Update #16
आज रात हर्ष ने एक बड़ा ही सुखद सपना देखा... वो और सुहासिनी अपने उसी कैर के कुञ्ज में साथ में बैठे हुए थे। कुछ अलग ही तरह का सपना था वो, जो पूरी तरह से हर्ष को समझ में भी नहीं आ पाया। लेकिन, जब वो सुबह उठा, तो उसको लगा कि इतना सुन्दर सपना उसने शायद पहले कभी नहीं देखा था।
दिन में सुहासिनी से जब मुलाकात हुई तो वो बोला,
“आपको पता है... कल रात... कल रात हमने अपने सपने में आपको देखा।”
सुहासिनी यह सुन कर लाज से मुस्कुराने लगी।
“हमारी इच्छा होती कि हम पूरे दिन भर... बस आपके साथ ही बैठे रहें...” वो बोले जा रहा था।
“हमारी भी...” सुहासिनी ने लज्जा से दोहरी होते हुए, बुदबुदा कर कहा।
दोनों के ही चेहरों पर मुस्कान थी।
“भैया और भाभी माँ भी एक दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं!” थोड़ी देर बाद हर्ष ने कहा - निष्प्रयोजन!
“हाँ...” यह कोई वार्तालाप नहीं था।
सुहासिनी के चेहरे की मुस्कान और भी बढ़ गई थी।
“आपको पता है... कुछ दिनों पहले हमने उनको कुछ करते हुए देखा...” हर्ष बोलते बोलते कुछ सोचकर रुक गया।
“क्या कर रहे थे?” सुहासिनी के स्वर में एक आत्मीय जिज्ञासा थी।
हर्ष कुछ क्षण चुप रहा, और फिर बड़े ही अप्रत्याशित ढंग से उसने सुहासिनी का एक गाल चूम लिया। एक कोमल, बाल-सुलभ चुम्बन... जो शायद केवल बच्चे ही कर सकते हैं... निष्पाप और प्यारा!
किन्तु यह अप्रत्याशित था। सुहासिनी घबराकर थोड़ा पीछे हट गई और स्तब्ध सी होकर हर्ष को देखती रही।
“आपको खराब लगा?”
सुहासिनी ने ‘न’ में सर हिलाया। लेकिन लज्जा की सुन्दर सी रक्तिम लालिमा उसके पूरे शरीर पर फ़ैल गई।
थोड़ी देर दोनों के बीच कोई संवाद नहीं हुआ। शायद बात आई-गई हो गई!
आज और भी भीषण गर्मी थी। हर्ष गर्मी के कारण पसीना पसीना हो गया था।
आज उसकी ये दशा देख कर सुहासिनी को हँसी नहीं आई... बल्कि उसके मन में ‘पत्नी वाले दायित्व’ की भावना आ गई, कि काश वो अपने राजकुमार को थोड़ी सी भी राहत दे सके! वो अल्हड़, चंचल लड़की अचानक ही न जाने कहाँ गायब हो गई, और उसका स्थान वापस उस गरिमामई लड़की ने ले लिया, जिस पर हर्ष मोहित हुआ था।
उसने अपनी चुनरी से, हर्ष के चेहरे पर से चुहचुहाते पसीने को सुखाने का उपक्रम शुरू कर दिया।
हर्ष ने बड़े प्रेम से सुहासिनी को निहारा।
सुहासिनी ने हर्ष को अपनी तरफ़ देखते हुए देखा, तो लजा कर उसने अपनी नज़रें नीची कर लीं।
उसकी यह हरकत हर्ष को इतनी प्यारी लगी कि उसने न जाने किस भावना से वशीभूत हो कर सुहासिनी के उस हाथ को चूम लिया, जिस हाथ से वो उसका पसीना सुखा रही थी। इन दो चुम्बनों के कारण, अचानक ही दोनों के बीच संवाद में शब्दों की आवश्यकता जैसे समाप्त हो गई हो! जब संवाद भाव-भंगिमाओं, और संकेतों में हो, तो उसमें शब्दों का क्या स्थान?
सुहासिनी लजा तो गई, लेकिन फिर भी उसने पसीना सुखाना बंद नहीं किया।
उधर हर्ष को अपनी पसंद, अपने प्रेम पर इतना अभिमान हो रहा था कि वो कुछ कह ही नहीं सकता था। सुहासिनी का रमणीय, गरिमामय रूप भी कितना सुहाना था, और उसका अल्हड़, सरल रूप भी! वो पानी की तरह पारदर्शी थी - उसमें न तो कोई दिखावा था, और न ही कोई मिलावट!
चुनरी हटने के कारण, सुहासिनी के सीने पर केवल उसकी कुर्ती ही रह गई थी। और उस दिन की याद हर्ष के मानस-पटल से हटी नहीं थी। हर्ष की दृष्टि वापस सुहासिनी के कुर्ती के महरम पर पड़ी। सुहासिनी की कनपटियों से नन्ही नन्ही, बूँद बूँद कर के रिसता पसीना, उसके गले से होता हुआ उसके सीने पर, उसकी छातियों के बीच के हिस्से को भिगो रहा था! और इस बात का गवाह था उसकी कुर्ती के सामने बढ़ता हुआ गीलापन!
