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Incest रिश्तों का कामुक संगम

Satyaultime123

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रंजू का सफर भाग ८
तपती गर्मी से प्यासी धरती, शायद सावन के महीने का इंतज़ार इसीलिए करती है, कि उसकी प्यास का सुखद अंत बरसते बादल ही कर सकते हैं। असल में बादल का जो पानी है, वो तो धरती ने ही उसे दिया है, जिसे सावन के महीने में वो ब्याज समेत चुकाता है। धरती जब अपनी कोख से पानी देती है, तो बादल का फर्ज बनता है कि वापिस से उसकी कोख को भर दे। सूखी बेजान धरती, अपने ही पानी को पाकर फिरसे हरीभरी हो उठती है।

रिमझिम रिमझिम बारिश की बूंदे, छत पर गिरने के साथ पायल की रुनझुन की तरह शोर मचा रही थी। चारों तरफ काले घने बादल छाए हुए थे। बारिश की मोटी मोटी बूंदे पूरे छत को भिगो चुकी थी। रंजू किसी प्यासी धरती की ही तरह बेचैन और तप रही थी। उसके बदन को वातावरण और तन की गर्मी तपा रही थी। बारिश की बूंदों को देख वो मचल उठी और किसी किशोरी कि भांति उत्साहित होकर भीगने निकल पड़ी। उसने अपने हाथ बढ़ाकर मौसम के मिजाज को परखा। फिर शीतल बरखा के जल को हथेली से अपने चेहरे पर मारा। आज उसके अंदर वाकई में किसी किशोरी की तरह भावनाएं उमर रही थी। वो किसी चंचल लड़की की भांति हरकतें कर रही थी। कुछ ही देर में वो पूरी तरह छत के बीच में आकर खड़ी हो गयी। उसकी साड़ी धीरे धीरे बारिश की बूंदों से गीली हो रही थी। कुछ ही देर में वो पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसके बदन से उसकी साड़ी और ब्लाउज पूरी तरह चिपक गए थे। पूरी तरह चिपकने से उसके चुच्ची और चूतड़ों के उभार पूरी तरह स्पष्ट हो चुके थे। मस्त भारी चूतड़ से गीली साड़ी बड़े ही कामुक अंदाज़ में सिलवटों के साथ चिपकी हुई थी। उसकी साड़ी चूतड़ों के दरार के बीच ऐसे फंसी थी, जैसे उन दोनों चूतड़ों के पाटों के बीच पिस रही हो। ब्लाउज गीले होने की वजह से उसकी चुच्ची की गोलाई और उसपर उभरे हुए चूचक स्पष्ट नज़र आ रहे थे। रंजू का आँचल भी भीग चुका था और वो सिकुड़कर बांये कंधे पर गीलेपन की वजह से टिका हुआ था। उसकी दोनों बड़ी बड़ी चूचियाँ एकदम उभरी हुई थी। ब्लाउज के गीलेपन की वजह से गोरी चूचियाँ और भूरे चूचक स्पष्ट दिख रहे थे। वो बीच बीच में जब कोई हरकत करती तो चूचियों में कंपन और कामुक हरकत हो रही थी। रंजू ने आज बाल खुले ही रखे थे, जबसे संगम नहा कर आयी थी। उसके लंबे काले घने बाल पूरी तरह भीग चुके थे और उसके चेहरे, गाल, गर्दन और पीठ पर चिपके हुए थे। उसके होंठ पर बारिश की बूंदे, गुलाब की पंखुड़ी पर शबनम की बूंदों सी प्रतीत हो रही थी। वो बार बार उन बूंदों को अपने होंठों को मुंह में भरकर पी रही थी। वो पूरी तरह मगन होकर भीग रही थी। अरुण अपनी माँ को भीगते हुए देख रहा था, पर उसने रंजू का ये रूप कभी नहीं देखा था। वो किसी नवविवाहिता की तरह पहली बारिश का आनंद ले रही थी। एक अत्यंत कामातुर नारी, जिसे आज फिरसे किसीने प्यार का अनमोल तोहफा दिया हो, उसके उत्साह की केवल कल्पना ही कि जा सकती है, खासकर तब जब उसकी काम सुख की संभावना बिल्कुल नगन्य हो चुकी हो। अरुण रंजू में एक नई ऊर्जा और खुशी साफ देख रहा था। ये खुशी उसके मन में भी थी, क्योंकि आज उसकी माँ ने उसका प्यार स्वीकार कर लिया था। रंजू के भीगते बदन को देख, उसके अरमान सुलग रहे थे। रंजू के तन बदन में भी काम वासना की तेज लहर उठ रही थी। ऐसे में रंजू बारिश की बूंदों को खुद से आत्मसात कर लेना चाहती थी।

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अरुण ने उसी समय मोबाइल पर गाना चला दिया," थम के बरस हो जरा थम के बरस, मेरा मेहबूब आनेवाला है"। रंजू के कानों में जब ये धुन गयी, तो उसके पैर अपने आप थिरकने लगे। उसे होश नहीं था, कि वो लॉज की छत पर बारिश में अपने बेटे के सामने भीग रही है। उसे अपनी जवानी के दिन याद आने लगे, कैसे उसने सहेलियों के साथ इस गाने पर सहेली की शादी में नाचा था। उसने अपने आँचल को समेटा, और उसे अपनी कमर में खोंस लिया। उसका ब्लाउज से लेके नाभि से काफी नीचे तक का हिस्सा पूरा नंगा हो उठा। फिर वो गाने के बोल के हिसाब से, नाचने लगी। कभी वो अपनी चूचियाँ हिलाती, तो कभी अपने गाँड़ को हिलाते हुए सेक्सी अंदाज़ में नाच रही थी। हिलती चूचियाँ पर कड़क हो चुके चूचक बिल्कुल किसी केक पर रखी चेरी की भांति लग रहे थे। उसकी उठी हुई चूचियाँ किसी भी बुड्ढे को लुभा देती, अरुण तो हट्टा कट्टा नौजवान था। जिन चूचियों से उसने बचपन में माँ का प्यार दूध बनकर, उसका पेट भरता था, आज वही हिलती चूचियाँ उसके अंदर वासना की भूख भड़का रही थी। चूचियों की भारीपन, और गीले होने की वजह से उसके ब्लाउज का एक हुक आगे से खुल गया। भारी भरकम, चूचियों का वजन सीधा, ब्लाउज के छोटे से हुक पर ही तो टिका हुआ था। उसके बार बार हिलोरे मारने और कूदने से चूचियाँ, की घाटी अथवा दरार काफी हद तक स्पष्ट रूप से दिख रही थी। बारिश की बूंदे उसके गले से चूते हुए उसकी चूचियों की घाटी में गायब हो जा रही थी। ब्लाउज धीरे धीरे नीचे की ओर सरक रही थी। अरुण का मन हो रहा था, कि जाके उसके ब्लाउज को फाड़कर, रंजू की चूचियों को आज़ाद कर दे। रंजू बेफिक्र होकर नाच रही थी। रंजू की थिरकती कमर तो और ज्यादा कामुक लग रही थी। उसकी हल्की चर्बीदार दोनों कूल्हे जब हिलते तो अरुण मचल उठता था। बारिश में गीले होते, उन सेक्सी कूल्हों को चिकोटी काटने और चूमने के लिए मचल रहा था अरुण। बारिश की गिरती लगातार बूंदे और उसके ठुमके, रंजू के कमर और कूल्हों को अत्यंत रमणीय बना रहे थे। वैसे इस उम्र में औरतों का पेट निकल आता है, पर रंजू चुकी गांव की काम काजी महिला थी, तो उसके पेट पर हल्की लटकी हुई चर्बी थी। उसकी नाभि का आकार भी काफी बड़ा और अंडाकार सा था। उसका पेट एकदम चिकना और गोरा था। वो बार बार अपने नाभि/ ढोढ़ी के आसपास कामुकता से सहला रही थी। रंजू किसी फिल्म की हीरोइन को अभी मात दे सकती थी। वो कभी अपने हाथ पीछे ले जाकर कमर पर रखकर चूचियाँ हिलाती, तो कभी सर पर रखके। कभी गोल गोल घूमकर दोनों हाथे फैलाये अपने चूतड़ों को हिलाती। उसके चूतड़ों के बीच फंसी उसकी साड़ी, उसके गाँड़ की भव्यता और बढ़ा रही थी।

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ऐसे भारी चूतड़ थे जो साड़ी अभी तक टिकी हुई थी, वरना साया से पीछे से निकलने के बावजूद भला उस हल्के कपड़े की क्या बिसात थी। रंजू के साये का ऊपरी हिस्सा दिखने लगा था। तभी रंजू पीछे मुड़के, दोनों हाथ ऊपर करके अपने कूल्हों को झटके के साथ दांये बाएं कर नाच रही थी। फिर कभी उन्हें गोल गोल घुमाकर पीछे की ओर जोर के ठुमके लगा रही थी। उसके चूतड़ों का गोलाकार आकार गीले साड़ी की वजह से साफ साफ पता चल रहा था। पीछे से उसकी कमर भी कामुक अंदाज़ में ऐसे हिल रही थी जैसे, कोई नागिन बलखा रही हो। उसके खुले बाल जब छिटककर उसके गालों और चेहरे पर लगते थे, तो वो और अधिक कामुक लग रही थी। रंजू को इस समय शायद इंद्रदेव अगर देख लेते तो उसे स्वर्ग में अप्सरा बनाकर ले जाते। लेकिन इस समय अप्सरा तो वो थी, पर इंद्र कोई और था उसका अपना बेटा। रंजू की ठुमकती कमर अरुण के अंदर अपनी ही माँ के प्रति गहरी काम वासना भड़का रही थी। तभी उसकी नज़र अपनी माँ के खूबसूरत चेहरे पर गयी। हाय वो गीले गुलाबी होंठ, वो गीले गोर गोर गाल, वो नशीली आंखें, वो गीले काले लंबे बाल, उफ्फ्फ इस उम्र में भी रंजू उसे पच्चीस साल की स्त्री लग रही थी। जब वो गीले होंठों से, गाने के बोल बुदबुदाती तो, इतनी कामुक लग रही थी, जैसे उसके ओठों से पानी नहीं, बल्कि मधुरस टपक रहा हो।


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रंजू वैसे तो विधवा होने की वजह से कम ही कॉस्मेटिक सामान इस्तेमाल कर रही थी। फिर भी उसका रूप उसका यौवन ऐसे खिल रहा था, जैसे वो किसी फ़िल्म की हीरोइन हो। अरुण कमरे के दरवाज़े पर खड़ा, उसके हुस्न, उसके जलवे, उसकी जवानी, उसका रूप, उसके यौवन को आंखों से दिल में उतार रहा था। गाना खत्म होने को आया, रंजू नाचते नाचते रुक गयी। उसकी सांसे तेज चल रही थी, जिस वजह से उसकी चूचियाँ बार बार ऊपर नीचे हो रही थी। वो थक चुकी थी, तो वो वैसे ही नीचे बैठ गयी। रंजू के भारी नितम्भ अपने ही बोझ से छत की सतह पर दब कर फैल गए। फिर वो पीठ के बल लेट गयी। अब बारिश की बूंदे उसके चेहरे से लेकर पैर तक सीधे टकरा रही थी। बारिश में पूरी तरह गीली हो चुकी साड़ी से लिपटी रंजू फर्श पर कामुकता से कभी पेट के बल लेट जाती, तो कभी पलट कर घूम जाती। उसके बदन से बारिश की बूंदे छींट खाकर ऐसे उड़ रही थी, जैसे चिंगारी भड़क रही हो। वो उस बारिश में भी किसी जलते हुए शोले सी भड़क रही थी। तभी उन दोनों की नजरें आपस में मिली। अरुण रंजू को कामुकता भड़ी नजरों से देख रहा था। रंजू की आंखों में भी पुरुष संसर्ग की प्यास साफ झलक रही थी। एक आदमी को और क्या चाहिए, बारिश का मौसम, उसमें भीगती हुई एक औरत और औरत के अंदर भड़कती कामाग्नि की ज्वाला। अरुण रंजू को देखते हुए जाने कब बारिश में भीगते हुए उसकी ओर बढ़ चला। रंजू उसे अपनी ओर आते हुए देख रही थी, और उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। अरुण कुछ ही क्षण में रंजू के पास खड़ा था, वो रंजू की ओर अपना दांया हाथ बढ़ा दिया। रंजू ने अपना हाथ बढ़ाया और उसका हाथ पकड़ के उठने लगी। अब रंजू अपने बेटे के सामने पूरी तरह गीली कामुक स्त्री जैसी खड़ी थी। दोनों के बीच अभी भी एक हाथ की दूरी बनी हुई थी। दोनों एक दूसरे को कामातुर दृष्टि से देख रहे थे। रंजू पहल करते हुए शर्मा रही थी। अरुण ये चाह रहा था, कि रंजू इस बार पहल शुरू करे। लेकिन रंजू अपने ही बेटे से व्यभिचार की शुरुवात करने में लजा रही थी।
अरुण ये समझ गया कि उसे रंजू को थोड़ा धक्का लगाना पड़ेगा। वो उसके और करीब आया और अपनी माँ को कमर से पकड़ लिया। फिर उसे अपनी ओर खींचते हुए बोला," केतना बढ़िया, मौसम भईल बा माई। एकदम कमाल के। गर्मी से राहत हो जाई।"
रंजू उसकी ओर देखते हुए बोली," हॉं, बेटा बहुत निम्मन मौसम भईल बाटे। तपत गर्मी से राहत भेटल बा।"
अरुण," तहरो राहत भईल होई। ई बरखा तहार देहिया के भिगाके एकदम, मस्त क देने होई। अबसे, तू एकदम अलग बुझात बारू।"
रंजू," बबुआ, बरखा, हमार तन मन के एकदम मस्त क दिहलस हो। ई बरखा में भीजके दिल में अजब से खुशी अउर बेचैनी दुनु उठल बाटे।"
अरुण उसके बेहद करीब था और बारिश की बूंदे दोनों की पलको से लगातार टपक रही थी। दोनों की नजरें एक दूसरे की आंखों में डूब जाना चाहती थी। अरुण उसे अपने से चिपकाते हुए पूछा," कइसन बेचैनी??
रंजू की कमर के चारों ओर राजू के हाथ लिपटे हुए थे। उसकी चूचियाँ अरुण के सीने से दब चुकी थी। रंजू उसकी टी शर्ट उतारते हुए बोली," ई बेचैनी आज से ना, बहुत दिन से ह। पर दिल के कोनो कोना में दबल रहला।" फिर उसका हाथ उठाके अपने सीने पर रखते हुए बोली," महसूस करअ हमार दिल के धड़कन अउर ओकर धक धक में बहत बेचैनी के अरुण।"
अरुण रंजू के बांये चुच्ची के ऊपर से रंजू की धड़कन महसूस करने लगा। रंजू उसकी टी शर्ट उतारके उससे पहले की भांति चिपक गयी थी। उस भीगती बारिश में भी, अरुण रंजू के चूचियों के बीच की गर्मी महसूस कर रहा था। रंजू के प्यासे होठ गीले होकर भी प्यासे लग रहे थे। अरुण के सीने को रंजू सहला रही थी। अरुण उसके होठों को बांये हाथ के अंगूठे से छुआ। रंजू जैसे खुद अपने होठ उसपर रगड़ने लगी। अरुण को रंजू की इस हरकत से उसके अंदर की बेचैनी की अंदाजा होने लगा था। दोनों का माथा एक दूजे से चिपका हुआ था। दोनों की सांसें एक दूजे से टकरा रही थी। रंजू ऐसे बेचैन हो रही थी, जैसे वो पहली बार किसी पुरुष के समीप गयी थी। अरुण के अंगूठे को वो खुद होठों के बीच ले ली और चूमने लगी।
अरुण रंजू की चुच्ची को धीरे धीरे मसल रहा था। रंजू उसके छाती को अपनी हथेलियों से महसूस कर रही थी, जैसे कह रही हो मुझे चूम लो, मेरे होठों का रस पी लो। अरुण उस मूक निमंत्रण को स्वीकार करते हुए, उसके होठ को चूमने लगा। रंजू ने खुद अपना सर आगे कर अपने होठ अरुण के होठों से मिला दिया था। वैसे तो छत पर कोई नहीं था, पर ऐसा लग रहा था कि उस चुम्बन को कई लोग देखकर शोर कर रहे हो। ये कोलाहल दोनों की मनः स्थिति को दर्शा रहा था। अरुण रंजू के होठों का पूरा रसपान कर चुका था और उसके मुंह में अपनी जीभ ठूंस चुका था। रंजू अपने बेटे की लपलपाती जीभ अपनी जीभ से खुद लड़ा रही थी। वो अपने मुंह के हर कोने में अरुण के जीभ को महसूस कर रही थी। थोड़ी देर बाद बारी रंजू की थी। दोनों की जीभ अब अपना स्थान अदल बदल कर चुकी थी। रंजु की जीभ अब अपने बेटे के मुंह में कुश्ती लड़ रही थी। जाने कितने देर दोनों इसी अवस्था में खड़े रहे। थोड़ी देर और इस तरह चुम्मा चाटी के बाद, दोनों हांफने लगे।
अरुण," तू त खूब बढ़िया नाचेलु। तहरा देखके कोई ना कह सकेला कि तू एतना बढ़िया नचनिया बारू।"
रंजू थोड़ा हंसी और बोली," हमके ई गाना बहुत पसंद रहला, हमार सहेली के बियाह में हम नाचने रहनि। हमार बियाह में भी ई गीत खूब बाजल रहला।"
अरुण," का बात ह। तू नाच नाच के पूरा माहौल बनाउने होखब।"
रंजू शर्मा गयी। अरुण ने फिर रंजू के बाल पकड़ के उसका सर पीछे की ओर झुका दिया। रंजू की चूचियाँ उभर आई और अरुण ने चूचियों के बीच अपना सर डाल दिया। रंजू उसके सर को पकड़े हुए सिसकारी," सस्स.....स्स......स्ससस्स....सस्स... भर रही थी। अरुण उसके ब्लाउज के हुक खोलने लगा। वो रंजू की चूचियों को बेतरतीब चूमे जा रहा था। रंजू की ब्लाउज की आखरी हुक खुलते ही, चूचियाँ आज़ाद हो उठी। उसके मोटे मोटे भूरे चूचक गर्व से तनके अरुण को चिढ़ा रहे थे। रंजू की ब्लाउज उसके बांहों में फंसी हुई थी। अरुण अपनी माँ के स्तनों को लगातार चूम रहा था।
रंजू," आह...आह...आह...उह अरुण...चु.. चूस..... ल ना। हमार चुच्ची चूस ल। आह... धअ.... ल...अ... अपना मुँह में। खूब... निम्मन से चूसअ..... आपन ....माई के चु... चुच्ची।
अरुण उसकी चूचियों को बांये हाथ से भींच रहा था, और उसकी दांयी चुच्ची के चूचक को अपने मुंह में लेके चूस रहा था। अरुण चूचक को बेरहमी से चूसे जा रहा था। वो बीच बीच में उसपर हल्के से दांत भी काट लेता था। रंजू के मुंह से कामुक आँहें भर भरके उठ रही थी। अरुण रंजू के दोनों चूचियों को बारी बारी चूस रहा था। रंजू अपने ही बेटे की बांहों में अब बहकने लगी थी। रंजू को स्तनपान अथवा चुच्ची चुसवाई करवाने से अत्यंत उत्तेजना हो रही थी। अरुण अपनी माँ के अंदर की कामुक स्त्री के बंद दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था। रंजू की आंखें वासना से लबरेज हो उठी थी। लेकिन अरुण उसे कामुकता से इतना भर देना चाह रहा था, की आज वो चाह कर भी नैतिकता की ओर ना जा पाए। वो अभी भी रंजू के गोरे गोरे चुच्ची को मसल रहा था और बारी बारी चूस रहा था। रंजू बिना संकोच स्तन मर्दन और स्तनपान का आनंद दे रही थी और ले भी रही थी। अरुण ने उसे फिर छत पर ही लिटा दिया। वो उसके ऊपर आ गया और उसकी ब्लाउज निकालके फेंक दिया। रंजू की बालों से भरी कांख ( बगल) उसके सामने थी। गीले होने की वजह से बाल चिपक गए थे। अरुण से रुका ना गया और बोल उठा," माई, तहार कंखिया बहुत मस्त बा। चूस ली का?
रंजू लंपट स्वर में बोली," बेटा, हमार रोम रोम अब तहार बा। जइसे चाहा वइसे करा।"
अरुण ने फिर आव देखा ना ताव सीधा रंजू के बांयी कांख को जीभ फिराके चाटने लगा। रंजू को बीच बीच में गुदगुदी लगती तो वो हंस पड़ती। वहां एक अजीब सी मादक गंध थी। अरुण उसका दीवाना हो उठा। वो कभी दांयी कांख को चूमता तो कभी बांयी कांख को। रंजू अपनी बांहे ऊपर की ओर मोड़े सिसयाते हुए अपनी गर्दन दांये बांये पलटते हुए पड़ी थी। कुछ देर तक ऐसे ही चाटने के बाद, अरुण रंजू को चूमने लगा। रंजू भी उसे पूरी शिद्दत से चूम रही थी। तभी रंजू ने अरुण को पलट दिया, और चूमते हुए खुद उसके ऊपर आ गयी। अरुण को रंजू से इसकी अपेक्षा नहीं थी। रंजू उससे पूरी तरह लिपटी हुई थी। अरुण अपने हाथ रंजू की नंगी पीठ से लेकर कमर और कूल्हों तक फिरा रहा था। वो रंजू को खुद में समा लेना चाहता था। रंजू किसी नवयौवना की भांति, अरुण की ऊर्जा से ऊर्जा मिला रही थी। अरुण ने फिर उसके चूतड़ों को धर दबोचा। रंजू के भारी नितम्भ उसके हाथों में पूरी तरह समा नहीं रहे थे। लेकिन जितना हिस्सा भी उसके पंजों में आया उसने उनको खूब मसलना शुरू कर दिया। रंजू कराह उठी। गीले साड़ी की वजह से चूतड़ों पर पकड़ आसानी से बन रही थी। अरुण ने उसे अपनी ओर खींच लिया और उसकी साड़ी साया समेत उठाने लगा। रंजू खुद उसका सहयोग कर रही थी। थोड़ी ही देर में रंजू की साड़ी उसके कमर तक उठ चुकी थी। अरुण ने उसे हल्का उठने का इशारा किया और उसकी पैंटी की इलास्टिक को पकड़ के खींचने लगा। रंजू की पैंटी घुटनों तक आ चुकी थी। उसकी हल्की झांटों वाली बूर अरुण के आंखों के सामने आ चुकी थी। रंजू फिर मूतने की अवस्था में अरुण के चेहरे के पास बैठ गयी। अब रंजू की साँवली बूर अरुण के मुंह के ऊपर थी। ऐसे मौसम में ये नज़ारा अरुण के दिलो दिमाग में सिवाय कामाग्नि भड़काने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। रंजू अपने बूर पर अरुण के जुबान के हमले के लिए तैयार बैठी थी। उसे खुद इस बात की जल्दी थी, कि कब अरुण उसकी रिसती बूर को अपनी जीभ से चाटे। तभी उसे वो अनुभूति होने लगी, और अरुण अपनी माँ की बूर का रसास्वादन करने लगा। बूर के पानी का खाड़ा स्वाद, उसकी जुबान को भा गया।
रंजू सिसयायते हुए बोली," आह,....उम्म्म्म.... हाय.... केतना बढ़िया बुझाता। ले लअ ..... राजा..... उफ़्फ़फ़फ़..... का बताईं...ब.. बड़ा... बेचैन बानि। पी लअ..... सब.... रस।
अरुण," खुलके बोल ना माई, आह.....कहाँ के रस पी ली.....
रंजू उसकी ओर देख बोली," हमके बेशरम बनाबे चाहेलु मुसवा बेटा। माई के बेशरम बनाइबू का हो।"
अरुण," इहे में त मज़ा आवेला, जब तलक तू खुलके ना बोलबु त मज़ा ना आई। औरत जब बेशरम होखेलि तभी मज़ा आवेला।
रंजू फिर बेशर्मी से बोली," आह... लेकिन .... तहरा सामने हम एतना बेशर्म कइसे बनी। उफ़्फ़फ़फ़.... बड़ा लाज आवेला। त....तहार प..प.पापा के साथ त हम बहुत खुल गईल रहनि। उफ़्फ़फ़फ़....हाय राम।
अरुण," इहे त बात बा रंजू, औरत के शरम के गहना मरद के साथे उतार देवे के चाही। खुलके चुदाई के मज़ा आउर मस्ती करेके बा त, लाज शरम छोड़ दे। बोल कहाँ के रस पी ली।"
रंजू," ब..बु...बूर के रस। अपन माई के बूर के रस पी लअ.... उफ़्फ़फ़फ़ । केतना अजीब बुझा रहल बा। तहरा से अईसे बोल के।
अरुण," लेकिन तहार बूर से त पानी अउर चुवे लागल बा रंजू रानी।"अरुण अपनी माँ को नाम से इसलिए बुला रहा था, ताकि उसका संकोच दूर कर सके। अरुण उसके चूतड़ों को पकड़के बूर को चाटने में लग गया। रंजू उसके बूर से चूती, पानी अपने बेटे की प्यासी जुबान पर गिरा रही थी। अरुण उसके बूर के चीरे से पत्तियों को फैलाके जीभ बीच में घुसेड़ रहा था। रंजू के मुंह से कामुक सिसकारियां निकल रही थी। रंजू की कमर अपने आप ही आगे पीछे हो रही थी, और वो अरुण की जीभ पर बूर को घिस रही थी। अरुण उसकी बूर के दाने को बीच बीच में मुंह में भरके चूस ले रहा था। ऐसे करते ही रंजू की सांसे और सिसकारी दोनों ही तेज हो जाती।
रंजू," आह, सीssssssss. आह ...हह... हाय रे जालिम, आह.... हमके त तू म..म.मस्ता देले बारू। केतना बढ़िया चुसेलु बेटा, माई के बूर .......के आह र..रराजा।"
अरुण उसकी बातें सुनके खुश था, कि उसकी माँ लाज शरम के पर्दे धीरे धीरे हटा रही है। रंजू की आंखें बंद थी, उसने खुद को काफी संतुलित कर रखा था। उसके हाथ दोनों केहुनी से मुड़े हुए अपने सर के पीछे थे। कमर एक लय में अरुण के मुंह पर हिल रही थी। अरुण उसकी बूर में तभी उंगली डाल दिया। एक तरफ बूर में उंगली और दूसरी ओर अरुण का बूर के दाने को छेड़ना रंजू को पागल बना रहा था। उसकी बूर से पानी, किसी रिसते हुए जल प्रपात के स्रोत की तरह धीरे धीरे उसके बूर की फांकों पर से बह रहे थे। कुछ ही क्षणों में रंजू की बूर टहकने लगी, और बूर से पानी का फव्वारा फूट के अरुण के खुले मुंह और चेहरे पर बरस उठा। रंजू कामुकता से चरम सुख को प्राप्त कर चीख उठी। अरुण उसके बूर के पानी को बेहिचक पी गया। उसका स्वाद नमकीन और थोड़ा खाड़ा था। शायद रंजू की मूत भी निकल गयी थी। अरुण ने फिर रंजू की साँसों में काबू आने के बाद, उसे उठने को कहा। रंजू उसकी बात मान उठ खड़ी हुई। उसकी आँखों में थोड़ी लाज थी। अरुण भी खड़ा हो गया। तब रंजू की नज़र अरुण के पैंट पर पड़ी जिसमें, लण्ड तनकर तंबू बना रहा था। रंजू थोड़ा शर्माते हुए, उसके पास आई और अपना हाथ उसके पैंट के अंदर घुसा दिया। उसने अरुण के लण्ड को कसके पकड़ लिया। उसकी नज़रें झुकी हुई थी। अरुण ने उसकी ठुड्ढी पकड़के उसके चेहरे को ऊपर उठाया और बोला," का भईल, हमरा से नज़र मिला ल।
रंजू उसकी ओर देखते हुए बोली," लाज आवेला,।"
अरुण," अभो, तोरा लाज आ रहल बा का। तू त पूरा नंगे बारू ए रानी। हमार हल से तहार खेतवा, पर अभी त जुताई होई रंजू रानी।"
रंजू शर्मा रही थी।अरुण ने फिर अपना पैंट उतार दिया और अपना लण्ड लहरा दिया। रंजू बारिश में भीगते हुए, उसके लण्ड को देख कांप उठी। इतना मुस्टंड लण्ड वो पहली बार करीब से देख रही थी। उसकी आँखों में वासना लहरा उठी। इससे पहले की अरुण उससे कुछ कहता वो खुद घुटनों पर बैठ गयी। और अरुण के सख्त लण्ड को दोनों हथेली में थाम घूर रही थी। अरुण ने रंजू के अंदर की प्यासी औरत को पहचान लिया था, और ये भी अनुमान लगा लिया था कि आज उसे कोई नहीं रोक पायेगा। रंजू अरुण के लण्ड के सुपाड़े को चूमी, और फिर जीभ से उसकी चोंच रूपी छेद में कुरेदा। ऐसा करने से अरुण को असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी। रंजू लण्ड को हौले हौले मुठियाते हुए, चूम रही थी। फिर अरुण की ओर कामुकता से देख मुस्कुराती। अरुण उसके सर पर हाथ रख उसे सहला रहा था। रंजू अरुण के सुपाड़े को मुंह में लेकर जोर से लॉलीपाप की तरह चूस रही थी। वो रुक रुक के उसके सुपाड़े को कभी छोड़ती तो फिर तुरंत लप से मुंह खोलकर चूसना शुरू कर देती।
अरुण," उफ़्फ़फ़फ़ उम्म्मह का बात ह, अउर चूस हमार लांड के। आह .....आह बड़ा निम्मन बुझा रहल बा। केतना मज़ा आ रहल बा माई।"
रंजू," उम्ममम्ममम्मम्म.... ऊमम्म आह....ललप्पप्प,,,, ललप्पप्प का बढ़िया लण्ड ह।
थोड़ी देर चुसाई के बाद, अरुण ने रंजू को वहीं लेटने को बोला। फिर अरुण उसकी जांघों के बीच आकर उसकी बूर के मुंहाने पर अपना लण्ड छुवाने लगा। प्यासी तपती जमीन पर आज बादल बरसने वाले थे। रंजू उत्तेजना के मारे, लण्ड के एहसास से मचल रही थी। अरुण रंजू को इस तरह मचलता देख, खुश था। उसने फिर अपना लण्ड उसके बूर के चिपचिपे पानी से गीला किया। फिर हौले से अगले ही पल उसकी बूर में उतार दिया। रंजू वैसे तो चुदी चुदाई औरत थी, लेकिन अपने बेटे के लण्ड के हमले से, कराह उठी। उसका लण्ड था भी बड़ा सा, जिसे किसी भी स्त्री को लेने में दिक्कत होती। अरुण रंजू को भीनी भीनी बारिश में छत के ही एक कोने में चोद रहा था। लण्ड की पूरी लंबाई बूर में जा चुकी थी। अब तो वो बार बार अंदर बाहर निकल रहा था। रंजू अपने बेटे के नीचे लेटी मस्त चुदवा रही थी। रंजू के दोनों हाथ, अरुण अपने पंजो में लिए हुए था। रंजू के सर के पास उसकी हथेलियां थी। रंजू की प्यासी कामुक आंखें, आधी खुली हुई थी। उसके होठ कांप रहे थे। उसकी दोनों जाँघे फैली हुई थी, जिनके बीच अरुण बैठ कर उसे प्यार के धक्के लगा रहा था। उसकी चूचियाँ बारिश में गीली होकर हिलती हुई और भी नरम और लुभावनी लग रही थी। उसपर बारिश की बूंदे गिरकर जब लुढ़क रही थी, तो और भी कामोत्तेजक दृश्य बन रहा था। अरुण की कमर के धक्कों के साथ, रंजू भी हिल रही थी। तभी अरुण ने रंजू के प्यासे कांपते होठों को अपने होठों के शिकंजे में ले लिया। अरुण उसके होठों को ऐसे चूस रहा था, मानो कोई भंवरा किसी फूल के रस को चूस रहा था। रंजू भी उसके गर्दन को अपनी बांहों में भरकर उसे अपने होठों का मदन रस पिला रही थी। दोनों एक दूसरे में मगन होकर दुनिया भूल चुके थे। थोड़ी देर बाद जब दोनों के चुम्बन का विराम हुआ तो,
रंजू अरुण के माथे को चूमकर बोली,"अरुण हम बहुत पियासल बानि, तू अपन माई के पियास मिटाइबू ना राजा। हमार बूर से पानी हमेशा चुवेला, लांड खातिर। लेकिन तोर पापा, खाली एक महीना खातिर, आवत रहला। उ एक महीना उ हमके जमके चोदत रहले, पर हमके त बारह महीना बूर में लांड चाही। आखिर हमहु औरत बानि, केतनो चुदायिब एक महीना में पर फेर लांड खातिर बूर से पानी चुबे करि। आ हमार पियास तहार, मोट लांड से बुझी।"

अरुण," माई, अब से कउनो रतिया, तहराके पियासल ना सुते के पड़ी। ई हमार वचन बा। पापा जउन तहरा संगे अन्याय कइले बारन, ओकर न्याय बेटा करि। तहरा जइसन चुदक्कड़ माल, कइसे एतना दिन बच गईल इहे आश्चर्य बा। हम त अब तक ई सोचत रहनि कि तू बड़ा सुशील और संस्कारी महिला बिया।

रंजू," तू हमरा पर ध्यान ना दिहलस ना राजा एहीसे बच गईल रहनि। लेकिन जंगल में हिरनी, कब तलिक शेर से बची। एक ना एक दिन हिरनी के शिकार त होबे करि। भले तहार माई बानि, पर कामेच्छा त हमरो बा। कहां जाके नाम डुबौति। अपन अंदर के औरत के समझौने रहनि। पर अब तहरा देखके, सुशील और संस्कारी औरत के जगह, काम पिपासु औरत ले लिहलस।"

अरुण," आवे दे अपन कामेच्छा के उपर, खुल जो पूरा। देख अबसे कइसे तहार, हर तरह के यौन इच्छा हम पूरा करब। रंजू अबसे तहार, हर रात सुहागरात होई, जउन तू अपन बेटा के साथ मनाइबू।

रंजू," सच में अरुण, का अब हमार सब सपना पूरा होई। हर रोज़ सेज बिछी, अउर जउन जउन चीज़ हम सोचले रहनि, उ तू हमरा संग में करबा।

अरुण," खुल के बोल रानी, का तहार इच्छा बा। कइसे कइसे चुदबाबे चाहेलु ?
रंजू," हमके लाज लागेला, जाने तू का सोचबा कि तहार पूजा पाठ वाली माई के मन में एतना गंदा गंदा बतिया कइसे आवेला। लेकिन एगो बात जान ल, कि हर औरत चाहे उ केकरो माई, बहन, बेटी होखो, ओकरा अंदर एगो छिनार जरूर होखेला।"

अरुण," तू देखा ना कि तू केतना बड़की छिनार हउ, बेटा के लांड पर त बइठल बारू।"

रंजू उसकी ओर देखते हुए," खाली हम ही छिनार बानि का। देखलस नइखे कइसे रानी आपन बाप से चुदबाबेली। जइसे बाप बेटी वइसे माई बेटा। तू आपन माई, चोद के खुश बारू ना।

अरुण धक्के लगाता हुआ बोल रहा था," तहरा चोदके, मन के मुराद पूरा हो गइल माई। तहार देहिया के कुल गर्मी उतर जाई। औरतिया के चोदे में मज़ा आवेला, पर माई के चोदे में डबल मज़ा।

रंजू हंसते हुए," जे आपन माई के चोदेले, जानत बारू उ का कहाले मादरचोद। जउन बूर से निकलेले, उहे बूर में लांड घुसाके, छितरावेला।

