरुरी भी नहीं की मै कारण बताऊ. यहां मेरा नाम Shetan है. और मै चाहती हु की आप मुझे कोई कॉल दो तो इसी नाम से दो. कॉल देना ना देना आप की मर्जी है.

दरसल मै नहीं चाहती की मेरी इमेज भाभी वाली हो. मेरी इमेज एक राइटर की ही रहे. बाकि आप खुद समजदार हो.
हां लिखो, स्टोरी की आउटलाइन में, दे दूंगा, 😁, ok जैसा आप कहे, 🫡, कोई दिक्कत नहीं है। जैसा आप चाहते हो वैसा ही होगा, अब में यहां और कुछ नहीं बोलूंगा, नहीं तो फिर कोई कांड हो जाएगा,
पर मुझे यहां कोई समझता नहीं है, यह बात पक्की है।😔, सबकी रिस्पेक्ट करता हूं में, पर मेरी रिस्पेक्ट कोई नहीं करता।
 
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komaalrani

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Please post the next part of story. Waiting.
 
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Shetan

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Please post the next part of story. Waiting.
अभी मुझे लगता है की जल्दी पोस्ट अपडेट करना पड़ेगा. कल तक लिख लुंगी. और कल ही पोस्ट भी कर दूंगी.
 
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komaalrani

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आपने जो आंकड़े सामने रखे हैं, वे फोरम की व्यवस्था के साथ साथ पाठकों की बदलती मानसिकता का भी कड़वा सच बयां करते हैं। दो लाख की भीड़ में चंद सौ लोगों का ऑनलाइन होना और उनका भी साहित्य के बजाय केवल माँ-बेटे के इन्सेस्ट जैसी रचनाओं या केवल तस्वीरों में रस लेना, किसी भी गंभीर लेखक का मनोबल तोड़ने के लिए काफी है। आपके व्यूज या कमेंट्स आपकी लेखनी की कमी से नहीं गिरे हैं.. आप एक ऐसे बाजार में गुणवत्ता परोस रही हैं, जहां ज्यादातर दर्शक अब सिर्फ एक ही तरह का कंटेंट खोज रहे हैं।

रही-सही कसर फोरम की तकनीकी समस्याओं ने पूरी कर दी है। क्लाउडफ्लेयर के अंतहीन वेरिफिकेशन और हर पन्ने पर विज्ञापनों के मकड़जाल ने पढ़ने का अनुभव ऐसा कर दिया है कि कोई नया या गेस्ट पाठक अकाउंट बनाने का सिरदर्द लेना ही नहीं चाहता। जब ज्यादातर ट्रैफिक सिर्फ मूक दर्शकों का हो, तो संवाद और टिप्पणियों की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

आप एक बेहद मंझी हुई और असरदार लेखिका हैं। कुछ सतही पाठकों और तकनीकी समस्याओ की वजह से आपकी कलम का रुकना, हम जैसे आपके मुरीदों के लिए एक बड़ा नुकसान होगा। मंच और भीड़ समय के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन आपकी लेखनी की धार किसी भी हाल में कुंद नहीं पड़नी चाहिए। अपनी शर्तों पर अपना मंच चुनिए और लिखना जारी रखिए यही प्रार्थना है।

सविनय

वखारिया
आपने बहुत अच्छी व्याख्या की और इस बिंदु पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए।

यह सही है की हमारे इस फोरम पर २०२५ में बहुत से हमले हुए, डी डी ओ एस अटैक ( A DDoS (Distributed Denial-of-Service) attack is a type of cyberattack that aims to make an online service, website, or network unavailable to legitimate users by overwhelming it with a flood of internet traffic_और मैंने जो थोड़ी पूछताछ की तो निम्न बिंदु सामने आये

१. High concurrent load: The forum sees large numbers of logged-in users and guests at peak times. Shared or capacity-limited server resources struggle under that volume, leading to slow response times.

२ Past DDoS impact: Persistent DDoS attacks in 2025 caused server crashes, database issues, and temporary domain moves. Even after mitigation and upgrades, capacity can remain constrained during traffic spikes.

३ Hosting and architecture: The site uses Cloudflare (common for DDoS protection) along with backend servers that have shown strain under load. Forums of this type (XenForo-based adult/community sites) are sensitive to concurrent users, database queries, and uncached dynamic content.

४ Other contributing factors: Ads for free users, image/media loading, and occasional bot traffic can add further delays.


पर जो मैं करीब दस पंद्रह दिन से देख रही हूँ , कभी भी फोरम पर आने वालों की संख्या १० -११ हजार के पार नहीं जाती, जो किसी भी स्तर से बहुत हैवी ट्रैफिक नहीं कही जा सकती।

हाँ मेंबर्स का अनुपात कभी भी २-३ % से ऊपर नहीं होता, और अगर किसी पोस्ट के २० हजार व्यूज हों ( जो एक बड़ी संख्या है ) तो इस अनुपात में करीब ४ सौ मेंबर ही उस थ्रेड पर आये और अगर इसी अनुपात में कमेंट करने वाले भी हो जो विज्ञापनों के मकड़ जाल को पार कर हिम्मत करें तो उनकी संख्या भी १ से २ फीसदी होगी यानी , ४-८ के बीच।

हर बार आप नया पृष्ठ खोलें, कुछ भी पोस्ट करें तो कुछ अवांछित आता है और हर बार टाइम भी लगता है तो लोग पढ़ तो लेते हैं कमेंट नहीं करते

