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जवा का IIT दिल्ली में कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के लिए सेलेक्शन हो गया था —
पूरा घर खुश था,
पर इस खुशी के साथ एक जुदाई का ग़म भी था।
कल जवा को दिल्ली जाना था —
आज उसकी दतिया की आखिरी रात थी।"
"रात के 4 बज गए थे —
जवा की आँखों से नींद गायब थी।
उसने धीरे से विजया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया —
'क्या है, भैया?'
'यार… मन बहुत बेचैन है…'
विजया ने उसे अंदर बुला लिया।"
"कमरे में —
विजया बिस्तर पर आधी लेटी थी,
और जवा उसके करीब बैठ गया।
'विजया… मैं तुझे बहुत मिस करूंगा…'
विजया ने उसका सिर अपने कंधे पर रखा —
'मैं भी, भैया…
पर आप अपने करियर पर ध्यान दो…
मैं कहीं नहीं जा रही…'"
"जवा ने धीरे-धीरे उसके गाल पर चूमा —
विजया मुस्कुराई।
फिर दूसरे गाल पर —
'क्या कर रहे हो, भैया…?'
पर जवा रुका नहीं —
उसने उसके होंठों को चूमा,
और फिर भावुक होकर बोला —
'आई लव यू, विजया…'
और उसे कसकर गले लगा लिया।"
"विजया ने भी कहा —
'आई लव यू टू, भैया…'
पर जवा ने उसकी आँखों में देखा —
'आई लव यू…
एज़ अ गर्ल…
नॉट एज़ अ सिस्टर…'
विजया की आँखें खुली रह गईं —
उसने सोचा,
'अभी भाई इमोशनल ट्रॉमा में है…
इसे फ़ुर्सत से समझाऊँगी…'
पर उसके होंठ फड़फड़ा गए —
'भैया… मैं आपकी सगी बहना हूँ…'
पर जवा ने उसे एक बार फिर गले लगा लिया —
जैसे वो उसे छोड़ना नहीं चाहता।"
"खिड़की से हवा आई —
विजया ने चादर ओढ़ी,
और जवा भी उसी चादर में आ गया।
फिर उसने धीरे-धीरे उसके उभारों को दबोचा —
पहले हल्के से, फिर थोड़ा और गहरा।
विजया ने विरोध नहीं किया —
क्योंकि वो भी अपने भाई को बहुत प्यार करती थी,
और जानती थी कि
'भाई अभी जुदाई के ग़म में है…
शायद ये भावनाएँ हैं…'"

"पर जवा का हाथ रुका नहीं —
उसने विजया की ब्रा खोलने की कोशिश की,
और उन्हें सक करने की जिद करने लगा।
विजया ने उसका हाथ पकड़ा —
'भैया… ये बहुत दूर की बात है…
मैं आपसे प्यार करती हूँ…
पर ये… सही नहीं है…'
पर उसकी आँखों में नमी थी,
और उसके हाथ की गर्मी
जवा के लंड को और बेचैन कर रही थी।"
" "जवा की जिद बढ़ती गई —
उसके हाथ विजया के उभारों पर थे,
और उसकी साँसें भारी थीं।
'बहना… बस एक बार…'
विजया ने आँखें बंद कर लीं —
जैसे वो ज़हर पी रही हो —
और धीरे-धीरे
उसने अपना एक उभार
जवा के मुँह के करीब कर दिया।"
"जवा ने तुरंत उसे अपने होंठों में ले लिया —
पहले हल्के से,
फिर और गहरा,
और फिर और जोर से
सक करना शुरू कर दिया।
विजया की साँसें तेज़ हो गईं —
उसके शरीर में एक बिजली दौड़ गई,
पर उसने आँखें कसकर बंद रखीं —
मानो वो अपनी मर्यादा को बचाए रखना चाहती हो।"
"जवा ने दूसरा उभार भी अपने हाथों में लिया —
और दोनों को बारी-बारी से चूसा।
विजया के हाथ अनजाने में
जवा के बालों में उलझ गए —
जैसे उसका शरीर विरोध कर रहा हो,
पर उसके हाथ अलग नहीं हो रहे थे।
उसके होंठों से
एक हल्की-सी कराह निकल गई —
जिसे उसने तुरंत दबा लिया।"
"फिर जवा ने विजया के निप्पल को अपनी जीभ से रगड़ा —
और विजया की टांगें काँप गईं।
वो अपने आप को संभालने की कोशिश कर रही थी,
पर उसका शरीर
उसके संस्कारों से ज़्यादा
कामुक हो रहा था।
जवा ने उसकी ब्रा पूरी तरह उतार दी,
और उसके उभारों को
अपनी उँगलियों के बीच मसलने लगा।"
"विजया ने आँखें खोलीं —
और जवा की आँखों में अपनी परछाई देखी —
वो शर्मा गई,
पर उसने रोका नहीं।
'भैया… बस आज…'
'हाँ, बहना… बस आज…'
और उस रात,

