• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
  • Poll closed .

big king

Active Member
621
1,093
123
अध्याय - 150
━━━━━━༻♥༺━━━━━━
दिन ऐसे ही गुज़रने लगे।
गांव में अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य अच्छे तरीके से चलता रहा। गांव के लोग इस सबसे बड़ा खुश और उत्साहित थे। हर तरफ इसी की चर्चा होती थी। मैं और रूपचंद्र निर्माण कार्य की देख रेख में लगे हुए थे। ठंड अब ज़्यादा ही होने लगी थी जिसकी वजह से धूप अब कम ही देखने को मिलती थी। हर तरफ धुंध सी छाई रहती थी। काम करने वालों को तो मेहनत करने से गर्मी मिलती थी जिसकी वजह से उन्हें मज़ा आता था लेकिन जो बैठे हुए सिर्फ देखने वाले थे उन्हें ठंड कंपाने लगी थी।रूपचंद्र के द्वारा ही मुझे पता चल गया था कि उसके घर में उसके बड़े ताऊ की लड़कियों के ब्याह की तैयारियां होने लगीं हैं। उसकी बहनों के ससुराल वालों ने ब्याह की लग्न बनवा ली थी और सवा महीने बाद शादी होनी थी। दोनों बहनें एक ही घर में ब्याही जाने वाली थीं इस लिए ज़्यादा परेशानी की बात नहीं थी। इस बीच रूपचंद्र के बहुत ज़ोर देने पर मैं एक दो बार उसके घर भी गया। उसके घर वालों ने बहुत ही अच्छे ढंग से मेरा स्वागत सत्कार किया था। रूपा ने भी छुप कर मुझे देखा था।इधर हवेली में भी अब सामान्य हालात थे। मेनका चाची सबके सामने पहले की ही तरह खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश करती रहती थीं। मां भी उनसे तरीके से ही बातें करती थीं। कुसुम तो भोली और मासूम थी, अतः जल्दी ही वो अपने रंग में आ गई थी और पहले की ही तरह अपनी चंचलता से सबका मन मोहती रहती थी।मैं भी सबके बीच सामान्य ही था। एक तरफ रूपा के प्रति प्रेम उमड़ रहा था जिसके चलते मन में कई तरह के मीठे ख़याल उभरने लगते थे तो वहीं दूसरी तरफ अनुराधा का ख़याल आते ही दिल में एक टीस सी उभर आती थी। मैं हर रोज़ उसके विदाई स्थल पर जाता था और कुछ देर वहां बैठ कर उसकी यादों में खो जाता था। वहीं से सरोज काकी से मिलने जाता और फिर उसका हाल चाल ले कर खेतों की तरफ निकल जाता। रात को जब खा पी कर अपने कमरे में सोने आता तो मन देर रात तक जाने कहां कहां भटकता रहता और मैं जाने कैसे कैसे ख़यालों में खोता रहता था।रागिनी भाभी के बारे में जब भी ख़याल आता तो मेरे जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ जाती थी। ना चाहते हुए भी मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ये नियति का कैसा खेल है कि जिस भाभी के प्रति मेरे अंदर सिर्फ आदर और सम्मान की ही भावना है उनके साथ नियति मेरा ब्याह करवाने पर तुल गई है। इसमें कोई शक नहीं कि उनके बेहतर जीवन के लिए सबने जो फ़ैसला किया था वो अपनी जगह सर्वथा उचित था लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इस रिश्ते के प्रति मन में अब भी अजीब से ख़याल उभरते थे।मैं तो रूपा की सहमति पर भाभी से ब्याह करने को राज़ी हो गया था लेकिन अक्सर सोचता था कि क्या भाभी इस रिश्ते को दिल से स्वीकार करेंगी? मैं जानता था कि अंततः उन्हें भी इस रिश्ते को स्वीकार करना ही पड़ेगा लेकिन मैं ये भी सोचता था कि उनका राज़ी होना एक मज़बूरी ही होगी। यानि दिल से वो यही चाहती हैं कि उनका मुझसे ब्याह न हो।अजीब से हालात हो गए थे। अजीब सी दुविधा हो गई थी। अजीब से धर्म संकट में फंस गए थे हम दोनों। कुछ दिनों से मेरा बहुत मन कर रहा था भाभी से मिलने का और उनसे इस बारे में बात करने का लेकिन फिर ये सोच कर हिम्मत जवाब दे जाती थी कि आख़िर कैसे नज़र मिला सकूंगा उनसे? मुझे अपने पास आया देख कर कहीं वो मेरे बारे में ग़लत न सोच बैठें। कहीं वो ये न सोच बैठें कि मेरे मन में पहले से ही उनके बारे में ग़लत सोच थी और मैं पहले से ही ये सब चाहता था। जबकि सच तो यही था कि मेरे मन में आज से पहले कभी उनके बारे में ऐसा कुछ भी नहीं था। मैं ये मानता हूं कि एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर उनकी तरफ आकर्षित हो जाया करता था लेकिन इसमें मेरा क्या दोष था? एक तो मेरा चरित्र ही ऐसा था और दूसरे वो थीं ही इतनी सुंदर कि कोई भी उनकी तरफ आकर्षित हुए बग़ैर नहीं रह सकता था।मैं जानना चाहता था कि भाभी इस बारे में क्या फ़ैसला करती हैं और ख़ास कर इस बारे में क्या सोचती हैं? कभी कभी मैं खुद को अपराधी सा महसूस करने लगता था। मैं अपनी भाभी को बताना चाहता था कि मेरे मन में ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आज है। हम दोनों के घर वालों ने भले ही हमारा आपस में विवाह कर देने का फ़ैसला ले लिया है लेकिन इसके बावजूद मैं उनके बारे में ग़लत नहीं सोच सकता हूं। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मेरे दिल में आज भी उनके प्रति वैसी ही मान सम्मान की भावना मौजूद है जैसे हमेशा से थी। मेरा उनसे ब्याह होना बस नियति की ही मर्ज़ी थी, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। इस लिए भगवान के लिए वो इस संबंध के चलते मेरे बारे में ऐसा वैसा कुछ भी ना सोचें।मैं कुछ दिनों से इस सबके बारे में इतना सोचने लगा था कि मेरी हालत अब अजीब सी हो गई थी। मैं बहुत ज़्यादा परेशान, चिंतित और बेचैन रहने लगा था। इस बात को मेरे घर वालों ने भी महसूस किया। मां ने तो एक दिन मुझसे पूछा भी लेकिन मैंने ये सोच कर उन्हें कुछ नहीं बताया कि बेवजह ही वो परेशान और चिंतित हो जाएंगी। हालाकि वो मेरे ना बताने पर भी फिक्रमंद हो उठीं थीं, और फिर एक दिन।"क्या बात है बेटा?" मेरे कमरे में आ कर मां ने पूछा____"कई दिनों से देख रही हूं तुझे। तू कुछ परेशान और गुमसुम सा नज़र आने लगा है। आख़िर ऐसी कौन सी बात है जिसके चलते तेरी ये हालत हो गई है? मैंने दो दिन पहले भी तुझसे पूछा था लेकिन तूने कुछ नहीं बताया। आख़िर बात क्या है मेरे लाल? क्या अपनी मां को नहीं बताएगा? क्या तू चाहता है कि तेरी मां तुझे ऐसी हालत में देख कर चिंतित हो उठे और दुखी हो जाए?""नहीं मां।" मैंने अधीरता से कहा____"मैं ये सपने में भी नहीं चाह सकता कि आप किसी बात से दुखी हो जाएं।""तो फिर बता ना बेटा।" मां ने अधीर हो कर कहा____"आख़िर किस बात से तू इतना परेशान दिखने लगा है? कौन सी ऐसी बात है जो तुझे अंदर ही अंदर परेशान किए हुए है? क्या अनुराधा की वजह से तेरी ये हालत है?""नहीं मां।" मैंने कहा____"उसकी वजह से नहीं है। उससे तो मैं रोज़ ही मिलता हूं और अपने दिल की बातें भी उसे बताता हूं। मेरी परेशानी कुछ और है मां।""तो बता ना बेटा।" मां एकदम व्याकुल सी हो कर बोलीं____"कौन सी परेशानी हो गई है मेरे बेटे को?""रागिनी भाभी।" मैंने गंभीरता से कहा____"हां मां, भाभी की वजह से परेशान रहता हूं आज कल।""उसकी वजह से?" मां एकदम से चौंकी____"पर उसकी वजह से क्यों बेटा? कहीं तू इस वजह से तो नहीं परेशान है कि हम उससे तेरा ब्याह करवा देना चाहते हैं?""नहीं मां, ऐसी बात नहीं है।" मैंने कहा___"बात ये है कि इस रिश्ते के संबंध में वो क्या सोचती होंगी? इससे भी बढ़ कर मेरे बारे में क्या सोचती होंगी?""वो क्या सोचेगी?" मां ने कहा____"यही ना कि ये कैसी किस्मत है कि उसे अपने देवर से ब्याह करना पड़ रहा है? मैं मानती हूं बेटा कि उसके लिए भी इस रिश्ते को स्वीकार करना आसान नहीं होगा लेकिन ये भी तो सच ही है कि ऐसा हम इसी लिए करना चाहते हैं क्योंकि इसी में उसका भला है। इसी में उसका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में खुश रह सकेगी। तू इस बारे में ज़्यादा मत सोच। मैं मानती हूं कि ये रिश्ता शुरू शुरू में अजीब लगेगा लेकिन बाद में तुम दोनों इस रिश्ते को दिल से अपना कर एक दूसरे से प्रेम करने लगोगे।""ये सब तो बाद की बातें हैं मां।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"लेकिन इस वक्त मेरी परेशानी ये है कि मैं खुद को उनका अपराधी सा महसूस करता हूं। मेरे चरित्र के बारे में तो उन्हें भी पता रहा है। ऐसे में अब जब उनसे ब्याह करने का फ़ैसला हो गया तो कहीं न कहीं वो मेरे बारे में ये भी सोचेंगी कि मैं शुरू से ही उनके बारे में ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा और अब जब उनसे ब्याह करने की बात हुई तो मैंने झट से इस रिश्ते को क़बूल कर लिया।""ऐसा कुछ भी नहीं है बेटा।" मां ने मेरे बाएं गाल को प्यार से सहलाते हुए कहा____"तू बेवजह ही ये सब सोच कर खुद को दुखी कर रहा है। तू भी जानता है कि तेरी भाभी ने तुझे कभी ग़लत नहीं समझा है। अगर वो तुझे ग़लत समझती तो वो कभी एक पल के लिए भी तेरा पक्ष न लेती और ना ही तुझे एक अच्छा इंसान बनने के लिए तुझ पर ज़ोर डालती। इतना ही नहीं, तेरे साथ कभी वो खेतों पर घूमने भी न जाती। उसे तेरे चरित्र का भले ही पता था लेकिन उसे तुझ पर भरोसा भी था कि तू उसके प्रति कभी ग़लत नहीं सोच सकता है। इसी लिए तो वो तुझे इतना मानती थी और तेरे हर दुख में तेरी ही तरह वो भी दुखी हो जाती थी। जब तेरा बड़ा भाई गुज़रा तो वो सदमे में चली गई थी। हम सबने पूरी कोशिश की थी उसको दुख से उबारने की लेकिन तेरी वजह से वो अपने उस असहनीय दुख से उबर गई। वो अक्सर मुझसे कहती थी कि अगर वैभव जैसा उसका देवर न होता तो आज वो अपने दुख से बाहर न निकल पाती। वो ये भी कहा करती थी कि उसे गर्व है कि ईश्वर ने उसे वैभव जैसा देवर दिया है जो उसके चेहरे पर खुशी लाने के लिए कुछ भी कर सकता है। ये सारी बातें यही ज़ाहिर करती हैं मेरे बेटे कि वो कभी तेरे बारे में ग़लत नहीं सोच सकती। तेरे साथ उसके ब्याह होने वाली बात से भी वो यही सोचती होगी कि इसमें तेरा कोई दोष नहीं है। जो भी हो रहा है उसमें सबसे ज़्यादा क़िस्मत का हाथ है। इस लिए तू ये सब फ़िज़ूल की बातें सोच कर ख़ुद को दुखी मत रख।""क्या मैं एक बार भाभी से मिल आऊं?" मैंने धड़कते दिल से मां को देखते हुए उनसे पूछा____"मैं मानता हूं कि मेरा अब उनसे मिलना उचित नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं एक बार उनसे मिलना चाहता हूं। उनके सामने घुटनों पर बैठ कर उनसे कहना चाहता हूं कि मेरे मन में उनके प्रति ना पहले कभी कोई ग़लत भावना थी और ना ही आगे कभी हो सकती है। इस रिश्ते के बाद भी उनके प्रति मेरे दिल में वैसी ही मान सम्मान की भावना रहेगी जैसे हमेशा से रही है।"मेरी बातें सुन कर मां की आंखें भर आईं और अगले ही पल उनकी आंखों से आंसू के कतरे छलक पड़े। उन्होंने लपक कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया। मैं भी किसी छोटे से बच्चे की तरह उनसे छुपक गया। एक असीम सुख और शांति का एहसास हुआ मुझे।"मैं जानती हूं कि तेरे मन में रागिनी के प्रति बहुत ही ज़्यादा आदर और श्रद्धा जैसा भाव है।" मां ने मुझे खुद से छुपकाए हुए ही कहा____"और सच कहूं तो मुझे इस बात के लिए तुझ पर गर्व है। ख़ैर, तू अपनी भाभी से मिलना चाहता है ना तो ठीक है। मैं आज ही तेरे पिता जी से इस बारे में बात करूंगी और उन्हें समझाऊंगी कि वो इसके लिए तुझे चंदनपुर जाने की अनुमति दे दें।""ओह! मां।" मैंने खुशी से उन्हें जोरों से कस लिया____"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मां। मैं बता नहीं सकता कि आपके मुख से ये सुन कर मुझे कितना सुकून मिला है।""मां को धन्यवाद करता है पागल।" मां ने मुझे खुद से अलग कर के कहा____"अरे! मां तो होती ही है अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए। ख़ैर अब तू आराम कर और इस बारे में अब कुछ भी सोच कर खुद को परेशान मत कर। चल अब जाती हूं मैं।"मां ने मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और फिर वो कमरे से चली गईं। इतने दिनों से जिन बातों को सोचते हुए मैं परेशान था वो अब मानों किसी जादू के जैसे छू मंतर हो गईं लगने लगीं थी। मेरा मन अब बहुत हल्का महसूस हो रहा था।✮✮✮✮"अरे! शालिनी तू कब आई अपनी ससुराल से?" रागिनी अपनी बचपन की सहेली को अपनी तरफ आते देख एकदम से चौंकी थी।घर के पीछे कुछ खाली जगह थी जिसे चारो तरफ से लकड़ी की ऊंची दीवार बना कर घेरा हुआ था। उस खाली जगह में एक तरफ कुवां था और दूसरी तरफ कुछ पेड़ पौधे लगे हुए थे जिनमें से कुछ अमरूद के, कुछ कटहल के और एक दो केले के पेड़ थे। रागिनी खाली समय में ज़्यादातर यहीं आ कर बैठ जाया करती थी। गांव में किसी के घर जाना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था। एक शालिनी ही थी जिसके घर वो चली जाया करती थी किंतु उसकी शादी के बाद वहां भी जाना बंद हो गया था। अपने चाचा जी के घर भी चली जाती थी जहां पर वो अपनी भाभियों के पास थोड़ा समय गुज़ार लेती थी।"आज ही आई हूं।" शालिनी ने उसके क़रीब आ कर कहा____"तेरे बारे में मां ने बताया तो तुझसे मिलने चली आई। सच कहूं तो तेरे बारे में जब वो सब सुना था तो बहुत दुख हुआ था मुझे। यकीन ही नहीं हुआ था कि मेरी इतनी अच्छी सहेली के साथ ऊपर वाला इस तरह का अन्याय कर सकता है।""सब किस्मत की बातें हैं शालिनी।" रागिनी ने फीकी सी मुस्कान होठों पर सजा कर कहा____"ख़ैर तू बता, कैसी है तू और जीजा जी कैसे हैं?""मैं ठीक हूं और तेरे जीजा जी भी ठीक हैं।" शालिनी ने कहा____"मुझे वंदना भाभी ने बताया कि तेरा फिर से ब्याह करने का फ़ैसला किया है चाचा जी ने?"शालिनी की इस बात पर रागिनी कुछ बोल ना सकी। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नज़र आए। शालिनी ग़ौर से उसको देखने लगी थी।"उन्होंने बताया कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया है।" शालिनी ने आगे कहा____"मैं तो उनके मुख से ये सब सुन कर हैरान ही हो गई थी। वैसे सच कहूं तो मुझे तेरा फिर से ब्याह होने की बात सुन कर बहुत खुशी हुई है। ऊपर वाले से यही प्रार्थना करती थी कि मेरी सहेली के जीवन को फिर से खुशियों से भरने का कोई इंतज़ाम कर दो और देखो ऊपर वाले ने मेरी प्रार्थना सुन ली। बस यही जान कर थोड़ी हैरानी हुई कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया चाचा जी ने।""पता नहीं ऊपर वाला मुझसे क्या चाहता है शालिनी?" रागिनी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"जो कुछ मैंने सपने में भी नहीं सोचा था वही सब मेरे साथ करता जा रहा है वो। समझ में नहीं आ रहा अपनी ऐसी किस्मत पर रोऊं या खुश होऊं?""अरे! ऐसा क्यों कह रही है तू?" शालिनी ने हैरानी से उसे देखते हुए कहा____"मैं मानती हूं कि ऊपर वाले ने इसके पहले तेरे साथ जो किया था वो बहुत ही ग़लत और दुखदाई था लेकिन ये तो बहुत ही अच्छी बात है कि तेरा फिर से ब्याह हो जाएगा और तेरा दुखों से भरा ये जीवन फिर से खुशियों से भर जाएगा।""कहना बहुत आसान होता है शालिनी।" रागिनी ने उदास भाव से कहा____"लेकिन अमल करना बहुत मुश्किल होता है। अपने ही देवर को अब पति की नज़र से देखना अथवा सोचना बहुत ही अजीब सी अनुभूति कराता है मुझे।""हां मैं समझती हूं इस बात को।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"समझ सकती हूं कि इस बारे में तेरे मन में जाने कैसे कैसे ख़याल उभरते होंगे लेकिन मैं तुझसे यही कहूंगी कि देवर से ब्याह करने का मामला कोई नया नहीं है। दुनिया में अक्सर परिस्थितियों को देख कर लोगों ने ऐसे निर्णय लिए हैं। तुझे भी इस बात को समझना चाहिए और फ़िज़ूल की बातें अपने मन से निकाल कर सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचना चाहिए। ऊपर वाले की कृपा से तुझे इतना अच्छा ससुराल मिला है। अपनी बेटी की तरह प्यार करने वाले इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं और सबसे बड़ी बात तेरा भला चाहते हुए तेरे जीवन को फिर से संवारने के लिए वो तेरा फिर से ब्याह कर देना चाहते हैं। सबके नसीब में ऐसे इंसान नहीं होते रागिनी जो अपनी बहू के लिए इतना कुछ सोचें और करने लगें। क्या हुआ अगर देवर से ब्याह हो जाएगा तेरा? शुरू शुरू में ज़रूर अजीब लगेगा लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। मुझे तो इस बात का भी यकीन है कि आगे चल कर तू खुद अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात से यही सोचने लगेगी कि ये अच्छा ही हुआ।""मतलब तुझे भी लगता है कि मेरा अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात हर तरह से उचित है?" रागिनी ने शालिनी की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा।"हां बिल्कुल।" शालिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तेरे भले के लिए वो जो भी कर रहे हैं एकदम सही कर रहे हैं। तुझे भी बेकार की बातें नहीं सोचनी चाहिए और इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाना चाहिए। अपने ही पैरों से अपनी अच्छी किस्मत को ठोकर मत मार।"रागिनी अपलक देखती रह गई शालिनी को। उसे समझ ही न आया कि अब क्या कहे? दिलो दिमाग़ में एकाएक ही हलचल सी मच गई थी।"अच्छा ये तो बता मेरे होने वाले जीजा जी अभी भी वैसे ही हैं क्या?" शालिनी ने सहसा मुस्कुराते हुए पूछा____"या अब बदल गए हैं वो? और हां, इस रिश्ते के बारे में उनका क्या ख़याल है?"रागिनी को समझ ना आया कि वो अपनी सहेली से वैभव के बारे में क्या बताए? शालिनी के मुख से होने वाले जीजा जी सुन कर ही उसके समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई थी। मन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभरने लगे थे।"क्या हुआ?" उसे कुछ न बोलता देख शालिनी ने जैसे उसे ख़यालों से बाहर खींचा____"चुप क्यों हो गई तू? बता ना मेरे होने वाले जीजा जी के बारे में?""व...वो अब पहले से बदल गए हैं।" रागिनी ने झिझकते हुए बड़ी मुश्किल से कहा।"हाय राम! क्या सच में?" शालिनी ने आश्चर्य से आंखें फैला कर रागिनी को देखा____"बड़े आश्चर्य की बात है ये। क्या वो सच में बदल गए हैं?"रागिनी अजीब सा महसूस करने लगी थी। शालिनी के पूछने पर उसने सिर्फ हां में सिर हिला दिया। ये देख शालिनी को फिर से हैरानी हुई। उसकी आंखों के सामने वैभव का चेहरा चमक उठा और साथ ही गुज़रे समय की यादें भी।(दोस्तो, ये वही शालिनी है जिसके बारे में वैभव ने अपनी भाभी से उस समय मज़ाक करते हुए ज़िक्र किया था जब वो अपनी भाभी को ले कर उनके मायके चंदनपुर जा रहा था।)"क्या हुआ?" शालिनी को कहीं खो सा गया देख रागिनी ने उसे देखते हुए पूछा____"अब तू कहां खो गई?""व...वो मैं न।" शालिनी एकदम से हड़बड़ा गई। फिर जल्दी से खुद को सम्हालते हुए बोली____"अरे! मैं तो ये सोचने लगी थी कि क्या सच में मेरे होने वाले जीजा जी बदल गए हैं? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा।""क्यों नहीं हो रहा भला?" रागिनी को जाने क्यों उसकी बात से बुरा महसूस हुआ जिसके चलते उसने सहसा उसे घूरते हुए कहा____"और हां मुझे पता है कि तू भी उनसे नैन मटक्का कर चुकी है।""अ....अरे! ये...ये क्या कह रही है तू?" शालिनी ने बुरी तरह हड़बड़ाते हुए रागिनी को हैरत से देखा____"मेरा उनसे इस तरह का कोई चक्कर नहीं था। पता नहीं क्यों ऐसा बोल रही है तू?""मैं ऐसा इस लिए कह रही हूं क्योंकि मुझे उन्होंने ही बताया था जिनसे तेरा नैन मटक्का चला था।" रागिनी ने कहा____"और इतना तो मैं समझती ही हूं कि इस मामले में वो महाशय कितने पहुंचे हुए थे। अगर उन्होंने तेरा ज़िक्र किया था तो मेरे लिए ये यकीन कर लेना सहज ही था कि तेरा उनसे चक्कर था।"शालिनी भौचक्की सी देखती रह गई रागिनी को। एकदम से ही वो नज़रें चुराने लगी थी। फिर उसने अपनी हालत को काबू किया और चेहरे पर खुशी के भाव लाते हुए कहा____"हां यार, मेरा उनसे चक्कर चल गया था लेकिन यकीन कर बस थोड़ा सा ही चल पाया था। बात इतनी भी नहीं बढ़ी थी कि हमारे बीच कुछ ग़लत हो जाता।"रागिनी को याद आया कि वैभव ने भी उससे ऐसा ही कुछ कहा था। शालिनी के आख़िरी वाक्य से जाने क्यों रागिनी को राहत सी महसूस हुई।"ख़ैर ये सब छोड़।" शालिनी ने एकदम सामान्य भाव से कहा____"और ये तो बता कि मेरे होने वाले जीजा जी क्या सच में ही बदल गए हैं?""तू तो ऐसे कह रही है जैसे वो कभी बदल ही नहीं सकते थे?" रागिनी को फिर से बुरा लगा, इस लिए उसने उसे घूरा____"वैसे भी उन्होंने कोई क़सम तो खाई नहीं थी कि वो कभी बदलेंगे ही नहीं।""हां ये तो है।" शालिनी ने कहा____"लेकिन मैं ये जानने को उत्सुक हूं कि वो बदल कैसे गए और बदले भी हैं तो कितना बदले हैं? क्या एकदम से शरीफ़ ही बन गए हैं वो?""हां कुछ ऐसा ही है।" रागिनी के ज़हन में गुज़रे समय की ढेर सारी बातें जैसे चमक उठीं और साथ ही आंखों के सामने ढेर सारी तस्वीरें भी।"कुछ ऐसा ही है का क्या मतलब है?" शालिनी जैसे बाल की खाल निकालने पर उतारू हो गई____"जो इंसान हमेशा मौज मस्ती करता था और भी ना जाने क्या क्या करता था वो अचानक से शरीफ़ कैसे बन गया?""इसके जवाब में बस इतना ही कहूंगी कि हर इंसान वक्त के साथ बदल जाता है।" रागिनी ने थोड़ा बेचैन भाव से कहा____"जीवन में कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं जिसके चलते इंसान को खुद पर बदलाव करना पड़ता है।""हां ये तो तू सही कह रही है।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"वैसे उनका इस तरह से बदल जाना तेरे हिसाब से ठीक है या नहीं?""ठीक ही है।" रागिनी ने कहा____"अगर कोई अच्छा इंसान बन जाए और अच्छे अच्छे कर्म करने लगे तो भला इससे अच्छा क्या हो सकता है?""यानि मेरे होने वाले जीजा जी अब अच्छे इंसान बन गए हैं।" शालिनी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"और अब अच्छे अच्छे काम करने लगे हैं। ये तो कमाल ही हो गया रागिनी। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो तुम्हारे लिए अच्छे बन गए हैं? आख़िर अब तुमसे ब्याह जो होना है उनका।""क्या फ़ालतू की बातें कर रही है तू?" रागिनी थोड़ा उखड़ कर बोली____"बिना मतलब कहीं की बात कहीं जोड़े जा रही है तू।""अरे! तू गुस्सा क्यों हो रही है?" शालिनी ने हैरानी ज़ाहिर की____"मैंने तो वही कहा है जो मुझे लगा। अब अगर ऐसा नहीं है तो तू ही बता कि उनके इस तरह बदल जाने की क्या वजह है?""मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती।" रागिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तू कोई और बात कर।""अच्छा ठीक है।" शालिनी को महसूस हुआ कि रागिनी शायद उसकी बातों से चिढ़ रही है इस लिए कोई और बात करने का ही उसने सोचा____"और बता, यहां कैसा लग रहा है तुझे? मेरा मतलब है कि ससुराल से आए क़रीब ढाई महीने हो गए हैं तुझे तो क्या तुझे अपने ससुराल वालों की याद नहीं आती?""आती है।" रागिनी ने सहसा उदास हो कर कहा____"लेकिन अब वहां जा ही नहीं सकती। मेरे सास ससुर और मेरे माता पिता ने अचानक से मेरे सामने ये रिश्ता जो रख दिया है।""उन्होंने ये तेरे भले के लिए ही किया है रागिनी।" शालिनी ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"आज भले ही तुझे ये रिश्ता अजीब और बेमन सा लग रहा है लेकिन यकीन मान आगे चल कर इसी रिश्ते से तुझे लगाव हो जाएगा। ख़ैर अपने लिए न सही अपने घर और ससुराल वालों की खुशी के लिए इस रिश्ते के लिए हां कह दे।""वो तो कहना ही पड़ेगा मुझे।" रागिनी ने कहा____"इतने दिनों से खुद को इस रिश्ते के लिए ही तो समझा रही हूं। सबके बारे में ही तो सोच रही हूं। ख़ास कर अपने सास ससुर के बारे में। मैं भी जानती हूं कि ऊपर वाले ने मुझे दुनिया के सबसे अच्छे सास ससुर दिए हैं जो मुझे अपनी बेटी मान कर मुझे बहुत प्यार और स्नेह देते हैं। मैं इस रिश्ते को ना कह कर उनकी पवित्र भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकती।""चल यही सही।" शालिनी के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई____"यही सोच के अब तू इस रिश्ते के लिए हां कह दे। तुझे शायद अंदाज़ा भी नहीं है कि सब तेरे हां कहने का कितनी शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं और साथ ही तेरे लिए बहुत ज़्यादा फिक्रमंद भी हैं।""हां जानती हूं मैं।" रागिनी ने सिर हिलाया।"तो मैं जा कर वंदना भाभी को बता दूं कि तूने इस रिश्ते के लिए हां कह दिया है?" शालिनी ने खुशी से पूछा।"न..नहीं नहीं रुक जा ना।" रागिनी एकदम से हड़बड़ा कर बोल पड़ी।"अब किस बात के लिए रुक जाऊं?" शालिनी ने भौंहें उठा कर देखा उसे____"जो कहना है उसे साफ शब्दों में जल्द से जल्द कह देना चाहिए। बेवजह समय बर्बाद करना अच्छा नहीं होता, समझी।"रागिनी को समझ ना आया कि क्या कहे? अवाक सी देखती रह गई शालिनी को। उसकी धड़कनें एकदम से तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। दिलो दिमाग़ में हलचल सी मच गई थी।"चल अब यहां से।" शालिनी ने उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए कहा____"हर वक्त अकेले में फ़ालतू की बातें मत सोचा कर। खुशियां खुद चल कर तेरे क़दमों के पास आईं हैं तो उन्हें फ़ौरन अपनी झोली में भर ले।"रागिनी बदहवास सी उसके साथ खिंचती चली गई। उसकी धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं थी। गोरे चेहरे पर लाज की सुर्खी भी छाने लगी थी। कदाचित ये सोच कर कि उसकी सहेली अभी कुछ ही पलों में वंदना भाभी को बता देगी कि वो वैभव से ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई है।रागिनी को ये सोच कर बड़ा अजीब सा लगने लगा कि जाने क्या सोचेंगे अब उसके माता पिता और भैया भाभी और साथ ही उसकी छोटी बहन भी। कहीं वो सब उसके बारे में कुछ ऊटपटांग तो नहीं सोच बैठेंगे? रागिनी का चेहरा इस एहसास के चलते ही लाज से सुर्ख पड़ता चला गया।


