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UPDATE 6
अब ये मेरे लिए प्रेस्टीज इशू बनता जा रहा था, मैं रमा दीदी को ज़्यादा खुले तौर पर टीज़ नहीं करना चाहता था, लेकिन उनके मन में पता नहीं क्या चल रहा था, मैं जैसे ही जाने दो सोच के खड़ा होता तो वो थोड़ा दूर से मुझे अंगूठा दिखा के जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती
मैंने ठान लिया कि अब इनको सबक सीखा के ही रहूँगा. इस समय हम अपने लंबे-चौड़े आँगन में ही थे. मैंने एक लंबी सी छलांग लगाई और इससे पहले कि रमा दीदी संभाल कर भाग पाती मैंने पीछे से उनकी कमर में लपेटा मार दिया. वो नीचे को झुकती चली गयी, मैं उनके ऊपर था. पीठ मेरे सीने से सटी हुई थी, मैंने उनको अपनी बाजुओं में कस कर उठा लिया. रमा दीदी खिल-खिला रही थी, और मुझसे छोड़ने के लिए बोलती जा रही थी. दीदी के हाथ मेरे हाथों के ऊपर थे, लेकिन उनसे वो मेरे हाथों पर दबाव डाले थी, उन्हें छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं था. मेरी हाइट दीदी से कुछ ज़्यादा ही थी, उनको ऊपर उठाते हुए मेरे हाथ उनके पेट से सरक कर थोड़ा ऊपर को हो गये और उनके अमरूद के निचले हिस्से को टच होने लगे.
दीदी लगातार खिल-खिलाए जा रही थी और अपने हाथों से मेरे हाथों को और ऊपर को खिसकाने की कोशिश कर रही थी, अब उनकी कमर का ऊपरी हिस्सा मेरे ठीक लंड के सामने था जो कमर के दबाव से फूलने लगा था. दीदी ने अब अपने को छुड़ाने के बहाने अपने को और झुकाया और मेरी बाजुओं पर झूल गयी, अपने दोनों पैर हवा में उठा लिए और उन्हें मेरे घुटनों पर जमा लिया. उसके बाद उन्होंने अपनी कमर को और ऊपर की ओर उछाला, अब उनके गोल-मटोल चुतड़ों की दरार ठीक मेरे अकड़ चुके लंड के सामने थी, वो लगातार मुझसे छोड़ने के लिए बोल रही थी और साथ ही अपने गांड को मेरे बाबू के ऊपर रगड़ रही थी.
हम दोनों के ही मुँह लाल पड़ गये थे. अभी कुछ और आगे होता उसके पहले बाहर के दरवाजे से एक और खिल-खिलाहट की आवाज़ सुनाई दी. मैंने दीदी को छोड़ दिया और हम दोनों ने ही पीछे मुड़कर देखा, दरवाजे पर आशा दीदी खड़ी ताली बजा-बजा कर हमारा खेल देखते हुए हंस रही थी.
आशा – वाह ! भाई-बहन अकेले-अकेले ही खेल में लगे हो. अरे भाई हमें भी शामिल कर लो.
रमा– देखो ना दीदी, ये छोटू बहुत तंग करता है मुझे, ऐसा कस कर पकड़ लिया कि छोड़ ही नहीं रहा था.
मैं – अच्छा मेरे गुदगुदी किसने की थी हां! अब बताओ दीदी को खुद शुरू करती है, और दोष मेरे ऊपर डाल रही है.
आशा – अरे बस करो तुम दोनों और बताओ कोई काम-वाम तो नहीं है तुम दोनों को..?
दोनों एक साथ – नहीं ऐसा तो कोई काम नहीं है.
आशा – तो चलो क्यों ना हम लोग खेतों में चलें, वही बाग़ में बैठ कर खेलते हैं, यहाँ कितनी गर्मी है.
मैंने कहा – हां दीदी चलो वहीं चलते हैं. फिर हम बाबूजी को बता कर तीनों खेतों की तरफ चल दिए, जो बस घर से कोई आधा किमी की दूरी पर ही थे.
हमारी लंबी चौड़ी ज़मीन थी, ज़मीन के लगभग सेंटर में 4 एकड़ का आम और अमरूद का बाग था, जिसमें और भी आमला, बेर जैसे पेड़ थे, लेकिन मुख्य तौर पर आम और अमरूद ही थे. बगीचे के चारों तरफ के हिस्से बराबर-बराबर खेत चारों भाइयों में बँटे हुए थे. गांव की तरफ का हमारा हिस्सा था, और उसके ठीक अपोजिट आशा दीदी के खेत थे, चारों की ज़मीन की सिंचाई हमारे ही ट्यूबवेल से होती थी. ये सीज़न आमों का था, लेकिन कच्चे आम लगे थे, पकने में अभी कम से कम एक महीना और लगने वाला था.
हम तीनों आम के बगीचे में जहाँ घने पेड़ थे उनके नीचे एक चादर बिछा कर बैठ गये, और कार्ड्स खेलने लगे. गर्मियों की चिलचिलाती दोपहरी में घर से ज़्यादा यहाँ राहत थी, वैसे तो हवा ज़्यादा नहीं थी, फिर भी जब भी हवा का झोंका आता, तो बड़ी ठंडक पहुँचती उस तमतमाति गर्मी में.
कार्ड खेलते हमारी पूरी दोपहरी निकल गयी, 3 बजे रमा दीदी बोली, यार अब चलो, बोर हो गये खेलते-खेलते. तभी आशा दीदी बोली चलो ठीक है, लेकिन कुछ आम ले लेते हैं, शाम को चटनी बनाने के काम आएँगे.
आशा दीदी बोली – छोटू तू ट्राइ करना कुछ आम तोड़ने की.. तो मैं उचक कर कुछ नीचे की तरफ लटके आमों को तोड़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन काफ़ी कोशिश करने पर भी उन तक पहुँच नहीं पाया. दोनों दीदी मिट्टी के ढेले उठाकर आमों को निशाना लगाकर तोड़ने की कोशिश करने लगी, लेकिन निशाना नहीं लग पा रहा था और एक-आध लगा भी तो कच्चे आम मिट्टी के ढेलों से नहीं टूट पाए.