जवा ने विजया के उभारों को सक किया,
जैसे वो अपनी प्यास बुझा रहा हो,
पर विजया के अंदर एक संघर्ष था —
रिश्ते की मर्यादा
और शरीर की चाहत के बीच।"


विजया ने धीरे से जवा का हाथ रोका —
'भैया… 5 बज गए हैं…'
'आप आधे घंटे से ये सब कर रहे हैं…'
'प्लीज़ समझो…'
'सब घर में कितने खुश हैं —'
'उन्हें ऐसा दर्द मत दो…'
'कि वो अंदर से टूट जाएँ…'
'मम्मी कभी भी उठ सकती हैं…'
जवा की साँसें अभी भी भारी थीं,
पर विजया के शब्दों ने उसकी बेचैनी को ठंडा कर दिया।
उसने आँखें बंद कर लीं,
और धीरे-धीरे
विजया के हाथों को अपने हाथों से अलग किया।"
"विजया उठी,
और दरवाज़ा खोल दिया —
जैसे उसे पता हो कि
ठीक 2 मिनट बाद माँ आने वाली हैं।
और हुआ भी वैसा ही —
माँ ने दरवाज़ा खोला,
और देखा —
'अरे… तुम लोग जाग रहे हो?'
'हाँ, माँ…'
जवा की आवाज़ भावुक थी —
'आज बहुत इमोशनल हो रहा है…'
'जाने को…'"
"माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया —
और जवा ने अपना सिर
उनके वक्षस्थल पर रख दिया —
जहाँ से उसने दूध पिया था,
और वहीं रोने लगा —
'माँ… मुझे बहुत डर लग रहा है…'
'डर कैसा, बेटा…?'
'कि मैं अकेला हो जाऊँगा…'
'ऐसा कुछ नहीं होगा…'

माँ ने उसे कसकर गले लगाया,
और उसका सिर सहलाने लगीं —
मानो वो बचपन में
जब रोता था, तब सहलाती थीं।"
"उस पल —
माँ की बाँहें,
उसकी गर्मी,
और उसकी शांति —
ने जवा को संभाल लिया।
उसने माँ को और कसकर पकड़ा,
जैसे वो उनमें समा जाना चाहता हो,
और रोता रहा —
बच्चों की तरह —
जिसे दुनिया की सारी टेंशन
अपनी माँ की गोद में भूलनी होती है।"
"माँ ने विजया की ओर देखा —
जो चुपचाप खड़ी थी,
उसकी आँखों में
एक अनकही कहानी थी —
पर उसने कुछ नहीं कहा।
बस माँ को देखती रही,
जो अपने बेटे को
अपनी छाती से लगाए
उसके बालों को सहला रही थी।
और उस रात,
माँ की गोद
जवा का आखिरी सहारा बन गई —
एक नई ज़िंदगी की शुरुआत से पहले।"