वह दृश्य देख कर हर्ष के अंदर, अल्पवय की उदात्त भावनाएँ अचानक से हिलोरें भरने लगीं! हर्ष ने हाथ बढ़ा कर पसीने की क्षीण, पतली धारा को पोंछ दिया।
अगर कोई और होता, तो सुहासिनी उस बढ़े हुए हाथ को झटक देती... और यदि उसके सामर्थ्य में होता, तो उस हाथ को कटार से काट भी देती! कोई और समय होता, तो संभव है सुहासिनी हर्ष की इस हरकत का भी कोई विरोध करती! लेकिन इस समय... इस समय, न जाने क्यों उसको हर्ष का ऐसा करना उचित लगा। हर्ष भी बहुत घबराया हुआ था - उसको स्त्रियों और लड़कियों के साथ सभ्य व्यवहार करना सिखाया गया था! और इस समय वो जो कर रहा था, वो सभ्य तो शायद नहीं ही था! लेकिन, सुहासिनी तो अपनी थी! अपनी पत्नी के साथ तो अंतरंग हुआ जा सकता है न? लेकिन ऐसे ही निश्चय - अनिश्चय के बीच हर्ष के मन में एक अनोखी लालसा जाग उठी!
हर्ष ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए, और सुहासिनी की कुर्ती के बटनों में उलझा दिए। सुहासिनी का दिल धक्-धक्-धक्-धक् कर के तेजी से धड़कने लगा। इस बात की उम्मीद नहीं थी उसको, लेकिन अब जब ये बात उसके साथ हो रही थी, वो उसको रोकने में अक्षम थी! और तो और, वो इस बात को होने से रोकना भी नहीं चाहती थी।
कुछ ही क्षणों में उसकी कुर्ती के सभी बटन खुल गए थे - लेकिन सुहासिनी को लग रहा था कि कितना समय हो गया! वो जानती थी कि अगले किसी ही पल वो अपने राजकुमार के सामने अभूतपूर्व तरीके से नग्न होने वाली थी! अभूतपूर्व इसलिए, क्योंकि उसको आज तक उस रूप में अन्य किसी ने भी नहीं देखा था। उसके मन में एक अजीब सी घबराहट होने लगी - कि क्या राजकुमार को वो पसंद आएगी?
जैसे ही उसकी कुर्ती के दोनों पट अलग हुए, हर्ष के गले से एक आश्चर्यजनक, संतुष्ट, किन्तु दबी हुई आह निकल गई।
छोटे छोटे नारंगी के फलों के आकर के गोल-मटोल, और उन्ही के जैसे थोड़े सख़्त, थोड़े मुलायम, थोड़े चिकने, तो थोड़े खुरदुरे, और अत्यंत युवा स्तन!
“अति सुन्दर...” उसके मुँह से स्वयं ही बढ़ाई निकल गई।
सुहासिनी को शर्म आ रही थी, लेकिन एक गज़ब का आंदोलन भी हो रहा था उसके मन में! उसको लग रहा था जैसे घण्टों बीते जा रहे हों - उसका राजकुमार उसके स्तनों को बड़ी लालसा, बड़ी रुचिकर दृष्टि से देखे डाल रहा था।
रहा नहीं गया सुहासिनी से, “राजकुमार जी...?”
उसको आशा थी कि शायद राजकुमार उसको यूँ ताकना रोक दें, लेकिन हुआ उसका उल्टा! हर्ष पुकारे जाने पर जैसे किसी तन्द्रा से जागा। और जागते ही वो अपनी इच्छाओं पर क्रियान्वयन करने लगा। वो सुहासिनी की कुर्ती को उसके शरीर से उतारने लगा। वो भी हर्ष की इस हरकत में सहायता करने लगी। कुछ ही क्षणों में सुहासिनी कमर के ऊपर पूरी तरह से नग्न थी।
हर्ष ने अपनी सुहासिनी को मन भर के देखा - कमसिन, क्षीण से शरीर वाली लड़की! लेकिन नग्न हो कर कैसी सुन्दर सी लग रही थी! मनभावन! कामुक भी!
“तुम बहुत सुन्दर हो, सुहासिनी!” हर्ष ने कहा, और बढ़ कर उसको अपने आलिंगन में भर लिया।
सुहासिनी भी, और हर्ष भी, दोनों के ही शरीर काँप रहे थे। नया एहसास था ये। अपरिचित, और थोड़ा डरावना भी! कुछ देर दोनों ऐसे ही आलिंगनबद्ध हुए रहे, फिर हर्ष से जैसे रहा नहीं गया। उसने सुहासिनी को अपने से अलग किया, और बारी बारी से उसके दोनों स्तनों को चूम लिया।
‘बाप रे!’
