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Romance श्राप [Completed]

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avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
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Update #1, Update #2, Update #3, Update #4, Update #5, Update #6, Update #7, Update #8, Update #9, Update #10, Update #11, Update #12, Update #13, Update #14, Update #15, Update #16, Update #17, Update #18, Update #19, Update #20, Update #21, Update #22, Update #23, Update #24, Update #25, Update #26, Update #27, Update #28, Update #29, Update #30, Update #31, Update #32, Update #33, Update #34, Update #35, Update #36, Update #37, Update #38, Update #39, Update #40, Update #41, Update #42, Update #43, Update #44, Update #45, Update #46, Update #47, Update #48, Update #49, Update #50, Update #51, Update #52.

Beautiful-Eyes
* इस चित्र का इस कहानी से कोई लेना देना नहीं है! एक AI सॉफ्टवेयर की मदद से यह चित्र बनाया है। सुन्दर लगा, इसलिए यहाँ लगा दिया!
 
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queen sandhya

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Update #1


“अभिवादन हो महाराज,” राजपुरोहित जी ने अपने आसन से उठते हुए अतिथि-सत्कार गृह में प्रवेश करते हुए ज़मींदार बलभद्र देव का अभिवादन किया।

चंद्रपुर रियासत के ज़मींदार - या राजा ही कह लीजिए - बलभद्र देव करीब पैंसठ साल के युवा थे। रियासत का भारतीय गणराज्य में विलय तो कई वर्षों पहले ही हो चुका था, लेकिन वहाँ की प्रजा में उनके लिए जैसा आदर पहले था, वैसा ही अभी भी था। उनको सभी ‘महाराज’ कह कर ही बुलाते थे। इसके बहुत से कारण थे।

अपने समकक्ष और समकालीन अन्य ज़मींदारों और राजाओं के विपरीत विलासमय जीवन से वो बहुत परे थे। बेहद संयम से अपना जीवन यापन करते थे। यूँ तो वो ज़मींदार थे, लेकिन पढ़ने लिखने की तीव्र प्रेरणा और प्रजावत्सल होने के कारण उन्होंने लन्दन से वकालत की डिग्री हासिल करी थी। जब भारत में अंग्रेज़ों का वर्चस्व था, तब उन्होंने अपनी वकालत, और मृदुभषिता के हुनर के बलबूते अपनी और आसपास की कई रियासतों की जनता को अनावश्यक करभार से छुटकारा दिला रखा था। इस कारण से उनकी जनता उनका बहुत आदर सम्मान करती थी।

स्वतंत्रता मिलने के पश्चात जब रियासतों और जागीरदारी का भारत देश में राजनीतिक विलय की बात उठी, तो उस पहल को सबसे पहले उसको स्वीकारने वालों में से वो एक थे। राय बहादुर मेनन और लौह पुरुष सरदार ने उस कारण से चंद्रपुर में कई सारे राजकीय निवेश करने का वचन दिया, और उस पर अमल भी किया। हाल ही में वहाँ एक राजकीय अस्पताल और दो (एक लड़कों के लिए, और दूसरा लड़कियों के लिए) इंटर कॉलेज भी बनाए गए थे। रेल तंत्र की प्रांतीय पुनर्व्यवस्था अभी हाल ही में संपन्न हुई थी, और उसके कारण चंद्रपुर एक मुख्य रेल-स्थानक बन गया था। जब आम चुनाव हुए, तो उनके विरुद्ध कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं हुआ - इतना सम्मान था उनका!

बलभद्र देव ने सम्मानपूर्वक राजपुरोहित जी के चरण-स्पर्श किए और उनको आसन ग्रहण करने का आग्रह किया।

“चिरंजीवी भव महाराज, यशस्वी भव!” राजपुरोहित ने दोनों हाथ उठा कर उनको आशीर्वाद दिए, और अपने स्थान पर पुनः बैठ गए।

कुछ समय एक दूसरे का कुशलक्षेम पूछने के बाद राजपुरोहित जी अपने प्रमुख मुद्दे पर आ गए।

“महाराज,” उन्होंने हाथ जोड़ कर कहना शुरू किया, “हमारे जीवन में बस एक कार्य शेष रह गया... उसी हेतु एक अंतिम प्रयास है यह,”

बलभद्र जी ने भी हाथ जोड़ दिए, “किस विषय में राजपुरोहित जी?”

उनको समझ में आ रहा था कि विषय क्या है। यूँ ही अकारण राजपुरोहित जी सवेरे सवेरे राजमहल आने वालों में से नहीं थे।

“महाराज, विगत पंद्रह वर्षों से हम राजकुमारी जी के विवाह के लिए कोई सुयोग्य वर ढूँढने में रत हैं... किन्तु अभी तक विफ़लता ही हाथ लगी है।”

बलभद्र जी ने गहरी साँस छोड़ी! तो उनका संदेह सही निकला।

उनकी एक ही पुत्री थी - प्रियम्बदा। अपने पिता के ही समान उनको भी ज्ञानार्जन का बहुत शौक था। लिहाज़ा, वो अपने पिता से भी कई हाथ आगे निकल गईं थीं। जिस समय राजपरिवार अपनी पुत्रियों को फ़ैशन, ऊँचे ख़ानदान में रहने सहने की शिक्षा देते थे, उस समय बलभद्र जी ने प्रियम्बदा को एम.ए. तक की शिक्षा दिलाई। बहुत संभव है कि वो पूरे राज्य में इतनी शिक्षा प्राप्त किये कुछ ही गिने चुने लोगों में से एक हों! जहाँ एक तरफ़ प्रियम्बदा पढ़ने लिखने में लीन थी, वहीं दूसरी तरफ़ बलभद्र जी परमार्थ के कार्य में लीन थे! अब इस चक्कर में राजकुमारी की शादी में विलम्ब होने लगा।

कोई सुयोग्य वर ही न मिलता। ऊँचे राजवाड़े उनके साथ नाता नहीं करना चाहते थे क्योंकि वो राजा नहीं थे, केवल ज़मींदार थे। और उनके समकक्ष ज़मींदारी में प्रियम्बदा जितने पढ़े लिखे लड़के ही नहीं थे। जब लड़कियों का इंटर कॉलेज शुरू हुआ, तब प्रियम्बदा ने ही उसके प्रशासन की कमान सम्हाली, और आज कल वो उसी में व्यस्त रहती थी।

“किन्तु,” बलभद्र जी ने कहना शुरू किया, “आप आज आए हैं... तो लगता है कि कोई शुभ समाचार अवश्य है!”

“महाराज, समाचार शुभ तो है!” राजपुरोहित ने थोड़ा सम्हलते हुए कहा, “किन्तु बात तनिक जटिल है! आपके पास समय हो, तभी आरम्भ करते हैं!” उन्होंने हाथ जोड़ दिए।

बलभद्र जी साँसद थे, और उनके पास काम की कमी नहीं थी। सुबह से ही उनसे मिलने वालों का ताँता लगा रहता था। वो किसी को न नहीं करते थे। और यह सभी बातें राजपुरोहित जी को मालूम थीं।

“कैसी बातें कर रहे हैं आप, राजपुरोहित जी!” उन्होंने भी हाथ जोड़ दिए, “बस... बिटिया का विवाह हो जाए... अब तो हमारी यही इच्छा शेष है! आप बताएँ सब कुछ... विस्तार से!”

“महाराज, हमको ज्ञात है कि आप जैसा विद्वान पुरुष, विद्या-देवी का उपासक, अपने होने वाले दामाद में यही सारे गुण चाहता है... राजकुमारी जी स्वयं विदुषी हैं! तो अंततः हमको एक सुयोग्य वर मिल गया है।”

“बहुत अच्छी बात है ये तो! बताईए न उसके बारे में!”

“अवश्य महाराज,” कह कर राजपुरोहित जी ने अपने झोले से एक पुस्तिका निकालते हुए कहना शुरू किया, “हमारे हिसाब से राजकुमारी प्रियम्बदा के लिए सबसे सुयोग्य वर, राजस्थान की सीमा पर स्थित, महाराजपुर राज्य के राजा, महाराज घनश्याम सिंह जी के ज्येष्ठ सुपुत्र, युवराज हरिश्चंद्र सिंह जी हैं।”

“तनिक ठहरिए राजपुरोहित जी... महाराजपुर? सुना हुआ नाम लग रहा है! क्यों सुना है, ध्यान नहीं आ रहा है!”

“अवश्य सुना होगा महाराज! हम आपको सब बताते हैं!” राजपुरोहित ने बड़े धैर्य से कहा, “लेकिन आप हमारी सारी बात सुन लें पहले!”

“जी!” बलभद्र जी ने फिलहाल शांत रहना उचित समझा।

एक तो प्रियम्बदा बत्तीस की हो गई थी, और इस उम्र में किसी लड़की का विवाह होना संभव ही नहीं रह जाता। ऊपर से राजपुरोहित जी एक राजपरिवार से सम्बन्ध लाए थे। कुछ भी कह लें - अपनी एकलौती पुत्री के लिए एक सुयोग्य वर का लालच तो किसी भी लड़की के पिता में होता ही है!

‘आशा है कि राजकुमार पढ़े लिखे भी हों!’ उन्होंने मन ही मन सोचा।

“युवराज इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में परास्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं, और अंतिम वर्ष में हैं।”

यह सुन कर बलभद्र जी को बड़ा सुख मिला।

राजपुरोहित जी कह रहे थे, “यह सम्बन्ध महाराज की ही तरफ़ से आया है... उनको भी आपके जैसा ही परिवार चाहिए... ऐसा परिवार जहाँ लोग उत्तम पढ़े लिखे हों... अंधविश्वासों से दूर हों!”

“अच्छी बात है...”

“राजपरिवार में चार ही सदस्य हैं... महाराज, महारानी, युवराज, और उनके छोटे भाई! ... युवराज की आयु त्रयोविंशति (तेईस) वर्ष की है...”

“किन्तु राजपुरोहित जी, युवराज तो मेरी प्रियम्बदा से बहुत छोटे हैं...”

“जी महाराज, ज्ञात है हमको!” राजपुरोहित ही ने बलभद्र जी को जैसे स्वांत्वना दी हो, “लेकिन राजकुमारी की आयु उनके लिए कोई समस्या नहीं है। ... वैसे भी, राजकुमारी जी की ख़्याति अब सुदूर क्षेत्रों में भी फ़ैल रही है।”

“आश्चर्य है! राजपुरोहित जी, हमको लग रहा है कि इस हर अच्छी बात के उपरान्त एक ‘परन्तु’ आने ही वाला है!” बलभद्र जी ने हँसते हुए कहा।

जिस अंदाज़ में उन्होंने ये कहा, राजपुरोहित भी हँसने लगे।

“राजपरिवार धनाढ्य है! महाराज भी आप जैसे ही प्रजावत्सल रहे हैं, अतः जनता की शुभकामनाएँ और आशीर्वाद उनको प्राप्त हैं। ... परन्तु, एक समय था, जब ऐसा नहीं था।” राजपुरोहित जी ने ‘परन्तु’ का ख़ुलासा करना शुरू कर ही दिया, “कोई सौ, सवा सौ वर्ष पूर्व महाराज के एक पूर्वज, महाराज श्याम बहादुर पर विदेशी आक्रांताओं का दास होने का आरोप लग चुका है। ... कहते हैं कि वो इतने दुराचारी और अत्याचारी थे, कि उन्होंने किसी को न छोड़ा...! हर प्रकार के दुर्गुण थे उनमें... मदिरा-प्रेमी, विधर्मी, अनाचारी!”

बलभद्र इस बात को रोचकता से सुन रहे थे। बात किधर जाने वाली है, यह कहना कठिन था।

“कहते हैं कि एक बार एक ब्राह्मण संगीतज्ञ, और उसकी पत्नी, जो उसी के समान गुणी गायिका थी, दोनों उसके श्याम बहादुर महाराज के दरबार में आए... दीपोत्सव के रंगारंग कार्यक्रम में भजन - पूजन करने। श्याम बहादुर की कुदृष्टि ब्राह्मण स्त्री पर जम गई! रूपसि तो वो थी ही, उसका गायन भी अद्भुत था! किन्तु जहाँ सभा में उपस्थित अन्य लोग आध्यात्म सागर में डूबे हुए थे, वहीं महाराज को...” राजपुरोहित जी ने बात अधूरी ही छोड़ दी।

समझदार व्यक्ति को संकेत करना ही बहुत होता है। बलभद्र जी समझ गए इस बात को।

“वो रात्रि बहुत अत्याचारी रात्रि थी महाराज!” राजपुरोहित जी ने उदास होते हुए कहा, “कुछ लोग कहते हैं कि उस ब्राह्मण की हत्या कर दी गई... कुछ कहते हैं कि उसको किसी क्षद्म आरोप में कारावास में डाल दिया गया... इस समय तो कुछ भी ठीक ठीक ज्ञात नहीं है! इतने वर्ष बीत जाने पर घटनाएँ किंवदन्तियाँ बन जाती हैं!”

बलभद्र जी ने समझते हुए सर हिलाया। राजपुरोहित ने कहना जारी रखा,

“किन्तु श्याम बहादुर ने उस ब्राह्मण स्त्री के साथ अत्यंत पाशविक दुराचार किया...” राजपुरोहित जी से ‘बलात्कार’ शब्द कहा भी नहीं जा पा रहा था, “... इतना कि वो बेचारी अधमरी हो गई। पूरा समय वो अपने सतीत्व की दुहाई देती हुई महाराज से विनती करती रही, कि वो उस पर दया करें! कि वो उसको छोड़ दें! किन्तु उस निर्दयी को दया न आई!”

बलभद्र जी ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा, “किन्तु वो बहुत पुरानी बात हो गई है न राजपुरोहित जी? ऐसे ढूँढने लगेंगे तो प्रत्येक परिवार में ऐसे अनेकों गूढ़ रहस्य छुपे होंगे?”

“अवश्य महाराज! परन्तु मुख्य बात हमने आपको अभी बताई ही नहीं!” राजपुरोहित जी ने गहरी साँस भरते हुए और थोड़ा रुकते हुए कहा, “किंवदंतियों के अनुसार उस ब्राह्मण स्त्री ने अपनी छिन्न अवस्था में श्याम बहादुर महाराज को श्राप दिया कि पुरुष होने के दम्भ में अगर वो मानवता भूल गए हैं, अगर वो यह भूल गए हैं कि उनका स्वयं का अस्तित्व एक स्त्री के ही कारण संभव हुआ है, तो जा... तेरे परिवार में कन्या उत्पन्न ही न हो!”

“क्या?”

“जी महाराज,” राजपुरोहित जी ने गला खँखारते हुए कहा, “और... श्याम बहादुर महाराज के बाद राजपरिवार में जितनी भी संतानें आईं, उनमें से आज तक कोई भी कन्या नहीं हुई...”

“और उस ब्राह्मणी का क्या हुआ?”

“ज्ञात नहीं महाराज... कुछ लोग कहते हैं कि ब्राह्मण की ही तरह उसकी भी हत्या कर दी गई! कुछ कहते हैं कि ब्राह्मणी को राज्य के बाहर ले जा कर वन में छोड़ दिया गया कि वन्य-पशु उसका भक्षण कर लें... कुछ कहते हैं कि उस दुराचार के कारण ब्राह्मणी गर्भवती हुई और उसने किसी संतान को जन्म दिया! सच कहें, ये सब तो केवल अटकलें ही हैं!”

“हे प्रभु!” बलभद्र जी ने गहरी साँस भरते हुए, बड़े अविश्वास से कहा, “सच में... क्या ये बातें... श्राप इत्यादि... संभव भी हैं?”

“महाराज, संसार में न जाने कैसी कैसी अनहोनी होती रहती हैं! इस श्राप में कितनी सत्यता है, हम कह नहीं सकते! हम तो ईश्वर की शक्ति में विश्वास रखते हैं... सतीत्व में विश्वास रखते हैं...! आपका संसार अलग है! आप तर्क-वितर्क में विश्वास रखते हैं! किन्तु एक तथ्य यह अवश्य है कि महाराजपुर राजपरिवार में विगत सवा सौ वर्षों में किसी कन्या के जन्म का कोई अभिलेख नहीं मिलता!”

“तो क्या इसीलिए...”

“महाराज, आप अंधविश्वासों में नहीं पड़ते, किन्तु समाज उसको मानता है! कुछ दशकों से अनेकों राजपरिवारों ने महाराजपुर राजपरिवार का, कहिए सामाजिक परित्याग कर दिया है। ... एक अभिशप्त परिवार में कौन अपनी कन्या देगा?”

“तो क्या वो लोग अपनी बहुओं को...”

“नहीं महाराज... उसमें आप संशय न करें! ... पुत्रवधुओं का ऐसा सम्मान तो हमने किसी अन्य परिवार में नहीं देखा! अन्य लोग केवल कहते हैं कि उनके घर आपकी पुत्री राज करेगी! किन्तु महाराजपुर राजपरिवार में पुत्रवधुएँ सत्य ही रानियों जैसी रहती हैं! उनका ऐसा आदर सम्मान होता है कि क्या कहें!”

