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Fantasy क्या यही प्यार है

park

Well-Known Member
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तीसरा भाग


अभिषेक के पापा मुझे बहुत मानते थे। उनके लिए मैं और अभिषेक उनके बेटे जैसे थे, लेकिन अभिषेक की मम्मी को इसी बात से गुस्सा था कि वो मुझ जैसे निम्न माध्यम वर्ग के लड़के को इतना स्नेह क्यों करते हैं। इसका कारण ये था कि अभिषेक की मम्मी एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी और अधिकतर अमीर लोगों का दिल और भावनाए बहुत संकीर्ण होती हैं।

उन्होंने अभिषेक से भी कई बार कहा था कि अभिषेक का मेरे साथ दोस्ती में अभिषेक का कोई लाभ नहीं है। लेकिन अभिषेक उनकी बात कभी नहीं मानी। यही कारण था कि वो मुझको बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। अभिषेक के पापा की वजह से वो खुलकर कभी ये बात बोल नहीं पाती थी, क्योंकि अभिषेक के पापा थोड़ा सख्त मिज़ाज़ के थे और तुरंत ही प्रतिक्रिया दे देते थे। अभिषेक ने कई बात मुझे ये बात बताई जब कभी उसका मूड खराब होता था। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं चाचा और अभिषेक के लिए उनके घर चला जाता था।

बहरहाल मैं और अभिषेक उनसे अनुमति लेकर मेरे घर जाने के लिए निकल आए थे। वो भी अपनी साईकिल बाहर निकाल लाया। वैसे अभिषेक के घर में दो बाइक थी। उसे कहीं भी जाना होता तो वो बाइक से ही जाता था, लेकिन जब मेरे साथ चलना होता था तो हमेशा साईकल से ही चलता था। स्कूल भी वो साइकिल से ही आता था।

जब मैंने उसे साईकल निकालते देखा तो मैंने उससे कहा।

मैं- साईकल क्यों बाहर निकाल रहा है। आ जा इसी से दोनों लोग चलते हैं। बहुत मज़ा आएगा।

अभिषेक- फिर मैं वापस कैसे आऊंगा।

मैं- वैसे भी आज तू वापस आ नहीं पाएगा। पापा और काजल तुझे आने ही नहीं देंगे। मैं तुझे कल छोड़ दूंगा घर। चल अब जल्दी कर नहीं तो रात हो जाएगी।

फिर मैं साईकल चलाने लगा और अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठ गया। फिर हम दोनो बातचीत करते हुए आने लगे। 2 किलोमीटर तक साईकिल चलाने के बाद मैंने अभिषेक से साईकिल चलाने के लिए कहा। अभिषेक साईकिल चलाने लगा। मैं डंडे पर बैठ गया और एक पांव से पैडिल पर मारने लगा जिससे साइकिल की गति तेज हो गई।

मेरे घर से 500 मीटर पहले ही एक छोटा सा बाजार पड़ता है। जो हफ्ते में 3 दिन लगता है। उस दिन बाजार था तो वहां पर गोलगप्पे और टिकिया का ठेला लगा हुआ था। अभिषेक ने साईकिल रोक दी और बोला।

अभिषेक- देख भाई। मुझे तो तलब हो रही है गोलगप्पे खाने ने। तुझे भी खाना है तो आ जा।

मैं- अबे तुझे लड़कियों वाली आदत कब से पड़ गई।

अभिषेक- लड़कियों वाली आदत मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

मैं- मतलब ये कि उन्हें ही गोलगप्पे ज्यादा पसंद होते हैं। देखता नहीं गोलगप्पे (गुपचुप, फुलकी) की दुकान पर कितनी भीड़ होती है लड़कियों की। चाहे वो खाना खा कर ही घर से निकलें, लेकिन अगर गोलगप्पे का ठेला दिख गया तो उनको फिर भूख लग जाती है। तेरा हाल भी उसी तरह है।

अभिषेक- देख भाई। पहली बात ये कि मैं कोई खाना वाना खा कर नहीं निकला हूँ। और दूसरी बात जब भूख लगती है तो कुछ भी अच्छा दिखे तो खाने में लड़का, लड़की नहीं देखा जाता। अरे मैं तुझसे बात ही क्यों कर रहा हूँ। तुझे खाना है तो आ नहीं तो मैं जा रहा हूं। साला तुझे भाषण देने के चक्कर में भूख और तेज़ हो गई है।

इतना कहकर अभिषेक गोलगप्पे के ठेले के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़कियां पहले ही गोलगप्पे खा रही थी। अभिषेक जाकर उनके बगल खड़ा हो गया। मैं भी मन मारकर ठेले के पास पहुँच गया।

अब यहां पर अभिषेक की हालत देखने लायक थी। जब लड़की गोलगप्पा उठती और अपने मुंह में डालती तो अभिषेक इस दौरान हुई उनको पूरी क्रिया को देखता और अपने होंठों पर जीभ फिरता। जब उसने दो चार बार ऐसा किया तो मैंने उससे कहा।

मैं- क्या कर रहा है यार तू। कहीं बीच बाजार मरवा न देना तुम।

अभिषेक- मैं क्या करूँ यार। बहुत भूख लगी है और मुंह में पानी आ रहा है और ये लड़कियाँ पता नहीं कितने जन्मों की भूखी हैं कि खाये ही जा रही हैं। जिनको नज़र नहीं आ रहा है कि दो शरीफ लड़के कब से गोलगप्पे खाने के लिए खड़े हैं।

मैं- मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि लड़कियों का मनपसंद होता है गोलगप्पा। चल कहीं और चलते हैं कुछ और खाते हैं।

अभिषेक मेरी बात अनसुना कर दिया और कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार वो बोल ही पड़ा।