कमेंट से न सिर्फ संवाद होता है बल्कि, कहानी एक बार फिर से उस वर्ग में ऊपर आ जाती है और नए पाठको के लिए सुलभ होती है

अब यह निर्णय एडमिन टीम को लेना है की इसका क्या हल निकालें जिससे कमेंट करना सहज बने और लोग पढ़ने के बाद दो शब्द ही सही लिखे,

बाकी बातें आपने जो कहीं, वो सोलहों आना सही है उसे दुहराने का प्रयोजन नहीं है।

एक बार फिर से आभार
 

Shetan

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A

Episode 11


बीती उस रात सिर्फ रूपा ही सोइ थी. क्यों की उसकी जो फैंटासी का एक हिस्सा जो पूरा हुआ था. कविता भयानक से मासूम बन जाए. और उसे उसने अपनी बाहो मे पूरी रात जकड़े रखा. रूपा को तो बहोत अच्छे से नींद आई. वही कविता का नींद ना आने का कारण सिर्फ वीरू का दिया हुआ दर्द ही नही था.

कविता को तो पहले से नींद नही आती थी. वो तो वीरू की बाहो मे कुछ जादू ही था. जो उसकी बाहो मे कविता को कब नींद आती. उसे खुद को ही पता नही चलता. लेकिन वीरू को यह समझ नही आ रहा था की उसे क्यों नींद नही आ रही. सायद कविता को जो उसने दर्द दिया.

उस वजह से. या फिर कोई और कारण. उसे पता ही नही चल रहा था. पिछले तीन दिन तो कविता उसके ऊपर लद कर चैन से सोइ रहती. और उसे ठीक से नींद भी नही आ रही थी. नींद आती तो भी बहोत लेट. वीरू और कविता दोनों ही उस रात जाग रहे थे.

बस फर्क अलग अलग. अलग अलग बिस्तर पर और अलग अलग रूम मे. अँधेरी काली रात खतम हुई. पर वीरू और कविता दोनों ही ऐसे ही आंखे खोले अपने अपने बिस्तर पर पड़े रहे. वीरू सीधा पिठ के बल. वो पूरी रात कविता के बारे मे सोचता रहा.

वही कविता रूपा की तरफ पिठ किए यह सोचती रही की वीरू अगर उसकी लाइफ मे ना आया तो ऐसा कोई भी नही होगा जो उसका अपना हो. तभि कविता को एहसास हुआ की रूपा उठकार बैठ रही है. कविता ने तुरंत अपनी आंखे बंद कर ली.

रूपा भी कविता को देखती है. और बेड से खड़ी हो गई. जब वो जाने लगी. तब कविता ने अपनी आंखे खोली. जाते हुए रूपा एक बार फिर घूम कर कविता को देखती है. पर कविता ने झट से अपनी आंखे बंद कर ली. रूपा को कविता पर प्यार आने लगा.

वो बस थोड़ा सा मुस्कुराई. और वहां से चल पड़ी. रूपा पहले खुद फ्रेश हुई. और उसके बाद वीरू के रूम मे घुसी. वो दरसल चेक करना चाहती थी की वीरू उठा या नही. पर वीरू तो पहले से ही जाग रहा था.


रूपा : (स्माइल, शारारत) क्या बात है. बड़ी जल्दी नींद खुल गई. वैसे कैसा रहा उस तितली के साथ. मझा आया या नही.


वीरू कुछ समझ नही पाया. रूपा उसे बुरी तरह डांटनी चाहिये थी. पर वो तो उसे किसी दूल्हे की भाभी की तरह छेड़ रही है. मज़ाक कर रही है. मतलब की उस लड़की ने अब तक रूपा को कुछ नही बताया.


वीरू : वो वो वो कहा है???


रूपा : (स्माइल) सो रही है. उसका पहेली बार था ना. कही तू फिर ना लग जाए. सायद इसके लिए एक ही बार कर के आ गई. पर तू क्यों मान गया. जाने नही देना था साली को. और रागड़ना था ना.


बोलते हुए रूपा ने वही जग जैसे प्लास्टिक के डिब्बे की नोझल मे वीरू का लिंग घुसाया. और वीरू मूतने लगा. वो कुछ भी नही बोला. पर वो समझ गया की कविता जब नींद से उठेगी तब उसकी सामत आने वाली है. इन सब मे रूपा और वीरू ने एक चीज पर ध्यान नही दिया.

वीरू का एक हाथ खुला है. और कविता गन लिए वहां नही है. रूटीन के मुताबिक रूपा वीरू से मज़ाक मस्ती करते हुए उसे खोल देती है. और उसे फ्रेश करवाकर नहला धुला कर वापस भी लॉक कर देती है.


रूपा : अभी तू बैठ. मै तेरे लिए कुछ खाने को लाती हु.


जब रूपा जाने लगी तब वीरू एकदम सॉक हो गया. उसका मुँह एकदम फटा फटा सा रहे गया. उसे खयाल आया की कविता गन लेकर वहां जब थी ही नही तो वो भाग सकता था. पर यही खयाल रूपा को भी आया. और उसके फेस पर भी यही प्रतिक्रिया थी.

बस फर्क इतना की उसके फेस पर अपनी गलती के सिवा स्माइल भी थी. की गलती तो हुई. पर वो बच गई. साथ वीरू के चूतियापे पर ज्यादा ही हसीं आने लगी.


रूपा : (स्माइल) तू तो सच मे चुतिया हे रे. मुझे पता है. यह तूने जानबुचकर नही किया. पर......... साला चुतिया कही का.