सच में, न जाने कैसे अजीब शय थे ये दोनों अंग, कि हर्ष के चूमते ही, उसके पूरे शरीर में कँपकँपी दौड़ गई! यह तो एक बात हुई! उस दिन की ही भाँति फिर से सुहासिनी को अपना पूरा शरीर तपता हुआ महसूस हुआ! लज्जा की लालिमा उसके पूरे शरीर पर फ़ैल गई!
साथ ही वापस आ गया उस दिन का संशय! उसने अपने मन को मना लिया था कि स्तन तो बच्चों के भरण-पोषण के लिए होते हैं, इसलिए उनका पति के लिए कोई उपयोग नहीं है। लेकिन राजकुमार के चुम्बन ने उस आश्वासन को डिगा दिया।
‘क्या करने वाले हैं ये?’
सुहासिनी के मन में यह विचार आया ही, कि अगले ही पल उसको अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया।
हर्ष ने सुहासिनी का एक चूचक अपने मुँह में भर लिया और उसको चूसने लगा!
सुहासिनी को जो एहसास हुआ, उसको वो शब्दों में बयान नहीं कर सकती थी! जैसे ही हर्ष ने उसके चूचक को मुँह में लिया, वैसे ही उसको गुदगुदी का एक ज़ोरदार झटका सा लगा! और जैसे जैसे चूषण की अवधि बढ़ती गई, वैसे वैसे ही उसके पूरे शरीर में कामुक तरंग फैलती गई। अभी तक उसको वैसा अनुभव नहीं हुआ था! एक और एहसास हुआ - सुहासिनी को लगा कि जैसे उसका पेशाब निकल गया हो! उसका पूरा शरीर अनियंत्रित हो कर काँप रहा था, और उधर हर्ष उसका दूसरा दूसरा चूचक पीने में व्यस्त हो गया था। सुहासिनी बहुत कमज़ोर सा महसूस कर रही थी। ऊपर से यह संज्ञान कि उसका पेशाब निकल गया है, उसके कारण उसको एक अलग तरह की शर्म आ रही थी। उसका मन हो रहा था कि अब वो अपने घर चली जाए!
लेकिन वो चाहती थी कि राजकुमार को अपने मन का ‘आनंद’ मिल जाए।
हर्ष को अपार आनंद मिल रहा था। जोश में आ कर वो ज़ोर ज़ोर से चूस रहा था। लेकिन शायद जिस बात की उसको उम्मीद थी, वो नहीं हो रही थी। अंततः उसने सुहासिनी के स्तनों से खेलना बंद किया। इतनी देर में दोनों की ही साँसें उखड़ गई थीं, जिनको संयत कारने में थोड़ा समय लगा।
जब दोनों के होश थोड़ा वापस आए तब सुहासिनी ने पहले तो अपनी कुर्ती वापस पहनी, और शरमाते सकुचाते हर्ष से बोली,
“राजकुमार जी... अभी इनमें दूध नहीं आता...”
उसकी बात सुन कर हर्ष ने बड़ी हैरत से सुहासिनी की तरफ़ देखा।
“आपको कैसे पता कि हम आपका दूध पीना चाहते हैं?”
“उस दिन भी आप इन्ही को देख रहे थे... और आज...! अब अगर ये दूध पीने की चाहत नहीं है, तो फिर और क्या है?”
हर्ष मुस्कुराया।
“कब आएगा?”
“जब हमारा बच्चा होगा।” वो शर्माते हुए बोली।
“और हमारा बच्चा कब होगा?”
सुहासिनी अब तक लाज से पानी पानी हो गई थी, “जब आप और हम विवाह के बंधन में बँध जाएँगे...”
हर्ष आनंद से मुस्कुराया, “मतलब जल्दी ही...?”
“हाँ... जल्दी ही!”
“तब हम आपका दूध पी सकेंगे?”
“आप चाहेंगे तो... लेकिन, वो तो हमारे बच्चे के लिए होगा न?”
“हाँ,” हर्ष ने थोड़ी निराशा से कहा, और फिर अचानक ही उम्मीद से बोला, “बहुत नहीं... बस, थोड़ा ही?”
“हा हा...” और बस, अचानक से ही, सुहासिनी फिर से वो चुलबुली सी लड़की बन गई, “हम जाएँ?”
“इतनी जल्दी?”
“लू लग जाएगी... आप भी चलिए!” सुहासिनी ने बड़े प्यार से हर्ष के गले में गलबैयाँ डाल कर कहा, “कल मिलेंगे न फिर!” जैसे उसने हर्ष को समझाया हो।
“वचन है न?”
“आपसे मिले बिना...” उसने बात अधूरी ही छोड़ दी, और हर्ष के माथे को चूम कर उठ गई, और अपने घर की ओर चल दी।
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