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Incest Maa beheno ka pyar

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Brooks420

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Bhai tum bhoot sahi story likhte ho aur kya mast pic add krte ho story ke matching, real feel hone lagta hai Bhai ek story hai meri favourite usko tum fir se likh do thoda change kr ke uska link mai de rha hu


1 -maa beta me breastfeeding kra do

2- bahen ke saath photoshoot ke through sex kra do

3- aur dusri bahen ke sasural ja ke seduce kr ke lingerie try out ke bahane sex kra do


Aur in situation se matching pic daal do ki muth mar ke shanti paa lun plzzzzzzz bhai
 
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vs12557

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अगले दिन मैं मम्मी के आंखों में उस प्यास को तलाश करने लगा जो उसने नैना आंटी के साथ बात करते वक्त जिक्र किया था. लेकिन मम्मी की बातें कहीं उलझी हुई नजर आ रही थी. मम्मी इतनी जल्दी मानने वालों में से तो नहीं है. जब भी नैना आंटी उसे बेटे के बारे में कहती तो मम्मी का विरोध बढ़ जाता था. क्योंकि वो अभी भी ऐसे रिश्ते के खिलाफ थी.

मैं सुबह बैठ पढ़ाई कर रहा था और कुसुम दीदी मेरे सामने, एक बिना स्लीव वाली टॉप में बैठी थी. मेरा मन पढ़ाई में कम मम्मी की बातों में और उसकी चाहत में ज्यादा था. तभी मेरी नजर कुसुम दीदी के छाती पर पड़ा जहां उसकी चूचियां टॉप से ढकी हुई थी. लेकिन वो ढकी होने के बाद भी काफी आकर्षक लग रही थी. मेरी नजर उन पर टिक गई और कुछ पल के लिए मैं भूल गया कि मैं पढ़ने बैठा हूं.

अपनी मम्मी की छिपी हुई कामुकता का ख्याल एक चिंगारी की तरह था, और अब अपनी बहन को देखकर मुझे अपने लंड में एक गर्माहट महसूस हो रहा था. मैं बस उसे देखता रहा, एक मूर्ति के तरह बैठा हुआ, उसके सीने को निहारता रहा. दीदी ने भी इस बात पर ध्यान दिया कि मैं उसके स्तनों को देखने की कोशिश कर रहा हूं. उसने तुरंत चुटकी बजाते हुए मेरा ध्यान तोड़ दिया.


कुसुम दीदी: (धीमी लेकिन गुस्से भरी आवाज में) क्या देख रहा है?
मैं: कुछ भी तो नहीं. बस ऐसे ही कुछ सोच रहा था.
कुसुम दीदी: बहुत सोचता है तू. पिछले 10 मिनट से देख रही हूं इस एक पन्ने को खोलकर बैठा हुआ है. तू पढ़ाई कर भी रहा है या फिर नौटंकी.


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मैं फिर से अपना ध्यान पढ़ाई की ओर किया. कुछ देर बीते लेकिन मन नहीं माना, मम्मी के किचन में खाना बनाने का आवाज बार-बार मेरे कानों में आ रहा था. जिसकी वजह से मेरा मन बेचैन था और जल्दी से उसे मिलने का बहाना ढूंढने लगा.

मैं: दीदी मैं आता हूं पानी पीकर. मुझे बहुत प्यास लग रही है.
कुसुम दीदी: ठीक है जा...

मैं जल्दी से उठ खड़ा हुआ और किचन की तरफ जाने लगा. मेरे दिमाग में चल रही उथल-पुथल शांत होने का नाम नहीं ले रही थी. जब भी कमरा शांत होता, मम्मी और नैना आंटी की आवाज़ की रिकॉर्डिंग मेरे दिमाग में बार-बार बजने लगती. जैसे ही मैं किचन में दाखिल हुआ, मैंने उन्हें देखा. मम्मी काउंटर के पास खड़ी थीं और उनकी पीठ मेरी तरफ थी.

वो अभी मुझे नजरअंदाज कर रही थी. मैंने फ्रिज से पानी लिया और उसे घूरते हुए पी रहा था. उसका ध्यान बिल्कुल मेरी तरफ नहीं था. वो खाना बनाने में व्यस्त थी. पानी पीकर मैं ग्लास रखा और अचानक उसके करीब जाकर उसकी कमर में हाथ डालकर अपनी ओर खींचा जिससे उसके बदन में सिहरन पैदा हो गई. वो चौंक गई और अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया. मेरी गर्म साँसें उसकी गर्दन पर महसूस हो रही थी. मैंने वक्त ना बर्बाद करते हुए तुरंत झुका और अपने होंठ उसके कान के ठीक नीचे टिका दिए.



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मैंने उसके गाल और फिर उसके जबड़े पर ज़बरदस्ती चुम्मा लेने लगा और आखिर में उसके होठ चुम लिया.

मैं: आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो?
मम्मी: तेरी इसी लक्षण की वजह से...तूने समझ कर क्या रखा है मुझे? जब जो चाहे वो कर देगा?
मैं: क्यों मजा नहीं आया था आपको पिछली बार?
मम्मी: (गुस्से में) छोड़ मुझे.

वो यह सब कह रही थी लेकिन मैं फिर भी उसे चूमता रहा. मैंने उसका सिर पीछे की ओर झुकाया और अपने होंठों को उसके होंठों पर ज़ोर से दबाया. वो एक कामुक और ज़बरदस्त चुंबन था. एक पल के लिए वो जम सी गई, उसके होंठ कसकर भिंचे हुए थे. लेकिन फिर, जैसे कुछ टूट गया ओर उसके होंठ नरम पड़ गए.


जैसे ही हमारा चुंबन गहरा हुआ और मुझे महसूस हुआ कि उसका शरीर मेरे शरीर से सटकर पिघलने लगा है, तभी दरवाज़े की तरफ से आई आहट की आवाज ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए. मैंने तुरंत चुम्मा लेना छोड़ दिया लेकिन इससे पहले कि मैं पीछे हट पाता, कुसुम दीदी दरवाजे पर खड़ी हो गई. वो मेरे पीछे-पीछे आई थी. मैंने उससे कहा था कि मैं बस पानी लेने जा रहा हूं, लेकिन उसे ज़रूर एक अजीब एहसास हो गया होगा जो मुझमें पूरे दिन से थी. उसने चुम्मा करते हुए तो नहीं देखा, मैं सही समय पर पीछे हट गया था. लेकिन उसने हमारी पोज़िशन ज़रूर देख ली थी. उसने देखा कि मैं मम्मी को पीछे से पकड़े हुए था और मेरे हाथ उसके गांड पर इस तरह से थे जो एक माँ और बेटे के रिश्ते के हिसाब से बहुत ज़्यादा अंतरंग थे.



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मम्मी ने जल्दी से अपनी साड़ी ठीक की, उसके हाथ बुरी तरह कांप रहे थे. उसने न तो मेरी तरफ देखा और न ही कुसुम दीदी की तरफ. वो खाना पकाने में व्यस्त होने का दिखावा करने लगी. मुझे लगा था कि दीदी पापा को फ़ोन करेंगी, या मुझे थप्पड़ मारेंगी, या चिल्लाने लगेंगी कि मैं कितना बुरा हूं. लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया. वो बस वहीं खड़ी रही, उसकी नज़रें मुझ पर और मम्मी पर घूम रही थी. उसके चेहरे पर डर के भाव नहीं थे, वो कुछ ज़्यादा ही पेचीदा बात थी. दीदी बस मुड़ी और किचन से बाहर चली गई.

कोई प्रतिक्रिया न होना, आमना-सामना होने से भी ज़्यादा डरावना होता है. एक घंटा बीत गया, मम्मी अपने कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया. मैं दीदी के साथ लिविंग रूम में बैठा था. उसके बाद वो भी अपने कमरे में जाने के लिए उठी, लेकिन जाते-जाते उसने गंभीरता से कुछ कहा.


कुसुम दीदी: तुझसे मैं शाम को बात करती हूं.

ये वाकई में एक डरावना पल था. जो चीज छुपे तौर तरीके से होना चाहिए था वो अब एक और गलत दिशा में जा रहा था. लेकिन कुसुम दीदी का सामना करना मेरे लिए शेर का सामना करने के बराबर था. न जाने उसने क्या-क्या सोच लिया होगा. मैं अपने कमरे में गया लेकिन बेचैनी बरकरार थी. मैं बस शाम होने का इंतजार कर रहा था की कुसुम दीदी आखिर क्या करेगी.

वक्त बिता गया और धीरे-धीरे शाम का समय आ गया. तभी मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई. मैंने घबराते हुए दरवाजा खोला तो सामने कुसुम दीदी थी.


कुसुम दीदी: यहां नहीं, चल छत पर बात करना है.

छत पर पहुंचते ही मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था, कुसुम दीदी ने अपनी पूछताछ शुरू की.

कुसुम दीदी: मुझे जवाब दे, तु मम्मी को उस तरह क्यों पकड़े हुए थे? मैंने तेरे हाथ उनकी कमर पर देखे. मैंने देखा कि तु अपना शरीर उनके शरीर से सटा रहा था. वो कोई गले मिलना नहीं था. न ही तु उन्हें सहारा दे रहा था. वो कुछ और ही था.
मैं: मैं बस खाने के बारे में पूछ रहा था.
कुसुम दीदी: मुझसे झूठ मत बोल. हमारे बीच जो हुआ, उसके बाद तो बिल्कुल नहीं. क्या तुझे लगता है कि मैं भूल गई हूँ? मुझे वो किस याद है. मुझे याद है कि तुने मुझे किस नज़र से देखा था, और कैसे तुने मेरे साथ हदें पार करने की कोशिश की थी.


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मैं: मैं क्या करूं मैंने अपना हाल आपको समझाया था पहले भी. ये लकीरें किसने खींची हैं? समाज ने? किसी पुरानी किताब ने? मैं एक मर्द हूँ, दीदी.
कुसुम दीदी: आशीष, तु अभी मर्द' नहीं बना है. तु एक ऐसा लड़का है जो अपनी भावनाओं के बहकावे में आकर खुद को बर्बादी की कगार पर ले जा रहा है. ये ज़रूरतों की बात नहीं है. ये डिसिप्लिन की कमी है.
मैं: दीदी, मुझे बस एक पार्टनर चाहिए! कोई ऐसा जिसे मैं छू सकूँ, और जो मेरे अंदर की इस तड़प को शांत कर सके. मैं जवान हूं और ऐसे घर में फंसा हुआ हूं जहाँ सब ऐसा दिखावा करते हैं जैसे सेक्स जैसी कोई चीज़ ही नहीं होती.
कुसुम दीदी: तुझे फिर थप्पड़ खाना है? क्या बोल रहा है तू? थोड़ी भी शर्म नहीं अपनी बेहन से किस तरह बात करना है.
मैं: तो आप ही बताओ मैं क्या करूं?
कुसुम दीदी: तो ठीक है मैं अब खुल कर बात करती हूं.

उसके लहजे में गुस्से की जगह एक सख्त, बड़ी बहन जैसी सिख थी.

मैं: मुझे लगा था कि आप बहुत गुस्से में होगे. लेकिन आप तो बस... शांति से मुझे सब समझा रहे हो. मुझे समझ नहीं आ रहा.
कुसुम दीदी: मेरी शांति को माफ़ी मत समझना. मैं गुस्से में हूँ. मेरा गुस्सा उससे कहीं ज़्यादा है.
मैं: तो फिर आप चिल्ला क्यों नहीं रही हो?
कुसुम दीदी: क्योंकि तुझे पीटने या तुझ पर चिल्लाने से कोई हल नहीं निकलेगा. इससे तेरे दिमाग़ में चल रहे विचार नहीं मिटेंगे, और न ही इस घर का माहौल ठीक होगा.
मैं: कुसुम... दीदी... अगर आप सच में समझती हैं, तो प्लीज. मैं यह अकेले नहीं कर सकता. मैं इन इच्छाओं से अकेले नहीं लड़ सकता. मुझे लगता है कि मैं पागल हो रहा हूँ.
कुसुम दीदी: तु मुझसे क्या कह रहा है, आशीष?
मैं: मुझे आपके साथ की ज़रूरत है. सिर्फ़ एक ऐसी बहन के तौर पर नहीं जो मुझे पढ़ने के लिए कहती है, बल्कि एक ऐसी इंसान के तौर पर जो जानती है कि यहाँ फँसे होने का क्या मतलब है. मेरी मदद करो.


मैं दीदी के चेहरे पर चल रही उथल-पुथल देख सकता था. उसका सख्त चेहरा ढीला पड़ रहा था, और उसमें एक ऐसी उत्सुकता और कमज़ोरी दिख रही थी जो बिल्कुल मेरी जैसी थी.

कुसुम दीदी: तु उस इंसान से साथ माँग रहा है जिसे तुने बहकाने की कोशिश की थी.
मैं: क्योंकि सिर्फ आप ही जानती हैं. सिर्फ आप ही हैं जो दिखावा नहीं कर रही है.
कुसुम दीदी: अपने कमरे में जा, अभी मैं कुछ नहीं कह सकती. लेकिन हम इस बारे में फिर बात करेंगे. चेतावनी के तौर पर नहीं, बल्कि बातचीत के तौर पर. बस... मम्मी को तब तक दोबारा मत छूना जब तक मैं तुझे न बताऊँ कि इसे कैसे संभालना है.


मैंने सिर हिलाया, मेरे दिमाग में कई बातें चल रही थी. मैं वापस अपने कमरे में गया, लेकिन अब जीत का एहसास कुछ अलग था. मैं सिर्फ सज़ा से ही नहीं बचा था, मुझे उसी इंसान में एक साथी मिल गया था जिसे मुझे रोकना था और जो इस खेल में मेरे लिए सबसे बड़ी दुश्मन थी.

रात के वक्त, जो रिकॉर्डिंग बची थी मैं उसे सुनने के लिए बेचैन था. इसीलिए मैंने ध्यान लगाते हुए फिर से सुनना शुरू किया.


