• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Incest तलाश

🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

park

Well-Known Member
14,724
17,556
228
Update 05

रात भर मूसलाधार बारिश होने के बाद, सुबह सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के शीशों से छनकर घर के भीतर आ रही थीं। चिड़ियों की चहचहाहट से सन्नाटा तो टूट गया था, लेकिन घर के माहौल में कल रात के उस पहले चुंबन की गर्माहट और अनजाना संकोच अभी भी हवा में तैर रहा था।

सुनीता हमेशा की तरह तड़के ही उठ गई थी। उसने नहा-धोकर अपनी पसंदीदा कत्थई सूती साड़ी पहनी, बालों की सलीके से जूड़ा बनाया और रसोई में चली गई। लेकिन उसका ध्यान काम में कम और कल रात के उस एक लम्हे में ज्यादा अटका हुआ था। जब भी उसके हाथ रसोई के बर्तनों को छूते, उसे अपने होंठों पर आरव के स्पर्श का अहसास होने लगता और उसके गाल मारे शर्म के लाल हो जाते।

तभी बरामदे में आरव के भारी और शांत कदमों की आहट हुई।

सुनीता का दिल एक पल के लिए जोर से धड़का। उसने चाय के बर्तन में दूध डालते हुए खुद को व्यस्त दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसकी कांपती उंगलियां उसकी घबराहट बयां कर रही थीं।

आरव रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। उसने कल बाजार से लिया हुआ वही नया नीला कुर्ता पहन रखा था, जिसमें उसका गठीला शरीर और भी ज्यादा आकर्षित लग रहा था। उसके चेहरे पर कल रात की कोई झिझक या चलाकी नहीं थी, बस वही मासूमियत और एक गहरा ठहराव था।

"सुप्रभात मौसी..." आरव ने बेहद धीमी और आदरयुक्त आवाज में कहा।

सुनीता ने हिम्मत जुटाकर मुड़कर उसकी तरफ देखा। आरव की गहरी, साफ आंखों में झांकते ही सुनीता के मन का सारा खौफ और संकोच पल भर में पिघल गया।
"सुप्रभात आरव," सुनीता ने अपनी कजरारी आंखों को थोड़ा झुकाते हुए एक बेहद मीठी और हल्की मुस्कान के साथ कहा, "रात को नींद अच्छी आई?"


file-000000009294820eba840b26cf1ce98b
"हाँ..." आरव ने दो कदम आगे बढ़ाकर चाय के दो कप उठाए, "लेकिन जागने के बाद भी ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी बहुत हसीन सपने में हूँ।"

आरव के इस सीधे और रूह को छू लेने वाले बोल पर सुनीता के होंठों पर एक नशीली सुर्खी छा गई। उसने आरव के हाथ से चाय का कप लिया और दोनों रसोई की चौखट पर पास-पास बैठ गए।

कल रात का वो पहला चुंबन अब किसी गुनाह का बोझ नहीं, बल्कि उन दोनों के बीच एक अनकहा, अटूट और नया रिश्ता बन चुका था। दोनों चुपचाप चाय की चुस्कियां ले रहे थे, लेकिन एक-दूसरे की बांहों का हल्का सा स्पर्श ही उनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी राहत बन गया था।

तभी, बाहर गली में लाठी की खटखट आवाज गूंजी और किसी ने घर का भारी कुंडा खटखटाया—
"सुनीता बेटा! घर पर हो क्या?"

आवाज सिया देवी की थी।
सुनीता और आरव ने झटके से एक-दूसरे की तरफ देखा। सुबह-सुबह सुल्तानपुर की सबसे कड़क मुखिया का अचानक उनके घर के दरवाजे पर आना किसी नए मोड़ या आने वाले तूफान की आहट था।

सिया देवी की आवाज सुनते ही सुनीता ने चाय का कप तुरंत एक तरफ रखा और अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर खींचते हुए दरवाजे की तरफ भागी। आरव भी शांत कदमों से उसके पीछे-पीछे आ गया।

सुनीता ने घर का भारी लकड़ी का दरवाजा खोला। सामने सफेद सूती साड़ी पहने, हाथ में लाठी लिए सिया देवी खड़ी थीं। उनके पीछे उनका एक खास मुलाजिम भी खड़ा था।

"प्रणाम अम्मा! आप सुबह-सुबह... सब खैरियत तो है न?" सुनीता ने आगे बढ़कर सिया देवी के पैर छूते हुए आदर से कहा।

"सदा सुखी रहो बेटा," सिया देवी ने सुनीता के सिर पर हाथ रखा। फिर उनकी पैनी नजरें सुनीता के पीछे खड़े आरव पर पड़ीं। आरव ने भी बड़े अदब से अपने दोनों हाथ जोड़कर सिया देवी को प्रणाम किया, "नमस्ते अम्मा जी।"

सिया देवी ने आरव को सिर से पांव तक देखा। आज आरव उस नीले कुर्ते में और भी ज्यादा रसूखदार और गंभीर लग रहा था। सिया देवी के कड़क चेहरे पर एक धीमी सी संतोषजनक मुस्कान आ गई।
"अंदर आने को नहीं कहोगी सुनीता बेटा?" सिया देवी ने हल्के दुलार से पूछा।

"अरे अम्मा, यह भी कोई कहने की बात है! आइए-आइए," सुनीता उन्हें आदर से अंदर ले आई और दालान में बिछी तख्त पर बिठाया। आरव ने तुरंत रसोई से पानी का लोटा और पीतल का गिलास लाकर सिया देवी के सामने रख दिया।

सिया देवी ने पानी की दो घूंट पी और आरव की तरफ देखकर बोलीं, "संस्कार तो बहुत अच्छे दिए हैं तुमने अपने इस भांजे को, सुनीता। देखने में जितना बलशाली है, मिजाज से उतना ही नम्र।"

सुनीता के दिल की धड़कन अभी भी थोड़ी तेज थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि गांव की इतनी बड़ी रसूखदार महिला तड़के ही उसके घर क्यों आई हैं।
"अम्मा... आप चाय लेंगी? मैं अभी बनाकर लाती हूँ," सुनीता ने कहा।

"नहीं बेटा, चाय फिर कभी। आज हम यहाँ किसी खास वजह से आए हैं," सिया देवी का लहजा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने अपनी लाठी को जमीन पर टिकाया और सुनीता की आंखों में आंखें डालकर बोलना शुरू किया।
"सुनीता... कल शाम को स्कूल में जो कुछ हुआ, उसकी खबर हमारे कानों तक पहुँच चुकी है। हमारा बेटा राकेश... अपनी हदों से बाहर जा रहा है। उसने स्कूल में आकर तुम्हारे और इस बच्चे के ऊपर जो घिनौने इल्जाम लगाए हैं, उससे हमारा सिर शर्म से झुक गया है।"

यह सुनते ही सुनीता और आरव दोनों चौंक गए। सुनीता को लगा था कि सिया देवी शायद राकेश की बातों में आकर जांच-पड़ताल करने आई हैं, लेकिन सच तो कुछ और ही था।

सिया देवी ने एक गहरी सांस ली और भारी आवाज में आगे कहा, "राकेश भले ही हमारा इकलौता बेटा है, पर उसकी नाफरमानी और आवारागर्दी अब बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है। हमें पता चला कि तुम दोनों ने बिना किसी डर के उसका सामना किया और उसे आईना दिखाया। सुनीता, तुम इस गांव की इज्जत हो। और यह नौजवान आरव... भले ही याददाश्त खो चुका है, लेकिन कल इसने जिस तरह एक औरत के सम्मान की रक्षा की, उसने हमारा दिल जीत लिया।"

सिया देवी ने अपने मुलाजिम की तरफ इशारा किया। मुलाजिम ने एक छोटी सी कपड़े की थैली और कुछ कागजात आगे बढ़ा दिए।

"अम्मा... यह सब क्या है?" सुनीता ने हैरान होकर पूछा।
"यह मंदिर के ट्रस्ट और गांव के सुरक्षा कोष की तरफ से है," सिया देवी ने कहा, "अगले महीने गांव में बहुत बड़ा मेला और दंगल होने वाला है। राकेश उस दंगल के नाम पर गांव वालों से उगाही कर रहा था। हमने फैसला किया है कि इस बार दंगल और सुरक्षा का पूरा इंतजाम आरव संभालेगा। इसे हम अपनी तरफ से जिम्मेदारी सौंप रहे हैं। इससे राकेश को उसकी औकात भी पता चल जाएगी और गांव में आरव को एक सम्मानजनक पहचान भी मिल जाएगी।"

सुनीता और आरव स्तब्ध रह गए। सिया देवी का यह मकसद न केवल राकेश के मुंह पर एक करारा थप्पड़ था, बल्कि उन्होंने आरव को गांव के सामने एक मजबूत और सम्मानित मुकाम देने की नींव रख दी थी।


सुबह सिया देवी के जाने के बाद से ही घर में एक अजीब सा खिंचाव और खामोशी बनी हुई थी। दिन का समय तो जैसे-तैसे बीत गया, लेकिन जैसे-जैसे शाम ढली और रात का अंधेरा घना हुआ, सुनीता के मन की घबराहट और चिंता बढ़ने लगी।

रात का खाना मेज पर लगा हुआ था। रोटी, दाल और सब्जी की भाप उड़ रही थी, पर दोनों में से किसी की भी थाली में हाथ डालने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पीली रोशनी के बीच आरव चुपचाप बैठा अपनी थाली को देख रहा था, जबकि सुनीता की कजरारी आंखों में गहरे फिक्र के बादल छाए हुए थे।

सुनीता ने अपनी सूती साड़ी का पल्लू उंगलियों में भींचते हुए एक लंबी सांस ली और खामोशी को तोड़ा।
"आरव... तुमने सिया देवी अम्मा की बात इतनी आसानी से कैसे मान ली?" सुनीता की आवाज में चिंता साफ छलक रही थी, "तुम नहीं जानते कि सुल्तानपुर का दंगल और मेला क्या चीज है। यह सिर्फ एक खेल नहीं है... यह राकेश की ताकत का अड्डा रहा है।"

आरव ने अपनी गहरी आंखें उठाईं और सुनीता की तरफ देखा। "मौसी... अम्मा जी ने जब भरी पंचायत के सामने वो जिम्मेदारी दी, तो मैं मना कैसे करता? उन्होंने मुझ पर भरोसा जताया है।"

"अरे पर तुम समझ क्यों नहीं रहे!" सुनीता थोड़ा आगे झुकी, उसका हाथ चिंता के मारे कांप रहा था, उसने आरव के गठीले हाथ पर अपना हाथ रख दिया, "राकेश कोई आम लड़का नहीं है। वह एक सिरफिरा गुंडा है। सालों से मेले का ठेका और उगाही उसके हाथ में थी। अब जब उसकी अपनी मां ने तुम्हें वो जिम्मेदारी दे दी है, तो वह चुप नहीं बैठेगा। वह तिलमिला चुका है आरव... वह तुम्हें नुकसान पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है।"

आरव ने सुनीता के कांपते हाथ को अपनी दूसरी हथेली से ढक लिया। उसकी उंगलियों का स्पर्श बहुत गर्म और आश्वस्त करने वाला था।
"मौसी, आप इतनी घबरा क्यों रही हैं?" आरव ने बेहद धीमी और नशीली आवाज में पूछा, "क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं है?"

"मुझे तुम पर भरोसा है आरव..." सुनीता की आंखें नम हो गईं, उसकी सांसें थोड़ी तेज हो गईं, "पर मुझे डर इस बात का है कि तुम अपना अतीत भूल चुके हो। तुम्हें नहीं पता कि तुम कौन हो, तुम्हारी ताकत की सीमा क्या है। अगर राकेश ने अपने गुंडों के साथ मिलकर कोई घात लगाकर हमला किया, तो मैं... मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी। तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अकेली कैसे जिऊंगी?"

सुनीता के मुंह से निकले इन आखिरी शब्दों में सिर्फ एक मौसी की फिक्र नहीं थी, बल्कि कल रात के उस पहले चुंबन के बाद उपजे उस गहरे, अनजाने और अंतरंग प्यार की तड़प थी।

आरव ने सुनीता के हाथ को थोड़ा और कसकर भींच लिया। उसने सीधे सुनीता की कजरारी आंखों में झांका, जहाँ उसके लिए बेपनाह फिक्र तैर रही थी।
"मुझे कुछ नहीं होगा मौसी," आरव ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "जब तक आपकी फिक्र और आपका यह दुलार मेरे साथ है, राकेश या इस गांव का कोई भी तूफान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। और वैसे भी... जो इंसान अपना सब कुछ खो चुका हो, उसके पास खोने के लिए सिर्फ आप ही तो बची हैं। आपकी इज्जत और आपकी सुरक्षा के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ।"

आरव की इस बात में इतनी सच्चाई और गर्माहट थी कि सुनीता का दिल धक से रह गया। डर के उस साये के बीच भी दोनों के बीच कल रात वाली वही खुमारी और खिंचाव दोबारा तैरने लगा।

सुनीता ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन आरव का हाथ नहीं छोड़ा। खाने की थाली वहीं रखी रह गई, और दोनों एक-दूसरे के स्पर्श और फिक्र के समंदर में डूब गए, यह जानते हुए भी कि आने वाला कल उनके लिए कोई बहुत बड़ा तूफान लेकर आने वाला है।


खाने की थालियां एक तरफ सरक चुकी थीं, लेकिन दोनों के बीच पसरी चिंता की परत अब एक अजीब सी बेताबी में बदलने लगी थी। आने वाले कल का खौफ जितना गहरा हो रहा था, एक-दूसरे को खोने का डर दोनों को उतना ही करीब खींच रहा था।

सुनीता ने जब थालियां उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो आरव ने बहुत आहिस्ते से उसकी कलाई थाम ली।
"अभी मत उठिए..." आरव की आवाज बहुत मद्धम और नशीली थी।

सुनीता का दिल एक पल को जोर से धड़का। उसने मुड़कर आरव की तरफ देखा। आरव की गहरी, काली आंखों में इस वक्त राकेश या दंगल की कोई फिक्र नहीं थी—वहाँ सिर्फ सुनीता के लिए एक बेपनाह, प्यासा खिंचाव था।

"आरव... बर्तन रखने दो," सुनीता ने कांपती आवाज में कहा, लेकिन उसकी उंगलियों ने आरव की कलाई को छोड़ा नहीं।

आरव ने जवाब देने की बजाय सुनीता को आहिस्ते से अपनी ओर खींचा। सुनीता का सुडौल, 42 साल का बदन बिना किसी विरोध के आरव के गठीले सीने से आ लगा। उसकी सूती साड़ी का पल्लू कंधे से सरककर नीचे फर्श पर गिर गया। कमरे में जलते दीये की मद्धम पीली रोशनी में सुनीता की सुराहीदार गर्दन और दमकती हुई कमर और भी रसीली लग रही थी।