━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
Bahot jabardast update tha bhai bahot maja aaya dost. Thora pyaar
 

Dark Cobra

CRIMSON
259
443
64
अध्याय - 150
━━━━━━༻♥༺━━━━━━




दिन ऐसे ही गुज़रने लगे।
गांव में अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य अच्छे तरीके से चलता रहा। गांव के लोग इस सबसे बड़ा खुश और उत्साहित थे। हर तरफ इसी की चर्चा होती थी। मैं और रूपचंद्र निर्माण कार्य की देख रेख में लगे हुए थे। ठंड अब ज़्यादा ही होने लगी थी जिसकी वजह से धूप अब कम ही देखने को मिलती थी। हर तरफ धुंध सी छाई रहती थी। काम करने वालों को तो मेहनत करने से गर्मी मिलती थी जिसकी वजह से उन्हें मज़ा आता था लेकिन जो बैठे हुए सिर्फ देखने वाले थे उन्हें ठंड कंपाने लगी थी।

रूपचंद्र के द्वारा ही मुझे पता चल गया था कि उसके घर में उसके बड़े ताऊ की लड़कियों के ब्याह की तैयारियां होने लगीं हैं। उसकी बहनों के ससुराल वालों ने ब्याह की लग्न बनवा ली थी और सवा महीने बाद शादी होनी थी। दोनों बहनें एक ही घर में ब्याही जाने वाली थीं इस लिए ज़्यादा परेशानी की बात नहीं थी। इस बीच रूपचंद्र के बहुत ज़ोर देने पर मैं एक दो बार उसके घर भी गया। उसके घर वालों ने बहुत ही अच्छे ढंग से मेरा स्वागत सत्कार किया था। रूपा ने भी छुप कर मुझे देखा था।

इधर हवेली में भी अब सामान्य हालात थे। मेनका चाची सबके सामने पहले की ही तरह खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश करती रहती थीं। मां भी उनसे तरीके से ही बातें करती थीं। कुसुम तो भोली और मासूम थी, अतः जल्दी ही वो अपने रंग में आ गई थी और पहले की ही तरह अपनी चंचलता से सबका मन मोहती रहती थी।

मैं भी सबके बीच सामान्य ही था। एक तरफ रूपा के प्रति प्रेम उमड़ रहा था जिसके चलते मन में कई तरह के मीठे ख़याल उभरने लगते थे तो वहीं दूसरी तरफ अनुराधा का ख़याल आते ही दिल में एक टीस सी उभर आती थी। मैं हर रोज़ उसके विदाई स्थल पर जाता था और कुछ देर वहां बैठ कर उसकी यादों में खो जाता था। वहीं से सरोज काकी से मिलने जाता और फिर उसका हाल चाल ले कर खेतों की तरफ निकल जाता। रात को जब खा पी कर अपने कमरे में सोने आता तो मन देर रात तक जाने कहां कहां भटकता रहता और मैं जाने कैसे कैसे ख़यालों में खोता रहता था।

रागिनी भाभी के बारे में जब भी ख़याल आता तो मेरे जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ जाती थी। ना चाहते हुए भी मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ये नियति का कैसा खेल है कि जिस भाभी के प्रति मेरे अंदर सिर्फ आदर और सम्मान की ही भावना है उनके साथ नियति मेरा ब्याह करवाने पर तुल गई है। इसमें कोई शक नहीं कि उनके बेहतर जीवन के लिए सबने जो फ़ैसला किया था वो अपनी जगह सर्वथा उचित था लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इस रिश्ते के प्रति मन में अब भी अजीब से ख़याल उभरते थे।

मैं तो रूपा की सहमति पर भाभी से ब्याह करने को राज़ी हो गया था लेकिन अक्सर सोचता था कि क्या भाभी इस रिश्ते को दिल से स्वीकार करेंगी? मैं जानता था कि अंततः उन्हें भी इस रिश्ते को स्वीकार करना ही पड़ेगा लेकिन मैं ये भी सोचता था कि उनका राज़ी होना एक मज़बूरी ही होगी। यानि दिल से वो यही चाहती हैं कि उनका मुझसे ब्याह न हो।

अजीब से हालात हो गए थे। अजीब सी दुविधा हो गई थी। अजीब से धर्म संकट में फंस गए थे हम दोनों। कुछ दिनों से मेरा बहुत मन कर रहा था भाभी से मिलने का और उनसे इस बारे में बात करने का लेकिन फिर ये सोच कर हिम्मत जवाब दे जाती थी कि आख़िर कैसे नज़र मिला सकूंगा उनसे? मुझे अपने पास आया देख कर कहीं वो मेरे बारे में ग़लत न सोच बैठें। कहीं वो ये न सोच बैठें कि मेरे मन में पहले से ही उनके बारे में ग़लत सोच थी और मैं पहले से ही ये सब चाहता था। जबकि सच तो यही था कि मेरे मन में आज से पहले कभी उनके बारे में ऐसा कुछ भी नहीं था। मैं ये मानता हूं कि एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर उनकी तरफ आकर्षित हो जाया करता था लेकिन इसमें मेरा क्या दोष था? एक तो मेरा चरित्र ही ऐसा था और दूसरे वो थीं ही इतनी सुंदर कि कोई भी उनकी तरफ आकर्षित हुए बग़ैर नहीं रह सकता था।

मैं जानना चाहता था कि भाभी इस बारे में क्या फ़ैसला करती हैं और ख़ास कर इस बारे में क्या सोचती हैं? कभी कभी मैं खुद को अपराधी सा महसूस करने लगता था। मैं अपनी भाभी को बताना चाहता था कि मेरे मन में ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आज है। हम दोनों के घर वालों ने भले ही हमारा आपस में विवाह कर देने का फ़ैसला ले लिया है लेकिन इसके बावजूद मैं उनके बारे में ग़लत नहीं सोच सकता हूं। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मेरे दिल में आज भी उनके प्रति वैसी ही मान सम्मान की भावना मौजूद है जैसे हमेशा से थी। मेरा उनसे ब्याह होना बस नियति की ही मर्ज़ी थी, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। इस लिए भगवान के लिए वो इस संबंध के चलते मेरे बारे में ऐसा वैसा कुछ भी ना सोचें।

मैं कुछ दिनों से इस सबके बारे में इतना सोचने लगा था कि मेरी हालत अब अजीब सी हो गई थी। मैं बहुत ज़्यादा परेशान, चिंतित और बेचैन रहने लगा था। इस बात को मेरे घर वालों ने भी महसूस किया। मां ने तो एक दिन मुझसे पूछा भी लेकिन मैंने ये सोच कर उन्हें कुछ नहीं बताया कि बेवजह ही वो परेशान और चिंतित हो जाएंगी। हालाकि वो मेरे ना बताने पर भी फिक्रमंद हो उठीं थीं, और फिर एक दिन।

"क्या बात है बेटा?" मेरे कमरे में आ कर मां ने पूछा____"कई दिनों से देख रही हूं तुझे। तू कुछ परेशान और गुमसुम सा नज़र आने लगा है। आख़िर ऐसी कौन सी बात है जिसके चलते तेरी ये हालत हो गई है? मैंने दो दिन पहले भी तुझसे पूछा था लेकिन तूने कुछ नहीं बताया। आख़िर बात क्या है मेरे लाल? क्या अपनी मां को नहीं बताएगा? क्या तू चाहता है कि तेरी मां तुझे ऐसी हालत में देख कर चिंतित हो उठे और दुखी हो जाए?"

"नहीं मां।" मैंने अधीरता से कहा____"मैं ये सपने में भी नहीं चाह सकता कि आप किसी बात से दुखी हो जाएं।"

"तो फिर बता ना बेटा।" मां ने अधीर हो कर कहा____"आख़िर किस बात से तू इतना परेशान दिखने लगा है? कौन सी ऐसी बात है जो तुझे अंदर ही अंदर परेशान किए हुए है? क्या अनुराधा की वजह से तेरी ये हालत है?"

"नहीं मां।" मैंने कहा____"उसकी वजह से नहीं है। उससे तो मैं रोज़ ही मिलता हूं और अपने दिल की बातें भी उसे बताता हूं। मेरी परेशानी कुछ और है मां।"

"तो बता ना बेटा।" मां एकदम व्याकुल सी हो कर बोलीं____"कौन सी परेशानी हो गई है मेरे बेटे को?"

"रागिनी भाभी।" मैंने गंभीरता से कहा____"हां मां, भाभी की वजह से परेशान रहता हूं आज कल।"

"उसकी वजह से?" मां एकदम से चौंकी____"पर उसकी वजह से क्यों बेटा? कहीं तू इस वजह से तो नहीं परेशान है कि हम उससे तेरा ब्याह करवा देना चाहते हैं?"

"नहीं मां, ऐसी बात नहीं है।" मैंने कहा___"बात ये है कि इस रिश्ते के संबंध में वो क्या सोचती होंगी? इससे भी बढ़ कर मेरे बारे में क्या सोचती होंगी?"

"वो क्या सोचेगी?" मां ने कहा____"यही ना कि ये कैसी किस्मत है कि उसे अपने देवर से ब्याह करना पड़ रहा है? मैं मानती हूं बेटा कि उसके लिए भी इस रिश्ते को स्वीकार करना आसान नहीं होगा लेकिन ये भी तो सच ही है कि ऐसा हम इसी लिए करना चाहते हैं क्योंकि इसी में उसका भला है। इसी में उसका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में खुश रह सकेगी। तू इस बारे में ज़्यादा मत सोच। मैं मानती हूं कि ये रिश्ता शुरू शुरू में अजीब लगेगा लेकिन बाद में तुम दोनों इस रिश्ते को दिल से अपना कर एक दूसरे से प्रेम करने लगोगे।"

"ये सब तो बाद की बातें हैं मां।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"लेकिन इस वक्त मेरी परेशानी ये है कि मैं खुद को उनका अपराधी सा महसूस करता हूं। मेरे चरित्र के बारे में तो उन्हें भी पता रहा है। ऐसे में अब जब उनसे ब्याह करने का फ़ैसला हो गया तो कहीं न कहीं वो मेरे बारे में ये भी सोचेंगी कि मैं शुरू से ही उनके बारे में ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा और अब जब उनसे ब्याह करने की बात हुई तो मैंने झट से इस रिश्ते को क़बूल कर लिया।"

"ऐसा कुछ भी नहीं है बेटा।" मां ने मेरे बाएं गाल को प्यार से सहलाते हुए कहा____"तू बेवजह ही ये सब सोच कर खुद को दुखी कर रहा है। तू भी जानता है कि तेरी भाभी ने तुझे कभी ग़लत नहीं समझा है। अगर वो तुझे ग़लत समझती तो वो कभी एक पल के लिए भी तेरा पक्ष न लेती और ना ही तुझे एक अच्छा इंसान बनने के लिए तुझ पर ज़ोर डालती। इतना ही नहीं, तेरे साथ कभी वो खेतों पर घूमने भी न जाती। उसे तेरे चरित्र का भले ही पता था लेकिन उसे तुझ पर भरोसा भी था कि तू उसके प्रति कभी ग़लत नहीं सोच सकता है। इसी लिए तो वो तुझे इतना मानती थी और तेरे हर दुख में तेरी ही तरह वो भी दुखी हो जाती थी। जब तेरा बड़ा भाई गुज़रा तो वो सदमे में चली गई थी। हम सबने पूरी कोशिश की थी उसको दुख से उबारने की लेकिन तेरी वजह से वो अपने उस असहनीय दुख से उबर गई। वो अक्सर मुझसे कहती थी कि अगर वैभव जैसा उसका देवर न होता तो आज वो अपने दुख से बाहर न निकल पाती। वो ये भी कहा करती थी कि उसे गर्व है कि ईश्वर ने उसे वैभव जैसा देवर दिया है जो उसके चेहरे पर खुशी लाने के लिए कुछ भी कर सकता है। ये सारी बातें यही ज़ाहिर करती हैं मेरे बेटे कि वो कभी तेरे बारे में ग़लत नहीं सोच सकती। तेरे साथ उसके ब्याह होने वाली बात से भी वो यही सोचती होगी कि इसमें तेरा कोई दोष नहीं है। जो भी हो रहा है उसमें सबसे ज़्यादा क़िस्मत का हाथ है। इस लिए तू ये सब फ़िज़ूल की बातें सोच कर ख़ुद को दुखी मत रख।"

"क्या मैं एक बार भाभी से मिल आऊं?" मैंने धड़कते दिल से मां को देखते हुए उनसे पूछा____"मैं मानता हूं कि मेरा अब उनसे मिलना उचित नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं एक बार उनसे मिलना चाहता हूं। उनके सामने घुटनों पर बैठ कर उनसे कहना चाहता हूं कि मेरे मन में उनके प्रति ना पहले कभी कोई ग़लत भावना थी और ना ही आगे कभी हो सकती है। इस रिश्ते के बाद भी उनके प्रति मेरे दिल में वैसी ही मान सम्मान की भावना रहेगी जैसे हमेशा से रही है।"

मेरी बातें सुन कर मां की आंखें भर आईं और अगले ही पल उनकी आंखों से आंसू के कतरे छलक पड़े। उन्होंने लपक कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया। मैं भी किसी छोटे से बच्चे की तरह उनसे छुपक गया। एक असीम सुख और शांति का एहसास हुआ मुझे।

"मैं जानती हूं कि तेरे मन में रागिनी के प्रति बहुत ही ज़्यादा आदर और श्रद्धा जैसा भाव है।" मां ने मुझे खुद से छुपकाए हुए ही कहा____"और सच कहूं तो मुझे इस बात के लिए तुझ पर गर्व है। ख़ैर, तू अपनी भाभी से मिलना चाहता है ना तो ठीक है। मैं आज ही तेरे पिता जी से इस बारे में बात करूंगी और उन्हें समझाऊंगी कि वो इसके लिए तुझे चंदनपुर जाने की अनुमति दे दें।"

"ओह! मां।" मैंने खुशी से उन्हें जोरों से कस लिया____"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मां। मैं बता नहीं सकता कि आपके मुख से ये सुन कर मुझे कितना सुकून मिला है।"

"मां को धन्यवाद करता है पागल।" मां ने मुझे खुद से अलग कर के कहा____"अरे! मां तो होती ही है अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए। ख़ैर अब तू आराम कर और इस बारे में अब कुछ भी सोच कर खुद को परेशान मत कर। चल अब जाती हूं मैं।"

मां ने मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और फिर वो कमरे से चली गईं। इतने दिनों से जिन बातों को सोचते हुए मैं परेशान था वो अब मानों किसी जादू के जैसे छू मंतर हो गईं लगने लगीं थी। मेरा मन अब बहुत हल्का महसूस हो रहा था।

✮✮✮✮

"अरे! शालिनी तू कब आई अपनी ससुराल से?" रागिनी अपनी बचपन की सहेली को अपनी तरफ आते देख एकदम से चौंकी थी।

घर के पीछे कुछ खाली जगह थी जिसे चारो तरफ से लकड़ी की ऊंची दीवार बना कर घेरा हुआ था। उस खाली जगह में एक तरफ कुवां था और दूसरी तरफ कुछ पेड़ पौधे लगे हुए थे जिनमें से कुछ अमरूद के, कुछ कटहल के और एक दो केले के पेड़ थे। रागिनी खाली समय में ज़्यादातर यहीं आ कर बैठ जाया करती थी। गांव में किसी के घर जाना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था। एक शालिनी ही थी जिसके घर वो चली जाया करती थी किंतु उसकी शादी के बाद वहां भी जाना बंद हो गया था। अपने चाचा जी के घर भी चली जाती थी जहां पर वो अपनी भाभियों के पास थोड़ा समय गुज़ार लेती थी।

"आज ही आई हूं।" शालिनी ने उसके क़रीब आ कर कहा____"तेरे बारे में मां ने बताया तो तुझसे मिलने चली आई। सच कहूं तो तेरे बारे में जब वो सब सुना था तो बहुत दुख हुआ था मुझे। यकीन ही नहीं हुआ था कि मेरी इतनी अच्छी सहेली के साथ ऊपर वाला इस तरह का अन्याय कर सकता है।"

"सब किस्मत की बातें हैं शालिनी।" रागिनी ने फीकी सी मुस्कान होठों पर सजा कर कहा____"ख़ैर तू बता, कैसी है तू और जीजा जी कैसे हैं?"