अभिषेक- लगता है तुम लोग कई दिन की भूखी प्यासी हो। कब से देख रहा हूँ गोलगप्पे खाए पड़ी हो। मुझे लगता है पूरा ठेला खाकर ही मानोगी तुम लोग।

अभिषेक की बात सुनकर उन लड़कियों ने उसे घूरकर देखा तो अभिषेक अपने दांत निकालकर हंसने लगा। आखिरकार वो लड़कियाँ गोलगप्पे खाकर चली गई। उनके जाने के बाद मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- साले तू एक दिन बहुत पिटेगा। तुझे कितनी बार मना किया है कि ऐसे कोई भी बात मत बोला कर खासकर लड़कियों को, लेकिन तू है कि मेरी बात सुनता ही नहीं। जब मार पड़ेगी तो मुझसे मत कहना कि मैंने तुझे आगाह नहीं किया।

अभिषेक- कुछ नहीं होगा यार। कौन सा मैं उनको छेड़ रहा था। मैं तो बस कम खाने के लिए बोल रहा था। अच्छा अब ज्यादा बातें नहीं। गोलगप्पे वाले भैया। हमे भी गोलगप्पे खिलाइए।


फिर शुरू हुआ गोलगप्पे खाने का सिलसिला जो जाकर 70 ₹ पर खत्म हुआ। जिसमें से 10 ₹ का गोलगप्पा मैंने खाया था बाकी के 60 ₹ का गोलगप्पा अभिषेक ने खाया था। उसने गोलगप्पे खाकर एक लंबी डकार ली और अपने हाथ अपनी शर्ट में पोछ कर मुझसे बोला।

अभिषेक- हां। अब लग रहा है कि पेट में कुछ गया है।

मैं- कुछ गया है। भुक्खड़, अगर कुछ देर और खाता तो उसका पूरा ठेला खा डालता तू। कोई इतना खाता है क्या, ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों का भूखा है तू।

अभिषेक- जब भूख लगी थी तो क्या करूँ मैं। अब ज्यादा बकचोदी मत कर। तुझे तो मेरे हर चीज से परेशानी है। अब जल्दी से पैसे दे और घर चल। आज कुछ अच्छा बनवाऊंगा खाने के लिए चाची से।

मैं- तू सच में पेटू है। अभी भी तेरा पेट नहीं भरा।

मैंने ये बात मुस्कुराते हुए बोली थी जिसे सुनकर क़र अभिषेक भी मुस्कुराने लगा। फिर मैं गोलगप्पे वाले को पैसे देकर वहां से चल दिया। बाजार पर होने पर मैं साईकिल की सीट पर बैठ गया और साईकिल आगे बढ़ा दी। अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठा तभी एक धमाका हुआ।

धड़ाम...... फुस्स सससससस....

उसके उछलकर बैठने से साईकिल का टायर पंचर हो गया। (वैसे टायर पंचर नहीं होता पंचर तो ट्यूब होती है, लेकिन गांव में इसे टायर पंचर ही बोलते हैं) और साईकिल तुरन्त रुक गई। मैं साईकिल स्टैंड पर खड़ीकर अगला टायर देखा तो वो फट गया था। मैं अभिषेक को देखने लगा। वो भी मुझे देख रहा था। मैंने उससे कहा।

मैं- ये सब तेरी वजह से ही हुआ है।

अभिषेक- मेरी वजह से? मैंने क्या किया है।

मैं- तुझे ही बड़ी भूख लगी थी न। और खाया भी तो कितना ठूंस ठूंस कर। फिर भी तेरा पेट नहीं भरा। अभी और खाने की बात कर रहा है। ना तू इतना ज्यादा खाता, न तेरा वजन बढ़ता और न ही टायर पंचर होता।

अभिषेक- देख नयन। अब कुछ ज्यादा ही बोल रहा है तू। मेरे गोलगप्पे खाने से कुछ नहीं हुआ समझे। ये तो टायर कमजोर था साइकिल का। इसलिए फट गया। और इसके लिए तू मुझे मत बोल। अपने आप को देख मुझसे ज्यादा वजन तो तेरा है।

उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। क्योंकि उसने बात एकदम सही बोली थी। मेरा वजन उससे 2-4 किलो ज्यादा ही था। फिर हम दोनों बात करते हुए पैदल ही साईकिल को घसीटते हुए अपने घर की तरफ चल दिये। जब मैं घर पहुँचा तो पापा और काजल दुआर(घर के सामने की खाली जगह) में चारपाई/खटिया डाले बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिषेक तुरंत जाकर पापा के पांव छू लिया और खटिया पर बैठ गया। उसे देखकर काजल ने कहा।

काजल- भैया आज आपका भी परिणाम आया होगा न। क्या हुआ बताओ न।

अभिषेक- वो सब बाद में बताऊंगा। पहले ये मिठाई खा और ये कपड़े रख जो पापा ने तेरे लिए भेजे हैं।

इतना कहकर अभिषेक ने मिठाई का डिब्बा, जो वह घर से लाया था निकालकर काजल को दे दिया साथ में कपड़े का बैग भी दे दिया तब तक मैं भी आकर पापा के पांव स्पर्श किया और उनकी बगल में बैठ गया। अभिषेक ने कहा।

अभिषेक- आपको पता है चाचा जी। मैं और नयन दोनों प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। अभी तक अंक नहीं देखा है। वो आपके सामने देखेंगे।

तबतक मेरी अम्मा भी घर से बाहर आ गई। पापा ने उन्हें देखते हुए कहा।

पापा- अरे सुनती हो भाग्यवान। दोनों बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। जाओ इनके खाने लिए मैंने जो जलेबी लाई है उसे ले आओ।

अभिषेक- अरे वाह चाचा जी। आपने बहुत अच्छा किया। मेरे मुंह में पानी आ गया। जल्दी लेकर आइये चाची जी।

