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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
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big king

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अध्याय - 143
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"मुझे ग़लत मत समझना वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन इस बारे में मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकता।"मैं मूर्खों की तरह देखता रह गया उसे। रूपचंद्र के चेहरे पर खेद पूर्ण भाव थे। कुछ देर वो ख़ामोशी से मुझे देखता रहा उसके बाद मेरे कंधे पर हल्के से हाथ की थपकी देने के बाद चला गया। मुझे समझ ना आया कि अब ये क्या चक्कर है?
अब आगे....
रसोई में रागिनी अपनी भाभी वंदना का खाना बनाने में हाथ बंटा रही थी। यूं तो घर में उसे कोई भी काम करने के लिए नहीं कहता था लेकिन उसे खुद ही अच्छा नहीं लगता था कि वो बैठ के सिर्फ खाना खाए। पहले भी उसे काम करना बेहद पसंद था और आज भी वो खाली बैठना पसंद नहीं करती थी।कुछ समय पहले तक सब ठीक ही था लेकिन फिर एक दिन उसके ससुर यानि दादा ठाकुर यहां आए। उन्होंने उसके पिता से उसके ब्याह के संबंध में जो भी बातें की उसके बारे में जान कर उसे बड़ा झटका लगा था। पहले तो ये बात उसे अपनी भाभी वंदना ने ही बताया और फिर रात में उसकी मां ने बताया। रागिनी के लिए वो सारी बातें ऐसी थीं कि उसके बाद से जैसे उसका हंसना मुस्कुराना ही बंद हो गया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके ससुर उसका फिर से ब्याह करने की चर्चा करने उसके पिता के पास आए थे। बात अगर सिर्फ इतनी ही होती तो कदाचित उसे इतना झटका नहीं लगता किंतु झटके वाली बात ये थी कि उसके ससुर उसका ब्याह उसके ही देवर से करने की बात बोले थे।रागिनी के लिए ये बात किसी झटके से कम नहीं थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके ससुर ऐसा कैसे चाह सकते थे और उसके खुद के पिता भी उनकी इस बात को मंजूरी कैसे दे सकते थे? अब क्योंकि वो खुद किसी से इस बारे में कुछ कह नहीं सकती थी इस लिए अंदर ही अंदर वो इस बात से परेशान हो गई थी। दो तीन दिन तक यही आलम रहा लेकिन फिर उसकी मां के समझाने पर वो थोड़ा सामान्य होने लगी थी। हालाकि अंदर से वो अभी भी बेचैन थी।वैभव को उसने देवर के साथ साथ हमेशा ही अपना छोटा भाई समझा था। वो अच्छी तरह जानती थी कि वैभव कैसे चरित्र का लड़का है इसके बाद भी वो ये समझती थी कि वैभव ने कभी उसे ग़लत नज़र से नहीं देखा था। हालाकि ये सिर्फ उसका सोचना ही था क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी के अंदर की बात पूर्ण रूप से नहीं जान रहा होता है, ये तो बस उसका विश्वास था।"अब इतना भी मत सोचो रागिनी।" वंदना ने उसे ख़ामोशी से काम करते देखा तो बोल पड़ी____"तुम भी अच्छी तरह समझती हो कि तुम्हारे ससुर जी और तुम्हारे पिता जी तुम्हारी भलाई के लिए ही ऐसा चाहते हैं। सच कहूं तो इस रिश्ते के लिए किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है। तुम्हें पता है, तुम्हारे भैया से हर रोज़ मेरी इस बारे में बात होती है। उनका भी यही कहना है कि तुम्हारा वैभव के साथ ब्याह कर देने का फ़ैसला बिल्कुल भी ग़लत नहीं है। देवर से भाभी का ब्याह हो जाना कोई ग़लत नहीं है। ऐसा तो हमेशा से होता आया है।""मैं दुबारा ब्याह करने से इंकार नहीं कर रही भाभी।" रागिनी ने गंभीर भाव से कहा____"मैं सिर्फ ये कह रही हूं कि वैभव से ही क्यों? जिसे अब तक मैं अपने देवर के साथ साथ अपना छोटा भाई समझती आई हूं उसे एकदम से पति की नज़र से कैसे देखने लगूं? आप लोगों ने तो कह दिया लेकिन आप लोग ये नहीं समझ रहे हैं कि इस बारे में मैं क्या महसूस करती हूं।""ऐसा नहीं है रागिनी।" वंदना ने कहा____"हम सबको एहसास है कि इस रिश्ते के बारे में तुम इस समय कैसा महसूस करती होगी। तुम्हारी जगह मैं होती तो मेरा भी यही कहना होता लेकिन जीवन में हमें इसके अलावा भी कई सारी बातें सोचनी पड़ती हैं। तुम्हारा कहना है कि वैभव से ही क्यों? यानि तुम्हें वैभव से ब्याह करने में आपत्ति है, जबकि नहीं होनी चाहिए। ऐसा इस लिए क्योंकि तुम उसके बारे में पहले से ही सब कुछ जानती हो। तुम जानती हो कि वो तुम्हारी कितनी इज्ज़त करता है और कितनी फ़िक्र करता है। तुम्हीं ने बताया था कि वो तुम्हारे होठों पर मुस्कान लाने के लिए क्या क्या करता रहता है। सोचने वाली बात है रागिनी कि जो व्यक्ति तुम्हारी खुशी के लिए इतना कुछ करता हो और तुम्हें इतना चाहता हो उससे ब्याह करने से इंकार क्यों? किसी दूसरे व्यक्ति से ब्याह करने का सोचती हो तो बताओ क्या वो व्यक्ति वैभव की तरह तुम्हें मान सम्मान देगा? क्या वो वैभव की तरह तुम्हें चाहेगा और क्या उसके घर वाले तुम्हें अपने घर की शान बना लेंगे?"रागिनी कुछ बोल ना सकी किंतु चेहरे से स्पष्ट नज़र आ रहा था कि उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था। वंदना कुछ देर तक उसे देखती रही।"मैं जानती हूं कि तुमने अपने जीवन में कभी किसी लड़के का ख़याल भी अपने मन में नहीं लाया था।" फिर उसने रागिनी के दोनों कन्धों को पकड़ कर बड़े स्नेह से कहा____"तुम्हारे जीवन में जो आया वो सिर्फ तुम्हारा पति ही था। यही वजह है कि तुम किसी और के बारे में ऐसा सोचना ही नहीं चाहती, ख़ास कर वैभव के बारे में। तुम भी जानती हो कि शादी से पहले लड़का लड़की एक दूसरे के लिए अजनबी ही होते हैं। दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति कई तरह की आशंकाएं रहती हैं। ख़ास कर लड़की ये सोच कर परेशान हो जाती है कि जाने कैसा होगा उसका होने वाला पति और फिर आगे जाने क्या होगा? लेकिन जब दोनों की शादी हो जाती है और दोनों साथ रहने लगते हैं तो मन की सारी आशंकाएं अपने आप ही दूर होती चली जाती हैं। एक वक्त ऐसा आता है जब दोनों को एक दूसरे से बेहद लगाव हो जाता है और फिर दोनों को ये भी लगने लगता है जैसे वो दोनों एक दूसरे के लिए ही बने थे। तुम्हारे लिए तो सबसे अच्छी बात यही है कि तुम अपने होने वाले पति के बारे में पहले से ही सब कुछ जानती हो। सबसे बड़ी बात ये जानती हो कि वो तुम्हें कितना चाहता है और तुम्हारी कितनी फ़िक्र करता है। एक औरत को इससे ज़्यादा और क्या चाहिए होता है? भूल जाओ कि तुम वैभव की भाभी हो या वैभव तुम्हारा देवर है। मन में सिर्फ ये रखो कि वो एक ऐसा लड़का है जिससे तुम्हारा ब्याह होना है।""यही तो नहीं कर पा रही भाभी।" रागिनी ने जैसे आहत हो कर कहा____"उसके बारे में एक पल में सब कुछ भूल जाना आसान नहीं है। मेरा तो ये सोच कर हृदय कांप जाता है कि जब उसे सच का पता चलेगा तो क्या सोचेगा वो मेरे बारे में? अगर उसने एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो कैसे नज़रें मिला पाऊंगी उससे?""ऐसा सिर्फ तुम सोचती हो रागिनी।" वंदना ने कहा____"ऐसा भी तो हो सकता है कि वो तुम्हारे बारे में ऐसा कुछ सोचे ही नहीं बल्कि ये सोच ले कि वो कितना किस्मत वाला है जो उसके जीवन में तुम जैसी लड़की पत्नी के रूप में मिलने वाली है। आख़िर तुम्हारी अच्छाईयां और तुम्हारी खूबियों के बारे में तो उसे पता ही है। मुझे पूरा यकीन है कि जब उसे इस सच का पता चलेगा तो वो सपने में भी तुम्हारे बारे में ग़लत नहीं सोचेगा। बल्कि यही सोचेगा कि अब वो पूरे हक़ से और पूरी आज़ादी के साथ तुम्हें खुश रखने का प्रयास कर सकेगा। हां रागिनी, जितना कुछ तुमने उसके बारे में मुझे बताया है उससे मैं पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि वैभव इस रिश्ते को ख़ुशी से स्वीकार करेगा और ब्याह के बाद तुम्हें बहुत खुश रखेगा।"रागिनी के समूचे बदन में झुरझूरी सी दौड़ गई। उसे बड़ा अजीब लग रहा था। चेहरे पर अभी भी पहले जैसी गंभीरता और उदासी छाई हुई थी।"एक बार अपने सास ससुर के बारे में भी सोचो रागिनी।" वंदना ने कुछ सोचते हुए कहा____"तुम्हीं बताया करती थी ना कि वो दोनों तुम्हें बहू नहीं बल्कि अपनी बेटी मानते हैं और तुम्हें अपनी हवेली की शान समझते हैं। इसी से ज़ाहिर होता है कि वो तुम्हें कितना चाहते हैं। वैभव से तुम्हारा ब्याह करवा देने के पीछे उनकी यही भावना है कि तुम हमेशा उनकी बेटी बन कर उनकी हवेली की शान ही बनी रहो और साथ ही फिर से सुहागन बनने के बाद एक खुशहाल जीवन जियो। मानती हूं कि इतनी कम उमर में तुम्हें विधवा बना कर ऊपर वाले ने तुम्हारे साथ अच्छा नहीं किया है लेकिन मैं ये भी मानती हूं कि तुम बहुत भाग्यशाली हो जो तुम्हें इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे हितों के बारे में सोचते हैं। वरना मैंने ऐसे भी लोग देखे और सुने हैं जो अपनी बहू के विधवा हो जाने पर उसे नौकरानी बना कर सारा जीवन उसे दुख देते रहते हैं। शायद यही सब पिता जी ने और तुम्हारे भैया ने भी सोचा होगा। माना कि तुम्हारे सास ससुर ऐसे नहीं हैं लेकिन कोई भी माता पिता ये नहीं चाहते कि उनकी बेटी विधवा के रूप में जीवन भर कष्ट सहे। तुम्हारा फिर से ब्याह करने की बात तुम्हारे अपने सास ससुर ने की है। ज़ाहिर है वो भी ऐसा नहीं चाहते और फिर जब उन्होंने यहां आ कर पिता जी से इस रिश्ते की बात कही तो पिता जी भी झट से मान गए थे। इस डर से नहीं कि तुम्हारा क्या होगा बल्कि इस खुशी में कि अपनी बेटी का जिस तरह से भला वो खुद चाहते थे वैसा उनकी बेटी के सास ससुर खुद ही चाहते हैं। तुम्हीं सोचो कि आज के युग में ऐसे महान सास ससुर कहां मिलते हैं जो अपनी बहू के बारे में इतना कुछ सोचें?""हां ये तो आप सही कह रही हैं।" रागिनी ने सिर हिलाते हुए धीमें से कहा____"इस मामले में मेरे सास ससुर बहुत अच्छे हैं। उन्होंने कभी भूल से भी किसी तरह का मुझे कोई कष्ट नहीं दिया। इतना कुछ हो जाने के बाद भी उन्होंने मुझे किसी बात का ताना नहीं मारा बल्कि मेरे दुख से दुखी हो कर हमेशा मुझे अपने सीने से लगाए रखा था।""इसी लिए तो कहती हूं रागिनी कि तुम बहुत भाग्यशाली हो।" वंदना ने कहा____"पूर्व जन्म में तुमने ज़रूर बहुत अच्छे कर्म किए थे जिसके चलते इस जन्म में तुम्हें इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं। पति में भी कोई ख़राबी नहीं थी, वो तो उन बेचारे की किस्मत ही ख़राब थी जिसके चलते ऊपर वाले ने उन्हें अपने पास बुला लिया। तुम्हारे देवर के बारे में तुमसे बेहतर कौन जान सकता है? सच तो ये है कि तुम्हारे ससुराल में हर कोई बहुत अच्छा है। इस लिए मैं तो यही कहूंगी कि तुम अब कुछ भी मत सोचो, ईश्वर ने तुम्हारी खुशियां छीनी थी तो उसने फिर से तुम्हें खुशियां देने के लिए इस तरह का रिश्ता भेज दिया है। इसे ख़ुशी ख़ुशी क़बूल करो और वैभव के साथ जीवन में आगे बढ़ जाओ।"अभी रागिनी कुछ कहने ही वाली थी कि तभी रसोई में कामिनी आ गई। उसने बताया कि पिता जी और भैया खेतों से आ गए हैं और हाथ मुंह धोने के बाद जल्दी ही बरामदे में खाना खाने के लिए आ जाएंगे। कामिनी की इस बात के बाद वंदना और रागिनी जल्दी जल्दी थाली सजाने की तैयारी करने लगीं।✮✮✮✮रूपचंद्र के जाने के बाद मेरे मन में विचारों का जैसे बवंडर सा उठ खड़ा हुआ था। वो तो चला गया था लेकिन मुझे उलझा गया था। मैं सोचने लगा था कि आख़िर कौन से सच की बात कर रहा था वो और तो और वो ख़ुद क्यों नहीं बता सकता था? आख़िर ऐसा कौन सा सच होगा जिसे मैं अपने माता पिता से ही जान सकता था?दोपहर तक मैं इसी तरह विचारों में उलझा रहा और मजदूरों को काम करते हुए देखता रहा। उसके बाद मैं खाना खाने के लिए मोटर साईकिल में बैठ कर हवेली की तरफ चल पड़ा। मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि मौका मिलते ही मां से पूछूंगा कि अभी ऐसा क्या है जिसे उन्होंने मुझे नहीं बताया है?हवेली पहुंचा तो देखा पिता जी खाना खाने बैठ चुके थे। मुंशी किशोरी लाल भी बैठा हुआ था। मुझे आया देख मां ने मुझे भी हाथ मुंह धो कर बैठ जाने के लिए कहा। मैं फ़ौरन ही हाथ मुंह धो के आया और कुर्सी पर बैठ गया। कुसुम और कजरी खाना परोसने लगीं। खाना खाने के दरमियान हमेशा की ही तरह ख़ामोशी रही। पिता जी को खाते वक्त बातें करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था।खाना पीना कर के जब पिता जी और मुंशी जी चले गए तो मैंने मां की तरफ देखा। मुझे पिता जी और मुंशी जी की तरह कुर्सी से उठ कर न गया देख मां समझ गईं कि कोई बात है जिसके चलते मैं अभी भी कुर्सी पर बैठा हुआ था।"क्या हुआ बेटा?" मां ने मेरे क़रीब आ कर बड़े स्नेह से कहा____"भोजन तो कर चुका है तू, फिर बैठा क्यों है? आराम नहीं करना है क्या तुझे?""आराम बाद में कर लूंगा मां।" मैंने कहा____"इस वक्त मुझे आपसे कुछ जानना है और उम्मीद करता हूं कि आप मुझे सब कुछ सच सच बताएंगी।"मेरी बात सुन कर मां मेरी तरफ बड़े ध्यान से देखने लगीं। कजरी तो जूठे बर्तन उठा कर चली गई थी लेकिन कुसुम मेरी बात सुन कर ठिठक गई थी और उत्सुक भाव से हमारी तरफ देखने लगी थी।"क्या जानना चाहता है तू?" इधर मां ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"तेरी भाभी के बारे में तो मैंने तुझे कल ही बता दिया था, फिर अब क्या जानना चाहता है?""वही जो आपने नहीं बताया।" मैंने मां की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा____"और मुझे लगता है कि अभी भी आपने मुझसे कुछ छुपा रखा है।""अपने कमरे में जा।" मां ने गहरी सांस ले कर कहा____"मैं आती हूं थोड़ी देर में।""ठीक है।" मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा____"जल्दी आइएगा।"कहने के साथ ही मैं तो अपने कमरे की तरफ चला गया किंतु पीछे मां एकदम से परेशान हो उठीं थी। कुछ पलों तक जाने वो क्या सोचती रहीं फिर खुद को सम्हालते हुए अपने कमरे की तरफ बढ़ चलीं। जल्दी ही वो कमरे में पहुंच गईं। कमरे में पिता जी पलंग पर आराम करने के लिए लेट चुके थे। कमरे में आते ही मां ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया। ये देख पिता जी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।"क्या हुआ?" वो पूछ ही बैठे____"आपको भोजन नहीं करना क्या?""बाद में कर लेंगे।" उन्होंने पिता जी के क़रीब जा कर कहा____"इस वक्त एक समस्या हो गई है।""स...समस्या??" पिता जी चौंके____"ये क्या कह रही हैं आप?""लगता है हमारे बेटे को शक हो गया है।" मां ने चिंतित भाव से कहा____"अभी अभी वो हमसे कोई बात जानने की बात कह रहा था और ये भी कह रहा था कि हमने अभी भी उससे कुछ छुपाया है।""क्या उसने स्पष्ट रूप से आपसे ऐसा कुछ कहा है?" पिता जी ने पूछा____"क्या आपको लगता है कि वो रागिनी बहू के बारे में आपसे जानने की बात कह रहा था?""पता नहीं।" मां ने कहा____"लेकिन जिस अंदाज़ में बोल रहा था उससे तो यही लगता है कि वो रागिनी बहू के बारे में ही जानना चाहता है।"मां की इस बात पर पिता जी फ़ौरन कुछ ना बोले। उनके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे। मां बेचैनी से उन्हें ही देखे जा रहीं थी।"क्या सोचने लगे आप?" फिर उन्होंने कहा____"कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं? हमने उसे कमरे में जाने को कह दिया है और ये भी कहा है कि आते हैं थोड़ी देर में। ज़ाहिर है वो हमारी प्रतीक्षा करेगा। समझ में नहीं आ रहा कि अगर उसने रागिनी बहू के बारे में ही पूछेगा तो क्या बताएंगे उसे?""हमें लगता है कि सच बताना ही पड़ेगा उसे।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"इस बात को ज़्यादा समय तक उससे छुपा के भी नहीं रख सकते। वैसे भी जो कुछ उसे बताया गया है उससे वो परेशान और दुखी ही होगा। इस लिए बेहतर है कि उसे सच ही बता दिया जाए।""क्या आपको लगता है कि सच जानने के बाद वो चुप बैठेगा?" मां ने कहा____"पहले ही वो अनुराधा की मौत हो जाने से टूट सा गया था और बड़ी मुश्किल से उसके सदमे से बाहर आया है। अगर उसे ये बात बताएंगे तो जाने क्या सोच बैठे वो और फिर जाने क्या करने पर उतारू हो जाए?""हम मानते हैं कि उसको सच बताना ख़तरा मोल लेने जैसा है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन एक दिन तो उसे बताना ही पड़ेगा इस सच को। वैसे हमारा ख़याल है कि अगर आप उसे बेहतर तरीके से समझाएंगी तो शायद वो समझ जाएगा। आप उसे ये भी बता सकती हैं कि ये सब कुल गुरु की भविष्यवाणी के अनुसार ही हो रहा है।""कुल गुरु का नाम लेंगे तो वो भड़क जाएगा।" मां ने झट से कहा____"पहले भी वो अपने बड़े भाई की भविष्यवाणी वाली बात से उन पर बिगड़ गया था।""तो फिर आप उसे समझाइएगा कि इसी में सबका भला है।" पिता जी ने कहा____"ख़ास कर उसकी भौजाई का। अगर वो चाहता है कि उसकी भौजाई हमेशा खुश रहे और इसी हवेली में रहे तो उसे इस रिश्ते को स्वीकार करना ही होगा।"पिता जी की इस बात पर मां कुछ देर तक उन्हें देखतीं रहीं। इतना तो वो भी समझती थीं कि एक दिन सच का पता वैभव को चलेगा ही तो बेहतर है आज ही बता दिया जाए। वैसे उन्हें यकीन था कि अपनी भाभी की ख़ुशी के लिए उनका बेटा ज़रूर इस रिश्ते को स्वीकार कर लेगा।"ठीक है फिर।" मां ने जैसे निर्णायक अंदाज़ से कहा____"हम जा कर उसे सच बता देते हैं। अब जो होगा देखा जाएगा।"✮✮✮✮मैं पलंग पर लेटा बड़ी शिद्दत से मां का इंतज़ार कर रहा था। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे जिसकी वजह से मेरी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। तभी खुले दरवाज़े पर मां नज़र आईं। उन्हें देखते ही मैं उठ कर बैठ गया। उधर वो कमरे में दाख़िल हो कर मेरे पास आईं और पलंग पर बैठ गईं। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंची हुई थीं।"आने में बड़ी देर लगा दी आपने?" मैंने व्याकुल भाव से कहा____"ख़ैर अब बताइए कि मुझसे और क्या छुपाया है आपने?""मैं तुझे सच बता दूंगी।" मां ने कहा____"लेकिन उससे पहले मैं तुझसे कुछ पूछना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि मैं तुझसे जो भी पूछूं उसका तू पूरी ईमानदारी से सच सच जवाब दे।""बिल्कुल दूंगा मां।" मैंने एकदम दृढ़ हो कर कहा____"आप पूछिए, मैं आपको वचन देता हूं कि आप जो कुछ भी मुझसे पूछेंगी मैं उसका सच सच जवाब दूंगा।""ठीक है।" मां ने एक लंबी सांस ली____"मैं तुझसे ये जानना चाहती हूं कि तू अपनी भाभी के बारे में क्या सोचता है?""य...ये कैसा सवाल है मां?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मेरी नज़र में भाभी की क्या अहमियत है। वो इस हवेली की शान हैं। उनके जैसी बहू और भाभी हमारे पास होना बड़े गौरव की बात है।""ये मैं जानती हूं।" मां ने कहा____"मैं तुझसे इसके अलावा जानना चाहती हूं। जैसे कि, क्या तू चाहता है कि तेरी भाभी हमेशा इस हवेली की शान बनी रहे? क्या तू चाहता है कि तेरी भाभी अपने जीवन में हमेशा खुश रहे?""मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप ये कैसे सवाल कर रही हैं?" मैंने थोड़ा परेशान हो कर कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि ऐसा इस हवेली में हर कोई चाहता है।""मैं हर किसी की नहीं।" मां ने कहा____"बल्कि तेरी बात कर रही हूं। तू अपनी बता कि तू क्या चाहता है?""सबकी तरह मैं भी यही चाहता हूं कि मेरी भाभी हमेशा खुश रहें।" मैंने कहा____"उनके जीवन में कभी कोई दुख न आए। भैया के गुज़र जाने के बाद मेरी यही कोशिश थी कि मैं हर वक्त उनके चेहरे पर मुस्कान ला सकूं।""सिर्फ इतना ही?" मां ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखा।"और क्या मां?" मैंने कहा____"हम सबसे जितना हो सकता है उतना ही तो कर सकते हैं। काश! इससे ज़्यादा कुछ करना मेरे बस में होता तो मैं वो भी करता उनकी खुशी के लिए।""क्या तुझे लगता है कि तेरे बस में सिर्फ इतना ही था?" मां ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"अगर मैं कहूं कि तू उसकी खुशी के लिए और भी बहुत कुछ कर सकता है तो क्या तू करेगा?""बिल्कुल करूंगा मां।" मैंने झट से कहा____"अगर मुझे पता चल जाए कि जिस चीज़ से भाभी खुश हो जाएंगी वो दुनिया के फला कोने में है तो यकीन मानिए मैं उस कोने में जा कर वो चीज़ ले आऊंगा और भाभी को दे कर उन्हें खुश करूंगा। अब इससे ज़्यादा क्या कहूं?""क्या तू उसकी खुशी के लिए कुछ भी कर सकता है?" मां ने जैसे मुझे परखा।"हां, अगर मेरे बस में हुआ तो कुछ भी कर जाऊंगा।" मैंने पूरी दृढ़ता से कहा____"आज मैं जो कुछ भी हूं उसमें मेरी भाभी का बहुत बड़ा हाथ है मां। इस लिए अपनी भाभी को खुश करने के लिए कुछ भी कर सकता हूं लेकिन अब शायद ऐसा नहीं कर सकूंगा क्योंकि उनके माता पिता उनका फिर से कहीं ब्याह करने का फ़ैसला कर चुके हैं। अब वो ना आपकी बहू रहेंगी और ना ही मेरी भाभी। इस हवेली से हमेशा के लिए उनका नाता टूट जाएगा।""क्या तू चाहता है कि तेरी भाभी कहीं न जाए और इसी हवेली में बहू बन कर रहे?" मां ने पूछा।"मैं अपने स्वार्थ के लिए उनका जीवन बर्बाद नहीं कर सकता मां।" मैंने सहसा गंभीर हो कर कहा____"उनके लिए यही बेहतर है कि उनका फिर से ब्याह हो जाए ताकि वो अपने पति के साथ जीवन में हमेशा खुश रह सकें।""अगर वो फिर से सुहागन बन कर इस हवेली में आ जाए तो क्या वो खुश नहीं रहेगी?" मां ने धड़कते दिल से कहते हुए मेरी तरफ देखा।"य...ये क्या कह रही हैं आप?" मैं एकदम से चकरा सा गया____"ऐसा भला कैसे हो सकता है?""क्यों नहीं हो सकता?" मां ने जैसे तर्क़ दिया____"अगर तू उसे ब्याह करके इस हवेली में ले आएगा तो क्या वो फिर से खुश नहीं हो जाएगी?"तीव्र झटका लगा मुझे। ऐसा लगा जैसे आसमान से मैं पूरे वेग से धरती पर आ गिरा था। हैरत से आंखें फाड़े मैं देखता रह गया मां को। उधर वो भी चहरे पर हल्के घबराहट के भाव लिए मेरी तरफ ही देखे जा रहीं थी।"क...क्या हुआ?" फिर उन्होंने कहा____"क्या तू अपनी भाभी की खुशी के लिए उससे ब्याह नहीं कर सकता?""य...ये आप क्या बोल रही हैं मां?" मैं सकते जैसी हालत में था____"आप होश में तो हैं? आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं?""वक्त और हालात इंसान को और भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं बेटा।" मां ने जब देखा कि मैं उनकी इस बात से भड़का नहीं हूं तो उन्होंने राहत की सांस लेते हुए कहा____"तुझे बताने की ज़रूरत नहीं है कि रागिनी हमारे लिए क्या मायने रखती है। तू भी जानता है और मानता भी है कि इस हवेली में उसके रहने से हम सब कैसा महसूस करते हैं? ये तो उस बेचारी की बदकिस्मती थी कि उसे इतनी कम उमर में विधवा हो जाना पड़ा लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या हम उसे ऐसे ही सारी जिंदगी यहां रखेंगे और उसे दुख सहता देखेंगे? नहीं बेटा, ऐसा ना हम चाह सकते हैं और ना ही तू। यही सब बातें मैं और तेरे पिता जी अक्सर अकेले में सोचते थे। तब हमने फ़ैसला किया कि हम अपनी बहू को हमेशा खुश रखने के लिए उसका फिर से ब्याह करेंगे। हम ये भी चाहते थे कि वो हमेशा हमारी ही बहू बन कर इस हवेली में रहे और ऐसा तो तभी संभव होगा जब उसका ब्याह हम अपने ही बेटे से यानि तुझसे करें।""बड़ी अजीब बातें कर रही हैं आप।" मैंने चकित भाव से कहा____"आप सोच भी कैसे सकती हैं कि मैं अपनी भाभी से ब्याह करने का सोच भी सकता हूं? मैं उनकी बहुत इज्ज़त करता हूं और मेरे लिए वो किसी देवी की तरह पूज्यनीय हैं।""मैं जानती हूं बेटा।" मां ने सिर हिलाते हुए कहा____"और उसके प्रति तेरी भावनाओं को भी समझती हूं लेकिन तुझे भी समझना होगा कि ज़रूरत पड़ने पर सबकी भलाई के लिए हमें ऐसे भी काम करने पड़ते हैं जिसे करने के लिए पहली नज़र में हमारा दिल नहीं मानता।""लेकिन मां वो मेरी भाभी हैं।" मैंने पुरज़ोर भाव से कहा____"उनके बारे में ऐसा सोचना भी मेरे लिए गुनाह है।""देवर का भाभी से ब्याह होना ऐसी बात नहीं है बेटा जिसे समाज मान्यता नहीं देता।" मां ने जैसे मुझे समझाते हुए कहा____"दुनिया में ऐसा पहले भी हुआ है और आगे भी ज़रूरत पड़ने पर होता रहेगा। इस लिए तू इस बारे में व्यर्थ की बातें मत सोच। तू जानना चाहता था न कि मैंने तुझसे अभी और क्या छुपाया है तो वो यही है। असल में जब मैंने और तुम्हारे पिता जी ने रागिनी का फिर से ब्याह करने का सोच लिया और ये भी सोच लिया कि हम उसका ब्याह तुझसे ही करेंगे तो हमने इस बारे में सबसे पहले रागिनी के पिता जी से भी चर्चा करने का सोच लिया था। कुछ दिन पहले तेरे पिता जी चंदनपुर गए थे समधी जी से इस बारे में बात करने। जब उन्होंने रागिनी के पिता जी से इस बारे में चर्चा की तो वो भी इस रिश्ते के लिए खुशी खुशी मान गए। उन्हें तो इसी बात से खुशी हुई थी कि हम उनकी बेटी की भलाई के लिए इतना कुछ सोचते हैं।"मैं अवाक सा देखता रह गया मां को। एकाएक ही मेरे मन मस्तिष्क में धमाके से होने लगे थे। अचानक ही ज़हन में वो बातें गूंजने लगीं जो चंदनपुर में कामिनी से हुईं थी और फिर भाभी से हुईं थी। भाभी का उदास और गंभीर चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो गया। उनकी बातें मेरे कानों में गूंजने लगीं।