"मैं ठीक हूं और तेरे जीजा जी भी ठीक हैं।" शालिनी ने कहा____"मुझे वंदना भाभी ने बताया कि तेरा फिर से ब्याह करने का फ़ैसला किया है चाचा जी ने?"

शालिनी की इस बात पर रागिनी कुछ बोल ना सकी। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नज़र आए। शालिनी ग़ौर से उसको देखने लगी थी।

"उन्होंने बताया कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया है।" शालिनी ने आगे कहा____"मैं तो उनके मुख से ये सब सुन कर हैरान ही हो गई थी। वैसे सच कहूं तो मुझे तेरा फिर से ब्याह होने की बात सुन कर बहुत खुशी हुई है। ऊपर वाले से यही प्रार्थना करती थी कि मेरी सहेली के जीवन को फिर से खुशियों से भरने का कोई इंतज़ाम कर दो और देखो ऊपर वाले ने मेरी प्रार्थना सुन ली। बस यही जान कर थोड़ी हैरानी हुई कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया चाचा जी ने।"

"पता नहीं ऊपर वाला मुझसे क्या चाहता है शालिनी?" रागिनी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"जो कुछ मैंने सपने में भी नहीं सोचा था वही सब मेरे साथ करता जा रहा है वो। समझ में नहीं आ रहा अपनी ऐसी किस्मत पर रोऊं या खुश होऊं?"

"अरे! ऐसा क्यों कह रही है तू?" शालिनी ने हैरानी से उसे देखते हुए कहा____"मैं मानती हूं कि ऊपर वाले ने इसके पहले तेरे साथ जो किया था वो बहुत ही ग़लत और दुखदाई था लेकिन ये तो बहुत ही अच्छी बात है कि तेरा फिर से ब्याह हो जाएगा और तेरा दुखों से भरा ये जीवन फिर से खुशियों से भर जाएगा।"

"कहना बहुत आसान होता है शालिनी।" रागिनी ने उदास भाव से कहा____"लेकिन अमल करना बहुत मुश्किल होता है। अपने ही देवर को अब पति की नज़र से देखना अथवा सोचना बहुत ही अजीब सी अनुभूति कराता है मुझे।"

"हां मैं समझती हूं इस बात को।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"समझ सकती हूं कि इस बारे में तेरे मन में जाने कैसे कैसे ख़याल उभरते होंगे लेकिन मैं तुझसे यही कहूंगी कि देवर से ब्याह करने का मामला कोई नया नहीं है। दुनिया में अक्सर परिस्थितियों को देख कर लोगों ने ऐसे निर्णय लिए हैं। तुझे भी इस बात को समझना चाहिए और फ़िज़ूल की बातें अपने मन से निकाल कर सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचना चाहिए। ऊपर वाले की कृपा से तुझे इतना अच्छा ससुराल मिला है। अपनी बेटी की तरह प्यार करने वाले इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं और सबसे बड़ी बात तेरा भला चाहते हुए तेरे जीवन को फिर से संवारने के लिए वो तेरा फिर से ब्याह कर देना चाहते हैं। सबके नसीब में ऐसे इंसान नहीं होते रागिनी जो अपनी बहू के लिए इतना कुछ सोचें और करने लगें। क्या हुआ अगर देवर से ब्याह हो जाएगा तेरा? शुरू शुरू में ज़रूर अजीब लगेगा लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। मुझे तो इस बात का भी यकीन है कि आगे चल कर तू खुद अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात से यही सोचने लगेगी कि ये अच्छा ही हुआ।"

"मतलब तुझे भी लगता है कि मेरा अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात हर तरह से उचित है?" रागिनी ने शालिनी की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा।

"हां बिल्कुल।" शालिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तेरे भले के लिए वो जो भी कर रहे हैं एकदम सही कर रहे हैं। तुझे भी बेकार की बातें नहीं सोचनी चाहिए और इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाना चाहिए। अपने ही पैरों से अपनी अच्छी किस्मत को ठोकर मत मार।"

रागिनी अपलक देखती रह गई शालिनी को। उसे समझ ही न आया कि अब क्या कहे? दिलो दिमाग़ में एकाएक ही हलचल सी मच गई थी।

"अच्छा ये तो बता मेरे होने वाले जीजा जी अभी भी वैसे ही हैं क्या?" शालिनी ने सहसा मुस्कुराते हुए पूछा____"या अब बदल गए हैं वो? और हां, इस रिश्ते के बारे में उनका क्या ख़याल है?"

रागिनी को समझ ना आया कि वो अपनी सहेली से वैभव के बारे में क्या बताए? शालिनी के मुख से होने वाले जीजा जी सुन कर ही उसके समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई थी। मन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभरने लगे थे।

"क्या हुआ?" उसे कुछ न बोलता देख शालिनी ने जैसे उसे ख़यालों से बाहर खींचा____"चुप क्यों हो गई तू? बता ना मेरे होने वाले जीजा जी के बारे में?"

"व...वो अब पहले से बदल गए हैं।" रागिनी ने झिझकते हुए बड़ी मुश्किल से कहा।

"हाय राम! क्या सच में?" शालिनी ने आश्चर्य से आंखें फैला कर रागिनी को देखा____"बड़े आश्चर्य की बात है ये। क्या वो सच में बदल गए हैं?"

रागिनी अजीब सा महसूस करने लगी थी। शालिनी के पूछने पर उसने सिर्फ हां में सिर हिला दिया। ये देख शालिनी को फिर से हैरानी हुई। उसकी आंखों के सामने वैभव का चेहरा चमक उठा और साथ ही गुज़रे समय की यादें भी।

(दोस्तो, ये वही शालिनी है जिसके बारे में वैभव ने अपनी भाभी से उस समय मज़ाक करते हुए ज़िक्र किया था जब वो अपनी भाभी को ले कर उनके मायके चंदनपुर जा रहा था।)

"क्या हुआ?" शालिनी को कहीं खो सा गया देख रागिनी ने उसे देखते हुए पूछा____"अब तू कहां खो गई?"

"व...वो मैं न।" शालिनी एकदम से हड़बड़ा गई। फिर जल्दी से खुद को सम्हालते हुए बोली____"अरे! मैं तो ये सोचने लगी थी कि क्या सच में मेरे होने वाले जीजा जी बदल गए हैं? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा।"

"क्यों नहीं हो रहा भला?" रागिनी को जाने क्यों उसकी बात से बुरा महसूस हुआ जिसके चलते उसने सहसा उसे घूरते हुए कहा____"और हां मुझे पता है कि तू भी उनसे नैन मटक्का कर चुकी है।"

"अ....अरे! ये...ये क्या कह रही है तू?" शालिनी ने बुरी तरह हड़बड़ाते हुए रागिनी को हैरत से देखा____"मेरा उनसे इस तरह का कोई चक्कर नहीं था। पता नहीं क्यों ऐसा बोल रही है तू?"

"मैं ऐसा इस लिए कह रही हूं क्योंकि मुझे उन्होंने ही बताया था जिनसे तेरा नैन मटक्का चला था।" रागिनी ने कहा____"और इतना तो मैं समझती ही हूं कि इस मामले में वो महाशय कितने पहुंचे हुए थे। अगर उन्होंने तेरा ज़िक्र किया था तो मेरे लिए ये यकीन कर लेना सहज ही था कि तेरा उनसे चक्कर था।"

शालिनी भौचक्की सी देखती रह गई रागिनी को। एकदम से ही वो नज़रें चुराने लगी थी। फिर उसने अपनी हालत को काबू किया और चेहरे पर खुशी के भाव लाते हुए कहा____"हां यार, मेरा उनसे चक्कर चल गया था लेकिन यकीन कर बस थोड़ा सा ही चल पाया था। बात इतनी भी नहीं बढ़ी थी कि हमारे बीच कुछ ग़लत हो जाता।"

रागिनी को याद आया कि वैभव ने भी उससे ऐसा ही कुछ कहा था। शालिनी के आख़िरी वाक्य से जाने क्यों रागिनी को राहत सी महसूस हुई।

"ख़ैर ये सब छोड़।" शालिनी ने एकदम सामान्य भाव से कहा____"और ये तो बता कि मेरे होने वाले जीजा जी क्या सच में ही बदल गए हैं?"

"तू तो ऐसे कह रही है जैसे वो कभी बदल ही नहीं सकते थे?" रागिनी को फिर से बुरा लगा, इस लिए उसने उसे घूरा____"वैसे भी उन्होंने कोई क़सम तो खाई नहीं थी कि वो कभी बदलेंगे ही नहीं।"

"हां ये तो है।" शालिनी ने कहा____"लेकिन मैं ये जानने को उत्सुक हूं कि वो बदल कैसे गए और बदले भी हैं तो कितना बदले हैं? क्या एकदम से शरीफ़ ही बन गए हैं वो?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" रागिनी के ज़हन में गुज़रे समय की ढेर सारी बातें जैसे चमक उठीं और साथ ही आंखों के सामने ढेर सारी तस्वीरें भी।

"कुछ ऐसा ही है का क्या मतलब है?" शालिनी जैसे बाल की खाल निकालने पर उतारू हो गई____"जो इंसान हमेशा मौज मस्ती करता था और भी ना जाने क्या क्या करता था वो अचानक से शरीफ़ कैसे बन गया?"

"इसके जवाब में बस इतना ही कहूंगी कि हर इंसान वक्त के साथ बदल जाता है।" रागिनी ने थोड़ा बेचैन भाव से कहा____"जीवन में कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं जिसके चलते इंसान को खुद पर बदलाव करना पड़ता है।"

"हां ये तो तू सही कह रही है।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"वैसे उनका इस तरह से बदल जाना तेरे हिसाब से ठीक है या नहीं?"

"ठीक ही है।" रागिनी ने कहा____"अगर कोई अच्छा इंसान बन जाए और अच्छे अच्छे कर्म करने लगे तो भला इससे अच्छा क्या हो सकता है?"

"यानि मेरे होने वाले जीजा जी अब अच्छे इंसान बन गए हैं।" शालिनी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"और अब अच्छे अच्छे काम करने लगे हैं। ये तो कमाल ही हो गया रागिनी। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो तुम्हारे लिए अच्छे बन गए हैं? आख़िर अब तुमसे ब्याह जो होना है उनका।"

"क्या फ़ालतू की बातें कर रही है तू?" रागिनी थोड़ा उखड़ कर बोली____"बिना मतलब कहीं की बात कहीं जोड़े जा रही है तू।"

"अरे! तू गुस्सा क्यों हो रही है?" शालिनी ने हैरानी ज़ाहिर की____"मैंने तो वही कहा है जो मुझे लगा। अब अगर ऐसा नहीं है तो तू ही बता कि उनके इस तरह बदल जाने की क्या वजह है?"

"मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती।" रागिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तू कोई और बात कर।"

"अच्छा ठीक है।" शालिनी को महसूस हुआ कि रागिनी शायद उसकी बातों से चिढ़ रही है इस लिए कोई और बात करने का ही उसने सोचा____"और बता, यहां कैसा लग रहा है तुझे? मेरा मतलब है कि ससुराल से आए क़रीब ढाई महीने हो गए हैं तुझे तो क्या तुझे अपने ससुराल वालों की याद नहीं आती?"

"आती है।" रागिनी ने सहसा उदास हो कर कहा____"लेकिन अब वहां जा ही नहीं सकती। मेरे सास ससुर और मेरे माता पिता ने अचानक से मेरे सामने ये रिश्ता जो रख दिया है।"

"उन्होंने ये तेरे भले के लिए ही किया है रागिनी।" शालिनी ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"आज भले ही तुझे ये रिश्ता अजीब और बेमन सा लग रहा है लेकिन यकीन मान आगे चल कर इसी रिश्ते से तुझे लगाव हो जाएगा। ख़ैर अपने लिए न सही अपने घर और ससुराल वालों की खुशी के लिए इस रिश्ते के लिए हां कह दे।"

"वो तो कहना ही पड़ेगा मुझे।" रागिनी ने कहा____"इतने दिनों से खुद को इस रिश्ते के लिए ही तो समझा रही हूं। सबके बारे में ही तो सोच रही हूं। ख़ास कर अपने सास ससुर के बारे में। मैं भी जानती हूं कि ऊपर वाले ने मुझे दुनिया के सबसे अच्छे सास ससुर दिए हैं जो मुझे अपनी बेटी मान कर मुझे बहुत प्यार और स्नेह देते हैं। मैं इस रिश्ते को ना कह कर उनकी पवित्र भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकती।"

"चल यही सही।" शालिनी के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई____"यही सोच के अब तू इस रिश्ते के लिए हां कह दे। तुझे शायद अंदाज़ा भी नहीं है कि सब तेरे हां कहने का कितनी शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं और साथ ही तेरे लिए बहुत ज़्यादा फिक्रमंद भी हैं।"

"हां जानती हूं मैं।" रागिनी ने सिर हिलाया।

"तो मैं जा कर वंदना भाभी को बता दूं कि तूने इस रिश्ते के लिए हां कह दिया है?" शालिनी ने खुशी से पूछा।

"न..नहीं नहीं रुक जा ना।" रागिनी एकदम से हड़बड़ा कर बोल पड़ी।

"अब किस बात के लिए रुक जाऊं?" शालिनी ने भौंहें उठा कर देखा उसे____"जो कहना है उसे साफ शब्दों में जल्द से जल्द कह देना चाहिए। बेवजह समय बर्बाद करना अच्छा नहीं होता, समझी।"

रागिनी को समझ ना आया कि क्या कहे? अवाक सी देखती रह गई शालिनी को। उसकी धड़कनें एकदम से तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। दिलो दिमाग़ में हलचल सी मच गई थी।

"चल अब यहां से।" शालिनी ने उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए कहा____"हर वक्त अकेले में फ़ालतू की बातें मत सोचा कर। खुशियां खुद चल कर तेरे क़दमों के पास आईं हैं तो उन्हें फ़ौरन अपनी झोली में भर ले।"

रागिनी बदहवास सी उसके साथ खिंचती चली गई। उसकी धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं थी। गोरे चेहरे पर लाज की सुर्खी भी छाने लगी थी। कदाचित ये सोच कर कि उसकी सहेली अभी कुछ ही पलों में वंदना भाभी को बता देगी कि वो वैभव से ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई है।

रागिनी को ये सोच कर बड़ा अजीब सा लगने लगा कि जाने क्या सोचेंगे अब उसके माता पिता और भैया भाभी और साथ ही उसकी छोटी बहन भी। कहीं वो सब उसके बारे में कुछ ऊटपटांग तो नहीं सोच बैठेंगे? रागिनी का चेहरा इस एहसास के चलते ही लाज से सुर्ख पड़ता चला गया।





━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━mast lajawab update sir ji
Ragni bhi Raji ho gyi aur vaibhav bhi Raji hai ab dekhte hai kaise ragni batati hai apne pariwar walo ko
❣️Waiting for next update
Kaise milta hai vaibhav ragni se
 
Last edited:

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
81,735
119,687
354
Shandar update
Thanks
Welcome back 😊... रागिनी का वैभव से पुनर्विवाह के लिए मान जाना... ❤️💗💖💓💕💞

बसंत आने वाला है... परन्तु वासंतिक मादकता {वो सरसों के पीले फूल, टेसू (पलाश) पर छाई लाली, महुआ के मोती समान फुलों के ढेर और सुन्दर कन्याओं का मादक व्यवहार} इस का सर्वोत्तम वर्णन komaalrani ही कर सकती हैं....

परन्तु आज रागिनी के गुलाबी गालों, झुके नैनों, लड़खड़ाती जुबान और लरज़ते ओठों का चित्रण TheBlackBlood भाई शायद आपने विस्तृत वर्णन नहीं किया पर मेरी आंखें उस आते हुए वसन्त ऋतु को रागिनी के गोरे चेहरे पर लाज की सुर्खी कि आभा में महसूस कर रही हैं।

बहुत सुंदर चित्रण/वर्णन... आपके लेखन को मेरे और सभी पाठकों कि और से बहुमान...

जय जय
Sahi kaha umakant bhai, vistrat varnan nahi kiya, iski vajah yahi hai ki story ko lamba na kheench kar use jald se jald complete kar Dena chahta hu....
Awesome Bhai mast update hai.......
Thanks
Awesome update
Thanks
भाई धन्यवाद अपने busy schedule में से time निकाल कर पोस्ट करने के लिए। उम्मीद है की ऐसी ही बीच बीच में समय निकाल कर आप पोस्ट देते रहेंगे ।

दादा ठाकुर पूरी कोशिश कर रहे है सफेद नकाबपोश का सच छिपाने की, लेकिन कारण इतना obvious हैं की सच चाह कर भी छुप नहीं पा रहा है। दादा ठाकुर के लिए एक तरफ कुवा और दूसरी तरफ खाई हैं। एक तरफ तो उनके अपनो ने ऐसा किया उस चीज़ का दुख है और दूसरी तरफ उनके ही अपनो ने ऐसा किया है अगर इसका पता चला तो उनके ही खानदान की बदनामी होगी।

अब जब अंदर का frustration नहीं निकलेगा कोई आदमी कैसे खुश रह सकता हैं।

वैसे ये तो अच्छा हुआ की दादा ठाकुर ने मेनका देवी के भाई की करतूत उनकी पूरी फैमिली को बता दी अब बस एक बार मेनका देवी भी अपने मायके चली जाए ताकि वो भी थोड़ा लानत झेल ले।
बस इन सब में बेचारी कुसुम का दिल न दुखे।

तो finally वैभव और रागिनी दोनो शादी के लिए राजी हो गए, और ठीक दादा ठाकुर के कहे अनुसार वैभव ने शादी का decision जल्दी और कम पशोपेश के साथ लिया है।

वैसे ये वैभव और शालिनी का किस्सा कौन से no. के अपडेट में है, मुझे वो दोबारा से पढ़ना है। कृपया किसी को पता हो तो बताने का कष्ट करे।

So जब शालिनी ने कहा की उसके और वैभव के बीच बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ी थी तो रागिनी को थोड़ी राहत हुई मतलब कही न कही रागिनी भी वैभव के ऊपर अधिकार मान चुकी है।

अपडेट के लिए धन्यवाद, अगले अपडेट की प्रतीक्षा में ❣️
Kya kare dost, aap logo ka pyar aur kahani ko jald puri karne ki teevra ichha ke chalte kisi tarah time nikaal raha hu...
nice update
busy schedule hone k baad bhi aapne update diya ye aapki hum readers ke prati pyar darshata hai
thanks for your updates
baivav abhi bahot si soch se ghira hua hai khaskar apni bhabhi raagini ko lekar
but ye soch tabhi khatam ho sakti jab raagini aur baiva apas me baat kare iss bare me
dono ke apne apne soch ko sajha karne se dono apni confusion state se bahar niklenge aur aage badh payenge
baaki to rekha ke parivar waalo ko bhi safedposh ki haqiqat ka pata lagbhag chal hi cuhuka hai aur ab ne use raaz hi rakhne ka afaisla kiya hai
acha hai aise hi parivar ek dusre ki madat karte hai
keep going

keep writing
Thanks dost....
Safedposh ka kirdar hi aisa tha ki uske bare me log itna jaldi nahi bhula sakenge. Dusri baat agar achanak se uska zikra hi band ho jaye to log uske bare me puchhenge hi. Yaani uska sach kisi na kisi madhyam se baahar aayega hi...
TheBlackBlood भाई :

भारतीय स्त्री - खास कर के रागिनी जैसी संस्कारी स्त्री - जब किसी पुरुष को ‘इनके’ ‘उनके’ करके सम्बोधित करती है (या करने लगे), तो उसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं : अमुक पुरुष उससे उम्र में बड़ा है, इसलिए आदरणीय है; अमुक पुरुष का वो नाम भूल गई है; या फिर अमुक व्यक्ति उसका पति है या फिर उसके मन में पति वाला स्थान रखता है। 🤭

पहले दो विकल्प तो सही नहीं बैठते! और शालिनी को ले कर रागिनी ने जो ‘सौतिया डाह’ वाला व्यवहार दिखाया है, उससे भी यही सिद्ध होता है कि वैभव का स्थान रागिनी के मन में जम गया है। लिहाज़ा (आखिरी अपडेट की अंतिम पंक्तियों को पढ़ कर), हम पाठक बस एक ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं, कि वैभव की तो निकल पड़ी! हा हा! 😂

यह अच्छी बात है। बिना वजह स्वयं को सताना नहीं चाहिए। प्रेम पाने का अवसर दोबारा मिल रहा हो, तो बिना किसी हूल हुज्जत के उसको आदर के साथ और खुले मन से स्वीकार कर लेना चाहिए। चलो - अंततः समाज में और परिवार में शांति आने वाली है।

दादा ठाकुर की गज़ब की स्थिति है - बेचारे छटपटा रहे हैं कि कैसे भी कर के सफ़ेदपोश की सच्चाई सभी से छुपा ली जाए। लेकिन दुनिया मूर्ख नहीं है - कुछ न कुछ तर्क वितर्क कर के पूरी नहीं, तो सन्निकट सच्चाई निकाल ही लेगी। कयास लगाएगी। तिल का ताड़ बनाएगी। यह बात किसी भी स्थिति में ठीक नहीं है। कयास लगाने से अर्थ का अनर्थ बनते देर नहीं लगती। इसलिए मुझको तो यही ठीक लगता है कि सफ़ेदपोश की सच्चाई बाहर आना समाज के लिए भी स्वस्थ है। वो केवल ठाकुरों का अपराधी नहीं है - समाज का अपराधी है।

मेनका चाची के बारे में कुछ अपडेट्स से पता नहीं चल रहा है। कुसुम के बारे में भी चुप्पी ही है। उसके दोनों भाईयों का ज़िक्र आना ही बंद हो गया है न जाने कब से।

बड़े ही खूबसूरत अपडेट हैं! अपना ख्याल रखें! मिलते हैं जल्दी ही।
Sahi kaha bhaiya ji, vaibhav ki to nikal padi :D uske jaisa insaan kismat ka itna dhani ho sakta hai is baat ki hairaani hona laazmi hai. Aksar maine dekha hai ki jo bure log hote hain wo zyada sukhi hote hain aur jo achhe hote hain wo dukhi, pata nahi srishti ka ye kaisa vidhaan hai...