मैं- तू कितना बड़ा पेटू है अभिषेक। तेरे मुंह में तो हर खाने वाली चीज को देखकर पानी आ जाता है। अभी आधे घंटे पहले भरपेट गोलगप्पे खाकर आ रहा है। और फिर से तुझे भूख लग गई।


अभिषेक- इतनी दूर पैदल चलवाया तुमने। जो खाया था वो पच गया सब। अब पेट खाली हो गया है तो भूख तो लगेगी ही न और हां चाची जी। आज हम दोनों के पास होने की खुशी में कुछ अच्छा सा बनाइये खाने के लिए।

मम्मी- हां क्यों नहीं मेरे बच्चे पास हुए हैं।

उसके बाद मां एक थाली में जलेबी निकाल कर ले आई। हम सब मिलकर जलेबी खाने लगे और इधर उधर की बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने सबको आधे घंटे पहले बाजार वाली कहानी बता दी कि कैसे अभिषेक ने गोलगप्पे खाते हुए लड़कियों को देख रहा था और कैसे इसके मुंह में पानी आ रहा था और कैसे साईकिल पंचर हो गई वगैरह वगैरह। जिसे सुनकर सब हंसने लगे।

इसके आगे की कहानी अगले भाग में।
Nice and superb update...
 

mashish

BHARAT
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तीसरा भाग


अभिषेक के पापा मुझे बहुत मानते थे। उनके लिए मैं और अभिषेक उनके बेटे जैसे थे, लेकिन अभिषेक की मम्मी को इसी बात से गुस्सा था कि वो मुझ जैसे निम्न माध्यम वर्ग के लड़के को इतना स्नेह क्यों करते हैं। इसका कारण ये था कि अभिषेक की मम्मी एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी और अधिकतर अमीर लोगों का दिल और भावनाए बहुत संकीर्ण होती हैं।

उन्होंने अभिषेक से भी कई बार कहा था कि अभिषेक का मेरे साथ दोस्ती में अभिषेक का कोई लाभ नहीं है। लेकिन अभिषेक उनकी बात कभी नहीं मानी। यही कारण था कि वो मुझको बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। अभिषेक के पापा की वजह से वो खुलकर कभी ये बात बोल नहीं पाती थी, क्योंकि अभिषेक के पापा थोड़ा सख्त मिज़ाज़ के थे और तुरंत ही प्रतिक्रिया दे देते थे। अभिषेक ने कई बात मुझे ये बात बताई जब कभी उसका मूड खराब होता था। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं चाचा और अभिषेक के लिए उनके घर चला जाता था।

बहरहाल मैं और अभिषेक उनसे अनुमति लेकर मेरे घर जाने के लिए निकल आए थे। वो भी अपनी साईकिल बाहर निकाल लाया। वैसे अभिषेक के घर में दो बाइक थी। उसे कहीं भी जाना होता तो वो बाइक से ही जाता था, लेकिन जब मेरे साथ चलना होता था तो हमेशा साईकल से ही चलता था। स्कूल भी वो साइकिल से ही आता था।

जब मैंने उसे साईकल निकालते देखा तो मैंने उससे कहा।

मैं- साईकल क्यों बाहर निकाल रहा है। आ जा इसी से दोनों लोग चलते हैं। बहुत मज़ा आएगा।

अभिषेक- फिर मैं वापस कैसे आऊंगा।

मैं- वैसे भी आज तू वापस आ नहीं पाएगा। पापा और काजल तुझे आने ही नहीं देंगे। मैं तुझे कल छोड़ दूंगा घर। चल अब जल्दी कर नहीं तो रात हो जाएगी।

फिर मैं साईकल चलाने लगा और अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठ गया। फिर हम दोनो बातचीत करते हुए आने लगे। 2 किलोमीटर तक साईकिल चलाने के बाद मैंने अभिषेक से साईकिल चलाने के लिए कहा। अभिषेक साईकिल चलाने लगा। मैं डंडे पर बैठ गया और एक पांव से पैडिल पर मारने लगा जिससे साइकिल की गति तेज हो गई।

मेरे घर से 500 मीटर पहले ही एक छोटा सा बाजार पड़ता है। जो हफ्ते में 3 दिन लगता है। उस दिन बाजार था तो वहां पर गोलगप्पे और टिकिया का ठेला लगा हुआ था। अभिषेक ने साईकिल रोक दी और बोला।

अभिषेक- देख भाई। मुझे तो तलब हो रही है गोलगप्पे खाने ने। तुझे भी खाना है तो आ जा।

मैं- अबे तुझे लड़कियों वाली आदत कब से पड़ गई।

अभिषेक- लड़कियों वाली आदत मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

मैं- मतलब ये कि उन्हें ही गोलगप्पे ज्यादा पसंद होते हैं। देखता नहीं गोलगप्पे (गुपचुप, फुलकी) की दुकान पर कितनी भीड़ होती है लड़कियों की। चाहे वो खाना खा कर ही घर से निकलें, लेकिन अगर गोलगप्पे का ठेला दिख गया तो उनको फिर भूख लग जाती है। तेरा हाल भी उसी तरह है।

अभिषेक- देख भाई। पहली बात ये कि मैं कोई खाना वाना खा कर नहीं निकला हूँ। और दूसरी बात जब भूख लगती है तो कुछ भी अच्छा दिखे तो खाने में लड़का, लड़की नहीं देखा जाता। अरे मैं तुझसे बात ही क्यों कर रहा हूँ। तुझे खाना है तो आ नहीं तो मैं जा रहा हूं। साला तुझे भाषण देने के चक्कर में भूख और तेज़ हो गई है।