अरुण," तहरा जइसन छिनार माई, मादरचोद के ही जन्म दी।" दोनों जोर से हंस पड़े। रंजू अब पूरी तरह खुल चुकी थी। अरुण ने फर्श पर बैठे, रंजू को उठाकर अपनी गोद में लण्ड पर बैठने का इशारा किया। रंजू खड़ी हुई फिर साड़ी और साया जो कमर में था, उसे उतार फेंकी। और अपने बेटे के सामने सम्पूर्ण नग्नावस्था में खड़ी थी। रंजू के बदन पर कपड़े का एक टुकड़ा भी नहीं था। रंजू फिर अपने बेटे के लण्ड पर बैठने लगी। अरुण का लण्ड उसकी बूर की गहराईयों में उतरने लगा। रंजू की आंखें अनायास ही बन्द हो गयी। उसने अरुण को अपने चूचियों से लगा लिया। अरुण उसकी चूचियों में सर रखके रंजू की कमर को थामे हुआ था। रंजू अब उसके लण्ड पर हल्के हल्के कूद रही थी। अरुण उसके चूतड़ों पर हाथ से काबू किये हुए था।
रंजू," आह...आह...उफ्फ्फ खूब चोदआ अरुण मादरचोद कस कस के चोद। जउन बेटा के सामने पवित्र रहनि, आज ओकरे लांड पर बईठके चुदवा रहल बानि।"
अरुण," तू हमरा खातिर अभी भी पहिले जइसे रहबू माई। तहार पवित्रता के केहू दोसर आदमी सवाल ना कर सकिले। तहार हमार रिश्ता घर के भीतर मरद मेहरू वाला होई और दुनिया के सामने पवित्र माई बेटा के।
रंजू," पहिले जइसन अब कुछ ना रही अरुण, काहे कि औरत आ मरद जब एक बार चुदाई कर ले, त दुनु के खाली एकांत चाही और दुनु एक दोसर के भोगी।"
रंजू इस अवस्था और भी कामुक लग रही थी। वो बारिश में भीगकर और भी आकर्षक और कामातुर लग रही थी। अरुण के धक्के भी तेज हो रहे थे। बूर की दीवारों से अरुण के घिसते लण्ड का एहसास रंजू की बूर से अत्यधिक काम रास का रिसाव कर रहा था। एक बेचैन, प्यासी, कामुक स्त्री होकर वो अपने बेटे संग काम लीला में लीन हो गयी थी। लण्ड का बूर से बार बार बाहर आना और घुसना, उसके अंतरात्मा को एक सुकून दे रहा था। कितना अजीब है ये लण्ड बूर का संगम, जिसमें कोई भेदभाव नहीं था। ना बूर को कोई संकोच था, कि जो लण्ड घुसा है वो बेटे का है, और ना ही लण्ड को कोई संकोच था कि वो मां की बूर में घुस चुका है। अगर शरीर रिश्ते देखती तो शायद रुक जाती, पर उसे तो बस भूख मिटाने से मतलब है। रिश्तों की डोर तो कहीं पीछे छूट गयी थी। अब तो बस एक दूजे की प्यास मिटाना ही मकसद था। दोनों की कामुक आँहें और गर्म सांसें उस आंच को सुलगा रही थी, जो दोनों के मन में एक दूजे को मड़ई के पीछे देखके भड़की थी। रंजू ने ट्रेन में किसी तरह चुदने से खुदको बचा लिया था, पर आज वासना के आगे वो नतमस्तक हो चुकी थी। बूर में लण्ड लेकर उसका अधूरापन पूरा हो चुका था। लण्ड तो आखिर लण्ड है वो चाहे किसी का भी हो।
दोनों इस तरह करीब आधे घंटे तक चुदाई करते रहे। दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हुए, आखिरकार झड़ने लगे। अरुण रंजू की बूर में तेज धक्के मारते हुए उसके कंधों पर लुढ़क गया। रंजू की बूर टहक रही थी, उस चरम सुख की प्राप्ति से। दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। दोनों की सांसें तेज़ चल रही थी। तपती धरती पर पहली बारिश हो चुकी थी।
बारिश लगभग रुक चुकी पर फुहारे अभी भी पर रही थी, दोनों निर्वस्त्र खुले आसमान के नीचे लेटे हुए थे। रंजू अरुण के ऊपर लेटी हुई थी। अरुण उसके दोनों चूतड़ों को पकड़के सहला रहा था। एक खामोशी सी छाई हुई थी। तभी खामोशी को तोड़ते हुए रंजू बोली," अरुण, हमके पेशाब लागल बा। हमके मूते जाय दअ।"
अरुण ने जब रंजू के मुंह से ये बात सुनी, तो उसके कान खड़े हो गए। उसने रंजू की ओर देखा और उसे चूमते हुए बोला," हम तहरा मूते देखत चाहत बानि।"

रंजू," कइसन बात कहत हो, तहरा के लाज ना आई। अपन माई के मूतत देखत चाहत बारू। बेशरम मुसवा।"

अरुण," माई, अब कइसन लाज शरम। तहार हमार रिश्ता अब माई बेटा के साथ साथ मरद औरत के हो गइल बा। औरत के जब हम कुल ऊपर से नीचा तक नंगा कइके, चोदे देले बानि, त औरतिया काहे लजात बिया। हम त ना लजाइब।"

रंजू," लेकिन बेटवा, तहरा सामने कभू कइनी ना। एकदम अजीब बुझा रहल बा। ई देखके तहरा का मिली। शरीर के गंदगी बा।"
अरुण," इहे त देखेके बा, कि माई के बूर से पेशाब के धार कइसन छुल छुल निकलेला। आ उ गंदगी ना, हमार खातिर अमृत ह माई।" ऐसा बोलके उसने रंजू को खड़े किया और खुद उसके नीचे ठीक बूर के सामने बैठ गया। रंजू एक बार फिर बोली," अरुण, इँहा ठीक ना बुझा रहल बा। हमके बाथरूम जाय दे, केहू आ जाई त।"
अरुण," माई, जब अभी तक केहू ना आईल, त अब के आई, दु मिनट लगी। नखरा मत कर।"
रंजू अपने पैर पटकते हुए बोली," ढेरी जोर से मूत लागल बा। जिद ना कर बेटा। हम बाद में तहरा देखा देब।"
अरुण," जिद तू क रहल बारू, हम कहतानि कि मूत एज्जे। औरत के नन्हा बूर से पेशाब के धार हमके देखके बा।" वो उसकी कमर को थामके बोला।
रंजू अपने बेटे, और मूत के प्रेशर से तंग हुई पड़ी थी। उससे जब रहा नहीं गया, तो वो बोली," ना मानबु, त ले अब हमसे बर्दाश्त ना हो रहल बा। बड़ी देर से रोकले बानि।" और फिर उसके बूर से छुल छुला कर मूत के फौवारे से छूटे। रंजू की बूर और उसके आसपास की जांघ का हिस्सा अरुण के वीर्य से पूरी तरह सना हुआ था। वो मूत की पहली धार, उसे साफ करती हुई बहने लगी। अरुण ये अनमोल दृश्य, अपनी आंखों में सजो रहा था। वो बूर की पत्तियों के खुले दरवाज़े, से चिपककर बहती पेशाब की धार को, बहता देखकर झूम उठा। रंजू खड़े खड़े जीवन में कभी मूती नहीं थी। और वो अनायास ही बैठने लगी, जिससे उसके मूत की धार सीधे अरुण के चेहरे पर बरसने लगी। रंजू की गर्म मूत की धार अपने चेहरे पर महसूस कर वो मचल उठा। अपनी माँ के बूर से बरसते उस पवित्र खाड़े जल को, वो मुंह के बर्तन में एकत्रित करने लगा। उसने रंजू की जांघ, पकड़ हुई थी, और उसे उसी अवस्था में रोक दिया था। रंजू को खुद पर काबू नहीं था, क्योंकि वो बहुत देर से मूती नहीं थी और ऊपर से बारिश में गीले होने की वजह से और भी जोर की मूत आई थी। वो अपनी बूर से तेज़ धार लगातार मारे जा रही थी। और अरुण उसके मूत्राशय रूपी जल प्रपात का पानी, किसी प्यासे की तरह पी रहा था, जैसे उसे मीठे पानी का झरना मिल गया हो। रंजू उसे देख, थोड़ा थोड़ा मुस्कुरा रही थी, पर उसके चेहरे पर मूत निकलने की राहत ज्यादा थी। एक संस्कारी औरत ये भी कर सकती है, उसे ये खुद पर भरोसा नहीं हो रहा था। जब तक उसकी पेशाब की धार कमजोर नहीं हुई, तब तक अरुण उसका पेशाब पीता रहा। इस क्रम में बहुत सारा पेशाब छूटकर उसके शरीर को गीला भी कर गया। पर वो किसी शराबी सा अपनी माँ के बूर रूपी मधुकलश से पेशाब के पैमाने पीता रहा। थोड़ी देर बाद धार जब बंद हुई, तो अपने होठों को चाटता हुआ, बूर से टपकते बूंदों को अपनी हथेली में जमा करने लगा।
रंजू हंसते हुए," मुसवा बेटा, ई का करतारू, हाथ से काहे पेशाब उठा रहल बारू। छोड़ द "
अरुण," माई, तहार बूर से चुवेला ई पानी पेशाब ना अमृत ह। ई पीके हमार तन मन तंदरुस्त हो गइल बा। अब तहार मूत त हमके रोज चाही।"
रंजू हंसते हुए बोली," तहरा के एतना बढ़िया लागल का राजा। ई बूर के खाड़ा पेशाब के स्वाद।"
अरुण,सर हिलाते हुए बोला" हॉं माई, तहार पेशाब के स्वाद हमके एकदम निम्मन बुझाईल।" ऐसा बोलके उसने अपनी अंजुली में पड़े एकत्रित मूत को पीने लगा। फिर उसने रंजू की जांघों और बूर के आसपास पेशाब से गीले त्वचा को चाट लिया। फिर बूर को जीभ से कुरेद कुरेद के एक एक बूंद चट कर गया। रंजू उसे देख, अचंभित और उत्तेजित दोनों थी। वो उसके सामने घुटनों पर बैठ गयी और उसकी आँखों में देखते हुए उसे चूमने लगी। उसे भी अपनी बूर के पेशाब का खाड़ा स्वाद का एहसास हुआ। वो लेकिन उसे चूमती रही। दोनों एक बार फिर गर्म हो चुके थे। रंजू उसके लण्ड को पकड़के सहला रही थी। अरुण रंजू की चूचियों को पकड़के मसल रहा था। रंजू खुद अपने चूचियों को उसके मुंह में देना चाह रही थी। अरुण ने फिर रंजू की चूचियों को पर्याप्त सम्मान देते हुए, उन्हें चूसने लगा। रंजू उसका लण्ड हिला रही थी।
रंजू," आह,,, सीसीसी ....इशशश.... असही चुसत रहलु बचपन में तू हमार दुनु चुचिया। तब तू अपन भूख मिटात रहलु, अब फ़र्क़ एतना बा कि ई चुसिके तू हमार पियास मिटा रहल बारू। खूब पी लsss ई चुचिया के, दूध के धार निकाल द, मुसवा बेटा।" रंजू बड़बड़ा रही थी।
अरुण," माई, कसम से, तहार चुच्ची चुसे में बड़ा आनंद आ रहल बा। हाय ई तनल तहार कारी अंगूर जइसन तहार चूचक।"
रंजू," त पिलअ, राजा जइसे मन करे। चुसि चुसि के तू अउर तहार पापा बड़ा कइले बारन सं। जेतना चुसाई उतना आकार अउर पियास बढ़ी। औरतिया के सबसे कामुक हिस्सा चूचक ही बारे।"
अरुण," एहीसे त चुसत अउर मर्दन दुनु करत बानि।" दोनों इसी तरह कामोत्तेजक बातें करके एक दूसरे को उकसा रहे थे। रंजू अपने बूर में लण्ड लेने के लिए फिरसे कामातुर हो चुकी थी। उसकी आँखों में फिरसे जगी प्यास साफ पता चल रही थी।
रंजू वासना में डूबी हुई सी बोली," घुसावा ना, अरुण।"
अरुण उसके होंठों को छूते हुए पूछा," का घुसाई बोला ना।"
रंजू उसके लण्ड को दबोचते हुए बोली," ई, जउन कूद रहल बा, मुसवा।"
अरुण," ना खुलके बोला, कि तहरा का चाही, कहां चाही, कहां घुसाई।"
रंजू ने सोचा कि शर्माने का कोई फायदा नहीं, वैसे भी दोनों ने थोड़ी देर पहले ही ये काम किया था। फिर उसकी आँखों में आंखें डालके वो बोली," तहार बड़का लांड, हमार बूर में घुसावा मुसवा बेटा।"
अरुण," आ ओकर बाद, का करि।
रंजू," फेर हमार बूर में लांड आगे पीछे करके हमके चोदिहा रे मादरचोद।"
अरुण," उफ़्फ़फ़फ़,,,,, उफ्फ्फ रंडी बिया तू। बेटा के लांड से बूर चुदबाबे में बड़ा मन लाग रहल बा का।"
रंजू," अब का बेटा आ का माई, हरामी। तहरा के का पता कि हम केतना पियासल बानि। चुपचाप लांड घुसा दे। ना त...
अरुण," ना.....त,ना...त का?
रंजू उसके लण्ड को पकड़े हुए बोली," देखा दी, देखबू का?
अरुण इससे पहले कुछ समझ पाता, रंजू उसके लण्ड को बूर के मुहाने पर दोनों फांकों के बीच रगड़ने लगी। लण्ड का कड़क सुपाड़ा बूर के रस से भीग गया और चिकना हो गया। रंजू उसपर बैठती चली गयी। बूर लण्ड का खुली फांकों से स्वागत करती चली गयी।
रंजू के मुंह से कामुक सित्कार निकल रही थी। अरुण अपने दोनों हाथ पीछे की ओर टिकाए रंजू को बैठने की पर्याप्त जगह दे रहा था। रंजू लण्ड पर गाँड़ कुदका रही थी और अपनी मस्ती में बड़बड़ा रही थी।
रंजू," उफ़्फ़... जिनगी में पहली बार, अइसन लांड मिलल बा, जउन एतना जल्दी फेर से तैयार हो गइल। हमार बूर अइसन लांड चाहत रहनि। हरदम बूर से पानी चुवत बिया। तहार पापा कभू एकरा ठीक से शांत ना कइलस।"
अरुण," काहे माई, पापा तहके ठीक से चोदत ना रहला का?
रंजू," चोदत रहले, पर उ खाली एक महीना खातिर आवत रहले नु। एक महीना में हमके उ बस दस पंद्रह दिन ही चोदत रहले।"
अरुण," दस पंद्रह दिन कम बा का?
रंजू," अउर ना त का। मेहरू एगारह महीना पियासल रही, त दस दिन के चुदाई से का होई। कम से कम पूरा महीना त जमके चोदे के चाही ना।"
अरुण," माई दस दिन में तहार मन ना भरेला। अरे पापा के त तू कचूमर निकाल देत होई।"
रंजू," एहीसे त तरह तरह के दवाई, शिलाजीत, सब के व्यवस्था करत रहनि। ताकि सारा सारा रतिया उ हमके धर के पेलत रही। लेकिन उ एक ही बेर करत रहुवे। हमके कम से कम दु से तीन बेर लांड चाही। देखा ना अभी भी हम बहुत कम चुदौनी हअ। लेकिन अब अपन पापा के कमी तहके ही पूरा करे के पड़ी।"
अरुण," का कहत बारू, तू त एकदम चुदक्कड़ माल बिया। तू टेंशन मत ले, आज से तू संभोग के सम्पूर्ण सुख भोगबु। तहके जेतना मर्ज़ी उतना बेर चोदब। पापा जउन काम अधूरा छोड़ले बानि उ काम, सब बेटा के पूरा करेके पड़ी।"
रंजू," जब बाप के स्वर्गवास होखेला, त कुल संपत्ति बेटा लेवेला। औरत भी एक तरह से संपत्ति ही होखेला। उ हिसाब से हमहुँ तहार हो गइनी राजा। हमर ध्यान तहरे राखे के पड़ी"
अरुण," तू सच कह रहल बारू माई, अबसे पापा के एक एक चीज़ हमार बा। तू भी उमे से एक बारू। तहार ध्यान त राखे के पड़ी। तहार हर जरूरत पूरा करे के पड़ी,भले शरीर के काहे ना हो।"
रंजू और वो मुस्कुराए और फिर अरुण ने उसे अपने नीचे वापिस लिटा दिया। रंजू की बूर में अभी भी लण्ड घुसा ही हुआ था। अरुण रंजू को ताबड़तोड़ चोद रहा था। अरुण की कमर किसी इंजन की पिस्टन की तरह ऊपर नीचे हो रही थी। रंजू उसके नीचे अपने पैरों की कैंची बनाके लेटी हुई धक्के ले रही थी। अरुण उसे चूमे जा रहा था। बूर की चुदाई में लण्ड कोई कंजूसी नहीं कर रहा था। बूर तो खुद ही बिछी हुई थी, लुटने के लिए। सुपाड़े बार बार रंजू की बच्चेदानी को छू कर वापिस आ जा रहा था। रंजू उस एहसास से पहले से परिचित थी, फिर भी नए युवा साथी के पाने की खुशी में, वो और भी उत्साहित और उत्तेजित महसूस कर रही थी। कोई बीस से पच्चीस मिनट की धमाकेदार चुदाई के बाद, अरुण की कमर अकड़ने लगी। रंजू उसका भरपूर साथ दे रही थी।
अरुण," आह.... रंजू हमार गिरे वला ह रानी। तहार बुरवा में निकल जाई।
रंजू," उम्म्म्म..... आआऊऊ.......गिरा दे राजा, गिरा दे, दुनु के एक साथ होए वला ह। हमहुँ झड़ब, तहरा साथे।"
थोड़ी देर में बूर में लण्ड का गाढ़ा पानी निकल आया और रंजू की बच्चेदानी से टकरा गया। ठीक उसी समय रंजू भी कमर उचकाके झड़ रही थी। दोनों चरमसुख को प्राप्त कर चुके थे। अरुण रंजू के ऊपर ही लेटा था। बारिश अब पूरी तरह बंद हो चुकी थी। तभी उन दोनों को छत पर किसी के आने की आहट सुनाई दी। रंजू नंगी ही अरुण को धक्का देकर उठी, और कमरे की ओर भागी। अरुण भी कपड़ों की चिंता छोड़, रंजू के पीछे भागा। दोनों के कपड़े छत पर ही पड़े हुए थे, गीले से मैले कुचले से। अरुण ने भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। छत पर खाने के लिए पूछने लड़का आया हुआ था। अरुण ने खाना आर्डर कर दिया। वो लड़का बाहर से ही आर्डर लेकर जा रहा था, तभी उसने उनके छत पर गिरे कपड़े देख लिए और बोला," भैया आपके कपड़े छत पर गिरे हुए हैं, शायद बारिश में गिर गए हो।" उसे क्या पता था, कि दोनों ने खुद कपड़े बारिश में ही उतारे हैं। रंजू शर्म से पानी पानी हुई पड़ी थी। दोनों इस वक़्त कमरे में नंगे ही थे। रंजू तौलिये से बदन पोंछी, और फिर खुदको ढकने की कोशिश कर रही थी। अरुण ने वो तौलिया खींच लिया और अपना बदन पोछने लगा। रंजू फिर लजा उठी।
अरुण ने फिर रंजू से कहा," जाके कपड़ा उठा लावा।"
रंजू," अईसे लँगटे जाईं का बाहरी।
अरुण," त का भईल, अभी तक छत पर का करत रहलु।"
रंजू," बारिश रुक गईल बा, केहू आ जाइ तब। ना हम ना जाईब। तू ले ले आवा।"
अरुण," त रहे द, हमहुँ ना उठाईब।"
रंजू," इहे सब करवाबे हमरा से। अच्छा रुक हम ले आवतानी।"
अरुण ने दरवाज़ा खोल दिया और रंजू दौड़ते हुए नंगी ही छत के बीचो बीच भागी। उसके चूतड़ दांये बांये हिल रहे थे। कूल्हों की उछाल उसके दिल पर छुड़ियाँ चला रही थी। रंजू किसी नंगी अप्सरा सी लग रही थी। उसके बदन का हर हिस्सा उसके नंगेपन में खुलके सामने आ रहा था। उसकी कमर, जाँघे, पिंडलियाँ, तलवे, पैर, उसके लहराते बाल। इतना चुदवाने के बावजूद उसमें काफी ऊर्जा थी। फिर जब वो कपड़े उठाने को झुकी तो उसके चूतड़ दोनों फैल गए और उसके गाँड़ का भूरा छेद साफ साफ नजर आने लगा। रंजू ऐसे में अरुण को पूरा पूरा मनमोहक दृश्य दे रही थी। वो बार बार झुकके अपने और अरुण के कपड़े उठा रही थी। अरुण का मन ललचा गया। वो तौलिया छोड़ नंगा ही रंजू की ओर जाने लगा। इससे पहले की रंजू कुछ समझ पाती, वो अरुण की बांहों में थी और अरुण उसे अपने गोद में उठाके कमरे की ओर चल दिया। रंजू अरुण के गर्दन के इर्द गिर्द हाथ का घेरा बनाये हुए थी, और पैरों से उसके कमर के इर्द गिर्द कैंची बनाके टिकी हुई थी। अरुण उसकी जाँघे पकड़के, उसे उठाये था। उसका तना हुआ लण्ड उसके चूतड़ों से टकड़ा रहा था। रंजू बोली," ए मुसवा बेटा, तू कभू किधरो से आ जाला हो। कपड़ा के पसारे के पड़ी। छोड़ द"
अरुण," रात में कहां छत पर कपड़ा सुखी, रूम में कुर्सी पर रख दिहअ।"
रंजू मुस्कुरा उठी और अरुण भी, दोनों नंगे ही कमरे में प्रवेश कर गए और दरवाज़ा बंद हो गया।
जैसे ही दोनों कमरे में आये की फोन की घंटी बज उठी, वो अंजू का फोन था। रंजू उससे बात करने लगी। अंजू उन दोनों के सफर और काम के बारे में पूछने लगी। रंजू ने गीले कपड़े, कुर्सी पर डाल दिया। अरुण पानी पी रहा था। थोड़ी देर में खाना आ गया, दोनों को भूख भी लगी हुई थी। दोनों खाने के बाद फिर बिस्तर पर एक दूसरे के आलिंगन में सिमट गए। उस रात अरुण ने रंजू को दो बार और जमके चोदा। ये चुदाई रात के तीन बजे तक चली। जिसके बाद दोनों ही तृप्त होकर सो गए। शायद रंजू को अपनी प्यासी धरती का बादल मिल चुका था।

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भोसड़ा का दीवाना 💦🤤🍑
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रंजू का सफर भाग ८
तपती गर्मी से प्यासी धरती, शायद सावन के महीने का इंतज़ार इसीलिए करती है, कि उसकी प्यास का सुखद अंत बरसते बादल ही कर सकते हैं। असल में बादल का जो पानी है, वो तो धरती ने ही उसे दिया है, जिसे सावन के महीने में वो ब्याज समेत चुकाता है। धरती जब अपनी कोख से पानी देती है, तो बादल का फर्ज बनता है कि वापिस से उसकी कोख को भर दे। सूखी बेजान धरती, अपने ही पानी को पाकर फिरसे हरीभरी हो उठती है।

रिमझिम रिमझिम बारिश की बूंदे, छत पर गिरने के साथ पायल की रुनझुन की तरह शोर मचा रही थी। चारों तरफ काले घने बादल छाए हुए थे। बारिश की मोटी मोटी बूंदे पूरे छत को भिगो चुकी थी। रंजू किसी प्यासी धरती की ही तरह बेचैन और तप रही थी। उसके बदन को वातावरण और तन की गर्मी तपा रही थी। बारिश की बूंदों को देख वो मचल उठी और किसी किशोरी कि भांति उत्साहित होकर भीगने निकल पड़ी। उसने अपने हाथ बढ़ाकर मौसम के मिजाज को परखा। फिर शीतल बरखा के जल को हथेली से अपने चेहरे पर मारा। आज उसके अंदर वाकई में किसी किशोरी की तरह भावनाएं उमर रही थी। वो किसी चंचल लड़की की भांति हरकतें कर रही थी। कुछ ही देर में वो पूरी तरह छत के बीच में आकर खड़ी हो गयी। उसकी साड़ी धीरे धीरे बारिश की बूंदों से गीली हो रही थी। कुछ ही देर में वो पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसके बदन से उसकी साड़ी और ब्लाउज पूरी तरह चिपक गए थे। पूरी तरह चिपकने से उसके चुच्ची और चूतड़ों के उभार पूरी तरह स्पष्ट हो चुके थे। मस्त भारी चूतड़ से गीली साड़ी बड़े ही कामुक अंदाज़ में सिलवटों के साथ चिपकी हुई थी। उसकी साड़ी चूतड़ों के दरार के बीच ऐसे फंसी थी, जैसे उन दोनों चूतड़ों के पाटों के बीच पिस रही हो। ब्लाउज गीले होने की वजह से उसकी चुच्ची की गोलाई और उसपर उभरे हुए चूचक स्पष्ट नज़र आ रहे थे। रंजू का आँचल भी भीग चुका था और वो सिकुड़कर बांये कंधे पर गीलेपन की वजह से टिका हुआ था। उसकी दोनों बड़ी बड़ी चूचियाँ एकदम उभरी हुई थी। ब्लाउज के गीलेपन की वजह से गोरी चूचियाँ और भूरे चूचक स्पष्ट दिख रहे थे। वो बीच बीच में जब कोई हरकत करती तो चूचियों में कंपन और कामुक हरकत हो रही थी। रंजू ने आज बाल खुले ही रखे थे, जबसे संगम नहा कर आयी थी। उसके लंबे काले घने बाल पूरी तरह भीग चुके थे और उसके चेहरे, गाल, गर्दन और पीठ पर चिपके हुए थे। उसके होंठ पर बारिश की बूंदे, गुलाब की पंखुड़ी पर शबनम की बूंदों सी प्रतीत हो रही थी। वो बार बार उन बूंदों को अपने होंठों को मुंह में भरकर पी रही थी। वो पूरी तरह मगन होकर भीग रही थी। अरुण अपनी माँ को भीगते हुए देख रहा था, पर उसने रंजू का ये रूप कभी नहीं देखा था। वो किसी नवविवाहिता की तरह पहली बारिश का आनंद ले रही थी। एक अत्यंत कामातुर नारी, जिसे आज फिरसे किसीने प्यार का अनमोल तोहफा दिया हो, उसके उत्साह की केवल कल्पना ही कि जा सकती है, खासकर तब जब उसकी काम सुख की संभावना बिल्कुल नगन्य हो चुकी हो। अरुण रंजू में एक नई ऊर्जा और खुशी साफ देख रहा था। ये खुशी उसके मन में भी थी, क्योंकि आज उसकी माँ ने उसका प्यार स्वीकार कर लिया था। रंजू के भीगते बदन को देख, उसके अरमान सुलग रहे थे। रंजू के तन बदन में भी काम वासना की तेज लहर उठ रही थी। ऐसे में रंजू बारिश की बूंदों को खुद से आत्मसात कर लेना चाहती थी।

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अरुण ने उसी समय मोबाइल पर गाना चला दिया," थम के बरस हो जरा थम के बरस, मेरा मेहबूब आनेवाला है"। रंजू के कानों में जब ये धुन गयी, तो उसके पैर अपने आप थिरकने लगे। उसे होश नहीं था, कि वो लॉज की छत पर बारिश में अपने बेटे के सामने भीग रही है। उसे अपनी जवानी के दिन याद आने लगे, कैसे उसने सहेलियों के साथ इस गाने पर सहेली की शादी में नाचा था। उसने अपने आँचल को समेटा, और उसे अपनी कमर में खोंस लिया। उसका ब्लाउज से लेके नाभि से काफी नीचे तक का हिस्सा पूरा नंगा हो उठा। फिर वो गाने के बोल के हिसाब से, नाचने लगी। कभी वो अपनी चूचियाँ हिलाती, तो कभी अपने गाँड़ को हिलाते हुए सेक्सी अंदाज़ में नाच रही थी। हिलती चूचियाँ पर कड़क हो चुके चूचक बिल्कुल किसी केक पर रखी चेरी की भांति लग रहे थे। उसकी उठी हुई चूचियाँ किसी भी बुड्ढे को लुभा देती, अरुण तो हट्टा कट्टा नौजवान था। जिन चूचियों से उसने बचपन में माँ का प्यार दूध बनकर, उसका पेट भरता था, आज वही हिलती चूचियाँ उसके अंदर वासना की भूख भड़का रही थी। चूचियों की भारीपन, और गीले होने की वजह से उसके ब्लाउज का एक हुक आगे से खुल गया। भारी भरकम, चूचियों का वजन सीधा, ब्लाउज के छोटे से हुक पर ही तो टिका हुआ था। उसके बार बार हिलोरे मारने और कूदने से चूचियाँ, की घाटी अथवा दरार काफी हद तक स्पष्ट रूप से दिख रही थी। बारिश की बूंदे उसके गले से चूते हुए उसकी चूचियों की घाटी में गायब हो जा रही थी। ब्लाउज धीरे धीरे नीचे की ओर सरक रही थी। अरुण का मन हो रहा था, कि जाके उसके ब्लाउज को फाड़कर, रंजू की चूचियों को आज़ाद कर दे। रंजू बेफिक्र होकर नाच रही थी। रंजू की थिरकती कमर तो और ज्यादा कामुक लग रही थी। उसकी हल्की चर्बीदार दोनों कूल्हे जब हिलते तो अरुण मचल उठता था। बारिश में गीले होते, उन सेक्सी कूल्हों को चिकोटी काटने और चूमने के लिए मचल रहा था अरुण। बारिश की गिरती लगातार बूंदे और उसके ठुमके, रंजू के कमर और कूल्हों को अत्यंत रमणीय बना रहे थे। वैसे इस उम्र में औरतों का पेट निकल आता है, पर रंजू चुकी गांव की काम काजी महिला थी, तो उसके पेट पर हल्की लटकी हुई चर्बी थी। उसकी नाभि का आकार भी काफी बड़ा और अंडाकार सा था। उसका पेट एकदम चिकना और गोरा था। वो बार बार अपने नाभि/ ढोढ़ी के आसपास कामुकता से सहला रही थी। रंजू किसी फिल्म की हीरोइन को अभी मात दे सकती थी। वो कभी अपने हाथ पीछे ले जाकर कमर पर रखकर चूचियाँ हिलाती, तो कभी सर पर रखके। कभी गोल गोल घूमकर दोनों हाथे फैलाये अपने चूतड़ों को हिलाती। उसके चूतड़ों के बीच फंसी उसकी साड़ी, उसके गाँड़ की भव्यता और बढ़ा रही थी।

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ऐसे भारी चूतड़ थे जो साड़ी अभी तक टिकी हुई थी, वरना साया से पीछे से निकलने के बावजूद भला उस हल्के कपड़े की क्या बिसात थी। रंजू के साये का ऊपरी हिस्सा दिखने लगा था। तभी रंजू पीछे मुड़के, दोनों हाथ ऊपर करके अपने कूल्हों को झटके के साथ दांये बाएं कर नाच रही थी। फिर कभी उन्हें गोल गोल घुमाकर पीछे की ओर जोर के ठुमके लगा रही थी। उसके चूतड़ों का गोलाकार आकार गीले साड़ी की वजह से साफ साफ पता चल रहा था। पीछे से उसकी कमर भी कामुक अंदाज़ में ऐसे हिल रही थी जैसे, कोई नागिन बलखा रही हो। उसके खुले बाल जब छिटककर उसके गालों और चेहरे पर लगते थे, तो वो और अधिक कामुक लग रही थी। रंजू को इस समय शायद इंद्रदेव अगर देख लेते तो उसे स्वर्ग में अप्सरा बनाकर ले जाते। लेकिन इस समय अप्सरा तो वो थी, पर इंद्र कोई और था उसका अपना बेटा। रंजू की ठुमकती कमर अरुण के अंदर अपनी ही माँ के प्रति गहरी काम वासना भड़का रही थी। तभी उसकी नज़र अपनी माँ के खूबसूरत चेहरे पर गयी। हाय वो गीले गुलाबी होंठ, वो गीले गोर गोर गाल, वो नशीली आंखें, वो गीले काले लंबे बाल, उफ्फ्फ इस उम्र में भी रंजू उसे पच्चीस साल की स्त्री लग रही थी। जब वो गीले होंठों से, गाने के बोल बुदबुदाती तो, इतनी कामुक लग रही थी, जैसे उसके ओठों से पानी नहीं, बल्कि मधुरस टपक रहा हो।


