रंजू का सफर भाग ८
तपती गर्मी से प्यासी धरती, शायद सावन के महीने का इंतज़ार इसीलिए करती है, कि उसकी प्यास का सुखद अंत बरसते बादल ही कर सकते हैं। असल में बादल का जो पानी है, वो तो धरती ने ही उसे दिया है, जिसे सावन के महीने में वो ब्याज समेत चुकाता है। धरती जब अपनी कोख से पानी देती है, तो बादल का फर्ज बनता है कि वापिस से उसकी कोख को भर दे। सूखी बेजान धरती, अपने ही पानी को पाकर फिरसे हरीभरी हो उठती है।
रिमझिम रिमझिम बारिश की बूंदे, छत पर गिरने के साथ पायल की रुनझुन की तरह शोर मचा रही थी। चारों तरफ काले घने बादल छाए हुए थे। बारिश की मोटी मोटी बूंदे पूरे छत को भिगो चुकी थी। रंजू किसी प्यासी धरती की ही तरह बेचैन और तप रही थी। उसके बदन को वातावरण और तन की गर्मी तपा रही थी। बारिश की बूंदों को देख वो मचल उठी और किसी किशोरी कि भांति उत्साहित होकर भीगने निकल पड़ी। उसने अपने हाथ बढ़ाकर मौसम के मिजाज को परखा। फिर शीतल बरखा के जल को हथेली से अपने चेहरे पर मारा। आज उसके अंदर वाकई में किसी किशोरी की तरह भावनाएं उमर रही थी। वो किसी चंचल लड़की की भांति हरकतें कर रही थी। कुछ ही देर में वो पूरी तरह छत के बीच में आकर खड़ी हो गयी। उसकी साड़ी धीरे धीरे बारिश की बूंदों से गीली हो रही थी। कुछ ही देर में वो पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसके बदन से उसकी साड़ी और ब्लाउज पूरी तरह चिपक गए थे। पूरी तरह चिपकने से उसके चुच्ची और चूतड़ों के उभार पूरी तरह स्पष्ट हो चुके थे। मस्त भारी चूतड़ से गीली साड़ी बड़े ही कामुक अंदाज़ में सिलवटों के साथ चिपकी हुई थी। उसकी साड़ी चूतड़ों के दरार के बीच ऐसे फंसी थी, जैसे उन दोनों चूतड़ों के पाटों के बीच पिस रही हो। ब्लाउज गीले होने की वजह से उसकी चुच्ची की गोलाई और उसपर उभरे हुए चूचक स्पष्ट नज़र आ रहे थे। रंजू का आँचल भी भीग चुका था और वो सिकुड़कर बांये कंधे पर गीलेपन की वजह से टिका हुआ था। उसकी दोनों बड़ी बड़ी चूचियाँ एकदम उभरी हुई थी। ब्लाउज के गीलेपन की वजह से गोरी चूचियाँ और भूरे चूचक स्पष्ट दिख रहे थे। वो बीच बीच में जब कोई हरकत करती तो चूचियों में कंपन और कामुक हरकत हो रही थी। रंजू ने आज बाल खुले ही रखे थे, जबसे संगम नहा कर आयी थी। उसके लंबे काले घने बाल पूरी तरह भीग चुके थे और उसके चेहरे, गाल, गर्दन और पीठ पर चिपके हुए थे। उसके होंठ पर बारिश की बूंदे, गुलाब की पंखुड़ी पर शबनम की बूंदों सी प्रतीत हो रही थी। वो बार बार उन बूंदों को अपने होंठों को मुंह में भरकर पी रही थी। वो पूरी तरह मगन होकर भीग रही थी। अरुण अपनी माँ को भीगते हुए देख रहा था, पर उसने रंजू का ये रूप कभी नहीं देखा था। वो किसी नवविवाहिता की तरह पहली बारिश का आनंद ले रही थी। एक अत्यंत कामातुर नारी, जिसे आज फिरसे किसीने प्यार का अनमोल तोहफा दिया हो, उसके उत्साह की केवल कल्पना ही कि जा सकती है, खासकर तब जब उसकी काम सुख की संभावना बिल्कुल नगन्य हो चुकी हो। अरुण रंजू में एक नई ऊर्जा और खुशी साफ देख रहा था। ये खुशी उसके मन में भी थी, क्योंकि आज उसकी माँ ने उसका प्यार स्वीकार कर लिया था। रंजू के भीगते बदन को देख, उसके अरमान सुलग रहे थे। रंजू के तन बदन में भी काम वासना की तेज लहर उठ रही थी। ऐसे में रंजू बारिश की बूंदों को खुद से आत्मसात कर लेना चाहती थी।
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अरुण ने उसी समय मोबाइल पर गाना चला दिया," थम के बरस हो जरा थम के बरस, मेरा मेहबूब आनेवाला है"। रंजू के कानों में जब ये धुन गयी, तो उसके पैर अपने आप थिरकने लगे। उसे होश नहीं था, कि वो लॉज की छत पर बारिश में अपने बेटे के सामने भीग रही है। उसे अपनी जवानी के दिन याद आने लगे, कैसे उसने सहेलियों के साथ इस गाने पर सहेली की शादी में नाचा था। उसने अपने आँचल को समेटा, और उसे अपनी कमर में खोंस लिया। उसका ब्लाउज से लेके नाभि से काफी नीचे तक का हिस्सा पूरा नंगा हो उठा। फिर वो गाने के बोल के हिसाब से, नाचने लगी। कभी वो अपनी चूचियाँ हिलाती, तो कभी अपने गाँड़ को हिलाते हुए सेक्सी अंदाज़ में नाच रही थी। हिलती चूचियाँ पर कड़क हो चुके चूचक बिल्कुल किसी केक पर रखी चेरी की भांति लग रहे थे। उसकी उठी हुई चूचियाँ किसी भी बुड्ढे को लुभा देती, अरुण तो हट्टा कट्टा नौजवान था। जिन चूचियों से उसने बचपन में माँ का प्यार दूध बनकर, उसका पेट भरता था, आज वही हिलती चूचियाँ उसके अंदर वासना की भूख भड़का रही थी। चूचियों की भारीपन, और गीले होने की वजह से उसके ब्लाउज का एक हुक आगे से खुल गया। भारी भरकम, चूचियों का वजन सीधा, ब्लाउज के छोटे से हुक पर ही तो टिका हुआ था। उसके बार बार हिलोरे मारने और कूदने से चूचियाँ, की घाटी अथवा दरार काफी हद तक स्पष्ट रूप से दिख रही थी। बारिश की बूंदे उसके गले से चूते हुए उसकी चूचियों की घाटी में गायब हो जा रही थी। ब्लाउज धीरे धीरे नीचे की ओर सरक रही थी। अरुण का मन हो रहा था, कि जाके उसके ब्लाउज को फाड़कर, रंजू की चूचियों को आज़ाद कर दे। रंजू बेफिक्र होकर नाच रही थी। रंजू की थिरकती कमर तो और ज्यादा कामुक लग रही थी। उसकी हल्की चर्बीदार दोनों कूल्हे जब हिलते