Nice and superb update....Update 05
रात भर मूसलाधार बारिश होने के बाद, सुबह सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के शीशों से छनकर घर के भीतर आ रही थीं। चिड़ियों की चहचहाहट से सन्नाटा तो टूट गया था, लेकिन घर के माहौल में कल रात के उस पहले चुंबन की गर्माहट और अनजाना संकोच अभी भी हवा में तैर रहा था।
सुनीता हमेशा की तरह तड़के ही उठ गई थी। उसने नहा-धोकर अपनी पसंदीदा कत्थई सूती साड़ी पहनी, बालों की सलीके से जूड़ा बनाया और रसोई में चली गई। लेकिन उसका ध्यान काम में कम और कल रात के उस एक लम्हे में ज्यादा अटका हुआ था। जब भी उसके हाथ रसोई के बर्तनों को छूते, उसे अपने होंठों पर आरव के स्पर्श का अहसास होने लगता और उसके गाल मारे शर्म के लाल हो जाते।
तभी बरामदे में आरव के भारी और शांत कदमों की आहट हुई।
सुनीता का दिल एक पल के लिए जोर से धड़का। उसने चाय के बर्तन में दूध डालते हुए खुद को व्यस्त दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसकी कांपती उंगलियां उसकी घबराहट बयां कर रही थीं।
आरव रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। उसने कल बाजार से लिया हुआ वही नया नीला कुर्ता पहन रखा था, जिसमें उसका गठीला शरीर और भी ज्यादा आकर्षित लग रहा था। उसके चेहरे पर कल रात की कोई झिझक या चलाकी नहीं थी, बस वही मासूमियत और एक गहरा ठहराव था।
"सुप्रभात मौसी..." आरव ने बेहद धीमी और आदरयुक्त आवाज में कहा।
सुनीता ने हिम्मत जुटाकर मुड़कर उसकी तरफ देखा। आरव की गहरी, साफ आंखों में झांकते ही सुनीता के मन का सारा खौफ और संकोच पल भर में पिघल गया।
"सुप्रभात आरव," सुनीता ने अपनी कजरारी आंखों को थोड़ा झुकाते हुए एक बेहद मीठी और हल्की मुस्कान के साथ कहा, "रात को नींद अच्छी आई?"
"हाँ..." आरव ने दो कदम आगे बढ़ाकर चाय के दो कप उठाए, "लेकिन जागने के बाद भी ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी बहुत हसीन सपने में हूँ।"
आरव के इस सीधे और रूह को छू लेने वाले बोल पर सुनीता के होंठों पर एक नशीली सुर्खी छा गई। उसने आरव के हाथ से चाय का कप लिया और दोनों रसोई की चौखट पर पास-पास बैठ गए।
कल रात का वो पहला चुंबन अब किसी गुनाह का बोझ नहीं, बल्कि उन दोनों के बीच एक अनकहा, अटूट और नया रिश्ता बन चुका था। दोनों चुपचाप चाय की चुस्कियां ले रहे थे, लेकिन एक-दूसरे की बांहों का हल्का सा स्पर्श ही उनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी राहत बन गया था।
तभी, बाहर गली में लाठी की खटखट आवाज गूंजी और किसी ने घर का भारी कुंडा खटखटाया—
"सुनीता बेटा! घर पर हो क्या?"