"मुझे आने वाले तूफान का कोई डर नहीं है मौसी..." आरव ने अपनी गर्म सांसें सुनीता के कान के पास छोड़ते हुए कहा, "मुझे सिर्फ इस बात का डर लगता है कि कहीं यह वक्त यहीं न ठहर जाए।"

आरव की उंगलियों ने सुनीता की पीठ पर अपनी पकड़ कस दी। उसकी उंगलियों की गर्माहट सीधे सुनीता की रीढ़ में एक कड़कड़ाती हुई सिहरन बनकर दौड़ गई। सुनीता ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी दोनों बांहें आरव की चौड़ी गर्दन के गिर्द लपेट दीं।


file-0000000019288211a844d0415dc65aeb
"तुम बहुत बेपरवाह हो आरव..." सुनीता के कांपते होंठ आरव के गाल से जा टकराए, "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम मेरे लिए क्या बनते जा रहे हो।"

आरव ने सुनीता की ठुड्डी को ऊपर उठाया और सीधे उसके रसीले होंठों पर अपने होंठ टिका दिए। कल रात का वो पहला चुंबन जहाँ एक अनजाने संकोच और झिझक से भरा था, वहीं आज का यह चुंबन आने वाले खतरे के साये में और भी गहरा, प्यासा और अंतरंग हो चुका था।


file-0000000085b08207a332ccaddd278f5f
सुनीता के मुंह से एक धीमी सी सिसकी निकली। उसने आरव के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और खुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। 42 बरसों की मर्यादा, समाज का डर, और 'मौसी' का वो झूठा पर्दा—सब कुछ उस एक नशीली आगोश में जलकर राख हो रहा था।

आरव ने सुनीता को अपनी बांहों में उठाया और तख्त की ओर बढ़ गया। बाहर रात का सन्नाटा गहरा रहा था और आने वाले कल का तूफान दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, लेकिन कमरे के भीतर दो रूहें एक-दूसरे की गर्माहट में खोकर दुनिया के हर खौफ से बेखबर हो चुकी थीं।

उस नशीले और प्यासे चुंबन की गहराई में डूबने से ठीक पहले, सुनीता का वजूद झटके से सिहर उठा। उसके दिमाग में आने वाले कल की चिंता, राकेश का खौफ और समाज के बेदर्द नियमों की कड़कड़ाती आवाज गूंज उठी।

सुनीता ने तड़पकर अपने होंठ आरव के होंठों से अलग कर लिए। उसकी सांसें बेकाबू होकर चल रही थीं और आंखों में एक बेपनाह दर्द और डर तैर रहा था।

उसने अपने दोनों हाथों से आरव के सीने पर दबाव डाला और खुद को थोड़ा पीछे धकेल दिया।

"नहीं आरव... इतनी जल्दी मत करो!" सुनीता की आवाज थरथरा रही थी, गाल मारे शर्म और घबराहट के लाल हो चुके थे। उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू समेटा और अपने सीने पर कसकर लपेट लिया।
आरव ठिठक कर रह गया। उसकी गहरी आंखों में एक अजीब सी तड़प और उलझन छा गई, "मौसी... क्या हुआ?"

सुनीता ने अपनी आंखें मूंद लीं और एक लंबी, ठंडी सांस भरी। जब उसने अपनी पलकें खोलीं, तो उसकी आंखों से आंसुओं की एक बूंद ढलक कर उसके गाल पर बह निकली।

"आरव..." सुनीता ने बेहद कांपती और भावुक आवाज में कहा, "42 सालों की इस सूनी और तन्हा जिंदगी में... मुझे एक नई जिंदगी की तलाश थी। और सच कहूँ तो... वो जिंदगी मुझे तुम में नजर आ रही है। मुझे तुमसे प्यार होने लगा है।"

आरव ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामना चाहा, लेकिन सुनीता ने हल्के से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
"मगर अभी नहीं आरव... बिल्कुल नहीं," सुनीता ने आंसुओं से भरी आंखों से उसे देखते हुए कहा, "अभी चारों तरफ आग लगी हुई है। राकेश कोई भी चाल चल सकता है, सिया देवी अम्मा ने तुम पर इतना बड़ा भरोसा जताया है। अगर जरा सी भी गड़बड़ हुई... अगर समाज को हमारे इस रिश्ते की भनक लग गई, तो मैं सब कुछ खो दूंगी! मेरी इज्जत, मेरा वजूद और सबसे बढ़कर... तुम्हें!"

आरव खामोशी से सुनीता के एक-एक शब्द को सुन रहा था। उसके चेहरे का तनाव अब पिघलने लगा था।
"तुम्हारी उम्र अभी सिर्फ 22 साल है आरव..." सुनीता का गला भर आया, "और मैं 42 साल की एक ढलती उम्र की औरत हूँ। यह समाज बहुत निर्दयी है, यह हमें कभी माफ नहीं करेगा। वे कहेंगे कि मैंने एक अनाथ और अपनी याददाश्त गंवा चुके लड़के का फायदा उठाया है।"

सुनीता ने आरव के गठीले चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया, उसकी उंगलियां आरव के गालों को बहुत दुलार से सहलाने लगीं।


file-0000000095cc8211aa89b69eb91d4a32
"मुझे थोड़ा वक्त दो आरव... जब तक यह तूफान टल नहीं जाता, जब तक तुम इस गांव में मजबूती से खड़े नहीं हो जाते और तुम्हारा अतीत साफ नहीं हो जाता, तब तक हमें खुद पर काबू रखना होगा। अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो यह वक्त भी कट जाएगा।"

आरव ने सुनीता के कांपते हाथों पर अपने हाथ रख दिए। उसकी आंखों में अब वासना की जगह सुनीता के लिए बेपनाह इज्जत और एक नया समर्पण था।

"जैसा आप कहेंगी, वैसा ही होगा मौसी," आरव ने बहुत आदर और गर्माहट से कहा, "मैं आपके डर और आपकी मर्यादा को कभी ठेस नहीं पहुँचाऊंगा। आपके लिए मैं इस समाज से भी लड़ूँगा और उस राकेश से भी।"

सुनीता ने राहत की एक लंबी सांस ली। दोनों ने उस रात एक-दूसरे को बांहों में भरने की बजाय, एक-दूसरे का हाथ थामकर उस अनजाने सफर का सामना करने का फैसला किया।


रात का सन्नाटा कमरे की खिड़की से छनकर आती हवा की सरसराहट से रह-रहकर टूट रहा था। दीये की मद्धम, पीली रोशनी में दोनों के साये दीवारों पर आड़े-तिरछे तैर रहे थे। अभी-अभी थमी उस बेताबी के बाद, कमरे का तापमान जैसे एक अजीब से सुकून और अनकही तड़प के बीच झूल रहा था।

आरव ने सुनीता के कांपते, ठंडे हाथों को अपनी दोनों हथेलियों के बीच समेट लिया। उसकी नीली, गहरी आंखों में वासना का उफान तो थम चुका था, लेकिन उसकी जगह एक बहुत ही निर्मल, गहरा और बेपनाह खिंचाव तैर रहा था।

"सुनीता..." आरव ने पहली बार बिना 'मौसी' कहे, सीधे उसका नाम पुकारा। उसकी आवाज में एक अजीब सी ललक और रूहानी मिठास थी।

सुनीता का दिल उस नाम को सुनते ही जोर से धड़क उठा।

"मैं आपको अपनी बनाना चाहता हूँ," आरव ने सीधे उसकी कजरारी आंखों में झांकते हुए कहा, "न जाने क्यों, जब से होश संभाला है, मुझे आपमें अपनी पूरी दुनिया दिखती है। ऐसा लगता है जैसे बरसों से मुझे इसी एक छांव की तलाश थी।"

सुनीता के होंठ थोड़े से खुले रह गए। आरव के इन बेबाक और सच्चे बोलों ने उसकी 42 साल की सुसुप्त आत्मा को अंदर तक झकझोर दिया था। उसकी आंखें छलक आईं। उसने आरव के कसरती, चौड़े चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया और उंगलियों से उसके गालों को बड़ी नजाकत से सहलाया।

"हाँ आरव..." सुनीता का गला भर आया, उसकी नशीली आवाज में एक गहरा अहसास घुला हुआ था, "मुझे भी कभी-कभी ऐसा ही लगता है... जैसे मैं तुम्हें बरसों से जानती हूँ। तुमसे मेरा कोई जन्मों का संबंध है, जो हमें हर बंदिश के बावजूद बार-बार एक-दूसरे के पास खींच लाता है। पर... पर हमें थोड़ा संभालकर आगे बढ़ना चाहिए आरव। वक्त हमारे खिलाफ है।"

आरव ने सुनीता की उंगलियों को चूम लिया और एक लंबी, संतोष भरी सांस ली। उसके चेहरे पर बच्चे जैसी मासूमियत लौट आई।

"आप जैसा ठीक समझें..." आरव ने बहुत आदर से कहा, लेकिन उसकी आंखों में एक धीमी सी इल्तजा तैर गई, "लेकिन मैं आपसे दूर नहीं रहना चाहता। आप मेरी पत्नी न सही... पर कम से कम मुझे अपने सीने से लगाकर प्यार तो कर सकती हैं? अपने बेटे की तरह ही सही, अपनी बाहों के घेरे में मुझे सुला लीजिए।"

आरव की इस निश्छल और प्यासी मांग ने सुनीता के भीतर के सारे बांध तोड़ दिए। उसमें से 'मौसी' का डर, समाज की दहशत और उम्र का फासला—सब कुछ एक पल में बह गया। सिर्फ एक औरत का बेपनाह दुलार और एक गहरी आत्मीयता बाकी रह गई।

सुनीता ने तख्त पर पीछे होकर सहारा लिया और मुस्कुराकर अपनी बांहें फैला दीं।

"आ जाओ..." सुनीता ने बेहद कोमल और रसीली आवाज में कहा।

आरव ने बिना एक पल गंवाए अपना सिर सुनीता की सुराहीदार छाती और उसकी गोद के पास टिका दिया। सुनीता ने अपनी दोनों बांहों का गर्म घेरा आरव के कसरती जिस्म के गिर्द कस लिया। उसने अपनी उंगलियां आरव के घने, मुलायम बालों में फंसा दीं और आहिस्ते-आहिस्ते सहलाने लगी।


file-00000000c2d082468460fd4b6887dd8c
आरव ने अपनी आंखें मूंद लीं और सुनीता के सीने में उठती धड़कनों को सुनने लगा। सुनीता की सूती साड़ी से आती चंदन और बारिश की भीनी-भीनी खुशबू में आरव को दुनिया का सबसे महफूज कोना मिल गया था। सुनीता ने झुककर आरव के माथे पर एक बहुत ही गहरा, ममता और प्यार से भरा चुंबन जड़ दिया।
कमरे में पसर चुका सन्नाटा अब किसी गुनाह का बोझ नहीं उठा रहा था। बाहर रात का तूफान जारी था, लेकिन उस छोटे से कमरे में दो रूहें एक-दूसरे की बांहों के घेरे में सिमटकर, दुनिया की हर बंदिश से बेखबर, सुकून की आगोश में सो जाने को तैयार थीं।
Nice and superb update....
 

rhyme_boy

Well-Known Member
6,845
7,274
189
Update 02

रसोई से निकलती गर्म-गर्म पराठों और चाय की मनभावन खुशबू ने पूरे घर को अपनी आगोश में ले रखा था। सुनीता करीने से लकड़ी की मेज पर नाश्ते की थालियाँ सजा रही थी। सुबह की सुनहरी धूप खिड़की के रास्ते उसकी सादी सूती साड़ी पर पड़ रही थी, जिससे उसके गोरे रंग में एक अलग ही निखार आ रहा था।

तभी आरव नहाकर कमरे से बाहर निकला। सिर के भीगे बालों से पानी की कुछ बूंदें ढलककर उसकी चौड़ी गर्दन और गठीले सीने पर फिसल रही थीं। कल रात वाले वही पुराने कपड़े पहने होने के बावजूद उसकी कद-काठी और मर्दाना आकर्षण देखते ही बनता था।

सुनीता ने जैसे ही नजरें उठाकर उसे देखा, उसके होंठों पर एक बेहद मीठी और रसीली मुस्कान तैर गई। उसकी नजरें एक पल के लिए आरव के चौड़े कांधों पर ठहरीं।
"नहा लिया?" सुनीता ने प्यार से पूछा और प्लेट में पराठा रखते हुए आगे बोली, "कल रात तो जैसे-तैसे कट गई, लेकिन आज शाम को हम दोनों पास वाले बाजार चलेंगे। तुम्हारे लिए कुछ अच्छे और नाप के कपड़े ले आऊंगी। ऐसे कब तक दूसरों के कपड़ों में रहोगे?"

आरव ने सुनीता के इस अधिकार और अपनेपन को चुपचाप महसूस किया। वह बिना कुछ कहे शांति से मेज के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सा संकोच और एक अनजाना सुकून दोनों साथ तैर रहे थे।

सुनीता उसके लिए गरमा-गरम नाश्ता परोसने लगी। उसकी उंगलियाँ जब-जब थाली के पास आरव के हाथों को छू जातीं, तो दोनों के बदन में एक मद्धम सी सिहरन दौड़ जाती।

पराठे पर मक्खन की टिकिया रखते हुए सुनीता अचानक रुक गई, जैसे उसे कुछ याद आया हो। वह आरव की ओर देखते हुए चहकती हुई बोली—
"वैसे... आज से मेरी छुट्टियाँ खत्म हो रही हैं। मुझे स्कूल जाना ही पड़ेगा। पर फिर मैंने सोचा, तुम दिन भर यहाँ इस अकेले घर में बैठकर क्या करोगे? बोर हो जाओगे और न जाने क्या-क्या अनाप-शनाप सोचोगे... इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम भी मेरे साथ ही स्कूल चलो!"

सुनीता की यह बात सुनकर आरव के हाथ में उठा निवाला वहीं थम गया। उसने अपनी गहरी और मासूम आँखों से सुनीता की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में थोड़ा झिझक और संकोच साफ झलक रहा था—
"स्कूल? लेकिन... मैं वहाँ जाकर क्या करूँगा, सुनीता? सारे बच्चे और मास्टर मुझे अजीब नजरों से देखेंगे। मैं तो..."

"अरे! तो इसमें इतना सोचने और घबराने की क्या बात है?" सुनीता ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए बेहद आत्मीयता से कहा। उसने अपने कोमल हाथ से आरव के कंधे को धीरे से सहलाया, "वहाँ बड़ा सा स्टाफ रूम है, ढेर सारी किताबें हैं। तुम आराम से वहाँ बैठना, चाय पीना और किताबें पढ़ना। और वैसे भी... मेरी नजरों के सामने रहोगे, तो मुझे भी तुम्हारी चिंता नहीं रहेगी। समझे?"