कहते हुए राजपुरोहित जी ने एक पत्र निकाला, “... आप स्वयं मिल लें उनसे! ये महाराज घनश्याम सिंह जी की ओर से आपको और महारानी को निमंत्रण भेजा गया है! ये निमंत्रण पत्र उन्होंने ही लिखा है... हमारे सामने!” और बलभद्र जी को सौंप दिया।

उन्होंने समय ले कर उस पत्र को पढ़ा।

संभ्रांत, शिष्ट लेखन! पढ़ कर ही समझ में आ जाए कि किसी खानदानी पुरुष ने लिखा है। पत्र में महाराज ने लिखा था कि किसी प्रशासनिक कार्य से उनका दिल्ली जाना हुआ था, जहाँ पर उन्होंने राजकुमारी प्रियम्बदा को दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में होने वाले किसी कार्यक्रम में बोलते हुए सुना। उनसे मुलाकात तो न हो सकी, लेकिन जानकारों से पूछने पर उनके बारे में पता चला। और यह कि उनको राजकुमारी प्रियम्बदा, युवराज हरिश्चंद्र के लिए भा गईं। और अगर महाराज की कृपा हो, तो वो राजकुमारी को बहू बना कर कृतार्थ होना चाहते हैं, और राज्य और राजपरिवार की उन्नति में एक और कदम रखना चाहते हैं। पत्र के साथ ही युवराज की तस्वीर और राजपरिवार की भी तस्वीर संलग्न थी।

*
Very nyc stori dear
 

queen sandhya

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Update #2


बलभद्र देव जी किसी प्रकार के अंधविश्वासों में विश्वास नहीं करते थे। और तो और, वो लगभग नास्तिक थे - स्वयं सूर्य और पृथ्वी के पूजक थे। हाँ, यह अवश्य है कि उन्होंने किसी अन्य को अपने विश्वास का पालन करने से मना नहीं किया कभी भी। और अपनी परम्पराओं का भी सम्मान करते थे। लेकिन वो यह समझ रहे थे कि राजपरिवारों से जुड़ने का ऐसा सुनहरा अवसर उनके हाथ लगा है, तो बस अन्य राजपरिवारों के अंधविश्वास के कारण! राजपुरोहित जी के प्रस्ताव लाने के चार महीनों के ही अंतराल में युवराज हरिश्चंद्र सिंह और राजकुमारी प्रियम्बदा का विवाह सम्पन्न हो गया।

यह एक ऐसा विवाह था जिसका चंद्रपुर रियासत को एक बड़े लम्बे अर्से से इंतज़ार था। जनता में आशा थी कि राजकुमारी के युवा होते ही महल में विवाह का नाद होगा; आनंद रहेगा! किन्तु विधि का विधान - वैसा नहीं हुआ। साल दर साल बीत गए... चंद्रपुर की जनता, अपने भावी ‘राजा’ की राह देखती रह गई। अवश्य ही अब देश गणराज्य था, लेकिन राज-परिवारों को ले कर जनता का कौतूहल अभी भी बरकरार था - यहाँ तक कि बेहद सादगी से रहने वाले बलभद्र देव के परिवार को ले कर भी! संभव है कि यह कौतूहल बलभद्र जी के प्रजावत्सल होने के कारण रहा हो! वो जनता के शुभचिंतक थे, तो जनता भी उनकी शुभचिंतक थी! सभी बस यही चाहते थे कि राजकुमारी जी का शीघ्र ही विवाह हो, उनकी संतान हो, और वो चंद्रपुर रियासत का नेतृत्व करे! लेकिन बिना विवाह के कुछ संभव नहीं था।

इसलिए जब दोनों के सम्बन्ध तय होने की खबर चंद्रपुर की जनता में फ़ैली, ये केवल ज़मींदारों का ही नहीं, बल्कि पूरे चंद्रपुर की शान का प्रश्न हो गया। विवाह से एक सप्ताह पहले से ही ढोल-ताशों का नाद बजने लगा था चंद्रपुर में! हर घर में रंगाई पुताई, राजमहल जाने वाले रास्ते के दोनों किनारों पर चूने की लकीर और रास्ते की अच्छी साफ़ सफ़ाई! यह सब काम रियासत के वाशिंदों ने खुद किया... किसी से कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। और विवाह वाली रात पूरी रियासत असंख्य दीयों की रौशनी से ऐसी जगमगा रही हो, जैसे वो दिवाली की रात हो! ये कहना न्यूनोक्ति होगा कि महाराज घनश्याम सिंह ऐसा सम्बन्ध पा कर फूले नहीं समाए।

प्रियम्बदा कोई अपार सुंदरी नहीं थी - सामान्य चेहरे मोहरे, और कद काठी वाली, बत्तीस वर्ष की लड़की थी। थोड़ा साँवला रंग था उसका। अपने पिता का प्रोत्साहन पा कर घुड़सवारी का आनंद उठा लेती थी, लेकिन बस उतना ही! पहले तो उस पर भी उसकी माता का विरोध होता रहता था, लेकिन जैसे जैसे शादी की उम्र निकलने लगी, उसकी माता ने भी उस पर लगाई हुई मनाही थोड़ी कम कर दी। उसमें जो सुंदरता थी, वो सहज सुंदरता थी। लेकिन उसका व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था!

जब महाराज घनश्याम ने प्रियम्बदा को एक सभा को सम्बोधित करते हुए देखा और सुना, तो न जाने क्यों उनको एक आनंद सा महसूस हुआ। उनको लगा कि इस लड़की में उनके घर की बहू, और राज्य की अगली रानी बनने की समस्त खूबियाँ हैं। पता करने पर मालूम हुआ कि वो अभी भी कुँवारी है और खानदानी, राजसी परिवार से है! थोड़ा प्रयास करने से उनको देव परिवार के बारे में सब कुछ मालूम हो गया! उनको अपार हर्ष भी हुआ जब बलभद्र देव महाराज ने उनका विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

सुदूर पूर्व और सुदूर पश्चिम का ऐसा सुन्दर मिलन! आज के समय में सब कुछ होता है, लेकिन उस समय तो कोई स्थानों के नाम भी ठीक से जानता भी नहीं था।

उस समय परिवारों के बड़े ही आपस में बातचीत कर के अपने बच्चों के सम्बन्ध तय कर लेते थे। यहाँ भी यही हुआ था, लेकिन गनीमत यह थी कि बलभद्र जी ने अपनी बेटी को, उसके होने वाले पति के बारे में जितना संभव था, उतनी जानकारियाँ उपलब्ध कराईं। अपने स्तर पर जो संभव था, उन्होंने भावी दामाद के बारे में जानने का प्रयास किया। हरिश्चंद्र, जिसको अब उनके घर ‘हरीश’ नाम से पुकारते थे, एक अच्छा युवा था। अपने समय के पुत्रों के समान उसको भी अपने पिता की, अपने परिवार के सम्मान की बड़ी चिंता रहती थी। इसलिए उसका पूरा प्रयास रहता था कि वो कोई ऐसा कदम न उठाए जिससे कि उसके परिवार का सर नीचा हो। वैसे भी उसके लकड़दादा के पाप का बोझ कुछ ऐसा भारी था, कि रजवाड़े होते हुए भी वो सभी अपना सर थोड़ा नीचे ही रख कर चलते थे। पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ निकलती जा रही थीं, फिर भी वो बोझ बढ़ता ही जा रहा था! एक तरह का सामाजिक बहिष्कार उनको झेलना पड़ रहा था अपने समकक्ष राजाओं से! पढ़ा लिखा तो वो था ही; आकर्षक भी था। विश्वविद्यालय में अनेकों लड़कियों को वो भाता था। हो भी क्यों न? और ऐसा नहीं है कि वो उन लड़कियों की चेष्टाओं से अनभिज्ञ था। लेकिन फिर भी उसने कभी अपनी इच्छाओं से वशीभूत हो कर कुछ नहीं किया। कहीं कुछ ऐसा न हो जाए, कि खानदान का सर और झुक जाए, यह डर सदैव बना रहता था उसके हृदय में! जब प्रियम्बदा के साथ यह सम्बन्ध उसके सामने प्रस्तुत हुआ, तो उसने माता पिता के चरण छू कर उसको स्वीकार कर लिया।

प्रियम्बदा को भी स्वयं को ले कर कोई उदात्त अनुमान नहीं थे। वो जानती भी थी और समझती भी थी कि वो एक सामान्य सी दिखने वाली लड़की है। साथ ही साथ वो हरीश से आयु में बहुत बड़ी भी है। ऐसे में उसका वैवाहिक जीवन फिल्मों में दिखाई जा रही कहानियों जैसा नहीं होने वाला था। ऊपर से, ज़मींदार की लड़की होने से ले कर युवरानी और भावी रानी होने का सफ़र भी उसी को तय करना था। कठिन काम था यह! लेकिन उसके संस्कार पुख़्ता थे। पढ़ी लिखी, समझदार और गुणवती लड़की थी वो। उसको मालूम था कि वो एक आदर्श बहू बन सकती है, और उसका प्रयास था कि उसके कार्य ऐसे रहें जिससे उसके अपने माता पिता, और अपने ससुराल दोनों का ही सम्मान और बढ़े!

चन्द्रपुर से महाराजपुर का सफ़र लम्बा था - अधिकतर समय ट्रेन से जाना, फिर रेल-स्थानक से गाड़ी से महाराजपुर! समय लगता है। उस समय द्रुतगामी ट्रेन नहीं होती थीं! लिहाज़ा लगभग तीन दिन लगने थे इस यात्रा में! अच्छी बात यह थी कि ट्रेन में फर्स्ट क्लास की व्यवस्था थी। इसलिए राजपरिवार उसी में सफ़र कर रहा था। वैसे उस ट्रेन में इस बार अधिकतर लोग राजपरिवार के ही थे। पारस्परिक अंतर्ज्ञान के लिए नई नवेली जोड़ी के पास कुछ अवसर अवश्य था, किन्तु कुछ ऐसा हिसाब किताब बैठा कि दोनों को बात करने के अवसर कम ही मिले; और जो मिले, वो बस हाँ, हूँ, में ही निकल गए। हर मुख्य रेल-स्थानक पर महाराज घनश्याम से मिलने वाली बड़ी बड़ी हस्तियाँ मौजूद थीं! अवश्य ही वो सामाजिक रूप से हाशिए पर थे, लेकिन राजनीतिक रूप से उनका प्रभाव प्रबल था। इसलिए मिलने वालों की कोई कमी नहीं थी। इसलिए अपने गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते ट्रेन को और भी अधिक समय लग गया।

जब वो महाराजपुर पहुँचे तो नवविवाहिता युवरानी के स्वागत के लिए भव्य बंदोबस्त था! प्रियम्बदा की आँखें चुँधिया गईं - ऐसा स्वागत हुआ! उस समय लगभग संध्या हो चली थी; युवरानी की देखभाल के लिए ससुराल से सेविकाएँ आई हुई थीं! वैसे तो राजपरिवारों में चलन यह था कि बहू अपने साथ अपने मायके से ही सेविकाएँ ले आती थी, लेकिन प्रियम्बदा वैसी नहीं थी। सरल सी जीवनशैली थी उसकी! इसलिए ससुराल ने ही पूरा बंदोबस्त किया था। सेविकाओं ने ही उसको स्वागत योग्य परिधान और भारी ज़ेवर पहनाए, और महाराजपुर से एक स्टेशन पहले ही पूरी तरह सुसज्जित कर दिया! रेलवे स्थानक पर राजसी बैण्ड बाजा मौजूद था, और पूरा स्टेशन ऐसा सुसज्जित था कि जैसे वो कोई रेलवे स्थानक नहीं, बल्कि कोई मैरिज-हॉल हो! रेल के डब्बे से निकलने के मार्ग पर लाल कालीन बिछी हुई थी, जिस पर फूलों की भी एक कालीन सी बिछी हुई थी। उसके चेहरे पर एक पतला, किन्तु लम्बा सा घूँघट डाला हुआ था, जो परंपरा के अनुसार ही था। लेकिन घूँघट के अंदर से वो बाहर के दृश्य भली-भाँति देख सकती थी। नव-युगल की आरती होने के बाद, डब्बे से ले कर बाहर कार तक पहुँचते हुए पुष्प-वर्षा थमी नहीं! अद्भुत सा, रोमांचक अनुभव! अब जा कर प्रियम्बदा को समझ में आया कि उसका जीवन कितना बदल गया है!

महाराजपुर में भी चन्द्रपुर जैसी ही व्यवस्था थी - जिधर दृष्टि जाती, हर घर में जगमग करते दीये जल रहे थे। गाड़ियों का काफ़िला धीरे धीरे चल रहा था! उसके ससुर और उसके पति अपनी जनता से मिल रहे थे, और सभी का यथोचित आशीर्वाद ले रहे थे। प्रियम्बदा कार में अकेली ही थी - हाँ उसके लिए एक सेविका आगे बैठी हुई थी। कुछ बच्चे कार के शीशे से अंदर झाँक कर नई दुल्हन को देखने का प्रयास भी कर रहे थे, लेकिन बाहर गोधूलि के प्रकाश के कारण कुछ देख नहीं पा रहे थे। उसको बाद में मालूम हुआ कि आज रात से ले कर एक सप्ताह तक पूरे महाराजपुर में प्रतिदिन भोज का आयोजन है!

‘बाप रे!’

इसको कहते हैं सम्पन्नता!

राजमहल पहुँच कर उसका पुनः, और पहले से भी कहीं भव्य स्वागत हुआ। गाजे-बाजे, ढोल, नगाड़े, तुरही, और ऐसे ही नाना प्रकार के उच्च स्वर वाले वाद्य-यंत्र बज रहे थे! राजमहल के द्वार पर अपनी बहू के स्वागत के लिए महारानी स्वयं मौजूद थीं, और फूलों की वर्षा के बीच, अपने बेटे और बहू की आरती उतार रही थीं। आरती के बाद महावर की थाल में पैर रख कर जब प्रियम्बदा आगे बढ़ी, तो उसका हृदय धमकने लगा!

‘ये अपना घर है!’

घर नहीं, महल था वो! द्वार से ले कर अंदर मुख्य हॉल तक पहुँचने तक गलियारे के दोनों तरफ़ इस राज-परिवार के पूर्वजों के दस दस फुट ऊँचे चित्र लगे हुए थे। रेशम के महीन, रंग-बिरंगे कपड़ों के पर्दे गलियारे के हर खम्भे के बीच झूल रहे थे। गलियारे पर रेशम की ही सुन्दर सी कालीन बिछी हुई थी, जिस पर वो चल रही थी। यह तो केवल झलक मात्र थी! ये था राजसी ठाठ-बाठ! हर बात की ऐसी बहुतायत! ऐसे ऐश-ओ-आराम में रहने की आदत ही नहीं थी उसकी!

हाँलाकि उसको पता था कि उसकी ससुराल में बहू और बेटी में कोई अंतर नहीं किया जाता, फिर भी अज्ञात का डर, अज्ञात की आशंका बनी ही रहती है! कोई जान-पहचान का न हो, तो वैसे ही व्यक्ति घबराने लगता है। अपने नए परिवार के किसी सदस्य से मिली भी तो नहीं है वो!

उसने पाँच छः पग धरे होंगे कि उसका देवर उसको सामने से भागता आता हुआ दिखा। विवाह के दौरान उसने देखा था अपने देवर, हर्षवर्द्धन को! हरीश का सहबाला बना हुआ था! बेचारा विवाह की रस्मों के दौरान ऊब गया था, और अधिकतर समय सोता ही रहा था। महाराज और महारानी की सबसे छोटी संतान है वो! उसको देख कर लगता है कि हरीश अपने बचपन में कैसे रहे होंगे! चुलबुल, लेकिन शर्मीले!

“भाभी माँ,” उसने कहा, “आपको हम आपके कक्ष में ले कर जाएँगे!”

उसने ‘हम’ इतने हक़ से कहा, जैसे कि ये काम उसके अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकता।

उसकी बात पर महारानी हँसने लगीं!

“अवश्य राजकुमार!” उन्होंने हँसते हुए कहा, “आपकी भाभी अब आपके सुपुर्द हैं! आपको इनका पूरा ख़याल रखना होगा! लेकिन, इनको परेशान न करिएगा! समझ गए?”

“जी माँ,” उसने कहा, और अपनी भाभी का हाथ पकड़ कर उनको उनके कक्ष में ले जाने लगा।

हॉल के किनारों से ऊपर जाने के लिए दोनों तरफ़ सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। राजपरिवार का आवास ऊपर था। काफ़ी देर चलने के बाद दोनों एक आलीशान कमरे में प्रविष्ट हुए।

“भाभी माँ, आईये! ... यह है आपका कक्ष!” हर्ष ने चहकते हुए प्रियम्बदा को बताया, और हाथ पकड़ कर उसको अंदर ले आया।

यह एक विशालकाय कक्ष था। एक ओर आलीशान पलँग बिछा हुआ था, और बाकी के कमरे में बैठने के लिए सोफ़े, गद्दियाँ, टेबल, इत्यादि की व्यवस्था थी।

प्रियम्बदा को सोफ़े पर बिठा कर हर्ष बोला, “भाभी माँ, अब हम चलते हैं!”

“कहाँ जा रहे हैं आप राजकुमार?”

“आपके स्वागत की व्यवस्था भी तो देखनी है!” उसने इतने सयानेपन से कहा कि प्रियम्बदा ने बड़ी कठिनाई से अपनी हँसी दबाई कि कहीं बच्चे को बुरा न लग जाए!

“अपनी भाभी माँ के पास नहीं बैठेंगे आप?” प्रियम्बदा ने कहा, “हमको अकेली छोड़ कर चले जाएँगे?”

“ओह, हाँ... आप हमारे जाने पर अकेली तो हो जाएँगी! ... ठीक है, हम नहीं जाते!” उसने कहा, फिर कुछ सोच कर, “... किन्तु, आपके लिए जलपान...”

उसी समय एक सेविका ने अदब से आवाज़ दी, “युवरानी जी... राजकुमार जी... हम महारानी जी का सन्देश ले कर आई हैं!”

“आ जाईए भीतर,” प्रियम्बदा ने कहा।

‘इतना फॉर्मल है सब कुछ...’ उसने मन में सोचा, ‘कितना एडजस्ट करना पड़ेगा!’

राजकुमारियाँ या युवरानियाँ कैसे रहती हैं, उसको इन सब का कोई अंदाज़ा नहीं था। कभी सीखा ही नहीं, और न ही कभी इन सब बातों की ज़रुरत ही समझी।

“युवरानी जी,” मुख्यसेविका बोली, “महारानी ने कहा है कि रात्रिभोज भोजन गृह में सजा दिया गया है। आप यदि तैयार हैं, तो हम आपको लिवा लाएँ!”

“जी... ठीक है!”

अपने लिए ‘जी’ सम्बोधन सुन कर सेविका की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं; वो पूरे अदब से नब्बे अंश झुक कर दोनों हाथों को जोड़ कर नमस्कार कर के कमरे से बाहर निकल गई।

“राजकुमार जी,” उसने अपने देवर से कहा, “आप हमारे साथ रात्रिभोज करेंगे?”

“अवश्य, भाभी माँ!”


*
Very nyc
 

queen sandhya

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Update #3


महल के अनुरूप ही मुख्य भोजनगृह भी विशालकाय था। महल में इसके अतिरिक्त भी कई भोजनगृह थे, लेकिन यह प्रत्येक मुख्य आयोजनों में इस्तेमाल किया जाता था। डाइनिंग टेबल चालीस लोगों के बैठने के लिए निर्मित की गई थी, जो अपने हिसाब से एक बड़ी व्यवस्था थी। दो बड़े फ़ानूसों की रौशनी से टेबल सुशोभित था। जब प्रियम्बदा ने भोजन गृह में प्रवेश किया, तो वहाँ उपस्थित सभी लोग उसके सम्मान में खड़े हो गए - उसके सास ससुर भी! ऐसा होते तो कभी सुना ही नहीं... देखना तो दूर की बात है!

‘सच में - बहुओं का तो कैसा अनोखा सम्मान होता है यहाँ,’ उसने सोचा।

सोच कर अच्छा भी लगा उसको और बेहद घबराहट भी! मन में उसके यह डर समाने लगा कि कहीं वो ऐसा कुछ न कर बैठे, जिससे ससुराल का नाम छोटा हो! लेकिन उसके डर के विपरीत, उसके ससुराल के लोग यह चाहते थे कि उसको किसी भी बात का डर न हो! और वो अपने नए परिवार में आनंद से रह सके। उसको और हरीश को साथ में बैठाया गया। प्रियम्बदा के चेहरे पर, नाक तक घूँघट का आवरण था, लिहाज़ा देखने की चेष्टा करने वालों को केवल उसके होंठ और उसकी ठुड्डी दिखाई दे रही थी। उसके बगल में बैठा हुआ हरीश भी उसको देखना चाहता था, लेकिन शिष्टाचार के चलते वो संभव नहीं था।

यह एक मल्टी-कोर्स भोज था, और उसके यहाँ की व्यवस्था से थोड़ा अलग था। उसको भी लग रहा था कि नई बहू के स्वागत में उसके ससुराल वाले बढ़ चढ़ के ‘दिखावा’ कर रहे थे! खाने का कार्यक्रम बहुत देर तक चला - एक एक कर के कई कोर्स परोसे जा रहे थे। इस तरह की बहुतायत उसने पहले नहीं देखी थी। भोजन आनंदपूर्ण और स्वादिष्ट था, और आज के बेहद ख़ास मौके के अनुकूल भी था! नई बहू जो आई थी। खैर, आनंद और हँसी मज़ाक के साथ अंततः रात्रिभोज समाप्त हुआ।

“बहू,” अंततः महारानी जी (सास) ने प्रियम्बदा से बड़े ही अपनेपन, और बड़ी अनौपचारिकता से अपने गले से लगाते हुए कहा, “अब तुम विश्राम करो... आशा है कि सब कुछ तुम्हारी पसंद के अनुसार रहा होगा! अभी सो जाओ... सवेरे मिलेंगे! तब तुमको इस्टेट दिखाने ले चलेंगे! कल कई लोग तुमसे मिलने आएँगे!”