आशा – छोटू यार ! तू घोड़ा बन जाए तो तेरे ऊपर चढ़ कर मैं या रमा पहुँच सकती हैं आमों तक. मैं अपने घुटने टेक कर घोड़ा बन गया, पहले रमा दीदी ने कोशिश किया लेकिन वो नहीं पहुँच पाई, फिर आशा दीदी ने भी कोशिश किया, उनका वजन थोड़ा ज़्यादा था, लेकिन मैंने उनको भी सहन कर लिया, लेकिन नतीजा वो ही ढाक के तीन पात.
आशा दीदी बोली, यार! ये तो बात नहीं बन रही, तू पेड़ पर चढ़के नहीं तोड़ सकता क्या? अब मैं आज तक किसी पेड़ पर नहीं चढ़ा था, तो मैंने मना कर दिया.
फिर वो बोली – तो एक काम कर, मुझे उचका दे. मैं तोड़ लूँगी.
मैंने रमा दीदी की ओर देखा, तो वो मन ही मन मुस्करा रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोली, मुझे चुप रहते हुए वो फिर बोली- अरे उचका ना बिंदास, सोच क्या रहा है.. तू भी ना… !
मैंने आशा दीदी को जैसे ही पीछे से पकड़ने की कोशिश की तो वो पलट गयी और बोली – आगे से उठा, जिससे तुझे भी दिखे कि और कितना ऊपर करना है.
मैंने थोड़ा झुक कर उनकी जांघों को अपने बाजुओं में लपेटा और ऊपर को उठाया. इस पोज़िशन में उनकी चूत मेरे कमर से थोड़ा ऊपर माने पेट पर था और उनके बूब्स मेरे मुँह से थोड़ा सा नीचे थे. उनकी मोटी मांसल जांघों के एहसास ने मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ा दी, भारी-भारी गोल मुलायम चुचियों का उपरी भाग मेरी ठोडी को सहला रहा था. दो-चार आम तो उनकी हद में आ गये और उन्होंने उन्हें तोड़ लिया, लेकिन और भी तोड़ने के लिए अभी भी वो नहीं पहुँच पा रही थी.
आशा – छोटू! भाई और थोड़ा ऊपर कर ना!
मैंने उन्हें और 6-8” ऊपर किया तो मेरा मुँह ठीक उनके बूब्स के बीच में आ गया, मेरे गाल उनकी चुचियों पर थे.
अचानक उनके मुँह से एक हल्की से सिसकी निकल गयी.. ईीीइसस्स्शह…सीईईईईईई.., मैंने कहा- क्या हुआ दीदी..? तो वो फ़ौरन बोली – कुछ नहीं तू ऐसे ही पकड़े रह बस मैं आम को पकड़ने ही वाली हूँ… अरे हिल मत…ना..!
मेरा मुँह और नाक उनकी मोटी-मोटी चुचियों में दब रहा था, तो उसको थोड़ा इधर-उधर किया. इससे मेरी नाक उनकी चुचियों पर रगड़ने लगी. वो तो आम तोड़ना भूल कर अपनी आँखें बंद करके मस्ती में खो गयी.
मेरा भी नीचे तंबू बनता जा रहा था, फिर अचानक रमा दीदी बोली – अरे दीदी ! तोडो ना आम जल्दी उसको प्राब्लम हो रही है, कब तक वो ऐसे उठाए खड़ा रहेगा..?
आशा – अरे तोड़ तो रही हूँ! छोटू ! भैया थोडा पीछे को हो ना ! ये चार आम थोड़े तेरे पीछे को हैं.
मैं जैसे ही थोड़ा पीछे को हुआ, मुझे पता नहीं था कि ज़मीन थोड़ा उबड़-खाबड़ है, मेरा पैर एक गड्ढे में चला गया और मैं पीछे को गिरने लगा. छोटूऊऊ….संभाअल. वो चिल्लाई लेकिन एक बार बॅलेन्स क्या बिगड़ा कि धडाम से में पीछे को गिर पड़ा. आशा दीदी मेरे उपर उनकी चूत मेरे आकड़े हुए लंड को किस कर रही थी.
उसके 34” के दोनों उभार मेरे सीने में दबे पड़े थे, उत्तेजना के कारण दीदी के निप्पल भी कड़े होकर मेरे सीने में चुभन पैदा कर रहे थे. मेरे दोनों हाथ अभी भी उनकी मस्त गद्देदार गांड पर थे. मुझे पता नहीं चला कि कही चोट-वोट भी लगी है, मैं तो बस उनके मादक शरीर के नीचे पड़ा उनकी आँखों में झाँक रहा था, जिसमें एक निमंत्रण दिखाई दिया. वो भी ऐसे ही कुछ देर मज़े के आलम में खोई रही. रमा दीदी पास में खड़ी खिल-खिला रही थी.
फिर मुझे अपनी पीठ में कुछ चुभता सा महसूस हुआ और मैंने उनसे कहा- अरे दीदी ! उठो मेरी पीठ टूट गयी..!
वो – तो पहले तू मुझे छोड़ तो सही, तभी तो मैं उठुँगी…! तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे दोनों हाथ उसके चुतड़ों पर कसे हुए हैं. जब मैंने उन्हें छोड़ा, तो अपनी चूत को मेरे लंड के ऊपर ज़ोर से रगड़ा और एक मादक सिसकी भरती हुई वो मेरे ऊपर से उठ गयी.
मैं जैसे ही खड़ा हुआ तब मुझे अपनी पीठ में दर्द का एहसास हुआ. क्योंकि जहाँ में गिरा था, वहाँ एक छोटा सा ब्रिक (ईंट) का टुकड़ा पड़ा हुआ था और उस साले ने मेरी पीठ को चटका दिया था.
