Update 01
सविता एक छोटे से गाँव में रहती थी। उसके परिवार में उसका एक बेटा, उसके ससुर और उसका जेठ थे। जब उसका बेटा चिंटू बहुत छोटा सा बच्चा था, तभी सविता के पति की मौत हो गई थी। पति के मरने के बाद सविता एकदम अकेली पड़ गई थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने खुद अपने दम पर मेहनत मजदूरी करके अपने बेटे चिंटू को पाल-पोसकर बड़ा किया। उसने मन में पक्का फैसला कर लिया था कि वह जिंदगी में कभी भी किसी दूसरे मर्द से शादी नहीं करेगी। वह पूरी जिंदगी अपने इसी फैसले पर टिकी रही।
धीरे-धीरे समय बीतता गया और अब सविता की उम्र 48 साल की हो गई थी। इस उम्र में आकर उसके शरीर की बनावट में एक बड़ा बदलाव आ गया था। जवानी के दिनों में उसका जो बदन एकदम दुबला-पतला और छरहरा हुआ करता था, वह अब इस उम्र में आकर पूरी तरह से मोटा और भरा-पूरा बन गया था। उसके शरीर का मांस अब हर जगह से खूब भारी और गदराया हुआ हो गया था। अब वह जब भी गाँव में साड़ी पहनकर घर में घूमती, तो उसका वह भरा-पूरा भारी शरीर साड़ी के अंदर से भी साफ़ साफ़ दिखाई देता था। घर के मर्द उसे देखते तो देखते ही रह जाते थे।
उसका बेटा चिंटू अब 24 साल का पूरा जवान लड़का हो चुका था। वह पास के ही एक शहर में काम करने लगा था। गाँव के इस घर में चिंटू के अलावा सविता के बूढ़े ससुर और उसका बड़ा जेठ ही उसके साथ रहते थे। चिंटू रोज़ शहर से गाँव अपने घर तो आता था, लेकिन उसका घर आना-जाना बहुत अजीब था। वह या तो रात को बहुत देर गए घर लौटता था जब सब सो जाते थे, या फिर सुबह-सुबह सूरज निकलने से पहले ही अंधेरे में बहुत जल्दी काम के लिए निकल जाता था। दिनभर सविता घर में अपने ससुर और जेठ के साथ अकेली रह जाती थी।
एक रात अचानक सविता की आँख खुली, तो पूरे कमरे में घाघ सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने जैसे ही करवट लेनी चाही, उसे अपने बदन पर हवा का एक ठंडा झोंका महसूस हुआ। उसने झटके से हाथ-पैर हिलाए, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह खटिया पर पूरी तरह से नग्न हालत में लेटी हुई थी। उसके बदन पर धागे का एक टुकड़ा भी नहीं था।
यह देखते ही डर के मारे उसके होश उड़ गए और छाती ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगी। उसने खौफ से कांपते हुए अपनी आँखें फाड़कर अंधेरे कमरे में चारों तरफ देखा। उसे अच्छी तरह याद था कि रात को सोने से पहले उसने सिर्फ अपनी ऊपर की साड़ी निकाली थी, लेकिन ब्लाउज और पेटीकोट तो उसने पूरा पहन रखा था। फिर आधी रात को उसके शरीर के ये सारे कपड़े कहाँ चले गए?
कमरे के घने अंधेरे में उसे एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य साया उसे इस हालत में टकटकी लगाए देख रहा हो। वह डर के मारे अपनी छाती को दोनों हाथों से छुपाकर खटिया पर ही दुबक गई। लेकिन फिर कुछ देर बाद, उसने अपने मन को तसल्ली देने के लिए सोचा कि शायद उसने खुद ही गहरी नींद में अपनी सुध-बुध खोकर गरमी के मारे ये कपड़े निकाल दिए होंगे। वैसे भी, इन दिनों उसके भरे-पूरे जिस्म की गरमी काफी बढ़ गई थी। उसने कई दिनों से खुद को छूकर अपनी उस दबी हुई प्यास को शांत जो नहीं किया था। लेकिन अंदर ही अंदर एक खौफनाक शक उसके दिमाग में रेंगने लगा था कि क्या सच में वह कमरे में अकेली थी?