“जी माँ!” उसने कहा और उनके पैर छुए। फिर अपने ससुर के भी।

“सदा सुहागन रहो! ... सदा प्रसन्न रहो!” दोनों ने उसको आशीर्वाद दिया।

“और,” उसके ससुर ने यह बात जोड़ी, “हमसे बहुत फॉर्मल होने की ज़रुरत नहीं है बेटे... ये तुम्हारा घर है! हमको भी अपने माता पिता जैसा ही मानो। जैसे उनके साथ करती हो, वैसे ही हमारे साथ करो... बस, यही आशा है कि अपने तरीक़े से, बड़े आनंद से रहो यहाँ!”

यह बात सुन कर उसका मन खिल गया।

‘श्रापित परिवार,’ यह बात सुन सुन कर उसका मन खट्टा हो गया था। लेकिन कैसे भले लोग हैं यहाँ! अच्छा है कि वो एक श्रापित परिवार में ब्याही गई... अनगिनत ‘धन्य’ परिवारों में ब्याही गई अनगिनत लड़कियों की क्या दशा होती है, सभी जानते हैं।

दो सेविकाएँ उसको भोजन गृह से वापस उसके कमरे में लिवा लाईं। कमरे में आ कर उसने देखा कि कमरे में रखी एक बड़ी अलमारी में उसका व्यक्तिगत सामान आवश्यकतानुसार - जैसे मुख्य कपड़े और ज़ेवर इत्यादि - सुसज्जित और सुव्यवस्थित तरीक़े से लगा दिया गया था। उसका अन्य सामान महल में कहीं और रखा गया था, जिनको सेविकाओं को कह कर मँगाया जा सकता था।

कमरे में उसको लिवा कर सेविकाओं ने उससे पूछा कि उसको कुछ चाहिए। उसने जब ‘न’ में सर हिलाया, तब दोनों उसको मुस्कुराती हुई, ‘गुड नाईट’ बोल कर बाहर निकल लीं। शायद सेविकाओं में भी यह चर्चा आम हो गई हो कि नई बहू बहुत ‘सीधी’ हैं।

अब आगे क्या होगा, यह सोचती हुई वो अनिश्चय के साथ पलंग पर बैठी रही।

सेविकाओं के बाहर जाने के कोई पंद्रह मिनट बाद हरिश्चंद्र कमरे में आता है। पलंग पर यूँ, सकुचाई सी बैठी रहना, प्रियम्बदा को बड़ा अस्वाभाविक सा, और अवास्तविक सा लग रहा था। विवाह से ले कर अभी तक के अंतराल में उसकी हरीश से बस तीन चार बार ही, और वो भी एक दो शब्दों की बातचीत हुई थी। एक ऐसी स्त्री, जिसका काम शिक्षण का था, होने के नाते यह बहुत ही अजीब से परिस्थिति थी उसके लिए। उसकी आदत अन्य लोगों से बात चीत करने की थी, उनसे पहल करने की थी, लेकिन यहाँ सब उल्टा पुल्टा हो गया था!

और तो और, पलंग पर उसके बगल बैठ कर हरीश भी उतना ही सकुचाया हुआ सा प्रतीत हो रहा था। दो अनजाने लोग, यूँ ही अचानक से एक कमरे में एक साथ डाल दिए गए थे, इस उम्मीद में कि वो अब एक दूसरे के साथ अंतरंग हो जाएँगे! कुछ लोग शायद हो भी जाते हैं, लेकिन बहुत से लोग हैं, जिनके लिए ये सब उतना आसान नहीं होता।

“अ... आपको हमारा महाराजपुर कैसा लगा?” उसने हिचकते हुए पूछा।

“अच्छा,” शालीन सा, लेकिन एक बेहद संछिप्त सा उत्तर।

कुछ देर दोनों में चुप्पी सधी रही। शायद हरीश को उम्मीद रही हो कि प्रियम्बदा इस बातचीत का सूत्र सम्हाल लेगी! उधर प्रियम्बदा को आशा थी कि शायद हरीश कुछ आगे पूछें! लेकिन ऐसे दो टूक उत्तर के बाद आदमी पूछे भी तो क्या?

जब बहुत देर तक प्रियम्बदा ने कुछ नहीं कहा, तब हरीश को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे! खुद को लड़कियों से दूर रखने की क़वायद में उसको यह ज्ञान ही नहीं आया कि उनसे बात कैसे करनी हैं। दोनों काफी देर तक चुप्पी साधे बैठे रहे, इस उम्मीद में कि अगला/अगली बातें करेगा/करेगी!

अंततः हार कर हरीश ने ही कहा, “अ... आप... आप सो जाईए! कल मिलते हैं!”

“क्यों?” प्रियम्बदा ने चकित हो कर कहा, “... म्मे... मेरा मतलब... आप कहाँ...?”

उसको निराशा भी हुई कि शायद उसी के कारण हरीश का मन अब आगे ‘और’ बातें करने का नहीं हो रहा हो।

“कहीं नहीं...” हरीश ने एक फ़ीकी सी हँसी दी, “मैं यहाँ सोफ़े पर लेट जाऊँगा!”

“क्यों?” ये तो और भी निराशाजनक बात थी।

“कहीं आपको... उम्... अजीब न लगे!” उसने कहा, और पलंग से उठने लगा।

वो दो कदम चला होगा कि, “सुनिए,” प्रियम्बदा ने आवाज़ दी, “... मैं... अ... हम... आप...” लेकिन आगे जो कहना था उसमें उसकी जीभ लड़बड़ा गई।

“जी?”

प्रियम्बदा ने एक गहरी साँस भरी, “जी... हम आपसे कुछ कहना चाहते हैं!”

“जी कहिए...”

“प... पहले आप बैठ जाईए... प्लीज़!”

हरीश को यह सुन कर बड़ा भला लगा। जीवन में शायद पहली बार स्त्री का संग मिल रहा था उसको! प्रियम्बदा सभ्य, सौम्य, स्निग्ध, और खानदानी लड़की थी - यह सभी गुण किसी को भी आकर्षित कर सकते हैं।

“हमको मालूम है कि... कि अपनी... आ... आपके मन में कई सारी हसरतें रही होंगी... अपनी शादी को ले कर!” प्रियम्बदा ने हिचकते हुए कहना शुरू किया, “ले... लेकिन,”

“ओह गॉड,” हरीश ने बीच में ही उसकी बात रोकते हुए कहा, “... अरे... आप ऐसे कुछ मत सोचिए... प्लीज़! ... पिताजी ने कुछ सोच कर ही हमको आपके लायक़ समझा होगा! ... मैं तो बस इसी कोशिश में हूँ कि आपको हमसे कोई निराशा न हो!” कहते हुए हरीश ने अपना सर नीचे झुका लिया।

उसकी बात इतनी निर्मल थी कि प्रियम्बदा का हृदय लरज गया, “सुनिए... देखिए हमारी तरफ़...”

हरीश ने प्रियम्बदा की ओर देखा - उसका चेहरा अभी भी घूँघट से ढँका हुआ था, “... आप की ही तरह हम भी अपने पिता जी की समझदारी के भरोसे इस विवाह के लिए सहमत हुए हैं... किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि आप हमको पसंद नहीं! ... हमको... हमको आपके गुणों... आपकी क़्वालिटीज़ का पता है! ... आप हमको बहुत... बहुत पसंद हैं!”

अपनी बढ़ाई सुन कर हरीश को बहुत अच्छा लगा।

“... और,” प्रियम्बदा ने कहना जारी रखा, “आपको सोफ़े पर सोने की कोई ज़रुरत नहीं है! ... हमारे पति हैं आप!”

यह सुन कर हरीश में थोड़ा साहस भी आया; उसने मुस्कुराते हुए पूछा, “हम... हम आपका घूँघट हटा दें?”

प्रियम्बदा ने लजाते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया। अनायास ही उसके होंठों पर एक स्निग्ध मुस्कान आ गई। लज्जा की सिन्दूरी चादर उसके पूरे शरीर पर फ़ैल गई।

हरीश ने कम्पित हाथों से प्रियम्बदा का घूँघट उठा कर पीछे कर दिया... इतनी देर में पहली बार प्रियम्बदा को थोड़ा खुला खुला सा लगा। उसने एक गहरी साँस भरी... उसकी नज़रें अभी भी नीचे ही थीं, लेकिन होंठों पर मुस्कान बरक़रार थी। साँस लेने से उसके पतले से नथुने थोड़ा फड़क उठे। उसके साँवले सलोने चेहरे की यह छोटी छोटी सी बातें हरीश को बहुत अच्छी लगीं। अच्छी क्यों न लगतीं? अब ये लड़की उसकी अपनी थी!

अवश्य ही प्रियम्बदा कोई अगाध सुंदरी नहीं थी, लेकिन उसके रूप में लावण्य अवश्य था। साधारण तो था, लेकिन साथ ही साथ उसका चेहरा मनभावन भी था। हरीश का मन मचल उठा, और दिल की धड़कनें बढ़ गईं।

रहा नहीं गया उससे... अचानक ही उसने प्रियम्बदा को अपनी बाहों में भर के उसके होंठों पर चुम्बन रसीद दिया। एक अप्रत्याशित सी हरकत, लेकिन प्रियम्बदा के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई - एक अपरिचित सी सिहरन! जैसा डर लगने पर होता है। ऐसी कोई अनहोनी नहीं हो गई थी, लेकिन इस आक्रमण से प्रियम्बदा थोड़ी अचकचा गई। और... सहज वृत्ति के कारण उसने अपनी हथेली के पिछले हिस्से से, अपने होंठों पर से हरीश का चुम्बन पोंछ दिया।

“अरे,” हरीश ने लगभग हँसते हुए और थोड़ी निराशा वाले भाव से शिकायत करी, “आपने इसको पोंछ क्यों दिया?”

“आपने मुझको यूँ जूठा क्यों किया?” उसने भोलेपन से अपनी शिकायत दर्ज़ करी।

अंतरंगता के मामले में दोनों ही निरे नौसिखिए सिद्ध होते जा रहे थे!

यौन शिक्षा के अभाव, और चारित्रिक पहरे में पले बढ़े लोगों का शायद यही अंजाम होता है। उन दोनों को सेक्स को ले कर जो भी थोड़ा बहुत अधकचरा ज्ञान मालूम था, वो अपने मित्रों से था। परिवार से इस बारे में कुछ भी शिक्षा नहीं मिली थी। शायद परिवार वालों ने उनसे यह उम्मीद की हुई थी, कि जब आवश्यकता होगी, तब वो किसी सिद्धहस्त खिलाड़ी की तरह सब कर लेंगे! जहाँ प्रियम्बदा को ‘पति पत्नी के बीच क्या होता है’ वाले विषय का एक मोटा मोटा अंदाज़ा था, वहीं हरीश को उससे बस थोड़ा सा ही अधिक ज्ञान था। लेकिन ‘करना कैसे है’ का चातुर्य दोनों के ही पास नहीं था।

“मैं नहीं तो आपको और कौन जूठा कर सकता है?” हरीश ने पूछा।

“कोई भी नहीं!” प्रियम्बदा ने बच्चों की सी ज़िद से कहा।

“क्या सच में...” हरीश बोला, और प्रियम्बदा के बेहद करीब आ कर उसके माथे को चूम कर आगे बोला, “... कोई भी नहीं?”

प्रियम्बदा ने हरीश के इस बार के चुम्बन में कुछ ऐसी अनोखी, अंतरंग, और कोमल सी बात महसूस करी, कि उससे वो चुम्बन पोंछा नहीं जा सका। उसका दिल न जाने कैसे, बिल्कुल अपरिचित सी भावना से लरज गया।

हरीश ने इस सकारात्मक प्रभाव को बख़ूबी देखा, और बड़े आत्मविश्वास से प्रियम्बदा की दोनों आँखों को बारी बारी चूमा। इस बार भी उसके चुम्बनों को नहीं पोंछा गया।

“कोई भी नहीं?” उसने फिर से पूछा।

प्रियम्बदा ने कुछ नहीं कहा। बस, अपनी बड़ी बड़ी आँखों से अपने पति की शरारती आँखों में देखती रही।

हरीश ने इस बार प्रियम्बदा की नाक के अग्रभाग को चूमा।

“कोई भी नहीं?” उसने फिर से पूछा।

उत्तर में प्रियम्बदा के होंठों पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई।

हरीश ने एक बार फिर से उसके होंठों को चूमा। इस बार प्रियम्बदा ने भी उत्तर में उसको चूमा।

“कोई भी नहीं?”

“कोई भी नहीं!” प्रियम्बदा ने मुस्कुराते हुए, धीरे से कहा।

कुछ भी हो, मनुष्य में लैंगिक आकर्षण की यह प्रवृत्ति प्रकृति-प्रदत्त होती है। यह ज्ञान हम साथ में ले कर पैदा होते हैं। कुछ समय अनाड़ियों जैसी हरकतें अवश्य कर लें, लेकिन एक समय आता है जब प्रकृति हम पर हावी हो ही जाती है। उस समय हम ऐसे ऐसे काम करते हैं, जिनके बारे में हमको पूर्व में कोई ज्ञान ही नहीं होता! हरीश और प्रियम्बदा के बीच चुम्बनों का आदान प्रदान होंठों तक ही नहीं रुका, बल्कि आगे भी चलता रहा। होंठों से होते हुए अब वो उसकी गर्दन को चूम रहा था।

और उसके कारण प्रियम्बदा का घूँघट कब का बिस्तर पर ही गिर गया। प्रियम्बदा ने जो चोली पहन रखी थी, वो पारम्परिक राजस्थानी तरीक़े की थी - कुर्ती-नुमा! लेकिन उसकी फ़िटिंग ढीली ढाली न रहे, उसके लिए चोली के साइड में डोरियाँ लगी हुई थीं, जिनको आवश्यकतानुसार कसा या ढीला किया जा सकता था। हरीश को मालूम था इस वस्त्र के बारे में, लेकिन प्रियम्बदा को नहीं। उसको सामान्य ब्लाउज पहनने की आदत थी। इसलिए जब उसने अचानक ही अपने स्तनों पर कपड़े का कसाव लुप्त होता महसूस किया, तो उसको भी कौतूहल हुआ।

एक तरफ़ हरीश उसके वक्ष-विदरण को चूम रहा था, तो दूसरी तरफ़ उसका हाथ चोली के भीतर प्रविष्ट हो कर उसके एक स्तन से खेल रहा था। पुरुष का ऐसा अंतरंग स्पर्श अपने जीवन में प्रियम्बदा ने पहली बार महसूस किया था। उसके दोनों चूचक उत्तेजित हो कर सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए। हरीश भी आश्चर्यचकित था - कैसे वो इतने साहस से ये सब कुछ कर पा रहा था! प्रियम्बदा उससे उम्र में कहीं अधिक बड़ी है, और अपनी से बड़ी लड़कियों और महिलाओं का वो बहुत आदर करता था... उनके पैर छूता था, उनसे नज़र मिला कर बात नहीं करता था। फिर भी न जाने किन भावनाओं के वशीभूत हो कर वो ऐसे ऐसे काम कर रहा था, जिनकी उसने अभी तक केवल कल्पना ही करी थी। अपनी हथेली पर चुभते हुए प्रियम्बदा के चूचक उसको बड़े ही भले लग रहे थे। यह जो भी ‘अदृश्य शक्ति’, या अबूझ भावना थी, जो उससे यह सब करवा रही थी, अभी भी संतुष्ट नहीं हुई थी। उसको और चाहिए था! बहुत कुछ चाहिए था!

हरीश की प्रियम्बदा को चूमने की चाह कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही थी। उसके सीने के खुले हुए भाग पर जब उसके होंठों का स्पर्श हुआ, तब उसको एक अलग ही आनंद की अनुभूति हुई।

‘कितना कोमल... कितना सुखकारी अंग...’

हरीश के मन में उस कोमल और सुखकारी अंग को देखने की ललक जाग उठी... और प्रियम्बदा में उस कोमल और सुखकारी अंग को दिखाने की!

उनके पलँग पर मसनद तकिए लगे हुए थे। उन पर पीठ टिका कर आराम से अधलेटी अवस्था में आराम किया जा सकता था। हरीश ने थोड़ा सा धकेल कर उसको मसनद से टिका कर आराम से बैठा दिया, और उसकी चोली उतारने कर उपक्रम करने लगा। अंदर उसने कुछ भी नहीं पहना हुआ था, लिहाज़ा, कुर्ती-नुमा चोली के ऊपर होते ही उसके स्तन उजागर हो गए। हरीश को जैसे होश ही न रहा हो।

उसको नहीं मालूम था कि अपनी पत्नी के स्तनों की कल्पना वो किस प्रकार करे! तुलना करने के लिए कोई ज्ञान ही नहीं था। स्तनों के नाम पर उसने अपनी माँ और धाय माँ के स्तन देखे थे, और अब उस बात को भी समय हो चला। ऐसे में वो क्या उम्मीद करे, वो बस इस बात की कल्पना ही कर सकता था। हरीश की कल्पना के पंखों को एक बार उड़ान मिली अवश्य थी - जब वो खजुराहो घूमने गया था। उसने वहाँ जो देखा, उस दृश्य ने उसके होश उड़ा दिए! अनेकों आसन... अनेकों कल्पनाएँ! फिर भी, वहाँ के मंदिरों की दीवारों पर उकेरी हुई मूर्तियों को देख कर कितना ही ज्ञान हो सकता है? असल जीवन में उतनी क्षीण कटि, वृहद् नितम्बों और उन्नत वक्षों वाली स्त्रियाँ भला होती ही कहाँ हैं? वो तो मूर्तिकार की कल्पना का रूपांतर मात्र है!

लेकिन इस समय जो उसके सम्मुख था, वो कल्पना से भी बेहतर था। शरीर के अन्य हिस्सों के रंगों के समान ही प्रियम्बदा के स्तनों का रंग था। आकार में वो बड़े, और गोल थे। उसके चूचक भी हरीश की मध्यमा उंगली के जितने मोटे, और उनके गिर्द करीब ढाई इंच व्यास का एरोला! उसके स्तनों को देख कर हरीश को ऐसा लग रहा था जैसे वो दोनों कलश हों, और उन दोनों कलशों में मुँह तक दूध भरा हुआ हो!