आवाज सिया देवी की थी।
सुनीता और आरव ने झटके से एक-दूसरे की तरफ देखा। सुबह-सुबह सुल्तानपुर की सबसे कड़क मुखिया का अचानक उनके घर के दरवाजे पर आना किसी नए मोड़ या आने वाले तूफान की आहट था।
सिया देवी की आवाज सुनते ही सुनीता ने चाय का कप तुरंत एक तरफ रखा और अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर खींचते हुए दरवाजे की तरफ भागी। आरव भी शांत कदमों से उसके पीछे-पीछे आ गया।
सुनीता ने घर का भारी लकड़ी का दरवाजा खोला। सामने सफेद सूती साड़ी पहने, हाथ में लाठी लिए सिया देवी खड़ी थीं। उनके पीछे उनका एक खास मुलाजिम भी खड़ा था।
"प्रणाम अम्मा! आप सुबह-सुबह... सब खैरियत तो है न?" सुनीता ने आगे बढ़कर सिया देवी के पैर छूते हुए आदर से कहा।
"सदा सुखी रहो बेटा," सिया देवी ने सुनीता के सिर पर हाथ रखा। फिर उनकी पैनी नजरें सुनीता के पीछे खड़े आरव पर पड़ीं। आरव ने भी बड़े अदब से अपने दोनों हाथ जोड़कर सिया देवी को प्रणाम किया, "नमस्ते अम्मा जी।"
सिया देवी ने आरव को सिर से पांव तक देखा। आज आरव उस नीले कुर्ते में और भी ज्यादा रसूखदार और गंभीर लग रहा था। सिया देवी के कड़क चेहरे पर एक धीमी सी संतोषजनक मुस्कान आ गई।
"अंदर आने को नहीं कहोगी सुनीता बेटा?" सिया देवी ने हल्के दुलार से पूछा।
"अरे अम्मा, यह भी कोई कहने की बात है! आइए-आइए," सुनीता उन्हें आदर से अंदर ले आई और दालान में बिछी तख्त पर बिठाया। आरव ने तुरंत रसोई से पानी का लोटा और पीतल का गिलास लाकर सिया देवी के सामने रख दिया।
सिया देवी ने पानी की दो घूंट पी और आरव की तरफ देखकर बोलीं, "संस्कार तो बहुत अच्छे दिए हैं तुमने अपने इस भांजे को, सुनीता। देखने में जितना बलशाली है, मिजाज से उतना ही नम्र।"
सुनीता के दिल की धड़कन अभी भी थोड़ी तेज थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि गांव की इतनी बड़ी रसूखदार महिला तड़के ही उसके घर क्यों आई हैं।
"अम्मा... आप चाय लेंगी? मैं अभी बनाकर लाती हूँ," सुनीता ने कहा।
"नहीं बेटा, चाय फिर कभी। आज हम यहाँ किसी खास वजह से आए हैं," सिया देवी का लहजा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने अपनी लाठी को जमीन पर टिकाया और सुनीता की आंखों में आंखें डालकर बोलना शुरू किया।
"सुनीता... कल शाम को स्कूल में जो कुछ हुआ, उसकी खबर हमारे कानों तक पहुँच चुकी है। हमारा बेटा राकेश... अपनी हदों से बाहर जा रहा है। उसने स्कूल में आकर तुम्हारे और इस बच्चे के ऊपर जो घिनौने इल्जाम लगाए हैं, उससे हमारा सिर शर्म से झुक गया है।"
यह सुनते ही सुनीता और आरव दोनों चौंक गए। सुनीता को लगा था कि सिया देवी शायद राकेश की बातों में आकर जांच-पड़ताल करने आई हैं, लेकिन सच तो कुछ और ही था।
सिया देवी ने एक गहरी सांस ली और भारी आवाज में आगे कहा, "राकेश भले ही हमारा इकलौता बेटा है, पर उसकी नाफरमानी और आवारागर्दी अब बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है। हमें पता चला कि तुम दोनों ने बिना किसी डर के उसका सामना किया और उसे आईना दिखाया। सुनीता, तुम इस गांव की इज्जत हो। और यह नौजवान आरव... भले ही याददाश्त खो चुका है, लेकिन कल इसने जिस तरह एक औरत के सम्मान की रक्षा की, उसने हमारा दिल जीत लिया।"