अगली सुबह जैसे ही घर के मर्द, यानी सविता के ससुर और जेठ, रोज़ की तरह काम के सिलसिले में खेतों की तरफ निकल गए, घर में सन्नाटा छा गया। लेकिन सविता के भीतर रात के उस खौफनाक हादसे और अपने भरे-पूरे बदन की बढ़ती हुई तड़प की वजह से बेचैनी चरम पर थी। वह किसी भी तरह से अपने जिस्म की इस सुलगती हुई आग को शांत करना चाहती थी। उसने बिना वक्त गंवाए, दबे पाँव अपनी जेठानी कमला के कमरे की तरफ रुख किया और अंदर जाते ही सीधे उससे लिपट गई।
उसकी जेठानी कमला सांवले-काले रंग की, बेहद भारी-भरकम और कसरती बदन की मालकिन थी। कमला के शरीर की ताकत ऐसी थी कि वह अच्छे-भले मर्द को भी पटक दे। अपनी सुंदर, गोरी और मखमली देवरानी को इस तरह सुबह-सुबह अपनी बाहों में तड़पता देख कमला के भीतर की सोई हुई भूख भी जाग उठी।
इसके बाद दोनों औरतों के बीच जिस्म का एक बेहद लंबा और बेबाक खेल शुरू हो गया। सविता जैसी गोरी, मक्खन जैसी दूधिया और सुडौल काया वाली औरत के बदन का रस चखने के लिए कमला हर वक्त तैयार रहती थी। कमला ने सविता को बिस्तर पर पूरी तरह से निचोड़ कर रख दिया। वह सविता के इस गदराए हुए शरीर का मज़ा बिल्कुल उसी अंदाज़ में ले रही थी, जैसे कोई ताकतवर मर्द अपनी औरत का लेता है। कमला को अपनी इस खूबसूरत देवरानी को अपनी उँगलियों के तीखे प्रहार और अपनी गीली ज़बान की छुअन से तृप्त करने में एक असीम और गहरा सुकून मिलता था, और सविता भी इस मदहोश कर देने वाले खेल में अपनी रात की सारी घबराहट भूलकर पूरी तरह बहती चली गई।
जब दोनों औरतों के बीच जिस्म का वह लंबा और तूफानी खेल ख़त्म हुआ, तो पूरा कमरा उनकी भारी और हांफती हुई सांसों से गूँज रहा था। सविता पूरी तरह से निढाल होकर कमला की मजबूत और चौड़ी छाती पर अपना सिर टिकाए पड़ी थी। उसका गोरा, दूधिया बदन पसीने से चमक रहा था।
कमला ने बहुत प्यार से सविता के बिखरे हुए बालों को अपनी उँगलियों से समेटा और फिर उसके लाल हो चुके गाल पर एक गीला चुंबन अंकित किया। लेकिन अगले ही पल, कमला की आँखों में एक शरारती और गहरी कामुक चमक आ गई। वह सविता को और उकसाने के इरादे से उसके कान के पास झुककर बहुत ही धीमी आवाज़ में बोली, "क्यों छोटी? आज तो मेरी उँगलियों और जीभ ने तुझे पूरा पानी-पानी कर दिया... लेकिन सच-सच बता, कब तक सिर्फ मेरी इस उंगली से अपना काम चलाएगी? मुझे कोई ऐतराज नहीं है तेरी इस प्यास से, लेकिन तुझे भी तो एक असली मर्द का पूरा सुख चाहिए ना?"