तो अरुण मचल उठता था। बारिश में गीले होते, उन सेक्सी कूल्हों को चिकोटी काटने और चूमने के लिए मचल रहा था अरुण। बारिश की गिरती लगातार बूंदे और उसके ठुमके, रंजू के कमर और कूल्हों को अत्यंत रमणीय बना रहे थे। वैसे इस उम्र में औरतों का पेट निकल आता है, पर रंजू चुकी गांव की काम काजी महिला थी, तो उसके पेट पर हल्की लटकी हुई चर्बी थी। उसकी नाभि का आकार भी काफी बड़ा और अंडाकार सा था। उसका पेट एकदम चिकना और गोरा था। वो बार बार अपने नाभि/ ढोढ़ी के आसपास कामुकता से सहला रही थी। रंजू किसी फिल्म की हीरोइन को अभी मात दे सकती थी। वो कभी अपने हाथ पीछे ले जाकर कमर पर रखकर चूचियाँ हिलाती, तो कभी सर पर रखके। कभी गोल गोल घूमकर दोनों हाथे फैलाये अपने चूतड़ों को हिलाती। उसके चूतड़ों के बीच फंसी उसकी साड़ी, उसके गाँड़ की भव्यता और बढ़ा रही थी।

ऐसे भारी चूतड़ थे जो साड़ी अभी तक टिकी हुई थी, वरना साया से पीछे से निकलने के बावजूद भला उस हल्के कपड़े की क्या बिसात थी। रंजू के साये का ऊपरी हिस्सा दिखने लगा था। तभी रंजू पीछे मुड़के, दोनों हाथ ऊपर करके अपने कूल्हों को झटके के साथ दांये बाएं कर नाच रही थी। फिर कभी उन्हें गोल गोल घुमाकर पीछे की ओर जोर के ठुमके लगा रही थी। उसके चूतड़ों का गोलाकार आकार गीले साड़ी की वजह से साफ साफ पता चल रहा था। पीछे से उसकी कमर भी कामुक अंदाज़ में ऐसे हिल रही थी जैसे, कोई नागिन बलखा रही हो। उसके खुले बाल जब छिटककर उसके गालों और चेहरे पर लगते थे, तो वो और अधिक कामुक लग रही थी। रंजू को इस समय शायद इंद्रदेव अगर देख लेते तो उसे स्वर्ग में अप्सरा बनाकर ले जाते। लेकिन इस समय अप्सरा तो वो थी, पर इंद्र कोई और था उसका अपना बेटा। रंजू की ठुमकती कमर अरुण के अंदर अपनी ही माँ के प्रति गहरी काम वासना भड़का रही थी। तभी उसकी नज़र अपनी माँ के खूबसूरत चेहरे पर गयी। हाय वो गीले गुलाबी होंठ, वो गीले गोर गोर गाल, वो नशीली आंखें, वो गीले काले लंबे बाल, उफ्फ्फ इस उम्र में भी रंजू उसे पच्चीस साल की स्त्री लग रही थी। जब वो गीले होंठों से, गाने के बोल बुदबुदाती तो, इतनी कामुक लग रही थी, जैसे उसके ओठों से पानी नहीं, बल्कि मधुरस टपक रहा हो।
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रंजू वैसे तो विधवा होने की वजह से कम ही कॉस्मेटिक सामान इस्तेमाल कर रही थी। फिर भी उसका रूप उसका यौवन ऐसे खिल रहा था, जैसे वो किसी फ़िल्म की हीरोइन हो। अरुण कमरे के दरवाज़े पर खड़ा, उसके हुस्न, उसके जलवे, उसकी जवानी, उसका रूप, उसके यौवन को आंखों से दिल में उतार रहा था। गाना खत्म होने को आया, रंजू नाचते नाचते रुक गयी। उसकी सांसे तेज चल रही थी, जिस वजह से उसकी चूचियाँ बार बार ऊपर नीचे हो रही थी। वो थक चुकी थी, तो वो वैसे ही नीचे बैठ गयी। रंजू के भारी नितम्भ अपने ही बोझ से छत की सतह पर दब कर फैल गए। फिर वो पीठ के बल लेट गयी। अब बारिश की बूंदे उसके चेहरे से लेकर पैर तक सीधे टकरा रही थी। बारिश में पूरी तरह गीली हो चुकी साड़ी से लिपटी रंजू फर्श पर कामुकता से कभी पेट के बल लेट जाती, तो कभी पलट कर घूम जाती। उसके बदन से बारिश की बूंदे छींट खाकर ऐसे उड़ रही थी, जैसे चिंगारी भड़क रही हो। वो उस बारिश में भी किसी जलते हुए शोले सी भड़क रही थी। तभी उन दोनों की नजरें आपस में मिली। अरुण रंजू को कामुकता भड़ी नजरों से देख रहा था। रंजू की आंखों में भी पुरुष संसर्ग की प्यास साफ झलक रही थी। एक आदमी को और क्या चाहिए, बारिश का मौसम, उसमें भीगती हुई एक औरत और औरत के अंदर भड़कती कामाग्नि की ज्वाला। अरुण रंजू को देखते हुए जाने कब बारिश में भीगते हुए उसकी ओर बढ़ चला। रंजू उसे अपनी ओर आते हुए देख रही थी, और उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। अरुण कुछ ही क्षण में रंजू के पास खड़ा था, वो रंजू की ओर अपना दांया हाथ बढ़ा दिया। रंजू ने अपना हाथ बढ़ाया और उसका हाथ पकड़ के उठने लगी। अब रंजू अपने बेटे के सामने पूरी तरह गीली कामुक स्त्री जैसी खड़ी थी। दोनों के बीच अभी भी एक हाथ की दूरी बनी हुई थी। दोनों एक दूसरे को कामातुर दृष्टि से देख रहे थे। रंजू पहल करते हुए शर्मा रही थी। अरुण ये चाह रहा था, कि रंजू इस बार पहल शुरू करे। लेकिन रंजू अपने ही बेटे से व्यभिचार की शुरुवात करने में लजा रही थी।
अरुण ये समझ गया कि उसे रंजू को थोड़ा धक्का लगाना पड़ेगा। वो उसके और करीब आया और अपनी माँ को कमर से पकड़ लिया। फिर उसे अपनी ओर खींचते हुए बोला," केतना बढ़िया, मौसम भईल बा माई। एकदम कमाल के। गर्मी से राहत हो जाई।"
रंजू उसकी ओर देखते हुए बोली," हॉं, बेटा बहुत निम्मन मौसम भईल बाटे। तपत गर्मी से राहत भेटल बा।"
अरुण," तहरो राहत भईल होई। ई बरखा तहार देहिया के भिगाके एकदम, मस्त क देने होई। अबसे, तू एकदम अलग बुझात बारू।"
रंजू," बबुआ, बरखा, हमार तन मन के एकदम मस्त क दिहलस हो। ई बरखा में भीजके दिल में अजब से खुशी अउर बेचैनी दुनु उठल बाटे।"
अरुण उसके बेहद करीब था और बारिश की बूंदे दोनों की पलको से लगातार टपक रही थी। दोनों की नजरें एक दूसरे की आंखों में डूब जाना चाहती थी। अरुण उसे अपने से चिपकाते हुए पूछा," कइसन बेचैनी??