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Awesome update tha bhai ekdamm lallantop bhai. Ab maja aayga bhai
अध्याय - 144
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मैं अवाक सा देखता रह गया मां को। एकाएक ही मेरे मन मस्तिष्क में धमाके से होने लगे थे। अचानक ही ज़हन में वो बातें गूंजने लगीं जो चंदनपुर में कामिनी से हुईं थी और फिर भाभी से हुईं थी। भाभी का उदास और गंभीर चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो गया। उनकी बातें मेरे कानों में गूंजने लगीं।


अब आगे....


ऊपर वाले का खेल भी बड़ा अजब होता है। वो अक्सर कुछ ऐसा कर देता है जिसकी हम इंसान कल्पना भी नहीं किए होते। मैंने सपने में भी कभी ये नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मुझे अपनी ही भाभी से ब्याह करना होगा। अपनी उस भाभी से जिनके प्रति मेरे मन में आदर और सम्मान तो था ही किंतु एक श्रद्धा भाव भी था। एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर विचलित होने लगता था। मुझे डर लगने लगता था कि कहीं इस वजह से मुझसे कोई अनर्थ न हो जाए। यही वजह थी कि मैं हमेशा उनसे दूर दूर ही रहा करता था। उसके बाद कुछ ऐसा हो गया जिसने हम सबको हिला कर ही रख दिया।

बड़े भैया गुज़र गए और मेरी भाभी विधवा हो गईं। उन्हें विधवा के लिबास में देख कर हम सब दुखी हो जाते थे। मेरे अंदर ऐसा बदलाव आया कि उसके बाद कभी मेरे मन में उनके प्रति कोई ग़लत ख़याल नहीं उभरा। इसके बाद वक्त कुछ ऐसा आया कि मेरे अंदर का वो वैभव ही ख़त्म हो गया जो सिर्फ अय्याशियों में ही मगन रहता था।

"मैं अपनी रागिनी जैसी बेटी को नहीं खोना चाहती बेटा।" सहसा मां की इस आवाज़ से मैं चौंक कर ख़यालों से बाहर आया। उधर मां भारी गले से कह रहीं थी____"मैं उसे हमेशा के लिए इस हवेली की शान ही बनाए रखना चाहती हूं। उसे खुश देखना चाहती हूं। इस लिए मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूं कि तू उससे ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"म...मां।" मैंने हड़बड़ा कर मां के हाथों को थाम लिया____"ये क्या कर रही हैं आप? हाथ जोड़ कर अपने बेटे को पापी मत बनाइए।"

"तो मान जा न मेरे लाल।" मां ने नम आंखों से मुझे देखा____"रागिनी से ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"क्या भाभी को भी पता है इस बारे में?" मैंने मां से पूछा।

"हां, उसके माता पिता ने उसे भी सब बता दिया होगा।" मां ने कहा।

"तो क्या वो तैयार हैं इस रिश्ते के लिए?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा।

"जब वो तैयार हो जाएगी तो उसके पिता संदेश भिजवा देंगे तेरे पिता जी को।" मां ने कहा____"या फिर वो स्वयं ही यहां आएंगे ख़बर देने।"

"इसका मतलब भाभी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं अभी।" मैंने कहा____"और मुझे यकीन है कि वो तैयार भी नहीं होंगी। मेरी भाभी ऐसी नहीं हैं जो ऐसे रिश्ते के लिए हां कह देंगी।"

"और अगर उसने हां कह दिया तो?" मां ने कहा____"तब तो तू उससे ब्याह करेगा ना?"

"आप बेवजह उनके ऊपर इस रिश्ते को थोप रही हैं मां।" मैंने हताश भाव से कहा____"उन पर ऐसा ज़ुल्म मत कीजिए आप लोग।"

"इस वक्त भले ही तुम्हें या रागिनी को ये ज़ुल्म लग रहा है।" मां ने अधीरता से कहा____"लेकिन मुझे यकीन है कि ब्याह के बाद तुम दोनों इस रिश्ते से खुश रहोगे।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं अब? बड़ी अजीब सी परिस्थिति बन गई थी। मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि इतने दिनों से मेरे माता पिता ये सब सोच रहे थे और इतना ही नहीं ऐसा करने का फ़ैसला भी कर चुके थे। हैरत की बात ये कि मुझे इस बात की भनक तक नहीं लगने दी थी।

"ऐसे चुप मत बैठ बेटा।" मां ने मुझे चुप देखा तो कहा____"मुझे बता कि अगर रागिनी इस रिश्ते के लिए मान जाती है तो तू उसके साथ ब्याह करेगा ना?"

"मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा मां।" मैंने हैरान परेशान भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपसे कुछ नहीं कहूंगा। मुझे सोचने के लिए समय चाहिए।"

"ठीक है तुझे सोचने के लिए जितना समय चाहिए ले ले।" मां ने कहा____"लेकिन ज़्यादा समय भी मत लगाना।"

"एक बात बताइए।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"क्या इस बारे में गौरी शंकर को पता है?"

"हां।" मेरी उम्मीद के विपरीत मां ने जब हां कहा तो मैं हैरान रह गया।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि इस बारे में सबको पता है लेकिन मुझे ही पता नहीं था। अचानक मुझे रूपा का ख़याल आया तो मैंने मां से कहा____"फिर तो रूपा को भी पता होगा ना इस बारे में?"

"नहीं।" मां ने एक बार फिर मुझे हैरान किया_____"उसको अभी इस बारे में नहीं बताया गया है।"

"ऐसा क्यों?" मैं पूछे बगैर न रह सका।

"असल में हम चाहते थे कि पहले तुम और रागिनी दोनों ही इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाओ।" मां ने कहा____"उसके बाद ही रूपा को इस बारे में बताएंगे। हम जानते हैं कि रूपा एक बहुत ही अच्छी लड़की है, बहुत समझदार है वो। जब उसे इस बारे में बताएंगे तो वो इस बात की गहराई को समझेगी। ख़ास कर रागिनी के बारे में सोचेगी। यही सब सोच कर हमने सिर्फ गौरी शंकर को इस बारे में बता रखा है।"

"बड़े आश्चर्य की बात है।" मैंने गहरी सांस ली____"इतना कुछ सोचा हुआ था आप दोनों ने और मुझसे छुपा के रखा, क्यों?"

"डरते थे कि कहीं तू इस बारे में जान कर नाराज़ ना हो जाए।" मां ने कहा____"दूसरी वजह ये भी थी कि तू अनुराधा की वजह से इस हालत में भी नहीं था कि तू शांति से इस बारे में सुन सके।"

मां के मुख से अनुराधा का नाम सुन कर मेरे अंदर एकाएक टीस सी उठी। आंखों के सामने उसका मासूम चेहरा चमक उठा। पलक झपकते ही मेरे चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आए। सीने में दर्द जाग उठा। फ़ौरन ही आंखें बंद कर के मैंने उस दर्द को जज़्ब करने की कोशिश में लग गया।

"क्या रूपचंद्र को भी इस बारे में बताया था पिता जी ने?" फिर मैंने खुद को सम्हालते हुए पूछा।

"नहीं तो।" मां ने हैरानी ज़ाहिर की____"लेकिन तू ऐसा क्यों कह रहा है?"

"क्योंकि आज वो मुझसे कुछ अजीब सी बातें कर रहा था।" मैंने कहा____"जब मैंने पूछा तो कहने लगा कि वो खुद मुझे कुछ नहीं बता सकता लेकिन हां इस बारे में मैं अपने माता पिता से पूछ सकता हूं।"

"अच्छा तो इसी लिए तू वहां से आते ही मुझसे इस बारे में ऐसा कह रहा था?" मां को जैसे अब समझ आया था____"ख़ैर हो सकता है कि गौरी शंकर ने अपने घर में इस बात का ज़िक्र किया हो जिसके चलते उसे भी इस बारे में पता चल गया होगा।"

"फिर तो रूपा को भी पता चल ही गया होगा।" मैंने जैसे संभावना ब्यक्त की।

"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।" मां ने मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा____"तेरे पिता जी ने गौरी शंकर से स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वो इस बारे में रूपा को पता न चलने दें।"

"और ऐसा कब तक रहेगा?" मैंने पूछा।

"उचित समय आने पर उसे भी बता दिया जाएगा।" मां ने पलंग से उतर कर कहा____"फिलहाल हमें चंदनपुर से तेरी भाभी के राज़ी होने की ख़बर की प्रतीक्षा है। उसकी हां के बाद ही हम रूपा को इस बारे में बताएंगे।"

कहने के साथ ही मां मुझे आराम करने का बोल कर कमरे से चली गईं। वो तो चली गईं थी लेकिन मुझे सोचो के भंवर में फंसा गईं थी। मैं बड़ी अजीब सी दुविधा और परेशानी में पड़ गया था।

✮✮✮✮

"आपको क्या लगता है काका?" रूपचंद्र ने गौरी शंकर से मुखातिब हो कर कहा____"सच जानने के बाद वैभव की क्या प्रतिक्रिया होगी?"

"कुछ कह नहीं सकता।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन तुम्हें उससे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। तुम्हें समझना चाहिए था कि अभी अभी वो उस लड़की के सदमे से बाहर आया है। ऐसे में उसके सामने इस तरह की बातें करना उचित नहीं था।"

"मैं मानता हूं काका कि उचित नहीं था।" रूपचंद्र ने कहा____"इसी लिए मैंने अपने मुख से उसको सच नहीं बताया।"

"हां लेकिन उसके मन में सच जानने की जिज्ञासा तो डाल ही दी थी ना तुमने।" गौरी शंकर ने कहा____"ऐसे में वो ये सोच कर नाराज़ हो जाएगा कि उसके माता पिता ने उससे कोई सच छुपा के रखा। उसकी नाराज़गी हम सबके लिए भारी पड़ सकती है।"

"आप बेवजह ही इतना ज़्यादा सोच रहे हैं काका।" रूपचंद्र ने कहा____"जबकि मुझे पूरा यकीन है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। वैसे भी मुझे लगता है कि उसके मन में सच जानने की उत्सुकता डाल कर मैंने अच्छा ही किया है। इसी बहाने अब वो अपने माता पिता से सच जानने का प्रयास करेगा। उसके माता पिता को भी उसे सब कुछ सच सच बताना ही पड़ेगा। मेरा ख़याल है कि जब वो वैभव को सच बताएंगे तो उसके साथ ही उसे परिस्थितियों का भी एहसास कराएंगे। वो उसे समझाएंगे कि वो जो कुछ भी करना चाहते हैं उसी में सबका भला है, ख़ास कर उसकी भाभी का। इतना तो वो लोग भी जानते हैं कि वैभव अपनी भाभी को कितना मानता है और उनकी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता है।"

"शायद रूप ठीक कह रहा है गौरी।" ललिता देवी ने कहा____"मानती हूं कि उसे सच बताने का ये सही वक्त नहीं था लेकिन अब जो हो गया उसका क्या कर सकते हैं? वैसे भी मुझे पूर्ण विश्वास है कि अगर वैभव को सच का पता उसकी अपनी मां के द्वारा चलेगा तो ज़्यादा बेहतर होगा। ठकुराईन बहुत ही प्यार से अपने बेटे को इस सबके बारे में समझा सकती हैं और वैभव भी उनकी बातों को शांत मन से सुन कर समझने की कोशिश करेगा।"

"ललिता सही कह रही है।" फूलवती ने कहा____"मेरा भी यही मानना है कि वैभव की मां इस बारे में अपने बेटे को बहुत अच्छी तरह से समझा सकती हैं और उसे अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए मना भी सकती हैं।"

"अगर ऐसा हो जाए तो अच्छा ही है।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं आज शाम को दादा ठाकुर से मिलने हवेली जाऊंगा और ये जानने का प्रयास करूंगा कि इस बारे में उन्होंने वैभव से बात की है या नहीं?"

"इस बारे में तो मैं खुद ही पता कर लूंगा काका।" रूपचंद्र ने झट से कहा____"कुछ देर में वैभव वापस काम धाम देखने आएगा तो मैं किसी बहाने उससे इस बारे में पता कर लूंगा।"

"हां ये भी ठीक है।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन उससे कुछ भी पूछने से पहले ये ज़रूर परख लेना कि उसकी मानसिक अवस्था कैसी है? ऐसा न हो कि वो तुम्हारे द्वारा कुछ पूछने पर बिगड़ जाए।"

"फ़िक्र मत कीजिए काका।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं इस बात का अंदाज़ा लगा लेने के बाद ही उससे इस बारे में बात करूंगा।"

कुछ देर और इसी संबंध में उनकी बातें हुईं उसके बाद दोनों औरतें अंदर चली गईं जबकि रूपचंद्र और गौरी शंकर पलंग पर लेट कर आराम करने लगे। दोनों चाचा भतीजे खाना खा चुके थे।

✮✮✮✮

मैं हवेली से आराम करने के बाद वापस उस जगह पर आ गया था जहां पर अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य चल रहा था। सारे मज़दूर और मिस्त्री भी अपने अपने घरों से लाया हुआ खाना खा चुके थे और अब फिर से काम पर लग गए थे। निर्माण कार्य बड़े उत्साह से और बड़ी तेज़ गति से चल रहा था।

मैं देवी मां के मंदिर के पास ही एक पेड़ के पास रखी एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठा हुआ था। मेरी नज़रें ज़रूर लोगों पर टिकी हुईं थी लेकिन मेरा मन कहीं और ही उलझा हुआ था। बार बार ज़हन में मां की बातें गूंजने लगती थीं और मैं ना चाहते हुए भी उन बातों के बारे में सोचने लगता था।

मैंने सपने में भी ये उम्मीद अथवा कल्पना नहीं की थी कि ऐसा भी कभी होगा। बार बार आंखों के सामने भाभी का उदास और गंभीर चेहरा उजागर हो जाता था। मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि क्या इसी वजह से कल भाभी इतना उदास और गंभीर नज़र आ रहीं थी? मतलब उन्हें भी इस रिश्ते के बारे में पता चल चुका था और इसी लिए वो मेरे सामने इतनी उदास अवस्था में खड़ी बातें कर रहीं थी।

अचानक ही मेरे मन में सवाल उभरा कि अगर उन्हें पहले से ही इस बारे में पता था तो उन्होंने कल मुझसे इस बारे में कुछ कहा क्यों नहीं? वो उदास तथा गंभीर ज़रूर थीं लेकिन मुझसे सामान्य भाव से ही बातें कर रहीं थी, ऐसा क्यों? अपने इन सवालों का जवाब मैं सोचने लगा। जल्दी ही जवाब के रूप में मेरे ज़हन में सवाल उभरा____'क्या वो उस समय मेरे मन की टोह ले रहीं थी?'

जवाब के रूप में ज़हन में उभरा ये सवाल ऐसा था जिसने मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मैं सोचने लगा कि क्या सच में वो ये देखना चाहती थीं कि मेरे मन में क्या है?

अचानक मेरे मन में ख़याल उभरा कि क्या वो मुझसे ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई होंगी? इस ख़याल के एहसास ने एक बार फिर से मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मेरे मन में फिर से सवाल उभरा कि क्या सचमुच मेरी भाभी मुझसे यानि अपने देवर से शादी करने का सोच सकती हैं?

मैं अपने मन में उभरते सवालों और ख़यालों के चलते एकाएक बुरी तरह उलझ गया था। मुझे पता ही न चला कि कब वक्त गुज़रा और रूपचंद्र आ कर मेरे पास ही खड़ा हो गया था। होश तब आया जब उसने मेरा कंधा पकड़ कर मुझे हिलाया।

"क्या हुआ भाई?" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए एकाएक मज़ाकिया भाव से पूछा____"मेरी बहन के अलावा और किसके ख़यालों में खोए हुए हो तुम?"

"न...नहीं तो।" मैं बुरी तरह बौखला गया, खुद को सम्हालते हुए कहा____"ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुम बताओ कब आए?"

"मुझे आए हुए तो काफी समय हो गया।" रूपचंद्र ने मुझे बड़े ध्यान से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पास ही खड़ा था और ये देखने में लगा हुआ था कि तुम बैठे तो यहीं पर हो लेकिन तुम्हारा मन जाने कहां था। मैं सही कह रहा हूं ना?"

"ह...हां वो मैं कुछ सोच रहा था।" मैंने काफी हद तक खुद को सम्हाल लिया था____"मैं सोच रहा था कि जब हमारे गांव में अस्पताल और विद्यालय बन कर तैयार हो जाएंगे तो लोगों को बहुत राहत हो जाएगी। ग़रीब लोग सहजता से इलाज़ करा सकेंगे। उनके बच्चे विद्यालय में पढ़ने लगेंगे तो उनके बच्चों का जीवन और व्यक्तित्व काफी निखर जाएगा।"

"ये तो तुमने बिल्कुल सही कहा।" रूपचंद्र ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम ये सब नहीं सोच रहे थे।"

रूपचंद्र की इस बात पर मैं चकित भाव से उसे देखने लगा। उधर वो भी कम्बख़्त मुझे ही देखे जा रहा था। कोई और परिस्थिति होती तो मैं हर्गिज़ उससे नज़रें चुराने वाला नहीं था लेकिन इस वक्त मैंने ख़ुद महसूस किया कि मेरी हालत उससे कमज़ोर है।

"मेरी बात का बुरा मत मानना वैभव।" फिर उसने थोड़ा संजीदा हो कर कहा____"असल में जिस तरह तुम यहां बैठे कहीं खोए हुए थे उससे मैं समझ गया था कि तुम्हें वो सच पता चल चुका है जिसे मैं खुद तुम्हें नहीं बता सकता था। ख़ैर, अगर सच में ही तुम्हें सच का पता चल चुका है तो तुम्हें मुझसे कुछ भी छुपाने की ना तो ज़रूरत है और ना ही मुझसे नज़रें चुराने की।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं उससे? बड़ा अजीब सा महसूस करने लगा था मैं। सबसे ज़्यादा मुझे ये सोच कर अजीब लगने लगा था कि वो और उसके घर वाले क्या सोच रहे होंगे इस रिश्ते के बारे में।

"ऐसे उतरा हुआ चेहरा मत बनाओ यार।" रूपचंद्र ने मेरे कंधे को हल्के से दबाते हुए जैसे दिलासा दी____"अब तुम्हारे और हमारे बीच कुछ भी पराया नहीं है। तुम्हारा दुख हमारा दुख है और तुम्हारा सुख हमारा सुख है। तुमसे ही सब कुछ है, तुम जो भी करोगे उसका हम पर भी असर होगा। इस लिए व्यर्थ का संकोच छोड़ दो और जो भी मन में हो खुशी मन से साझा करो। एक बात मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि मैं और मेरे घर वालों को अब किसी भी बात से कोई एतराज़ नहीं है। यूं समझो कि तुम्हारी खुशी में ही हम सबकी खुशी है। अब इससे ज़्यादा क्या कहूं?"

"मतलब तुम्हें या तुम्हारे घर वालों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ मेरी ही भाभी से कर देना चाहते हैं?" मैंने जैसे एक ही सांस में सब कह दिया।

"सच कहूं तो पहली बार जब इस बारे में काका से पता चला था तो हम सबको थोड़ा बुरा लगा था।" रूपचंद्र ने गंभीर हो कर कहा____"लेकिन काका ने जब इस रिश्ते के संबंध में पूरी बात विस्तार से बताई तो हम सबको एहसास हुआ कि ऐसा होना कहीं से भी ग़लत नहीं है। पहले भी तो तुम अनुराधा से ब्याह करना चाहते थे। हमें अनुराधा से भी कोई समस्या नहीं थी, ये तो फिर भी तुम्हारी अपनी भाभी हैं। अगर तुम्हारे द्वारा उनका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में हमेशा खुश रह सकती हैं तो ये अच्छी बात ही है।"

"बात तो ठीक है रूपचंद्र।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन अपनी भाभी से ब्याह करने की बात सोच कर ही मुझे बड़ा अजीब सा लगता है। तुम तो जानते हो कि सबको मेरे चरित्र के बारे में पता है और इस वजह से लोगों को जब ये पता चलेगा कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ अपनी ही बहू से कर देना चाहते हैं तो जाने वो लोग क्या क्या सोच बैठेंगे। मुझे अपने ऊपर लोगों द्वारा खीचड़ उछाले जाने पर कोई एतराज़ नहीं होगा लेकिन अगर लोग मेरी भाभी के चरित्र पर कीचड़ उछालने लगेंगे तो मैं बर्दास्त नहीं कर सकूंगा। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मेरी भाभी का चरित्र गंगा मैया की तरह स्वच्छ और पवित्र रहा है। ये उनकी बदकिस्मती ही थी कि उनके पति गुज़र गए और वो विधवा हो गईं, लेकिन मैं ये हर्गिज़ सहन नहीं करूंगा कि लोग इस रिश्ते के चलते उनके चरित्र पर सवाल उठाने लगें।"

"लोग तो भगवान पर भी कीचड़ उछाल देते हैं वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"इंसानों की तो बात ही मत करो। मैं तो यही कहूंगा कि तुम लोगों के बारे में मत सोचो बल्कि सिर्फ अपनी भाभी के बारे में सोचो। उनकी ज़िंदगी संवारने के बारे में सोचो। अगर तुम्हें भी लगता है कि तुमसे ब्याह हो जाने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा और वो खुश रहने लगेंगी तो तुम इस रिश्ते को स्वीकार कर लो। सच कहूं तो मैं भी चाहता हूं कि उनका जीवन संवर जाए। विधवा के रूप में इतना लंबा जीवन गुज़ारना बहुत ही कठिन होगा उनके लिए।"

"और तुम्हारी बहन का क्या?" मैंने धड़कते दिल से उससे पूछा____"पहले भी अनुराधा की वजह से उसने खुद को समझाया था और अब फिर से वही किस्सा? पहले तो मैंने अपनी मूर्खता के चलते उसके साथ नाइंसाफी की थी लेकिन अब जान बूझ कर कैसे उसके साथ अन्याय करूं? आख़िर और कितना उसे अपने प्रेम के चलते समझौता करना पड़ेगा?"