नैना: सीमा, तुम्हारी आवाज़ थोड़ी ठीक से नहीं आ रही है.
मम्मी: हेलो, अब सुनाई दे रहा है?
नैना: हां हां बोलो. फ्री हो गई सारे कामों से?
मम्मी: हां वही रोज रोज के काम. मैं तो वही सोच रही थी, मैं तय नहीं कर पा रही हूं कि तुम सही हो या गलत. एक औरत होने के नाते मैं जानती हूं कि तुम्हारी शारीरिक मजबूरियां रही होगी.
नैना: सच बताओ, पति के दूर होने पर तुम असल में कैसे मैनेज कर रही हो?
मम्मी: (लंबी सांस लेते हुए) मैं ठीक हूँ, नैना. सच में. मैं अपनी बेटियों और आशीष के साथ खुश हूँ, घर में शांति है... लेकिन झूठ नहीं बोलूँगी, कभी-कभी अकेलापन बहुत महसूस होता है. दो महीने हो गए हैं, बिस्तर का एक हिस्सा खाली रहते हुए.
नैना: मैं तुम्हारी आवाज़ से समझ सकती हूँ. तुम किस चीज की कमी महसूस कर रही हो.
मम्मी: मुझे बस उनकी मौजूदगी की कमी खलती है. उनके साथ की. लेकिन अजीब बात है... मुझे लगता है कि मैं कहीं खो रही हूँ. तुम ये कैसे करती हो, नैना?
नैना: खुद से सच कहो. तुम्हारा दिल तो तुम्हारे पति को याद करता है, पर तुम्हारा शरीर? तुम्हारी चूत तड़प रही है, है ना? वो गहरी, कसकती हुई तड़प जो सिर्फ़ इसलिए नहीं जाती कि तुम किसी ऐसे इंसान से प्यार करती हो जो हज़ारों मील दूर है.
मम्मी: (हैरानी से) "नैना! प्लीज़... यह अश्लील है.
नैना: किसके लिए अश्लील है? दीवारों के लिए? हवा के लिए? हम औरतें हैं, अगर तुम उस तड़प को शांत नहीं करोगी, तो वह कड़वाहट में बदल जाएगी जो तुम्हें अंदर ही अंदर खोखला कर देगी.
मम्मी: ये नामुमकिन है. मैं एक माँ हूँ, एक पत्नी हूँ. मेरी एक इज़्जत है.
नैना: तुम्हें किसी अजनबी की ज़रूरत नहीं है, तुम्हें ऐसे इंसान की ज़रूरत है जो पहले से ही तुम्हारे आस-पास हो. जिस पर तुम भरोसा करती हो. जो तुम्हें वैसा ही देख सके जैसी तुम असल में हो.
मम्मी: मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम क्या कहना चाहती हो.
नैना: आशीष के बारे में सोचो. वो अब जवान हो गया है. मज़बूत और वो तुम्हारे साथ घर में ही तो रहता है.

ये हैरानी की बात थी. नैना आंटी की दी गई मम्मी को ऐसी सलाह की वो अपने बेटे से ही चूदवाले ले. मैं बता भी नहीं सकता उस वक्त इन दो औरतों की बातें सुनकर मेरे शरीर में कितनी बेचैनी थी.

मम्मी: (कुछ सेकंड की खामोशी) ...क्या?
नैना: जरा सोचो तो सही. उसे अपना दोस्त बनाओ. वो तुम्हें उस तरह समझ सकता है जैसा तुम्हारी बेटियाँ कभी नहीं समझ पाएँगी. वो तुम्हारी उन ज़रूरतों को पूरा कर सकता है और तुम्हारे राज़ को भी सुरक्षित रख सकता है.

मम्मी: नैना, ये बहुत ही भयानक बात है! वो मेरा बेटा है!
नैना: और वो एक मर्द भी है. कुदरत से क्यों लड़ना? जब समाधान तुम्हारे ही घर में मौजूद है, तो चुपचाप क्यों तड़पना?
मम्मी: ये गलत है! ये हमारी संस्कृति के खिलाफ और घिनौना है! हमारे समाज में, ये सबसे बड़ा पाप है. मैं आशीष को कभी भी उस नज़रिए से नहीं देख सकती.
नैना: तुम बहुत सोचती हो. मैंने समझाया था ना, संस्कृति बस उन लोगों के बनाए नियम हैं जो खुशी महसूस करने से डरते थे. तुम इसे पाप कहती हो, लेकिन मैं इसे आज़ादी कहती हूँ.
मम्मी: और वैसे भी... उसे पढ़ाई करनी है! उसकी पढ़ाई के लिए ये बहुत अहम समय है. उसे अपनी किताबों पर ध्यान देना चाहिए, न कि अपनी माँ की इच्छाओं पर!
नैना: तुम कहती हो कि उसे पढ़ाई करनी चाहिए. लेकिन मैं तुम्हें नौजवानों के बारे में एक राज़ की बात बताती हूँ... जब उनका तनाव दूर हो जाता है, तो वे कहीं बेहतर ढंग से पढ़ाई करते हैं.

आंटी की ये सब बातें सुनकर, मम्मी की आवाज में एक आह भरी थी.

मम्मी: तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो? तुम मुझे किसी ऐसी चीज़ की तरफ क्यों धकेलने की कोशिश कर रही हो जो इतनी... भयानक है?
नैना: क्योंकि मैं तुम्हारी परवाह करती हूँ, डार्लिंग. मैं भी इस रास्ते से गुज़री हूँ. जरा सोचो आशीष के चेहरे पर क्या भाव होंगे जब उसे पता चलेगा कि उसकी माँ सिर्फ़ उसकी देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत है जिसकी एक ऐसी प्यास है जिसे सिर्फ वही बुझा सकता है.
मम्मी: तुम्हारी बातें सुनकर मुझे लग रहा है कि मैं पागल हो जाऊँगी.
नैना: ये पागलपन नहीं है. क्या ये डर है? या फिर ये सोचो कि उसका जवान लंड तुम्हारी तड़पती हुई चूत में अंदर जा रहा है?
मम्मी: ये बहुत गलत है... मैं उसे देख भी नहीं सकती, बिना कुछ महसूस किए. मैं बहुत डरी हुई हूँ.
नैना: उसे कोई इशारा दो, सीमा. उस लड़के को वो आदमी बनने का मौका दो, जिसकी तुम्हें ज़रूरत है.
क्या अपने बेटे के बारे में सोचते हुए तुम्हारी उंगलियां उस गीलेपन में फिसल रही हैं?

मम्मी: हाँ... हाँ...भगवान मेरी मदद करे, मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूँ.
नैना: (संतुष्टि भरी आवाज़ में) हाँ, अब अपनी आँखें बंद करो. सोचो कि वो तुमसे कह रहा है कि वो अपनी माँ के साथ सेक्स करना चाहता है.
मम्मी: (ज़ोर से कराहते हुए, कांपती आवाज़ में) हे भगवान... आशीष... आह...... मैं नहीं कर सकती...
नैना: हाँ, तुम कर सकती हो. खुद को इसमें बहने दो. मैं तुम्हें कल फ़ोन करूँगी. अच्छी नींद लेना.

ये सब क्या था? बात इस हद तक गुजर गई थी और मुझे पता भी नहीं! वो तो अच्छा हुआ कि मैंने रिकॉर्डिंग सुन ली. लेकिन इसमें नैना आंटी का क्या फायदा हुआ? मेरे समझ में नहीं आ रहा था. क्या वो अपनी जैसी ही एक और औरत को बनाना चाहती थी या फिर वाकई में मम्मी को अपने अनुभव से मदद करना चाहती थी जैसा कि उसने कहा था.


मेरी हिम्मत पूरी तरह से बढ़ गई क्योंकि मैं समझ गया की मम्मी भी प्यासी है और रिकॉर्डिंग से यह साफ था कि उसने मेरा नाम लेते हुए अपनी चूत को सहलाया था. मेरा मन कर रहा था कि मैं तुरंत मम्मी के कमरे में जाकर उसकी सारी इच्छाएं पूरी कर दूं. लेकिन यहां मामला पेचीदा हो गया था. क्योंकि कुसुम दीदी ने भी मुझसे वादा करवाया था कि मैं मम्मी के साथ कुछ गलत ना करूं. मेरे हाथ में मेरे घर की तीनों औरतों का लगाम था और अब ये मेरे ऊपर निर्भर था पूरी तरह से, मैं किसको अपनी ओर पहले खींचना चाहता हूं. इसलिए मैंने यहां जोश से नहीं बल्कि होश में रहकर फैसला किया. फिलहाल कुसुम दीदी के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी और वो इकलौती थी जिसकी चूत का नशा मुझ पर हावी हो गया, इसीलिए उसका कहना मानना जरूरी था.

अगली सुबह हम सब नाश्ता करने के लिए बैठे थे और मम्मी नाश्ता परोस रही थी. कुसुम दीदी रह रहकर कोई मजाकिया बात कर दे रही थी और खास करके उसने मेरे नए हेयर स्टाइल का मजाक उड़ाया जिसकी वजह से माहौल काफी खुशियों भरा था सबके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी.



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मम्मी मुझसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी और अपनी जज्बातों को दबाए हुए हंस रही थी. इंतजार था कुसुम दीदी के अगले कदम का. रीना दीदी खूबसूरत काली कुर्ती में मेरे बगल में बैठी हुई थी. तभी मैंने टेबल के नीचे अपने पैरों से रीना दीदी के पैरों को सहलाने लगा. वो भी मुझे देखकर मुस्कुराई और आंखों आंखों से इशारा कर रही थी कि कोई देख लेगा. वो अपने पैरों से ही मेरे पैर को हटाने की कोशिश कर रही थी और मैं उसे छेड़े जा रहा था.


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नाश्ता खत्म होने के बाद रीना दीदी शर्मा कर चली गई. कुसुम दीदी अब भी वहीं पर थी मैंने उसे तुरंत पूछा,

मैं: दीदी आपने बोला था कुछ बताने को.
कुसुम दीदी: तू चल अपने कमरे में और पढ़ाई कर, मैं आती हूं.

दीदी का यह कहना, मैं तुरंत उठकर चला गया अपने कमरे के अंदर. कुछ देर बाद में कुसुम दीदी वहां पर आई, पीछे मुड़कर हल्के से क्लिक की आवाज के साथ दरवाजा बंद किया और सीधे मेरी कुर्सी के पास आकर मुझ पर झुक गई. मैंने भी किताबों को एक तरफ किया. मुझे उसके फूलों जैसी ताज़गी भरी खुशबू आ रही थी.


कुसुम दीदी: मैं ये देखने आई थी कि क्या तु सच में ध्यान दे रहा है, या तेरा मन अभी भी उन चीज़ों के बारे में सोच रहा है जिनके बारे में तुझे नहीं सोचना चाहिए.
मैं: मैं कोशिश कर रहा हूँ, दीदी. लेकिन ये मुश्किल है. जब भी मैं मम्मी को देखता हूँ, या जब भी आपको देखता हूँ... तो मुझे अपने सीने में एक अजीब सा दबाव महसूस होता है. एक बेचैनी.

उसकी नज़र मेरी पैंट में उभरे हुए हिस्से पर पड़ती है जो की लंड के तनाव के वजह से हुआ था. फिर उसने मेरी ओर देखा.


कुसुम दीदी: तु कितना साफ-साफ सब ज़ाहिर कर देता है.

मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया और झिझकते हुए उसकी कमर को पकड़ा और उसके साथ खड़ा हो गया.

मैं: मैं इसे अकेले नहीं संभाल सकता. आपने कहा था कि आप मेरा साथ दोगी. प्लीज़... मुझे बताओ कि क्या करना है.

मेरा हाथ अभी भी उसकी कमर में था और वह मेरे काफी करीब लेकिन वो एक इंच भी पीछे नहीं हटी.

कुसुम दीदी: सपोर्ट का मतलब ये नहीं है कि मैं बस हार मान लूंगी, आशीष. इसका मतलब है कि मैं तुझे सिखाऊंगी. मैं तुझे दिखाऊंगी कि इस भूख को कैसे कंट्रोल करना है... या इसे कैसे शांत करना है.

उसके यह कहते ही मैं अपना होंठ उसके होठों पर एकदम करीब ले गया इतना करीब कि हम दोनों की गर्म सांसे एक दूसरे के मुंह को गर्म कर रही थी.


मैं: मैं कुछ भी करूँगा. आप जैसा चाहोगी, मैं वैसा ही बन जाऊँगा. बस... प्लीज, रुको मत. मैं बहुत अकेला रहा हूँ, दी. मैं इसके लिए तरसता रहा हूँ.
कुसुम दीदी: मुझे पता है. तुझे ये समझना होगा कि यहाँ सब कुछ मेरे कंट्रोल में होगा.

इसीलिए पहल दीदी ने की और अपने होठों को मेरे होठों पर रख रखते हुए धीमी गति से एक चुम्मा लिया. ये रहस्यमई था, ये जादुई था, क्योंकि जिस कुसुम दीदी को मैं जानता था वो बिल्कुल ही सख्त और खतरनाक थी. गुस्सा तो उसके नाक पर रहता था. पर आज उसने खुद अपने होठों को मेरे होठ से मिलाया. मैं भी देर ना करते हुए उसे गहरी चुंबन की ओर ले गया. मेरी पकड़ उसके कमर पर और मजबूत हो गई हम दोनों की जिस्म एक दूसरे से सट गए.


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मैं उसकी चूचियों की गर्मी अपने सीने पर महसूस कर सकता था और शायद वो मेरे लैंड का तनाव अपनी चूत पर हमने कोई परवाह नहीं की बस एक दूसरे को बाहों में जोर से जकड़ कर चूमने लगे.

वो बरसात वाले दिन, जबरदस्ती से किया गया चुंबन में वो मजा नहीं था जो कि इस वाले में. क्योंकि इस बार दीदी का पूरा सहयोग था.

ये उसके साथ मेरा पहला असली चुंबन था. दांतों और जीभ का एक बेताब और अनाड़ी मिलन. ये दिनों से दबी हुई चाहत का इज़हार था. मैंने उसकी सांसों की मिठास और उसकी नमकीन स्वाद को महसूस किया, मेरी जीभ ज़ोर-ज़ोर से उसके मुँह में जा रही थी, मानो उस पर अपना हक जता रही हो. उसकी जुबान मेरी जुबान के साथ एक ऐसी तेज और जोश भरी लय में थिरकने लगी कि मेरा सिर चकराने लगा.

मुझे उसकी शरीर से निकलती गर्मी महसूस हुई, और मैंने अपना हाथ कपड़े के नीचे खिसकाया, ताकि डोरी खींचकर उसे खोल सकूँ और उसका बदन देख सकूँ. अचानक वो अकड़ गई. उसने झटके से मेरा हाथ हटा दिया, चुंबन तोड़कर कुछ इंच पीछे हट गई. उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, होंठ गीले थे, लेकिन उसके चेहरे पर फिर से सावधानी और संयम वाले भाव आ गए थे.


कुसुम दीदी: नहीं, आशीष. अभी नहीं. तु बहुत तेज़ी दिखा रहा है. मैंने कहा था न सब कुछ मेरे कंट्रोल में है.
मैं: प्लीज़, दीदी... मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता. मुझे आपको देखना है. मुझे आपको महसूस करना है. प्लीज़, बस मुझे...