पूरा घर खुश था,
पर इस खुशी के साथ एक जुदाई का ग़म भी था।
कल जवा को दिल्ली जाना था —
आज उसकी दतिया की आखिरी रात थी।"
"रात के 4 बज गए थे —
जवा की आँखों से नींद गायब थी।
उसने धीरे से विजया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया —
'क्या है, भैया?'
'यार… मन बहुत बेचैन है…'
विजया ने उसे अंदर बुला लिया।"
"कमरे में —
विजया बिस्तर पर आधी लेटी थी,
और जवा उसके करीब बैठ गया।
'विजया… मैं तुझे बहुत मिस करूंगा…'
विजया ने उसका सिर अपने कंधे पर रखा —
'मैं भी, भैया…
पर आप अपने करियर पर ध्यान दो…
मैं कहीं नहीं जा रही…'"
"जवा ने धीरे-धीरे उसके गाल पर चूमा —
विजया मुस्कुराई।
फिर दूसरे गाल पर —
'क्या कर रहे हो, भैया…?'
पर जवा रुका नहीं —
उसने उसके होंठों को चूमा,
और फिर भावुक होकर बोला —
'आई लव यू, विजया…'
और उसे कसकर गले लगा लिया।"
"विजया ने भी कहा —
'आई लव यू टू, भैया…'
पर जवा ने उसकी आँखों में देखा —
'आई लव यू…
एज़ अ गर्ल…
नॉट एज़ अ सिस्टर…'
विजया की आँखें खुली रह गईं —
उसने सोचा,
'अभी भाई इमोशनल ट्रॉमा में है…
इसे फ़ुर्सत से समझाऊँगी…'
पर उसके होंठ फड़फड़ा गए —
'भैया… मैं आपकी सगी बहना हूँ…'
पर जवा ने उसे एक बार फिर गले लगा लिया —
जैसे वो उसे छोड़ना नहीं चाहता।"
"खिड़की से हवा आई —
विजया ने चादर ओढ़ी,
और जवा भी उसी चादर में आ गया।
फिर उसने धीरे-धीरे उसके उभारों को दबोचा —
पहले हल्के से, फिर थोड़ा और गहरा।
विजया ने विरोध नहीं किया —
क्योंकि वो भी अपने भाई को बहुत प्यार करती थी,
और जानती थी कि
'भाई अभी जुदाई के ग़म में है…
शायद ये भावनाएँ हैं…'"

"पर जवा का हाथ रुका नहीं —
उसने विजया की ब्रा खोलने की कोशिश की,
और उन्हें सक करने की जिद करने लगा।
विजया ने उसका हाथ पकड़ा —
'भैया… ये बहुत दूर की बात है…
मैं आपसे प्यार करती हूँ…
पर ये… सही नहीं है…'
पर उसकी आँखों में नमी थी,
और उसके हाथ की गर्मी
जवा के लंड को और बेचैन कर रही थी।"
" "जवा की जिद बढ़ती गई —
उसके हाथ विजया के उभारों पर थे,
और उसकी साँसें भारी थीं।
'बहना… बस एक बार…'
विजया ने आँखें बंद कर लीं —
जैसे वो ज़हर पी रही हो —
और धीरे-धीरे
उसने अपना एक उभार
जवा के मुँह के करीब कर दिया।"
"जवा ने तुरंत उसे अपने होंठों में ले लिया —
पहले हल्के से,
फिर और गहरा,
और फिर और जोर से
सक करना शुरू कर दिया।
विजया की साँसें तेज़ हो गईं —
उसके शरीर में एक बिजली दौड़ गई,
पर उसने आँखें कसकर बंद रखीं —
मानो वो अपनी मर्यादा को बचाए रखना चाहती हो।"
"जवा ने दूसरा उभार भी अपने हाथों में लिया —
और दोनों को बारी-बारी से चूसा।
विजया के हाथ अनजाने में
जवा के बालों में उलझ गए —
जैसे उसका शरीर विरोध कर रहा हो,
पर उसके हाथ अलग नहीं हो रहे थे।
उसके होंठों से
एक हल्की-सी कराह निकल गई —
जिसे उसने तुरंत दबा लिया।"
"फिर जवा ने विजया के निप्पल को अपनी जीभ से रगड़ा —
और विजया की टांगें काँप गईं।
वो अपने आप को संभालने की कोशिश कर रही थी,
पर उसका शरीर
उसके संस्कारों से ज़्यादा
कामुक हो रहा था।
जवा ने उसकी ब्रा पूरी तरह उतार दी,
और उसके उभारों को
अपनी उँगलियों के बीच मसलने लगा।"
"विजया ने आँखें खोलीं —
और जवा की आँखों में अपनी परछाई देखी —
वो शर्मा गई,
पर उसने रोका नहीं।
'भैया… बस आज…'
'हाँ, बहना… बस आज…'
और उस रात,