"मेरी बहन के बारे में तुम्हारा ऐसा सोचना ही ये साबित करता है कि तुम्हें उसके प्रेम का और उसकी तकलीफ़ों का एहसास है।" रूपचंद्र ने कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे मुंह से अपनी बहन के लिए ये फिक्रमंदी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा है। लेकिन तुम शायद अभी भी मेरी बहन को अच्छे से समझे नहीं हो। अगर समझे होते तो ये भी समझ जाते कि उसे इस रिश्ते से भी कोई समस्या नहीं होगी। जैसे उसने अनुराधा को ख़ुशी ख़ुशी क़बूल कर लिया था वैसे ही अब वो रागिनी दीदी को भी ख़ुशी से क़बूल कर लेगी।"

"तुम्हारी बहन बहुत महान है रूपचंद्र।" मैंने सहसा संजीदा हो कर कहा____"इतना कुछ होने के बाद भी उसके दिल से मेरे प्रति उसका प्रेम नहीं मिटा। अनुराधा की मौत के बाद जब मैं गहरे सदमे में चला गया था तो उसने जिस तरह से मुझे उसके दुख से निकाला उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता मैं। मेरे लिए उसने जितना त्याग और जितना समझौता किया है उतना इस संसार में दूसरा कोई नहीं कर सकता। मैं इस जन्म में ही नहीं बल्कि अपने हर जन्म में उसका ऋणी रहूंगा। अक्सर सोचता हूं कि मेरे जैसे इंसान के नसीब में ऊपर वाले ने इतनी अच्छी लड़कियां क्यों लिखी थी? भला मैंने अपने जीवन में कौन से ऐसे अच्छे कर्म किए थे जिसके चलते मुझे रूपा और अनुराधा जैसी प्रेम करने वाली लड़कियां नसीब हुईं?"

"ऊपर वाले की लीला वही जाने वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"हम इंसान तो बस यही कह सकते हैं कि ये सब किस्मत की ही बातें हैं। ख़ैर छोड़ो और ये बताओ कि अब क्या सोचा है तुमने? मेरा मतलब है कि क्या तुम अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए राज़ी हो?"

"सच कहूं तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा भाई।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"जब से मां के द्वारा इस सच का पता चला है तब से मन में यही सब चल रहा है। कल तक मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था और शायद यही वजह थी कि कल चंदनपुर में मैं अपनी भाभी से बात भी कर सका था। मगर अब ये सब जानने के बाद उनसे बात करने की तो दूर उनसे नज़रें मिलाने की भी हिम्मत नहीं कर पाऊंगा। जाने क्या क्या सोच रहीं होंगी वो मेरे बारे में?"

"मुझे लगता है कि तुम बेकार में ही ये सब सोच रहे हो।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं ये मानता हूं कि उनको भी इस रिश्ते के बारे में सोच कर तुम्हारी तरह ही अजीब लग रहा होगा लेकिन यकीन मानों देर सवेर वो भी इस रिश्ते को स्वीकार कर लेंगी। उनके घर वाले उन्हें भी तो समझाएंगे कि उनके लिए क्या सही है और क्या उचित है।"

थोड़ी देर रूपचंद्र से और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद मैं उसे यहीं रहने का बोल कर अपने खेतों की तरफ निकल गया। रूपचंद्र से इस बारे में बातें कर के थोड़ा बेहतर महसूस करने लगा था मैं।



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Bahot jabardast tha bhai ekdamm mast 👍👍👍👌👌👌👌👍👍👍
 
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यत्र-तत्र-सर्वत्र यही चर्चा का विषय बना हुआ है कि वैभव और रागिनी विवाह के बंधन मे बंधेगे या नही ! यत्र-तत्र से कहने का तात्पर्य वैभव और रागिनी से है तो सर्वत्र का मतलब हम सब रीडर्स से है ।
दोनो ही उहापोह वाली स्थिति मे है । दोनो ही असमंजस मे है । दोनो का दिमाग दो तरफ दौड़ रहा है । दोनो को लगता है कि मेरी स्वीकृति कहीं मेरी कमजोरी न दर्शा दे । दोनो को लगता है कि उसे कहीं गलत न समझ लिया जाए ।
इस चीज का एकमात्र निराकरण है - दोनो ही इस विषय पर एक दूसरे के साथ खुलकर बातें करे । एक दूसरे की दुविधा दूर करने का प्रयास करे । अनवरत कन्वर्सेशन ही किसी समस्या का सर्वश्रेष्ठ निदान है ।

चाहे आपकी प्रथम विवाह हो या फिर पुनर्विवाह , इंसान के अंदर , उसके दिल मे कुछ तरह के भावनाओं का उबाल आता ही है ।
यह खबर आपके लिए खुशी की भी हो सकती है । आपके दिल मे फुलझड़ी सा चलने का आभास भी करा सकती है । आपको रोमांटिक भी बना सकती है । आने वाले वैवाहिक जीवन के सुखद पलों का तृष्णा देखा सकती है ।
तो यह खबर आपके लिए दुखों का पहाड़ भी लग सकता है । यह खबर आपको लज्जित भी कर सकती है । आपको शर्मिन्दगी का एहसास भी करा सकता है। यह आपके लिए दुखों का पहाड़ भी लग सकता है ।

या फिर ऐसा भी हो सकता है कि इन दोनो परिस्थितियों से बिल्कुल अलग भाव - विहीन जैसी परिस्थिति हो सकती है । आपके लिए विवाह करना सिर्फ खानापूर्ति करने जैसा होता है ।

प्रश्न यह है कि दोनो के मन मस्तिष्क मे क्या चल रहा है ? यह दोनो को ही ठंडे दिमाग से , पुरी एकाग्रता से चिन्तन करना है ।

और जहां तक बात रूपा की है तो भाई , आखिर वह भी वैभव की पत्नी बनने वाली है । वह भी परिवार का अहम हिस्सा है । उसे भी सबकुछ जानने का हक है ।

बहुत ही खूबसूरत अपडेट शुभम भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
 
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मुझे लगता है की वैभव और रागिनी को आमने सामने बैठा कर बात करवानी चाहिए, क्योंकि दोनो एक ही जैसे उलझन का सामना कर रहे है,

लेकिन यह भी तय की अगर दोनों में से किसी एक ने भी हां कह दी तो दूसरे को हां करने में देरी नही लगेगी। दोनों बस इंतजार करेंगे की कोई पहले हां कर दे।

पहले लगा था की वैभव के लिए ज्यादा मुश्किल होगा लेकिन लग रहा ये decison रागिनी के लिए ज्यादा कठिन हैं।
अब भले ही ये दादा ठाकुर और सुगंधा ठकुराइन का स्वार्थ बोल लो या रागिनी के लिए फिक्र, लेकिन इतना जरूर है की वो वैभव को रागिनी से शादी करने के लिए मना ही लेंगे चाहे उसके लिए emotional blackmail ही क्यों न करना पड़े।

मुझे तो रागिनी और वैभव के बीच का adult scene पढ़ना हैं, आखिर दोनो के बीच की शर्म की दीवार कैसे गिरती है।

उम्दा अपडेट भाई, अगले अपडेट की प्रतीक्षा में ❣️
बिल्कुल सही कहा आपने सूरज भाई । रागिनी भाभी और वैभव का सुहागरात होना ही चाहिए लेकिन मेरी इच्छा है कि वह सुहागरात सीन्स avsji भाई का लिखा हुआ हो। :D
शुभम भाई से एडल्ट सीन्स ठीक तरह से लिखा नही जाता। :D
 

Game888

Hum hai rahi pyar ke
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अध्याय - 144
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मैं अवाक सा देखता रह गया मां को। एकाएक ही मेरे मन मस्तिष्क में धमाके से होने लगे थे। अचानक ही ज़हन में वो बातें गूंजने लगीं जो चंदनपुर में कामिनी से हुईं थी और फिर भाभी से हुईं थी। भाभी का उदास और गंभीर चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो गया। उनकी बातें मेरे कानों में गूंजने लगीं।


अब आगे....


ऊपर वाले का खेल भी बड़ा अजब होता है। वो अक्सर कुछ ऐसा कर देता है जिसकी हम इंसान कल्पना भी नहीं किए होते। मैंने सपने में भी कभी ये नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मुझे अपनी ही भाभी से ब्याह करना होगा। अपनी उस भाभी से जिनके प्रति मेरे मन में आदर और सम्मान तो था ही किंतु एक श्रद्धा भाव भी था। एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर विचलित होने लगता था। मुझे डर लगने लगता था कि कहीं इस वजह से मुझसे कोई अनर्थ न हो जाए। यही वजह थी कि मैं हमेशा उनसे दूर दूर ही रहा करता था। उसके बाद कुछ ऐसा हो गया जिसने हम सबको हिला कर ही रख दिया।

बड़े भैया गुज़र गए और मेरी भाभी विधवा हो गईं। उन्हें विधवा के लिबास में देख कर हम सब दुखी हो जाते थे। मेरे अंदर ऐसा बदलाव आया कि उसके बाद कभी मेरे मन में उनके प्रति कोई ग़लत ख़याल नहीं उभरा। इसके बाद वक्त कुछ ऐसा आया कि मेरे अंदर का वो वैभव ही ख़त्म हो गया जो सिर्फ अय्याशियों में ही मगन रहता था।

"मैं अपनी रागिनी जैसी बेटी को नहीं खोना चाहती बेटा।" सहसा मां की इस आवाज़ से मैं चौंक कर ख़यालों से बाहर आया। उधर मां भारी गले से कह रहीं थी____"मैं उसे हमेशा के लिए इस हवेली की शान ही बनाए रखना चाहती हूं। उसे खुश देखना चाहती हूं। इस लिए मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूं कि तू उससे ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"म...मां।" मैंने हड़बड़ा कर मां के हाथों को थाम लिया____"ये क्या कर रही हैं आप? हाथ जोड़ कर अपने बेटे को पापी मत बनाइए।"

"तो मान जा न मेरे लाल।" मां ने नम आंखों से मुझे देखा____"रागिनी से ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"क्या भाभी को भी पता है इस बारे में?" मैंने मां से पूछा।

"हां, उसके माता पिता ने उसे भी सब बता दिया होगा।" मां ने कहा।

"तो क्या वो तैयार हैं इस रिश्ते के लिए?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा।

"जब वो तैयार हो जाएगी तो उसके पिता संदेश भिजवा देंगे तेरे पिता जी को।" मां ने कहा____"या फिर वो स्वयं ही यहां आएंगे ख़बर देने।"

"इसका मतलब भाभी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं अभी।" मैंने कहा____"और मुझे यकीन है कि वो तैयार भी नहीं होंगी। मेरी भाभी ऐसी नहीं हैं जो ऐसे रिश्ते के लिए हां कह देंगी।"

"और अगर उसने हां कह दिया तो?" मां ने कहा____"तब तो तू उससे ब्याह करेगा ना?"

"आप बेवजह उनके ऊपर इस रिश्ते को थोप रही हैं मां।" मैंने हताश भाव से कहा____"उन पर ऐसा ज़ुल्म मत कीजिए आप लोग।"

"इस वक्त भले ही तुम्हें या रागिनी को ये ज़ुल्म लग रहा है।" मां ने अधीरता से कहा____"लेकिन मुझे यकीन है कि ब्याह के बाद तुम दोनों इस रिश्ते से खुश रहोगे।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं अब? बड़ी अजीब सी परिस्थिति बन गई थी। मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि इतने दिनों से मेरे माता पिता ये सब सोच रहे थे और इतना ही नहीं ऐसा करने का फ़ैसला भी कर चुके थे। हैरत की बात ये कि मुझे इस बात की भनक तक नहीं लगने दी थी।

"ऐसे चुप मत बैठ बेटा।" मां ने मुझे चुप देखा तो कहा____"मुझे बता कि अगर रागिनी इस रिश्ते के लिए मान जाती है तो तू उसके साथ ब्याह करेगा ना?"

"मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा मां।" मैंने हैरान परेशान भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपसे कुछ नहीं कहूंगा। मुझे सोचने के लिए समय चाहिए।"

"ठीक है तुझे सोचने के लिए जितना समय चाहिए ले ले।" मां ने कहा____"लेकिन ज़्यादा समय भी मत लगाना।"

"एक बात बताइए।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"क्या इस बारे में गौरी शंकर को पता है?"

"हां।" मेरी उम्मीद के विपरीत मां ने जब हां कहा तो मैं हैरान रह गया।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि इस बारे में सबको पता है लेकिन मुझे ही पता नहीं था। अचानक मुझे रूपा का ख़याल आया तो मैंने मां से कहा____"फिर तो रूपा को भी पता होगा ना इस बारे में?"

"नहीं।" मां ने एक बार फिर मुझे हैरान किया_____"उसको अभी इस बारे में नहीं बताया गया है।"

"ऐसा क्यों?" मैं पूछे बगैर न रह सका।

"असल में हम चाहते थे कि पहले तुम और रागिनी दोनों ही इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाओ।" मां ने कहा____"उसके बाद ही रूपा को इस बारे में बताएंगे। हम जानते हैं कि रूपा एक बहुत ही अच्छी लड़की है, बहुत समझदार है वो। जब उसे इस बारे में बताएंगे तो वो इस बात की गहराई को समझेगी। ख़ास कर रागिनी के बारे में सोचेगी। यही सब सोच कर हमने सिर्फ गौरी शंकर को इस बारे में बता रखा है।"

"बड़े आश्चर्य की बात है।" मैंने गहरी सांस ली____"इतना कुछ सोचा हुआ था आप दोनों ने और मुझसे छुपा के रखा, क्यों?"

"डरते थे कि कहीं तू इस बारे में जान कर नाराज़ ना हो जाए।" मां ने कहा____"दूसरी वजह ये भी थी कि तू अनुराधा की वजह से इस हालत में भी नहीं था कि तू शांति से इस बारे में सुन सके।"

मां के मुख से अनुराधा का नाम सुन कर मेरे अंदर एकाएक टीस सी उठी। आंखों के सामने उसका मासूम चेहरा चमक उठा। पलक झपकते ही मेरे चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आए। सीने में दर्द जाग उठा। फ़ौरन ही आंखें बंद कर के मैंने उस दर्द को जज़्ब करने की कोशिश में लग गया।

"क्या रूपचंद्र को भी इस बारे में बताया था पिता जी ने?" फिर मैंने खुद को सम्हालते हुए पूछा।

"नहीं तो।" मां ने हैरानी ज़ाहिर की____"लेकिन तू ऐसा क्यों कह रहा है?"

"क्योंकि आज वो मुझसे कुछ अजीब सी बातें कर रहा था।" मैंने कहा____"जब मैंने पूछा तो कहने लगा कि वो खुद मुझे कुछ नहीं बता सकता लेकिन हां इस बारे में मैं अपने माता पिता से पूछ सकता हूं।"

"अच्छा तो इसी लिए तू वहां से आते ही मुझसे इस बारे में ऐसा कह रहा था?" मां को जैसे अब समझ आया था____"ख़ैर हो सकता है कि गौरी शंकर ने अपने घर में इस बात का ज़िक्र किया हो जिसके चलते उसे भी इस बारे में पता चल गया होगा।"

"फिर तो रूपा को भी पता चल ही गया होगा।" मैंने जैसे संभावना ब्यक्त की।

"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।" मां ने मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा____"तेरे पिता जी ने गौरी शंकर से स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वो इस बारे में रूपा को पता न चलने दें।"

"और ऐसा कब तक रहेगा?" मैंने पूछा।

"उचित समय आने पर उसे भी बता दिया जाएगा।" मां ने पलंग से उतर कर कहा____"फिलहाल हमें चंदनपुर से तेरी भाभी के राज़ी होने की ख़बर की प्रतीक्षा है। उसकी हां के बाद ही हम रूपा को इस बारे में बताएंगे।"

कहने के साथ ही मां मुझे आराम करने का बोल कर कमरे से चली गईं। वो तो चली गईं थी लेकिन मुझे सोचो के भंवर में फंसा गईं थी। मैं बड़ी अजीब सी दुविधा और परेशानी में पड़ गया था।

✮✮✮✮

"आपको क्या लगता है काका?" रूपचंद्र ने गौरी शंकर से मुखातिब हो कर कहा____"सच जानने के बाद वैभव की क्या प्रतिक्रिया होगी?"

"कुछ कह नहीं सकता।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन तुम्हें उससे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। तुम्हें समझना चाहिए था कि अभी अभी वो उस लड़की के सदमे से बाहर आया है। ऐसे में उसके सामने इस तरह की बातें करना उचित नहीं था।"

"मैं मानता हूं काका कि उचित नहीं था।" रूपचंद्र ने कहा____"इसी लिए मैंने अपने मुख से उसको सच नहीं बताया।"

"हां लेकिन उसके मन में सच जानने की जिज्ञासा तो डाल ही दी थी ना तुमने।" गौरी शंकर ने कहा____"ऐसे में वो ये सोच कर नाराज़ हो जाएगा कि उसके माता पिता ने उससे कोई सच छुपा के रखा। उसकी नाराज़गी हम सबके लिए भारी पड़ सकती है।"

"आप बेवजह ही इतना ज़्यादा सोच रहे हैं काका।" रूपचंद्र ने कहा____"जबकि मुझे पूरा यकीन है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। वैसे भी मुझे लगता है कि उसके मन में सच जानने की उत्सुकता डाल कर मैंने अच्छा ही किया है। इसी बहाने अब वो अपने माता पिता से सच जानने का प्रयास करेगा। उसके माता पिता को भी उसे सब कुछ सच सच बताना ही पड़ेगा। मेरा ख़याल है कि जब वो वैभव को सच बताएंगे तो उसके साथ ही उसे परिस्थितियों का भी एहसास कराएंगे। वो उसे समझाएंगे कि वो जो कुछ भी करना चाहते हैं उसी में सबका भला है, ख़ास कर उसकी भाभी का। इतना तो वो लोग भी जानते हैं कि वैभव अपनी भाभी को कितना मानता है और उनकी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता है।"

"शायद रूप ठीक कह रहा है गौरी।" ललिता देवी ने कहा____"मानती हूं कि उसे सच बताने का ये सही वक्त नहीं था लेकिन अब जो हो गया उसका क्या कर सकते हैं? वैसे भी मुझे पूर्ण विश्वास है कि अगर वैभव को सच का पता उसकी अपनी मां के द्वारा चलेगा तो ज़्यादा बेहतर होगा। ठकुराईन बहुत ही प्यार से अपने बेटे को इस सबके बारे में समझा सकती हैं और वैभव भी उनकी बातों को शांत मन से सुन कर समझने की कोशिश करेगा।"

"ललिता सही कह रही है।" फूलवती ने कहा____"मेरा भी यही मानना है कि वैभव की मां इस बारे में अपने बेटे को बहुत अच्छी तरह से समझा सकती हैं और उसे अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए मना भी सकती हैं।"

"अगर ऐसा हो जाए तो अच्छा ही है।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं आज शाम को दादा ठाकुर से मिलने हवेली जाऊंगा और ये जानने का प्रयास करूंगा कि इस बारे में उन्होंने वैभव से बात की है या नहीं?"

"इस बारे में तो मैं खुद ही पता कर लूंगा काका।" रूपचंद्र ने झट से कहा____"कुछ देर में वैभव वापस काम धाम देखने आएगा तो मैं किसी बहाने उससे इस बारे में पता कर लूंगा।"

"हां ये भी ठीक है।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन उससे कुछ भी पूछने से पहले ये ज़रूर परख लेना कि उसकी मानसिक अवस्था कैसी है? ऐसा न हो कि वो तुम्हारे द्वारा कुछ पूछने पर बिगड़ जाए।"

"फ़िक्र मत कीजिए काका।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं इस बात का अंदाज़ा लगा लेने के बाद ही उससे इस बारे में बात करूंगा।"

कुछ देर और इसी संबंध में उनकी बातें हुईं उसके बाद दोनों औरतें अंदर चली गईं जबकि रूपचंद्र और गौरी शंकर पलंग पर लेट कर आराम करने लगे। दोनों चाचा भतीजे खाना खा चुके थे।

✮✮✮✮

मैं हवेली से आराम करने के बाद वापस उस जगह पर आ गया था जहां पर अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य चल रहा था। सारे मज़दूर और मिस्त्री भी अपने अपने घरों से लाया हुआ खाना खा चुके थे और अब फिर से काम पर लग गए थे। निर्माण कार्य बड़े उत्साह से और बड़ी तेज़ गति से चल रहा था।

मैं देवी मां के मंदिर के पास ही एक पेड़ के पास रखी एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठा हुआ था। मेरी नज़रें ज़रूर लोगों पर टिकी हुईं थी लेकिन मेरा मन कहीं और ही उलझा हुआ था। बार बार ज़हन में मां की बातें गूंजने लगती थीं और मैं ना चाहते हुए भी उन बातों के बारे में सोचने लगता था।

मैंने सपने में भी ये उम्मीद अथवा कल्पना नहीं की थी कि ऐसा भी कभी होगा। बार बार आंखों के सामने भाभी का उदास और गंभीर चेहरा उजागर हो जाता था। मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि क्या इसी वजह से कल भाभी इतना उदास और गंभीर नज़र आ रहीं थी? मतलब उन्हें भी इस रिश्ते के बारे में पता चल चुका था और इसी लिए वो मेरे सामने इतनी उदास अवस्था में खड़ी बातें कर रहीं थी।

अचानक ही मेरे मन में सवाल उभरा कि अगर उन्हें पहले से ही इस बारे में पता था तो उन्होंने कल मुझसे इस बारे में कुछ कहा क्यों नहीं? वो उदास तथा गंभीर ज़रूर थीं लेकिन मुझसे सामान्य भाव से ही बातें कर रहीं थी, ऐसा क्यों? अपने इन सवालों का जवाब मैं सोचने लगा। जल्दी ही जवाब के रूप में मेरे ज़हन में सवाल उभरा____'क्या वो उस समय मेरे मन की टोह ले रहीं थी?'

जवाब के रूप में ज़हन में उभरा ये सवाल ऐसा था जिसने मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मैं सोचने लगा कि क्या सच में वो ये देखना चाहती थीं कि मेरे मन में क्या है?

अचानक मेरे मन में ख़याल उभरा कि क्या वो मुझसे ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई होंगी? इस ख़याल के एहसास ने एक बार फिर से मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मेरे मन में फिर से सवाल उभरा कि क्या सचमुच मेरी भाभी मुझसे यानि अपने देवर से शादी करने का सोच सकती हैं?

मैं अपने मन में उभरते सवालों और ख़यालों के चलते एकाएक बुरी तरह उलझ गया था। मुझे पता ही न चला कि कब वक्त गुज़रा और रूपचंद्र आ कर मेरे पास ही खड़ा हो गया था। होश तब आया जब उसने मेरा कंधा पकड़ कर मुझे हिलाया।

"क्या हुआ भाई?" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए एकाएक मज़ाकिया भाव से पूछा____"मेरी बहन के अलावा और किसके ख़यालों में खोए हुए हो तुम?"

"न...नहीं तो।" मैं बुरी तरह बौखला गया, खुद को सम्हालते हुए कहा____"ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुम बताओ कब आए?"

"मुझे आए हुए तो काफी समय हो गया।" रूपचंद्र ने मुझे बड़े ध्यान से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पास ही खड़ा था और ये देखने में लगा हुआ था कि तुम बैठे तो यहीं पर हो लेकिन तुम्हारा मन जाने कहां था। मैं सही कह रहा हूं ना?"

"ह...हां वो मैं कुछ सोच रहा था।" मैंने काफी हद तक खुद को सम्हाल लिया था____"मैं सोच रहा था कि जब हमारे गांव में अस्पताल और विद्यालय बन कर तैयार हो जाएंगे तो लोगों को बहुत राहत हो जाएगी। ग़रीब लोग सहजता से इलाज़ करा सकेंगे। उनके बच्चे विद्यालय में पढ़ने लगेंगे तो उनके बच्चों का जीवन और व्यक्तित्व काफी निखर जाएगा।"

"ये तो तुमने बिल्कुल सही कहा।" रूपचंद्र ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम ये सब नहीं सोच रहे थे।"

रूपचंद्र की इस बात पर मैं चकित भाव से उसे देखने लगा। उधर वो भी कम्बख़्त मुझे ही देखे जा रहा था। कोई और परिस्थिति होती तो मैं हर्गिज़ उससे नज़रें चुराने वाला नहीं था लेकिन इस वक्त मैंने ख़ुद महसूस किया कि मेरी हालत उससे कमज़ोर है।

"मेरी बात का बुरा मत मानना वैभव।" फिर उसने थोड़ा संजीदा हो कर कहा____"असल में जिस तरह तुम यहां बैठे कहीं खोए हुए थे उससे मैं समझ गया था कि तुम्हें वो सच पता चल चुका है जिसे मैं खुद तुम्हें नहीं बता सकता था। ख़ैर, अगर सच में ही तुम्हें सच का पता चल चुका है तो तुम्हें मुझसे कुछ भी छुपाने की ना तो ज़रूरत है और ना ही मुझसे नज़रें चुराने की।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं उससे? बड़ा अजीब सा महसूस करने लगा था मैं। सबसे ज़्यादा मुझे ये सोच कर अजीब लगने लगा था कि वो और उसके घर वाले क्या सोच रहे होंगे इस रिश्ते के बारे में।

"ऐसे उतरा हुआ चेहरा मत बनाओ यार।" रूपचंद्र ने मेरे कंधे को हल्के से दबाते हुए जैसे दिलासा दी____"अब तुम्हारे और हमारे बीच कुछ भी पराया नहीं है। तुम्हारा दुख हमारा दुख है और तुम्हारा सुख हमारा सुख है। तुमसे ही सब कुछ है, तुम जो भी करोगे उसका हम पर भी असर होगा। इस लिए व्यर्थ का संकोच छोड़ दो और जो भी मन में हो खुशी मन से साझा करो। एक बात मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि मैं और मेरे घर वालों को अब किसी भी बात से कोई एतराज़ नहीं है। यूं समझो कि तुम्हारी खुशी में ही हम सबकी खुशी है। अब इससे ज़्यादा क्या कहूं?"

