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Incest तलाश

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Mamta Mishra

Sweet wife and Mom
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Nice and superb update....
Thanks 🥰🥰
nice story . and aap bahut acha likh rahi ho.
Thanks🥰🥰
Hhhmm Rakesh to aap puri tarah se Sunita ke pichhe padh gaya hai... ye khatra jaldi talne wala nahi hai...

Lekin udhar Aarav aur sunita ke jism dono puri tarah se akarshit hone lage hain....

sundar update... Lekhan ka jawab nahi..
Thanks 🥰🥰
J
Jabardast update
Thanks 🥰🥰
Nice update.
Thanks 🥰🥰
 
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rhyme_boy

Well-Known Member
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Update 04

बाहर झिमझिम गिरती बूंदों की सरसराहट के बीच कमरे में छाए उस बेहद गर्म और नशीले सन्नाटे को अचानक सुनीता की तेज होती धड़कनों ने तोड़ दिया। आरव की मजबूत बांहों का घेरा जब उसकी कमर पर और कसा, तो सुनीता के कांपते होंठों से एक ठंडी सांस निकली।

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आरव की गर्म सांसें उसकी गर्दन की त्वचा को छू रही थीं, लेकिन तभी... कमरे की दीवार पर टंगे कैलेंडर और उसमें छपी देवी की तस्वीर पर सुनीता की मुंदी हुई आंखें अचानक खुल गईं।

मानो किसी ने उसके जलते हुए वजूद पर बर्फ का पानी डाल दिया हो।

सुनीता का पूरा शरीर झटके से कांप उठा। 42 सालों की सख्त मर्यादा, समाज का डर, उम्र का फासला और उस झूठे लेकिन दुनिया के सामने स्वीकारे गए पवित्र रिश्ते की दीवारें अचानक उसकी आंखों के सामने ढहती हुई नजर आईं।

"अहह... आरव... नहीं!"

सुनीता ने पूरे जोर से आरव के गठीले सीने पर अपने दोनों हाथ टिकाए और झटके से खुद को पीछे धकेल दिया। उसकी साड़ी का भीगा पल्लू कंधे से ढलका हुआ था और उसकी सुराहीदार छाती घबराहट और खौफ के मारे तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसकी आंखों में थोड़ा पहले जो वासना और नशा था, उसकी जगह अब एक गहरे पछतावे और खौफ ने ले ली थी।

आरव ठिठक कर रह गया। उसकी गहरी, मासूम आंखों में एक अजीब सा सन्नाटा और उलझन छा गई। "क्या हुआ... मौसी?"

'मौसी' शब्द का हथौड़ा सीधे सुनीता के कलेजे पर पड़ा। उसका दिल कांप उठा।

'ओह! यह मैं क्या करने जा रही थी?' सुनीता ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और सीने से कसकर लपेट लिया। उसके गाल मारे शर्म और पछतावे के लाल हो चुके थे। वह मुड़कर कमरे के कोने में खड़ी हो गई, उसकी पीठ आरव की तरफ थी।

"तुम... तुम अपने कपड़े बदलो आरव," सुनीता की आवाज थरथरा रही थी, उसमें एक गहरा द्वंद्व छलक रहा था, "हम... हम अपनी मर्यादा भूल रहे हैं। दुनिया की नजरों में तुम मेरे भांजे हो, और मैं... मैं 42 साल की एक औरत हूँ जिसने ताउम्र अपने चरित्र को कभी दागदार नहीं होने दिया।"

उसके मन के भीतर दो फाड़ हो रहे थे। एक तरफ 42 साल की तन्हाई, कुंवारेपन की प्यास और आरव के लिए उमड़ता बेपनाह प्यार था, जो उसे आरव की बांहों में खींच रहा था। तो दूसरी तरफ सुल्तानपुर का सख्त समाज, सिया देवी का भरोसा, और खुद उसका अपना स्वाभिमान था जो उसे जोर-जोर से धिक्कार रहा था।
'अगर काकी की बातें सच हो गईं तो? अगर गांव वालों को जरा भी भनक लग गई तो वे मुझे किस नजर से देखेंगे? लोग कहेंगे कि सुनीता अपने ही भांजे पर डोरे डाल रही है!' यह सोचकर ही सुनीता के माथे पर भीगे बालों के बीच पसीने की बूंदें छलक आईं।

आरव खामोशी से सुनीता की तड़प को देख रहा था। उसने बिना कोई सवाल किए खूंटी से अपना सूखा कुर्ता उठाया और चुपचाप दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गया।
जब आरव चला गया, तो सुनीता फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपने चेहरे को अपनी हथेलियों में छिपा लिया और उसके मुंह से एक खामोश सिसकी निकल पड़ी। वह जानती थी कि जिस अनजाने गुनाह की तरफ उसके कदम बढ़ रहे थे, उसकी कीमत सुल्तानपुर का यह समाज उससे बहुत बुरी तरह वसूल सकता था।


कल रात के उस अवांछित खिंचाव और सुनीता के पछतावे के बाद, दोनों के बीच एक भारी और अजीब सी खामोशी पसर गई थी। सुबह की धूप तो खिल आई थी, लेकिन दोनों के दिलों में गहरा कोहरा छाया हुआ था।
घर से स्कूल तक का आधा किलोमीटर का सफर दोनों ने बिना एक शब्द बोले तय किया। सुनीता आगे-आगे तेज कदमों से चल रही थी, अपनी नजरें नीची किए, और आरव दो कदम पीछे चुपचाप उसका पीछा कर रहा था। रास्ते में जब भी कोई ग्रामीण सुनीता को प्रणाम करता, वह एक फीकी मुस्कान देकर आगे बढ़ जाती। उसकी आत्मा अंदर ही अंदर कचोट रही थी। उसे लग रहा था जैसे उसके माथे पर एक अदृश्य अपराध बोध लिख गया हो।

स्कूल पहुँचते ही सुनीता सीधे स्टाफ रूम में चली गई और खुद को काम में पूरी तरह उलझाने की कोशिश करने लगी। उसने आरव की तरफ एक बार देखा भी नहीं। आरव हमेशा की तरह बरामदे में एक बेंच पर बैठ गया, उसकी मासूम लेकिन पैनी नजरें सुनीता की हर हलचल पर टिकी हुई थीं।

दोपहर के वक्त, जब सारे शिक्षक लंच के लिए बाहर निकले, तब सुनीता रूम में अकेली रह गई। वह रजिस्टर में कुछ लिख रही थी, तभी उसके सामने एक साया आकर रुक गया।

सुनीता का दिल धक से रह गया। उसने नजरें उठाईं—सामने आरव खड़ा था। उसके हाथ में पानी का एक गिलास था।


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"आप सुबह से बहुत परेशान दिख रही हैं मौसी... पानी पी लीजिए," आरव ने धीमी और सहज आवाज में कहा। उसकी आवाज में कल रात का न तो कोई दुराव था और न ही कोई वासना, सिर्फ एक निश्छल फिक्र थी।

सुनीता ने कांपते हाथों से गिलास ले लिया। उसने आरव की आंखों में झांका, जहाँ किसी चलाकी या अपराध का कोई निशान नहीं था।

"आरव..." सुनीता की आवाज भर्रा गई, "तुम... तुम मुझसे नाराज नहीं हो?"