रंजू की कमर के चारों ओर राजू के हाथ लिपटे हुए थे। उसकी चूचियाँ अरुण के सीने से दब चुकी थी। रंजू उसकी टी शर्ट उतारते हुए बोली," ई बेचैनी आज से ना, बहुत दिन से ह। पर दिल के कोनो कोना में दबल रहला।" फिर उसका हाथ उठाके अपने सीने पर रखते हुए बोली," महसूस करअ हमार दिल के धड़कन अउर ओकर धक धक में बहत बेचैनी के अरुण।"
अरुण रंजू के बांये चुच्ची के ऊपर से रंजू की धड़कन महसूस करने लगा। रंजू उसकी टी शर्ट उतारके उससे पहले की भांति चिपक गयी थी। उस भीगती बारिश में भी, अरुण रंजू के चूचियों के बीच की गर्मी महसूस कर रहा था। रंजू के प्यासे होठ गीले होकर भी प्यासे लग रहे थे। अरुण के सीने को रंजू सहला रही थी। अरुण उसके होठों को बांये हाथ के अंगूठे से छुआ। रंजू जैसे खुद अपने होठ उसपर रगड़ने लगी। अरुण को रंजू की इस हरकत से उसके अंदर की बेचैनी की अंदाजा होने लगा था। दोनों का माथा एक दूजे से चिपका हुआ था। दोनों की सांसें एक दूजे से टकरा रही थी। रंजू ऐसे बेचैन हो रही थी, जैसे वो पहली बार किसी पुरुष के समीप गयी थी। अरुण के अंगूठे को वो खुद होठों के बीच ले ली और चूमने लगी।
अरुण रंजू की चुच्ची को धीरे धीरे मसल रहा था। रंजू उसके छाती को अपनी हथेलियों से महसूस कर रही थी, जैसे कह रही हो मुझे चूम लो, मेरे होठों का रस पी लो। अरुण उस मूक निमंत्रण को स्वीकार करते हुए, उसके होठ को चूमने लगा। रंजू ने खुद अपना सर आगे कर अपने होठ अरुण के होठों से मिला दिया था। वैसे तो छत पर कोई नहीं था, पर ऐसा लग रहा था कि उस चुम्बन को कई लोग देखकर शोर कर रहे हो। ये कोलाहल दोनों की मनः स्थिति को दर्शा रहा था। अरुण रंजू के होठों का पूरा रसपान कर चुका था और उसके मुंह में अपनी जीभ ठूंस चुका था। रंजू अपने बेटे की लपलपाती जीभ अपनी जीभ से खुद लड़ा रही थी। वो अपने मुंह के हर कोने में अरुण के जीभ को महसूस कर रही थी। थोड़ी देर बाद बारी रंजू की थी। दोनों की जीभ अब अपना स्थान अदल बदल कर चुकी थी। रंजु की जीभ अब अपने बेटे के मुंह में कुश्ती लड़ रही थी। जाने कितने देर दोनों इसी अवस्था में खड़े रहे। थोड़ी देर और इस तरह चुम्मा चाटी के बाद, दोनों हांफने लगे।
अरुण," तू त खूब बढ़िया नाचेलु। तहरा देखके कोई ना कह सकेला कि तू एतना बढ़िया नचनिया बारू।"
रंजू थोड़ा हंसी और बोली," हमके ई गाना बहुत पसंद रहला, हमार सहेली के बियाह में हम नाचने रहनि। हमार बियाह में भी ई गीत खूब बाजल रहला।"
अरुण," का बात ह। तू नाच नाच के पूरा माहौल बनाउने होखब।"
रंजू शर्मा गयी। अरुण ने फिर रंजू के बाल पकड़ के उसका सर पीछे की ओर झुका दिया। रंजू की चूचियाँ उभर आई और अरुण ने चूचियों के बीच अपना सर डाल दिया। रंजू उसके सर को पकड़े हुए सिसकारी," सस्स.....स्स......स्ससस्स....सस्स... भर रही थी। अरुण उसके ब्लाउज के हुक खोलने लगा। वो रंजू की चूचियों को बेतरतीब चूमे जा रहा था। रंजू की ब्लाउज की आखरी हुक खुलते ही, चूचियाँ आज़ाद हो उठी। उसके मोटे मोटे भूरे चूचक गर्व से तनके अरुण को चिढ़ा रहे थे। रंजू की ब्लाउज उसके बांहों में फंसी हुई थी। अरुण अपनी माँ के स्तनों को लगातार चूम रहा था।
रंजू," आह...आह...आह...उह अरुण...चु.. चूस..... ल ना। हमार चुच्ची चूस ल। आह... धअ.... ल...अ... अपना मुँह में। खूब... निम्मन से चूसअ..... आपन ....माई के चु... चुच्ची।
अरुण उसकी चूचियों को बांये हाथ से भींच रहा था, और उसकी दांयी चुच्ची के चूचक को अपने मुंह में लेके चूस रहा था। अरुण चूचक को बेरहमी से चूसे जा रहा था। वो बीच बीच में उसपर हल्के से दांत भी काट लेता था। रंजू के मुंह से कामुक आँहें भर भरके उठ रही थी। अरुण रंजू के दोनों चूचियों को बारी बारी चूस रहा था। रंजू अपने ही बेटे की बांहों में अब बहकने लगी थी। रंजू को स्तनपान अथवा चुच्ची चुसवाई करवाने से अत्यंत उत्तेजना हो रही थी। अरुण अपनी माँ के अंदर की कामुक स्त्री के बंद दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था। रंजू की आंखें वासना से लबरेज हो उठी थी। लेकिन अरुण उसे कामुकता से इतना भर देना चाह रहा था, की आज वो चाह कर भी नैतिकता की ओर ना जा पाए। वो अभी भी रंजू के गोरे गोरे चुच्ची को मसल रहा था और बारी बारी चूस रहा था। रंजू बिना संकोच स्तन मर्दन और स्तनपान का आनंद दे रही थी और ले भी रही थी। अरुण ने उसे फिर छत पर ही लिटा दिया। वो उसके ऊपर आ गया और उसकी ब्लाउज निकालके फेंक दिया। रंजू की बालों से भरी कांख ( बगल) उसके सामने थी। गीले होने की वजह से बाल चिपक गए थे। अरुण से रुका ना गया और बोल उठा," माई, तहार कंखिया बहुत मस्त बा। चूस ली का?
रंजू लंपट स्वर में बोली," बेटा, हमार रोम रोम अब तहार बा। जइसे चाहा वइसे करा।"
अरुण ने फिर आव देखा ना ताव सीधा रंजू के बांयी कांख को जीभ फिराके चाटने लगा। रंजू को बीच बीच में गुदगुदी लगती तो वो हंस पड़ती। वहां एक अजीब सी मादक गंध थी। अरुण उसका दीवाना हो उठा। वो कभी दांयी कांख को चूमता तो कभी बांयी कांख को। रंजू अपनी बांहे ऊपर की ओर मोड़े सिसयाते हुए अपनी गर्दन दांये बांये पलटते हुए पड़ी थी। कुछ देर तक ऐसे ही चाटने के बाद, अरुण रंजू को चूमने लगा। रंजू भी उसे पूरी शिद्दत से चूम रही थी। तभी रंजू ने अरुण को पलट दिया, और चूमते हुए खुद उसके ऊपर आ गयी। अरुण को रंजू से इसकी अपेक्षा नहीं थी। रंजू उससे पूरी तरह लिपटी हुई थी। अरुण अपने हाथ रंजू की नंगी पीठ से लेकर कमर और कूल्हों तक फिरा रहा था। वो रंजू को खुद में समा लेना चाहता था। रंजू किसी नवयौवना की भांति, अरुण की ऊर्जा से ऊर्जा मिला रही थी। अरुण ने फिर उसके चूतड़ों को धर दबोचा। रंजू के भारी नितम्भ उसके हाथों में पूरी तरह समा नहीं रहे थे। लेकिन जितना हिस्सा भी उसके पंजों में आया उसने उनको खूब मसलना शुरू कर दिया। रंजू कराह उठी। गीले साड़ी की वजह से चूतड़ों पर पकड़ आसानी से बन रही थी। अरुण ने उसे अपनी ओर खींच लिया और उसकी साड़ी साया समेत उठाने लगा। रंजू खुद उसका सहयोग कर रही थी। थोड़ी ही देर में रंजू की साड़ी उसके कमर तक उठ चुकी थी। अरुण ने उसे हल्का उठने का इशारा किया और उसकी पैंटी की इलास्टिक को पकड़ के खींचने लगा। रंजू की पैंटी घुटनों तक आ चुकी थी। उसकी हल्की झांटों वाली बूर अरुण के आंखों के सामने आ चुकी थी। रंजू फिर मूतने की अवस्था में अरुण के चेहरे के पास बैठ गयी। अब रंजू की साँवली बूर अरुण के मुंह के ऊपर थी। ऐसे मौसम में ये नज़ारा अरुण के दिलो दिमाग में सिवाय कामाग्नि भड़काने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। रंजू अपने बूर पर अरुण के जुबान के हमले के लिए तैयार बैठी थी। उसे खुद इस बात की जल्दी थी, कि कब अरुण उसकी रिसती बूर को अपनी जीभ से चाटे। तभी उसे वो अनुभूति होने लगी, और अरुण अपनी माँ की बूर का रसास्वादन करने लगा। बूर के पानी का खाड़ा स्वाद, उसकी जुबान को भा गया।
रंजू सिसयायते हुए बोली," आह,....उम्म्म्म.... हाय.... केतना बढ़िया बुझाता। ले लअ ..... राजा..... उफ़्फ़फ़फ़..... का बताईं...ब.. बड़ा... बेचैन बानि। पी लअ..... सब.... रस।
अरुण," खुलके बोल ना माई, आह.....कहाँ के रस पी ली.....