इतना कहकर अभिषेक गोलगप्पे के ठेले के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़कियां पहले ही गोलगप्पे खा रही थी। अभिषेक जाकर उनके बगल खड़ा हो गया। मैं भी मन मारकर ठेले के पास पहुँच गया।

अब यहां पर अभिषेक की हालत देखने लायक थी। जब लड़की गोलगप्पा उठती और अपने मुंह में डालती तो अभिषेक इस दौरान हुई उनको पूरी क्रिया को देखता और अपने होंठों पर जीभ फिरता। जब उसने दो चार बार ऐसा किया तो मैंने उससे कहा।

मैं- क्या कर रहा है यार तू। कहीं बीच बाजार मरवा न देना तुम।

अभिषेक- मैं क्या करूँ यार। बहुत भूख लगी है और मुंह में पानी आ रहा है और ये लड़कियाँ पता नहीं कितने जन्मों की भूखी हैं कि खाये ही जा रही हैं। जिनको नज़र नहीं आ रहा है कि दो शरीफ लड़के कब से गोलगप्पे खाने के लिए खड़े हैं।

मैं- मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि लड़कियों का मनपसंद होता है गोलगप्पा। चल कहीं और चलते हैं कुछ और खाते हैं।

अभिषेक मेरी बात अनसुना कर दिया और कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार वो बोल ही पड़ा।

अभिषेक- लगता है तुम लोग कई दिन की भूखी प्यासी हो। कब से देख रहा हूँ गोलगप्पे खाए पड़ी हो। मुझे लगता है पूरा ठेला खाकर ही मानोगी तुम लोग।

अभिषेक की बात सुनकर उन लड़कियों ने उसे घूरकर देखा तो अभिषेक अपने दांत निकालकर हंसने लगा। आखिरकार वो लड़कियाँ गोलगप्पे खाकर चली गई। उनके जाने के बाद मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- साले तू एक दिन बहुत पिटेगा। तुझे कितनी बार मना किया है कि ऐसे कोई भी बात मत बोला कर खासकर लड़कियों को, लेकिन तू है कि मेरी बात सुनता ही नहीं। जब मार पड़ेगी तो मुझसे मत कहना कि मैंने तुझे आगाह नहीं किया।

अभिषेक- कुछ नहीं होगा यार। कौन सा मैं उनको छेड़ रहा था। मैं तो बस कम खाने के लिए बोल रहा था। अच्छा अब ज्यादा बातें नहीं। गोलगप्पे वाले भैया। हमे भी गोलगप्पे खिलाइए।


फिर शुरू हुआ गोलगप्पे खाने का सिलसिला जो जाकर 70 ₹ पर खत्म हुआ। जिसमें से 10 ₹ का गोलगप्पा मैंने खाया था बाकी के 60 ₹ का गोलगप्पा अभिषेक ने खाया था। उसने गोलगप्पे खाकर एक लंबी डकार ली और अपने हाथ अपनी शर्ट में पोछ कर मुझसे बोला।

अभिषेक- हां। अब लग रहा है कि पेट में कुछ गया है।

मैं- कुछ गया है। भुक्खड़, अगर कुछ देर और खाता तो उसका पूरा ठेला खा डालता तू। कोई इतना खाता है क्या, ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों का भूखा है तू।

अभिषेक- जब भूख लगी थी तो क्या करूँ मैं। अब ज्यादा बकचोदी मत कर। तुझे तो मेरे हर चीज से परेशानी है। अब जल्दी से पैसे दे और घर चल। आज कुछ अच्छा बनवाऊंगा खाने के लिए चाची से।

मैं- तू सच में पेटू है। अभी भी तेरा पेट नहीं भरा।

मैंने ये बात मुस्कुराते हुए बोली थी जिसे सुनकर क़र अभिषेक भी मुस्कुराने लगा। फिर मैं गोलगप्पे वाले को पैसे देकर वहां से चल दिया। बाजार पर होने पर मैं साईकिल की सीट पर बैठ गया और साईकिल आगे बढ़ा दी। अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठा तभी एक धमाका हुआ।

धड़ाम...... फुस्स सससससस....

उसके उछलकर बैठने से साईकिल का टायर पंचर हो गया। (वैसे टायर पंचर नहीं होता पंचर तो ट्यूब होती है, लेकिन गांव में इसे टायर पंचर ही बोलते हैं) और साईकिल तुरन्त रुक गई। मैं साईकिल स्टैंड पर खड़ीकर अगला टायर देखा तो वो फट गया था। मैं अभिषेक को देखने लगा। वो भी मुझे देख रहा था। मैंने उससे कहा।

मैं- ये सब तेरी वजह से ही हुआ है।

अभिषेक- मेरी वजह से? मैंने क्या किया है।

मैं- तुझे ही बड़ी भूख लगी थी न। और खाया भी तो कितना ठूंस ठूंस कर। फिर भी तेरा पेट नहीं भरा। अभी और खाने की बात कर रहा है। ना तू इतना ज्यादा खाता, न तेरा वजन बढ़ता और न ही टायर पंचर होता।

अभिषेक- देख नयन। अब कुछ ज्यादा ही बोल रहा है तू। मेरे गोलगप्पे खाने से कुछ नहीं हुआ समझे। ये तो टायर कमजोर था साइकिल का। इसलिए फट गया। और इसके लिए तू मुझे मत बोल। अपने आप को देख मुझसे ज्यादा वजन तो तेरा है।

उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। क्योंकि उसने बात एकदम सही बोली थी। मेरा वजन उससे 2-4 किलो ज्यादा ही था। फिर हम दोनों बात करते हुए पैदल ही साईकिल को घसीटते हुए अपने घर की तरफ चल दिये। जब मैं घर पहुँचा तो पापा और काजल दुआर(घर के सामने की खाली जगह) में चारपाई/खटिया डाले बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिषेक तुरंत जाकर पापा के पांव छू लिया और खटिया पर बैठ गया। उसे देखकर काजल ने कहा।