"किस बात के लिए?" आरव ने बेहद सादगी से पूछा, "आपने जो कहा, वो सही ही तो था। आप मेरी मौसी हैं और मैं यहाँ आपकी हिफाजत के लिए हूँ। आपने मुझे अपने पास अपनापन दिया और रहने का आश्रय दिया, मुझे नहीं पता मै कहा से आया हूँ, लेकिन आपके पास आने के बाद लगता है की किसी अपने के पास आया हूँ,आपकी आंखें रोती हैं तो मेरा दिल दुखता है, मौसी।"

आरव की इस निष्पाप बात ने सुनीता के भीतर के सारे पछतावे को पिघला दिया। उसे अहसास हुआ कि आरव का मन कितना साफ है; भटकाव तो उसके अपने उम्रदराज और अकेले वजूद में आ गया था। सुनीता की आंखों में हल्के आंसू आ गए, और उसने राहत की एक लंबी सांस ली।

लेकिन, सुकून का यह लम्हा ज्यादा देर नहीं टिका।
अचानक स्कूल के मुख्य फाटक पर एक पुरानी जीप आकर रुकी और उसकी तेज आवाज पूरे परिसर में गूंज उठी। जीप से उतरा राकेश। उसके साथ दो-तीन लफंगे भी थे। राकेश का चेहरा एक घिनौनी कुटिलता से चमक रहा था। उसके हाथ में एक लिफाफा था।

वह सीधे स्टाफ रूम की तरफ बढ़ा। उसे देखकर हेडमास्टर साहब और बाकी शिक्षक डर के मारे सहम गए।

"प्रणाम सुनीता जी!" राकेश ने दरवाजे पर खड़े होकर एक जहरीली मुस्कान के साथ कहा, "हम तो अम्मा के कहने पर यहाँ स्कूल के निरीक्षण के लिए आए हैं। पर सुना है आजकल स्कूल में पढ़ाई से ज्यादा... 'भांजे' की खातिरदारी हो रही है?"

सुनीता की रीढ़ में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। राकेश की नजरें बरामदे में बैठे आरव पर पड़ीं और फिर उसने अपना दांव खेला।


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"वैसे, हेडमास्टर साहब," राकेश ने जोर से चिल्लाकर कहा ताकि पूरे स्कूल के लोग सुन सकें, "जरा इस 'भांजे' का असली सच भी जान लीजिए! मैंने शहर से खबर निकलवाई है... इस लौंडे का नाम किसी भी अस्पताल या पुलिस रिकॉर्ड में नहीं है। सुनीता जी, जिस लड़के को आप अपना 'भांजा' बताकर अपने घर में रखे हुए हैं, वो कोई भांजा-वांजा नहीं है! यह एक भगोड़ा और बेनाम गुंडा है, जिसके साथ हमारी मास्टरनी जी रंगरेलियां मना रही हैं!"

राकेश का यह तीखा और अपमानजनक बयान तीर की तरह सुनीता के कलेजे में जा धंसा। पूरे स्टाफ रूम में सन्नाटा छा गया। सब सुनीता को शक और हैरानी की नजरों से देखने लगे।

सुनीता का चेहरा सफेदी की तरह फक पड़ गया। उसकी 42 साल की बेदाग इज्जत एक पल में नीलाम होने की कगार पर खड़ी थी।

राकेश के उस तीखे और अपमानजनक बयान से पूरे स्टाफ रूम में सन्नाटा छा गया। सुनीता की 42 साल की बेदाग इज्जत एक पल में नीलाम होने की कगार पर खड़ी थी। उसकी आंखों में खौफ और बेबसी साफ दिख रही थी।

तभी बरामदे में बैठा आरव शांत कदमों से आगे बढ़ा। उसके चेहरे पर न तो कोई घबराहट थी और न ही राकेश की बातों का कोई असर। वह सीधे सुनीता और राकेश के बीच आकर लोहे की दीवार की तरह खड़ा हो गया।


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आरव की चौड़ी पीठ देखकर सुनीता का कांपता हुआ वजूद थोड़ा संभला। वह जानती थी कि आरव कोई रक्षक बनकर या किसी मकसद से उसके घर नहीं आया था। वह तो खुद किस्मत का मारा एक ऐसा इंसान था जो हादसे के बाद अपनी याददाश्त, अपना नाम, अपना अतीत—सब कुछ गंवा चुका था। अस्पताल के बिस्तर पर बेसुध पड़े इस अजनबी को जब कोई अपना कहने वाला नहीं मिला, तब सुनीता का करुणा से भरा दिल पिघल गया था। जब तक उसकी याददाश्त वापस न आ जाए, तब तक उसने आरव को अपने घर में पनाह दी थी।
लेकिन किस्मत का खेल भी कितना अजीब होता है! कहाँ शहर की तन्हा जिंदगी में भटका हुआ एक अनजान नौजवान, और कहाँ गाँव के अनुशासन और मर्यादाओं में बंधी 42 साल की एक अनाथ अध्यापिका। दोनों की तकदीर ने ऐसी करवट ली कि एक बिना अतीत का इंसान, दूसरे के तन्हा जीवन में नए सवेरे की आस बन गया था।

आरव ने अपनी ठंडी और गहरी नजरें राकेश पर टिकाईं। उसकी आंखों में ऐसा ठहराव था जिसने राकेश के कदम अपने आप पीछे खींचने पर मजबूर कर दिए।
"राकेश..." आरव की आवाज बहुत धीमी थी, पर उसमें एक अजीब सी कड़क गूंजी, "यह औरत बेदाग है। इन्हें अपनी गंदी जुबान से छूने की गलती मत करना।"

"ओए बेनाम लौंडे! तू मुझे सिखाएगा?" राकेश झल्लाकर चिल्लाया, "तू है कौन? तेरा नाम क्या है? कहाँ से आया है? जवाब दे!"

आरव ने एक पल के लिए अपनी बंद मुट्ठियों को देखा। उसके दिमाग में अतीत का कोई पन्ना नहीं खुला, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून तैर गया।

"मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ... मुझे खुद नहीं पता," आरव ने सीधे राकेश की आंखों में देखते हुए कहा, "लेकिन किस्मत मुझे जहाँ ले आई है, वहाँ मैं किसी बेगुनाह की इज्जत पर कीचड़ नहीं उछलने दूंगा। सुनीता जी ने मुझे सिर्फ एक इंसान समझकर पनाह दी है। अगर तूने अपनी औकात से बाहर जाकर दोबारा कोई घिनौना इल्जाम लगाया, तो अंजाम सुबह से भी ज्यादा बुरा होगा।"

आरव का यह बेबाक और सच्चा जवाब सुनकर हेडमास्टर और बाकी स्टाफ के चेहरों पर जमा शक का गुबार छंटने लगा। सुनीता ने भी आंखों में आंसू भरकर आरव को देखा। उसे अहसास हुआ कि भले ही आरव अपनी पहचान भूल चुका है, लेकिन उसका वजूद और संस्कार आज भी उतने ही अडिग हैं।

राकेश गुस्से से तिलमिला उठा, पर आरव के कसरती शरीर और बुलंद हौसले के आगे उसकी हिम्मत जवाब दे गई। वह उंगली दिखाते हुए जीप की तरफ भागा, "देख लूंगा तुम दोनों को! इस गाँव में तुम लोगों को चैन से जीने नहीं दूंगा!"

राकेश की जीप धूल उड़ाती हुई निकल गई। स्टाफ रूम में एक बार फिर सन्नाटा छा गया, पर इस बार उस सन्नाटे में खौफ नहीं, बल्कि किस्मत के इस अनोखे खेल और एक नए जीवन की शुरुआत का मूक अहसास था।

राकेश की जीप का शोर जैसे ही स्कूल के गेट से दूर हुआ, स्टाफ रूम में एक बहुत भारी सन्नाटा छा गया। हवा में एक अजीब सी खामोशी तैर रही थी।

हेडमास्टर रामनाथ जी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और एक लंबी सांस ली। शर्मा जी और वर्मा जी की नजरों में भी ढेरों अनसुलझे सवाल तैर रहे थे। आरव का यह कबूलनामा कि वह अपनी पहचान तक भूल चुका है और उसका अतीत धुंधला है—इस सच ने पूरे स्टाफ को भीतर तक चौंका दिया था। सब मन ही मन यही सोच रहे थे कि जो औरत ताउम्र कड़े अनुशासन और उसूलों की मिसाल रही, उसने एक अजनबी लड़के को अपने घर में पनाह देने के लिए 'भांजे' का झूठा मुखौटा क्यों पहनाया?

