S M H R
TERE DAR PE SANAM CHALE AYE HUM
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Nice updateअध्याय - 150
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दिन ऐसे ही गुज़रने लगे।
गांव में अस्पताल और विद्यालय का निर्माण कार्य अच्छे तरीके से चलता रहा। गांव के लोग इस सबसे बड़ा खुश और उत्साहित थे। हर तरफ इसी की चर्चा होती थी। मैं और रूपचंद्र निर्माण कार्य की देख रेख में लगे हुए थे। ठंड अब ज़्यादा ही होने लगी थी जिसकी वजह से धूप अब कम ही देखने को मिलती थी। हर तरफ धुंध सी छाई रहती थी। काम करने वालों को तो मेहनत करने से गर्मी मिलती थी जिसकी वजह से उन्हें मज़ा आता था लेकिन जो बैठे हुए सिर्फ देखने वाले थे उन्हें ठंड कंपाने लगी थी।
रूपचंद्र के द्वारा ही मुझे पता चल गया था कि उसके घर में उसके बड़े ताऊ की लड़कियों के ब्याह की तैयारियां होने लगीं हैं। उसकी बहनों के ससुराल वालों ने ब्याह की लग्न बनवा ली थी और सवा महीने बाद शादी होनी थी। दोनों बहनें एक ही घर में ब्याही जाने वाली थीं इस लिए ज़्यादा परेशानी की बात नहीं थी। इस बीच रूपचंद्र के बहुत ज़ोर देने पर मैं एक दो बार उसके घर भी गया। उसके घर वालों ने बहुत ही अच्छे ढंग से मेरा स्वागत सत्कार किया था। रूपा ने भी छुप कर मुझे देखा था।
इधर हवेली में भी अब सामान्य हालात थे। मेनका चाची सबके सामने पहले की ही तरह खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश करती रहती थीं। मां भी उनसे तरीके से ही बातें करती थीं। कुसुम तो भोली और मासूम थी, अतः जल्दी ही वो अपने रंग में आ गई थी और पहले की ही तरह अपनी चंचलता से सबका मन मोहती रहती थी।
मैं भी सबके बीच सामान्य ही था। एक तरफ रूपा के प्रति प्रेम उमड़ रहा था जिसके चलते मन में कई तरह के मीठे ख़याल उभरने लगते थे तो वहीं दूसरी तरफ अनुराधा का ख़याल आते ही दिल में एक टीस सी उभर आती थी। मैं हर रोज़ उसके विदाई स्थल पर जाता था और कुछ देर वहां बैठ कर उसकी यादों में खो जाता था। वहीं से सरोज काकी से मिलने जाता और फिर उसका हाल चाल ले कर खेतों की तरफ निकल जाता। रात को जब खा पी कर अपने कमरे में सोने आता तो मन देर रात तक जाने कहां कहां भटकता रहता और मैं जाने कैसे कैसे ख़यालों में खोता रहता था।
रागिनी भाभी के बारे में जब भी ख़याल आता तो मेरे जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ जाती थी। ना चाहते हुए भी मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ये नियति का कैसा खेल है कि जिस भाभी के प्रति मेरे अंदर सिर्फ आदर और सम्मान की ही भावना है उनके साथ नियति मेरा ब्याह करवाने पर तुल गई है। इसमें कोई शक नहीं कि उनके बेहतर जीवन के लिए सबने जो फ़ैसला किया था वो अपनी जगह सर्वथा उचित था लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इस रिश्ते के प्रति मन में अब भी अजीब से ख़याल उभरते थे।
मैं तो रूपा की सहमति पर भाभी से ब्याह करने को राज़ी हो गया था लेकिन अक्सर सोचता था कि क्या भाभी इस रिश्ते को दिल से स्वीकार करेंगी? मैं जानता था कि अंततः उन्हें भी इस रिश्ते को स्वीकार करना ही पड़ेगा लेकिन मैं ये भी सोचता था कि उनका राज़ी होना एक मज़बूरी ही होगी। यानि दिल से वो यही चाहती हैं कि उनका मुझसे ब्याह न हो।