रंजू उसकी ओर देख बोली," हमके बेशरम बनाबे चाहेलु मुसवा बेटा। माई के बेशरम बनाइबू का हो।"
अरुण," इहे में त मज़ा आवेला, जब तलक तू खुलके ना बोलबु त मज़ा ना आई। औरत जब बेशरम होखेलि तभी मज़ा आवेला।
रंजू फिर बेशर्मी से बोली," आह... लेकिन .... तहरा सामने हम एतना बेशर्म कइसे बनी। उफ़्फ़फ़फ़.... बड़ा लाज आवेला। त....तहार प..प.पापा के साथ त हम बहुत खुल गईल रहनि। उफ़्फ़फ़फ़....हाय राम।
अरुण," इहे त बात बा रंजू, औरत के शरम के गहना मरद के साथे उतार देवे के चाही। खुलके चुदाई के मज़ा आउर मस्ती करेके बा त, लाज शरम छोड़ दे। बोल कहाँ के रस पी ली।"
रंजू," ब..बु...बूर के रस। अपन माई के बूर के रस पी लअ.... उफ़्फ़फ़फ़ । केतना अजीब बुझा रहल बा। तहरा से अईसे बोल के।
अरुण," लेकिन तहार बूर से त पानी अउर चुवे लागल बा रंजू रानी।"अरुण अपनी माँ को नाम से इसलिए बुला रहा था, ताकि उसका संकोच दूर कर सके। अरुण उसके चूतड़ों को पकड़के बूर को चाटने में लग गया। रंजू उसके बूर से चूती, पानी अपने बेटे की प्यासी जुबान पर गिरा रही थी। अरुण उसके बूर के चीरे से पत्तियों को फैलाके जीभ बीच में घुसेड़ रहा था। रंजू के मुंह से कामुक सिसकारियां निकल रही थी। रंजू की कमर अपने आप ही आगे पीछे हो रही थी, और वो अरुण की जीभ पर बूर को घिस रही थी। अरुण उसकी बूर के दाने को बीच बीच में मुंह में भरके चूस ले रहा था। ऐसे करते ही रंजू की सांसे और सिसकारी दोनों ही तेज हो जाती।
रंजू," आह, सीssssssss. आह ...हह... हाय रे जालिम, आह.... हमके त तू म..म.मस्ता देले बारू। केतना बढ़िया चुसेलु बेटा, माई के बूर .......के आह र..रराजा।"
अरुण उसकी बातें सुनके खुश था, कि उसकी माँ लाज शरम के पर्दे धीरे धीरे हटा रही है। रंजू की आंखें बंद थी, उसने खुद को काफी संतुलित कर रखा था। उसके हाथ दोनों केहुनी से मुड़े हुए अपने सर के पीछे थे। कमर एक लय में अरुण के मुंह पर हिल रही थी। अरुण उसकी बूर में तभी उंगली डाल दिया। एक तरफ बूर में उंगली और दूसरी ओर अरुण का बूर के दाने को छेड़ना रंजू को पागल बना रहा था। उसकी बूर से पानी, किसी रिसते हुए जल प्रपात के स्रोत की तरह धीरे धीरे उसके बूर की फांकों पर से बह रहे थे। कुछ ही क्षणों में रंजू की बूर टहकने लगी, और बूर से पानी का फव्वारा फूट के अरुण के खुले मुंह और चेहरे पर बरस उठा। रंजू कामुकता से चरम सुख को प्राप्त कर चीख उठी। अरुण उसके बूर के पानी को बेहिचक पी गया। उसका स्वाद नमकीन और थोड़ा खाड़ा था। शायद रंजू की मूत भी निकल गयी थी। अरुण ने फिर रंजू की साँसों में काबू आने के बाद, उसे उठने को कहा। रंजू उसकी बात मान उठ खड़ी हुई। उसकी आँखों में थोड़ी लाज थी। अरुण भी खड़ा हो गया। तब रंजू की नज़र अरुण के पैंट पर पड़ी जिसमें, लण्ड तनकर तंबू बना रहा था। रंजू थोड़ा शर्माते हुए, उसके पास आई और अपना हाथ उसके पैंट के अंदर घुसा दिया। उसने अरुण के लण्ड को कसके पकड़ लिया। उसकी नज़रें झुकी हुई थी। अरुण ने उसकी ठुड्ढी पकड़के उसके चेहरे को ऊपर उठाया और बोला," का भईल, हमरा से नज़र मिला ल।
रंजू उसकी ओर देखते हुए बोली," लाज आवेला,।"
अरुण," अभो, तोरा लाज आ रहल बा का। तू त पूरा नंगे बारू ए रानी। हमार हल से तहार खेतवा, पर अभी त जुताई होई रंजू रानी।"
रंजू शर्मा रही थी।अरुण ने फिर अपना पैंट उतार दिया और अपना लण्ड लहरा दिया। रंजू बारिश में भीगते हुए, उसके लण्ड को देख कांप उठी। इतना मुस्टंड लण्ड वो पहली बार करीब से देख रही थी। उसकी आँखों में वासना लहरा उठी। इससे पहले की अरुण उससे कुछ कहता वो खुद घुटनों पर बैठ गयी। और अरुण के सख्त लण्ड को दोनों हथेली में थाम घूर रही थी। अरुण ने रंजू के अंदर की प्यासी औरत को पहचान लिया था, और ये भी अनुमान लगा लिया था कि आज उसे कोई नहीं रोक पायेगा। रंजू अरुण के लण्ड के सुपाड़े को चूमी, और फिर जीभ से उसकी चोंच रूपी छेद में कुरेदा। ऐसा करने से अरुण को असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी। रंजू लण्ड को हौले हौले मुठियाते हुए, चूम रही थी। फिर अरुण की ओर कामुकता से देख मुस्कुराती। अरुण उसके सर पर हाथ रख उसे सहला रहा था। रंजू अरुण के सुपाड़े को मुंह में लेकर जोर से लॉलीपाप की तरह चूस रही थी। वो रुक रुक के उसके सुपाड़े को कभी छोड़ती तो फिर तुरंत लप से मुंह खोलकर चूसना शुरू कर देती।