रूपा खुश थी. और उसे वीरू के चूतियापे पर सच मे बहोत हसीं आ रही थी. वो हस्ते हुए चली गई. वही वीरू यह सोचता रहे गया की उस लड़की के जागने से पहले सब काम निपटालू. ताकि खाना तो नसीब हो जाए. आगे वो लड़की पता नही बदला लेने उसके साथ क्या क्या करेंगी. यही सोचते हुए वीरू ने भागने का सोचा ही नही.

खिल खिलाकर हस्ते हुए रूपा उस रूम से निकल कर किचन की तरफ जाने लगी. जाते हुए वो उसी रूम के सामने से गुजरी. जहा वो कविता के साथ चिपक कर सोइ थी. वो उस रूम के आगे से गुजरी. और जाते जाते अचानक रुक कर पीछे मूड गई. उसने कविता को देखा.

दरसल उसने कविता की आंखे खुली और खामोश चहेरे को एक टक दरवाजे की तरफ देखते हुए पाया. तुरंत ही रूपा पीछे मुड़ी. जब रूपा डोर पर आई तब कविता कही खोई हुई थी. और अचानक रूपा डोर पर आ गई तो कविता एकदम से उठकर बैठने लगी. तभि उसे दर्द हुआ. और वो दर्द रोक नही पाई.


कविता : (आंखे बंद, दर्द, करहना) ससस अह्ह्ह्ह....


रूपा तुरंत कविता के पास आई. और कविता को सहारा दिया.


रूपा : अरे रे. दर्द हो रहा है क्या??? देखने दो.


रूपा भी समझती थी की पहेली बार करने पर दर्द होगा. वो कविता को वापस पेट के बल लेटा देती है. कविता कुछ नही बोलती. बस लेटी रही. रूपा ने उसकी दोनों हिप्स खोल कर देखि. वो लाल हो चुकी थी. रूपा समझ गई की खरोच अंदर जरूर होगी.


रूपा : ससस.. अरे बीबीजी. पूरी लाल हो चुकी है. साले को समझाया था. आराम से करना.


पर रूपा को अच्छा भी लग रहा था. क्यों की कविता ने ही उसे भगा दिया था. वो मन मे बोल रही थी. अब मझा आया ना साली को. मै वहां इसी लिए थी. रूपा ने वीरू को ब्लेम दिया. पर कविता फिर भी वीरू का ही फेवर लेती है.


कविता : ससससस अरे नही बाबा.. ऐसा नही है. दरसल वो खुद पर कंट्रोल नही कर पाया.


कविता बोल कर रुक गई. रूपा देख भी नही रही थी. फिर भी वो स्माइल करती है.


कविता : (स्माइल) मै इतनी ब्यूटीफुल जो हु.


रूपा : (स्माइल) सिर्फ तुम ही नही. यह भी तो बहोत खूबसूरत है.


रूपा ने मज़ाक मे बोलते हुए कविता की हिप्स पर हलकी सी चपात मारी तो कविता फिर कराह उठी.


कविता : ससससस अह्ह्ह्ह...


रूपा : ओह्ह ओह्ह सॉरी सॉरी. मै अभी तेल गरम कर के लेकर आती हु.


रूपा जाने लगी तो कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया. रूपा ने सर घुमाकर कविता की तरफ देखा.


कविता : क्या उसने कुछ खाया???


रूपा को कविता का वीरू के लिए यह पूछना बहोत अच्छा लगा.


रूपा : (स्माइल) ओओओ हो. बड़ी परवाह है दर्द देने वाले की. वही लेने तो आई थी. पर तुम्हे देख कर रुक गई.


कविता : तो फिर पहले उसे खिला दो.


रूपा वहां से निकल कर किचन मे गई. कविता की ज़ुट्ठी स्माइल फिर ख़ामोशी और मायूसी मे बदल गई. वो वीरू के लिए झूठ भी बोल रही थी. सिर्फ उसका सच वही जानती थी की वो वीरू से कितना ज्यादा प्यार करने लगी है. जो उसे बेरहमी से दर्द देने वाले वीरू के लिए भी ब्लेम नही दे रही. बल्की बात पलट रही थी.
 
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Shetan

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Episode 11.1


रूपा के जाने के बाद कविता वही बेड पर ही पड़ी रही. और पड़े पड़े सोचती ही रही. उसकी सोच बस यही थी. अपना अकेलापन. पर कुछ एक डेढ़ घंटे बाद रूपा फिर डोर पर खड़ी हो गई.


रूपा : (स्माइल ) किस सोच मे डूबी हुई हो बीबीजी???


कविता पेट के बल उलटी ही लेटी हुई थी. उसने थोड़ासा सर ऊपर उठाकर घुमाया. और रूपा की तरफ देख कर स्माइल की. रूपा के हाथ मे कटोरी थी. जिसमे गुन गुना से थोड़ासा ज्यादा गरम लहेसून वाला तेल था. गरम लहेसून की गंध भी आ रही थी.

रूपा आकर कविता की कमर के पास बैठ गई. और एक हाथ से कविता की हिप्स पे रख कर उसे साहलाया. कविता को हलके स्पर्श से ही दर्द महसूस हुआ. वो सिसकने लगी.


कविता : ससससस...


रूपा ने हिप्स को चौड़ा किया. मतलब खोला. दोनों हिप्स के बिच पिछवाड़े के छेद का हिस्सा लाल हो गया था. कविता को तकलीफ हो रही थी. रूपा कटोरी से हलका गरम लहेसून वाला तेल डालती है. जिस से कविता को पहले तो तकलीफ हुई. पर बाद मे आराम मिलने लगा.


