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Lazy villain
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पंद्रहवाँ भाग
तनु के प्यार का इजहार को मानने के बाद महेश के कहने पर अभिषेक हमें रसगुल्ला खिलाने ले गया। दुकान पर जाने के बाद अभिषेक ने एक एक प्लेट में दो रसगुल्ले की तीन प्लेट का ऑर्डर दिया। थोड़ी देर बार रसगुल्ले की प्लेट हम लोगों के सामने आ गई। महेश रसगुल्ले पर टूट पड़ा। हम दोनों का एक रसगुल्ला भी नहीं खत्म हुआ था और महेश की प्लेट साफ हो चुकी थी। वो हम दोनों की तरफ ललचाई हुई नजरों से देख रहा था। अभिषेक ने उससे पूछा।
अभिषेक- अब क्या है। ऐसे क्यों देख रहा है। नजर लगाएगा क्या।
महेश- अबे और खाने का मन है। तू कहे तो और ले लूँ।
अभिषेक- रसगुल्ला मन बदलने और स्वाद लेने की चीज होती है। पेट भरने की नहीं। ठीक है ले ले।
फिर महेश ने अपने लिए और रसगुल्ला मंगा लिया। कुछ देर में उसने वो रसगुल्ले खा डाले और अभिषेक की तरफ फिर से देखने लगा। अभिषेक ने उससे फिर कहा।
अभिषेक- अब क्या है। और खाएगा क्या।
महेश ने बेचारे सी शक्ल बनाकर हाँ में सिर हिलाया। अभिषेक ने उससे कहा।
अभिषेक- साले एकदम पेटू है क्या तू। कोई इतना रसगुल्ला खाता है क्या। शादी नहीं हुई है मेरी जो तू रसगुल्ला पेले पड़ा है।
महेश- भाई बस तू बोल दे कि पेट भर कर खिला दें। 4 तो खा ही चुका हूँ ज्यादा से ज्यादा 2-3 और खाऊँगा। बोल दे न भाई।
महेश की बात सुनकर मैंने भी सोचा की महेश सही कह रहा है। और कितना खाएगा। 2-3 में पेट तो भर ही जाएगा। तो यही सोचकर मैंने उसे भरपेट रसगुल्ला खाने के लिए बोल दिया। बस फिर क्या था। महेश ने जो रसगुल्ला खाना शुरू किया तो खाता गया खाता गया। और आखिरकार 16 रसगुल्ला खाकर उसने एक लम्बी डकार ली और पानी पीने लगा। मैं और अभिषेक आँखे फाड़े महेश को देख रहे थे। इतने वर्षों की दोस्ती में आज बता चल रहा था कि महेश रसगुल्ले के लिए कितना पेटू है। जब महेश पानी पी कर खाली हुआ तो मैंने कहा।
मै- ये सब क्या था बे। कोई ऐसे खाता है क्या। कितने दिन से भूखा था तू। आस-पास देश सभी तुझे ही देख रहे हैं। और सोच रहे होंने कि कैसा भुक्खड़ इनसान है ये।
मेरी बात सुनकर महेश ने आस-पास देखा तो कुछ लोग महेश को ही देख रहे थे अजीब नजरों से। कुछ देर बाद अभिषेक ने महेश से कहा।
अभिषेक- साले मुझे पता होता कि तू आज मेरा बैंड बजाकर रहेगा तो मैं तुझे कभी न खिलाता रसगुल्ला। साले पूरा 16 रसगुल्ला खाया तूने। कम से कम रसगुल्ले का आकार देख लेता। छोटा वाला रसगुल्ला नहीं था ये मेरे बाप। बड़ा वाला था। मेरी बारात में नहीं आया था तू जो इतना छककर खाए पड़ा था। मेरी तो महीने भर का जेब खर्च तूने एक ही दिन में साफ कर दिया। देखने मेरी बददुआ लगेगी तुझे। कल तेरी गाँड़ न चल गई तो कहना।
अभिषेक की बात सुनकर महेश खीस निपोरने लगा। महेश ने जाकर रसगुल्ले के पैसे दिए हलवाई को। फिर अपने स्कूल चले गए। पूरी क्लास करने के बाद छुट्टी होने पर हम घर आ गए। उसके बाद कुछ खास नहीं हुआ। अगले दिन जब मैं स्कूल पहुँचा तो अभिषेक मुझे स्कूल में दिखा, परंतु महेश कहीं भी दूर-दूर तक नजर नहीं आया तो मैंने अभिषेक से पूछा।