अजीब से हालात हो गए थे। अजीब सी दुविधा हो गई थी। अजीब से धर्म संकट में फंस गए थे हम दोनों। कुछ दिनों से मेरा बहुत मन कर रहा था भाभी से मिलने का और उनसे इस बारे में बात करने का लेकिन फिर ये सोच कर हिम्मत जवाब दे जाती थी कि आख़िर कैसे नज़र मिला सकूंगा उनसे? मुझे अपने पास आया देख कर कहीं वो मेरे बारे में ग़लत न सोच बैठें। कहीं वो ये न सोच बैठें कि मेरे मन में पहले से ही उनके बारे में ग़लत सोच थी और मैं पहले से ही ये सब चाहता था। जबकि सच तो यही था कि मेरे मन में आज से पहले कभी उनके बारे में ऐसा कुछ भी नहीं था। मैं ये मानता हूं कि एक वक्त था जब मैं उनके रूप सौंदर्य से सम्मोहित हो कर उनकी तरफ आकर्षित हो जाया करता था लेकिन इसमें मेरा क्या दोष था? एक तो मेरा चरित्र ही ऐसा था और दूसरे वो थीं ही इतनी सुंदर कि कोई भी उनकी तरफ आकर्षित हुए बग़ैर नहीं रह सकता था।
मैं जानना चाहता था कि भाभी इस बारे में क्या फ़ैसला करती हैं और ख़ास कर इस बारे में क्या सोचती हैं? कभी कभी मैं खुद को अपराधी सा महसूस करने लगता था। मैं अपनी भाभी को बताना चाहता था कि मेरे मन में ना पहले कभी कोई ग़लत ख़याल था और ना ही आज है। हम दोनों के घर वालों ने भले ही हमारा आपस में विवाह कर देने का फ़ैसला ले लिया है लेकिन इसके बावजूद मैं उनके बारे में ग़लत नहीं सोच सकता हूं। मैं उन्हें बताना चाहता था कि मेरे दिल में आज भी उनके प्रति वैसी ही मान सम्मान की भावना मौजूद है जैसे हमेशा से थी। मेरा उनसे ब्याह होना बस नियति की ही मर्ज़ी थी, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। इस लिए भगवान के लिए वो इस संबंध के चलते मेरे बारे में ऐसा वैसा कुछ भी ना सोचें।
मैं कुछ दिनों से इस सबके बारे में इतना सोचने लगा था कि मेरी हालत अब अजीब सी हो गई थी। मैं बहुत ज़्यादा परेशान, चिंतित और बेचैन रहने लगा था। इस बात को मेरे घर वालों ने भी महसूस किया। मां ने तो एक दिन मुझसे पूछा भी लेकिन मैंने ये सोच कर उन्हें कुछ नहीं बताया कि बेवजह ही वो परेशान और चिंतित हो जाएंगी। हालाकि वो मेरे ना बताने पर भी फिक्रमंद हो उठीं थीं, और फिर एक दिन।
"क्या बात है बेटा?" मेरे कमरे में आ कर मां ने पूछा____"कई दिनों से देख रही हूं तुझे। तू कुछ परेशान और गुमसुम सा नज़र आने लगा है। आख़िर ऐसी कौन सी बात है जिसके चलते तेरी ये हालत हो गई है? मैंने दो दिन पहले भी तुझसे पूछा था लेकिन तूने कुछ नहीं बताया। आख़िर बात क्या है मेरे लाल? क्या अपनी मां को नहीं बताएगा? क्या तू चाहता है कि तेरी मां तुझे ऐसी हालत में देख कर चिंतित हो उठे और दुखी हो जाए?"
"नहीं मां।" मैंने अधीरता से कहा____"मैं ये सपने में भी नहीं चाह सकता कि आप किसी बात से दुखी हो जाएं।"
"तो फिर बता ना बेटा।" मां ने अधीर हो कर कहा____"आख़िर किस बात से तू इतना परेशान दिखने लगा है? कौन सी ऐसी बात है जो तुझे अंदर ही अंदर परेशान किए हुए है? क्या अनुराधा की वजह से तेरी ये हालत है?"