सुनीता ने चारों तरफ छाई उस खामोशी और सहकर्मियों की उलझन भरी नजरों को भांप लिया। उसकी पलकें शर्म और शर्मिंदगी से झुक गईं, लेकिन उसने नजरें चुराने की बजाय सच का सामना करना ही बेहतर समझा।
उसने अपने कांपते हाथों को आपस में भींचा और आगे बढ़कर हेडमास्टर साहब के सामने खड़ी हो गई।

"हेडमास्टर सर... और शर्मा जी," सुनीता की आवाज थोड़ी कांपी, पर उसमें एक गजब की सच्चाई थी, "आप सब जो सोच रहे हैं, वो गलत नहीं है। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई जो मैंने आरव की पहचान को लेकर आप लोगों से और पूरे गांव से झूठ बोला।"

स्टाफ रूम में बैठा हर शख्स सांस रोके सुनीता को सुन रहा था। आरव भी चुपचाप खिड़की के पास खड़ा होकर सुनीता के उस बेबाक रूप को देख रहा था।

सुनीता ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और आंखों में छलकते आंसुओं को रोकते हुए आगे कहा, "बारिश की उस खौफनाक रात में यह लड़का मुझे अस्पताल के पास लहूलुहान और बेसुध हालत में मिला था। जब इसे होश आया, तो इसके पास न कोई नाम था, न यादें और न ही सिर छिपाने की कोई जगह। डॉक्टर भी लाचार थे। जब मैंने इस बेबस, मासूम लड़के की आंखों में देखा... तो पता नहीं क्यों, 42 साल के मेरे अकेलेपन में मुझे इसमें अपने बेटे जैसा अहसास हुआ।"

सुनीता का गला भर आया। उसने अपनी बात जारी रखी, "एक अकेली औरत का किसी अजनबी लड़के को अपने घर में रखना इस कतारबद्ध समाज को कभी मंजूर नहीं होता। लोग तरह-तरह की बातें बनाते, इसलिए डर के मारे मैंने इसे अपनी बहन का बेटा बता दिया। मुझे लगा कि मैं इसे बदनामी से बचा लूंगी... पर शायद झूठ का सहारा लेकर मैंने ही गलती कर दी।"

सुनीता के ये शब्द सीधे वहां मौजूद हर इंसान के कलेजे को छू गए। उसकी आवाज में छलकता हुआ दर्द, ममता और बेबसी इतनी सच्ची थी कि किसी के मन में शक का एक कतरा भी बाकी न रहा।

सब जानते थे कि सुनीता ने अपनी पूरी जिंदगी इसी स्कूल और गांव के बच्चों के नाम कर दी थी। उसके चरित्र पर आज तक एक भी दाग नहीं लगा था। उसकी मर्यादित पहचान ही उसकी सबसे बड़ी गवाही थी।
हेडमास्टर रामनाथ जी की सख्त आंखें नम हो गईं। उन्होंने आगे बढ़कर सुनीता के सिर पर बहुत बुजुर्गवार तरीके से हाथ रखा।

"सुनीता मैडम..." हेडमास्टर जी ने भारी आवाज में कहा, "आपको सफाई देने की जरूरत नहीं है। हम आपको सालों से जानते हैं। आपने जो किया, वो किसी का घर उजाड़ने के लिए नहीं, बल्कि एक भटके हुए इंसान को सहारा देने के लिए किया था। एक मां का दिल ही ऐसा फैसला ले सकता है।"


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शर्मा जी ने भी सहमति में सिर हिलाया, "बिल्कुल मैडम! राकेश जैसे नीच इंसान की बातों का कोई वजूद नहीं है। आपने इंसानियत निभाई है, और हम सब आपके इस फैसले में आपके साथ हैं।"

सुनीता के सीने से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया। उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। आरव ने दूर खड़े होकर सुनीता की तरफ देखा—उसकी आंखों में सुनीता के प्रति इज्जत और अपनापन और भी गहरा हो चुका था।

किस्मत के इस अनजाने खेल ने भले ही सुनीता को एक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, लेकिन उसकी सच्चाई ने आज समाज की सबसे पहली परीक्षा को पास कर लिया था।


स्कूल में सच सामने आ जाने और साथियों का साथ मिलने के बाद, सुनीता के मन का बहुत बड़ा बोझ उतर चुका था। लेकिन राकेश की धमकियां और उसका जहरीला मिजाज इस बात का इशारा था कि तूफान अभी पूरी तरह टला नहीं था।

छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चे अपने-अपने बस्तों के साथ बाहर निकल गए। सुनीता ने अपनी अलमारी बंद की और आरव के साथ घर की ओर कदम बढ़ा दिए।
रास्ते में सूरज ढलने लगा था और सुल्तानपुर की गलियों में मद्धम सा अंधेरा उतर रहा था। दोनों चुपचाप चल रहे थे, लेकिन इस बार की खामोशी में कोई झिझक या डर नहीं था, बल्कि एक गहरा ठहराव था।

आज स्कूल में..." आरव ने धीरे से बोलना शुरू किया, उसकी नजरें सुनीता के शांत चेहरे पर टिकी थीं, "आपने सबके सामने मुझे अपना बेटा कहा..."

सुनीता के कदम पल भर के लिए ठिठके। उसने रुककर आरव की चौड़ी छाती और मासूम आंखों में झांका। दोपहर में मास्टर साहब के सामने बोले गए वे शब्द उसके मुंह से बेबसी में निकले थे, लेकिन अब जब आरव ने वही बात दोहराई, तो सुनीता के भीतर एक अजीब सी कसमकस कौंध गई।

"आरव..." सुनीता की आवाज में हल्की सी ककंपकंपी थी, "अगर समाज को सच न बताती, तो वे तुम्हारी और मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ा देते। उस वक्त मुझे जो सही लगा, मैंने कह दिया।"

आरव ने अपनी उंगलियों से अपने भीगे बालों को पीछे सरकाया। उसने सुनीता का हाथ अपने मजबूत हाथ में थाम लिया, "मुझे बुरा नहीं लगा मौसी... मुझे तो बस इस बात की खुशी है कि इस पूरी दुनिया में जहाँ मेरा कोई नाम-पता नहीं है, वहाँ आपने मुझे बेसहारा नहीं छोड़ा।"
सुनीता ने आरव के हाथ की गर्माहट को अपनी हथेलियों में महसूस किया। मन के किसी कोने में छुपा हुआ कामी खिंचाव और दूसरी तरफ ममता का यह नया आवरण—दोनों अहसास आपस में टकरा रहे थे। पर आरव के इस निश्छल दुलार ने सुनीता के दिल को एक असीम सुकून से भर दिया।

जब दोनों घर पहुँचे, तो अंधेरा गहरा चुका था। सुनीता ने मुख्य दरवाजे का ताला खोला और अंदर दाखिल होकर दीया जलाया।

दीये की मद्धम रोशनी में रसोई का कोना जगमगा उठा। सुनीता ने चूल्हा जलाया और चाय चढ़ाने लगी। आरव वहीं रसोई के दरवाजे की चौखट से टिककर खड़ा हो गया और खामोशी से सुनीता की एक-एक हरकत को निहारने लगा।

"ऐसे क्या देख रहे हो?" सुनीता ने केतली में अदरक कूटकर डालते हुए मुस्कुराकर पूछा।

"यही कि... अगर मेरी याददाश्त कभी वापस नहीं आई, और मैं कभी यह याद न रख पाया कि मैं कौन हूँ, तो क्या मैं हमेशा आपके साथ ऐसे ही रह सकता हूँ?" आरव के सवाल में एक छोटे बच्चे जैसी मासूमियत और तड़प थी।

सुनीता ने चाय का बर्तन चूल्हे से उतारा और दो कुल्हड़ों में चाय ढाली। वह चलकर आरव के एकदम करीब आई और कुल्हड़ उसकी तरफ बढ़ाते हुए बहुत आत्मीयता से बोली—

"जब तक तुम्हारा दिल चाहे आरव... यह घर तुम्हारा ही है। किस्मत तुम्हें जहाँ से भी खींचकर लाई हो, यहाँ तुम सुरक्षित हो।"

दोनों ने कुल्हड़ की गर्म-गर्म चुस्कियां लीं। बाहर रात का सन्नाटा गहरा रहा था, लेकिन घर के भीतर एक अलग ही अपनापन और सुकून महक रहा था।

उधर, गांव की दूसरी तरफ, राकेश अपनी बैठक में शराब की बोतल लिए बैठा था। उसके सामने उसके दो गुर्गे खड़े थे। स्कूल में हुई अपनी फजीहत और आरव के कड़े तेवरों को वह भूल नहीं पा रहा था।

"भैया," एक गुंडे ने कहा, "सुनीता मैडम ने तो मास्टर लोगों को झांसा दे दिया। अब क्या करेंगे?"