मैं आहह भरते हुए उठा… तो रमा दीदी बोली – क्या हुआ छोटू..? चोट लग गयी क्या..?
मैं – हां दीदी इस पत्थर से मेरी पीठ टूट गई शायद, तो आशा दीदी ने मेरी शर्ट ऊपर करके अपने हाथ से कुछ देर सहलाया और बोली- रमा घर जाकर थोड़ा आयोडेक्स की मालिश कर देना ठीक हो जाएगा. इसी तरह की चुहलबाज़ियों में समय व्यतीत हो रहा था, मेरी दोनों बहनें मेरे साथ दिनों दिन खुलती जा रही थी और मैं उनकी हरकतों से बुरी तरह उत्तेजित हो जाता था, लेकिन कुछ कर नहीं पाता.
मैंने अभी तक अपने लौडे को हाथ में लेकर सिवाय मुताने के और कोई उसे नहीं किया था. मन ही मन सोचता था, कि काश इसके आगे भी कुछ कर पाता. लेकिन क्या? ये कोई आईडिया नहीं था. मेरा कोई ऐसा दोस्त भी नहीं था जिससे मैं इस तरह की बातें शेयर कर पाता. वो दोनों तो मुझे गरम करके अपना काम निकाल कर अपने रास्ते हो लेती और मैं यूँ ही चूतिया बना रह जाता.
आख़िरकार छुट्टियों के दिन बीत गये और मैंने क्लास 11 में एडमिशन ले लिया. स्कूल शुरू होने के कुछ दिन बाद ही मोहिनी भाभी लौट आई, मतलब बड़े भैया ले आए अपनी ससुराल जाकर. आखिर उनके भी तो लौड़े में खुजली होती ही होगी. भाभी ने आते ही मेरी क्लास ले ली, और वो जो टाइम टेबल बना कर गयी थी, उसके बारे में पूछा जिसे मैं एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह ईमानदारी से पालन कर रहा था. उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और मेरा माथा चूम कर मुझे अपनी गोद में लिटाया और बीते दिनों का सारा प्यार उडेल दिया.
मैं अकेला स्कूल जाने वाला ही रह गया था, मंझले चाचा के बच्चे तो अपने मामा के यहाँ शहर में रह कर पढ़ रहे थे. और मेरी दीदी समेत वाकी की 12थ तक की पढ़ाई पूरी हो गयी थी. भाभी की प्रेग्नेन्सी को जैसे-जैसे दिन बढ़ रहे थे, उनके शरीर में कुछ ज़्यादा ही बदलाव दिखने लगे थे, उनके वक्ष और कूल्हे एक दम अपोजिट साइड को बाहर निकलते जा रहे थे.
यही नहीं, वो दिनों दिन बोल्ड भी होती जा रही थी. एक दिन मालिश करते-करते भाभी ने मेरी हालत बहुत खराब कर दी. ना जाने आज उनको क्या सूझी की अपनी साड़ी उतार कर एक तरफ रख दी, और मात्र ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे लौड़े के ऊपर अपनी उभरी हुई गांड टिका कर मेरे सीने पर मालिश करने लगी. आगे-पीछे होते हुए उनकी गांड मेरे लंड पर रगड़ा दे रही थी, जिसकी वजह से मेरे लंड महाराज बुरी तरह अकड़ गये, फिर तो उसकी ऐसी रेल बनी कि पुछो मत.
उधर ब्लाउज में कसे उनके बूब्स बिल्कुल मेरी आँखों के सामने थे जो झटकों के साथ उछल-उछल कर बाहर को निकलने पर आमादा दिखाई दे रहे थे. फिर भाभी मेरे ऊपर ही पसर गयी और उन्होंने मेरे होंठ अपने होंठों में भर लिए, मुझे बड़ा अजीब लगा कि ये कर क्या रही हैं, जिंदगी में पहली बार किसी ने मेरे होंठों को चूमा था. यही नहीं, वो अपनी कमर को लगातार ज़ोर-तेज़ मेरे लंड पर घिसने लगी.
15 मिनिट में उन्होंने मेरी हालत बैरंग कर दी, उनका मुँह लाल हो गया, बदन भट्टी की तरह तप रहा था, मानो बुखार चढ़ गया हो. फिर अचानक ही वो शांत पड़ गयी और कुछ देर बाद मेरे ऊपर से उतर कर अपनी साड़ी उठाई और नीचे भाग गयी. मैं बड़ा असमंजस में पड़ गया और सोचने लगा कि शायद भाभी को कहीं बुखार तो नहीं आ गया, जिसकी वजह से वो ऐसी हरकत कर रही थी. इधर मेरा बुरा हाल था, मेरा मन कर रहा था, कि अपने लंड को कच्छे से बाहर निकल लूँ और ज़ोर-ज़ोर से हिलाऊँ, उसे सहलाऊँ…!
आखिरकार मैंने आज पहली बार उसको बाहर निकाल ही लिया और ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा. इधर जैसे ही मेरे लंड के टोपे की खाल ऊपर को खिंची, मुझे बेहद दर्द का भी एहसास हुआ. लेकिन मन करे कि तेज़ इसको रगड़ूं, मसलूं. अभी मैं इसी कश्मकश में था कि क्या और कैसे करूँ कि अचानक भाभी की आवाज़ सुनाई दी.
भाभी - अंकुश!..... ये क्या हो रहा है..?
मैंने गर्दन घुमाकर देखा, तो भाभी जीने की सबसे उपरी सीढ़ी पर अपनी कमर पर हाथ रखे खड़ी थी. मेरी तो गांड ही फट गयी, इधर मेरा लंड फुल अकड़ में था. मैंने झट से उसे अपने पेट की तरफ लिटाया और अपने शॉर्ट को ऊपर की तरह खींच कर एलास्टिक छोड़ दी. चटकककक! शॉर्ट की टाइट एलास्टिक लंड के ठीक टोपे पर जहाँ उसकी स्किन का जॉइंट था वहाँ पड़ी. अरईईई…..मैय्आआआआअ………मररर्र्र्र्र्र्र्ररर…..गय्आआ……..रीईईईईईईईईईई. दर्द के मारे मेरी हालत पतली हो गयी और में करवट लेते हुए, अपने घुटनों को पेट पर मोड़ कर लोट-पोट होने लगा…!