"नहीं मां।" मैंने कहा____"उसकी वजह से नहीं है। उससे तो मैं रोज़ ही मिलता हूं और अपने दिल की बातें भी उसे बताता हूं। मेरी परेशानी कुछ और है मां।"
"तो बता ना बेटा।" मां एकदम व्याकुल सी हो कर बोलीं____"कौन सी परेशानी हो गई है मेरे बेटे को?"
"रागिनी भाभी।" मैंने गंभीरता से कहा____"हां मां, भाभी की वजह से परेशान रहता हूं आज कल।"
"उसकी वजह से?" मां एकदम से चौंकी____"पर उसकी वजह से क्यों बेटा? कहीं तू इस वजह से तो नहीं परेशान है कि हम उससे तेरा ब्याह करवा देना चाहते हैं?"
"नहीं मां, ऐसी बात नहीं है।" मैंने कहा___"बात ये है कि इस रिश्ते के संबंध में वो क्या सोचती होंगी? इससे भी बढ़ कर मेरे बारे में क्या सोचती होंगी?"
"वो क्या सोचेगी?" मां ने कहा____"यही ना कि ये कैसी किस्मत है कि उसे अपने देवर से ब्याह करना पड़ रहा है? मैं मानती हूं बेटा कि उसके लिए भी इस रिश्ते को स्वीकार करना आसान नहीं होगा लेकिन ये भी तो सच ही है कि ऐसा हम इसी लिए करना चाहते हैं क्योंकि इसी में उसका भला है। इसी में उसका जीवन संवर सकता है और वो अपने जीवन में खुश रह सकेगी। तू इस बारे में ज़्यादा मत सोच। मैं मानती हूं कि ये रिश्ता शुरू शुरू में अजीब लगेगा लेकिन बाद में तुम दोनों इस रिश्ते को दिल से अपना कर एक दूसरे से प्रेम करने लगोगे।"
"ये सब तो बाद की बातें हैं मां।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"लेकिन इस वक्त मेरी परेशानी ये है कि मैं खुद को उनका अपराधी सा महसूस करता हूं। मेरे चरित्र के बारे में तो उन्हें भी पता रहा है। ऐसे में अब जब उनसे ब्याह करने का फ़ैसला हो गया तो कहीं न कहीं वो मेरे बारे में ये भी सोचेंगी कि मैं शुरू से ही उनके बारे में ग़लत सोच रखता रहा होऊंगा और अब जब उनसे ब्याह करने की बात हुई तो मैंने झट से इस रिश्ते को क़बूल कर लिया।"
"ऐसा कुछ भी नहीं है बेटा।" मां ने मेरे बाएं गाल को प्यार से सहलाते हुए कहा____"तू बेवजह ही ये सब सोच कर खुद को दुखी कर रहा है। तू भी जानता है कि तेरी भाभी ने तुझे कभी ग़लत नहीं समझा है। अगर वो तुझे ग़लत समझती तो वो कभी एक पल के लिए भी तेरा पक्ष न लेती और ना ही तुझे एक अच्छा इंसान बनने के लिए तुझ पर ज़ोर डालती। इतना ही नहीं, तेरे साथ कभी वो खेतों पर घूमने भी न जाती। उसे तेरे चरित्र का भले ही पता था लेकिन उसे तुझ पर भरोसा भी था कि तू उसके प्रति कभी ग़लत नहीं सोच सकता है। इसी लिए तो वो तुझे इतना मानती थी और तेरे हर दुख में तेरी ही तरह वो भी दुखी हो जाती थी। जब तेरा बड़ा भाई गुज़रा तो वो सदमे में चली गई थी। हम सबने पूरी कोशिश की थी उसको दुख से उबारने की लेकिन तेरी वजह से वो अपने उस असहनीय दुख से उबर गई। वो अक्सर मुझसे कहती थी कि अगर वैभव जैसा उसका देवर न होता तो आज वो अपने दुख से बाहर न निकल पाती। वो ये भी कहा करती थी कि उसे गर्व है कि ईश्वर ने उसे वैभव जैसा देवर दिया है जो उसके चेहरे पर खुशी लाने के लिए कुछ भी कर सकता है। ये सारी बातें यही ज़ाहिर करती हैं मेरे बेटे कि वो कभी तेरे बारे में ग़लत नहीं सोच सकती। तेरे साथ उसके ब्याह होने वाली बात से भी वो यही सोचती होगी कि इसमें तेरा कोई दोष नहीं है। जो भी हो रहा है उसमें सबसे ज़्यादा क़िस्मत का हाथ है। इस लिए तू ये सब फ़िज़ूल की बातें सोच कर ख़ुद को दुखी मत रख।"