मैं रुका नहीं. मैंने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा कि मैं उसे कितना चाहता हूँ, मैंने इस पल का कितना सपना देखा था, और वही अकेली थी जो मेरी चाहत को समझती थी. मेरे हाथ चलते रहे, उसके कपड़ों के किनारों को छूते हुए, उसकी जॉलाइन और कान के निचले हिस्से को चूमते हुए, और फिर एक नई, बेताब शिद्दत के साथ उसके होंठों पर वापस आते हुए. मैंने उससे गुज़ारिश की, मेरी आवाज कांप रही थी, और मैंने वादा किया कि अगर वो मुझे बस उसे देखने दे, तो मैं उसकी हर बात मानूँगा.

आखिरकार, दीदी की हिचकिचाहट की दीवार टूट गई. उसने एक लंबी, कांपती हुई आह भरी और अपनी बाहों से कसकर मेरी गर्दन को पकड़ लिया, और मुझे वापस एक गहरे, रूह को छू लेने वाले चुंबन में खींच लिया. उसने मेरे होंठों के पास फुसफुसाया, उसकी आवाज़ मुश्किल से सुनाई दे रही थी.


कुसुम दीदी: ठीक है... लेकिन मैं जैसा चाहूंगी सिर्फ वैसा होगा.

उसने ऊपर हाथ बढ़ाया और धीरे-धीरे अपनी कुर्ती के बटन खोलने लगी. मैं मंत्रमुग्ध होकर देखता रहा, जैसे ही कुर्ती उसके कंधों से फिसलकर ज़मीन पर गिरी... मैंने उसके कपड़े हटाए, और रोशनी में उसकी मखमली, गोरी शरीर देखकर मेरे लंड का सुपाड़ा पूरी तरह से फूल गया. मेरी नज़रें उसकी ब्रा की लेस पर टिकी थीं, जो उसके उभरे हुए स्तनों को मुश्किल से ढके हुए थी. मैंने कई बार उसकी चूचियों की कल्पना की थी, लेकिन असलियत किसी भी कल्पना से कहीं ज़्यादा नशीली थी.

मैंने हाथ बढ़ाया, मेरी उंगलियाँ कांप रही थीं जब मैंने उसकी ब्रा के कपड़े को छुआ. मैं ब्रा के नीचे उसकी चूचियों की गर्माहट महसूस कर सकता था, और उस एहसास ने मेरे लंड में बिजली सी दौड़ा दी.


मैं: दीदी... प्लीज. मैं उन्हें चूसना चाहता हूँ.
कुसुम दीदी: नहीं, आशीष. ये बहुत ज़्यादा हो रहा है. हमने पहले ही किस किया है. मैं तुझे इससे आगे नहीं बढ़ने दे सकती. बस... बस मुझे देख.

मैंने नहीं सुना. मैं सुन भी नहीं सकता था. मेरे अंदर की भूख एक धधकती आग की तरह थी जिसने बाकी सब कुछ भुला दिया था. मैं और करीब आया, अपनी छाती को उसकी छाती से सटाया, और उसे अपने शरीर के बीच जकड़ लिया.


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मैंने उसे फिर से किस करना शुरू किया, लेकिन इस बार यह ज़्यादा आक्रामक और ज़बरदस्त था. मैंने अपने होंठ उसके मुँह से हटाकर उसके जबड़े पर, और फिर नीचे उसकी गले के संवेदनशील गड्ढे तक ले गया, जिससे वह धीरे से कराह उठी.

उसने मुझे दूर धकेलने की कोशिश की, लेकिन उसकी हरकतें कमज़ोर थी, मेरे स्पर्श के हमले के आगे उसका इरादा टूट रहा था. जब मैंने उसके कंधे को हल्के से काटा तो वह हाँफने लगी.


कुसुम दीदी: (सिसकियां लेते हुए) बहुत ज़िद्दी है तू.

मैं वापस उसके होंठों पर आया और उसे बहुत शिद्दत से चूमा, मेरी जीभ उसके मुँह में घूम रही थी जबकि मेरा हाथ उसकी ब्रा के ऊपर से उसकी चूचियां दबा रहा था. मैंने हुक के साथ छेड़छाड़ की, लेकिन उसे खोला नहीं, जिससे वो बेचैन और बेताब हो गई. उसका सिर पीछे दीवार से जा लगा उसकी आँखें बंद हो गई और उसने आखिरकार विरोध करना छोड़ दिया. उसने फुसफुसाते हुए कहा,


कुसुम दीदी: ठीक है, लेकिन सिर्फ एक बार करने दूंगी. सिर्फ़ एक बार.

मैंने उसके ब्रा का हुक बिना खोले नीचे से पकड़ कर ऊपर उठा दिया. पहली बार मैंने उन्हें देखा, उसकी दोनों रसीली चूचियां बाहर निकल आई. उसके नंगे सीने को देखकर मेरी सांसें जैसे रुक ही गई. निप्पल के आसपास का वो हल्का गुलाबी रंग, खड़े निप्पल ठंडी हवा में उभरे हुए थे. मैं उसके करीब झुका, मेरी गर्म सांसें उसकी निप्पल को छू रही थी. फिर मैंने निप्पल के चारों तरफ जीभ घुमाते हुए उसकी चूचियां पकड़ कर निप्पल को चूसने लगा और उसकी त्वचा के नमकीन और मीठे स्वाद को महसूस किया. इससे उसकी हल्की सिसकारियां शुरू हो गई और उसने मुझे अपने चूचि के और करीब खींच लिया.

कुसुम दीदी: उम्म्...आशु...आंह...हे भगवान...आह...

मैं उसके दूसरे स्तन की ओर बढ़ा, उसके निचले हिस्से को चाटा और फिर निप्पल को जितना हो सकता था अपने भीतर तक खींच लिया. मैं उसके दिल की तेज़ धड़कन सुन सकता था, जो बिल्कुल मेरी धड़कन जैसी ही तेज़ थी. जब मैं उसके स्तनों को चूसता और सहलाता रहा, तो मैंने उसमें एक बदलाव महसूस किया की मेरी जीभ के हर स्पर्श के साथ उसका शरीर कांप रहा था. मैंने उसकी सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया था.

जब मेरा मुँह उसके स्तनों पर टिका हुआ था, तभी मेरा हाथ नीचे की ओर चला गया. मैंने उसके पजामे की कमरबंद पकड़ी, जो पहले से ही ढीली थी. धीरे-धीरे, जानबूझकर, मैंने कपड़े को नीचे सरकाना शुरू किया. जैसे ही पजामा उसके गांड से नीचे सरका. उसने ब्रा से ही मिलती जुलती रंग की सुंदर सी पैंटी पहनी थी जो कि उसके गोरे बदन को और चमका रही थी. मैंने उसकी जांघों को अपनी टांगों से कांपते हुए महसूस किया. शायद वो पहली बार का डर था.

मैं उसे एक पल के लिए भी छोड़ना नहीं चाहता था. उसके स्तनों पर मेरे मुँह की नमी अभी भी चमक रही थी, और मैं उसे सोफ़े की तरफ़ ले गया. मेरे साथ चलते हुए उसके पैर कांप रहे थे. मैंने उसे धीरे से कुशन पर पीछे की ओर धकेला. हाय उसका गोरा बदन...मुझे मदहोश किए जा रहा था. दीदी ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें मदहोश थी और साँसें तेज़ चल रही थी. वो मज़बूत और दबंग बहन, जिसे मैं हमेशा से जानता था, अब मेरे स्पर्श से पूरी तरह पिघल चुकी थी.


मैं: आप बहुत खूबसूरत हो, दीदी. मैं रुक नहीं सकता... मेरा मन ही नहीं भरता आपसे.


उसने अपनी पीठ को थोड़ा ऊपर उठाया, उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और अनजाने में ही वो मुझे अपने करीब बुला रही थी. मैंने एक आखरी बार और उसकी चुचियों का साथ नहीं छोड़ा और उसे चूसने लगा. क्योंकि मेरे लिए भी ये पहला मौका था जब मेरी बेहन अपनी इच्छा से मुझे अपनी इज्जत देने को तैयार थी.


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मैं उसे अभी पूरी तरह से नंगा नहीं करना चाहता था. शरीर के कुछ हिस्सों का ढका होना ज़्यादा कामुक लग रहा था. मैं उसके पैरों के बीच घुटनों के बल बैठ गया, मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. मैंने उसकी पैंटी की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन उसे उतारने के बजाय, मैंने अपनी उंगलियों से कपड़े को एक तरफ खिसका दिया.


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जो नज़ारा दिखा, वो दिलकश था. उसकी कुंवारी चूत, गुलाबी, तंग और उत्तेजना की साफ, मीठी नमी से चमकती हुई. मैं आगे झुकता हुआ अपनी जीभ को एक नरमी के साथ उसके चूत की कली (क्लिटोरिस) पर दबाया.


कुसुम दीदी: आह्ह्ह… ये क्या...रुक... नहीं, प्लीज... आह्ह!

उसके गांड ऊपर की ओर उछले. मैंने धीरे-धीरे और लंबे स्ट्रोक्स के साथ उसे चाटना शुरू किया, उसके स्वाद का मज़ा लेते हुए. ये मम्मी के स्वाद से अलग था. जहाँ मम्मी की चूत में एक परिपक्व, भारी कस्तूरी जैसी गंध थी जो मुझे बेकाबू कर देती थी, वहीं कुसुम दीदी का स्वाद हल्का, मीठा और ताजगी भरा, मासूम खुशबू वाला था, जो किसी वर्जित फल जैसा महसूस होता था.

मैंने उसकी गुहारों को नज़रअंदाज़ किया और
मेरी जीभ उस चूत के संवेदनशील हिस्से के चारों ओर घूमती रही और फिर उसकी परतों के भीतर गहराई तक चली गई. मैं उसके रस का स्वाद ले सकता था, उसकी कुंवारपन का नमकीन और मीठापन, और यह अद्भुत लग रहा था. दोनों की अपनी-अपनी खासियतें थी. मम्मी की अनुभवी गर्मी और दीदी की तंग, ताज़ी मिठास. और उन दोनों को अपने वश में करने के ख्याल से ही मेरा लंड दर्दनाक हद तक तड़पने लगा.

जैसे-जैसे मैं उसकी चूत को चाटता और चूसता गया, दीदी पिघलती गई. उसने मुझे दूर धकेलने की कोशिश छोड़ दी, बल्कि, उसकी उंगलियों ने मेरे बालों को कसकर पकड़ लिया और मेरे चेहरे को अपनी जांघों के बीच और ज़ोर से दबाया.

मैं एक पल के लिए पीछे हटा और मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा, मेरा मुंह उसके रस से गिला हो चुका था.
उसने नीचे मेरी ओर देखा, उसने देखा कि उसके भाई का चेहरा उसकी चूत के रस से गिला हो गया है.


मैं: क्या आपको अब भी लगता है कि ये गलत है, दीदी?
कुसुम दीदी: मुझे इस बात से नफ़रत है कि मुझे ये कितना पसंद आ रहा है.

तनाव अपनी चरम सीमा पर था. मैं खड़ा हुआ और जल्दी से अपने कपड़े उतार दिए, जिससे मेरा लंड बाहर आ गया. वो पत्थर की तरह सख्त था. दीदी उसे पहली बार देखकर ठिठक गई, उसकी सांसें थम गई. उसने कभी किसी पुरुष का लंड इतनी करीब से नहीं देखा था, अपने भाई का तो बिल्कुल नही. वो उसे एकटक देखती रही, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई. वो उसके आकार और उसकी मर्दानगी से मंत्रमुग्ध हो गई थी. मैं और करीब आया, मेरे लंड का सिरा लगभग उसकी जांघ को छू रहा था.

मैं: इसे छुओ, दीदी. ये आपके लिए है.

वो एक पल के लिए हिचकिचाई, फिर, धीरे-धीरे, उसकी उंगलियां आगे बढ़ीं. जब उसने पहली बार मेरे लंड की गर्म, मखमली त्वचा को छुआ, तो उसके मुँह से एक हल्की सी सिसकारी निकली. उसने अपना हाथ मेरे लंड के चारों ओर लपेटा. शुरुआत में उसकी पकड़ झिझक भरी थी, लेकिन जैसे ही उसने लंड के तनाव की गर्मी और सख्ती को महसूस किया, उसकी पकड़ कसती चली गई.


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जब उसने अपना हाथ ऊपर-नीचे चलाना शुरू किया, उसके चेहरे पर कामुकता के भाव उभर आए. वो उस एहसास से सम्मोहित थी, जिस तरह उसकी हथेली के नीचे लंड की नसें धड़क रही थी. अब हालात पूरी तरह बदल चुके थे. अब वो उस चरम सुख को पाने के लिए बेताब थी जो सिर्फ़ मैं ही दे सकता था.

कुसुम दीदी: (बहुत धीमी आवाज में) ये... बहुत बड़ा है. मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं ये कर रही हूँ!

मैंने नीचे झुककर उसकी ठोड़ी पकड़ ली और उसे मेरी आँखों में देखने के लिए मजबूर किया. वो अब मेरी थी, आनंद और वर्जित के रोमांच से टूट चुकी थी. मैंने उसकी पैंटी उतारते हुए उसके पैरों को और चौड़ा किया, उसकी उत्तेजना की गंध मेरी नाक में भर गई, और मैं जानता था कि चाटना तो बस शुरुआत थी. मैं अपने लंड के चारों ओर उस कसी हुई, कुंवारी गर्मी को महसूस करना चाहता था.

मेरे लंड में बढ़ रहे दबाव को मैं और नहीं रोक पा रहा था. नीचे दीदी को देखा, उसके पैर फैले हुए थे और उसकी कुंवारी चूत चमक रही थी. मैंने उसके गरम गांड को मज़बूती से पकड़ा, मेरी उंगलियाँ उसकी मुलायम गांड में धंस गई, और मैंने अपने लंड के अगले हिस्से को उसके तंग, चूत के संकरे रास्ते पर रखा. उसकी आँखें फैल गई जब उसने अपनी वर्जिनिटी की रुकावट के ख़िलाफ मेरे दबाव को महसूस किया. उसने तेज़ी से अपना सिर हिलाया, उसकी आँखों में डर की एक झलक लौट आई.


कुसुम दीदी: नहीं... आशीष, रुक! मैंने कभी... इससे दर्द होगा! प्लीज, रुक.
मैं: श्श्श्श...डरो मत कुछ नहीं होगा...

मैंने धीरे-धीरे लंड आगे बढ़ाया, मेरा लंड का मोटा सुपाड़ा उसके चूत के नाजुक गुलाबी पंखुड़ियों को फैला रहा था. हल्का सा जोर देते हुए मैंने मेरे लंड के सुपाड़े को अंदर घुसाने की कोशिश करने लगा, उसके मुँह से एक तीखी, ऊँची चीख निकली, और उसकी पीठ सोफ़े से ऊपर की ओर मुड़ गई.