"मतलब तुम्हें या तुम्हारे घर वालों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ मेरी ही भाभी से कर देना चाहते हैं?" मैंने जैसे एक ही सांस में सब कह दिया।

"सच कहूं तो पहली बार जब इस बारे में काका से पता चला था तो हम सबको थोड़ा बुरा लगा था।" रूपचंद्र ने गंभीर हो कर कहा____"लेकिन काका ने जब इस रिश्ते के संबंध में पूरी बात विस्तार से बताई तो हम सबको एहसास हुआ कि ऐसा होना कहीं से भी ग़लत नहीं है। पहले भी तो तुम अनुराधा से ब्याह करना चाहते थे। हमें अनुराधा से भी कोई समस्या नहीं थी, ये तो फिर भी तुम्हारी अपनी भाभी हैं। अगर तुम्हारे द्वारा उनका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में हमेशा खुश रह सकती हैं तो ये अच्छी बात ही है।"

"बात तो ठीक है रूपचंद्र।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन अपनी भाभी से ब्याह करने की बात सोच कर ही मुझे बड़ा अजीब सा लगता है। तुम तो जानते हो कि सबको मेरे चरित्र के बारे में पता है और इस वजह से लोगों को जब ये पता चलेगा कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ अपनी ही बहू से कर देना चाहते हैं तो जाने वो लोग क्या क्या सोच बैठेंगे। मुझे अपने ऊपर लोगों द्वारा खीचड़ उछाले जाने पर कोई एतराज़ नहीं होगा लेकिन अगर लोग मेरी भाभी के चरित्र पर कीचड़ उछालने लगेंगे तो मैं बर्दास्त नहीं कर सकूंगा। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मेरी भाभी का चरित्र गंगा मैया की तरह स्वच्छ और पवित्र रहा है। ये उनकी बदकिस्मती ही थी कि उनके पति गुज़र गए और वो विधवा हो गईं, लेकिन मैं ये हर्गिज़ सहन नहीं करूंगा कि लोग इस रिश्ते के चलते उनके चरित्र पर सवाल उठाने लगें।"

"लोग तो भगवान पर भी कीचड़ उछाल देते हैं वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"इंसानों की तो बात ही मत करो। मैं तो यही कहूंगा कि तुम लोगों के बारे में मत सोचो बल्कि सिर्फ अपनी भाभी के बारे में सोचो। उनकी ज़िंदगी संवारने के बारे में सोचो। अगर तुम्हें भी लगता है कि तुमसे ब्याह हो जाने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा और वो खुश रहने लगेंगी तो तुम इस रिश्ते को स्वीकार कर लो। सच कहूं तो मैं भी चाहता हूं कि उनका जीवन संवर जाए। विधवा के रूप में इतना लंबा जीवन गुज़ारना बहुत ही कठिन होगा उनके लिए।"

"और तुम्हारी बहन का क्या?" मैंने धड़कते दिल से उससे पूछा____"पहले भी अनुराधा की वजह से उसने खुद को समझाया था और अब फिर से वही किस्सा? पहले तो मैंने अपनी मूर्खता के चलते उसके साथ नाइंसाफी की थी लेकिन अब जान बूझ कर कैसे उसके साथ अन्याय करूं? आख़िर और कितना उसे अपने प्रेम के चलते समझौता करना पड़ेगा?"

"मेरी बहन के बारे में तुम्हारा ऐसा सोचना ही ये साबित करता है कि तुम्हें उसके प्रेम का और उसकी तकलीफ़ों का एहसास है।" रूपचंद्र ने कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे मुंह से अपनी बहन के लिए ये फिक्रमंदी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा है। लेकिन तुम शायद अभी भी मेरी बहन को अच्छे से समझे नहीं हो। अगर समझे होते तो ये भी समझ जाते कि उसे इस रिश्ते से भी कोई समस्या नहीं होगी। जैसे उसने अनुराधा को ख़ुशी ख़ुशी क़बूल कर लिया था वैसे ही अब वो रागिनी दीदी को भी ख़ुशी से क़बूल कर लेगी।"

"तुम्हारी बहन बहुत महान है रूपचंद्र।" मैंने सहसा संजीदा हो कर कहा____"इतना कुछ होने के बाद भी उसके दिल से मेरे प्रति उसका प्रेम नहीं मिटा। अनुराधा की मौत के बाद जब मैं गहरे सदमे में चला गया था तो उसने जिस तरह से मुझे उसके दुख से निकाला उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता मैं। मेरे लिए उसने जितना त्याग और जितना समझौता किया है उतना इस संसार में दूसरा कोई नहीं कर सकता। मैं इस जन्म में ही नहीं बल्कि अपने हर जन्म में उसका ऋणी रहूंगा। अक्सर सोचता हूं कि मेरे जैसे इंसान के नसीब में ऊपर वाले ने इतनी अच्छी लड़कियां क्यों लिखी थी? भला मैंने अपने जीवन में कौन से ऐसे अच्छे कर्म किए थे जिसके चलते मुझे रूपा और अनुराधा जैसी प्रेम करने वाली लड़कियां नसीब हुईं?"

"ऊपर वाले की लीला वही जाने वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"हम इंसान तो बस यही कह सकते हैं कि ये सब किस्मत की ही बातें हैं। ख़ैर छोड़ो और ये बताओ कि अब क्या सोचा है तुमने? मेरा मतलब है कि क्या तुम अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए राज़ी हो?"

"सच कहूं तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा भाई।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"जब से मां के द्वारा इस सच का पता चला है तब से मन में यही सब चल रहा है। कल तक मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था और शायद यही वजह थी कि कल चंदनपुर में मैं अपनी भाभी से बात भी कर सका था। मगर अब ये सब जानने के बाद उनसे बात करने की तो दूर उनसे नज़रें मिलाने की भी हिम्मत नहीं कर पाऊंगा। जाने क्या क्या सोच रहीं होंगी वो मेरे बारे में?"

"मुझे लगता है कि तुम बेकार में ही ये सब सोच रहे हो।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं ये मानता हूं कि उनको भी इस रिश्ते के बारे में सोच कर तुम्हारी तरह ही अजीब लग रहा होगा लेकिन यकीन मानों देर सवेर वो भी इस रिश्ते को स्वीकार कर लेंगी। उनके घर वाले उन्हें भी तो समझाएंगे कि उनके लिए क्या सही है और क्या उचित है।"

थोड़ी देर रूपचंद्र से और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद मैं उसे यहीं रहने का बोल कर अपने खेतों की तरफ निकल गया। रूपचंद्र से इस बारे में बातें कर के थोड़ा बेहतर महसूस करने लगा था मैं।




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Sanju@

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अध्याय - 129
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मैं अपने खेतों पर पहुंचा तो भुवन वहीं था। मैंने उसे जीप में बैठाया और वहां से चल पड़ा। रास्ते में मैंने उसे बताया कि हमें कहां और किस काम के लिए जाना है। भुवन ने साथ में भीमा और बलवीर को भी ले चलने की सलाह दी जो मुझे भी उचित लगी। असल में मुझे अंदेशा था कि ये मामला आसानी से निपट जाने वाला नहीं है। ख़ैर जल्दी ही हम दोनों भीमा और बलवीर के घर पहुंचे। वहां से दोनों को जीप में बैठा कर मैं निकल पड़ा।


अब आगे....


सबसे पहले हम मुरारी काका के गांव पहुंचे। मुझे इतने समय बाद आया देख गांव वाले थोड़ा हैरान हुए। मैंने एक बरगद के पेड़ के पास जीप को रोका। पेड़ के चारो तरफ चबूतरा बना हुआ था जिसमें कुछ लोग बैठे हुए थे। हमें देखते ही वो सब चबूतरे से उतर कर ज़मीन में खड़े हो गए और फिर सलाम करने लगे। मैंने भुवन को समझा दिया था कि क्या करना है इस लिए उसने भीमा और बलवीर को इशारा किया। वो दोनों अलग अलग दिशा में चले गए जबकि भुवन उन लोगों से बात करने लगा।

बात करने का तात्पर्य ये पता करना था कि मालती का पति जगन कैसा था और किन लोगों के साथ जुवां खेलता था? जुएं खेलने के लिए उसके पास पैसा किस तरीके से आता था और साथ ही जिन लोगों से उसने कर्ज़ा लिया था वो उससे अपना रुपिया वसूलने के लिए क्या करते थे?

क़रीब बीस मिनट बाद भीमा और बलवीर वापस आए। उन लोगों का काम भी यही था कि वो गांव के अलग अलग लोगों से इस बारे में पूछताछ करें। उन दोनों ने आ कर मुझे वही सब बताया जो भुवन के द्वारा इन लोगों से पता चला था। ये अलग बात है कि अलग अलग लोगों के बताने का तरीका थोड़ा अलग था किंतु मतलब एक ही था।

सारी बातों को समझने के बाद मैंने सबको जीप में बैठने को कहा और फिर चल पड़े हम। मुरारी के गांव से क़रीब डेढ़ दो किलो मीटर पर ही एक दूसरा गांव हिम्मतपुर था। जल्दी ही मेरी जीप हिम्मतपुर में दाख़िल हो गई और उस मकान के सामने रुकी जहां से जगन ने कर्ज़ा लिया था।

हिम्मतपुर गांव ज़्यादा बड़ा नहीं था। आबादी भी ज़्यादा नहीं थी। क़रीब पचास साठ घर थे गांव में। गांव का सबसे संपन्न आदमी था शंकर लाल श्रीवास्तव। गांव में सबसे ज़्यादा उसी के पास ज़मीनें थीं जिनसे उसे खूब पैदावार होती थी। गांव के लोगों को वो उधारी में अनाज देता था और फिर उसके नियम के अनुसार ग़रीब आदमी अपनी ज़मीन से अनाज उगा कर उसका उधार तो चुकाता ही था किंतु ब्याज के साथ। इसके अलावा उसका मुख्य पेशा लोगों को ब्याज में पैसा देना भी था। लोग मज़बूरी में कर्ज़ लेते थे लेकिन कर्ज़ा चुकाना उनके बस से बाहर हो जाता था। ऐसा इस लिए भी कि ग़रीब आदमी अपनी खुद की ज़रूरतें ही ढंग से पूरी नहीं कर पाता था तो कर्ज़ा कैसे चुकाता? इस चक्कर में ब्याज बढ़ता जाता। ब्याज को चुकाते चुकाते इंसान का कचूमर निकल जाता था। जब समय थोड़ा लम्बा हो जाता था तो शंकर लाल नया नियम लागू कर देता। नए नियम में कर्ज़ चुकाने का समय नियुक्त कर देता था और जब ग़रीब आदमी तय समय पर कर्ज़ा न दे पाता तो वो उनकी पहले से ही गिरवी रखी ज़मीन को अपने कब्जे में कर लेता था। ग़रीब आदमी रोने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। शंकर लाल ने लोगों को डराने धमकाने के लिए बकायदा मुस्टंडे पाल रखे थे।

शंकर लाल के दो बेटे और दो बेटियां थी। दोनों बेटों की शादी हो चुकी थी और दो बेटियों में से एक अभी अविवाहित थी। उसके दोनों बेटे यानि हीरा लाल और मणि लाल अपने बाप के नक्शे क़दम पर ही चल रहे थे।

मकान के सामने एक लंबा चौड़ा मैदान था। उसके बाद पुराने समय का बड़ा सा मकान बना हुआ था जिसकी सामने वाली दीवार पर सिर्फ लकड़ी के मोटे मोटे खम्भे थे जिनमें नक्काशी की हुई थी। उन खंभों के एक तरफ बड़ी सी चौपार थी जिनमें क़रीब पांच मजबूत पलंग बिछे हुए थे जबकि दूसरी तरफ उसका बैठका था। उस बैठके में उसका आसन बना हुआ था जहां पर बैठ कर वो उन लोगों से मिलता था जो लोग उसके पास कर्ज़ लेने आते थे। बैठके से सटी ही एक दीवार थी जिसमें लोहे की मजबूत अलमारी लगभग आधी धंसी हुई थी। उसी अलमारी में उसके बही खातों की जाने कितनी ही मोटी मोटी किताबें रखी हुई थी। उस अलमारी से क़रीब तीन फिट की दूरी पर एक दरवाज़ा था जो एक ऐसे कमरे का था जिसमें उसकी पूंजी रखी हुई होती थी। दरवाज़ा हमेशा एक मजबूत ताले के साथ बंद रहता था जिसकी चाभी सिर्फ उसके पास ही होती थी।

जीप जब मकान के सामने मैदान में पहुंच कर रुकी तो वहां मौजूद उसके मुस्टंडे एकदम से तन कर खड़े हो गए। बैठके में शंकर लाल बैठा हुआ था और उसके पास दो तीन लोग भी थे जो शकल से ही उससे कर्ज़ लेने आए लोग लग रहे थे। शंकर लाल के बगल से उसका बड़ा बेटा हीरा लाल बैठा हुआ था। जीप को देख सबकी नज़रें हमारी तरफ ही केंद्रित हो गईं थी।

शंकर लाल और उसका बेटा उस वक्त चौंके जब उन्होंने जीप से मुझे उतरते देखा। दोनों बाप बेटे एकदम से हड़बड़ा से गए। शंकर लाल ने अपने बेटे को कोई इशारा किया और फिर उठ कर मेरी तरफ लपका। उसका बेटा भी उठ कर मेरी तरफ आने लगा था।

"अरे! छोटे कुंवर आप यहां?" शंकर लाल चेहरे पर खुशी के भाव लाते हुए और ज़ुबान को मीठा बनाते हुए बोला____"धन्य भाग हमारे जो आप खुद चल कर मेरी छोटी सी कुटिया में पधारे। आइए आइए, अंदर आइए।"

"मेरे पास अंदर बैठने का वक्त नहीं है शंकर काका।" मैंने सपाट और स्पष्ट भाव से कहा____"मैं यहां एक ज़रूरी काम से आया हूं और उम्मीद करता हूं कि आप मुझे ज़रा भी निराश नहीं करेंगे।"

"अरे! हुकुम कीजिए छोटे कुंवर।" शंकर लाल फ़ौरन ही अपने दांत निपोरते हुए बोल पड़ा____"मुझे बताइए कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?" कहने के साथ ही वो अपने मुस्टंडों से मुखातिब हुआ____"अरे! बेवकूफों खड़े क्या हो। जाओ चारपाई ले कर आओ छोटे कुंवर के बैठने के लिए और हीरा बेटा तू ज़रा इनके जल पान की फ़ौरन व्यवस्था कर। बड़े लोग हैं ये....बार बार हमारे घर को पवित्र करने नहीं आएंगे।"

शंकर लाल की बात सुनते ही उसका एक मुस्टंडा फ़ौरन ही चारपाई ले आया और चौगान में रख कर उस पर एक गद्दा बिछा दिया। उधर उसका बेटा हीरा भी अंदर की तरफ दौड़ गया था। शंकर लाल ने हाथ जोड़ कर मुझे चारपाई पर बैठने को कहा तो मैं बैठ गया। जबकि भुवन, भीमा और बलवीर मेरे समीप ही बगल से खड़े हो गए।

"और बताइए छोटे कुंवर दादा ठाकुर कैसे हैं?" शंकर लाल ने अपने स्वर को मधुर बनाते हुए पूछा____"काफी समय हो गया उनके दर्शन नहीं हुए। वैसे कुछ समय पहले ख़बर मिली थी आपके साथ हुई दुखद घटना के बारे में।"

"सब किस्मत की बातें हैं काका।" मैंने कहा____"जिसकी किस्मत में जो होना लिखा होता है वो तो होता ही है। आख़िर किसी का अपनी किस्मत पर और ऊपर वाले पर कहां कोई ज़ोर चलता है।"

"हां ये तो सही कहा आपने।" शंकर लाल ने सहसा बेचैन हो कर कहा____"अब क्या कह सकते हैं किंतु जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ। अच्छा अगर आप बुरा न मानें तो क्या मैं आपसे ये पूछने की गुस्ताख़ी कर सकता हूं कि आप यहां मुझ जैसे अदने से व्यक्ति के घर किस उद्देश्य से पधारे हैं?"

शंकर लाल ने ये कहा ही था कि उसका बेटा हीरा आ गया। उसके पीछे एक औरत भी थी। मैंने अंदाज़ा लगाया शायद वो औरत उसकी मां थी। उसने आते ही मुझे सलाम किया। मेरी उम्र से बड़े लोग जब मुझे यूं सलाम करते थे तो मुझे बड़ा अजीब लगता था किंतु क्या कर सकता था। रुद्रपुर के ठाकुरों का इतिहास ही ऐसा रहा है कि लोग झुक कर सलाम किए बिना नहीं रहते थे। ख़ैर हीरा ने बड़े आदर भाव से मुझे जल पान कराया और फिर मेरे साथ आए मेरे लोगों को भी।

मैंने देखा शंकर लाल के चेहरे पर बेचैनी के साथ साथ अब थोड़े चिंता के भाव भी उभर आए थे। शायद वो ये सोच कर चिंता में पड़ गया रहा होगा कि मेरे जैसे चरित्र का लड़का उसके गांव में उसके ही घर आख़िर किस मकसद से आया है? कहीं मेरी नज़र उसकी छोटी बेटी सुषमा पर तो नहीं पड़ गई है? अगर वो वाकई में यही सोच के चिंतित हो उठा रहा होगा तो इसमें उसका कोई दोष नहीं था। मेरे बारे में सब जानते थे इस लिए उनका ऐसा सोच लेना कोई बड़ी बात नहीं थी।

"कहिए छोटे कुंवर और क्या सेवा करें आपकी?" शंकर लाल खुल कर पूछने में शायद झिझक रहा था इस लिए उसने मेरे यहां आने का मकसद जानने के लिए ये तरीका अपनाया।

"सेवा करने की कोई ज़रूरत नहीं है काका।" मैंने उसकी बेचैनी और चिंता को दूर करने के इरादे से कहा____"जैसा कि मैंने आपको बताया था कि मैं यहां एक ज़रूरी काम से आया हूं। असल में मैं आपसे ये जानने आया हूं कि मुरारी के भाई जगन ने कितना कर्ज़ लिया था आपसे? ख़याल रहे, मुझे बिल्कुल सच सच ही बताना क्योंकि झूठ और दोगलापन मुझे ज़रा भी पसंद नहीं है।"

"ज...जगन???" शंकर लाल के साथ साथ उसका बेटा भी ये नाम सुन कर चौका। उधर कुछ पलों तक सोचने के बाद शंकर लाल ने कहा____"अच्छा अच्छा आप उस जगन की बात कर रहे हैं लेकिन....आप उसके कर्ज़ लेने के संबंध में क्यों पूछ रहे हैं कुंवर?"

"क्योंकि आपकी मेहरबानियों के चलते जगन की पत्नी और उसके बच्चे बेघर हो चुके हैं।" मैंने इस बार सख़्त भाव से उसकी तरफ देखते हुए कहा____"अपना कर्ज़ा वसूलने के चक्कर में आपने ज़रा भी ये सोचना गवारा नहीं किया कि एक असहाय औरत बेघर होने के बाद अपने बच्चों को कहां रखेगी और उन्हें क्या खिला कर ज़िंदा रखेगी? क्या आपको लगता है कि ऐसा कर के आपने कोई महान काम किया है? अगर ये महान काम है तो फिर आपको ये भी समझ लेना चाहिए कि जो मैं करता हूं वो इससे भी ज़्यादा महान काम है। क्या आप चाहते हैं कि मैं अपनी महानता आपके ही घर पर दिखाऊं?"

मेरी बातें सुनते ही शंकर लाल सन्नाटे में आ गया। उधर उसका बेटा और पत्नी भी सन्न रह गई थी। फिर जैसे एकदम से उन्हें होश आया। कुछ दूरी पर खड़े उसके मुस्टंडे भी मेरी बातें सुन चुके थे जिसके चलते उन्हें किसी अनिष्ट की आशंका हो गई थी। अतः वो पूरी तरह मुस्तैद नज़र आने लगे थे।

"य...ये आप कैसी बातें कर रहे हैं छोटे कुंवर?" शंकर लाल ने बौखलाए हुए लहजे से कहा____"आपको ज़रूर कोई ग़लतफहमी हुई है। हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया है।"

"ख़ामोश।" मैं एक झटके में चारपाई से उठ कर गुस्से में गुर्रा उठा____"मैंने पहले ही आपको बता दिया है कि मुझे झूठ और दोगलापन ज़रा भी पसंद नहीं है। इस लिए झूठ बोलने की कोशिश मत करना वरना अच्छा नहीं होगा।"

"ये आप ठीक नहीं कर रहे हैं कुंवर।" हीरा लाल नागवारी भरे लहजे से बोला_____"आप मेरे पिता जी से ऐसे लहजे में बात नहीं कर सकते।"

"अभी तुमने मेरा लहजा ठीक से देखा ही नहीं है हीरा लाल।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"मैं अगर अपने लहजे में आ गया तो तुम सोच भी नहीं सकते कि किस तरह का जलजला आ जाएगा तुम सबके जीवन में।"

"च...छोटे कुंवर भगवान के लिए ऐसा न कहें।" मेरी बातों से घबरा कर सहसा उसकी मां बोल पड़ी____"अगर कोई संगीन बात है तो उसे शांति से सुलझा लीजिए।"

"मैं यहां शांति से सुलझाने ही आया था काकी।" मैंने कहा____"लेकिन आपके पति महाशय को शायद शांति से बात करना पसंद नहीं है बल्कि झूठ बोलना पसंद है। इन्हें लगता है कि मुझे कुछ पता ही नहीं है।"

"मु...मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे कुंवर।" शंकर लाल सहसा हाथ जोड़ कर बोल पड़ा____"पता नहीं कैसे मेरे मुंह से झूठ निकल गया? हां, ये सच है कि मुरारी के भाई जगन ने मुझसे कर्ज़ा लिया था और एक बार नहीं बल्कि चार चार बार लिया था। मैंने भी उसकी ज़मीनों को हड़पने की नीयत से कर्ज़ा दे दिया था। दोनों भाईयों की ज़मीनें नहर के पास हैं जिसके चलते उनमें फसल अच्छी होती है। अगर ऐसा न होता तो मैं बार बार उसे कर्ज़ा नहीं देता। मैं जानता था कि जुवां खेलने वाला जगन कभी कर्ज़ा नहीं चुका सकेगा और अंत में वही होगा जो मैं चाहता था। तय समय पर जब उसने कर्ज़ा नहीं लौटाया तो मैंने जबरन उसके खेतों पर कब्ज़ा कर लिया और फिर कागज़ातों पर उसका अंगूठा लगवा लिया।"

"और जब इतने पर भी तुम्हें तसल्ली नहीं हुई तो तुमने उसके बीवी बच्चों को उनके ही घर से निकाल दिया?" मैंने सख़्त नज़रों से उसकी तरफ देखते हुए कहा____"उसके बीवी बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया तुमने। एक बार भी तुम्हें तरस न आया कि बेसहारा हो जाने के बाद उनका क्या होगा?"

शंकर लाल ने सिर झुका लिया। उसके बेटे हीरा लाल से भी मानों कुछ कहते ना बन पड़ा था। उधर शंकर लाल की पत्नी कभी अपने पति को देखती तो कभी अपने बेटे को। उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव थे।

"ऐसी ज़मीन जायदाद और धन संपत्ति का क्या करोगे काका जिसे मरने के बाद अपने साथ ले कर ही नहीं जा सकोगे?" मैंने कहा____"लोगों की मज़बूरी का फ़ायदा उठा कर जो तुम पाप कर रहे हो ना असल में यही तुम्हारी कमाई है। इसी कमाई हुई दौलत को ले कर तुम ऊपर वाले के पास जाओगे और इतना तो तुम्हें भी पता है कि पाप की गठरी लिए जब इंसान ऊपर वाले के पास जाता है तो ऊपर वाला उसके साथ कैसा सुलूक करता है। ख़ैर तुम्हें तो ईश्वर ने पहले से ही इतना संपन्न बना रखा है तो फिर क्यों ऐसे कर्म करते हो? ईश्वर ने दिया है तो उससे ग़रीब इंसानों का भला करो। भला करने से ग़रीबों की दुआएं मिलेंगी, पुण्य होगा। वही दौलत ऊपर वाले के पास पहुंचने पर तुम्हारे काम आएगी।"

"आप बिल्कुल सही कह रहे हैं छोटे कुंवर।" शंकर लाल की बीवी ने अधीरता से कहा____"लेकिन इन बाप बेटों को कभी समझ नहीं आएगा। मैं तो इन्हें समझा समझा कर थक गई हूं। ये तो मुझे डरा धमका कर चुप ही करा देते हैं। अच्छा हुआ जो आज आप यहां आ गए और इनकी अकल ठिकाने लगा दी।"

"मैं ये नहीं कहता काकी कि जगन से इन्हें अपना कर्ज़ा नहीं उसूलना चाहिए था।" मैंने कहा____"वो तो इनका हक़ था क्योंकि उन्होंने उसे दिया था लेकिन जगन के गुज़र जाने के बाद उसके बीवी बच्चों को बेघर नहीं करना चाहिए था। ऐसा करना तो हद दर्जे का गुनाह होता है। हम भी ग़रीबों को कर्ज़ा देते हैं लेकिन हमने आज तक कभी किसी को नहीं सताया बल्कि हमेशा ऐसा होता है कि हम कर्ज़ा ही माफ़ कर देते हैं। मेरे पिता जी कभी किसी ग़रीब को तड़पते हुए नहीं देख सकते।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे कुंवर।" शंकर लाल ने कहा____"अब से ऐसा नहीं होगा। मुझे समझ आ गया है कि मैंने ऐसा कर के अब तक कितना अपराध किया है। मैं आज और अभी जगन का कर्ज़ा माफ़ करता हूं और उसका जो घर मैंने अपने क़ब्जे में लिया है उसे भी मुक्त करता हूं।"

"नहीं काका।" मैंने कहा____"सिर्फ घर ही नहीं बल्कि उसकी ज़मीनें भी। मुझे बताओ कितना कर्ज़ा होता है उसका?"

"अब आपसे झूठ नहीं बोलूंगा।" शंकर लाल थोड़ा झिझकते हुए बोला____"यही कोई इक्कीस हज़ार के क़रीब उसका ब्याज समेत कर्ज़ा होगा।"

"ठीक है।" मैंने अपनी जेब से रुपयों की एक गड्डी निकाली और उसमें से इक्कीस हज़ार निकाल कर शंकर लाल की तरफ बढ़ाते हुए कहा____"ये लो इक्कीस हज़ार और इसी वक्त अपने बही खाते से जगन के नाम का खाता खारिज़ करो।"

शंकर लाल ने कांपते हाथों से रुपए लिए और फिर पलट कर बैठके की तरफ चला गया। कुछ ही देर में वो बही खाते की मोटी सी किताब ले कर मेरे पास आ गया। मेरे सामने ही उसने वो किताब खोली। पन्ने पलटते हुए वो जल्द ही जगन के खाते पर पहुंचा और फिर क़लम से उस खाते पर कई आड़ी तिरछी लकीरें खींच दी। यानि अब जगन का खाता खारिज़ हो चुका था। उसके बाद वो फिर से वापस गया और इस बार कोठरी से कागज़ात ले कर आया।

"ये लीजिए कुंवर।" फिर उसने उन कागज़ातों को मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा____"ये जगन की ज़मीनों के वो कागज़ात हैं जिनमें मैंने उसका अंगूठा लगवाया था।"

कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद मैं अपनी जीप में आ कर बैठ गया। मेरे बैठते ही भुवन, भीमा और बलवीर भी बैठ गए। अगले ही पल जीप लंबी चौड़ी चौगान में घूमने के बाद सड़क की तरफ बढ़ती चली गई।

"मुझे आपसे ये उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी पिता जी कि आप उससे इतना घबरा जाएंगे।" हीरा लाल ने अपने पिता से कहा____"और इतनी आसानी से उसके सामने हथियार डाल कर वही करने लग जाएंगे जो वो चाहता था। आपने ऐसा क्यों किया पिता जी?"