मुझे दर्द से तड़पता देख भाभी दौड़ कर मेरे पास आई, और मेरे सर के पास बैठ, हाथ फेरते हुए बोली – क्या हुआ मेरे राजा मुन्ना को, बताओ मुझे… क्या हुआ..?
मेरे मुँह से कोई शब्द ही नहीं निकल पा रहे थे. मैं लगातार कभी करवट से हो जाता तो कभी पीठ के बल, मेरे घुटने मुड़े ही हुए थे. मेरी आँखों से पानी निकल आया. तेज दर्द की लहर मेरी जान ही निकाले दे रही थी. भाभी मेरे सर को लगातार सहलाए जा रही थी और बार-बार पूछने की कोशिश कर रही थी कि आख़िर मुझे हुआ क्या है..? जब थोड़ा दर्द में राहत हुई और मेरा चीखना कम हो गया तो उन्होंने फिर से पूछा… देखो अंकुश मुझे बताओ… क्या हुआ है तुम्हें..?
आह्ह्ह्ह…. भाभी मेरे पेट में बहुत तेज दर्द है… मैंने बात को छिपाने की कोशिश करते हुए कहा. मैं नहीं चाहता था कि भाभी को पता चले कि मैं क्या कर रहा था..?
भाभी – देखो झूठ मत बोलो,… पेट दर्द में कोई ऐसा नहीं बिलबिलाता है… सच-सच बताओ… शरमाओ नही… कहीं कुछ बड़ी प्राब्लम हो गयी तो लेने के देने पड़ जाएँगे…
दरअसल उन्होंने मुझे वो करते हुए तो देख ही लिया था, तो प्राब्लम भी कोई उसी से रिलेटेड होगी. इसलिए वो जानना चाहती थी.
मैं – नहीं भाभी सच में मेरे पेट में ही दर्द है.. मैंने फिर से छिपाने की कोशिश की.
भाभी थोड़ा बनावटी गुस्सा अपने चेहरे पर ला कर बोली – अंकुश..! मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी कि मुझसे तुम कोई बात छिपाओगे…!
सच बताओ क्या बात है. कहीं कुछ ज़्यादा प्राब्लम हो गयी तो सब मुझे ही दोष देंगे, कैसी भाभी है ये? बिन माँ के बच्चे का ख्याल भी नहीं रख सकी. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी भाभी किसी से बात करने लायक ना रहे?
अब मेरे पास सच बताने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था… उन्होंने इमोशनली मुझे फँसा दिया था. मेरा दर्द भी अब जा चुका था तो मैं उनकी गोद में अपना सर रख कर बोला – भाभी मेरी सूसू मेरे शॉर्ट की एलास्टिक से दब गयी थी. बस और कुछ नहीं.
भाभी – लेकिन तुम ऐसा क्या कर रहे थे जो तुम्हारी सूसू दब गयी? और इतनी ज़ोर से कैसे दबी कि इतना दर्द हुआ…?
मैं – जाने दो ना भाभी..! अब सब ठीक है..!
भाभी – तो तुम मुझे सच-सच नहीं बताओगे.. हां! कोई बात नहीं, आज के बाद मेरे से कभी बात मत करना और उन्होंने मेरा सर अपनी गोद से उठा दिया और उठ कर जाने लगी. मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और बोला – मैं सब सच बताता हूँ. लेकिन प्लीज़ भाभी मुझसे नाराज़ मत हो. वरना मैं कैसे जी पाऊंगा…?
उन्होंने लाड़ से मुझे अपने सीने में दबा लिया. उनके मुलायम दूध मेरे मुँह पर दब गये. कुछ देर बाद उन्होंने मुझे अलग किया और मेरा माथा चूमकर मेरी ओर देखने लगी…!
मैं – भाभी जब आप मालिश कर रही थी, तो आपके चुतड़ों की रगड़ से मेरी सूसू अकड़ने लगी. मेरे अंदर उत्तेजना बढ़ने लगी जो निरंतर बढ़ती ही गयी. जब आप उठकर चली गयी तो लाख कोशिश के बाद भी मैं अपने आप को रोक ना सका और अपनी लंड को बाहर निकाल कर मसलने लगा. लेकिन आपकी आवाज़ सुन कर मैंने जल्दबाज़ी में उसको छुपाना चाहा और झटके से एलास्टिक छूट कर उसके ऊपर लगी. भाभी कुछ देर चुप रही, और मेरे मासूम चेहरे की ओर देखती रही.फिर ना जाने क्या सोचकर वो मुस्कराने लगी और मेरे नंगे बदन पर हाथ फेरते हुए बोली – लाओ दिखाओ तो मुझे… क्या हुआ है वहाँ…?
मैंने शर्म से अपने घुटने जोड़ लिए ताकि भाभी कहीं जबरदस्ती मेरे शॉर्ट को ना खींच दें और बोला – नहीं भाभी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. अब दर्द भी नहीं हो रहा आप रहने दो..!
वो अपनी आँखें तरेर कर बोली – तुम अभी बच्चे हो, अभी दर्द नहीं है तो इसका मतलब ये तो नहीं हुआ कि सब कुछ सही है, कही अंदरूनी चोट हुई तो बाद में परेशान कर सकती है. देखो ये शर्म छोड़ो और मुझे देखने दो. फिर उन्होंने मुझे लिटा दिया और मेरे शॉर्ट को नीचे करने लगी. मैंने एक लास्ट कोशिश की और उनके हाथ पकड़ लिया. उन्होंने एक हाथ से मेरा हाथ हटा दिया और मेरा शॉर्ट नीचे खिसका कर घुटनों तक कर दिया.