सविता ने शर्माकर अपनी आँखें मूँद लीं और कमला की बाहों में और दुबक गई। उसने दबी आवाज़ में कहा, "दीदी, आप भी ना... सुबह-सुबह क्या बातें लेकर बैठ गईं। मुझे किसी मर्द की कोई ज़रूरत नहीं है, मैं आपके साथ ही खुश हूँ।"
कमला ज़ोर से हँसी, और उसका भारी बदन हिलने लगा। उसने सविता की ठुड्डी को ऊपर उठाया और सीधे उसकी आँखों में देखते हुए बोली, "अरे, तू मुझसे क्या छुपा रही है? मैं तेरी जेठानी हूँ, तेरी नस-नस से वाकिफ हूँ। सुन, अगर तू कहे तो मैं तेरे जेठ, यानी अपने वाले से बात करूँ? वो तो सालों से तेरे इस मक्खन जैसे गोरे और भरे-पूरे बदन को चखने के लिए तड़प रहे हैं। जब भी तू आँगन में अपनी साड़ी संभालती है, उनकी नज़रें सिर्फ तेरी पतली कमर पर ही टिकी रहती हैं। क्या कहती है? अपने भैय्या को सौंप दूँ एक रात के लिए तुझे?"
यह सुनते ही सविता का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे रात का वह वाकया याद आ गया जब वह पूरी नंगी मिली थी। उसने घबराकर कहा, "नहीं दीदी! ऐसी बात मुँह से भी मत निकालो। अगर जेठ जी को भनक भी लग गई तो अनर्थ हो जाएगा। मैं उनके सामने कभी आँख भी नहीं उठा पाऊँगी।"
कमला ने मज़े लेते हुए सविता के स्तन के कड़े हो चुके उभार को धीरे से भींचा और बात को और आगे बढ़ाते हुए बोली, "अच्छा, तो जेठ जी से लाज आती है? तो फिर एक और रास्ता है... ससुर जी के बारे में क्या ख्याल है तेरा? उम्र भले ही ढल रही है उनकी, लेकिन बदन में अभी भी पूरा ज़मींदार वाला दम है। वैसे भी घर की लक्ष्मी को बाहर भेजने से तो अच्छा है कि घर का मर्द ही तेरी इस जवानी का पूरा मज़ा ले और तू भी हमेशा के लिए इसी चौखट के भीतर सुरक्षित रहे। बोल... ससुर जी से छुदेगी तू?"
सविता का पूरा बदन इस बेबाक और तीखी छेड़खानी से अंदर तक काँप उठा। एक तरफ लोक-लाज का डर था और दूसरी तरफ कमला के इन शब्दों से उसकी योनि के भीतर फिर से एक मीठी सी कुलबुलाहट जागने लगी थी। वह कमला के सीने पर हल्के से हाथ मारकर बोली, "दीदी, बस करो... अब और मत उकसाओ मुझे, वरना मैं अभी यहाँ से भाग जाऊँगी।" लेकिन कमला उसे छोड़ कहाँ रही थी, वह अपनी मजबूत बाहों में सविता को और कसकर इस कामुक चर्चा का पूरा मज़ा ले रही थी।
कमला की उन मदहोश कर देने वाली बातों और तीखी छेड़खानी के बीच सविता का दिल बुरी तरह धड़क रहा था। आख़िरी बार सिहरते हुए उसने कमला के चौड़े और मजबूत कंधे पर अपना हाथ रखा। कमरे में पसरे सन्नाटे को देखकर उसने एक गहरी सांस ली। उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया, और आँखों में रात का वही खौफ तैरने लगा।
सविता ने अपनी आवाज़ को बहुत धीमा करते हुए कहा, "दीदी... आप तो मज़ाक में जेठ जी और ससुर जी का नाम ले रही हो, लेकिन मुझे तो इस घर में अब रात को अकेले सोने में भी डर लगने लगा है। कल रात मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जो आज तक कभी नहीं हुआ था।"
कमला ने जैसे ही सविता के चेहरे पर वह डर देखा, उसकी शरारती आँखें भी गंभीर हो गईं। उसने सविता को अपनी बाहों में और ऊपर खींचते हुए पूछा, "क्या हुआ छोटी? तू इतनी डरी हुई क्यों है? साफ़-साफ़ बता, कल रात क्या हुआ था?"