राकेश ने शराब का गिलास मेज पर पटका और उसकी आंखों में एक खौफनाक साजिश की चमक तैर गई।
"झांसा दे दिया तो क्या हुआ?" राकेश घिनौने अंदाज में हंसा, "मास्टर लोग मान गए, पर सुल्तानपुर की पंचायत और मेरी अम्मा सिया देवी इतनी आसानी से नहीं मानेंगी। कल सुबह मैं ऐसा खेल खेलूंगा कि यह 'बेटा' और उसकी 'मां' दोनों गांव के चौराहे पर मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे!"

रात का सन्नाटा सुल्तानपुर के उस पुराने घर को अपनी बाहों में समेट चुका था। बाहर हल्की-हल्की फुहारें अब भी गिर रही थीं, जिनकी मद्धम आवाज छत पर एक सुरीली धुन जगा रही थी।

रसोई का काम निपटाकर सुनीता जब बरामदे में आई, तो उसने देखा कि आरव लकड़ी की पुरानी आरामकुर्सी पर बैठा खिड़की के पार गिरती बूंदों को एकटक निहार रहा है। दीये की मद्धम पीली रोशनी उसके कसरती बदन और मासूम चेहरे पर ढलती हुई एक अजीब सा सुकून बिखेर रही थी।

सुनीता आहिस्ते से चलकर उसके पास आई और पास रखी छोटी स्टूल पर बैठ गई।

"क्या सोच रहे हो आरव?" सुनीता ने बेहद कोमल आवाज में पूछा।

आरव ने अपनी गहरी नजरें खिड़की से हटाकर सुनीता के शांत और निखरे हुए चेहरे पर टिका दीं। उसके होंठों पर एक हल्की सी, निष्पाप मुस्कान तैर गई।

"यही सोच रहा था ... कि जब मैं उस अस्पताल में होश में आया था, तो चारों तरफ सिर्फ एक अनजाना अंधेरा था। मुझे नहीं पता था कि मेरा नाम क्या है, मैं कहाँ से आया हूँ, या मेरी इस दुनिया में कोई जगह भी है या नहीं।" आरव की आवाज में एक गहरा ठहराव था। उसने अपना मजबूत हाथ आगे बढ़ाकर बहुत आदर से सुनीता के थर्मामीटर से गर्म हाथ को अपनी हथेलियों में थाम लिया।

"पर जब मैंने पहली बार आपकी आंखें देखीं," आरव ने सीधे सुनीता की कजरारी आंखों में झांकते हुए कहा, "तो मुझे ऐसा लगा जैसे भटकते हुए इंसान को अचानक उसकी मंजिल मिल गई हो। लोग कहते हैं कि याददाश्त खोना एक खौफनाक सपना है... पर अगर उस

याददाश्त के खोने से मुझे आप मिली हैं, तो मैं अपना अतीत कभी याद भी नहीं करना चाहता।"

आरव के इन बेबाक और रूह को छू लेने वाले शब्दों ने सुनीता के भीतर सालों से जमी तन्हाई की बर्फ को पल भर में पिघला दिया। 42 साल की उम्र तक जिसने सिर्फ जिम्मेदारी और अनुशासन का बोझ ढोया था, आज उसे किसी की छांव और बेपनाह अपनापे का अहसास हो रहा था।

सुनीता ने अपनी दूसरी हथेली आरव के हाथ पर रख दी। उसकी उंगलियां आरव की मजबूत हथेली को दुलारने लगीं।

"अतीत चाहे जो भी रहा हो आरव," सुनीता की नशीली आवाज में एक अजीब सा अहसास और दुलार घुला हुआ था, "इस घर की चौखट के भीतर तुम पूरी तरह महफूज हो। जब तक मेरी सांसें हैं, तुम्हें अपनी पहचान खोने का मलाल कभी नहीं होने दूंगी।"

दोनों के बीच का सन्नाटा अब किसी खौफ या संकोच से नहीं, बल्कि एक बेहद गहरे और पवित्र सुकून से भरा हुआ था। बाहर बारिश की फुहारें गिर रही थीं, और अंदर दो अकेली रूहें एक-दूसरे की गर्माहट में खोकर किस्मत के इस अनोखे खेल को खामोशी से स्वीकार कर रही थीं।


रात का सन्नाटा और गहरा गया था। दीये की मद्धम पीली रोशनी कमरे की दीवारों पर दोनों के सायों को एक-दूसरे में समेट रही थी। बाहर बारिश की हल्की बूंदें अब भी छत पर एक मदहोश कर देने वाली धुन बजा रही थीं।
सुनीता के हाथ पर आरव की हथेली की गर्माहट धीरे-धीरे पूरे जिस्म में एक अनजानी अग्नि सुलगा रही थी। आरव के शब्दों में जो बेपनाह अपनापन था, उसने सुनीता के मन से डर और संकोच की आखिरी परत भी हटा दी थी।

आरव ने बहुत आहिस्ते से सुनीता की उंगलियों में अपनी उंगलियां उलझा लीं। उसकी नजरें सुनीता के सुराहीदार गले, उसके गुलाबी पड़ते गालों और थोड़े खुले हुए रसीले होंठों पर टिक गईं।

"मौसी..." आरव ने एक बेहद नशीली और कांपती आवाज में कहा, उसके चेहरे और सुनीता के चेहरे के बीच का फासला अब सिमटकर चंद इंच ही रह गया था।
"उफ़... आरव," सुनीता के मुंह से एक गरम सांस निकली। उसकी कजरारी आंखें आरव की उस प्यासी, सम्मोहन भरी रंगत को देखकर खुद-ब-खुद मुंदने लगीं।
आरव ने अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और बड़ी नजाकत से सुनीता की भीगी लटों को उसके गाल से हटाकर कान के पीछे सरका दिया। उसकी उंगलियों का स्पर्श सुनीता की नाजुक त्वचा से हुआ, तो सुनीता के पूरे बदन में एक मीठी सिहरन दौड़ गई। उसने अनजाने में ही अपना चेहरा आरव की गर्म हथेली पर टिका दिया।

42 बरसों का कठोर अनुशासन और अकेलेपन की तपिश—सब कुछ उस एक रात की आगोश में बहने लगा था।

आरव थोड़ा और आगे झुका। उसकी मर्दाना सांसें सीधे सुनीता के गालों और होंठों से टकराने लगीं। सुनीता ने अपनी सुराहीदार गर्दन थोड़ी पीछे को ढला दी, जिससे उसकी सूती साड़ी का पल्लू कंधे से सरककर थोड़ा नीचे ढलक गया। चांदनी और दीये की रोशनी के संगम में उसकी दमकती काया और भी रसीली लग रही थी।

आरव ने सुनीता की पतली कमर पर अपनी मजबूत बांह का घेरा कस दिया और उसे धीरे से अपनी ओर खींच लिया। सुनीता का सुडौल वजूद पूरी तरह आरव के गठीले, चौड़े सीने से जा चिपका। दोनों के दिलों की धड़कनें एक-दूसरे की छाती में साफ महसूस हो रही थीं।