"क्या मैं एक बार भाभी से मिल आऊं?" मैंने धड़कते दिल से मां को देखते हुए उनसे पूछा____"मैं मानता हूं कि मेरा अब उनसे मिलना उचित नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं एक बार उनसे मिलना चाहता हूं। उनके सामने घुटनों पर बैठ कर उनसे कहना चाहता हूं कि मेरे मन में उनके प्रति ना पहले कभी कोई ग़लत भावना थी और ना ही आगे कभी हो सकती है। इस रिश्ते के बाद भी उनके प्रति मेरे दिल में वैसी ही मान सम्मान की भावना रहेगी जैसे हमेशा से रही है।"
मेरी बातें सुन कर मां की आंखें भर आईं और अगले ही पल उनकी आंखों से आंसू के कतरे छलक पड़े। उन्होंने लपक कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया। मैं भी किसी छोटे से बच्चे की तरह उनसे छुपक गया। एक असीम सुख और शांति का एहसास हुआ मुझे।
"मैं जानती हूं कि तेरे मन में रागिनी के प्रति बहुत ही ज़्यादा आदर और श्रद्धा जैसा भाव है।" मां ने मुझे खुद से छुपकाए हुए ही कहा____"और सच कहूं तो मुझे इस बात के लिए तुझ पर गर्व है। ख़ैर, तू अपनी भाभी से मिलना चाहता है ना तो ठीक है। मैं आज ही तेरे पिता जी से इस बारे में बात करूंगी और उन्हें समझाऊंगी कि वो इसके लिए तुझे चंदनपुर जाने की अनुमति दे दें।"
"ओह! मां।" मैंने खुशी से उन्हें जोरों से कस लिया____"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मां। मैं बता नहीं सकता कि आपके मुख से ये सुन कर मुझे कितना सुकून मिला है।"
"मां को धन्यवाद करता है पागल।" मां ने मुझे खुद से अलग कर के कहा____"अरे! मां तो होती ही है अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए। ख़ैर अब तू आराम कर और इस बारे में अब कुछ भी सोच कर खुद को परेशान मत कर। चल अब जाती हूं मैं।"
मां ने मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और फिर वो कमरे से चली गईं। इतने दिनों से जिन बातों को सोचते हुए मैं परेशान था वो अब मानों किसी जादू के जैसे छू मंतर हो गईं लगने लगीं थी। मेरा मन अब बहुत हल्का महसूस हो रहा था।
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"अरे! शालिनी तू कब आई अपनी ससुराल से?" रागिनी अपनी बचपन की सहेली को अपनी तरफ आते देख एकदम से चौंकी थी।
घर के पीछे कुछ खाली जगह थी जिसे चारो तरफ से लकड़ी की ऊंची दीवार बना कर घेरा हुआ था। उस खाली जगह में एक तरफ कुवां था और दूसरी तरफ कुछ पेड़ पौधे लगे हुए थे जिनमें से कुछ अमरूद के, कुछ कटहल के और एक दो केले के पेड़ थे। रागिनी खाली समय में ज़्यादातर यहीं आ कर बैठ जाया करती थी। गांव में किसी के घर जाना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था। एक शालिनी ही थी जिसके घर वो चली जाया करती थी किंतु उसकी शादी के बाद वहां भी जाना बंद हो गया था। अपने चाचा जी के घर भी चली जाती थी जहां पर वो अपनी भाभियों के पास थोड़ा समय गुज़ार लेती थी।
"आज ही आई हूं।" शालिनी ने उसके क़रीब आ कर कहा____"तेरे बारे में मां ने बताया तो तुझसे मिलने चली आई। सच कहूं तो तेरे बारे में जब वो सब सुना था तो बहुत दुख हुआ था मुझे। यकीन ही नहीं हुआ था कि मेरी इतनी अच्छी सहेली के साथ ऊपर वाला इस तरह का अन्याय कर सकता है।"
"सब किस्मत की बातें हैं शालिनी।" रागिनी ने फीकी सी मुस्कान होठों पर सजा कर कहा____"ख़ैर तू बता, कैसी है तू और जीजा जी कैसे हैं?"