सुनीता की आँखों में छुपा वह बेपनाह अपनापन देखकर आरव इंकार न कर सका। वह बस खामोशी से सिर हिलाकर मुस्कुरा दिया, जबकि सुनीता का दिल उसे अपने साथ ले जाने की खुशी में किसी नवविवाहिता की तरह उछल रहा था।

सुनीता ने गर्म-गर्म आलू का पराठा आरव की थाली में रखा और फिर खुद भी ठीक उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गई। मेज छोटी थी, इसलिए जब सुनीता आगे को झुकी, तो उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया, जिससे उसकी ढली हुई सुराहीदार गर्दन और दमकती छाती का ऊपरी हिस्सा चांदनी की तरह चमक उठा। आरव की नजरें एक पल के लिए वहीं अटक गईं, पर उसने तुरंत अपनी पलकें झुका लीं।

सुनीता ने उसकी इस चोरी को भांप लिया था। उसके गुलाबी गालों पर एक हल्की सी लाली छा गई, लेकिन उसने बात का सिलसिला जारी रखा।

"अच्छा सुनो," सुनीता ने चाय की थर्मामीटर जैसी गर्म चुस्की लेते हुए कहा, उसकी नशीली आंखें सीधे आरव के चेहरे में झांक रही थीं, "तुम खाने में कोई नखरे तो नहीं करते न? आज तो मैंने आलू के पराठे बना दिए हैं, लेकिन तुम्हें क्या-क्या पसंद है, मुझे बता देना। मैं वही सब बनाऊंगी।"

आरव ने पराठे का एक निवाला तोड़ा, उसे दही में डुबोया और अपने मुंह में रखा। सुनीता के हाथ के खाने का स्वाद इतना लाजवाब था कि उसके मुंह से अनजाने में ही निकला, "बहुत स्वादिष्ट है... मैंने शायद बहुत समय से इतना अच्छा खाना नहीं खाया।"

आरव की यह बात सुनकर सुनीता का सीना चौड़ा हो गया। एक औरत के लिए इससे बड़ी तारीफ क्या हो सकती थी कि कोई पुरुष उसके हाथ के बने खाने की इतनी आत्मीयता से सराहना करे। वह खुशी से झूम उठी और अपनी पतली उंगलियों से अपने बालों की लट को कान के पीछे सरकाते हुए बोली, "बस, फिर तो रोज मेरे ही हाथ का खाना खाना पड़ेगा तुम्हें। अब से तुम्हारी पसंद-नापसंद का ख्याल रखना मेरी जिम्मेदारी है।"

आरव ने चाय का कुल्हड़ उठाया और बहुत धीरे से पूछा, "सुनीता... आप अकेली रहती हैं इस बड़े से घर में? कोई और नहीं है आपके साथ?"

यह सवाल सुनते ही सुनीता की आंखों में एक पल के लिए अतीत की कोई पुरानी, काली परछाईं लहराई, लेकिन उसने तुरंत मुस्कान से उसे ढक लिया। उसने अपनी ढली हुई कमर को कुर्सी की पीठ से टिकाया, जिससे उसकी सुडौल छाती और अधिक उभर आई।
"कोई नहीं है आरव..." सुनीता की आवाज में थोड़ा सा अकेलापन और बहुत सारा ठहराव था, "सालों से यह घर ऐसा ही शांत था। लेकिन आज... आज पहली बार मुझे इस मेज पर किसी के साथ बैठकर नाश्ता करने का अहसास इतना खूबसूरत लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे इस वीरान घर में कोई रोनक लौट आई हो।"

आरव सुनीता के शब्दों में छुपी उस प्यास और अकेलेपन की गहराई को महसूस कर सकता था। उसने अपनी मेज पर रखी हथेली को थोड़ा आगे बढ़ाया और सुनीता की उंगलियों को हल्के से छू दिया।

"अब आप अकेली नहीं हैं," आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा।

सुनीता का दिल उस जरा से स्पर्श से धक से रह गया। उसके जिस्म में एक ककंपकंपी दौड़ गई। उसने अपनी थर्मामीटर सी गर्म हथेली से आरव का हाथ थाम लिया।
"इसीलिए कह रही हूँ," सुनीता ने अपने होंठों को थोड़ा काटकर नशीले अंदाज में कहा, "आज तुम मेरे साथ ही स्कूल चल रहे हो। मैं तुम्हें इस घर में अकेला छोड़कर एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठ पाऊंगी। वहां मेरे कमरे में बैठना, जब मुझे छुट्टी मिलेगी, मैं आकर तुम्हारे पास बैठूंगी... मंजूर है?"

आरव ने सुनीता के इस मीठे अधिकार और उसकी आंखों में उमड़ती अनजानी वासना व अपनापे को देखा। वह चाहकर भी मना नहीं कर पाया। उसने हल्के से सिर हिला दिया, और सुनीता के चेहरे पर एक ऐसी दिलकश मुस्कान खिल उठी जिसने पूरे कमरे को एक अलग ही मदहोश कर देने वाले अहसास से भर दिया।


रसोई में बनी उस छोटी सी लकड़ी की मेज पर धूप की सुहानी सुनहरी किरणें खिड़की की जाली से छनकर आ रही थीं। धूप की वे लकीरें सीधे सुनीता के सादे, मगर बेहद सलीके से पहने गए कपड़ों पर पड़ रही थीं।
सुनीता के होंठों पर वही नशीली, मद्धम सी मुस्कान तैर रही थी। उसने पराठे का एक छोटा सा, नरम टुकड़ा तोड़ा, उसे गाढ़े दही में हल्का सा डुबोया और बड़े नजाकत से अपने गुलाबी होंठों के बीच रख लिया। चबाते हुए उसने अपनी गहरी, कजरारी आंखों से नटखट अंदाज में आरव की तरफ देखा—

"वैसे... रात में नींद कैसी आई तुम्हें?"

आरव ने चाय का कुल्हड़ मेज पर वापस रखा। उसके भीगे बालों की एकाध बूंदें अब भी उसकी सुडौल गर्दन पर ठहरी हुई थीं। उसने थोड़ा संकोच करते हुए अपनी नजरें झुका लीं, "अब... रात को थोड़ा नींद देर से आई, इसलिए शायद सुबह इतनी देर तक सोता ही रह गया।"
सुनीता यह सुनकर अपनी सुराहीदार गर्दन थोड़ा पीछे करके खिलखिलाकर मुस्कुरा पड़ी। उसकी हंसी में एक अजीब सी खनक थी, जैसे शांत रात में कोई जलतरंग बज उठा हो। वह हंसी सीधे आरव के सीने में उतर गई।
"वैसे, नींद तो कल रात मुझे भी ठीक से नहीं आ रही थी," सुनीता ने अपनी नशीली निगाहों को आरव के गठीले कांधों पर टिकाते हुए कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी गर्माहट और अनजाना सा खिंचाव था।
फिर अचानक उसकी आवाज थोड़ी गंभीर और संजीदा हो गई। उसने आरव के चेहरे की रेखाओं को ध्यान से पढ़ा और बोली, "वैसे आरव... क्या तुम्हें अपने बारे में कुछ भी याद आया? अपने घर, अपनी पढ़ाई या परिवार के बारे में कोई छोटा सा धागा भी दिमाग में पकड़ाया?"
यह सवाल सुनते ही आरव का थोड़ी देर पहले खिलता हुआ चेहरा अचानक बुझ सा गया। उसकी आंखों में वही पुराना खौफनाक सन्नाटा और खालीपन लौट आया। उसकी उंगलियां मेज पर रखे कपड़े को कसकर भींचने लगीं।

सुनीता से आरव की यह बेबसी और लाचारी बर्दाश्त नहीं हुई। 42 बरसों से जिस दिल में सिर्फ अनुशासन की सख्ती थी, वहां इस वक्त सिर्फ और सिर्फ आरव के लिए तड़प उमड़ पड़ी थी। उसने बिना एक पल गंवाए मेज पर रखा आरव का मजबूत, गठीला हाथ अपने दोनों कोमल, थर्मामीटर से गर्म हाथों में थाम लिया। सुनीता की मखमली हथेलियों का वह स्पर्श आरव के भीतर तक ठंडक पहुंचा गया।

"नहीं... मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा," आरव ने एक भारी और लंबी सांस खींचते हुए कहा। उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद सुनीता की हथेली की गर्माहट में खो जाने लगीं, "बस वो काली खौफनाक रात... बारिश का शोर... और लोहे के टकराने के साथ चीखते हुए लोगों की आवाजें ही दिमाग में किसी खौफनाक सपने की तरह गूंज रही हैं।"

"कोई बात नहीं आरव... तुम परेशान मत हो," सुनीता ने बेहद आत्मीयता से उसकी उंगलियों को सहलाते हुए दिलासा दिया। उसके स्पर्श में एक मां का दुलार भी था और एक स्त्री का अनजाना समर्पण भी।

"धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। हमें एक बार पुलिस स्टेशन में भी खबर करनी होगी, ताकि अगर तुम्हारे परिवार वाले तुम्हें ढूंढ रहे हों तो उन्हें कम से कम इतना पता चल सके कि तुम सुरक्षित हो। और हां, किसी अच्छे शहर के डॉक्टर को भी दिखाएंगे ताकि तुम्हारी याददाश्त जल्दी वापस आ सके। लेकिन..." सुनीता ने आरव की आंखों में आंखें डालते हुए अपनी पकड़ थोड़ी मजबूत की, "जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते या तुम्हें सब याद नहीं आ जाता, तुम बेफिक्र होकर मेरे पास रहो। यह तुम्हारा ही घर है... समझे?"

आरव ने सुनीता के इस बेपनाह और निस्वार्थ दुलार को देखा। उसके वीरान पड़े जीवन में यह औरत किसी फरिश्ते की तरह आई थी। फिर उसके मन में एक व्यावहारिक दुविधा कौंधी। उसने थोड़ा झिझकते हुए, संकोच भरे अंदाज में पूछा—

"अच्छा... अगर हम बाहर जा रहे हैं, स्कूल जा रहे हैं... तो मैं सबके सामने आपको क्या कहूंगा? दीदी??"

'दीदी' शब्द सुनते ही सुनीता जोर से हंस पड़ी। उसकी साड़ी का पल्लू एक बार फिर उसके सुडौल कंधे से ढलक कर नीचे गिर गया, और उसकी छाती का ढला हुआ उभार चांदनी सा दमक उठा। रसोई की दीवारें उसकी हंसी की गूंज से महक उठीं।

"अरे बुद्धू! मेरी उम्र अब दीदी कहलाने की नहीं रही," सुनीता ने अपने गालों पर झूलती लट को बड़े नजाकत से कान के पीछे सरकाते हुए कहा।

आरव ने सचमुच चौंककर उसे सर से पांव तक देखा। सुबह की उस निखरी धूप में सुनीता का दमकता गोरा रंग, उसकी सुराहीदार गर्दन, ढली हुई पतली कमर और गठीला, आकर्षक बदन कहीं से भी ढलती उम्र की चुगली नहीं कर रहा था। उसकी एक-एक हरकत में किसी नवयौवना सी ताजगी बिखरी पड़ी थी।

"अरे क्या बात करती हैं आप!" आरव की नजरें सुनीता की सुडौल काया पर जम कर रह गईं, "आप तो अभी मुझसे बस थोड़ी सी ही बड़ी लगती हैं। अगर मेरी कोई सगी बड़ी बहन होती, तो कसम से बिल्कुल आपके जैसी ही खूबसूरत और हसीन होती!"

सुनीता ने अपनी पलकें झुका लीं। उसके गालों पर एकदम से हया की लाली दौड़ गई। 42 साल की उम्र तक जिसने कभी किसी मर्द की तारीफ का एक लफ़्ज़ अपने करीब नहीं आने दिया था, आज एक 22 साल के गठीले, खूबसूरत युवा मर्द के मुंह से अपने हुस्न का ऐसा कसीदा सुनकर उसका कुंवारा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसके सीने की गति तेज हो गई।

उसने अपनी छाती पर पल्लू को दोबारा संभालते हुए और अपनी रंगत छुपाते हुए कहा, "बड़े छांट हो तुम तो! बातों में फंसाना अच्छी तरह जानते हो... अच्छा बताओ, फिर क्या बोलोगे मुझे?"

आरव थोड़ा गंभीर होकर सोचने लगा। उसने अपनी ठोड़ी पर हाथ रखा, "अम्म... 'मां' तो मैं आपको बोल नहीं सकता क्योंकि वो बहुत अलग अहसास होता है... और 'आंटी' कहना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। आंटी शब्द बहुत पराया और सूखा सा लगता है।"
सुनीता ने अपनी चाय का आखिरी घूंट लिया और अपनी नशीली आंखों से उसे देखते हुए एक बहुत ही व्यावहारिक सुझाव दिया—

"एक काम करो... फिलहाल तुम मुझे 'मौसी' बोलना। मैं गांव वालों और स्कूल के बाकी मास्टरों को बता दूंगी कि तुम मेरी दूर की बहन के बेटे हो, जो शहर से मेरे पास कुछ दिन रहने आया है। इससे कोई फालतू के सवाल भी नहीं उठाएगा और हमारा रिश्ता भी सबको साफ रहेगा।"

आरव के मासूम चेहरे पर एक गहरी राहत भरी मुस्कान बिखर गई। उसने सिर हिलाया, "हां! यह बिल्कुल सही रहेगा... मौसी।"

'मौसी' शब्द जब आरव के होंठों से निकला, तो सुनीता के भीतर एक अजीब सी मीठी गुदगुदी हुई। उसने मन ही मन सोचा—रिश्ता चाहे जो भी नाम ले ले, लेकिन इस घर की फिजाओं में जो अनजाना नशा घुल चुका था, उसे रोक पाना अब शायद किसी के बस में नहीं था।


सुनीता ने घर के मुख्य दरवाजे पर पीतल का भारी ताला लगाया और उसकी चाबी अपनी साड़ी के पल्लू के छोर में नजाकत से बांध ली। सुबह की गुनगुनी धूप अब थोड़ी तीखी होने लगी थी, और रात की बारिश के बाद गांव की सोंधी मिट्टी की महक चारों तरफ महक रही थी।
सुनीता आगे-आगे चल रही थी और आरव उसके पीछे। सुनीता का हर कदम उसकी चाल में एक अनजानी लचक पैदा कर रहा था। उसकी सूती साड़ी के पल्लू से झलकती सुराहीदार पीठ और ढली हुई कमर धूप में और भी निखर रही थी। आरव की नजरें चुपचाप उसकी उसी कुदरती खूबसूरती पर टिकी थीं। जब भी रास्ते में कोई गड्ढा या कीचड़ आता, सुनीता रुक जाती और मुड़कर आरव का हाथ थाम लेती।

तभी, गांव की मुख्य सड़क से गुजरते वक्त रास्ते में एक नया मोड़ आया।

सड़क किनारे बनी एक पुरानी चाय की दुकान के पास गांव के कुछ रसूखदार और शोहदे किस्म के लोग बैठे थे। उनमें से एक था राकेश—गांव के पूर्व सरपंच का बेटा, जो सालों से सुनीता पर गंदी नजर रखता आया था। सुनीता ने हमेशा उसे दुत्कार कर भगाया था।

आज जब उसने सुनीता को 42 साल की उम्र में किसी 22 साल के नौजवान का हाथ थामे, इस तरह मुस्कुराते हुए चलते देखा, तो उसकी आंखों में जलन और हवस का एक खौफनाक तूफान उठ खड़ा हुआ।

राकेश ने चाय का कुल्हड़ नीचे पटका और जानबूझकर बीच रास्ते में आकर खड़ा हो गया। उसके साथ उसके दो गुर्गे भी थे।

"अरे वाह, मैडम जी!" राकेश ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए गंदी मुस्कान के साथ कहा, "आज सूरज किधर से निकला है? जो औरत आज तक किसी मर्द की परछाईं से भी दूर भागती थी, वो आज इस चीकने लौंडे का हाथ थामकर सड़क पर निकल रही है? कौन है यह चिकना, सुनीता जी? कहीं शहर से नया शौक तो नहीं पाल लिया?"