अरुण," उफ़्फ़फ़फ़ उम्म्मह का बात ह, अउर चूस हमार लांड के। आह .....आह बड़ा निम्मन बुझा रहल बा। केतना मज़ा आ रहल बा माई।"
रंजू," उम्ममम्ममम्मम्म.... ऊमम्म आह....ललप्पप्प,,,, ललप्पप्प का बढ़िया लण्ड ह।
थोड़ी देर चुसाई के बाद, अरुण ने रंजू को वहीं लेटने को बोला। फिर अरुण उसकी जांघों के बीच आकर उसकी बूर के मुंहाने पर अपना लण्ड छुवाने लगा। प्यासी तपती जमीन पर आज बादल बरसने वाले थे। रंजू उत्तेजना के मारे, लण्ड के एहसास से मचल रही थी। अरुण रंजू को इस तरह मचलता देख, खुश था। उसने फिर अपना लण्ड उसके बूर के चिपचिपे पानी से गीला किया। फिर हौले से अगले ही पल उसकी बूर में उतार दिया। रंजू वैसे तो चुदी चुदाई औरत थी, लेकिन अपने बेटे के लण्ड के हमले से, कराह उठी। उसका लण्ड था भी बड़ा सा, जिसे किसी भी स्त्री को लेने में दिक्कत होती। अरुण रंजू को भीनी भीनी बारिश में छत के ही एक कोने में चोद रहा था। लण्ड की पूरी लंबाई बूर में जा चुकी थी। अब तो वो बार बार अंदर बाहर निकल रहा था। रंजू अपने बेटे के नीचे लेटी मस्त चुदवा रही थी। रंजू के दोनों हाथ, अरुण अपने पंजो में लिए हुए था। रंजू के सर के पास उसकी हथेलियां थी। रंजू की प्यासी कामुक आंखें, आधी खुली हुई थी। उसके होठ कांप रहे थे। उसकी दोनों जाँघे फैली हुई थी, जिनके बीच अरुण बैठ कर उसे प्यार के धक्के लगा रहा था। उसकी चूचियाँ बारिश में गीली होकर हिलती हुई और भी नरम और लुभावनी लग रही थी। उसपर बारिश की बूंदे गिरकर जब लुढ़क रही थी, तो और भी कामोत्तेजक दृश्य बन रहा था। अरुण की कमर के धक्कों के साथ, रंजू भी हिल रही थी। तभी अरुण ने रंजू के प्यासे कांपते होठों को अपने होठों के शिकंजे में ले लिया। अरुण उसके होठों को ऐसे चूस रहा था, मानो कोई भंवरा किसी फूल के रस को चूस रहा था। रंजू भी उसके गर्दन को अपनी बांहों में भरकर उसे अपने होठों का मदन रस पिला रही थी। दोनों एक दूसरे में मगन होकर दुनिया भूल चुके थे। थोड़ी देर बाद जब दोनों के चुम्बन का विराम हुआ तो,
रंजू अरुण के माथे को चूमकर बोली,"अरुण हम बहुत पियासल बानि, तू अपन माई के पियास मिटाइबू ना राजा। हमार बूर से पानी हमेशा चुवेला, लांड खातिर। लेकिन तोर पापा, खाली एक महीना खातिर, आवत रहला। उ एक महीना उ हमके जमके चोदत रहले, पर हमके त बारह महीना बूर में लांड चाही। आखिर हमहु औरत बानि, केतनो चुदायिब एक महीना में पर फेर लांड खातिर बूर से पानी चुबे करि। आ हमार पियास तहार, मोट लांड से बुझी।"
अरुण," माई, अब से कउनो रतिया, तहराके पियासल ना सुते के पड़ी। ई हमार वचन बा। पापा जउन तहरा संगे अन्याय कइले बारन, ओकर न्याय बेटा करि। तहरा जइसन चुदक्कड़ माल, कइसे एतना दिन बच गईल इहे आश्चर्य बा। हम त अब तक ई सोचत रहनि कि तू बड़ा सुशील और संस्कारी महिला बिया।
रंजू," तू हमरा पर ध्यान ना दिहलस ना राजा एहीसे बच गईल रहनि। लेकिन जंगल में हिरनी, कब तलिक शेर से बची। एक ना एक दिन हिरनी के शिकार त होबे करि। भले तहार माई बानि, पर कामेच्छा त हमरो बा। कहां जाके नाम डुबौति। अपन अंदर के औरत के समझौने रहनि। पर अब तहरा देखके, सुशील और संस्कारी औरत के जगह, काम पिपासु औरत ले लिहलस।"
अरुण," आवे दे अपन कामेच्छा के उपर, खुल जो पूरा। देख अबसे कइसे तहार, हर तरह के यौन इच्छा हम पूरा करब। रंजू अबसे तहार, हर रात सुहागरात होई, जउन तू अपन बेटा के साथ मनाइबू।
रंजू," सच में अरुण, का अब हमार सब सपना पूरा होई। हर रोज़ सेज बिछी, अउर जउन जउन चीज़ हम सोचले रहनि, उ तू हमरा संग में करबा।
अरुण," खुल के बोल रानी, का तहार इच्छा बा। कइसे कइसे चुदबाबे चाहेलु ?