वो दृश्य देखते ही, हरीश तत्क्षण एक ऊर्ध्व चूचक से जा लगा, और पूरे उत्साह से चूसने लगा। प्रियम्बदा उसके सामने नग्न होने के कारण वैसे भी घबराई हुई थी, यह सोच कर कि क्या वो अपने पति को पसंद आएगी या नहीं, और इस अचानक हुए आक्रमण से वो चिहुँक गई!

“आह्ह्ह्हह...” उसको उम्मीद नहीं थी कि इतने उच्च स्वर में उसकी चीख निकल जाएगी!

‘हे प्रभु,’ उसने सोचा, ‘कहीं किसी ने सुन न लिया हो!’

प्रत्यक्षतः उसने कहा, “क... क्या कर रहे हैं आप?”

उत्तर देने से पहले हरीश ने कुछ पल और चूसा, फिर बोला, “इनमें... इनमें दूध ही नहीं है...”

यह सुन कर प्रियम्बदा हँसती हुई बोली, “अब आप आ गए हैं न... अब आ जाएगा इनमें दूध!”

“सच में?”

उसने मुस्कुराते हुए ‘हाँ’ में कई बार सर हिलाया।

“आप हमको माँ बनने का सुख दे दीजिए... फिर हम आपको पिलाएँगे...” उसने शरमाते हुए कहा।

“सच में?” हरीश ने उसके करीब आते हुए फुसफुसा कर कहा।

प्रियम्बदा ने फिर से ‘हाँ’ में सर हिलाया, और हाथ बढ़ा कर उसने हरीश का कुर्ता ऊपर किया, और उसके चूड़ीदार पाजामे का इज़ारबंद खोलने लगी। हरीश ने अंदर लँगोट बाँध रखा था। उसने थोड़ा झिझकते हुए हरीश के लिंग को ढँकने वाले वस्त्र को एक तरफ हटाया। एक स्वस्थ उत्तेजित लिंग प्रियम्बदा के सामने उपस्थित था!

“सुनिए...” उसने धीरे से कहा।

“जी?”

“हम... हमें आपको... आपको... नग्न देखना है!”

“क्या? बिना किसी वस्त्र के?”

प्रियम्बदा ने ‘हाँ’ में सर हिलाया। कहा तो उसने! कितनी बार एक ही बात को बोले?

“जी ठीक है...”

वो हरीश की पत्नी अवश्य थी, लेकिन हरीश के मन में उसके लिए एक आदर-सूचक स्थान था - न केवल अपने संस्कार के कारण, बल्कि प्रियम्बदा से छोटा होने के कारण भी! एक तरह से उसको आज्ञा मिली थी अपनी पत्नी से!

हरीश पलँग से उठा, और उठ कर अपने वस्त्र उतारने लगा। रात में थोड़ी सी ठंडक अवश्य थी, लेकिन ऐसी नहीं कि बिना वस्त्रों के न रहा जा सके। थोड़े ही समय में वो पूर्ण नग्न हो कर प्रियम्बदा के सामने उपस्थित था। बिना किसी रूकावट के अब उसका लिंग और भी प्रबलता से स्तंभित था।

प्रियम्बदा ने मन भर के अपने पति को देखा - ‘कैसा मनभावन पुरुष!’ सच में, वो पूरी तरह से हरीश पर मोहित हो गई। कैसी किस्मत कि ऐसा सुन्दर सा पति मिला है उसको!

“आप... आप बहुत... बहुत सुन्दर हैं...” प्रियम्बदा ने कहा, और कहते ही हथेलियों के पीछे अपना चेहरा छुपा लिया।

हरीश अपनी बढ़ाई सुन कर आनंदित हो गया।

“क्या हम आपको भी...” अपनी बात पूरी करने से वो थोड़ा हिचकिचाया।

“आ... आप कर दीजिए... ह... हमसे हो नहीं पाएगा...” वो लजाती हुई बोली, “बहुत लज्जा आएगी...!”

हाँ - लज्जा तो आएगी! थोड़े ही वस्त्र हटे थे, और उतने में ही प्रियम्बदा की मनोस्थिति लज्जास्पद हो गई थी। पूर्ण नग्न होने में तो बेचारी शर्म से दोहरी तिहरी हो जाती!

हरीश ने धड़कते हृदय से प्रियम्बदा को निर्वस्त्र करना शुरू कर दिया - उसको इस काम में आनंद आ रहा था, लेकिन अगर कोई बाहर से देखता, तो उसको यह कोई कामुक कार्य जैसा नहीं लगता! बहुत उद्देश्यपूर्वक वो बस एक के बाद एक कर के उसके कपड़े उतारता जा रहा था। कुछ ही देर में प्रियम्बदा भी पूर्ण नग्न हो कर हरीश के सामने आँखें मींचे हुए बिस्तर पर आधी लेटी हुई थी। उन दोनों में बस इतना ही अंतर था कि प्रियम्बदा का शरीर आभूषणों से लदा-फदा था, और हरीश के शरीर पर नाम-मात्र के आभूषण थे।

हरीश ने पहली बार एक पूर्ण नग्न नारी के दर्शन किए थे! उसने पाया कि प्रियम्बदा की देहयष्टि अच्छी थी! मांसल देह थी, लेकिन स्थूलता केवल उचित स्थानों पर थी, जैसे कि स्तनों पर और नितम्बों पर। योनि-स्थल पूरी तरह से साफ़ था - यह देख कर उसको आश्चर्य हुआ! शायद उसको शहद के प्रयोगों के बारे में नहीं मालूम था। उसको अपनी पत्नी बहुत अच्छी लगी! मन में अनेकों प्रकार की कामनाओं ने घर कर लिया। अब और देर नहीं की जा सकती थी।

वो वापस पलँग पर आया, और बिना कुछ कहे प्रियम्बदा के सामने बैठ गया। वो भी समझ रही थी कि मिलान की घड़ियाँ बस निकट ही हैं। सहज प्रत्याशा में उसने अपनी जाँघें दोनों ओर फ़ैला कर, जैसे हरीश को आमंत्रित कर लिया हो। हरीश ने भी प्रियम्बदा के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए, अपने लिंग को योनिमुख पर बैठाया और उसके अंदर प्रविष्ट हो गया।



*


एक सेविका, महारानी के व्यक्तिगत कक्ष के दरवाज़े पर शिष्ट दस्तख़त देती है।

“आ जाओ...” महारानी ने उसको अंदर आने को कहा।

यह कक्ष प्रियम्बदा और हरीश के कक्ष से छोटा था, और महारानी के अपने निजी प्रयोग के लिए था। वो आज के रात्रि-भोज के बाद शायद इसी इंतज़ार में बैठी हुई थीं। उस सेविका का नाम ‘बेला’ था। महारानी के विवाह के समय वो उनके साथ ही, उनके मायके से आई थी! इसलिए वो उनकी सबसे विश्वासपात्री थी।

बेला को देखते ही वो बड़ी उम्मीद से बोलीं, “बोलो बेला...”

बेला हाथ जोड़ कर शर्माती हुई मुस्कुराई। कुछ बोली नहीं। इतना संकेत बहुत था।

महारानी ने संतोष भरी साँस ली। जैसे मन से कोई बड़ा बोझ उतर गया हो।

“युवराज को युवरानी पसंद तो आईं?”

“जी महारानी जी... बहुत पसंद आईं... और सच कहें, तो युवरानी हैं भी बड़ी सुन्दर!” उसने अर्थपूर्वक कहा।

“बढ़िया!” फिर कुछ सोचते हुए, “... दोनों एक दूसरे के अनुकूल तो हैं?”

“जी महारानी जी! बहुत अनुकूल हैं...” वो फिर से संकोच करने लगी, लेकिन जो काम मिला था वो जानकारी तो देनी ही थी उसको, “आधी घटिका से थोड़ा अधिक ही दोनों का खेल चला...”

“बहुत बढ़िया... बहुत बढ़िया! ... दोनों अभी क्या कर रहे हैं?”

“जी, उनके सोने के बाद ही वहाँ से आई हूँ!”

“अच्छी बात है... देखना, कोई उनके विश्राम में ख़लल न डाले! ... महाराज क्या कर रहे हैं?”

“आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं... रोज़ की भाँति!” बेला ने महारानी को मानो छेड़ते हुए कहा, “किसी सेविका को आपको लिवा लाने का आदेश भी दिया है उन्होंने!”

इस बात पर महारानी मुस्कुराईं।

“बढ़िया...”


*
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avsji

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Update #17


सुबह का नाश्ता कर के जय ने मीना को अपना इस्टेट दिखाने की पेशकश करी, जो मीना ने सहर्ष स्वीकार कर ली। इस्टेट दिखाना एक बहाना था - दरअसल वो भी चाहती थी कि सुबह की नरम गुलाबी धूप में जैसा रोमांटिक माहौल बन रहा था, उसमें जय के साथ, अकेले में, थोड़ा समय बिताया जा सके। वो थोड़ी नर्वस थी... ऐसे किसी के साथ कुछ समय बिताये हुए कुछ वर्ष बीत गए थे। पिछले अफेयर के बाद अब उसकी इच्छा नहीं होती थी कि वो किसी और पुरुष के साथ किसी भी तरह का सम्बन्ध बनाए... लेकिन, जय से मिल कर उसके हृदय के तार झनझना उठे। वो जानती थी कि जय भी उसमें उतनी ही रूचि रखता है। लिहाज़ा, उसकी आशा थी कि वो अपने भूत के बारे में जय से बात कर पाएगी, और तब अगर सब ठीक रहा तो दोनों आगे बढ़ सकेंगे। क्लेयर ने मीना को एक शॉल ओढ़ने को दे दिया था, जिससे उसको ठण्ड न लगे। मौसम ठण्डा अवश्य था, लेकिन सुहाना भी बहुत था।

जय इस तरह से मीना के साथ एकांत और समय पा कर उत्साहित भी था, और थोड़ा नर्वस भी... ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उसके पेट में तितलियाँ उड़ रही थीं। उसके और मीना के सम्बन्ध पर उसके परिवार की रज़ामंदी तो मिल ही गई थी, तो अब बस लड़की - यानि कि मीना की रज़ामंदी मिलनी शेष थी। वो चाहता था कि मीना की प्रेम-दृष्टि उस पर पड़े! उसके पहले किसी भी लड़की ने उसको इस तरह से आकर्षित नहीं किया था। और, मीना से कुछ दिनों तक मिलने और उसके साथ काम करने के बाद उसको उसके गुणों के बारे में भी पता चला, तो वो उसकी तरफ़ और भी आकर्षित हो गया। कुछ समय पहले तक उसको विवाह करने की कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन मीना से मिलने के बाद उसको ऐसा लगता कि मीना के साथ विवाह करना उसके लिए सबसे आवश्यक काम था।

जैसा कि मीना को कल रात ही स्पष्ट हो गया था, आदित्य और जय का ‘घर’ एक बड़ा सा इस्टेट था। तीन एकड़ भूमि पर बना मुख्य आवास एक बड़ा सा बंगला था, जो इस्टेट के सामने की तरफ़, मुख्य मार्ग के समीप बना हुआ था। इस मुख्य बंगले में छः कमरे, दो हाल, और एक स्टडी था, जो आदित्य के लिया ऑफ़िस का काम करता था। इस मुख्य बंगले से थोड़ा अलग हट कर एक गेस्ट कॉटेज था, जिसमें दो कमरे, एक हॉल और एक छोटी सी रसोई थी। यह किसी भी मेहमान, या उनके परिवार के आवास के रूप में इस्तेमाल होता था। इसके अतिरिक्त एक और कॉटेज था, जिसमें एक कमरा, एक हाल, और एक छोटी सी रसोई थी - इसी में कल रात मीना गई थी। यह जय का मैन-केव था और केवल वो ही इस कॉटेज का इस्तेमाल करता था। आज कल अपना सारा कामकाज वो वहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरे इस्टेट में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और बगीचे लगे हुए थे। एक स्थान पर एक छोटा सा, गोल सा तालाब बना हुआ था, जिसमें बीच में वीनस की एक मूर्ति लगी हुई थी, और उसके हर तरफ से छोटे छोटे फ़ौव्वारे लगे हुए थे। तालाब की परिधि पर करीब दो फुट का चबूतरा था, जो बहुत अच्छी जगह थी बैठ कर आगे की बातचीत करने के लिए।

“जय,” मीना ने थोड़ा हिचकते हुए कहा, “थोड़ा... बैठ जाएँ? ... तुमसे कुछ बातें करनी थीं...”

“बोलो मीना...” जय भी उसी के समान हिचकिचा रहा था।

“जय...” मीना की हिचक बरकरार थी, “... ऐसी बात शायद लड़कियाँ नहीं करतीं... लेकिन... लेकिन... न जाने क्या बात है तुममें... कि मैं बरबस तुम्हारी तरफ़ खिंची चली आती हूँ...”

जय को लगा कि जैसे उसके कानों में मधुर संगीत बजने लगा हो।

“कल तुमने मुझसे कहा था न... कि मुझको पहली बार देखते ही मैं तुमको भा गई... यह कि जैसे मैं तुम्हारी अपनी हूँ? ... तो मुझको भी वैसा ही लगा... जब मैंने तुमको पहली बार देखा! ... कुछ अमेज़िंग सा अट्रैक्शन! अदरवर्ल्डली! ... उसको एक्सप्लेन नहीं कर सकती!”

“मीना...?”

“मुझको कह लेने दो जय... प्लीज़!”

जय ने केवल ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“थैंक यू...” मीना ने कहा और एक गहरी साँस भरी, “तुम मुझे पसंद... नो, बहुत पसंद हो! ... लेकिन... मैं चाहती हूँ... कि इसके पहले कि हम आगे बढ़ें, तुमको... कम से कम तुमको... मेरे बारे में पता हो। ... मेरे पास्ट के बारे में...”

“मीना... मैंने तुमसे पहले ही कहा है कि मुझे तुम्हारे पास्ट से कोई मतलब नहीं, कोई परवाह नहीं... अगर तुम कोई ख़ूनी या मुज़रिम न रही हो!”

मीना हौले से हँसी, “नहीं मैं कोई ख़ूनी वूनी नहीं हूँ... बट स्टिल, आई वान्ट यू टू नो अबाउट मी!”

“ओके!”

“मैं एक ग़रीब फ़ैमिली से हूँ...”

जय ने उसकी इस बात पर बड़े ही बेपरवाह तरीके से अपने कन्धे उचकाए - यह बताने के लिए कि इस बात का कोई महत्त्व नहीं है - ख़ास कर अब, जब मीना का खुद का एक मुक़म्मल कैरियर है, और वो स्वयं इतना कमा लेती है जिसमें बड़े ठाठ से अमेरिका में रहा जा सके!

मीना ने फिर भी कहना जारी रखा, “मेरी पढ़ाई लिखाई... सब एक चैरिटेबल ट्रस्ट ने मैनेज किया है...”

आई वुड से, यू डिड वण्डरफुल्ली ग्रेट!” जय खुश होते हुए बोला, “नाम बताना उस ट्रस्ट का... मैं भी उसमें डॉलर डोनेट करूँगा! ... भई, क्या बढ़िया जेम ढूँढ़ निकाला है उन लोगों ने!”

जय की बात पर मीना के होंठों पर एक नर्वस सी हँसी आ गई, “आई नो... आई नो! ... तुमको फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन तुमको अपने बारे में सब कुछ बता देना मेरा फ़र्ज़ है!”

“हा हा! ओके! बताओ सब!”

आई डोंट नो हाऊ यू फ़ील अबाउट इट... बट मैं बड़ी भी बहुत हूँ तुमसे...”

आई नो... तुम्हारा रेज़्युमे पढ़ा है मैंने! ... मुझसे कहीं अधिक क्वालिफाइड हो, मुझसे अधिक एक्सपीरियंस है, तो जाहिर सी बात है कि मुझसे बड़ी भी हो!” जय ने फिर से इस बात को नकारते हुए कहा, “... वैसे, भैया भी जानते हैं ये बात! ... और शायद अब भाभी भी... फिर भी उन्होंने इस बारे में एक बात भी नहीं बोली!”

मीना चुप ही रही।

उसको चुप देख कर जय ने ही बात आगे बढ़ाई, “वैसे, एक बात बताऊँ तुमको? ... उम्र में भाभी भी भैया से बड़ी हैं। ... वो हम सबसे कहीं अधिक मैच्योर हैं... इसीलिए तो हम सब में इतना ठहराव है।”

“ओह?”

“हाँ! ... भाभी पहले चाचा जी - मतलब हमारी कंपनी के फाउंडर... की पर्सनल सेक्रेटरी थीं।” जय ने अपने परिवार का एक राज़ खोला, “... भाभी बहुत स्किलफुल थीं और बहुत एजुकेटेड भी... और इसलिए चाचा जी उनको बहुत पसंद भी करते थे! शायद अपनी बेटी के ही जैसे... लेकिन इतना पसंद करने के बावज़ूद, वो भाभी में अपनी बहू का रूप नहीं देख पाए। ... उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वो चाहते थे कि भैया उनकी पसंद की किसी भारतीय लड़की से शादी करें!”

बताते बताते जय ने गहरी साँस भरी, “... लेकिन भैया और भाभी दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे... उसके कारण थोड़ा फ़्रिक्शन भी हुआ! लेकिन, फिर चाचा जी की मौत के बाद भाभी ने जिस तरह भैया... हमारे बिज़नेस... और फिर मुझको सम्हाला... सबकी बोलती बंद कर दी उन्होंने! ... चाची जी के मन में उनको ले कर बहुत से प्रीकंसीवड नोशंस थे... लेकिन जब उन्होंने भाभी का असली रूप देखा... उनके सभी गुण समझे, तब वो भी शांत हो गईं।”

कहते हुए जय ने बड़े गर्व से मीना को देखा - वो हतप्रभ हो कर सब सुन रही थी,

“एक देसी लड़की क्या इतना सब कर सकेगी? ... मेरे ख्याल से नहीं!” वो बड़े गर्व से बोला, “... और अब आलम ये है कि चाची जी अपनी ‘प्यारी बहू’ के बिना नहीं रह पातीं। हम बेटों से मिलने से अधिक उनको अपनी बहू और दोनों पोतों से मिलने का मन होता रहता है!”

“हा हा! दैट इस सो नाइस टू नो, जय...” मीना अब थोड़ा सहज हो गई, “थैंक यू फॉर टेलिंग मी ऑल दिस!”

“नो प्रॉब्लम!” जय ने बड़ी दरियादिली से कहा, “आगे बोलो... क्या कहना था तुमको!”

“उम्म्म...” मीना ने एक भूमिका बाँधी, “शायद तुमको ये बात सुन कर बुरा लगे!”

“बुरा लगना है, तो लगने दो! ... तुम कम से कम अपनी बात तो कहो!”