राकेश के गुर्गे जोर-जोर से हंसने लगे। रास्ते पर चलते गांव वाले भी रुककर देखने लगे।
सुनीता का खून खौल उठा। उसके गाल गुस्से से लाल हो गए, लेकिन उसने संयम बनाए रखा। वह आरव को किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहती थी।

"राकेश! अपनी जबान को लगाम दो और हमारा रास्ता छोड़ो," सुनीता ने कड़क आवाज में कहा, "यह मेरी बहन का बेटा आरव है, शहर से मेरे पास आया है।"

"ओहो! बहन का बेटा?" राकेश ने एक कदम और आगे बढ़ाकर आरव को नीच नजरों से घूरा, "झांसा किसे दे रही हो सुनीता? हमें तो कुछ और ही चक्कर लग रहा है। इस उम्र में इतनी जवानी चढ़ी है कि अब घर में..."

राकेश अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अचानक आरव की आंखें एकदम बदल गईं।
आरव, जो अब तक बेहद शांत, मासूम और गुमसुम लग रहा था, उसकी आंखों में एक खौफनाक और अजनबी आक्रामकता उतर आई। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके भीतर सोए हुए एक ताकतवर और खतरनाक इंसान को जगा दिया हो।

बिना एक पल की देरी किए, आरव ने राकेश की गर्दन अपने गठीले और मजबूत हाथ से दबोच ली!
आरव की पकड़ इतनी खौफनाक और कसकर थी कि राकेश की आंखें बाहर आने लगीं और उसकी आवाज हलक में ही अटक गई। राकेश के दोनों गुर्गे डर के मारे दो कदम पीछे हट गए। आरव के शरीर की मांसपेशियां तन गई थीं और उसका पूरा बदन एक शिकारी की तरह कड़क हो गया था।

"अगर दोबारा इसके लिए एक भी गलत शब्द बोला... तो यहीं मिट्टी में गाड़ दूंगा," आरव की आवाज में एक ऐसी कड़क और खौफनाक भारीपन था जो इससे पहले सुनीता ने भी कभी नहीं सुनी थी।


file-00000000957482088e428092390f80bb
सुनीता हक्की-बक्की रह गई। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही मासूम लड़का है जो सुबह तक उसकी गोद में सिर रखकर रो रहा था। लेकिन आरव के इस खतरनाक तेवर को देखकर सुनीता का दिल एक अजीब से अहसास और सुकून से भर गया—सालों बाद किसी मर्द ने उसके सम्मान के लिए इस तरह ढाल बनकर खड़े होने की हिम्मत दिखाई थी।

सुनीता ने घबराकर तुरंत आरव की चौड़ी बांह को थाम लिया, "आरव! छोड़ो उसे... छोड़ो आरव, हमें देर हो रही है!"

सुनीता की आवाज सुनते ही, आरव का गुस्सा पल भर में गायब हो गया। उसने राकेश को झटके से पीछे धकेला, जिससे राकेश सीधा रास्ते के कीचड़ में जा गिरा। आरव ने फिर से वही मासूम नजरें सुनीता की तरफ घुमाईं, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो।
राकेश खौफ और अपमान से कांपता हुआ जमीन से उठा और दूर हटकर चीखा, "याद रखना सुनीता! इस लौंडे का गुरूर मैं बहुत जल्द तोड़ूँगा!"

आरव ने राकेश की धमकी पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने आहिस्ते से सुनीता का कांपता हुआ हाथ अपने हाथ में ले लिया और बेहद प्यार से बोला, "चलिए मौसी... स्कूल चलते हैं।"

सुनीता ने आरव के उस मजबूत और सुगठित शरीर को देखा। उसके मन में एक बड़ा सवाल कौंध गया— आखिर कौन है यह आरव? इस मासूमियत के पीछे कौन सा खौफनाक और ताकतवर अतीत छिपा है, जो अचानक एक पल में बाहर आ जाता है?


राकेश को कीचड़ में धकेलने के बाद जब आरव ने दोबारा सुनीता का हाथ थामा, तो सुनीता की उंगलियां हल्की सी कांप रही थीं। दोनों पगडंडी पर आगे बढ़ने लगे, लेकिन सुनीता का ध्यान अब रास्ते पर कम और अपने बगल में चल रहे इस 22 साल के नौजवान पर ज्यादा था।

सुबह का वह मासूम, बेबस आरव जो उसकी गोद में सिर छुपाकर सुकून ढूंढ रहा था... और अभी कुछ ही मिनट पहले राकेश की गर्दन दबोचने वाला वह खौफनाक, आक्रामक मर्द—दोनों एक ही इंसान थे! सुनीता के कुंवारे और संयमित दिल में आरव के इस मर्दाना तेवर ने एक अजीब सी सिहरन और गहरा कौतूहल भर दिया था।

थोड़ी दूर आगे जाकर जब गांव की चहल-पहल थोड़ी कम हुई और नीम के घने पेड़ों की छांव आई, तो सुनीता के कदम खुद-ब-खुद थम गए। उसने झटके से आरव का हाथ छोड़ा और उसके ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।
सुबह की गुनगुनी धूप नीम के पत्तों से छनकर सुनीता के दमकते चेहरे और उसकी सुराहीदार गर्दन पर पड़ रही थी। उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसने अपनी कजरारी, नशीली आंखों से सीधे आरव की गहरी आंखों में झांका।

"आरव..." सुनीता की आवाज में आश्चर्य, चिंता और एक अनजाना खिंचाव मिला हुआ था, "अभी तुमने जो किया... वो क्या था?"

आरव ने बिल्कुल बच्चों जैसी मासूमियत से अपनी पलकें झपकाईं। उसकी आंखों से वह खौफनाक गुस्सा पल भर में गायब हो चुका था, जैसे वह कोई सपना रहा हो।

"क्या हुआ मौसी?" आरव ने बड़े सीधेपन से पूछा।
"क्या हुआ? तुम पूछ रहे हो क्या हुआ?" सुनीता ने एक कदम और करीब आते हुए बेहद धीमी लेकिन कड़क आवाज में कहा, "तुमने देखा कि तुमने राकेश को कैसे पकड़ा था? तुम्हारी पकड़, तुम्हारा वो रूप... आरव, कोई आम लड़का किसी तगड़े मर्द की गर्दन इतनी आसानी से एक हाथ से नहीं दबोच सकता। ऐसा लग रहा था जैसे तुम्हें किसी को नुकसान पहुंचाने की, लड़ने की बहुत गहरी ट्रेनिंग मिली हो!"

सुनीता ने अपनी उंगलियां आरव के गठीले, कड़क सीने पर रखीं—जहाँ अभी भी उसकी मांसपेशियों का कसाव साफ महसूस हो रहा था।

"आरव, सच-सच बताओ... क्या तुम्हें सचमुच कुछ याद नहीं है? जब तुमने उस गुंडे की गर्दन पकड़ी थी, तब तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा था? क्या तुम्हें अपनी पुरानी जिंदगी का कोई हिस्सा, कोई धुंधली सी तस्वीर नजर आई?" सुनीता ने तड़पकर पूछा, उसकी उंगलियां आरव के सीने पर और कस गईं।

आरव ने अपना सिर झुका लिया। उसने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को दबाया, जैसे उसके दिमाग में कोई भारी हलचल हो रही हो। उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें छलक आईं।

"मुझे... मुझे कुछ याद नहीं आ रहा मौसी," आरव की आवाज फिर से भररा गई, "लेकिन जब उस आदमी ने आपके लिए वो गंदे शब्द बोले... तो मेरे अंदर कुछ फटा। मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरी सबसे कीमती चीज को छीन रहा हो। मुझे बस इतना पता था कि मुझे आपको बचाना है... चाहे उसके लिए मुझे किसी की जान ही क्यों न लेनी पड़े।"


1788847996055
आरव ने अचानक अपनी नजरें उठाईं और सीधे सुनीता की आंखों में देखा। उसकी नजरों में जो बेपनाह दीवानगी और रक्षा करने का जुनून था, उसने सुनीता के पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया।

42 साल की उम्र तक सुनीता ने हमेशा मर्दों को अपनी हवस पूरी करने के लिए करीब आते देखा था। लेकिन आज... आज पहली बार किसी मर्द ने उसकी रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने का वह खौफनाक रूप दिखाया था। आरव के उन शब्दों ने सुनीता के भीतर सालों से दबे स्त्रीत्व को जागृत कर दिया।

सुनीता का गुस्सा पल भर में पिघलकर एक बेपनाह दुलार में बदल गया। उसने अपने दोनों कोमल हाथ आरव के गालों पर रख दिए। उसकी उंगलियों की ठंडक आरव के माथे के पसीने को सहलाने लगी।

"पगले..." सुनीता ने बेहद नशीली और कांपती हुई आवाज में कहा, उसके होंठ आरव के चेहरे के बेहद करीब थे, "तुम्हें अंदाजा भी है कि तुम मेरे लिए क्या करने जा रहे थे? अगर उस गुंडे को कुछ हो जाता तो?"
"आपके लिए कुछ भी मौसी," आरव ने बिना किसी झिझक के सुनीता की पतली कमर पर अपने मजबूत हाथ रख दिए।

चांदनी रात की तरह, दिन के उजाले में भी उन दोनों के जिस्म एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए थे। सुनीता के गालों पर हया की गहरी लाली छा गई, लेकिन उसने आरव को खुद से दूर नहीं किया। आरव की मजबूत बांहों का वह स्पर्श उसे एक अजीब सी सुरक्षा और सिहरन का अहसास करा रहा था।

"अच्छा बाबा ठीक है," सुनीता ने अपनी नशीली पलकें झुकाते हुए मुस्कुराकर कहा, "अब चलो... स्कूल के लिए देर हो रही है। पर याद रखना, जब तक हम तुम्हारा सच नहीं जान लेते, तुम्हें अपने इस गुस्से पर थोड़ा काबू रखना होगा... समझे?"

आरव ने मासूमियत से सिर हिला दिया। सुनीता ने उसकी उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसाईं और दोनों एक बार फिर स्कूल की पगडंडी पर आगे बढ़ गए, जबकि सुनीता के दिल में आरव के इस रहस्यमयी और ताकतवर अतीत का सवाल और गहरा हो चुका था।
Bohot zabardast ... Pyar, gusse, rehesya se bhara update...
Acha episode likha hai Mamta...

Keep writing
 

discover

Member
222
226
43
J
Update 05

रात भर मूसलाधार बारिश होने के बाद, सुबह सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के शीशों से छनकर घर के भीतर आ रही थीं। चिड़ियों की चहचहाहट से सन्नाटा तो टूट गया था, लेकिन घर के माहौल में कल रात के उस पहले चुंबन की गर्माहट और अनजाना संकोच अभी भी हवा में तैर रहा था।

सुनीता हमेशा की तरह तड़के ही उठ गई थी। उसने नहा-धोकर अपनी पसंदीदा कत्थई सूती साड़ी पहनी, बालों की सलीके से जूड़ा बनाया और रसोई में चली गई। लेकिन उसका ध्यान काम में कम और कल रात के उस एक लम्हे में ज्यादा अटका हुआ था। जब भी उसके हाथ रसोई के बर्तनों को छूते, उसे अपने होंठों पर आरव के स्पर्श का अहसास होने लगता और उसके गाल मारे शर्म के लाल हो जाते।

तभी बरामदे में आरव के भारी और शांत कदमों की आहट हुई।

सुनीता का दिल एक पल के लिए जोर से धड़का। उसने चाय के बर्तन में दूध डालते हुए खुद को व्यस्त दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसकी कांपती उंगलियां उसकी घबराहट बयां कर रही थीं।

आरव रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। उसने कल बाजार से लिया हुआ वही नया नीला कुर्ता पहन रखा था, जिसमें उसका गठीला शरीर और भी ज्यादा आकर्षित लग रहा था। उसके चेहरे पर कल रात की कोई झिझक या चलाकी नहीं थी, बस वही मासूमियत और एक गहरा ठहराव था।

"सुप्रभात मौसी..." आरव ने बेहद धीमी और आदरयुक्त आवाज में कहा।

सुनीता ने हिम्मत जुटाकर मुड़कर उसकी तरफ देखा। आरव की गहरी, साफ आंखों में झांकते ही सुनीता के मन का सारा खौफ और संकोच पल भर में पिघल गया।
"सुप्रभात आरव," सुनीता ने अपनी कजरारी आंखों को थोड़ा झुकाते हुए एक बेहद मीठी और हल्की मुस्कान के साथ कहा, "रात को नींद अच्छी आई?"


file-000000009294820eba840b26cf1ce98b
"हाँ..." आरव ने दो कदम आगे बढ़ाकर चाय के दो कप उठाए, "लेकिन जागने के बाद भी ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी बहुत हसीन सपने में हूँ।"

आरव के इस सीधे और रूह को छू लेने वाले बोल पर सुनीता के होंठों पर एक नशीली सुर्खी छा गई। उसने आरव के हाथ से चाय का कप लिया और दोनों रसोई की चौखट पर पास-पास बैठ गए।

कल रात का वो पहला चुंबन अब किसी गुनाह का बोझ नहीं, बल्कि उन दोनों के बीच एक अनकहा, अटूट और नया रिश्ता बन चुका था। दोनों चुपचाप चाय की चुस्कियां ले रहे थे, लेकिन एक-दूसरे की बांहों का हल्का सा स्पर्श ही उनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी राहत बन गया था।

तभी, बाहर गली में लाठी की खटखट आवाज गूंजी और किसी ने घर का भारी कुंडा खटखटाया—
"सुनीता बेटा! घर पर हो क्या?"