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रंजू वैसे तो विधवा होने की वजह से कम ही कॉस्मेटिक सामान इस्तेमाल कर रही थी। फिर भी उसका रूप उसका यौवन ऐसे खिल रहा था, जैसे वो किसी फ़िल्म की हीरोइन हो। अरुण कमरे के दरवाज़े पर खड़ा, उसके हुस्न, उसके जलवे, उसकी जवानी, उसका रूप, उसके यौवन को आंखों से दिल में उतार रहा था। गाना खत्म होने को आया, रंजू नाचते नाचते रुक गयी। उसकी सांसे तेज चल रही थी, जिस वजह से उसकी चूचियाँ बार बार ऊपर नीचे हो रही थी। वो थक चुकी थी, तो वो वैसे ही नीचे बैठ गयी। रंजू के भारी नितम्भ अपने ही बोझ से छत की सतह पर दब कर फैल गए। फिर वो पीठ के बल लेट गयी। अब बारिश की बूंदे उसके चेहरे से लेकर पैर तक सीधे टकरा रही थी। बारिश में पूरी तरह गीली हो चुकी साड़ी से लिपटी रंजू फर्श पर कामुकता से कभी पेट के बल लेट जाती, तो कभी पलट कर घूम जाती। उसके बदन से बारिश की बूंदे छींट खाकर ऐसे उड़ रही थी, जैसे चिंगारी भड़क रही हो। वो उस बारिश में भी किसी जलते हुए शोले सी भड़क रही थी। तभी उन दोनों की नजरें आपस में मिली। अरुण रंजू को कामुकता भड़ी नजरों से देख रहा था। रंजू की आंखों में भी पुरुष संसर्ग की प्यास साफ झलक रही थी। एक आदमी को और क्या चाहिए, बारिश का मौसम, उसमें भीगती हुई एक औरत और औरत के अंदर भड़कती कामाग्नि की ज्वाला। अरुण रंजू को देखते हुए जाने कब बारिश में भीगते हुए उसकी ओर बढ़ चला। रंजू उसे अपनी ओर आते हुए देख रही थी, और उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। अरुण कुछ ही क्षण में रंजू के पास खड़ा था, वो रंजू की ओर अपना दांया हाथ बढ़ा दिया। रंजू ने अपना हाथ बढ़ाया और उसका हाथ पकड़ के उठने लगी। अब रंजू अपने बेटे के सामने पूरी तरह गीली कामुक स्त्री जैसी खड़ी थी। दोनों के बीच अभी भी एक हाथ की दूरी बनी हुई थी। दोनों एक दूसरे को कामातुर दृष्टि से देख रहे थे। रंजू पहल करते हुए शर्मा रही थी। अरुण ये चाह रहा था, कि रंजू इस बार पहल शुरू करे। लेकिन रंजू अपने ही बेटे से व्यभिचार की शुरुवात करने में लजा रही थी।
अरुण ये समझ गया कि उसे रंजू को थोड़ा धक्का लगाना पड़ेगा। वो उसके और करीब आया और अपनी माँ को कमर से पकड़ लिया। फिर उसे अपनी ओर खींचते हुए बोला," केतना बढ़िया, मौसम भईल बा माई। एकदम कमाल के। गर्मी से राहत हो जाई।"
रंजू उसकी ओर देखते हुए बोली," हॉं, बेटा बहुत निम्मन मौसम भईल बाटे। तपत गर्मी से राहत भेटल बा।"
अरुण," तहरो राहत भईल होई। ई बरखा तहार देहिया के भिगाके एकदम, मस्त क देने होई। अबसे, तू एकदम अलग बुझात बारू।"
रंजू," बबुआ, बरखा, हमार तन मन के एकदम मस्त क दिहलस हो। ई बरखा में भीजके दिल में अजब से खुशी अउर बेचैनी दुनु उठल बाटे।"
अरुण उसके बेहद करीब था और बारिश की बूंदे दोनों की पलको से लगातार टपक रही थी। दोनों की नजरें एक दूसरे की आंखों में डूब जाना चाहती थी। अरुण उसे अपने से चिपकाते हुए पूछा," कइसन बेचैनी??
रंजू की कमर के चारों ओर राजू के हाथ लिपटे हुए थे। उसकी चूचियाँ अरुण के सीने से दब चुकी थी। रंजू उसकी टी शर्ट उतारते हुए बोली," ई बेचैनी आज से ना, बहुत दिन से ह। पर दिल के कोनो कोना में दबल रहला।" फिर उसका हाथ उठाके अपने सीने पर रखते हुए बोली," महसूस करअ हमार दिल के धड़कन अउर ओकर धक धक में बहत बेचैनी के अरुण।"
अरुण रंजू के बांये चुच्ची के ऊपर से रंजू की धड़कन महसूस करने लगा। रंजू उसकी टी शर्ट उतारके उससे पहले की भांति चिपक गयी थी। उस भीगती बारिश में भी, अरुण रंजू के चूचियों के बीच की गर्मी महसूस कर रहा था। रंजू के प्यासे होठ गीले होकर भी प्यासे लग रहे थे। अरुण के सीने को रंजू सहला रही थी। अरुण उसके होठों को बांये हाथ के अंगूठे से छुआ। रंजू जैसे खुद अपने होठ उसपर रगड़ने लगी। अरुण को रंजू की इस हरकत से उसके अंदर की बेचैनी की अंदाजा होने लगा था। दोनों का माथा एक दूजे से चिपका हुआ था। दोनों की सांसें एक दूजे से टकरा रही थी। रंजू ऐसे बेचैन हो रही थी, जैसे वो पहली बार किसी पुरुष के समीप गयी थी। अरुण के अंगूठे को वो खुद होठों के बीच ले ली और चूमने लगी।
अरुण रंजू की चुच्ची को धीरे धीरे मसल रहा था। रंजू उसके छाती को अपनी हथेलियों से महसूस कर रही थी, जैसे कह रही हो मुझे चूम लो, मेरे होठों का रस पी लो। अरुण उस मूक निमंत्रण को स्वीकार करते हुए, उसके होठ को चूमने लगा। रंजू ने खुद अपना सर आगे कर अपने होठ अरुण के होठों से मिला दिया था। वैसे तो छत पर कोई नहीं था, पर ऐसा लग रहा था कि उस चुम्बन को कई लोग देखकर शोर कर रहे हो। ये कोलाहल दोनों की मनः स्थिति को दर्शा रहा था। अरुण रंजू के होठों का पूरा रसपान कर चुका था और उसके मुंह में अपनी जीभ ठूंस चुका था। रंजू अपने बेटे की लपलपाती जीभ अपनी जीभ से खुद लड़ा रही थी। वो अपने मुंह के हर कोने में अरुण के जीभ को महसूस कर रही थी। थोड़ी देर बाद बारी रंजू की थी। दोनों की जीभ अब अपना स्थान अदल बदल कर चुकी थी। रंजु की जीभ अब अपने बेटे के मुंह में कुश्ती लड़ रही थी। जाने कितने देर दोनों इसी अवस्था में खड़े रहे। थोड़ी देर और इस तरह चुम्मा चाटी के बाद, दोनों हांफने लगे।
अरुण," तू त खूब बढ़िया नाचेलु। तहरा देखके कोई ना कह सकेला कि तू एतना बढ़िया नचनिया बारू।"
रंजू थोड़ा हंसी और बोली," हमके ई गाना बहुत पसंद रहला, हमार सहेली के बियाह में हम नाचने रहनि। हमार बियाह में भी ई गीत खूब बाजल रहला।"
अरुण," का बात ह। तू नाच नाच के पूरा माहौल बनाउने होखब।"
रंजू शर्मा गयी। अरुण ने फिर रंजू के बाल पकड़ के उसका सर पीछे की ओर झुका दिया। रंजू की चूचियाँ उभर आई और अरुण ने चूचियों के बीच अपना सर डाल दिया। रंजू उसके सर को पकड़े हुए सिसकारी," सस्स.....स्स......स्ससस्स....सस्स... भर रही थी। अरुण उसके ब्लाउज के हुक खोलने लगा। वो रंजू की चूचियों को बेतरतीब चूमे जा रहा था। रंजू की ब्लाउज की आखरी हुक खुलते ही, चूचियाँ आज़ाद हो उठी। उसके मोटे मोटे भूरे चूचक गर्व से तनके अरुण को चिढ़ा रहे थे। रंजू की ब्लाउज उसके बांहों में फंसी हुई थी। अरुण अपनी माँ के स्तनों को लगातार चूम रहा था।
रंजू," आह...आह...आह...उह अरुण...चु.. चूस..... ल ना। हमार चुच्ची चूस ल। आह... धअ.... ल...अ... अपना मुँह में। खूब... निम्मन से चूसअ..... आपन ....माई के चु... चुच्ची।
अरुण उसकी चूचियों को बांये हाथ से भींच रहा था, और उसकी दांयी चुच्ची के चूचक को अपने मुंह में लेके चूस रहा था। अरुण चूचक को बेरहमी से चूसे जा रहा था। वो बीच बीच में उसपर हल्के से दांत भी काट लेता था। रंजू के मुंह से कामुक आँहें भर भरके उठ रही थी। अरुण रंजू के दोनों चूचियों को बारी बारी चूस रहा था। रंजू अपने ही बेटे की बांहों में अब बहकने लगी थी। रंजू को स्तनपान अथवा चुच्ची चुसवाई करवाने से अत्यंत उत्तेजना हो रही थी। अरुण अपनी माँ के अंदर की कामुक स्त्री के बंद दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था। रंजू की आंखें वासना से लबरेज हो उठी थी। लेकिन अरुण उसे कामुकता से इतना भर देना चाह रहा था, की आज वो चाह कर भी नैतिकता की ओर ना जा पाए। वो अभी भी रंजू के गोरे गोरे चुच्ची को मसल रहा था और बारी बारी चूस रहा था। रंजू बिना संकोच स्तन मर्दन और स्तनपान का आनंद दे रही थी और ले भी रही थी। अरुण ने उसे फिर छत पर ही लिटा दिया। वो उसके ऊपर आ गया और उसकी ब्लाउज निकालके फेंक दिया। रंजू की बालों से भरी कांख ( बगल) उसके सामने थी। गीले होने की वजह से बाल चिपक गए थे। अरुण से रुका ना गया और बोल उठा," माई, तहार कंखिया बहुत मस्त बा। चूस ली का?
रंजू लंपट स्वर में बोली," बेटा, हमार रोम रोम अब तहार बा। जइसे चाहा वइसे करा।"
अरुण ने फिर आव देखा ना ताव सीधा रंजू के बांयी कांख को जीभ फिराके चाटने लगा। रंजू को बीच बीच में गुदगुदी लगती तो वो हंस पड़ती। वहां एक अजीब सी मादक गंध थी। अरुण उसका दीवाना हो उठा। वो कभी दांयी कांख को चूमता तो कभी बांयी कांख को। रंजू अपनी बांहे ऊपर की ओर मोड़े सिसयाते हुए अपनी गर्दन दांये बांये पलटते हुए पड़ी थी। कुछ देर तक ऐसे ही चाटने के बाद, अरुण रंजू को चूमने लगा। रंजू भी उसे पूरी शिद्दत से चूम रही थी। तभी रंजू ने अरुण को पलट दिया, और चूमते हुए खुद उसके ऊपर आ गयी। अरुण को रंजू से इसकी अपेक्षा नहीं थी। रंजू उससे पूरी तरह लिपटी हुई थी। अरुण अपने हाथ रंजू की नंगी पीठ से लेकर कमर और कूल्हों तक फिरा रहा था। वो रंजू को खुद में समा लेना चाहता था। रंजू किसी नवयौवना की भांति, अरुण की ऊर्जा से ऊर्जा मिला रही थी। अरुण ने फिर उसके चूतड़ों को धर दबोचा। रंजू के भारी नितम्भ उसके हाथों में पूरी तरह समा नहीं रहे थे। लेकिन जितना हिस्सा भी उसके पंजों में आया उसने उनको खूब मसलना शुरू कर दिया। रंजू कराह उठी। गीले साड़ी की वजह से चूतड़ों पर पकड़ आसानी से बन रही थी। अरुण ने उसे अपनी ओर खींच लिया और उसकी साड़ी साया समेत उठाने लगा। रंजू खुद उसका सहयोग कर रही थी। थोड़ी ही देर में रंजू की साड़ी उसके कमर तक उठ चुकी थी। अरुण ने उसे हल्का उठने का इशारा किया और उसकी पैंटी की इलास्टिक को पकड़ के खींचने लगा। रंजू की पैंटी घुटनों तक आ चुकी थी। उसकी हल्की झांटों वाली बूर अरुण के आंखों के सामने आ चुकी थी। रंजू फिर मूतने की अवस्था में अरुण के चेहरे के पास बैठ गयी। अब रंजू की साँवली बूर अरुण के मुंह के ऊपर थी। ऐसे मौसम में ये नज़ारा अरुण के दिलो दिमाग में सिवाय कामाग्नि भड़काने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। रंजू अपने बूर पर अरुण के जुबान के हमले के लिए तैयार बैठी थी। उसे खुद इस बात की जल्दी थी, कि कब अरुण उसकी रिसती बूर को अपनी जीभ से चाटे। तभी उसे वो अनुभूति होने लगी, और अरुण अपनी माँ की बूर का रसास्वादन करने लगा। बूर के पानी का खाड़ा स्वाद, उसकी जुबान को भा गया।
रंजू सिसयायते हुए बोली," आह,....उम्म्म्म.... हाय.... केतना बढ़िया बुझाता। ले लअ ..... राजा..... उफ़्फ़फ़फ़..... का बताईं...ब.. बड़ा... बेचैन बानि। पी लअ..... सब.... रस।
अरुण," खुलके बोल ना माई, आह.....कहाँ के रस पी ली.....
रंजू उसकी ओर देख बोली," हमके बेशरम बनाबे चाहेलु मुसवा बेटा। माई के बेशरम बनाइबू का हो।"
अरुण," इहे में त मज़ा आवेला, जब तलक तू खुलके ना बोलबु त मज़ा ना आई। औरत जब बेशरम होखेलि तभी मज़ा आवेला।
रंजू फिर बेशर्मी से बोली," आह... लेकिन .... तहरा सामने हम एतना बेशर्म कइसे बनी। उफ़्फ़फ़फ़.... बड़ा लाज आवेला। त....तहार प..प.पापा के साथ त हम बहुत खुल गईल रहनि। उफ़्फ़फ़फ़....हाय राम।
अरुण," इहे त बात बा रंजू, औरत के शरम के गहना मरद के साथे उतार देवे के चाही। खुलके चुदाई के मज़ा आउर मस्ती करेके बा त, लाज शरम छोड़ दे। बोल कहाँ के रस पी ली।"
रंजू," ब..बु...बूर के रस। अपन माई के बूर के रस पी लअ.... उफ़्फ़फ़फ़ । केतना अजीब बुझा रहल बा। तहरा से अईसे बोल के।
अरुण," लेकिन तहार बूर से त पानी अउर चुवे लागल बा रंजू रानी।"अरुण अपनी माँ को नाम से इसलिए बुला रहा था, ताकि उसका संकोच दूर कर सके। अरुण उसके चूतड़ों को पकड़के बूर को चाटने में लग गया। रंजू उसके बूर से चूती, पानी अपने बेटे की प्यासी जुबान पर गिरा रही थी। अरुण उसके बूर के चीरे से पत्तियों को फैलाके जीभ बीच में घुसेड़ रहा था। रंजू के मुंह से कामुक सिसकारियां निकल रही थी। रंजू की कमर अपने आप ही आगे पीछे हो रही थी, और वो अरुण की जीभ पर बूर को घिस रही थी। अरुण उसकी बूर के दाने को बीच बीच में मुंह में भरके चूस ले रहा था। ऐसे करते ही रंजू की सांसे और सिसकारी दोनों ही तेज हो जाती।
रंजू," आह, सीssssssss. आह ...हह... हाय रे जालिम, आह.... हमके त तू म..म.मस्ता देले बारू। केतना बढ़िया चुसेलु बेटा, माई के बूर .......के आह र..रराजा।"
अरुण उसकी बातें सुनके खुश था, कि उसकी माँ लाज शरम के पर्दे धीरे धीरे हटा रही है। रंजू की आंखें बंद थी, उसने खुद को काफी संतुलित कर रखा था। उसके हाथ दोनों केहुनी से मुड़े हुए अपने सर के पीछे थे। कमर एक लय में अरुण के मुंह पर हिल रही थी। अरुण उसकी बूर में तभी उंगली डाल दिया। एक तरफ बूर में उंगली और दूसरी ओर अरुण का बूर के दाने को छेड़ना रंजू को पागल बना रहा था। उसकी बूर से पानी, किसी रिसते हुए जल प्रपात के स्रोत की तरह धीरे धीरे उसके बूर की फांकों पर से बह रहे थे। कुछ ही क्षणों में रंजू की बूर टहकने लगी, और बूर से पानी का फव्वारा फूट के अरुण के खुले मुंह और चेहरे पर बरस उठा। रंजू कामुकता से चरम सुख को प्राप्त कर चीख उठी। अरुण उसके बूर के पानी को बेहिचक पी गया। उसका स्वाद नमकीन और थोड़ा खाड़ा था। शायद रंजू की मूत भी निकल गयी थी। अरुण ने फिर रंजू की साँसों में काबू आने के बाद, उसे उठने को कहा। रंजू उसकी बात मान उठ खड़ी हुई। उसकी आँखों में थोड़ी लाज थी। अरुण भी खड़ा हो गया। तब रंजू की नज़र अरुण के पैंट पर पड़ी जिसमें, लण्ड तनकर तंबू बना रहा था। रंजू थोड़ा शर्माते हुए, उसके पास आई और अपना हाथ उसके पैंट के अंदर घुसा दिया। उसने अरुण के लण्ड को कसके पकड़ लिया। उसकी नज़रें झुकी हुई थी। अरुण ने उसकी ठुड्ढी पकड़के उसके चेहरे को ऊपर उठाया और बोला," का भईल, हमरा से नज़र मिला ल।
रंजू उसकी ओर देखते हुए बोली," लाज आवेला,।"
अरुण," अभो, तोरा लाज आ रहल बा का। तू त पूरा नंगे बारू ए रानी। हमार हल से तहार खेतवा, पर अभी त जुताई होई रंजू रानी।"
रंजू शर्मा रही थी।अरुण ने फिर अपना पैंट उतार दिया और अपना लण्ड लहरा दिया। रंजू बारिश में भीगते हुए, उसके लण्ड को देख कांप उठी। इतना मुस्टंड लण्ड वो पहली बार करीब से देख रही थी। उसकी आँखों में वासना लहरा उठी। इससे पहले की अरुण उससे कुछ कहता वो खुद घुटनों पर बैठ गयी। और अरुण के सख्त लण्ड को दोनों हथेली में थाम घूर रही थी। अरुण ने रंजू के अंदर की प्यासी औरत को पहचान लिया था, और ये भी अनुमान लगा लिया था कि आज उसे कोई नहीं रोक पायेगा। रंजू अरुण के लण्ड के सुपाड़े को चूमी, और फिर जीभ से उसकी चोंच रूपी छेद में कुरेदा। ऐसा करने से अरुण को असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी। रंजू लण्ड को हौले हौले मुठियाते हुए, चूम रही थी। फिर अरुण की ओर कामुकता से देख मुस्कुराती। अरुण उसके सर पर हाथ रख उसे सहला रहा था। रंजू अरुण के सुपाड़े को मुंह में लेकर जोर से लॉलीपाप की तरह चूस रही थी। वो रुक रुक के उसके सुपाड़े को कभी छोड़ती तो फिर तुरंत लप से मुंह खोलकर चूसना शुरू कर देती।
अरुण," उफ़्फ़फ़फ़ उम्म्मह का बात ह, अउर चूस हमार लांड के। आह .....आह बड़ा निम्मन बुझा रहल बा। केतना मज़ा आ रहल बा माई।"
रंजू," उम्ममम्ममम्मम्म.... ऊमम्म आह....ललप्पप्प,,,, ललप्पप्प का बढ़िया लण्ड ह।
थोड़ी देर चुसाई के बाद, अरुण ने रंजू को वहीं लेटने को बोला। फिर अरुण उसकी जांघों के बीच आकर उसकी बूर के मुंहाने पर अपना लण्ड छुवाने लगा। प्यासी तपती जमीन पर आज बादल बरसने वाले थे। रंजू उत्तेजना के मारे, लण्ड के एहसास से मचल रही थी। अरुण रंजू को इस तरह मचलता देख, खुश था। उसने फिर अपना लण्ड उसके बूर के चिपचिपे पानी से गीला किया। फिर हौले से अगले ही पल उसकी बूर में उतार दिया। रंजू वैसे तो चुदी चुदाई औरत थी, लेकिन अपने बेटे के लण्ड के हमले से, कराह उठी। उसका लण्ड था भी बड़ा सा, जिसे किसी भी स्त्री को लेने में दिक्कत होती। अरुण रंजू को भीनी भीनी बारिश में छत के ही एक कोने में चोद रहा था। लण्ड की पूरी लंबाई बूर में जा चुकी थी। अब तो वो बार बार अंदर बाहर निकल रहा था। रंजू अपने बेटे के नीचे लेटी मस्त चुदवा रही थी। रंजू के दोनों हाथ, अरुण अपने पंजो में लिए हुए था। रंजू के सर के पास उसकी हथेलियां थी। रंजू की प्यासी कामुक आंखें, आधी खुली हुई थी। उसके होठ कांप रहे थे। उसकी दोनों जाँघे फैली हुई थी, जिनके बीच अरुण बैठ कर उसे प्यार के धक्के लगा रहा था। उसकी चूचियाँ बारिश में गीली होकर हिलती हुई और भी नरम और लुभावनी लग रही थी। उसपर बारिश की बूंदे गिरकर जब लुढ़क रही थी, तो और भी कामोत्तेजक दृश्य बन रहा था। अरुण की कमर के धक्कों के साथ, रंजू भी हिल रही थी। तभी अरुण ने रंजू के प्यासे कांपते होठों को अपने होठों के शिकंजे में ले लिया। अरुण उसके होठों को ऐसे चूस रहा था, मानो कोई भंवरा किसी फूल के रस को चूस रहा था। रंजू भी उसके गर्दन को अपनी बांहों में भरकर उसे अपने होठों का मदन रस पिला रही थी। दोनों एक दूसरे में मगन होकर दुनिया भूल चुके थे। थोड़ी देर बाद जब दोनों के चुम्बन का विराम हुआ तो,
रंजू अरुण के माथे को चूमकर बोली,"अरुण हम बहुत पियासल बानि, तू अपन माई के पियास मिटाइबू ना राजा। हमार बूर से पानी हमेशा चुवेला, लांड खातिर। लेकिन तोर पापा, खाली एक महीना खातिर, आवत रहला। उ एक महीना उ हमके जमके चोदत रहले, पर हमके त बारह महीना बूर में लांड चाही। आखिर हमहु औरत बानि, केतनो चुदायिब एक महीना में पर फेर लांड खातिर बूर से पानी चुबे करि। आ हमार पियास तहार, मोट लांड से बुझी।"

अरुण," माई, अब से कउनो रतिया, तहराके पियासल ना सुते के पड़ी। ई हमार वचन बा। पापा जउन तहरा संगे अन्याय कइले बारन, ओकर न्याय बेटा करि। तहरा जइसन चुदक्कड़ माल, कइसे एतना दिन बच गईल इहे आश्चर्य बा। हम त अब तक ई सोचत रहनि कि तू बड़ा सुशील और संस्कारी महिला बिया।

रंजू," तू हमरा पर ध्यान ना दिहलस ना राजा एहीसे बच गईल रहनि। लेकिन जंगल में हिरनी, कब तलिक शेर से बची। एक ना एक दिन हिरनी के शिकार त होबे करि। भले तहार माई बानि, पर कामेच्छा त हमरो बा। कहां जाके नाम डुबौति। अपन अंदर के औरत के समझौने रहनि। पर अब तहरा देखके, सुशील और संस्कारी औरत के जगह, काम पिपासु औरत ले लिहलस।"

अरुण," आवे दे अपन कामेच्छा के उपर, खुल जो पूरा। देख अबसे कइसे तहार, हर तरह के यौन इच्छा हम पूरा करब। रंजू अबसे तहार, हर रात सुहागरात होई, जउन तू अपन बेटा के साथ मनाइबू।

रंजू," सच में अरुण, का अब हमार सब सपना पूरा होई। हर रोज़ सेज बिछी, अउर जउन जउन चीज़ हम सोचले रहनि, उ तू हमरा संग में करबा।

अरुण," खुल के बोल रानी, का तहार इच्छा बा। कइसे कइसे चुदबाबे चाहेलु ?
रंजू," हमके लाज लागेला, जाने तू का सोचबा कि तहार पूजा पाठ वाली माई के मन में एतना गंदा गंदा बतिया कइसे आवेला। लेकिन एगो बात जान ल, कि हर औरत चाहे उ केकरो माई, बहन, बेटी होखो, ओकरा अंदर एगो छिनार जरूर होखेला।"

अरुण," तू देखा ना कि तू केतना बड़की छिनार हउ, बेटा के लांड पर त बइठल बारू।"

रंजू उसकी ओर देखते हुए," खाली हम ही छिनार बानि का। देखलस नइखे कइसे रानी आपन बाप से चुदबाबेली। जइसे बाप बेटी वइसे माई बेटा। तू आपन माई, चोद के खुश बारू ना।

अरुण धक्के लगाता हुआ बोल रहा था," तहरा चोदके, मन के मुराद पूरा हो गइल माई। तहार देहिया के कुल गर्मी उतर जाई। औरतिया के चोदे में मज़ा आवेला, पर माई के चोदे में डबल मज़ा।

रंजू हंसते हुए," जे आपन माई के चोदेले, जानत बारू उ का कहाले मादरचोद। जउन बूर से निकलेले, उहे बूर में लांड घुसाके, छितरावेला।

अरुण," तहरा जइसन छिनार माई, मादरचोद के ही जन्म दी।" दोनों जोर से हंस पड़े। रंजू अब पूरी तरह खुल चुकी थी। अरुण ने फर्श पर बैठे, रंजू को उठाकर अपनी गोद में लण्ड पर बैठने का इशारा किया। रंजू खड़ी हुई फिर साड़ी और साया जो कमर में था, उसे उतार फेंकी। और अपने बेटे के सामने सम्पूर्ण नग्नावस्था में खड़ी थी। रंजू के बदन पर कपड़े का एक टुकड़ा भी नहीं था। रंजू फिर अपने बेटे के लण्ड पर बैठने लगी। अरुण का लण्ड उसकी बूर की गहराईयों में उतरने लगा। रंजू की आंखें अनायास ही बन्द हो गयी। उसने अरुण को अपने चूचियों से लगा लिया। अरुण उसकी चूचियों में सर रखके रंजू की कमर को थामे हुआ था। रंजू अब उसके लण्ड पर हल्के हल्के कूद रही थी। अरुण उसके चूतड़ों पर हाथ से काबू किये हुए था।
रंजू," आह...आह...उफ्फ्फ खूब चोदआ अरुण मादरचोद कस कस के चोद। जउन बेटा के सामने पवित्र रहनि, आज ओकरे लांड पर बईठके चुदवा रहल बानि।"
अरुण," तू हमरा खातिर अभी भी पहिले जइसे रहबू माई। तहार पवित्रता के केहू दोसर आदमी सवाल ना कर सकिले। तहार हमार रिश्ता घर के भीतर मरद मेहरू वाला होई और दुनिया के सामने पवित्र माई बेटा के।
रंजू," पहिले जइसन अब कुछ ना रही अरुण, काहे कि औरत आ मरद जब एक बार चुदाई कर ले, त दुनु के खाली एकांत चाही और दुनु एक दोसर के भोगी।"
रंजू इस अवस्था और भी कामुक लग रही थी। वो बारिश में भीगकर और भी आकर्षक और कामातुर लग रही थी। अरुण के धक्के भी तेज हो रहे थे। बूर की दीवारों से अरुण के घिसते लण्ड का एहसास रंजू की बूर से अत्यधिक काम रास का रिसाव कर रहा था। एक बेचैन, प्यासी, कामुक स्त्री होकर वो अपने बेटे संग काम लीला में लीन हो गयी थी। लण्ड का बूर से बार बार बाहर आना और घुसना, उसके अंतरात्मा को एक सुकून दे रहा था। कितना अजीब है ये लण्ड बूर का संगम, जिसमें कोई भेदभाव नहीं था। ना बूर को कोई संकोच था, कि जो लण्ड घुसा है वो बेटे का है, और ना ही लण्ड को कोई संकोच था कि वो मां की बूर में घुस चुका है। अगर शरीर रिश्ते देखती तो शायद रुक जाती, पर उसे तो बस भूख मिटाने से मतलब है। रिश्तों की डोर तो कहीं पीछे छूट गयी थी। अब तो बस एक दूजे की प्यास मिटाना ही मकसद था। दोनों की कामुक आँहें और गर्म सांसें उस आंच को सुलगा रही थी, जो दोनों के मन में एक दूजे को मड़ई के पीछे देखके भड़की थी। रंजू ने ट्रेन में किसी तरह चुदने से खुदको बचा लिया था, पर आज वासना के आगे वो नतमस्तक हो चुकी थी। बूर में लण्ड लेकर उसका अधूरापन पूरा हो चुका था। लण्ड तो आखिर लण्ड है वो चाहे किसी का भी हो।
दोनों इस तरह करीब आधे घंटे तक चुदाई करते रहे। दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हुए, आखिरकार झड़ने लगे। अरुण रंजू की बूर में तेज धक्के मारते हुए उसके कंधों पर लुढ़क गया। रंजू की बूर टहक रही थी, उस चरम सुख की प्राप्ति से। दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। दोनों की सांसें तेज़ चल रही थी। तपती धरती पर पहली बारिश हो चुकी थी।
बारिश लगभग रुक चुकी पर फुहारे अभी भी पर रही थी, दोनों निर्वस्त्र खुले आसमान के नीचे लेटे हुए थे। रंजू अरुण के ऊपर लेटी हुई थी। अरुण उसके दोनों चूतड़ों को पकड़के सहला रहा था। एक खामोशी सी छाई हुई थी। तभी खामोशी को तोड़ते हुए रंजू बोली," अरुण, हमके पेशाब लागल बा। हमके मूते जाय दअ।"
अरुण ने जब रंजू के मुंह से ये बात सुनी, तो उसके कान खड़े हो गए। उसने रंजू की ओर देखा और उसे चूमते हुए बोला," हम तहरा मूते देखत चाहत बानि।"

रंजू," कइसन बात कहत हो, तहरा के लाज ना आई। अपन माई के मूतत देखत चाहत बारू। बेशरम मुसवा।"

अरुण," माई, अब कइसन लाज शरम। तहार हमार रिश्ता अब माई बेटा के साथ साथ मरद औरत के हो गइल बा। औरत के जब हम कुल ऊपर से नीचा तक नंगा कइके, चोदे देले बानि, त औरतिया काहे लजात बिया। हम त ना लजाइब।"

रंजू," लेकिन बेटवा, तहरा सामने कभू कइनी ना। एकदम अजीब बुझा रहल बा। ई देखके तहरा का मिली। शरीर के गंदगी बा।"
अरुण," इहे त देखेके बा, कि माई के बूर से पेशाब के धार कइसन छुल छुल निकलेला। आ उ गंदगी ना, हमार खातिर अमृत ह माई।" ऐसा बोलके उसने रंजू को खड़े किया और खुद उसके नीचे ठीक बूर के सामने बैठ गया। रंजू एक बार फिर बोली," अरुण, इँहा ठीक ना बुझा रहल बा। हमके बाथरूम जाय दे, केहू आ जाई त।"
अरुण," माई, जब अभी तक केहू ना आईल, त अब के आई, दु मिनट लगी। नखरा मत कर।"
रंजू अपने पैर पटकते हुए बोली," ढेरी जोर से मूत लागल बा। जिद ना कर बेटा। हम बाद में तहरा देखा देब।"
अरुण," जिद तू क रहल बारू, हम कहतानि कि मूत एज्जे। औरत के नन्हा बूर से पेशाब के धार हमके देखके बा।" वो उसकी कमर को थामके बोला।
रंजू अपने बेटे, और मूत के प्रेशर से तंग हुई पड़ी थी। उससे जब रहा नहीं गया, तो वो बोली," ना मानबु, त ले अब हमसे बर्दाश्त ना हो रहल बा। बड़ी देर से रोकले बानि।" और फिर उसके बूर से छुल छुला कर मूत के फौवारे से छूटे। रंजू की बूर और उसके आसपास की जांघ का हिस्सा अरुण के वीर्य से पूरी तरह सना हुआ था। वो मूत की पहली धार, उसे साफ करती हुई बहने लगी। अरुण ये अनमोल दृश्य, अपनी आंखों में सजो रहा था। वो बूर की पत्तियों के खुले दरवाज़े, से चिपककर बहती पेशाब की धार को, बहता देखकर झूम उठा। रंजू खड़े खड़े जीवन में कभी मूती नहीं थी। और वो अनायास ही बैठने लगी, जिससे उसके मूत की धार सीधे अरुण के चेहरे पर बरसने लगी। रंजू की गर्म मूत की धार अपने चेहरे पर महसूस कर वो मचल उठा। अपनी माँ के बूर से बरसते उस पवित्र खाड़े जल को, वो मुंह के बर्तन में एकत्रित करने लगा। उसने रंजू की जांघ, पकड़ हुई थी, और उसे उसी अवस्था में रोक दिया था। रंजू को खुद पर काबू नहीं था, क्योंकि वो बहुत देर से मूती नहीं थी और ऊपर से बारिश में गीले होने की वजह से और भी जोर की मूत आई थी। वो अपनी बूर से तेज़ धार लगातार मारे जा रही थी। और अरुण उसके मूत्राशय रूपी जल प्रपात का पानी, किसी प्यासे की तरह पी रहा था, जैसे उसे मीठे पानी का झरना मिल गया हो। रंजू उसे देख, थोड़ा थोड़ा मुस्कुरा रही थी, पर उसके चेहरे पर मूत निकलने की राहत ज्यादा थी। एक संस्कारी औरत ये भी कर सकती है, उसे ये खुद पर भरोसा नहीं हो रहा था। जब तक उसकी पेशाब की धार कमजोर नहीं हुई, तब तक अरुण उसका पेशाब पीता रहा। इस क्रम में बहुत सारा पेशाब छूटकर उसके शरीर को गीला भी कर गया। पर वो किसी शराबी सा अपनी माँ के बूर रूपी मधुकलश से पेशाब के पैमाने पीता रहा। थोड़ी देर बाद धार जब बंद हुई, तो अपने होठों को चाटता हुआ, बूर से टपकते बूंदों को अपनी हथेली में जमा करने लगा।
रंजू हंसते हुए," मुसवा बेटा, ई का करतारू, हाथ से काहे पेशाब उठा रहल बारू। छोड़ द "
अरुण," माई, तहार बूर से चुवेला ई पानी पेशाब ना अमृत ह। ई पीके हमार तन मन तंदरुस्त हो गइल बा। अब तहार मूत त हमके रोज चाही।"
रंजू हंसते हुए बोली," तहरा के एतना बढ़िया लागल का राजा। ई बूर के खाड़ा पेशाब के स्वाद।"
अरुण,सर हिलाते हुए बोला" हॉं माई, तहार पेशाब के स्वाद हमके एकदम निम्मन बुझाईल।" ऐसा बोलके उसने अपनी अंजुली में पड़े एकत्रित मूत को पीने लगा। फिर उसने रंजू की जांघों और बूर के आसपास पेशाब से गीले त्वचा को चाट लिया। फिर बूर को जीभ से कुरेद कुरेद के एक एक बूंद चट कर गया। रंजू उसे देख, अचंभित और उत्तेजित दोनों थी। वो उसके सामने घुटनों पर बैठ गयी और उसकी आँखों में देखते हुए उसे चूमने लगी। उसे भी अपनी बूर के पेशाब का खाड़ा स्वाद का एहसास हुआ। वो लेकिन उसे चूमती रही। दोनों एक बार फिर गर्म हो चुके थे। रंजू उसके लण्ड को पकड़के सहला रही थी। अरुण रंजू की चूचियों को पकड़के मसल रहा था। रंजू खुद अपने चूचियों को उसके मुंह में देना चाह रही थी। अरुण ने फिर रंजू की चूचियों को पर्याप्त सम्मान देते हुए, उन्हें चूसने लगा। रंजू उसका लण्ड हिला रही थी।
रंजू," आह,,, सीसीसी ....इशशश.... असही चुसत रहलु बचपन में तू हमार दुनु चुचिया। तब तू अपन भूख मिटात रहलु, अब फ़र्क़ एतना बा कि ई चुसिके तू हमार पियास मिटा रहल बारू। खूब पी लsss ई चुचिया के, दूध के धार निकाल द, मुसवा बेटा।" रंजू बड़बड़ा रही थी।
अरुण," माई, कसम से, तहार चुच्ची चुसे में बड़ा आनंद आ रहल बा। हाय ई तनल तहार कारी अंगूर जइसन तहार चूचक।"
रंजू," त पिलअ, राजा जइसे मन करे। चुसि चुसि के तू अउर तहार पापा बड़ा कइले बारन सं। जेतना चुसाई उतना आकार अउर पियास बढ़ी। औरतिया के सबसे कामुक हिस्सा चूचक ही बारे।"
अरुण," एहीसे त चुसत अउर मर्दन दुनु करत बानि।" दोनों इसी तरह कामोत्तेजक बातें करके एक दूसरे को उकसा रहे थे। रंजू अपने बूर में लण्ड लेने के लिए फिरसे कामातुर हो चुकी थी। उसकी आँखों में फिरसे जगी प्यास साफ पता चल रही थी।
रंजू वासना में डूबी हुई सी बोली," घुसावा ना, अरुण।"
अरुण उसके होंठों को छूते हुए पूछा," का घुसाई बोला ना।"
रंजू उसके लण्ड को दबोचते हुए बोली," ई, जउन कूद रहल बा, मुसवा।"
अरुण," ना खुलके बोला, कि तहरा का चाही, कहां चाही, कहां घुसाई।"
रंजू ने सोचा कि शर्माने का कोई फायदा नहीं, वैसे भी दोनों ने थोड़ी देर पहले ही ये काम किया था। फिर उसकी आँखों में आंखें डालके वो बोली," तहार बड़का लांड, हमार बूर में घुसावा मुसवा बेटा।"
अरुण," आ ओकर बाद, का करि।
रंजू," फेर हमार बूर में लांड आगे पीछे करके हमके चोदिहा रे मादरचोद।"
अरुण," उफ़्फ़फ़फ़,,,,, उफ्फ्फ रंडी बिया तू। बेटा के लांड से बूर चुदबाबे में बड़ा मन लाग रहल बा का।"
रंजू," अब का बेटा आ का माई, हरामी। तहरा के का पता कि हम केतना पियासल बानि। चुपचाप लांड घुसा दे। ना त...
अरुण," ना.....त,ना...त का?
रंजू उसके लण्ड को पकड़े हुए बोली," देखा दी, देखबू का?
अरुण इससे पहले कुछ समझ पाता, रंजू उसके लण्ड को बूर के मुहाने पर दोनों फांकों के बीच रगड़ने लगी। लण्ड का कड़क सुपाड़ा बूर के रस से भीग गया और चिकना हो गया। रंजू उसपर बैठती चली गयी। बूर लण्ड का खुली फांकों से स्वागत करती चली गयी।
रंजू के मुंह से कामुक सित्कार निकल रही थी। अरुण अपने दोनों हाथ पीछे की ओर टिकाए रंजू को बैठने की पर्याप्त जगह दे रहा था। रंजू लण्ड पर गाँड़ कुदका रही थी और अपनी मस्ती में बड़बड़ा रही थी।
रंजू," उफ़्फ़... जिनगी में पहली बार, अइसन लांड मिलल बा, जउन एतना जल्दी फेर से तैयार हो गइल। हमार बूर अइसन लांड चाहत रहनि। हरदम बूर से पानी चुवत बिया। तहार पापा कभू एकरा ठीक से शांत ना कइलस।"
अरुण," काहे माई, पापा तहके ठीक से चोदत ना रहला का?
रंजू," चोदत रहले, पर उ खाली एक महीना खातिर आवत रहले नु। एक महीना में हमके उ बस दस पंद्रह दिन ही चोदत रहले।"
अरुण," दस पंद्रह दिन कम बा का?
रंजू," अउर ना त का। मेहरू एगारह महीना पियासल रही, त दस दिन के चुदाई से का होई। कम से कम पूरा महीना त जमके चोदे के चाही ना।"
अरुण," माई दस दिन में तहार मन ना भरेला। अरे पापा के त तू कचूमर निकाल देत होई।"
रंजू," एहीसे त तरह तरह के दवाई, शिलाजीत, सब के व्यवस्था करत रहनि। ताकि सारा सारा रतिया उ हमके धर के पेलत रही। लेकिन उ एक ही बेर करत रहुवे। हमके कम से कम दु से तीन बेर लांड चाही। देखा ना अभी भी हम बहुत कम चुदौनी हअ। लेकिन अब अपन पापा के कमी तहके ही पूरा करे के पड़ी।"
अरुण," का कहत बारू, तू त एकदम चुदक्कड़ माल बिया। तू टेंशन मत ले, आज से तू संभोग के सम्पूर्ण सुख भोगबु। तहके जेतना मर्ज़ी उतना बेर चोदब। पापा जउन काम अधूरा छोड़ले बानि उ काम, सब बेटा के पूरा करेके पड़ी।"
रंजू," जब बाप के स्वर्गवास होखेला, त कुल संपत्ति बेटा लेवेला। औरत भी एक तरह से संपत्ति ही होखेला। उ हिसाब से हमहुँ तहार हो गइनी राजा। हमर ध्यान तहरे राखे के पड़ी"
अरुण," तू सच कह रहल बारू माई, अबसे पापा के एक एक चीज़ हमार बा। तू भी उमे से एक बारू। तहार ध्यान त राखे के पड़ी। तहार हर जरूरत पूरा करे के पड़ी,भले शरीर के काहे ना हो।"
रंजू और वो मुस्कुराए और फिर अरुण ने उसे अपने नीचे वापिस लिटा दिया। रंजू की बूर में अभी भी लण्ड घुसा ही हुआ था। अरुण रंजू को ताबड़तोड़ चोद रहा था। अरुण की कमर किसी इंजन की पिस्टन की तरह ऊपर नीचे हो रही थी। रंजू उसके नीचे अपने पैरों की कैंची बनाके लेटी हुई धक्के ले रही थी। अरुण उसे चूमे जा रहा था। बूर की चुदाई में लण्ड कोई कंजूसी नहीं कर रहा था। बूर तो खुद ही बिछी हुई थी, लुटने के लिए। सुपाड़े बार बार रंजू की बच्चेदानी को छू कर वापिस आ जा रहा था। रंजू उस एहसास से पहले से परिचित थी, फिर भी नए युवा साथी के पाने की खुशी में, वो और भी उत्साहित और उत्तेजित महसूस कर रही थी। कोई बीस से पच्चीस मिनट की धमाकेदार चुदाई के बाद, अरुण की कमर अकड़ने लगी। रंजू उसका भरपूर साथ दे रही थी।
अरुण," आह.... रंजू हमार गिरे वला ह रानी। तहार बुरवा में निकल जाई।
रंजू," उम्म्म्म..... आआऊऊ.......गिरा दे राजा, गिरा दे, दुनु के एक साथ होए वला ह। हमहुँ झड़ब, तहरा साथे।"
थोड़ी देर में बूर में लण्ड का गाढ़ा पानी निकल आया और रंजू की बच्चेदानी से टकरा गया। ठीक उसी समय रंजू भी कमर उचकाके झड़ रही थी। दोनों चरमसुख को प्राप्त कर चुके थे। अरुण रंजू के ऊपर ही लेटा था। बारिश अब पूरी तरह बंद हो चुकी थी। तभी उन दोनों को छत पर किसी के आने की आहट सुनाई दी। रंजू नंगी ही अरुण को धक्का देकर उठी, और कमरे की ओर भागी। अरुण भी कपड़ों की चिंता छोड़, रंजू के पीछे भागा। दोनों के कपड़े छत पर ही पड़े हुए थे, गीले से मैले कुचले से। अरुण ने भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। छत पर खाने के लिए पूछने लड़का आया हुआ था। अरुण ने खाना आर्डर कर दिया। वो लड़का बाहर से ही आर्डर लेकर जा रहा था, तभी उसने उनके छत पर गिरे कपड़े देख लिए और बोला," भैया आपके कपड़े छत पर गिरे हुए हैं, शायद बारिश में गिर गए हो।" उसे क्या पता था, कि दोनों ने खुद कपड़े बारिश में ही उतारे हैं। रंजू शर्म से पानी पानी हुई पड़ी थी। दोनों इस वक़्त कमरे में नंगे ही थे। रंजू तौलिये से बदन पोंछी, और फिर खुदको ढकने की कोशिश कर रही थी। अरुण ने वो तौलिया खींच लिया और अपना बदन पोछने लगा। रंजू फिर लजा उठी।
अरुण ने फिर रंजू से कहा," जाके कपड़ा उठा लावा।"
रंजू," अईसे लँगटे जाईं का बाहरी।
अरुण," त का भईल, अभी तक छत पर का करत रहलु।"
रंजू," बारिश रुक गईल बा, केहू आ जाइ तब। ना हम ना जाईब। तू ले ले आवा।"
अरुण," त रहे द, हमहुँ ना उठाईब।"
रंजू," इहे सब करवाबे हमरा से। अच्छा रुक हम ले आवतानी।"
अरुण ने दरवाज़ा खोल दिया और रंजू दौड़ते हुए नंगी ही छत के बीचो बीच भागी। उसके चूतड़ दांये बांये हिल रहे थे। कूल्हों की उछाल उसके दिल पर छुड़ियाँ चला रही थी। रंजू किसी नंगी अप्सरा सी लग रही थी। उसके बदन का हर हिस्सा उसके नंगेपन में खुलके सामने आ रहा था। उसकी कमर, जाँघे, पिंडलियाँ, तलवे, पैर, उसके लहराते बाल। इतना चुदवाने के बावजूद उसमें काफी ऊर्जा थी। फिर जब वो कपड़े उठाने को झुकी तो उसके चूतड़ दोनों फैल गए और उसके गाँड़ का भूरा छेद साफ साफ नजर आने लगा। रंजू ऐसे में अरुण को पूरा पूरा मनमोहक दृश्य दे रही थी। वो बार बार झुकके अपने और अरुण के कपड़े उठा रही थी। अरुण का मन ललचा गया। वो तौलिया छोड़ नंगा ही रंजू की ओर जाने लगा। इससे पहले की रंजू कुछ समझ पाती, वो अरुण की बांहों में थी और अरुण उसे अपने गोद में उठाके कमरे की ओर चल दिया। रंजू अरुण के गर्दन के इर्द गिर्द हाथ का घेरा बनाये हुए थी, और पैरों से उसके कमर के इर्द गिर्द कैंची बनाके टिकी हुई थी। अरुण उसकी जाँघे पकड़के, उसे उठाये था। उसका तना हुआ लण्ड उसके चूतड़ों से टकड़ा रहा था। रंजू बोली," ए मुसवा बेटा, तू कभू किधरो से आ जाला हो। कपड़ा के पसारे के पड़ी। छोड़ द"
अरुण," रात में कहां छत पर कपड़ा सुखी, रूम में कुर्सी पर रख दिहअ।"
रंजू मुस्कुरा उठी और अरुण भी, दोनों नंगे ही कमरे में प्रवेश कर गए और दरवाज़ा बंद हो गया।
जैसे ही दोनों कमरे में आये की फोन की घंटी बज उठी, वो अंजू का फोन था। रंजू उससे बात करने लगी। अंजू उन दोनों के सफर और काम के बारे में पूछने लगी। रंजू ने गीले कपड़े, कुर्सी पर डाल दिया। अरुण पानी पी रहा था। थोड़ी देर में खाना आ गया, दोनों को भूख भी लगी हुई थी। दोनों खाने के बाद फिर बिस्तर पर एक दूसरे के आलिंगन में सिमट गए। उस रात अरुण ने रंजू को दो बार और जमके चोदा। ये चुदाई रात के तीन बजे तक चली। जिसके बाद दोनों ही तृप्त होकर सो गए। शायद रंजू को अपनी प्यासी धरती का बादल मिल चुका था।