“ओके! ... जब मैं यहाँ ऍमबीए करने आई, तब से ले कर अब तक मेरे तीन अफेयर्स हो चुके हैं...” उसने कहा - और थोड़ी देर रुक कर देखने लगी कि इस बात का जय पर क्या प्रभाव पड़ा।

आई ऍम सॉरी मीना... सॉरी इस बात के लिए कि प्यार की तुम्हारी तलाश अभी तक क़ामयाब नहीं हो पाई... लेकिन शायद ये इसलिए भी हुआ है कि... तुम जैसी अमेजिंग लड़की... उन तीनों से बेहतर डिज़र्व करती है!” जय ने कहा।

उसको भी विश्वास नहीं हुआ कि उसके अंदर इतनी सहनशीलता कहाँ से आ गई! शायद इसीलिए कहते हैं कि प्यार में लोग अंधे हो जाते हैं।

“ओह जय... तुम पर तो किसी बात का कोई असर ही नहीं होता!” मीना ऊपर से निराश, लेकिन अंदर से बहुत आनंदित होती हुई बोली!

“मैंने कहा न - मेरे लिए तुम्हारा पास्ट मायने नहीं रखता! ... मायने रखता है तो बस... हमारा फ्यूचर!”

“ओके...” मीना ने भी इस बार बम गिरा देने की ठान ली, “तुम कुछ सुन ही नहीं रहे हो... कुछ मान ही नहीं रहे हो, तो सुनो... हाऊ विल यू रिएक्ट, इफ आई टेल यू दैट आई हैड फिज़िकल रिलेशनशिप्स विद दोज़ मेन?”

हाँ - इस बार जय के चेहरे पर शिकन आई - लेकिन बहुत हल्की सी!

वो सोचते हुए बोला, “याह... दैट इस अ बिट सैड मीना... आई अंडरस्टैंड कि तुमको कैसा फ़ील हुआ होगा! ... लेकिन ये भी सच बात है, कि बिना सच्चे प्यार के सेक्स करने से कोई फ़ायदा नहीं होता... और न ही कोई सटिस्फैक्शन मिलता है!” उसने बुझे हुए स्वर में कहा, “... आई विश व्ही हैड मेट अर्लियर (काश कि हम पहले मिले होते)!”

“ओह जय...” मीना ने गहरी साँस लेते हुए, बड़े अशक्त भाव से कहा - और बोलते बोलते उसका पूरा शरीर काँप गया, “कैसे हो तुम!”

सच में - उसको समझ ही नहीं आया कि कैसा आदमी है जय! कोई और होता तो उसको वेश्या होने का तमगा पकड़ा चुका होता। गोरे अमेरिकन्स भी शायद इतने खुले हुए न हों, जबकि उनका समाज सेक्स को ले कर कहीं अधिक खुला हुआ है।

द बेस्ट!” वो मुस्कुराया।

“हा हा!” मीना नर्वस हो कर हँसी, और बोली, “ओह गॉड! नो वंडर आई लव यू सो मच!” उसने एक झोंक में कह डाला।

फिर वो बोलते बोलते हठात ही रुक गई - उसको संज्ञान हुआ कि उसने ये क्या कह दिया! मन की बात ज़ुबान से निकल गई। पहले तो उसके चेहरे से सारा रंग निचुड़ गया और फिर अगले ही क्षण उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फ़ैल गई।

जय के चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान आ गई, “मतलब... अभी तो कोई और नहीं है तुम्हारी लाइफ में?”

“कोई नहीं जय...” मीना ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा, “जब से तुम मिले हो...” वो बोलते बोलते रुक गई, और फिर थोड़ा ठहर कर बोली, “... किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती अब मैं...”

“पक्की बात?” जय मुस्कुराया।

“हम्म उम्म...” मीना ने स्वीकारा... बहुत हल्के से, दबे हुए स्वर निकले उसके!

अब तक दोनों के दिलों की धड़कनें बहुत बढ़ गई थीं।

“आई लव यू...” जय ने मीना के कान में बहुत धीरे से कहा।

“लव यू टू...” मीना ने भी उतने ही धीरे से उत्तर दिया, “आई ऍम सो लकी! ... ऍम आई सो लकी?”

“तुम्हारा मुझको नहीं पता मीना,” जय बोला, “लेकिन मैं तो लकी हूँ!”

“ओह जय... जय... मेरे जय!” कह कर मीना जय की मज़बूत बाज़ुओं के घेरे में समां गई।

वो आलिंगन इतना सुखदायक था जिसका शब्दों में बयान कर पाना कठिन है।

“वायदा करो कि तुम मुझसे अलग नहीं होगी!” जय बोला।

“मरते दम तक नहीं!”

“पक्की बात?”

“पक्की बात... मेरे पूरे वज़ूद पर अब तुम्हारा हक़ है जय! बस तुम्हारा!” मीना भावनाओं के आवेश में बोलती जा रही थी, “... मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं किसी को इतनी बड़ी बात कह सकूँगी...”

उसको अपने आलिंगन में ही बाँधे हुए जय बड़े प्यार से उसको देखता है।

“ओह जय! ... काश मैंने वो सब बेवक़ूफ़ियाँ न करी होतीं!”

“मीना... जैसा कि मैंने पहले भी कहा है... उन बातों का हमारे आगे की लाइफ पर कोई असर नहीं होने वाला... सो नहीं होने वाला!” उसने मीना का माथा चूमा, “... भूल जाओ वो सब!”

“तुम साथ रहोगे... तो भूल जाऊँगी... सब कुछ!”

“पक्की बात?” कह कर जय ने मीना के दोनों गालों पर अपने दोनों हाथ रख कर हल्के से दबाया।

“हम्म उम्म...”

गाल दबाने से मीना के होंठ किसी चोंच की भाँति सामने की तरफ़ निकल आए। अगले ही पल जय ने मीना की चोंच को अपने मुँह में भर लिया, और दोनों ही एक बेहद प्रेममय फ्रेंच चुम्बन में लिप्त हो गए।

*
 

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Update #17


सुबह का नाश्ता कर के जय ने मीना को अपना इस्टेट दिखाने की पेशकश करी, जो मीना ने सहर्ष स्वीकार कर ली। इस्टेट दिखाना एक बहाना था - दरअसल वो भी चाहती थी कि सुबह की नरम गुलाबी धूप में जैसा रोमांटिक माहौल बन रहा था, उसमें जय के साथ, अकेले में, थोड़ा समय बिताया जा सके। वो थोड़ी नर्वस थी... ऐसे किसी के साथ कुछ समय बिताये हुए कुछ वर्ष बीत गए थे। पिछले अफेयर के बाद अब उसकी इच्छा नहीं होती थी कि वो किसी और पुरुष के साथ किसी भी तरह का सम्बन्ध बनाए... लेकिन, जय से मिल कर उसके हृदय के तार झनझना उठे। वो जानती थी कि जय भी उसमें उतनी ही रूचि रखता है। लिहाज़ा, उसकी आशा थी कि वो अपने भूत के बारे में जय से बात कर पाएगी, और तब अगर सब ठीक रहा तो दोनों आगे बढ़ सकेंगे। क्लेयर ने मीना को एक शॉल ओढ़ने को दे दिया था, जिससे उसको ठण्ड न लगे। मौसम ठण्डा अवश्य था, लेकिन सुहाना भी बहुत था।

जय इस तरह से मीना के साथ एकांत और समय पा कर उत्साहित भी था, और थोड़ा नर्वस भी... ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उसके पेट में तितलियाँ उड़ रही थीं। उसके और मीना के सम्बन्ध पर उसके परिवार की रज़ामंदी तो मिल ही गई थी, तो अब बस लड़की - यानि कि मीना की रज़ामंदी मिलनी शेष थी। वो चाहता था कि मीना की प्रेम-दृष्टि उस पर पड़े! उसके पहले किसी भी लड़की ने उसको इस तरह से आकर्षित नहीं किया था। और, मीना से कुछ दिनों तक मिलने और उसके साथ काम करने के बाद उसको उसके गुणों के बारे में भी पता चला, तो वो उसकी तरफ़ और भी आकर्षित हो गया। कुछ समय पहले तक उसको विवाह करने की कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन मीना से मिलने के बाद उसको ऐसा लगता कि मीना के साथ विवाह करना उसके लिए सबसे आवश्यक काम था।

जैसा कि मीना को कल रात ही स्पष्ट हो गया था, आदित्य और जय का ‘घर’ एक बड़ा सा इस्टेट था। तीन एकड़ भूमि पर बना मुख्य आवास एक बड़ा सा बंगला था, जो इस्टेट के सामने की तरफ़, मुख्य मार्ग के समीप बना हुआ था। इस मुख्य बंगले में छः कमरे, दो हाल, और एक स्टडी था, जो आदित्य के लिया ऑफ़िस का काम करता था। इस मुख्य बंगले से थोड़ा अलग हट कर एक गेस्ट कॉटेज था, जिसमें दो कमरे, एक हॉल और एक छोटी सी रसोई थी। यह किसी भी मेहमान, या उनके परिवार के आवास के रूप में इस्तेमाल होता था। इसके अतिरिक्त एक और कॉटेज था, जिसमें एक कमरा, एक हाल, और एक छोटी सी रसोई थी - इसी में कल रात मीना गई थी। यह जय का मैन-केव था और केवल वो ही इस कॉटेज का इस्तेमाल करता था। आज कल अपना सारा कामकाज वो वहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरे इस्टेट में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और बगीचे लगे हुए थे। एक स्थान पर एक छोटा सा, गोल सा तालाब बना हुआ था, जिसमें बीच में वीनस की एक मूर्ति लगी हुई थी, और उसके हर तरफ से छोटे छोटे फ़ौव्वारे लगे हुए थे। तालाब की परिधि पर करीब दो फुट का चबूतरा था, जो बहुत अच्छी जगह थी बैठ कर आगे की बातचीत करने के लिए।

“जय,” मीना ने थोड़ा हिचकते हुए कहा, “थोड़ा... बैठ जाएँ? ... तुमसे कुछ बातें करनी थीं...”

“बोलो मीना...” जय भी उसी के समान हिचकिचा रहा था।

“जय...” मीना की हिचक बरकरार थी, “... ऐसी बात शायद लड़कियाँ नहीं करतीं... लेकिन... लेकिन... न जाने क्या बात है तुममें... कि मैं बरबस तुम्हारी तरफ़ खिंची चली आती हूँ...”

जय को लगा कि जैसे उसके कानों में मधुर संगीत बजने लगा हो।

“कल तुमने मुझसे कहा था न... कि मुझको पहली बार देखते ही मैं तुमको भा गई... यह कि जैसे मैं तुम्हारी अपनी हूँ? ... तो मुझको भी वैसा ही लगा... जब मैंने तुमको पहली बार देखा! ... कुछ अमेज़िंग सा अट्रैक्शन! अदरवर्ल्डली! ... उसको एक्सप्लेन नहीं कर सकती!”

“मीना...?”

“मुझको कह लेने दो जय... प्लीज़!”

जय ने केवल ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“थैंक यू...” मीना ने कहा और एक गहरी साँस भरी, “तुम मुझे पसंद... नो, बहुत पसंद हो! ... लेकिन... मैं चाहती हूँ... कि इसके पहले कि हम आगे बढ़ें, तुमको... कम से कम तुमको... मेरे बारे में पता हो। ... मेरे पास्ट के बारे में...”

“मीना... मैंने तुमसे पहले ही कहा है कि मुझे तुम्हारे पास्ट से कोई मतलब नहीं, कोई परवाह नहीं... अगर तुम कोई ख़ूनी या मुज़रिम न रही हो!”

मीना हौले से हँसी, “नहीं मैं कोई ख़ूनी वूनी नहीं हूँ... बट स्टिल, आई वान्ट यू टू नो अबाउट मी!”

“ओके!”

“मैं एक ग़रीब फ़ैमिली से हूँ...”

जय ने उसकी इस बात पर बड़े ही बेपरवाह तरीके से अपने कन्धे उचकाए - यह बताने के लिए कि इस बात का कोई महत्त्व नहीं है - ख़ास कर अब, जब मीना का खुद का एक मुक़म्मल कैरियर है, और वो स्वयं इतना कमा लेती है जिसमें बड़े ठाठ से अमेरिका में रहा जा सके!

मीना ने फिर भी कहना जारी रखा, “मेरी पढ़ाई लिखाई... सब एक चैरिटेबल ट्रस्ट ने मैनेज किया है...”

आई वुड से, यू डिड वण्डरफुल्ली ग्रेट!” जय खुश होते हुए बोला, “नाम बताना उस ट्रस्ट का... मैं भी उसमें डॉलर डोनेट करूँगा! ... भई, क्या बढ़िया जेम ढूँढ़ निकाला है उन लोगों ने!”

जय की बात पर मीना के होंठों पर एक नर्वस सी हँसी आ गई, “आई नो... आई नो! ... तुमको फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन तुमको अपने बारे में सब कुछ बता देना मेरा फ़र्ज़ है!”

“हा हा! ओके! बताओ सब!”

आई डोंट नो हाऊ यू फ़ील अबाउट इट... बट मैं बड़ी भी बहुत हूँ तुमसे...”

आई नो... तुम्हारा रेज़्युमे पढ़ा है मैंने! ... मुझसे कहीं अधिक क्वालिफाइड हो, मुझसे अधिक एक्सपीरियंस है, तो जाहिर सी बात है कि मुझसे बड़ी भी हो!” जय ने फिर से इस बात को नकारते हुए कहा, “... वैसे, भैया भी जानते हैं ये बात! ... और शायद अब भाभी भी... फिर भी उन्होंने इस बारे में एक बात भी नहीं बोली!”

मीना चुप ही रही।

उसको चुप देख कर जय ने ही बात आगे बढ़ाई, “वैसे, एक बात बताऊँ तुमको? ... उम्र में भाभी भी भैया से बड़ी हैं। ... वो हम सबसे कहीं अधिक मैच्योर हैं... इसीलिए तो हम सब में इतना ठहराव है।”

“ओह?”

“हाँ! ... भाभी पहले चाचा जी - मतलब हमारी कंपनी के फाउंडर... की पर्सनल सेक्रेटरी थीं।” जय ने अपने परिवार का एक राज़ खोला, “... भाभी बहुत स्किलफुल थीं और बहुत एजुकेटेड भी... और इसलिए चाचा जी उनको बहुत पसंद भी करते थे! शायद अपनी बेटी के ही जैसे... लेकिन इतना पसंद करने के बावज़ूद, वो भाभी में अपनी बहू का रूप नहीं देख पाए। ... उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वो चाहते थे कि भैया उनकी पसंद की किसी भारतीय लड़की से शादी करें!”

बताते बताते जय ने गहरी साँस भरी, “... लेकिन भैया और भाभी दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे... उसके कारण थोड़ा फ़्रिक्शन भी हुआ! लेकिन, फिर चाचा जी की मौत के बाद भाभी ने जिस तरह भैया... हमारे बिज़नेस... और फिर मुझको सम्हाला... सबकी बोलती बंद कर दी उन्होंने! ... चाची जी के मन में उनको ले कर बहुत से प्रीकंसीवड नोशंस थे... लेकिन जब उन्होंने भाभी का असली रूप देखा... उनके सभी गुण समझे, तब वो भी शांत हो गईं।”

कहते हुए जय ने बड़े गर्व से मीना को देखा - वो हतप्रभ हो कर सब सुन रही थी,

“एक देसी लड़की क्या इतना सब कर सकेगी? ... मेरे ख्याल से नहीं!” वो बड़े गर्व से बोला, “... और अब आलम ये है कि चाची जी अपनी ‘प्यारी बहू’ के बिना नहीं रह पातीं। हम बेटों से मिलने से अधिक उनको अपनी बहू और दोनों पोतों से मिलने का मन होता रहता है!”

“हा हा! दैट इस सो नाइस टू नो, जय...” मीना अब थोड़ा सहज हो गई, “थैंक यू फॉर टेलिंग मी ऑल दिस!”

“नो प्रॉब्लम!” जय ने बड़ी दरियादिली से कहा, “आगे बोलो... क्या कहना था तुमको!”

“उम्म्म...” मीना ने एक भूमिका बाँधी, “शायद तुमको ये बात सुन कर बुरा लगे!”

“बुरा लगना है, तो लगने दो! ... तुम कम से कम अपनी बात तो कहो!”

“ओके! ... जब मैं यहाँ ऍमबीए करने आई, तब से ले कर अब तक मेरे तीन अफेयर्स हो चुके हैं...” उसने कहा - और थोड़ी देर रुक कर देखने लगी कि इस बात का जय पर क्या प्रभाव पड़ा।

आई ऍम सॉरी मीना... सॉरी इस बात के लिए कि प्यार की तुम्हारी तलाश अभी तक क़ामयाब नहीं हो पाई... लेकिन शायद ये इसलिए भी हुआ है कि... तुम जैसी अमेजिंग लड़की... उन तीनों से बेहतर डिज़र्व करती है!” जय ने कहा।

उसको भी विश्वास नहीं हुआ कि उसके अंदर इतनी सहनशीलता कहाँ से आ गई! शायद इसीलिए कहते हैं कि प्यार में लोग अंधे हो जाते हैं।

“ओह जय... तुम पर तो किसी बात का कोई असर ही नहीं होता!” मीना ऊपर से निराश, लेकिन अंदर से बहुत आनंदित होती हुई बोली!

“मैंने कहा न - मेरे लिए तुम्हारा पास्ट मायने नहीं रखता! ... मायने रखता है तो बस... हमारा फ्यूचर!”

“ओके...” मीना ने भी इस बार बम गिरा देने की ठान ली, “तुम कुछ सुन ही नहीं रहे हो... कुछ मान ही नहीं रहे हो, तो सुनो... हाऊ विल यू रिएक्ट, इफ आई टेल यू दैट आई हैड फिज़िकल रिलेशनशिप्स विद दोज़ मेन?”

हाँ - इस बार जय के चेहरे पर शिकन आई - लेकिन बहुत हल्की सी!

वो सोचते हुए बोला, “याह... दैट इस अ बिट सैड मीना... आई अंडरस्टैंड कि तुमको कैसा फ़ील हुआ होगा! ... लेकिन ये भी सच बात है, कि बिना सच्चे प्यार के सेक्स करने से कोई फ़ायदा नहीं होता... और न ही कोई सटिस्फैक्शन मिलता है!” उसने बुझे हुए स्वर में कहा, “... आई विश व्ही हैड मेट अर्लियर (काश कि हम पहले मिले होते)!”

“ओह जय...” मीना ने गहरी साँस लेते हुए, बड़े अशक्त भाव से कहा - और बोलते बोलते उसका पूरा शरीर काँप गया, “कैसे हो तुम!”

सच में - उसको समझ ही नहीं आया कि कैसा आदमी है जय! कोई और होता तो उसको वेश्या होने का तमगा पकड़ा चुका होता। गोरे अमेरिकन्स भी शायद इतने खुले हुए न हों, जबकि उनका समाज सेक्स को ले कर कहीं अधिक खुला हुआ है।

द बेस्ट!” वो मुस्कुराया।

“हा हा!” मीना नर्वस हो कर हँसी, और बोली, “ओह गॉड! नो वंडर आई लव यू सो मच!” उसने एक झोंक में कह डाला।

फिर वो बोलते बोलते हठात ही रुक गई - उसको संज्ञान हुआ कि उसने ये क्या कह दिया! मन की बात ज़ुबान से निकल गई। पहले तो उसके चेहरे से सारा रंग निचुड़ गया और फिर अगले ही क्षण उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फ़ैल गई।

जय के चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान आ गई, “मतलब... अभी तो कोई और नहीं है तुम्हारी लाइफ में?”