काजल- भैया आज आपका भी परिणाम आया होगा न। क्या हुआ बताओ न।

अभिषेक- वो सब बाद में बताऊंगा। पहले ये मिठाई खा और ये कपड़े रख जो पापा ने तेरे लिए भेजे हैं।

इतना कहकर अभिषेक ने मिठाई का डिब्बा, जो वह घर से लाया था निकालकर काजल को दे दिया साथ में कपड़े का बैग भी दे दिया तब तक मैं भी आकर पापा के पांव स्पर्श किया और उनकी बगल में बैठ गया। अभिषेक ने कहा।

अभिषेक- आपको पता है चाचा जी। मैं और नयन दोनों प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। अभी तक अंक नहीं देखा है। वो आपके सामने देखेंगे।

तबतक मेरी अम्मा भी घर से बाहर आ गई। पापा ने उन्हें देखते हुए कहा।

पापा- अरे सुनती हो भाग्यवान। दोनों बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। जाओ इनके खाने लिए मैंने जो जलेबी लाई है उसे ले आओ।

अभिषेक- अरे वाह चाचा जी। आपने बहुत अच्छा किया। मेरे मुंह में पानी आ गया। जल्दी लेकर आइये चाची जी।

मैं- तू कितना बड़ा पेटू है अभिषेक। तेरे मुंह में तो हर खाने वाली चीज को देखकर पानी आ जाता है। अभी आधे घंटे पहले भरपेट गोलगप्पे खाकर आ रहा है। और फिर से तुझे भूख लग गई।


अभिषेक- इतनी दूर पैदल चलवाया तुमने। जो खाया था वो पच गया सब। अब पेट खाली हो गया है तो भूख तो लगेगी ही न और हां चाची जी। आज हम दोनों के पास होने की खुशी में कुछ अच्छा सा बनाइये खाने के लिए।

मम्मी- हां क्यों नहीं मेरे बच्चे पास हुए हैं।

उसके बाद मां एक थाली में जलेबी निकाल कर ले आई। हम सब मिलकर जलेबी खाने लगे और इधर उधर की बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने सबको आधे घंटे पहले बाजार वाली कहानी बता दी कि कैसे अभिषेक ने गोलगप्पे खाते हुए लड़कियों को देख रहा था और कैसे इसके मुंह में पानी आ रहा था और कैसे साईकिल पंचर हो गई वगैरह वगैरह। जिसे सुनकर सब हंसने लगे।

इसके आगे की कहानी अगले भाग में।

NIce update
 

Ankitarani

Param satyagyani...
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तीसरा भाग


अभिषेक के पापा मुझे बहुत मानते थे। उनके लिए मैं और अभिषेक उनके बेटे जैसे थे, लेकिन अभिषेक की मम्मी को इसी बात से गुस्सा था कि वो मुझ जैसे निम्न माध्यम वर्ग के लड़के को इतना स्नेह क्यों करते हैं। इसका कारण ये था कि अभिषेक की मम्मी एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी और अधिकतर अमीर लोगों का दिल और भावनाए बहुत संकीर्ण होती हैं।

उन्होंने अभिषेक से भी कई बार कहा था कि अभिषेक का मेरे साथ दोस्ती में अभिषेक का कोई लाभ नहीं है। लेकिन अभिषेक उनकी बात कभी नहीं मानी। यही कारण था कि वो मुझको बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। अभिषेक के पापा की वजह से वो खुलकर कभी ये बात बोल नहीं पाती थी, क्योंकि अभिषेक के पापा थोड़ा सख्त मिज़ाज़ के थे और तुरंत ही प्रतिक्रिया दे देते थे। अभिषेक ने कई बात मुझे ये बात बताई जब कभी उसका मूड खराब होता था। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मैं चाचा और अभिषेक के लिए उनके घर चला जाता था।

बहरहाल मैं और अभिषेक उनसे अनुमति लेकर मेरे घर जाने के लिए निकल आए थे। वो भी अपनी साईकिल बाहर निकाल लाया। वैसे अभिषेक के घर में दो बाइक थी। उसे कहीं भी जाना होता तो वो बाइक से ही जाता था, लेकिन जब मेरे साथ चलना होता था तो हमेशा साईकल से ही चलता था। स्कूल भी वो साइकिल से ही आता था।

जब मैंने उसे साईकल निकालते देखा तो मैंने उससे कहा।

मैं- साईकल क्यों बाहर निकाल रहा है। आ जा इसी से दोनों लोग चलते हैं। बहुत मज़ा आएगा।

अभिषेक- फिर मैं वापस कैसे आऊंगा।

मैं- वैसे भी आज तू वापस आ नहीं पाएगा। पापा और काजल तुझे आने ही नहीं देंगे। मैं तुझे कल छोड़ दूंगा घर। चल अब जल्दी कर नहीं तो रात हो जाएगी।

फिर मैं साईकल चलाने लगा और अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठ गया। फिर हम दोनो बातचीत करते हुए आने लगे। 2 किलोमीटर तक साईकिल चलाने के बाद मैंने अभिषेक से साईकिल चलाने के लिए कहा। अभिषेक साईकिल चलाने लगा। मैं डंडे पर बैठ गया और एक पांव से पैडिल पर मारने लगा जिससे साइकिल की गति तेज हो गई।

मेरे घर से 500 मीटर पहले ही एक छोटा सा बाजार पड़ता है। जो हफ्ते में 3 दिन लगता है। उस दिन बाजार था तो वहां पर गोलगप्पे और टिकिया का ठेला लगा हुआ था। अभिषेक ने साईकिल रोक दी और बोला।

अभिषेक- देख भाई। मुझे तो तलब हो रही है गोलगप्पे खाने ने। तुझे भी खाना है तो आ जा।