Samay ke sath sath baki sab dekhne ko milega. Halaaki maine bahut kuch out kar diya hai, fir bhi koshish thi ki sab kuch rahe aur ek achha sa end ho sake...
Superb update bro
Thanks
Bahot jabardast update tha bhai bahot maja aaya dost. Thora pyaar bhara ehsaas ho raha hain. Next update ka intajaar rahegaa bhai 👌👌👌👌👌👌👌👌👌👍👍👍👍👍👍👌👌👌
Thanks
Outstanding updates bro
Thanks
Bhabhi akhir kar Saadi ke liye raazi ho hi gai. lakho vichar man umde honge .Kai raat bhabhi isi soch uljhan me so bhi nhi paai hogi .. lekin jab har koi bhabhi ko saadi ke liye Han kahne ke liye bol Raha ho to bhabhi ko bhi dusro ki pahluo ko samjhne ke liye majbur hona pada .ek bhi insaan bhabhi ko aisa nhi mila jisne bhabhi ko ye kaha ki wo Saadi ke liye mana kar de.agar aisa hota to shayad bhabhi abhi Saadi ke liye raazi nhi hoti mere khayal se . but finally raazi ho gai .. vaibhav bhi bhabhi se milne a Raha hai dekhte hain ek dusre se kaise milte hain kya baat hoti hai dono me.vaibhav soch raha hai bhabhi kya Sochegi uske bare me aur bhabhi soch rahi hai vaibhav kya sochega . sahukaro ko ne bhi akhir sahi andaja laga liya ki safedposh kon tha aur wo bhi is baat ko dabana cahte hain jo dono pariwar ke liye sahi hai .
Bhabhi ke mayake me sab achhe hi the bro is liye kisi ne is rishte ke liye usko mana karne ko nahi kaha, kamini se ummid thi but jab usko vaibhav ke badal jane ki baat pata chali to usne bhi iska virodh nahi kiya...bas itni si baat thi...
रीडर्स जितनी बेसब्री से वैभव - रूपा की शादी का इन्तजार नही कर रहे हैं उससे कहीं अधिक वो वैभव - रागिनी की शादी की सम्भावना टटोल रहे हैं ।
इसे कहते है हमारे एक्स- फोरम के रीडर्स की दरियादिली और उनकी संवेदनशीलता ।

वैभव साहब की सोच स्पष्ट है । अगर रागिनी खुशी - खुशी , तहेदिल से उनके साथ वैवाहिक बंधन मे बंधना चाहती है तो फिर उन्हें किसी तरह की आपत्ति नही है । वो रागिनी से शादी भी करेंगे और बिस्तर पर उसके साथ " ताय ताय - थैया थैया " सुर पर भरत नाट्यम भी करेंगे । :D

रागिनी मैडम ने अपने बचपन की सखी के समक्ष एक तरह से अपनी स्वीकृति दे दी है । थोड़ा-बहुत ना - नुकर अवश्य उन्होने किया था जो स्वभाविक ही है लेकिन अंततः डिसिजन बहुत बढ़िया और स्वयं के हित मे लिया।
कहते हैं - सौभाग्य आप का बंद दरवाजा सिर्फ एक बार खटखटाता है । अगर आपने उस वक्त दरवाजा खोल दिया तो सौभाग्य आपके कमरे मे प्रवेश कर जाती है लेकिन , दुर्भाग्य तब तक दरवाजा खटखटाती है जब तक आप अपना दरवाजा खोल नही देते ।
इसलिए रागिनी का " हां " उसके सौभाग्य के आगमन की खबर होगी ।

साहूकारों का सफेदपोश के ऊपर चर्चा करना या गांव के किसी भी लोग का इस विषय पर चर्चा करना कोई अचरज वाली बात नही है । लोगों का काम है कहना और यह सब लोग करेंगे ही । लेकिन मेरा अब भी मानना है कि सफेदपोश का राज , राज बनकर ही रह जाना चाहिए । लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है । कुछ दिन बाद सबकुछ भुल जायेंगे । सफेदपोश पर बात करना अब गड़े मुर्द उखाड़ने की तरह है जो सिर्फ और सिर्फ दुर्गंध पैदा करती है ।

बहुत ही खूबसूरत अपडेट शुभम भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
Reader's ki soch writers ki kalpana se bhi pareshan hoti hai. Unki apni ek alag hi imagination hoti hai... :D

Ragini ka aisa sochna aur uska aisa bartaav aakhir me aapko alag tarah se samjh aayega...

Dada thakur ki koshish to yahi thi ki safedposh ka raaz kabhi kisi ko pata na chale, lekin wakt aur halaat kaha kisi ke bas me hote hain...let's see kya hota hai..
Nice update bhai
Thanks
Super awesome update brother finally haan hogai aur udhar vaibhav bhi Ara h Ragini se milne eagerly waiting for your next update brother luvd this one pls do cont asap take care
Thanks
Nice update
Ragini k Ghar walo ne apna akhiri daw chal Diya Jo ki Ragini ki saheli Shalini thi or woh daw lagta hai kaam kar gaya


(Bhai 1 request hai Ragini or Vaibhav ki suhagrat bhi dikhana woh thodi erotic style mein ),😊
Thanks
Nice 1
Tho ak
Nice 1
Akhir kaar Gauri Shankar or Rupchand ne apne hisab se safedposh ki gutti suljha li
Thanks
सफेदपोश के बारे में न बता कर भी दादा ठाकुर एक तरह से बहुत कुछ बता जाते हैं, लेकिन कर भी क्या सकते हैं, ऐसे कर्म काण्ड कर दिए हैं खुद के ही भाई और बहु ने कि जीवन की बवासीर बन गया है वो, न तो बता सकते हैं, और छुपाना भी नामुमकिन है।

वैभव और रागिनी दोनो ही लगभग एक ही पसोपेश से जूझ रहे हैं, लेकिन अंतर्मन में दोनो ही राजी हो गए हैं।

जहां वैभव अपने अतीत के कारण हिचक रहा है, वही रागिनी के मन में बस यही गांठ है कि जिसे वो भाई समान समझ रही थी उसे अब पति के रूप में अगर जो स्वीकार कर भी लेती है, तो समाज क्या सोचेगा।

वहीं दूसरी ओर शालिनी के पूछने पर अदरसुचक शब्दों से वैभव को बोलना ये दर्शाता है कि वो मन ही मन वैभव को स्वीकार कर चुकी है।

अब बस दोनो को एकदूसरे के सामने अपने मन की बात खोलनी है।
Sahi kaha aapne, kuch na bata kar bhi saamne wale zahen me shak paida kar rahe wo...but jaisa ki aapne khud hi kaha kya kar sakte hain. Sach hota hi aisa hai Jo zyada time tak chhupa nahi rah sakta...

Ragini aur vaibhav ki mulakaat fir se hogi to sab kuch thik ho jayega..

Shalini aur Ragini bachpan ki saheli hain. Ittefaak se wo apni sasuraal se maayke aai hai to usko ragini ke bare me pata chala jiske chalte wo usse milne aai. Ek tarah se yu samajhiye ki ragini ke liye ek aur supporter aa gaya...
Welcome
Nice update🙏
Thanks
Dono hi updates ek se badhkar ek he TheBlackBlood Shubham Bhai,

Sabse pehle to aapka hardik dhanyawad jo aapne apne busy schedule me se time nikalkar ye updates post ki............

Pehle thakur mahender aur ab gauri shankar dono ko hi dada thakur ne safedposh ke khatme ki khabar to di............lekin ye nahi bataya ki vo kaun tha..............aakhir batate bhi kis tarah ki vo aur koi nahi unka bhai aur unke bhai ki patni thi...............ye raaz vo nasur ban gaya he dada thakur ke liye jiska ab koi ilaaz bhi nahi he...........

Lekin rupachander ne badi hi samajhdari se apne parivar ke beech ye rahasay suljha bhi diya aur is raaz ko sada ke raaz hi rakhne ke liye bol bhi diya...........

Thakurain ne badi hi sujhbujh se vaibhav ke sabhi doubts clear kar diye...............ab uska man shaant he........

Aakhir ragini ne bhi vaibhav aur apne rishte ko swikar hi liya..............halanki use mana karne ke liye uske pass koi thos vajah bhi nahi thi...........

Agle updates ka besabri se intezar rahega Bhai
Jab shak paida hota hai to uske bare me jaanne ki curiosity bhi hoti hai aur fir usi ke chalte insaan sach ka pata lagane lagta hai. Gauri shankar foolwati aur rupchandra ne yahi kiya hai....apni samajh ke chalte unhone apne tarike se safedposh ka sach pata Kiya...

Is rishte ko accept karna hi tha. Virodh jaisi koi baat ho hi nahi sakti thi kyoki dono taraf ki situation hi aisi thi...
मेनका ने बताया कि उन्होंने किस तरह षडयंत्र रचा और जगताप के मरने के बाद उसने इसको अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश की।ये सब अवधराज के भ्रमित करने के कारण हुआ है अवधराज के कारण एक परिवार तबाह हो गया मेनका जगताप के साथ बराबर की गुनेहगार है उसका गुनाह माफी के लायक तो नही है लेकिन अब देखते हैं ठाकुर साहब क्या फैसला लेते हैं
Thanks
बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया
आखिर सफेदपोश कौन हो सकता हैं ईस बारें में साहुकार परिवार ने तर्क वितर्क लगा के जान ही लिया और वो तर्क उन्होंने किसी को ना बताने का सोचकर बहुत ही अच्छा किया खैर देखते हैं आगे क्या होता है
Thanks
बहुत ही लाजवाब अपडेट
Thanks
Bahot jabardast update tha bhai bahot maja aaya dost. Thora pyaar
Thanks
TheBlackBlood bhai update kab de rahe ho. Aaj ka muhurt hai kya
Thanks
Ragni bhi Raji ho gyi aur vaibhav bhi Raji hai ab dekhte hai kaise ragni batati hai apne pariwar walo ko
❣️Waiting for next update
Kaise milta hai vaibhav ragni se
Thanks
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
81,735
119,687
354
अध्याय - 151
━━━━━━༻♥༺━━━━━━


रागिनी को ये सोच कर बड़ा अजीब सा लगने लगा कि जाने क्या सोचेंगे अब उसके माता पिता और भैया भाभी और साथ ही उसकी छोटी बहन भी। कहीं वो सब उसके बारे में कुछ ऊटपटांग तो नहीं सोच बैठेंगे? रागिनी का चेहरा इस एहसास के चलते ही लाज से सुर्ख पड़ता चला गया।


अब आगे....


वक्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता और ना ही उसे रोक लेने की किसी में क्षमता होती है। शाम को जब मैं खेतों से वापस हवेली आया तो मां ने मुझे पास बुला कर धीमें से बताया कि पिता जी ने मुझे चंदनपुर जाने की अनुमति दे दी है।

मां की इस बात को सुन कर जहां एक तरफ मुझे बेहद खुशी हुई वहीं दूसरी तरफ अचानक ही ये सोच कर अब घबराहट सी होने लगी कि कैसे मैं चंदनपुर जा कर अपनी भाभी का सामना कर सकूंगा? मुझे देख कर वो कैसा बर्ताव करेंगी? क्या वो मुझ पर गुस्सा होंगी? क्या वो इस सबके के लिए मुझसे शिकायतें करेंगी? कहीं वो ये तो नहीं कहेंगी कि मैं अब क्या सोच के उनसे मिलने आया हूं? कहीं वो....कहीं वो चंदनपुर में मुझे आया देख मेरे बारे में ग़लत तो नहीं सोचने लगेंगी? ऐसे न जाने कितने ही ख़याल सवालों के रूप में मेरे ज़हन में उभरने लगे जिसके चलते मेरा मन एकदम से भारी सा हो गया।

बहरहाल, मां ने ही कहा कि मैं कल सुबह ही चंदनपुर जा कर अपनी भाभी से मिल आऊं। उसके बाद मैं गुसलखाने में जा कर हाथ मुंह धोया और अपने कमरे में चला आया। कुछ ही देर में कुसुम चाय ले कर आ गई।

"मैं आपसे बहुत नाराज़ हूं।" मैंने उसके हाथ में मौजूद ट्रे से जैसे ही चाय का प्याला उठाया तो उसने सीधा खड़े हो कर मुझसे कहा।

"अच्छा वो क्यों भला?" मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा। उसने एकदम से मुंह फुला लिया था। ज़ाहिर है वो अपनी नाराज़गी दिखा रही थी मुझे।

"क्योंकि आपने मुझे....यानि अपनी गुड़िया को।" उसने अपनी एक अंगुली खुद की तरफ मोड़ कर कहा___"मेरी होने वाली भाभी से एक बार भी नहीं मिलाया। मेरी होने वाली भाभी का घर इतना पास है इसके बावजूद मैं उन्हें एक दिन भी देख नहीं सकी।"

"अरे! तो इसमें मुश्किल क्या है?" मैंने चाय की एक चुस्की ले कर कहा____"तुझे अगर उससे मिलना ही है तो जब चाहे उसके घर जा कर मिल सकती है।"

"वाह! बहुत अच्छे।" कुसुम ने मुझे घूरते हुए कहा____"कितनी अच्छी सलाह दी है आपने मुझे। ऐसी सलाह कैसे दे सकते हैं आप?"

"अरे! अब क्या हुआ?" मैं सच में इस बार चौंका____"क्या तुझे ये ग़लत सलाह लगती है?"

"और नहीं तो क्या?" उसने ट्रे को पलंग पर रख दिया और फिर अपने दोनों हाथों को अपनी कमर पर रख कर कहा____"मैंने तो सोचा था कि आप अपनी गुड़िया को बढ़िया जीप में बैठा कर भाभी से मिलवाने ले चलेंगे लेकिन नहीं, आपने तो गंदी वाली सलाह दे दी मुझे।"

"अब मुझे क्या पता था कि तुझे अपनी होने वाली भाभी से मिलने का कम बल्कि जीप में बैठ कर घूमने का ज़्यादा मन है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुझे पहले ही साफ साफ बता देना था कि जीप में बैठ कर घूमने जाना है तेरा।"

"ऐसा कुछ नहीं है।" कुसुम ने बुरा सा मुंह बनाया____"जीप में बैठ कर घूमने जाना होगा तो वो मैं कभी भी घूम सकती हूं। मैं जब भी आपको कहूंगी तो आप मुझे घुमाने ले जाएंगे लेकिन मुझे सच में अपनी होने वाली भाभी से मिलना है।"

"मतलब तू सच में ही मिलना चाहती है उससे?" मैंने ग़ौर से देखा उसे।

"हे भगवान!" कुसुम ने अपने माथे पर हल्के से हथेली मारते हुए कहा____"क्या आपको अपनी लाडली बहन की बात पर बिल्कुल भरोसा नहीं है? सच में बहुत गंदे हो गए हैं आप। जाइए मुझे आपसे बात ही नहीं करना अब।"

कहने के साथ ही वो लपक कर पलंग के किनारे बैठ गई और फिर मेरी तरफ अपनी पीठ कर के मुंह फुला कर बैठ गई। मैं समझ गया कि वो रूठ जाने का नाटक कर रही है और चाहती है कि मैं उसे हमेशा की तरह प्यार से मनाऊं...और ऐसा होना ही था। मैं हमेशा की तरह उसको मनाने ही लगा। आख़िर मेरी लाडली जो थी, मेरी जान जो थी।

"अच्छा ठीक है।" मैं उसके पास आ कर बोला____"अब नाराज़ होने का नाटक मत कर। कल सुबह तुझे ले चलूंगा उससे मिलवाने।"

"ना, मैं अभी भी नाराज़ हूं।" उसने बिना मेरी तरफ पलटे ही कहा____"पहले अच्छे से मनाइए मुझे।"

"हम्म्म्म तो फिर तू ही बता कैसे मनाऊं तुझे?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा___"अगर तू नन्ही सी गुड़िया होती तो तुझे दोनों हाथों में ले कर हवा में उछालता, तुझे गोद में लेता। लेकिन तू तो अब थोड़ी बड़ी हो गई है और इतनी भारी भी हो गई है कि मैं तुझे दोनों हाथों में ले कर उछाल ही नहीं पाऊंगा।"

"हाय राम! कितना झूठ बोलते हैं आप?" कुसुम एकदम से पलट कर मेरी तरफ आश्चर्य से आंखें फैला कर बोली____"मैं कहां बड़ी हो गई हूं और जब बड़ी ही नहीं हुई हूं तो भारी कैसे हो सकती हूं? आप अपनी गुड़िया के बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं?"

"चल मान लिया कि तू बड़ी नहीं हुई है।" मैंने कहा____"लेकिन तू नन्ही सी भी तो नहीं है ना। क्या तुझे खुद ये नहीं दिख रहा?"

"हां ये तो सही कह रहे हैं आप।" कुसुम एक नज़र खुद को देखने के बाद मासूमियत से बोली____"पर मैं तो आपकी गुड़िया ही हूं ना तो आप मुझे उठा ही सकते हैं। वैसे भी, मैं जानती हूं कि मेरे सबसे अच्छे वाले भैया बहुत शक्तिशाली हैं। वो किसी को भी उठा सकते हैं।"

"चल अब मुझे चने के झाड़ पर मत चढ़ा।" मैंने कहा____"मैं सच में तुझे गोद में उठाने वाला नहीं हूं लेकिन हां अपनी गुड़िया को प्यार से गले ज़रूर लगा सकता हूं, आ जा।"

मेरा इतना कहना था कि कुसुम लपक कर मेरे गले से लग गई। मेरे सामने छोटी सी बच्ची बन जाती थी वो और वैसा ही बर्ताव करती थी। कुछ देर गले लगाए रखने के बाद मैंने उसे खुद से अलग किया।

"चल अब जा।" फिर मैंने उसके चेहरे को प्यार से सहला कर कहा____"और कल सुबह तैयार रहना अपनी होने वाली भाभी से मिलने के लिए।"

"कल क्यों?" उसने हौले से मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे तो आज और अभी मिलना है अपनी भाभी से।"

"अरे! पागल है क्या तू?" मैं बुरी तरह चौंकते हुए बोला____"देख नहीं रही शाम हो गई है। इस समय कैसे मैं तुझे उससे मिलवा सकता हूं?"

"क्यों नहीं मिलवा सकते?" कुसुम ने अपनी भौंहें ऊपर कर के कहा____"भाभी का घर कौन सा बहुत दूर है? क्या मेरी ख़ुशी के लिए इसी समय आप मुझे भाभी से मिलवाने नहीं ले जा सकते?"

कुसुम की इन बातों से मैं सकते की सी हालत में देखता रह गया उसे। अजीब दुविधा में डाल दिया था उसने। मैं सोच में पड़ गया कि अब क्या करूं? ऐसा नहीं था कि मैं इस समय उसे रूपा से मिलवा नहीं सकता था लेकिन मैं ये भी सोचने लगा था कि अगर मैंने ऐसा किया तो रूपा के घर वाले क्या सोचेंगे?

"अच्छा ठीक है।" फिर मैंने कुछ सोच कर कहा____"मैं तुझे इसी समय ले चलता हूं लेकिन मेरी भी एक शर्त है।"

"कैसी शर्त?" उसके माथे पर शिकन उभरी।

"यही कि मैं उसके घर के अंदर नहीं जाऊंगा।" मैंने कहा____"बल्कि तुझे उसके घर पहुंचा दूंगा, ताकि तू उससे मिल ले और मैं बाहर ही तेरे वापस आने का इंतज़ार करूंगा।"

"अब ये क्या बात हुई भला?" कुसुम ने हैरानी से कहा____"आप अकेले बाहर मेरे आने का इंतज़ार करेंगे? नहीं नहीं, ऐसे में मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा। आप भी मेरे साथ अंदर चलेंगे।"

"समझने की कोशिश कर कुसुम।" मैंने कहा____"इस वक्त मेरा उन लोगों के घर जाना बिल्कुल भी उचित नहीं है। मैं रूपचंद्र को बाहर ही बुला लूंगा। वो तुझे अपनी बहन के पास छोड़ आएगा और मैं तेरे आने तक उसके साथ बाहर ही पेड़ के नीचे बने चबूतरे में बैठ कर उससे बातें करता रहूंगा। जब तू वापस आएगी तो तुझे ले कर वापस हवेली आ जाऊंगा।"

"और अगर भाभी के घर वालों को पता चला कि आप बाहर ही बैठे हैं तो क्या ये उन्हें अच्छा लगेगा?" कुसुम ने कहा____"क्या वो ये नहीं सोचेंगे कि आप क्यों अंदर नहीं आए?"

"उनके कुछ सोचने से मुझे फ़र्क नहीं पड़ता मेरी बहना।" मैंने कहा____"इस समय जो उचित है मैं वही करूंगा। ख़ैर तू ये सब छोड़ और जा कर तैयार हो जा। मैं कुछ ही देर में नीचे आता हूं।"

कुसुम खुशी खुशी चाय का खाली प्याला उठा कर कमरे से चली गई। उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि मेरी बहन का भी हिसाब किताब अलग ही है। ख़ैर मुझे उसकी ख़ुशी के लिए अब ये करना ही था इस लिए मैं भी उठ कर कपड़ों के ऊपर गर्म सूटर पहनने लगा।

✮✮✮✮

कुछ ही देर में मैं कुसुम को जीप में बैठाए रूपचंद्र के घर के सामने सड़क पर पहुंच गया। इत्तेफ़ाक से रूपचंद्र सड़क के किनारे मोड़ पर ही मौजूद पेड़ के पास ही मिल गया। वो पेड़ के नीचे बने चबूतरे में गांव के किसी लड़के के साथ बैठा उससे बातें कर रहा था। मुझे जीप में इस वक्त कुसुम के साथ आया देख वो चौंका और जल्दी ही चबूतरे से उतर कर मेरे पास आ गया।

"अरे! अच्छा हुआ कि तुम यहीं मिल गए मुझे।" वो जैसे ही मेरे पास आया तो मैंने उससे कहा____"मैं तुम्हें ही बुलाने की सोच रहा था।"

"क्या बात है वैभव?" उसने एक नज़र कुसुम की तरफ देखने के बाद मुझसे पूछा____"तुम इस वक्त कहीं जा रहे हो क्या?"

"वो असल में मेरी ये बहन तुम्हारी बहन से मिलने की ज़िद कर रही थी।" मैंने थोड़े संकोच के साथ कहा____"इस लिए मैं इसको उससे मिलाने के लिए ही यहां लाया हूं। तुम एक काम करो, इसको अपने साथ ले जाओ और अपनी बहन के पास छोड़ आओ।"

"अरे! ये तो बहुत अच्छी बात है।" रूपचंद्र के चेहरे पर खुशी चमक उभर आई____"लेकिन तुम इन्हें छोड़ आने को क्यों कह रहे हो? क्या तुम नहीं चलोगे?"

"नहीं यार, मैं अंदर नहीं जाऊंगा।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"मैंने इससे भी यही कहा था कि मैं बाहर ही रहूंगा और तुम इसको अपनी बहन के पास छोड़ आओगे।"

"ये सब तो ठीक है।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन तुम्हें अंदर चलने में क्या समस्या है? अब जब यहां तक आ ही गए हो तो अंदर भी चलो। हम सबको अच्छा ही लगेगा।"

"समझने की कोशिश करो भाई।" मैंने कहा____"मुझे अंदर ले जाने की कोशिश मत करो। तुम मेरी गुड़िया को अपनी बहन के पास ले जाओ। मैं यहीं पर इसके वापस आने का इंतज़ार करूंगा।"

"ठीक है, अगर तुम नहीं चलना चाहते तो कोई बात नहीं।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं इन्हें रूपा के पास छोड़ कर वापस आता हूं।"

मेरे इशारा करने पर कुसुम चुपचाप जीप से नीचे उतर गई। उसके बाद वो रूपचंद्र के साथ उसके घर के अंदर की तरफ बढ़ गई। इधर मैंने भी जीप को वापस मोड़ा और फिर उससे उतर कर पेड़ के चबूतरे पर जा कर बैठ गया। सच कहूं तो इस वक्त मुझे बड़ा ही अजीब महसूस हो रहा था लेकिन मजबूरी थी इस लिए बैठा रहा। रूपचन्द्र जिस लड़के से बातें कर रहा था वो पता नहीं कब चला गया था और अब मैं अकेला ही बैठा था। मन में ये ख़याल भी उभरने लगा कि अंदर मेरी गुड़िया अपनी होने वाली भाभी से जाने क्या बातें करेगी?