"मैं ठीक हूं और तेरे जीजा जी भी ठीक हैं।" शालिनी ने कहा____"मुझे वंदना भाभी ने बताया कि तेरा फिर से ब्याह करने का फ़ैसला किया है चाचा जी ने?"
शालिनी की इस बात पर रागिनी कुछ बोल ना सकी। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नज़र आए। शालिनी ग़ौर से उसको देखने लगी थी।
"उन्होंने बताया कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया है।" शालिनी ने आगे कहा____"मैं तो उनके मुख से ये सब सुन कर हैरान ही हो गई थी। वैसे सच कहूं तो मुझे तेरा फिर से ब्याह होने की बात सुन कर बहुत खुशी हुई है। ऊपर वाले से यही प्रार्थना करती थी कि मेरी सहेली के जीवन को फिर से खुशियों से भरने का कोई इंतज़ाम कर दो और देखो ऊपर वाले ने मेरी प्रार्थना सुन ली। बस यही जान कर थोड़ी हैरानी हुई कि तेरा ब्याह तेरे ही देवर से करने का फ़ैसला किया चाचा जी ने।"
"पता नहीं ऊपर वाला मुझसे क्या चाहता है शालिनी?" रागिनी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"जो कुछ मैंने सपने में भी नहीं सोचा था वही सब मेरे साथ करता जा रहा है वो। समझ में नहीं आ रहा अपनी ऐसी किस्मत पर रोऊं या खुश होऊं?"
"अरे! ऐसा क्यों कह रही है तू?" शालिनी ने हैरानी से उसे देखते हुए कहा____"मैं मानती हूं कि ऊपर वाले ने इसके पहले तेरे साथ जो किया था वो बहुत ही ग़लत और दुखदाई था लेकिन ये तो बहुत ही अच्छी बात है कि तेरा फिर से ब्याह हो जाएगा और तेरा दुखों से भरा ये जीवन फिर से खुशियों से भर जाएगा।"
"कहना बहुत आसान होता है शालिनी।" रागिनी ने उदास भाव से कहा____"लेकिन अमल करना बहुत मुश्किल होता है। अपने ही देवर को अब पति की नज़र से देखना अथवा सोचना बहुत ही अजीब सी अनुभूति कराता है मुझे।"
"हां मैं समझती हूं इस बात को।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"समझ सकती हूं कि इस बारे में तेरे मन में जाने कैसे कैसे ख़याल उभरते होंगे लेकिन मैं तुझसे यही कहूंगी कि देवर से ब्याह करने का मामला कोई नया नहीं है। दुनिया में अक्सर परिस्थितियों को देख कर लोगों ने ऐसे निर्णय लिए हैं। तुझे भी इस बात को समझना चाहिए और फ़िज़ूल की बातें अपने मन से निकाल कर सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचना चाहिए। ऊपर वाले की कृपा से तुझे इतना अच्छा ससुराल मिला है। अपनी बेटी की तरह प्यार करने वाले इतने अच्छे सास ससुर मिले हैं और सबसे बड़ी बात तेरा भला चाहते हुए तेरे जीवन को फिर से संवारने के लिए वो तेरा फिर से ब्याह कर देना चाहते हैं। सबके नसीब में ऐसे इंसान नहीं होते रागिनी जो अपनी बहू के लिए इतना कुछ सोचें और करने लगें। क्या हुआ अगर देवर से ब्याह हो जाएगा तेरा? शुरू शुरू में ज़रूर अजीब लगेगा लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। मुझे तो इस बात का भी यकीन है कि आगे चल कर तू खुद अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात से यही सोचने लगेगी कि ये अच्छा ही हुआ।"
"मतलब तुझे भी लगता है कि मेरा अपने देवर के साथ ब्याह हो जाने की बात हर तरह से उचित है?" रागिनी ने शालिनी की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा।
"हां बिल्कुल।" शालिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तेरे भले के लिए वो जो भी कर रहे हैं एकदम सही कर रहे हैं। तुझे भी बेकार की बातें नहीं सोचनी चाहिए और इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाना चाहिए। अपने ही पैरों से अपनी अच्छी किस्मत को ठोकर मत मार।"
रागिनी अपलक देखती रह गई शालिनी को। उसे समझ ही न आया कि अब क्या कहे? दिलो दिमाग़ में एकाएक ही हलचल सी मच गई थी।
"अच्छा ये तो बता मेरे होने वाले जीजा जी अभी भी वैसे ही हैं क्या?" शालिनी ने सहसा मुस्कुराते हुए पूछा____"या अब बदल गए हैं वो? और हां, इस रिश्ते के बारे में उनका क्या ख़याल है?"