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Bahut bahut bahut hi sandar jabrdast Bhai kya chudai hui dono me moot pine ka scene ufff super bro intezar rhega agle erotic mind-blowing dhamakedar update ka
 

vyabhichari

Member
195
1,951
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रंजू का सफर -भाग ९

दोनों माँ बेटे एक दूसरे के आलिंगन में निर्वस्त्र होकर सो रहे थे। कल रात की रंगीन चुदाई के बाद रंजू अपने बेटे के कंधे पर सर और उसके जांघ के ऊपर पैर रखके निश्चिन्त होकर पड़ी थी। रात चार बार चुदने के बावजूद उस कामुक स्त्री के चेहरे और बदन में थकान की जगह संतुष्टि झलक रही थी। रंजू की बूर से अरुण के लण्ड का पानी गिरकर सूख चुका था। अरुण ने हर बार अपनी माँ की बूर में ही पानी निकाला। रंजू काम सुख की इतनी भूखी थी, कि उसे इस बात का खयाल ही नहीं रहा कि उसकी कोख अभी भी उर्वर है। बूर से बहा पानी बूर की फांकों, जांघों और बूर के नीचे गाँड़ की ओर सूख चुका था। रंजू सारी रात बूर में लण्ड लेकर मचलती रही। अरुण ने उसके बदन को सारी रात निचोड़ा था। रंजू के गालों, चूचियों, कमर, चूतड़, जांघों पर अरुण के दांतों के निशान उनके बीच हुए विभत्स व्यभिचार की गाथा सुना रहे थे। रंजू के बाल बिखरे हुए और होठ अत्यधिक चुसाई के वजह से सूज गए थे। अरुण के बदन पर भी रंजू ने अपनी काम आतुरता की छाप ऐसे ही छोड़ी थी। रंजू इस क्षण किसी नव विवाहिता स्त्री की तरह प्रतीत हो रही, जो सुहागरात के बाद पति की बांहों में, अपनी जवानी लुटाकर बिल्कुल निर्लज्ज होकर सिमटी होती है। दोनों सुबह आठ बजे तक सोते रहे। रंजू की नींद खुली तो, वो खुद की अवस्था पर शरमा गयी। अपने ही बेटे की बांहों में नग्न होना हर किसी माँ के नसीब में थोड़े ही होता है। रंजू उठ बैठी और अपने बेटे के खड़े लण्ड को देख मुस्कुरा उठी। उसने एक नज़र अरुण को देखा और फिर उसके लण्ड को झुककर चूम ली। उसके लण्ड से बूर के पानी की मदमस्त गंध आ रही थी। रंजू बीती रात की घटना याद कर खुद बेशर्म हो उठी और अरुण के लण्ड को अपनी जीभ से ही चाटकर साफ करने लगी। असल में लण्ड और बूर के मिलन से अरुण के लण्ड का स्वाद उसे अपनी ओर खींच रहा था। वो किसी छोटी बच्ची की तरह अपना लॉलीपाप चूसे जा रही थी। अरुण अपनी माँ की ऐसी हरकत से नींद से उठ गया। उसे रंजू का ये नया रूप चकित और भ्रमित दोनों कर रहा था। वो रंजू को बिना रोके टोके तकिए के सहारे बिस्तर के सर की ओर बैठ गया। अरुण एक हाथ से रंजू के बाल सहला रहा था और उसकी नंगी पीठ, चूतड़ और बूर को छेड़ रहा था। रंजू उसकी ओर देख, मुस्कुराई और अपनी कामुक आंखों से, बेटे को उकसा रही थी। रंजू की कामातुर प्रयास और प्यास आखिर बेटे के लण्ड में अपनी प्यासे यौन आचार का संदेश देने में कामयाब रही।
अरुण," आहहहहह... का चुसत बारू। तू एक नंबर के लांडखोर हउ माई। देखआ अपना के कइसन पियासल रंडी जइसन लांड के चाट रहल बारू।"
रंजू लण्ड के सुपाड़े को चूसकर छोड़ते हुए बोली," अरुण ई पियास तू ना बुझबू, ई लांड के पियास उहे बुझी जेकराके लांड नइखे मिलत। रंडी भी अईसे ना चुसेला, ओकरा त रोज़ लांड मिलेला। हमरा जइसन औरत के मजबूरी केहू ना बुझेला। एगो लांड मिलत रहले अउर उ भी खाली साल में दस दिन। रंडी के त रोज़ लांड अउर पइसा दुनु मिलेला। शरीफ औरत के यौन इच्छा खाली एक मरद के हाथ में रहेला। अगर सही मरद मिल जाता, त कउनो बात ना, ना त पियासल ही जिनगी गुजारे पड़ेला। लेकिन जब अइसन मरद जिनगी में आवेला, जेकरा लांड मजबूत रहेला जइसन तहार, त दबल कामेच्छा के संतुष्टि खातिर रंडी अउर छिनार भी बन सकेली। अइसन निम्मन लांड मिली त केहू, नारी व्यभिचार पर मजबूर हो जाई।"अरुण रंजू के गाल पर थूक से सने लण्ड को पटकते हुए बोला," तहार पियास, तहार कामेच्छा, तहार ई तड़पत जवानी, ई सबके कहानी तहार आँखिया बता रहल बा। हमके ई पता चल गईल कि तहार बूर में लांड जेतना जाई, उ पियासल ही रही। तू एगो बहुत कामुक स्त्री बारू माई। पापा तहराके उ काम सुख ना दे पईलन जेकर तू हक़दार रहलु। अब जे हो गइल से हो गइल, आगे का सोचले बारू।"
रंजू उसके आंड़ को सहलाते हुए बोली," अबसे उहे होई जउन, राते भईल। एगो अति काम पिपासु स्त्री के जवान मर्द मिल गईल बा, त उहे होई जउन होत आइल बाटे यानि संभोग, मैथुन, चुदाई। हम स्त्री बानि त चुदायिब अउर तू पुरुष बारू त तू चोदबे हमरा।" ये बोलकर उसने अरुण का सुपाड़ा अपने होठों में दबा लिया और जीभ से लण्ड के छेद को कुरेदने लगी। अरुण के मुंह से सिसकारी फूट पड़ी। अरुण उसके गाँड़ को मसलते हुए लण्ड चुसाई का पूरा आनंद ले रहा था। रंजू की बूर रिसने लगी थी। रंजू ने उसके हाथ को खिसकाके बूर पर रख दिया। वो इस समय अपने चूतड़ अरुण की ओर किये हुए थी। अरुण ने उसकी साँवली फूली बूर की फांकों को मसल के अलग कर दिया वहां तो गीलेपन से अरुण की उंगलियां भी गीली हो गयी। अपनी माँ की तरसती बूर से बरसते खाड़े पानी का एहसास उसे ना चाहते हुए भी स्वाद लेने पर मजबूर कर दिया। रंजू की रिसती बूर से जैसे ही उसने उंगली निकाली, बूर के मोटे पानी के धागे से उंगली और बूर की पत्तियों के बीच बनकर टूट गए। ये दृश्य बेहद कामुक था। अरुण ने उंगलियां मुंह में रखकर चाट ली। रंजू अपनी टांगे फैलाये घुटनों पर थी और लण्ड चूसने में मगन थी। अरुण ने रंजू के टांगों को पकड़के अपने सीने के दोनों तरफ रख लिया और रंजू की बूर में मुँह लगा दिया। अब दोनों एक दूसरे के यौन अंगों के साथ मुख मैथुन कर रहे थे। अरुण तो झांट से भरी बूर को चूसने में तल्लीन हो चुका था। रंजू भी अरुण के लण्ड की लंबाई से अपने गले की गहराई नाप रही थी। वो अरुण का लण्ड दोनों हाथों से थामे चूस रही थी। अरुण उसके बूर को फैलाके हर हिस्से को जीभ से चाट रहा था। बूर के अंदरूनी गुलाबी हिस्से को अरुण उंगलियों से छितराके चूस रहा था। अरुण अपनी मां के बूर में मूत वाले छेद को भी छोड़ नहीं रहा था। फिर बूर के दाने को उंगली से छेड़ रहा था। अरुण जब बूर चूस रहा था उसकी नज़रे बार बार रंजू के भूरे गाँड़ के छेद पर जा रही थी, उसका मन हो रहा था कि उसपर भी जीभ फिरा दे पर बूर से चूते मदन रस ने उसे ऐसा करने नहीं दिया। जब माँ के बूर का मधुरस मुंह में घुल रहा हो, तो लुभावनी से लुभावनी चीज़ छूट जाती है। अरुण उसकी बूर के दरार में जीभ फेरता तो कभी उंगली से जोर से रगड़ता, जिससे बूर खूब पानी छोड़ती और अरुण फिर उस रस को किसी गगरी से चूते जल की तरह पी रहा था। अपने बूर से होती छेड़खानी, रंजू को मदमस्त कर रही थी। वो जवान बेटे की मुख मैथुन की कला की कायल हो चुकी थी। रंजू बूर की चुसाई ज्यादा देर झेल नहीं पाई और बूर से पानी का फव्वारा अरुण के मुंह में फूट पड़ा। रंजू की कमर अकड़ी हुई थी और उसका शरीर थर्रा रहा था। उसके मुंह से कंकंपाती आँहें निकल रही थी। रंजू अरुण के मुंह पर बूर चिपकाए सीधी बैठ गयी और कमर हिला रही थी। वो अपना बूर का अमृत अरुण के पूरे चेहरे पर मल रही थी। अरुण के पूरे चेहरे पर रंजू की चिप चिपी बूर का स्पर्श हो रहा था। रंजू चरमसुख की प्राप्ति के दौरान अपने बूर को अरुण के पूरे चेहरे पर रगड़ रही थी। अरुण भी अपनी लपलपाती जीभ से रंजू के बूर के रस का एक एक बूंद चाट रहा था। थोड़ी देर बाद रंजू शांत हुई और अरुण की ओर देख बोली," कइसन लागल माई के बूर के पानी?
अरुण उसे अपने नीचे लिटा के उसके होठों को चूम लिया और बोला," तहार बूर के पानी हमार चुदाई के प्यास भड़का दिलहस। बूर के ताज़ा रस पीके, तहरा चोदे के मन सौ गुना बढ़ गईल बा माई।"
रंजू उसकी आँखों में देख बोली," तहरा रोकने के बा। घुसा द माई के बूर में लांड। ई बूर भी लांड के बिना बेचैन बा, जब तक बेटवा के लांड ना मिली, चैन ना मिली।"
अरुण अपना लण्ड उसके बूर में घुसाते हुए बोला," आह.... ले लांड साली, रंडी के बेटी, खोल बूर के हमार लांड खातिर कुतिया साली।"
रंजू अपने हाथ से बूर की फांके फैलाकर, अरुण के लण्ड का स्वागत कर रही थी। बेटे का तना हुआ नाग जब उसकी गुफा में घुसा तो रंजू कामुक सिसकारी भरते हुए अरुण को अपनी बांहों में भर ली। अरुण अपनी कमर हिलाते हुए रंजू को चोदने लगा था। रंजू की टांगे फैली हुई थी, जिनके बीच अरुण रंजू के ऊपर लेटा हुआ उसे चोद रहा था। लण्ड और बूर आपस के मिलन से गीलेपन की आज से फच फच की आवाज़ निकाल रहे थे। अरुण रंजू के होंठों को चूसते हुए, धक्के लगा रहा था। उसने प्यार से रंजू के मुंह में थूक दिया। रंजू को उसकी ये हरकत अलग और नटखट सी लगी। वो उसके थूक को निगल गयी और फिर अपना जीभ अरुण के मुंह में घुसाके चाटने लगी। अरुण उसकी जीभ को चूसने लगा। रंजू खुद को अरुण को सौंप चुकी थी। अरुण के हाथ उसके चूचियों का मर्दन भी कर रहे थे। वो रंजू की चूचियों को बेरहमी से मसल रहा था। रंजू अपने बेटे को बांहों में भर सबकुछ करने की छूट दे दी थी। अरुण उसे अपने हिसाब से और अपनी गति से चोद रहा था। पूरे कमरे में रंजू और अरुण की आँहें, और बूर के कुटाई की आवाज़ गूंज रही थी। रंजू की प्यासी बूर जो थोड़ी देर पहले झड़ चुकी थी, फिरसे कांपने लगी थी। अरुण बिना रुके उसकी भीषण चुदाई जो कर रहा था। आखिरकार कोई सात आठ मिनट बाद, अरुण उसकी बूर में ही लण्ड का पानी निकाल दिया, रंजू भी उसके साथ झड़ गयी। दोनों एक दूसरे की बांहों में लेटे हुए थे। रंजू ने देखा अरुण हांफ रहा था, उसने उसके सर को सहलाते हुए माथे को चूम लिया। कल रात से अरुण अब तक उसे पांच बार चोद चुका था। इतनी बार रंजू एक साथ कभी नहीं चुदी थी। रंजू फिर भी उसे मना नहीं की। कोई और स्त्री होती तो शायद वो चूर हो जाती। पर रंजू की क्षमता देख अरुण भी हैरान था। रंजू और अरुण दोनों पसीने से लतपथ थे। दोनों एक दूसरे की चढ़ती उतरती सांसें देख मुस्कुरा रहे थे। रंजू अरुण के नीचे लेटी, बोली," उफ़्फ़फ़फ़ अरुण आहहह बहुत मज़ा आईल आज त। एतना कभू ना चोदौनी ह। तहरा में बड़ा दम बा, असही रहिया राजा।"
अरुण," आह निचोड़ लेलु तू, हमरा के। तहार बूर में लांड के पानी राते से पांच बेर निकलनी ह।
रंजू," कउनु बात नइखे, हम तहार शरीर के थकान के पूरा इंतज़ाम कर देब। अभी त शुरुवात बा, अइसन अइसन केतना रात तहके अब गुजारे के बा।
अरुण," पहिले त तू नखरा करत रहलु की, माई बेटा के रिश्ता बा, पाप होई। अब का भईल रंजू रानी??
रंजू," अब हम ई बूझ गईल बानि, कि तहरा जइसन मरद हमके ना मिली,जउन हमार पियास मिटाई। ई रिश्ता नाता के कउनु मायने नइखे, बल्कि माई बेटा के रिश्ता में चुदाई के आनंद अउर बढ़ जाला। तू भले हमार कोख से पैदा भईल बारू, पर जन्म हमार खातिर ही लेलु। तहरा संगे, हमरा कउनो तरह के डर नइखन। घर के इज्जत, तहरा हाथ में बा, जे होई बंद दरवाज़ा में होई।"
अरुण," विश्वास नइखे होत, कि ई बतिया तू बोलत बारू। अइसन बुझाता कि कउनो दोसर रंजू हमार बांहिया में बा। रंजू," ना बेटवा, हम तहार उहे माई रहब, लेकिन उ सबके सामने, लेकिन अकेले में तू हमार मरद बनके रहिया। देखलस ना कइसे रानी आपन बाप रमेसर से चुदाबेलि। वइसे ही हम तहरा से चुदायिब।"
अरुण," लेकिन हम तहरा अइसन ना देख सकिले ??
रंजू," कइसन ?
अरुण," तू ना कउनु श्रृंगार करत बिया, ना कउनु आभूषण पेन्हली। तहार ई सूना मांग, सूना गला, सूना कान, एकदम बढ़िया नइखे लागत। तनि लिपस्टिक, मेक अप करबू तब अच्छा लगबू। कुछ नया कपड़ा, गहना अउर मेक अप के समान तहरा खातिर लेबे के पड़ी।"
रंजू," अरुण हम अब विधवा बानि, सबके सामने त हमके असही रहे के पड़ी। लेकिन तू कहबू त तहार खातिर, हम अकेले में सब करब। तहार हर इच्छा पूरा करब राजा।"
अरुण," इँहा त तहरा कोई जानत नइखे, आज आफिस के काम कइके, हम तहरा ले चलब समान ख़रीदवावे खातिर। रंजू आफिस की बात सुनके घड़ी की ओर देखती है," अरे बाप रे नौ बज गईल, चला जल्दी तैयार हो। आफिस के काम आज हो जाई, ओकर बाद देखल जायी। अभी त तैयार होखे।" थोड़ी देर बाद दोनों नहा धोके तैयार हो गए। और पेंशन ऑफिस के लिए निकल पड़े। रंजू उसके साथ ऐसे चिपकी हुई थी, जैसे वो उसकी बीवी थी। अरुण उसकी कमर में हाथ डालके, अपनी ओर खींच लिया। रंजू खुद ही अपने अंगों को अरुण के बदन पर रगड़ रही थी। रास्ते में राजू कभी उसकी गाँड़ दबोच लेता तो, कभी उसकी चिकोटी काट लेता, यो कभी उसकी पप्पी ले लेता। रंजू उसकी हरकतों से तंग हो रही थी, पर उसे अच्छा भी लग रहा था। रंजू झूठा गुस्सा दिखा रही थी। कुछ देर बाद दोनों पेंशन आफिस पहुंचे, और कुछ देर के बाद उनका काम हो गया। दुबेजी वही कर्मचारी जो छुट्टी पर थे, आज आके सारा काम कर गए। उन्होंने रंजू का सारा काम खत्म कर आखरी कागजों पर उसके दस्तखत ले रहे थे। दस्तखत करने बाद वो बोला, "ये लीजिए रंजू जी, आपके कागज पूरे हो गए। आप बस नीचे सब जगह दस्तखत कर दीजिए। अगले महीने से आपकी पेंशन शुरू हो जाएगी।" सामने से कर्मचारी बोला। रंजू ने मुस्कुराते हुए उससे पेन ले लिया और दस्तखत करने लगी। रंजू धीरे धीरे दस्तखत करने लगी। अरुण उसके साथ बगल वाली कुर्सी पर बैठा था और पन्ने पलट कर उसकी मदद कर रहा था। थोड़ी देर में दस्तखत पूरे हो गए, तो उस आदमी ने सारे कागज़ रख लिया और उसकी एक प्रति रंजू की ओर बढ़ा दी। रंजू ने वो कागज़ लेकर अरुण की ओर बढ़ा दिए। अरुण ने वो कागज़ देखे और फिर अपने बैग में रख लिया।
वो कर्मचारी बोलता है," आपको हर साल नवम्बर में जीवन प्रमाण पत्र और पुनर्विवाह प्रमाण पत्र जमा करना होगा। आप अब किसी और से विवाह नहीं कर सकती। एक शहीद की विधवा बनके आपको जीना होगा। आप जैसी औरतों की देश को जरूरत है, जो देश पर हंसते हंसते अपना पति न्योछावर कर दिया और अब जीवन का सुख त्यागके विधवा बनकर रहेंगी। आपको सत सत नमन है मेरा। ये पेंशन तो एक छोटा सा प्रयास है, आपके जीवन यापन के लिए।" रंजू और अरुण ने उसकी बातें सुन एक दूसरे की ओर देखा, और आंखों ही आंखों में मुस्कुराए, दोनों वहां से फिर निकल गए। बाहर आकर अरुण ने रंजू को पास के एक होटल में खाना खिलाया और फिर बोला," माई, खाना त खा लेलु, चल अब तहरा के कुछ खरीदारी कराई।"
रंजू बोली," का खरीदारी ??
अरुण," तहार देहिया अईसे सूना सूना नइखे बढ़िया लागत, तहराके कुछ सोना के आइटम दिया दी।"
रंजू बोली," ठीक बा, दिया द, पर पइसा कहाँ से आई। तहरा मालूम नइखे, सोना चांदी केतना महग बा। कहां से लाईबा पइसा।"
अरुण हँसते हुए," अरे तू ओकर चिंता छोड़ दे। ई देख आजे मोबाइल में बैंक से मैसेज आईल बाटे, कि राज्य सरकार से जउन पापा के इनाम मिले वाला रहल, उ आ गईल बा पूरा पच्चीस लाख अउर केंद्र सरकार से भी एतना ही आयी, हो सकेला अगला हफ्ता में।"
रंजू खुश होते हुए बोली," अच्छा, बड़ा जल्दी आ गईल। लेकिन बेफिजूल के खर्चा काहे करबू। कहीं औरो पइसा लगाबअ। मकान के मरम्मत करवावे के बा, कुछ जमीन ले ले जाई।"
अरुण उसका हाथ पकड़ के, बोला," उ सब करके भी बहुत पइसा बची अउर अभी त अउर पइसा आयी। मकान भी बन जाई। कुछ जमीन भी ले लेब। जर बड़ले बा, जमीन आइबे करि, बस जोरू के कमी बा।"
रंजू उसकी ओर देख बोली," कमी ना होई, तहार बियाह जल्दी से करा देब। फेर जोरू के साथे, लागल रहिया।"
अरुण," हमके बियाह नइखे करेके। हम त तहरे के जोरू बनाके रखब, एहीसे तहार सूना बदन ना देखल जाला। अपन जोरू के कुछ स्पेशल देबे के बा। चल हमरा साथे।" और उसका हाथ पकड़के बाहर ले आया।
वहां से पास ही तनिष्क का शोरूम था। वहां वो रंजू को ले गया। अरुण ने सेल्स गर्ल से बोला कि वो सोने के कमरबंद दिखाए। सेल्स गर्ल ने रंजू की ओर इशारा करके पूछा," इनके लिए दिखाऊँ क्या सर? अरुण ने हां में सिर हिलाया। वो उन दोनों को लिफ्ट से दूसरे फ्लोर पर ले गयी, जहां कमरबंद रखे हुए थे।
सेल्स गर्ल," सर रेंज कितने तक दिखाऊँ, हमारे पास डेढ़ लाख से लेकर पचास लाख तक है, कोई हिचकिचाहट मत रखिये, खुलके बोल दीजिए। हमारे पास सभी रेंज में बढ़िया आइटम है।
अरुण," जी पांच तक में दिखाइए।" रंजू सुनके ऊपर से बोली," काहे एतना खर्चा कर रहल बा।" मगर दिल से बहुत खुश थी। किसी भी आम औरत की तरह सोना के आभूषण देख खुश थी। अरुण," अरे जान, ई समान कउन बेर बेर लिहल जाला, एक बेर लेले दिल से तहराके, देतानि। फिर रंजू हंस दी। तभी सेल्स गर्ल बोली," ले लीजिए मैडम, पति की जेब कभी कभी खुलती है। मैंने पत्नियों को जिद करते हुए देखा है, यहां तो उल्टा है।" वो मुस्कुराते हुए बोली। रंजू उसकी बात सुन शर्मा गयी, आखिर उस लड़की ने उसे उसके ही बेटे की बीवी कहके बुलाया था। अरुण ने रंजू के कंधे पर हाथ रखके बोला," शरमात काहे बारू, उ कउनो गलत बात थोड़े कहलस रंजुजी।"
रंजू का चेहरा शर्म से लाल था। रंजू फिर उसके साथ बैठके, कमरबंद देखने लगी। सारे बहुत बढ़िया बढ़िया डिज़ाइन थे। अरुण बार बार रंजू को पूछ और बता रहा था। सेल्स गर्ल भी पूरी मेहनत से लगी हुई थी। रंजू ने आखिर चार पांच सेलेक्ट करके साइड रख दिये। फिर सेल्स गर्ल उसे आईने के सामने ले गयी और उसे एक कमरबंद पहना दिया। रंजू की कमर चौड़ी थी, तो वो टाइट हो रही थी। उसने रंजू से पल्लू गिराने को बोला, ताकि कमरबंद अच्छे से दिख सके। उसने उसके पहले ही अपना पल्लू गिरा दिया। उसके कमर पर कमरबंद बहुत सेक्सी लग रही थी। सेल्स गर्ल बोली," मैडम देखिए बहुत ही खूबसूरत लग रहा है आप पर। साड़ी पर और खिलेगा। किसी फंक्शन में भी घूम जमेगा आप पर।" रंजू ने एक एक कर सारे पहन कर देखे, और अंत में अरुण की सहमति से, उसने एक साढ़े चार लाख का कमरबंद पसंद किया। अरुण ने फिर सेल्स गर्ल से कुछ बात की। सेल्स गर्ल बोली," सर हो जाएगा, पर उसका अलग से लगेगा वजन के हिसाब से।" अरुण ने सहमति दे दी। सेल्स गर्ल फिर अरुण को लटकन वाले झुमके दिखाने लगी। अरुण ने उसमें से एक पसंद किया, रंजू को भी वो पसंद था। अरुण ने रंजू के चेहरे पर पढ़ लिया था, कि उसे इस खरीद दारी में बड़ा मजा आ रहा है। कोई एक घंटे बाद उनका बिलिंग हुआ। अरुण ने फिर वहां चेक काट कर बिल ले लिया। उनका बिल कोई साढ़े पांच लाख के आसपास बना। रंजू बोली," ढ़ेर खर्चा हो गइल अरुण।"
अरुण उसका हाथ पकड़के बोला," सोना कभू खर्चा ना होवेला। ई त बूझा एक तरह से नगद बा। जब चाहबू भजा लेल जायी। तू चिंता मत कर। चल अब तनि कपड़ा दुकान में, बढ़िया साड़ी लेले।" फिर दोनों चल दिये एक बड़े दुकान की ओर और वहां अरुण ने रंजू के लिए सुंदर सुंदर दो तीन साड़ियाँ खरीद ली। रंजू के लिए एक फिरोज़ी, एक लाल और एक काली साड़ी उसने पैक करवाई। फिर अरुण ने वहां मौजूद सेल्स गर्ल से, डिज़ाइनर ब्रा पैंटी, रंजू के लिए मंगवाई। अरुण उसे लजाते हुए देख बोला," लजात काहे बारू माई, ले लआ ब्रा पैंटी त तहरा के चाही ना।" रंजू उसकी ओर देख बोली," ई हम कभू तहरा पापा के साथ भी ना किनली, अउर तू हमके खरीदवा रहल बारे। एहीसे लजात बानि।"
अरुण," कउनो बात ना, तू धीरे धीरे बुझबू कि मरद से तू जेतना खुलबु उतना बढ़िया रही। चल अभी त तू पसंद कर।" उसे क्या पता था, कि रंजू तो मजी हुई खिलाड़ी है।
रंजू शर्माते हुये बोली," तू देख ल, जउन लेबा हम पिन्हब।"
अरुण ने फिर रंजू की साइज के लाल और मैरून रंग के दो सेट ब्रा पैंटी ले ली। दोनों शॉपिंग करके वापिस होटल आ गए। वापिस आकर, अरुण ने रंजू से कहा," एगो काम रह गईल। उ काम कइके आवत हईं।" इससे पहले रंजू उससे पूछ पाती, वो जा चुका था।अरुण वापिस होटल पहुंचा तो रंजू से बोला," शाम सात बजे ट्रैन बा, अभी चार घंटा टाइम बा।"
रंजू बोली," आराम करबू त कर ले।"
अरुण," हट, आराम ना, तू तैयार बारू, चल तहरा के एक जगह लेके जायके बा।"
रंजू आश्चर्य से पूछते बोली,"कहां??
अरुण," चल ना, सवाल ना कर।" रंजू अरुण को लेकर वापिस लॉज के बाहर आ गया। उसने लॉज खाली कर दिया। थोड़ी देर बाद वो रंजू को एक ब्यूटी पार्लर में लेकर घुसा और रंजू की ओर देख बोला," वइसे त तहरा के कउनो मेक अप के जरूरत नइखे, पर हम चाहत बानि की तू थोड़ा बन संवर के रहा।"
रंजू उसे देख मुस्कुराई," काहे, हम तहरा के अइसन, पसंद नइखे का?
अरुण उसका हाथ थामकर बोला," तहरा जइसन कोई नइखे अउर ना केहू हो सकेली। लेकिन हम चाहत बानि की तू आज ई भूल जो कि तू विधवा बारू। एक विवाहित स्त्री जइसन तहार रूप श्रृंगार होवे के चाही।"
रंजू बोली," जइसन तहार इच्छा। तू जे कहबा हम करब।" ऐसा बोलके उसने बेटे के गाल को सहलाया। फिर रंजू को एक लड़की अंदर ले गयी। अरुण वहीं बाहर बैठ गया। अंदर रंजू का फेसिअल, मैनीक्योर, पेडीक्योर, इत्यादि सब होने लगा। कोई दो घंटे बाद रंजू वहां से पूरी तरह तैयार होके निकली। वो बला की खूबसूरत लग रही थी। रंजू के चेहरे में अलग ही चमक थी। वो किसी फिल्म की हीरोइन को फेल कर देती। इस वक़्त रंजू को देखकर कोई उसे 30 से ज्यादा की बोल नहीं सकता था। उसके बाल लहरा रहे थे, बालों की कटिंग उसे और सेक्सी बना रही थी। अरुण का बस चलता तो, रंजू को वहीं चूम लेता। सच ये देसी औरतें खुद को सजने सवरने का समय देती नहीं, अगर ये सजने सवरने लगे तो पति और आशिक़ इन्हें हमेशा बिस्तर में ही घुसाए रखे।
रंजू अरुण के पास आकर, उसके खुले मुंह की ओर इशारा कर बोली," मुंह बंद कर।" रंजू ये बोलकर हसने लगी। तभी अरुण ने रंजू की कमर पर चिकोटी काट ली। रंजू के मुंह से बड़ा तेज उफ़्फ़फ़फ़ निकला और वो बोली," काहै कटलस।"
अरुण," ई देखे खातिर, की तू असली में बारू। अइसन खूबसूरती खाली कितबिया में होखेला। पर तहरा के देखके ई पता चल गईल कि एतना खूबसूरत औरत सच में भी हो सकेली।"
रंजू बोली," अब चला स्टेशन ना त लेट हो जाई। बाकी के तारीफ उंहे करिहा।
रंजू और अरुण रेलवे स्टेशन आ गए। थोड़ी देर में ट्रेन आयी और अरुण रंजू को लेकर ट्रैन में बैठ गया। रंजू ने इससे पहले कभी ऐसी व्यवस्था नहीं देखी थी। एक पूरा कमरा जैसा बना हुआ था, उसके अंदर दो बड़े बर्थ थे, सिर्फ दो लोगों के लिए। अरुण ने समान बर्थ के नीचे डाला और रंजू को बैठने के लिए बोला। रंजू वहां बैठी, और वो समझ गयी थी, अरुण ने ऐसी बुकिंग क्यों कराई है। उसके मन में लड्डू फूटने लगे और बूर से रिसती पानी में वेग आ गया। रंजू अपनी साड़ी का पल्लू किनारे से पकड़े हुए, मुंह में उंगली के नाखून चबा रही थी। गाड़ी थोड़ी देर बाद स्टेशन से खुल गयी, और खुलते ही टी टी ई आ गया और उनका टिकट चेक करने लगा। चेक करने के बाद वो मुस्कुरा कर चला गया। शाम के पौने आठ हो चुके थे। अरुण रंजू के पास आया और उसके कमर में हाथ डालके उसे अपनी ओर खींचा। रंजू उसकी ओर देखी तो उसका बेटा उसके होठ चूमने के लिए अपने होठ बढ़ा रहा था। रंजू ने उसके होठों पर अपनी उंगली रख दी और बोली," एहि खातिर तू ई वाला सीट बुक कइलस बारे,।
अरुण उसके उंगलियों को मुंह में रख चूस कर बोला," हॉं माई, अइसन मौका ट्रैन में जाने कब मिली। हमनीके केहू डिस्टर्ब ना करि।" अरुण एक सांस खींचकर फिर बोला," आज हम तहराके जीभर के पहले देखब।"
रंजू उसके गाल सहलाते हुए उसकी आँखों मे देखते हुए बोली," पहिले ना देखलस का राजा हमके।"
अरुण," देखनि ह, पर खाली माई के नज़र से पर आज से तू हमार प्रेमिका भी बारू। अबसे तहके एक स्त्री के भी नजर से देखे के बा।" वो रंजू के बदन को सूंघते हुए बोला।
रंजू उसके साँस को अपनी चुच्ची पर महसूस कर मचल उठी। रंजू खुद कामुक होकर बोली," अरुण हम तहरा से कुछ कहब तू बुरा त ना मानबु बेटा?
अरुण," ना माई, बोल ना। तहार कउनु बात के बुरा ना लागी।" उसने रंजू को अपने गोद में बैठने को कहा, तो रंजू बेहिचक उसकी गोद में बैठ गयी और बोली," पहले हमार कसम खा, फिर बोलब।" रंजू उसका हाथ अपने सर पर रखके बोली। अरुण उसकी आँखों में देख बोला," तहरा के भरोसा नइखे का, त ले तहार कसम खा तानि।"
रंजू फिर बोली," तू हमरा से पहिले अउर केहू के चोदले बारू का।"
अरुण उसकी आँखों में देखा तो रंजू की आंखों में उसे एक किशोरी की भांति उत्सुकता दिखी जिसके उत्तर देते हुए बोला," तहरा से झूठ ना बोलब हां चोदले बानि।"
रंजू उसकी ओर देख बोली," तू नीतू के चोदले बारू।"
अरुण समझ गया कि उस दिन किसी और ने नहीं बल्कि उसकी मां ने ही उसे नीतू के साथ सेक्स करते हुए देखा था। अरुण बोला," हां, नीतू के चोदले बानि, तहरा बुरा लागल का माई।"
रंजू," ना उ बात नइखे, तू दुनु जुवान हो गइल बारू। दुनु के अंदर विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण हो रहल बा। सच बताई त हम तहके उहे दिन से देखके चाहत बानि। तहार औजार देखके, हम त पगला गईल रहनि।"
अरुण को अपनी कानों पर यकीन नही हुआ," तू हमार लांड देखके हमार दीवानी हो गइल रहलु, एहीसे तू कुछ बोललु ना जब हम नीतू के चोदत रहनि। तू हमरा पास बाद में काहे ना आइलु।"
रंजू," मन त बहुत रहल, पर हिम्मत ना भईल। कइसे बेटा के केहू माई कही कि उ ओकर लांड के दीवानी ह।" रंजू उसके लण्ड को सहलाते हुए बोली," नीतू के साथे तहके बढ़िया लागल कि हमरा साथ।" रंजू बेशर्मी से पूछ बैठी।
अरुण उसकी आँखों में देख बोला," माई के बूर से बेहतरीन बूर ना भेट सकेला चोदे खातिर। तहके चोदके हम धन्य हो गइनी। नीतू जइसन लइकी त आत जात रही।"
रंजू ,"अगर हमरा जगह अंजू तू दुनु के देख लिहित त, आ कहीं नीतू अंजू के बता दी तब का होई।"
अरुण," हमरा नसीब में तू रहलु, एहीसे भगवान अंजू मौसी के जगह तहरा भेजले रहनि। अउर रहल बात नीतू के त उ आपन माई के का बताई, की चुदबा के आईल बानि। तू त खुद देखले बारू जे भईल दुनु के मर्जी से।"
रंजू," हमार पैदा कईल चीज़ पर पहिल हक़ हमार ह। तहरा पर पहिल हक़ हमार ह।"
अरुण," आह माई, तहार मुंह से शब्द ना शहद चु रहल बा। हमके लागत बा, तू अउर चीज कहे चाहत बारू। आज खुलके बोल हमरा से।
रंजू," सच कहत बारू बेटा, हम बहुत चीज़ मन में रखले बानि। लेकिन लाज से नइखे बोलत रहनि।"
अरुण," तहराके जे बोले के बा बोल। इँहा केहू अऊर नइखे, तू बोल हम सुनब। तहार मन में जे भी बात बा। अब लजा मत।"
रंजू उसकी ओर देख बोली," हम त तहरा बहुत पहिने से चाहत रहनि। जब तू सोलह साल के रहला। तहार बाप के अभाव में हम त तहके देखके अपन बूर रतिया में सहलात रहनि। केतना बार सोचनी, कि हम बहुत गलत करत बानि, पर हमके बहुत मज़ा आत रहला। तहरा बारे में सोचके, बूर में उंगली खूब कइनी। केतना बार तहके गंदा अंडरवियर के सूँघके बुर के मसलनि ह। हाय.... तहार बाप हमके पियासल ही छोड़ के चल जात रहला। हम दिन रात लांड के बारे में सोचत रहनि। पता नइखे, हम शुरू से ही बड़ा कामुक स्त्री बानि। हमेशा बूर से पानी चुवेला, लांड खातिर। जानत बारू दिन रात हम लांड के बारे में ही सोचत बानि। जब तहार पापा मर गइलन, त हम सोचत रहनि कि अब सारा उम्र बूर के हाथ से ही काम चलाबे के पड़ी। तहार पापा के लांड बस मिलत रहला उहू साल में दस से पंद्रह दिन। हम त बहुत कानत रहनि, अकेले में कि भगवान हमके अइसन कामुक बनाके, किस्मत में लांड के सुख बहुत कम लिखले बारन। अउर ई उम्र के साथ घट ना बढ़ रहल बा। हमार चुदाई के पियास, जाने कब खत्म होई। अइसन में तहरा जब नीतू के साथ चोदत देखनि त लागल कि तहरा से बढ़िया के होई। तहरा के सामने केतना बार हम हिम्मत कइके गाँड़ अउर चुच्ची दिखात रहनि, लेकिन तू ध्यान ना दिहलस। उसे आगे बढ़े के हिम्मत ना रहल। अगर तू हिम्मत कइले रहते, त हम तहरा से बहुत पहिने चुदवा लेने रहती। बाद में रानी अउर रमेसर के रासलीला देखके हमके खूब बढ़िया लागल अउर तहरा साथ अवैध संबंध बनाबे खातिर वजह मिल गईल। माई बेटा के बीच अइसन शारीरिक संबंध के कल्पना मात्र से बूर में पानी झरना जइसन बहेला। जब बेटा ही माई के पेलत बा, त रिश्ता बीच में आग में घी के काम करेला।असीम सुख मिलेला, समाज के बनल नियम तोड़े में। त का भईल तू हमार कोख से निकलल बारे, तू हमके चोदके अगर सुख दे सकेले, त दुनिया समाज के गाँड़ में काहे आग लागत बा। जब हमरा दिक्कत नइखे तहरा से चुदाबे में, त केहू अउर के काहे बुरा लागेला। लेकिन अफसोस ई समाज हमार तहार संबंध के स्वीकारी ना। एहीसे हमरा तहराके बंद कमरा अउर दुनिया से छुपाके एक दोसर के कामेच्छा पूरा करेके पड़ी। हमार जीवन हम अब तहार नाम क दयिनी ह अरुण। आज के रात हमके अईसे प्यार करा, कि हमार आत्मा पर भी तहार नाम हो जाए। तू जे चाहे हमरा साथ कर सकेला, जइसे चाहे प्यार कर, चोद हमरा। बस आजके रात यादगार बना दे।" ऐसा बोलके रंजू अरुण को चूमने लगी। अरुण रंजू को अपनी बांहों में भरके उसके मुंह में जीभ से जीभ लड़ा रहा था। दोनों एक दूसरे के प्यासे मुंह को अपनी लार का पानी पिला रहे थे। अरुण की माँ ने तो अपना दिल ही उसके सामने खोलके रख दिया था। अरुण उसकी बातें सुन काफी उत्तेजीत हो चुका था। वो रंजू के होठों का रस पी रहा था और रंजू भी निडर और निर्लज होकर, अरुण को अधरों का रस पिला रही थी। अरुण रंजू के मुलायम केश को मुट्ठी में भींच कर उसके गालों और गर्दन सब हिस्से को चाट रहा था। और फिर वापिस उसके लाल होठों को चूमने लगता था। रंजू माँ बेटे के रिश्ते की सारी मर्यादा पहले ही लांघ चुकी थी, आज वो इस पवित्र रिश्ते में अपनी प्यास से आग लगा रही थी। चलती ए सी में भी दोनों इतने गर्म हो चुके थे कि पसीना आने लगा था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। रंजू अरुण से अलग होकर बैठ गयी। वेंडर खाना लेकर आया था। उन्होंने देखा गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी। रंजू ने कहा," अरुण पानी के बोतल ले लआ। रात खातिर। अरुण पानी लेने के लिए प्लेटफार्म पर उतर गया। अरुण ने कुछ सोचके पानी की तीन बोतल ले ली। जब पानी लेकर वापिस आया तो रंजू ने दरवाज़ा बंद कर रखा था। अरुण दरवाज़ा खटखटा के बोला," का भईल माई, दरवाज़ा खोल ना।" अंदर से रंजू की आवाज़ आयी," दस मिनट बाहर रुका, खोलत हईं।" वो बाहर खड़ा इंतज़ार कर रहा था। गाड़ी फिरसे चलने लगी, लेकिन दरवाज़ा अभी भी बंद था। उसे रंजू के पास जाने की जल्दी थी। कोई पंद्रह मिनट बाद रंजू ने दरवाज़ा खोला। अरुण उत्सुकतावश तेज कदमों से अंदर गया। अंदर लाइट बंद थी। अरुण ने पानी की बोतल रखी, उसे अंधेरे में कुछ ठीक से नज़र नहीं आ रहा था। अरुण ने लाइट जलाई तो रंजू को देख दंग रह गया।
रंजू ने उसकी खरीदी लाल साड़ी पहनी हुई थी। ब्लाउज बनी नहीं थी तो सिर्फ नई खरीदी लाल ब्रा में थी। अरुण ने जो झुमके खरीदे थे, उसने वो पहनी हुई थी, उसके हाथों और पैरों में लाल नेल पॉलिश लगी हुई थी। उसने हाथों में लाल चूड़ियां और होठों पर लाल लिपस्टिक लगाई हुई थी। रंजू उसकी ओर देख बोली," तू कहत रहला ना, हम सूना सूना तहके बढ़िया नइखे लागेली। देख कान में झुमका, हाथ में चूड़ी, ई श्रृंगार।"
अरुण ने उसकी लिपस्टिक उठायी और उससे रंजू की मांग में लगा दिया। रंजू ने उसे रोका नहीं। अरुण ने फिर उससे उसके भवों के बीच गोल टिका भी बना दिया। रंजू उसके सामने भावहीन सी खड़ी थी। अरुण बोला," अब तहार श्रृंगार पूरा भईल।" रंजू ने बोला," अभी त असली चीज़ बाकी ह बेटा, ई कमरबंद हमके पिन्हा द।" और रंजू ने अपनी कमर पर कमरबंद लपेटके, अरुण को उसका हुक लगाने को बोली। अरुण ने उसको एडजस्ट किया और हुक लगा दी। रंजू अब पूरी तरह तैयार थी। अरुण सीट पर बैठके, रंजू की पल्लू हटाके, उसकी कमर और ढोढ़ी ( नाभि) को चूम लिया। रंजू होंठो के छुवन से गुदगुदी महसूस कर रही थी और कामुकता से हँस रही थी। अरुण रंजू के चर्बीदार पेट के हर हिस्से को चूम रहा था। रंजू उसके सामने खड़ी उसके सर को पकड़, सहला रही थी। रंजू एक विवाहित स्त्री की तरह प्रतीत हो रही थी। अरुण रंजू की नाभी को अपनी जीभ से कुरेद कुरेद कर चाट रहा था। उसने तो रंजू की नाभि को चाटते हुए, उसमें चिकोटी काट ली। रंजू उस दर्द से कामुकता से सिहर उठी। उसकी ढोढ़ी के आसपास की त्वचा को अपने हथेली की उंगलियों से मसलकर ढोढ़ी को उठाके उसके अंदर थूक दिया। फिर उसे पूरा फैला दिया अपनी जीभ से। रंजू की नाभि और उसके आसपास की गोरी त्वचा थूक से भीगके गीली हो चुकी थी। रंजू उस छेड़छाड़ से जब हिल रही थी, तो उसका पल्लू धीरे धीरे सरक रहा था। और फिर आखिर में आनंद से झूमती रंजू के बदन से पल्लू पूरी तरह गिर गया। अब तक वो रंजू की ढोढ़ी को मन भर चूस चुका था।
अरुण ने अपनी मां के चूचियों को देखते हुए कहा," माई, आज रात हम तहार बदन के एक एक हिस्सा के देखब, महसूस करब अउर तहरा आँखिया से चोदब। ए रानी आज तू खुलके देखा दअ हमके ई गोर देहिया के अंग अंग।"
रंजू अपने बाल को दोनों हाथों से समेटते हुए पीछे ले गयी और बोली," देखा ना बेटा, तहार नज़र केतना गंदा बा, कि माई के आँचरा अपने गिर गईल। हमके त लागत बा, कि अगर तू तनि अउर गंदा अउर घटिया नज़र से हमके देख लेबे त, हम असही नंगी हो जाइब। तहार आँखिया में हम खुदके नंगा महसूस क रहल बानि। आँखिया से तू त चुदाई शुरू क देले बारू। लेकिन तू चिंता मत कर बेटा, आज हम तहके उ रूप देखाएब, जउन रूप में हमके भगवान भेजने रहला। जउन रूप में तहार नानी हमके पहिल बेर गोद में उठौनी। देखे चाहबू आपन माई, के अईसे बेटा??