मैं- अबे तुझे लड़कियों वाली आदत कब से पड़ गई।

अभिषेक- लड़कियों वाली आदत मतलब। तू कहना क्या चाहता है।

मैं- मतलब ये कि उन्हें ही गोलगप्पे ज्यादा पसंद होते हैं। देखता नहीं गोलगप्पे (गुपचुप, फुलकी) की दुकान पर कितनी भीड़ होती है लड़कियों की। चाहे वो खाना खा कर ही घर से निकलें, लेकिन अगर गोलगप्पे का ठेला दिख गया तो उनको फिर भूख लग जाती है। तेरा हाल भी उसी तरह है।

अभिषेक- देख भाई। पहली बात ये कि मैं कोई खाना वाना खा कर नहीं निकला हूँ। और दूसरी बात जब भूख लगती है तो कुछ भी अच्छा दिखे तो खाने में लड़का, लड़की नहीं देखा जाता। अरे मैं तुझसे बात ही क्यों कर रहा हूँ। तुझे खाना है तो आ नहीं तो मैं जा रहा हूं। साला तुझे भाषण देने के चक्कर में भूख और तेज़ हो गई है।

इतना कहकर अभिषेक गोलगप्पे के ठेले के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़कियां पहले ही गोलगप्पे खा रही थी। अभिषेक जाकर उनके बगल खड़ा हो गया। मैं भी मन मारकर ठेले के पास पहुँच गया।

अब यहां पर अभिषेक की हालत देखने लायक थी। जब लड़की गोलगप्पा उठती और अपने मुंह में डालती तो अभिषेक इस दौरान हुई उनको पूरी क्रिया को देखता और अपने होंठों पर जीभ फिरता। जब उसने दो चार बार ऐसा किया तो मैंने उससे कहा।

मैं- क्या कर रहा है यार तू। कहीं बीच बाजार मरवा न देना तुम।

अभिषेक- मैं क्या करूँ यार। बहुत भूख लगी है और मुंह में पानी आ रहा है और ये लड़कियाँ पता नहीं कितने जन्मों की भूखी हैं कि खाये ही जा रही हैं। जिनको नज़र नहीं आ रहा है कि दो शरीफ लड़के कब से गोलगप्पे खाने के लिए खड़े हैं।

मैं- मैंने तुझसे पहले ही कहा था कि लड़कियों का मनपसंद होता है गोलगप्पा। चल कहीं और चलते हैं कुछ और खाते हैं।

अभिषेक मेरी बात अनसुना कर दिया और कुछ देर इंतज़ार करने के बाद आखिरकार वो बोल ही पड़ा।

अभिषेक- लगता है तुम लोग कई दिन की भूखी प्यासी हो। कब से देख रहा हूँ गोलगप्पे खाए पड़ी हो। मुझे लगता है पूरा ठेला खाकर ही मानोगी तुम लोग।

अभिषेक की बात सुनकर उन लड़कियों ने उसे घूरकर देखा तो अभिषेक अपने दांत निकालकर हंसने लगा। आखिरकार वो लड़कियाँ गोलगप्पे खाकर चली गई। उनके जाने के बाद मैंने अभिषेक से कहा।

मैं- साले तू एक दिन बहुत पिटेगा। तुझे कितनी बार मना किया है कि ऐसे कोई भी बात मत बोला कर खासकर लड़कियों को, लेकिन तू है कि मेरी बात सुनता ही नहीं। जब मार पड़ेगी तो मुझसे मत कहना कि मैंने तुझे आगाह नहीं किया।

अभिषेक- कुछ नहीं होगा यार। कौन सा मैं उनको छेड़ रहा था। मैं तो बस कम खाने के लिए बोल रहा था। अच्छा अब ज्यादा बातें नहीं। गोलगप्पे वाले भैया। हमे भी गोलगप्पे खिलाइए।


फिर शुरू हुआ गोलगप्पे खाने का सिलसिला जो जाकर 70 ₹ पर खत्म हुआ। जिसमें से 10 ₹ का गोलगप्पा मैंने खाया था बाकी के 60 ₹ का गोलगप्पा अभिषेक ने खाया था। उसने गोलगप्पे खाकर एक लंबी डकार ली और अपने हाथ अपनी शर्ट में पोछ कर मुझसे बोला।

अभिषेक- हां। अब लग रहा है कि पेट में कुछ गया है।

मैं- कुछ गया है। भुक्खड़, अगर कुछ देर और खाता तो उसका पूरा ठेला खा डालता तू। कोई इतना खाता है क्या, ऐसा लग रहा था जैसे जन्मों का भूखा है तू।

अभिषेक- जब भूख लगी थी तो क्या करूँ मैं। अब ज्यादा बकचोदी मत कर। तुझे तो मेरे हर चीज से परेशानी है। अब जल्दी से पैसे दे और घर चल। आज कुछ अच्छा बनवाऊंगा खाने के लिए चाची से।

मैं- तू सच में पेटू है। अभी भी तेरा पेट नहीं भरा।

मैंने ये बात मुस्कुराते हुए बोली थी जिसे सुनकर क़र अभिषेक भी मुस्कुराने लगा। फिर मैं गोलगप्पे वाले को पैसे देकर वहां से चल दिया। बाजार पर होने पर मैं साईकिल की सीट पर बैठ गया और साईकिल आगे बढ़ा दी। अभिषेक उछलकर आगे डंडे पर बैठा तभी एक धमाका हुआ।

धड़ाम...... फुस्स सससससस....