आवाज सिया देवी की थी।
सुनीता और आरव ने झटके से एक-दूसरे की तरफ देखा। सुबह-सुबह सुल्तानपुर की सबसे कड़क मुखिया का अचानक उनके घर के दरवाजे पर आना किसी नए मोड़ या आने वाले तूफान की आहट था।

सिया देवी की आवाज सुनते ही सुनीता ने चाय का कप तुरंत एक तरफ रखा और अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर खींचते हुए दरवाजे की तरफ भागी। आरव भी शांत कदमों से उसके पीछे-पीछे आ गया।

सुनीता ने घर का भारी लकड़ी का दरवाजा खोला। सामने सफेद सूती साड़ी पहने, हाथ में लाठी लिए सिया देवी खड़ी थीं। उनके पीछे उनका एक खास मुलाजिम भी खड़ा था।

"प्रणाम अम्मा! आप सुबह-सुबह... सब खैरियत तो है न?" सुनीता ने आगे बढ़कर सिया देवी के पैर छूते हुए आदर से कहा।

"सदा सुखी रहो बेटा," सिया देवी ने सुनीता के सिर पर हाथ रखा। फिर उनकी पैनी नजरें सुनीता के पीछे खड़े आरव पर पड़ीं। आरव ने भी बड़े अदब से अपने दोनों हाथ जोड़कर सिया देवी को प्रणाम किया, "नमस्ते अम्मा जी।"

सिया देवी ने आरव को सिर से पांव तक देखा। आज आरव उस नीले कुर्ते में और भी ज्यादा रसूखदार और गंभीर लग रहा था। सिया देवी के कड़क चेहरे पर एक धीमी सी संतोषजनक मुस्कान आ गई।
"अंदर आने को नहीं कहोगी सुनीता बेटा?" सिया देवी ने हल्के दुलार से पूछा।

"अरे अम्मा, यह भी कोई कहने की बात है! आइए-आइए," सुनीता उन्हें आदर से अंदर ले आई और दालान में बिछी तख्त पर बिठाया। आरव ने तुरंत रसोई से पानी का लोटा और पीतल का गिलास लाकर सिया देवी के सामने रख दिया।

सिया देवी ने पानी की दो घूंट पी और आरव की तरफ देखकर बोलीं, "संस्कार तो बहुत अच्छे दिए हैं तुमने अपने इस भांजे को, सुनीता। देखने में जितना बलशाली है, मिजाज से उतना ही नम्र।"

सुनीता के दिल की धड़कन अभी भी थोड़ी तेज थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि गांव की इतनी बड़ी रसूखदार महिला तड़के ही उसके घर क्यों आई हैं।
"अम्मा... आप चाय लेंगी? मैं अभी बनाकर लाती हूँ," सुनीता ने कहा।

"नहीं बेटा, चाय फिर कभी। आज हम यहाँ किसी खास वजह से आए हैं," सिया देवी का लहजा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने अपनी लाठी को जमीन पर टिकाया और सुनीता की आंखों में आंखें डालकर बोलना शुरू किया।
"सुनीता... कल शाम को स्कूल में जो कुछ हुआ, उसकी खबर हमारे कानों तक पहुँच चुकी है। हमारा बेटा राकेश... अपनी हदों से बाहर जा रहा है। उसने स्कूल में आकर तुम्हारे और इस बच्चे के ऊपर जो घिनौने इल्जाम लगाए हैं, उससे हमारा सिर शर्म से झुक गया है।"

यह सुनते ही सुनीता और आरव दोनों चौंक गए। सुनीता को लगा था कि सिया देवी शायद राकेश की बातों में आकर जांच-पड़ताल करने आई हैं, लेकिन सच तो कुछ और ही था।

सिया देवी ने एक गहरी सांस ली और भारी आवाज में आगे कहा, "राकेश भले ही हमारा इकलौता बेटा है, पर उसकी नाफरमानी और आवारागर्दी अब बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है। हमें पता चला कि तुम दोनों ने बिना किसी डर के उसका सामना किया और उसे आईना दिखाया। सुनीता, तुम इस गांव की इज्जत हो। और यह नौजवान आरव... भले ही याददाश्त खो चुका है, लेकिन कल इसने जिस तरह एक औरत के सम्मान की रक्षा की, उसने हमारा दिल जीत लिया।"

सिया देवी ने अपने मुलाजिम की तरफ इशारा किया। मुलाजिम ने एक छोटी सी कपड़े की थैली और कुछ कागजात आगे बढ़ा दिए।

"अम्मा... यह सब क्या है?" सुनीता ने हैरान होकर पूछा।
"यह मंदिर के ट्रस्ट और गांव के सुरक्षा कोष की तरफ से है," सिया देवी ने कहा, "अगले महीने गांव में बहुत बड़ा मेला और दंगल होने वाला है। राकेश उस दंगल के नाम पर गांव वालों से उगाही कर रहा था। हमने फैसला किया है कि इस बार दंगल और सुरक्षा का पूरा इंतजाम आरव संभालेगा। इसे हम अपनी तरफ से जिम्मेदारी सौंप रहे हैं। इससे राकेश को उसकी औकात भी पता चल जाएगी और गांव में आरव को एक सम्मानजनक पहचान भी मिल जाएगी।"

सुनीता और आरव स्तब्ध रह गए। सिया देवी का यह मकसद न केवल राकेश के मुंह पर एक करारा थप्पड़ था, बल्कि उन्होंने आरव को गांव के सामने एक मजबूत और सम्मानित मुकाम देने की नींव रख दी थी।


सुबह सिया देवी के जाने के बाद से ही घर में एक अजीब सा खिंचाव और खामोशी बनी हुई थी। दिन का समय तो जैसे-तैसे बीत गया, लेकिन जैसे-जैसे शाम ढली और रात का अंधेरा घना हुआ, सुनीता के मन की घबराहट और चिंता बढ़ने लगी।

रात का खाना मेज पर लगा हुआ था। रोटी, दाल और सब्जी की भाप उड़ रही थी, पर दोनों में से किसी की भी थाली में हाथ डालने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पीली रोशनी के बीच आरव चुपचाप बैठा अपनी थाली को देख रहा था, जबकि सुनीता की कजरारी आंखों में गहरे फिक्र के बादल छाए हुए थे।

सुनीता ने अपनी सूती साड़ी का पल्लू उंगलियों में भींचते हुए एक लंबी सांस ली और खामोशी को तोड़ा।
"आरव... तुमने सिया देवी अम्मा की बात इतनी आसानी से कैसे मान ली?" सुनीता की आवाज में चिंता साफ छलक रही थी, "तुम नहीं जानते कि सुल्तानपुर का दंगल और मेला क्या चीज है। यह सिर्फ एक खेल नहीं है... यह राकेश की ताकत का अड्डा रहा है।"

आरव ने अपनी गहरी आंखें उठाईं और सुनीता की तरफ देखा। "मौसी... अम्मा जी ने जब भरी पंचायत के सामने वो जिम्मेदारी दी, तो मैं मना कैसे करता? उन्होंने मुझ पर भरोसा जताया है।"

"अरे पर तुम समझ क्यों नहीं रहे!" सुनीता थोड़ा आगे झुकी, उसका हाथ चिंता के मारे कांप रहा था, उसने आरव के गठीले हाथ पर अपना हाथ रख दिया, "राकेश कोई आम लड़का नहीं है। वह एक सिरफिरा गुंडा है। सालों से मेले का ठेका और उगाही उसके हाथ में थी। अब जब उसकी अपनी मां ने तुम्हें वो जिम्मेदारी दे दी है, तो वह चुप नहीं बैठेगा। वह तिलमिला चुका है आरव... वह तुम्हें नुकसान पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है।"

आरव ने सुनीता के कांपते हाथ को अपनी दूसरी हथेली से ढक लिया। उसकी उंगलियों का स्पर्श बहुत गर्म और आश्वस्त करने वाला था।
"मौसी, आप इतनी घबरा क्यों रही हैं?" आरव ने बेहद धीमी और नशीली आवाज में पूछा, "क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं है?"

"मुझे तुम पर भरोसा है आरव..." सुनीता की आंखें नम हो गईं, उसकी सांसें थोड़ी तेज हो गईं, "पर मुझे डर इस बात का है कि तुम अपना अतीत भूल चुके हो। तुम्हें नहीं पता कि तुम कौन हो, तुम्हारी ताकत की सीमा क्या है। अगर राकेश ने अपने गुंडों के साथ मिलकर कोई घात लगाकर हमला किया, तो मैं... मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी। तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अकेली कैसे जिऊंगी?"

सुनीता के मुंह से निकले इन आखिरी शब्दों में सिर्फ एक मौसी की फिक्र नहीं थी, बल्कि कल रात के उस पहले चुंबन के बाद उपजे उस गहरे, अनजाने और अंतरंग प्यार की तड़प थी।

आरव ने सुनीता के हाथ को थोड़ा और कसकर भींच लिया। उसने सीधे सुनीता की कजरारी आंखों में झांका, जहाँ उसके लिए बेपनाह फिक्र तैर रही थी।
"मुझे कुछ नहीं होगा मौसी," आरव ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "जब तक आपकी फिक्र और आपका यह दुलार मेरे साथ है, राकेश या इस गांव का कोई भी तूफान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। और वैसे भी... जो इंसान अपना सब कुछ खो चुका हो, उसके पास खोने के लिए सिर्फ आप ही तो बची हैं। आपकी इज्जत और आपकी सुरक्षा के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ।"

आरव की इस बात में इतनी सच्चाई और गर्माहट थी कि सुनीता का दिल धक से रह गया। डर के उस साये के बीच भी दोनों के बीच कल रात वाली वही खुमारी और खिंचाव दोबारा तैरने लगा।

सुनीता ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन आरव का हाथ नहीं छोड़ा। खाने की थाली वहीं रखी रह गई, और दोनों एक-दूसरे के स्पर्श और फिक्र के समंदर में डूब गए, यह जानते हुए भी कि आने वाला कल उनके लिए कोई बहुत बड़ा तूफान लेकर आने वाला है।


खाने की थालियां एक तरफ सरक चुकी थीं, लेकिन दोनों के बीच पसरी चिंता की परत अब एक अजीब सी बेताबी में बदलने लगी थी। आने वाले कल का खौफ जितना गहरा हो रहा था, एक-दूसरे को खोने का डर दोनों को उतना ही करीब खींच रहा था।

सुनीता ने जब थालियां उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो आरव ने बहुत आहिस्ते से उसकी कलाई थाम ली।
"अभी मत उठिए..." आरव की आवाज बहुत मद्धम और नशीली थी।

सुनीता का दिल एक पल को जोर से धड़का। उसने मुड़कर आरव की तरफ देखा। आरव की गहरी, काली आंखों में इस वक्त राकेश या दंगल की कोई फिक्र नहीं थी—वहाँ सिर्फ सुनीता के लिए एक बेपनाह, प्यासा खिंचाव था।

"आरव... बर्तन रखने दो," सुनीता ने कांपती आवाज में कहा, लेकिन उसकी उंगलियों ने आरव की कलाई को छोड़ा नहीं।

आरव ने जवाब देने की बजाय सुनीता को आहिस्ते से अपनी ओर खींचा। सुनीता का सुडौल, 42 साल का बदन बिना किसी विरोध के आरव के गठीले सीने से आ लगा। उसकी सूती साड़ी का पल्लू कंधे से सरककर नीचे फर्श पर गिर गया। कमरे में जलते दीये की मद्धम पीली रोशनी में सुनीता की सुराहीदार गर्दन और दमकती हुई कमर और भी रसीली लग रही थी।

"मुझे आने वाले तूफान का कोई डर नहीं है मौसी..." आरव ने अपनी गर्म सांसें सुनीता के कान के पास छोड़ते हुए कहा, "मुझे सिर्फ इस बात का डर लगता है कि कहीं यह वक्त यहीं न ठहर जाए।"

आरव की उंगलियों ने सुनीता की पीठ पर अपनी पकड़ कस दी। उसकी उंगलियों की गर्माहट सीधे सुनीता की रीढ़ में एक कड़कड़ाती हुई सिहरन बनकर दौड़ गई। सुनीता ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी दोनों बांहें आरव की चौड़ी गर्दन के गिर्द लपेट दीं।


file-0000000019288211a844d0415dc65aeb
"तुम बहुत बेपरवाह हो आरव..." सुनीता के कांपते होंठ आरव के गाल से जा टकराए, "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम मेरे लिए क्या बनते जा रहे हो।"

आरव ने सुनीता की ठुड्डी को ऊपर उठाया और सीधे उसके रसीले होंठों पर अपने होंठ टिका दिए। कल रात का वो पहला चुंबन जहाँ एक अनजाने संकोच और झिझक से भरा था, वहीं आज का यह चुंबन आने वाले खतरे के साये में और भी गहरा, प्यासा और अंतरंग हो चुका था।


file-0000000085b08207a332ccaddd278f5f
सुनीता के मुंह से एक धीमी सी सिसकी निकली। उसने आरव के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और खुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। 42 बरसों की मर्यादा, समाज का डर, और 'मौसी' का वो झूठा पर्दा—सब कुछ उस एक नशीली आगोश में जलकर राख हो रहा था।

आरव ने सुनीता को अपनी बांहों में उठाया और तख्त की ओर बढ़ गया। बाहर रात का सन्नाटा गहरा रहा था और आने वाले कल का तूफान दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, लेकिन कमरे के भीतर दो रूहें एक-दूसरे की गर्माहट में खोकर दुनिया के हर खौफ से बेखबर हो चुकी थीं।

उस नशीले और प्यासे चुंबन की गहराई में डूबने से ठीक पहले, सुनीता का वजूद झटके से सिहर उठा। उसके दिमाग में आने वाले कल की चिंता, राकेश का खौफ और समाज के बेदर्द नियमों की कड़कड़ाती आवाज गूंज उठी।

सुनीता ने तड़पकर अपने होंठ आरव के होंठों से अलग कर लिए। उसकी सांसें बेकाबू होकर चल रही थीं और आंखों में एक बेपनाह दर्द और डर तैर रहा था।

उसने अपने दोनों हाथों से आरव के सीने पर दबाव डाला और खुद को थोड़ा पीछे धकेल दिया।

"नहीं आरव... इतनी जल्दी मत करो!" सुनीता की आवाज थरथरा रही थी, गाल मारे शर्म और घबराहट के लाल हो चुके थे। उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू समेटा और अपने सीने पर कसकर लपेट लिया।
आरव ठिठक कर रह गया। उसकी गहरी आंखों में एक अजीब सी तड़प और उलझन छा गई, "मौसी... क्या हुआ?"