सविता ने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह उस नज़ारे को याद भी नहीं करना चाहती थी। उसने कांपते होठों से बताया, "दीदी, कल रात जब मेरी नींद खुली, तो कमरे में एकदम घाघ अंधेरा था। मुझे बदन पर ठंडी हवा महसूस हुई। मैंने जैसे ही खुद को देखा, मेरे होश उड़ गए। मैं अपनी खटिया पर पूरी तरह से नग्न हालत में लेटी हुई थी। मेरे बदन पर कपड़े का एक धागा भी नहीं था।"
यह सुनते ही कमला के पैर जैसे ठंडे पड़ गए। उसने अचरज से पूछा, "क्या? पूरी नंगी? लेकिन तू तो सोने से पहले ब्लाउज और पेटीकोट पहनकर सोती है ना?"
"हाँ दीदी!" सविता ने हाँफते हुए कहा, "मुझे पक्का याद है कि मैंने सिर्फ अपनी ऊपर की साड़ी निकाली थी। ब्लाउज और पेटीकोट तो मैंने पूरा पहन रखा था। लेकिन आधी रात को मेरे सारे कपड़े गायब थे। मुझे उस अंधेरे में ऐसा लगा जैसे कोई मुझे उसी हालत में टकटकी लगाए देख रहा हो। मैंने सुबह खुद को दिलासा देने के लिए सोच लिया कि शायद गरमी की वजह से नींद में मैंने खुद ही उन्हें निकाल दिया होगा... लेकिन मेरा दिल जानता है कि दाल में कुछ काला है। मुझे डर है कि कोई चुपके से मेरे कमरे में आता है।"
कमला कुछ देर के लिए एकदम खामोश हो गई। उसके चेहरे पर सोच के गहरे बादल छा गए। उसने सविता के गोरे, दूधिया बदन को देखा और फिर खिड़की के पार झांकते हुए बहुत ही रहस्यमयी आवाज़ में फुसफुसाकर बोली, "छोटी... अगर तेरी बात सच है, तो यह काम नींद में खुद कपड़े उतारने का नहीं है। इस घर के किसी मर्द ने रात के अंधेरे में तेरी इस सोती हुई जवानी का पूरा फायदा उठाया है। और अगर उसने सिर्फ कपड़े उतारे हैं, तो समझ ले कि वह तुझे अपनी गिरफ्त में लेने के लिए बहुत बड़ा और खौफनाक जाल बिछा रहा है।"
सविता यह सुनते ही अंदर तक काँप उठी। उसे समझ आ गया था कि उसके इस भरे-पूरे बदन की चाहत अब उसे एक बहुत बड़े और खतरनाक खेल के बीच लाकर खड़ा कर चुकी थी, जहाँ शिकारी घर के भीतर ही छुपा हुआ था।
कमला की यह बात सुनते ही सविता का पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। उसने डर के मारे कमला के दोनों हाथ कसकर पकड़ लिए। उसकी आँखों से आँसू बहने वाले थे। उसने हाँफते हुए पूछा, "दीदी, आप ऐसा मत बोलो! मुझे बहुत डर लग रहा है। आप ही बताओ, ऐसा नीच काम कौन कर सकता है? क्या गाँव का कोई बाहरी आदमी रात को चुपके से घर में घुसा था?"