"अगर मैं ऐसा न करता तो बहुत बड़ी मुसीबत हो जाती बेटे।" शंकर लाल ने कहा____"वो दादा ठाकुर का बेटा ज़रूर है लेकिन अपने पिता की तरह वो नर्म मिज़ाज का हर्गिज़ नहीं है। मैंने अक्सर सुना है कि उसके आचरण बिल्कुल बड़े दादा ठाकुर जैसे हैं। जिस लड़के पर उसके अपने पिता का कोई ज़ोर नहीं चलता उस पर किसी और का ज़ोर कैसे चल सकता है? इस लिए ऐसे ख़तरनाक लड़के से दुश्मनी मोल लेना बुद्धिमानी नहीं थी बेटा। क्या हुआ अगर जगन की ज़मीनें हमारे हाथ से निकल गईं, कर्ज़ का रुपिया तो हमें मिल ही गया है उससे। अभी जीवन बहुत शेष है मेरे बेटे और गांव में बहुत से ग़रीब अभी बाकी हैं जिनके पास ज़मीनें हैं और इतना ही नहीं जो किसी न किसी मज़बूरी के चलते हमसे कर्ज़ा लेने आएंगे ही।"

"शायद आप सही कह रहे हैं पिता जी।" हीरा लाल अपने पिता की बातों को समझ कर हौले से मुस्कुराते हुए बोला____"सच में हमें ऐसे ख़तरनाक लड़के से दुश्मनी नहीं मोल लेना चाहिए था।"

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भुवन, भीमा और बलवीर को वापस उनके यथा स्थान पर छोड़ने के बाद मैं सीधा मुरारी काका के घर पहुंचा। घर के बाहर जीप रोक कर मैं उतरा और दरवाज़े के पास आ कर अभी खड़ा ही हुआ था कि तभी दरवाज़ा खुल गया। सामने रूपा नज़र आई जो मुझे देखते ही खुश हो गई।

घर के अंदर दाख़िल हो कर मैं आंगन में आ गया। सब लोग आंगन में ही बैठे हुए थे किंतु मुझे आया देख सब खड़े हो गए। सरोज और मालती के चेहरों पर उत्सुकता के भाव थे। दोनों को बारी बारी से देखने के बाद मैं सीधा मालती के क़रीब पहुंचा।

"काकी, ये रहे तुम्हारी ज़मीनों के वो कागज़ात जिनमें साहूकार शंकर लाल ने तुम्हारे पति जगन से अंगूठा लगवाया था।" मैंने कागज़ातों को मालती की तरफ बढ़ाते हुए कहा____"चाहो तो इन्हें रखे रहना या फिर जला देना और हां, अब तुम अपने बच्चों के साथ अपने घर में भी रह सकती हो। अब वो लोग तुम्हें कभी परेशान नहीं करेंगे।"

मालती ने ये सुना तो उसकी आंखें छलक पड़ीं। एकाएक वो मेरे पैरों में गिर पड़ी और फिर रोते हुए बोली____"तुम धन्य हो छोटे कुंवर। तुमने इतना कुछ हो जाने के बाद भी मेरा और मेरे बच्चों का भला किया। मैं जीवन भर तुम्हारे पांव धो कर भी पीती रहूं तब भी तुम्हारा ये एहसान नहीं चुका सकूंगी।"

"अरे! ये क्या कर रही हो काकी?" मैं उससे दूर हटते हुए बोला____"तुम्हें ये सब करने और कहने की ज़रूरत नहीं है। अपने घर में अपने बच्चों के साथ बेफ़िक्र हो कर रहो। अब तुम्हारे ऊपर किसी का कोई कर्ज़ा नहीं है इस लिए अपने खेतों पर आराम से फसल उगा कर जीवन यापन करो।"

कहने के साथ ही मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा____"ये कुछ पैसे भी रख लो। इससे अपनी थोड़ी बहुत ज़रूरतें पूरी कर लेना।"

मालती ने कांपते हाथों से पैसे ले लिए। उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन खुशी के। वो मुझे इस तरह देखे जा रही थी जैसे मैं कोई फ़रिश्ता था जिसने एक ही पल में उसकी सारी समस्याओं का अंत कर दिया था। ख़ैर मैंने रूपा को चलने का इशारा किया और पलट कर दरवाज़े की तरफ बढ़ा ही था पीछे से सरोज काकी की आवाज़ सुन कर ठिठक गया।

"मुझे माफ़ कर दो वैभव।" फिर वो मेरे सामने आ कर बोली____"पिछले कुछ समय से तुम्हारे प्रति मेरा बर्ताव अच्छा नहीं था। मैंने तुम्हारे बारे में जाने क्या क्या सोच लिया था और बोल भी दिया था। मेरे मन में जाने कैसे ये बात बैठ गई थी कि तुम मनहूस हो और इसी लिए मेरी बेटी आज इस दुनिया में नहीं है। मैं भूल गई थी कि इंसान का जीना मरना तो ऊपर वाले की मर्ज़ी से होता है। मुझ अभागन को माफ़ कर दो बेटा।"

"तुम्हें माफ़ी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है काकी।" मैंने कहा____"तुमने मेरे बारे में अगर ऐसा सोच लिया था तो ग़लत नहीं सोच लिया था। तुम्हारी जगह कोई भी होता तो शायद ऐसा ही सोचता। ख़ैर, ये मत समझना कि अनुराधा के ना रहने से तुमसे या तुम्हारे घर से मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा, बल्कि ये रिश्ता तो हमेशा बना रहेगा। जब तक तुम्हारा बेटा बड़ा हो कर तुम्हारी ज़िम्मेदारी उठाने के लायक नहीं हो जाता तब तक तुम दोनों की ज़िम्मेदारी मेरी ही रहेगी। चलता हूं अब।"

कहने के साथ ही मैं दरवाज़े के बाहर निकल गया। मेरे पीछे पीछे रूपा भी आ गई थी। थोड़ी ही देर में हम दोनों जीप में बैठे अपने मकान की तरफ बढ़े चले जा रहे थे।

"मालती काकी के इस काम में तुम्हें कोई समस्या तो नहीं हुई ना?" रास्ते में रूपा ने मुझसे पूछा____"सब कुछ बिना किसी वाद विवाद के ही हो गया था न?"

"हां।" मैंने कहा____"उनकी इतनी औकात नहीं थी कि वो मुझे खाली हाथ वापस लौटा देते।"

"मुझे तो बड़ी घबराहट हो रही थी कि जाने वहां क्या होगा?" रूपा ने गंभीर हो कर कहा____"जल्बाज़ी में मैं ये भी भूल गई थी कि मुझे इस तरह तुम्हें ख़तरे में नहीं डालना चाहिए था। आख़िर किसी सफ़ेदपोश का ख़तरा तो है ही तुम्हें जो न जाने कब से तुम्हारी जान का दुश्मन बना बैठा है।"

"फ़िक्र मत करो।" मैंने कहा____"सफ़ेदपोश ऐसी चीज़ नहीं है जो सच्चे मर्द की तरह दिन के उजाले में सामने से आ कर मेरा सामना करे।"

"जो भी हो लेकिन हमें बिना सोचे समझे ऐसा क़दम नहीं उठाना चाहिए था।" रूपा ने सहसा भारी गले से कहा____"अगर आज तुम्हारे साथ कुछ उल्टा सीधा हो जाता तो मैं जीते जी मर जाती।"

"अरे! ऐसा कुछ नहीं होता?" मैंने कहा____"तुम बेकार में ये सब मत सोचो।"

"नहीं, आज के बाद मैं कभी तुम्हें इस तरह के कामों को करने को नहीं कहूंगी।" रूपा ने नम आंखों से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"सारी दुनिया का दुख दूर करने का ठेका नहीं लिया है तुमने। जिसके साथ जो होना है होता रहे, सबको अपने भाग्य के अनुसार ही सुख दुख मिलता है। उसके लिए तुम्हें अपनी जान को मुसीबत में डालने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

मैंने इस बार कुछ न कहा। थोड़ी ही देर में जीप मकान के बाहर पहुंच गई। हम दोनों अपनी अपनी तरफ से नीचे उतरे। एकाएक ही मेरी घूमती हुई नज़र एक जगह जा कर ठहर गई।

मकान की चौकीदारी करने वाले दोनों मज़दूर मकान के बाहर खाली मैदान में लकड़ी की चार मोटी मोटी बल्लियां गाड़ रहे थे। मैंने आवाज़ लगा कर पूछा कि वो क्या कर रहे हैं तो दोनों ने जवाब दिया कि वो घोंपा बना रहे हैं ताकि उसमें बैठ कर आस पास नज़र रख सकें। इसी तरह का एक घोंपा मकान के पिछले भाग में भी बना दिया था दोनों ने। मैं ये सोचने पर मजबूर हो गया कि मेरी और मकान की सुरक्षा के लिए वो दोनों क्या क्या सोचते रहते हैं। दोनों की ईमानदारी पर मुझे बड़ा ही फक्र हुआ।




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अध्याय - 130
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दो हफ़्ते ऐसे ही गुज़र गए।
इन दो हफ़्तों में काफी कुछ बदलाव आ गया था। रूपा ने जिस तरह से मेरा ख़याल रखा था और जिस तरह से मेरा मनोबल बढ़ाया था उसके चलते मैं अब काफी बेहतर महसूस करने लगा था। अनुराधा की यादें मेरे दिल में थीं और जब भी उसकी याद आती थी तो मैं उदास सा हो जाता था लेकिन रूपा हर बार मुझे सम्हाल लेती थी। पिछले कुछ दिनों से हमारे बीच अच्छा ताल मेल हो गया था। अब मैं उससे किसी बात के लिए संकोच नहीं करता था। वो जब भी शरारतें करती तो मैं भी उसे छेड़ देता था। कहने का मतलब ये कि हम दोनों एक दूसरे से काफी सहज हो गए थे।

सरोज काकी भी अब पहले से काफी बेहतर थी। रूपा हर रोज़ उसके घर जाती थी और उसकी बेटी बन कर उसका ख़याल रखती थी। सरोज भी उसे अब खुल कर स्नेह करने लगी थी। उसका बेटा अनूप रूपा से काफी घुल मिल गया था। रूपा उसे अक्सर पढ़ाती थी और कहती थी कि अगले साल से वो विद्यालय में पढ़ेगा।

उधर मालती भी अपने बच्चों के साथ अपने घर में रहने लगी थी और अपने खेतों पर मेहनत करने लगी थी। इस काम में उसकी बड़ी और मझली बेटी भी उसकी मदद करतीं थी।

कहते हैं वक्त अगर किसी तरह का दुख देता है तो उस दुख को दूर करने का कोई न कोई इंतज़ाम भी करता है। देर से ही सही लेकिन इंसान अपने दुख और अपनी तकलीफ़ों से उबर कर जीवन में आगे बढ़ ही जाता है। सबकी तकलीफ़ें पूरी तरह भले ही दूर नहीं हुईं थी लेकिन काफी हद तक सामान्य हालत हो गई थी।

इधर मैं हर रोज़ अपने वचन को निभाते हुए हवेली में मां से मिलने जाता था जिससे मां भी खुश रहतीं थीं। भाभी को अपने मायके गए हुए पंद्रह दिन हो गए थे। मैं हर रोज़ मां से उनके बारे पूछता था कि वो कब आएंगी? जवाब में मां यही कहतीं कि उन्हें अपने माता पिता के पास कुछ समय रहने दो।

इधर पिता जी आज कल बहुत भाग दौड़ कर रहे थे। हर रोज़ मुंशी किशोरी लाल के साथ किसी न किसी काम से निकल जाते थे। सुरक्षा के लिए शेरा उनके साथ ही साए की तरह रहता था।

रूपचंद्र हर दिन अपनी बहन से मिलने दूध देने के बहाने आता था। अपनी बहन को मेरे साथ खुश देख वो भी खुश था। ज़ाहिर है वो सारी बातें अपने घर वालों को भी बताता था जिसके चलते उसके घर वाले भी खुश और बेफ़िक्र थे। उन्हें बस इसी बात की चिंता थी कि क्या होगा उस दिन जब मुझे, भाभी को और रूपा को कुल गुरु की भविष्यवाणी के बारे में पता चलेगा? रूपा के बारे में तो उन्हें यकीन था कि उसे कोई समस्या नहीं होगी किंतु इस बारे में मेरी और भाभी की क्या प्रतिक्रिया होगी यही सबसे बड़ी चिंता की बात थी सबके लिए।

अपने संबंधों को लोगों की नज़र में बेहतर दिखाने के लिए अक्सर दादा ठाकुर और गौरी शंकर एक साथ कहीं न कहीं जाते हुए लोगों को नज़र आते जिसके चलते लोग आपस में दबी ज़ुबान में कुछ न कुछ बोलते थे। हालाकि जैसे जैसे दिन गुज़र रहे थे लोगों की सोच और राय बदलती जा रही थी। इसी बीच पिता जी एक दिन गौरी शंकर के साथ उसकी परेशानी को दूर करने के लिए उस गांव में गए जहां पर गौरी शंकर के बड़े भाईयों की बेटियों का रिश्ता हुआ था। पिता जी के साथ रहने का ही ऐसा असर हुआ था कि उन लोगों ने फ़ौरन ही रिश्ते को फिर से बनाने के लिए हां कह दिया था। ये देख गौरी शंकर बड़ा खुश हुआ था। उसे पहले से ही इस बात का यकीन था कि दादा ठाकुर का अगर दखल हो गया तो उसकी ये सबसे बड़ी समस्या चुटकियों में दूर हो जाएगी और वही हुआ भी था। गौरी शंकर ने जब ये खुश ख़बरी अपने घर की औरतों को सुनाई तो पूरे घर में दर्द मिश्रित ख़ुशी का माहौल छा गया था।

ऐसे ही एक दिन जब मैं रूपा को सरोज के घर से वापस मकान की तरफ ला रहा था तो रूपा को थोड़ा उदास देखा। आम तौर पर वो जब भी मेरे साथ होती थी तो खुश ही रहती थी लेकिन आज उसके चेहरे पर उदासी थी। मैं जानता था कि पिछले बीस दिनों से वो मेरे साथ यहां रह रही थी और अपने घर नहीं गई थी। यूं तो हर रोज़ ही वो अपने भाई से मिलती थी लेकिन बाकी घर वालों से वो नहीं मिली थी। मैं समझ सकता था कि उसकी उदासी का कारण शायद यही था।

"क्या हुआ?" मैंने अंजान बनते हुए उससे पूछा____"तुम उदास नज़र आ रही हो आज? क्या कुछ हुआ है अथवा कोई ऐसी बात है जिसके चलते तुम उदास हो गई हो?"

"ऐसी कोई बता नहीं है।" उसने अनमने भाव से जवाब दिया____"अपने प्रियतम के साथ हूं तो भला मैं क्यों उदास होऊंगी?"

"झूठ मत बोलो।" मैंने कहा____"मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुम किसी बात से उदास हो। तुम्हारे चेहरे पर आज वैसा नूर नहीं दिख रहा जैसे हर रोज़ दिखता है। बताओ ना क्या बात है? क्या घर वालों की बहुत याद आती है?"

"हां थोड़ी सी आती है।" रूपा ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा____"ख़ैर जाने दो, देखो हम पहुंच गए अपने घर।"

जीप जैसे ही रुकी तो रूपा अपनी तरफ से उतर गई और फिर बोली____"मैं चाय बनाती हूं, तब तक तुम हाथ मुंह धो लो।"

इतना कह कर वो चली गई किंतु मैं अब सोच में पड़ गया था। आज उसके चेहरे की उदासी देख कर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। अचानक ही ये सोच कर बुरा लगने लगा था कि मेरी वजह से वो कितना कुछ सह रही थी। पिछले बीस दिनों से वो मेरा एक बीवी की तरह ख़याल रख रही थी। अपने और मेरे कपड़े धोना, मेरी छोटी से छोटी बात का ख़याल रखना। मेरे हिस्से के काम भी वो ख़ुद ही कर रही थी। एक साथ रहने पर भी हमने अपनी मर्यादा भंग नहीं की थी और ना ही उसने कभी इसकी तरफ मेरा ध्यान आकर्षित किया था। हम दोनों ही नहीं चाहते थे कि हम अपने घर वालों के भरोसे को तोड़ कोई नाजायज़ क़दम उठाएं।

ख़ैर, एकदम से मुझे एहसास हुआ कि अंजाने में ही मेरे ऊपर उसके कितने एहसास हो गए हैं जिन्हें चुका पाना शायद ही कभी मुमकिन हो सकेगा।

जीप से उतर कर मैं गुसलखाने की तरफ चला गया। वहां से हाथ मुंह धो कर आया और अंदर ही चला गया। अंदर रूपा चूल्हे के पास बैठी चाय बना रही थी। मुझे आया देख उसके सूखे लबों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। मैं कुर्सी को खिसका कर उसके पास ही बैठ गया। उसने चाय छान कर कप में डाली और मेरी तरफ बढ़ा दिया।

"कल सुबह अपना सामान समेट कर थैले में डाल लेना।" मैंने उसके हाथ से चाय का कप लेने के बाद कहा____"कल सुबह तुम्हें वापस अपने घर जाना है।"

"य...ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपा मेरी बात सुन कर चौंकी____"क्या मुझसे कोई भूल हो गई है? क्या मेरे यहां रहने से तुम्हें तकलीफ़ होती है?

"ऐसी कोई बात नहीं है रूपा।" मैंने कहा____"बल्कि सच ये है कि अब मैं और ज़्यादा तुम्हें तकलीफ़ नहीं दे सकता। मेरी बेहतरी के लिए तुम पिछले बीस दिनों से अपना घर परिवार छोड़े मेरे साथ हो और मेरा हर तरह से ख़याल रख रही हो। इस लिए अब बहुत हुआ, मैं अब बिल्कुल ठीक हूं। मेरा ख़याल रखने के लिए तुमने इतने दिनों से इतना कुछ सहा है और मैंने एक बार भी तुम्हारी तकलीफ़ों के बारे में नहीं सोचा। मुझे अब जा कर एहसास हो रहा है कि कितना स्वार्थी हूं मैं।"

"तुम ये कैसी बातें कर रहे हो वैभव?" रूपा ने आहत भाव से कहा____"मैंने जो कुछ किया है वो मेरा फर्ज़ था, मेरा कर्तव्य था। तुम कोई ग़ैर नहीं हो, मेरे अपने हो। मेरे दिल के सरताज हो, मेरे सब कुछ हो। अपने महबूब के लिए मैंने जो भी किया है उससे मुझे अत्यंत खुशी मिली है और मैं चाहती हूं कि सारी ज़िंदगी मैं इसी तरह अपने दिलबर की सेवा करूं।"

"ठीक है, लेकिन मेरा भी तो कोई फर्ज़ होता है।" मैंने कहा____"तुम मुझसे प्रेम करती हो तो मेरे दिल में भी तो तुम्हारे प्रति वैसी ही भावनाएं हैं। मैं भी चाहता हूं कि जो लड़की मुझे इतना प्रेम करती है और मेरा इतना ख़याल रखती है उसकी ख़ुशी के लिए मैं भी कुछ करूं। उसे बहुत सारा प्यार करूं और उसे अपनी धड़कन बना लूं।"

"हां तो बना लो ना।" रूपा के चेहरे पर एकाएक ख़ुशी की चमक उभर आई____"मैंने कब मना किया है कि मुझे प्यार ना करो अथवा मुझे अपनी धड़कन न बनाओ? अरे! मैं तो कब से तरस रही हूं अपने दिलबर की आगोश में समा जाने के लिए।"

"आगोश में समाने का अभी वक्त नहीं आया है जानेमन।" मैंने सहसा मुस्कुराते हुए कहा____"जिस दिन आएगा उस दिन देखूंगा कि कितनी तड़प है तुम्हारे अंदर। फिलहाल तो मैं ये चाहता हूं कि तुम अपने घर जाओ और अपने परिवार के लोगों से मिलो।"

"हाय! मेरा महबूब कितना ज़ालिम है क्या करूं?" रूपा ने ठंडी आह सी भरी____"ख़ैर कोई बात नहीं सरकार। जब इतना इंतज़ार किया है तो थोड़ा समय और सही।"

"आज यहां पर तुम्हारी आख़िरी रात है।" मैंने कहा____"कल सुबह मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊंगा।"

"तो क्या तुम यहीं रहोगे?" रूपा ने हैरानी से देखा मुझे____"क्या हवेली नहीं जाओगे तुम? देखो, अगर तुम ऐसा करने का सोच रखे हो तो फिर मैं भी अपने घर नहीं जाऊंगी। यहीं रहूंगी, तुम्हारे साथ।"

"अब ये क्या बात हुई?" मैंने कहा____"देखो, अब तुम्हें मेरे साथ यहां रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम्हारे प्रयासों से और तुम्हारे सच्चे स्नेह के चलते मैं अब बिल्कुल ठीक हूं। इस लिए तुम्हें अब मेरे साथ रहने की ज़रूरत नहीं है। अब तुम्हारा अपने घर में ही रहना उचित होगा। वैसे भी मेरे खातिर तुमने और तुम्हारे घर वालों ने बहुत बड़ा क़दम उठाया था। ऐसा हर कोई नहीं कर सकता। मुझे ख़ुशी है कि तुमने और तुम्हारे घर वालों ने सच्चे दिल से मेरी बेहतरी के बारे में सोचा। अब मुझे भी ये सोचना चाहिए कि इस सबके चलते गांव समाज के लोग तुम्हारे और तुम्हारे घर वालों के बारे में कोई ग़लत बात न सोचें।"

"मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है।" रूपा ने दृढ़ता से कहा____"और ना ही मेरे घर वालों को है। वैसे भी तुमने तो सुना ही होगा कि जब मियां बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी? जिस दिन हम दोनों शादी के बंधन में बंध जाएंगे और दोनों परिवारों के बीच एक अटूट रिश्ता जुड़ जाएगा तो गांव समाज के लोगों के मुंह अपने आप ही बंद हो जाएंगे।"

"बहुत खूब।" मैंने कहा____"मेरी होने वाली बीवी शादी से पहले ही अपने होने वाले पति से ज़ुबान लड़ाते हुए बहस किए जा रही है। धन्य हो आज की नारी।"

"चिंता मत करो पति देव।" रूपा ने मुस्कुराते हुए कहा____"शादी के बाद आपकी ये बीवी आपको शिकायत का कोई मौका नहीं देगी।"

"क्या पता।" मैंने गहरी सांस ली____"जब शादी के पहले ये हाल है तो बाद में ऊपर वाला ही जाने क्या होगा। तुम्हें पता है मेरी चाची तो एक दिन मुझे चिढ़ा भी रहीं थी कि मैं अभी से जोरु का गुलाम बनने की कोशिश करने लगा हूं।"

"चाची जी से कहना कि उनकी होने वाली बहू उनके बेटे को अपना गुलाम नहीं बनाएगी।" रूपा ने कहा____"बल्कि वो अपने पति की दासी बन कर ही रहेगी।"

"ग़लत बात।" मैंने कहा____"पत्नी को दासी बना के रखना गिरे हुए लोगों की निम्न दर्जे की मानसिकता है। कम से कम ठाकुर वैभव सिंह की मानसिकता ऐसी गिरी हुई हर्गिज़ नहीं हो सकती। सच्चे दिल से प्रेम करने वाली को तो बस अपने हृदय में ही बसा के रखूंगा मैं।"

"फिर तो मैं यही समझूंगी कि जीवन सफल हो गया मेरा।" रूपा ने गदगद भाव से मुझे देखते हुए कहा____"मेरे दिलबर ने इतनी बड़ी बात कह दी। जी करता है अपने महबूब के होठों को चूम लूं।"

"घूम फिर कर तुम्हारी सुई वहीं आ कर अटक जाती है।" मैंने उसे घूर कर देखा____"बहुत बिगड़ गई हो तुम।"

"क्या करें जनाब?" रूपा ने शरारत से कहा____"तुम सुधरने की राह पर चल पड़े और हम बिगड़ने की राह पर। है ना कमाल की बात?"

"कमाल की बच्ची रुक अभी बताता हूं तुझे।" कहने के साथ ही मैं उसकी तरफ झपटा तो वो चाय का कप छोड़ अंदर कमरे की तरफ भाग चली। मैं भी उसके पीछे लपका।

रूपा मेरे कमरे में दाख़िल हो कर अभी दरवाज़े को बंद ही करने जा रही थी कि मैंने दरवाज़े पर अपने दोनों हाथ जमा दिए जिससे रूपा दरवाज़े को पूरी ताक़त लगाने के बावजूद भी बंद न कर सकी। उसकी हंसी और चीखें पूरे मकान में गूंजने लगीं थी। मैंने थोड़ी सी ताक़त लगा कर उसे पीछे धकेला और कमरे के अंदर दाख़िल हो गया। उधर रूपा ने जब देखा कि मैं अंदर आ गया हूं तो वो पलट कर पीछे की तरफ भागी किंतु ज़्यादा देर तक वो मुझसे भाग न सकी। जल्दी ही मैंने उसे पकड़ लिया। रूपा थोड़ी सी ही भाग दौड़ में बुरी तरह हांफने लगी थी। जैसे ही मैंने उसे पकड़ा तो एकाएक उसने खुद को मेरे हवाले कर दिया।

"अब दिखाऊं मैं अपना कमाल?" मैंने उसके दोनों हाथों को पकड़ कर ऊपर दीवार में सटाते हुए कहा तो दीवार में पीठ के बल चिपकी रूपा ने मेरी आंखों में देखते हुए बड़ी मोहब्बत से कहा____"हां दिखाओ ना।"

रूपा अपलक मुझे ही देखने लगी थी। उसकी सांसें भारी हो चलीं थी जिसके चलते उसके सीने के उभार ऊपर नीचे हो रहे थे। उसके खूबसूरत चेहरे पर पसीने की बूंदें किसी शबनम की तरह झिलमिला रहीं थी। आज उसे इतने क़रीब से देख मैं खोने सा लगा लेकिन फिर जल्दी ही मैंने खुद को सम्हाला और उसको छोड़ कर उससे थोड़ा दूर हो गया।

"क्या हुआ?" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"डर गए क्या मुझसे?"