अरुण अपनी तेज साँसों को संभालते हुये बोला," जब तू पैदा होखल होई, तब त तू बच्ची रहल होखब। अब तू एगो परिपक्व नारी और खुद माई बारू। अइसन में तहार हर अंग अब खुलके उभरी माई। तहार हुस्न अउर जोवन निखर के खिली, अइसन नज़ारा त हमके हर दिन देखे के बा।"
अरुण फिर रंजू की कमर में कसी हुई साड़ी को खींचने लगा। रंजू अपनी खिंचती साड़ी की वजह से गोल गोल घूम रही थी। रंजू को इस समय अपनी स्थिति पर लाज बिल्कुल नहीं आ रही थी, बल्कि वो कामुक आँहें भरके नटखट मुस्कान भर रही थी। अरुण भी उसे देख उत्तेजना से लार टपका रहा था। क्या दृश्य था एक बेटा अपनी सगी माँ का चलती ट्रेन में चीर हरण कर रहा था। रंजू अपने उतरते आवरण की भांति लज्जा भी उतार रही थी। वो कामुक होकर अपने दांतों से निचले होठ काट रही थी। वो अपने दोनों हाथ ऊपर किये खुले बालों को समेटे हुए थी। उसके दोनों काँखों के बाल, स्पष्ट झलक रहे थे। थोड़ी ही देर में रंजू की साड़ी पूरी तरह से उसके देह से खुल गयी और अरुण ने उसको वहीं फर्श पर गिरा दिया। अरुण ने साड़ी गिराने के अंदाज़ से ये जताना चाहा कि रंजू तेरे बदन को अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। ट्रैन अपनी गति से चल रही थी और उसके साथ ही हिल भी रहे थे।रंजू की साड़ी खुलके उसके पैरों में गिर चुकी थी और अरुण रंजू के चौड़े गाँड़ को सहला रहा था। रंजू अरुण के सामने अपनी पीठ करके खड़ी थी। अरुण खुद बैठा हुआ था। अरुण अपनी माँ के मोटे मोटे और भारी चूतड़ों को मसल रहा था। रंजू की पैंटी की इलास्टिक को अरुण मुँह से पकड़ लिया और उसकी गाँड़ से उसे उतारने लगा। रंजू की भारी भरकम गाँड़ से उस कसी हुई कच्छी को उतारना एक चैलेंज था। पर अरुण जब उसकी पैंटी उतार रहा था, तो उसे अपनी माँ की गाँड़ की दरार से पसीने की गंध उसके नथुनों में घुसके उसे उत्तेजित कर रही थी। अरुण ने उसकी पैंटी को खींच खींच कर रंजू की गाँड़, को लगभग नंगी कर चुका था। अरुण उसके चूतड़ों को चूम रहा था, और जीभ से उसकी गाँड़ के दरार के बीच छेड़खानी कर रहा था। रंजू को आनंद और गुदगुदी का कामुक अनुभव हो रहा था। अरुण अपनी माँ की गाँड़ की मादक गंध सूंघने और उसके चिकने चूतड़ों का स्वाद में व्यस्त था। तभी रंजू ने अरुण के सर को पकड़ लिया और अपनी गाँड़ की दरार की ओर दबा दिया, फिर अपने गाँड़ को ऊपर नीचे कर उसके चेहरे पर रगड़ने लगी। रंजू की गाँड़ में अरुण का चेहरा जैसे गायब हो चुका था। अरुण तो अपनी माँ की गाँड़ में पूरा चेहरा घुसाके मस्त हो रहा था। अरुण उसके चूतड़ों को मसल रहा था। रंजू को इसमें बहुत मज़ा आ रहा था, उसके पति ने कभी उसकी गाँड़ का स्वाद नहीं चखा था। रंजू की पैंटी उसके घुटनों में फंसी हुई थी। अरुण गाँड़ के दरार के अंदरूनी सांवले हिस्से को चाट रहा था। अरुण की सांसें उन चूतड़ों की बीच उखड़ने लगी। वो स्वतः ही अलग हो गया। लेकिन अगले ही क्षण उस सेक्सी गाँड़ से खुद को दूर ना रख पाया। रंजू की गाँड़ पर उसने चटाक चटाक एक दो थप्पड़ लगाए। वो थप्पड़ खाके रंजू के मुंह से कामुकता भरी आह निकल रही थी। वो फिर से रंजू की गाँड़ की दरार के अंदरूनी त्वचा को अपनी थूक से नहला रहा था और अपनी जीभ से हर एक इंच को चूम और चाट रहा था। रंजू इस गुदगुदी भरे एहसास के साथ और अधिक कामुक हो रही थी।
रंजू," आहहहहहह..... केतना बढ़िया लाग रहल बा, उफ़्फ़ कइसन जीभ से लपलपाके हमार गाँड़िया चाट रहल बारू। तहके मज़ा आ रहल बा का बेटा, माई के गंदा गाँड़ चाटे में।"
अरुण," तहार कोई चीज़ गंदा नइखे माई, अइसन सुंदर गाँड़ हम आज तक ना देखनि। का गाँड़ बा तहार, मन कर रहल बा सूंघत आउर चाटत रही। तहार गाँड़ के फांक के बीच से तहार पसीना के मस्त गंध आ रहल बा। मन कर रहल बा चाटत रही।"
रंजू कामुकता से बोली," इशशश.... शश तू बड़ा अलग बारू अरुण। केहू औरत के गाँड़ शायद चाटत होई गांव में। लोग गंदा बुझेला, एहीसे कहत रहनि। तहरा मन लागत बा त चाटआ आपन माई के गाँड़ के। आह.... गाँड़ चटवावे में बहुत मज़ा आ रहल बा।"
अरुण उसकी गाँड़ की दरार चाटने में मगन था, तभी उसकी नज़र अपनी माँ की सुंदर सिंकुड़ी गहरी भूरी छेद पर पड़ी। वो सहमी हुई सी, अरुण के जीभ रूपी तलवार का इंतज़ार कर रही थी। रंजू के चूतड़ों को फैलाके उसने उस छेद को छुआ तो रंजू सिसक उठी। अरुण ने फौरन अपनी नाक उसकी गाँड़ के छेद के ऊपर लाकर सूंघा और उसके मुंह से स्वतः आह निकल गया। उस नन्हें छिद्र की मादकता अलग ही थी। उसने सबसे पहले थूक से गाँड़ के छेद को गीला किया। फिर रंजू की गाँड़ के छेद पर उंगली से थूक मलने लगा। रंजू अपने दोनों चूतड़ों को हथेली से फैलाये हुए थी। रंजू गाँड़ के छेद पर हो रहे स्पर्श को महसूस कर सिसक रही थी। अरुण ने देखा रंजू के गाँड़ के छेद के आस पास भी इक्का दुक्का बाल थे। अरुण रंजू की गाँड़ के छेद के गीलेपन का जायजा लेकर उसकी गाँड़ में उंगली घुसा दी। अरुण की उंगली आधी घुसी, पर बूर की तरह अंदरूनी गीलेपन की कमी के कारण, रंजू को दर्द का अनुभव हुआ, पर रंजू उसकी आधी घुसी मध्य उंगली का दर्द झेल रही थी। उस उंगली के गाँड़ में प्रवेश से उसके अंदर दर्द का कम कामुकता का ज्यादा प्रसार हुआ। उसकी बूर का हाल तो ऐसा हो गया था, जैसे झरने के पास कोई गीला पत्थर, सावधानी नहीं बरती तो फिसलना तय। रंजू गाँड़ में हुए हमले से, अनायास कमर आगे बढ़ा दी। अरुण ने उसके पेट को आगे से पकड़ रखा था, वो उसे वापिस खींच के यथास्थान ले आया। इस बार उसने उसकी गाँड़ में एक और उंगली घुसा दी। रंजू फिर सिसिया उठी। अरुण रंजू की कसी हुई गाँड़ को उंगलियों से ढीला करने का प्रयास कर रहा था, पर उसकी टाइट गाँड़ इतनी आसानी से कहां खुलने वाली थी। अरुण ने रंजू की गाँड़ से उंगलियां बाहर निकाली और सूंघने लगा। उसे अपनी माँ की गाँड़ की अंदरूनी सुगंध बेहद उत्तेजित करने लगी। रंजू अपने चूतड़ों को फैलाये अरुण को देख बोली," कइसन बिया हमार गाँड़ के महक बेटा, इँहा से रोज़ सवेरे पियर पियर बदबूदार हग निकलेला।" फिर जोर से हंसी। अरुण अपनी माँ की ओर देख बोला," उ बदबू ना ह, तहार बदन के गंदा से गंदा चीज़ हमार खातिर चंदन जइसन सुगंधित होखेला।" ऐसा बोलके उसने उंगलियां मुंह में रख ली और चाट गया।
रंजू अपने बेटे की ये हरकत और बात सुनके, दंग रह गयी, उसने अरुण की आंखों में देख बोली," तू हमके एतना प्यार करेला का, कि हमार शरीर के मल भी, मिठाई जइसन चाट लेला। आई लव यू अरुण तू ही हमार सच्चा प्यार बारू।"
अरुण," आई लव यू टू रंजू। तू हमार आत्मा में बस गईल बारू।" अरुण ने फिर रंजू को अपनी जांघ पर बैठने का इशारा किया। रंजू बेहिचक अरुण की गोद में बांये जांघ पर नंगे चूतड़ों के साथ विराजमान हो गयी। रंजू ने खुद अपने पैरों से पैंटी उतार दी। अरुण ने रंजू की ब्रा के हुक खोल दिए। रंजू की ब्रा की स्ट्राप जैसे ही खुली, ब्रा आगे की ओर लटक गई। अरुण ने उसके हाथों से ब्रा निकालके फेंक दी। अब रंजू अपने बेटे की गोद में उतनी ही नंगी थी, जितना बचपन में अरुण उसकी गोद में लेटा रहता था। वो रंजू के निर्वस्त्र शरीर को अपनी आंखों में समाने की कोशिश कर रहा था। रंजू खुद अपने शरीर को अपने बेटे, की कामेच्छा भड़काने के लिए उसकी गोद में नंगी मचल रही थी। ट्रैन की धड़क धड़क के साथ हिलते हुए वो अरुण के मजबूत लण्ड को अपने हथेली से मसल रही थी। दोनों के होठ आपस में कब मिले पता ही नही चला। रंजू अरुण के होठों को किसी जंगली बिल्ली की तरह चूस रही थी। रंजू एक हाथ से बैलेंस बनाये थी और दूसरे से बेटे के लण्ड को मसल रही थी। रंजू को अपनी मजबूत बांहों में समेट अरुण रंजू के गीले गहरे चुम्मे का आनंद ले रहा था। रंजू एक नए उत्साह के साथ चुम्बन में खोई हुई थी। थोड़ी देर बाद चुम्बन टूटा तो, अरुण ने रंजू के बालों को सवारते हुए कहा," रंजू मोर जान, ई चुम्मा जउन तू दिहलस, अइसन चुम्मा अब हमके रोज चाही। तहार रसेदार चुम्मा मिठाई के फेल कर दी।"
रंजू हांफते हुए बोली," अरुण ई त तहार प्यार बा, जउन हमार चुम्मा में झलक रहल बा। लेकिन तू हमके पूरे नंगे कर दिहलस अउर खुद कपड़ा में बारू।"
अरुण खुद एक राउंड नैक टी शर्ट और निकर में था। अरुण बोला," उतारब रानी, पर उ से पहिले, तहार गोर बदन के एक एक हिस्सा देखेके बा अउर ओकरा चूमे के बा। चल हमार सामने खड़ी हो जाउ।" रंजू अरुण की आज्ञा का पालन करते हुए, उठ खड़ी हुई। रंजू अपने बेटे के सामने सिर्फ कमरबंद में खड़ी थी। अरुण अपनी माँ की नंगी काया को निहारने लगा। रंजू को देख कोई नही कह सकता था कि वो चालीस के ऊपर की है, अगर रंजू और अरुण को कोई देखता तो वो उसे उसकी बीवी या बड़ी बहन ही समझता। रंजू अपने नंगे बदन की नुमाइश कर रही थी। अरुण ने अपना लण्ड बाहर निकाला और रंजू के नंगे बदन को ताड़ना शुरु कर दिया। रंजू का बदन संगमरमर सा तराशा हुआ प्रतीत था। रंजू के काले घने बाल, वो मासूम फरेबी चेहरा, वो मद भरे मृग नयन, वो रसभरे गुलाबी होठ, वो गोरे गाल, वो सुराहीदार गर्दन, वो बड़े बड़े सीने से लटकते दूध की टंकी, वो सांवले रंग के तने हुए कड़क चूचक उफ़्फ़फ़फ़। उसके पेट पर थोड़ी चर्बी, और कामुक लंबी नाभि उसे और खूबसूरत बना रही थी। रंजू की भारी चर्बीदार कमर पर लटकी कसी हुई कमरबंद, उसे चोदने लायक एक जबरदस्त माल बना रही थी। अरुण ने उस कमरबंद को ठीक से एडजस्ट किया तो, कमरबंद के आगे तीन चार छोटे लटकन लगे हुए थे, जो सीधा रंजू की बूर के दाने को छेड़ रहे थे। उसकी बूर कमरबंद से थोड़ी ढक गयी थी। इस एहसास से रंजू की बूर और पानी छोड़ने लगे। रंजू की जाँघे उसके पैर एकदम चिकने, मुलायम सी थी। अगर मक्खन रख दो तो वो भी फिसल जाए। ऐसी गोरी जाँघे, और तलवे देख कोई भी आदमी औरत का दीवाना हो जाए। ऐसी खूबसूरत बाला जिसकी माँ हो, तो बेटे को मादरचोद बना देती है। रंजू के जिस्म के हर हिस्से को देख, अरुण लण्ड मसल रहा था। फिर वो उठके रंजू के पास आया, और उसके आंखों में देख बोला," जाने कइसे तहरा जइसन टंच माल के छोड़ पापा चल जात रहले। अगर हम रहती, त तहरा खातिर नौकरी छोड़ देने रहति। तहार आँखिया से तहार अधूरा इच्छा और प्यास झलक रहल बा। तहरा पर तरस आ रहल बा माई।"
रंजू अपने हाथ ऊपर उठाके बोली," तहार पापा देख ना केतना जुलुम कइले बा। हमरा साथ न्याय तहराके करे के पड़ी अरुण। हम अब चुपचाप ना रहब, शरीफ अउर सभ्य के चक्कड़ में हमार जवानी के प्यास अधूरा रह गईल बा। लेकिन अब हम समझौता न करब। व्यभिचार होई त होई दे, बेटा हमार बूर चोदे त चोदे, अब त लांड चाही बस हमरा।"
अरुण अपनी टी शर्ट उतारकर बोला," उफ़्फ़फ़फ़ रंडी साली, बड़का छिनार बिया तू, तहार बूर के साथ हमार लांड पूरा न्याय करि। माई अबसे तू हमार छिनार बनके रहबू। तहराके अब चिंता नइखे करेके।"
रंजू,"आह आह अरुण बेटा, अपना माई के छिनार रंडी कह रहल बारू, हमके आपन रखैल बनाके राखबू। बना ले हमके आपन रखैल। तू जेतना गारी देरहल बारू, हमार बूर पानी छोड़ रहल बा। अबसे हम तहार, अउर तू हमार हउ। ई कमरबंद पर लटकन त ना रहे, तू लागबैलू बा स्पेशल का बूर पर लटकत रही। बूर हमेशा चुवत रही, ऐसे।"
अरुण कमरबंद पर लगे लटकन को छूते हुए बोला," हाँ, ई जबरदस्ती लगबइली बानि, ताकि तहार बूर पर जब छुई, त तहके ई याद आये कि तू अब हमार बारू।
रंजू," काहे तहरा, हमरा पर भरोसा नइखे का अरुण।"
अरुण उसकी बूर को टटोलता हुआ बोला," भरोसा बा माई, पर जउन जिस्म के प्यास खातिर तू हमरा पास आईल बारू, उ खातिर तहार बूर हमेशा चुवे के चाही। हम जानत बानि कि तहार वइसे ही खूब चुवेला, पर ई चीज स्पेशल बा।"
रंजू," ए राजा, बूर से देखा ना केतना पानी चू रहल बिया।" अरुण ने रंजू को गोद में उठा लिया जांघ से पकड़के अपने कमर से लपेट लिया। रंजू अपने बेटे को बांहों की हार पहनाके, लटकी हुई थी। दोनों ने एक लंबा चुम्बन किया और रंजू बोली," आह.....अरुण आज रात हमरा अईसे चोदा, कि बूर के तृष्णा बुझ जाए। देखा खिड़की से बाहर चांद के, जे तहार हमार मिलन के गवाह बा।"
अरुण रंजू को चूमते हुए बोला," रंजू मोर जान, अभी से लेकर भोरे तक तहके सुते ना देब। आज पूरा रात तहार बूर में लांड घुसाके रखब। जब तलिक तू बस ना कहबू तहके चोदत रहब रानी।"
रंजू उसकी बात सुन कामुकता से ओत प्रोत हो गयी। उसने अरुण को फिरसे होठों का जाम पिला दिया। अरुण फिर रंजू को लेके बर्थ पर आ गया। वो खुद लेट गया और रंजू उसके ऊपर बैठ गयी। उसकी बूर अरुण के मुंह पर थी। रंजू उसके मुँह का एहसास पाते ही, ट्रैन के वेग के साथ हिलते हुए अपनी कमर हिला रही थी। उसकी बुर में दाने पर कमरबंद की लटकन अलग एहसास जगा रही थी। नीचे अरुण उसकी बूर की फांकों को अलग कर बूर के नमकीन पानी को चाभ रहा था। रंजू की कामुक सिसकियां और आँहें माहौल को और कर्णप्रिय बना रही थी। रंजू किसी किशोरी की तरह उत्साहित हो बूर को अरुण के पूरे चेहरे पर रगड़ रही थी। अरुण उसके चूतड़ों को लगातार भींच रहा था। रंजू खुद अपनी चूचियों को मसलते हुए बड़बड़ा रही थी," आह,...आह...उम्म्म्म.... ऊमम्म...मम्म.... उफ़्फ़... हाय....हे भगवान.... उहहह....चूस ल बुरिया के सब पानी। बचपन में चुच्ची से मीठा दूध पिहलस अब जवानी में बूर के नमकीन पानी। सब तहार बा....आहहहहहह।" अरुण अपनी माँ के मुंह से ये सब सुनके खुश था। वो बूर के पानी को पीते हुए, बूर के दाने को भी जीभ से रगड़ रहा था ताकि बूर और पानी छोड़ता जाए। रंजू अपने बेटे के मुंह में बूर घुसा देना चाह रही थी। वो इतनी कामुक हो चुकी थी, कि बूर से छुड़छुड़ा के तेज पानी की धार अरुण के मुंह और चेहरे पर रह रहके बरसा रही थी। अरुण अपनी माँ के अमृत जल को पीता रहा। उसने अपनी माँ की बूर को लगभग आधे घंटे तक चूसा। इस क्रम में रंजू दो बार जोर से झड़ी। रंजू थोड़ा थक के अरुण के बगल में लेट गयी।
अरुण उसके बाल संवारता हुआ बोला," का भईल माई, थक गईलु का, पानी पीले।" अरुण ने हाथ बढ़ाकर पानी का बोतल ले लिया। रंजू बोली," तू पिया द पानी।" अरुण को एक शरारत सूझी उसने पहले पानी को अपने मुंह में भर लिया फिर, रंजू को अपना मुंह खोलने का इशारा किया। रंजू ने वैसा ही किया। अरुण ने फिर उसे चुम्मा करते हुए सारा पानी रंजू के मुंह में डाल दिया। रंजू उस पानी को धीरे धीरे पूरा पी रही थी। अरुण ने फिर वैसा ही किया। अरुण का ये तरीका, रंजू को बहुत अच्छा लगा। दोनों ने आधे से ज्यादा बोतल ऐसे ही पिया। रंजू उठी और फिर अरुण के पैरों के बीच आ गयी, और उस आठ इंच के लॉलीपाप को घूर रही थी। रंजू को अपनी कोख से पैदा हुए इस लण्ड पर गर्व हो रहा था। अरुण का लण्ड उसके चेहरे की लंबाई के बराबर था। वो खुद उसके लण्ड से अपना चेहरा नाप रही थी। अरुण ये देख हँसा और बोला," का नापत बिया माई, तहार चेहरा से भी लंबा बा।"
रंजू अपनी कानी उंगली दिखा बोली," बेटा जब तू छोट रहला ना त एतना बड़का रहला। अब देख त, केतना भयंकर और ठोस हो गइल बा। हर औरत के सपना होखेला अइसन लांड मिले, जउन ओकरा शारीरिक सुख दे।" ऐसा बोल वो लण्ड के सुपाड़े को चमड़ी से आज़ाद कर चाटने लगी। अरुण रंजू के बाल पकड़ उसके होंठो पर लण्ड से चूता पानी ( प्री कम) लगा दिया। रंजू उसे चाटी तो पूरा चट कर गयी। उसे वो नमकीन पानी मस्त लग रहा था। रंजू अब उसके लण्ड को बड़ी ही शिद्दत और जज्बे के साथ फिरसे चूसने लगी। लण्ड उसका इतना बड़ा था कि रंजू बड़ी मुश्किल से आधा लण्ड ले पा रही थी। अरुण के पापा का तो वो पूरा गटक लेती थी। पर पापा का बेटा तो बहुत ही बड़ा लण्ड धारण किये था। रंजू किसी आज्ञाकारी छात्रा जैसे अरुण का लण्ड चूसे जा रही थी। रंजू अपनी जीभ का सही इस्तेमाल करते हुए आंड़ से लेके लांड के टोपे तक चाट रही थी।
रंजू सिसयायते हुए बोली," आह.... का मस्त लांड बा बेटा। अइसन निम्मन और स्वादिष्ट लांड कभू ना भेटात हमके। एगो पियासल औरत के हईं से बढ़के अउर का चाही।"
उसके थूक से पूरा लण्ड सनकर चमक रहा था। रंजू बीच बीच मे कोशिश करती की ज्यादा से ज्यादा लण्ड मुंह मे ले और वो इसमें कामयाब भी होती थी। जब लण्ड उसके गले तक जाता, तो वो कामुक नारी मुंह से गूं.... गूं .....गूं .... घघ SS की आवाज़ के साथ पूरा कोशिश करती। अरुण उसकी हौसला अफजाई भी करता था। रंजू के ठुड्ढी पर चेहरे पर काफी थूक निकला था, लेकिन उसकी रंजू को कोई परवाह नही थी। अरुण अभी भी पूरा लेटा हुआ था और रंजू अपने मुख मैथुन कला का निः शब्द प्रदर्शन कर रही थी। अरुण अपने मन में सोचा," कितनी प्यासी है ये औरत, इसके चेहरे इसकी आंखों में लण्ड की तड़प और भूख साफ दिख रही है। जाने मैंने इसपर पहले ध्यान क्यों नहीं दिया। जब ऐसी छिनार माँ घर में हो, तो बेटे का फर्ज़ है उसको गलत राह पर ना जाने दे और ऐसे में अपनी माँ को यौन सुख से वंचित ना रखे। बल्कि अपने जवान लण्ड से उसे चरम सुख और यौन संतुष्टि का पूरा मज़ा दे। कितना खुशनसीब हूँ मैं कि मेरी माँ एक बेहद प्यासी कामुक औरत है, जिसे लण्ड की सख्त जरूरत है।" ऐसे ही खयालों में वो रंजू के पीठ पर अपना पैर रख दिया। रंजू अभी भी उस मस्त लण्ड को किसी कुतिया की तरह चाट रही थी। रंजू की बूर अब लण्ड लेने के लिए तैयार हो चुकी थी। अरुण ने रंजू को इशारे से कुत्ती बनने का इशारा किया। रंजू लण्ड छोड़ फर्श पर चली गयी और साड़ी को बिछा के उस पर कुत्ती बन गयी। अरुण ," वाह... केतना चुदाबे के मन बा माई तहरा। तहराके इशारा कइनी कि तू कुत्ती बन गईलु। तू हमार कुत्ती बिया, तोहरा कुत्ती जइसन चोदब। साली रंडी के औलाद, भोंसड़ीवाली।"
अरुण ने फिर उसके पीछे आकर उसके बूर पर थूक दिया। रंजू की गाँड़ पर चपत लगाके, लण्ड से थूक फैलाया और बूर में बिना किसी चेतावनी के ठूस दिया। रंजू की बूर की फांके फैल गयी थी और बूर की पत्तियां लण्ड की गोलाई से चिपकी हुई थी। रंजू के मुंह से," आह...आह...आह...उम्म्मह ऐसी आवाज़ें गूंज रही थी। वो रंजू को पहले पूरी तरह लण्ड की आदि होने दिया। रंजू लण्ड के घुसने से पागल हो उठी थी। पिछले चौबीस घंटे से भी कम समय में वो पांच बार चुदी थी, और फिर भी लण्ड ऐसे ले रही थी जैसे पहली बार मिला हो। इस लण्ड की खास बात ये थी कि ये बेटे का लण्ड था। अरुण ने रंजू के चूतड़ों पर चटाक चटाक चपत लगाए और फिर अरुण ने उसकी गाँड़ में उंगली घुसा दी। रंजू गाँड़ में उंगली घुसने से चिंहुँक उठी और बोली," गाँड़ में काहे उंगली दे दिहलस। चला दे दिहलस त घुसा दे। अच्छा लागी बूर और गाँड़ मे एक साथ रही।" अरुण ने फिर रंजू के बूर में धक्के शुरू किए। अरुण बूर से पूरा लण्ड निकालके वापिस घुसाता। बूर से बार बार जब लण्ड घुसता और निकलता था तो, घर्षण से रंजू को बहुत मज़ा आ रहा था। उसकी गीली बूर और पानी छोड़ना शुरू कर दी।
अरुण," आह..... का कसल बूर बिया।आह..उम्ममम्ममम्म्, बूर के असल रानी तू बिया माई। लगातार चू रहल बा बूर से पानी। लांड फिसल फिसलके तहार बूर के कोना कोना चूमी। बूर के भोंसड़ा बन जाइ।"
बूर में कड़क लण्ड के एहसास, से रंजू मस्ती में डूबे जा रही थी। बूर की अंदरूनी दीवारों पर लण्ड का सख्त और कड़ापन महसूस जब हुआ तो रंजू की कमर अपने आप लण्ड को लेने के लिए आगे पीछे होने लगी। अरुण अब धीरे धीरे अपनी रफ्तार बढ़ाने लगा था। आखिर माँ की बूर की गर्मी उसके लण्ड को सेव रही थी। रंजू की कमर में बंधी कमरबंद, में कुछ झुनझुनी सी भी लगी थी, जो कि धक्कों के साथ बज रही थी। अरुण उसके कमरबंद को पकड़ तेज धक्के मार रहा था। अरुण के तमाचे भी उसके चूतड़ों को लाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। रंजू की बूर अब अचानक से अकड़ने लगी थी। वो तीसरी बार झड़ने वाली थी। रंजू की बूर की फड़कन महसूस कर अरुण भी बहुत देर टिक नहीं पाया। दोनों एक साथ झड़ गए। अरुण ने लण्ड का सारा सफेद पानी रंजू की बूर में ही डाल दिया। अरुण और रंजू पिछले चालीस मिनट से एक दूसरे को भोग रहे थे। अरुण जब झड़ गया, तो वो रंजू के बिछाए साड़ी पर ही बगल में लेट गया और रंजू उसके माथे को चूम ली और उसे अपने चूचियों से लगा ली। अरुण अपनी माँ के साथ प्रथम पड़ाव पार कर चुका था। उसने घड़ी देखी अभी तक बस साढ़े नौ बजे हैं। दोनों एक दूसरे में समाए थे। इस दफा अरुण को प्यास लगी तो, रंजू ने मुंह में भरके उसके मुंह में पानी दिया। ना जाने क्यों रंजू के मुंह से लगके वो पानी और मीठा हो चला था। रंजू ने बोतल खाली कर दी।अरुण," माई भूख लागल बा का?
रंजू बोली," हॉं, तहके भी त भूख लागल होई। बड़ा मेहनत कइले बारे, चल हम तहके खिया देत हईं।" दोनों फिर उठे और अरुण की गोद में रंजू बैठ गयी। रंजू ने फिर अपने हाथ से अपने बेटे को रोटी और सब्जी खिलाने लगी।जैसे एक अच्छी माँ अपने बेटे को प्यार से खाना खिलाती है। बस आज रंजू अपने निवाले में माँ की ममता के साथ कामुक स्त्री का व्यभिचार भी परोस रही थी। रंजू लोक लाज से परे अपने बेटे से बोली," अरुण तहके याद ह, बचपन में हम तहराके गोद में बइठा के खिलात रहनि। देखा आज फेर तहके, खिला रहल बानि। आज तहार माई लंगटे तहार गोदी में बइठके, तहरा खिला रहल बा। तू अब मादरचोद हो गइला बेटा। आपन माई के बूर चोदे बला।" ऐसा बोलके वो हसने लगी। रंजू की हंसी देख अरुण भी हँसा। चुकी वह खाना खा रहा था, तो हंसी की वजह से खाना स्वांस नली में चला गया, और उसे हिचकियाँ शुरू हो गयी। रंजू ने खाने की थाली एक तरफ रखी, और बेटे को पानी देते हुए बोली,"पी ले बेटा, हिचकी बंद हो जाई। " अरुण ने पानी पी पर हिचकी बंद नहीं हुई। वो रुक रुक के काफी पानी पी गया पर हिचकी बंद नही हुई। रंजू अब डर गई तो अरुण ने कहा," माई हमके हिक.... दोसर पानी हिक..क..चाही। पानी जउन हिक..... खारा होउ।"
रंजू बोली," अब खारा पानी कहां से लाई बेटा। ई ट्रैन में कहां मिली। तहके पता बा कहाँ मिली?
अरुण," हॉं..... हिक.... हम जानत बानि..... हिक.....। तहरा पास बिया।
रंजू समझ गयी अरुण उसके पेशाब की बात कर रहा है पर अनजान बनते हुए बोली," कहां बेटा, हमरा लंग नइखे बेटा। तू बताबा कहां बा??
अरुण," आपन दुनु ...हिक ....टांग फइला दे .....हिक...... माई,। फिर उसकी बूर को छूके बोला,"आपन ....हिक....पिया द।
रंजू फिर भी बोली," का पिलाई... बूर के पानी त एतना ना निकली बेटा।"
अरुण," माई, बूर के पानी ना, हिक...... पेशाब पिया द।
रंजू उसे देख मुस्कुराई और बोली," माई के पेशाब पिबु त हिचकी ठीक हो जाई का।"
अरुण," हाँ, माई हिक..... तहार पेशाब पियब त ठीक हो जाई।.....हिक....हिक....
रंजू बोली," ठीक बा तू लेट जो, हम जइसन मूतत बानी ना बईठके वसही तहरा मुंह में मूतब।" अरुण बिना एक पल गवाए लेट गया और रंजू उसके चेहरे के अगल बगल पैर रखकर बैठ गयी। उसकी बूर ठीक अरुण के खुले मुंह के सामने थी। रंजू उसकी ओर मुस्कुराके बोली," तैयार बारू का बेटा, मूती हम ?
अरुण बोला,' हॉं माई, छुड़छुड़ा द। हिक.....
रंजू अपनी बूर की फांक उंगली से फैलाके सीटी की मीठी सी आवाज़ के साथ बूर के ऊपर छोटे से छेद से पेशाब की धार मारने लगी। बूर से गिरता पेसाब छटक कर रंजू की जांघों और बूर के आसपास के हिस्से को तर कर गया। अरुण का चेहरा भी उस धार से गीला हो गया। रंजू ये देख निर्लज्जता से हंस रही थी। उसकी लापरवाह हंसी ने माहौल और भी कामुक और उत्तेजक कर दिया। अरुण अपनी माँ की बुर से फूटी पेशाब की सीधी धार मुँह में लेने लगा। बूर से जिस तेजी से पेशाब अरुण के मुंह में जमा हो रही थी, उसमें बुलबुले और झाग भी बन रहा था। अरुण उस मूत रूपी अमृत को गटक गटक कर पी रहा था। उस गर्म मूत की धार ने उसके गले की सिंकाई की। अपनी सगी माँ के पेशाब का खाड़ा स्वाद उसे गुर की तरह मीठा लग रहा था। रंजू," पी ले बेटा, माई के बूर से निकलल गरम गरम पेशाब। तहरा खातिर ही बूर में रखले रहनि जानू। माई के बूर से ताज़ा ताज़ा पेशाब पीके तहरा हिचकी ठीक हो जाई। बबुआ जेतना पीबा पी लआ। तहार जब जब मन करे, हमरा कह दिह हम गरम गरम पिला देब। हमरा भी पियाईबु का, तू अपन पेशाब। हमहुँ पीके देखत चाहेनि कि कइसन होखेला।"
अरुण की हिचकी अपनी माँ के मूत और बातों से दूर हो गयी। रंजू फिर अपनी गुलाबी बूर अरुण के मुंह से चटवा ली, ताकि पेशाब की बूंदे सब अरुण पी ले। अरुण उस साँवली सी गुलाबी बूर को चाटकर साफ कर दिया। अरुण ने फिर रंजू से कहा," माई, आजो हमार गोदी में, तहरा अब हम खाना खिया दी।" रंजू फिर बेटे की गोदी में बैठ गयी। और इस बार अरुण उसे खाना खिला रहा था। रंजू की खुलती जुबान और खुलते होठ के बीच जब अरुण निवाला डालता तो, बहुत सेक्सी अंदाज़ में वो मुंह से चबाती। कुछ जूठा उसके होठ के आसपास लगा हुआ था, जिसे अरुण ने रंजू को साफ करने बोला तो रंजू बोली," तू साफ कर दे ना," ऐसा बोलके अपना चेहरा आगे बढ़ा दिया। अरुण ने अपनी जीभ से उसके होठ के आसपास चाटके उसे साफ कर दिया। एक बेहद उत्तेजक माहौल में ये आग में घी का काम कर रहा था।
थोड़ी देर बाद दोनों ने खाना खत्म किया। रंजू ने फिर बेटे की उंगलियां चाट चाटकर साफ किया। दोनों ने फिर देखा कि मीठे में गुलाब जामुन था। रंजू ने वो गुलाब जामुन अपने होठों में रखी। फिर अरुण को अपने मुँह से आधा गुलाब जामुन खिलाई। अरुण रंजू की चूचियाँ मसलते हुए, गुलाब जामुन खा रहा था। रंजू एक बार फिरसे, बेटे के साथ काम लीला करना चाह रही थी। अरुण के गोद मे बैठ वो अपने चूतड़ों से उसका लण्ड घिसने लगी। अरुण ने रंजू की ओर देखा तो, रंजू ने अपनी आंखों से अगले संभोग दौर की अनुमति दे दी थी। रंजू अरुण की गोद में उसकी ओर मुंह करके बैठी हुई थी। अरुण उसकी बालों को पकड़ बोला," बोल का भईल माई रानी, फेर से बूर चुदाबे के मन कर रहल बा का?
बाल खिंचने की वजह से रंजू की गर्दन पीछे की ओर झुकी हुई थी। रंजू कामुकता से चिल्लाते हुए बोली," हॉं रे मादरचोद, चोद ना हमरा। तहार माई, तहार रंडी बिया। हमके गाली दे ना, गंदा गंदा गाली देके चोद। बहुत शरीफ और पवित्र बनके रह लेनी। अब हम तहरा साथे शराफत अउर पवित्रता के अंतिम क्रिया करम कर देनी ह। सच त ई बा कि तहार माई के हरदम लांड चाही। हमके अब कउनु अफसोस नइखे राजा, कि तहार लांड यानि बेटा जे हमार कोखिया से जनमल बा उहे हमरा चोद रहल बा। आह.....
अरुण रंजू के चूचियों और चूचकों को मीज रहा था। रंजू अपनी चूचियों को आगे कर उठाये थी, ताकि अरुण उनको खुल के उसे दबाए। रंजू की कामुक सिसकारियां और आँहें ट्रैन की धड़क धड़क के साथ, तालमेल बिठाए थी। अरुण अपनी माँ के चूचियों को उठाके चूचकों को मुंह में ले लिया। रंजू अपनी कड़े तने चूचक को अरुण के जीभ और तालू के बीच पिसते हुए महसूस कर रही थी। अरुण अपनी माँ के चूचक को आम की तरह चूस रहा था। रंजू की चूचियाँ इस चुसाई से एकदम कड़क हो चुकी थी। अरुण के सर को अपने बांहों में भरके सहलाते हुए अपना दूध पिलाना चाहती थी, पर उसकी दूध की टंकियां खाली थी। दोनों जैसे एक दूसरे के शरीर से सुख भोग रहे थे। अरुण ने रंजू की चूचियों पर कोई नाइंसाफी नहीं की। रंजू की दोनों चूचियाँ का बराबर रसास्वादन और मर्दन हो रहा था। रंजू अपने निचले होठ दांतों से दबाते हुए, अरुण की ओर प्यासी आंखों से देख रही थी, जैसे कह रही हो कि इन चूचियों से आज दूध निकाल के पी जाओ। अरुण जब उसके एक चूचक को मुँह में रखकर चूसता था, तो दूसरे चूचक को उंगलियों से छेड़ता था। रंजू अपनी चूचियों पर होते हरकत और स्पर्श से उत्तेजित हो बूर से पानी छोड़ रही थी। वो खुद अपनी चूचियों को रह रहके हिलाकर अरुण को उकसा भी रही थी। रंजू की लगातार रिसती बूर को अरुण ने छुवा तो, उसकी पूरी हथेली गीली हो चुकी थी। ऐसा गीलापन और इतना गीलापन शायद ही उसने किसी का देखा या सोचा होगा। उसने रंजू को अपनी गीली हथेली दिखाई और पूछा," केतना पानी छोड़ रहल बिया तहार बुरिया माई, एतना गीला बा, जइसे बुझाता कि तू मूत दिहलस। तहरा कउनु बीमारी त नइखे? अरुण चुटकी लेते हुए बोला। रंजू उसकी आँखों में देख बोली," हमार बूर शुरू से अइसन रहला राजा बेटवा। जबसे हमार महीना/माहवारी शुरू भईल, तबसे हमार बूर असही चुवेला। अउर जब चुदाई होखेला ना, तब त अईसे बुझाला की केहू बांध खोल देले बा। ई बीमारी ना, लांड खातिर बूर ज्यादे तैयारी कर रहल बिया।" ऐसा बोल उसने मुस्कुराते हुए अरुण को अपने चूचियों के बीच सटा लिया।
अरुण ने कहा," फेर त तहार बूर में लांड दिहे के पड़ी। ऐसा बोलके उसने रंजू को चूतड़ों से पकड़के उठाया और उसकी मचलती बूर में लण्ड घुसेड़ दिया। रंजू की नशीली आँखे लण्ड घुसने से और भी नशीली हो उठी थी। वो चुदाई के नशे में अपने ही होठ को दांतों तले दबा रही थी। रंजू अपने बाल ठीक करने दोनों हाथ ऊपर की, तो उसकी बाल से भरे कांख दिखने लगे जिनमें थोड़ा थोड़ा पसीना आ रहा था। रंजू वापिस जब लण्ड लेके नीचे बैठी तो अरुण उसके बगलों/ काँखों को देख उसे अपने करीब खींच सूंघने लगा। रंजू की कांख की गंध उसे, और उत्तेजना प्रदान करने लगी। अरुण की जीभ कब निकलकर उसकी कांख चाटने लगी पता ही नहीं चला। रंजू अपनी दोनों बांहे उठाये उसे पूरा सहयोग दे रही थी। उसकी कांख में पसीने की बूंदे, अरुण के जीभ पर नमकीन और रोमांचक स्वाद दे रहा था। उसके कांख का सांवलापन देख उसे और अधिक उत्तेजना हो रही थी। इस बीच अरुण उसकी बूर में धक्के भी लगा रहा था। रंजू की बूर बहुत गर्म थी, जैसे कोई कोयले की भट्ठी। उसकी बूर लण्ड को अपनी गिरफ्त में ली हुई थी। ऐसा लग रहा था, कि बूर ही लण्ड को चूस रही है। अरुण का लण्ड रंजू की बूर को फैला उसकी बच्चेदानी को छू रहा था। ऐसे में रंजू उत्तेजित हो खुद भी कमर हिला रही थी, जिससे बूर का दाना रगड़ खा रहा था। तभी रंजू झड़ने लगी, और अरुण ने लण्ड निकाल लिया, उसकी बूर से काफी सारा पानी मूत की तरह बह निकला। रंजू की चरमसुख से निकली कामुक आँहें ट्रैन के शोर में भी दब नहीं सकी। अगर कोई बाहर होता तो उसे पता चल जाता कि अंदर संभोग की प्रक्रिया चल रही है। अरुण का लण्ड उसकी जाँघे सब उस पानी से भीग चुका था। अरुण रंजू को अपनी बांहों में छुपा लिया था। रंजू कुछ देर तक सिसकियां लेते हुए, अरुण के कंधे पर सर टिकाए बैठी रही। थोड़ी देर बाद, रंजू बोली," हमार त हो गइल, लेकिन हमार मुसवा बेटा के मुसवा अभी तक शांत ना भईल। हम अब कुत्ती बन जात बानि, तू खड़ा होके हमके पाछे से चोद ले बेटा।" ऐसा बोलके रंजू उसकी गोद से उठी और फिर फर्श पर बिछी नई साड़ी पर घुटनों और हाथ के बल कुतिया बन गयी। अरुण अपना लण्ड मसलता हुआ उसके पीछे आया और रंजू की गाँड़ को सहलाने लगा। फिर उसने एक दो थप्पड़ लगाए उसकी गाँड़ पर, रंजू उस थप्पड़ की चोट से आँहें भर रही थी। अरुण चुदाई के नशे में बोला," एतना सुंदर गाँड़ तहार, अइसन बुझाला जइसे पहाड़, एक दिन आयी एकरो बेरा, जब थूक लगाके घुसाईब लांड।"
रंजू बोली," ले लिहा राजा हमार कुल जोवन के खज़ाना, चोद ल बूर, मरबाईब गाँड़ एक दिन लेकिन आज ना।"
अरुण ने फिर लण्ड पीछे से उसकी फूली हुई बूर पर लगा दिया। रंजू अपने हाथ भींचे बूर में घुसते लण्ड को महसूस करने लगी। थोड़ी देर बाद बूर में लण्ड पूरी तरह घुस चुका था। अरुण रंजू के चूतड़ों को थामे, लण्ड से उसकी ठुकाई करने लगा। बूर की अंदरूनी दीवार एकदम कसी और चिकनाहट से भरी हुई थी। लण्ड सटा सट अंदर बाहर हो रहा था। एक युवा लड़का अपनी माँ की बूर चोद रहा था, इससे बेहतर कामुक दृश्य नहीं हो सकता। रंजू लण्ड के एहसास से फिर से जोश में आने लगी। अरुण उसकी बूर में लण्ड घुसा घुसा के एकदम अंतिम गहराई तक ले गया।
रंजू अपनी कमर आगे पीछे कर, उसको सहयोग दे रही थी। कोई पंद्रह मिनट की चुदाई के बाद, अरुण का लण्ड अकड़ने लगा, वो चिल्लाते हुए बोला," उफ़्फ़फ़फ़... आह माई हमार गिरे वाला बा, ओह्ह चूस रहल बा तहार बूर हमार लांड के रंडी साली। बेटा के मादरचोद बना देले बा तू।" रंजू बोली," हमार भी छूटे वाला बा फेर से बेटा, बेटा माई के साथे झड़िहा। आह..ऊऊह उ ....उ ......उ.....
अगले कुछ क्षणों के बाद, दोनों फिर झड़ गए। अरुण ने लण्ड का पानी उसकी बूर में ही निकाल दिया। रंजू भी झड़ के हांफ रही थी। रंजू अरुण की ओर घूम के, पीठ के बल लेट गयी। अरुण रंजू के ऊपर ही लेट गया, और रंजू के स्तनों के उपर सर रख दिया। रंजू उसका माथा चूम, उसके सर को सहलाने लगी। कल से लेकर आज तक दोनों काफी खुल चुके थे। रंजू के मन में एक अजीब सी संतुष्टि थी।
रंजू और अरुण का ये कामुक मिलन, रिश्ते नातों से परे था। सच कहते हैं स्त्री के लिए पुरुष हर मर्यादा तोड़ सकता है, लेकिन स्त्री जब अपनी लाज शरम छोड़, मर्यादाओं की सीमाएं तोड़ देती है तो, अवैध संबंध का मज़ा ही कुछ और हो जाता है। ऐसे में अवैध संबंध की पूरी जिम्मेदारी स्त्री अपने हाथों में लेना चाहती है। रंजू भी अपने सगे बेटे के साथ हर मर्यादा से ऊपर उठकर अवैध संबंध को वैध करने की कोशिश में थी।
 