"आरव..." सुनीता की भर्राई आवाज उसकी सांसों में ही घुटकर रह गई। उसने अपने दोनों कोमल हाथ आरव के चौड़े कांधों पर रख दिए और अपनी उंगलियां उसके घने बालों में फंसा दीं।

कमरे का तापमान हर बीतते लम्हे के साथ चढ़ता जा रहा था। बाहर गिरती बारिश की फुहारें और अंदर दो प्यासी रूहों की सांसों का तूफान—दोनों मर्यादा के हर बंधनों को भुलाकर एक-दूसरे की बांहों की गर्माहट में पूरी तरह डूब चुके थे।


कमरे के भीतर छाए उस मद्धम उजाले में हवा की हर एक सांस जैसे ठहर सी गई थी। सुनीता का सुडौल शरीर जब आरव के चौड़े सीने से चिपका, तो दोनों की धड़कनों की तेज रफ्तार एक-दूसरे की छाती में सीधे गूंजने लगी।

आरव की उंगलियां सुनीता की भीगी-सी कमर पर थोड़ी और कसीं। उसने अपनी नीली, गहरी आंखों से सुनीता के कांपते, गुलाबी होंठों को देखा। सुनीता की कजरारी पलकें मारे हया और बेताबी के पूरी तरह झुक चुकी थीं। उसकी सुराहीदार गर्दन पर उतरती आरव की गर्म सांसें उसकी 42 साल की तन्हाई और कुंवारेपन की तपन को भड़का रही थीं।

आरव ने बहुत नजाकत से सुनीता की ठुड्डी को अपनी उंगलियों से थोड़ा ऊपर उठाया।

दोनों के चेहरों के बीच का आखिरी फासला मिट गया।
आरव ने अपने होंठ सुनीता के कांपते, रसीले होंठों पर रख दिए। वह उनका पहला चुंबन था—एक ऐसा स्पर्श जिसमें 42 सालों की सुसुप्त प्यास, अनजाना आकर्षण, और रात की नशीली फुहारें एक साथ पिघलकर बह निकलीं। सुनीता के मुंह से एक धीमी सी 'उफ़' निकली और उसने आरव की चौड़ी गर्दन के गिर्द अपनी दोनों बांहों का घेरा कस दिया। चुंबन की उस मिठास में दोनों मर्यादा और दुनिया की हर एक परवाह को पूरी तरह भूल चुके थे।


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लेकिन जैसे ही वह पहला नशीला लम्हा गहराने लगा, सुनीता के दिल के किसी कोने में सोई हुई मर्यादा और 'मौसी' का वो झूठा सच अचानक एक खौफनाक कसक बनकर जागा।

सुनीता का पूरा वजूद कांप उठा। उसने झटके से आरव के होंठों से अपने होंठ अलग किए और हांफते हुए खुद को पीछे धकेल दिया।
"अहह... आरव... नहीं!"

सुनीता की सांसें बेकाबू होकर चल रही थीं। उसके गाल मारे शर्म और घबराहट के लाल हो चुके थे। उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का ढलका हुआ पल्लू सीने पर समेटा और दरवाजे की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई। उसकी आंखों में अभी-अभी बीते उस चुंबन की खुमारी भी थी और एक गहरा अनजाना डर भी।

आरव भी अपनी जगह स्तब्ध खड़ा रह गया। उसके होंठों पर अभी भी सुनीता के स्पर्श की गर्माहट बाकी थी, लेकिन सुनीता की उस सहमी हुई हालत को देखकर उसने खुद को संभाला।

"मौसी..." आरव की आवाज बहुत भारी और भर्राई हुई थी।
"तुम... तुम जाओ आरव," सुनीता ने बिना मुड़े, कांपती आवाज में कहा, "आज रात... अब हमें सो जाना चाहिए। जाओ अपने कमरे में।"

आरव ने कुछ पल खामोशी से सुनीता की तड़पती हुई पीठ को देखा। फिर उसने बिना एक शब्द बोले, खिड़की के पास रखे दीये को बुझाया और खामोश कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

कमरे में अंधेरा छाते ही सुनीता तख्त पर बैठ गई। उसका पूरा शरीर अभी भी उस पहले चुंबन की झनझनाहट से कांप रहा था। उसने अपने होंठों पर उंगली रखी और अपनी आंखें मूंद लीं। उधर अपने कमरे में, आरव तख्त पर लेटा छत को निहार रहा था, उसके सीने में उठती लहरें उसे सोने नहीं दे रही थीं। दोनों एक ही छत के नीचे, अलग-अलग कमरों में अकेले लेटे हुए थे, पर दोनों के दिलों में उस पहली चुंबन की आग दहक रही थी।



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ek aur sundar episode....Is haram khor Rakesh ka pehla daav to fail ho gaya... dekhte hain agli kya chaal chalta hai...
Aarav aur Sunita aakhir ek dusre ki or badhti garmi mein apne rishte ho agla naam dene ka pehla kadam rakh liya... pehla chumban ho gaya... wow.... ab aag aur zyada sulagne lagegi

nice update
 
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Update 05

रात भर मूसलाधार बारिश होने के बाद, सुबह सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के शीशों से छनकर घर के भीतर आ रही थीं। चिड़ियों की चहचहाहट से सन्नाटा तो टूट गया था, लेकिन घर के माहौल में कल रात के उस पहले चुंबन की गर्माहट और अनजाना संकोच अभी भी हवा में तैर रहा था।

सुनीता हमेशा की तरह तड़के ही उठ गई थी। उसने नहा-धोकर अपनी पसंदीदा कत्थई सूती साड़ी पहनी, बालों की सलीके से जूड़ा बनाया और रसोई में चली गई। लेकिन उसका ध्यान काम में कम और कल रात के उस एक लम्हे में ज्यादा अटका हुआ था। जब भी उसके हाथ रसोई के बर्तनों को छूते, उसे अपने होंठों पर आरव के स्पर्श का अहसास होने लगता और उसके गाल मारे शर्म के लाल हो जाते।

तभी बरामदे में आरव के भारी और शांत कदमों की आहट हुई।

सुनीता का दिल एक पल के लिए जोर से धड़का। उसने चाय के बर्तन में दूध डालते हुए खुद को व्यस्त दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसकी कांपती उंगलियां उसकी घबराहट बयां कर रही थीं।

आरव रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। उसने कल बाजार से लिया हुआ वही नया नीला कुर्ता पहन रखा था, जिसमें उसका गठीला शरीर और भी ज्यादा आकर्षित लग रहा था। उसके चेहरे पर कल रात की कोई झिझक या चलाकी नहीं थी, बस वही मासूमियत और एक गहरा ठहराव था।

"सुप्रभात मौसी..." आरव ने बेहद धीमी और आदरयुक्त आवाज में कहा।

सुनीता ने हिम्मत जुटाकर मुड़कर उसकी तरफ देखा। आरव की गहरी, साफ आंखों में झांकते ही सुनीता के मन का सारा खौफ और संकोच पल भर में पिघल गया।
"सुप्रभात आरव," सुनीता ने अपनी कजरारी आंखों को थोड़ा झुकाते हुए एक बेहद मीठी और हल्की मुस्कान के साथ कहा, "रात को नींद अच्छी आई?"


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"हाँ..." आरव ने दो कदम आगे बढ़ाकर चाय के दो कप उठाए, "लेकिन जागने के बाद भी ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी बहुत हसीन सपने में हूँ।"

आरव के इस सीधे और रूह को छू लेने वाले बोल पर सुनीता के होंठों पर एक नशीली सुर्खी छा गई। उसने आरव के हाथ से चाय का कप लिया और दोनों रसोई की चौखट पर पास-पास बैठ गए।

कल रात का वो पहला चुंबन अब किसी गुनाह का बोझ नहीं, बल्कि उन दोनों के बीच एक अनकहा, अटूट और नया रिश्ता बन चुका था। दोनों चुपचाप चाय की चुस्कियां ले रहे थे, लेकिन एक-दूसरे की बांहों का हल्का सा स्पर्श ही उनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी राहत बन गया था।

तभी, बाहर गली में लाठी की खटखट आवाज गूंजी और किसी ने घर का भारी कुंडा खटखटाया—
"सुनीता बेटा! घर पर हो क्या?"