"डर नहीं गया हूं।" मैंने थोड़ा संजीदा हो कर कहा____"लेकिन ये सही नहीं है। हम दोनों को अपनी सीमाओं का भी ख़याल रहना चाहिए। हम दोनों के घर वालों ने यही विश्वास कर रखा होगा कि हम ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे जिसके चलते मर्यादा का उल्लंघन हो और समाज के लोग तरह तरह की बातें करने लगें।"

"हां मैं समझती हूं।" रूपा ने भी खुद को सम्हालते हुए गंभीर हो कर कहा____"और सच कहूं तो मेरा भी ऐसा कोई इरादा नहीं था। मैं तो बस तुम्हें छेड़ रही थी। अगर तुम्हें इस सबसे बुरा लगा हो तो माफ़ कर दो मुझे।"

"अरे! माफ़ी मत मांगो तुम।" मैंने कहा____"मुझे पता है कि तुम बस नोक झोंक ही कर रही थी। ख़ैर छोड़ो, आओ अब चलें। हम दोनों की चाय ठंडी हो गई होगी।"

"चलो मैं फिर से गर्म कर देती हूं।" कहने के साथ ही रूपा दरवाज़े की तरफ बढ़ चली। मैं भी उसके पीछे पीछे बाहर आ गया।

रात को खाना खाने के बाद हम दोनों कमरे में आ गए। रूपा अपना सामान इकट्ठा करने लगी और फिर उन्हें एक थैले में रखने लगी। उसके ज़ोर देने पर मैं भी हवेली जाने के लिए तैयार हो गया था। अपना सामान थैले में डालने के बाद वो मेरे कपड़े भी समेटने लगी। थोड़ी ही देर में सामान को एक जगह रखने के बाद वो नीचे ज़मीन में बिछे बिस्तर पर लेट गई। कुछ देर इधर उधर की बातें हुईं उसके बाद हम दोनों सोने की कोशिश करने लगे। रात देर से निदिया रानी ने आ कर हमें अपनी आगोश में लिया।

✮✮✮✮

सुबह क़रीब आठ बजे हम दोनों मकान से निकलने ही वाले थे कि रूपचंद्र डल्लू में दूध लिए आ गया। मुझे जीप में सामान रखते देख वो एकदम से चौंक पड़ा। उसके पूछने पर मैंने बताया कि मैं आज से हवेली में ही रहूंगा इस लिए वो भी अपनी बहन को ले कर घर जाए। पहले तो रूपचंद्र को लगा कि उसकी बहन और मेरे बीच कोई झगड़ा हो गया है जिसके चलते मैं ऐसा कह रहा हूं किंतु फिर उसे यकीन हो गया कि ऐसी कोई बात नहीं है। वो सबसे ज़्यादा ये जान कर खुश हुआ कि उसकी बहन की कोशिशें रंग लाईं जिसके चलते अब मैं बेहतर हो गया हूं और इतना ही नहीं ख़ुशी ख़ुशी हवेली भी लौट रहा हूं।

बहरहाल, कुछ ही देर में ज़रूरी सामान रख गया। रूपचंद्र मोटर साईकिल से आया था इस लिए सामान के साथ रूपा को मोटर साईकिल में बैठा कर ले जाना उसके लिए संभव नहीं था। अतः तय ये हुआ कि रूपा अपने सामान को ले कर मेरे साथ जीप में ही चलेगी।

मकान की चौकीदारी कर रहे मज़दूरों को मैंने कुछ ज़रूरी निर्देश दिए और फिर चल पड़ा वहां से। रूपचंद्र अपनी मोटर साईकिल से आगे आगे चला जा रहा था जबकि मैं और रूपा जीप में बैठे उसके पीछे थे। रूपा के चेहरे पर उदासी के भाव थे और वो जाने किन ख़यालों में खो गई थी?

"क्या हुआ?" मैंने उसकी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"अब क्यों उदास नज़र आ रही हो?"

"उदास न होऊं तो क्या करूं?" रूपा ने मेरी तरफ देखा____"इतने दिनों से तुम्हारे साथ रह रही थी तो बड़ा खुश थी लेकिन अब फिर से तुम मुझसे दूर हो जाओगे। इसके पहले तो किसी तरह तुम्हारे बिना रह ही लेती थी लेकिन अब अकेले नहीं रहा जाएगा मुझसे।"

"अच्छा तो ये सोच कर उदास हो?" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा____"अरे! जिसके पास रूपचंद्र जैसा प्यार करने वाला भाई हो उसे किसी बात से उदास होने की क्या ज़रूरत है?"

"हां ये तो है।" रूपा ने उसी उदासी से कहा____"लेकिन इसमें मेरे भैया भी क्या कर सकेंगे?"

"अरे! कमाल करती हो तुम।" मैंने कहा____"क्या तुम इतना जल्दी ये भूल गई कि तुम्हारा भाई तुम्हारी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता है? याद करो कि उसी ने तुम्हें मुझसे मिलाने का इंतज़ाम किया था। मुझे यकीन है कि आगे भी वो तुम्हारी ख़ुशी के लिए ऐसा ही करेगा।"

"हां लेकिन मैं अपने भैया से ये नहीं कह सकूंगी कि मुझे तुम्हारी याद आती है और मैं तुमसे मिलना चाहती हूं।।" रूपा ने कहा____"और लाज शर्म के चलते जब मैं ऐसा कह ही न सकूंगी तो वो भला कैसे कोई इंतज़ाम करेंगे?"

"तो क्या इसके पहले उसने तुम्हारे कहने पर मुझसे मिलवाने का इंतज़ाम किया था?" मैंने पूछा।

"न...नहीं तो।" रूपा ने झट से कहा____"मैंने तो उनसे ऐसा कुछ भी नहीं कहा था।"

"फिर भी उसने तुम्हें मुझसे मिलवाया था ना।" मैंने कहा____"इसका मतलब यही हुआ कि उसे अपनी बहन की चाहत का और उसकी ख़ुशी का बखूबी ख़याल था इसी लिए उसने बिना तुम्हारे कुछ कहे ही ऐसा किया था। यकीन मानो वो आगे भी ऐसा ही करेगा और तुम्हें उससे कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

"हां शायद तुम सही कह रहे हो।" रूपा के चेहरे पर एकाएक ख़ुशी की चमक उभर आई____"मेरे भैया ज़रूर मेरी ख़ुशी के लिए फिर से तुमसे मिलाने का कोई इंतज़ाम कर देंगे। कितने अच्छे हैं ना मेरे भैया?"

"हां।" मैं उसकी आख़िरी बात पर मुस्कुराए बिना न रह सका____"काश! दुनिया की हर बहन के पास तुम्हारे भाई जैसा भाई हो जो अपनी बहन के लिए इतने महान काम करे।"

"अब तुम मेरे भैया पर व्यंग्य कर रहे हो।" रूपा ने मुझे घूरते हुए कहा____"ऐसा कैसे कर सकते हो तुम? तुम्हें अभी पता नहीं है कि मेरे भैया कितने अच्छे हैं।"

"अरे! मैं कहां कुछ कह रहा हूं तुम्हारे भाई को?" मैं उसकी बात से एकदम से चौंक पड़ा____"मैं भी तो वही कह रहा हूं कि तुम्हारा भाई बहुत अच्छा है।"

"अच्छा ये बताओ अब कब मिलोगे?" रूपा ने एकाएक बड़ी उत्सुकता से मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"पहले की तरह मुझे तड़पाओगे तो नहीं ना?"

"एक काम करना तुम।" मैंने कहा____"अगर मैं तुमसे ना मिलूं अथवा अगर तुम्हें तड़पाऊं तो तुम सीधा हवेली आ जाना। वहां तो तुम मुझसे मिल ही लोगी।"

"हाय राम! ये क्या कह रहे हो?" रूपा एकदम से आंखें फैला कर बोली____"न बाबा न, हवेली नहीं आऊंगी मैं। वहां सब लोग होंगे और मुझे इस तरह हवेली में आते देखेंगे तो सब क्या सोचेंगे मेरे बारे में? मैं तो शर्म से ही मर जाऊंगी।"

"अरे! क्या सोचेंगे वो...यही ना कि उनकी होने वाली बहू बिना ब्याह किए ही अपने ससुराल में पधार गई है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"और ऐसा शायद इस लिए कि उनकी होने वाली बहू को अपने होने वाले पति से दूरी सहन नहीं हुई। इस लिए ब्याह होने से पहले ही ससुराल आ गई है।"

"हाय राम! कितने ख़राब हो तुम।" रूपा ने बुरी तरह लजाते हुए और झेंपते हुए कहा____"क्या तुम मुझे ऐसी वैसी समझते हो जो ऐसा कह रहे हो?"

"लो कर लो बात।" मैं उसकी दशा पर मन ही मन हंसते हुए बोला____"मैंने कब तुम्हें ऐसा वैसा समझा?"

"अब बातें न बनाओ तुम।" रूपा ने मुंह बनाते हुए कहा____"अच्छा मज़ाक मत करो और बताओ ना कब मिलोगे? मैं सच कह रही हूं घर में मुझसे अकेले न रहा जाएगा अब।"

"पर रहना तो पड़ेगा ना।" मैंने उसे ज़्यादा परेशान करना ठीक नहीं समझा इस लिए कहा____"हम दोनों को ही समाज के नियमों का पालन करना होगा वरना हम दोनों के ही खानदान पर समाज के लोग कीचड़ उछालने लगेंगे। क्या तुम्हें ये अच्छा लगेगा?"

"हां ये तो तुम सही कह रहे हो।" रूपा ने एकाएक गहरी सांस ली____"लेकिन पिछले बीस दिनों से तो हम दोनों साथ ही रहे हैं। अभी तक तो किसी ने कीचड़ नहीं उछाला हमारे खानदान पर?"

"हो सकता है कि लोगों को इस बारे में पता ही न चला हो।" मैंने कहा____"लेकिन ज़रूरी नहीं कि ऐसी बातें आगे भी लोगों को पता नहीं चलेंगी। तुमने भी सुना ही होगा कि इश्क़ मुश्क ज़्यादा दिनों तक दुनिया वालों से छुपे नहीं रहते।"

"हाय राम! अब क्या होगा?" रूपा मानों हताश हो उठी____"अगर ऐसा है तो फिर कैसे हमारी मुलाक़ात हो पाएगी? मैं सच कह रही हूं, मैं अब अपने कमरे में अकेले नहीं रह पाऊंगी। मुझे तुम्हारी बहुत याद आएगी। आख़िर हमारे मिलने का कोई तो उपाय होगा।"

"फ़िक्र मत करो।" मैंने उसकी हताशा को देखते हुए कहा____"कोई न कोई उपाय सोचूंगा मैं और हां, तुम भी बेकार में खुद को दुखी मत रखना। तुम तो वैसे भी एक महान और बहादुर लड़की हो यार। जब इतने समय तक इतना कुछ सहा है तो थोड़ा समय और सह लेना। हालाकि अब तो दुखी होने जैसी बात भी नहीं है क्योंकि हमारा मिलना ब्याह के रूप में तय ही हो चुका है। इस लिए ख़ुशी मन से उस तय वक्त का इंतज़ार करो। बाकी उसके पहले एक दूसरे से मिलने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लिया जाएगा।"

"ठीक है।" रूपा की हताशा दूर होती नज़र आई____"मैं सम्हाल लूंगी खुद को लेकिन तुम जल्दी ही मिलने का कोई रास्ता निकाल लेना।"

मैंने पलकें झपका कर हां कहा और सामने देखने लगा। जीप गांव में दाख़िल हो चुकी थी। चंद्रकांत का घर आ गया था और उसके बाद रूपा का ही घर था। अचानक रूपा को जैसे कुछ याद आया तो उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा।

"अरे! हां मैं तो भूल ही गई।" फिर उसने जल्दी से कहा____"आते समय मां (सरोज) से नहीं मिल पाई मैं। आज जब मैं उनके घर नहीं पहुंचूंगी तो वो ज़रूर परेशान हो जाएंगी मेरे लिए। मुझे ध्यान ही नहीं रहा था उनसे मिलने का और ये बताने का कि मैं घर जा रही हूं तो अब से उनसे नहीं मिल पाऊंगी।"

"चिंता मत करो।" मैंने कहा____"मैं दोपहर के बाद एक चक्कर लगा लूंगा उसके घर का और उसे बता दूंगा तुम्हारे बारे में। ख़ैर देखो तुम्हारा घर भी आ गया। तुम्हारा भाई घर के बाहर ही सड़क पर खड़ा तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"

कुछ ही पलों में जीप रूपचंद्र के सामने पहुंच कर रुकी। जीप के रुकते ही रूपा चुपचाप उतर गई। उधर रूपचंद्र जीप से रूपा का जो थोड़ा बहुत सामान था उसे निकालने लगा। रूपा ने एक नज़र अपने भाई की तरफ डाली और फिर जल्दी से मेरी तरफ देखा। चेहरे पर जबरन ख़ुशी के भाव लाने का प्रयास कर रही थी वो। उसकी आंखों में झिलमिलाते आंसू नज़र आए मुझे। ये देख मुझे भी अच्छा नहीं लगा। अगर रूपचंद्र न होता तो यकीनन अभी वो मुझसे कुछ कहती। फिर उसने आंखों के इशारों से मुझे समझाने का प्रयास किया कि मैं जल्दी ही उससे मिलने का कोई रास्ता निकाल लूंगा।

थोड़ी ही देर में जब रूपचंद्र जीप से उसका सामान निकाल चुका तो वो थैला लिए मेरे क़रीब आया। मैंने देखा उसके चेहरे पर खुशी तो थी किंतु झिझक के भाव भी थे, बोला____"मेरी बहन से अगर कोई भूल हुई हो तो उसे नादान और नासमझ समझ कर माफ़ कर देना वैभव।"

"ऐसी कोई बात नहीं है भाई।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"सच तो ये है कि भूल तो हमेशा मुझसे हुई है उसकी सच्ची भावनाओं को समझने में। ख़ैर मुझे खुशी है कि उसके जैसी नेकदिल लड़की को ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में लिखा है।"

मेरी बात सुन कर रूपचंद्र के चेहरे पर मौजूद ख़ुशी में इज़ाफा होता नज़र आया। फिर उसने अलविदा कहा और अपनी बहन को ले कर घर के अंदर की तरफ बढ़ता चला गया। उसके जाने के बाद मैंने भी जीप को हवेली की तरफ बढ़ा दिया।

रास्ते में मैं सोच रहा था कि जिस तरह मुझमें बदलाव आया था उसी तरह रूपचंद्र में भी बदलाव आया था। किसी जादू की तरह बदल गया था वो और अब अपनी बहन की ख़ुशी के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार था। ख़ैर यही सब सोचते हुए मैं हवेली पहुंच गया।




━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
वैभव ने मालती को उसकी जमीन वापिस करके बहुत अच्छा काम किया है वह अकेली बेचारी अपने परिवार का पेट भर सकेगी। शंकरलाल वैभव के जाने से डर गया था लेकिन अपनी हरकतों से बाज नहीं आया बाप बेटे फिर से ये आस लगाए हैं कि कोई और गरीब की जमीन हड़प लेंगे। खैर वैभव के बुरे होने का कुछ तो फायदा हुआ शंकरलाल इतना जल्दी मानने वालो में से नही था
वैभव अब पहले से बेहतर हो गया है ये सब रूपा के सच्चे प्यार के कारण हुआ सच में रूपा का प्रेम सच्चा और पवित्र है रूपा और वैभव के बीच प्यार भरी नोकझोक बहुत ही प्यारी और लाज़वाब थी
 

TheBlackBlood

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बिल्कुल सही कहा आपने सूरज भाई । रागिनी भाभी और वैभव का सुहागरात होना ही चाहिए लेकिन मेरी इच्छा है कि वह सुहागरात सीन्स avsji भाई का लिखा हुआ हो। :D
शुभम भाई से एडल्ट सीन्स ठीक तरह से लिखा नही जाता। :D
:doh: Har koi ragini aur vaibhav ki suhagrat ka khwaab dekhne laga hai, is chakkar me man se review nahi de rahe. Suraj13796 Bhai short review dene lage...jaise aupcharikta nibha rahe ho. Umakant007 bhai ki abhi kal hi tareef ki thi to wo bhi shaant ho gaye. Lagta hai ab do ki jagah ek hi update dena padega mujhe.. :roll:


Aap aur avsji bhai man laga kar review chhaap rahe hain, Riky bhai starting me short comment karte the wo ab apne review ko vistaar dene lage hain...joki achhi baat hai. Story apne end ke kareeb hi hai....jid din mood zarurat se zyada sahi hua usi din The End likh kar lapata ho jauanga :smoking:



Aur meri taraf se puri ijazat hai Sanju bhaiya ji ki aap avsji bhaiya ji se suhagrat ke scene likhwaaiye aur aanand lijiye.....jaha tak meri baat hai maine to aisa koi scene likha hi nahi hai. Saaf suthra character thi ragini is liye uski izzat ko ghapaghap likh kar taar taar nahi kiya aur Story end kar di...That's it :declare:

(Meri baato ko anyatha mat lena...Mera intention kisi ki bhavnaao ko thes pahuchana bilkul bhi nahi hai....sadiya sa joke samajh kar :buttkick: laga dena baato ko)
 
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अध्याय - 144
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मैं अवाक सा देखता रह गया मां को। एकाएक ही मेरे मन मस्तिष्क में धमाके से होने लगे थे। अचानक ही ज़हन में वो बातें गूंजने लगीं जो चंदनपुर में कामिनी से हुईं थी और फिर भाभी से हुईं थी। भाभी का उदास और गंभीर चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो गया। उनकी बातें मेरे कानों में गूंजने लगीं।


अब आगे....


ऊपर वाले का खेल भी बड़ा अजब होता है। वो अक्सर कुछ ऐसा कर देता है जिसकी हम इंसान कल्पना भी नहीं किए होते। मैंने सपने में भी कभी ये नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मुझे अपनी ही भाभी से ब्याह करना होगा। अपनी उस भाभी से जिनके प्रति मेरे मन में आदर और सम्मान तो था ही किंतु एक श्रद्धा भाव भी था। एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर विचलित होने लगता था। मुझे डर लगने लगता था कि कहीं इस वजह से मुझसे कोई अनर्थ न हो जाए। यही वजह थी कि मैं हमेशा उनसे दूर दूर ही रहा करता था। उसके बाद कुछ ऐसा हो गया जिसने हम सबको हिला कर ही रख दिया।

बड़े भैया गुज़र गए और मेरी भाभी विधवा हो गईं। उन्हें विधवा के लिबास में देख कर हम सब दुखी हो जाते थे। मेरे अंदर ऐसा बदलाव आया कि उसके बाद कभी मेरे मन में उनके प्रति कोई ग़लत ख़याल नहीं उभरा। इसके बाद वक्त कुछ ऐसा आया कि मेरे अंदर का वो वैभव ही ख़त्म हो गया जो सिर्फ अय्याशियों में ही मगन रहता था।

"मैं अपनी रागिनी जैसी बेटी को नहीं खोना चाहती बेटा।" सहसा मां की इस आवाज़ से मैं चौंक कर ख़यालों से बाहर आया। उधर मां भारी गले से कह रहीं थी____"मैं उसे हमेशा के लिए इस हवेली की शान ही बनाए रखना चाहती हूं। उसे खुश देखना चाहती हूं। इस लिए मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूं कि तू उससे ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"म...मां।" मैंने हड़बड़ा कर मां के हाथों को थाम लिया____"ये क्या कर रही हैं आप? हाथ जोड़ कर अपने बेटे को पापी मत बनाइए।"

"तो मान जा न मेरे लाल।" मां ने नम आंखों से मुझे देखा____"रागिनी से ब्याह करने के लिए हां कह दे।"

"क्या भाभी को भी पता है इस बारे में?" मैंने मां से पूछा।

"हां, उसके माता पिता ने उसे भी सब बता दिया होगा।" मां ने कहा।

"तो क्या वो तैयार हैं इस रिश्ते के लिए?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा।

"जब वो तैयार हो जाएगी तो उसके पिता संदेश भिजवा देंगे तेरे पिता जी को।" मां ने कहा____"या फिर वो स्वयं ही यहां आएंगे ख़बर देने।"

"इसका मतलब भाभी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं अभी।" मैंने कहा____"और मुझे यकीन है कि वो तैयार भी नहीं होंगी। मेरी भाभी ऐसी नहीं हैं जो ऐसे रिश्ते के लिए हां कह देंगी।"

"और अगर उसने हां कह दिया तो?" मां ने कहा____"तब तो तू उससे ब्याह करेगा ना?"

"आप बेवजह उनके ऊपर इस रिश्ते को थोप रही हैं मां।" मैंने हताश भाव से कहा____"उन पर ऐसा ज़ुल्म मत कीजिए आप लोग।"

"इस वक्त भले ही तुम्हें या रागिनी को ये ज़ुल्म लग रहा है।" मां ने अधीरता से कहा____"लेकिन मुझे यकीन है कि ब्याह के बाद तुम दोनों इस रिश्ते से खुश रहोगे।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं अब? बड़ी अजीब सी परिस्थिति बन गई थी। मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि इतने दिनों से मेरे माता पिता ये सब सोच रहे थे और इतना ही नहीं ऐसा करने का फ़ैसला भी कर चुके थे। हैरत की बात ये कि मुझे इस बात की भनक तक नहीं लगने दी थी।

"ऐसे चुप मत बैठ बेटा।" मां ने मुझे चुप देखा तो कहा____"मुझे बता कि अगर रागिनी इस रिश्ते के लिए मान जाती है तो तू उसके साथ ब्याह करेगा ना?"

"मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा मां।" मैंने हैरान परेशान भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपसे कुछ नहीं कहूंगा। मुझे सोचने के लिए समय चाहिए।"

"ठीक है तुझे सोचने के लिए जितना समय चाहिए ले ले।" मां ने कहा____"लेकिन ज़्यादा समय भी मत लगाना।"

"एक बात बताइए।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"क्या इस बारे में गौरी शंकर को पता है?"

"हां।" मेरी उम्मीद के विपरीत मां ने जब हां कहा तो मैं हैरान रह गया।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि इस बारे में सबको पता है लेकिन मुझे ही पता नहीं था। अचानक मुझे रूपा का ख़याल आया तो मैंने मां से कहा____"फिर तो रूपा को भी पता होगा ना इस बारे में?"

"नहीं।" मां ने एक बार फिर मुझे हैरान किया_____"उसको अभी इस बारे में नहीं बताया गया है।"

"ऐसा क्यों?" मैं पूछे बगैर न रह सका।

"असल में हम चाहते थे कि पहले तुम और रागिनी दोनों ही इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाओ।" मां ने कहा____"उसके बाद ही रूपा को इस बारे में बताएंगे। हम जानते हैं कि रूपा एक बहुत ही अच्छी लड़की है, बहुत समझदार है वो। जब उसे इस बारे में बताएंगे तो वो इस बात की गहराई को समझेगी। ख़ास कर रागिनी के बारे में सोचेगी। यही सब सोच कर हमने सिर्फ गौरी शंकर को इस बारे में बता रखा है।"

"बड़े आश्चर्य की बात है।" मैंने गहरी सांस ली____"इतना कुछ सोचा हुआ था आप दोनों ने और मुझसे छुपा के रखा, क्यों?"

"डरते थे कि कहीं तू इस बारे में जान कर नाराज़ ना हो जाए।" मां ने कहा____"दूसरी वजह ये भी थी कि तू अनुराधा की वजह से इस हालत में भी नहीं था कि तू शांति से इस बारे में सुन सके।"

मां के मुख से अनुराधा का नाम सुन कर मेरे अंदर एकाएक टीस सी उठी। आंखों के सामने उसका मासूम चेहरा चमक उठा। पलक झपकते ही मेरे चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आए। सीने में दर्द जाग उठा। फ़ौरन ही आंखें बंद कर के मैंने उस दर्द को जज़्ब करने की कोशिश में लग गया।

"क्या रूपचंद्र को भी इस बारे में बताया था पिता जी ने?" फिर मैंने खुद को सम्हालते हुए पूछा।

"नहीं तो।" मां ने हैरानी ज़ाहिर की____"लेकिन तू ऐसा क्यों कह रहा है?"

"क्योंकि आज वो मुझसे कुछ अजीब सी बातें कर रहा था।" मैंने कहा____"जब मैंने पूछा तो कहने लगा कि वो खुद मुझे कुछ नहीं बता सकता लेकिन हां इस बारे में मैं अपने माता पिता से पूछ सकता हूं।"

"अच्छा तो इसी लिए तू वहां से आते ही मुझसे इस बारे में ऐसा कह रहा था?" मां को जैसे अब समझ आया था____"ख़ैर हो सकता है कि गौरी शंकर ने अपने घर में इस बात का ज़िक्र किया हो जिसके चलते उसे भी इस बारे में पता चल गया होगा।"

"फिर तो रूपा को भी पता चल ही गया होगा।" मैंने जैसे संभावना ब्यक्त की।

"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।" मां ने मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा____"तेरे पिता जी ने गौरी शंकर से स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वो इस बारे में रूपा को पता न चलने दें।"

"और ऐसा कब तक रहेगा?" मैंने पूछा।

"उचित समय आने पर उसे भी बता दिया जाएगा।" मां ने पलंग से उतर कर कहा____"फिलहाल हमें चंदनपुर से तेरी भाभी के राज़ी होने की ख़बर की प्रतीक्षा है। उसकी हां के बाद ही हम रूपा को इस बारे में बताएंगे।"

कहने के साथ ही मां मुझे आराम करने का बोल कर कमरे से चली गईं। वो तो चली गईं थी लेकिन मुझे सोचो के भंवर में फंसा गईं थी। मैं बड़ी अजीब सी दुविधा और परेशानी में पड़ गया था।

✮✮✮✮

"आपको क्या लगता है काका?" रूपचंद्र ने गौरी शंकर से मुखातिब हो कर कहा____"सच जानने के बाद वैभव की क्या प्रतिक्रिया होगी?"