मैं- अभिषेक ये महेश आज स्कूल नहीं आया क्या कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।
मेरी बात सुनकर अभिषेक मुस्कुराने लगा, उसके मुस्कुराने का राज मैं नहीं समझ पाया तो मैंने फिर से अभिषेक से पूछा।
मैं- अरे यार मैं कुछ पूछ रहा हूँ और तू है कि बस मुस्कुराए जा रहा है। आखिर बात क्या है।
अभिषेक- तुझे पता है महेश क्यों नहीं आया है। उसकी तबीयत ठीक नहीं है।
मैं- उसकी तबीयत ठीक नहीं है तो इसमें हँसने की कौन सी बात हो गई है। हमें तो उसके लिए संवेदना जताना चाहिए।
अभिषेक- अरे बात वो नहीं है। बात ये है कि उसकी गाँड़ चलने लगी है। पेट में गुड़गुड़ाहट हो रही है उसके।
मैं- मुझे कैसे पता इस बारे में।
अभिषेक- अरे यार सुबह तड़के उसने मुझे फोन किया था और फोन उठाते ही मुझे गाली देने लगा। कहने लगा मैंने नजर लगा दी है। कल मैंने तो वैसे ही मजाक में वोल दिया था कि तुम्हारी गांड़ चल जाएगी। मुझे थोड़े ही मालूम था कि मेरी कही हुई बात सच हो जाएगी। सुबह से कई बार मुझे फोन कर चुका है बोल रहा है कि मेरी जुबान ही काली है। अब उसे कौन समझाए की ये सब मेरी जुबान का कमाल नहीं है कल खाए हुए 16 रसगुल्ले का कमाल है।
अभिषेक की बात सुनकर मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई। फिर हम दोनों अपनी कक्षा में जाने लगे तभी अभिषेक को फोन बजा। अभिषेक ने देखा तो महेश का ही फोन था। अभिषेक ने फोन मुझे दिया तो मैंने फोन उठाया। जैसे ही फोन मैंने अपने कान में लगाया महेश की मधुर वाणी मेरे कानों में शहद घोर लई।
महेश- साले भोस......ले। तू कभी सुखी नहीं रहेगा। भगवान करे एक दिन तेरे साथ भी यही हो। गाँडू तुझे पता है। सुबह से मैं नहर किनारे ही बैठा हूँ। घर भी नहीं जा पा रहा हूँ। घर जाते हुए रास्ते से मुझे वापस लौटना पड़ता है। ये सब तेरा किया धरा है साले।
मैं- और जो तुमने बिना सोचे समझे पेट भर के रसगुल्ले खाए थे उसका क्या। ये सब उसी का परिणाम है महेश।
महेश- अरे नूनू भाई। माफ करना भाई। मैंने सोचा वो साला अभिषेक है फोन पर। ये रसगुल्ले के कारण नहीं हुआ है। मैंने पहली वार थोड़े ही न रसगुल्ले खाए हैं। इसके पहले भी मैंने बहुत बार ऐसे ही खाए हैं, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ। ये सब अभिषेक की काली जुबान की वजह से हुआ है। आहहहहहह.. मेरा पेट। भाई तू फोन रख। फिर से आई है। मैं जा रहा हूँ।
इतने कहकर महेश ने फोन काट दिया। मैने अभिषेक की तरफ देखा। तो वो मुझे ही देख रहा था। लगभग 3 सेकेण्ड बाद अचानक से दोनो के मुँह से हसी का ठहाका निकल पड़ा और हम दोनो हँसते हँसते अपनी कक्षा मैं चले गए। कक्षा में जाने के बाद देखा कि अभिषेक की मैना मतलब तनु पहले से ही कक्षा में बैठी हुई थी। उसने अभिषेक हो हाय... का इशारा किया। मैं चुपचाप अपनी सीट पर जाकर बैठ गया और पढ़ाई करने लगा। इसी तरह ये दिन भी बीत गया।
अगले दो दिन तक महेश स्कूल नहीं आया था। इन दो दिनों में कोई खास बात नहीं हुई। उसके बाद अगले दिन इतवार था। चौथे दिन महेश स्कूल आया। वो रोज की अपेक्षा कुछ ढीला लग रहा था। उसने मुझसे हाथ मिलाया अभिषेक की पीठ पर एक मुक्का मारा। अभिषेक अपनी पीठ को सहलाते हुए कहा।