सिया देवी ने अपने मुलाजिम की तरफ इशारा किया। मुलाजिम ने एक छोटी सी कपड़े की थैली और कुछ कागजात आगे बढ़ा दिए।
"अम्मा... यह सब क्या है?" सुनीता ने हैरान होकर पूछा।
"यह मंदिर के ट्रस्ट और गांव के सुरक्षा कोष की तरफ से है," सिया देवी ने कहा, "अगले महीने गांव में बहुत बड़ा मेला और दंगल होने वाला है। राकेश उस दंगल के नाम पर गांव वालों से उगाही कर रहा था। हमने फैसला किया है कि इस बार दंगल और सुरक्षा का पूरा इंतजाम आरव संभालेगा। इसे हम अपनी तरफ से जिम्मेदारी सौंप रहे हैं। इससे राकेश को उसकी औकात भी पता चल जाएगी और गांव में आरव को एक सम्मानजनक पहचान भी मिल जाएगी।"
सुनीता और आरव स्तब्ध रह गए। सिया देवी का यह मकसद न केवल राकेश के मुंह पर एक करारा थप्पड़ था, बल्कि उन्होंने आरव को गांव के सामने एक मजबूत और सम्मानित मुकाम देने की नींव रख दी थी।
सुबह सिया देवी के जाने के बाद से ही घर में एक अजीब सा खिंचाव और खामोशी बनी हुई थी। दिन का समय तो जैसे-तैसे बीत गया, लेकिन जैसे-जैसे शाम ढली और रात का अंधेरा घना हुआ, सुनीता के मन की घबराहट और चिंता बढ़ने लगी।
रात का खाना मेज पर लगा हुआ था। रोटी, दाल और सब्जी की भाप उड़ रही थी, पर दोनों में से किसी की भी थाली में हाथ डालने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पीली रोशनी के बीच आरव चुपचाप बैठा अपनी थाली को देख रहा था, जबकि सुनीता की कजरारी आंखों में गहरे फिक्र के बादल छाए हुए थे।
सुनीता ने अपनी सूती साड़ी का पल्लू उंगलियों में भींचते हुए एक लंबी सांस ली और खामोशी को तोड़ा।
"आरव... तुमने सिया देवी अम्मा की बात इतनी आसानी से कैसे मान ली?" सुनीता की आवाज में चिंता साफ छलक रही थी, "तुम नहीं जानते कि सुल्तानपुर का दंगल और मेला क्या चीज है। यह सिर्फ एक खेल नहीं है... यह राकेश की ताकत का अड्डा रहा है।"
आरव ने अपनी गहरी आंखें उठाईं और सुनीता की तरफ देखा। "मौसी... अम्मा जी ने जब भरी पंचायत के सामने वो जिम्मेदारी दी, तो मैं मना कैसे करता? उन्होंने मुझ पर भरोसा जताया है।"
"अरे पर तुम समझ क्यों नहीं रहे!" सुनीता थोड़ा आगे झुकी, उसका हाथ चिंता के मारे कांप रहा था, उसने आरव के गठीले हाथ पर अपना हाथ रख दिया, "राकेश कोई आम लड़का नहीं है। वह एक सिरफिरा गुंडा है। सालों से मेले का ठेका और उगाही उसके हाथ में थी। अब जब उसकी अपनी मां ने तुम्हें वो जिम्मेदारी दे दी है, तो वह चुप नहीं बैठेगा। वह तिलमिला चुका है आरव... वह तुम्हें नुकसान पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है।"
आरव ने सुनीता के कांपते हाथ को अपनी दूसरी हथेली से ढक लिया। उसकी उंगलियों का स्पर्श बहुत गर्म और आश्वस्त करने वाला था।
"मौसी, आप इतनी घबरा क्यों रही हैं?" आरव ने बेहद धीमी और नशीली आवाज में पूछा, "क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं है?"
"मुझे तुम पर भरोसा है आरव..." सुनीता की आंखें नम हो गईं, उसकी सांसें थोड़ी तेज हो गईं, "पर मुझे डर इस बात का है कि तुम अपना अतीत भूल चुके हो। तुम्हें नहीं पता कि तुम कौन हो, तुम्हारी ताकत की सीमा क्या है। अगर राकेश ने अपने गुंडों के साथ मिलकर कोई घात लगाकर हमला किया, तो मैं... मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी। तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अकेली कैसे जिऊंगी?"