भाभी - हइई… दैयाआआआ.. ये क्या है अंकुश…? मेरा लंड देखकर उनका मुँह खुला का खुला रह गया और अपने खुले मुँह पर हाथ रख कर वो कुछ देर तक.. टक-टॅकी लगाए वो मेरे लंड की सुंदरता को देखती रह गयी..!
मैं – क्यों क्या हुआ भाभी…? ये मेरा सूसू ही तो है…!
भाभी - हे भगवान..! तुम इसे अभी भी सूसू ही समझ रहे हो..? ये तो पूरा मस्त हथियार हो गया है. फिर वो उसकी जड़ को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर इधर-उधर घुमा फिरा कर देखने लगी. जब उन्होंने मेरे टोपे की खाल को पीछे करने की कोशिश की तो वो बस अपना घूँघट की खोल पाया कि मुझे दर्द होने लगा.
मैं – अह्ह्ह्ह… भाभी नहीं… खोलो मत… दर्द होता है.
जब भाभी ने सुपाड़े के पीछे देखा तो मेरी खाल के होल से कोई आधा-पोना इंच नीचे ही जुड़ी हुई थी, जिसे खींचने पर दर्द होने लगता था.
भाभी – अंकुश! तुम्हारा हथियार तो अभी तक कोरा ही है. कभी कुछ किया नहीं इससे..?
मैं – हां ! रोज़ ही करता हूँ…. पेशाब..!
भाभी – खाली पेशाब?.... और कुछ नहीं..?
मैं – नहीं..! और भी कुछ होता है इससे..?
भाभी – हां अंकुश! और बहुत कुछ होता है.. लेकिन ताज्जुब है..! जब तुमने और कुछ भी नहीं किया है अब तक… तो फिर ये इतना लंबा और मोटा कैसे हो गया…?
मैं क्या जानू… ? मैंने जवाब दिया तो
भाभी बोली – तो फिर अभी क्यों हिला रहे थे..?
मैं – सच कहूँ भाभी.. आप जब भी मालिश करती हो और आपका बदन इससे रगड़ा ख़ाता है… तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि कुछ पुछो मत… और जी करने लगता है की इसको मसल डालूं…, कुचल कर रख दूं.. लेकिन दर्द की वजह से कुछ कर नहीं पाता….! पर आज आपने इसे ज़्यादा ही रगड़ दिया तो मुझसे रहा नहीं गया और वो करने लगा…
मेरा लंड अभी भी ज्यों का त्यों सोता सा एकदम 90 डिग्री पर खड़ा भाभी की मुट्ठी में क़ैद था. उन्होंने उसको थोड़ा खोल कर उसके पेशाब वाले छेद को अपनी उंगली से सहला दिया और बोली – तो अब कैसा लग रहा है..?
मैं – सीईईईई…. आहह.. भाभी ये सब मत करो… वरना ये फट जाएगा.
भाभी – तो इसको शांत कैसे करोगे अब…?
मैं – पता नहीं भाभी इसके पहले ये इतना कभी नहीं फूला था.. आज तो हद ही हो गयी है और अब आपका हाथ लगते ही तो और हालत खराब हो रही है…अह्ह्ह्ह…प्लीज़ भाभी कुछ करो ना ! प्लीज़…… वरना में कुछ कर बैठूँगा…!
भाभी – अच्छा.. अच्छा.. शांत रहो.. ! मैं कुछ करती हूँ, और फिर उसे हिलाने लगी, धीरे-धीरे बड़े एहतियात से उसको आगे पीछे करने लगी ताकि उसकी स्किन ज़्यादा ना खिंच जाए. मज़े में मेरे मुँह से आहह….उउउहह…और जल्दीीई.. ऐसी आवाज़ें निकलने लगी… और वो उनकी मुट्ठी में और ज़्यादा फूलने लगा… उसकी नसें उभर आईं.
भाभी की भी एक्साइटमेंट बढ़ने लगी, और किसी सम्मोहन सी शक्ति उनके चेहरे को मेरे लंड के नजदीक और नजदीक खींचने लगी. अब भाभी की गरम साँसें मेरे लंड पर महसूस हो रही थी. उत्तेजना में मेरे कान तक लाल हो गये थे. आखिरकार उनके होंठों ने मेरे अधखुले सुपाड़े को छू ही लिया. उफफफफफफफफफफफ्फ़…… मैं तो जैसे स्वर्ग में ही उड़ने लगा… उनके होंठों के स्पर्श होते ही मुझे एक सुकून सा मिला, और उनके रसीले होंठ उसको अपनी क़ैद में लेते चले गये. देखते-देखते उनके होंठों ने मेरे पूरे 3” लंबे सुपाड़े को जो दहक कर लाल शिमला के सेब जैसा दिख रहा था गडप्प कर लिया. एक ठंड सी पड़ गयी मेरे लंड में, जैसे किसी गरम चीज़ को एक साथ पानी में डाल दिया हो. उनकी जीभ मेरे पी होल पर गोल-गोल घूम रही थी. आनंद के मारे मेरी आँखें बंद हो चुकी थी और कमर थरथराने लगी. भाभी मेरे लंड को अंदर और अंदर अपने मुँह में लेती जा रही थी, लेकिन खूब कोशिश करके वो उसे करीब आधा ही ले पाई और उतने पर ही अपने होंठों से मालिश देने लगी. भाभी मेरे बगल में ही उकड़ू बैठी थी, लंड को अंदर-बाहर करते समय उनके मस्त मुलायम बूब्स मेरे पेट और कमर पर रगड़ खा रहे थे.
लंड का जड़ वाला हिस्सा अभी भी भाभी की मुट्ठी में ही था और वो मुँह के साथ-साथ अपने हाथ से भी उसे मसलती जा रही थी. 20-25 मिनिट की चुसाई के बाद भी मेरा कुछ नहीं हुआ तो भाभी ने अपना मुँह हटाया और मेरी ओर देख कर बोली – कुछ हुआ कि नहीं…?