कमला ने अपना सिर हिलाया और बहुत सोच-समझकर बोला, "छोटी, तू खुद दिमाग लगा। अपने इस घर की दीवारें कितनी ऊँची हैं, और बाहर का दरवाज़ा रात को अंदर से साफ़ बंद रहता है। गाँव का कोई भी ऐरा-गैरा आदमी इतनी आसानी से अंदर नहीं आ सकता। और अगर कोई चोर-उचक्का आता, तो वह घर का कीमती सामान चोरी करता, तेरी खटिया के पास आकर तेरे बदन से एक-एक कपड़ा इतनी सफाई से नहीं उतारता कि तुझे भनक तक न लगे। यह काम किसी बाहर वाले का नहीं, बल्कि इसी घर के किसी ऐसे मर्द का है जिसे घर के कोने-कोने का पता है।"
सविता ने घबराकर अपने होठों को भींचा और बोली, "तो... तो फिर कौन हो सकता है दीदी? क्या चिंटू? नहीं-नहीं, वह तो मेरा अपना खून है, मेरा बेटा है। वह ऐसा पाप कभी नहीं सोच सकता।"
"चिंटू तो सुबह जल्दी निकल जाता है और रात को बहुत देर से आता है," कमला ने उसकी बात काटते हुए कहा, "उसका तो दिमाग वैसे ही शहर की नौकरी में लगा रहता है। अब बचे घर के दो बड़े मर्द—तेरे ससुर जी और तेरे जेठ, यानी मेरे वाले।"
कमला ने अपनी आवाज़ को और धीमा किया और खिड़की के पास जाकर बाहर देखते हुए बोलने लगी, "देख छोटी, पहले बात करते हैं तेरे जेठ की। वो मर्द भले ही मेरे पति हैं, लेकिन मैं उनकी रग-रग से वाकिफ हूँ। वो भले ही सीधे बनते हैं, लेकिन जब भी तू नहाकर बाल सुखाने आँगन में आती है, तो उनकी आँखें तेरे इस गोरे और भरे-पूरे बदन को ऐसे घूरती हैं जैसे वो तुझे अपनी नज़रों से ही नंगा कर रहे हों। कई बार मैंने देखा है कि जब तू रसोई में काम करती है, तो वो बिना वजह वहाँ से चक्कर काटते हैं। उनके जवान बदन में अभी पूरा दम है, और वो तेरी इस जवानी के लिए सालों से भूखे हैं। हो सकता है कि रात के अंधेरे में वो चुपके से तेरे कमरे की कुंडी खोलकर अंदर आए हों।"
सविता की साँसें अटक गईं। उसने पूछा, "और... और ससुर जी?"
कमला ने पलटकर सविता की आँखों में देखा और गंभीर होकर बोली, "ससुर जी भले ही बूढ़े हो रहे हैं, लेकिन वो इस पूरे घर के मालिक हैं। रात को कब कौन सो रहा है, इस बात पर उनकी पूरी नज़र रहती है। तू तो जानती ही है कि गाँव के पुराने ज़मींदार स्वभाव के हैं वो। उनके मन में क्या चलता है, कोई नहीं जान सकता। बूढ़ी उम्र के मर्दों में जब इस उम्र में ऐसी वासना जागती है, तो वो और भी ज़्यादा खतरनाक हो जाते हैं। उन्हें पता है कि तू विधवा है और चिंटू घर पर रहता नहीं है, इसलिए तू पूरी तरह बेबस है। हो सकता है कि उन्होंने अपने रसूख और हक़ के घमंड में आकर यह खौफनाक हरकत की हो ताकि वो तुझे अंदर से कमज़ोर कर सकें।"
सविता खटिया पर बैठी-बैठी अपने भारी और दूधिया बदन को अपनी ही बाँहों में समेटने लगी। उसे ऐसा महसूस होने लगा जैसे उसके जेठ और ससुर की भूखी आँखें इस बंद कमरे की दीवारों के पार से भी उसकी नग्न काया को देख रही हों। घर के इन्हीं मर्दों के बीच अब उसे अपनी आबरू और अपनी जान दोनों खतरे में दिखाई देने लगी थीं।