"कुछ कह नहीं सकता।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन तुम्हें उससे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। तुम्हें समझना चाहिए था कि अभी अभी वो उस लड़की के सदमे से बाहर आया है। ऐसे में उसके सामने इस तरह की बातें करना उचित नहीं था।"

"मैं मानता हूं काका कि उचित नहीं था।" रूपचंद्र ने कहा____"इसी लिए मैंने अपने मुख से उसको सच नहीं बताया।"

"हां लेकिन उसके मन में सच जानने की जिज्ञासा तो डाल ही दी थी ना तुमने।" गौरी शंकर ने कहा____"ऐसे में वो ये सोच कर नाराज़ हो जाएगा कि उसके माता पिता ने उससे कोई सच छुपा के रखा। उसकी नाराज़गी हम सबके लिए भारी पड़ सकती है।"

"आप बेवजह ही इतना ज़्यादा सोच रहे हैं काका।" रूपचंद्र ने कहा____"जबकि मुझे पूरा यकीन है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। वैसे भी मुझे लगता है कि उसके मन में सच जानने की उत्सुकता डाल कर मैंने अच्छा ही किया है। इसी बहाने अब वो अपने माता पिता से सच जानने का प्रयास करेगा। उसके माता पिता को भी उसे सब कुछ सच सच बताना ही पड़ेगा। मेरा ख़याल है कि जब वो वैभव को सच बताएंगे तो उसके साथ ही उसे परिस्थितियों का भी एहसास कराएंगे। वो उसे समझाएंगे कि वो जो कुछ भी करना चाहते हैं उसी में सबका भला है, ख़ास कर उसकी भाभी का। इतना तो वो लोग भी जानते हैं कि वैभव अपनी भाभी को कितना मानता है और उनकी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता है।"

"शायद रूप ठीक कह रहा है गौरी।" ललिता देवी ने कहा____"मानती हूं कि उसे सच बताने का ये सही वक्त नहीं था लेकिन अब जो हो गया उसका क्या कर सकते हैं? वैसे भी मुझे पूर्ण विश्वास है कि अगर वैभव को सच का पता उसकी अपनी मां के द्वारा चलेगा तो ज़्यादा बेहतर होगा। ठकुराईन बहुत ही प्यार से अपने बेटे को इस सबके बारे में समझा सकती हैं और वैभव भी उनकी बातों को शांत मन से सुन कर समझने की कोशिश करेगा।"

"ललिता सही कह रही है।" फूलवती ने कहा____"मेरा भी यही मानना है कि वैभव की मां इस बारे में अपने बेटे को बहुत अच्छी तरह से समझा सकती हैं और उसे अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए मना भी सकती हैं।"

"अगर ऐसा हो जाए तो अच्छा ही है।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं आज शाम को दादा ठाकुर से मिलने हवेली जाऊंगा और ये जानने का प्रयास करूंगा कि इस बारे में उन्होंने वैभव से बात की है या नहीं?"

"इस बारे में तो मैं खुद ही पता कर लूंगा काका।" रूपचंद्र ने झट से कहा____"कुछ देर में वैभव वापस काम धाम देखने आएगा तो मैं किसी बहाने उससे इस बारे में पता कर लूंगा।"

"हां ये भी ठीक है।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन उससे कुछ भी पूछने से पहले ये ज़रूर परख लेना कि उसकी मानसिक अवस्था कैसी है? ऐसा न हो कि वो तुम्हारे द्वारा कुछ पूछने पर बिगड़ जाए।"

"फ़िक्र मत कीजिए काका।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं इस बात का अंदाज़ा लगा लेने के बाद ही उससे इस बारे में बात करूंगा।"

कुछ देर और इसी संबंध में उनकी बातें हुईं उसके बाद दोनों औरतें अंदर चली गईं जबकि रूपचंद्र और गौरी शंकर पलंग पर लेट कर आराम करने लगे। दोनों चाचा भतीजे खाना खा चुके थे।

✮✮✮✮

मैं हवेली से आराम करने के बाद वापस उस जगह पर आ गया था जहां पर अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य चल रहा था। सारे मज़दूर और मिस्त्री भी अपने अपने घरों से लाया हुआ खाना खा चुके थे और अब फिर से काम पर लग गए थे। निर्माण कार्य बड़े उत्साह से और बड़ी तेज़ गति से चल रहा था।

मैं देवी मां के मंदिर के पास ही एक पेड़ के पास रखी एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठा हुआ था। मेरी नज़रें ज़रूर लोगों पर टिकी हुईं थी लेकिन मेरा मन कहीं और ही उलझा हुआ था। बार बार ज़हन में मां की बातें गूंजने लगती थीं और मैं ना चाहते हुए भी उन बातों के बारे में सोचने लगता था।

मैंने सपने में भी ये उम्मीद अथवा कल्पना नहीं की थी कि ऐसा भी कभी होगा। बार बार आंखों के सामने भाभी का उदास और गंभीर चेहरा उजागर हो जाता था। मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि क्या इसी वजह से कल भाभी इतना उदास और गंभीर नज़र आ रहीं थी? मतलब उन्हें भी इस रिश्ते के बारे में पता चल चुका था और इसी लिए वो मेरे सामने इतनी उदास अवस्था में खड़ी बातें कर रहीं थी।

अचानक ही मेरे मन में सवाल उभरा कि अगर उन्हें पहले से ही इस बारे में पता था तो उन्होंने कल मुझसे इस बारे में कुछ कहा क्यों नहीं? वो उदास तथा गंभीर ज़रूर थीं लेकिन मुझसे सामान्य भाव से ही बातें कर रहीं थी, ऐसा क्यों? अपने इन सवालों का जवाब मैं सोचने लगा। जल्दी ही जवाब के रूप में मेरे ज़हन में सवाल उभरा____'क्या वो उस समय मेरे मन की टोह ले रहीं थी?'

जवाब के रूप में ज़हन में उभरा ये सवाल ऐसा था जिसने मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मैं सोचने लगा कि क्या सच में वो ये देखना चाहती थीं कि मेरे मन में क्या है?

अचानक मेरे मन में ख़याल उभरा कि क्या वो मुझसे ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई होंगी? इस ख़याल के एहसास ने एक बार फिर से मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी पैदा कर दी। मेरे मन में फिर से सवाल उभरा कि क्या सचमुच मेरी भाभी मुझसे यानि अपने देवर से शादी करने का सोच सकती हैं?

मैं अपने मन में उभरते सवालों और ख़यालों के चलते एकाएक बुरी तरह उलझ गया था। मुझे पता ही न चला कि कब वक्त गुज़रा और रूपचंद्र आ कर मेरे पास ही खड़ा हो गया था। होश तब आया जब उसने मेरा कंधा पकड़ कर मुझे हिलाया।

"क्या हुआ भाई?" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए एकाएक मज़ाकिया भाव से पूछा____"मेरी बहन के अलावा और किसके ख़यालों में खोए हुए हो तुम?"

"न...नहीं तो।" मैं बुरी तरह बौखला गया, खुद को सम्हालते हुए कहा____"ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुम बताओ कब आए?"

"मुझे आए हुए तो काफी समय हो गया।" रूपचंद्र ने मुझे बड़े ध्यान से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पास ही खड़ा था और ये देखने में लगा हुआ था कि तुम बैठे तो यहीं पर हो लेकिन तुम्हारा मन जाने कहां था। मैं सही कह रहा हूं ना?"

"ह...हां वो मैं कुछ सोच रहा था।" मैंने काफी हद तक खुद को सम्हाल लिया था____"मैं सोच रहा था कि जब हमारे गांव में अस्पताल और विद्यालय बन कर तैयार हो जाएंगे तो लोगों को बहुत राहत हो जाएगी। ग़रीब लोग सहजता से इलाज़ करा सकेंगे। उनके बच्चे विद्यालय में पढ़ने लगेंगे तो उनके बच्चों का जीवन और व्यक्तित्व काफी निखर जाएगा।"

"ये तो तुमने बिल्कुल सही कहा।" रूपचंद्र ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम ये सब नहीं सोच रहे थे।"

रूपचंद्र की इस बात पर मैं चकित भाव से उसे देखने लगा। उधर वो भी कम्बख़्त मुझे ही देखे जा रहा था। कोई और परिस्थिति होती तो मैं हर्गिज़ उससे नज़रें चुराने वाला नहीं था लेकिन इस वक्त मैंने ख़ुद महसूस किया कि मेरी हालत उससे कमज़ोर है।

"मेरी बात का बुरा मत मानना वैभव।" फिर उसने थोड़ा संजीदा हो कर कहा____"असल में जिस तरह तुम यहां बैठे कहीं खोए हुए थे उससे मैं समझ गया था कि तुम्हें वो सच पता चल चुका है जिसे मैं खुद तुम्हें नहीं बता सकता था। ख़ैर, अगर सच में ही तुम्हें सच का पता चल चुका है तो तुम्हें मुझसे कुछ भी छुपाने की ना तो ज़रूरत है और ना ही मुझसे नज़रें चुराने की।"

मुझे समझ ना आया कि क्या कहूं उससे? बड़ा अजीब सा महसूस करने लगा था मैं। सबसे ज़्यादा मुझे ये सोच कर अजीब लगने लगा था कि वो और उसके घर वाले क्या सोच रहे होंगे इस रिश्ते के बारे में।

"ऐसे उतरा हुआ चेहरा मत बनाओ यार।" रूपचंद्र ने मेरे कंधे को हल्के से दबाते हुए जैसे दिलासा दी____"अब तुम्हारे और हमारे बीच कुछ भी पराया नहीं है। तुम्हारा दुख हमारा दुख है और तुम्हारा सुख हमारा सुख है। तुमसे ही सब कुछ है, तुम जो भी करोगे उसका हम पर भी असर होगा। इस लिए व्यर्थ का संकोच छोड़ दो और जो भी मन में हो खुशी मन से साझा करो। एक बात मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि मैं और मेरे घर वालों को अब किसी भी बात से कोई एतराज़ नहीं है। यूं समझो कि तुम्हारी खुशी में ही हम सबकी खुशी है। अब इससे ज़्यादा क्या कहूं?"

"मतलब तुम्हें या तुम्हारे घर वालों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ मेरी ही भाभी से कर देना चाहते हैं?" मैंने जैसे एक ही सांस में सब कह दिया।

"सच कहूं तो पहली बार जब इस बारे में काका से पता चला था तो हम सबको थोड़ा बुरा लगा था।" रूपचंद्र ने गंभीर हो कर कहा____"लेकिन काका ने जब इस रिश्ते के संबंध में पूरी बात विस्तार से बताई तो हम सबको एहसास हुआ कि ऐसा होना कहीं से भी ग़लत नहीं है। पहले भी तो तुम अनुराधा से ब्याह करना चाहते थे। हमें अनुराधा से भी कोई समस्या नहीं थी, ये तो फिर भी तुम्हारी अपनी भाभी हैं। अगर तुम्हारे द्वारा उनका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में हमेशा खुश रह सकती हैं तो ये अच्छी बात ही है।"

"बात तो ठीक है रूपचंद्र।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन अपनी भाभी से ब्याह करने की बात सोच कर ही मुझे बड़ा अजीब सा लगता है। तुम तो जानते हो कि सबको मेरे चरित्र के बारे में पता है और इस वजह से लोगों को जब ये पता चलेगा कि मेरे माता पिता मेरा ब्याह तुम्हारी बहन के साथ साथ अपनी ही बहू से कर देना चाहते हैं तो जाने वो लोग क्या क्या सोच बैठेंगे। मुझे अपने ऊपर लोगों द्वारा खीचड़ उछाले जाने पर कोई एतराज़ नहीं होगा लेकिन अगर लोग मेरी भाभी के चरित्र पर कीचड़ उछालने लगेंगे तो मैं बर्दास्त नहीं कर सकूंगा। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मेरी भाभी का चरित्र गंगा मैया की तरह स्वच्छ और पवित्र रहा है। ये उनकी बदकिस्मती ही थी कि उनके पति गुज़र गए और वो विधवा हो गईं, लेकिन मैं ये हर्गिज़ सहन नहीं करूंगा कि लोग इस रिश्ते के चलते उनके चरित्र पर सवाल उठाने लगें।"

"लोग तो भगवान पर भी कीचड़ उछाल देते हैं वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"इंसानों की तो बात ही मत करो। मैं तो यही कहूंगा कि तुम लोगों के बारे में मत सोचो बल्कि सिर्फ अपनी भाभी के बारे में सोचो। उनकी ज़िंदगी संवारने के बारे में सोचो। अगर तुम्हें भी लगता है कि तुमसे ब्याह हो जाने के बाद उनका जीवन संवर जाएगा और वो खुश रहने लगेंगी तो तुम इस रिश्ते को स्वीकार कर लो। सच कहूं तो मैं भी चाहता हूं कि उनका जीवन संवर जाए। विधवा के रूप में इतना लंबा जीवन गुज़ारना बहुत ही कठिन होगा उनके लिए।"

"और तुम्हारी बहन का क्या?" मैंने धड़कते दिल से उससे पूछा____"पहले भी अनुराधा की वजह से उसने खुद को समझाया था और अब फिर से वही किस्सा? पहले तो मैंने अपनी मूर्खता के चलते उसके साथ नाइंसाफी की थी लेकिन अब जान बूझ कर कैसे उसके साथ अन्याय करूं? आख़िर और कितना उसे अपने प्रेम के चलते समझौता करना पड़ेगा?"

"मेरी बहन के बारे में तुम्हारा ऐसा सोचना ही ये साबित करता है कि तुम्हें उसके प्रेम का और उसकी तकलीफ़ों का एहसास है।" रूपचंद्र ने कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे मुंह से अपनी बहन के लिए ये फिक्रमंदी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा है। लेकिन तुम शायद अभी भी मेरी बहन को अच्छे से समझे नहीं हो। अगर समझे होते तो ये भी समझ जाते कि उसे इस रिश्ते से भी कोई समस्या नहीं होगी। जैसे उसने अनुराधा को ख़ुशी ख़ुशी क़बूल कर लिया था वैसे ही अब वो रागिनी दीदी को भी ख़ुशी से क़बूल कर लेगी।"

"तुम्हारी बहन बहुत महान है रूपचंद्र।" मैंने सहसा संजीदा हो कर कहा____"इतना कुछ होने के बाद भी उसके दिल से मेरे प्रति उसका प्रेम नहीं मिटा। अनुराधा की मौत के बाद जब मैं गहरे सदमे में चला गया था तो उसने जिस तरह से मुझे उसके दुख से निकाला उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता मैं। मेरे लिए उसने जितना त्याग और जितना समझौता किया है उतना इस संसार में दूसरा कोई नहीं कर सकता। मैं इस जन्म में ही नहीं बल्कि अपने हर जन्म में उसका ऋणी रहूंगा। अक्सर सोचता हूं कि मेरे जैसे इंसान के नसीब में ऊपर वाले ने इतनी अच्छी लड़कियां क्यों लिखी थी? भला मैंने अपने जीवन में कौन से ऐसे अच्छे कर्म किए थे जिसके चलते मुझे रूपा और अनुराधा जैसी प्रेम करने वाली लड़कियां नसीब हुईं?"

"ऊपर वाले की लीला वही जाने वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"हम इंसान तो बस यही कह सकते हैं कि ये सब किस्मत की ही बातें हैं। ख़ैर छोड़ो और ये बताओ कि अब क्या सोचा है तुमने? मेरा मतलब है कि क्या तुम अपनी भाभी से ब्याह करने के लिए राज़ी हो?"

"सच कहूं तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा भाई।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"जब से मां के द्वारा इस सच का पता चला है तब से मन में यही सब चल रहा है। कल तक मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था और शायद यही वजह थी कि कल चंदनपुर में मैं अपनी भाभी से बात भी कर सका था। मगर अब ये सब जानने के बाद उनसे बात करने की तो दूर उनसे नज़रें मिलाने की भी हिम्मत नहीं कर पाऊंगा। जाने क्या क्या सोच रहीं होंगी वो मेरे बारे में?"

"मुझे लगता है कि तुम बेकार में ही ये सब सोच रहे हो।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं ये मानता हूं कि उनको भी इस रिश्ते के बारे में सोच कर तुम्हारी तरह ही अजीब लग रहा होगा लेकिन यकीन मानों देर सवेर वो भी इस रिश्ते को स्वीकार कर लेंगी। उनके घर वाले उन्हें भी तो समझाएंगे कि उनके लिए क्या सही है और क्या उचित है।"

थोड़ी देर रूपचंद्र से और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद मैं उसे यहीं रहने का बोल कर अपने खेतों की तरफ निकल गया। रूपचंद्र से इस बारे में बातें कर के थोड़ा बेहतर महसूस करने लगा था मैं।



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Sukun hi sukun hai update me👍👍👍
 
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Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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बात करने से ही बात बनती है
रोज बातें किया करो हमसे.....


क्या खूब लिखा था इब्राहिम अश्क साहब ने।

बात करने से तो दुनिया के हर मसले सुलझ जाते हैं, ये भी बस दोनो, रागिनी और वैभव के आपस में बात करने से ही सुलझेगा।

Fear of unknown

बस यही हावी है अभी दोनो पर, और चाहे सुगंधा देवी हो या रूपचंद्र, वास्तव में दोनो उसी unknown का प्रतीक है जिससे दोनो डर रहे हैं। बाकी दोनो को खुद ही मालूम है कि वो दोनो को एक दूसरे से कोई भी गिला नहीं होगा। हां शर्म ओ हया की दीवारें कैसे टूटेंगी, वो भी बहुत इंट्रस्टिंग होगा देखना। लेकिन मुझे लगता है कि जहां एक बार दोनो आपस में इस विषय पर बात कर लेंगे, दोनो के बीच वो अंतरंगता आने में देर नहीं ही लगेगी। बस बुद्धि में घुसने भर की बात है।

बढ़िया अपडेट शुभम भाई :applause:

रूपचंद्र तो हर अपडेट के साथ हम लोग को सुखद आश्चर्य में डाल रहा है, क्योंकि कहानी की शुरुवात में इसके किरदार से जहां नफरत होती थी, वहीं अब यही कहानी के सबसे सुलझा किरदारों में से एक बन रहा है।
 

Ajju Landwalia

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अध्याय - 140
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इस बार भाभी कुछ न बोलीं। बस मेरी तरफ अपलक देखती रहीं। तभी बाहर से किसी के आने का आभास हुआ तो वो जल्दी से पलटीं और अंदर चली गईं। मैं असहाय सा बैठा रह गया। कुछ ही पलों में बाहर से एक औरत अंदर आई। मुझे देखते ही उसने झट से अपना चेहरा घूंघट कर के छुपा लिया और अंदर की तरफ चली गई।


अब आगे....


कुछ देर मैं यूं ही बैठा रहा और भाभी के बारे में सोचता रहा। उसके बाद मैं उठा और बाहर आया। भीमा बाहर सड़क के पास खड़ा था। मैंने उसे आवाज़ दे कर अंदर बुला लिया।

शाम होने में अभी क़रीब दो ढाई घंटे का समय था इस लिए मैं आराम से पलंग पर लेट गया। भीमा भी दूसरी तरफ चारपाई पर लेट गया था। इधर मैं आंखें बंद किए भाभी से हुई बातों के बारे में सोचने लगा। जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कुछ बदला बदला सा है। भाभी का बर्ताव भी मुझे कुछ बदला हुआ और थोड़ा अजीब सा लगा था। इसके पहले वो अक्सर मुझे छेड़तीं थी, मेरी टांग खींचतीं थी और तो और मेरी हेकड़ी निकाल कर आसमान से सीधा ज़मीन पर ले आतीं थी किंतु आज ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया था। उनके चेहरे पर कोई खुशी, कोई उत्साह, कोई चंचलता नहीं थी। अगर कुछ थी तो सिर्फ गंभीरता। उनकी आवाज़ भी धींमी थी।

मुझे लगा शायद वो अपने मायके में होने की वजह से अपने देवर से खुल कर बात नहीं कर पा रहीं थी। हां, ज़रूर यही बात होगी वरना भाभी मेरे सामने इतनी असामान्य नहीं हो सकती थीं। बहरहाल मैंने अपने ज़हन से सारी बातों को झटक दिया और आराम से सोने की कोशिश करने लगा मगर काफी देर गुज़र जाने पर भी मुझे नींद न आई। मन में एक खालीपन और एक बेचैनी सी महसूस हो रही थी।

एकाएक ही मुझे एहसास हुआ कि शाम होने से पहले मुझे वापस अपने गांव जाना है। जैसे आया था वैसे ही वापस जाना होगा मुझे। बड़ी खुशी के साथ और बड़ी उम्मीद के साथ मैं अपनी प्यारी सी भाभी को लेने आया था लेकिन भाभी खुद ही जाने को राज़ी नहीं थीं और मैं उन्हें चलने के लिए मजबूर भी नहीं कर सकता था। कुछ ही पलों में मेरी सारी खुशी और सारा उत्साह बर्फ़ की मानिंद ठंडा पड़ गया था।

मैं आंखें बंद किए ये सब सोच ही रहा था कि तभी मेरे कानों में पायल छनकने की आवाज़ें पड़ीं। कोई अंदर से आ रहा था जिसके पैरों की पायल छनक रही थी। मैंने करवट ली हुई थी इस लिए मैं देख नहीं सकता था कि कौन आ रहा है। पायल की छनकती आवाज़ एकाएक बंद हो गईं। मैंने महसूस किया कि मेरे क़रीब ही पायलों का छनकना बंद हुआ है।

"लगता है जीजा जी सो गए हैं।" तभी किसी की मधुर किंतु बहुत ही धींमी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बोलने वाले ने किसी दूसरे से ऐसा कहा था_____"अब क्या करें? क्या हमें जीजा जी को जगाना चाहिए? वैसे दीदी ने कहा है कि हम इन्हें परेशान न करें।"

"मुझे अच्छी तरह पता है कि इन महापुरुष को इतना जल्दी यहां नींद नहीं आने वाली।" ये दूसरी आवाज़ थी। आवाज़ धीमी तो थी लेकिन लहजा थोड़ा कर्कश सा था।

मैं फ़ौरन ही पहचान गया कि ये आवाज़ भाभी की छोटी बहन कामिनी की है। मुझे हैरानी हुई कि कामिनी इस वक्त यहां क्यों आई होगी, वो भी मेरे क़रीब? उसका और मेरा तो छत्तीस का आंकड़ा था। कभी सीधे मुंह बात नहीं करती थी वो। हालाकि इसमें उसका नहीं मेरा ही दोष था क्योंकि शुरुआत से ही मेरी हवस भरी नज़रों का उसी ने सामना किया था। उसे मेरी आदतों से और मेरी हरकतों से सख़्त नफ़रत थी।

"धीरे बोलिए दीदी।" पहले वाली ने धीमें स्वर में उससे कहा____"जीजा जी सुन लेंगे तो नाराज़ हो जाएंगे।"

"मुझे फ़र्क नहीं पड़ता।" कामिनी ने जैसे लापरवाही से कहा_____"वैसे भी मैं इनकी नाराज़गी से थोड़े ना डरती हूं।"

"हां हां समझ गई मैं।" पहले वाली आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। मैं उसकी आवाज़ से उसको पहचानने की कोशिश में लगा हुआ था। अरे! ये तो कंचन थी। भैया के चाचा ससुर की बेटी। बहरहाल उसने आगे कहा____"पर अब क्या करना है? वापस चलें?"

"तू जा।" कामिनी ने उससे कहा____"मैं देखती हूं इन्हें और हां अंदर किसी को कुछ मत बताना। ख़ास कर दीदी को तो बिल्कुल भी नहीं। पहले तो वो अपने देवर का पक्ष लेतीं ही थी किंतु अब तो कहना ही क्या। ख़ैर तू जा अब।"

कामिनी की इन बातों के बाद कंचन चली गई। उसके पायलों की छम छम से मुझे पता चल गया था। इधर अब मैं ये सोचने लगा कि कामिनी क्या करने वाली है? मैं पहले से ही उसके इस बर्ताव से हैरान था किंतु अब तो धड़कनें ही बढ़ गईं थी मेरी। बहरहाल, मैं आंखें बंद किए चुपचाप लेटा रहा और उसकी तरफ से किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगा। इसके लिए मुझे ज़्यादा देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। मैंने महसूस किया कि वो पीछे से घूम कर मेरे सामने की तरफ आई और मेरे सामने वाले पलंग पर बैठ गई। मेरी धड़कनें ये सोच कर धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं कि जाने ये आफ़त अब क्या करने वाली है?

"ज़्यादा नाटक करने की ज़रूरत नहीं है।" इस बार उसकी आवाज़ स्पष्ट रूप से मेरे कानों में पड़ी_____"मुझे अच्छी तरह पता है कि आप सो नहीं रहे हैं। अब चुपचाप अपना नाटक बंद कर के आंखें खोल लीजिए, वरना इंसान को गहरी नींद से जगाना भी मुझे अच्छी तरह आता है।"

ये तो सरासर धमकी थी, वो भी मेरे जैसे सूरमा को। मैं उसकी इस धमकी पर मन ही मन मुस्कुरा उठा। हालाकि उससे डरने का तो सवाल ही नहीं था लेकिन मैं नहीं चाहता था कि कोई तमाशा हो जाए। दूसरी वजह ये भी थी कि मैं उसके बर्ताव से हैरान था और जानना चाहता था कि आख़िर वो किस मकसद से मेरे पास आई थी?

"लीजिए सरकार, हमने अपनी आंखें खोल दी।" मैंने आंखें खोल कर उसकी तरफ देखते हुए उठ कर बैठ गया, फिर बोला_____"आप इतनी मोहब्बत से हमें जाग जाने को कह रहीं हैं तो हमें उठना ही पड़ेगा। कहिए, क्या चाहती हैं आप हमसे? प्यार मोहब्बत या फिर कुछ और?"

"हद है, आप कभी नहीं सुधरेंगे।" कामिनी ने मुझे घूरते हुए कहा____"जब देखो वही छिछोरी हरकतें।"

"आप भी कीजिए।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"यकीन मानिए, बहुत मज़ा आएगा।"

कामिनी ने मुझे खा जाने वाली नज़रों से देखा। पलक झपकते ही उसका चेहरा तमतमाया गया सा नज़र आया। ऐसी ही थी वो। ऐसा नहीं था कि उसे मज़ाक पसंद नहीं था लेकिन मेरा उससे मज़ाक करना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसके ज़हन में ये बात बैठ चुकी थी कि मैं हर लड़की को सिर्फ भोगने के लिए ही अपने मोह जाल में फंसाता हूं।

"उफ्फ! इतनी मोहब्बत से हमें मत देखिए सरकार।" मैंने उसे और गरमाया_____"वरना एक ही पल में ढेर हो जाएंगे हम।"

"क्यों करते हैं ऐसी गन्दी हरकतें?" उसने जैसे अपने गुस्से को बड़ी मुश्किल से दबाते हुए मुझसे कहा____"क्या आप कभी किसी से सभ्य इंसानों जैसी बातें नहीं कर सकते?"

"अब ये तो सबका अपना अपना सोचने का नज़रिया है सरकार।" मैंने कहा____"आपको मेरी बातें सभ्य नहीं लगती जबकि यही बातें दूसरों को सभ्य लगती हैं। प्यार मोहब्बत की चाशनी में डूबी हुई लगती हैं। आपको नहीं लगती हैं तो इसका मतलब ये है कि या तो आपका ज़ायका ख़राब है या फिर आपकी समझदानी में ही गड़बड़ी है।"

"मतलब आप स्पष्ट रूप से ये कह रहे हैं कि मेरे पास दिमाग़ नहीं है?" कामिनी ने इस बार गुस्से से मेरी तरफ देखा____"और मैं किसी की बातों का मतलब ही नहीं समझती हूं?"