कुछ ही देर में रूपचंद्र आ गया और मेरे पास ही चबूतरे पर बैठ गया। आते ही उसने बताया कि उसके घर वाले कुसुम को देख बड़ा खुश हुए हैं लेकिन ये जान कर उन्हें अच्छा नहीं लगा कि उनका होने वाला दामाद गैरों की तरह बाहर सड़क के किनारे बैठा है।

"मैंने फिलहाल उन्हें समझा दिया है कि तुम अंदर नहीं आना चाहते।" रूपचंद्र ने कहा____"इस लिए तुम्हें अंदर बुलाने की वो भी ज़िद न करें। ख़ैर और बताओ, कुसुम का अचानक से मेरी बहन से मिलने का मन कैसे हो गया?"

"सब अचानक से ही हुआ भाई।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"वो ऐसी ही है। कब उसके मन में क्या आ जाए इस बारे में उसे खुद भी पता नहीं होता। अभी कुछ देर पहले वो मेरे कमरे में मुझे चाय देने आई थी और फिर एकदम से कहने लगी कि उसे अपनी होने वाली भाभी से मिलना है। मैंने उससे कहा कि सुबह मिलवा दूंगा लेकिन नहीं मानी। कहने लगी कि उसे अभी मिलना है। बहुत समझाया लेकिन नहीं मानी, आख़िर मुझे उसे ले कर आना ही पड़ा।"

"हा हा हा।" रूपचंद्र ठहाका लगा कर हंस पड़ा____"सचमुच कमाल की हैं वो। ख़ैर, जब मैं उन्हें ले कर अंदर पहुंचा तो सबके सब पहले तो बड़ा हैरान हुए, फिर जब मैंने उन्हें बताया कि वो अपनी होने वाली भाभी से मिलने आई हैं तो सब मुस्कुरा उठे। थोड़ा हाल चाल पूछने के बाद मां ने रूपा को आवाज़ दी जो रसोई में थी। मां के कहने पर रूपा कुसुम के साथ अपने कमरे में चली गई थी।"

"और घर में कैसी चल रही हैं शादी की तैयारियां?" मैंने पूछा।

"सब के सब लगे हुए हैं।" रूपचंद्र ने कहा____"दीदी के ससुराल वाले तो जल्द ही शादी का मुहूर्त बनवाना चाहते थे लेकिन महीने के बाद से पहले कोई मुहूर्त ही नहीं था इस लिए मजबूरन उन्हें उसी मुहूर्त पर सब कुछ तय करना पड़ा।"

"हां विवाह जैसे संबंध शुभ मुहूर्त पर ही तो होते हैं।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"ख़ैर सबसे अच्छी बात यही है कि लगन तय हो गया और अब तुम्हारी बहनों का ब्याह होने वाला है।"

"ये सब दादा ठाकुर की ही कृपा से संभव हो सका है वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"उनका हाथ न होता तो इस विवाह का होना संभव ही नहीं था। हम सब भी न जाने कैसी मानसिकता का शिकार थे जिसके चलते ये सब कर बैठे। अब भी जब वो सब याद आता है तो खुद से घृणा होने लगती है।"

"सच कहूं तो मेरा भी यही हाल है।" मैंने गहरी सांस ली____"इसके पहले मैंने जो कर्म किए थे उनकी वजह से मेरे साथ जो हुआ उसके लिए मैं भी ऐसा ही सोचता हूं। अपने कर्मों के लिए मुझे भी खुद से घृणा होती है और तकलीफ़ होती है। काश! ऐसा हुआ करे कि इस दुनिया का कोई भी व्यक्ति ग़लत कर्म करने का सोचे ही नहीं।"

"ये तो असंभव है।" रूपचंद्र ने कहा____"आज के युग में हर कोई अच्छा कर्म करे ऐसा संभव ही नहीं है। ख़ैर छोड़ो, ये बताओ रागिनी दीदी की कोई ख़बर आई?"

"नहीं।" रूपचंद्र के मुख से अचानक भाभी का नाम सुनते ही मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई____"अभी तक तो नहीं आई लेकिन मैं कल उनसे मिलने चंदनपुर जा रहा हूं।"

"अच्छा।" रूपचंद्र ने हैरानी से कहा____"किसी विशेष काम से जा रहे हो क्या?"

"कुछ बातें हैं जिन्हें मैं उनसे कहना चाहता हूं यार।" मैंने सहसा गंभीर हो कर कहा____"तुम शायद यकीन न करो लेकिन सच ये है कि जब से मुझे ये पता चला है कि हम दोनों के घर वालों ने हमारा आपस में ब्याह कर देने का फ़ैसला किया है तब से मेरे मन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभर रहे हैं। मैं खुद को अपराधी सा महसूस करता हूं। मुझे ये सोच कर पीड़ा होने लगती है कि इस रिश्ते के चलते कहीं भाभी मुझे ग़लत न समझने लगीं हों। बस इसी के चलते मैं उनसे एक बार मिलना चाहता हूं और उन्हें बताना चाहता हूं कि इस रिश्ते के बाद भी मेरे मन में उनके प्रति कोई ग़लत भावना नहीं है। मेरे अंदर उनके लिए वैसा ही आदर सम्मान है जैसे हमेशा से रहा है।"

"तुम्हारे मुख से ऐसी अद्भुत बातें सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा करता है वैभव।" रूपचंद्र ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा____"सच कहता हूं, यकीन तो अब भी नहीं होता कि तुम इतने अच्छे इंसान बन गए हो लेकिन यकीन इस लिए कर लेता हूं क्योंकि मैंने अपनी आंखों से देखा है और दिल से महसूस किया है। मैं खुद भी तो बदल गया हूं। इसके पहले तुमसे बहुत ज़्यादा ईर्ष्या और नफ़रत करता था लेकिन आज जितना अपनी बहन से प्यार और स्नेह करता हूं उतना ही तुमसे भी करने लगा हूं। हो सकता है कि ये कोई चमत्कार हो या कोई नियति का खेल लेकिन सच यही है। ख़ैर तुम अगर ऐसा सोचते हो तो यकीनन रागिनी दीदी से मिल लो और उनसे अपने दिल की बातें कह डालो। शायद इसके चलते तुम्हें भी हल्का महसूस हो और उधर रागिनी दीदी के मन से भी किसी तरह की अथवा आशंका दूर हो जाए। वैसे सच कहूं तो जैसे अनुराधा को मेरी बहन ने अपना लिया था और मैं खुद भी तुम्हारे साथ उसका ब्याह होने से खुश था उसी तरह रागिनी दीदी को भी मेरी बहन ने अपना लिया है और मैं भी चाहता हूं उनका तुम्हारे साथ ब्याह हो जाए।"

"वैसे अगर तुम बुरा न मानो तो क्या तुमसे एक बात पूछूं?" मैंने कहा।

"हां बिल्कुल पूछो।" रूपचंद्र ने कहा____"और बुरा मानने का तो सवाल ही नहीं है।"

"सच कहूं तो अभी अभी मेरे मन में एक ख़याल उभरा है।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"और अगर भाभी से ब्याह होने वाली बात का ज़िक्र न हुआ होता तो शायद मेरे मन में ये ख़याल उभरता भी नहीं। मैं तुमसे ये पूछना चाहता हूं कि जिस तरह मेरे माता पिता ने अपनी विधवा बहू की खुशियों का ख़याल रखते हुए उनका ब्याह मुझसे कर देने का निर्णय लिया है तो क्या वैसे ही तुम भी अपनी किसी भाभी के साथ ब्याह करने का नहीं सोच सकते?"

"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपचंद्र ने चकित भाव से मेरी तरफ देखा____"मैं भला क्यों ऐसा सोचूंगा यार?"

"मानता हूं कि तुम नहीं सोच सकते।" मैंने कहा____"लेकिन तुम्हारे घर वाले तो सोच ही सकते हैं?"

"नहीं।" रूपचंद्र ने कहा____"इस तरह की कोई बात मेरे घर में किसी के भी मन में नहीं है।"

"ये तुम कैसे कह सकते हो?" मैंने जैसे तर्क़ किया____"हो सकता है कि ये बात तुम्हारे घर में किसी न किसी के ज़हन में आई ही हो। मैं ऐसा इस लिए भी कह रहा हूं क्योंकि भाभी के साथ मेरा ब्याह होने की बात तुम्हारे घर वालों को भी पता है। ऐसे में कभी न कभी किसी न किसी के मन में ये ख़याल तो उभरा ही होगा कि जब दादा ठाकुर अपनी बहू के भले के लिए ऐसा सोच कर उनका ब्याह मेरे साथ करने का फ़ैसला कर सकते हैं तो उन्हें भी अपनी बहुओं के भले के लिए ऐसा ही कुछ करना चाहिए।"

रूपचंद्र मेरी बात सुन कर फ़ौरन कुछ बोल ना सका। उसके चेहरे पर हैरानी के भाव तो उभरे ही थे किंतु एकाएक वो सोच में भी पड़ गया नज़र आने लगा था। इधर मुझे लगा कहीं मैंने कुछ ज़्यादा ही तो नहीं बोल दिया?

"क्या हुआ?" वो जब सोच में ही पड़ा रहा तो मैंने पूछा____"क्या मैंने कुछ गलत कह दिया?"

"नहीं।" रूपचंद्र ने गहरी सांस ली____"तुम्हारा ऐसा सोचना और कहना एक तरह से जायज़ भी है लेकिन ये भी सच है कि मेरे घर में फिलहाल ऐसा कुछ कोई भी नहीं सोच रहा।"

"हो सकता है कि उन्होंने ऐसा सोचा हो लेकिन इस बारे में तुम्हें पता न लगने दिया हो।" मैंने जैसे संभावना ज़ाहिर की।

"हां ये हो सकता है।" रूपचन्द्र ने अनिश्चित भाव से कहा____"लेकिन मुझे यकीन है कि मेरे घर वाले ऐसा करने का नहीं सोच सकते।"

"चलो मान लिया कि नहीं सोच सकते।" मैंने उसकी तरफ गौर से देखते हुए कहा____"लेकिन अगर ऐसी कोई बात तुम्हारे सामने आ जाए तो तुम क्या करोगे? क्या तुम अपनी किसी भाभी से ब्याह करने के लिए राज़ी हो जाओगे?"

"यार ये बड़ा मुश्किल सवाल है।" रूपचंद्र ने बेचैन भाव से कहा____"सच तो ये है कि मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं है और ना ही कभी अपनी भाभियों के बारे में कुछ गलत सोचा है।"

"सोचा तो मैंने भी नहीं था कभी।" मैंने कहा____"लेकिन देख ही रहे हो कि हर किसी की उम्मीदों से परे आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि मुझे अपनी भाभी का जीवन फिर से संवारने के लिए उनके साथ ब्याह करने को राज़ी होना पड़ा है। इसी तरह क्या तुम अपनी किसी भाभी की खुशियों का खयाल कर के ऐसा नहीं कर सकोगे? मान लो मेरी तरह तुम्हारे घर वालों ने भी तुम्हारे सामने भी ऐसा प्रस्ताव रख दिया तब तुम क्या करोगे? क्या अपनी किसी भाभी से ब्याह करने से इंकार कर दोगे तुम?"

"तुमने बिल्कुल ठीक कहा वैभव।" रूपचंद्र ने एक बार फिर बेचैनी से गहरी सांस ली____"वाकई में अगर ऐसा हुआ तो मुझे भी तुम्हारी तरह ऐसे रिश्ते के लिए राज़ी होना ही पड़ेगा। हालाकि ऐसा अगर कुछ महीने पहले होता तो शायद मैं ऐसे रिश्ते के लिए राज़ी न होता लेकिन अब यकीनन हो सकता हूं। ऐसा इस लिए क्योंकि तुम्हारी तरह मैं भी अब पहले जैसी मानसिकता वाला इंसान नहीं रहा। ख़ैर क्योंकि ऐसी कोई बात है ही नहीं इस लिए बेकार में इस बारे में क्या सोचना?"

मैं रूपचंद्र को बड़े ध्यान से देखे जा रहा था। ऐसी बातों के ज़िक्र से एकाएक ही उसके चेहरे पर कुछ अलग ही किस्म के भाव उभरे हुए दिखाई देने लगे थे।

"हां ये तो है।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"वैसे तुम्हारी बड़ी भाभी को संतान के रूप में एक बेटी तो है जिसके सहारे वो अपना जीवन गुज़ार सकती हैं लेकिन छोटी भाभी का क्या? मेरा मतलब है कि उनकी शादी हुए भी तो अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ है, उनको कोई औलाद भी नहीं है। ऐसे में क्या वो इसी तरह विधवा के रूप में अपना सारा जीवन गुज़ारेंगी?"

"इस बारे में क्या कह सकता हूं मैं?" रूपचंद्र ने कहा____"उनके नसीब में शायद ऐसे ही जीवन गुज़ारना लिखा है।"

"नसीब ऐसे ही नहीं लिखा होता भाई।" मैंने कहा____"इस दुनिया में कर्म प्रधान है। हमें हर चीज़ के लिए कर्म करना पड़ता है, फल मिले या न मिले वो अलग बात है। जैसे मेरे माता पिता ने अपनी बहू के जीवन को फिर से संवारने के लिए ये क़दम उठाया उसी तरह तुम्हारे घर वाले भी उठा सकते हैं। जब ऐसा होगा तो यकीनन तुम्हारी भाभी का नसीब भी दूसरी शक्ल में नज़र आने लगेगा। अब ये तुम पर और तुम्हारे घर वालों पर निर्भर करता है कि वो कैसा कर्म करते हैं या नहीं।"

"मैं तुम्हें अपनी राय और अपना फ़ैसला बता चुका हूं वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"बाकी मेरे घर वालों की मर्ज़ी है कि वो क्या करना चाहते हैं और क्या नहीं। मैं अपनी तरफ से इस बारे में किसी से कुछ भी नहीं कहूंगा।"

"ख़ैर जाने दो।" मैंने कहा____"जो होना होगा वो होगा ही।"

अभी मैंने ये कहा ही था कि तभी मेरे कानों में कुछ आवाज़ें पड़ीं। मैंने और रूपचंद्र ने पलट कर आवाज़ की दिशा में देखा। कुसुम दो तीन औरतों के साथ घर से बाहर आ गई थी। शाम पूरी तरह से हो चुकी थी और अंधेरा फैल गया था इस लिए उन औरतों में से एक ने अपने हाथ में लालटेन ले रखा था। कुछ ही देर में कुसुम उन औरतों के साथ बाहर सड़क पर आ गई। इधर मैं और रूपचंद्र भी चबूतरे से उतर आए थे।

"तुमने अपने होने वाले बहनोई को यहां ऐसे ही बैठा रखा था रूप।" फूलवती ने थोड़ी नाराज़गी से कहा____"ना पानी का पूछा और ना ही चाय का?"

"अरे! नहीं बड़ी मां।" मैं झट से रूपचन्द्र से पहले बोल पड़ा____"ऐसी बात नहीं है। रूपचंद्र ने मुझसे इस सबके लिए पूछा था लेकिन मैंने ही मना कर दिया था। आप बेवजह नाराज़ मत होइए।"

मेरे मुख से ये बात सुनते ही रूपचंद्र ने हल्के से चौंक कर मेरी तरफ देखा, फिर हौले से मुस्कुरा उठा। बहरहाल मैंने कुसुम को जीप में बैठने को कहा और खुद भी जीप की स्टेयरिंग शीट पर बैठ गया। कुसुम ने सबको हाथ जोड़ कर नमस्ते किया। उसके बाद मैंने जीप को हवेली की तरफ बढ़ा दिया। कुसुम बड़ा ही खुश नज़र आ रही थी।




━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
81,735
119,687
354
अध्याय - 152
━━━━━━༻♥༺━━━━━━



अगली सुबह।
चाय नाश्ता कर के मैं हवेली से चंदनपुर जाने के लिए जीप से निकला। मां ने मुझे समझाया था कि मैं वहां किसी से भी बेवजह उलझने जैसा बर्ताव न करूं और ना ही अपनी भाभी से ऐसी कोई बात कहूं जिससे कि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचे। हालाकि ऐसा मैं कर ही नहीं सकता था लेकिन मां तो मां ही थीं, शायद फिक्रमंदी के चलते उन्होंने मुझे ऐसी सलाह दी थी।

पूरे रास्ते मैं भाभी के बारे में ही जाने क्या क्या सोचता रहा। मन में तरह तरह की आशंकाएं उभर आतीं थी जिनके चलते मेरे अंदर एक घबराहट सी होने लगी थी। मैं अपने आपको इस बात के लिए तैयार करता जा रहा था कि जब भाभी से मेरा सामना होगा तब मैं उनके सामने बहुत ही सभ्य और शांत तरीके से अपने दिल की बातें रखूंगा। यूं तो मुझे पूरा भरोसा था कि भाभी मुझे समझेंगी लेकिन इसके बावजूद जाने क्यों मेरे मन में आशंकाएं उभर आतीं थी।

बहरहाल, दोपहर होने से पहले ही मैं चंदनपुर गांव यानि रागिनी भाभी के मायके पहुंच गया। अभी कुछ समय पहले ही मैं यहां आया था, इस लिए जैसे ही भैया के ससुराल वालों ने मुझे फिर से आया देखा तो सबके चेहरों पर हैरानी के भाव उभर आए। ये अलग बात है कि बाद में जल्दी ही उनके चेहरों पर खुशी के भाव भी उभर आए थे।

"अरे! क्या बात है।" भाभी का भाई वीरेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आते हुए बोला____"हमारे वैभव महाराज तो बड़ा जल्दी जल्दी हमें दर्शन दे रहे हैं।"

वीरेंद्र ने कहने के साथ ही झुक कर मेरे पैर छुए। उसकी बातों से जाने क्यों मैं थोड़ा असहज सा हो गया था। ये अलग बात है कि मैं जल्दी ही खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए हल्के से मुस्कुरा उठा था। ख़ैर वीरेंद्र मुझे ले कर अंदर बैठक में आया, जहां बाकी लोग पहले से ही मौजूद थे। सबने एक एक कर के मेरे पांव छुए। एक बार फिर से वही क्रिया दोहराई जाने लगी, यानि पीतल की थाल में मेरे पांव धोना वगैरह। थोड़ी देर औपचारिक तौर पर हाल चाल हुआ। इसी बीच अंदर से वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी मेरे लिए जल पान के कर आ गईं।

घर में इस वक्त मर्दों के नाम पर सिर्फ वीरेंद्र सिंह ही था, बाकी मर्द खेत गए हुए थे। मेरे आने की ख़बर फ़ौरन ही भैया के चाचा ससुर के घर तक पहुंच गई थी इस लिए उनके घर की औरतें और बहू बेटियां भी आ गईं।

"और बताईए महाराज बड़ा जल्दी आपके दर्शन हो गए।" वीरेंद्र सिंह ने पूछा____"यहां किसी विशेष काम से आए हैं क्या?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा____"असल में उस समय जब मैं यहां आया था तो भाभी को लेने आया था। उस समय मुझे बाकी बातों का बिल्कुल भी पता नहीं था। उसके बाद जब यहां से गया तो मां से ऐसी बातें पता चलीं जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"हां मैं समझ सकता हूं महाराज।" वीरेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और कृपया मुझे भी माफ़ करें मैंने भी इसके पहले इस बारे में आपको कुछ नहीं बताया। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि आपसे कैसे कहूं? दूसरी बात ये थी कि हम चाहते थे कि ये सब बातें आपको अपने ही माता पिता से पता चलें तो ज़्यादा उचित होगा।"

अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भाभी की मां सुलोचना देवी आ गईं। उन्हें देख कर मैं फिर से थोड़ा असहज सा महसूस करने लगा।

"कोई ख़ास काम था क्या महाराज?" सुलोचना देवी ने आते ही थोड़ी फिक्रमंदी से पूछा____"जिसके लिए आपको फिर से यहां आना पड़ा है?"

"वैभव महाराज को रिश्ते के बारे में पता चल चुका है मां।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही वीरेंद्र ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा____"और ये शायद उसी सिलसिले में यहां आए हैं।"

"ओह! सब ठीक तो है ना महाराज?" सुलोचना देवी एकदम से चिंतित सी नज़र आईं।

"हां मां जी सब ठीक ही है।" मैंने खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए कहा____"मैं यहां बस भाभी से मिलने आया हूं। उनसे कुछ ऐसी बातें कहने आया हूं जिन्हें कहे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकता। आप कृपया मेरी इस बात को अन्यथा मत लें और कृपा कर के मुझे भाभी से अकेले में बात करने का अवसर दें।"

मेरी बात सुन कर सुलोचना देवी और वीरेंद्र सिंह एक दूसरे की तरफ देखने लगे। चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे। फिर सुलोचना देवी ने जैसे खुद को सम्हाला और होठों पर मुस्कान सजा कर कहा____"ठीक है, अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो मैं रागिनी से अकेले में आपकी मुलाक़ात करवा देती हूं। आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आती हूं।"

कहने के साथ ही सुलोचना देवी पलट कर अंदर की तरफ चली गईं। इधर वीरेंद्र सिंह जाने किस सोच में गुम हो गया था। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं। बस ख़ामोशी से वक्त के गुज़रने का इंतज़ार करने लगा।

क़रीब पांच मिनट बाद सुलोचना देवी बाहर आईं। उन्होंने मुझे अपने साथ अंदर चलने को कहा तो मैं एक नज़र वीरेंद्र सिंह पर डालने के बाद पलंग से उठा और सुलोचना देवी के साथ अंदर की तरफ बढ़ चला। एकाएक ही मेरी धड़कनें तीव्र गति से चलने लगीं थी और साथ ही ये सोच कर घबराहट भी होने लगी थी कि भाभी के सामने कैसे खुद को सामान्य रख पाऊंगा मैं? कैसे उनसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बातें कह पाऊंगा? क्या वो मुझे समझेंगी?

सुलोचना देवी मुझे ले कर घर के पिछले हिस्से में आ गईं। घर के पीछे खाली जगह थी जहां पर एक तरफ कुआं था और बाकी कुछ हिस्सों में कई सारे पेड़ पौधे लगे हुए थे।

"महाराज।" सुलोचना देवी ने पलट कर मुझसे कहा____"आप यहीं रुकें, मैं रागिनी को भेजती हूं।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा और कुएं की तरफ यूं ही बढ़ चला।

उधर सुलोचना देवी वापस अंदर चली गईं। मैं कुएं के पास आ कर उसमें झांकने लगा। कुएं में क़रीब पांच फीट की दूरी पर पानी नज़र आया। मैं झांकते हुए कुएं के पानी को ज़रूर देखने लगा था लेकिन मेरा मन इसी सोच में डूबा हुआ था कि भाभी के आने पर क्या होगा? क्या मेरी तरह उनका भी यही हाल होगा? क्या मेरी तरह वो भी घबराई हुई होंगी?