कविता : (आंखे बंद, दर्द, सुकून ) अह्ह्ह्ह ससससस.... हहहस्स्स्स ससस...


रूपा : (स्माइल ) अच्छा बीबीजी......???


कविता : (आंखे बंद ) हम्म्म्म...


रूपा : (स्माइल ) क्या उसने अपना पूरा घुसा दिया था क्या???


कविता को लगा जैसे रूपा उस से मज़ाक कर रही है. उसे चिढ़ा रही है.


कविता : मुझे क्या पता. मै उसे घूम कर देख रही थी. हम्म... बात करती हो.


तभि रूपा ने अपनी तेल वाली ऊँगली कविता के पिछवाड़े मे घुसा दी. कविता की दर्द से चीख निकल गई.


कविता : (आंखे बंद, दर्द, जलन ) अह्हह्ह्ह्ह....... ससससस........ क्या कर रही हो. अह्ह्ह्ह सससससस... निकालोओओओओ....... सससससस......


रूपा : (स्माइल, शारारत) देखा नही तो क्या. झेला तो है. अंदर तक. मझा आया या नही.


कविता को पहले तो जलन हुई. लेकिन तेल के कारण राहत भी मिली तो उसने रूपा को रोका नही. उल्टा ऐसे ही पड़ी रूपा को ऊँगली करने देती है.


कविता : (मदहोश, आंखे बंद) अह्ह्ह ससससस.. मझा??? जान निकल गई मेरी. मझा तो सिर्फ उस बेस्टर्ड को आ रहा था.


रूपा : (स्माइल) अरे पहेली बार तो सबको दर्द करता है. (सोचते हुए) पर साला उसे तो बहोत अच्छे से आता है. फिर तेरी हालत कैसे खराब हो गई. कही....


रूपा कविता के पिछवाड़े मे आहिस्ता आहिस्ता ऊँगली किए जा रही थी. पर रूपा के ऐसा बोलने पर कविता वीरू का ही पक्ष लेने लगी.


कविता : नही नही... बोला ना. वो बाहेक गया था. और मेने भी उसे नही रोका.


बोलकर कविता चुप हो गई. कविता को वीरू का ज्यादा पक्ष लेते देख रूपा भी चुप हो गई. पर कविता का दर्द अपने आप उभर आया. और वो जो नही बोलना चाहती थी. वो जुबान पर आ गया.


कविता : पता है रूपा. मुझे यह डर नही है की वो मुझसे प्यार नही करता.


रूपा : तो क्या डर लगता है...... तुम्हे???


कविता : (सोचते हुए, खोई खोई) बस यही की वो मुझसे कही नफरत ना करता हो.


रूपा समझ तो गई की कुछ गड़बड़ है. पर वो बिच मे नही आई. वो कुछ पल बाद बोली.


रूपा : अरे नही करेगा बाबा.....


कविता : अह्ह्ह्हह ससससस...


बोलते हुए रूपा ने पट देकर कविता की हिप्स पर एक चमाट मारी. इस बार कविता को वैसा ज्यादा दर्द नही हुआ. रूपा ने ऊँगली बहार निकल ली थी. वो कविता की हिप्स सहलाने लगी.


रूपा : अब तो वो तुम्हारे इसका दीवाना हो गया है. सिर्फ इसके दम पर तुम जो चाहे वो करवा देना.


कविता ने तुरंत ही रूपा का हाथ झटक दिया. और सर घुमाकर थोड़ा नाराजगी वाला फेस बनाते रूपा को देखने लगी. कुछ पल दोनों शांत रहे तो रूपा फिर वही काम पर लग गई. तेल तो ठंडा हो गया था.

पर वो अब भी कविता को सुकून दे रहा था. दोनों हिप्स के बिच दरारो मे जब वह तेल डालती तो कविता को अच्छा लग रहा था. लेकिन कविता के पास सवालों की कमी नही थी.


कविता : क्या तुम्हे भी पहेली बार दर्द हुआ था???


रूपा : हा.... मेरी भी तुम्हारी तरह ही जान निकल गई थी. पर उसका तुम्हारे वाले जितना बडा नही था. फिर भी. मै तो उस टाइम तुमसे भी ज्यादा दुबली पतली थी.


कविता : कौन था वो??? क्या तुम्हारा हस्बैंड???


रूपा : ना रे. उस बेवड़े के बस का आगाड़ा नही था पिछवाडा क्या होगा. वो तो था साला एक हलकट.


कविता ने फिर सर घुमाकर रूपा की तरफ देखा.


कविता : तो बताओ ना. कौन था वो???


रूपा : मेरे बेवड़े बाप का दोस्त. भूरा. साले ने बिलकुल रहेम नही किया.


कविता ने देखा. रूपा का फेस मूरझा गया है. पर बाप का दोस्त सुनकर वो भी सॉक हो गई.


कविता : क्या??? पर कैसे?? और तुम मान कैसे गई.


रूपा कुछ पल शांत रही. और फिर अपनी कहानी सुनाने लगी.


रूपा : मै तब 18 साल की थी. मै और मेरी माँ सब घरों मे झाड़ू पोछा बर्तन साफ करती. पर मेरा बापू बस शराब पिता रहता. साला दिन रात वो और उसका दोस्त. कभी खोली मे तो कभी ठेके पर. बस शराब.