सुनीता के मुंह से निकले इन आखिरी शब्दों में सिर्फ एक मौसी की फिक्र नहीं थी, बल्कि कल रात के उस पहले चुंबन के बाद उपजे उस गहरे, अनजाने और अंतरंग प्यार की तड़प थी।
आरव ने सुनीता के हाथ को थोड़ा और कसकर भींच लिया। उसने सीधे सुनीता की कजरारी आंखों में झांका, जहाँ उसके लिए बेपनाह फिक्र तैर रही थी।
"मुझे कुछ नहीं होगा मौसी," आरव ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "जब तक आपकी फिक्र और आपका यह दुलार मेरे साथ है, राकेश या इस गांव का कोई भी तूफान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। और वैसे भी... जो इंसान अपना सब कुछ खो चुका हो, उसके पास खोने के लिए सिर्फ आप ही तो बची हैं। आपकी इज्जत और आपकी सुरक्षा के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ।"
आरव की इस बात में इतनी सच्चाई और गर्माहट थी कि सुनीता का दिल धक से रह गया। डर के उस साये के बीच भी दोनों के बीच कल रात वाली वही खुमारी और खिंचाव दोबारा तैरने लगा।
सुनीता ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन आरव का हाथ नहीं छोड़ा। खाने की थाली वहीं रखी रह गई, और दोनों एक-दूसरे के स्पर्श और फिक्र के समंदर में डूब गए, यह जानते हुए भी कि आने वाला कल उनके लिए कोई बहुत बड़ा तूफान लेकर आने वाला है।
खाने की थालियां एक तरफ सरक चुकी थीं, लेकिन दोनों के बीच पसरी चिंता की परत अब एक अजीब सी बेताबी में बदलने लगी थी। आने वाले कल का खौफ जितना गहरा हो रहा था, एक-दूसरे को खोने का डर दोनों को उतना ही करीब खींच रहा था।
सुनीता ने जब थालियां उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो आरव ने बहुत आहिस्ते से उसकी कलाई थाम ली।
"अभी मत उठिए..." आरव की आवाज बहुत मद्धम और नशीली थी।
सुनीता का दिल एक पल को जोर से धड़का। उसने मुड़कर आरव की तरफ देखा। आरव की गहरी, काली आंखों में इस वक्त राकेश या दंगल की कोई फिक्र नहीं थी—वहाँ सिर्फ सुनीता के लिए एक बेपनाह, प्यासा खिंचाव था।
"आरव... बर्तन रखने दो," सुनीता ने कांपती आवाज में कहा, लेकिन उसकी उंगलियों ने आरव की कलाई को छोड़ा नहीं।
आरव ने जवाब देने की बजाय सुनीता को आहिस्ते से अपनी ओर खींचा। सुनीता का सुडौल, 42 साल का बदन बिना किसी विरोध के आरव के गठीले सीने से आ लगा। उसकी सूती साड़ी का पल्लू कंधे से सरककर नीचे फर्श पर गिर गया। कमरे में जलते दीये की मद्धम पीली रोशनी में सुनीता की सुराहीदार गर्दन और दमकती हुई कमर और भी रसीली लग रही थी।
"मुझे आने वाले तूफान का कोई डर नहीं है मौसी..." आरव ने अपनी गर्म सांसें सुनीता के कान के पास छोड़ते हुए कहा, "मुझे सिर्फ इस बात का डर लगता है कि कहीं यह वक्त यहीं न ठहर जाए।"
आरव की उंगलियों ने सुनीता की पीठ पर अपनी पकड़ कस दी। उसकी उंगलियों की गर्माहट सीधे सुनीता की रीढ़ में एक कड़कड़ाती हुई सिहरन बनकर दौड़ गई। सुनीता ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी दोनों बांहें आरव की चौड़ी गर्दन के गिर्द लपेट दीं।
"तुम बहुत बेपरवाह हो आरव..." सुनीता के कांपते होंठ आरव के गाल से जा टकराए, "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम मेरे लिए क्या बनते जा रहे हो।"
आरव ने सुनीता की ठुड्डी को ऊपर उठाया और सीधे उसके रसीले होंठों पर अपने होंठ टिका दिए। कल रात का वो पहला चुंबन जहाँ एक अनजाने संकोच और झिझक से भरा था, वहीं आज का यह चुंबन आने वाले खतरे के साये में और भी गहरा, प्यासा और अंतरंग हो चुका था।
सुनीता के मुंह से एक धीमी सी सिसकी निकली। उसने आरव के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और खुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। 42 बरसों की मर्यादा, समाज का डर, और 'मौसी' का वो झूठा पर्दा—सब कुछ उस एक नशीली आगोश में जलकर राख हो रहा था।
आरव ने सुनीता को अपनी बांहों में उठाया और तख्त की ओर बढ़ गया। बाहर रात का सन्नाटा गहरा रहा था और आने वाले कल का तूफान दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, लेकिन कमरे के भीतर दो रूहें एक-दूसरे की गर्माहट में खोकर दुनिया के हर खौफ से बेखबर हो चुकी थीं।
उस नशीले और प्यासे चुंबन की गहराई में डूबने से ठीक पहले, सुनीता का वजूद झटके से सिहर उठा। उसके दिमाग में आने वाले कल की चिंता, राकेश का खौफ और समाज के बेदर्द नियमों की कड़कड़ाती आवाज गूंज उठी।
सुनीता ने तड़पकर अपने होंठ आरव के होंठों से अलग कर लिए। उसकी सांसें बेकाबू होकर चल रही थीं और आंखों में एक बेपनाह दर्द और डर तैर रहा था।
उसने अपने दोनों हाथों से आरव के सीने पर दबाव डाला और खुद को थोड़ा पीछे धकेल दिया।
"नहीं आरव... इतनी जल्दी मत करो!" सुनीता की आवाज थरथरा रही थी, गाल मारे शर्म और घबराहट के लाल हो चुके थे। उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू समेटा और अपने सीने पर कसकर लपेट लिया।
आरव ठिठक कर रह गया। उसकी गहरी आंखों में एक अजीब सी तड़प और उलझन छा गई, "मौसी... क्या हुआ?"