Raja jani

आवारा बादल
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ऐसे में अपनी माँ को यौन सुख से वंचित ना रखे। बल्कि अपने जवान लण्ड से उसे चरम सुख और यौन संतुष्टि का पूरा मज़ा दे। कितना खुशनसीब हूँ मैं कि मेरी माँ एक बेहद प्यासी कामुक औरत है, जिसे लण्ड की सख्त जरूरत है।" ऐसे ही खयालों में वो रंजू के पीठ पर अपना पैर रख दिया। रंजू अभी भी उस मस्त लण्ड को किसी कुतिया की तरह चाट रही थी। रंजू की बूर अब लण्ड लेने के लिए तैयार हो चुकी थी। अरुण ने रंजू को इशारे से कुत्ती बनने का इशारा किया। रंजू लण्ड छोड़ फर्श पर चली गयी और साड़ी को बिछा के उस पर कुत्ती बन गयी। अरुण ," वाह... केतना चुदाबे के मन बा माई तहरा। तहराके इशारा कइनी कि तू कुत्ती बन गईलु। तू हमार कुत्ती बिया, तोहरा कुत्ती जइसन चोदब। साली रंडी के औलाद, भोंसड़ीवाली। चरमसुख दे दिया माँ ने
 

rkv66

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ऐसे में अपनी माँ को यौन सुख से वंचित ना रखे। बल्कि अपने जवान लण्ड से उसे चरम सुख और यौन संतुष्टि का पूरा मज़ा दे। कितना खुशनसीब हूँ मैं कि मेरी माँ एक बेहद प्यासी कामुक औरत है, जिसे लण्ड की सख्त जरूरत है।" ऐसे ही खयालों में वो रंजू के पीठ पर अपना पैर रख दिया। रंजू अभी भी उस मस्त लण्ड को किसी कुतिया की तरह चाट रही थी। रंजू की बूर अब लण्ड लेने के लिए तैयार हो चुकी थी। अरुण ने रंजू को इशारे से कुत्ती बनने का इशारा किया। रंजू लण्ड छोड़ फर्श पर चली गयी और साड़ी को बिछा के उस पर कुत्ती बन गयी। अरुण ," वाह... केतना चुदाबे के मन बा माई तहरा। तहराके इशारा कइनी कि तू कुत्ती बन गईलु। तू हमार कुत्ती बिया, तोहरा कुत्ती जइसन चोदब। साली रंडी के औलाद, भोंसड़ीवाली। चरमसुख दे दिया माँ ने
excellent
 