आवाज सिया देवी की थी।
सुनीता और आरव ने झटके से एक-दूसरे की तरफ देखा। सुबह-सुबह सुल्तानपुर की सबसे कड़क मुखिया का अचानक उनके घर के दरवाजे पर आना किसी नए मोड़ या आने वाले तूफान की आहट था।

सिया देवी की आवाज सुनते ही सुनीता ने चाय का कप तुरंत एक तरफ रखा और अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर खींचते हुए दरवाजे की तरफ भागी। आरव भी शांत कदमों से उसके पीछे-पीछे आ गया।

सुनीता ने घर का भारी लकड़ी का दरवाजा खोला। सामने सफेद सूती साड़ी पहने, हाथ में लाठी लिए सिया देवी खड़ी थीं। उनके पीछे उनका एक खास मुलाजिम भी खड़ा था।

"प्रणाम अम्मा! आप सुबह-सुबह... सब खैरियत तो है न?" सुनीता ने आगे बढ़कर सिया देवी के पैर छूते हुए आदर से कहा।

"सदा सुखी रहो बेटा," सिया देवी ने सुनीता के सिर पर हाथ रखा। फिर उनकी पैनी नजरें सुनीता के पीछे खड़े आरव पर पड़ीं। आरव ने भी बड़े अदब से अपने दोनों हाथ जोड़कर सिया देवी को प्रणाम किया, "नमस्ते अम्मा जी।"

सिया देवी ने आरव को सिर से पांव तक देखा। आज आरव उस नीले कुर्ते में और भी ज्यादा रसूखदार और गंभीर लग रहा था। सिया देवी के कड़क चेहरे पर एक धीमी सी संतोषजनक मुस्कान आ गई।
"अंदर आने को नहीं कहोगी सुनीता बेटा?" सिया देवी ने हल्के दुलार से पूछा।

"अरे अम्मा, यह भी कोई कहने की बात है! आइए-आइए," सुनीता उन्हें आदर से अंदर ले आई और दालान में बिछी तख्त पर बिठाया। आरव ने तुरंत रसोई से पानी का लोटा और पीतल का गिलास लाकर सिया देवी के सामने रख दिया।

सिया देवी ने पानी की दो घूंट पी और आरव की तरफ देखकर बोलीं, "संस्कार तो बहुत अच्छे दिए हैं तुमने अपने इस भांजे को, सुनीता। देखने में जितना बलशाली है, मिजाज से उतना ही नम्र।"

सुनीता के दिल की धड़कन अभी भी थोड़ी तेज थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि गांव की इतनी बड़ी रसूखदार महिला तड़के ही उसके घर क्यों आई हैं।
"अम्मा... आप चाय लेंगी? मैं अभी बनाकर लाती हूँ," सुनीता ने कहा।

"नहीं बेटा, चाय फिर कभी। आज हम यहाँ किसी खास वजह से आए हैं," सिया देवी का लहजा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने अपनी लाठी को जमीन पर टिकाया और सुनीता की आंखों में आंखें डालकर बोलना शुरू किया।
"सुनीता... कल शाम को स्कूल में जो कुछ हुआ, उसकी खबर हमारे कानों तक पहुँच चुकी है। हमारा बेटा राकेश... अपनी हदों से बाहर जा रहा है। उसने स्कूल में आकर तुम्हारे और इस बच्चे के ऊपर जो घिनौने इल्जाम लगाए हैं, उससे हमारा सिर शर्म से झुक गया है।"

यह सुनते ही सुनीता और आरव दोनों चौंक गए। सुनीता को लगा था कि सिया देवी शायद राकेश की बातों में आकर जांच-पड़ताल करने आई हैं, लेकिन सच तो कुछ और ही था।

सिया देवी ने एक गहरी सांस ली और भारी आवाज में आगे कहा, "राकेश भले ही हमारा इकलौता बेटा है, पर उसकी नाफरमानी और आवारागर्दी अब बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है। हमें पता चला कि तुम दोनों ने बिना किसी डर के उसका सामना किया और उसे आईना दिखाया। सुनीता, तुम इस गांव की इज्जत हो। और यह नौजवान आरव... भले ही याददाश्त खो चुका है, लेकिन कल इसने जिस तरह एक औरत के सम्मान की रक्षा की, उसने हमारा दिल जीत लिया।"

सिया देवी ने अपने मुलाजिम की तरफ इशारा किया। मुलाजिम ने एक छोटी सी कपड़े की थैली और कुछ कागजात आगे बढ़ा दिए।

"अम्मा... यह सब क्या है?" सुनीता ने हैरान होकर पूछा।
"यह मंदिर के ट्रस्ट और गांव के सुरक्षा कोष की तरफ से है," सिया देवी ने कहा, "अगले महीने गांव में बहुत बड़ा मेला और दंगल होने वाला है। राकेश उस दंगल के नाम पर गांव वालों से उगाही कर रहा था। हमने फैसला किया है कि इस बार दंगल और सुरक्षा का पूरा इंतजाम आरव संभालेगा। इसे हम अपनी तरफ से जिम्मेदारी सौंप रहे हैं। इससे राकेश को उसकी औकात भी पता चल जाएगी और गांव में आरव को एक सम्मानजनक पहचान भी मिल जाएगी।"

सुनीता और आरव स्तब्ध रह गए। सिया देवी का यह मकसद न केवल राकेश के मुंह पर एक करारा थप्पड़ था, बल्कि उन्होंने आरव को गांव के सामने एक मजबूत और सम्मानित मुकाम देने की नींव रख दी थी।


सुबह सिया देवी के जाने के बाद से ही घर में एक अजीब सा खिंचाव और खामोशी बनी हुई थी। दिन का समय तो जैसे-तैसे बीत गया, लेकिन जैसे-जैसे शाम ढली और रात का अंधेरा घना हुआ, सुनीता के मन की घबराहट और चिंता बढ़ने लगी।

रात का खाना मेज पर लगा हुआ था। रोटी, दाल और सब्जी की भाप उड़ रही थी, पर दोनों में से किसी की भी थाली में हाथ डालने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पीली रोशनी के बीच आरव चुपचाप बैठा अपनी थाली को देख रहा था, जबकि सुनीता की कजरारी आंखों में गहरे फिक्र के बादल छाए हुए थे।

सुनीता ने अपनी सूती साड़ी का पल्लू उंगलियों में भींचते हुए एक लंबी सांस ली और खामोशी को तोड़ा।
"आरव... तुमने सिया देवी अम्मा की बात इतनी आसानी से कैसे मान ली?" सुनीता की आवाज में चिंता साफ छलक रही थी, "तुम नहीं जानते कि सुल्तानपुर का दंगल और मेला क्या चीज है। यह सिर्फ एक खेल नहीं है... यह राकेश की ताकत का अड्डा रहा है।"

आरव ने अपनी गहरी आंखें उठाईं और सुनीता की तरफ देखा। "मौसी... अम्मा जी ने जब भरी पंचायत के सामने वो जिम्मेदारी दी, तो मैं मना कैसे करता? उन्होंने मुझ पर भरोसा जताया है।"

"अरे पर तुम समझ क्यों नहीं रहे!" सुनीता थोड़ा आगे झुकी, उसका हाथ चिंता के मारे कांप रहा था, उसने आरव के गठीले हाथ पर अपना हाथ रख दिया, "राकेश कोई आम लड़का नहीं है। वह एक सिरफिरा गुंडा है। सालों से मेले का ठेका और उगाही उसके हाथ में थी। अब जब उसकी अपनी मां ने तुम्हें वो जिम्मेदारी दे दी है, तो वह चुप नहीं बैठेगा। वह तिलमिला चुका है आरव... वह तुम्हें नुकसान पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है।"

आरव ने सुनीता के कांपते हाथ को अपनी दूसरी हथेली से ढक लिया। उसकी उंगलियों का स्पर्श बहुत गर्म और आश्वस्त करने वाला था।
"मौसी, आप इतनी घबरा क्यों रही हैं?" आरव ने बेहद धीमी और नशीली आवाज में पूछा, "क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं है?"