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कुसुम दीदी: आह...! रुक! दर्द हो रहा है! ओह भगवान, ओह!!

मैं रुका रहा, हिलना-डुलना बंद कर दिया क्योंकि मुझे उसके शरीर में कंपन महसूस हो रहा था. मुझे उसकी चूत की गर्मी और कसाव महसूस हो रहा था, घर्षण बहुत तेज़ था. वो हल्की-हल्की सिसक रही थी, शुरुआती खिंचाव का दर्द उसे परेशान कर रहा था. मैं नीचे झुका और उसे गहराई से चूमा, उसका ध्यान भटकाने के लिए और किसी तरह की आवाज ना हो उससे बचने के लिए अपनी जीभ उसके मुँह में घुमाई, जबकि मेरे शरीर का निचला हिस्सा लगातार और ज़ोरदार दबाव डालता रहा.


मैं: (उसके होंठों के पास दबी हुई आवाज़ में) शशश... बस साँस लो, दीदी. अच्छा लगने लगेगा.


मैंने अचानक एक मज़बूत धक्का दिया, और अंदर धकेला. जब मैंने उसकी सील को तोड़ा तो मुझे एक साफ़ आवाज़ सुनाई दी. उसी वक्त मैंने अपना मुंह उसके मुंह पर दबा दिया जिससे कि उसकी आवाज दब जाए. उसकी उंगलियाँ मेरे कमर को कसकर पकड़ रही थी और उसके नाखून मेरी त्वचा में गड़ रहे थे जो कि मुझे खरोच भी रही थी.


कुसुम दीदी: नहीं इसे निकाल...आह! ओह भगवान! ओह... ये... ये मुझे फाड़ रहा है!

मैं वहीं जमा रहा, उसके अंदर आधा घुसा हुआ, ताकि उसका शरीर इस नए अनुभव के साथ तालमेल बिठा सके. कसाव अविश्वसनीय था. मम्मी की चूत की तुलना में कहीं ज़्यादा तंग. ऐसा लग रहा था जैसे मैं गर्म, मखमली रेशम में लिपटा हुआ हूँ जो मुझे छोड़ना नहीं चाहता था.

धीरे-धीरे, चीखें लंबी, कांपती हुई कराहों में बदल गई. तेज़ दर्द कम होने लगा था. मैंने बस कुछ इंच आगे-पीछे हिलना शुरू किया, ये देखने के लिए कि उसे कैसा लग रहा है. हर छोटी हरकत पर उसकी सांसें तेज़ हो जातीं. उसकी आवाज़ दर्द भरी चीख से बदलकर उलझन भरे मज़ा की कराह में बदल जाती.


कुसुम दीदी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह... ऐसा लग रहा है... अहह...जैसे सब कुछ भरा हुआ है. मुझे यकीन नहीं हो रहा...कि तु मेरे अंदर है.
मैं: हां दीदी देखो मैं आपको चोद रहा हूं.
कुसुम दीदी: इश्श्श्श्श...चुप हो जा!
मैं: अब क्या शर्माना? आप तो मेरी जान हो.
कुसुम दीदी: उम्म्म्म्म...

मैंने रफ़्तार बढ़ाई, लगभग पूरी तरह बाहर निकलकर फिर से अंदर धकेलने लगा. जांघों के उसके गांड से टकराने की आवाज सुनाई देने लगी. दीदी का मज़ा उस बचे-खुचे दर्द पर हावी होने लगा था.


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कुसुम: आह! हाँ... थोड़ा धीरे. आह्ह्ह…आह्ह्ह… मम्मी और रीना पीछे आंगन में है!

सेक्स सम्मोहक हो गया था, गर्मी और वर्जित घर्षण का एक धुंधला सा एहसास. मैं उसे पूरे रंग में चोद रहा था. हम दोनों हवस में डूब चुके थे.

कुसुम दीदी: ओह, आशीष... और! ओ माय गॉड! आह...
मैं: हाँ दीदी...हाँ, देखो, आपका भाई आपकी चूत चोद रहा है...
कुसुम दीदी: ऊऊह्ह्ह्ह…तेरा बहुत बड़ा है सच में!
मैं: क्या दीदी?
कुसुम दीदी: कुछ नहीं.
मैं: बोलो ना...
कुसुम दीदी: नहीं...

मैंने लंड को पूरा बाहर निकालते हुए एक जोरदार धक्का मारा. जिससे लंड पूरा उसकी चूत की गहराई में घुस गया.

कुसुम दीदी: आह्ह्ह्हह…….नही…रुकक्क…..आअह्ह्ह्ह!!!
मैं: अब बोलो क्या बड़ा है?
कुसुम दीदी: (सीसकते हुए) अहह...उन्ह..

एक और जोरदार लंड का झटका,

कुसुम दीदी: आह्ह्ह्हह……हाँ...तेरा लंड बड़ा है! आह्ह्ह्हह...धीरे करना प्लीज!

मेरा लंड उसके तंग चूत की सुरंग में फिसल रहा था और हर धक्के के साथ उसे फैला रहा था. उसकी कराहें तेज़ हो गई, जो मेरे धक्कों की गति के साथ तालमेल बिठा रही थी.

कुसुम दीदी: ओह... आह...ऊऊह्ह्ह्ह…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह……... हाँ! और!

वो अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थी, उसका शरीर तन रहा था, और उसकी साँसें छोटी, तेज़ सिसकियों में बदल रही थी.

मैंने अपनी रफ़्तार बढ़ाई, मेरे झटके हल्के और तेज़ हो गए, जो उसके चूत के मुहाने पर ज़ोर से लग रहे थे. दीदी उस एहसास में पूरी तरह खो गई थी, चरम सुख तक पहुँचते ही उसकी आवाज़ काँपने लगी. एक लंबी, सुरीली और परमानंद भरी कराह जो किसी समर्पण जैसी लग रही थी.



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कुसुम दीदी: हाँ...आंह...ओह! मैं... आह्ह्ह्हह……


उसकी अंदरूनी मांसपेशियों ने मेरे लंड को ज़ोरदार और लयबद्ध तरीके से जकड़ लिया, जैसे सारा रस निचोड़ रही हों. मैं जितनी गहराई तक जा सकता था, एक आखिरी ज़ोरदार झटका दिया और उसके अंदर स्खलित हो गया. मैंने महसूस किया कि मेरा गर्म वीर्य उसकी कुंवारी कोख में भर रहा है, उसे पूरी तरह से भर रहा है. हम एक-दूसरे से सटकर गिर पड़े, पसीने और शारीरिक तरल पदार्थों से भीगे हुए, हमारी साँसें तेज़ और एक जैसी चल रही थी. कुसुम दीदी वहीं लेटी रही, थकी हुई और निढाल, उसके होंठों पर एक छोटी सी, संतुष्ट मुस्कान थी. दर्द गायब हो चुका था.

बारिश की वो ठंडी हवा हम दोनों के बदन को धीरे-धीरे ठंडा कर रही थी, जहाँ मैं और दीदी एक-दूसरे से लिपटे हुए लेटे थे. हवा में सेक्स और पसीने की महक घुली हुई थी. दीदी की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं और वो छत की ओर देख रही थी. उसकी आँखों में हैरानी और नए-नए मिले सुख का मिला-जुला भाव था. काफी देर तक हममें से किसी ने कुछ नहीं कहा. हमने जो किया था, उसका डर एक भारी चादर की तरह हम पर छाया हुआ था, फिर भी हमारे बीच एक गुप्त अपनापन और बिजली जैसी सिहरन महसूस हो रही थी.


कुसुम दीदी: मुझे यकीन नहीं हो रहा कि हमने सच में ऐसा किया, आशीष. अगर मम्मी को पता चल गया... हे भगवान, वो तो हमें मार ही डालेंगी.

मैंने उसके माथे को चूमा, मेरी आवाज़ धीमी और उसके मन को शांत करने वाली थी.

मैं: उन्हें पता नहीं चलेगा. ये हमारा राज़ है, दीदी.

अगला कुछ पल हमने जल्दबाजी और घबराहट भरी खामोशी में खुद को साफ-सुथरा करने में बिताया. कुसुम दीदी बहुत संभलकर चल रही थी. पैरों के बीच हो रही तकलीफ उसे हर उस चूदाइ के झटके की याद दिला रही थी जो अभी-अभी हुई थी. उसने जल्दी से कपड़े पहने, अपनी कुर्ती ठीक की. उसका चेहरा शर्म से लाल हो रहा था. जब हम कमरे से बाहर निकले, तो घर के पिछले हिस्से से आवाज़ें आ रही थीं. मम्मी और रीना बागान में साफ सफाई कर रही थी और पौधे लगा रही थी. उनके काम-काज का सामान्य माहौल, घर के अंदर अभी-अभी हुई उस चूदाइ से बिल्कुल अलग था. कुसुम दीदी ने इस माहौल में घूलने मिलने की कोशिश की.


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कुसुम दीदी: आप लोग अभी तक मेहनत कर रहे हैं.
मम्मी: हां बारिश का मौसम है. सोचा कुछ नए फूल और कुछ पौधे लगा देते हैं, तो जल्दी खिल जाएंगे.
आशीष की पढ़ाई पूरी हो गई?

रीना दीदी: ध्यान देना आजकल ज्यादा बदमाश हो गया है. पढ़ाई में तो मन ही नहीं लगता, पता नहीं कहां खोया रहता है.
कुसुम दीदी: नहीं-नहीं, आप टेंशन मत लो मैं हूं ना.


सूरज ढलने के साथ ही घर में रात के खाने की तैयारी शुरू हो गई. मैंने दरवाज़े से देखा कि मम्मी और रीना दीदी अंदर आई, उनके कपड़ों पर धूल लगी थी और वे थकी हुई लेकिन खुश लग रही थीं. कुसुम दीदी किचन में मम्मी की मदद कर रही थी. वो बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थी. उसके हाव-भाव सहज थे और आवाज स्थिर थी जब वो उन सब्ज़ियों के बारे में बात कर रही थी जो उन्होंने तोड़ी थी. उसे देखना दिलचस्प था, वही लड़की जो कुछ घंटे पहले ही मेरे नीचे चरम सुख में चीख रही थी, अब एक आज्ञाकारी बेटी और बहन की तरह लग रही थी. मैं कमरे में मौजूद तीनों महिलाओं के बीच छिपी हुई भावनाओं को महसूस कर सकता था. उनमें से किसी को भी एक दूसरे के बारे में ये नहीं पता था कि मैं उनके परिवार की पवित्रता को पहले ही भंग कर चुका था.

मैंने अपनी सबसे बड़ी बहन रीना की ओर देखा. कुछ दिन पहले, मुझे वो अकेली मिली थी और मैंने अपनी उंगलियाँ उसकी शर्मीली चूत में डाल दी थीं. उसने कुसुम दीदी की तरह मुझसे ज़्यादा विरोध नहीं किया था.

रीना दीदी मेरी नज़र को भांपते हुए, उसने तुरंत नज़रे हटा ली और उसके गाल हल्के गुलाबी हो गए. वो तेज़ी से बातें करने लगी, उसकी आवाज़ सामान्य से थोड़ी ऊँची थी.


रीना दीदी: क्या तुमने पड़ोसी की नई कार देखी, कुसुम? मिसेज शर्मा सुबह से ही उसकी डींगें मार रही थीं. सच कहूँ तो, जिस तरह से वो बात करती हैं, लगता है जैसे उन्होंने लॉटरी जीत ली हो!

वो इधर-उधर की बातें कर रही थी, छोटी-मोटी गपशप का इस्तेमाल उस याद को छिपाने के लिए कर रही थी जब मेरी उंगलियों ने उसे फैलाया था. फिर भी जब उसे लगता कि कोई नहीं देख रहा है, तो वह बार-बार मेरी ओर देख लेती थी.

हम डिनर के लिए टेबल पर बैठे थे, कुछ पल के लिए सिर्फ प्लेटों पर चम्मचों के टकराने की आवाज़ आ रही थी. मम्मी टेबल के सबसे आगे बैठी थीं, उनके चेहरे पर सोच-विचार के भाव थे. उन्होंने दोपहर का काफ़ी समय नैना आंटी के साथ फ़ोन पर बिताया था, और उन बातचीत का असर उनके मुझे देखने के अंदाlज़ में साफ दिख रहा था. उनकी आँखों में एक प्यास थी, एक ऐसी उत्सुकता जो बेताबी की हद तक पहुँच रही थी. मम्मी मुझे चाहती थी. नैना आंटी के उकसाने वाले सुझावों ने उन्हें तैयार कर दिया था, और उनके अकेलेपन ने उस आग को और भड़का दिया था, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब नामुमकिन था. लेकिन वो एक माँ के तौर पर अपनी भूमिका में फंसी हुई थी. वो कभी मेरे होंठों को देखतीं, तो कभी मेरी छाती को. उनका हाथ पानी के गिलास को जरा ज़्यादा ही कसकर पकड़े हुए था. वो हाथ बढ़ाकर मुझे छूना चाहती थीं, यह जानना चाहती थीं कि जो गर्मी वो महसूस कर रही थीं, क्या वैसी ही गर्मी मुझमें भी है. लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि परफेक्ट माँ की छवि को तोड़े बिना इस दूरी को कैसे मिटाया जाए.


मम्मी: (गला साफ़ करते हुए) आशीष, तु आजकल बहुत चुप-चुप रहता है. क्या तुझे कोई परेशानी है? या फिर... तेरे मन में कुछ और चल रहा है?

ये सवाल टटोलने जैसा था, एक बुलावा था. वो माहौल को भांप रही थीं, उम्मीद कर रही थी कि मैं उन्हें कोई इशारा दूँ कि मुझे उनकी चाहत का पता है. कुसुम दीदी ने ऊपर देखा, उसके होंठों पर एक छोटी सी, छिपी हुई मुस्कान थी जब उसने मम्मी से मेरी तरफ़ देखा. वो जानती थी कि मैंने पहले ही उसे अपना बना लिया था, और वो हमारी मम्मी के अंदर उमड़ती उस कच्ची चाहत को देख सकती थी.

मैंने मम्मी की आँखों में सीधे देखा, मेरे होंठों के कोने पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई.


मैं: सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा है, मम्मी. बस... आजकल मैं बहुत सी नई चीज़ें खोज रहा हूँ.

उस बात का दोहरा मतलब हवा में तैर रहा था. रीना दीदी घबराहट में खिलखिलाकर हँसी और अपनी सीट पर थोड़ी हिली-डुली, जबकि मम्मी की साँसें थम सी गई. डिनर चलता रहा, पारिवारिक मेल-जोल का दिखावा, जिसके पीछे वर्जित वासना का तूफ़ान छिपा था. तीन औरतें, एक घर, और एक बेटा जो उनकी दुनिया का गुप्त केंद्र बन चुका था. हर एक के मन में वर्जित इच्छा का एक अलग रंग था.
 