सुनीता ने अपनी आंखें मूंद लीं और एक लंबी, ठंडी सांस भरी। जब उसने अपनी पलकें खोलीं, तो उसकी आंखों से आंसुओं की एक बूंद ढलक कर उसके गाल पर बह निकली।
"आरव..." सुनीता ने बेहद कांपती और भावुक आवाज में कहा, "42 सालों की इस सूनी और तन्हा जिंदगी में... मुझे एक नई जिंदगी की तलाश थी। और सच कहूँ तो... वो जिंदगी मुझे तुम में नजर आ रही है। मुझे तुमसे प्यार होने लगा है।"
आरव ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामना चाहा, लेकिन सुनीता ने हल्के से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
"मगर अभी नहीं आरव... बिल्कुल नहीं," सुनीता ने आंसुओं से भरी आंखों से उसे देखते हुए कहा, "अभी चारों तरफ आग लगी हुई है। राकेश कोई भी चाल चल सकता है, सिया देवी अम्मा ने तुम पर इतना बड़ा भरोसा जताया है। अगर जरा सी भी गड़बड़ हुई... अगर समाज को हमारे इस रिश्ते की भनक लग गई, तो मैं सब कुछ खो दूंगी! मेरी इज्जत, मेरा वजूद और सबसे बढ़कर... तुम्हें!"
आरव खामोशी से सुनीता के एक-एक शब्द को सुन रहा था। उसके चेहरे का तनाव अब पिघलने लगा था।
"तुम्हारी उम्र अभी सिर्फ 22 साल है आरव..." सुनीता का गला भर आया, "और मैं 42 साल की एक ढलती उम्र की औरत हूँ। यह समाज बहुत निर्दयी है, यह हमें कभी माफ नहीं करेगा। वे कहेंगे कि मैंने एक अनाथ और अपनी याददाश्त गंवा चुके लड़के का फायदा उठाया है।"
सुनीता ने आरव के गठीले चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया, उसकी उंगलियां आरव के गालों को बहुत दुलार से सहलाने लगीं।
"मुझे थोड़ा वक्त दो आरव... जब तक यह तूफान टल नहीं जाता, जब तक तुम इस गांव में मजबूती से खड़े नहीं हो जाते और तुम्हारा अतीत साफ नहीं हो जाता, तब तक हमें खुद पर काबू रखना होगा। अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो यह वक्त भी कट जाएगा।"
आरव ने सुनीता के कांपते हाथों पर अपने हाथ रख दिए। उसकी आंखों में अब वासना की जगह सुनीता के लिए बेपनाह इज्जत और एक नया समर्पण था।
"जैसा आप कहेंगी, वैसा ही होगा मौसी," आरव ने बहुत आदर और गर्माहट से कहा, "मैं आपके डर और आपकी मर्यादा को कभी ठेस नहीं पहुँचाऊंगा। आपके लिए मैं इस समाज से भी लड़ूँगा और उस राकेश से भी।"
सुनीता ने राहत की एक लंबी सांस ली। दोनों ने उस रात एक-दूसरे को बांहों में भरने की बजाय, एक-दूसरे का हाथ थामकर उस अनजाने सफर का सामना करने का फैसला किया।
रात का सन्नाटा कमरे की खिड़की से छनकर आती हवा की सरसराहट से रह-रहकर टूट रहा था। दीये की मद्धम, पीली रोशनी में दोनों के साये दीवारों पर आड़े-तिरछे तैर रहे थे। अभी-अभी थमी उस बेताबी के बाद, कमरे का तापमान जैसे एक अजीब से सुकून और अनकही तड़प के बीच झूल रहा था।
आरव ने सुनीता के कांपते, ठंडे हाथों को अपनी दोनों हथेलियों के बीच समेट लिया। उसकी नीली, गहरी आंखों में वासना का उफान तो थम चुका था, लेकिन उसकी जगह एक बहुत ही निर्मल, गहरा और बेपनाह खिंचाव तैर रहा था।