जवा ने विजया के उभारों को सक किया,
जैसे वो अपनी प्यास बुझा रहा हो,
पर विजया के अंदर एक संघर्ष था —
रिश्ते की मर्यादा
और शरीर की चाहत के बीच।"
विजया ने धीरे से जवा का हाथ रोका —
'भैया… 5 बज गए हैं…'
'आप आधे घंटे से ये सब कर रहे हैं…'
'प्लीज़ समझो…'
'सब घर में कितने खुश हैं —'
'उन्हें ऐसा दर्द मत दो…'
'कि वो अंदर से टूट जाएँ…'
'मम्मी कभी भी उठ सकती हैं…'
जवा की साँसें अभी भी भारी थीं,
पर विजया के शब्दों ने उसकी बेचैनी को ठंडा कर दिया।
उसने आँखें बंद कर लीं,
और धीरे-धीरे
विजया के हाथों को अपने हाथों से अलग किया।"
"विजया उठी,
और दरवाज़ा खोल दिया —
जैसे उसे पता हो कि
ठीक 2 मिनट बाद माँ आने वाली हैं।
और हुआ भी वैसा ही —
माँ ने दरवाज़ा खोला,
और देखा —
'अरे… तुम लोग जाग रहे हो?'
'हाँ, माँ…'
जवा की आवाज़ भावुक थी —
'आज बहुत इमोशनल हो रहा है…'
'जाने को…'"
"माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया —
और जवा ने अपना सिर
उनके वक्षस्थल पर रख दिया —
जहाँ से उसने दूध पिया था,
और वहीं रोने लगा —
'माँ… मुझे बहुत डर लग रहा है…'
'डर कैसा, बेटा…?'
'कि मैं अकेला हो जाऊँगा…'
'ऐसा कुछ नहीं होगा…'

माँ ने उसे कसकर गले लगाया,
और उसका सिर सहलाने लगीं —
मानो वो बचपन में
जब रोता था, तब सहलाती थीं।"
"उस पल —
माँ की बाँहें,
उसकी गर्मी,
और उसकी शांति —
ने जवा को संभाल लिया।
उसने माँ को और कसकर पकड़ा,
जैसे वो उनमें समा जाना चाहता हो,
और रोता रहा —
बच्चों की तरह —
जिसे दुनिया की सारी टेंशन
अपनी माँ की गोद में भूलनी होती है।"
"माँ ने विजया की ओर देखा —
जो चुपचाप खड़ी थी,
उसकी आँखों में
एक अनकही कहानी थी —
पर उसने कुछ नहीं कहा।
बस माँ को देखती रही,
जो अपने बेटे को
अपनी छाती से लगाए
उसके बालों को सहला रही थी।
और उस रात,
माँ की गोद
जवा का आखिरी सहारा बन गई —
एक नई ज़िंदगी की शुरुआत से पहले।"