रागिनी को समझ ना आया कि वो अपनी सहेली से वैभव के बारे में क्या बताए? शालिनी के मुख से होने वाले जीजा जी सुन कर ही उसके समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई थी। मन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभरने लगे थे।
"क्या हुआ?" उसे कुछ न बोलता देख शालिनी ने जैसे उसे ख़यालों से बाहर खींचा____"चुप क्यों हो गई तू? बता ना मेरे होने वाले जीजा जी के बारे में?"
"व...वो अब पहले से बदल गए हैं।" रागिनी ने झिझकते हुए बड़ी मुश्किल से कहा।
"हाय राम! क्या सच में?" शालिनी ने आश्चर्य से आंखें फैला कर रागिनी को देखा____"बड़े आश्चर्य की बात है ये। क्या वो सच में बदल गए हैं?"
रागिनी अजीब सा महसूस करने लगी थी। शालिनी के पूछने पर उसने सिर्फ हां में सिर हिला दिया। ये देख शालिनी को फिर से हैरानी हुई। उसकी आंखों के सामने वैभव का चेहरा चमक उठा और साथ ही गुज़रे समय की यादें भी।
(दोस्तो, ये वही शालिनी है जिसके बारे में वैभव ने अपनी भाभी से उस समय मज़ाक करते हुए ज़िक्र किया था जब वो अपनी भाभी को ले कर उनके मायके चंदनपुर जा रहा था।)
"क्या हुआ?" शालिनी को कहीं खो सा गया देख रागिनी ने उसे देखते हुए पूछा____"अब तू कहां खो गई?"
"व...वो मैं न।" शालिनी एकदम से हड़बड़ा गई। फिर जल्दी से खुद को सम्हालते हुए बोली____"अरे! मैं तो ये सोचने लगी थी कि क्या सच में मेरे होने वाले जीजा जी बदल गए हैं? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा।"
"क्यों नहीं हो रहा भला?" रागिनी को जाने क्यों उसकी बात से बुरा महसूस हुआ जिसके चलते उसने सहसा उसे घूरते हुए कहा____"और हां मुझे पता है कि तू भी उनसे नैन मटक्का कर चुकी है।"
"अ....अरे! ये...ये क्या कह रही है तू?" शालिनी ने बुरी तरह हड़बड़ाते हुए रागिनी को हैरत से देखा____"मेरा उनसे इस तरह का कोई चक्कर नहीं था। पता नहीं क्यों ऐसा बोल रही है तू?"