सुनीता ने अपनी आंखें मूंद लीं और एक लंबी, ठंडी सांस भरी। जब उसने अपनी पलकें खोलीं, तो उसकी आंखों से आंसुओं की एक बूंद ढलक कर उसके गाल पर बह निकली।

"आरव..." सुनीता ने बेहद कांपती और भावुक आवाज में कहा, "42 सालों की इस सूनी और तन्हा जिंदगी में... मुझे एक नई जिंदगी की तलाश थी। और सच कहूँ तो... वो जिंदगी मुझे तुम में नजर आ रही है। मुझे तुमसे प्यार होने लगा है।"

आरव ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामना चाहा, लेकिन सुनीता ने हल्के से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
"मगर अभी नहीं आरव... बिल्कुल नहीं," सुनीता ने आंसुओं से भरी आंखों से उसे देखते हुए कहा, "अभी चारों तरफ आग लगी हुई है। राकेश कोई भी चाल चल सकता है, सिया देवी अम्मा ने तुम पर इतना बड़ा भरोसा जताया है। अगर जरा सी भी गड़बड़ हुई... अगर समाज को हमारे इस रिश्ते की भनक लग गई, तो मैं सब कुछ खो दूंगी! मेरी इज्जत, मेरा वजूद और सबसे बढ़कर... तुम्हें!"

आरव खामोशी से सुनीता के एक-एक शब्द को सुन रहा था। उसके चेहरे का तनाव अब पिघलने लगा था।
"तुम्हारी उम्र अभी सिर्फ 22 साल है आरव..." सुनीता का गला भर आया, "और मैं 42 साल की एक ढलती उम्र की औरत हूँ। यह समाज बहुत निर्दयी है, यह हमें कभी माफ नहीं करेगा। वे कहेंगे कि मैंने एक अनाथ और अपनी याददाश्त गंवा चुके लड़के का फायदा उठाया है।"

सुनीता ने आरव के गठीले चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया, उसकी उंगलियां आरव के गालों को बहुत दुलार से सहलाने लगीं।


file-0000000095cc8211aa89b69eb91d4a32
"मुझे थोड़ा वक्त दो आरव... जब तक यह तूफान टल नहीं जाता, जब तक तुम इस गांव में मजबूती से खड़े नहीं हो जाते और तुम्हारा अतीत साफ नहीं हो जाता, तब तक हमें खुद पर काबू रखना होगा। अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो यह वक्त भी कट जाएगा।"

आरव ने सुनीता के कांपते हाथों पर अपने हाथ रख दिए। उसकी आंखों में अब वासना की जगह सुनीता के लिए बेपनाह इज्जत और एक नया समर्पण था।

"जैसा आप कहेंगी, वैसा ही होगा मौसी," आरव ने बहुत आदर और गर्माहट से कहा, "मैं आपके डर और आपकी मर्यादा को कभी ठेस नहीं पहुँचाऊंगा। आपके लिए मैं इस समाज से भी लड़ूँगा और उस राकेश से भी।"

सुनीता ने राहत की एक लंबी सांस ली। दोनों ने उस रात एक-दूसरे को बांहों में भरने की बजाय, एक-दूसरे का हाथ थामकर उस अनजाने सफर का सामना करने का फैसला किया।


रात का सन्नाटा कमरे की खिड़की से छनकर आती हवा की सरसराहट से रह-रहकर टूट रहा था। दीये की मद्धम, पीली रोशनी में दोनों के साये दीवारों पर आड़े-तिरछे तैर रहे थे। अभी-अभी थमी उस बेताबी के बाद, कमरे का तापमान जैसे एक अजीब से सुकून और अनकही तड़प के बीच झूल रहा था।

आरव ने सुनीता के कांपते, ठंडे हाथों को अपनी दोनों हथेलियों के बीच समेट लिया। उसकी नीली, गहरी आंखों में वासना का उफान तो थम चुका था, लेकिन उसकी जगह एक बहुत ही निर्मल, गहरा और बेपनाह खिंचाव तैर रहा था।

"सुनीता..." आरव ने पहली बार बिना 'मौसी' कहे, सीधे उसका नाम पुकारा। उसकी आवाज में एक अजीब सी ललक और रूहानी मिठास थी।

सुनीता का दिल उस नाम को सुनते ही जोर से धड़क उठा।

"मैं आपको अपनी बनाना चाहता हूँ," आरव ने सीधे उसकी कजरारी आंखों में झांकते हुए कहा, "न जाने क्यों, जब से होश संभाला है, मुझे आपमें अपनी पूरी दुनिया दिखती है। ऐसा लगता है जैसे बरसों से मुझे इसी एक छांव की तलाश थी।"

सुनीता के होंठ थोड़े से खुले रह गए। आरव के इन बेबाक और सच्चे बोलों ने उसकी 42 साल की सुसुप्त आत्मा को अंदर तक झकझोर दिया था। उसकी आंखें छलक आईं। उसने आरव के कसरती, चौड़े चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया और उंगलियों से उसके गालों को बड़ी नजाकत से सहलाया।

"हाँ आरव..." सुनीता का गला भर आया, उसकी नशीली आवाज में एक गहरा अहसास घुला हुआ था, "मुझे भी कभी-कभी ऐसा ही लगता है... जैसे मैं तुम्हें बरसों से जानती हूँ। तुमसे मेरा कोई जन्मों का संबंध है, जो हमें हर बंदिश के बावजूद बार-बार एक-दूसरे के पास खींच लाता है। पर... पर हमें थोड़ा संभालकर आगे बढ़ना चाहिए आरव। वक्त हमारे खिलाफ है।"

आरव ने सुनीता की उंगलियों को चूम लिया और एक लंबी, संतोष भरी सांस ली। उसके चेहरे पर बच्चे जैसी मासूमियत लौट आई।

"आप जैसा ठीक समझें..." आरव ने बहुत आदर से कहा, लेकिन उसकी आंखों में एक धीमी सी इल्तजा तैर गई, "लेकिन मैं आपसे दूर नहीं रहना चाहता। आप मेरी पत्नी न सही... पर कम से कम मुझे अपने सीने से लगाकर प्यार तो कर सकती हैं? अपने बेटे की तरह ही सही, अपनी बाहों के घेरे में मुझे सुला लीजिए।"

आरव की इस निश्छल और प्यासी मांग ने सुनीता के भीतर के सारे बांध तोड़ दिए। उसमें से 'मौसी' का डर, समाज की दहशत और उम्र का फासला—सब कुछ एक पल में बह गया। सिर्फ एक औरत का बेपनाह दुलार और एक गहरी आत्मीयता बाकी रह गई।

सुनीता ने तख्त पर पीछे होकर सहारा लिया और मुस्कुराकर अपनी बांहें फैला दीं।

"आ जाओ..." सुनीता ने बेहद कोमल और रसीली आवाज में कहा।

आरव ने बिना एक पल गंवाए अपना सिर सुनीता की सुराहीदार छाती और उसकी गोद के पास टिका दिया। सुनीता ने अपनी दोनों बांहों का गर्म घेरा आरव के कसरती जिस्म के गिर्द कस लिया। उसने अपनी उंगलियां आरव के घने, मुलायम बालों में फंसा दीं और आहिस्ते-आहिस्ते सहलाने लगी।


file-00000000c2d082468460fd4b6887dd8c
आरव ने अपनी आंखें मूंद लीं और सुनीता के सीने में उठती धड़कनों को सुनने लगा। सुनीता की सूती साड़ी से आती चंदन और बारिश की भीनी-भीनी खुशबू में आरव को दुनिया का सबसे महफूज कोना मिल गया था। सुनीता ने झुककर आरव के माथे पर एक बहुत ही गहरा, ममता और प्यार से भरा चुंबन जड़ दिया।
कमरे में पसर चुका सन्नाटा अब किसी गुनाह का बोझ नहीं उठा रहा था। बाहर रात का तूफान जारी था, लेकिन उस छोटे से कमरे में दो रूहें एक-दूसरे की बांहों के घेरे में सिमटकर, दुनिया की हर बंदिश से बेखबर, सुकून की आगोश में सो जाने को तैयार थीं।
Jabardast update
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

rhyme_boy

Well-Known Member
6,845
7,274
189
Update 03


राकेश वाले हादसे के बाद दोनों जब सुल्तानपुर के प्राथमिक विद्यालय की दहलीज पर पहुँचे, तो सुबह की प्रार्थना की घंटी बज रही थी। मिट्टी की सोंधी खुशबू के बीच कतार में खड़े बच्चों की सुरीली आवाजें पूरे परिसर में गूंज रही थीं।

file-000000003f4481f5880e8dd717fd62ca

सुनीता ने स्कूल के लोहे के गेट को पार किया। उसके चेहरे पर एक अजीब सा आत्म-विश्वास था, लेकिन आरव के कदम थोड़े ठिठक रहे थे।
"घबराओ मत आरव," सुनीता ने पीछे मुड़कर बहुत धीमी आवाज में कहा, "मेरा हाथ थामे रहो।"

जैसे ही दोनों ने मुख्य बरामदे में कदम रखा, सामने से चश्मा दुरुस्त करते हुए हेडमास्टर रामनाथ जी बाहर निकले। हाथ में रजिस्टरों का पुलिंदा थामे हेडमास्टर साहब ने जब सुनीता के साथ एक लंबे, चौड़े और अजनबी नौजवान को देखा, तो उनके कदम वहीं जम गए।

"अरे, सुनीता मैडम! जय हिंद," हेडमास्टर जी ने चश्मे के ऊपर से झांकते हुए पूछा, "यह नौजवान कौन है? गांव में तो पहले कभी नहीं देखा इन्हें?"

सुनीता ने अपनी सादी सूती साड़ी का पल्लू सलीके से संभाला और चेहरे पर एक सहज, मीठी मुस्कान लाते हुए बोली, "जय हिंद सर। यह आरव है... मेरी दूर की बहन का बेटा। शहर से आया है, कुछ दिन मेरे पास ही रहेगा। घर में अकेला बोर हो जाता, तो मैंने सोचा अपने साथ स्कूल ही ले आऊं।"


"अच्छा... अच्छा! भांजा है आपका," हेडमास्टर जी की सख्त आंखें थोड़ी ढीली पड़ीं। उन्होंने आरव को सर से पांव तक देखा—उसकी चौड़ी छाती, गठीले कंधे और गहरी, खामोश आंखें किसी साधारण शहर के लड़के जैसी नहीं लग रही थीं। "नमस्ते बेटा! पर मैडम, स्कूल में तो बच्चे और पढ़ाई... यह क्या करेंगे दिन भर?"

"सर, यह बहुत शांत स्वभाव का है," सुनीता ने तुरंत बात संभाली, "स्टाफ रूम में बैठकर किताबें पढ़ लेगा। और अगर आपको या किसी मास्टर साहब को कोई भारी सामान या रजिस्टर इधर-उधर करने हों, तो यह मदद भी कर देगा।"

"चलो, यह तो बहुत बढ़िया बात है," हेडमास्टर जी मुस्कुरा दिए, "स्टाफ रूम में आखिरी वाली कुर्सी पर आराम से बिठा दीजिए इन्हें।"

सुनीता आरव को लेकर स्टाफ रूम में आई। कमरा पुराना था—लकड़ी की बड़ी सी मेज, लोहे की अलमारियां और दीवारों पर टंगे भारत के नक्शे। सुनीता ने कोने वाली खिड़की के पास रखी कुर्सी साफ की और आरव को वहां बिठा दिया। खिड़की से सीधा बाहर का मैदान और सुनीता की कक्षा का दरवाजा दिखता था।
"तुम यहां बैठो," सुनीता ने उसके एकदम करीब आकर, उसकी बांह को हल्के से सहलाते हुए कहा, "मैं ठीक सामने वाली क्लास में हूँ। कोई भी बात हो, बस एक इशारा कर देना।"

आरव ने खिड़की से बाहर देखा और फिर सुनीता की नशीली, फिक्र मंद आंखों में। उसने आहिस्ते से सिर हिला दिया, "आप जाइए मौसी... मैं यहीं हूँ।"
'मौसी' शब्द सुनकर सुनीता के होंठों पर फिर वही पुरानी मिठास तैर गई। वह अपनी क्लास की तरफ बढ़ गई।
घंटी बजते ही सुनीता जब चौथी कक्षा में दाखिल हुई, तो बच्चों ने एक सुर में "गुड मॉर्निंग मैडम जी!" का शोर मचाया। लेकिन बच्चों का ध्यान पढ़ाई से ज्यादा खिड़की के पार स्टाफ रूम में बैठे आरव पर था।

"मैडम जी! वो खिड़की वाले भैया कौन हैं?" एक छोटे से बच्चे, गोलू ने अपनी उंगली उठाकर मासूमियत से पूछा।
"हाँ मैडम जी! वो तो एकदम हीरो जैसे लग रहे हैं!" दूसरी बच्ची चहक कर बोली।

पूरी क्लास में बच्चों की ठिठोली शुरू हो गई। सुनीता का चेहरा मारे शर्म और खुशी के गुलाबी हो उठा। उसने ब्लैकबोर्ड पर चौक से लिखते हुए कहा, "चुपचाप अपनी किताबें निकालो सब! वो मेरे भांजे हैं... आरव भैया बोलना सब।"

उधर स्टाफ रूम में आरव अकेला बैठा था। उसने अलमारी से इतिहास की एक पुरानी किताब निकाली और पन्ने पलटने लगा। लेकिन तभी, स्कूल के दो अन्य शिक्षक—शर्मा जी और वर्मा जी—स्टाफ रूम में दाखिल हुए।

"अरे भाई, आरव नाम है न तुम्हारा?" शर्मा जी ने चाय का कप मेज पर रखते हुए थोड़ा टटोलने वाले अंदाज में पूछा, "शहर में क्या करते हो? पढ़ाई पूरी हो गई या कोई नौकरी-धंधा देखते हो?"