उस दिन दोपहर का 1 बज रहा था. मै काम से जल्दी आ जाती थी. क्यों की मेरी माँ एक दो घर ज्यादा काम करती थी. इसी लिए वो 4 बजे तक आती. मै आकर खाना बनती. कभी किसी के घर से कुछ खाने को मिलता तो वो भी ले आती. उस दिन भी मै घर आई.

घर आई तो देखा की बापू और उसका दोस्त पकिया दारू पी रहे थे. पकिया साला सूखा दुबला पतला बिलकुल. पर बापू से वो रोज कम पिता था. साला वो मेरेको और मेरी माँ को ताड़ने आता था. माँ को तो वो बिलकुल पसंद नही था. पर साला वो जुवारी था. और साले के पास पैसा बहोत था.


कविता : (स्माइल) मतलब क्या??? तुम्हारी माँ का अफेयर था उसके साथ???


इस बात पर रूपा को भी हसीं आ गई.


रूपा : (स्माइल, शारारत) कच.... (मुँह से आवज) उसको तो माँ चुतिया बनती थी. कुछ करने ठोड़ी देती थी. मूरझाया चहेरा.


कविता : तो फिर तुम....


रूपा : उस दिन मै काम से आई. बापू और पकिया खोली के बहार चारपाई डालकर दारू पी रहे थे. मै जिनके यहाँ काम करती थी. उनके बच्चे का बर्थडे था. तो खाना मै वही खाकर भी आई थी. और लेकर भी आई थी. मेने बापू से खाना खाने को बोला.

पर वो तो पकिया के साथ दारू पिने मे मस्त थे. मै खाना रख कर खाने का बोली. और अंदर खोली मे आकर लेट गई. मुझे नींद आ गई. काम करने के बाद बहोत गहेरी नींद आती है. मै भी बहोत गहेरी नींद मे थी.

पर मुझे कुछ गुद गुदी महसूस होने लगी. थोड़ा गिला गिला लग रहा था. मझा भी बहोत आ रहा था. (स्माइल) ऐसा लग रहा था. जैसे मै हवा मे उड़ रही हु. तभि मेरी नींद खुल गई. मुझे लगा की मेरी दोनों टांगो के बिच कुछ है.


कविता : (सॉक) तो क्या वो तुम्हारा रेप कर रहा था???


रूपा : (स्माइल) अरे नही बीबीजी. वो तो साला चाट रहा था.


कविता को हसीं नही आई. उसे उल्टा गुस्सा आया.


कविता : वो तुम्हारी मर्जी के बिना तुम्हे हाथ लगा रहा था. और तुम ऐसे बोल रही हो जैसे....


रूपा ने कविता की बात काट दी.


रूपा : हाथ लगता तो साले का हाथ काट डालती मै. पर साला हाथ नही जीभ लगा रहा था. साले से कुछ होता नही था. उसको बस मुँह लगाने का सोख था. और उसे पता था की मै मरवा कर आई हु.


कविता फिर सॉक हुई. पर उसे हसीं भी आई.


कविता : एए एक मिनट. मरवाके आई मतलब सेक्स कर के आई थी???


रूपा कविता से बड़ी भी थी. और बेसर्म भी. फिर भी वो शर्मा गई. और एक्ससिटेड होते हुए हा मे सर हिलाया.


रूपा : (स्माइल, एक्ससिटेड) मेरा बॉयफ्रेंड कुट्टन.


कविता : (स्माइल) अरे वाह. तुम्हारा भी बॉयफ्रेंड था??


रूपा : (स्माइल) हा बीबीजी. वो मद्रासी था. टेक्सी चलाता था. और मुझसे बहोत प्यार करता था.


बोलते बोलते रूपा मायूस हो गई.


कविता : तो क्या हुआ?? तुमने उस से शादी क्यों नही की??


रूपा : (मायूस) क्यों की साला पकिया के साथ मुझको वो देख लिया.


कविता : पर तुम तो कहे रही थी की पकिया कुछ कर नही पाता था.


रूपा : वही तो बीबीजी. उस दिन मुझे पकिया का चस्का लग गया ना. साला उस दिन मेने माँ की मैक्सी पहनी हुई थी. मै लेटी हुई थी. मुझे अच्छा लगा. पर नींद खुली तब मेने देखा की मेरी मैक्सी पूरी ऊपर उठी हुई थी. झंगो तक. और मेरे दोनों टांगे भी खुले थे. और वो साला मेरी दोनों टांगो के बिच मुँह लगाकर चाट रहा था.

मै उसे धक्का दिया. वो मुझे दूर हुआ. मेने देखा की मेरा बापू दारू के नशे मे धुत पड़ा हुआ है. मै उसपर गुस्सा हो गई. और उसे धमका दिया.


मै (रूपा) : (गुस्सा) साले हलकट. यह क्या कर रहा है. मै तो तेरे दोस्त की बेटी हु ना. साले अपने ही दोस्त के साथ धोखा करेगा. मै रुक अभी पोलिस स्टेशन जाती हु.


पकिया : ओय रुक रुक. तू भी कोई दूध की धूलि नही है. और फिकर मत कर. मै कुछ करूँगा नही. मेरे को बस चाटने मे मझा आता है.


वो आगे बढ़ा तो मेने उसके मुँह पर लात मारी. उसे लगी पर उसने मेरा पाऊ पकड़ लिया.


पकिया : ससससस अबे साली क्या करती है. तू पैसे ले ले.