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अगले दिन मैं मम्मी के आंखों में उस प्यास को तलाश करने लगा जो उसने नैना आंटी के साथ बात करते वक्त जिक्र किया था. लेकिन मम्मी की बातें कहीं उलझी हुई नजर आ रही थी. मम्मी इतनी जल्दी मानने वालों में से तो नहीं है. जब भी नैना आंटी उसे बेटे के बारे में कहती तो मम्मी का विरोध बढ़ जाता था. क्योंकि वो अभी भी ऐसे रिश्ते के खिलाफ थी.

मैं सुबह बैठ पढ़ाई कर रहा था और कुसुम दीदी मेरे सामने, एक बिना स्लीव वाली टॉप में बैठी थी. मेरा मन पढ़ाई में कम मम्मी की बातों में और उसकी चाहत में ज्यादा था. तभी मेरी नजर कुसुम दीदी के छाती पर पड़ा जहां उसकी चूचियां टॉप से ढकी हुई थी. लेकिन वो ढकी होने के बाद भी काफी आकर्षक लग रही थी. मेरी नजर उन पर टिक गई और कुछ पल के लिए मैं भूल गया कि मैं पढ़ने बैठा हूं.

अपनी मम्मी की छिपी हुई कामुकता का ख्याल एक चिंगारी की तरह था, और अब अपनी बहन को देखकर मुझे अपने लंड में एक गर्माहट महसूस हो रहा था. मैं बस उसे देखता रहा, एक मूर्ति के तरह बैठा हुआ, उसके सीने को निहारता रहा. दीदी ने भी इस बात पर ध्यान दिया कि मैं उसके स्तनों को देखने की कोशिश कर रहा हूं. उसने तुरंत चुटकी बजाते हुए मेरा ध्यान तोड़ दिया.


कुसुम दीदी: (धीमी लेकिन गुस्से भरी आवाज में) क्या देख रहा है?
मैं: कुछ भी तो नहीं. बस ऐसे ही कुछ सोच रहा था.
कुसुम दीदी: बहुत सोचता है तू. पिछले 10 मिनट से देख रही हूं इस एक पन्ने को खोलकर बैठा हुआ है. तू पढ़ाई कर भी रहा है या फिर नौटंकी.


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मैं फिर से अपना ध्यान पढ़ाई की ओर किया. कुछ देर बीते लेकिन मन नहीं माना, मम्मी के किचन में खाना बनाने का आवाज बार-बार मेरे कानों में आ रहा था. जिसकी वजह से मेरा मन बेचैन था और जल्दी से उसे मिलने का बहाना ढूंढने लगा.

मैं: दीदी मैं आता हूं पानी पीकर. मुझे बहुत प्यास लग रही है.
कुसुम दीदी: ठीक है जा...

मैं जल्दी से उठ खड़ा हुआ और किचन की तरफ जाने लगा. मेरे दिमाग में चल रही उथल-पुथल शांत होने का नाम नहीं ले रही थी. जब भी कमरा शांत होता, मम्मी और नैना आंटी की आवाज़ की रिकॉर्डिंग मेरे दिमाग में बार-बार बजने लगती. जैसे ही मैं किचन में दाखिल हुआ, मैंने उन्हें देखा. मम्मी काउंटर के पास खड़ी थीं और उनकी पीठ मेरी तरफ थी.

वो अभी मुझे नजरअंदाज कर रही थी. मैंने फ्रिज से पानी लिया और उसे घूरते हुए पी रहा था. उसका ध्यान बिल्कुल मेरी तरफ नहीं था. वो खाना बनाने में व्यस्त थी. पानी पीकर मैं ग्लास रखा और अचानक उसके करीब जाकर उसकी कमर में हाथ डालकर अपनी ओर खींचा जिससे उसके बदन में सिहरन पैदा हो गई. वो चौंक गई और अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया. मेरी गर्म साँसें उसकी गर्दन पर महसूस हो रही थी. मैंने वक्त ना बर्बाद करते हुए तुरंत झुका और अपने होंठ उसके कान के ठीक नीचे टिका दिए.



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मैंने उसके गाल और फिर उसके जबड़े पर ज़बरदस्ती चुम्मा लेने लगा और आखिर में उसके होठ चुम लिया.

मैं: आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो?
मम्मी: तेरी इसी लक्षण की वजह से...तूने समझ कर क्या रखा है मुझे? जब जो चाहे वो कर देगा?
मैं: क्यों मजा नहीं आया था आपको पिछली बार?
मम्मी: (गुस्से में) छोड़ मुझे.

वो यह सब कह रही थी लेकिन मैं फिर भी उसे चूमता रहा. मैंने उसका सिर पीछे की ओर झुकाया और अपने होंठों को उसके होंठों पर ज़ोर से दबाया. वो एक कामुक और ज़बरदस्त चुंबन था. एक पल के लिए वो जम सी गई, उसके होंठ कसकर भिंचे हुए थे. लेकिन फिर, जैसे कुछ टूट गया ओर उसके होंठ नरम पड़ गए.


जैसे ही हमारा चुंबन गहरा हुआ और मुझे महसूस हुआ कि उसका शरीर मेरे शरीर से सटकर पिघलने लगा है, तभी दरवाज़े की तरफ से आई आहट की आवाज ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए. मैंने तुरंत चुम्मा लेना छोड़ दिया लेकिन इससे पहले कि मैं पीछे हट पाता, कुसुम दीदी दरवाजे पर खड़ी हो गई. वो मेरे पीछे-पीछे आई थी. मैंने उससे कहा था कि मैं बस पानी लेने जा रहा हूं, लेकिन उसे ज़रूर एक अजीब एहसास हो गया होगा जो मुझमें पूरे दिन से थी. उसने चुम्मा करते हुए तो नहीं देखा, मैं सही समय पर पीछे हट गया था. लेकिन उसने हमारी पोज़िशन ज़रूर देख ली थी. उसने देखा कि मैं मम्मी को पीछे से पकड़े हुए था और मेरे हाथ उसके गांड पर इस तरह से थे जो एक माँ और बेटे के रिश्ते के हिसाब से बहुत ज़्यादा अंतरंग थे.



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मम्मी ने जल्दी से अपनी साड़ी ठीक की, उसके हाथ बुरी तरह कांप रहे थे. उसने न तो मेरी तरफ देखा और न ही कुसुम दीदी की तरफ. वो खाना पकाने में व्यस्त होने का दिखावा करने लगी. मुझे लगा था कि दीदी पापा को फ़ोन करेंगी, या मुझे थप्पड़ मारेंगी, या चिल्लाने लगेंगी कि मैं कितना बुरा हूं. लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया. वो बस वहीं खड़ी रही, उसकी नज़रें मुझ पर और मम्मी पर घूम रही थी. उसके चेहरे पर डर के भाव नहीं थे, वो कुछ ज़्यादा ही पेचीदा बात थी. दीदी बस मुड़ी और किचन से बाहर चली गई.

कोई प्रतिक्रिया न होना, आमना-सामना होने से भी ज़्यादा डरावना होता है. एक घंटा बीत गया, मम्मी अपने कमरे में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया. मैं दीदी के साथ लिविंग रूम में बैठा था. उसके बाद वो भी अपने कमरे में जाने के लिए उठी, लेकिन जाते-जाते उसने गंभीरता से कुछ कहा.


कुसुम दीदी: तुझसे मैं शाम को बात करती हूं.

ये वाकई में एक डरावना पल था. जो चीज छुपे तौर तरीके से होना चाहिए था वो अब एक और गलत दिशा में जा रहा था. लेकिन कुसुम दीदी का सामना करना मेरे लिए शेर का सामना करने के बराबर था. न जाने उसने क्या-क्या सोच लिया होगा. मैं अपने कमरे में गया लेकिन बेचैनी बरकरार थी. मैं बस शाम होने का इंतजार कर रहा था की कुसुम दीदी आखिर क्या करेगी.

वक्त बिता गया और धीरे-धीरे शाम का समय आ गया. तभी मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई. मैंने घबराते हुए दरवाजा खोला तो सामने कुसुम दीदी थी.


कुसुम दीदी: यहां नहीं, चल छत पर बात करना है.

छत पर पहुंचते ही मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था, कुसुम दीदी ने अपनी पूछताछ शुरू की.

कुसुम दीदी: मुझे जवाब दे, तु मम्मी को उस तरह क्यों पकड़े हुए थे? मैंने तेरे हाथ उनकी कमर पर देखे. मैंने देखा कि तु अपना शरीर उनके शरीर से सटा रहा था. वो कोई गले मिलना नहीं था. न ही तु उन्हें सहारा दे रहा था. वो कुछ और ही था.
मैं: मैं बस खाने के बारे में पूछ रहा था.
कुसुम दीदी: मुझसे झूठ मत बोल. हमारे बीच जो हुआ, उसके बाद तो बिल्कुल नहीं. क्या तुझे लगता है कि मैं भूल गई हूँ? मुझे वो किस याद है. मुझे याद है कि तुने मुझे किस नज़र से देखा था, और कैसे तुने मेरे साथ हदें पार करने की कोशिश की थी.


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मैं: मैं क्या करूं मैंने अपना हाल आपको समझाया था पहले भी. ये लकीरें किसने खींची हैं? समाज ने? किसी पुरानी किताब ने? मैं एक मर्द हूँ, दीदी.
कुसुम दीदी: आशीष, तु अभी मर्द' नहीं बना है. तु एक ऐसा लड़का है जो अपनी भावनाओं के बहकावे में आकर खुद को बर्बादी की कगार पर ले जा रहा है. ये ज़रूरतों की बात नहीं है. ये डिसिप्लिन की कमी है.
मैं: दीदी, मुझे बस एक पार्टनर चाहिए! कोई ऐसा जिसे मैं छू सकूँ, और जो मेरे अंदर की इस तड़प को शांत कर सके. मैं जवान हूं और ऐसे घर में फंसा हुआ हूं जहाँ सब ऐसा दिखावा करते हैं जैसे सेक्स जैसी कोई चीज़ ही नहीं होती.
कुसुम दीदी: तुझे फिर थप्पड़ खाना है? क्या बोल रहा है तू? थोड़ी भी शर्म नहीं अपनी बेहन से किस तरह बात करना है.
मैं: तो आप ही बताओ मैं क्या करूं?
कुसुम दीदी: तो ठीक है मैं अब खुल कर बात करती हूं.

उसके लहजे में गुस्से की जगह एक सख्त, बड़ी बहन जैसी सिख थी.

मैं: मुझे लगा था कि आप बहुत गुस्से में होगे. लेकिन आप तो बस... शांति से मुझे सब समझा रहे हो. मुझे समझ नहीं आ रहा.
कुसुम दीदी: मेरी शांति को माफ़ी मत समझना. मैं गुस्से में हूँ. मेरा गुस्सा उससे कहीं ज़्यादा है.
मैं: तो फिर आप चिल्ला क्यों नहीं रही हो?
कुसुम दीदी: क्योंकि तुझे पीटने या तुझ पर चिल्लाने से कोई हल नहीं निकलेगा. इससे तेरे दिमाग़ में चल रहे विचार नहीं मिटेंगे, और न ही इस घर का माहौल ठीक होगा.
मैं: कुसुम... दीदी... अगर आप सच में समझती हैं, तो प्लीज. मैं यह अकेले नहीं कर सकता. मैं इन इच्छाओं से अकेले नहीं लड़ सकता. मुझे लगता है कि मैं पागल हो रहा हूँ.
कुसुम दीदी: तु मुझसे क्या कह रहा है, आशीष?
मैं: मुझे आपके साथ की ज़रूरत है. सिर्फ़ एक ऐसी बहन के तौर पर नहीं जो मुझे पढ़ने के लिए कहती है, बल्कि एक ऐसी इंसान के तौर पर जो जानती है कि यहाँ फँसे होने का क्या मतलब है. मेरी मदद करो.


मैं दीदी के चेहरे पर चल रही उथल-पुथल देख सकता था. उसका सख्त चेहरा ढीला पड़ रहा था, और उसमें एक ऐसी उत्सुकता और कमज़ोरी दिख रही थी जो बिल्कुल मेरी जैसी थी.

कुसुम दीदी: तु उस इंसान से साथ माँग रहा है जिसे तुने बहकाने की कोशिश की थी.
मैं: क्योंकि सिर्फ आप ही जानती हैं. सिर्फ आप ही हैं जो दिखावा नहीं कर रही है.
कुसुम दीदी: अपने कमरे में जा, अभी मैं कुछ नहीं कह सकती. लेकिन हम इस बारे में फिर बात करेंगे. चेतावनी के तौर पर नहीं, बल्कि बातचीत के तौर पर. बस... मम्मी को तब तक दोबारा मत छूना जब तक मैं तुझे न बताऊँ कि इसे कैसे संभालना है.


मैंने सिर हिलाया, मेरे दिमाग में कई बातें चल रही थी. मैं वापस अपने कमरे में गया, लेकिन अब जीत का एहसास कुछ अलग था. मैं सिर्फ सज़ा से ही नहीं बचा था, मुझे उसी इंसान में एक साथी मिल गया था जिसे मुझे रोकना था और जो इस खेल में मेरे लिए सबसे बड़ी दुश्मन थी.

रात के वक्त, जो रिकॉर्डिंग बची थी मैं उसे सुनने के लिए बेचैन था. इसीलिए मैंने ध्यान लगाते हुए फिर से सुनना शुरू किया.