रंजू," हमके लाज लागेला, जाने तू का सोचबा कि तहार पूजा पाठ वाली माई के मन में एतना गंदा गंदा बतिया कइसे आवेला। लेकिन एगो बात जान ल, कि हर औरत चाहे उ केकरो माई, बहन, बेटी होखो, ओकरा अंदर एगो छिनार जरूर होखेला।"
अरुण," तू देखा ना कि तू केतना बड़की छिनार हउ, बेटा के लांड पर त बइठल बारू।"
रंजू उसकी ओर देखते हुए," खाली हम ही छिनार बानि का। देखलस नइखे कइसे रानी आपन बाप से चुदबाबेली। जइसे बाप बेटी वइसे माई बेटा। तू आपन माई, चोद के खुश बारू ना।
अरुण धक्के लगाता हुआ बोल रहा था," तहरा चोदके, मन के मुराद पूरा हो गइल माई। तहार देहिया के कुल गर्मी उतर जाई। औरतिया के चोदे में मज़ा आवेला, पर माई के चोदे में डबल मज़ा।
रंजू हंसते हुए," जे आपन माई के चोदेले, जानत बारू उ का कहाले मादरचोद। जउन बूर से निकलेले, उहे बूर में लांड घुसाके, छितरावेला।
अरुण," तहरा जइसन छिनार माई, मादरचोद के ही जन्म दी।" दोनों जोर से हंस पड़े। रंजू अब पूरी तरह खुल चुकी थी। अरुण ने फर्श पर बैठे, रंजू को उठाकर अपनी गोद में लण्ड पर बैठने का इशारा किया। रंजू खड़ी हुई फिर साड़ी और साया जो कमर में था, उसे उतार फेंकी। और अपने बेटे के सामने सम्पूर्ण नग्नावस्था में खड़ी थी। रंजू के बदन पर कपड़े का एक टुकड़ा भी नहीं था। रंजू फिर अपने बेटे के लण्ड पर बैठने लगी। अरुण का लण्ड उसकी बूर की गहराईयों में उतरने लगा। रंजू की आंखें अनायास ही बन्द हो गयी। उसने अरुण को अपने चूचियों से लगा लिया। अरुण उसकी चूचियों में सर रखके रंजू की कमर को थामे हुआ था। रंजू अब उसके लण्ड पर हल्के हल्के कूद रही थी। अरुण उसके चूतड़ों पर हाथ से काबू किये हुए था।
रंजू," आह...आह...उफ्फ्फ खूब चोदआ अरुण मादरचोद कस कस के चोद। जउन बेटा के सामने पवित्र रहनि, आज ओकरे लांड पर बईठके चुदवा रहल बानि।"
अरुण," तू हमरा खातिर अभी भी पहिले जइसे रहबू माई। तहार पवित्रता के केहू दोसर आदमी सवाल ना कर सकिले। तहार हमार रिश्ता घर के भीतर मरद मेहरू वाला होई और दुनिया के सामने पवित्र माई बेटा के।
रंजू," पहिले जइसन अब कुछ ना रही अरुण, काहे कि औरत आ मरद जब एक बार चुदाई कर ले, त दुनु के खाली एकांत चाही और दुनु एक दोसर के भोगी।"
रंजू इस अवस्था और भी कामुक लग रही थी। वो बारिश में भीगकर और भी आकर्षक और कामातुर लग रही थी। अरुण के धक्के भी तेज हो रहे थे। बूर की दीवारों से अरुण के घिसते लण्ड का एहसास रंजू की बूर से अत्यधिक काम रास का रिसाव कर रहा था। एक बेचैन, प्यासी, कामुक स्त्री होकर वो अपने बेटे संग काम लीला में लीन हो गयी थी। लण्ड का बूर से बार बार बाहर आना और घुसना, उसके अंतरात्मा को एक सुकून दे रहा था। कितना अजीब है ये लण्ड बूर का संगम, जिसमें कोई भेदभाव नहीं था। ना बूर को कोई संकोच था, कि जो लण्ड घुसा है वो बेटे का है, और ना ही लण्ड को कोई संकोच था कि वो मां की बूर में घुस चुका है। अगर शरीर रिश्ते देखती तो शायद रुक जाती, पर उसे तो बस भूख मिटाने से मतलब है। रिश्तों की डोर तो कहीं पीछे छूट गयी थी। अब तो बस एक दूजे की प्यास मिटाना ही मकसद था। दोनों की कामुक आँहें और गर्म सांसें उस आंच को सुलगा रही थी, जो दोनों के मन में एक दूजे को मड़ई के पीछे देखके भड़की थी। रंजू ने ट्रेन में किसी तरह चुदने से खुदको बचा लिया था, पर आज वासना के आगे वो नतमस्तक हो चुकी थी। बूर में लण्ड लेकर उसका अधूरापन पूरा हो चुका था। लण्ड तो आखिर लण्ड है वो चाहे किसी का भी हो।
दोनों इस तरह करीब आधे घंटे तक चुदाई करते रहे। दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हुए, आखिरकार झड़ने लगे। अरुण रंजू की बूर में तेज धक्के मारते हुए उसके कंधों पर लुढ़क गया। रंजू की बूर टहक रही थी, उस चरम सुख की प्राप्ति से। दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। दोनों की सांसें तेज़ चल रही थी। तपती धरती पर पहली बारिश हो चुकी थी।
बारिश लगभग रुक चुकी पर फुहारे अभी भी पर रही थी, दोनों निर्वस्त्र खुले आसमान के नीचे लेटे हुए थे। रंजू अरुण के ऊपर लेटी हुई थी। अरुण उसके दोनों चूतड़ों को पकड़के सहला रहा था। एक खामोशी सी छाई हुई थी। तभी खामोशी को तोड़ते हुए रंजू बोली," अरुण, हमके पेशाब लागल बा। हमके मूते जाय दअ।"
अरुण ने जब रंजू के मुंह से ये बात सुनी, तो उसके कान खड़े हो गए। उसने रंजू की ओर देखा और उसे चूमते हुए बोला," हम तहरा मूते देखत चाहत बानि।"
रंजू," कइसन बात कहत हो, तहरा के लाज ना आई। अपन माई के मूतत देखत चाहत बारू। बेशरम मुसवा।"
अरुण," माई, अब कइसन लाज शरम। तहार हमार रिश्ता अब माई बेटा के साथ साथ मरद औरत के हो गइल बा। औरत के जब हम कुल ऊपर से नीचा तक नंगा कइके, चोदे देले बानि, त औरतिया काहे लजात बिया। हम त ना लजाइब।"
रंजू," लेकिन बेटवा, तहरा सामने कभू कइनी ना। एकदम अजीब बुझा रहल बा। ई देखके तहरा का मिली। शरीर के गंदगी बा।"
अरुण," इहे त देखेके बा, कि माई के बूर से पेशाब के धार कइसन छुल छुल निकलेला। आ उ गंदगी ना, हमार खातिर अमृत ह माई।" ऐसा बोलके उसने रंजू को खड़े किया और खुद उसके नीचे ठीक बूर के सामने बैठ गया। रंजू एक बार फिर बोली," अरुण, इँहा ठीक ना बुझा रहल बा। हमके बाथरूम जाय दे, केहू आ जाई त।"
अरुण," माई, जब अभी तक केहू ना आईल, त अब के आई, दु मिनट लगी। नखरा मत कर।"
रंजू अपने पैर पटकते हुए बोली," ढेरी जोर से मूत लागल बा। जिद ना कर बेटा। हम बाद में तहरा देखा देब।"
अरुण," जिद तू क रहल बारू, हम कहतानि कि मूत एज्जे। औरत के नन्हा बूर से पेशाब के धार हमके देखके बा।" वो उसकी कमर को थामके बोला।