उसने जेब से पैसे निकले. कुछ सो सो की नोट थी. उसने मुझे 300 रूपय दिए. मुझे भी पता थी. माँ भी उस से वही करवाती थी. और मझा भी मुझे बहोत आया तो मै मान गई. मै कुछ नही बोली तो वो समझ गया. मेरे हाथ मे सो सो के तीन नोट थे.

वो आगे बढ़ा. और मेरी छाती पर अपना हाथ घूमने लगा. मेने उसका हाथ नही हटाया. वो बस मेरे बोबो दबाकर मुझे धक्का दिया. मै वापस लेट गई. वो मेरी दोनों टांगो के बिच आ गया. वही तो पहला था. जिसने मेरी चुत मे मुँह लगाया था. मझा भी बहोत आ रहा था.

मेने अपनी आंखे बंद करली. जिस हाथ मे नोट थे. उस मुट्ठी को जोर से बिंच कर बंद कर लिया. और मेरे पानी छूट गया. वो बाद मे चले गया. पर जाते जाते बोलकर गया की मै जब भी बनवाउंगी तब धोऊ नही. साफ ना करू. साला वही चाट कर साफ करेगा.

साला वो उसके तो ज्यादा पैसे देता था. एक दिन खोली मे कोई नही था. मेने कुट्टन को बुला लिया. मेने और कुट्टन ने जमकर प्यार किया. कुट्टन जैसे गया. साला पकिया आ गया. साले को चुत से ताज़ा माल चाटने मे ज्यादा मझा आता था. वो आकर दरवाजा बंद करता है. और तुरंत मेरे पास आ गया. उसने मुझे 500 रूपय दिये.

साला मझा आता है जब चुदवाने के बाद कोई तुम्हारी चुत चाट कर साफ करदे. मै मान गई. और वो हर बार की तरह मेरी दोनों टांगो के बिच आ गया. पर मुझे नही मालूम था की कुट्टन गया नही था. साला उसकी गाड़ी की चाबी तो खोली मे ही रहे गई थी.

अचानक धड़ाम देकर उसने दरवाजे को लात मारी और अंदर आया. मै उसे रिक्वेस्ट करती रही. माफ़ी मांगती रही. पर कुट्टन का गुस्सा बहोत खराब है. उसने मुझे और पकिया दोनों को मारा. पर वो पकिया का सच नही जानता था. वो गलत समझा. और उसने मुझे छोड़ दिया.

उसके चक्कर मे मेने काम पे जाना भी छोड़ दिया. उसे ढूढ़ने निकली. पर वो मुझे कही नही मिला. और कभी मिलता भी तो बात नही करता. वो मुझे सुन ने को भी तैयार नही था. एक दिन मै उसकी टेक्सी के पीछे भागी. बहोत दूर तक. उसे उस दिन तरस आ गया.

उसने टेक्सी रोक दी. वो गुस्से से निचे उतरा. पर मै रो पड़ी तो उसने मेरी बात सुनी. पर पता उसे मुझसे पहले ही चल गया था. लेकिन मुझे लगा की उसने मुझे मौका दिया. पर ऐसा था नही. वो मुझे टेक्सी मे घुमाया, फिराया, खिलाया. मै बहोत खुश थी.

फिर वो मुझे दरिया किनारे ले गया. वो तो मेरे साथ पहले भी सेक्स करता था तो मुझे कोई प्रॉब्लम नही थी. लेकिन वो सेक्स नही कर रहा था. साला जैसे बदला ले रहा हो. साले ने रेत पर ही. एकदम खुले मे. मुझे पलटाया. और बहोत जोरो से.


रूपा बोलते हुए रो पड़ी. वो भी बोलते हुए हाकलने लगी. सिसकने लगी.


रूपा : मै मै मै छट पटा रही थी. लेकिन वो.


कविता ने तुरंत ही उसे बाहो मे भर लिया. कविता ने यही महसूस किया की वीरू ने भी रात यही सब किया था. सायद वो सेक्स नही बदला ही ले रहा था. दोनों कुछ पल शांत हुए. पर रूपा को अब भी कुछ बोलना था.


रूपा : लेकिन बीबीजी एक बात कहु. वो साला प्यार तो साला मुझसे ही करता था. मेरी गलती थी. साला बदला ले रहा था पर मुझे उसे एक मौका देना चाहिये था.


कविता : अच्छा... और तुम्हे ऐसा क्यों लगा.


रूपा : क्यों की मेने तो उसी वक्त सोच लिया था की आज के बाद कभी इसके पास नही आउंगी. और जो गलती थी. मेने उसे सच कर दिया. उसके बाद बीबीजी जो मर्द मुझे पसंद आया. मेने उसके साथ सेक्स किया. वो बाद मे आया था. मुझसे माफ़ी मांगने. पर साले को खूब गली दी. उसने अपने गांव मे शादी की. उसे लेकर भी आया था.

पर उसकी बस्ती मे मेरी एक दोस्त है. वो बता रही थी की कुट्टन रोज दारू पिता है. और रूपा रूपा बोलता रहता है. अभी तो बहोत बूढा हो गया. उसकी बीवी भी उसे छोड़ कर चली गई. वो तो मुझे भी अब नही पहचानता. मगर हर वक्त रूपा रूपा बोलता है.


कविता : (स्माइल) तुमसे प्यार करता था वो.


रूपा : हा बीबीजी. मुझे उसे एक बार माफ कर देना चाहिये था. पर क्या करती मै. उस चूतिये को क्या पता. साला मुझे इतना दर्द हुआ था. क्या बताऊ. साला टाइम निकल जाता है. तब साला अकल आती है. अभी मै जाऊ. खाना बनाना है. तुम्हारे उस को भी खिलाना है.