"मैं ऐसा इस लिए कह रही हूं क्योंकि मुझे उन्होंने ही बताया था जिनसे तेरा नैन मटक्का चला था।" रागिनी ने कहा____"और इतना तो मैं समझती ही हूं कि इस मामले में वो महाशय कितने पहुंचे हुए थे। अगर उन्होंने तेरा ज़िक्र किया था तो मेरे लिए ये यकीन कर लेना सहज ही था कि तेरा उनसे चक्कर था।"
शालिनी भौचक्की सी देखती रह गई रागिनी को। एकदम से ही वो नज़रें चुराने लगी थी। फिर उसने अपनी हालत को काबू किया और चेहरे पर खुशी के भाव लाते हुए कहा____"हां यार, मेरा उनसे चक्कर चल गया था लेकिन यकीन कर बस थोड़ा सा ही चल पाया था। बात इतनी भी नहीं बढ़ी थी कि हमारे बीच कुछ ग़लत हो जाता।"
रागिनी को याद आया कि वैभव ने भी उससे ऐसा ही कुछ कहा था। शालिनी के आख़िरी वाक्य से जाने क्यों रागिनी को राहत सी महसूस हुई।
"ख़ैर ये सब छोड़।" शालिनी ने एकदम सामान्य भाव से कहा____"और ये तो बता कि मेरे होने वाले जीजा जी क्या सच में ही बदल गए हैं?"
"तू तो ऐसे कह रही है जैसे वो कभी बदल ही नहीं सकते थे?" रागिनी को फिर से बुरा लगा, इस लिए उसने उसे घूरा____"वैसे भी उन्होंने कोई क़सम तो खाई नहीं थी कि वो कभी बदलेंगे ही नहीं।"
"हां ये तो है।" शालिनी ने कहा____"लेकिन मैं ये जानने को उत्सुक हूं कि वो बदल कैसे गए और बदले भी हैं तो कितना बदले हैं? क्या एकदम से शरीफ़ ही बन गए हैं वो?"
"हां कुछ ऐसा ही है।" रागिनी के ज़हन में गुज़रे समय की ढेर सारी बातें जैसे चमक उठीं और साथ ही आंखों के सामने ढेर सारी तस्वीरें भी।
"कुछ ऐसा ही है का क्या मतलब है?" शालिनी जैसे बाल की खाल निकालने पर उतारू हो गई____"जो इंसान हमेशा मौज मस्ती करता था और भी ना जाने क्या क्या करता था वो अचानक से शरीफ़ कैसे बन गया?"
"इसके जवाब में बस इतना ही कहूंगी कि हर इंसान वक्त के साथ बदल जाता है।" रागिनी ने थोड़ा बेचैन भाव से कहा____"जीवन में कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं जिसके चलते इंसान को खुद पर बदलाव करना पड़ता है।"
"हां ये तो तू सही कह रही है।" शालिनी ने सिर हिलाते हुए कहा____"वैसे उनका इस तरह से बदल जाना तेरे हिसाब से ठीक है या नहीं?"
"ठीक ही है।" रागिनी ने कहा____"अगर कोई अच्छा इंसान बन जाए और अच्छे अच्छे कर्म करने लगे तो भला इससे अच्छा क्या हो सकता है?"
"यानि मेरे होने वाले जीजा जी अब अच्छे इंसान बन गए हैं।" शालिनी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"और अब अच्छे अच्छे काम करने लगे हैं। ये तो कमाल ही हो गया रागिनी। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो तुम्हारे लिए अच्छे बन गए हैं? आख़िर अब तुमसे ब्याह जो होना है उनका।"
"क्या फ़ालतू की बातें कर रही है तू?" रागिनी थोड़ा उखड़ कर बोली____"बिना मतलब कहीं की बात कहीं जोड़े जा रही है तू।"
"अरे! तू गुस्सा क्यों हो रही है?" शालिनी ने हैरानी ज़ाहिर की____"मैंने तो वही कहा है जो मुझे लगा। अब अगर ऐसा नहीं है तो तू ही बता कि उनके इस तरह बदल जाने की क्या वजह है?"
"मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती।" रागिनी ने स्पष्ट भाव से कहा____"तू कोई और बात कर।"
"अच्छा ठीक है।" शालिनी को महसूस हुआ कि रागिनी शायद उसकी बातों से चिढ़ रही है इस लिए कोई और बात करने का ही उसने सोचा____"और बता, यहां कैसा लग रहा है तुझे? मेरा मतलब है कि ससुराल से आए क़रीब ढाई महीने हो गए हैं तुझे तो क्या तुझे अपने ससुराल वालों की याद नहीं आती?"