Kumar Abhi

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रंजू का सफर -भाग ९

दोनों माँ बेटे एक दूसरे के आलिंगन में निर्वस्त्र होकर सो रहे थे। कल रात की रंगीन चुदाई के बाद रंजू अपने बेटे के कंधे पर सर और उसके जांघ के ऊपर पैर रखके निश्चिन्त होकर पड़ी थी। रात चार बार चुदने के बावजूद उस कामुक स्त्री के चेहरे और बदन में थकान की जगह संतुष्टि झलक रही थी। रंजू की बूर से अरुण के लण्ड का पानी गिरकर सूख चुका था। अरुण ने हर बार अपनी माँ की बूर में ही पानी निकाला। रंजू काम सुख की इतनी भूखी थी, कि उसे इस बात का खयाल ही नहीं रहा कि उसकी कोख अभी भी उर्वर है। बूर से बहा पानी बूर की फांकों, जांघों और बूर के नीचे गाँड़ की ओर सूख चुका था। रंजू सारी रात बूर में लण्ड लेकर मचलती रही। अरुण ने उसके बदन को सारी रात निचोड़ा था। रंजू के गालों, चूचियों, कमर, चूतड़, जांघों पर अरुण के दांतों के निशान उनके बीच हुए विभत्स व्यभिचार की गाथा सुना रहे थे। रंजू के बाल बिखरे हुए और होठ अत्यधिक चुसाई के वजह से सूज गए थे। अरुण के बदन पर भी रंजू ने अपनी काम आतुरता की छाप ऐसे ही छोड़ी थी। रंजू इस क्षण किसी नव विवाहिता स्त्री की तरह प्रतीत हो रही, जो सुहागरात के बाद पति की बांहों में, अपनी जवानी लुटाकर बिल्कुल निर्लज्ज होकर सिमटी होती है। दोनों सुबह आठ बजे तक सोते रहे। रंजू की नींद खुली तो, वो खुद की अवस्था पर शरमा गयी। अपने ही बेटे की बांहों में नग्न होना हर किसी माँ के नसीब में थोड़े ही होता है। रंजू उठ बैठी और अपने बेटे के खड़े लण्ड को देख मुस्कुरा उठी। उसने एक नज़र अरुण को देखा और फिर उसके लण्ड को झुककर चूम ली। उसके लण्ड से बूर के पानी की मदमस्त गंध आ रही थी। रंजू बीती रात की घटना याद कर खुद बेशर्म हो उठी और अरुण के लण्ड को अपनी जीभ से ही चाटकर साफ करने लगी। असल में लण्ड और बूर के मिलन से अरुण के लण्ड का स्वाद उसे अपनी ओर खींच रहा था। वो किसी छोटी बच्ची की तरह अपना लॉलीपाप चूसे जा रही थी। अरुण अपनी माँ की ऐसी हरकत से नींद से उठ गया। उसे रंजू का ये नया रूप चकित और भ्रमित दोनों कर रहा था। वो रंजू को बिना रोके टोके तकिए के सहारे बिस्तर के सर की ओर बैठ गया। अरुण एक हाथ से रंजू के बाल सहला रहा था और उसकी नंगी पीठ, चूतड़ और बूर को छेड़ रहा था। रंजू उसकी ओर देख, मुस्कुराई और अपनी कामुक आंखों से, बेटे को उकसा रही थी। रंजू की कामातुर प्रयास और प्यास आखिर बेटे के लण्ड में अपनी प्यासे यौन आचार का संदेश देने में कामयाब रही।
अरुण," आहहहहह... का चुसत बारू। तू एक नंबर के लांडखोर हउ माई। देखआ अपना के कइसन पियासल रंडी जइसन लांड के चाट रहल बारू।"
रंजू लण्ड के सुपाड़े को चूसकर छोड़ते हुए बोली," अरुण ई पियास तू ना बुझबू, ई लांड के पियास उहे बुझी जेकराके लांड नइखे मिलत। रंडी भी अईसे ना चुसेला, ओकरा त रोज़ लांड मिलेला। हमरा जइसन औरत के मजबूरी केहू ना बुझेला। एगो लांड मिलत रहले अउर उ भी खाली साल में दस दिन। रंडी के त रोज़ लांड अउर पइसा दुनु मिलेला। शरीफ औरत के यौन इच्छा खाली एक मरद के हाथ में रहेला। अगर सही मरद मिल जाता, त कउनो बात ना, ना त पियासल ही जिनगी गुजारे पड़ेला। लेकिन जब अइसन मरद जिनगी में आवेला, जेकरा लांड मजबूत रहेला जइसन तहार, त दबल कामेच्छा के संतुष्टि खातिर रंडी अउर छिनार भी बन सकेली। अइसन निम्मन लांड मिली त केहू, नारी व्यभिचार पर मजबूर हो जाई।"अरुण रंजू के गाल पर थूक से सने लण्ड को पटकते हुए बोला," तहार पियास, तहार कामेच्छा, तहार ई तड़पत जवानी, ई सबके कहानी तहार आँखिया बता रहल बा। हमके ई पता चल गईल कि तहार बूर में लांड जेतना जाई, उ पियासल ही रही। तू एगो बहुत कामुक स्त्री बारू माई। पापा तहराके उ काम सुख ना दे पईलन जेकर तू हक़दार रहलु। अब जे हो गइल से हो गइल, आगे का सोचले बारू।"
रंजू उसके आंड़ को सहलाते हुए बोली," अबसे उहे होई जउन, राते भईल। एगो अति काम पिपासु स्त्री के जवान मर्द मिल गईल बा, त उहे होई जउन होत आइल बाटे यानि संभोग, मैथुन, चुदाई। हम स्त्री बानि त चुदायिब अउर तू पुरुष बारू त तू चोदबे हमरा।" ये बोलकर उसने अरुण का सुपाड़ा अपने होठों में दबा लिया और जीभ से लण्ड के छेद को कुरेदने लगी। अरुण के मुंह से सिसकारी फूट पड़ी। अरुण उसके गाँड़ को मसलते हुए लण्ड चुसाई का पूरा आनंद ले रहा था। रंजू की बूर रिसने लगी थी। रंजू ने उसके हाथ को खिसकाके बूर पर रख दिया। वो इस समय अपने चूतड़ अरुण की ओर किये हुए थी। अरुण ने उसकी साँवली फूली बूर की फांकों को मसल के अलग कर दिया वहां तो गीलेपन से अरुण की उंगलियां भी गीली हो गयी। अपनी माँ की तरसती बूर से बरसते खाड़े पानी का एहसास उसे ना चाहते हुए भी स्वाद लेने पर मजबूर कर दिया। रंजू की रिसती बूर से जैसे ही उसने उंगली निकाली, बूर के मोटे पानी के धागे से उंगली और बूर की पत्तियों के बीच बनकर टूट गए। ये दृश्य बेहद कामुक था। अरुण ने उंगलियां मुंह में रखकर चाट ली। रंजू अपनी टांगे फैलाये घुटनों पर थी और लण्ड चूसने में मगन थी। अरुण ने रंजू के टांगों को पकड़के अपने सीने के दोनों तरफ रख लिया और रंजू की बूर में मुँह लगा दिया। अब दोनों एक दूसरे के यौन अंगों के साथ मुख मैथुन कर रहे थे। अरुण तो झांट से भरी बूर को चूसने में तल्लीन हो चुका था। रंजू भी अरुण के लण्ड की लंबाई से अपने गले की गहराई नाप रही थी। वो अरुण का लण्ड दोनों हाथों से थामे चूस रही थी। अरुण उसके बूर को फैलाके हर हिस्से को जीभ से चाट रहा था। बूर के अंदरूनी गुलाबी हिस्से को अरुण उंगलियों से छितराके चूस रहा था। अरुण अपनी मां के बूर में मूत वाले छेद को भी छोड़ नहीं रहा था। फिर बूर के दाने को उंगली से छेड़ रहा था। अरुण जब बूर चूस रहा था उसकी नज़रे बार बार रंजू के भूरे गाँड़ के छेद पर जा रही थी, उसका मन हो रहा था कि उसपर भी जीभ फिरा दे पर बूर से चूते मदन रस ने उसे ऐसा करने नहीं दिया। जब माँ के बूर का मधुरस मुंह में घुल रहा हो, तो लुभावनी से लुभावनी चीज़ छूट जाती है। अरुण उसकी बूर के दरार में जीभ फेरता तो कभी उंगली से जोर से रगड़ता, जिससे बूर खूब पानी छोड़ती और अरुण फिर उस रस को किसी गगरी से चूते जल की तरह पी रहा था। अपने बूर से होती छेड़खानी, रंजू को मदमस्त कर रही थी। वो जवान बेटे की मुख मैथुन की कला की कायल हो चुकी थी। रंजू बूर की चुसाई ज्यादा देर झेल नहीं पाई और बूर से पानी का फव्वारा अरुण के मुंह में फूट पड़ा। रंजू की कमर अकड़ी हुई थी और उसका शरीर थर्रा रहा था। उसके मुंह से कंकंपाती आँहें निकल रही थी। रंजू अरुण के मुंह पर बूर चिपकाए सीधी बैठ गयी और कमर हिला रही थी। वो अपना बूर का अमृत अरुण के पूरे चेहरे पर मल रही थी। अरुण के पूरे चेहरे पर रंजू की चिप चिपी बूर का स्पर्श हो रहा था। रंजू चरमसुख की प्राप्ति के दौरान अपने बूर को अरुण के पूरे चेहरे पर रगड़ रही थी। अरुण भी अपनी लपलपाती जीभ से रंजू के बूर के रस का एक एक बूंद चाट रहा था। थोड़ी देर बाद रंजू शांत हुई और अरुण की ओर देख बोली," कइसन लागल माई के बूर के पानी?
अरुण उसे अपने नीचे लिटा के उसके होठों को चूम लिया और बोला," तहार बूर के पानी हमार चुदाई के प्यास भड़का दिलहस। बूर के ताज़ा रस पीके, तहरा चोदे के मन सौ गुना बढ़ गईल बा माई।"
रंजू उसकी आँखों में देख बोली," तहरा रोकने के बा। घुसा द माई के बूर में लांड। ई बूर भी लांड के बिना बेचैन बा, जब तक बेटवा के लांड ना मिली, चैन ना मिली।"
अरुण अपना लण्ड उसके बूर में घुसाते हुए बोला," आह.... ले लांड साली, रंडी के बेटी, खोल बूर के हमार लांड खातिर कुतिया साली।"
रंजू अपने हाथ से बूर की फांके फैलाकर, अरुण के लण्ड का स्वागत कर रही थी। बेटे का तना हुआ नाग जब उसकी गुफा में घुसा तो रंजू कामुक सिसकारी भरते हुए अरुण को अपनी बांहों में भर ली। अरुण अपनी कमर हिलाते हुए रंजू को चोदने लगा था। रंजू की टांगे फैली हुई थी, जिनके बीच अरुण रंजू के ऊपर लेटा हुआ उसे चोद रहा था। लण्ड और बूर आपस के मिलन से गीलेपन की आज से फच फच की आवाज़ निकाल रहे थे। अरुण रंजू के होंठों को चूसते हुए, धक्के लगा रहा था। उसने प्यार से रंजू के मुंह में थूक दिया। रंजू को उसकी ये हरकत अलग और नटखट सी लगी। वो उसके थूक को निगल गयी और फिर अपना जीभ अरुण के मुंह में घुसाके चाटने लगी। अरुण उसकी जीभ को चूसने लगा। रंजू खुद को अरुण को सौंप चुकी थी। अरुण के हाथ उसके चूचियों का मर्दन भी कर रहे थे। वो रंजू की चूचियों को बेरहमी से मसल रहा था। रंजू अपने बेटे को बांहों में भर सबकुछ करने की छूट दे दी थी। अरुण उसे अपने हिसाब से और अपनी गति से चोद रहा था। पूरे कमरे में रंजू और अरुण की आँहें, और बूर के कुटाई की आवाज़ गूंज रही थी। रंजू की प्यासी बूर जो थोड़ी देर पहले झड़ चुकी थी, फिरसे कांपने लगी थी। अरुण बिना रुके उसकी भीषण चुदाई जो कर रहा था। आखिरकार कोई सात आठ मिनट बाद, अरुण उसकी बूर में ही लण्ड का पानी निकाल दिया, रंजू भी उसके साथ झड़ गयी। दोनों एक दूसरे की बांहों में लेटे हुए थे। रंजू ने देखा अरुण हांफ रहा था, उसने उसके सर को सहलाते हुए माथे को चूम लिया। कल रात से अरुण अब तक उसे पांच बार चोद चुका था। इतनी बार रंजू एक साथ कभी नहीं चुदी थी। रंजू फिर भी उसे मना नहीं की। कोई और स्त्री होती तो शायद वो चूर हो जाती। पर रंजू की क्षमता देख अरुण भी हैरान था। रंजू और अरुण दोनों पसीने से लतपथ थे। दोनों एक दूसरे की चढ़ती उतरती सांसें देख मुस्कुरा रहे थे। रंजू अरुण के नीचे लेटी, बोली," उफ़्फ़फ़फ़ अरुण आहहह बहुत मज़ा आईल आज त। एतना कभू ना चोदौनी ह। तहरा में बड़ा दम बा, असही रहिया राजा।"
अरुण," आह निचोड़ लेलु तू, हमरा के। तहार बूर में लांड के पानी राते से पांच बेर निकलनी ह।
रंजू," कउनु बात नइखे, हम तहार शरीर के थकान के पूरा इंतज़ाम कर देब। अभी त शुरुवात बा, अइसन अइसन केतना रात तहके अब गुजारे के बा।
अरुण," पहिले त तू नखरा करत रहलु की, माई बेटा के रिश्ता बा, पाप होई। अब का भईल रंजू रानी??
रंजू," अब हम ई बूझ गईल बानि, कि तहरा जइसन मरद हमके ना मिली,जउन हमार पियास मिटाई। ई रिश्ता नाता के कउनु मायने नइखे, बल्कि माई बेटा के रिश्ता में चुदाई के आनंद अउर बढ़ जाला। तू भले हमार कोख से पैदा भईल बारू, पर जन्म हमार खातिर ही लेलु। तहरा संगे, हमरा कउनो तरह के डर नइखन। घर के इज्जत, तहरा हाथ में बा, जे होई बंद दरवाज़ा में होई।"
अरुण," विश्वास नइखे होत, कि ई बतिया तू बोलत बारू। अइसन बुझाता कि कउनो दोसर रंजू हमार बांहिया में बा। रंजू," ना बेटवा, हम तहार उहे माई रहब, लेकिन उ सबके सामने, लेकिन अकेले में तू हमार मरद बनके रहिया। देखलस ना कइसे रानी आपन बाप रमेसर से चुदाबेलि। वइसे ही हम तहरा से चुदायिब।"
अरुण," लेकिन हम तहरा अइसन ना देख सकिले ??
रंजू," कइसन ?
अरुण," तू ना कउनु श्रृंगार करत बिया, ना कउनु आभूषण पेन्हली। तहार ई सूना मांग, सूना गला, सूना कान, एकदम बढ़िया नइखे लागत। तनि लिपस्टिक, मेक अप करबू तब अच्छा लगबू। कुछ नया कपड़ा, गहना अउर मेक अप के समान तहरा खातिर लेबे के पड़ी।"
रंजू," अरुण हम अब विधवा बानि, सबके सामने त हमके असही रहे के पड़ी। लेकिन तू कहबू त तहार खातिर, हम अकेले में सब करब। तहार हर इच्छा पूरा करब राजा।"
अरुण," इँहा त तहरा कोई जानत नइखे, आज आफिस के काम कइके, हम तहरा ले चलब समान ख़रीदवावे खातिर। रंजू आफिस की बात सुनके घड़ी की ओर देखती है," अरे बाप रे नौ बज गईल, चला जल्दी तैयार हो। आफिस के काम आज हो जाई, ओकर बाद देखल जायी। अभी त तैयार होखे।" थोड़ी देर बाद दोनों नहा धोके तैयार हो गए। और पेंशन ऑफिस के लिए निकल पड़े। रंजू उसके साथ ऐसे चिपकी हुई थी, जैसे वो उसकी बीवी थी। अरुण उसकी कमर में हाथ डालके, अपनी ओर खींच लिया। रंजू खुद ही अपने अंगों को अरुण के बदन पर रगड़ रही थी। रास्ते में राजू कभी उसकी गाँड़ दबोच लेता तो, कभी उसकी चिकोटी काट लेता, यो कभी उसकी पप्पी ले लेता। रंजू उसकी हरकतों से तंग हो रही थी, पर उसे अच्छा भी लग रहा था। रंजू झूठा गुस्सा दिखा रही थी। कुछ देर बाद दोनों पेंशन आफिस पहुंचे, और कुछ देर के बाद उनका काम हो गया। दुबेजी वही कर्मचारी जो छुट्टी पर थे, आज आके सारा काम कर गए। उन्होंने रंजू का सारा काम खत्म कर आखरी कागजों पर उसके दस्तखत ले रहे थे। दस्तखत करने बाद वो बोला, "ये लीजिए रंजू जी, आपके कागज पूरे हो गए। आप बस नीचे सब जगह दस्तखत कर दीजिए। अगले महीने से आपकी पेंशन शुरू हो जाएगी।" सामने से कर्मचारी बोला। रंजू ने मुस्कुराते हुए उससे पेन ले लिया और दस्तखत करने लगी। रंजू धीरे धीरे दस्तखत करने लगी। अरुण उसके साथ बगल वाली कुर्सी पर बैठा था और पन्ने पलट कर उसकी मदद कर रहा था। थोड़ी देर में दस्तखत पूरे हो गए, तो उस आदमी ने सारे कागज़ रख लिया और उसकी एक प्रति रंजू की ओर बढ़ा दी। रंजू ने वो कागज़ लेकर अरुण की ओर बढ़ा दिए। अरुण ने वो कागज़ देखे और फिर अपने बैग में रख लिया।
वो कर्मचारी बोलता है," आपको हर साल नवम्बर में जीवन प्रमाण पत्र और पुनर्विवाह प्रमाण पत्र जमा करना होगा। आप अब किसी और से विवाह नहीं कर सकती। एक शहीद की विधवा बनके आपको जीना होगा। आप जैसी औरतों की देश को जरूरत है, जो देश पर हंसते हंसते अपना पति न्योछावर कर दिया और अब जीवन का सुख त्यागके विधवा बनकर रहेंगी। आपको सत सत नमन है मेरा। ये पेंशन तो एक छोटा सा प्रयास है, आपके जीवन यापन के लिए।" रंजू और अरुण ने उसकी बातें सुन एक दूसरे की ओर देखा, और आंखों ही आंखों में मुस्कुराए, दोनों वहां से फिर निकल गए। बाहर आकर अरुण ने रंजू को पास के एक होटल में खाना खिलाया और फिर बोला," माई, खाना त खा लेलु, चल अब तहरा के कुछ खरीदारी कराई।"
रंजू बोली," का खरीदारी ??
अरुण," तहार देहिया अईसे सूना सूना नइखे बढ़िया लागत, तहराके कुछ सोना के आइटम दिया दी।"
रंजू बोली," ठीक बा, दिया द, पर पइसा कहाँ से आई। तहरा मालूम नइखे, सोना चांदी केतना महग बा। कहां से लाईबा पइसा।"
अरुण हँसते हुए," अरे तू ओकर चिंता छोड़ दे। ई देख आजे मोबाइल में बैंक से मैसेज आईल बाटे, कि राज्य सरकार से जउन पापा के इनाम मिले वाला रहल, उ आ गईल बा पूरा पच्चीस लाख अउर केंद्र सरकार से भी एतना ही आयी, हो सकेला अगला हफ्ता में।"
रंजू खुश होते हुए बोली," अच्छा, बड़ा जल्दी आ गईल। लेकिन बेफिजूल के खर्चा काहे करबू। कहीं औरो पइसा लगाबअ। मकान के मरम्मत करवावे के बा, कुछ जमीन ले ले जाई।"
अरुण उसका हाथ पकड़ के, बोला," उ सब करके भी बहुत पइसा बची अउर अभी त अउर पइसा आयी। मकान भी बन जाई। कुछ जमीन भी ले लेब। जर बड़ले बा, जमीन आइबे करि, बस जोरू के कमी बा।"
रंजू उसकी ओर देख बोली," कमी ना होई, तहार बियाह जल्दी से करा देब। फेर जोरू के साथे, लागल रहिया।"
अरुण," हमके बियाह नइखे करेके। हम त तहरे के जोरू बनाके रखब, एहीसे तहार सूना बदन ना देखल जाला। अपन जोरू के कुछ स्पेशल देबे के बा। चल हमरा साथे।" और उसका हाथ पकड़के बाहर ले आया।
वहां से पास ही तनिष्क का शोरूम था। वहां वो रंजू को ले गया। अरुण ने सेल्स गर्ल से बोला कि वो सोने के कमरबंद दिखाए। सेल्स गर्ल ने रंजू की ओर इशारा करके पूछा," इनके लिए दिखाऊँ क्या सर? अरुण ने हां में सिर हिलाया। वो उन दोनों को लिफ्ट से दूसरे फ्लोर पर ले गयी, जहां कमरबंद रखे हुए थे।
सेल्स गर्ल," सर रेंज कितने तक दिखाऊँ, हमारे पास डेढ़ लाख से लेकर पचास लाख तक है, कोई हिचकिचाहट मत रखिये, खुलके बोल दीजिए। हमारे पास सभी रेंज में बढ़िया आइटम है।
अरुण," जी पांच तक में दिखाइए।" रंजू सुनके ऊपर से बोली," काहे एतना खर्चा कर रहल बा।" मगर दिल से बहुत खुश थी। किसी भी आम औरत की तरह सोना के आभूषण देख खुश थी। अरुण," अरे जान, ई समान कउन बेर बेर लिहल जाला, एक बेर लेले दिल से तहराके, देतानि। फिर रंजू हंस दी। तभी सेल्स गर्ल बोली," ले लीजिए मैडम, पति की जेब कभी कभी खुलती है। मैंने पत्नियों को जिद करते हुए देखा है, यहां तो उल्टा है।" वो मुस्कुराते हुए बोली। रंजू उसकी बात सुन शर्मा गयी, आखिर उस लड़की ने उसे उसके ही बेटे की बीवी कहके बुलाया था। अरुण ने रंजू के कंधे पर हाथ रखके बोला," शरमात काहे बारू, उ कउनो गलत बात थोड़े कहलस रंजुजी।"
रंजू का चेहरा शर्म से लाल था। रंजू फिर उसके साथ बैठके, कमरबंद देखने लगी। सारे बहुत बढ़िया बढ़िया डिज़ाइन थे। अरुण बार बार रंजू को पूछ और बता रहा था। सेल्स गर्ल भी पूरी मेहनत से लगी हुई थी। रंजू ने आखिर चार पांच सेलेक्ट करके साइड रख दिये। फिर सेल्स गर्ल उसे आईने के सामने ले गयी और उसे एक कमरबंद पहना दिया। रंजू की कमर चौड़ी थी, तो वो टाइट हो रही थी। उसने रंजू से पल्लू गिराने को बोला, ताकि कमरबंद अच्छे से दिख सके। उसने उसके पहले ही अपना पल्लू गिरा दिया। उसके कमर पर कमरबंद बहुत सेक्सी लग रही थी। सेल्स गर्ल बोली," मैडम देखिए बहुत ही खूबसूरत लग रहा है आप पर। साड़ी पर और खिलेगा। किसी फंक्शन में भी घूम जमेगा आप पर।" रंजू ने एक एक कर सारे पहन कर देखे, और अंत में अरुण की सहमति से, उसने एक साढ़े चार लाख का कमरबंद पसंद किया। अरुण ने फिर सेल्स गर्ल से कुछ बात की। सेल्स गर्ल बोली," सर हो जाएगा, पर उसका अलग से लगेगा वजन के हिसाब से।" अरुण ने सहमति दे दी। सेल्स गर्ल फिर अरुण को लटकन वाले झुमके दिखाने लगी। अरुण ने उसमें से एक पसंद किया, रंजू को भी वो पसंद था। अरुण ने रंजू के चेहरे पर पढ़ लिया था, कि उसे इस खरीद दारी में बड़ा मजा आ रहा है। कोई एक घंटे बाद उनका बिलिंग हुआ। अरुण ने फिर वहां चेक काट कर बिल ले लिया। उनका बिल कोई साढ़े पांच लाख के आसपास बना। रंजू बोली," ढ़ेर खर्चा हो गइल अरुण।"
अरुण उसका हाथ पकड़के बोला," सोना कभू खर्चा ना होवेला। ई त बूझा एक तरह से नगद बा। जब चाहबू भजा लेल जायी। तू चिंता मत कर। चल अब तनि कपड़ा दुकान में, बढ़िया साड़ी लेले।" फिर दोनों चल दिये एक बड़े दुकान की ओर और वहां अरुण ने रंजू के लिए सुंदर सुंदर दो तीन साड़ियाँ खरीद ली। रंजू के लिए एक फिरोज़ी, एक लाल और एक काली साड़ी उसने पैक करवाई। फिर अरुण ने वहां मौजूद सेल्स गर्ल से, डिज़ाइनर ब्रा पैंटी, रंजू के लिए मंगवाई। अरुण उसे लजाते हुए देख बोला," लजात काहे बारू माई, ले लआ ब्रा पैंटी त तहरा के चाही ना।" रंजू उसकी ओर देख बोली," ई हम कभू तहरा पापा के साथ भी ना किनली, अउर तू हमके खरीदवा रहल बारे। एहीसे लजात बानि।"
अरुण," कउनो बात ना, तू धीरे धीरे बुझबू कि मरद से तू जेतना खुलबु उतना बढ़िया रही। चल अभी त तू पसंद कर।" उसे क्या पता था, कि रंजू तो मजी हुई खिलाड़ी है।
रंजू शर्माते हुये बोली," तू देख ल, जउन लेबा हम पिन्हब।"
अरुण ने फिर रंजू की साइज के लाल और मैरून रंग के दो सेट ब्रा पैंटी ले ली। दोनों शॉपिंग करके वापिस होटल आ गए। वापिस आकर, अरुण ने रंजू से कहा," एगो काम रह गईल। उ काम कइके आवत हईं।" इससे पहले रंजू उससे पूछ पाती, वो जा चुका था।अरुण वापिस होटल पहुंचा तो रंजू से बोला," शाम सात बजे ट्रैन बा, अभी चार घंटा टाइम बा।"
रंजू बोली," आराम करबू त कर ले।"
अरुण," हट, आराम ना, तू तैयार बारू, चल तहरा के एक जगह लेके जायके बा।"
रंजू आश्चर्य से पूछते बोली,"कहां??
अरुण," चल ना, सवाल ना कर।" रंजू अरुण को लेकर वापिस लॉज के बाहर आ गया। उसने लॉज खाली कर दिया। थोड़ी देर बाद वो रंजू को एक ब्यूटी पार्लर में लेकर घुसा और रंजू की ओर देख बोला," वइसे त तहरा के कउनो मेक अप के जरूरत नइखे, पर हम चाहत बानि की तू थोड़ा बन संवर के रहा।"
रंजू उसे देख मुस्कुराई," काहे, हम तहरा के अइसन, पसंद नइखे का?
अरुण उसका हाथ थामकर बोला," तहरा जइसन कोई नइखे अउर ना केहू हो सकेली। लेकिन हम चाहत बानि की तू आज ई भूल जो कि तू विधवा बारू। एक विवाहित स्त्री जइसन तहार रूप श्रृंगार होवे के चाही।"
रंजू बोली," जइसन तहार इच्छा। तू जे कहबा हम करब।" ऐसा बोलके उसने बेटे के गाल को सहलाया। फिर रंजू को एक लड़की अंदर ले गयी। अरुण वहीं बाहर बैठ गया। अंदर रंजू का फेसिअल, मैनीक्योर, पेडीक्योर, इत्यादि सब होने लगा। कोई दो घंटे बाद रंजू वहां से पूरी तरह तैयार होके निकली। वो बला की खूबसूरत लग रही थी। रंजू के चेहरे में अलग ही चमक थी। वो किसी फिल्म की हीरोइन को फेल कर देती। इस वक़्त रंजू को देखकर कोई उसे 30 से ज्यादा की बोल नहीं सकता था। उसके बाल लहरा रहे थे, बालों की कटिंग उसे और सेक्सी बना रही थी। अरुण का बस चलता तो, रंजू को वहीं चूम लेता। सच ये देसी औरतें खुद को सजने सवरने का समय देती नहीं, अगर ये सजने सवरने लगे तो पति और आशिक़ इन्हें हमेशा बिस्तर में ही घुसाए रखे।
रंजू अरुण के पास आकर, उसके खुले मुंह की ओर इशारा कर बोली," मुंह बंद कर।" रंजू ये बोलकर हसने लगी। तभी अरुण ने रंजू की कमर पर चिकोटी काट ली। रंजू के मुंह से बड़ा तेज उफ़्फ़फ़फ़ निकला और वो बोली," काहै कटलस।"
अरुण," ई देखे खातिर, की तू असली में बारू। अइसन खूबसूरती खाली कितबिया में होखेला। पर तहरा के देखके ई पता चल गईल कि एतना खूबसूरत औरत सच में भी हो सकेली।"
रंजू बोली," अब चला स्टेशन ना त लेट हो जाई। बाकी के तारीफ उंहे करिहा।
रंजू और अरुण रेलवे स्टेशन आ गए। थोड़ी देर में ट्रेन आयी और अरुण रंजू को लेकर ट्रैन में बैठ गया। रंजू ने इससे पहले कभी ऐसी व्यवस्था नहीं देखी थी। एक पूरा कमरा जैसा बना हुआ था, उसके अंदर दो बड़े बर्थ थे, सिर्फ दो लोगों के लिए। अरुण ने समान बर्थ के नीचे डाला और रंजू को बैठने के लिए बोला। रंजू वहां बैठी, और वो समझ गयी थी, अरुण ने ऐसी बुकिंग क्यों कराई है। उसके मन में लड्डू फूटने लगे और बूर से रिसती पानी में वेग आ गया। रंजू अपनी साड़ी का पल्लू किनारे से पकड़े हुए, मुंह में उंगली के नाखून चबा रही थी। गाड़ी थोड़ी देर बाद स्टेशन से खुल गयी, और खुलते ही टी टी ई आ गया और उनका टिकट चेक करने लगा। चेक करने के बाद वो मुस्कुरा कर चला गया। शाम के पौने आठ हो चुके थे। अरुण रंजू के पास आया और उसके कमर में हाथ डालके उसे अपनी ओर खींचा। रंजू उसकी ओर देखी तो उसका बेटा उसके होठ चूमने के लिए अपने होठ बढ़ा रहा था। रंजू ने उसके होठों पर अपनी उंगली रख दी और बोली," एहि खातिर तू ई वाला सीट बुक कइलस बारे,।
अरुण उसके उंगलियों को मुंह में रख चूस कर बोला," हॉं माई, अइसन मौका ट्रैन में जाने कब मिली। हमनीके केहू डिस्टर्ब ना करि।" अरुण एक सांस खींचकर फिर बोला," आज हम तहराके जीभर के पहले देखब।"
रंजू उसके गाल सहलाते हुए उसकी आँखों मे देखते हुए बोली," पहिले ना देखलस का राजा हमके।"
अरुण," देखनि ह, पर खाली माई के नज़र से पर आज से तू हमार प्रेमिका भी बारू। अबसे तहके एक स्त्री के भी नजर से देखे के बा।" वो रंजू के बदन को सूंघते हुए बोला।
रंजू उसके साँस को अपनी चुच्ची पर महसूस कर मचल उठी। रंजू खुद कामुक होकर बोली," अरुण हम तहरा से कुछ कहब तू बुरा त ना मानबु बेटा?
अरुण," ना माई, बोल ना। तहार कउनु बात के बुरा ना लागी।" उसने रंजू को अपने गोद में बैठने को कहा, तो रंजू बेहिचक उसकी गोद में बैठ गयी और बोली," पहले हमार कसम खा, फिर बोलब।" रंजू उसका हाथ अपने सर पर रखके बोली। अरुण उसकी आँखों में देख बोला," तहरा के भरोसा नइखे का, त ले तहार कसम खा तानि।"
रंजू फिर बोली," तू हमरा से पहिले अउर केहू के चोदले बारू का।"
अरुण उसकी आँखों में देखा तो रंजू की आंखों में उसे एक किशोरी की भांति उत्सुकता दिखी जिसके उत्तर देते हुए बोला," तहरा से झूठ ना बोलब हां चोदले बानि।"
रंजू उसकी ओर देख बोली," तू नीतू के चोदले बारू।"
अरुण समझ गया कि उस दिन किसी और ने नहीं बल्कि उसकी मां ने ही उसे नीतू के साथ सेक्स करते हुए देखा था। अरुण बोला," हां, नीतू के चोदले बानि, तहरा बुरा लागल का माई।"
रंजू," ना उ बात नइखे, तू दुनु जुवान हो गइल बारू। दुनु के अंदर विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण हो रहल बा। सच बताई त हम तहके उहे दिन से देखके चाहत बानि। तहार औजार देखके, हम त पगला गईल रहनि।"
अरुण को अपनी कानों पर यकीन नही हुआ," तू हमार लांड देखके हमार दीवानी हो गइल रहलु, एहीसे तू कुछ बोललु ना जब हम नीतू के चोदत रहनि। तू हमरा पास बाद में काहे ना आइलु।"
रंजू," मन त बहुत रहल, पर हिम्मत ना भईल। कइसे बेटा के केहू माई कही कि उ ओकर लांड के दीवानी ह।" रंजू उसके लण्ड को सहलाते हुए बोली," नीतू के साथे तहके बढ़िया लागल कि हमरा साथ।" रंजू बेशर्मी से पूछ बैठी।
अरुण उसकी आँखों में देख बोला," माई के बूर से बेहतरीन बूर ना भेट सकेला चोदे खातिर। तहके चोदके हम धन्य हो गइनी। नीतू जइसन लइकी त आत जात रही।"
रंजू ,"अगर हमरा जगह अंजू तू दुनु के देख लिहित त, आ कहीं नीतू अंजू के बता दी तब का होई।"
अरुण," हमरा नसीब में तू रहलु, एहीसे भगवान अंजू मौसी के जगह तहरा भेजले रहनि। अउर रहल बात नीतू के त उ आपन माई के का बताई, की चुदबा के आईल बानि। तू त खुद देखले बारू जे भईल दुनु के मर्जी से।"
रंजू," हमार पैदा कईल चीज़ पर पहिल हक़ हमार ह। तहरा पर पहिल हक़ हमार ह।"
अरुण," आह माई, तहार मुंह से शब्द ना शहद चु रहल बा। हमके लागत बा, तू अउर चीज कहे चाहत बारू। आज खुलके बोल हमरा से।
रंजू," सच कहत बारू बेटा, हम बहुत चीज़ मन में रखले बानि। लेकिन लाज से नइखे बोलत रहनि।"
अरुण," तहराके जे बोले के बा बोल। इँहा केहू अऊर नइखे, तू बोल हम सुनब। तहार मन में जे भी बात बा। अब लजा मत।"
रंजू उसकी ओर देख बोली," हम त तहरा बहुत पहिने से चाहत रहनि। जब तू सोलह साल के रहला। तहार बाप के अभाव में हम त तहके देखके अपन बूर रतिया में सहलात रहनि। केतना बार सोचनी, कि हम बहुत गलत करत बानि, पर हमके बहुत मज़ा आत रहला। तहरा बारे में सोचके, बूर में उंगली खूब कइनी। केतना बार तहके गंदा अंडरवियर के सूँघके बुर के मसलनि ह। हाय.... तहार बाप हमके पियासल ही छोड़ के चल जात रहला। हम दिन रात लांड के बारे में सोचत रहनि। पता नइखे, हम शुरू से ही बड़ा कामुक स्त्री बानि। हमेशा बूर से पानी चुवेला, लांड खातिर। जानत बारू दिन रात हम लांड के बारे में ही सोचत बानि। जब तहार पापा मर गइलन, त हम सोचत रहनि कि अब सारा उम्र बूर के हाथ से ही काम चलाबे के पड़ी। तहार पापा के लांड बस मिलत रहला उहू साल में दस से पंद्रह दिन। हम त बहुत कानत रहनि, अकेले में कि भगवान हमके अइसन कामुक बनाके, किस्मत में लांड के सुख बहुत कम लिखले बारन। अउर ई उम्र के साथ घट ना बढ़ रहल बा। हमार चुदाई के पियास, जाने कब खत्म होई। अइसन में तहरा जब नीतू के साथ चोदत देखनि त लागल कि तहरा से बढ़िया के होई। तहरा के सामने केतना बार हम हिम्मत कइके गाँड़ अउर चुच्ची दिखात रहनि, लेकिन तू ध्यान ना दिहलस। उसे आगे बढ़े के हिम्मत ना रहल। अगर तू हिम्मत कइले रहते, त हम तहरा से बहुत पहिने चुदवा लेने रहती। बाद में रानी अउर रमेसर के रासलीला देखके हमके खूब बढ़िया लागल अउर तहरा साथ अवैध संबंध बनाबे खातिर वजह मिल गईल। माई बेटा के बीच अइसन शारीरिक संबंध के कल्पना मात्र से बूर में पानी झरना जइसन बहेला। जब बेटा ही माई के पेलत बा, त रिश्ता बीच में आग में घी के काम करेला।असीम सुख मिलेला, समाज के बनल नियम तोड़े में। त का भईल तू हमार कोख से निकलल बारे, तू हमके चोदके अगर सुख दे सकेले, त दुनिया समाज के गाँड़ में काहे आग लागत बा। जब हमरा दिक्कत नइखे तहरा से चुदाबे में, त केहू अउर के काहे बुरा लागेला। लेकिन अफसोस ई समाज हमार तहार संबंध के स्वीकारी ना। एहीसे हमरा तहराके बंद कमरा अउर दुनिया से छुपाके एक दोसर के कामेच्छा पूरा करेके पड़ी। हमार जीवन हम अब तहार नाम क दयिनी ह अरुण। आज के रात हमके अईसे प्यार करा, कि हमार आत्मा पर भी तहार नाम हो जाए। तू जे चाहे हमरा साथ कर सकेला, जइसे चाहे प्यार कर, चोद हमरा। बस आजके रात यादगार बना दे।" ऐसा बोलके रंजू अरुण को चूमने लगी। अरुण रंजू को अपनी बांहों में भरके उसके मुंह में जीभ से जीभ लड़ा रहा था। दोनों एक दूसरे के प्यासे मुंह को अपनी लार का पानी पिला रहे थे। अरुण की माँ ने तो अपना दिल ही उसके सामने खोलके रख दिया था। अरुण उसकी बातें सुन काफी उत्तेजीत हो चुका था। वो रंजू के होठों का रस पी रहा था और रंजू भी निडर और निर्लज होकर, अरुण को अधरों का रस पिला रही थी। अरुण रंजू के मुलायम केश को मुट्ठी में भींच कर उसके गालों और गर्दन सब हिस्से को चाट रहा था। और फिर वापिस उसके लाल होठों को चूमने लगता था। रंजू माँ बेटे के रिश्ते की सारी मर्यादा पहले ही लांघ चुकी थी, आज वो इस पवित्र रिश्ते में अपनी प्यास से आग लगा रही थी। चलती ए सी में भी दोनों इतने गर्म हो चुके थे कि पसीना आने लगा था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। रंजू अरुण से अलग होकर बैठ गयी। वेंडर खाना लेकर आया था। उन्होंने देखा गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी। रंजू ने कहा," अरुण पानी के बोतल ले लआ। रात खातिर। अरुण पानी लेने के लिए प्लेटफार्म पर उतर गया। अरुण ने कुछ सोचके पानी की तीन बोतल ले ली। जब पानी लेकर वापिस आया तो रंजू ने दरवाज़ा बंद कर रखा था। अरुण दरवाज़ा खटखटा के बोला," का भईल माई, दरवाज़ा खोल ना।" अंदर से रंजू की आवाज़ आयी," दस मिनट बाहर रुका, खोलत हईं।" वो बाहर खड़ा इंतज़ार कर रहा था। गाड़ी फिरसे चलने लगी, लेकिन दरवाज़ा अभी भी बंद था। उसे रंजू के पास जाने की जल्दी थी। कोई पंद्रह मिनट बाद रंजू ने दरवाज़ा खोला। अरुण उत्सुकतावश तेज कदमों से अंदर गया। अंदर लाइट बंद थी। अरुण ने पानी की बोतल रखी, उसे अंधेरे में कुछ ठीक से नज़र नहीं आ रहा था। अरुण ने लाइट जलाई तो रंजू को देख दंग रह गया।
रंजू ने उसकी खरीदी लाल साड़ी पहनी हुई थी। ब्लाउज बनी नहीं थी तो सिर्फ नई खरीदी लाल ब्रा में थी। अरुण ने जो झुमके खरीदे थे, उसने वो पहनी हुई थी, उसके हाथों और पैरों में लाल नेल पॉलिश लगी हुई थी। उसने हाथों में लाल चूड़ियां और होठों पर लाल लिपस्टिक लगाई हुई थी। रंजू उसकी ओर देख बोली," तू कहत रहला ना, हम सूना सूना तहके बढ़िया नइखे लागेली। देख कान में झुमका, हाथ में चूड़ी, ई श्रृंगार।"
अरुण ने उसकी लिपस्टिक उठायी और उससे रंजू की मांग में लगा दिया। रंजू ने उसे रोका नहीं। अरुण ने फिर उससे उसके भवों के बीच गोल टिका भी बना दिया। रंजू उसके सामने भावहीन सी खड़ी थी। अरुण बोला," अब तहार श्रृंगार पूरा भईल।" रंजू ने बोला," अभी त असली चीज़ बाकी ह बेटा, ई कमरबंद हमके पिन्हा द।" और रंजू ने अपनी कमर पर कमरबंद लपेटके, अरुण को उसका हुक लगाने को बोली। अरुण ने उसको एडजस्ट किया और हुक लगा दी। रंजू अब पूरी तरह तैयार थी। अरुण सीट पर बैठके, रंजू की पल्लू हटाके, उसकी कमर और ढोढ़ी ( नाभि) को चूम लिया। रंजू होंठो के छुवन से गुदगुदी महसूस कर रही थी और कामुकता से हँस रही थी। अरुण रंजू के चर्बीदार पेट के हर हिस्से को चूम रहा था। रंजू उसके सामने खड़ी उसके सर को पकड़, सहला रही थी। रंजू एक विवाहित स्त्री की तरह प्रतीत हो रही थी। अरुण रंजू की नाभी को अपनी जीभ से कुरेद कुरेद कर चाट रहा था। उसने तो रंजू की नाभि को चाटते हुए, उसमें चिकोटी काट ली। रंजू उस दर्द से कामुकता से सिहर उठी। उसकी ढोढ़ी के आसपास की त्वचा को अपने हथेली की उंगलियों से मसलकर ढोढ़ी को उठाके उसके अंदर थूक दिया। फिर उसे पूरा फैला दिया अपनी जीभ से। रंजू की नाभि और उसके आसपास की गोरी त्वचा थूक से भीगके गीली हो चुकी थी। रंजू उस छेड़छाड़ से जब हिल रही थी, तो उसका पल्लू धीरे धीरे सरक रहा था। और फिर आखिर में आनंद से झूमती रंजू के बदन से पल्लू पूरी तरह गिर गया। अब तक वो रंजू की ढोढ़ी को मन भर चूस चुका था।
अरुण ने अपनी मां के चूचियों को देखते हुए कहा," माई, आज रात हम तहार बदन के एक एक हिस्सा के देखब, महसूस करब अउर तहरा आँखिया से चोदब। ए रानी आज तू खुलके देखा दअ हमके ई गोर देहिया के अंग अंग।"
रंजू अपने बाल को दोनों हाथों से समेटते हुए पीछे ले गयी और बोली," देखा ना बेटा, तहार नज़र केतना गंदा बा, कि माई के आँचरा अपने गिर गईल। हमके त लागत बा, कि अगर तू तनि अउर गंदा अउर घटिया नज़र से हमके देख लेबे त, हम असही नंगी हो जाइब। तहार आँखिया में हम खुदके नंगा महसूस क रहल बानि। आँखिया से तू त चुदाई शुरू क देले बारू। लेकिन तू चिंता मत कर बेटा, आज हम तहके उ रूप देखाएब, जउन रूप में हमके भगवान भेजने रहला। जउन रूप में तहार नानी हमके पहिल बेर गोद में उठौनी। देखे चाहबू आपन माई, के अईसे बेटा??
अरुण अपनी तेज साँसों को संभालते हुये बोला," जब तू पैदा होखल होई, तब त तू बच्ची रहल होखब। अब तू एगो परिपक्व नारी और खुद माई बारू। अइसन में तहार हर अंग अब खुलके उभरी माई। तहार हुस्न अउर जोवन निखर के खिली, अइसन नज़ारा त हमके हर दिन देखे के बा।"