"मुझे तुम पर भरोसा है आरव..." सुनीता की आंखें नम हो गईं, उसकी सांसें थोड़ी तेज हो गईं, "पर मुझे डर इस बात का है कि तुम अपना अतीत भूल चुके हो। तुम्हें नहीं पता कि तुम कौन हो, तुम्हारी ताकत की सीमा क्या है। अगर राकेश ने अपने गुंडों के साथ मिलकर कोई घात लगाकर हमला किया, तो मैं... मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी। तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अकेली कैसे जिऊंगी?"

सुनीता के मुंह से निकले इन आखिरी शब्दों में सिर्फ एक मौसी की फिक्र नहीं थी, बल्कि कल रात के उस पहले चुंबन के बाद उपजे उस गहरे, अनजाने और अंतरंग प्यार की तड़प थी।

आरव ने सुनीता के हाथ को थोड़ा और कसकर भींच लिया। उसने सीधे सुनीता की कजरारी आंखों में झांका, जहाँ उसके लिए बेपनाह फिक्र तैर रही थी।
"मुझे कुछ नहीं होगा मौसी," आरव ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "जब तक आपकी फिक्र और आपका यह दुलार मेरे साथ है, राकेश या इस गांव का कोई भी तूफान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। और वैसे भी... जो इंसान अपना सब कुछ खो चुका हो, उसके पास खोने के लिए सिर्फ आप ही तो बची हैं। आपकी इज्जत और आपकी सुरक्षा के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ।"

आरव की इस बात में इतनी सच्चाई और गर्माहट थी कि सुनीता का दिल धक से रह गया। डर के उस साये के बीच भी दोनों के बीच कल रात वाली वही खुमारी और खिंचाव दोबारा तैरने लगा।

सुनीता ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन आरव का हाथ नहीं छोड़ा। खाने की थाली वहीं रखी रह गई, और दोनों एक-दूसरे के स्पर्श और फिक्र के समंदर में डूब गए, यह जानते हुए भी कि आने वाला कल उनके लिए कोई बहुत बड़ा तूफान लेकर आने वाला है।


खाने की थालियां एक तरफ सरक चुकी थीं, लेकिन दोनों के बीच पसरी चिंता की परत अब एक अजीब सी बेताबी में बदलने लगी थी। आने वाले कल का खौफ जितना गहरा हो रहा था, एक-दूसरे को खोने का डर दोनों को उतना ही करीब खींच रहा था।

सुनीता ने जब थालियां उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो आरव ने बहुत आहिस्ते से उसकी कलाई थाम ली।
"अभी मत उठिए..." आरव की आवाज बहुत मद्धम और नशीली थी।

सुनीता का दिल एक पल को जोर से धड़का। उसने मुड़कर आरव की तरफ देखा। आरव की गहरी, काली आंखों में इस वक्त राकेश या दंगल की कोई फिक्र नहीं थी—वहाँ सिर्फ सुनीता के लिए एक बेपनाह, प्यासा खिंचाव था।

"आरव... बर्तन रखने दो," सुनीता ने कांपती आवाज में कहा, लेकिन उसकी उंगलियों ने आरव की कलाई को छोड़ा नहीं।

आरव ने जवाब देने की बजाय सुनीता को आहिस्ते से अपनी ओर खींचा। सुनीता का सुडौल, 42 साल का बदन बिना किसी विरोध के आरव के गठीले सीने से आ लगा। उसकी सूती साड़ी का पल्लू कंधे से सरककर नीचे फर्श पर गिर गया। कमरे में जलते दीये की मद्धम पीली रोशनी में सुनीता की सुराहीदार गर्दन और दमकती हुई कमर और भी रसीली लग रही थी।

"मुझे आने वाले तूफान का कोई डर नहीं है मौसी..." आरव ने अपनी गर्म सांसें सुनीता के कान के पास छोड़ते हुए कहा, "मुझे सिर्फ इस बात का डर लगता है कि कहीं यह वक्त यहीं न ठहर जाए।"

आरव की उंगलियों ने सुनीता की पीठ पर अपनी पकड़ कस दी। उसकी उंगलियों की गर्माहट सीधे सुनीता की रीढ़ में एक कड़कड़ाती हुई सिहरन बनकर दौड़ गई। सुनीता ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी दोनों बांहें आरव की चौड़ी गर्दन के गिर्द लपेट दीं।


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"तुम बहुत बेपरवाह हो आरव..." सुनीता के कांपते होंठ आरव के गाल से जा टकराए, "तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि तुम मेरे लिए क्या बनते जा रहे हो।"

आरव ने सुनीता की ठुड्डी को ऊपर उठाया और सीधे उसके रसीले होंठों पर अपने होंठ टिका दिए। कल रात का वो पहला चुंबन जहाँ एक अनजाने संकोच और झिझक से भरा था, वहीं आज का यह चुंबन आने वाले खतरे के साये में और भी गहरा, प्यासा और अंतरंग हो चुका था।


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सुनीता के मुंह से एक धीमी सी सिसकी निकली। उसने आरव के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं और खुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। 42 बरसों की मर्यादा, समाज का डर, और 'मौसी' का वो झूठा पर्दा—सब कुछ उस एक नशीली आगोश में जलकर राख हो रहा था।

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आरव ने सुनीता को अपनी बांहों में उठाया और तख्त की ओर बढ़ गया। बाहर रात का सन्नाटा गहरा रहा था और आने वाले कल का तूफान दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, लेकिन कमरे के भीतर दो रूहें एक-दूसरे की गर्माहट में खोकर दुनिया के हर खौफ से बेखबर हो चुकी थीं।

उस नशीले और प्यासे चुंबन की गहराई में डूबने से ठीक पहले, सुनीता का वजूद झटके से सिहर उठा। उसके दिमाग में आने वाले कल की चिंता, राकेश का खौफ और समाज के बेदर्द नियमों की कड़कड़ाती आवाज गूंज उठी।

सुनीता ने तड़पकर अपने होंठ आरव के होंठों से अलग कर लिए। उसकी सांसें बेकाबू होकर चल रही थीं और आंखों में एक बेपनाह दर्द और डर तैर रहा था।

उसने अपने दोनों हाथों से आरव के सीने पर दबाव डाला और खुद को थोड़ा पीछे धकेल दिया।

"नहीं आरव... इतनी जल्दी मत करो!" सुनीता की आवाज थरथरा रही थी, गाल मारे शर्म और घबराहट के लाल हो चुके थे। उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू समेटा और अपने सीने पर कसकर लपेट लिया।
आरव ठिठक कर रह गया। उसकी गहरी आंखों में एक अजीब सी तड़प और उलझन छा गई, "मौसी... क्या हुआ?"

सुनीता ने अपनी आंखें मूंद लीं और एक लंबी, ठंडी सांस भरी। जब उसने अपनी पलकें खोलीं, तो उसकी आंखों से आंसुओं की एक बूंद ढलक कर उसके गाल पर बह निकली।

"आरव..." सुनीता ने बेहद कांपती और भावुक आवाज में कहा, "42 सालों की इस सूनी और तन्हा जिंदगी में... मुझे एक नई जिंदगी की तलाश थी। और सच कहूँ तो... वो जिंदगी मुझे तुम में नजर आ रही है। मुझे तुमसे प्यार होने लगा है।"

आरव ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामना चाहा, लेकिन सुनीता ने हल्के से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
"मगर अभी नहीं आरव... बिल्कुल नहीं," सुनीता ने आंसुओं से भरी आंखों से उसे देखते हुए कहा, "अभी चारों तरफ आग लगी हुई है। राकेश कोई भी चाल चल सकता है, सिया देवी अम्मा ने तुम पर इतना बड़ा भरोसा जताया है। अगर जरा सी भी गड़बड़ हुई... अगर समाज को हमारे इस रिश्ते की भनक लग गई, तो मैं सब कुछ खो दूंगी! मेरी इज्जत, मेरा वजूद और सबसे बढ़कर... तुम्हें!"