अभिषेक- ये क्या है बे। मुझे क्यों मारा तूने।
महेश- साले तेरा प्यार मुझे रास नहीं आया। तेरे प्यार ने मेरे पेट के छक्के छुड़ा दिए।
महेश की बात सुनकर हम सब हँसने लगे। इसी तरह दिन बीतते रहे और अभिषेक और तनु का प्यार और गहरा होता जा रहा था। इस दौरान मैंने और महेश ने एक बात ध्यान दी कि तनु का व्यवहार अब मेरे और महेश के प्रति वैसा नहीं रह गया था जैसा पहले हुआ करता था। अब वो मुझसे और महेश से ठीक से बात भी नहीं करती थी। किसी भी छोटी सी बात को लेकर वो चिढ़ जाया करती थी। ये सब अभिषेक के सामने होता था पहले तो अभिषेक ने तनु को दो-चार बार समझाया भी लेकिन अब वह भी कुछ नहीं वोलता था, इस बात से कभी मुझे गुस्सा भी आता था। मुझे लगने लगा था कि ये तनु अभिषेक को मुझसे दूर ले जा रही है और अभिषेक मुझसे दूर जा रहा है। एक दिन मैं और महेश स्कूल के परिसर में बैठे हुए बातें कर रहे थे। अभिषेक और तनु हमसे कुछ दूरी पर बैठे हुए थे। तभी महेश ने मुझसे कहा।
महेश- यार नूनू। मैं कई दिनों से तुझसे एक बात कहना चाहता हूँ। पता नहीं ये सच है या मेरा भ्रम। लेकिन बात हमसे जुड़ी हुई है।
मैं- ऐसी क्या बात है यार। तू बता तो सही।
महेश- यार मुझे लग रहा है कि तनु और अभिषेक बदल गए हैं। अब तनु का बर्ताव हम दोनों के प्रति पहले की तरह नहीं रह गया है। बात बात पर चिढ़ जाती है। ऐसा लगता है जैसे उसके कोई मकसद पूरा हो गया हो और हमे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया उसने। अभिषेक भी अब पहले की अपेक्षा कम बात करता है हमसे। हो सकता है ये मेरा वहम हो, लेकिन यही बात कई दिनों से मेरे मन में आ रही थी।
मै- नहीं यार ये तेरा बहम नहीं है। मैंने भी इस बात को कई बात नोट किया है। तनु के बर्ताव से तो ऐसा ही लगता है यार की वो अभिषेक को मुझसे दूर लेकर जा रही है। इस बारे में हमें अभिषेक से बात करनी पड़ेगी। मुझे लगने लगा है कि मुझसे गलती हो गई है अभिषेक को तनु का प्यार स्वीकार करने की सलाह देकर। जिस तरीके से अभिषेक पर तनु अपना एकाधिकार जमाने लगी है, मुझे लगता है कि तनु अभिषेक के लिए सही लड़की नहीं है।
महेश- सही कह रहे हो तुम नूनू भाई। हमे अभिषेक से इस बारे में बात करनी चाहिए।
इसके बाद हम अपनी कक्षा में चले गए। छुट्टी की बाद मैं घर लौट आया। रात को खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में आकर लेट गया और सोचने लगा। मुझे अभिषेक से बात करनी चाहिए या नहीं। कहीं अभिषेक ने मेरी बातों के गलत मतलब निकाल लिया तो। मुझे तनु से कोई मतलब पहले भी नहीं था और अब भी नहीं था, मैं बस अभिषेक को लेकर चिंतित था। आखिरकार मैंने फैसला लिया कि सही समय देखकर किसी दिन अभिषेक से बात करनी पड़ेगी। लेकिन हर समय तो तनु उसे घेरे रहती है तो उससे बात हो भी तो कैसे। फोन पर ये सब बात करना ठीक नहीं था। अगले दिन मैं स्कूल गया उस दिन महेश नहीं आया था उसने मुझे फोन करके पहले ही वता दिया था। भोजनावकास के समय मैं अकेले बाहर बैठा हुआ था तभी अभिषेक और तनु मुझे अकेला देखकर मेरे पास आकर बैठ गए। अभिषेक ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