“कोई नहीं जय...” मीना ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा, “जब से तुम मिले हो...” वो बोलते बोलते रुक गई, और फिर थोड़ा ठहर कर बोली, “... किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती अब मैं...”

“पक्की बात?” जय मुस्कुराया।

“हम्म उम्म...” मीना ने स्वीकारा... बहुत हल्के से, दबे हुए स्वर निकले उसके!

अब तक दोनों के दिलों की धड़कनें बहुत बढ़ गई थीं।

“आई लव यू...” जय ने मीना के कान में बहुत धीरे से कहा।

“लव यू टू...” मीना ने भी उतने ही धीरे से उत्तर दिया, “आई ऍम सो लकी! ... ऍम आई सो लकी?”

“तुम्हारा मुझको नहीं पता मीना,” जय बोला, “लेकिन मैं तो लकी हूँ!”

“ओह जय... जय... मेरे जय!” कह कर मीना जय की मज़बूत बाज़ुओं के घेरे में समां गई।

वो आलिंगन इतना सुखदायक था जिसका शब्दों में बयान कर पाना कठिन है।

“वायदा करो कि तुम मुझसे अलग नहीं होगी!” जय बोला।

“मरते दम तक नहीं!”

“पक्की बात?”

“पक्की बात... मेरे पूरे वज़ूद पर अब तुम्हारा हक़ है जय! बस तुम्हारा!” मीना भावनाओं के आवेश में बोलती जा रही थी, “... मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं किसी को इतनी बड़ी बात कह सकूँगी...”

उसको अपने आलिंगन में ही बाँधे हुए जय बड़े प्यार से उसको देखता है।

“ओह जय! ... काश मैंने वो सब बेवक़ूफ़ियाँ न करी होतीं!”

“मीना... जैसा कि मैंने पहले भी कहा है... उन बातों का हमारे आगे की लाइफ पर कोई असर नहीं होने वाला... सो नहीं होने वाला!” उसने मीना का माथा चूमा, “... भूल जाओ वो सब!”

“तुम साथ रहोगे... तो भूल जाऊँगी... सब कुछ!”

“पक्की बात?” कह कर जय ने मीना के दोनों गालों पर अपने दोनों हाथ रख कर हल्के से दबाया।

“हम्म उम्म...”

गाल दबाने से मीना के होंठ किसी चोंच की भाँति सामने की तरफ़ निकल आए। अगले ही पल जय ने मीना की चोंच को अपने मुँह में भर लिया, और दोनों ही एक बेहद प्रेममय फ्रेंच चुम्बन में लिप्त हो गए।

*
Nice update....
 

parkas

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Update #17


सुबह का नाश्ता कर के जय ने मीना को अपना इस्टेट दिखाने की पेशकश करी, जो मीना ने सहर्ष स्वीकार कर ली। इस्टेट दिखाना एक बहाना था - दरअसल वो भी चाहती थी कि सुबह की नरम गुलाबी धूप में जैसा रोमांटिक माहौल बन रहा था, उसमें जय के साथ, अकेले में, थोड़ा समय बिताया जा सके। वो थोड़ी नर्वस थी... ऐसे किसी के साथ कुछ समय बिताये हुए कुछ वर्ष बीत गए थे। पिछले अफेयर के बाद अब उसकी इच्छा नहीं होती थी कि वो किसी और पुरुष के साथ किसी भी तरह का सम्बन्ध बनाए... लेकिन, जय से मिल कर उसके हृदय के तार झनझना उठे। वो जानती थी कि जय भी उसमें उतनी ही रूचि रखता है। लिहाज़ा, उसकी आशा थी कि वो अपने भूत के बारे में जय से बात कर पाएगी, और तब अगर सब ठीक रहा तो दोनों आगे बढ़ सकेंगे। क्लेयर ने मीना को एक शॉल ओढ़ने को दे दिया था, जिससे उसको ठण्ड न लगे। मौसम ठण्डा अवश्य था, लेकिन सुहाना भी बहुत था।

जय इस तरह से मीना के साथ एकांत और समय पा कर उत्साहित भी था, और थोड़ा नर्वस भी... ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उसके पेट में तितलियाँ उड़ रही थीं। उसके और मीना के सम्बन्ध पर उसके परिवार की रज़ामंदी तो मिल ही गई थी, तो अब बस लड़की - यानि कि मीना की रज़ामंदी मिलनी शेष थी। वो चाहता था कि मीना की प्रेम-दृष्टि उस पर पड़े! उसके पहले किसी भी लड़की ने उसको इस तरह से आकर्षित नहीं किया था। और, मीना से कुछ दिनों तक मिलने और उसके साथ काम करने के बाद उसको उसके गुणों के बारे में भी पता चला, तो वो उसकी तरफ़ और भी आकर्षित हो गया। कुछ समय पहले तक उसको विवाह करने की कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन मीना से मिलने के बाद उसको ऐसा लगता कि मीना के साथ विवाह करना उसके लिए सबसे आवश्यक काम था।

जैसा कि मीना को कल रात ही स्पष्ट हो गया था, आदित्य और जय का ‘घर’ एक बड़ा सा इस्टेट था। तीन एकड़ भूमि पर बना मुख्य आवास एक बड़ा सा बंगला था, जो इस्टेट के सामने की तरफ़, मुख्य मार्ग के समीप बना हुआ था। इस मुख्य बंगले में छः कमरे, दो हाल, और एक स्टडी था, जो आदित्य के लिया ऑफ़िस का काम करता था। इस मुख्य बंगले से थोड़ा अलग हट कर एक गेस्ट कॉटेज था, जिसमें दो कमरे, एक हॉल और एक छोटी सी रसोई थी। यह किसी भी मेहमान, या उनके परिवार के आवास के रूप में इस्तेमाल होता था। इसके अतिरिक्त एक और कॉटेज था, जिसमें एक कमरा, एक हाल, और एक छोटी सी रसोई थी - इसी में कल रात मीना गई थी। यह जय का मैन-केव था और केवल वो ही इस कॉटेज का इस्तेमाल करता था। आज कल अपना सारा कामकाज वो वहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरे इस्टेट में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और बगीचे लगे हुए थे। एक स्थान पर एक छोटा सा, गोल सा तालाब बना हुआ था, जिसमें बीच में वीनस की एक मूर्ति लगी हुई थी, और उसके हर तरफ से छोटे छोटे फ़ौव्वारे लगे हुए थे। तालाब की परिधि पर करीब दो फुट का चबूतरा था, जो बहुत अच्छी जगह थी बैठ कर आगे की बातचीत करने के लिए।

“जय,” मीना ने थोड़ा हिचकते हुए कहा, “थोड़ा... बैठ जाएँ? ... तुमसे कुछ बातें करनी थीं...”

“बोलो मीना...” जय भी उसी के समान हिचकिचा रहा था।

“जय...” मीना की हिचक बरकरार थी, “... ऐसी बात शायद लड़कियाँ नहीं करतीं... लेकिन... लेकिन... न जाने क्या बात है तुममें... कि मैं बरबस तुम्हारी तरफ़ खिंची चली आती हूँ...”

जय को लगा कि जैसे उसके कानों में मधुर संगीत बजने लगा हो।

“कल तुमने मुझसे कहा था न... कि मुझको पहली बार देखते ही मैं तुमको भा गई... यह कि जैसे मैं तुम्हारी अपनी हूँ? ... तो मुझको भी वैसा ही लगा... जब मैंने तुमको पहली बार देखा! ... कुछ अमेज़िंग सा अट्रैक्शन! अदरवर्ल्डली! ... उसको एक्सप्लेन नहीं कर सकती!”

“मीना...?”

“मुझको कह लेने दो जय... प्लीज़!”

जय ने केवल ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“थैंक यू...” मीना ने कहा और एक गहरी साँस भरी, “तुम मुझे पसंद... नो, बहुत पसंद हो! ... लेकिन... मैं चाहती हूँ... कि इसके पहले कि हम आगे बढ़ें, तुमको... कम से कम तुमको... मेरे बारे में पता हो। ... मेरे पास्ट के बारे में...”

“मीना... मैंने तुमसे पहले ही कहा है कि मुझे तुम्हारे पास्ट से कोई मतलब नहीं, कोई परवाह नहीं... अगर तुम कोई ख़ूनी या मुज़रिम न रही हो!”

मीना हौले से हँसी, “नहीं मैं कोई ख़ूनी वूनी नहीं हूँ... बट स्टिल, आई वान्ट यू टू नो अबाउट मी!”

“ओके!”

“मैं एक ग़रीब फ़ैमिली से हूँ...”

जय ने उसकी इस बात पर बड़े ही बेपरवाह तरीके से अपने कन्धे उचकाए - यह बताने के लिए कि इस बात का कोई महत्त्व नहीं है - ख़ास कर अब, जब मीना का खुद का एक मुक़म्मल कैरियर है, और वो स्वयं इतना कमा लेती है जिसमें बड़े ठाठ से अमेरिका में रहा जा सके!

मीना ने फिर भी कहना जारी रखा, “मेरी पढ़ाई लिखाई... सब एक चैरिटेबल ट्रस्ट ने मैनेज किया है...”

आई वुड से, यू डिड वण्डरफुल्ली ग्रेट!” जय खुश होते हुए बोला, “नाम बताना उस ट्रस्ट का... मैं भी उसमें डॉलर डोनेट करूँगा! ... भई, क्या बढ़िया जेम ढूँढ़ निकाला है उन लोगों ने!”

जय की बात पर मीना के होंठों पर एक नर्वस सी हँसी आ गई, “आई नो... आई नो! ... तुमको फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन तुमको अपने बारे में सब कुछ बता देना मेरा फ़र्ज़ है!”

“हा हा! ओके! बताओ सब!”

आई डोंट नो हाऊ यू फ़ील अबाउट इट... बट मैं बड़ी भी बहुत हूँ तुमसे...”

आई नो... तुम्हारा रेज़्युमे पढ़ा है मैंने! ... मुझसे कहीं अधिक क्वालिफाइड हो, मुझसे अधिक एक्सपीरियंस है, तो जाहिर सी बात है कि मुझसे बड़ी भी हो!” जय ने फिर से इस बात को नकारते हुए कहा, “... वैसे, भैया भी जानते हैं ये बात! ... और शायद अब भाभी भी... फिर भी उन्होंने इस बारे में एक बात भी नहीं बोली!”

मीना चुप ही रही।

उसको चुप देख कर जय ने ही बात आगे बढ़ाई, “वैसे, एक बात बताऊँ तुमको? ... उम्र में भाभी भी भैया से बड़ी हैं। ... वो हम सबसे कहीं अधिक मैच्योर हैं... इसीलिए तो हम सब में इतना ठहराव है।”

“ओह?”

“हाँ! ... भाभी पहले चाचा जी - मतलब हमारी कंपनी के फाउंडर... की पर्सनल सेक्रेटरी थीं।” जय ने अपने परिवार का एक राज़ खोला, “... भाभी बहुत स्किलफुल थीं और बहुत एजुकेटेड भी... और इसलिए चाचा जी उनको बहुत पसंद भी करते थे! शायद अपनी बेटी के ही जैसे... लेकिन इतना पसंद करने के बावज़ूद, वो भाभी में अपनी बहू का रूप नहीं देख पाए। ... उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वो चाहते थे कि भैया उनकी पसंद की किसी भारतीय लड़की से शादी करें!”

बताते बताते जय ने गहरी साँस भरी, “... लेकिन भैया और भाभी दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे... उसके कारण थोड़ा फ़्रिक्शन भी हुआ! लेकिन, फिर चाचा जी की मौत के बाद भाभी ने जिस तरह भैया... हमारे बिज़नेस... और फिर मुझको सम्हाला... सबकी बोलती बंद कर दी उन्होंने! ... चाची जी के मन में उनको ले कर बहुत से प्रीकंसीवड नोशंस थे... लेकिन जब उन्होंने भाभी का असली रूप देखा... उनके सभी गुण समझे, तब वो भी शांत हो गईं।”

कहते हुए जय ने बड़े गर्व से मीना को देखा - वो हतप्रभ हो कर सब सुन रही थी,

“एक देसी लड़की क्या इतना सब कर सकेगी? ... मेरे ख्याल से नहीं!” वो बड़े गर्व से बोला, “... और अब आलम ये है कि चाची जी अपनी ‘प्यारी बहू’ के बिना नहीं रह पातीं। हम बेटों से मिलने से अधिक उनको अपनी बहू और दोनों पोतों से मिलने का मन होता रहता है!”

“हा हा! दैट इस सो नाइस टू नो, जय...” मीना अब थोड़ा सहज हो गई, “थैंक यू फॉर टेलिंग मी ऑल दिस!”

“नो प्रॉब्लम!” जय ने बड़ी दरियादिली से कहा, “आगे बोलो... क्या कहना था तुमको!”

“उम्म्म...” मीना ने एक भूमिका बाँधी, “शायद तुमको ये बात सुन कर बुरा लगे!”

“बुरा लगना है, तो लगने दो! ... तुम कम से कम अपनी बात तो कहो!”

“ओके! ... जब मैं यहाँ ऍमबीए करने आई, तब से ले कर अब तक मेरे तीन अफेयर्स हो चुके हैं...” उसने कहा - और थोड़ी देर रुक कर देखने लगी कि इस बात का जय पर क्या प्रभाव पड़ा।

आई ऍम सॉरी मीना... सॉरी इस बात के लिए कि प्यार की तुम्हारी तलाश अभी तक क़ामयाब नहीं हो पाई... लेकिन शायद ये इसलिए भी हुआ है कि... तुम जैसी अमेजिंग लड़की... उन तीनों से बेहतर डिज़र्व करती है!” जय ने कहा।

उसको भी विश्वास नहीं हुआ कि उसके अंदर इतनी सहनशीलता कहाँ से आ गई! शायद इसीलिए कहते हैं कि प्यार में लोग अंधे हो जाते हैं।

“ओह जय... तुम पर तो किसी बात का कोई असर ही नहीं होता!” मीना ऊपर से निराश, लेकिन अंदर से बहुत आनंदित होती हुई बोली!

“मैंने कहा न - मेरे लिए तुम्हारा पास्ट मायने नहीं रखता! ... मायने रखता है तो बस... हमारा फ्यूचर!”

“ओके...” मीना ने भी इस बार बम गिरा देने की ठान ली, “तुम कुछ सुन ही नहीं रहे हो... कुछ मान ही नहीं रहे हो, तो सुनो... हाऊ विल यू रिएक्ट, इफ आई टेल यू दैट आई हैड फिज़िकल रिलेशनशिप्स विद दोज़ मेन?”

हाँ - इस बार जय के चेहरे पर शिकन आई - लेकिन बहुत हल्की सी!

वो सोचते हुए बोला, “याह... दैट इस अ बिट सैड मीना... आई अंडरस्टैंड कि तुमको कैसा फ़ील हुआ होगा! ... लेकिन ये भी सच बात है, कि बिना सच्चे प्यार के सेक्स करने से कोई फ़ायदा नहीं होता... और न ही कोई सटिस्फैक्शन मिलता है!” उसने बुझे हुए स्वर में कहा, “... आई विश व्ही हैड मेट अर्लियर (काश कि हम पहले मिले होते)!”

“ओह जय...” मीना ने गहरी साँस लेते हुए, बड़े अशक्त भाव से कहा - और बोलते बोलते उसका पूरा शरीर काँप गया, “कैसे हो तुम!”

सच में - उसको समझ ही नहीं आया कि कैसा आदमी है जय! कोई और होता तो उसको वेश्या होने का तमगा पकड़ा चुका होता। गोरे अमेरिकन्स भी शायद इतने खुले हुए न हों, जबकि उनका समाज सेक्स को ले कर कहीं अधिक खुला हुआ है।

द बेस्ट!” वो मुस्कुराया।

“हा हा!” मीना नर्वस हो कर हँसी, और बोली, “ओह गॉड! नो वंडर आई लव यू सो मच!” उसने एक झोंक में कह डाला।

फिर वो बोलते बोलते हठात ही रुक गई - उसको संज्ञान हुआ कि उसने ये क्या कह दिया! मन की बात ज़ुबान से निकल गई। पहले तो उसके चेहरे से सारा रंग निचुड़ गया और फिर अगले ही क्षण उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फ़ैल गई।

जय के चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान आ गई, “मतलब... अभी तो कोई और नहीं है तुम्हारी लाइफ में?”

“कोई नहीं जय...” मीना ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा, “जब से तुम मिले हो...” वो बोलते बोलते रुक गई, और फिर थोड़ा ठहर कर बोली, “... किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती अब मैं...”

“पक्की बात?” जय मुस्कुराया।

“हम्म उम्म...” मीना ने स्वीकारा... बहुत हल्के से, दबे हुए स्वर निकले उसके!

अब तक दोनों के दिलों की धड़कनें बहुत बढ़ गई थीं।

“आई लव यू...” जय ने मीना के कान में बहुत धीरे से कहा।

“लव यू टू...” मीना ने भी उतने ही धीरे से उत्तर दिया, “आई ऍम सो लकी! ... ऍम आई सो लकी?”

“तुम्हारा मुझको नहीं पता मीना,” जय बोला, “लेकिन मैं तो लकी हूँ!”

“ओह जय... जय... मेरे जय!” कह कर मीना जय की मज़बूत बाज़ुओं के घेरे में समां गई।

वो आलिंगन इतना सुखदायक था जिसका शब्दों में बयान कर पाना कठिन है।

“वायदा करो कि तुम मुझसे अलग नहीं होगी!” जय बोला।

“मरते दम तक नहीं!”

“पक्की बात?”

“पक्की बात... मेरे पूरे वज़ूद पर अब तुम्हारा हक़ है जय! बस तुम्हारा!” मीना भावनाओं के आवेश में बोलती जा रही थी, “... मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं किसी को इतनी बड़ी बात कह सकूँगी...”

उसको अपने आलिंगन में ही बाँधे हुए जय बड़े प्यार से उसको देखता है।

“ओह जय! ... काश मैंने वो सब बेवक़ूफ़ियाँ न करी होतीं!”

“मीना... जैसा कि मैंने पहले भी कहा है... उन बातों का हमारे आगे की लाइफ पर कोई असर नहीं होने वाला... सो नहीं होने वाला!” उसने मीना का माथा चूमा, “... भूल जाओ वो सब!”

“तुम साथ रहोगे... तो भूल जाऊँगी... सब कुछ!”

“पक्की बात?” कह कर जय ने मीना के दोनों गालों पर अपने दोनों हाथ रख कर हल्के से दबाया।

“हम्म उम्म...”