मैं – बहुत अच्छा लग रहा है भाभी… प्लीज़ रूको मत ऐसे ही करती रहो..!
भाभी – तुम्हें तो मज़ा आ रहा है.. लेकिन मेरा तो मुँह दुखने लगा, और तुम्हारा माल अभी तक नहीं निकला.
फिर वो मेरी कमर के नीचे की साइड में आकर बैठ गयी और फिर से अपने मुँह में लेकर चूसने लगी, अब साथ-साथ उनकी उंगलियाँ मेरे टट्टों से खेल रही थी. मेरा तो मज़ा ही दुगना हो गया और मैं अपनी कमर उचका-उचका कर उनके मुँह में लंड पेलने की कोशिश करने लगा. अब भाभी जल्दी से जल्दी मेरा पानी निकालना चाहती थी, क्योंकि उनका मुँह दर्द करने लगा था, बीच-बीच में वो अपना एक हाथ अपनी चूत के पास ले जाती और ऊपर से उसको सहला देती. अब वो मेरे टट्टों और गांड के होल के बीच की जगह पर नाख़ून से खुरचने लगी. ऐसा करने से मेरे उस जगह पर करंट जैसा लगा और मुझे उस जगह से कुछ उठता सा महसूस होने लगा.
मैंने भाभी के सर पर हाथ रखा और तेज़-तेज़ अपनी कमर उचका कर अपना ज़्यादा से ज़्यादा लंड उनके मुँह में ठूंस दिया उनका गला चोक हो गया, में दनादन धक्के मारकर उनके सर को दबाए हुए था. वो मेरे हाथों को हटाने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी, लेकिन अब में अपने होश-हवास खो चुका था, फिर कुछ ऐसा हुआ मानो मेरे टट्टों से कोई बिजली सी दौड़ती हुई मेरे लंड में प्रवेश कर रही हो और मैं उनका सर अपने लंड पर कसकर पिचकारी छोड़ने लगा. मुझे लगा जैसे कोई गरम लावा जैसा मेरे लंड से निकल कर भाभी के मुँह में भर रहा हो. दो मिनिट तक दे दना दन पिचकारी मारने के बाद मैंने अपना हाथ उनके सर से हटाया और अपनी कमर को फर्श पर लैंड करा दिया…..!!
झट से उन्होंने अपना सर ऊपर किया. फलफला कर ढेर सारी मलाई जैसी उनके मुँह से निकल कर मेरे पेट पर गिरी, उनका मुँह लाल सुर्ख हो रहा था. वो खांसने लगी, फिर भागते हुए छत पर लगे नल से पानी लेकर मुँह साफ किया.
मैं बैठ कर उन्हें ही देख रहा था, मुँह साफ करके वो वापस लौटी और एक प्यार भरी धौल मेरी पीठ पर जमाई और बोली – जंगली कहीं के! मेरी दम निकालना चाहते थे..? हां!... पता है! मेरी साँसें बंद होने लगी थी.
मैं – सॉरी भाभी वो मैं … मुझे… होश ही नहीं रहा…
भाभी मुस्करा के बोली… मैं समझ सकती हूँ.. अच्छा ये बताओ अब कैसा लग रहा है.. कुछ हल्का फील हुआ या नहीं?
मैं – हां भाभी! थैंक्स! अब मेरी उत्तेजना कुछ कम हो गयी है.
भाभी – लेकिन तुम्हारा ये हथियार तो ज्यों का त्यों खड़ा है, जाओ बाथरूम में जाकर कुछ देर इसपर ठंडा पानी डाल लो.
आज पहली बार मुझे पता चला कि लंड से पेशाब के अलावा और भी कुछ निकलता है, जो इतना आनंद देता है. अब तो मैं अपने हाथ से भी उस मज़े को लेने की कोशिश करने लगा, लेकिन वो मज़ा नहीं मिला जो भाभी के चूसने से मिला था. फिर एक दिन बाथरूम में खड़ा मैं अपने लंड को सहला रहा था कि भाभी ने देख लिया और वो डाँट पिलाई कि पुछो मत.
जब मैंने कारण पूछा तो वो समझाने लगी – अंकुश देखो ये रोज़-रोज़ की आदत मत लगाओ. ठीक नहीं है, इससे तुम्हारा शरीर कमजोर होने लगेगा, हो सकता है कोई बीमारी भी लग जाए. कभी-कभी कर लेने में कोई बुराई नहीं है, पर हाथ से नहीं. हाथ से करने को मूठ मारना बोलते हैं और लिमिट से ज़्यादा मूठ मारने से इसकी (लिंग) नसें कमजोर पड़ जाती हैं.., यहाँ तक कि आदमी नामर्द भी हो जाते हैं, और शादी के बाद वो किसी काम के नहीं रह पाते.
मैंने पूछा कि भाभी तो और कौन-कौन से तरीके हैं उस आनंद को लेने के?
तो वो मुस्कराईं और बोली – अंकुश तुम तो आज ही सब कुछ जानना चाहते हो..! फिर कुछ सोच कर वो बोली – उस दिन मैंने जिस तरह से तुम्हें रिलीस किया था उसको मुख मैथुन (ब्लोजॉब) कहते हैं. असल में तो वो भी सही तरीका नहीं है.
मैं – तो सही तरीका क्या है, भाभी…?
भाभी – मर्द और औरत के बीच संभोग ही सही तरीका होता है, जो प्राकृतिक माना जाता है.. लेकिन उसके लिए अभी तुम्हारी उमर नहीं हुई है, तुम्हारे लिंग की स्किन जो जुड़ी हुई है ना वो भी तभी अलग होगी जब तुम किसी के साथ ये सब करोगे लेकिन गलती से भी किसी के साथ ऐसे वैसे संबंध बनाने की कोशिश भी मत करना… वरना…! मुझसे बुरा कोई नहीं होगा..! जब भी वो समय आएगा, मैं खुद तुम्हारी मदद करूँगी.