नैना: सीमा, तुम्हारी आवाज़ थोड़ी ठीक से नहीं आ रही है.
मम्मी: हेलो, अब सुनाई दे रहा है?
नैना: हां हां बोलो. फ्री हो गई सारे कामों से?
मम्मी: हां वही रोज रोज के काम. मैं तो वही सोच रही थी, मैं तय नहीं कर पा रही हूं कि तुम सही हो या गलत. एक औरत होने के नाते मैं जानती हूं कि तुम्हारी शारीरिक मजबूरियां रही होगी.
नैना: सच बताओ, पति के दूर होने पर तुम असल में कैसे मैनेज कर रही हो?
मम्मी: (लंबी सांस लेते हुए) मैं ठीक हूँ, नैना. सच में. मैं अपनी बेटियों और आशीष के साथ खुश हूँ, घर में शांति है... लेकिन झूठ नहीं बोलूँगी, कभी-कभी अकेलापन बहुत महसूस होता है. दो महीने हो गए हैं, बिस्तर का एक हिस्सा खाली रहते हुए.
नैना: मैं तुम्हारी आवाज़ से समझ सकती हूँ. तुम किस चीज की कमी महसूस कर रही हो.
मम्मी: मुझे बस उनकी मौजूदगी की कमी खलती है. उनके साथ की. लेकिन अजीब बात है... मुझे लगता है कि मैं कहीं खो रही हूँ. तुम ये कैसे करती हो, नैना?
नैना: खुद से सच कहो. तुम्हारा दिल तो तुम्हारे पति को याद करता है, पर तुम्हारा शरीर? तुम्हारी चूत तड़प रही है, है ना? वो गहरी, कसकती हुई तड़प जो सिर्फ़ इसलिए नहीं जाती कि तुम किसी ऐसे इंसान से प्यार करती हो जो हज़ारों मील दूर है.
मम्मी: (हैरानी से) "नैना! प्लीज़... यह अश्लील है.
नैना: किसके लिए अश्लील है? दीवारों के लिए? हवा के लिए? हम औरतें हैं, अगर तुम उस तड़प को शांत नहीं करोगी, तो वह कड़वाहट में बदल जाएगी जो तुम्हें अंदर ही अंदर खोखला कर देगी.
मम्मी: ये नामुमकिन है. मैं एक माँ हूँ, एक पत्नी हूँ. मेरी एक इज़्जत है.
नैना: तुम्हें किसी अजनबी की ज़रूरत नहीं है, तुम्हें ऐसे इंसान की ज़रूरत है जो पहले से ही तुम्हारे आस-पास हो. जिस पर तुम भरोसा करती हो. जो तुम्हें वैसा ही देख सके जैसी तुम असल में हो.
मम्मी: मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम क्या कहना चाहती हो.
नैना: आशीष के बारे में सोचो. वो अब जवान हो गया है. मज़बूत और वो तुम्हारे साथ घर में ही तो रहता है.

ये हैरानी की बात थी. नैना आंटी की दी गई मम्मी को ऐसी सलाह की वो अपने बेटे से ही चूदवाले ले. मैं बता भी नहीं सकता उस वक्त इन दो औरतों की बातें सुनकर मेरे शरीर में कितनी बेचैनी थी.

मम्मी: (कुछ सेकंड की खामोशी) ...क्या?
नैना: जरा सोचो तो सही. उसे अपना दोस्त बनाओ. वो तुम्हें उस तरह समझ सकता है जैसा तुम्हारी बेटियाँ कभी नहीं समझ पाएँगी. वो तुम्हारी उन ज़रूरतों को पूरा कर सकता है और तुम्हारे राज़ को भी सुरक्षित रख सकता है.

मम्मी: नैना, ये बहुत ही भयानक बात है! वो मेरा बेटा है!
नैना: और वो एक मर्द भी है. कुदरत से क्यों लड़ना? जब समाधान तुम्हारे ही घर में मौजूद है, तो चुपचाप क्यों तड़पना?
मम्मी: ये गलत है! ये हमारी संस्कृति के खिलाफ और घिनौना है! हमारे समाज में, ये सबसे बड़ा पाप है. मैं आशीष को कभी भी उस नज़रिए से नहीं देख सकती.
नैना: तुम बहुत सोचती हो. मैंने समझाया था ना, संस्कृति बस उन लोगों के बनाए नियम हैं जो खुशी महसूस करने से डरते थे. तुम इसे पाप कहती हो, लेकिन मैं इसे आज़ादी कहती हूँ.
मम्मी: और वैसे भी... उसे पढ़ाई करनी है! उसकी पढ़ाई के लिए ये बहुत अहम समय है. उसे अपनी किताबों पर ध्यान देना चाहिए, न कि अपनी माँ की इच्छाओं पर!
नैना: तुम कहती हो कि उसे पढ़ाई करनी चाहिए. लेकिन मैं तुम्हें नौजवानों के बारे में एक राज़ की बात बताती हूँ... जब उनका तनाव दूर हो जाता है, तो वे कहीं बेहतर ढंग से पढ़ाई करते हैं.

आंटी की ये सब बातें सुनकर, मम्मी की आवाज में एक आह भरी थी.

मम्मी: तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो? तुम मुझे किसी ऐसी चीज़ की तरफ क्यों धकेलने की कोशिश कर रही हो जो इतनी... भयानक है?
नैना: क्योंकि मैं तुम्हारी परवाह करती हूँ, डार्लिंग. मैं भी इस रास्ते से गुज़री हूँ. जरा सोचो आशीष के चेहरे पर क्या भाव होंगे जब उसे पता चलेगा कि उसकी माँ सिर्फ़ उसकी देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत है जिसकी एक ऐसी प्यास है जिसे सिर्फ वही बुझा सकता है.
मम्मी: तुम्हारी बातें सुनकर मुझे लग रहा है कि मैं पागल हो जाऊँगी.
नैना: ये पागलपन नहीं है. क्या ये डर है? या फिर ये सोचो कि उसका जवान लंड तुम्हारी तड़पती हुई चूत में अंदर जा रहा है?
मम्मी: ये बहुत गलत है... मैं उसे देख भी नहीं सकती, बिना कुछ महसूस किए. मैं बहुत डरी हुई हूँ.
नैना: उसे कोई इशारा दो, सीमा. उस लड़के को वो आदमी बनने का मौका दो, जिसकी तुम्हें ज़रूरत है.
क्या अपने बेटे के बारे में सोचते हुए तुम्हारी उंगलियां उस गीलेपन में फिसल रही हैं?

मम्मी: हाँ... हाँ...भगवान मेरी मदद करे, मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूँ.
नैना: (संतुष्टि भरी आवाज़ में) हाँ, अब अपनी आँखें बंद करो. सोचो कि वो तुमसे कह रहा है कि वो अपनी माँ के साथ सेक्स करना चाहता है.
मम्मी: (ज़ोर से कराहते हुए, कांपती आवाज़ में) हे भगवान... आशीष... आह...... मैं नहीं कर सकती...
नैना: हाँ, तुम कर सकती हो. खुद को इसमें बहने दो. मैं तुम्हें कल फ़ोन करूँगी. अच्छी नींद लेना.

ये सब क्या था? बात इस हद तक गुजर गई थी और मुझे पता भी नहीं! वो तो अच्छा हुआ कि मैंने रिकॉर्डिंग सुन ली. लेकिन इसमें नैना आंटी का क्या फायदा हुआ? मेरे समझ में नहीं आ रहा था. क्या वो अपनी जैसी ही एक और औरत को बनाना चाहती थी या फिर वाकई में मम्मी को अपने अनुभव से मदद करना चाहती थी जैसा कि उसने कहा था.


मेरी हिम्मत पूरी तरह से बढ़ गई क्योंकि मैं समझ गया की मम्मी भी प्यासी है और रिकॉर्डिंग से यह साफ था कि उसने मेरा नाम लेते हुए अपनी चूत को सहलाया था. मेरा मन कर रहा था कि मैं तुरंत मम्मी के कमरे में जाकर उसकी सारी इच्छाएं पूरी कर दूं. लेकिन यहां मामला पेचीदा हो गया था. क्योंकि कुसुम दीदी ने भी मुझसे वादा करवाया था कि मैं मम्मी के साथ कुछ गलत ना करूं. मेरे हाथ में मेरे घर की तीनों औरतों का लगाम था और अब ये मेरे ऊपर निर्भर था पूरी तरह से, मैं किसको अपनी ओर पहले खींचना चाहता हूं. इसलिए मैंने यहां जोश से नहीं बल्कि होश में रहकर फैसला किया. फिलहाल कुसुम दीदी के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी और वो इकलौती थी जिसकी चूत का नशा मुझ पर हावी हो गया, इसीलिए उसका कहना मानना जरूरी था.

अगली सुबह हम सब नाश्ता करने के लिए बैठे थे और मम्मी नाश्ता परोस रही थी. कुसुम दीदी रह रहकर कोई मजाकिया बात कर दे रही थी और खास करके उसने मेरे नए हेयर स्टाइल का मजाक उड़ाया जिसकी वजह से माहौल काफी खुशियों भरा था सबके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी.



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मम्मी मुझसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी और अपनी जज्बातों को दबाए हुए हंस रही थी. इंतजार था कुसुम दीदी के अगले कदम का. रीना दीदी खूबसूरत काली कुर्ती में मेरे बगल में बैठी हुई थी. तभी मैंने टेबल के नीचे अपने पैरों से रीना दीदी के पैरों को सहलाने लगा. वो भी मुझे देखकर मुस्कुराई और आंखों आंखों से इशारा कर रही थी कि कोई देख लेगा. वो अपने पैरों से ही मेरे पैर को हटाने की कोशिश कर रही थी और मैं उसे छेड़े जा रहा था.


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नाश्ता खत्म होने के बाद रीना दीदी शर्मा कर चली गई. कुसुम दीदी अब भी वहीं पर थी मैंने उसे तुरंत पूछा,

मैं: दीदी आपने बोला था कुछ बताने को.
कुसुम दीदी: तू चल अपने कमरे में और पढ़ाई कर, मैं आती हूं.

दीदी का यह कहना, मैं तुरंत उठकर चला गया अपने कमरे के अंदर. कुछ देर बाद में कुसुम दीदी वहां पर आई, पीछे मुड़कर हल्के से क्लिक की आवाज के साथ दरवाजा बंद किया और सीधे मेरी कुर्सी के पास आकर मुझ पर झुक गई. मैंने भी किताबों को एक तरफ किया. मुझे उसके फूलों जैसी ताज़गी भरी खुशबू आ रही थी.


कुसुम दीदी: मैं ये देखने आई थी कि क्या तु सच में ध्यान दे रहा है, या तेरा मन अभी भी उन चीज़ों के बारे में सोच रहा है जिनके बारे में तुझे नहीं सोचना चाहिए.
मैं: मैं कोशिश कर रहा हूँ, दीदी. लेकिन ये मुश्किल है. जब भी मैं मम्मी को देखता हूँ, या जब भी आपको देखता हूँ... तो मुझे अपने सीने में एक अजीब सा दबाव महसूस होता है. एक बेचैनी.

उसकी नज़र मेरी पैंट में उभरे हुए हिस्से पर पड़ती है जो की लंड के तनाव के वजह से हुआ था. फिर उसने मेरी ओर देखा.


कुसुम दीदी: तु कितना साफ-साफ सब ज़ाहिर कर देता है.

मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया और झिझकते हुए उसकी कमर को पकड़ा और उसके साथ खड़ा हो गया.

मैं: मैं इसे अकेले नहीं संभाल सकता. आपने कहा था कि आप मेरा साथ दोगी. प्लीज़... मुझे बताओ कि क्या करना है.

मेरा हाथ अभी भी उसकी कमर में था और वह मेरे काफी करीब लेकिन वो एक इंच भी पीछे नहीं हटी.

कुसुम दीदी: सपोर्ट का मतलब ये नहीं है कि मैं बस हार मान लूंगी, आशीष. इसका मतलब है कि मैं तुझे सिखाऊंगी. मैं तुझे दिखाऊंगी कि इस भूख को कैसे कंट्रोल करना है... या इसे कैसे शांत करना है.

उसके यह कहते ही मैं अपना होंठ उसके होठों पर एकदम करीब ले गया इतना करीब कि हम दोनों की गर्म सांसे एक दूसरे के मुंह को गर्म कर रही थी.


मैं: मैं कुछ भी करूँगा. आप जैसा चाहोगी, मैं वैसा ही बन जाऊँगा. बस... प्लीज, रुको मत. मैं बहुत अकेला रहा हूँ, दी. मैं इसके लिए तरसता रहा हूँ.
कुसुम दीदी: मुझे पता है. तुझे ये समझना होगा कि यहाँ सब कुछ मेरे कंट्रोल में होगा.

इसीलिए पहल दीदी ने की और अपने होठों को मेरे होठों पर रख रखते हुए धीमी गति से एक चुम्मा लिया. ये रहस्यमई था, ये जादुई था, क्योंकि जिस कुसुम दीदी को मैं जानता था वो बिल्कुल ही सख्त और खतरनाक थी. गुस्सा तो उसके नाक पर रहता था. पर आज उसने खुद अपने होठों को मेरे होठ से मिलाया. मैं भी देर ना करते हुए उसे गहरी चुंबन की ओर ले गया. मेरी पकड़ उसके कमर पर और मजबूत हो गई हम दोनों की जिस्म एक दूसरे से सट गए.


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मैं उसकी चूचियों की गर्मी अपने सीने पर महसूस कर सकता था और शायद वो मेरे लैंड का तनाव अपनी चूत पर हमने कोई परवाह नहीं की बस एक दूसरे को बाहों में जोर से जकड़ कर चूमने लगे.

वो बरसात वाले दिन, जबरदस्ती से किया गया चुंबन में वो मजा नहीं था जो कि इस वाले में. क्योंकि इस बार दीदी का पूरा सहयोग था.

ये उसके साथ मेरा पहला असली चुंबन था. दांतों और जीभ का एक बेताब और अनाड़ी मिलन. ये दिनों से दबी हुई चाहत का इज़हार था. मैंने उसकी सांसों की मिठास और उसकी नमकीन स्वाद को महसूस किया, मेरी जीभ ज़ोर-ज़ोर से उसके मुँह में जा रही थी, मानो उस पर अपना हक जता रही हो. उसकी जुबान मेरी जुबान के साथ एक ऐसी तेज और जोश भरी लय में थिरकने लगी कि मेरा सिर चकराने लगा.

मुझे उसकी शरीर से निकलती गर्मी महसूस हुई, और मैंने अपना हाथ कपड़े के नीचे खिसकाया, ताकि डोरी खींचकर उसे खोल सकूँ और उसका बदन देख सकूँ. अचानक वो अकड़ गई. उसने झटके से मेरा हाथ हटा दिया, चुंबन तोड़कर कुछ इंच पीछे हट गई. उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, होंठ गीले थे, लेकिन उसके चेहरे पर फिर से सावधानी और संयम वाले भाव आ गए थे.


कुसुम दीदी: नहीं, आशीष. अभी नहीं. तु बहुत तेज़ी दिखा रहा है. मैंने कहा था न सब कुछ मेरे कंट्रोल में है.
मैं: प्लीज़, दीदी... मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता. मुझे आपको देखना है. मुझे आपको महसूस करना है. प्लीज़, बस मुझे...

मैं रुका नहीं. मैंने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा कि मैं उसे कितना चाहता हूँ, मैंने इस पल का कितना सपना देखा था, और वही अकेली थी जो मेरी चाहत को समझती थी. मेरे हाथ चलते रहे, उसके कपड़ों के किनारों को छूते हुए, उसकी जॉलाइन और कान के निचले हिस्से को चूमते हुए, और फिर एक नई, बेताब शिद्दत के साथ उसके होंठों पर वापस आते हुए. मैंने उससे गुज़ारिश की, मेरी आवाज कांप रही थी, और मैंने वादा किया कि अगर वो मुझे बस उसे देखने दे, तो मैं उसकी हर बात मानूँगा.