रूपा तो चली गई. पर कविता को कई चीजे समझ आई. एक की जो प्यार करता है. वो अपने पार्टनर को किसी दूसरे के साथ देखना बरदास नही करेगा. और दूसरा की जिंदगी मे एक और मौका जरूर देना चाहिये था. दोपहर हो चुकी थी. रूपा बार बार वीरू के पास जाकर सब संभालती रही. रूपा और कविता ने बादमे भी साथ टाइम बिताया. कविता ने दोपहर को खाना भी खाया.

लेकिन वो वीरू के पास नही गई. वही वीरू कविता के लिए बहोत गिल्टी फील कर रहा था. और कविता को देखने और मिलने को बेताब हो गया. जब जब रूपा आती तो वो कविता के बारे मे ही पूछता. कविता से मिलने की, उस से माफ़ी मांगने की प्यास वीरू मे बढ़ती गई. और शाम और शाम से रात हो गई. पर कविता बीरु के पास नही गई.
 
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Shetan

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Episode 11.2


वीरू जब जब रूपा आती तब वो बस एक ही सवाल करता. वो कहा है. रूपा उसे सही सही बता देती की वो अंदर दूसरे रूम मे ही है. और उसकी तबियत खराब है. वीरू रूपा से फरमाइश करता की या तो उसे यहाँ लेकर आओ. या फिर उसे वहां उस लड़की के पास लेकर जाओ. ऐसा नही था की रूपा आकर सब कविता को ना बताए.

वो पक्का हर बात कविता को बताती. पर कविता बस ना कहे रही थी. दिन भर कविता और रूपा ने तो खूब समय बिताया. पर वीरू बेचारा अकेला ही बंधा पड़ा रहा. पूरा दिन खतम हो चूका था. और रात हो गई. रूपा रात का खाना भी खिला गई.

पर वीरू कविता को देखने के लिए तरस गया. वो जान ना चाहता था की अब कविता का क्या हाल है. आखिर कविता को वो दर्द उसी ने जो दिया था. रूपा ने भी वादा कर दिया की वो उसे भेज देगी. तब जाकर वीरू ने खाना खाया. पर कविता नही आई.

रात के 9 बज गए. वीरू के जहन मे यह भी बात नही थी की उसकी एक दिन की माहौलत और खतम होने वाले थी. ब्रास्पात मतलब की गुरु वार भी कुछ चंद घंटो मे खतम हो जाएगा. बस जहन मे वो लड़की. जिसके साथ 4 दिन भी बिता दिए. और फिर भी अब तक उसे कविता का नाम भी नही पता था. वीरू ने भी उम्मीद छोड़ दी.

पर जब उसकी उम्मीद छूटी. तब ही वो डोर पर आकर खड़ी हो गई. वीरू ने जब कविता को डोर पर देखा तो उसके फेस पर स्माइल आ गई. उसे कविता बहोत प्यारी लगने लगी. कविता भी जब आई तो वो नंगी नही आई. उसने छोटी सी फ्रॉक पहनी हुई थी.

दरवाजे के सहारे खड़ी कविता किसी छोटे बच्चे के जैसे लग रही थी. दरवाजे के सहारे एक टांग पर खड़ी. एक हाथ से जैसे दरवाजे पर लटक रही हो. और दूसरे हाथ की एक ऊँगली खुद के ही मुँह मे. जैसे अपने ही नाख़ून चबा रही है. पर चहेरे पर ख़ामोशी.

जैसे वो एक पहेली हो. की कविता का मूड कैसा है. क्या वो गुस्से है?? या फिर भूल गई. वीरू ने कविता को ऐसे पुकारा. जैसे वो कोई बच्ची हो.


वीरू : (स्माइल ) केसी हो तुम?? आओ इधर आओ. मेरे पास आओ.


जैसे छोटे बच्चे इंतजार कर रहे होते है की बड़े कब परमिशन देंगे. और परमिशन मिलते ही तुरंत आ जाते है. वैसे कविता तुरंत ही वीरू के पास आकर खड़ी हो गई.


वीरू : (स्माइल ) अरे..... मेरे पास बैठो ना. प्लीज.


कविता तुरंत ही बेड पर बैठ गई.


वीरू : अभी केसी हो तुम. मतलब. क्या अभी भी दर्द कर रहा है.


कविता तुरंत वीरू से कुछ मोड़ कर दूसरी तरफ पाऊ लटकाकर बैठ गई. और कुछ भी नही बोली. वीरू और ज्यादा परेशान हो गया. उसे ऐसा लगने लगा की जैसे सच मे वो किसी छोटी बच्ची से ही बात कर रहा है.


वीरू : अरे.... प्लीज मुझसे बात करो ना. वो मेने सच मे जान बुचकर नही किया. अब कैसे बताऊ तुम्हे.... उफ्फ्फ...


कविता : (मासूमियत, बच्चो जैसे) मै तुमसे बात नही करुँगी. पता है. मुझे कितना पेइन हो रहा था. वो तो रूपा ने..... और तुमने तो सॉरी भी नही बोला.


कविता जैसे बच्चे हर बात थोड़ा बोलकर छोड़ देते. और मेइन बात जो उन्हें चाहिये होता है. वो ही बोलते है. वैसे बोलती है.


वीरू : अच्छा सॉरी. आइंदा कभी मै तुम्हे पेइन नही दूंगा.