मेरे अपरिपक्व दिमाग़ में कुछ पल्ले पड़ा कुछ नहीं, पर मैं इतना ज़रूर समझ गया, कि भाभी मेरी सब जायज़, नाजायज़ ज़रूरतों का ख्याल रखती हैं, और जब जिस काम की ज़रूरत होगी वो ज़रूर करेंगी. मैं अपनी पढ़ाई में जुट गया. समय निकलता रहा, भाभी की प्रेग्नेन्सी का समय नजदीक आता जा रहा था, अब उनका पेट काफ़ी बड़ा हो गया था. मैं उनके पेट पर हाथ फेरकर उनको चिढ़ाया करता, कभी उनके पेट पर कान लगाकर बच्चे से बात करता. छोटी चाची, समय-समय पर भाभी की देख भाल कर देती.
आखिरकार वो समय आ गया और भाभी ने एक प्यारी सी गुड़िया को जन्म दिया. सभी बहुत खुश थे उस नन्ही परी के आने से जिसका नाम मैंने रूचि रखा.
कुछ दिनों बाद मेरे एग्जाम भी हो गये, और अब में एक बार फिर बोर्ड की क्लास में पहुँच गया था. उधर कृष्णा भैया ने ग्रेजुएशन के फाइनल के साथ पी.सी.एस. के एग्जाम भी दे दिए थे, और उनका सेलेक्शन होना लगभग तय था. रमा दीदी ने फर्स्ट ईयर प्राइवेट से क्लियर कर लिया था, लेकिन प्रेग्नेन्सी की वजह से भाभी एग्जाम नहीं दे पाई, जिसका उनको मलाल था. लेकिन वो जिंदगी के अहम एग्जाम में तो पास हो ही चुकी थी. कुछ दिनो के बाद मँझले भैया का पी.सी.एस. का रिज़ल्ट आ गया, रैंक के हिसाब से उनको डीएसपी की पोस्ट के लिए सेलेक्ट किया गया था, अब उन्हें कुछ महीनों के लिए ट्रेनिंग पर जाना था. मेरा इस साल बोर्ड था, सभी को मेरे भविष्य की चिंता थी, सो स्कूल के पहले दिन से ही सब का अटेन्षन मेरे ऊपर ही था.
उस दिन संडे था, दोनों बड़े भाई भी घर आए हुए थे, कल मंझले भैया को ट्रेनिंग के लिए निकलना था, घर में थोड़ा मिल बैठ कर खाने का प्रोग्राम रखा था. हमारे परिवार में मेरे यहाँ ही मिक्सर था, जो बड़े भैया की शादी में आया था, और इस समय वो छोटी चाची के यहाँ था, वो किसी काम के लिए ले गयी थी उसे. वैसे तो चाची को भी हमारे घर ही आना था, लेकिन थोड़ा काम जल्दी हो जाए तो भाभी ने मुझे कहा – अंकुश! छोटी चाची के यहाँ से अपना मिक्सर तो ला दो ज़रा, कुछ नारियल वग़ैरह की चटनी भी बना लेंगे.
छोटे चाचा का घर भी बगल में ही था, उन्होंने अपने हिस्से में अपनी ज़रूरत के ही हिसाब से दो कमरे और एक छोटा सा किचन मेन गेट के साथ ही बना रखे थे, बाकी की ज़मीन में ऊँची सी बाउंड्री से कवर कर रखा था. बाउंड्री की पीछे की दीवार पर छप्पर डाल कर गाय-भैंस के लिए जगह कर रखी थी उसी के साथ में चारा काटने की मशीन लगा रखी थी जो एक सिंगल फेज़ की मोटर से चल जाती थी.
मैं चाची के घर पहुँचा तो उनका गेट अंदर से बंद था, मैंने गेट खटखटाया, तो अंदर से चाची की आवाज़ आई… कौन है…?
मैं हूँ चाची… मैंने जवाब दिया तो वो बोली – रूको अंकुश, अभी गेट खोलती हूँ.
थोड़ी देर बाद जैसे ही गेट खुला, सामने चाची को देख कर मेरी आँखें फटी रह गयी… मुँह खुला का खुला रह गया और मैं फटी आँखों से उन्हें देखता ही रह गया…. सामने चाची मात्र एक पेटीकोट में जो उनकी पहाड़ की चोटियों जैसी चुचियों पर सिर्फ़ लपेटा हुआ था और वो उसे एक हाथ से पकड़े हुए थी, वही पेटीकोट नीचे उनके घुटनों से भी 2”-3” ऊपर तक ही आ रहा था और उनकी गोल-गोल खंबे जैसी मांसल जांघें दिखाई दे रही थी. गेट खोलते ही वो मुझे देख क मुस्कराईं और बोली:
आओ छोटू..! और इतना कह कर पलट गयी.. अब उनकी हाहाकारी गांड मेरी आँखों के सामने थी. उनकी गांड पीछे को इतनी उभरी हुई थी कि, कमर के कटाव पर अगर कोई तौलिया रख दिया जाए तो गारंटीड वो गिर नहीं सकता. ऊपर से आगे को खिंचा हुआ पेटीकोट.. लगता था गांड के प्रेशर से कहीं फट ना जाए… कसे हुए पेटीकोट में उनकी गांड ऐसी लग रही थी मानो दो बड़े वाले तरबूज फिट हो रहे हों… दोनों के बीच की दरार तरबूजों की कसावट की वजह से बहुत ही कम दिखाई दी मुझे.