आखिरकार, दीदी की हिचकिचाहट की दीवार टूट गई. उसने एक लंबी, कांपती हुई आह भरी और अपनी बाहों से कसकर मेरी गर्दन को पकड़ लिया, और मुझे वापस एक गहरे, रूह को छू लेने वाले चुंबन में खींच लिया. उसने मेरे होंठों के पास फुसफुसाया, उसकी आवाज़ मुश्किल से सुनाई दे रही थी.


कुसुम दीदी: ठीक है... लेकिन मैं जैसा चाहूंगी सिर्फ वैसा होगा.

उसने ऊपर हाथ बढ़ाया और धीरे-धीरे अपनी कुर्ती के बटन खोलने लगी. मैं मंत्रमुग्ध होकर देखता रहा, जैसे ही कुर्ती उसके कंधों से फिसलकर ज़मीन पर गिरी... मैंने उसके कपड़े हटाए, और रोशनी में उसकी मखमली, गोरी शरीर देखकर मेरे लंड का सुपाड़ा पूरी तरह से फूल गया. मेरी नज़रें उसकी ब्रा की लेस पर टिकी थीं, जो उसके उभरे हुए स्तनों को मुश्किल से ढके हुए थी. मैंने कई बार उसकी चूचियों की कल्पना की थी, लेकिन असलियत किसी भी कल्पना से कहीं ज़्यादा नशीली थी.

मैंने हाथ बढ़ाया, मेरी उंगलियाँ कांप रही थीं जब मैंने उसकी ब्रा के कपड़े को छुआ. मैं ब्रा के नीचे उसकी चूचियों की गर्माहट महसूस कर सकता था, और उस एहसास ने मेरे लंड में बिजली सी दौड़ा दी.


मैं: दीदी... प्लीज. मैं उन्हें चूसना चाहता हूँ.
कुसुम दीदी: नहीं, आशीष. ये बहुत ज़्यादा हो रहा है. हमने पहले ही किस किया है. मैं तुझे इससे आगे नहीं बढ़ने दे सकती. बस... बस मुझे देख.

मैंने नहीं सुना. मैं सुन भी नहीं सकता था. मेरे अंदर की भूख एक धधकती आग की तरह थी जिसने बाकी सब कुछ भुला दिया था. मैं और करीब आया, अपनी छाती को उसकी छाती से सटाया, और उसे अपने शरीर के बीच जकड़ लिया.


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मैंने उसे फिर से किस करना शुरू किया, लेकिन इस बार यह ज़्यादा आक्रामक और ज़बरदस्त था. मैंने अपने होंठ उसके मुँह से हटाकर उसके जबड़े पर, और फिर नीचे उसकी गले के संवेदनशील गड्ढे तक ले गया, जिससे वह धीरे से कराह उठी.

उसने मुझे दूर धकेलने की कोशिश की, लेकिन उसकी हरकतें कमज़ोर थी, मेरे स्पर्श के हमले के आगे उसका इरादा टूट रहा था. जब मैंने उसके कंधे को हल्के से काटा तो वह हाँफने लगी.


कुसुम दीदी: (सिसकियां लेते हुए) बहुत ज़िद्दी है तू.

मैं वापस उसके होंठों पर आया और उसे बहुत शिद्दत से चूमा, मेरी जीभ उसके मुँह में घूम रही थी जबकि मेरा हाथ उसकी ब्रा के ऊपर से उसकी चूचियां दबा रहा था. मैंने हुक के साथ छेड़छाड़ की, लेकिन उसे खोला नहीं, जिससे वो बेचैन और बेताब हो गई. उसका सिर पीछे दीवार से जा लगा उसकी आँखें बंद हो गई और उसने आखिरकार विरोध करना छोड़ दिया. उसने फुसफुसाते हुए कहा,


कुसुम दीदी: ठीक है, लेकिन सिर्फ एक बार करने दूंगी. सिर्फ़ एक बार.

मैंने उसके ब्रा का हुक बिना खोले नीचे से पकड़ कर ऊपर उठा दिया. पहली बार मैंने उन्हें देखा, उसकी दोनों रसीली चूचियां बाहर निकल आई. उसके नंगे सीने को देखकर मेरी सांसें जैसे रुक ही गई. निप्पल के आसपास का वो हल्का गुलाबी रंग, खड़े निप्पल ठंडी हवा में उभरे हुए थे. मैं उसके करीब झुका, मेरी गर्म सांसें उसकी निप्पल को छू रही थी. फिर मैंने निप्पल के चारों तरफ जीभ घुमाते हुए उसकी चूचियां पकड़ कर निप्पल को चूसने लगा और उसकी त्वचा के नमकीन और मीठे स्वाद को महसूस किया. इससे उसकी हल्की सिसकारियां शुरू हो गई और उसने मुझे अपने चूचि के और करीब खींच लिया.

कुसुम दीदी: उम्म्...आशु...आंह...हे भगवान...आह...

मैं उसके दूसरे स्तन की ओर बढ़ा, उसके निचले हिस्से को चाटा और फिर निप्पल को जितना हो सकता था अपने भीतर तक खींच लिया. मैं उसके दिल की तेज़ धड़कन सुन सकता था, जो बिल्कुल मेरी धड़कन जैसी ही तेज़ थी. जब मैं उसके स्तनों को चूसता और सहलाता रहा, तो मैंने उसमें एक बदलाव महसूस किया की मेरी जीभ के हर स्पर्श के साथ उसका शरीर कांप रहा था. मैंने उसकी सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया था.

जब मेरा मुँह उसके स्तनों पर टिका हुआ था, तभी मेरा हाथ नीचे की ओर चला गया. मैंने उसके पजामे की कमरबंद पकड़ी, जो पहले से ही ढीली थी. धीरे-धीरे, जानबूझकर, मैंने कपड़े को नीचे सरकाना शुरू किया. जैसे ही पजामा उसके गांड से नीचे सरका. उसने ब्रा से ही मिलती जुलती रंग की सुंदर सी पैंटी पहनी थी जो कि उसके गोरे बदन को और चमका रही थी. मैंने उसकी जांघों को अपनी टांगों से कांपते हुए महसूस किया. शायद वो पहली बार का डर था.

मैं उसे एक पल के लिए भी छोड़ना नहीं चाहता था. उसके स्तनों पर मेरे मुँह की नमी अभी भी चमक रही थी, और मैं उसे सोफ़े की तरफ़ ले गया. मेरे साथ चलते हुए उसके पैर कांप रहे थे. मैंने उसे धीरे से कुशन पर पीछे की ओर धकेला. हाय उसका गोरा बदन...मुझे मदहोश किए जा रहा था. दीदी ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें मदहोश थी और साँसें तेज़ चल रही थी. वो मज़बूत और दबंग बहन, जिसे मैं हमेशा से जानता था, अब मेरे स्पर्श से पूरी तरह पिघल चुकी थी.


मैं: आप बहुत खूबसूरत हो, दीदी. मैं रुक नहीं सकता... मेरा मन ही नहीं भरता आपसे.


उसने अपनी पीठ को थोड़ा ऊपर उठाया, उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और अनजाने में ही वो मुझे अपने करीब बुला रही थी. मैंने एक आखरी बार और उसकी चुचियों का साथ नहीं छोड़ा और उसे चूसने लगा. क्योंकि मेरे लिए भी ये पहला मौका था जब मेरी बेहन अपनी इच्छा से मुझे अपनी इज्जत देने को तैयार थी.


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मैं उसे अभी पूरी तरह से नंगा नहीं करना चाहता था. शरीर के कुछ हिस्सों का ढका होना ज़्यादा कामुक लग रहा था. मैं उसके पैरों के बीच घुटनों के बल बैठ गया, मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. मैंने उसकी पैंटी की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन उसे उतारने के बजाय, मैंने अपनी उंगलियों से कपड़े को एक तरफ खिसका दिया.


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जो नज़ारा दिखा, वो दिलकश था. उसकी कुंवारी चूत, गुलाबी, तंग और उत्तेजना की साफ, मीठी नमी से चमकती हुई. मैं आगे झुकता हुआ अपनी जीभ को एक नरमी के साथ उसके चूत की कली (क्लिटोरिस) पर दबाया.


कुसुम दीदी: आह्ह्ह… ये क्या...रुक... नहीं, प्लीज... आह्ह!

उसके गांड ऊपर की ओर उछले. मैंने धीरे-धीरे और लंबे स्ट्रोक्स के साथ उसे चाटना शुरू किया, उसके स्वाद का मज़ा लेते हुए. ये मम्मी के स्वाद से अलग था. जहाँ मम्मी की चूत में एक परिपक्व, भारी कस्तूरी जैसी गंध थी जो मुझे बेकाबू कर देती थी, वहीं कुसुम दीदी का स्वाद हल्का, मीठा और ताजगी भरा, मासूम खुशबू वाला था, जो किसी वर्जित फल जैसा महसूस होता था.

मैंने उसकी गुहारों को नज़रअंदाज़ किया और
मेरी जीभ उस चूत के संवेदनशील हिस्से के चारों ओर घूमती रही और फिर उसकी परतों के भीतर गहराई तक चली गई. मैं उसके रस का स्वाद ले सकता था, उसकी कुंवारपन का नमकीन और मीठापन, और यह अद्भुत लग रहा था. दोनों की अपनी-अपनी खासियतें थी. मम्मी की अनुभवी गर्मी और दीदी की तंग, ताज़ी मिठास. और उन दोनों को अपने वश में करने के ख्याल से ही मेरा लंड दर्दनाक हद तक तड़पने लगा.

जैसे-जैसे मैं उसकी चूत को चाटता और चूसता गया, दीदी पिघलती गई. उसने मुझे दूर धकेलने की कोशिश छोड़ दी, बल्कि, उसकी उंगलियों ने मेरे बालों को कसकर पकड़ लिया और मेरे चेहरे को अपनी जांघों के बीच और ज़ोर से दबाया.

मैं एक पल के लिए पीछे हटा और मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा, मेरा मुंह उसके रस से गिला हो चुका था.
उसने नीचे मेरी ओर देखा, उसने देखा कि उसके भाई का चेहरा उसकी चूत के रस से गिला हो गया है.


मैं: क्या आपको अब भी लगता है कि ये गलत है, दीदी?
कुसुम दीदी: मुझे इस बात से नफ़रत है कि मुझे ये कितना पसंद आ रहा है.

तनाव अपनी चरम सीमा पर था. मैं खड़ा हुआ और जल्दी से अपने कपड़े उतार दिए, जिससे मेरा लंड बाहर आ गया. वो पत्थर की तरह सख्त था. दीदी उसे पहली बार देखकर ठिठक गई, उसकी सांसें थम गई. उसने कभी किसी पुरुष का लंड इतनी करीब से नहीं देखा था, अपने भाई का तो बिल्कुल नही. वो उसे एकटक देखती रही, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई. वो उसके आकार और उसकी मर्दानगी से मंत्रमुग्ध हो गई थी. मैं और करीब आया, मेरे लंड का सिरा लगभग उसकी जांघ को छू रहा था.

मैं: इसे छुओ, दीदी. ये आपके लिए है.

वो एक पल के लिए हिचकिचाई, फिर, धीरे-धीरे, उसकी उंगलियां आगे बढ़ीं. जब उसने पहली बार मेरे लंड की गर्म, मखमली त्वचा को छुआ, तो उसके मुँह से एक हल्की सी सिसकारी निकली. उसने अपना हाथ मेरे लंड के चारों ओर लपेटा. शुरुआत में उसकी पकड़ झिझक भरी थी, लेकिन जैसे ही उसने लंड के तनाव की गर्मी और सख्ती को महसूस किया, उसकी पकड़ कसती चली गई.


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जब उसने अपना हाथ ऊपर-नीचे चलाना शुरू किया, उसके चेहरे पर कामुकता के भाव उभर आए. वो उस एहसास से सम्मोहित थी, जिस तरह उसकी हथेली के नीचे लंड की नसें धड़क रही थी. अब हालात पूरी तरह बदल चुके थे. अब वो उस चरम सुख को पाने के लिए बेताब थी जो सिर्फ़ मैं ही दे सकता था.

कुसुम दीदी: (बहुत धीमी आवाज में) ये... बहुत बड़ा है. मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं ये कर रही हूँ!

मैंने नीचे झुककर उसकी ठोड़ी पकड़ ली और उसे मेरी आँखों में देखने के लिए मजबूर किया. वो अब मेरी थी, आनंद और वर्जित के रोमांच से टूट चुकी थी. मैंने उसकी पैंटी उतारते हुए उसके पैरों को और चौड़ा किया, उसकी उत्तेजना की गंध मेरी नाक में भर गई, और मैं जानता था कि चाटना तो बस शुरुआत थी. मैं अपने लंड के चारों ओर उस कसी हुई, कुंवारी गर्मी को महसूस करना चाहता था.

मेरे लंड में बढ़ रहे दबाव को मैं और नहीं रोक पा रहा था. नीचे दीदी को देखा, उसके पैर फैले हुए थे और उसकी कुंवारी चूत चमक रही थी. मैंने उसके गरम गांड को मज़बूती से पकड़ा, मेरी उंगलियाँ उसकी मुलायम गांड में धंस गई, और मैंने अपने लंड के अगले हिस्से को उसके तंग, चूत के संकरे रास्ते पर रखा. उसकी आँखें फैल गई जब उसने अपनी वर्जिनिटी की रुकावट के ख़िलाफ मेरे दबाव को महसूस किया. उसने तेज़ी से अपना सिर हिलाया, उसकी आँखों में डर की एक झलक लौट आई.


कुसुम दीदी: नहीं... आशीष, रुक! मैंने कभी... इससे दर्द होगा! प्लीज, रुक.
मैं: श्श्श्श...डरो मत कुछ नहीं होगा...

मैंने धीरे-धीरे लंड आगे बढ़ाया, मेरा लंड का मोटा सुपाड़ा उसके चूत के नाजुक गुलाबी पंखुड़ियों को फैला रहा था. हल्का सा जोर देते हुए मैंने मेरे लंड के सुपाड़े को अंदर घुसाने की कोशिश करने लगा, उसके मुँह से एक तीखी, ऊँची चीख निकली, और उसकी पीठ सोफ़े से ऊपर की ओर मुड़ गई.



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कुसुम दीदी: आह...! रुक! दर्द हो रहा है! ओह भगवान, ओह!!