"क्या आप मुझसे झगड़ा करने ही आईं थी?" मैंने विषय को बदलने की गरज से इस बार थोड़ा गंभीरता से कहा____"अगर झगड़ा ही करने आईं थी तो ठीक है मैं तैयार हूं लेकिन यदि किसी और वजह से आईं थी तो सीधे मुद्दे की बातों पर आइए। वैसे मैं हैरान हूं कि जो लड़की मुझे अपना कट्टर दुश्मन समझती है वो मुझसे गुफ़्तगू करने कैसे आई है?"

कामिनी ने इस बार फ़ौरन कुछ ना कहा। उसने सबसे पहले अपने गुस्से को काबू किया और आंखें बंद कर के गहरी गहरी सांसें ली। नीले रंग का कुर्ता सलवार पहन रखा था उसने। दुपट्टे से उसने अपने सीने के उभारों को पूरी तरह से ढंक रखा था। ऐसा हमेशा होता था, मेरे सामने आते ही वो कुछ ज़्यादा ही चौकन्नी हो जाती थी।

"अब कुछ बोलिए भी।" मैंने कहा____"मैं बड़ी शिद्दत से जानना चाहता हूं कामिनी देवी आज मेरे सामने कैसे बैठी हैं और मुझसे इतनी मोहब्बत से बातें क्यों कर रही हैं?"

"आप फिर से शुरू हो गए?" उसने मुझे घूरा।

"अगर आप बड़ी मोहब्बत से शुरू हो जातीं तो हम रुके रहते।" मैंने हौले से मुस्कुराते हुए कहा____"ख़ैर बताइए आज सूरज किस दिशा से उगा है चंदनपुर में?"

"क्या आप सच में दीदी को लेने आए हैं?" उसने जैसे मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया और पूछा।

"क्या आपको कोई शक है इसमें?" मैंने कहा____"वैसे आप भी हमारे साथ चलतीं तो क़सम से आनन्द ही आ जाता।"

"किसी कीमत पर नहीं।" कामिनी ने दृढ़ता से कहा____"आपके साथ तो किसी जन्म में कहीं नहीं जाऊंगी मैं।"

"वाह! इतनी शिद्दत से मोहब्बत आप ही कर सकती हैं मुझसे।" मैं मुस्कुराया।

"ये मोहब्बत नहीं है।" उसने घूरते हुए कहा____"बल्कि...।"

"नफ़रत है?" उसकी बता काट कर मैंने उसकी बात पूरी की_____"जानता हूं मैं लेकिन शायद आप ये नहीं जानती कि नफ़रत और मोहब्बत का जन्म एक ही जगह से होता है....दिल से। अब दिल से नफ़रत कीजिए या मोहब्बत, ये तो पक्की बात है ना कि किसी न किसी भावना से आपने मुझे अपना बना ही रखा है।"

"अपने मन को बहलाने के लिए ख़याल अच्छा है।" कामिनी ने कहा____"ख़ैर मैं आपको ये बताने के लिए आई थी कि दीदी को हम लोग अब नहीं भेजेंगे। वो यहीं रहेंगी, हमारे साथ।"

"क...क्या मतलब?" मैं एकदम से चौंक पड़ा____"ये क्या कह रही हैं आप?"

"वही जो आपने सुना है।" कामिनी ने स्पष्ट रूप से कहा____"भैया ने आपसे स्पष्ट रूप में इसी लिए नहीं कहा क्योंकि वो शायद संकोच कर गए थे लेकिन सच यही है कि दीदी अब यहीं रहेंगी। आपको अकेले ही वापस जाना होगा।"

"अरे! भला ये क्या बात हुई?" मैं बुरी तरह हैरान परेशान सा बोल पड़ा____"माना कि भाभी का ये मायका है और वो यहां जब तक चाहे रह सकती हैं लेकिन इसका क्या मतलब हुआ कि वो अब यहां से नहीं जाएंगी?"

"बस नहीं जाएंगी।" कामिनी ने अजीब भाव से कहा____"वैसे भी जिनसे उनका संबंध था वो तो अब रहे नहीं। फिर भला हम कैसे उन्हें इस दुख के साथ जीवन भर उस हवेली में विधवा बहू बन कर रहने दें? आपको शायद पता नहीं है कि पिता जी ने दीदी का फिर से ब्याह कर देने का फ़ैसला किया है। आप तो जानते ही है कि दीदी की अभी उमर ही क्या है जो वो आपके भाई की विधवा बन कर सारी ज़िंदगी दुख और कष्ट में गुज़ारें।"

कामिनी की बातें किसी पिघले हुए शीशे की तरह मेरे कानों में अंदर तक समाती चली गईं थी। मेरे दिलो दिमाग़ में एकाएक ही हलचल सी मच गई थी। मन में तरह तरह के ख़यालों की आंधी सी आ गई थी।

"अगर ये मज़ाक है।" फिर मैंने सख़्त भाव से कहा____"तो समझ लीजिए कि मुझे इस तरह का घटिया मज़ाक बिल्कुल भी पसंद नहीं है। आप भाभी के बारे में ऐसी बकवास कैसे कर सकती हैं?"

"ये बकवास नहीं है जीजा जी।" कामिनी ने कहा____"हकीक़त है हकीक़त। मैं मानती हूं कि आप अपनी भाभी के बारे में इस तरह की बातें नहीं सुन सकते हैं लेकिन खुद सोचिए कि क्या आप यही चाहते हैं कि मेरी दीदी अपना पहाड़ जैसा जीवन विधवा बन कर ही गुज़ारें? क्या आप यही चाहते हैं कि उनके जीवन में कभी खुशियों के कोई रंग ही न आएं? क्या आप यही चाहते हैं कि वो जीवन भर अकेले दुख दर्द में डूबी रहें?"

"नहीं नहीं।" मैं झट से बोल पड़ा____"अपनी भाभी के बारे में मैं ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता। मैं तो....मैं तो यही दुआ करता हूं कि उनकी ज़िंदगी में पहले जैसी ही खुशियां आ जाएं जिससे मेरी भाभी का चेहरा फिर से पूर्णिमा के चांद की तरह चमकने लगे। मैं तो चाहता हूं कि मेरी भाभी के होठों पर हमेशा खुशियों से भरी मुस्कान सजी रहे। उनके जीवन में दुख का एक तिनका भी कभी न आए।"

"अगर आप सच में ऐसा चाहते हैं।" कामिनी ने कहा____"तो फिर आपको इस बात से कोई एतराज़ अथवा कष्ट नहीं होना चाहिए कि उनका फिर से कहीं ब्याह हो जाए। आप भी समझने की कोशिश कीजिए कि उनके जीवन में इस तरह की खुशियां तभी आ सकती हैं जब हमेशा के लिए उनके बदन से विधवा का लिबास उतार दिया जाए और उन्हें किसी की सुहागन बना दिया जाए। पिता जी भी ये नहीं सह पा रहे हैं कि उनकी बेटी इतनी सी उमर में विधवा हो कर सारा जीवन दुख और कष्ट में ही व्यतीत करने पर मज़बूर हैं।"

सच कहूं तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैं एकाएक आसमान से ज़मीन पर आ गिरा था। भाभी का फिर से ब्याह करने का कोई सोचेगा इस बारे में तो मैंने अब तक कल्पना ही नहीं की थी। सच ही तो कह रही थी कामिनी कि उनकी ज़िंदगी में खुशियां तभी आ सकती हैं जब उनका फिर से ब्याह कर दिया जाए और उन्हें किसी की सुहागन बना दिया जाए। सच ही तो था, एक विधवा के रूप में भला वो कैसे खुश रह सकती थीं? असल खुशियां तो तभी मिलती हैं जब इंसान का जीवन खुशियों के रंगों से भरा हो। एक विधवा के जीवन में सफेद रंग के अलावा दूसरा कोई रंग भरा ही नहीं जा सकता था?

मेरे मनो मस्तिष्क में धमाके से होने लगे थे। पहली बार मैं इस तरीके से सोचने पर मजबूर हुआ था। पहली बार इतनी गहराई से सोचने का मानों अवसर मिला था। अचानक ही मेरे मन में एक ख़याल बिजली की तरह आ गिरा....भाभी का फिर से ब्याह हो जाएगा, यानि वो किसी की पत्नी बन जाएंगी। उसके बाद उनसे मेरा कोई रिश्ता नहीं रह जाएगा। आज वो मेरी भाभी हैं लेकिन ब्याह के बाद वो किसी और के रिश्ते में बंध जाएंगी। हवेली की बहू और हवेली शान हमेशा के लिए किसी दूसरे के घर की शान बन जाएगी।

एक झटके में जैसे मैं वास्तविकता के धरातल पर आ गया जिसके एहसास ने मुझे अंदर तक हिला डाला। एक झटके में भाभी का प्यार और स्नेह मुझे अपने से दूर होता नज़र आने लगा। उनका वो छेड़ना, वो टांगे खींचना और एक झटके में मेरी हेकड़ी निकाल देना ये सब कभी न भुलाई जा सकने वाली याद सा बनता महसूस हुआ। पलक झपकते ही आंखों के सामने भाभी का सुंदर चेहरा उभर आया...और फिर अगले ही पल एक एक कर के वो हर लम्हें उभरने लगे जिनमें मेरी उनसे मुलाक़ातों की तस्वीरें थीं। जब भैया जीवित थे तब की तस्वीरें। भाभी तब सुहागन थीं, बहुत सुंदर और मासूम नज़र आतीं थी वो। फिर एकदम से तस्वीरें बड़ी तेज़ी से बदलने लगीं और कुछ ही पलों में उस वक्त की तस्वीर उभर आई जब कुछ देर पहले मैंने उन्हें देखा था।

एक झटके में मुझे अपनी कोई बहुत ही अनमोल चीज़ खो देने जैसा एहसास हुआ। मेरे अंदर भाभी को खो देने जैसी पीड़ा उभर आई। मैं एकदम से दुखी और उदास सा हो गया। मेरी आंखें अनायास ही बंद हो गईं और ना चाहते हुए भी आंखों की कोर से आंसू का एक कतरा छलक गया। मैंने हड़बड़ा कर जल्दी से उसे पोंछ लिया। मैं नहीं चाहता था कि कामिनी मेरी आंख से निकले आंसू के उस कतरे को देख ले।

"क्या हुआ जीजा जी?" सहसा कामिनी की आवाज़ से मैं चौंका____"आप एकदम से चुप क्यों हो गए? क्या मैंने कुछ ग़लत कह दिया है आपसे?"

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"आपने भाभी के बारे में जो भी कहा वो एकदम से उचित ही कहा है। मुझसे अच्छी तो आप हैं कामिनी जो अपनी दीदी की खुशियों के बारे में इतना कुछ सोच बैठी हैं। एक मैं हूं जो अब तक यही समझ रहा था कि मैं अपनी भाभी को खुश रखने के लिए बहुत कुछ कर रहा हूं। हैरत की बात है कि मैं कभी ये सोच ही नहीं पाया कि एक औरत को असल खुशी तभी मिल सकती है जब उसका सम्पूर्ण जीवन खुशियों के अलग अलग रंगों से भर जाए और ऐसा तो तभी हो सकता है ना जब उस औरत का फिर से कहीं ब्याह हो जाए। आज मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है और इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद भी देता हूं कि आपने मुझे इस सत्य का एहसास कराया। आपके पिता जी ने अपनी बेटी की खुशी के लिए बहुत ही उम्दा कार्य करने का फ़ैसला लिया है। मुझे अपनी भाभी के लिए इस बात से बहुत खुशी हो रही है। ईश्वर से यही प्रार्थना करता था कि वो उन्हें हमेशा खुश रखें तो अब ऐसा हो जाने से वो वाकई में खुश ही रहेंगी।"

कामिनी मेरी तरफ ही देखे जा रही थी। उसके चेहरे पर थोड़े हैरानी के भाव भी उभर आए थे। शायद उसे मुझसे ऐसी गंभीर बातों की उम्मीद नहीं थी। वो तो यही समझती थी कि मैं एक बहुत ही ज़्यादा बिगड़ा हुआ लड़का हूं जिसे किसी की भावनाओं से अथवा किसी के दुख दर्द से कोई मतलब ही नहीं होता है।

"वैसे इतनी बड़ी बात हो गई और किसी ने मुझे बताया तक नहीं।" फिर मैंने कहा____"मुझे अब समझ आ रहा है कि क्यों हर बार मां मुझे भाभी को लेने आने से मना कर रहीं थी। आते समय पिता जी ने भी यही कहा था कि अगर यहां पर आप लोग भाभी को मेरे साथ भेजने से मना करें तो मैं इसके लिए किसी पर दबाव नहीं डालूंगा। इसका मतलब तो यही हुआ कि मां और पिता जी को भी इस बारे में पता है। यानि वो भी जानते हैं कि आपके पिता जी भाभी का फिर से ब्याह कर देना चाहते हैं?"

"इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।" कामिनी ने कहा____"पर आपकी बातों से तो यही लगता है कि उन्हें इस बारे में पता है।"

"हां लेकिन मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने इस बारे में मुझे क्यों कुछ नहीं बताया?" मैंने उलझन पूर्ण भाव से कहा____"अगर वो उसी समय मुझे बता देते तो भला क्या हो जाता?"

कामिनी के पास जैसे मेरे इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। वो भी सोच में पड़ गई थी। कुछ देर तक हमारे बीच ख़ामोशी ही रही। मुझे बहुत अजीब महसूस हो रहा था। एकदम से अब मुझे पराएपन का एहसास होने लगा था।

"मैंने हमेशा आपके साथ ग़लत बर्ताव किया है कामिनी।" फिर मैंने गंभीरता से कहा____"हमेशा आपको परेशान किया है, इसके लिए माफ़ कर दीजिएगा मुझे।"

"अरे! ये क्या कह रहे हैं आप?" कामिनी एकदम से चौंकी____"देखिए आप इस तरह मुझसे माफ़ी मत मांगिए।"

"मेरी एक विनती है आपसे।" मैंने उसकी तरफ देखा____"मैं अपनी भाभी को आख़िरी बार देख लेना चाहता हूं। क्या आप उन्हें यहां भेज देंगी? देखिए मना मत करना।"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" कामिनी के चेहरे पर हैरानी और उलझन जैसे भाव उभर आए____"अच्छा ठीक है, मैं जा कर दीदी को आपकी ये बात बता देती हूं।"

"उन्हें सिर्फ बताना ही नहीं है।" मैंने ज़ोर देते हुए कहा____"उनसे कहना कि उनका देवर उनसे आख़िरी बार मिलना चाहता है।"

कामिनी ठीक है कहते हुए उठी और अंदर चली गई। इधर मैं दुखी मन से बैठा जाने क्या क्या सोचने लगा। मुझे इस बात की तो खुशी थी कि भाभी का किसी से ब्याह हो जाएगा तो वो हमेशा खुश रहेंगी लेकिन अब इस बात का बेहद दुख भी हो रहा था कि मैं अब हमेशा के लिए अपनी भाभी को खो दूंगा। मेरे बदले हुए जीवन में उनका बहुत योगदान था। आज मैं बदल कर यहां तक पहुंचा था तो इसमें भाभी का भी बहुत बड़ा हाथ था। वो हमेशा मुझे अच्छा इंसान बनने के लिए ज़ोर देती थीं। हमेशा मेरा मार्गदर्शन करतीं थी। मेरे माता पिता को तो उनके जैसी बहू पाने पर हमेशा से गर्व था ही किंतु मुझे भी उनके जैसी भाभी पाने पर नाज़ था।

काश! विधाता ने बड़े भैया का जीवन नहीं छीना होता तो आज मैं अपनी भाभी को खो नहीं रहा होता। पहले अनुराधा और अब भाभी, दोनों को ही खो दिया मैंने। एकाएक ही मेरे अंदर तीव्र पीड़ा उठी। मेरा मन रो देने का करने लगा। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने जज़्बातों को रोका और भाभी के आने का इंतज़ार करने लगा।

आख़िर मेरी मुराद पूरी हुई और भाभी आ गईं। वही गंभीर चेहरा, कोई खुशी नहीं, कोई उत्साह नहीं। आंखों में सूनापन और होठों पर रेगिस्तान के जैसा सूखापन। वो आईं और मेरे सामने खड़ी हो गईं। मेरा जी किया कि मैं एक झटके से उनसे लिपट जाऊं और किसी बच्चे की तरफ फूट फूट कर रो पड़ूं। उनसे लिपट पड़ने से तो खुद को रोक लिया मैंने लेकिन आंखों को बगावत करने से न रोक सका। मेरे लाख रोकने के बाद भी जज़्बातों की आंधी ने आंखों से आंसुओं को छलका ही दिया। मैंने महसूस किया कि मेरी आंखों से आंसू छलका देख भाभी तड़प सी उठीं थी।

"क...क्या हुआ तुम्हें?" फिर उन्होंने झट से फिक्रमंद हो कर पूछा____"तुम...तुम रो क्यों रहे हो? क्या कामिनी ने तुम्हें कुछ कहा है?"

"नहीं नहीं।" मेरे अंदर हुक सी उठी, खुद को सम्हालते हुए बोला____"उन्होंने कुछ नहीं कहा मुझे।"

"तो फिर तुम इस तरह रो क्यों रहे हो?" भाभी बहुत ज़्यादा चिंतित नज़र आने लगीं____"क्या हुआ है तुम्हें? बताओ मुझे, तुम्हारी आंखों से आंसू क्यों बह आए हैं?"

"ये मेरा कहना नहीं माने भाभी।" मेरी आवाज़ लड़खड़ा गई____"मेरे मना करने पर भी आंखों से छलक ही गए।"

"अरे! ये कैसी बातें कर रहे हो तुम?" भाभी अभी भी चिंतित थीं____"सच सच बताओ आख़िर बात क्या है?"

"एक तरफ ये जान कर बेहद खुशी हुई कि आपके पिता जी फिर से आपका ब्याह करना चाहते हैं ताकि आप वास्तव में खुश रहने लगें।" मैंने कहा_____"दूसरी तरफ मुझे इस बात का दुख होने लगा है कि जब आपकी किसी से शादी हो जाएगी तो आप मेरी भाभी नहीं रह जाएंगी। आपको भाभी नहीं कह सकूंगा मैं। कह भी कैसे सकूंगा? आपसे भाभी का रिश्ता ही कहां रह जाएगा फिर? पहले बड़े भैया को खो दिया और अब अपनी भाभी को भी खो देने वाला हूं। यही सोच कर रोना आ गया था भाभी। समझ में नहीं आ रहा कि आपको मिलने वाली खुशियों के लिए खुश होऊं या हमेशा के लिए अपनी प्यारी सी भाभी को खो देने का शोक मनाऊं।"

"एकदम पागल हो तुम?" भाभी ने कांपती आवाज़ में कहा____"तुमसे ये किसने कहा कि मैं किसी से शादी करने को तैयार हूं?"

"क...क्या मतलब??" मैं भाभी की बात सुन कर बुरी तरह उछल पड़ा, फिर झट से बोला____"म....मतलब...ये क्या कह रही हैं आप? मुझसे कामिनी ने तो यही बताया है कि आपके पिता जी ने आपका फिर से ब्याह करने का फ़ैसला कर लिया है।"

"अरे! वो झूठ बोल रही थी तुमसे।" भाभी ने कहा____"सच यही है कि मैं किसी से शादी नहीं करने वाली। मैं दादा ठाकुर की बहू थी, हूं और हमेशा रहूंगी।"

"क...क्या सच में??" मैं जैसे खुशी से नाच उठा, किंतु फिर मायूस सा हो कर बोला_____"लेकिन भाभी आपकी खुशियों का क्या? आख़िर ये तो सच ही है ना कि एक औरत को असल खुशियां तभी मिलती हैं जब वो किसी की सुहागन हो।"

"मिलती होंगी।" भाभी ने जैसे लापरवाही से कहा____"लेकिन मुझे ऐसी खुशियां नहीं चाहिए जिसकी वजह से मेरा देवर अपनी भाभी को खो दे और दुखी हो जाए।"

"नहीं भाभी, मैं अपनी खुशी के लिए आपका जीवन बर्बाद करने का सोच भी नहीं सकता।" मैंने संजीदा हो कर कहा_____"मुझे सच्ची खुशी तभी मिलेगी जब मेरी प्यारी भाभी सचमुच में खुश रहने लगेंगी। इस लिए आप मेरे बारे में मत सोचिए और अपने पिता जी की बात मान कर फिर से शादी कर लीजिए। आप जहां भी रहेंगी मैं आपको भाभी ही मानूंगा और हमेशा आपकी खुशियों की कामना करूंगा।"

भाभी मेरी तरफ अपलक देखने लगीं। उनकी आंखें नम हो गईं थी। चेहरे पर पीड़ा के भाव नुमायां हो उठे थे। फिर जैसे उन्होंने खुद को सम्हाला।

"एक बात पूछूं तुमसे?" फिर उन्होंने अजीब भाव से कहा।

"आपको इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने अधीरता से कहा।

"सच सच बताओ कितना चाहते हो मुझे?" भाभी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए पूछा।

"हद से ज़्यादा।" मैंने जवाब दिया____"अपनी भाभी की खुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूं मैं। आपको पहले भी बताया था कि आपकी अहमियत और आपका मुकाम बहुत ख़ास और बहुत ऊंचा है मेरी नज़र में।"

"ये तो तुम अभी मेरा दिल रखने के लिए बोल रहे हो।" भाभी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए ही कहा____"लेकिन रूपा से शादी हो जाने के बाद तो भूल ही जाओगे मुझे।"

"आप जानती हैं कि ऐसा नहीं हो सकता।" मैंने दृढ़ता से कहा____"बता ही चुका हूं कि आपकी अहमियत अलग है। जहां आप हैं वहां कोई नहीं हो सकता।"

"क्या तुम्हें नहीं लगता कि ये ग़लत है?" भाभी ने कहा____"तुम्हें अपनी भाभी को इतनी अहमियत नहीं देनी चाहिए, बल्कि रूपा को देनी चाहिए। वो तुमसे बेहद प्रेम करती है। क्या नहीं किया है उसने तुम्हारे लिए। उसके प्रेम और त्याग का ईमानदारी से तुम्हें फल देना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे उसने तुम्हें दिया है।"

"मैंने कब इससे इंकार किया है भाभी?" मैंने कहा____"यकीन मानिए, उसके साथ कभी कोई नाइंसाफी नहीं करूंगा। किंतु यहां पर बात आपकी अहमियत की हुई थी तो ये सच है कि आपकी अहमियत मेरे लिए बहुत अहम है।"

मेरी बात सुन कर भाभी कुछ देर मुझे देखती रहीं। फिर जैसे उन्होंने इस बात को दरकिनार किया और कहा____"अच्छा अब तुम आराम करो। मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर भेजवाती हूं। अगर रुकना नहीं है तो शाम होने से पहले पहले चले जाना।"

उनकी बात पर मैंने सिर हिलाया। उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के बाद मुझे थोड़ी राहत सी महसूस हुई। पलंग पर मैं फिर से लेट गया और उनसे हुई बातों के बारे में सोचने लगा।

कुछ ही देर में वंदना भाभी चाय ले कर आईं। अभी मैंने उनसे चाय ली ही थी कि ससुर जी यानी भाभी के पिता जी भी आ गए। वंदना भाभी अंदर से उनके लिए भी चाय ले आईं। भीमा को उन्होंने पहले ही दे दिया था। चाय पीते समय ही भाभी के पिता जी से बात चीत हुई। उसके बाद मैं जाने के लिए उठ गया। सब घर वालों ने आ कर मेरे पांव छुए और मुझे विदाई के रूप में पैसे दिए। उसके बाद मैं और भीमा जीप में बैठ कर चल पड़े। आते समय भाभी को नहीं देख पाया था मैं।




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Behad shandar update he TheBlackBlood Shubham Bhai,


Dada Thakur aur ragini bhabhi ke pita ki baat vaibhav aur ragini ke vivah ke baare me shayad pehle hi ho chuki he..................dada thakur gauri shankar ke sath chandanpur aakar sari baat kar chuke he............

iska pata ragini bhabhi ko to he.lekin viabhv puri tarah se anjaan he........................

Jab ragini bhabhi ne vaibhav se pucha ki "Kitna Chahte ho Mujhe" to shayad vo apne aur vaibhav ki vivah ki baat vaibhav se karne wali thi lekin......kuch soch kar chup ho gayi............shayad unko bhi andaja ho gaya tha ki vaibhav ko is baat ki koi jaankari nahi he..........

Keep posting Bhai
 

Suraj13796

💫THE_BRAHMIN_BULL💫
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:doh: Har koi ragini aur vaibhav ki suhagrat ka khwaab dekhne laga hai, is chakkar me man se review nahi de rahe. Suraj13796 Bhai short review dene lage...jaise aupcharikta nibha rahe ho. Umakant007 bhai ki abhi kal hi tareef ki thi to wo bhi shaant ho gaye. Lagta hai ab do ki jagah ek hi update dena padega mujhe.. :roll:


Aap aur avsji bhai man laga kar review chhaap rahe hain, Riky bhai starting me short comment karte the wo ab apne review ko vistaar dene lage hain...joki achhi baat hai. Story apne end ke kareeb hi hai....jid din mood zarurat se zyada sahi hua usi din The End likh kar lapata ho jauanga :smoking:



Aur meri taraf se puri ijazat hai Sanju bhaiya ji ki aap avsji bhaiya ji se suhagrat ke scene likhwaaiye aur aanand lijiye.....jaha tak meri baat hai maine to aisa koi scene likha hi nahi hai. Saaf suthra character thi ragini is liye uski izzat ko ghapaghap likh kar taar taar nahi kiya aur Story end kar di...That's it :declare:

(Meri baato ko anyatha mat lena...Mera intention kisi ki bhavnaao ko thes pahuchana bilkul bhi nahi hai....sadiya sa joke samajh kar :buttkick: laga dena baato ko)
भाई मैं रिव्यू बड़ा ही लिखना चाहता हूं पर अभी दो अपडेट में एक ही जैसा situation था, तो जानबूझ कर रिव्यू लंबा नही खींचा, वैसे भी अभी ये कहानी एक बार फिर से पढ़नी है शुरू से, मैं तब भी रिव्यू दूंगा।

बस यहीं कहूंगा की कहानी का साफ सुथरा end कर दिया😞😞 अत्याचार है हम पाठकों पर,

हमारी मांगे वाजिब है और उन्हें please पूरी की जाए 🙏🏻🙏🏻
 
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