कविता पीछे घूमती है. और शरमाते बच्चों जैसे स्माइल करती है. जैसे छोटे बच्चे मान जाते है. वो पूरी बेड पर छढ़ गई. और तुरंत वीरू के बगल मे लेट गई. वीरू हस पड़ा. तो कविता भी हसने लगी. वो वीरू तो बंधा हुआ पिठ के बल था. वही कविता उसके ही बगल मे पेट के बल लेटी हुई उसे ही देख रही थी.


वीरू : क्या तुम्हे सोना है?? क्या तुम्हे नींद आ रही है.


कविता : कच...(मुँह से आवाज ) मै कभी नही सोती हु.


वीरू सोचने लगा की बड़ी अजीब है. उसके ऊपर लद कर तो घोड़े बेचकर सोती है. और मुँह पर झूठ बोल रही है. पर कविता का बेहेवियर किसी बच्चे के जैसा था. सीधा मुँह पर जी हजार जवाब.


वीरू : ठीक है फिर. लाइट बंद कर दो.


कविता किसी बच्चे की तरह ही स्पीड से उठी. लाइट बंद की. और झट से वापस अपनी जगह पर आकर लेट गई. वैसे ही पेट के बल छिपकली की तरह. और फेस वीरू की तरफ. कविता वीरू को ही देख रही थी. वीरू ने कविता को स्माइल करते हुए देखा.

और फिर आंखे बंद कर के सो गया. उसे कविता की बच्चो जैसी हरकत अजीब भी लगी. और बहोत प्यारी भी लग रही थी. वीरू आंखे बंद किए कुछ देर पड़ा रहा. पर उसे कविता को देखने का मन होने लगा.

वीरू ने आंखे खोली और सर घुमाकर कविता को देखा. वीरू सॉक हो गया. वो अब भी वैसे ही उसे ही देख रही थी. वीरू कुछ बोला नही बस स्माइल की और वापस सीधा होकर आंखे बंद कर लेता है. कविता ने उसे माफ कर दिया. इसके लिए वो खुश था.

पर परेशानी यह की उसे नींद अब भी नही आ रही थी. वो परेशान हो गया. वो सोचने लगा की उसे नींद क्यों नही आ रही. धीरे धीरे और समय बीत गया. और रात के 11 बजे. पर दिल का बोझ हलका होने के बावजूद भी उसे नींद बिलकुल नही आ रही थी.

वीरू तंग आ गया. और उसने फिर आंखे खोली. वो गर्दन घुमाकर देखता है. तो फिर हैरान हो गया. कविता अब भी वैसे ही उसे ही देख रही थी.


वीरू : क्या तुम्हे सच मे नींद नही आ रही???


वीरू ने थोड़ा गुस्से वाले लहेजे मे कहा. कविता ने सर ऊपर उठाया. और बच्चों जैसे बस ना मे सर हिलाया.


वीरू : जुठ मत बोलो. पिछली तीन रातो से तुम मेरे ऊपर ही सो रही हो.


कविता : (बच्चो जैसे) मुझे नींद नही आती. फिर रात को मेने गेम खेली. और फिर डॉक्टर ने मेडिसिन, तो तुमने मुझे प्यार किया. फिर मै सो गई.


कविता हर बात बच्चो के जैसे आधी आधी बोल रही थी. वीरू को कुछ समझ आया. और कुछ नही आया. पर उसे इतना समझ आ गया की कविता को उसके ऊपर लेटने से नींद आ जाती है.

फिर वीरू ने सोचा की तीन दिन से कविता उसके ऊपर सो जा रही है. तो सायद उसे अपने ऊपर सुलाया जाए तो उसे नींद आ जाएगी.


वीरू : अच्छा सुनो. तुम मेरे ऊपर आकर लेटो ना. सायद मुझे भी तभि नींद आएगी.


कविता यह सुनकर खुश हो गई. और तुरंत वीरू के ऊपर खिसक कर आ गई. कविता वीरू के ऊपर इतनी ला परवाही बरत ती की उसका घुटना लिंग पर लगे की उसकी कोनी वीरू के पेट पर लगे.

कोई परवाह नही करती. वो रोज के जैसे वीरू के ऊपर. वीरू की छाती पर अपना सर टीकाकरसो गई. वीरू को ऐसे जकड़ लिया. जैसे वीरू कोई टेड़ीबेयर हो. वीरू का लिंग कविता की नाभि मे धंस गया.

वही कविता के बूब्स वीरू के धड मतलब छाती के निचे. टांगे भी कविता ने फॉल्ट कर के वीरू की टांगो पर टिका ली. निचे बेड के गद्दे पर कविता का कुछ टच हो रहा था तो सिर्फ कविता का घुटना.

लेकिन ऐसे एक साथ चिपक कर सोने से वीरू और कविता दोनों को नींद आ गई. और दोनों गहेरी जींद मे सो गए. जो कविता वीरू से पुरे दिन नाराज थी. उसने पल भर मे वीरू को माफ भी कर दिया. और भूल भी गई. जैसे दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हो.


लेकिन वीरू की मुसीबत बढ़ने वाली थी. जिसका अंदाजा उसे नही था. क्यों की वीरू तो कविता को बाहो मे भर कर सो चूका था. पर उसे यह ध्यान ही नही था की नागर ने दी हुई मोहलत मे से एक दिन और खतम हो गया था. गुरु वार मतलब Thursday खतम हो चूका था. और शुक्रवार मतलब Friday स्टार्ट हो चूका था.
 
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