अभिषेक- क्या बात है यार नयन। तु किसी सोच में डूबा हुआ है।
मैं- अभिषेक मुझे तुझसे कुछ जरूरी बात करनी है।
अभिषेक- हाँ बता न क्या बात करनी है तुझे।
मै- मुझे सिर्फ तुझसे बात करनी है वो भी अकेले में।
मेरी बात सुनकर तनु ने अजीब सा मुँह बना लिया। अभिषेक तनु को वहीं बैठने को बोलकर मेरे साथ थोड़ी दूर आकर बैठ गया और बोला।
अभिषेक- अब बता क्या बात है।
मै- देख अभिषेक मैं जो बात करने जा रहा हूँ हो सकता है तुझे खराब लगे, क्योंकि ये बात हम चारों से संबंधित है। मुझे लगता है कि तनु का प्यार तुम्हें मुझसे दूर ले जा रहा है। ये मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता। तनु का व्यवहार भी मेरे साथ पहले जैसा नहीं रह गया है। और तू भी उसे कुछ नहीं कहता। और मुझे ये भी लगता है कि तनु तेरे लिए सही लड़की नही है।
अभिषेक- ये क्या बात कर रहा है तू। पागल हो गया है, क्या बकवास किए जा रहा है। मैं तुझसे कभी दूर जा सकता हूँ भला। तू तो मेरा भाई है यार। तनु को लेकर तेरे मन में जो भी है वो इसलिए है कि तुझे लगता है कि उसके आने से मैं तुझसे दूर हो गया हूँ। लेकिन मुझे नहीं लगता कि तनु ऐसी लड़की है जो हम दोनों को अलग करने का सोचे।
मै- मैं सही कह रहा हूँ तू सच में मुझसे दूर हो गया है। अब पहले जैसा नहीं रह गया है तू अभिषेक। तू और महेश ही हैं मेरे दोस्त, लेकिन तुझे तनु मुझसे दूर कर रही है। मैं ये नहीं होने दूँगा अभिषेक, मैं तनु से सीधे इस बारे में बात करूँगा।
मैंने ये बात एकदम गमगीन होकर कहा था, मेरी आँखें भर आई थी ये बात कहते हुए। अभिषेक ने मुझे इस हालत में देखा तो मुझे अपने गले लगा लिया और बोला।
अभिषेक- मुझे माफ कर दे भाई। ये सही है कि मैं इन कुछ दिनों में तुमको ज्यादा समय नहीं दे पाया, लेकिन ये भी सही है कि तेरे लिए मैं ऐसी कई तनु को छोड़ सकता हूँ। लेकिन तेरी दोस्ती नहीं छोड़ सकता, तुझे नहीं छोड़ सकता। तू मेरे दोस्त भी है और भाई भी है। तू कहे तो मैं आज ही तनु से अलगाव कर लूँ। लेकिन यार तू ऐसे रो मत। अब मुझसे ऐसी गलती कभी नहीं होगी। मैं आगे से तुझे शिकायत का कोई मौंके नहीं दूँगा।
अभिषेक की बात सुनकर मुझे अपने आपपर बहुत गुस्सा आया, मुझे अपनी सोच पर गुस्सा आया कि मैं अभिषेक को बचपन से जानता हूँ उसके बाद भी मैंने उसपर शक किया। लेकिन क्या करता मैं एक अनजाना भय मेरे अंदर बैठ गया था उससे दूर होने का, मैं अभिषेक से अलग होकर उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा।
मै- मुझे माफ कर देना भाई। गलती मुझसे हुई है। मैंने पता नहीं क्या क्या सोच लिया था तेरे बारे में।
अभिषेक- चल अब ये ड्रामा बंद कर और चल यहाँ से नहीं तो लोग हमारे बारे में पता नहीं क्या क्या सोच लेंगे।
अभिषेक की बात सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। और हम दोनो हँसते हुए वहाँ से चले गए।
इसके आगे की कहानी अगले भाग में।
16 rasgulle kha gaya Mahesh wow yaar ...lekin bechare ka pet kharab ho gaya hai