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। किसी के आने के एहसास से एकाएक मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल ने एकदम से धड़कना ही बंद कर दिया हो। सब कुछ थम गया सा महसूस हुआ। मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्हाला और फिर धीरे से पलटा।

मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। गुलाबी कुर्ते सलवार में वो मेरी तरफ पीठ किए अमरूद के पेड़ के पास ठहर ग‌ईं थी। उनके बालों की चोटी उनकी पीठ से होते हुए नीचे उनके नितम्बों को भी पार गई थी। सहसा वो थोड़ा सा घूमीं जिसके चलते मुझे उनके चेहरे की थोड़ी सी झलक मिली। दोनों हाथों में पकड़े अपने दुपट्टे के छोर को हौले हौले उमेठने में लगीं हुईं थी वो।

कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहने के बाद मैं हिम्मत जुटा कर उनकी तरफ बढ़ा। मेरी धड़कनें जो इसके पहले थम सी गई थी वो चलने तो लगीं थी लेकिन हर गुज़रते पल के साथ वो धाड़ धाड़ की शक्ल में बजते हुए मेरी पसलियों पर चोट करने लगीं थी। आख़िर कुछ ही पलों में मैं उनके थोड़ा पास पहुंच गया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया था कि मैं उनके पास आ गया हूं इस लिए दुपट्टे को उमेठने वाली उनकी क्रिया एकदम से रुक गई थी।

"भ...भाभी।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ बड़ी मुश्किल से उन्हें पुकारा।

एकाएक ही मेरे अंदर बड़ी तेज़ हलचल सी मच गई थी जिसे मैं काबू में करने का प्रयास करने लगा था। उधर मेरे पुकारने पर भाभी पर प्रतिक्रिया हुई। वो बहुत धीमें से मेरी तरफ को पलटीं। अगले ही पल उनका खूबसूरत चेहरा पूरी तरह से मुझे नज़र आया। वो पलट तो गईं थी लेकिन मेरी तरफ देख नहीं रहीं थी। पलकें झुका रखीं थी उन्होंने। सुंदर से चेहरे पर हल्की सी सुर्खी छाई नज़र आई।

"अ...आप ठीक तो हैं ना?" मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से पूछा।

"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से सिर हिलाया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किस तरह से उनसे वो बातें कहूं जो मैं उनसे कहने आया था। मेरे दिलो दिमाग़ में हलचल सी मची हुई थी। हल्की ठंड में भी मेरे चहरे पर घबराहट के चलते पसीना उभर आया था।

"व..वो मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं आपको अपने दिल की बात कहूं?" फिर मैंने किसी तरह उनकी तरफ देखते हुए कहा।

उनकी पलकें अभी भी झुकी हुईं थी किन्तु मेरी बात सुनते ही उन्होंने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ देखा। अगले ही पल हमारी नज़रें आपस में टकरा गईं। मुझे अपने अंदर एकदम से झुरझरी सी महसूस हुई। वो सवालिया भाव से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"कृपया आप मुझे ग़लत मत समझिएगा।" मैंने झिझकते हुए कहा____"मैं यहां आपसे ये कहने आया हूं कि मेरे दिल में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आगे कभी हो सकता है। मैं पहले भी आपका दिल की गहराइयों से आदर और सम्मान करता था और आगे भी करता रहूंगा।"

मेरी ये बातें सुनते ही भाभी के चेहरे पर राहत और खुशी जैसे भाव उभरे। उनकी आंखें जो विरान सी नज़र आ रहीं थी उनमें एकाएक नमी सी नज़र आने लगी। कुछ कहने के लिए उनके होठ कांपे किंतु शायद उनसे कुछ बोला नहीं गया।

"उस दिन जब मैं यहां आपको लेने आया था तो मुझे कुछ भी पता नहीं था।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"यहां कामिनी ने जब मुझसे आपके ब्याह होने की बात बताई तो मुझे सच में धक्का लगा था क्योंकि आपका फिर से ब्याह होने की मैंने कल्पना ही नहीं की थी। फिर जब उन्होंने मुझे आपके जीवन को संवारने और आपकी खुशियों की बातें की तो मुझे भी एहसास हुआ कि वास्तव में आपके लिए यही उचित है। उसके बाद जब आपसे बातें हुईं और आपने ब्याह करने से मना कर दिया तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन फिर ये सोचा कि अगर आपका फिर से ब्याह नहीं हुआ तो भला कैसे आपका जीवन संवर सकता है और कैसे आपको सच्ची खुशियां मिल सकती हैं? इसी लिए मैंने आपसे कहा था कि आप हमारे लिए अपना जीवन बर्बाद मत कीजिए। ख़ैर उसके बाद मैं वापस चला गया था। वापस जाते समय मैं रास्ते में यही सोच रहा था कि आपके बारे में इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया गया और किसी ने मुझे बताया तक नहीं। इतना तो मैं समझ गया था कि आपके ब्याह होने की बात मां और पिता जी को भी पहले से ही पता थी लेकिन मैं ये सोच कर नाराज़ सा हो गया था कि ये बात मुझसे क्यों छुपाई गई? जब हवेली पहुंचा तो मैंने मां से नाराज़गी दिखाते हुए यही सब पूछा, तब उन्होंने बताया, लेकिन पूरा सच तब भी नहीं बताया। वो तो रूपचंद्र की बातों से मुझे आभास हुआ कि अभी भी मुझसे कुछ छुपाया गया है। हवेली में जब दुबारा मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि वास्तव में सच क्या है।"

इतना सब बोल कर मैं एकाएक चुप हो गया और भाभी को ध्यान से देखने लगा। वो पहले की ही तरह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ीं थी। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे उनके। नज़रें फिर से झुका लीं थी उन्होंने।

"मां ने जब बताया कि आपका ब्याह असल में मेरे साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था।" मैंने फिर से कहना शुरू किया____"मैंने तो ऐसा होने की कल्पना भी नहीं की थी लेकिन मां के अनुसार सच यही था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे और आपके माता पिता हम दोनों का आपस में ब्याह करने का कैसे सोच सकते हैं? जब मैंने मां से ये सवाल किया तो उन्होंने पता नहीं कैसी कैसी बातों के द्वारा मुझे समझाना शुरू कर दिया। ये भी कहा कि क्या मैं अपनी भाभी के जीवन को फिर से संवारने के लिए और उनको सच्ची खुशियां देने के लिए इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता? मां के इस सवाल पर मैं अवाक सा रह गया था और फिर आख़िर में मुझे स्वीकार करना ही पड़ा। सब लोग यही चाहते थे, सबको लगता है कि यही उचित है और इसी से आपका भला हो सकता है तो मैं भला कैसे इंकार कर देता? मैं भला ये कैसे चाह सकता था भाभी कि मेरी वजह से आपका जीवन खुशियों से महरूम हो जाए? मैं तो पहले से ही सच्चे दिल से यही चाहता था कि आप हमेशा खुश रहें, आपके जीवन में एक पल के लिए कभी दुख का साया न आए।"

भाभी अब भी नज़रें झुकाए ख़ामोश खड़ीं थी। उन्हें यूं ख़ामोश खड़ा देख मुझे घबराहट भी होने लगी थी लेकिन मैंने सोच लिया था कि उनसे जो कुछ कहने आया था वो कह कर ही जाऊंगा।

"उस दिन से अब तक मैं इसी रिश्ते के बारे में सोचता रहा हूं भाभी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आपकी खुशी के लिए मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकता हूं। आपके होठों पर मुस्कान लाने के लिए मैं खुशी खुशी ख़ुद को भी मिटा सकता हूं। मेरे इस बदले हुए जीवन में आपका बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज मैं जो बन गया हूं उसमें आपका ही सहयोग था और आपका ही मार्गदर्शन रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपनी भाभी की बदौलत आज एक अच्छा इंसान बनने लगा हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि आप ये कभी मत समझना कि इस रिश्ते के चलते आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई बदलाव आ जाएगा। आप ये कभी मत सोचना कि मेरे दिल से आपके प्रति आदर और सम्मान मिट जाएगा। मेरे दिल में हमेशा आपके लिए मान सम्मान और श्रद्धा की भावना रहेगी।"

"तु...तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने नज़रें उठा कर अधीरता से कहा____"मैं जानती हूं और समझती हूं कि तुम मेरी कितनी इज्ज़त करते हो।"

"आपको पता है।" मैंने सहसा अधीर हो कर कहा____"कुछ दिनों से मैं अपने आपको अपराधी सा महसूस करने लगा हूं।"

"ऐसा क्यों?" भाभी के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे और साथ ही फिक्रमंदी के भी।

"मेरे मन में बार बार यही ख़याल उभरता रहता है कि इस रिश्ते के चलते आप मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगी होंगी।" मैंने कहा____"इतना तो सबको पता रहा है कि मेरा चरित्र कैसा था। अब जब आपका ब्याह मुझसे करने का फ़ैसला किया गया तो मेरे मन में यही ख़याल उभरा कि आप भी अब मेरे चरित्र के आधार पर यही सोच रही होंगी कि मैं आपके बारे में पहले से ही ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा, इसी लिए रिश्ते को झट से मंजूरी दे दी।"

"न...नहीं नहीं।" भाभी ने झट से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ऐसा नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"

"क्या करूं भाभी?" मेरी आंखें भर आईं____"मेरा चरित्र ही ऐसा रहा है कि अब अपने उस चरित्र से मुझे ख़ुद ही बहुत घृणा होती है। बार बार यही एहसास होता है कि इस रिश्ते का ज़िक्र होने के बाद अब हर कोई मेरे बारे में ग़लत ही सोच रहा होगा। मेरा यकीन कीजिए भाभी, भले ही मेरा चरित्र निम्न दर्ज़े का रहा है लेकिन मैंने कभी भी आपके बारे में ग़लत नहीं सोचा है। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं था कि अपने ही घर की औरतों और बहू बेटी पर नीयत ख़राब कर लेता। काश! हनुमान जी की तरह मुझमें भी शक्ति होती तो इस वक्त मैं अपना सीना चीर कर आपको दिखा देता। मैं दिखा देता और फिर कहता कि देख लीजिए....मेरे सीने में आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आदर सम्मान और श्रद्धा की ही भावना मौजूद है।"

"ब..बस करो।" रागिनी भाभी की आंखें छलक पड़ीं, रुंधे हुए गले से बोलीं____"मैंने कहा ना कि तुम्हें ऐसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है और ना ही कुछ कहने की। मैं अच्छी तरह जानती हूं और हमेशा महसूस भी किया है कि तुमने कभी मेरे बारे में ग़लत नहीं सोचा है। सच कहती हूं, मुझे हमेशा से ही तुम्हारे जैसा देवर मिलने का गर्व रहा है।"

"आप सच कह रही हैं ना भाभी?" मैं अधीरता से बोल पड़ा____"क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा है।"

"हां, ख़ुद से भी ज़्यादा।" भाभी ने लरजते स्वर में कहा____"वैसे सच कहूं तो मेरी भी दशा तुम्हारे जैसी ही है। इतने दिनों से मैं भी यही सोचते हुए ख़ुद को दुखी किए हूं कि इस रिश्ते के चलते तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचने लगे होगे। अपनी मां और भाभी से यही कहती थी कि अगर तुमने इस रिश्ते के चलते एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो मेरे लिए वो बहुत ही शर्म की बात हो जाएगी। उस सूरत में मुझे ऐसा लगने लगेगा कि ये धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"नहीं भाभी नहीं।" मैं तड़प कर बोल पड़ा____"मैं आपके बारे में कभी ग़लत नहीं सोच सकता। आप तो देवी हैं मेरे लिए जिनके प्रति हमेशा सिर्फ श्रद्धा ही रहेगी। दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं कभी आपके प्रति कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोच सकता। आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहें भाभी। मैं नहीं जानता कि ऊपर बैठा विधाता मुझसे या आपसे क्या चाहता है लेकिन इतना यकीन कीजिए कि ये संबंध मेरे और आपके बीच मौजूद सच्ची भावनाओं को कभी मैला नहीं कर सकता।"

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव।" भाभी की आंखों से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया____"तुमने ये कह कर मेरे मन को बहुत बड़ी राहत दी है। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि इतने दिनों से मैं ये सब सोच सोच कर कितना व्यथित थी।"

"आप खुद को दुखी मत रखिए भाभी।" मैंने कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं आपको दुखी होते नहीं देख सकता। इसके पहले आपको खुश रखने के लिए मेरे बस में जो था वो कर रहा था लेकिन इस रिश्ते के बाद मेरी हमेशा यही कोशिश रहेगी कि मैं आपको कभी एक पल के लिए भी दुख में न रहने दूं।"

मेरी बात सुन कर रागिनी भाभी बड़े गौर से मेरी तरफ देखने लगीं थी। उनके चेहरे पर खुशी के भाव तो थे ही किंतु एकाएक लाज की सुर्खी भी उभर आई थी। उनकी आंखों में समंदर से भी ज़्यादा गहरा प्यार और स्नेह झलकता नज़र आया मुझे।

"क्या रूपा को पता है इस बारे में?" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए पूछा____"उस बेचारी के साथ फिर से एक ऐसी स्थिति आ गई है जहां पर उसे समझौता करना पड़ेगा। उसके बारे में जब भी सोचती हूं तो पता नहीं क्यों बहुत बुरा लगता है। तुम्हारे जीवन में सिर्फ उसी का हक़ है।"

"उसे मैंने ही इस बारे में बताया है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब मैंने सारी बातें बताई तो वो भी यही कहने लगी कि आपके लिए यही उचित है।"

"क्या उसे इस बारे में जान कर तकलीफ़ नहीं हुई?" भाभी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"उसने क्या कहा जब आप ये सुनेंगी तो आपको बड़ा आश्चर्य होगा।" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा।

"अच्छा, क्या कहा उसने?" भाभी ने उत्सुकता से पूछा।

मैंने संक्षेप में उन्हें रूपा से हुई अपनी बातें बता दी। सुन कर सचमुच भाभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। कुछ देर जाने क्या सोचती रहीं फिर एक गहरी सांस लीं।

"सचमुच बहुत अद्भुत लड़की है वो।" भाभी ने चकित भाव से कहा____"आज के युग में ऐसी लड़कियां विरले ही कहीं देखने को मिलती हैं। तुम बहुत किस्मत वाले हो जो ऐसी लड़की तुमसे इतना प्रेम करती है और तुम्हारी जीवन संगिनी बनने वाली है। मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम कभी भी उसके प्रेम का निरादर मत करना और ना ही कभी उसको कोई दुख तकलीफ़ देना।"

"कभी नहीं दूंगा भाभी।" मैंने अधीरता से कहा____"उसे दुख तकलीफ़ देने का मतलब है हद दर्ज़े का गुनाह करना। कभी कभी सोचा करता हूं कि मैंने तो अपने अब तक के जीवन में हमेशा बुरे कर्म ही किए थे इसके बावजूद ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में मुझे इतना प्रेम करने वाली लड़कियां कैसे लिखी थीं?"

"शायद इस लिए क्योंकि ऐसी अद्भुत लड़कियों के द्वारा वो तुम्हें मुकम्मल रूप से बदल देना चाहता था।" भाभी ने कहा____"काश! ईश्वर ने अनुराधा के साथ ऐसा न किया होता। उस मासूम का जब भी ख़याल आता है तो मन बहुत ज़्यादा व्यथित हो उठता है।"

अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।




━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
22,790
45,838
259
अध्याय - 151
━━━━━━༻♥༺━━━━━━


रागिनी को ये सोच कर बड़ा अजीब सा लगने लगा कि जाने क्या सोचेंगे अब उसके माता पिता और भैया भाभी और साथ ही उसकी छोटी बहन भी। कहीं वो सब उसके बारे में कुछ ऊटपटांग तो नहीं सोच बैठेंगे? रागिनी का चेहरा इस एहसास के चलते ही लाज से सुर्ख पड़ता चला गया।


अब आगे....


वक्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता और ना ही उसे रोक लेने की किसी में क्षमता होती है। शाम को जब मैं खेतों से वापस हवेली आया तो मां ने मुझे पास बुला कर धीमें से बताया कि पिता जी ने मुझे चंदनपुर जाने की अनुमति दे दी है।

मां की इस बात को सुन कर जहां एक तरफ मुझे बेहद खुशी हुई वहीं दूसरी तरफ अचानक ही ये सोच कर अब घबराहट सी होने लगी कि कैसे मैं चंदनपुर जा कर अपनी भाभी का सामना कर सकूंगा? मुझे देख कर वो कैसा बर्ताव करेंगी? क्या वो मुझ पर गुस्सा होंगी? क्या वो इस सबके के लिए मुझसे शिकायतें करेंगी? कहीं वो ये तो नहीं कहेंगी कि मैं अब क्या सोच के उनसे मिलने आया हूं? कहीं वो....कहीं वो चंदनपुर में मुझे आया देख मेरे बारे में ग़लत तो नहीं सोचने लगेंगी? ऐसे न जाने कितने ही ख़याल सवालों के रूप में मेरे ज़हन में उभरने लगे जिसके चलते मेरा मन एकदम से भारी सा हो गया।

बहरहाल, मां ने ही कहा कि मैं कल सुबह ही चंदनपुर जा कर अपनी भाभी से मिल आऊं। उसके बाद मैं गुसलखाने में जा कर हाथ मुंह धोया और अपने कमरे में चला आया। कुछ ही देर में कुसुम चाय ले कर आ गई।

"मैं आपसे बहुत नाराज़ हूं।" मैंने उसके हाथ में मौजूद ट्रे से जैसे ही चाय का प्याला उठाया तो उसने सीधा खड़े हो कर मुझसे कहा।

"अच्छा वो क्यों भला?" मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा। उसने एकदम से मुंह फुला लिया था। ज़ाहिर है वो अपनी नाराज़गी दिखा रही थी मुझे।

"क्योंकि आपने मुझे....यानि अपनी गुड़िया को।" उसने अपनी एक अंगुली खुद की तरफ मोड़ कर कहा___"मेरी होने वाली भाभी से एक बार भी नहीं मिलाया। मेरी होने वाली भाभी का घर इतना पास है इसके बावजूद मैं उन्हें एक दिन भी देख नहीं सकी।"

"अरे! तो इसमें मुश्किल क्या है?" मैंने चाय की एक चुस्की ले कर कहा____"तुझे अगर उससे मिलना ही है तो जब चाहे उसके घर जा कर मिल सकती है।"

"वाह! बहुत अच्छे।" कुसुम ने मुझे घूरते हुए कहा____"कितनी अच्छी सलाह दी है आपने मुझे। ऐसी सलाह कैसे दे सकते हैं आप?"

"अरे! अब क्या हुआ?" मैं सच में इस बार चौंका____"क्या तुझे ये ग़लत सलाह लगती है?"

"और नहीं तो क्या?" उसने ट्रे को पलंग पर रख दिया और फिर अपने दोनों हाथों को अपनी कमर पर रख कर कहा____"मैंने तो सोचा था कि आप अपनी गुड़िया को बढ़िया जीप में बैठा कर भाभी से मिलवाने ले चलेंगे लेकिन नहीं, आपने तो गंदी वाली सलाह दे दी मुझे।"

"अब मुझे क्या पता था कि तुझे अपनी होने वाली भाभी से मिलने का कम बल्कि जीप में बैठ कर घूमने का ज़्यादा मन है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुझे पहले ही साफ साफ बता देना था कि जीप में बैठ कर घूमने जाना है तेरा।"

"ऐसा कुछ नहीं है।" कुसुम ने बुरा सा मुंह बनाया____"जीप में बैठ कर घूमने जाना होगा तो वो मैं कभी भी घूम सकती हूं। मैं जब भी आपको कहूंगी तो आप मुझे घुमाने ले जाएंगे लेकिन मुझे सच में अपनी होने वाली भाभी से मिलना है।"

"मतलब तू सच में ही मिलना चाहती है उससे?" मैंने ग़ौर से देखा उसे।

"हे भगवान!" कुसुम ने अपने माथे पर हल्के से हथेली मारते हुए कहा____"क्या आपको अपनी लाडली बहन की बात पर बिल्कुल भरोसा नहीं है? सच में बहुत गंदे हो गए हैं आप। जाइए मुझे आपसे बात ही नहीं करना अब।"

कहने के साथ ही वो लपक कर पलंग के किनारे बैठ गई और फिर मेरी तरफ अपनी पीठ कर के मुंह फुला कर बैठ गई। मैं समझ गया कि वो रूठ जाने का नाटक कर रही है और चाहती है कि मैं उसे हमेशा की तरह प्यार से मनाऊं...और ऐसा होना ही था। मैं हमेशा की तरह उसको मनाने ही लगा। आख़िर मेरी लाडली जो थी, मेरी जान जो थी।

"अच्छा ठीक है।" मैं उसके पास आ कर बोला____"अब नाराज़ होने का नाटक मत कर। कल सुबह तुझे ले चलूंगा उससे मिलवाने।"

"ना, मैं अभी भी नाराज़ हूं।" उसने बिना मेरी तरफ पलटे ही कहा____"पहले अच्छे से मनाइए मुझे।"

"हम्म्म्म तो फिर तू ही बता कैसे मनाऊं तुझे?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा___"अगर तू नन्ही सी गुड़िया होती तो तुझे दोनों हाथों में ले कर हवा में उछालता, तुझे गोद में लेता। लेकिन तू तो अब थोड़ी बड़ी हो गई है और इतनी भारी भी हो गई है कि मैं तुझे दोनों हाथों में ले कर उछाल ही नहीं पाऊंगा।"

"हाय राम! कितना झूठ बोलते हैं आप?" कुसुम एकदम से पलट कर मेरी तरफ आश्चर्य से आंखें फैला कर बोली____"मैं कहां बड़ी हो गई हूं और जब बड़ी ही नहीं हुई हूं तो भारी कैसे हो सकती हूं? आप अपनी गुड़िया के बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं?"

"चल मान लिया कि तू बड़ी नहीं हुई है।" मैंने कहा____"लेकिन तू नन्ही सी भी तो नहीं है ना। क्या तुझे खुद ये नहीं दिख रहा?"

"हां ये तो सही कह रहे हैं आप।" कुसुम एक नज़र खुद को देखने के बाद मासूमियत से बोली____"पर मैं तो आपकी गुड़िया ही हूं ना तो आप मुझे उठा ही सकते हैं। वैसे भी, मैं जानती हूं कि मेरे सबसे अच्छे वाले भैया बहुत शक्तिशाली हैं। वो किसी को भी उठा सकते हैं।"

"चल अब मुझे चने के झाड़ पर मत चढ़ा।" मैंने कहा____"मैं सच में तुझे गोद में उठाने वाला नहीं हूं लेकिन हां अपनी गुड़िया को प्यार से गले ज़रूर लगा सकता हूं, आ जा।"

मेरा इतना कहना था कि कुसुम लपक कर मेरे गले से लग गई। मेरे सामने छोटी सी बच्ची बन जाती थी वो और वैसा ही बर्ताव करती थी। कुछ देर गले लगाए रखने के बाद मैंने उसे खुद से अलग किया।

"चल अब जा।" फिर मैंने उसके चेहरे को प्यार से सहला कर कहा____"और कल सुबह तैयार रहना अपनी होने वाली भाभी से मिलने के लिए।"

"कल क्यों?" उसने हौले से मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे तो आज और अभी मिलना है अपनी भाभी से।"

"अरे! पागल है क्या तू?" मैं बुरी तरह चौंकते हुए बोला____"देख नहीं रही शाम हो गई है। इस समय कैसे मैं तुझे उससे मिलवा सकता हूं?"

"क्यों नहीं मिलवा सकते?" कुसुम ने अपनी भौंहें ऊपर कर के कहा____"भाभी का घर कौन सा बहुत दूर है? क्या मेरी ख़ुशी के लिए इसी समय आप मुझे भाभी से मिलवाने नहीं ले जा सकते?"