अरुण फिर रंजू की कमर में कसी हुई साड़ी को खींचने लगा। रंजू अपनी खिंचती साड़ी की वजह से गोल गोल घूम रही थी। रंजू को इस समय अपनी स्थिति पर लाज बिल्कुल नहीं आ रही थी, बल्कि वो कामुक आँहें भरके नटखट मुस्कान भर रही थी। अरुण भी उसे देख उत्तेजना से लार टपका रहा था। क्या दृश्य था एक बेटा अपनी सगी माँ का चलती ट्रेन में चीर हरण कर रहा था। रंजू अपने उतरते आवरण की भांति लज्जा भी उतार रही थी। वो कामुक होकर अपने दांतों से निचले होठ काट रही थी। वो अपने दोनों हाथ ऊपर किये खुले बालों को समेटे हुए थी। उसके दोनों काँखों के बाल, स्पष्ट झलक रहे थे। थोड़ी ही देर में रंजू की साड़ी पूरी तरह से उसके देह से खुल गयी और अरुण ने उसको वहीं फर्श पर गिरा दिया। अरुण ने साड़ी गिराने के अंदाज़ से ये जताना चाहा कि रंजू तेरे बदन को अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। ट्रैन अपनी गति से चल रही थी और उसके साथ ही हिल भी रहे थे।रंजू की साड़ी खुलके उसके पैरों में गिर चुकी थी और अरुण रंजू के चौड़े गाँड़ को सहला रहा था। रंजू अरुण के सामने अपनी पीठ करके खड़ी थी। अरुण खुद बैठा हुआ था। अरुण अपनी माँ के मोटे मोटे और भारी चूतड़ों को मसल रहा था। रंजू की पैंटी की इलास्टिक को अरुण मुँह से पकड़ लिया और उसकी गाँड़ से उसे उतारने लगा। रंजू की भारी भरकम गाँड़ से उस कसी हुई कच्छी को उतारना एक चैलेंज था। पर अरुण जब उसकी पैंटी उतार रहा था, तो उसे अपनी माँ की गाँड़ की दरार से पसीने की गंध उसके नथुनों में घुसके उसे उत्तेजित कर रही थी। अरुण ने उसकी पैंटी को खींच खींच कर रंजू की गाँड़, को लगभग नंगी कर चुका था। अरुण उसके चूतड़ों को चूम रहा था, और जीभ से उसकी गाँड़ के दरार के बीच छेड़खानी कर रहा था। रंजू को आनंद और गुदगुदी का कामुक अनुभव हो रहा था। अरुण अपनी माँ की गाँड़ की मादक गंध सूंघने और उसके चिकने चूतड़ों का स्वाद में व्यस्त था। तभी रंजू ने अरुण के सर को पकड़ लिया और अपनी गाँड़ की दरार की ओर दबा दिया, फिर अपने गाँड़ को ऊपर नीचे कर उसके चेहरे पर रगड़ने लगी। रंजू की गाँड़ में अरुण का चेहरा जैसे गायब हो चुका था। अरुण तो अपनी माँ की गाँड़ में पूरा चेहरा घुसाके मस्त हो रहा था। अरुण उसके चूतड़ों को मसल रहा था। रंजू को इसमें बहुत मज़ा आ रहा था, उसके पति ने कभी उसकी गाँड़ का स्वाद नहीं चखा था। रंजू की पैंटी उसके घुटनों में फंसी हुई थी। अरुण गाँड़ के दरार के अंदरूनी सांवले हिस्से को चाट रहा था। अरुण की सांसें उन चूतड़ों की बीच उखड़ने लगी। वो स्वतः ही अलग हो गया। लेकिन अगले ही क्षण उस सेक्सी गाँड़ से खुद को दूर ना रख पाया। रंजू की गाँड़ पर उसने चटाक चटाक एक दो थप्पड़ लगाए। वो थप्पड़ खाके रंजू के मुंह से कामुकता भरी आह निकल रही थी। वो फिर से रंजू की गाँड़ की दरार के अंदरूनी त्वचा को अपनी थूक से नहला रहा था और अपनी जीभ से हर एक इंच को चूम और चाट रहा था। रंजू इस गुदगुदी भरे एहसास के साथ और अधिक कामुक हो रही थी।
रंजू," आहहहहहह..... केतना बढ़िया लाग रहल बा, उफ़्फ़ कइसन जीभ से लपलपाके हमार गाँड़िया चाट रहल बारू। तहके मज़ा आ रहल बा का बेटा, माई के गंदा गाँड़ चाटे में।"
अरुण," तहार कोई चीज़ गंदा नइखे माई, अइसन सुंदर गाँड़ हम आज तक ना देखनि। का गाँड़ बा तहार, मन कर रहल बा सूंघत आउर चाटत रही। तहार गाँड़ के फांक के बीच से तहार पसीना के मस्त गंध आ रहल बा। मन कर रहल बा चाटत रही।"
रंजू कामुकता से बोली," इशशश.... शश तू बड़ा अलग बारू अरुण। केहू औरत के गाँड़ शायद चाटत होई गांव में। लोग गंदा बुझेला, एहीसे कहत रहनि। तहरा मन लागत बा त चाटआ आपन माई के गाँड़ के। आह.... गाँड़ चटवावे में बहुत मज़ा आ रहल बा।"
अरुण उसकी गाँड़ की दरार चाटने में मगन था, तभी उसकी नज़र अपनी माँ की सुंदर सिंकुड़ी गहरी भूरी छेद पर पड़ी। वो सहमी हुई सी, अरुण के जीभ रूपी तलवार का इंतज़ार कर रही थी। रंजू के चूतड़ों को फैलाके उसने उस छेद को छुआ तो रंजू सिसक उठी। अरुण ने फौरन अपनी नाक उसकी गाँड़ के छेद के ऊपर लाकर सूंघा और उसके मुंह से स्वतः आह निकल गया। उस नन्हें छिद्र की मादकता अलग ही थी। उसने सबसे पहले थूक से गाँड़ के छेद को गीला किया। फिर रंजू की गाँड़ के छेद पर उंगली से थूक मलने लगा। रंजू अपने दोनों चूतड़ों को हथेली से फैलाये हुए थी। रंजू गाँड़ के छेद पर हो रहे स्पर्श को महसूस कर सिसक रही थी। अरुण ने देखा रंजू के गाँड़ के छेद के आस पास भी इक्का दुक्का बाल थे। अरुण रंजू की गाँड़ के छेद के गीलेपन का जायजा लेकर उसकी गाँड़ में उंगली घुसा दी। अरुण की उंगली आधी घुसी, पर बूर की तरह अंदरूनी गीलेपन की कमी के कारण, रंजू को दर्द का अनुभव हुआ, पर रंजू उसकी आधी घुसी मध्य उंगली का दर्द झेल रही थी। उस उंगली के गाँड़ में प्रवेश से उसके अंदर दर्द का कम कामुकता का ज्यादा प्रसार हुआ। उसकी बूर का हाल तो ऐसा हो गया था, जैसे झरने के पास कोई गीला पत्थर, सावधानी नहीं बरती तो फिसलना तय। रंजू गाँड़ में हुए हमले से, अनायास कमर आगे बढ़ा दी। अरुण ने उसके पेट को आगे से पकड़ रखा था, वो उसे वापिस खींच के यथास्थान ले आया। इस बार उसने उसकी गाँड़ में एक और उंगली घुसा दी। रंजू फिर सिसिया उठी। अरुण रंजू की कसी हुई गाँड़ को उंगलियों से ढीला करने का प्रयास कर रहा था, पर उसकी टाइट गाँड़ इतनी आसानी से कहां खुलने वाली थी। अरुण ने रंजू की गाँड़ से उंगलियां बाहर निकाली और सूंघने लगा। उसे अपनी माँ की गाँड़ की अंदरूनी सुगंध बेहद उत्तेजित करने लगी। रंजू अपने चूतड़ों को फैलाये अरुण को देख बोली," कइसन बिया हमार गाँड़ के महक बेटा, इँहा से रोज़ सवेरे पियर पियर बदबूदार हग निकलेला।" फिर जोर से हंसी। अरुण अपनी माँ की ओर देख बोला," उ बदबू ना ह, तहार बदन के गंदा से गंदा चीज़ हमार खातिर चंदन जइसन सुगंधित होखेला।" ऐसा बोलके उसने उंगलियां मुंह में रख ली और चाट गया।
रंजू अपने बेटे की ये हरकत और बात सुनके, दंग रह गयी, उसने अरुण की आंखों में देख बोली," तू हमके एतना प्यार करेला का, कि हमार शरीर के मल भी, मिठाई जइसन चाट लेला। आई लव यू अरुण तू ही हमार सच्चा प्यार बारू।"
अरुण," आई लव यू टू रंजू। तू हमार आत्मा में बस गईल बारू।" अरुण ने फिर रंजू को अपनी जांघ पर बैठने का इशारा किया। रंजू बेहिचक अरुण की गोद में बांये जांघ पर नंगे चूतड़ों के साथ विराजमान हो गयी। रंजू ने खुद अपने पैरों से पैंटी उतार दी। अरुण ने रंजू की ब्रा के हुक खोल दिए। रंजू की ब्रा की स्ट्राप जैसे ही खुली, ब्रा आगे की ओर लटक गई। अरुण ने उसके हाथों से ब्रा निकालके फेंक दी। अब रंजू अपने बेटे की गोद में उतनी ही नंगी थी, जितना बचपन में अरुण उसकी गोद में लेटा रहता था। वो रंजू के निर्वस्त्र शरीर को अपनी आंखों में समाने की कोशिश कर रहा था। रंजू खुद अपने शरीर को अपने बेटे, की कामेच्छा भड़काने के लिए उसकी गोद में नंगी मचल रही थी। ट्रैन की धड़क धड़क के साथ हिलते हुए वो अरुण के मजबूत लण्ड को अपने हथेली से मसल रही थी। दोनों के होठ आपस में कब मिले पता ही नही चला। रंजू अरुण के होठों को किसी जंगली बिल्ली की तरह चूस रही थी। रंजू एक हाथ से बैलेंस बनाये थी और दूसरे से बेटे के लण्ड को मसल रही थी। रंजू को अपनी मजबूत बांहों में समेट अरुण रंजू के गीले गहरे चुम्मे का आनंद ले रहा था। रंजू एक नए उत्साह के साथ चुम्बन में खोई हुई थी। थोड़ी देर बाद चुम्बन टूटा तो, अरुण ने रंजू के बालों को सवारते हुए कहा," रंजू मोर जान, ई चुम्मा जउन तू दिहलस, अइसन चुम्मा अब हमके रोज चाही। तहार रसेदार चुम्मा मिठाई के फेल कर दी।"
रंजू हांफते हुए बोली," अरुण ई त तहार प्यार बा, जउन हमार चुम्मा में झलक रहल बा। लेकिन तू हमके पूरे नंगे कर दिहलस अउर खुद कपड़ा में बारू।"
अरुण खुद एक राउंड नैक टी शर्ट और निकर में था। अरुण बोला," उतारब रानी, पर उ से पहिले, तहार गोर बदन के एक एक हिस्सा देखेके बा अउर ओकरा चूमे के बा। चल हमार सामने खड़ी हो जाउ।" रंजू अरुण की आज्ञा का पालन करते हुए, उठ खड़ी हुई। रंजू अपने बेटे के सामने सिर्फ कमरबंद में खड़ी थी। अरुण अपनी माँ की नंगी काया को निहारने लगा। रंजू को देख कोई नही कह सकता था कि वो चालीस के ऊपर की है, अगर रंजू और अरुण को कोई देखता तो वो उसे उसकी बीवी या बड़ी बहन ही समझता। रंजू अपने नंगे बदन की नुमाइश कर रही थी। अरुण ने अपना लण्ड बाहर निकाला और रंजू के नंगे बदन को ताड़ना शुरु कर दिया। रंजू का बदन संगमरमर सा तराशा हुआ प्रतीत था। रंजू के काले घने बाल, वो मासूम फरेबी चेहरा, वो मद भरे मृग नयन, वो रसभरे गुलाबी होठ, वो गोरे गाल, वो सुराहीदार गर्दन, वो बड़े बड़े सीने से लटकते दूध की टंकी, वो सांवले रंग के तने हुए कड़क चूचक उफ़्फ़फ़फ़। उसके पेट पर थोड़ी चर्बी, और कामुक लंबी नाभि उसे और खूबसूरत बना रही थी। रंजू की भारी चर्बीदार कमर पर लटकी कसी हुई कमरबंद, उसे चोदने लायक एक जबरदस्त माल बना रही थी। अरुण ने उस कमरबंद को ठीक से एडजस्ट किया तो, कमरबंद के आगे तीन चार छोटे लटकन लगे हुए थे, जो सीधा रंजू की बूर के दाने को छेड़ रहे थे। उसकी बूर कमरबंद से थोड़ी ढक गयी थी। इस एहसास से रंजू की बूर और पानी छोड़ने लगे। रंजू की जाँघे उसके पैर एकदम चिकने, मुलायम सी थी। अगर मक्खन रख दो तो वो भी फिसल जाए। ऐसी गोरी जाँघे, और तलवे देख कोई भी आदमी औरत का दीवाना हो जाए। ऐसी खूबसूरत बाला जिसकी माँ हो, तो बेटे को मादरचोद बना देती है। रंजू के जिस्म के हर हिस्से को देख, अरुण लण्ड मसल रहा था। फिर वो उठके रंजू के पास आया, और उसके आंखों में देख बोला," जाने कइसे तहरा जइसन टंच माल के छोड़ पापा चल जात रहले। अगर हम रहती, त तहरा खातिर नौकरी छोड़ देने रहति। तहार आँखिया से तहार अधूरा इच्छा और प्यास झलक रहल बा। तहरा पर तरस आ रहल बा माई।"
रंजू अपने हाथ ऊपर उठाके बोली," तहार पापा देख ना केतना जुलुम कइले बा। हमरा साथ न्याय तहराके करे के पड़ी अरुण। हम अब चुपचाप ना रहब, शरीफ अउर सभ्य के चक्कड़ में हमार जवानी के प्यास अधूरा रह गईल बा। लेकिन अब हम समझौता न करब। व्यभिचार होई त होई दे, बेटा हमार बूर चोदे त चोदे, अब त लांड चाही बस हमरा।"
अरुण अपनी टी शर्ट उतारकर बोला," उफ़्फ़फ़फ़ रंडी साली, बड़का छिनार बिया तू, तहार बूर के साथ हमार लांड पूरा न्याय करि। माई अबसे तू हमार छिनार बनके रहबू। तहराके अब चिंता नइखे करेके।"
रंजू,"आह आह अरुण बेटा, अपना माई के छिनार रंडी कह रहल बारू, हमके आपन रखैल बनाके राखबू। बना ले हमके आपन रखैल। तू जेतना गारी देरहल बारू, हमार बूर पानी छोड़ रहल बा। अबसे हम तहार, अउर तू हमार हउ। ई कमरबंद पर लटकन त ना रहे, तू लागबैलू बा स्पेशल का बूर पर लटकत रही। बूर हमेशा चुवत रही, ऐसे।"
अरुण कमरबंद पर लगे लटकन को छूते हुए बोला," हाँ, ई जबरदस्ती लगबइली बानि, ताकि तहार बूर पर जब छुई, त तहके ई याद आये कि तू अब हमार बारू।
रंजू," काहे तहरा, हमरा पर भरोसा नइखे का अरुण।"
अरुण उसकी बूर को टटोलता हुआ बोला," भरोसा बा माई, पर जउन जिस्म के प्यास खातिर तू हमरा पास आईल बारू, उ खातिर तहार बूर हमेशा चुवे के चाही। हम जानत बानि कि तहार वइसे ही खूब चुवेला, पर ई चीज स्पेशल बा।"
रंजू," ए राजा, बूर से देखा ना केतना पानी चू रहल बिया।" अरुण ने रंजू को गोद में उठा लिया जांघ से पकड़के अपने कमर से लपेट लिया। रंजू अपने बेटे को बांहों की हार पहनाके, लटकी हुई थी। दोनों ने एक लंबा चुम्बन किया और रंजू बोली," आह.....अरुण आज रात हमरा अईसे चोदा, कि बूर के तृष्णा बुझ जाए। देखा खिड़की से बाहर चांद के, जे तहार हमार मिलन के गवाह बा।"
अरुण रंजू को चूमते हुए बोला," रंजू मोर जान, अभी से लेकर भोरे तक तहके सुते ना देब। आज पूरा रात तहार बूर में लांड घुसाके रखब। जब तलिक तू बस ना कहबू तहके चोदत रहब रानी।"
रंजू उसकी बात सुन कामुकता से ओत प्रोत हो गयी। उसने अरुण को फिरसे होठों का जाम पिला दिया। अरुण फिर रंजू को लेके बर्थ पर आ गया। वो खुद लेट गया और रंजू उसके ऊपर बैठ गयी। उसकी बूर अरुण के मुंह पर थी। रंजू उसके मुँह का एहसास पाते ही, ट्रैन के वेग के साथ हिलते हुए अपनी कमर हिला रही थी। उसकी बुर में दाने पर कमरबंद की लटकन अलग एहसास जगा रही थी। नीचे अरुण उसकी बूर की फांकों को अलग कर बूर के नमकीन पानी को चाभ रहा था। रंजू की कामुक सिसकियां और आँहें माहौल को और कर्णप्रिय बना रही थी। रंजू किसी किशोरी की तरह उत्साहित हो बूर को अरुण के पूरे चेहरे पर रगड़ रही थी। अरुण उसके चूतड़ों को लगातार भींच रहा था। रंजू खुद अपनी चूचियों को मसलते हुए बड़बड़ा रही थी," आह,...आह...उम्म्म्म.... ऊमम्म...मम्म.... उफ़्फ़... हाय....हे भगवान.... उहहह....चूस ल बुरिया के सब पानी। बचपन में चुच्ची से मीठा दूध पिहलस अब जवानी में बूर के नमकीन पानी। सब तहार बा....आहहहहहह।" अरुण अपनी माँ के मुंह से ये सब सुनके खुश था। वो बूर के पानी को पीते हुए, बूर के दाने को भी जीभ से रगड़ रहा था ताकि बूर और पानी छोड़ता जाए। रंजू अपने बेटे के मुंह में बूर घुसा देना चाह रही थी। वो इतनी कामुक हो चुकी थी, कि बूर से छुड़छुड़ा के तेज पानी की धार अरुण के मुंह और चेहरे पर रह रहके बरसा रही थी। अरुण अपनी माँ के अमृत जल को पीता रहा। उसने अपनी माँ की बूर को लगभग आधे घंटे तक चूसा। इस क्रम में रंजू दो बार जोर से झड़ी। रंजू थोड़ा थक के अरुण के बगल में लेट गयी।
अरुण उसके बाल संवारता हुआ बोला," का भईल माई, थक गईलु का, पानी पीले।" अरुण ने हाथ बढ़ाकर पानी का बोतल ले लिया। रंजू बोली," तू पिया द पानी।" अरुण को एक शरारत सूझी उसने पहले पानी को अपने मुंह में भर लिया फिर, रंजू को अपना मुंह खोलने का इशारा किया। रंजू ने वैसा ही किया। अरुण ने फिर उसे चुम्मा करते हुए सारा पानी रंजू के मुंह में डाल दिया। रंजू उस पानी को धीरे धीरे पूरा पी रही थी। अरुण ने फिर वैसा ही किया। अरुण का ये तरीका, रंजू को बहुत अच्छा लगा। दोनों ने आधे से ज्यादा बोतल ऐसे ही पिया। रंजू उठी और फिर अरुण के पैरों के बीच आ गयी, और उस आठ इंच के लॉलीपाप को घूर रही थी। रंजू को अपनी कोख से पैदा हुए इस लण्ड पर गर्व हो रहा था। अरुण का लण्ड उसके चेहरे की लंबाई के बराबर था। वो खुद उसके लण्ड से अपना चेहरा नाप रही थी। अरुण ये देख हँसा और बोला," का नापत बिया माई, तहार चेहरा से भी लंबा बा।"
रंजू अपनी कानी उंगली दिखा बोली," बेटा जब तू छोट रहला ना त एतना बड़का रहला। अब देख त, केतना भयंकर और ठोस हो गइल बा। हर औरत के सपना होखेला अइसन लांड मिले, जउन ओकरा शारीरिक सुख दे।" ऐसा बोल वो लण्ड के सुपाड़े को चमड़ी से आज़ाद कर चाटने लगी। अरुण रंजू के बाल पकड़ उसके होंठो पर लण्ड से चूता पानी ( प्री कम) लगा दिया। रंजू उसे चाटी तो पूरा चट कर गयी। उसे वो नमकीन पानी मस्त लग रहा था। रंजू अब उसके लण्ड को बड़ी ही शिद्दत और जज्बे के साथ फिरसे चूसने लगी। लण्ड उसका इतना बड़ा था कि रंजू बड़ी मुश्किल से आधा लण्ड ले पा रही थी। अरुण के पापा का तो वो पूरा गटक लेती थी। पर पापा का बेटा तो बहुत ही बड़ा लण्ड धारण किये था। रंजू किसी आज्ञाकारी छात्रा जैसे अरुण का लण्ड चूसे जा रही थी। रंजू अपनी जीभ का सही इस्तेमाल करते हुए आंड़ से लेके लांड के टोपे तक चाट रही थी।
रंजू सिसयायते हुए बोली," आह.... का मस्त लांड बा बेटा। अइसन निम्मन और स्वादिष्ट लांड कभू ना भेटात हमके। एगो पियासल औरत के हईं से बढ़के अउर का चाही।"
उसके थूक से पूरा लण्ड सनकर चमक रहा था। रंजू बीच बीच मे कोशिश करती की ज्यादा से ज्यादा लण्ड मुंह मे ले और वो इसमें कामयाब भी होती थी। जब लण्ड उसके गले तक जाता, तो वो कामुक नारी मुंह से गूं.... गूं .....गूं .... घघ SS की आवाज़ के साथ पूरा कोशिश करती। अरुण उसकी हौसला अफजाई भी करता था। रंजू के ठुड्ढी पर चेहरे पर काफी थूक निकला था, लेकिन उसकी रंजू को कोई परवाह नही थी। अरुण अभी भी पूरा लेटा हुआ था और रंजू अपने मुख मैथुन कला का निः शब्द प्रदर्शन कर रही थी। अरुण अपने मन में सोचा," कितनी प्यासी है ये औरत, इसके चेहरे इसकी आंखों में लण्ड की तड़प और भूख साफ दिख रही है। जाने मैंने इसपर पहले ध्यान क्यों नहीं दिया। जब ऐसी छिनार माँ घर में हो, तो बेटे का फर्ज़ है उसको गलत राह पर ना जाने दे और ऐसे में अपनी माँ को यौन सुख से वंचित ना रखे। बल्कि अपने जवान लण्ड से उसे चरम सुख और यौन संतुष्टि का पूरा मज़ा दे। कितना खुशनसीब हूँ मैं कि मेरी माँ एक बेहद प्यासी कामुक औरत है, जिसे लण्ड की सख्त जरूरत है।" ऐसे ही खयालों में वो रंजू के पीठ पर अपना पैर रख दिया। रंजू अभी भी उस मस्त लण्ड को किसी कुतिया की तरह चाट रही थी। रंजू की बूर अब लण्ड लेने के लिए तैयार हो चुकी थी। अरुण ने रंजू को इशारे से कुत्ती बनने का इशारा किया। रंजू लण्ड छोड़ फर्श पर चली गयी और साड़ी को बिछा के उस पर कुत्ती बन गयी। अरुण ," वाह... केतना चुदाबे के मन बा माई तहरा। तहराके इशारा कइनी कि तू कुत्ती बन गईलु। तू हमार कुत्ती बिया, तोहरा कुत्ती जइसन चोदब। साली रंडी के औलाद, भोंसड़ीवाली।"
अरुण ने फिर उसके पीछे आकर उसके बूर पर थूक दिया। रंजू की गाँड़ पर चपत लगाके, लण्ड से थूक फैलाया और बूर में बिना किसी चेतावनी के ठूस दिया। रंजू की बूर की फांके फैल गयी थी और बूर की पत्तियां लण्ड की गोलाई से चिपकी हुई थी। रंजू के मुंह से," आह...आह...आह...उम्म्मह ऐसी आवाज़ें गूंज रही थी। वो रंजू को पहले पूरी तरह लण्ड की आदि होने दिया। रंजू लण्ड के घुसने से पागल हो उठी थी। पिछले चौबीस घंटे से भी कम समय में वो पांच बार चुदी थी, और फिर भी लण्ड ऐसे ले रही थी जैसे पहली बार मिला हो। इस लण्ड की खास बात ये थी कि ये बेटे का लण्ड था। अरुण ने रंजू के चूतड़ों पर चटाक चटाक चपत लगाए और फिर अरुण ने उसकी गाँड़ में उंगली घुसा दी। रंजू गाँड़ में उंगली घुसने से चिंहुँक उठी और बोली," गाँड़ में काहे उंगली दे दिहलस। चला दे दिहलस त घुसा दे। अच्छा लागी बूर और गाँड़ मे एक साथ रही।" अरुण ने फिर रंजू के बूर में धक्के शुरू किए। अरुण बूर से पूरा लण्ड निकालके वापिस घुसाता। बूर से बार बार जब लण्ड घुसता और निकलता था तो, घर्षण से रंजू को बहुत मज़ा आ रहा था। उसकी गीली बूर और पानी छोड़ना शुरू कर दी।
अरुण," आह..... का कसल बूर बिया।आह..उम्ममम्ममम्म्, बूर के असल रानी तू बिया माई। लगातार चू रहल बा बूर से पानी। लांड फिसल फिसलके तहार बूर के कोना कोना चूमी। बूर के भोंसड़ा बन जाइ।"
बूर में कड़क लण्ड के एहसास, से रंजू मस्ती में डूबे जा रही थी। बूर की अंदरूनी दीवारों पर लण्ड का सख्त और कड़ापन महसूस जब हुआ तो रंजू की कमर अपने आप लण्ड को लेने के लिए आगे पीछे होने लगी। अरुण अब धीरे धीरे अपनी रफ्तार बढ़ाने लगा था। आखिर माँ की बूर की गर्मी उसके लण्ड को सेव रही थी। रंजू की कमर में बंधी कमरबंद, में कुछ झुनझुनी सी भी लगी थी, जो कि धक्कों के साथ बज रही थी। अरुण उसके कमरबंद को पकड़ तेज धक्के मार रहा था। अरुण के तमाचे भी उसके चूतड़ों को लाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। रंजू की बूर अब अचानक से अकड़ने लगी थी। वो तीसरी बार झड़ने वाली थी। रंजू की बूर की फड़कन महसूस कर अरुण भी बहुत देर टिक नहीं पाया। दोनों एक साथ झड़ गए। अरुण ने लण्ड का सारा सफेद पानी रंजू की बूर में ही डाल दिया। अरुण और रंजू पिछले चालीस मिनट से एक दूसरे को भोग रहे थे। अरुण जब झड़ गया, तो वो रंजू के बिछाए साड़ी पर ही बगल में लेट गया और रंजू उसके माथे को चूम ली और उसे अपने चूचियों से लगा ली। अरुण अपनी माँ के साथ प्रथम पड़ाव पार कर चुका था। उसने घड़ी देखी अभी तक बस साढ़े नौ बजे हैं। दोनों एक दूसरे में समाए थे। इस दफा अरुण को प्यास लगी तो, रंजू ने मुंह में भरके उसके मुंह में पानी दिया। ना जाने क्यों रंजू के मुंह से लगके वो पानी और मीठा हो चला था। रंजू ने बोतल खाली कर दी।अरुण," माई भूख लागल बा का?
रंजू बोली," हॉं, तहके भी त भूख लागल होई। बड़ा मेहनत कइले बारे, चल हम तहके खिया देत हईं।" दोनों फिर उठे और अरुण की गोद में रंजू बैठ गयी। रंजू ने फिर अपने हाथ से अपने बेटे को रोटी और सब्जी खिलाने लगी।जैसे एक अच्छी माँ अपने बेटे को प्यार से खाना खिलाती है। बस आज रंजू अपने निवाले में माँ की ममता के साथ कामुक स्त्री का व्यभिचार भी परोस रही थी। रंजू लोक लाज से परे अपने बेटे से बोली," अरुण तहके याद ह, बचपन में हम तहराके गोद में बइठा के खिलात रहनि। देखा आज फेर तहके, खिला रहल बानि। आज तहार माई लंगटे तहार गोदी में बइठके, तहरा खिला रहल बा। तू अब मादरचोद हो गइला बेटा। आपन माई के बूर चोदे बला।" ऐसा बोलके वो हसने लगी। रंजू की हंसी देख अरुण भी हँसा। चुकी वह खाना खा रहा था, तो हंसी की वजह से खाना स्वांस नली में चला गया, और उसे हिचकियाँ शुरू हो गयी। रंजू ने खाने की थाली एक तरफ रखी, और बेटे को पानी देते हुए बोली,"पी ले बेटा, हिचकी बंद हो जाई। " अरुण ने पानी पी पर हिचकी बंद नहीं हुई। वो रुक रुक के काफी पानी पी गया पर हिचकी बंद नही हुई। रंजू अब डर गई तो अरुण ने कहा," माई हमके हिक.... दोसर पानी हिक..क..चाही। पानी जउन हिक..... खारा होउ।"
रंजू बोली," अब खारा पानी कहां से लाई बेटा। ई ट्रैन में कहां मिली। तहके पता बा कहाँ मिली?
अरुण," हॉं..... हिक.... हम जानत बानि..... हिक.....। तहरा पास बिया।
रंजू समझ गयी अरुण उसके पेशाब की बात कर रहा है पर अनजान बनते हुए बोली," कहां बेटा, हमरा लंग नइखे बेटा। तू बताबा कहां बा??
अरुण," आपन दुनु ...हिक ....टांग फइला दे .....हिक...... माई,। फिर उसकी बूर को छूके बोला,"आपन ....हिक....पिया द।
रंजू फिर भी बोली," का पिलाई... बूर के पानी त एतना ना निकली बेटा।"
अरुण," माई, बूर के पानी ना, हिक...... पेशाब पिया द।
रंजू उसे देख मुस्कुराई और बोली," माई के पेशाब पिबु त हिचकी ठीक हो जाई का।"
अरुण," हाँ, माई हिक..... तहार पेशाब पियब त ठीक हो जाई।.....हिक....हिक....
रंजू बोली," ठीक बा तू लेट जो, हम जइसन मूतत बानी ना बईठके वसही तहरा मुंह में मूतब।" अरुण बिना एक पल गवाए लेट गया और रंजू उसके चेहरे के अगल बगल पैर रखकर बैठ गयी। उसकी बूर ठीक अरुण के खुले मुंह के सामने थी। रंजू उसकी ओर मुस्कुराके बोली," तैयार बारू का बेटा, मूती हम ?
अरुण बोला,' हॉं माई, छुड़छुड़ा द। हिक.....
रंजू अपनी बूर की फांक उंगली से फैलाके सीटी की मीठी सी आवाज़ के साथ बूर के ऊपर छोटे से छेद से पेशाब की धार मारने लगी। बूर से गिरता पेसाब छटक कर रंजू की जांघों और बूर के आसपास के हिस्से को तर कर गया। अरुण का चेहरा भी उस धार से गीला हो गया। रंजू ये देख निर्लज्जता से हंस रही थी। उसकी लापरवाह हंसी ने माहौल और भी कामुक और उत्तेजक कर दिया। अरुण अपनी माँ की बुर से फूटी पेशाब की सीधी धार मुँह में लेने लगा। बूर से जिस तेजी से पेशाब अरुण के मुंह में जमा हो रही थी, उसमें बुलबुले और झाग भी बन रहा था। अरुण उस मूत रूपी अमृत को गटक गटक कर पी रहा था। उस गर्म मूत की धार ने उसके गले की सिंकाई की। अपनी सगी माँ के पेशाब का खाड़ा स्वाद उसे गुर की तरह मीठा लग रहा था। रंजू," पी ले बेटा, माई के बूर से निकलल गरम गरम पेशाब। तहरा खातिर ही बूर में रखले रहनि जानू। माई के बूर से ताज़ा ताज़ा पेशाब पीके तहरा हिचकी ठीक हो जाई। बबुआ जेतना पीबा पी लआ। तहार जब जब मन करे, हमरा कह दिह हम गरम गरम पिला देब। हमरा भी पियाईबु का, तू अपन पेशाब। हमहुँ पीके देखत चाहेनि कि कइसन होखेला।"
अरुण की हिचकी अपनी माँ के मूत और बातों से दूर हो गयी। रंजू फिर अपनी गुलाबी बूर अरुण के मुंह से चटवा ली, ताकि पेशाब की बूंदे सब अरुण पी ले। अरुण उस साँवली सी गुलाबी बूर को चाटकर साफ कर दिया। अरुण ने फिर रंजू से कहा," माई, आजो हमार गोदी में, तहरा अब हम खाना खिया दी।" रंजू फिर बेटे की गोदी में बैठ गयी। और इस बार अरुण उसे खाना खिला रहा था। रंजू की खुलती जुबान और खुलते होठ के बीच जब अरुण निवाला डालता तो, बहुत सेक्सी अंदाज़ में वो मुंह से चबाती। कुछ जूठा उसके होठ के आसपास लगा हुआ था, जिसे अरुण ने रंजू को साफ करने बोला तो रंजू बोली," तू साफ कर दे ना," ऐसा बोलके अपना चेहरा आगे बढ़ा दिया। अरुण ने अपनी जीभ से उसके होठ के आसपास चाटके उसे साफ कर दिया। एक बेहद उत्तेजक माहौल में ये आग में घी का काम कर रहा था।
थोड़ी देर बाद दोनों ने खाना खत्म किया। रंजू ने फिर बेटे की उंगलियां चाट चाटकर साफ किया। दोनों ने फिर देखा कि मीठे में गुलाब जामुन था। रंजू ने वो गुलाब जामुन अपने होठों में रखी। फिर अरुण को अपने मुँह से आधा गुलाब जामुन खिलाई। अरुण रंजू की चूचियाँ मसलते हुए, गुलाब जामुन खा रहा था। रंजू एक बार फिरसे, बेटे के साथ काम लीला करना चाह रही थी। अरुण के गोद मे बैठ वो अपने चूतड़ों से उसका लण्ड घिसने लगी। अरुण ने रंजू की ओर देखा तो, रंजू ने अपनी आंखों से अगले संभोग दौर की अनुमति दे दी थी। रंजू अरुण की गोद में उसकी ओर मुंह करके बैठी हुई थी। अरुण उसकी बालों को पकड़ बोला," बोल का भईल माई रानी, फेर से बूर चुदाबे के मन कर रहल बा का?
बाल खिंचने की वजह से रंजू की गर्दन पीछे की ओर झुकी हुई थी। रंजू कामुकता से चिल्लाते हुए बोली," हॉं रे मादरचोद, चोद ना हमरा। तहार माई, तहार रंडी बिया। हमके गाली दे ना, गंदा गंदा गाली देके चोद। बहुत शरीफ और पवित्र बनके रह लेनी। अब हम तहरा साथे शराफत अउर पवित्रता के अंतिम क्रिया करम कर देनी ह। सच त ई बा कि तहार माई के हरदम लांड चाही। हमके अब कउनु अफसोस नइखे राजा, कि तहार लांड यानि बेटा जे हमार कोखिया से जनमल बा उहे हमरा चोद रहल बा। आह.....
अरुण रंजू के चूचियों और चूचकों को मीज रहा था। रंजू अपनी चूचियों को आगे कर उठाये थी, ताकि अरुण उनको खुल के उसे दबाए। रंजू की कामुक सिसकारियां और आँहें ट्रैन की धड़क धड़क के साथ, तालमेल बिठाए थी। अरुण अपनी माँ के चूचियों को उठाके चूचकों को मुंह में ले लिया। रंजू अपनी कड़े तने चूचक को अरुण के जीभ और तालू के बीच पिसते हुए महसूस कर रही थी। अरुण अपनी माँ के चूचक को आम की तरह चूस रहा था। रंजू की चूचियाँ इस चुसाई से एकदम कड़क हो चुकी थी। अरुण के सर को अपने बांहों में भरके सहलाते हुए अपना दूध पिलाना चाहती थी, पर उसकी दूध की टंकियां खाली थी। दोनों जैसे एक दूसरे के शरीर से सुख भोग रहे थे। अरुण ने रंजू की चूचियों पर कोई नाइंसाफी नहीं की। रंजू की दोनों चूचियाँ का बराबर रसास्वादन और मर्दन हो रहा था। रंजू अपने निचले होठ दांतों से दबाते हुए, अरुण की ओर प्यासी आंखों से देख रही थी, जैसे कह रही हो कि इन चूचियों से आज दूध निकाल के पी जाओ। अरुण जब उसके एक चूचक को मुँह में रखकर चूसता था, तो दूसरे चूचक को उंगलियों से छेड़ता था। रंजू अपनी चूचियों पर होते हरकत और स्पर्श से उत्तेजित हो बूर से पानी छोड़ रही थी। वो खुद अपनी चूचियों को रह रहके हिलाकर अरुण को उकसा भी रही थी। रंजू की लगातार रिसती बूर को अरुण ने छुवा तो, उसकी पूरी हथेली गीली हो चुकी थी। ऐसा गीलापन और इतना गीलापन शायद ही उसने किसी का देखा या सोचा होगा। उसने रंजू को अपनी गीली हथेली दिखाई और पूछा," केतना पानी छोड़ रहल बिया तहार बुरिया माई, एतना गीला बा, जइसे बुझाता कि तू मूत दिहलस। तहरा कउनु बीमारी त नइखे? अरुण चुटकी लेते हुए बोला। रंजू उसकी आँखों में देख बोली," हमार बूर शुरू से अइसन रहला राजा बेटवा। जबसे हमार महीना/माहवारी शुरू भईल, तबसे हमार बूर असही चुवेला। अउर जब चुदाई होखेला ना, तब त अईसे बुझाला की केहू बांध खोल देले बा। ई बीमारी ना, लांड खातिर बूर ज्यादे तैयारी कर रहल बिया।" ऐसा बोल उसने मुस्कुराते हुए अरुण को अपने चूचियों के बीच सटा लिया।
अरुण ने कहा," फेर त तहार बूर में लांड दिहे के पड़ी। ऐसा बोलके उसने रंजू को चूतड़ों से पकड़के उठाया और उसकी मचलती बूर में लण्ड घुसेड़ दिया। रंजू की नशीली आँखे लण्ड घुसने से और भी नशीली हो उठी थी। वो चुदाई के नशे में अपने ही होठ को दांतों तले दबा रही थी। रंजू अपने बाल ठीक करने दोनों हाथ ऊपर की, तो उसकी बाल से भरे कांख दिखने लगे जिनमें थोड़ा थोड़ा पसीना आ रहा था। रंजू वापिस जब लण्ड लेके नीचे बैठी तो अरुण उसके बगलों/ काँखों को देख उसे अपने करीब खींच सूंघने लगा। रंजू की कांख की गंध उसे, और उत्तेजना प्रदान करने लगी। अरुण की जीभ कब निकलकर उसकी कांख चाटने लगी पता ही नहीं चला। रंजू अपनी दोनों बांहे उठाये उसे पूरा सहयोग दे रही थी। उसकी कांख में पसीने की बूंदे, अरुण के जीभ पर नमकीन और रोमांचक स्वाद दे रहा था। उसके कांख का सांवलापन देख उसे और अधिक उत्तेजना हो रही थी। इस बीच अरुण उसकी बूर में धक्के भी लगा रहा था। रंजू की बूर बहुत गर्म थी, जैसे कोई कोयले की भट्ठी। उसकी बूर लण्ड को अपनी गिरफ्त में ली हुई थी। ऐसा लग रहा था, कि बूर ही लण्ड को चूस रही है। अरुण का लण्ड रंजू की बूर को फैला उसकी बच्चेदानी को छू रहा था। ऐसे में रंजू उत्तेजित हो खुद भी कमर हिला रही थी, जिससे बूर का दाना रगड़ खा रहा था। तभी रंजू झड़ने लगी, और अरुण ने लण्ड निकाल लिया, उसकी बूर से काफी सारा पानी मूत की तरह बह निकला। रंजू की चरमसुख से निकली कामुक आँहें ट्रैन के शोर में भी दब नहीं सकी। अगर कोई बाहर होता तो उसे पता चल जाता कि अंदर संभोग की प्रक्रिया चल रही है। अरुण का लण्ड उसकी जाँघे सब उस पानी से भीग चुका था। अरुण रंजू को अपनी बांहों में छुपा लिया था। रंजू कुछ देर तक सिसकियां लेते हुए, अरुण के कंधे पर सर टिकाए बैठी रही। थोड़ी देर बाद, रंजू बोली," हमार त हो गइल, लेकिन हमार मुसवा बेटा के मुसवा अभी तक शांत ना भईल। हम अब कुत्ती बन जात बानि, तू खड़ा होके हमके पाछे से चोद ले बेटा।" ऐसा बोलके रंजू उसकी गोद से उठी और फिर फर्श पर बिछी नई साड़ी पर घुटनों और हाथ के बल कुतिया बन गयी। अरुण अपना लण्ड मसलता हुआ उसके पीछे आया और रंजू की गाँड़ को सहलाने लगा। फिर उसने एक दो थप्पड़ लगाए उसकी गाँड़ पर, रंजू उस थप्पड़ की चोट से आँहें भर रही थी। अरुण चुदाई के नशे में बोला," एतना सुंदर गाँड़ तहार, अइसन बुझाला जइसे पहाड़, एक दिन आयी एकरो बेरा, जब थूक लगाके घुसाईब लांड।"
रंजू बोली," ले लिहा राजा हमार कुल जोवन के खज़ाना, चोद ल बूर, मरबाईब गाँड़ एक दिन लेकिन आज ना।"
अरुण ने फिर लण्ड पीछे से उसकी फूली हुई बूर पर लगा दिया। रंजू अपने हाथ भींचे बूर में घुसते लण्ड को महसूस करने लगी। थोड़ी देर बाद बूर में लण्ड पूरी तरह घुस चुका था। अरुण रंजू के चूतड़ों को थामे, लण्ड से उसकी ठुकाई करने लगा। बूर की अंदरूनी दीवार एकदम कसी और चिकनाहट से भरी हुई थी। लण्ड सटा सट अंदर बाहर हो रहा था। एक युवा लड़का अपनी माँ की बूर चोद रहा था, इससे बेहतर कामुक दृश्य नहीं हो सकता। रंजू लण्ड के एहसास से फिर से जोश में आने लगी। अरुण उसकी बूर में लण्ड घुसा घुसा के एकदम अंतिम गहराई तक ले गया।
रंजू अपनी कमर आगे पीछे कर, उसको सहयोग दे रही थी। कोई पंद्रह मिनट की चुदाई के बाद, अरुण का लण्ड अकड़ने लगा, वो चिल्लाते हुए बोला," उफ़्फ़फ़फ़... आह माई हमार गिरे वाला बा, ओह्ह चूस रहल बा तहार बूर हमार लांड के रंडी साली। बेटा के मादरचोद बना देले बा तू।" रंजू बोली," हमार भी छूटे वाला बा फेर से बेटा, बेटा माई के साथे झड़िहा। आह..ऊऊह उ ....उ ......उ.....
अगले कुछ क्षणों के बाद, दोनों फिर झड़ गए। अरुण ने लण्ड का पानी उसकी बूर में ही निकाल दिया। रंजू भी झड़ के हांफ रही थी। रंजू अरुण की ओर घूम के, पीठ के बल लेट गयी। अरुण रंजू के ऊपर ही लेट गया, और रंजू के स्तनों के उपर सर रख दिया। रंजू उसका माथा चूम, उसके सर को सहलाने लगी। कल से लेकर आज तक दोनों काफी खुल चुके थे। रंजू के मन में एक अजीब सी संतुष्टि थी।
रंजू और अरुण का ये कामुक मिलन, रिश्ते नातों से परे था। सच कहते हैं स्त्री के लिए पुरुष हर मर्यादा तोड़ सकता है, लेकिन स्त्री जब अपनी लाज शरम छोड़, मर्यादाओं की सीमाएं तोड़ देती है तो, अवैध संबंध का मज़ा ही कुछ और हो जाता है। ऐसे में अवैध संबंध की पूरी जिम्मेदारी स्त्री अपने हाथों में लेना चाहती है। रंजू भी अपने सगे बेटे के साथ हर मर्यादा से ऊपर उठकर अवैध संबंध को वैध करने की कोशिश में थी।
Jabardast update bhai
 

Enjoywuth

Well-Known Member
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Just out of world update bhai.. Sach main itna sab likhne ke liye kitna sochna padta hai.. Aur Kitni mehnat lagti hai.. Wakia bahut accha update but mutra ka sevan jee thoda khata kiya baki sab ek number lajwab

Ab ranju ko pata chal gaya ki arun ne nitu ko bhi choda hai.. Toh ab kaise arun ghar ja kar annu aur nitu ka karta hai ya un dono ko chod deta ha..

Anju bhi becahri pati ke hote hui bhi akeli ji rahi hai uska sahara bhi ab arun hi hai

Dekte haii uska dil toot ta hai ya arun koi rasta nikal leta hai
 
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