यह सवाल सुनते ही आरव का हाथ किताब के पन्ने पर जम गया। उसके दिमाग में फिर वही भयानक सन्नाटा और लोहे की चीखें गूंजने लगीं। वह खामोश रहा और बस उनकी तरफ देखता रहा।

वर्मा जी ने चुटकी ली, "अरे शर्मा जी, शहर के लड़के हैं, आसानी से घुलते-मिलते नहीं। वैसे सुनीता मैडम का भांजा है, तो शरीफ ही होगा।"

दोपहर की लंच की घंटी बजी। बच्चे मैदान में भागने लगे। सुनीता अपने टिफिन के साथ तुरंत स्टाफ रूम में दाखिल हुई। उसने देखा कि आरव थोड़ा असहज बैठा है। सुनीता ने बिना किसी की परवाह किए अपना टिफिन आरव की मेज पर खोला।

"लो आरव, खाना खा लो," सुनीता ने अपने हाथ से पराठे का कोर तोड़कर उसकी तरफ बढ़ाया।
स्टाफ रूम में बैठे दूसरे शिक्षकों की नजरें उन दोनों के इस अनजाने और गहरे खिंचाव पर टिक गईं। 42 साल की कड़क और अनुशासन प्रिय सुनीता मैडम का एक 22 साल के नौजवान को इस तरह अपने हाथों से खाना खिलाना... पूरे स्कूल के माहौल में एक नया, अनसुलझा नशा घोल रहा था।


लंच की घंटी बजते ही बच्चे मैदान में तितली की तरह बिखर गए थे। सुनीता और आरव अभी टिफिन खोलकर बैठे ही थे कि अचानक पूरे स्कूल परिसर में एक अजीब सी खामोशी छा गई।
बरामदे में भारी जूतों और लाठी की खटखट आवाज गूंजी।

स्टाफ रूम का दरवाजा खुला और अंदर कदम रखा सिया देवी ने। 55 साल की उम्र में भी उनका रोब और दबदबा देखने लायक था। सुल्तानपुर के सबसे बड़े और रसूखदार घराने की मुखिया, स्कूल की मुख्य ट्रस्टी और पूरे इलाके में जिनकी एक कड़क आवाज पर सन्नाटा छा जाता था। सफेद सूती साड़ी, माथे पर बड़ा सा लाल सिंदूर का टीका, और आंखों में एक ऐसी कड़क सख्ती जो किसी को भी झुका दे। गांव का बच्चा-बच्चा उनसे कांपता था, पर उनकी ईमानदारी और सामाजिक कामों की वजह से लोग उनकी दिल से इज्जत करते थे।
हालांकि, सिया देवी की एक बहुत बड़ी कमजोरी भी थी—उनका इकलौता बेटा राकेश। राकेश पूरे गांव में आवारागर्दी और गुंडागर्दी करता था, लेकिन सिया देवी का उसके प्रति अंधा प्यार ऐसा था कि वे उसकी हर गलती पर आंखें मूंद लेती थीं।

उन्हें देखते ही हेडमास्टर रामनाथ जी और बाकी मास्टर अपनी कुर्सियों से झटके में खड़े हो गए।
सुनीता के चेहरे पर भी तुरंत एक अदब भरी मुस्कान आ गई। उसने तुरंत टिफिन एक तरफ रखा, अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर थोड़ा आगे खिसकाया और आगे बढ़कर उनके पैर छू लिए।

"प्रणाम अम्मा!" सुनीता की आवाज में बेपनाह इज्जत और अपनापन था।


file-0000000000f082118ade0681b2c5c25a
सिया देवी के सख्त चेहरे पर जमी बर्फ पल भर के लिए पिघली। उन्होंने सुनीता के सिर पर हाथ रखा और बेहद प्यार से बोलीं, "सदा सुखी रहो सुनीता बेटा... कैसी हो? हम तो गांव का दौरा कर रहे थे, सोचा स्कूल और बच्चों का हाल-चाल भी लेते चलें।"

सिया देवी सुनीता को गांव की सबसे सुसंस्कृत, मर्यादित और चरित्रवान औरत मानती थीं। सालों से उन्होंने सुनीता का अनुशासन देखा था, इसलिए उनके दिल में सुनीता के लिए अपनी बेटी जैसा मान था।
लेकिन तभी, सिया देवी की पैनी नजरें कोने में बैठी एक अनजान शख्सियत पर जाकर टिक गईं— आरव।
आरव खामोशी से अपनी जगह पर बैठा हुआ था। उसकी चौड़ी छाती, सुगठित काया और अनजान चेहरा देखकर सिया देवी की भौंहें थोड़ा तन गईं। उन्होंने अपनी लाठी जमीन पर हल्की सी ठोंकी और पूछा—
"सुनीता बेटा... यह नौजवान कौन है? और स्कूल के स्टाफ रूम में क्या कर रहा है?"

हेडमास्टर साहब कुछ बोलते, उससे पहले ही सुनीता ने बड़े आदर से हाथ जोड़कर कहा, "अम्मा, यह आरव है... मेरी दूर की बहन का बेटा। शहर से आया है, कुछ दिन मेरे पास रहने। घर में अकेला रहता तो परेशान होता, इसलिए मैं इसे अपने साथ ही ले आई।"

सिया देवी ने आरव को ऊपर से नीचे तक अपनी तीखी नजरों से घूरा। आरव भी बिना किसी डर या हिचकिचाहट के, एकदम शांत और मासूम नजरों से उन्हें देख रहा था।

"हम्म... देखने में तो किसी रसूखदार और मजबूत खानदान का लगता है," सिया देवी ने थोड़ा धीमे स्वर में कहा, फिर सुनीता की तरफ मुड़कर बोलीं, "पर बेटा, गांव-देहात का माहौल खराब है। जवान भांजा है, तुम्हारे साथ रहेगा तो लोग तरह-तरह की बातें बनाएंगे। पर खैर... तुम्हारे चरित्र और संस्कारों पर हमें पूरा भरोसा है। तुम कभी कुछ गलत नहीं कर सकती।"
आरव ने सिया देवी की इस बात को सुना, पर वह चुपचाप बैठा रहा।

सिया देवी ने हेडमास्टर साहब से पढ़ाई-लिखाई और बच्चों की उपस्थिति का हाल-चाल लिया। कुछ जरूरी निर्देश देने के बाद, उन्होंने अपनी लाठी संभाली और जाने के लिए मुड़ीं।

"अच्छा सुनीता बेटा, हम चलते हैं। अपना ध्यान रखना," सिया देवी ने दुलार से कहा और स्टाफ रूम से बाहर निकल गईं।

उनके जाते ही सुनीता ने एक गहरी सांस ली। उसके दिल की धड़कन अभी भी थोड़ी तेज थी। अगर सिया देवी को जरा सा भी शक होता या उन्हें रास्ते में हुई राकेश वाली घटना की भनक लग जाती, तो बात बहुत बिगड़ सकती थी।

सुनीता ने मुड़कर आरव की तरफ देखा, जो खिड़की से बाहर जाती सिया देवी की भारी-भरकम गाड़ी को देख रहा था। सुनीता उसके पास आई और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, "अम्मा बहुत सख्त महिला हैं आरव... पूरे गांव में उनका हुक्म चलता है। अच्छा हुआ सब शांति से निपट गया।"

आरव ने सुनीता की घबराई हुई आंखों में देखा और मुस्कुराते हुए उसका हाथ अपने मजबूत हाथ में थाम लिया, "जब तक आप मेरे साथ हैं मौसी, मुझे किसी का डर नहीं।"


दोपहर ढलते-ढलते स्कूल की आखिरी घंटी बजी और बच्चे खुशी से चहकते हुए अपने-अपने घरों की तरफ दौड़ पड़े। सुनीता ने अपना सामान समेटा और आरव के साथ घर की ओर चल दी। रास्ते में ही सुनीता ने आरव की तरफ देखा—
"आरव," सुनीता ने चलते-चलते कहा, "तुम्हारे पास पहनने के लिए ज्यादा कपड़े नहीं हैं। शाम को हम दोनों सुल्तानपुर के मुख्य बाजार चलेंगे, तुम्हारे लिए कुछ नए कुर्ते-पायजामे और शर्ट ले लेंगे।"

आरव ने पहले तो मना करना चाहा, पर सुनीता की लाड़ भरी ज़िद के आगे उसकी एक न चली।
शाम होते-होते बाजार में रौनक बढ़ गई थी। रंग-बिरंगी दुकानों की बत्तियां जल चुकी थीं और हल्की-हल्की ठंडक हवा में घुलने लगी थी। सुनीता और आरव बाजार की सबसे बड़ी कपड़े की दुकान 'गुप्ता वस्त्र भंडार' में दाखिल हुए।

दुकानदार ने तुरंत सुनीता को पहचान लिया, "अरे सुनीता मैडम जी! प्रणाम! आइए-आइए, आज क्या देखना है?"

"इनके लिए कुछ अच्छे कपड़े दिखाइए," सुनीता ने मुस्कुराते हुए आरव की तरफ इशारा किया।
दुकानदार ने तुरंत एक से बढ़कर एक टी-शर्ट्स, शर्ट्स और कुर्ते गद्दी पर बिछा दिए। सुनीता खुद एक-एक कपड़ा उठाकर आरव के सीने से लगाकर देखने लगी। आरव खामोशी से खड़ा था, लेकिन जब सुनीता का हाथ उसकी छाती को छूता, तो दोनों के बीच एक अनकहा सा खिंचाव तैर जाता।

"यह गहरा नीला कुर्ता तुम पर बहुत जचेगा आरव," सुनीता ने एक रेशमी कुर्ता उठाकर कहा, "जाओ, उस ट्रायल रूम में पहनकर दिखाओ मुझे।"

आरव कुर्ता लेकर चेंजिंग रूम में चला गया। कुछ ही देर में जब वह बाहर आया, तो दुकान में मौजूद कुछ और ग्राहकों की नजरें भी उस पर ठहर गईं। नीले रंग के कुर्ते में आरव का सुगठित शरीर, चौड़े कंधे और आकर्षण एकदम निखर कर आ रहा था। वह किसी नवाब की तरह लग रहा था।

सुनीता की नजरें उस पर जम गईं। उसका दिल जोर से धड़का। 42 साल की उम्र में पहली बार उसके मन में किसी पुरुष को देखकर ऐसी अजीब सी बेताबी जगी थी। वह आहिस्ते से उठकर आरव के पास आई।
"कैसा लग रहा है मौसी?" आरव ने मासूमियत से पूछा।
सुनीता ने कुछ नहीं कहा। उसके हाथ अपने आप उठे और उसने आरव के कुर्ते के कॉलर को सलीके से ठीक करना शुरू किया। दोनों के बीच दूरी इतनी कम थी कि सुनीता की सांसें आरव की गर्दन से टकरा रही थीं।
"बहुत सुंदर..." सुनीता की आवाज हल्की सी कांपी। उसने अपनी उंगलियों से कुर्ते के बटन बंद किए और अचानक उसकी नजर आरव की गहरी, सम्मोहक आंखों से मिली।


file-00000000c7d081f4a0046a9eda458994
दोनों के बीच का सन्नाटा बहुत कुछ बोल रहा था। आरव ने सुनीता के कांपते हाथों पर अपना मजबूत हाथ रख दिया।

"आप जो भी पसंद करेंगी, मुझे वही अच्छा लगेगा," आरव ने धीमी, नशीली आवाज में कहा।
सुनीता का चेहरा शर्म से लाल हो उठा। उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया और नजरें चुराते हुए दुकानदार से कहा, "यह नीला वाला, और वो दो शर्ट्स... सब पैक कर दीजिए।"

जब वे दुकान से बाहर निकले, तो सुनीता का दिल अभी भी तेजी से धड़क रहा था। बाजार की भीड़ में चलते हुए आरव ने बहुत सहजता से सुनीता की हथेली को अपनी उंगलियों में भींच लिया। इस बार सुनीता ने अपना हाथ नहीं छुड़ाया।

लेकिन तभी, सड़क के दूसरी तरफ एक काली जीप आकर रुकी।
जीप की पिछली सीट पर बैठा राकेश अपनी जलती हुई आंखों से सुनीता और आरव को देख रहा था। उसके साथ जीप में दो खूंखार गुंडे भी बैठे थे।

"भैया! वही लौंडा है न जिसने सुबह आपको कीचड़ में फेंका था?" एक गुंडे ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए पूछा, "कहो तो अभी गाड़ी चढ़ा दें दोनों पर? या यहीं खींचकर सड़क पर धून दें?"


file-000000009f948211b6b80f996274a1bf
राकेश का खून खौल रहा था। उसने आरव का वो गठीला शरीर देखा और फिर सुबह की वो खौफनाक घटना याद की, जब आरव ने एक हाथ से उसका गला दबाकर हवा में उठा दिया था। राकेश के गले में अभी भी दर्द की कसक बाकी थी।

"बेवकूफ मत बनो!" राकेश गुर्राया और उसने गुंडे का हाथ पीछे खींच लिया। "वो लौंडा कोई आम देहाती नहीं है। सुबह उसका हाथ देखा था? लोहे जैसा है। अगर अभी भीड़ में पंगा लिया, तो वो बाजार के बीचों-बीच हमारी बखिया उधेड़ देगा... और ऊपर से अम्मा तक बात पहुँच गई तो मेरी शामत आ जाएगी।"

राकेश ने देखा कि सुनीता कैसे आरव के कंधे से सटकर चल रही थी और आरव ने कितनी बेफिक्री से उसका हाथ थाम रखा था। दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा नशा और सुकून था।

"सुनीता... बड़ी सती-सावित्री बनती फिरती है गांव भर में," राकेश ने जीप के डैशबोर्ड पर मुक्का मारते हुए घिनौनी मुस्कान के साथ बड़बड़ाया, "गांव वाले इसे देवी मानते हैं और ये इस 22 साल के लौंडे के साथ रंगरेलियां मना रही है। अगर मैंने मार-पीट की, तो मामला बिगड़ जाएगा... लेकिन अगर मैंने इसका चरित्र पूरे गांव के सामने नंगा कर दिया, तो ये मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी।"

उसके दिमाग में एक खौफनाक साजिश का ताना-बाना बुना जाने लगा।

"भैया, फिर क्या करना है?" गुंडे ने पूछा।

"अभी पीछा करो, बस यह देखो कि ये दोनों कहाँ जा रहे हैं," राकेश की आंखों में कमीनी चमक तैर गई, "मार-पीट से सिर्फ जिस्म टूटता है, लेकिन बदनामी से रूह। मैं इस लौंडे को भी खत्म करूंगा, लेकिन पहले सुनीता की इज्जत को सुल्तानपुर के चौराहे पर नीलाम करूंगा। जब अम्मा खुद अपनी आंखों से इस 'सती' का सच देखेंगी, तब मजा आएगा।"

उधर, आरव और सुनीता इस बात से अनजान, बाजार की बत्तियों की रोशनी में एक-दूसरे का हाथ थामे धीरे-धीरे अपने घर की ओर बढ़ रहे थे। सुनीता को आरव के साथ चलने में एक अजीब सी सुरक्षा और गरमाहट का अहसास हो रहा था, जबकि पीछे से मंडराता हुआ खतरा अब और भी ज्यादा जहरीला रूप ले चुका था।


बाजार का शोर-शराबा और राकेश की वो जलती हुई नजरें पीछे छूट चुकी थीं। रात के सन्नाटे में जब सुनीता ने घर का भारी दरवाजा अंदर से बंद किया, तो बाहर की दुनिया जैसे पूरी तरह कट गई। कमरे की हल्की पीली रोशनी में बाजार से लाए नए कपड़ों के पैकेट मेज पर रखे थे।

सुनीता ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को खिसकाकर गले और सुराहीदार गर्दन से पसीना पोंछा। दिन भर की भागदौड़ के बाद उसकी आंखों में हल्की थकान तो थी, लेकिन गालों पर आरव के साथ बिताए लम्हों की एक अलग ही सुर्खी चमक रही थी।

आरव मेज के पास खड़ा था। उसने नीले रंग का नया कुर्ता संभालकर रखा और फिर सुनीता की तरफ मुड़ा। उसकी गहरी, खामोश निगाहें सिर्फ और सिर्फ सुनीता पर टिकी थीं।

"क्या हुआ आरव? ऐसे क्यों देख रहे हो?" सुनीता ने अपनी गीली जुल्फों को समेटते हुए थोड़ा शर्माकर पूछा।
"आज पहली बार..." आरव ने धीमी, भर्राई हुई आवाज में कहा और दो कदम बढ़ाकर सुनीता के करीब आ गया, "आज पहली बार मुझे लगा कि मेरा भी कोई अपना है। बाजार में जब आपने वो कपड़े मेरे सीने से लगाए, तो ऐसा लगा जैसे कोई बहुत बरसों बाद मुझे सहला रहा हो।"

सुनीता का दिल उस सीधे-सादे इजहार से धक से रह गया। 42 साल की उम्र तक अनुशासन की कड़क परतों में लिपटी सुनीता का मन इस 22 साल के नौजवान की सादगी पर पूरी तरह पिघलने लगा था। उसने हिम्मत जुटाकर अपना थर्मामीटर सा गर्म हाथ आरव की चौड़ी छाती पर रखा।

"आरव..." सुनीता की सांसें थोड़ी तेज हो गईं, "तुम पराए नहीं हो। जब से उस अस्पताल में तुम्हें देखा है, मेरा मन तुम्हारे अलावा कुछ सोच ही नहीं पाता।"
आरव ने सुनीता के उस कोमल हाथ को अपने मजबूत हाथों में भींच लिया। उसने सुनीता के और करीब आकर उसकी कजरारी आंखों में झांका, "मौसी... अगर मुझे मेरी पुरानी जिंदगी कभी याद न आए, तो क्या आप मुझे हमेशा ऐसे ही अपने पास रखोगी?"