कुसुम की इन बातों से मैं सकते की सी हालत में देखता रह गया उसे। अजीब दुविधा में डाल दिया था उसने। मैं सोच में पड़ गया कि अब क्या करूं? ऐसा नहीं था कि मैं इस समय उसे रूपा से मिलवा नहीं सकता था लेकिन मैं ये भी सोचने लगा था कि अगर मैंने ऐसा किया तो रूपा के घर वाले क्या सोचेंगे?

"अच्छा ठीक है।" फिर मैंने कुछ सोच कर कहा____"मैं तुझे इसी समय ले चलता हूं लेकिन मेरी भी एक शर्त है।"

"कैसी शर्त?" उसके माथे पर शिकन उभरी।

"यही कि मैं उसके घर के अंदर नहीं जाऊंगा।" मैंने कहा____"बल्कि तुझे उसके घर पहुंचा दूंगा, ताकि तू उससे मिल ले और मैं बाहर ही तेरे वापस आने का इंतज़ार करूंगा।"

"अब ये क्या बात हुई भला?" कुसुम ने हैरानी से कहा____"आप अकेले बाहर मेरे आने का इंतज़ार करेंगे? नहीं नहीं, ऐसे में मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा। आप भी मेरे साथ अंदर चलेंगे।"

"समझने की कोशिश कर कुसुम।" मैंने कहा____"इस वक्त मेरा उन लोगों के घर जाना बिल्कुल भी उचित नहीं है। मैं रूपचंद्र को बाहर ही बुला लूंगा। वो तुझे अपनी बहन के पास छोड़ आएगा और मैं तेरे आने तक उसके साथ बाहर ही पेड़ के नीचे बने चबूतरे में बैठ कर उससे बातें करता रहूंगा। जब तू वापस आएगी तो तुझे ले कर वापस हवेली आ जाऊंगा।"

"और अगर भाभी के घर वालों को पता चला कि आप बाहर ही बैठे हैं तो क्या ये उन्हें अच्छा लगेगा?" कुसुम ने कहा____"क्या वो ये नहीं सोचेंगे कि आप क्यों अंदर नहीं आए?"

"उनके कुछ सोचने से मुझे फ़र्क नहीं पड़ता मेरी बहना।" मैंने कहा____"इस समय जो उचित है मैं वही करूंगा। ख़ैर तू ये सब छोड़ और जा कर तैयार हो जा। मैं कुछ ही देर में नीचे आता हूं।"

कुसुम खुशी खुशी चाय का खाली प्याला उठा कर कमरे से चली गई। उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि मेरी बहन का भी हिसाब किताब अलग ही है। ख़ैर मुझे उसकी ख़ुशी के लिए अब ये करना ही था इस लिए मैं भी उठ कर कपड़ों के ऊपर गर्म सूटर पहनने लगा।

✮✮✮✮

कुछ ही देर में मैं कुसुम को जीप में बैठाए रूपचंद्र के घर के सामने सड़क पर पहुंच गया। इत्तेफ़ाक से रूपचंद्र सड़क के किनारे मोड़ पर ही मौजूद पेड़ के पास ही मिल गया। वो पेड़ के नीचे बने चबूतरे में गांव के किसी लड़के के साथ बैठा उससे बातें कर रहा था। मुझे जीप में इस वक्त कुसुम के साथ आया देख वो चौंका और जल्दी ही चबूतरे से उतर कर मेरे पास आ गया।

"अरे! अच्छा हुआ कि तुम यहीं मिल गए मुझे।" वो जैसे ही मेरे पास आया तो मैंने उससे कहा____"मैं तुम्हें ही बुलाने की सोच रहा था।"

"क्या बात है वैभव?" उसने एक नज़र कुसुम की तरफ देखने के बाद मुझसे पूछा____"तुम इस वक्त कहीं जा रहे हो क्या?"

"वो असल में मेरी ये बहन तुम्हारी बहन से मिलने की ज़िद कर रही थी।" मैंने थोड़े संकोच के साथ कहा____"इस लिए मैं इसको उससे मिलाने के लिए ही यहां लाया हूं। तुम एक काम करो, इसको अपने साथ ले जाओ और अपनी बहन के पास छोड़ आओ।"

"अरे! ये तो बहुत अच्छी बात है।" रूपचंद्र के चेहरे पर खुशी चमक उभर आई____"लेकिन तुम इन्हें छोड़ आने को क्यों कह रहे हो? क्या तुम नहीं चलोगे?"

"नहीं यार, मैं अंदर नहीं जाऊंगा।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"मैंने इससे भी यही कहा था कि मैं बाहर ही रहूंगा और तुम इसको अपनी बहन के पास छोड़ आओगे।"

"ये सब तो ठीक है।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन तुम्हें अंदर चलने में क्या समस्या है? अब जब यहां तक आ ही गए हो तो अंदर भी चलो। हम सबको अच्छा ही लगेगा।"

"समझने की कोशिश करो भाई।" मैंने कहा____"मुझे अंदर ले जाने की कोशिश मत करो। तुम मेरी गुड़िया को अपनी बहन के पास ले जाओ। मैं यहीं पर इसके वापस आने का इंतज़ार करूंगा।"

"ठीक है, अगर तुम नहीं चलना चाहते तो कोई बात नहीं।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं इन्हें रूपा के पास छोड़ कर वापस आता हूं।"

मेरे इशारा करने पर कुसुम चुपचाप जीप से नीचे उतर गई। उसके बाद वो रूपचंद्र के साथ उसके घर के अंदर की तरफ बढ़ गई। इधर मैंने भी जीप को वापस मोड़ा और फिर उससे उतर कर पेड़ के चबूतरे पर जा कर बैठ गया। सच कहूं तो इस वक्त मुझे बड़ा ही अजीब महसूस हो रहा था लेकिन मजबूरी थी इस लिए बैठा रहा। रूपचन्द्र जिस लड़के से बातें कर रहा था वो पता नहीं कब चला गया था और अब मैं अकेला ही बैठा था। मन में ये ख़याल भी उभरने लगा कि अंदर मेरी गुड़िया अपनी होने वाली भाभी से जाने क्या बातें करेगी?

कुछ ही देर में रूपचंद्र आ गया और मेरे पास ही चबूतरे पर बैठ गया। आते ही उसने बताया कि उसके घर वाले कुसुम को देख बड़ा खुश हुए हैं लेकिन ये जान कर उन्हें अच्छा नहीं लगा कि उनका होने वाला दामाद गैरों की तरह बाहर सड़क के किनारे बैठा है।

"मैंने फिलहाल उन्हें समझा दिया है कि तुम अंदर नहीं आना चाहते।" रूपचंद्र ने कहा____"इस लिए तुम्हें अंदर बुलाने की वो भी ज़िद न करें। ख़ैर और बताओ, कुसुम का अचानक से मेरी बहन से मिलने का मन कैसे हो गया?"

"सब अचानक से ही हुआ भाई।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"वो ऐसी ही है। कब उसके मन में क्या आ जाए इस बारे में उसे खुद भी पता नहीं होता। अभी कुछ देर पहले वो मेरे कमरे में मुझे चाय देने आई थी और फिर एकदम से कहने लगी कि उसे अपनी होने वाली भाभी से मिलना है। मैंने उससे कहा कि सुबह मिलवा दूंगा लेकिन नहीं मानी। कहने लगी कि उसे अभी मिलना है। बहुत समझाया लेकिन नहीं मानी, आख़िर मुझे उसे ले कर आना ही पड़ा।"

"हा हा हा।" रूपचंद्र ठहाका लगा कर हंस पड़ा____"सचमुच कमाल की हैं वो। ख़ैर, जब मैं उन्हें ले कर अंदर पहुंचा तो सबके सब पहले तो बड़ा हैरान हुए, फिर जब मैंने उन्हें बताया कि वो अपनी होने वाली भाभी से मिलने आई हैं तो सब मुस्कुरा उठे। थोड़ा हाल चाल पूछने के बाद मां ने रूपा को आवाज़ दी जो रसोई में थी। मां के कहने पर रूपा कुसुम के साथ अपने कमरे में चली गई थी।"

"और घर में कैसी चल रही हैं शादी की तैयारियां?" मैंने पूछा।

"सब के सब लगे हुए हैं।" रूपचंद्र ने कहा____"दीदी के ससुराल वाले तो जल्द ही शादी का मुहूर्त बनवाना चाहते थे लेकिन महीने के बाद से पहले कोई मुहूर्त ही नहीं था इस लिए मजबूरन उन्हें उसी मुहूर्त पर सब कुछ तय करना पड़ा।"

"हां विवाह जैसे संबंध शुभ मुहूर्त पर ही तो होते हैं।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"ख़ैर सबसे अच्छी बात यही है कि लगन तय हो गया और अब तुम्हारी बहनों का ब्याह होने वाला है।"

"ये सब दादा ठाकुर की ही कृपा से संभव हो सका है वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"उनका हाथ न होता तो इस विवाह का होना संभव ही नहीं था। हम सब भी न जाने कैसी मानसिकता का शिकार थे जिसके चलते ये सब कर बैठे। अब भी जब वो सब याद आता है तो खुद से घृणा होने लगती है।"

"सच कहूं तो मेरा भी यही हाल है।" मैंने गहरी सांस ली____"इसके पहले मैंने जो कर्म किए थे उनकी वजह से मेरे साथ जो हुआ उसके लिए मैं भी ऐसा ही सोचता हूं। अपने कर्मों के लिए मुझे भी खुद से घृणा होती है और तकलीफ़ होती है। काश! ऐसा हुआ करे कि इस दुनिया का कोई भी व्यक्ति ग़लत कर्म करने का सोचे ही नहीं।"

"ये तो असंभव है।" रूपचंद्र ने कहा____"आज के युग में हर कोई अच्छा कर्म करे ऐसा संभव ही नहीं है। ख़ैर छोड़ो, ये बताओ रागिनी दीदी की कोई ख़बर आई?"

"नहीं।" रूपचंद्र के मुख से अचानक भाभी का नाम सुनते ही मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई____"अभी तक तो नहीं आई लेकिन मैं कल उनसे मिलने चंदनपुर जा रहा हूं।"

"अच्छा।" रूपचंद्र ने हैरानी से कहा____"किसी विशेष काम से जा रहे हो क्या?"

"कुछ बातें हैं जिन्हें मैं उनसे कहना चाहता हूं यार।" मैंने सहसा गंभीर हो कर कहा____"तुम शायद यकीन न करो लेकिन सच ये है कि जब से मुझे ये पता चला है कि हम दोनों के घर वालों ने हमारा आपस में ब्याह कर देने का फ़ैसला किया है तब से मेरे मन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभर रहे हैं। मैं खुद को अपराधी सा महसूस करता हूं। मुझे ये सोच कर पीड़ा होने लगती है कि इस रिश्ते के चलते कहीं भाभी मुझे ग़लत न समझने लगीं हों। बस इसी के चलते मैं उनसे एक बार मिलना चाहता हूं और उन्हें बताना चाहता हूं कि इस रिश्ते के बाद भी मेरे मन में उनके प्रति कोई ग़लत भावना नहीं है। मेरे अंदर उनके लिए वैसा ही आदर सम्मान है जैसे हमेशा से रहा है।"

"तुम्हारे मुख से ऐसी अद्भुत बातें सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा करता है वैभव।" रूपचंद्र ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा____"सच कहता हूं, यकीन तो अब भी नहीं होता कि तुम इतने अच्छे इंसान बन गए हो लेकिन यकीन इस लिए कर लेता हूं क्योंकि मैंने अपनी आंखों से देखा है और दिल से महसूस किया है। मैं खुद भी तो बदल गया हूं। इसके पहले तुमसे बहुत ज़्यादा ईर्ष्या और नफ़रत करता था लेकिन आज जितना अपनी बहन से प्यार और स्नेह करता हूं उतना ही तुमसे भी करने लगा हूं। हो सकता है कि ये कोई चमत्कार हो या कोई नियति का खेल लेकिन सच यही है। ख़ैर तुम अगर ऐसा सोचते हो तो यकीनन रागिनी दीदी से मिल लो और उनसे अपने दिल की बातें कह डालो। शायद इसके चलते तुम्हें भी हल्का महसूस हो और उधर रागिनी दीदी के मन से भी किसी तरह की अथवा आशंका दूर हो जाए। वैसे सच कहूं तो जैसे अनुराधा को मेरी बहन ने अपना लिया था और मैं खुद भी तुम्हारे साथ उसका ब्याह होने से खुश था उसी तरह रागिनी दीदी को भी मेरी बहन ने अपना लिया है और मैं भी चाहता हूं उनका तुम्हारे साथ ब्याह हो जाए।"

"वैसे अगर तुम बुरा न मानो तो क्या तुमसे एक बात पूछूं?" मैंने कहा।

"हां बिल्कुल पूछो।" रूपचंद्र ने कहा____"और बुरा मानने का तो सवाल ही नहीं है।"

"सच कहूं तो अभी अभी मेरे मन में एक ख़याल उभरा है।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"और अगर भाभी से ब्याह होने वाली बात का ज़िक्र न हुआ होता तो शायद मेरे मन में ये ख़याल उभरता भी नहीं। मैं तुमसे ये पूछना चाहता हूं कि जिस तरह मेरे माता पिता ने अपनी विधवा बहू की खुशियों का ख़याल रखते हुए उनका ब्याह मुझसे कर देने का निर्णय लिया है तो क्या वैसे ही तुम भी अपनी किसी भाभी के साथ ब्याह करने का नहीं सोच सकते?"

"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपचंद्र ने चकित भाव से मेरी तरफ देखा____"मैं भला क्यों ऐसा सोचूंगा यार?"

"मानता हूं कि तुम नहीं सोच सकते।" मैंने कहा____"लेकिन तुम्हारे घर वाले तो सोच ही सकते हैं?"

"नहीं।" रूपचंद्र ने कहा____"इस तरह की कोई बात मेरे घर में किसी के भी मन में नहीं है।"

"ये तुम कैसे कह सकते हो?" मैंने जैसे तर्क़ किया____"हो सकता है कि ये बात तुम्हारे घर में किसी न किसी के ज़हन में आई ही हो। मैं ऐसा इस लिए भी कह रहा हूं क्योंकि भाभी के साथ मेरा ब्याह होने की बात तुम्हारे घर वालों को भी पता है। ऐसे में कभी न कभी किसी न किसी के मन में ये ख़याल तो उभरा ही होगा कि जब दादा ठाकुर अपनी बहू के भले के लिए ऐसा सोच कर उनका ब्याह मेरे साथ करने का फ़ैसला कर सकते हैं तो उन्हें भी अपनी बहुओं के भले के लिए ऐसा ही कुछ करना चाहिए।"

रूपचंद्र मेरी बात सुन कर फ़ौरन कुछ बोल ना सका। उसके चेहरे पर हैरानी के भाव तो उभरे ही थे किंतु एकाएक वो सोच में भी पड़ गया नज़र आने लगा था। इधर मुझे लगा कहीं मैंने कुछ ज़्यादा ही तो नहीं बोल दिया?

"क्या हुआ?" वो जब सोच में ही पड़ा रहा तो मैंने पूछा____"क्या मैंने कुछ गलत कह दिया?"

"नहीं।" रूपचंद्र ने गहरी सांस ली____"तुम्हारा ऐसा सोचना और कहना एक तरह से जायज़ भी है लेकिन ये भी सच है कि मेरे घर में फिलहाल ऐसा कुछ कोई भी नहीं सोच रहा।"

"हो सकता है कि उन्होंने ऐसा सोचा हो लेकिन इस बारे में तुम्हें पता न लगने दिया हो।" मैंने जैसे संभावना ज़ाहिर की।

"हां ये हो सकता है।" रूपचन्द्र ने अनिश्चित भाव से कहा____"लेकिन मुझे यकीन है कि मेरे घर वाले ऐसा करने का नहीं सोच सकते।"

"चलो मान लिया कि नहीं सोच सकते।" मैंने उसकी तरफ गौर से देखते हुए कहा____"लेकिन अगर ऐसी कोई बात तुम्हारे सामने आ जाए तो तुम क्या करोगे? क्या तुम अपनी किसी भाभी से ब्याह करने के लिए राज़ी हो जाओगे?"

"यार ये बड़ा मुश्किल सवाल है।" रूपचंद्र ने बेचैन भाव से कहा____"सच तो ये है कि मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं है और ना ही कभी अपनी भाभियों के बारे में कुछ गलत सोचा है।"

"सोचा तो मैंने भी नहीं था कभी।" मैंने कहा____"लेकिन देख ही रहे हो कि हर किसी की उम्मीदों से परे आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि मुझे अपनी भाभी का जीवन फिर से संवारने के लिए उनके साथ ब्याह करने को राज़ी होना पड़ा है। इसी तरह क्या तुम अपनी किसी भाभी की खुशियों का खयाल कर के ऐसा नहीं कर सकोगे? मान लो मेरी तरह तुम्हारे घर वालों ने भी तुम्हारे सामने भी ऐसा प्रस्ताव रख दिया तब तुम क्या करोगे? क्या अपनी किसी भाभी से ब्याह करने से इंकार कर दोगे तुम?"

"तुमने बिल्कुल ठीक कहा वैभव।" रूपचंद्र ने एक बार फिर बेचैनी से गहरी सांस ली____"वाकई में अगर ऐसा हुआ तो मुझे भी तुम्हारी तरह ऐसे रिश्ते के लिए राज़ी होना ही पड़ेगा। हालाकि ऐसा अगर कुछ महीने पहले होता तो शायद मैं ऐसे रिश्ते के लिए राज़ी न होता लेकिन अब यकीनन हो सकता हूं। ऐसा इस लिए क्योंकि तुम्हारी तरह मैं भी अब पहले जैसी मानसिकता वाला इंसान नहीं रहा। ख़ैर क्योंकि ऐसी कोई बात है ही नहीं इस लिए बेकार में इस बारे में क्या सोचना?"

मैं रूपचंद्र को बड़े ध्यान से देखे जा रहा था। ऐसी बातों के ज़िक्र से एकाएक ही उसके चेहरे पर कुछ अलग ही किस्म के भाव उभरे हुए दिखाई देने लगे थे।

"हां ये तो है।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"वैसे तुम्हारी बड़ी भाभी को संतान के रूप में एक बेटी तो है जिसके सहारे वो अपना जीवन गुज़ार सकती हैं लेकिन छोटी भाभी का क्या? मेरा मतलब है कि उनकी शादी हुए भी तो अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ है, उनको कोई औलाद भी नहीं है। ऐसे में क्या वो इसी तरह विधवा के रूप में अपना सारा जीवन गुज़ारेंगी?"

"इस बारे में क्या कह सकता हूं मैं?" रूपचंद्र ने कहा____"उनके नसीब में शायद ऐसे ही जीवन गुज़ारना लिखा है।"

"नसीब ऐसे ही नहीं लिखा होता भाई।" मैंने कहा____"इस दुनिया में कर्म प्रधान है। हमें हर चीज़ के लिए कर्म करना पड़ता है, फल मिले या न मिले वो अलग बात है। जैसे मेरे माता पिता ने अपनी बहू के जीवन को फिर से संवारने के लिए ये क़दम उठाया उसी तरह तुम्हारे घर वाले भी उठा सकते हैं। जब ऐसा होगा तो यकीनन तुम्हारी भाभी का नसीब भी दूसरी शक्ल में नज़र आने लगेगा। अब ये तुम पर और तुम्हारे घर वालों पर निर्भर करता है कि वो कैसा कर्म करते हैं या नहीं।"

"मैं तुम्हें अपनी राय और अपना फ़ैसला बता चुका हूं वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"बाकी मेरे घर वालों की मर्ज़ी है कि वो क्या करना चाहते हैं और क्या नहीं। मैं अपनी तरफ से इस बारे में किसी से कुछ भी नहीं कहूंगा।"

"ख़ैर जाने दो।" मैंने कहा____"जो होना होगा वो होगा ही।"

अभी मैंने ये कहा ही था कि तभी मेरे कानों में कुछ आवाज़ें पड़ीं। मैंने और रूपचंद्र ने पलट कर आवाज़ की दिशा में देखा। कुसुम दो तीन औरतों के साथ घर से बाहर आ गई थी। शाम पूरी तरह से हो चुकी थी और अंधेरा फैल गया था इस लिए उन औरतों में से एक ने अपने हाथ में लालटेन ले रखा था। कुछ ही देर में कुसुम उन औरतों के साथ बाहर सड़क पर आ गई। इधर मैं और रूपचंद्र भी चबूतरे से उतर आए थे।

"तुमने अपने होने वाले बहनोई को यहां ऐसे ही बैठा रखा था रूप।" फूलवती ने थोड़ी नाराज़गी से कहा____"ना पानी का पूछा और ना ही चाय का?"

"अरे! नहीं बड़ी मां।" मैं झट से रूपचन्द्र से पहले बोल पड़ा____"ऐसी बात नहीं है। रूपचंद्र ने मुझसे इस सबके लिए पूछा था लेकिन मैंने ही मना कर दिया था। आप बेवजह नाराज़ मत होइए।"

मेरे मुख से ये बात सुनते ही रूपचंद्र ने हल्के से चौंक कर मेरी तरफ देखा, फिर हौले से मुस्कुरा उठा। बहरहाल मैंने कुसुम को जीप में बैठने को कहा और खुद भी जीप की स्टेयरिंग शीट पर बैठ गया। कुसुम ने सबको हाथ जोड़ कर नमस्ते किया। उसके बाद मैंने जीप को हवेली की तरफ बढ़ा दिया। कुसुम बड़ा ही खुश नज़र आ रही थी।





━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
हम तो डूबे हैं सनम, तुमको भी ले डूबेंगे 😂😂

वैभव ने गांठ छोड़ दी रूपचंद्र के मन में। क्या अब वो भी अपनी भाभी को इस नजर से देखेगा?