मैं रुका रहा, हिलना-डुलना बंद कर दिया क्योंकि मुझे उसके शरीर में कंपन महसूस हो रहा था. मुझे उसकी चूत की गर्मी और कसाव महसूस हो रहा था, घर्षण बहुत तेज़ था. वो हल्की-हल्की सिसक रही थी, शुरुआती खिंचाव का दर्द उसे परेशान कर रहा था. मैं नीचे झुका और उसे गहराई से चूमा, उसका ध्यान भटकाने के लिए और किसी तरह की आवाज ना हो उससे बचने के लिए अपनी जीभ उसके मुँह में घुमाई, जबकि मेरे शरीर का निचला हिस्सा लगातार और ज़ोरदार दबाव डालता रहा.


मैं: (उसके होंठों के पास दबी हुई आवाज़ में) शशश... बस साँस लो, दीदी. अच्छा लगने लगेगा.


मैंने अचानक एक मज़बूत धक्का दिया, और अंदर धकेला. जब मैंने उसकी सील को तोड़ा तो मुझे एक साफ़ आवाज़ सुनाई दी. उसी वक्त मैंने अपना मुंह उसके मुंह पर दबा दिया जिससे कि उसकी आवाज दब जाए. उसकी उंगलियाँ मेरे कमर को कसकर पकड़ रही थी और उसके नाखून मेरी त्वचा में गड़ रहे थे जो कि मुझे खरोच भी रही थी.


कुसुम दीदी: नहीं इसे निकाल...आह! ओह भगवान! ओह... ये... ये मुझे फाड़ रहा है!

मैं वहीं जमा रहा, उसके अंदर आधा घुसा हुआ, ताकि उसका शरीर इस नए अनुभव के साथ तालमेल बिठा सके. कसाव अविश्वसनीय था. मम्मी की चूत की तुलना में कहीं ज़्यादा तंग. ऐसा लग रहा था जैसे मैं गर्म, मखमली रेशम में लिपटा हुआ हूँ जो मुझे छोड़ना नहीं चाहता था.

धीरे-धीरे, चीखें लंबी, कांपती हुई कराहों में बदल गई. तेज़ दर्द कम होने लगा था. मैंने बस कुछ इंच आगे-पीछे हिलना शुरू किया, ये देखने के लिए कि उसे कैसा लग रहा है. हर छोटी हरकत पर उसकी सांसें तेज़ हो जातीं. उसकी आवाज़ दर्द भरी चीख से बदलकर उलझन भरे मज़ा की कराह में बदल जाती.


कुसुम दीदी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह... ऐसा लग रहा है... अहह...जैसे सब कुछ भरा हुआ है. मुझे यकीन नहीं हो रहा...कि तु मेरे अंदर है.
मैं: हां दीदी देखो मैं आपको चोद रहा हूं.
कुसुम दीदी: इश्श्श्श्श...चुप हो जा!
मैं: अब क्या शर्माना? आप तो मेरी जान हो.
कुसुम दीदी: उम्म्म्म्म...

मैंने रफ़्तार बढ़ाई, लगभग पूरी तरह बाहर निकलकर फिर से अंदर धकेलने लगा. जांघों के उसके गांड से टकराने की आवाज सुनाई देने लगी. दीदी का मज़ा उस बचे-खुचे दर्द पर हावी होने लगा था.


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कुसुम: आह! हाँ... थोड़ा धीरे. आह्ह्ह…आह्ह्ह… मम्मी और रीना पीछे आंगन में है!

सेक्स सम्मोहक हो गया था, गर्मी और वर्जित घर्षण का एक धुंधला सा एहसास. मैं उसे पूरे रंग में चोद रहा था. हम दोनों हवस में डूब चुके थे.

कुसुम दीदी: ओह, आशीष... और! ओ माय गॉड! आह...
मैं: हाँ दीदी...हाँ, देखो, आपका भाई आपकी चूत चोद रहा है...
कुसुम दीदी: ऊऊह्ह्ह्ह…तेरा बहुत बड़ा है सच में!
मैं: क्या दीदी?
कुसुम दीदी: कुछ नहीं.
मैं: बोलो ना...
कुसुम दीदी: नहीं...

मैंने लंड को पूरा बाहर निकालते हुए एक जोरदार धक्का मारा. जिससे लंड पूरा उसकी चूत की गहराई में घुस गया.

कुसुम दीदी: आह्ह्ह्हह…….नही…रुकक्क…..आअह्ह्ह्ह!!!
मैं: अब बोलो क्या बड़ा है?
कुसुम दीदी: (सीसकते हुए) अहह...उन्ह..

एक और जोरदार लंड का झटका,

कुसुम दीदी: आह्ह्ह्हह……हाँ...तेरा लंड बड़ा है! आह्ह्ह्हह...धीरे करना प्लीज!

मेरा लंड उसके तंग चूत की सुरंग में फिसल रहा था और हर धक्के के साथ उसे फैला रहा था. उसकी कराहें तेज़ हो गई, जो मेरे धक्कों की गति के साथ तालमेल बिठा रही थी.

कुसुम दीदी: ओह... आह...ऊऊह्ह्ह्ह…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह……... हाँ! और!

वो अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थी, उसका शरीर तन रहा था, और उसकी साँसें छोटी, तेज़ सिसकियों में बदल रही थी.

मैंने अपनी रफ़्तार बढ़ाई, मेरे झटके हल्के और तेज़ हो गए, जो उसके चूत के मुहाने पर ज़ोर से लग रहे थे. दीदी उस एहसास में पूरी तरह खो गई थी, चरम सुख तक पहुँचते ही उसकी आवाज़ काँपने लगी. एक लंबी, सुरीली और परमानंद भरी कराह जो किसी समर्पण जैसी लग रही थी.



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कुसुम दीदी: हाँ...आंह...ओह! मैं... आह्ह्ह्हह……


उसकी अंदरूनी मांसपेशियों ने मेरे लंड को ज़ोरदार और लयबद्ध तरीके से जकड़ लिया, जैसे सारा रस निचोड़ रही हों. मैं जितनी गहराई तक जा सकता था, एक आखिरी ज़ोरदार झटका दिया और उसके अंदर स्खलित हो गया. मैंने महसूस किया कि मेरा गर्म वीर्य उसकी कुंवारी कोख में भर रहा है, उसे पूरी तरह से भर रहा है. हम एक-दूसरे से सटकर गिर पड़े, पसीने और शारीरिक तरल पदार्थों से भीगे हुए, हमारी साँसें तेज़ और एक जैसी चल रही थी. कुसुम दीदी वहीं लेटी रही, थकी हुई और निढाल, उसके होंठों पर एक छोटी सी, संतुष्ट मुस्कान थी. दर्द गायब हो चुका था.

बारिश की वो ठंडी हवा हम दोनों के बदन को धीरे-धीरे ठंडा कर रही थी, जहाँ मैं और दीदी एक-दूसरे से लिपटे हुए लेटे थे. हवा में सेक्स और पसीने की महक घुली हुई थी. दीदी की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं और वो छत की ओर देख रही थी. उसकी आँखों में हैरानी और नए-नए मिले सुख का मिला-जुला भाव था. काफी देर तक हममें से किसी ने कुछ नहीं कहा. हमने जो किया था, उसका डर एक भारी चादर की तरह हम पर छाया हुआ था, फिर भी हमारे बीच एक गुप्त अपनापन और बिजली जैसी सिहरन महसूस हो रही थी.


कुसुम दीदी: मुझे यकीन नहीं हो रहा कि हमने सच में ऐसा किया, आशीष. अगर मम्मी को पता चल गया... हे भगवान, वो तो हमें मार ही डालेंगी.

मैंने उसके माथे को चूमा, मेरी आवाज़ धीमी और उसके मन को शांत करने वाली थी.

मैं: उन्हें पता नहीं चलेगा. ये हमारा राज़ है, दीदी.

अगला कुछ पल हमने जल्दबाजी और घबराहट भरी खामोशी में खुद को साफ-सुथरा करने में बिताया. कुसुम दीदी बहुत संभलकर चल रही थी. पैरों के बीच हो रही तकलीफ उसे हर उस चूदाइ के झटके की याद दिला रही थी जो अभी-अभी हुई थी. उसने जल्दी से कपड़े पहने, अपनी कुर्ती ठीक की. उसका चेहरा शर्म से लाल हो रहा था. जब हम कमरे से बाहर निकले, तो घर के पिछले हिस्से से आवाज़ें आ रही थीं. मम्मी और रीना बागान में साफ सफाई कर रही थी और पौधे लगा रही थी. उनके काम-काज का सामान्य माहौल, घर के अंदर अभी-अभी हुई उस चूदाइ से बिल्कुल अलग था. कुसुम दीदी ने इस माहौल में घूलने मिलने की कोशिश की.


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कुसुम दीदी: आप लोग अभी तक मेहनत कर रहे हैं.
मम्मी: हां बारिश का मौसम है. सोचा कुछ नए फूल और कुछ पौधे लगा देते हैं, तो जल्दी खिल जाएंगे.
आशीष की पढ़ाई पूरी हो गई?

रीना दीदी: ध्यान देना आजकल ज्यादा बदमाश हो गया है. पढ़ाई में तो मन ही नहीं लगता, पता नहीं कहां खोया रहता है.
कुसुम दीदी: नहीं-नहीं, आप टेंशन मत लो मैं हूं ना.


सूरज ढलने के साथ ही घर में रात के खाने की तैयारी शुरू हो गई. मैंने दरवाज़े से देखा कि मम्मी और रीना दीदी अंदर आई, उनके कपड़ों पर धूल लगी थी और वे थकी हुई लेकिन खुश लग रही थीं. कुसुम दीदी किचन में मम्मी की मदद कर रही थी. वो बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थी. उसके हाव-भाव सहज थे और आवाज स्थिर थी जब वो उन सब्ज़ियों के बारे में बात कर रही थी जो उन्होंने तोड़ी थी. उसे देखना दिलचस्प था, वही लड़की जो कुछ घंटे पहले ही मेरे नीचे चरम सुख में चीख रही थी, अब एक आज्ञाकारी बेटी और बहन की तरह लग रही थी. मैं कमरे में मौजूद तीनों महिलाओं के बीच छिपी हुई भावनाओं को महसूस कर सकता था. उनमें से किसी को भी एक दूसरे के बारे में ये नहीं पता था कि मैं उनके परिवार की पवित्रता को पहले ही भंग कर चुका था.

मैंने अपनी सबसे बड़ी बहन रीना की ओर देखा. कुछ दिन पहले, मुझे वो अकेली मिली थी और मैंने अपनी उंगलियाँ उसकी शर्मीली चूत में डाल दी थीं. उसने कुसुम दीदी की तरह मुझसे ज़्यादा विरोध नहीं किया था.

रीना दीदी मेरी नज़र को भांपते हुए, उसने तुरंत नज़रे हटा ली और उसके गाल हल्के गुलाबी हो गए. वो तेज़ी से बातें करने लगी, उसकी आवाज़ सामान्य से थोड़ी ऊँची थी.


रीना दीदी: क्या तुमने पड़ोसी की नई कार देखी, कुसुम? मिसेज शर्मा सुबह से ही उसकी डींगें मार रही थीं. सच कहूँ तो, जिस तरह से वो बात करती हैं, लगता है जैसे उन्होंने लॉटरी जीत ली हो!

वो इधर-उधर की बातें कर रही थी, छोटी-मोटी गपशप का इस्तेमाल उस याद को छिपाने के लिए कर रही थी जब मेरी उंगलियों ने उसे फैलाया था. फिर भी जब उसे लगता कि कोई नहीं देख रहा है, तो वह बार-बार मेरी ओर देख लेती थी.

हम डिनर के लिए टेबल पर बैठे थे, कुछ पल के लिए सिर्फ प्लेटों पर चम्मचों के टकराने की आवाज़ आ रही थी. मम्मी टेबल के सबसे आगे बैठी थीं, उनके चेहरे पर सोच-विचार के भाव थे. उन्होंने दोपहर का काफ़ी समय नैना आंटी के साथ फ़ोन पर बिताया था, और उन बातचीत का असर उनके मुझे देखने के अंदाlज़ में साफ दिख रहा था. उनकी आँखों में एक प्यास थी, एक ऐसी उत्सुकता जो बेताबी की हद तक पहुँच रही थी. मम्मी मुझे चाहती थी. नैना आंटी के उकसाने वाले सुझावों ने उन्हें तैयार कर दिया था, और उनके अकेलेपन ने उस आग को और भड़का दिया था, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब नामुमकिन था. लेकिन वो एक माँ के तौर पर अपनी भूमिका में फंसी हुई थी. वो कभी मेरे होंठों को देखतीं, तो कभी मेरी छाती को. उनका हाथ पानी के गिलास को जरा ज़्यादा ही कसकर पकड़े हुए था. वो हाथ बढ़ाकर मुझे छूना चाहती थीं, यह जानना चाहती थीं कि जो गर्मी वो महसूस कर रही थीं, क्या वैसी ही गर्मी मुझमें भी है. लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि परफेक्ट माँ की छवि को तोड़े बिना इस दूरी को कैसे मिटाया जाए.


मम्मी: (गला साफ़ करते हुए) आशीष, तु आजकल बहुत चुप-चुप रहता है. क्या तुझे कोई परेशानी है? या फिर... तेरे मन में कुछ और चल रहा है?

ये सवाल टटोलने जैसा था, एक बुलावा था. वो माहौल को भांप रही थीं, उम्मीद कर रही थी कि मैं उन्हें कोई इशारा दूँ कि मुझे उनकी चाहत का पता है. कुसुम दीदी ने ऊपर देखा, उसके होंठों पर एक छोटी सी, छिपी हुई मुस्कान थी जब उसने मम्मी से मेरी तरफ़ देखा. वो जानती थी कि मैंने पहले ही उसे अपना बना लिया था, और वो हमारी मम्मी के अंदर उमड़ती उस कच्ची चाहत को देख सकती थी.

मैंने मम्मी की आँखों में सीधे देखा, मेरे होंठों के कोने पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई.


मैं: सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा है, मम्मी. बस... आजकल मैं बहुत सी नई चीज़ें खोज रहा हूँ.

उस बात का दोहरा मतलब हवा में तैर रहा था. रीना दीदी घबराहट में खिलखिलाकर हँसी और अपनी सीट पर थोड़ी हिली-डुली, जबकि मम्मी की साँसें थम सी गई. डिनर चलता रहा, पारिवारिक मेल-जोल का दिखावा, जिसके पीछे वर्जित वासना का तूफ़ान छिपा था. तीन औरतें, एक घर, और एक बेटा जो उनकी दुनिया का गुप्त केंद्र बन चुका था. हर एक के मन में वर्जित इच्छा का एक अलग रंग था.
Superb excellent 👌 work akhir Kusum chud gayi wo bhi itni aasani se Ab Maa bhi shayad line par arhi hai jaldi hi Rina bh legi Ashish ka Lund but Nahin ka kya maksad ho sakta hai Ashish ki Maa ko Ashish se chudwane ke pichhe..... Waiting for next eagerly
 
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