गाल दबाने से मीना के होंठ किसी चोंच की भाँति सामने की तरफ़ निकल आए। अगले ही पल जय ने मीना की चोंच को अपने मुँह में भर लिया, और दोनों ही एक बेहद प्रेममय फ्रेंच चुम्बन में लिप्त हो गए।

*
Bahut hi shaandar update diya hai avsji bhai....
Nice and lovely update....
 

dhparikh

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Update #17


सुबह का नाश्ता कर के जय ने मीना को अपना इस्टेट दिखाने की पेशकश करी, जो मीना ने सहर्ष स्वीकार कर ली। इस्टेट दिखाना एक बहाना था - दरअसल वो भी चाहती थी कि सुबह की नरम गुलाबी धूप में जैसा रोमांटिक माहौल बन रहा था, उसमें जय के साथ, अकेले में, थोड़ा समय बिताया जा सके। वो थोड़ी नर्वस थी... ऐसे किसी के साथ कुछ समय बिताये हुए कुछ वर्ष बीत गए थे। पिछले अफेयर के बाद अब उसकी इच्छा नहीं होती थी कि वो किसी और पुरुष के साथ किसी भी तरह का सम्बन्ध बनाए... लेकिन, जय से मिल कर उसके हृदय के तार झनझना उठे। वो जानती थी कि जय भी उसमें उतनी ही रूचि रखता है। लिहाज़ा, उसकी आशा थी कि वो अपने भूत के बारे में जय से बात कर पाएगी, और तब अगर सब ठीक रहा तो दोनों आगे बढ़ सकेंगे। क्लेयर ने मीना को एक शॉल ओढ़ने को दे दिया था, जिससे उसको ठण्ड न लगे। मौसम ठण्डा अवश्य था, लेकिन सुहाना भी बहुत था।

जय इस तरह से मीना के साथ एकांत और समय पा कर उत्साहित भी था, और थोड़ा नर्वस भी... ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उसके पेट में तितलियाँ उड़ रही थीं। उसके और मीना के सम्बन्ध पर उसके परिवार की रज़ामंदी तो मिल ही गई थी, तो अब बस लड़की - यानि कि मीना की रज़ामंदी मिलनी शेष थी। वो चाहता था कि मीना की प्रेम-दृष्टि उस पर पड़े! उसके पहले किसी भी लड़की ने उसको इस तरह से आकर्षित नहीं किया था। और, मीना से कुछ दिनों तक मिलने और उसके साथ काम करने के बाद उसको उसके गुणों के बारे में भी पता चला, तो वो उसकी तरफ़ और भी आकर्षित हो गया। कुछ समय पहले तक उसको विवाह करने की कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन मीना से मिलने के बाद उसको ऐसा लगता कि मीना के साथ विवाह करना उसके लिए सबसे आवश्यक काम था।

जैसा कि मीना को कल रात ही स्पष्ट हो गया था, आदित्य और जय का ‘घर’ एक बड़ा सा इस्टेट था। तीन एकड़ भूमि पर बना मुख्य आवास एक बड़ा सा बंगला था, जो इस्टेट के सामने की तरफ़, मुख्य मार्ग के समीप बना हुआ था। इस मुख्य बंगले में छः कमरे, दो हाल, और एक स्टडी था, जो आदित्य के लिया ऑफ़िस का काम करता था। इस मुख्य बंगले से थोड़ा अलग हट कर एक गेस्ट कॉटेज था, जिसमें दो कमरे, एक हॉल और एक छोटी सी रसोई थी। यह किसी भी मेहमान, या उनके परिवार के आवास के रूप में इस्तेमाल होता था। इसके अतिरिक्त एक और कॉटेज था, जिसमें एक कमरा, एक हाल, और एक छोटी सी रसोई थी - इसी में कल रात मीना गई थी। यह जय का मैन-केव था और केवल वो ही इस कॉटेज का इस्तेमाल करता था। आज कल अपना सारा कामकाज वो वहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरे इस्टेट में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और बगीचे लगे हुए थे। एक स्थान पर एक छोटा सा, गोल सा तालाब बना हुआ था, जिसमें बीच में वीनस की एक मूर्ति लगी हुई थी, और उसके हर तरफ से छोटे छोटे फ़ौव्वारे लगे हुए थे। तालाब की परिधि पर करीब दो फुट का चबूतरा था, जो बहुत अच्छी जगह थी बैठ कर आगे की बातचीत करने के लिए।

“जय,” मीना ने थोड़ा हिचकते हुए कहा, “थोड़ा... बैठ जाएँ? ... तुमसे कुछ बातें करनी थीं...”

“बोलो मीना...” जय भी उसी के समान हिचकिचा रहा था।

“जय...” मीना की हिचक बरकरार थी, “... ऐसी बात शायद लड़कियाँ नहीं करतीं... लेकिन... लेकिन... न जाने क्या बात है तुममें... कि मैं बरबस तुम्हारी तरफ़ खिंची चली आती हूँ...”

जय को लगा कि जैसे उसके कानों में मधुर संगीत बजने लगा हो।

“कल तुमने मुझसे कहा था न... कि मुझको पहली बार देखते ही मैं तुमको भा गई... यह कि जैसे मैं तुम्हारी अपनी हूँ? ... तो मुझको भी वैसा ही लगा... जब मैंने तुमको पहली बार देखा! ... कुछ अमेज़िंग सा अट्रैक्शन! अदरवर्ल्डली! ... उसको एक्सप्लेन नहीं कर सकती!”

“मीना...?”

“मुझको कह लेने दो जय... प्लीज़!”

जय ने केवल ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“थैंक यू...” मीना ने कहा और एक गहरी साँस भरी, “तुम मुझे पसंद... नो, बहुत पसंद हो! ... लेकिन... मैं चाहती हूँ... कि इसके पहले कि हम आगे बढ़ें, तुमको... कम से कम तुमको... मेरे बारे में पता हो। ... मेरे पास्ट के बारे में...”

“मीना... मैंने तुमसे पहले ही कहा है कि मुझे तुम्हारे पास्ट से कोई मतलब नहीं, कोई परवाह नहीं... अगर तुम कोई ख़ूनी या मुज़रिम न रही हो!”

मीना हौले से हँसी, “नहीं मैं कोई ख़ूनी वूनी नहीं हूँ... बट स्टिल, आई वान्ट यू टू नो अबाउट मी!”

“ओके!”

“मैं एक ग़रीब फ़ैमिली से हूँ...”

जय ने उसकी इस बात पर बड़े ही बेपरवाह तरीके से अपने कन्धे उचकाए - यह बताने के लिए कि इस बात का कोई महत्त्व नहीं है - ख़ास कर अब, जब मीना का खुद का एक मुक़म्मल कैरियर है, और वो स्वयं इतना कमा लेती है जिसमें बड़े ठाठ से अमेरिका में रहा जा सके!

मीना ने फिर भी कहना जारी रखा, “मेरी पढ़ाई लिखाई... सब एक चैरिटेबल ट्रस्ट ने मैनेज किया है...”

आई वुड से, यू डिड वण्डरफुल्ली ग्रेट!” जय खुश होते हुए बोला, “नाम बताना उस ट्रस्ट का... मैं भी उसमें डॉलर डोनेट करूँगा! ... भई, क्या बढ़िया जेम ढूँढ़ निकाला है उन लोगों ने!”

जय की बात पर मीना के होंठों पर एक नर्वस सी हँसी आ गई, “आई नो... आई नो! ... तुमको फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन तुमको अपने बारे में सब कुछ बता देना मेरा फ़र्ज़ है!”

“हा हा! ओके! बताओ सब!”

आई डोंट नो हाऊ यू फ़ील अबाउट इट... बट मैं बड़ी भी बहुत हूँ तुमसे...”

आई नो... तुम्हारा रेज़्युमे पढ़ा है मैंने! ... मुझसे कहीं अधिक क्वालिफाइड हो, मुझसे अधिक एक्सपीरियंस है, तो जाहिर सी बात है कि मुझसे बड़ी भी हो!” जय ने फिर से इस बात को नकारते हुए कहा, “... वैसे, भैया भी जानते हैं ये बात! ... और शायद अब भाभी भी... फिर भी उन्होंने इस बारे में एक बात भी नहीं बोली!”

मीना चुप ही रही।

उसको चुप देख कर जय ने ही बात आगे बढ़ाई, “वैसे, एक बात बताऊँ तुमको? ... उम्र में भाभी भी भैया से बड़ी हैं। ... वो हम सबसे कहीं अधिक मैच्योर हैं... इसीलिए तो हम सब में इतना ठहराव है।”

“ओह?”

“हाँ! ... भाभी पहले चाचा जी - मतलब हमारी कंपनी के फाउंडर... की पर्सनल सेक्रेटरी थीं।” जय ने अपने परिवार का एक राज़ खोला, “... भाभी बहुत स्किलफुल थीं और बहुत एजुकेटेड भी... और इसलिए चाचा जी उनको बहुत पसंद भी करते थे! शायद अपनी बेटी के ही जैसे... लेकिन इतना पसंद करने के बावज़ूद, वो भाभी में अपनी बहू का रूप नहीं देख पाए। ... उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वो चाहते थे कि भैया उनकी पसंद की किसी भारतीय लड़की से शादी करें!”

बताते बताते जय ने गहरी साँस भरी, “... लेकिन भैया और भाभी दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे... उसके कारण थोड़ा फ़्रिक्शन भी हुआ! लेकिन, फिर चाचा जी की मौत के बाद भाभी ने जिस तरह भैया... हमारे बिज़नेस... और फिर मुझको सम्हाला... सबकी बोलती बंद कर दी उन्होंने! ... चाची जी के मन में उनको ले कर बहुत से प्रीकंसीवड नोशंस थे... लेकिन जब उन्होंने भाभी का असली रूप देखा... उनके सभी गुण समझे, तब वो भी शांत हो गईं।”

कहते हुए जय ने बड़े गर्व से मीना को देखा - वो हतप्रभ हो कर सब सुन रही थी,

“एक देसी लड़की क्या इतना सब कर सकेगी? ... मेरे ख्याल से नहीं!” वो बड़े गर्व से बोला, “... और अब आलम ये है कि चाची जी अपनी ‘प्यारी बहू’ के बिना नहीं रह पातीं। हम बेटों से मिलने से अधिक उनको अपनी बहू और दोनों पोतों से मिलने का मन होता रहता है!”

“हा हा! दैट इस सो नाइस टू नो, जय...” मीना अब थोड़ा सहज हो गई, “थैंक यू फॉर टेलिंग मी ऑल दिस!”

“नो प्रॉब्लम!” जय ने बड़ी दरियादिली से कहा, “आगे बोलो... क्या कहना था तुमको!”

“उम्म्म...” मीना ने एक भूमिका बाँधी, “शायद तुमको ये बात सुन कर बुरा लगे!”

“बुरा लगना है, तो लगने दो! ... तुम कम से कम अपनी बात तो कहो!”

“ओके! ... जब मैं यहाँ ऍमबीए करने आई, तब से ले कर अब तक मेरे तीन अफेयर्स हो चुके हैं...” उसने कहा - और थोड़ी देर रुक कर देखने लगी कि इस बात का जय पर क्या प्रभाव पड़ा।

आई ऍम सॉरी मीना... सॉरी इस बात के लिए कि प्यार की तुम्हारी तलाश अभी तक क़ामयाब नहीं हो पाई... लेकिन शायद ये इसलिए भी हुआ है कि... तुम जैसी अमेजिंग लड़की... उन तीनों से बेहतर डिज़र्व करती है!” जय ने कहा।

उसको भी विश्वास नहीं हुआ कि उसके अंदर इतनी सहनशीलता कहाँ से आ गई! शायद इसीलिए कहते हैं कि प्यार में लोग अंधे हो जाते हैं।

“ओह जय... तुम पर तो किसी बात का कोई असर ही नहीं होता!” मीना ऊपर से निराश, लेकिन अंदर से बहुत आनंदित होती हुई बोली!

“मैंने कहा न - मेरे लिए तुम्हारा पास्ट मायने नहीं रखता! ... मायने रखता है तो बस... हमारा फ्यूचर!”

“ओके...” मीना ने भी इस बार बम गिरा देने की ठान ली, “तुम कुछ सुन ही नहीं रहे हो... कुछ मान ही नहीं रहे हो, तो सुनो... हाऊ विल यू रिएक्ट, इफ आई टेल यू दैट आई हैड फिज़िकल रिलेशनशिप्स विद दोज़ मेन?”

हाँ - इस बार जय के चेहरे पर शिकन आई - लेकिन बहुत हल्की सी!

वो सोचते हुए बोला, “याह... दैट इस अ बिट सैड मीना... आई अंडरस्टैंड कि तुमको कैसा फ़ील हुआ होगा! ... लेकिन ये भी सच बात है, कि बिना सच्चे प्यार के सेक्स करने से कोई फ़ायदा नहीं होता... और न ही कोई सटिस्फैक्शन मिलता है!” उसने बुझे हुए स्वर में कहा, “... आई विश व्ही हैड मेट अर्लियर (काश कि हम पहले मिले होते)!”

“ओह जय...” मीना ने गहरी साँस लेते हुए, बड़े अशक्त भाव से कहा - और बोलते बोलते उसका पूरा शरीर काँप गया, “कैसे हो तुम!”

सच में - उसको समझ ही नहीं आया कि कैसा आदमी है जय! कोई और होता तो उसको वेश्या होने का तमगा पकड़ा चुका होता। गोरे अमेरिकन्स भी शायद इतने खुले हुए न हों, जबकि उनका समाज सेक्स को ले कर कहीं अधिक खुला हुआ है।

द बेस्ट!” वो मुस्कुराया।

“हा हा!” मीना नर्वस हो कर हँसी, और बोली, “ओह गॉड! नो वंडर आई लव यू सो मच!” उसने एक झोंक में कह डाला।

फिर वो बोलते बोलते हठात ही रुक गई - उसको संज्ञान हुआ कि उसने ये क्या कह दिया! मन की बात ज़ुबान से निकल गई। पहले तो उसके चेहरे से सारा रंग निचुड़ गया और फिर अगले ही क्षण उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फ़ैल गई।

जय के चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान आ गई, “मतलब... अभी तो कोई और नहीं है तुम्हारी लाइफ में?”

“कोई नहीं जय...” मीना ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा, “जब से तुम मिले हो...” वो बोलते बोलते रुक गई, और फिर थोड़ा ठहर कर बोली, “... किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती अब मैं...”

“पक्की बात?” जय मुस्कुराया।

“हम्म उम्म...” मीना ने स्वीकारा... बहुत हल्के से, दबे हुए स्वर निकले उसके!

अब तक दोनों के दिलों की धड़कनें बहुत बढ़ गई थीं।

“आई लव यू...” जय ने मीना के कान में बहुत धीरे से कहा।

“लव यू टू...” मीना ने भी उतने ही धीरे से उत्तर दिया, “आई ऍम सो लकी! ... ऍम आई सो लकी?”

“तुम्हारा मुझको नहीं पता मीना,” जय बोला, “लेकिन मैं तो लकी हूँ!”

“ओह जय... जय... मेरे जय!” कह कर मीना जय की मज़बूत बाज़ुओं के घेरे में समां गई।

वो आलिंगन इतना सुखदायक था जिसका शब्दों में बयान कर पाना कठिन है।

“वायदा करो कि तुम मुझसे अलग नहीं होगी!” जय बोला।

“मरते दम तक नहीं!”

“पक्की बात?”

“पक्की बात... मेरे पूरे वज़ूद पर अब तुम्हारा हक़ है जय! बस तुम्हारा!” मीना भावनाओं के आवेश में बोलती जा रही थी, “... मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं किसी को इतनी बड़ी बात कह सकूँगी...”

उसको अपने आलिंगन में ही बाँधे हुए जय बड़े प्यार से उसको देखता है।

“ओह जय! ... काश मैंने वो सब बेवक़ूफ़ियाँ न करी होतीं!”

“मीना... जैसा कि मैंने पहले भी कहा है... उन बातों का हमारे आगे की लाइफ पर कोई असर नहीं होने वाला... सो नहीं होने वाला!” उसने मीना का माथा चूमा, “... भूल जाओ वो सब!”

“तुम साथ रहोगे... तो भूल जाऊँगी... सब कुछ!”

“पक्की बात?” कह कर जय ने मीना के दोनों गालों पर अपने दोनों हाथ रख कर हल्के से दबाया।

“हम्म उम्म...”

गाल दबाने से मीना के होंठ किसी चोंच की भाँति सामने की तरफ़ निकल आए। अगले ही पल जय ने मीना की चोंच को अपने मुँह में भर लिया, और दोनों ही एक बेहद प्रेममय फ्रेंच चुम्बन में लिप्त हो गए।

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Nice update....
 
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इश्क करना एक अलग चीज है लेकिन इश्क मे पड़कर शारीरिक संबंध बना लेना एक अलग चीज है। प्रेम मे धोखा खाना एक आम बात है लेकिन प्रेम मे बार-बार धोखा खाना आम बात नही है।
कहते है गलती किसी भी इंसान से हो सकती है पर यह भी कहा जाता है कि बार-बार गलती करना इंसान के मानसिक कमजोरी को प्रदर्शित करता है। यह भी कहते है कि पहली भूल माफी के काबिल होती है लेकिन बार-बार भूल की माफी नही होती।
मीना मैडम बहुत कम उम्र मे ही तीन लड़कों के साथ रिलेशनशिप मे रही और तीनों लड़कों के साथ सेक्सुअल सम्बन्ध भी बनाई और अब चौथे की तैयारी है। यह कैसा इश्क है जो शादी-ब्याह से पहले ही शारीरिक संबंध स्थापित कर लिया जाए और वह भी तीन तीन लड़कों के साथ ! मै इसे इश्क नही मानता। यह सेक्स की भूख है।
वो इंटेलिजेंट है , पढ़ी लिखी है , बड़ी फर्म मे जाॅब करती है , रोजाना कई प्रकार के लोगों से वास्ता पड़ता है । इसलिए यह विश्वास करना बहुत मुश्किल है कि वो बार-बार और वो भी कई लड़कों से छली गई है।

मीना मैडम एक अनाथ लड़की होकर भी जिस तरह से अपनी एजुकेशन पुरी की , कठिन परिश्रम कर एक बड़ी फर्म मे अपनी नौकरी स्थापित की , एक बड़े शहर मे सर्वाइव की , उसके लिए वो प्रशंसा और सम्मान की हकदार है। लेकिन उसका अपने सेक्स पर कन्ट्रोल न करना उसके चरित्र को संदेहास्पद बनाता है।
जय साहब उसके हुस्न पर मोहित है लेकिन वो सांसारिक जीवन के तजुर्बों के मामले मे नौसिखिए भी है। मुझे लगता है उन्हे मीना की सारी सच्चाई अपने बड़े भाई और भाभी को बतानी चाहिए। देखते है , उनका क्या रिएक्शन आता है !