आरव खामोशी से सुनीता के एक-एक शब्द को सुन रहा था। उसके चेहरे का तनाव अब पिघलने लगा था।
"तुम्हारी उम्र अभी सिर्फ 22 साल है आरव..." सुनीता का गला भर आया, "और मैं 42 साल की एक ढलती उम्र की औरत हूँ। यह समाज बहुत निर्दयी है, यह हमें कभी माफ नहीं करेगा। वे कहेंगे कि मैंने एक अनाथ और अपनी याददाश्त गंवा चुके लड़के का फायदा उठाया है।"

सुनीता ने आरव के गठीले चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया, उसकी उंगलियां आरव के गालों को बहुत दुलार से सहलाने लगीं।


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"मुझे थोड़ा वक्त दो आरव... जब तक यह तूफान टल नहीं जाता, जब तक तुम इस गांव में मजबूती से खड़े नहीं हो जाते और तुम्हारा अतीत साफ नहीं हो जाता, तब तक हमें खुद पर काबू रखना होगा। अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो यह वक्त भी कट जाएगा।"

आरव ने सुनीता के कांपते हाथों पर अपने हाथ रख दिए। उसकी आंखों में अब वासना की जगह सुनीता के लिए बेपनाह इज्जत और एक नया समर्पण था।

"जैसा आप कहेंगी, वैसा ही होगा मौसी," आरव ने बहुत आदर और गर्माहट से कहा, "मैं आपके डर और आपकी मर्यादा को कभी ठेस नहीं पहुँचाऊंगा। आपके लिए मैं इस समाज से भी लड़ूँगा और उस राकेश से भी।"

सुनीता ने राहत की एक लंबी सांस ली। दोनों ने उस रात एक-दूसरे को बांहों में भरने की बजाय, एक-दूसरे का हाथ थामकर उस अनजाने सफर का सामना करने का फैसला किया।


रात का सन्नाटा कमरे की खिड़की से छनकर आती हवा की सरसराहट से रह-रहकर टूट रहा था। दीये की मद्धम, पीली रोशनी में दोनों के साये दीवारों पर आड़े-तिरछे तैर रहे थे। अभी-अभी थमी उस बेताबी के बाद, कमरे का तापमान जैसे एक अजीब से सुकून और अनकही तड़प के बीच झूल रहा था।

आरव ने सुनीता के कांपते, ठंडे हाथों को अपनी दोनों हथेलियों के बीच समेट लिया। उसकी नीली, गहरी आंखों में वासना का उफान तो थम चुका था, लेकिन उसकी जगह एक बहुत ही निर्मल, गहरा और बेपनाह खिंचाव तैर रहा था।

"सुनीता..." आरव ने पहली बार बिना 'मौसी' कहे, सीधे उसका नाम पुकारा। उसकी आवाज में एक अजीब सी ललक और रूहानी मिठास थी।

सुनीता का दिल उस नाम को सुनते ही जोर से धड़क उठा।

"मैं आपको अपनी बनाना चाहता हूँ," आरव ने सीधे उसकी कजरारी आंखों में झांकते हुए कहा, "न जाने क्यों, जब से होश संभाला है, मुझे आपमें अपनी पूरी दुनिया दिखती है। ऐसा लगता है जैसे बरसों से मुझे इसी एक छांव की तलाश थी।"

सुनीता के होंठ थोड़े से खुले रह गए। आरव के इन बेबाक और सच्चे बोलों ने उसकी 42 साल की सुसुप्त आत्मा को अंदर तक झकझोर दिया था। उसकी आंखें छलक आईं। उसने आरव के कसरती, चौड़े चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया और उंगलियों से उसके गालों को बड़ी नजाकत से सहलाया।

"हाँ आरव..." सुनीता का गला भर आया, उसकी नशीली आवाज में एक गहरा अहसास घुला हुआ था, "मुझे भी कभी-कभी ऐसा ही लगता है... जैसे मैं तुम्हें बरसों से जानती हूँ। तुमसे मेरा कोई जन्मों का संबंध है, जो हमें हर बंदिश के बावजूद बार-बार एक-दूसरे के पास खींच लाता है। पर... पर हमें थोड़ा संभालकर आगे बढ़ना चाहिए आरव। वक्त हमारे खिलाफ है।"

आरव ने सुनीता की उंगलियों को चूम लिया और एक लंबी, संतोष भरी सांस ली। उसके चेहरे पर बच्चे जैसी मासूमियत लौट आई।

"आप जैसा ठीक समझें..." आरव ने बहुत आदर से कहा, लेकिन उसकी आंखों में एक धीमी सी इल्तजा तैर गई, "लेकिन मैं आपसे दूर नहीं रहना चाहता। आप मेरी पत्नी न सही... पर कम से कम मुझे अपने सीने से लगाकर प्यार तो कर सकती हैं? अपने बेटे की तरह ही सही, अपनी बाहों के घेरे में मुझे सुला लीजिए।"

आरव की इस निश्छल और प्यासी मांग ने सुनीता के भीतर के सारे बांध तोड़ दिए। उसमें से 'मौसी' का डर, समाज की दहशत और उम्र का फासला—सब कुछ एक पल में बह गया। सिर्फ एक औरत का बेपनाह दुलार और एक गहरी आत्मीयता बाकी रह गई।

सुनीता ने तख्त पर पीछे होकर सहारा लिया और मुस्कुराकर अपनी बांहें फैला दीं।

"आ जाओ..." सुनीता ने बेहद कोमल और रसीली आवाज में कहा।

आरव ने बिना एक पल गंवाए अपना सिर सुनीता की सुराहीदार छाती और उसकी गोद के पास टिका दिया। सुनीता ने अपनी दोनों बांहों का गर्म घेरा आरव के कसरती जिस्म के गिर्द कस लिया। उसने अपनी उंगलियां आरव के घने, मुलायम बालों में फंसा दीं और आहिस्ते-आहिस्ते सहलाने लगी।


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आरव ने अपनी आंखें मूंद लीं और सुनीता के सीने में उठती धड़कनों को सुनने लगा। सुनीता की सूती साड़ी से आती चंदन और बारिश की भीनी-भीनी खुशबू में आरव को दुनिया का सबसे महफूज कोना मिल गया था। सुनीता ने झुककर आरव के माथे पर एक बहुत ही गहरा, ममता और प्यार से भरा चुंबन जड़ दिया।
कमरे में पसर चुका सन्नाटा अब किसी गुनाह का बोझ नहीं उठा रहा था। बाहर रात का तूफान जारी था, लेकिन उस छोटे से कमरे में दो रूहें एक-दूसरे की बांहों के घेरे में सिमटकर, दुनिया की हर बंदिश से बेखबर, सुकून की आगोश में सो जाने को तैयार थीं।
ममता जी, मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि ये आपकी पहली कहानी है. आपके शब्दों का चयन और पात्रों की मनोस्थिति का वर्णन एकदम लाजवाब है. अगले अपडेट का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा. 🙏
 
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Mamta Mishra

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ममता जी, मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि ये आपकी पहली कहानी है. आपके शब्दों का चयन और पात्रों की मनोस्थिति का वर्णन एकदम लाजवाब है. अगले अपडेट का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा. 🙏
Thanks🥰🥰
 

Mamta Mishra

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Thanks🥰🥰
ek aur sundar episode....Is haram khor Rakesh ka pehla daav to fail ho gaya... dekhte hain agli kya chaal chalta hai...
Aarav aur Sunita aakhir ek dusre ki or badhti garmi mein apne rishte ho agla naam dene ka pehla kadam rakh liya... pehla chumban ho gaya... wow.... ab aag aur zyada sulagne lagegi

nice update
 
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