"आती है।" रागिनी ने सहसा उदास हो कर कहा____"लेकिन अब वहां जा ही नहीं सकती। मेरे सास ससुर और मेरे माता पिता ने अचानक से मेरे सामने ये रिश्ता जो रख दिया है।"
"उन्होंने ये तेरे भले के लिए ही किया है रागिनी।" शालिनी ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"आज भले ही तुझे ये रिश्ता अजीब और बेमन सा लग रहा है लेकिन यकीन मान आगे चल कर इसी रिश्ते से तुझे लगाव हो जाएगा। ख़ैर अपने लिए न सही अपने घर और ससुराल वालों की खुशी के लिए इस रिश्ते के लिए हां कह दे।"
"वो तो कहना ही पड़ेगा मुझे।" रागिनी ने कहा____"इतने दिनों से खुद को इस रिश्ते के लिए ही तो समझा रही हूं। सबके बारे में ही तो सोच रही हूं। ख़ास कर अपने सास ससुर के बारे में। मैं भी जानती हूं कि ऊपर वाले ने मुझे दुनिया के सबसे अच्छे सास ससुर दिए हैं जो मुझे अपनी बेटी मान कर मुझे बहुत प्यार और स्नेह देते हैं। मैं इस रिश्ते को ना कह कर उनकी पवित्र भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकती।"
"चल यही सही।" शालिनी के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई____"यही सोच के अब तू इस रिश्ते के लिए हां कह दे। तुझे शायद अंदाज़ा भी नहीं है कि सब तेरे हां कहने का कितनी शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं और साथ ही तेरे लिए बहुत ज़्यादा फिक्रमंद भी हैं।"
"हां जानती हूं मैं।" रागिनी ने सिर हिलाया।
"तो मैं जा कर वंदना भाभी को बता दूं कि तूने इस रिश्ते के लिए हां कह दिया है?" शालिनी ने खुशी से पूछा।
"न..नहीं नहीं रुक जा ना।" रागिनी एकदम से हड़बड़ा कर बोल पड़ी।
"अब किस बात के लिए रुक जाऊं?" शालिनी ने भौंहें उठा कर देखा उसे____"जो कहना है उसे साफ शब्दों में जल्द से जल्द कह देना चाहिए। बेवजह समय बर्बाद करना अच्छा नहीं होता, समझी।"
रागिनी को समझ ना आया कि क्या कहे? अवाक सी देखती रह गई शालिनी को। उसकी धड़कनें एकदम से तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। दिलो दिमाग़ में हलचल सी मच गई थी।
"चल अब यहां से।" शालिनी ने उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए कहा____"हर वक्त अकेले में फ़ालतू की बातें मत सोचा कर। खुशियां खुद चल कर तेरे क़दमों के पास आईं हैं तो उन्हें फ़ौरन अपनी झोली में भर ले।"
रागिनी बदहवास सी उसके साथ खिंचती चली गई। उसकी धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं थी। गोरे चेहरे पर लाज की सुर्खी भी छाने लगी थी। कदाचित ये सोच कर कि उसकी सहेली अभी कुछ ही पलों में वंदना भाभी को बता देगी कि वो वैभव से ब्याह करने के लिए राज़ी हो गई है।
रागिनी को ये सोच कर बड़ा अजीब सा लगने लगा कि जाने क्या सोचेंगे अब उसके माता पिता और भैया भाभी और साथ ही उसकी छोटी बहन भी। कहीं वो सब उसके बारे में कुछ ऊटपटांग तो नहीं सोच बैठेंगे? रागिनी का चेहरा इस एहसास के चलते ही लाज से सुर्ख पड़ता चला गया।
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Ragini k Ghar walo ne apna akhiri daw chal Diya Jo ki Ragini ki saheli Shalini thi or woh daw lagta hai kaam kar gaya
(Bhai 1 request hai Ragini or Vaibhav ki suhagrat bhi dikhana woh thodi erotic style mein ),