'मौसी' शब्द का नशा और दोनों के बदन की नजदीकी—इस संगम ने कमरे का तापमान अचानक बढ़ा दिया। सुनीता ने अपनी सुराहीदार गर्दन थोड़ी उठाई। दोनों के चेहरों के बीच चंद इंच का फासला रह गया था। आरव के जिस्म की गर्माहट और उसकी मर्दाना सांसें सीधे सुनीता के गालों से टकरा रही थीं।

"हमेशा आरव..." सुनीता ने नशीली, कांपती आवाज में कहा, उसके होंठ हल्के से फड़फड़ाए, "चाहे तुम्हारा अतीत कुछ भी हो, जब तक मैं हूँ, तुम्हें कभी अकेला नहीं होने दूंगी।"

आरव की उंगलियां सुनीता की पतली कमर पर टिक गईं। 42 सालों की सुसुप्त वासना और मर्यादा की दीवारें उस एक स्पर्श के सामने ढहने लगी थीं। सुनीता की आंखें मुंद गईं और उसने अपना सिर आरव के गठीले सीने पर टिका दिया। आरव की मजबूत बांहों ने उसे अपनी आगोश में भर लिया। कमरे में सिर्फ उन दोनों की तेज चलती सांसों की आवाज थी, जो बाहर मंडराते राकेश के खतरे से बेखबर, एक नए और अनजाने रिश्ते के समंदर में डूब रही थीं।

सुबह-सुबह सुल्तानपुर के आसमान को काले-स्याह बादलों ने घेर रखा था और झमाझम बारिश की मूसलाधार बूंदें कच्चे-पक्के मकानों की छतों पर तबले की तरह बज रही थीं। हवा में मिट्टी और गीली घास की सोंधी खुशबू रची-बसी थी।
सुनीता अभी-अभी रसोई में चाय चढ़ाने ही वाली थी कि बाहर गली में एक बुजुर्ग औरत की रोती-बिलखती आवाज सुनाई दी।
"अरे कोई बचाओ रे... मेरी सुंदरी भाग गई! कोई रोको उसे!"

सुनीता ने खिड़की से झांका। गांव की बेबस बुढ़िया, काकी, अपनी इकलौती भैंस के पीछे भीगती हुई भाग रही थी। भैंस खूंटे से रस्सी तुड़ाकर आपे से बाहर होकर सड़क पर दौड़े जा रही थी। दयालु सुनीता से यह देखा नहीं गया। उसने तुरंत अपना पुराना काला छाता उठाया और बिना अपनी सूती साड़ी की परवाह किए बाहर गली में दौड़ पड़ी।

लेकिन हवा का रुख बेहद तूफानी था। जैसे ही सुनीता ने भैंस को घेरने के लिए सड़क के मोड़ पर कदम रखा, हवा के एक खौफनाक तेज झोंके ने उसके हाथ से छाते को पूरी तरह उलट दिया!

"उफ़!" सुनीता के मुंह से निकला।


file-000000001f548208826f7c9c39611b96
छाता बेकार होकर हाथ से छूट गया। मूसलाधार बारिश ने पलक झपकते ही सुनीता को सर से पांव तक पूरी तरह भिगो दिया। गीली सूती साड़ी उसके 42 साल के सुडौल और गठीले बदन से चिपक गई, जिससे उसकी पतली कमर और सुराहीदार बनावट और निखर आई। सुनीता ने भागकर भैंस की भीगी, फिसलन भरी रस्सी पकड़ने की कोशिश की, लेकिन भैंस के एक ही झटके में सुनीता फिसलकर लगभग गिरने ही वाली थी कि...
अचानक पीछे से दो मजबूत और कड़े हाथों ने सुनीता की भीगी कमर को कसकर थाम लिया!

सुनीता का गिरता हुआ बदन सीधे आरव के चौड़े, गठीले सीने से जा टकराया। आरव बिना छाते के, सिर्फ एक पतले कुर्ते में पीछे-पीछे भागा चला आया था। बारिश के पानी में भीगा उसका कसरती शरीर लोहे की तरह सख्त लग रहा था।


file-00000000a7c081fb895bba90625f573a
"संभल के मौसी!" आरव की भारी और गर्माहट भरी आवाज सीधे सुनीता के भीगे कान से टकराई।
सुनीता की सांसें थम गईं। आरव ने एक हाथ से सुनीता को संभाला और दूसरे हाथ से पलक झपकते ही भैंस की मोटी रस्सी को झटके से खींचकर वहीं रोक दिया। आरव की मजबूत पकड़ के आगे उस भटकी हुई भैंस की एक न चली; वह वहीं खामोश खड़ी होकर हांफने लगी।

बुढ़िया काकी हांफती हुई दोनों के पास पहुँची। भैंस की रस्सी आरव के हाथ में सुरक्षित देखकर उसकी जान में जान आई।

"अरे जुग-जुग जियो बेटा!" काकी ने आरव की चौड़ी बांहों पर हाथ फेरते हुए दुआएं दीं। फिर अचानक काकी की तीखी नजरें भीगे पानी में एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े सुनीता और आरव पर टिक गईं।

काकी ने चकित होकर अपनी पुरानी आंखें सिकोड़ीं, "अरे सुनीता बेटी... यह कौन है? गांव में तो इसे पहले कभी नहीं देखा? इतनी ताकत और ऐसा रूप-रंग... यह कौन सुरमा है?"

सुनीता का दिल बारिश के बीच भी जोर-जोर से धड़कने लगा। उसके गाल मारे शर्म और भीगी ठंडक के गुलाबी हो उठे। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को खिसकाकर अपनी भीगी छाती पर संभालने की नाकाम कोशिश की और कांपती आवाज में कहा—

"काकी... यह आरव है। मेरी दूर की बहन का बेटा... मेरा भांजा। शहर से मेरे पास कुछ दिन रहने आया है।"
काकी ने आरव को सर से पांव तक घूरा, फिर सुनीता के दमकते हुए भीगे चेहरे को देखा। बुढ़िया के चेहरे पर एक अजीब सी रहस्यमयी मुस्कान तैर गई।

"अच्छा... भांजा है?" काकी ने थोड़ा मटकाते हुए कहा, "पर बेटी, राम कसम... यह तो किसी भी कोण से तेरा भांजा नहीं लगता! इसकी आंखों में तेरे लिए जो चिंता और खिंचाव है न, वो कोई भांजा अपनी मौसी के लिए नहीं रखता। जो भी हो... जोड़ी बड़ी रंगदार लग रही है तुम दोनों की!"

काकी के इन तीखे और अनचाहे सवालों ने दोनों के बीच एक नशीला सन्नाटा घोल दिया। सुनीता ने नजरें झुका लीं और काकी के हाथ में भैंस की रस्सी थमाते हुए बोली, "काकी तुम जाओ... ठंड लग जाएगी तुम्हें।"
काकी बुदबुदाती हुई भैंस को लेकर चली गई।
अब उस सुनसान, भीगी गली में सिर्फ सुनीता और आरव बचे थे। मूसलाधार बारिश अब हल्की झिमझिम फुहारों में बदल चुकी थी। बारिश की ठंडी बूंदें सुनीता के गालों, होंठों और सुराहीदार गर्दन से होकर उसकी साड़ी के भीतर ढलक रही थीं।


file-000000009f148211a1233a3831c5b945
आरव ने सुनीता का भीगा हुआ हाथ अपने गर्म हाथों में थाम लिया। दोनों के बीच की दूरी खत्म हो चुकी थी।
"आप बहुत भीग गई हैं मौसी... और बहुत सुंदर लग रही हैं," आरव ने सीधे सुनीता की कजरारी आंखों में झांकते हुए नशीली आवाज में कहा। उसकी सांसों की गर्माहट बारिश की ठंडक को चीर रही थी।

सुनीता का पूरा शरीर इस बारिश और आरव के स्पर्श की खुमारी में सिहर उठा। 42 सालों की सुसुप्त वासना उस ठंडे मौसम में आग बनकर सुलगने लगी थी।
"चलो... घर चलो आरव," सुनीता ने अपनी भर्राई और नशीली आवाज में कहा, उसके होंठ ठंड और अनजाने खिंचाव से कांप रहे थे, "यहाँ कोई देख लेगा तो... काकी की बातों की तरह गांव भर में बातें बनने लगेंगी।"

आरव ने बिना कुछ कहे सुनीता को अपने सीने की ओट में लिया और दोनों एक ही छज्जे की छांव में, बारिश की खुमारी में डूबते हुए अपने घर के दरवाजे की तरफ बढ़ गए।

घर का भारी दरवाजा अंदर से बंद होते ही बाहर की मूसलाधार बारिश का शोर थोड़ा मद्धम पड़ गया। कमरे के भीतर छाई हल्की पीली रोशनी में दोनों के भीगे शरीरों से पानी की बूंदें टपककर फर्श पर छोटे-छोटे गड्ढे बना रही थीं।

सुनीता का पूरा शरीर ठंड और एक अनजानी घबराहट से सिहर रहा था। भीगी सूती साड़ी उसके 42 साल के सुडौल और गठीले बदन पर किसी दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई थी। उसकी ढली हुई कमर, सुराहीदार गर्दन और सुगठित काया बारिश की रंगत में और भी रसीली लग रही थी।

"तुम... तुम पहले अपने कपड़े बदल लो आरव," सुनीता ने अपनी भर्राई आवाज में कहा। उसकी सांसें तेज चल रही थीं और हाथ साड़ी के भीगे पल्लू को संभालने में कांप रहे थे।

लेकिन आरव ने कपड़े बदलने के लिए कदम आगे नहीं बढ़ाए। वह खामोशी से सुनीता की तरफ बढ़ा। उसके भीगे घने बालों से पानी की बूंदें उसकी चौड़ी गर्दन और कसरती सीने से होती हुई नीचे ढलक रही थीं। उसकी गहरी, मासूम आंखों में एक ऐसा सम्मोहन था जिससे बच पाना सुनीता के बस में नहीं था।

"आप भीगकर बहुत कांप रही हैं मौसी..." आरव ने बेहद नशीली और मद्धम आवाज में कहा।

उसने बिना किसी झिझक के अपने थर्मामीटर से गर्म और मजबूत हाथ सुनीता की भीगी, कांपती बांहों पर रख दिए। आरव के जिस्म की गर्माहट जैसे ही सुनीता के ठंडे बदन से टकराई, सुनीता के मुंह से एक हल्की सी 'उफ़' निकल गई। उसके पूरे वजूद में एक कड़कड़ाती हुई सिहरन दौड़ गई।


grok-1788969168566
"आरव... यह... यह ठीक नहीं है," सुनीता ने झूठी सख्ती से कहना चाहा, लेकिन उसकी आवाज में कोई ताकत नहीं थी। उसकी कजरारी आंखें मुंदने लगी थीं।
आरव की उंगलियों ने आहिस्ते से सुनीता के कंधे से भीगा हुआ पल्लू नीचे खिसका दिया। 42 बरसों की मर्यादा, कड़ा अनुशासन और कुंवारेपन की कसम—सब कुछ उस एक नशीले लम्हे में वाष्प बनकर उड़ने लगा। कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया था।

आरव ने खूंटी से एक सूखा गमछा उठाया और बहुत कोमलता से सुनीता के भीगे गालों, उसकी सुराहीदार गर्दन और कंधे पर जमी पानी की बूंदों को पोंछने लगा। जब गमछा सुनीता की गर्दन से नीचे सरका, तो सुनीता ने अनजाने में ही अपना सिर पीछे की ओर गिरा दिया और आरव के गठीले सीने का सहारा ले लिया।

"आप बहुत हसीन हैं..." आरव ने सुनीता के कान के पास झुककर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए कहा।
सुनीता के भीतर सालों से दबी हुई कामुकता की अग्नि अचानक भड़क उठी। उसने मुड़कर आरव की चौड़ी छाती पर अपने दोनों हाथ रख दिए। दोनों की सांसें एक-दूसरे में उलझ रही थीं। आरव के सूखे कपड़े उठाने से पहले ही दोनों की नजरें एक-दूसरे के होंठों पर टिक गईं।
सुनीता ने 42 सालों में पहली बार किसी मर्द की बांहों में खुद को पूरी तरह बेबस और तृप्त महसूस किया। आरव ने अपनी मजबूत बांहों का घेरा सुनीता की पतली कमर के चारों तरफ कस दिया और उसे अपने सीने से पूरी तरह चिपका लिया। बाहर बारिश थमी नहीं थी, पर कमरे के भीतर दो रूहें मर्यादा के सारे बंधनों को पीछे छोड़ एक-दूसरे की गर्माहट में पूरी तरह डूब चुकी थीं।
Hhhmm Rakesh to aap puri tarah se Sunita ke pichhe padh gaya hai... ye khatra jaldi talne wala nahi hai...

Lekin udhar Aarav aur sunita ke jism dono puri tarah se akarshit hone lage hain....

sundar update... Lekhan ka jawab nahi..
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories
Top