बहुत ही खूबसूरत अपडेट avsji भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
 
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Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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Update #17


सुबह का नाश्ता कर के जय ने मीना को अपना इस्टेट दिखाने की पेशकश करी, जो मीना ने सहर्ष स्वीकार कर ली। इस्टेट दिखाना एक बहाना था - दरअसल वो भी चाहती थी कि सुबह की नरम गुलाबी धूप में जैसा रोमांटिक माहौल बन रहा था, उसमें जय के साथ, अकेले में, थोड़ा समय बिताया जा सके। वो थोड़ी नर्वस थी... ऐसे किसी के साथ कुछ समय बिताये हुए कुछ वर्ष बीत गए थे। पिछले अफेयर के बाद अब उसकी इच्छा नहीं होती थी कि वो किसी और पुरुष के साथ किसी भी तरह का सम्बन्ध बनाए... लेकिन, जय से मिल कर उसके हृदय के तार झनझना उठे। वो जानती थी कि जय भी उसमें उतनी ही रूचि रखता है। लिहाज़ा, उसकी आशा थी कि वो अपने भूत के बारे में जय से बात कर पाएगी, और तब अगर सब ठीक रहा तो दोनों आगे बढ़ सकेंगे। क्लेयर ने मीना को एक शॉल ओढ़ने को दे दिया था, जिससे उसको ठण्ड न लगे। मौसम ठण्डा अवश्य था, लेकिन सुहाना भी बहुत था।

जय इस तरह से मीना के साथ एकांत और समय पा कर उत्साहित भी था, और थोड़ा नर्वस भी... ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उसके पेट में तितलियाँ उड़ रही थीं। उसके और मीना के सम्बन्ध पर उसके परिवार की रज़ामंदी तो मिल ही गई थी, तो अब बस लड़की - यानि कि मीना की रज़ामंदी मिलनी शेष थी। वो चाहता था कि मीना की प्रेम-दृष्टि उस पर पड़े! उसके पहले किसी भी लड़की ने उसको इस तरह से आकर्षित नहीं किया था। और, मीना से कुछ दिनों तक मिलने और उसके साथ काम करने के बाद उसको उसके गुणों के बारे में भी पता चला, तो वो उसकी तरफ़ और भी आकर्षित हो गया। कुछ समय पहले तक उसको विवाह करने की कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन मीना से मिलने के बाद उसको ऐसा लगता कि मीना के साथ विवाह करना उसके लिए सबसे आवश्यक काम था।

जैसा कि मीना को कल रात ही स्पष्ट हो गया था, आदित्य और जय का ‘घर’ एक बड़ा सा इस्टेट था। तीन एकड़ भूमि पर बना मुख्य आवास एक बड़ा सा बंगला था, जो इस्टेट के सामने की तरफ़, मुख्य मार्ग के समीप बना हुआ था। इस मुख्य बंगले में छः कमरे, दो हाल, और एक स्टडी था, जो आदित्य के लिया ऑफ़िस का काम करता था। इस मुख्य बंगले से थोड़ा अलग हट कर एक गेस्ट कॉटेज था, जिसमें दो कमरे, एक हॉल और एक छोटी सी रसोई थी। यह किसी भी मेहमान, या उनके परिवार के आवास के रूप में इस्तेमाल होता था। इसके अतिरिक्त एक और कॉटेज था, जिसमें एक कमरा, एक हाल, और एक छोटी सी रसोई थी - इसी में कल रात मीना गई थी। यह जय का मैन-केव था और केवल वो ही इस कॉटेज का इस्तेमाल करता था। आज कल अपना सारा कामकाज वो वहीं करता था। इसके अतिरिक्त पूरे इस्टेट में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और बगीचे लगे हुए थे। एक स्थान पर एक छोटा सा, गोल सा तालाब बना हुआ था, जिसमें बीच में वीनस की एक मूर्ति लगी हुई थी, और उसके हर तरफ से छोटे छोटे फ़ौव्वारे लगे हुए थे। तालाब की परिधि पर करीब दो फुट का चबूतरा था, जो बहुत अच्छी जगह थी बैठ कर आगे की बातचीत करने के लिए।

“जय,” मीना ने थोड़ा हिचकते हुए कहा, “थोड़ा... बैठ जाएँ? ... तुमसे कुछ बातें करनी थीं...”

“बोलो मीना...” जय भी उसी के समान हिचकिचा रहा था।

“जय...” मीना की हिचक बरकरार थी, “... ऐसी बात शायद लड़कियाँ नहीं करतीं... लेकिन... लेकिन... न जाने क्या बात है तुममें... कि मैं बरबस तुम्हारी तरफ़ खिंची चली आती हूँ...”

जय को लगा कि जैसे उसके कानों में मधुर संगीत बजने लगा हो।

“कल तुमने मुझसे कहा था न... कि मुझको पहली बार देखते ही मैं तुमको भा गई... यह कि जैसे मैं तुम्हारी अपनी हूँ? ... तो मुझको भी वैसा ही लगा... जब मैंने तुमको पहली बार देखा! ... कुछ अमेज़िंग सा अट्रैक्शन! अदरवर्ल्डली! ... उसको एक्सप्लेन नहीं कर सकती!”

“मीना...?”

“मुझको कह लेने दो जय... प्लीज़!”

जय ने केवल ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“थैंक यू...” मीना ने कहा और एक गहरी साँस भरी, “तुम मुझे पसंद... नो, बहुत पसंद हो! ... लेकिन... मैं चाहती हूँ... कि इसके पहले कि हम आगे बढ़ें, तुमको... कम से कम तुमको... मेरे बारे में पता हो। ... मेरे पास्ट के बारे में...”

“मीना... मैंने तुमसे पहले ही कहा है कि मुझे तुम्हारे पास्ट से कोई मतलब नहीं, कोई परवाह नहीं... अगर तुम कोई ख़ूनी या मुज़रिम न रही हो!”

मीना हौले से हँसी, “नहीं मैं कोई ख़ूनी वूनी नहीं हूँ... बट स्टिल, आई वान्ट यू टू नो अबाउट मी!”

“ओके!”

“मैं एक ग़रीब फ़ैमिली से हूँ...”

जय ने उसकी इस बात पर बड़े ही बेपरवाह तरीके से अपने कन्धे उचकाए - यह बताने के लिए कि इस बात का कोई महत्त्व नहीं है - ख़ास कर अब, जब मीना का खुद का एक मुक़म्मल कैरियर है, और वो स्वयं इतना कमा लेती है जिसमें बड़े ठाठ से अमेरिका में रहा जा सके!

मीना ने फिर भी कहना जारी रखा, “मेरी पढ़ाई लिखाई... सब एक चैरिटेबल ट्रस्ट ने मैनेज किया है...”

आई वुड से, यू डिड वण्डरफुल्ली ग्रेट!” जय खुश होते हुए बोला, “नाम बताना उस ट्रस्ट का... मैं भी उसमें डॉलर डोनेट करूँगा! ... भई, क्या बढ़िया जेम ढूँढ़ निकाला है उन लोगों ने!”

जय की बात पर मीना के होंठों पर एक नर्वस सी हँसी आ गई, “आई नो... आई नो! ... तुमको फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन तुमको अपने बारे में सब कुछ बता देना मेरा फ़र्ज़ है!”

“हा हा! ओके! बताओ सब!”

आई डोंट नो हाऊ यू फ़ील अबाउट इट... बट मैं बड़ी भी बहुत हूँ तुमसे...”

आई नो... तुम्हारा रेज़्युमे पढ़ा है मैंने! ... मुझसे कहीं अधिक क्वालिफाइड हो, मुझसे अधिक एक्सपीरियंस है, तो जाहिर सी बात है कि मुझसे बड़ी भी हो!” जय ने फिर से इस बात को नकारते हुए कहा, “... वैसे, भैया भी जानते हैं ये बात! ... और शायद अब भाभी भी... फिर भी उन्होंने इस बारे में एक बात भी नहीं बोली!”

मीना चुप ही रही।

उसको चुप देख कर जय ने ही बात आगे बढ़ाई, “वैसे, एक बात बताऊँ तुमको? ... उम्र में भाभी भी भैया से बड़ी हैं। ... वो हम सबसे कहीं अधिक मैच्योर हैं... इसीलिए तो हम सब में इतना ठहराव है।”

“ओह?”

“हाँ! ... भाभी पहले चाचा जी - मतलब हमारी कंपनी के फाउंडर... की पर्सनल सेक्रेटरी थीं।” जय ने अपने परिवार का एक राज़ खोला, “... भाभी बहुत स्किलफुल थीं और बहुत एजुकेटेड भी... और इसलिए चाचा जी उनको बहुत पसंद भी करते थे! शायद अपनी बेटी के ही जैसे... लेकिन इतना पसंद करने के बावज़ूद, वो भाभी में अपनी बहू का रूप नहीं देख पाए। ... उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वो चाहते थे कि भैया उनकी पसंद की किसी भारतीय लड़की से शादी करें!”

बताते बताते जय ने गहरी साँस भरी, “... लेकिन भैया और भाभी दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे... उसके कारण थोड़ा फ़्रिक्शन भी हुआ! लेकिन, फिर चाचा जी की मौत के बाद भाभी ने जिस तरह भैया... हमारे बिज़नेस... और फिर मुझको सम्हाला... सबकी बोलती बंद कर दी उन्होंने! ... चाची जी के मन में उनको ले कर बहुत से प्रीकंसीवड नोशंस थे... लेकिन जब उन्होंने भाभी का असली रूप देखा... उनके सभी गुण समझे, तब वो भी शांत हो गईं।”

कहते हुए जय ने बड़े गर्व से मीना को देखा - वो हतप्रभ हो कर सब सुन रही थी,

“एक देसी लड़की क्या इतना सब कर सकेगी? ... मेरे ख्याल से नहीं!” वो बड़े गर्व से बोला, “... और अब आलम ये है कि चाची जी अपनी ‘प्यारी बहू’ के बिना नहीं रह पातीं। हम बेटों से मिलने से अधिक उनको अपनी बहू और दोनों पोतों से मिलने का मन होता रहता है!”

“हा हा! दैट इस सो नाइस टू नो, जय...” मीना अब थोड़ा सहज हो गई, “थैंक यू फॉर टेलिंग मी ऑल दिस!”

“नो प्रॉब्लम!” जय ने बड़ी दरियादिली से कहा, “आगे बोलो... क्या कहना था तुमको!”

“उम्म्म...” मीना ने एक भूमिका बाँधी, “शायद तुमको ये बात सुन कर बुरा लगे!”

“बुरा लगना है, तो लगने दो! ... तुम कम से कम अपनी बात तो कहो!”

“ओके! ... जब मैं यहाँ ऍमबीए करने आई, तब से ले कर अब तक मेरे तीन अफेयर्स हो चुके हैं...” उसने कहा - और थोड़ी देर रुक कर देखने लगी कि इस बात का जय पर क्या प्रभाव पड़ा।

आई ऍम सॉरी मीना... सॉरी इस बात के लिए कि प्यार की तुम्हारी तलाश अभी तक क़ामयाब नहीं हो पाई... लेकिन शायद ये इसलिए भी हुआ है कि... तुम जैसी अमेजिंग लड़की... उन तीनों से बेहतर डिज़र्व करती है!” जय ने कहा।

उसको भी विश्वास नहीं हुआ कि उसके अंदर इतनी सहनशीलता कहाँ से आ गई! शायद इसीलिए कहते हैं कि प्यार में लोग अंधे हो जाते हैं।

“ओह जय... तुम पर तो किसी बात का कोई असर ही नहीं होता!” मीना ऊपर से निराश, लेकिन अंदर से बहुत आनंदित होती हुई बोली!

“मैंने कहा न - मेरे लिए तुम्हारा पास्ट मायने नहीं रखता! ... मायने रखता है तो बस... हमारा फ्यूचर!”

“ओके...” मीना ने भी इस बार बम गिरा देने की ठान ली, “तुम कुछ सुन ही नहीं रहे हो... कुछ मान ही नहीं रहे हो, तो सुनो... हाऊ विल यू रिएक्ट, इफ आई टेल यू दैट आई हैड फिज़िकल रिलेशनशिप्स विद दोज़ मेन?”

हाँ - इस बार जय के चेहरे पर शिकन आई - लेकिन बहुत हल्की सी!

वो सोचते हुए बोला, “याह... दैट इस अ बिट सैड मीना... आई अंडरस्टैंड कि तुमको कैसा फ़ील हुआ होगा! ... लेकिन ये भी सच बात है, कि बिना सच्चे प्यार के सेक्स करने से कोई फ़ायदा नहीं होता... और न ही कोई सटिस्फैक्शन मिलता है!” उसने बुझे हुए स्वर में कहा, “... आई विश व्ही हैड मेट अर्लियर (काश कि हम पहले मिले होते)!”

“ओह जय...” मीना ने गहरी साँस लेते हुए, बड़े अशक्त भाव से कहा - और बोलते बोलते उसका पूरा शरीर काँप गया, “कैसे हो तुम!”

सच में - उसको समझ ही नहीं आया कि कैसा आदमी है जय! कोई और होता तो उसको वेश्या होने का तमगा पकड़ा चुका होता। गोरे अमेरिकन्स भी शायद इतने खुले हुए न हों, जबकि उनका समाज सेक्स को ले कर कहीं अधिक खुला हुआ है।

द बेस्ट!” वो मुस्कुराया।

“हा हा!” मीना नर्वस हो कर हँसी, और बोली, “ओह गॉड! नो वंडर आई लव यू सो मच!” उसने एक झोंक में कह डाला।

फिर वो बोलते बोलते हठात ही रुक गई - उसको संज्ञान हुआ कि उसने ये क्या कह दिया! मन की बात ज़ुबान से निकल गई। पहले तो उसके चेहरे से सारा रंग निचुड़ गया और फिर अगले ही क्षण उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फ़ैल गई।

जय के चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान आ गई, “मतलब... अभी तो कोई और नहीं है तुम्हारी लाइफ में?”

“कोई नहीं जय...” मीना ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा, “जब से तुम मिले हो...” वो बोलते बोलते रुक गई, और फिर थोड़ा ठहर कर बोली, “... किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती अब मैं...”

“पक्की बात?” जय मुस्कुराया।

“हम्म उम्म...” मीना ने स्वीकारा... बहुत हल्के से, दबे हुए स्वर निकले उसके!

अब तक दोनों के दिलों की धड़कनें बहुत बढ़ गई थीं।

“आई लव यू...” जय ने मीना के कान में बहुत धीरे से कहा।

“लव यू टू...” मीना ने भी उतने ही धीरे से उत्तर दिया, “आई ऍम सो लकी! ... ऍम आई सो लकी?”

“तुम्हारा मुझको नहीं पता मीना,” जय बोला, “लेकिन मैं तो लकी हूँ!”

“ओह जय... जय... मेरे जय!” कह कर मीना जय की मज़बूत बाज़ुओं के घेरे में समां गई।

वो आलिंगन इतना सुखदायक था जिसका शब्दों में बयान कर पाना कठिन है।

“वायदा करो कि तुम मुझसे अलग नहीं होगी!” जय बोला।

“मरते दम तक नहीं!”

“पक्की बात?”

“पक्की बात... मेरे पूरे वज़ूद पर अब तुम्हारा हक़ है जय! बस तुम्हारा!” मीना भावनाओं के आवेश में बोलती जा रही थी, “... मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं किसी को इतनी बड़ी बात कह सकूँगी...”

उसको अपने आलिंगन में ही बाँधे हुए जय बड़े प्यार से उसको देखता है।

“ओह जय! ... काश मैंने वो सब बेवक़ूफ़ियाँ न करी होतीं!”

“मीना... जैसा कि मैंने पहले भी कहा है... उन बातों का हमारे आगे की लाइफ पर कोई असर नहीं होने वाला... सो नहीं होने वाला!” उसने मीना का माथा चूमा, “... भूल जाओ वो सब!”

“तुम साथ रहोगे... तो भूल जाऊँगी... सब कुछ!”

“पक्की बात?” कह कर जय ने मीना के दोनों गालों पर अपने दोनों हाथ रख कर हल्के से दबाया।

“हम्म उम्म...”

गाल दबाने से मीना के होंठ किसी चोंच की भाँति सामने की तरफ़ निकल आए। अगले ही पल जय ने मीना की चोंच को अपने मुँह में भर लिया, और दोनों ही एक बेहद प्रेममय फ्रेंच चुम्बन में लिप्त हो गए।

*
हम्म्म

मैच्योरिटी उम्र की मोहताज नहीं होती, मीना ने जो किया शायद वो प्यार ना होकर हवस ही थी। ये होना बहुत स्वाभाविक है क्योंकि भारतीय परिवेश में पले बढ़े किसी भी व्यक्ति के लिए लड़के लड़की की दोस्ती एक टैबू जैसी चीजें हो जाती है, और वही जब बाहर जाता है तो उसकी ओर आकर्षित होना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन बार बार यही करना कुछ अजीब है। शायद आप इसे कहानी का ही कोई हिस्सा बनाए।
इश्क करना एक अलग चीज है लेकिन इश्क मे पड़कर शारीरिक संबंध बना लेना एक अलग चीज है। प्रेम मे धोखा खाना एक आम बात है लेकिन प्रेम मे बार-बार धोखा खाना आम बात नही है।
कहते है गलती किसी भी इंसान से हो सकती है पर यह भी कहा जाता है कि बार-बार गलती करना इंसान के मानसिक कमजोरी को प्रदर्शित करता है। यह भी कहते है कि पहली भूल माफी के काबिल होती है लेकिन बार-बार भूल की माफी नही होती।
मीना मैडम बहुत कम उम्र मे ही तीन लड़कों के साथ रिलेशनशिप मे रही और तीनों लड़कों के साथ सेक्सुअल सम्बन्ध भी बनाई और अब चौथे की तैयारी है। यह कैसा इश्क है जो शादी-ब्याह से पहले ही शारीरिक संबंध स्थापित कर लिया जाए और वह भी तीन तीन लड़कों के साथ ! मै इसे इश्क नही मानता। यह सेक्स की भूख है।
वो इंटेलिजेंट है , पढ़ी लिखी है , बड़ी फर्म मे जाॅब करती है , रोजाना कई प्रकार के लोगों से वास्ता पड़ता है । इसलिए यह विश्वास करना बहुत मुश्किल है कि वो बार-बार और वो भी कई लड़कों से छली गई है।

मीना मैडम एक अनाथ लड़की होकर भी जिस तरह से अपनी एजुकेशन पुरी की , कठिन परिश्रम कर एक बड़ी फर्म मे अपनी नौकरी स्थापित की , एक बड़े शहर मे सर्वाइव की , उसके लिए वो प्रशंसा और सम्मान की हकदार है। लेकिन उसका अपने सेक्स पर कन्ट्रोल न करना उसके चरित्र को संदेहास्पद बनाता है।
जय साहब उसके हुस्न पर मोहित है लेकिन वो सांसारिक जीवन के तजुर्बों के मामले मे नौसिखिए भी है। मुझे लगता है उन्हे मीना की सारी सच्चाई अपने बड़े भाई और भाभी को बतानी चाहिए। देखते है , उनका क्या रिएक्शन आता है !

बहुत ही खूबसूरत अपडेट avsji भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
आपकी बात से सहमत हूं पूरी तरह से, एक या दो बार समझ आता है, पर तीन बार, ये थोड़ा विचित्र है।
 
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