उसके उछलकर बैठने से साईकिल का टायर पंचर हो गया। (वैसे टायर पंचर नहीं होता पंचर तो ट्यूब होती है, लेकिन गांव में इसे टायर पंचर ही बोलते हैं) और साईकिल तुरन्त रुक गई। मैं साईकिल स्टैंड पर खड़ीकर अगला टायर देखा तो वो फट गया था। मैं अभिषेक को देखने लगा। वो भी मुझे देख रहा था। मैंने उससे कहा।

मैं- ये सब तेरी वजह से ही हुआ है।

अभिषेक- मेरी वजह से? मैंने क्या किया है।

मैं- तुझे ही बड़ी भूख लगी थी न। और खाया भी तो कितना ठूंस ठूंस कर। फिर भी तेरा पेट नहीं भरा। अभी और खाने की बात कर रहा है। ना तू इतना ज्यादा खाता, न तेरा वजन बढ़ता और न ही टायर पंचर होता।

अभिषेक- देख नयन। अब कुछ ज्यादा ही बोल रहा है तू। मेरे गोलगप्पे खाने से कुछ नहीं हुआ समझे। ये तो टायर कमजोर था साइकिल का। इसलिए फट गया। और इसके लिए तू मुझे मत बोल। अपने आप को देख मुझसे ज्यादा वजन तो तेरा है।

उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। क्योंकि उसने बात एकदम सही बोली थी। मेरा वजन उससे 2-4 किलो ज्यादा ही था। फिर हम दोनों बात करते हुए पैदल ही साईकिल को घसीटते हुए अपने घर की तरफ चल दिये। जब मैं घर पहुँचा तो पापा और काजल दुआर(घर के सामने की खाली जगह) में चारपाई/खटिया डाले बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिषेक तुरंत जाकर पापा के पांव छू लिया और खटिया पर बैठ गया। उसे देखकर काजल ने कहा।

काजल- भैया आज आपका भी परिणाम आया होगा न। क्या हुआ बताओ न।

अभिषेक- वो सब बाद में बताऊंगा। पहले ये मिठाई खा और ये कपड़े रख जो पापा ने तेरे लिए भेजे हैं।

इतना कहकर अभिषेक ने मिठाई का डिब्बा, जो वह घर से लाया था निकालकर काजल को दे दिया साथ में कपड़े का बैग भी दे दिया तब तक मैं भी आकर पापा के पांव स्पर्श किया और उनकी बगल में बैठ गया। अभिषेक ने कहा।

अभिषेक- आपको पता है चाचा जी। मैं और नयन दोनों प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। अभी तक अंक नहीं देखा है। वो आपके सामने देखेंगे।

तबतक मेरी अम्मा भी घर से बाहर आ गई। पापा ने उन्हें देखते हुए कहा।

पापा- अरे सुनती हो भाग्यवान। दोनों बच्चे प्रथम श्रेणी में पास हुए हैं। जाओ इनके खाने लिए मैंने जो जलेबी लाई है उसे ले आओ।

अभिषेक- अरे वाह चाचा जी। आपने बहुत अच्छा किया। मेरे मुंह में पानी आ गया। जल्दी लेकर आइये चाची जी।

मैं- तू कितना बड़ा पेटू है अभिषेक। तेरे मुंह में तो हर खाने वाली चीज को देखकर पानी आ जाता है। अभी आधे घंटे पहले भरपेट गोलगप्पे खाकर आ रहा है। और फिर से तुझे भूख लग गई।


अभिषेक- इतनी दूर पैदल चलवाया तुमने। जो खाया था वो पच गया सब। अब पेट खाली हो गया है तो भूख तो लगेगी ही न और हां चाची जी। आज हम दोनों के पास होने की खुशी में कुछ अच्छा सा बनाइये खाने के लिए।

मम्मी- हां क्यों नहीं मेरे बच्चे पास हुए हैं।

उसके बाद मां एक थाली में जलेबी निकाल कर ले आई। हम सब मिलकर जलेबी खाने लगे और इधर उधर की बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने सबको आधे घंटे पहले बाजार वाली कहानी बता दी कि कैसे अभिषेक ने गोलगप्पे खाते हुए लड़कियों को देख रहा था और कैसे इसके मुंह में पानी आ रहा था और कैसे साईकिल पंचर हो गई वगैरह वगैरह। जिसे सुनकर सब हंसने लगे।

इसके आगे की कहानी अगले भाग में।
Wow superb....sb ache se chal rha hai...
Abhi filhl to dono dosto ke bich kitna pyar hai...kitna apnapn hai...dosto ke priwar m ubhi unke lie kaafi apnapn hai...yh sb dikhaya gya hai...

Ye sb pahle ke time me tha ..lekin ab......
2karan hai...apnapn km hone ke ..
1.sb apne me busy hai...kisi ke pas itna time nhi...
2.btmeji...
Btmeeji ko mai aham role manti hu isme.....sb nhi leki kuch..
Dosto ki hi bahano pr gandi najar dalte hai...
Jbki...dost ki bahan to apni hi bahan honi chahiye na...lekin ab..islie dosto ko ab koi jaada ghr me ghusna psnd nhi krta..
Mere ghud ke ghr me...bhaiya ko unke dosto ko laana alowed nhi hai...
Kyuki ab logo ki mansikta bht nimn str pr pahuch gyi hai...

Dosto ko chhodo...rishtedaro pr bhi koi vishwas nhi krta...
Mummy papa btate hai ki pahle shadi hoti thi to rishtedar apni betiyo ko mahino pahle bhejdiya krte the..taki shadi wale ghr me help ho jaye...
Lekin ab...ab to koi ek din pahle na bheje...vajah wo hi...apni beti ki safety chahte hai sb...

Pahle pdos ke ldke ke sath beti ko dur dyr bhej diya krte the...bina kisi dr ke...
Lekin ab...
Ab to mama ya chahcha ke bete ke sath na bheje...kitni vishvasniyta kho di hai hm logo ne...isse apse pyar prem sb khtm ho gya...
Khair mai bhi kaha pahuch gyi..