खैर कुसुम का बचपना वापस देख अच्छा लगा, और वैसे वैभव चाहे तो उसे कल दूसरी भाभी से भी मिला सकता है।
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
22,790
45,838
259
अध्याय - 152
━━━━━━༻♥༺━━━━━━



अगली सुबह।
चाय नाश्ता कर के मैं हवेली से चंदनपुर जाने के लिए जीप से निकला। मां ने मुझे समझाया था कि मैं वहां किसी से भी बेवजह उलझने जैसा बर्ताव न करूं और ना ही अपनी भाभी से ऐसी कोई बात कहूं जिससे कि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचे। हालाकि ऐसा मैं कर ही नहीं सकता था लेकिन मां तो मां ही थीं, शायद फिक्रमंदी के चलते उन्होंने मुझे ऐसी सलाह दी थी।

पूरे रास्ते मैं भाभी के बारे में ही जाने क्या क्या सोचता रहा। मन में तरह तरह की आशंकाएं उभर आतीं थी जिनके चलते मेरे अंदर एक घबराहट सी होने लगी थी। मैं अपने आपको इस बात के लिए तैयार करता जा रहा था कि जब भाभी से मेरा सामना होगा तब मैं उनके सामने बहुत ही सभ्य और शांत तरीके से अपने दिल की बातें रखूंगा। यूं तो मुझे पूरा भरोसा था कि भाभी मुझे समझेंगी लेकिन इसके बावजूद जाने क्यों मेरे मन में आशंकाएं उभर आतीं थी।

बहरहाल, दोपहर होने से पहले ही मैं चंदनपुर गांव यानि रागिनी भाभी के मायके पहुंच गया। अभी कुछ समय पहले ही मैं यहां आया था, इस लिए जैसे ही भैया के ससुराल वालों ने मुझे फिर से आया देखा तो सबके चेहरों पर हैरानी के भाव उभर आए। ये अलग बात है कि बाद में जल्दी ही उनके चेहरों पर खुशी के भाव भी उभर आए थे।

"अरे! क्या बात है।" भाभी का भाई वीरेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आते हुए बोला____"हमारे वैभव महाराज तो बड़ा जल्दी जल्दी हमें दर्शन दे रहे हैं।"

वीरेंद्र ने कहने के साथ ही झुक कर मेरे पैर छुए। उसकी बातों से जाने क्यों मैं थोड़ा असहज सा हो गया था। ये अलग बात है कि मैं जल्दी ही खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए हल्के से मुस्कुरा उठा था। ख़ैर वीरेंद्र मुझे ले कर अंदर बैठक में आया, जहां बाकी लोग पहले से ही मौजूद थे। सबने एक एक कर के मेरे पांव छुए। एक बार फिर से वही क्रिया दोहराई जाने लगी, यानि पीतल की थाल में मेरे पांव धोना वगैरह। थोड़ी देर औपचारिक तौर पर हाल चाल हुआ। इसी बीच अंदर से वीरेंद्र सिंह की पत्नी वंदना भाभी मेरे लिए जल पान के कर आ गईं।

घर में इस वक्त मर्दों के नाम पर सिर्फ वीरेंद्र सिंह ही था, बाकी मर्द खेत गए हुए थे। मेरे आने की ख़बर फ़ौरन ही भैया के चाचा ससुर के घर तक पहुंच गई थी इस लिए उनके घर की औरतें और बहू बेटियां भी आ गईं।

"और बताईए महाराज बड़ा जल्दी आपके दर्शन हो गए।" वीरेंद्र सिंह ने पूछा____"यहां किसी विशेष काम से आए हैं क्या?"

"हां कुछ ऐसा ही है।" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा____"असल में उस समय जब मैं यहां आया था तो भाभी को लेने आया था। उस समय मुझे बाकी बातों का बिल्कुल भी पता नहीं था। उसके बाद जब यहां से गया तो मां से ऐसी बातें पता चलीं जिनके बारे में मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।"

"हां मैं समझ सकता हूं महाराज।" वीरेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और कृपया मुझे भी माफ़ करें मैंने भी इसके पहले इस बारे में आपको कुछ नहीं बताया। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आया था कि आपसे कैसे कहूं? दूसरी बात ये थी कि हम चाहते थे कि ये सब बातें आपको अपने ही माता पिता से पता चलें तो ज़्यादा उचित होगा।"

अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से भाभी की मां सुलोचना देवी आ गईं। उन्हें देख कर मैं फिर से थोड़ा असहज सा महसूस करने लगा।

"कोई ख़ास काम था क्या महाराज?" सुलोचना देवी ने आते ही थोड़ी फिक्रमंदी से पूछा____"जिसके लिए आपको फिर से यहां आना पड़ा है?"

"वैभव महाराज को रिश्ते के बारे में पता चल चुका है मां।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही वीरेंद्र ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा____"और ये शायद उसी सिलसिले में यहां आए हैं।"

"ओह! सब ठीक तो है ना महाराज?" सुलोचना देवी एकदम से चिंतित सी नज़र आईं।

"हां मां जी सब ठीक ही है।" मैंने खुद को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए कहा____"मैं यहां बस भाभी से मिलने आया हूं। उनसे कुछ ऐसी बातें कहने आया हूं जिन्हें कहे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकता। आप कृपया मेरी इस बात को अन्यथा मत लें और कृपा कर के मुझे भाभी से अकेले में बात करने का अवसर दें।"

मेरी बात सुन कर सुलोचना देवी और वीरेंद्र सिंह एक दूसरे की तरफ देखने लगे। चेहरों पर उलझन के भाव उभर आए थे। फिर सुलोचना देवी ने जैसे खुद को सम्हाला और होठों पर मुस्कान सजा कर कहा____"ठीक है, अगर आप ऐसा ही चाहते हैं तो मैं रागिनी से अकेले में आपकी मुलाक़ात करवा देती हूं। आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आती हूं।"

कहने के साथ ही सुलोचना देवी पलट कर अंदर की तरफ चली गईं। इधर वीरेंद्र सिंह जाने किस सोच में गुम हो गया था। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूं। बस ख़ामोशी से वक्त के गुज़रने का इंतज़ार करने लगा।

क़रीब पांच मिनट बाद सुलोचना देवी बाहर आईं। उन्होंने मुझे अपने साथ अंदर चलने को कहा तो मैं एक नज़र वीरेंद्र सिंह पर डालने के बाद पलंग से उठा और सुलोचना देवी के साथ अंदर की तरफ बढ़ चला। एकाएक ही मेरी धड़कनें तीव्र गति से चलने लगीं थी और साथ ही ये सोच कर घबराहट भी होने लगी थी कि भाभी के सामने कैसे खुद को सामान्य रख पाऊंगा मैं? कैसे उनसे नज़रें मिला कर अपने दिल की बातें कह पाऊंगा? क्या वो मुझे समझेंगी?

सुलोचना देवी मुझे ले कर घर के पिछले हिस्से में आ गईं। घर के पीछे खाली जगह थी जहां पर एक तरफ कुआं था और बाकी कुछ हिस्सों में कई सारे पेड़ पौधे लगे हुए थे।

"महाराज।" सुलोचना देवी ने पलट कर मुझसे कहा____"आप यहीं रुकें, मैं रागिनी को भेजती हूं।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा और कुएं की तरफ यूं ही बढ़ चला।

उधर सुलोचना देवी वापस अंदर चली गईं। मैं कुएं के पास आ कर उसमें झांकने लगा। कुएं में क़रीब पांच फीट की दूरी पर पानी नज़र आया। मैं झांकते हुए कुएं के पानी को ज़रूर देखने लगा था लेकिन मेरा मन इसी सोच में डूबा हुआ था कि भाभी के आने पर क्या होगा? क्या मेरी तरह उनका भी यही हाल होगा? क्या मेरी तरह वो भी घबराई हुई होंगी?

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। किसी के आने के एहसास से एकाएक मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दिल ने एकदम से धड़कना ही बंद कर दिया हो। सब कुछ थम गया सा महसूस हुआ। मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को सम्हाला और फिर धीरे से पलटा।

मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। गुलाबी कुर्ते सलवार में वो मेरी तरफ पीठ किए अमरूद के पेड़ के पास ठहर ग‌ईं थी। उनके बालों की चोटी उनकी पीठ से होते हुए नीचे उनके नितम्बों को भी पार गई थी। सहसा वो थोड़ा सा घूमीं जिसके चलते मुझे उनके चेहरे की थोड़ी सी झलक मिली। दोनों हाथों में पकड़े अपने दुपट्टे के छोर को हौले हौले उमेठने में लगीं हुईं थी वो।

कुछ देर तक ख़ामोशी से उनकी तरफ देखते रहने के बाद मैं हिम्मत जुटा कर उनकी तरफ बढ़ा। मेरी धड़कनें जो इसके पहले थम सी गई थी वो चलने तो लगीं थी लेकिन हर गुज़रते पल के साथ वो धाड़ धाड़ की शक्ल में बजते हुए मेरी पसलियों पर चोट करने लगीं थी। आख़िर कुछ ही पलों में मैं उनके थोड़ा पास पहुंच गया। शायद उन्हें भी एहसास हो गया था कि मैं उनके पास आ गया हूं इस लिए दुपट्टे को उमेठने वाली उनकी क्रिया एकदम से रुक गई थी।

"भ...भाभी।" मैंने धाड़ धाड़ बजते अपने दिल के साथ बड़ी मुश्किल से उन्हें पुकारा।

एकाएक ही मेरे अंदर बड़ी तेज़ हलचल सी मच गई थी जिसे मैं काबू में करने का प्रयास करने लगा था। उधर मेरे पुकारने पर भाभी पर प्रतिक्रिया हुई। वो बहुत धीमें से मेरी तरफ को पलटीं। अगले ही पल उनका खूबसूरत चेहरा पूरी तरह से मुझे नज़र आया। वो पलट तो गईं थी लेकिन मेरी तरफ देख नहीं रहीं थी। पलकें झुका रखीं थी उन्होंने। सुंदर से चेहरे पर हल्की सी सुर्खी छाई नज़र आई।

"अ...आप ठीक तो हैं ना?" मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से पूछा।

"हम्म्म्म।" उन्होंने धीमें से सिर हिलाया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर किस तरह से उनसे वो बातें कहूं जो मैं उनसे कहने आया था। मेरे दिलो दिमाग़ में हलचल सी मची हुई थी। हल्की ठंड में भी मेरे चहरे पर घबराहट के चलते पसीना उभर आया था।

"व..वो मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं आपको अपने दिल की बात कहूं?" फिर मैंने किसी तरह उनकी तरफ देखते हुए कहा।

उनकी पलकें अभी भी झुकी हुईं थी किन्तु मेरी बात सुनते ही उन्होंने धीरे से पलकें उठा कर मेरी तरफ देखा। अगले ही पल हमारी नज़रें आपस में टकरा गईं। मुझे अपने अंदर एकदम से झुरझरी सी महसूस हुई। वो सवालिया भाव से मेरी तरफ देखने लगीं थी।

"कृपया आप मुझे ग़लत मत समझिएगा।" मैंने झिझकते हुए कहा____"मैं यहां आपसे ये कहने आया हूं कि मेरे दिल में आपके लिए ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आगे कभी हो सकता है। मैं पहले भी आपका दिल की गहराइयों से आदर और सम्मान करता था और आगे भी करता रहूंगा।"

मेरी ये बातें सुनते ही भाभी के चेहरे पर राहत और खुशी जैसे भाव उभरे। उनकी आंखें जो विरान सी नज़र आ रहीं थी उनमें एकाएक नमी सी नज़र आने लगी। कुछ कहने के लिए उनके होठ कांपे किंतु शायद उनसे कुछ बोला नहीं गया।

"उस दिन जब मैं यहां आपको लेने आया था तो मुझे कुछ भी पता नहीं था।" मैंने धड़कते दिल से कहा____"यहां कामिनी ने जब मुझसे आपके ब्याह होने की बात बताई तो मुझे सच में धक्का लगा था क्योंकि आपका फिर से ब्याह होने की मैंने कल्पना ही नहीं की थी। फिर जब उन्होंने मुझे आपके जीवन को संवारने और आपकी खुशियों की बातें की तो मुझे भी एहसास हुआ कि वास्तव में आपके लिए यही उचित है। उसके बाद जब आपसे बातें हुईं और आपने ब्याह करने से मना कर दिया तो मुझे अच्छा तो लगा लेकिन फिर ये सोचा कि अगर आपका फिर से ब्याह नहीं हुआ तो भला कैसे आपका जीवन संवर सकता है और कैसे आपको सच्ची खुशियां मिल सकती हैं? इसी लिए मैंने आपसे कहा था कि आप हमारे लिए अपना जीवन बर्बाद मत कीजिए। ख़ैर उसके बाद मैं वापस चला गया था। वापस जाते समय मैं रास्ते में यही सोच रहा था कि आपके बारे में इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया गया और किसी ने मुझे बताया तक नहीं। इतना तो मैं समझ गया था कि आपके ब्याह होने की बात मां और पिता जी को भी पहले से ही पता थी लेकिन मैं ये सोच कर नाराज़ सा हो गया था कि ये बात मुझसे क्यों छुपाई गई? जब हवेली पहुंचा तो मैंने मां से नाराज़गी दिखाते हुए यही सब पूछा, तब उन्होंने बताया, लेकिन पूरा सच तब भी नहीं बताया। वो तो रूपचंद्र की बातों से मुझे आभास हुआ कि अभी भी मुझसे कुछ छुपाया गया है। हवेली में जब दुबारा मां से पूछा तो उन्होंने बताया कि वास्तव में सच क्या है।"

इतना सब बोल कर मैं एकाएक चुप हो गया और भाभी को ध्यान से देखने लगा। वो पहले की ही तरह चुपचाप अपनी जगह पर खड़ीं थी। चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे उनके। नज़रें फिर से झुका लीं थी उन्होंने।

"मां ने जब बताया कि आपका ब्याह असल में मेरे साथ करने का फ़ैसला किया गया है तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था।" मैंने फिर से कहना शुरू किया____"मैंने तो ऐसा होने की कल्पना भी नहीं की थी लेकिन मां के अनुसार सच यही था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे और आपके माता पिता हम दोनों का आपस में ब्याह करने का कैसे सोच सकते हैं? जब मैंने मां से ये सवाल किया तो उन्होंने पता नहीं कैसी कैसी बातों के द्वारा मुझे समझाना शुरू कर दिया। ये भी कहा कि क्या मैं अपनी भाभी के जीवन को फिर से संवारने के लिए और उनको सच्ची खुशियां देने के लिए इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता? मां के इस सवाल पर मैं अवाक सा रह गया था और फिर आख़िर में मुझे स्वीकार करना ही पड़ा। सब लोग यही चाहते थे, सबको लगता है कि यही उचित है और इसी से आपका भला हो सकता है तो मैं भला कैसे इंकार कर देता? मैं भला ये कैसे चाह सकता था भाभी कि मेरी वजह से आपका जीवन खुशियों से महरूम हो जाए? मैं तो पहले से ही सच्चे दिल से यही चाहता था कि आप हमेशा खुश रहें, आपके जीवन में एक पल के लिए कभी दुख का साया न आए।"

भाभी अब भी नज़रें झुकाए ख़ामोश खड़ीं थी। उन्हें यूं ख़ामोश खड़ा देख मुझे घबराहट भी होने लगी थी लेकिन मैंने सोच लिया था कि उनसे जो कुछ कहने आया था वो कह कर ही जाऊंगा।

"उस दिन से अब तक मैं इसी रिश्ते के बारे में सोचता रहा हूं भाभी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"आपकी खुशी के लिए मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकता हूं। आपके होठों पर मुस्कान लाने के लिए मैं खुशी खुशी ख़ुद को भी मिटा सकता हूं। मेरे इस बदले हुए जीवन में आपका बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज मैं जो बन गया हूं उसमें आपका ही सहयोग था और आपका ही मार्गदर्शन रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपनी भाभी की बदौलत आज एक अच्छा इंसान बनने लगा हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि आप ये कभी मत समझना कि इस रिश्ते के चलते आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई बदलाव आ जाएगा। आप ये कभी मत सोचना कि मेरे दिल से आपके प्रति आदर और सम्मान मिट जाएगा। मेरे दिल में हमेशा आपके लिए मान सम्मान और श्रद्धा की भावना रहेगी।"

"तु...तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने नज़रें उठा कर अधीरता से कहा____"मैं जानती हूं और समझती हूं कि तुम मेरी कितनी इज्ज़त करते हो।"

"आपको पता है।" मैंने सहसा अधीर हो कर कहा____"कुछ दिनों से मैं अपने आपको अपराधी सा महसूस करने लगा हूं।"

"ऐसा क्यों?" भाभी के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे और साथ ही फिक्रमंदी के भी।

"मेरे मन में बार बार यही ख़याल उभरता रहता है कि इस रिश्ते के चलते आप मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगी होंगी।" मैंने कहा____"इतना तो सबको पता रहा है कि मेरा चरित्र कैसा था। अब जब आपका ब्याह मुझसे करने का फ़ैसला किया गया तो मेरे मन में यही ख़याल उभरा कि आप भी अब मेरे चरित्र के आधार पर यही सोच रही होंगी कि मैं आपके बारे में पहले से ही ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा, इसी लिए रिश्ते को झट से मंजूरी दे दी।"

"न...नहीं नहीं।" भाभी ने झट से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ऐसा नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"

"क्या करूं भाभी?" मेरी आंखें भर आईं____"मेरा चरित्र ही ऐसा रहा है कि अब अपने उस चरित्र से मुझे ख़ुद ही बहुत घृणा होती है। बार बार यही एहसास होता है कि इस रिश्ते का ज़िक्र होने के बाद अब हर कोई मेरे बारे में ग़लत ही सोच रहा होगा। मेरा यकीन कीजिए भाभी, भले ही मेरा चरित्र निम्न दर्ज़े का रहा है लेकिन मैंने कभी भी आपके बारे में ग़लत नहीं सोचा है। मैं इतना भी गिरा हुआ नहीं था कि अपने ही घर की औरतों और बहू बेटी पर नीयत ख़राब कर लेता। काश! हनुमान जी की तरह मुझमें भी शक्ति होती तो इस वक्त मैं अपना सीना चीर कर आपको दिखा देता। मैं दिखा देता और फिर कहता कि देख लीजिए....मेरे सीने में आपके लिए सिर्फ और सिर्फ आदर सम्मान और श्रद्धा की ही भावना मौजूद है।"

"ब..बस करो।" रागिनी भाभी की आंखें छलक पड़ीं, रुंधे हुए गले से बोलीं____"मैंने कहा ना कि तुम्हें ऐसा कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है और ना ही कुछ कहने की। मैं अच्छी तरह जानती हूं और हमेशा महसूस भी किया है कि तुमने कभी मेरे बारे में ग़लत नहीं सोचा है। सच कहती हूं, मुझे हमेशा से ही तुम्हारे जैसा देवर मिलने का गर्व रहा है।"

"आप सच कह रही हैं ना भाभी?" मैं अधीरता से बोल पड़ा____"क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा है।"

"हां, ख़ुद से भी ज़्यादा।" भाभी ने लरजते स्वर में कहा____"वैसे सच कहूं तो मेरी भी दशा तुम्हारे जैसी ही है। इतने दिनों से मैं भी यही सोचते हुए ख़ुद को दुखी किए हूं कि इस रिश्ते के चलते तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचने लगे होगे। अपनी मां और भाभी से यही कहती थी कि अगर तुमने इस रिश्ते के चलते एक पल के लिए भी मेरे बारे में ग़लत सोच लिया तो मेरे लिए वो बहुत ही शर्म की बात हो जाएगी। उस सूरत में मुझे ऐसा लगने लगेगा कि ये धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"नहीं भाभी नहीं।" मैं तड़प कर बोल पड़ा____"मैं आपके बारे में कभी ग़लत नहीं सोच सकता। आप तो देवी हैं मेरे लिए जिनके प्रति हमेशा सिर्फ श्रद्धा ही रहेगी। दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन मैं कभी आपके प्रति कुछ भी उल्टा सीधा नहीं सोच सकता। आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहें भाभी। मैं नहीं जानता कि ऊपर बैठा विधाता मुझसे या आपसे क्या चाहता है लेकिन इतना यकीन कीजिए कि ये संबंध मेरे और आपके बीच मौजूद सच्ची भावनाओं को कभी मैला नहीं कर सकता।"

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव।" भाभी की आंखों से फिर से आंसू का एक कतरा छलक गया____"तुमने ये कह कर मेरे मन को बहुत बड़ी राहत दी है। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि इतने दिनों से मैं ये सब सोच सोच कर कितना व्यथित थी।"

"आप खुद को दुखी मत रखिए भाभी।" मैंने कहा____"आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं आपको दुखी होते नहीं देख सकता। इसके पहले आपको खुश रखने के लिए मेरे बस में जो था वो कर रहा था लेकिन इस रिश्ते के बाद मेरी हमेशा यही कोशिश रहेगी कि मैं आपको कभी एक पल के लिए भी दुख में न रहने दूं।"

मेरी बात सुन कर रागिनी भाभी बड़े गौर से मेरी तरफ देखने लगीं थी। उनके चेहरे पर खुशी के भाव तो थे ही किंतु एकाएक लाज की सुर्खी भी उभर आई थी। उनकी आंखों में समंदर से भी ज़्यादा गहरा प्यार और स्नेह झलकता नज़र आया मुझे।

"क्या रूपा को पता है इस बारे में?" फिर उन्होंने खुद को सम्हालते हुए पूछा____"उस बेचारी के साथ फिर से एक ऐसी स्थिति आ गई है जहां पर उसे समझौता करना पड़ेगा। उसके बारे में जब भी सोचती हूं तो पता नहीं क्यों बहुत बुरा लगता है। तुम्हारे जीवन में सिर्फ उसी का हक़ है।"

"उसे मैंने ही इस बारे में बताया है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब मैंने सारी बातें बताई तो वो भी यही कहने लगी कि आपके लिए यही उचित है।"

"क्या उसे इस बारे में जान कर तकलीफ़ नहीं हुई?" भाभी ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा।

"उसने क्या कहा जब आप ये सुनेंगी तो आपको बड़ा आश्चर्य होगा।" मैंने हौले से मुस्कुरा कर कहा।

"अच्छा, क्या कहा उसने?" भाभी ने उत्सुकता से पूछा।

मैंने संक्षेप में उन्हें रूपा से हुई अपनी बातें बता दी। सुन कर सचमुच भाभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। कुछ देर जाने क्या सोचती रहीं फिर एक गहरी सांस लीं।

"सचमुच बहुत अद्भुत लड़की है वो।" भाभी ने चकित भाव से कहा____"आज के युग में ऐसी लड़कियां विरले ही कहीं देखने को मिलती हैं। तुम बहुत किस्मत वाले हो जो ऐसी लड़की तुमसे इतना प्रेम करती है और तुम्हारी जीवन संगिनी बनने वाली है। मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम कभी भी उसके प्रेम का निरादर मत करना और ना ही कभी उसको कोई दुख तकलीफ़ देना।"

"कभी नहीं दूंगा भाभी।" मैंने अधीरता से कहा____"उसे दुख तकलीफ़ देने का मतलब है हद दर्ज़े का गुनाह करना। कभी कभी सोचा करता हूं कि मैंने तो अपने अब तक के जीवन में हमेशा बुरे कर्म ही किए थे इसके बावजूद ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में मुझे इतना प्रेम करने वाली लड़कियां कैसे लिखी थीं?"

"शायद इस लिए क्योंकि ऐसी अद्भुत लड़कियों के द्वारा वो तुम्हें मुकम्मल रूप से बदल देना चाहता था।" भाभी ने कहा____"काश! ईश्वर ने अनुराधा के साथ ऐसा न किया होता। उस मासूम का जब भी ख़याल आता है तो मन बहुत ज़्यादा व्यथित हो उठता है।"

अनुराधा का ज़िक्र होते ही मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से एक तूफ़ान सा आया और फिर मुझे अंदर तक हिला कर चला गया। ख़ैर कुछ देर और मेरी भाभी से बातें हुईं उसके बाद वो चली गईं। उनके जाने के थोड़ी देर बाद मैं भी वापस बैठक में आ गया। वीरेंद्र सिंह खेतों की तरफ चला गया था इस लिए मैं चुपचाप पलंग पर लेट गया और फिर भाभी से बातों के बारे में सोचने लगा। भाभी से अपने दिल की बातें कह देने से और उनका जवाब सुन लेने से अब मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।




━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
आखिर बात करने से बात बन ही गई।

बढ़िया अपडेट, दोनो की चिंता दूर हुई और संशय के बादल आखिरकार छट ही गए।


बाकी मुझे लगा की शुभम भाई कुछ आलिंगन वगैरा दिखाएंगे देवर भाभी का 🫣
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories
Top