रंजू अपने बेटे, और मूत के प्रेशर से तंग हुई पड़ी थी। उससे जब रहा नहीं गया, तो वो बोली," ना मानबु, त ले अब हमसे बर्दाश्त ना हो रहल बा। बड़ी देर से रोकले बानि।" और फिर उसके बूर से छुल छुला कर मूत के फौवारे से छूटे। रंजू की बूर और उसके आसपास की जांघ का हिस्सा अरुण के वीर्य से पूरी तरह सना हुआ था। वो मूत की पहली धार, उसे साफ करती हुई बहने लगी। अरुण ये अनमोल दृश्य, अपनी आंखों में सजो रहा था। वो बूर की पत्तियों के खुले दरवाज़े, से चिपककर बहती पेशाब की धार को, बहता देखकर झूम उठा। रंजू खड़े खड़े जीवन में कभी मूती नहीं थी। और वो अनायास ही बैठने लगी, जिससे उसके मूत की धार सीधे अरुण के चेहरे पर बरसने लगी। रंजू की गर्म मूत की धार अपने चेहरे पर महसूस कर वो मचल उठा। अपनी माँ के बूर से बरसते उस पवित्र खाड़े जल को, वो मुंह के बर्तन में एकत्रित करने लगा। उसने रंजू की जांघ, पकड़ हुई थी, और उसे उसी अवस्था में रोक दिया था। रंजू को खुद पर काबू नहीं था, क्योंकि वो बहुत देर से मूती नहीं थी और ऊपर से बारिश में गीले होने की वजह से और भी जोर की मूत आई थी। वो अपनी बूर से तेज़ धार लगातार मारे जा रही थी। और अरुण उसके मूत्राशय रूपी जल प्रपात का पानी, किसी प्यासे की तरह पी रहा था, जैसे उसे मीठे पानी का झरना मिल गया हो। रंजू उसे देख, थोड़ा थोड़ा मुस्कुरा रही थी, पर उसके चेहरे पर मूत निकलने की राहत ज्यादा थी। एक संस्कारी औरत ये भी कर सकती है, उसे ये खुद पर भरोसा नहीं हो रहा था। जब तक उसकी पेशाब की धार कमजोर नहीं हुई, तब तक अरुण उसका पेशाब पीता रहा। इस क्रम में बहुत सारा पेशाब छूटकर उसके शरीर को गीला भी कर गया। पर वो किसी शराबी सा अपनी माँ के बूर रूपी मधुकलश से पेशाब के पैमाने पीता रहा। थोड़ी देर बाद धार जब बंद हुई, तो अपने होठों को चाटता हुआ, बूर से टपकते बूंदों को अपनी हथेली में जमा करने लगा।
रंजू हंसते हुए," मुसवा बेटा, ई का करतारू, हाथ से काहे पेशाब उठा रहल बारू। छोड़ द "
अरुण," माई, तहार बूर से चुवेला ई पानी पेशाब ना अमृत ह। ई पीके हमार तन मन तंदरुस्त हो गइल बा। अब तहार मूत त हमके रोज चाही।"
रंजू हंसते हुए बोली," तहरा के एतना बढ़िया लागल का राजा। ई बूर के खाड़ा पेशाब के स्वाद।"
अरुण,सर हिलाते हुए बोला" हॉं माई, तहार पेशाब के स्वाद हमके एकदम निम्मन बुझाईल।" ऐसा बोलके उसने अपनी अंजुली में पड़े एकत्रित मूत को पीने लगा। फिर उसने रंजू की जांघों और बूर के आसपास पेशाब से गीले त्वचा को चाट लिया। फिर बूर को जीभ से कुरेद कुरेद के एक एक बूंद चट कर गया। रंजू उसे देख, अचंभित और उत्तेजित दोनों थी। वो उसके सामने घुटनों पर बैठ गयी और उसकी आँखों में देखते हुए उसे चूमने लगी। उसे भी अपनी बूर के पेशाब का खाड़ा स्वाद का एहसास हुआ। वो लेकिन उसे चूमती रही। दोनों एक बार फिर गर्म हो चुके थे। रंजू उसके लण्ड को पकड़के सहला रही थी। अरुण रंजू की चूचियों को पकड़के मसल रहा था। रंजू खुद अपने चूचियों को उसके मुंह में देना चाह रही थी। अरुण ने फिर रंजू की चूचियों को पर्याप्त सम्मान देते हुए, उन्हें चूसने लगा। रंजू उसका लण्ड हिला रही थी।
रंजू," आह,,, सीसीसी ....इशशश.... असही चुसत रहलु बचपन में तू हमार दुनु चुचिया। तब तू अपन भूख मिटात रहलु, अब फ़र्क़ एतना बा कि ई चुसिके तू हमार पियास मिटा रहल बारू। खूब पी लsss ई चुचिया के, दूध के धार निकाल द, मुसवा बेटा।" रंजू बड़बड़ा रही थी।
अरुण," माई, कसम से, तहार चुच्ची चुसे में बड़ा आनंद आ रहल बा। हाय ई तनल तहार कारी अंगूर जइसन तहार चूचक।"
रंजू," त पिलअ, राजा जइसे मन करे। चुसि चुसि के तू अउर तहार पापा बड़ा कइले बारन सं। जेतना चुसाई उतना आकार अउर पियास बढ़ी। औरतिया के सबसे कामुक हिस्सा चूचक ही बारे।"
अरुण," एहीसे त चुसत अउर मर्दन दुनु करत बानि।" दोनों इसी तरह कामोत्तेजक बातें करके एक दूसरे को उकसा रहे थे। रंजू अपने बूर में लण्ड लेने के लिए फिरसे कामातुर हो चुकी थी। उसकी आँखों में फिरसे जगी प्यास साफ पता चल रही थी।
रंजू वासना में डूबी हुई सी बोली," घुसावा ना, अरुण।"
अरुण उसके होंठों को छूते हुए पूछा," का घुसाई बोला ना।"
रंजू उसके लण्ड को दबोचते हुए बोली," ई, जउन कूद रहल बा, मुसवा।"
अरुण," ना खुलके बोला, कि तहरा का चाही, कहां चाही, कहां घुसाई।"
रंजू ने सोचा कि शर्माने का कोई फायदा नहीं, वैसे भी दोनों ने थोड़ी देर पहले ही ये काम किया था। फिर उसकी आँखों में आंखें डालके वो बोली," तहार बड़का लांड, हमार बूर में घुसावा मुसवा बेटा।"
अरुण," आ ओकर बाद, का करि।
रंजू," फेर हमार बूर में लांड आगे पीछे करके हमके चोदिहा रे मादरचोद।"
अरुण," उफ़्फ़फ़फ़,,,,, उफ्फ्फ रंडी बिया तू। बेटा के लांड से बूर चुदबाबे में बड़ा मन लाग रहल बा का।"
रंजू," अब का बेटा आ का माई, हरामी। तहरा के का पता कि हम केतना पियासल बानि। चुपचाप लांड घुसा दे। ना त...
अरुण," ना.....त,ना...त का?
रंजू उसके लण्ड को पकड़े हुए बोली," देखा दी, देखबू का?
अरुण इससे पहले कुछ समझ पाता, रंजू उसके लण्ड को बूर के मुहाने पर दोनों फांकों के बीच रगड़ने लगी। लण्ड का कड़क सुपाड़ा बूर के रस से भीग गया और चिकना हो गया। रंजू उसपर बैठती चली गयी। बूर लण्ड का खुली फांकों से स्वागत करती चली गयी।
रंजू के मुंह से कामुक सित्कार निकल रही थी। अरुण अपने दोनों हाथ पीछे की ओर टिकाए रंजू को बैठने की पर्याप्त जगह दे रहा था। रंजू लण्ड पर गाँड़ कुदका रही थी और अपनी मस्ती में बड़बड़ा रही थी।
रंजू," उफ़्फ़... जिनगी में पहली बार, अइसन लांड मिलल बा, जउन एतना जल्दी फेर से तैयार हो गइल। हमार बूर अइसन लांड चाहत रहनि। हरदम बूर से पानी चुवत बिया। तहार पापा कभू एकरा ठीक से शांत ना कइलस।"
अरुण," काहे माई, पापा तहके ठीक से चोदत ना रहला का?
रंजू," चोदत रहले, पर उ खाली एक महीना खातिर आवत रहले नु। एक महीना में हमके उ बस दस पंद्रह दिन ही चोदत रहले।"
अरुण," दस पंद्रह दिन कम बा का?