Well achha lga dono ke priwaro ke pyar ko dekhte hue...lekin yha thoda peso ka ghamand abhshek ki maa ko hai...
Baki sb achhe hai...
Golgappe khana...fr tyre punchur....or last me ghar aakar thodi si msti...bahut achha apdate tha mahi ji...

Welldone...
 

Mahi Maurya

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majedar update ..abhishek to golgappe pet bharke kha liya 🤣..aur ghar aane par jilebi ka naam sunke mooh me paani aa gaya ..
abhishek ki maa ko paise ka ghamand hai aisa lagta hai ,jo abhishek ko nayan se dosti todne ko kehte rehti hai ..
बहुत बहुत धन्यवाद इस बेहतरीन समीक्षा के लिए।

साथ बने रहिए।
 
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Mahi Maurya

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abhi tak mane jitni bhi story padhi to sirf story padh ke nikal leta tha first time ye sab bhi padha to kahna padega story se jyada mja to isme hi arha
😂😂😂😂😂
आपको जिसमे मज़ा आ रहा है वही पढ़िए।

well story start accha hai bus update time mille yahi request hai vese me jaldi kisi story me review ya comment nhi deta kuch khas story chod ke but idhr dene ka mn kiya
बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
आप अगर कहानी नियमित पढ़ेंगे तो आपको हमारी नियमितता के बारे में पता चल जाएगा।

साथ बने रहिए।
 

Mahi Maurya

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आम्रपाली दुबे और पवन सिंह के " रात दीया बुता के पिया क्या क्या किया " से मजेदार डांस इस गाने पर होता -
" छलकता हमरो जवनियां ये राजा ,
जईसे की बलटी के पनियां हो । "
काजल राघवानी और पवन सिंह का गीत । :D

वैसे भोजपुरी गानों पर कोई भी नाचने को विवश हो जाए ।
आप सही कह रहे हैं पहले तो हमने यही सोचा था, लेकिन बाद में मूड बदल गया।
अभिषेक और नयन दोनों के संस्कार ही अच्छे नहीं हैं बल्कि पढ़ाई में भी वे तेज है । फर्स्ट डिवीजन से पास होना कोई मामूली चीज नहीं है । रिजल्ट के टाइम लड़कों की जो मानसिक स्थिति होती है वो अभिषेक और नयन के माध्यम से बहुत ही अच्छे तरीके से दिखाया गया है ।

नयन के पिताजी के इस विचार से मैं भली-भांति सहमत हूं कि जो दुसरों की बहन बेटियों पर बुरी नजर रखता है , उसकी भी बहन बेटियां बुरी नजर से देखी जाती है ।


साइकिल पर अपने दोस्त को बैठाकर स्कूल या घुमने फिरने जाना..... बचपन की याद दिला गया ।
अभिषेक को गुपचुप बहुत पसंद है । लेकिन मुझसे ज्यादा नहीं । एक समय था जब मैं पचास से अधिक गुपचुप खा लेता था पर अभी भी कम से कम बीस पच्चीस तो खा ही लेता हूं । :D

गांवों की सबसे प्रसिद्ध मिठाई ---- जिलेबी ! हर त्योहार या किसी भी खुशी के ओकेजन में घरों में जिलेबी आता ही था । और क्या स्वादिष्ट होता था ! शायद गांवों की पानी के वजह से था ।
मेरा फेवरेट एक चाट और एक मिठाई तो हो गया । बस एक और बाकी रह गया है - रसगुल्ला । बंगाल का रसगुल्ला ।
इस खुशी के मौके पर डिनर में रसगुल्ला तो होना ही चाहिए । :loveeyed2:

बहुत ही सुन्दर लिख रही हैं माही जी । ऐसे ही गांवों की खुशबू बिखेरते रहिए ।
बहुत बहुत धन्यवाद सर जी इस शानदार प्रतिक्रिया के लिए।

साथ बने रहिए।
 

Mahi Maurya

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1 -jab 18 years old ( 2017)tha tab allahabad me mts ka exam tha Mera waha aur waha log itne bade lutere ki gadi bhada doguna wasul kiye the aur khane ka dam to puchho hi mat ...
किसी परीक्षा के समय और किसी मेले के समय इलाहाबाद की हर चीजे महंगी हो जाती है। वरना 30 रु. में इतना खाना मिल जाता है कि किसी की भी 8-10 घंटे की भूख मिट जाती है।
2 :- Mai 8th class Tak sochata rha ki naini se hokar Jo longitude line gujari hai wo sach me jamin par khichi gayi ..aur maje baat ye hai ki Mai bad me samajh gaya tha ki wo ek imaginary line hai but jab naini gaya to waha ke ek aadami se puchha ki Bhai yaha Kya sach me longitude Rekha khichi gayi hai😆😆
ये सबका यही हाल है। हम यहीं के हैं तो मुझे बचपन में ऐसा ही लगता था। लेकिन बाद में पता चला कि ये एक काल्पनिक रेखा है।😎😎😎
 
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Mahi Maurya

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kya bat hai shuruwaat hi prayagraaj se huyi hai badhiya
shaandaar update hai badhiya tarise se intro diya hai pure pariwaar aur nayan ke dost logis ka jabardast
To nayan bhai ka 10th ka result aane wala hai aur janab tension main hai waise ab result ki itni kya tension lena jo hona hai wo to hoga hi jitna exam main likha hoga utne hi marks milenge :D (waise ye baat passout hone ke baad sab bolte hai par jab hamara result aata tha tab fati padi hoti thi :shhhh: )
khair abhi to nayan babu apne mitra se milne nikle hai par yaha mujhe payal ke irade thik nahi lag rahe dekhte hai aage kya hota hai
badhiya update shandaar shuruwat :superb:
आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर जी।

साथ बने रहिए।
 
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