"सुनीता..." आरव ने पहली बार बिना 'मौसी' कहे, सीधे उसका नाम पुकारा। उसकी आवाज में एक अजीब सी ललक और रूहानी मिठास थी।
सुनीता का दिल उस नाम को सुनते ही जोर से धड़क उठा।
"मैं आपको अपनी बनाना चाहता हूँ," आरव ने सीधे उसकी कजरारी आंखों में झांकते हुए कहा, "न जाने क्यों, जब से होश संभाला है, मुझे आपमें अपनी पूरी दुनिया दिखती है। ऐसा लगता है जैसे बरसों से मुझे इसी एक छांव की तलाश थी।"
सुनीता के होंठ थोड़े से खुले रह गए। आरव के इन बेबाक और सच्चे बोलों ने उसकी 42 साल की सुसुप्त आत्मा को अंदर तक झकझोर दिया था। उसकी आंखें छलक आईं। उसने आरव के कसरती, चौड़े चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया और उंगलियों से उसके गालों को बड़ी नजाकत से सहलाया।
"हाँ आरव..." सुनीता का गला भर आया, उसकी नशीली आवाज में एक गहरा अहसास घुला हुआ था, "मुझे भी कभी-कभी ऐसा ही लगता है... जैसे मैं तुम्हें बरसों से जानती हूँ। तुमसे मेरा कोई जन्मों का संबंध है, जो हमें हर बंदिश के बावजूद बार-बार एक-दूसरे के पास खींच लाता है। पर... पर हमें थोड़ा संभालकर आगे बढ़ना चाहिए आरव। वक्त हमारे खिलाफ है।"
आरव ने सुनीता की उंगलियों को चूम लिया और एक लंबी, संतोष भरी सांस ली। उसके चेहरे पर बच्चे जैसी मासूमियत लौट आई।
"आप जैसा ठीक समझें..." आरव ने बहुत आदर से कहा, लेकिन उसकी आंखों में एक धीमी सी इल्तजा तैर गई, "लेकिन मैं आपसे दूर नहीं रहना चाहता। आप मेरी पत्नी न सही... पर कम से कम मुझे अपने सीने से लगाकर प्यार तो कर सकती हैं? अपने बेटे की तरह ही सही, अपनी बाहों के घेरे में मुझे सुला लीजिए।"
आरव की इस निश्छल और प्यासी मांग ने सुनीता के भीतर के सारे बांध तोड़ दिए। उसमें से 'मौसी' का डर, समाज की दहशत और उम्र का फासला—सब कुछ एक पल में बह गया। सिर्फ एक औरत का बेपनाह दुलार और एक गहरी आत्मीयता बाकी रह गई।
सुनीता ने तख्त पर पीछे होकर सहारा लिया और मुस्कुराकर अपनी बांहें फैला दीं।
"आ जाओ..." सुनीता ने बेहद कोमल और रसीली आवाज में कहा।
आरव ने बिना एक पल गंवाए अपना सिर सुनीता की सुराहीदार छाती और उसकी गोद के पास टिका दिया। सुनीता ने अपनी दोनों बांहों का गर्म घेरा आरव के कसरती जिस्म के गिर्द कस लिया। उसने अपनी उंगलियां आरव के घने, मुलायम बालों में फंसा दीं और आहिस्ते-आहिस्ते सहलाने लगी।
आरव ने अपनी आंखें मूंद लीं और सुनीता के सीने में उठती धड़कनों को सुनने लगा। सुनीता की सूती साड़ी से आती चंदन और बारिश की भीनी-भीनी खुशबू में आरव को दुनिया का सबसे महफूज कोना मिल गया था। सुनीता ने झुककर आरव के माथे पर एक बहुत ही गहरा, ममता और प्यार से भरा चुंबन जड़ दिया।
कमरे में पसर चुका सन्नाटा अब किसी गुनाह का बोझ नहीं उठा रहा था। बाहर रात का तूफान जारी था, लेकिन उस छोटे से कमरे में दो रूहें एक-दूसरे की बांहों के घेरे में सिमटकर, दुनिया की हर बंदिश से बेखबर, सुकून की आगोश में सो जाने को तैयार थीं।