रंजू," अउर ना त का। मेहरू एगारह महीना पियासल रही, त दस दिन के चुदाई से का होई। कम से कम पूरा महीना त जमके चोदे के चाही ना।"
अरुण," माई दस दिन में तहार मन ना भरेला। अरे पापा के त तू कचूमर निकाल देत होई।"
रंजू," एहीसे त तरह तरह के दवाई, शिलाजीत, सब के व्यवस्था करत रहनि। ताकि सारा सारा रतिया उ हमके धर के पेलत रही। लेकिन उ एक ही बेर करत रहुवे। हमके कम से कम दु से तीन बेर लांड चाही। देखा ना अभी भी हम बहुत कम चुदौनी हअ। लेकिन अब अपन पापा के कमी तहके ही पूरा करे के पड़ी।"
अरुण," का कहत बारू, तू त एकदम चुदक्कड़ माल बिया। तू टेंशन मत ले, आज से तू संभोग के सम्पूर्ण सुख भोगबु। तहके जेतना मर्ज़ी उतना बेर चोदब। पापा जउन काम अधूरा छोड़ले बानि उ काम, सब बेटा के पूरा करेके पड़ी।"
रंजू," जब बाप के स्वर्गवास होखेला, त कुल संपत्ति बेटा लेवेला। औरत भी एक तरह से संपत्ति ही होखेला। उ हिसाब से हमहुँ तहार हो गइनी राजा। हमर ध्यान तहरे राखे के पड़ी"
अरुण," तू सच कह रहल बारू माई, अबसे पापा के एक एक चीज़ हमार बा। तू भी उमे से एक बारू। तहार ध्यान त राखे के पड़ी। तहार हर जरूरत पूरा करे के पड़ी,भले शरीर के काहे ना हो।"
रंजू और वो मुस्कुराए और फिर अरुण ने उसे अपने नीचे वापिस लिटा दिया। रंजू की बूर में अभी भी लण्ड घुसा ही हुआ था। अरुण रंजू को ताबड़तोड़ चोद रहा था। अरुण की कमर किसी इंजन की पिस्टन की तरह ऊपर नीचे हो रही थी। रंजू उसके नीचे अपने पैरों की कैंची बनाके लेटी हुई धक्के ले रही थी। अरुण उसे चूमे जा रहा था। बूर की चुदाई में लण्ड कोई कंजूसी नहीं कर रहा था। बूर तो खुद ही बिछी हुई थी, लुटने के लिए। सुपाड़े बार बार रंजू की बच्चेदानी को छू कर वापिस आ जा रहा था। रंजू उस एहसास से पहले से परिचित थी, फिर भी नए युवा साथी के पाने की खुशी में, वो और भी उत्साहित और उत्तेजित महसूस कर रही थी। कोई बीस से पच्चीस मिनट की धमाकेदार चुदाई के बाद, अरुण की कमर अकड़ने लगी। रंजू उसका भरपूर साथ दे रही थी।
अरुण," आह.... रंजू हमार गिरे वला ह रानी। तहार बुरवा में निकल जाई।
रंजू," उम्म्म्म..... आआऊऊ.......गिरा दे राजा, गिरा दे, दुनु के एक साथ होए वला ह। हमहुँ झड़ब, तहरा साथे।"
थोड़ी देर में बूर में लण्ड का गाढ़ा पानी निकल आया और रंजू की बच्चेदानी से टकरा गया। ठीक उसी समय रंजू भी कमर उचकाके झड़ रही थी। दोनों चरमसुख को प्राप्त कर चुके थे। अरुण रंजू के ऊपर ही लेटा था। बारिश अब पूरी तरह बंद हो चुकी थी। तभी उन दोनों को छत पर किसी के आने की आहट सुनाई दी। रंजू नंगी ही अरुण को धक्का देकर उठी, और कमरे की ओर भागी। अरुण भी कपड़ों की चिंता छोड़, रंजू के पीछे भागा। दोनों के कपड़े छत पर ही पड़े हुए थे, गीले से मैले कुचले से। अरुण ने भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। छत पर खाने के लिए पूछने लड़का आया हुआ था। अरुण ने खाना आर्डर कर दिया। वो लड़का बाहर से ही आर्डर लेकर जा रहा था, तभी उसने उनके छत पर गिरे कपड़े देख लिए और बोला," भैया आपके कपड़े छत पर गिरे हुए हैं, शायद बारिश में गिर गए हो।" उसे क्या पता था, कि दोनों ने खुद कपड़े बारिश में ही उतारे हैं। रंजू शर्म से पानी पानी हुई पड़ी थी। दोनों इस वक़्त कमरे में नंगे ही थे। रंजू तौलिये से बदन पोंछी, और फिर खुदको ढकने की कोशिश कर रही थी। अरुण ने वो तौलिया खींच लिया और अपना बदन पोछने लगा। रंजू फिर लजा उठी।
अरुण ने फिर रंजू से कहा," जाके कपड़ा उठा लावा।"
रंजू," अईसे लँगटे जाईं का बाहरी।
अरुण," त का भईल, अभी तक छत पर का करत रहलु।"
रंजू," बारिश रुक गईल बा, केहू आ जाइ तब। ना हम ना जाईब। तू ले ले आवा।"
अरुण," त रहे द, हमहुँ ना उठाईब।"
रंजू," इहे सब करवाबे हमरा से। अच्छा रुक हम ले आवतानी।"
अरुण ने दरवाज़ा खोल दिया और रंजू दौड़ते हुए नंगी ही छत के बीचो बीच भागी। उसके चूतड़ दांये बांये हिल रहे थे। कूल्हों की उछाल उसके दिल पर छुड़ियाँ चला रही थी। रंजू किसी नंगी अप्सरा सी लग रही थी। उसके बदन का हर हिस्सा उसके नंगेपन में खुलके सामने आ रहा था। उसकी कमर, जाँघे, पिंडलियाँ, तलवे, पैर, उसके लहराते बाल। इतना चुदवाने के बावजूद उसमें काफी ऊर्जा थी। फिर जब वो कपड़े उठाने को झुकी तो उसके चूतड़ दोनों फैल गए और उसके गाँड़ का भूरा छेद साफ साफ नजर आने लगा। रंजू ऐसे में अरुण को पूरा पूरा मनमोहक दृश्य दे रही थी। वो बार बार झुकके अपने और अरुण के कपड़े उठा रही थी। अरुण का मन ललचा गया। वो तौलिया छोड़ नंगा ही रंजू की ओर जाने लगा। इससे पहले की रंजू कुछ समझ पाती, वो अरुण की बांहों में थी और अरुण उसे अपने गोद में उठाके कमरे की ओर चल दिया। रंजू अरुण के गर्दन के इर्द गिर्द हाथ का घेरा बनाये हुए थी, और पैरों से उसके कमर के इर्द गिर्द कैंची बनाके टिकी हुई थी। अरुण उसकी जाँघे पकड़के, उसे उठाये था। उसका तना हुआ लण्ड उसके चूतड़ों से टकड़ा रहा था। रंजू बोली," ए मुसवा बेटा, तू कभू किधरो से आ जाला हो। कपड़ा के पसारे के पड़ी। छोड़ द"
अरुण," रात में कहां छत पर कपड़ा सुखी, रूम में कुर्सी पर रख दिहअ।"
रंजू मुस्कुरा उठी और अरुण भी, दोनों नंगे ही कमरे में प्रवेश कर गए और दरवाज़ा बंद हो गया।
जैसे ही दोनों कमरे में आये की फोन की घंटी बज उठी, वो अंजू का फोन था। रंजू उससे बात करने लगी। अंजू उन दोनों के सफर और काम के बारे में पूछने लगी। रंजू ने गीले कपड़े, कुर्सी पर डाल दिया। अरुण पानी पी रहा था। थोड़ी देर में खाना आ गया, दोनों को भूख भी लगी हुई थी। दोनों खाने के बाद फिर बिस्तर पर एक दूसरे के आलिंगन में सिमट गए। उस रात अरुण ने रंजू को दो बार और जमके चोदा। ये चुदाई रात के तीन बजे तक चली। जिसके बाद दोनों ही तृप्त होकर सो गए। शायद रंजू को अपनी प्यासी धरती का बादल मिल चुका था।