चाची अपनी तरबूजों को मटकाते हुए अपने बाथरूम की ओर चल दी जो किचन के साइड से मात्र 3 फीट की तीन तरफ से ओट सी लगाकर नहाने-धोने के लिए बना रखा था. उनके मटकते हुए कूल्हे ऐसे लग रहे थे, मानो एक दूसरे से शर्त लगा रहे हों… “कि मैं बड़ा कि तू..?” अब रहने वाले दो ही तो प्राणी थे.., शादी के 10 साल बाद भी इतनी उपजाऊ ज़मीन से भी चाचा कोई फसल नहीं काट पाए थे. चाची की इस जान मारु गांड को देख कर मेरा लंड फड़कने लगा. अब कुछ दिन पहले ऐसा कुछ हुआ होता तो शायद मेरे लिए ये नॉर्मल बात होती, लेकिन अब भाभी ने मेरे नाग से जहर निकाल कर ये जता दिया था, कि नारी का बदन क्या, क्यों और किसलिए होता है..?
वो अपनी लंड फाड़ू गांड को मटकाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ते हुए बोली – और बताओ अंकुश, कैसे आना हुआ..?
मैं हड़बड़ा कर बोला – वो चाची… वो..वो.. भाभी ने.. वो मिक्सर लाने के लिए बोला है…
चाची – अच्छा हां ! तुम थोड़ी देर बैठो.. उसके जार को साफ करना है अभी.. मैं थोड़ा नहा लेती हूँ.. उसके बाद साफ करके दूँगी..
मैं वहीं आँगन में पड़ी चारपाई पर पैर लटका कर बैठ गया, और कनखियों से उनके बाथरूम की तरफ देखने लगा. चाची बैठ कर नहा रही थी, उनके सर के बाल मुझे दिख रहे थे. वो मुझसे बातें भी करती जा रही थी नहाने के साथ-साथ. करीब 10 मिनिट में ही उनका नहाना हो गया और वहीँ पर रखे उनके दूसरे पेटीकोट को उन्होंने बैठे-बैठे ही उठाया और अपने सर के ऊपर से अपने शरीर पर डाल लिया, फिर वहीं रखी ब्रा उठाई और उसे पहनने लगी.
मैं अभी भी चोर नज़रों से उधर ही देख रहा था.. अचानक वो उठ खड़ी हुई, उनका पेटीकोट ठीक वैसे ही था जो नहाने से पहले वाला था.. उनकी कमर से ऊपर का हिस्सा मुझे दिख रहा था.
उन्होंने मुझे आवाज़ दी – ओ अंकुश! ज़रा इधर तो आना.
मैं उठकर उनके पास पहुँचा, इस समय उनके गीले बदन से वो पेटीकोट भी जगह-जगह गीला होकर उनके बदन से चिपका हुआ था. गीले कपड़े से उनके शरीर का रंग तक झलक रहा था. उन्होंने पेटीकोट के ऊपर से ही वो ब्रा जिसकी स्ट्रिप्स अपने कंधों पर चढ़ा कर आगे अपने स्तनों पर पकड़ रखी थी, और उसकी पट्टियाँ जिनको पीछे लेजा कर हुक करते हैं, वो साइड्स से झूल रही थीं.
मैं उनके ठीक पीछे जा खड़ा हुआ और बोला – जी चाची .. बताइए क्या काम है..?
चाची – अरे अंकुश ! देखो ना ये मेरी ब्रा थोड़ी टाइट हो गयी है, बहुत कोशिश की लेकिन मैं अपने हाथ से इसके हुक नहीं लगा पा रही, थोड़ा तुम लगा दो ना!
मैंने उनके दोनों ओर झूल रही ब्रा के स्ट्रैप्स को पकड़ा.. तो मेरे हाथ उनके गीले नंगे कांख से टच हो गये. मेरे लंड ने एक फिर ठुमका मारा...! फिर उन्होंने पेटीकोट को ब्रा के नीचे से निकाल कर हाथों में पकड़ लिया और उसको कमर में बाँधने के लिए अपनी नाभि जो किसी बोरिंग के गड्ढे की तरह दिख रही थी… तक ले गयी, अब एक हाथ उनका आगे दोनों चोटियों के ऊपर से ब्रा को थामे था, और दूसरे में पेटीकोट पकड़ा हुआ था…. मैंने दोनों तरफ की स्ट्रैप को खींच कर पीछे उनकी पीठ पर लाया.. मेरी दोनों हथेलियाँ चाची की नंगी पीठ पर धीरे-धीरे फिसल रही थीं…
ना जाने ये कैसी उत्तेजना थी मेरे शरीर में की मेरे हाथ काँपने लगे….
ब्रा वाकई में कुछ ज़्यादा ही टाइट थी, उनके हुक के होल जो धागे के बने हुए थे, उनमें हुक डालने में मुझे बड़ी दिक्कत आ रही थी…
अरे ! खड़े-खड़े क्या कर रहे हो अंकुश, जल्दी डालो ना.. चाची की आवाज़ सुन कर मेरे हाथ और ज़्यादा काँपने लगे….
मैंने स्ट्रैप को और थोड़ा खींच कर उनके होल के मुँह तक हुक लाकर छोड़ दिए. चाची को लगा कि अब तो हुक लग ही जाएगा, सो उनका वो हाथ जो ब्रा को आगे से संभाले हुए था, वो भी अब पेटीकोट के नाडे को बाँधने के लिए नीचे कर लिया था...! जैसे ही मैंने हुक को उसके होल में छोड़ा, वो साला होल में जाने की बजाय बाहर से ही स्लिप हो गया… नतीजा… चाची की ब्रा किसी स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह उछल कर उनके सामने ज़मीन पर टपक गयी…
फ़ौरन चाची ने अपना एक हाथ अपनी बड़ी बड़ी चुचियों पर रख लिया…और वो उन्हें ढकने की नाकाम कोशिश करती हुई बोली – क्या अंकुश… ऊँट से हो गए हो और एक छोटा सा काम नहीं होता तुमसे.
मैंने मरी सी आवाज़ में कहा – मैंने पहले कभी डाला नहीं हैं ना चाची.. तो..
चाची – क्या नहीं डाला अभी तक..?
मैं – व.व.उूओ.. हुक कभी होल में नही…. डॅलाया.. सॉरी चाची..
चाची सामने पड़ी ब्रा उठाने के लिए आगे को झुकी, नाडे पर उनके हाथ की पकड़ कम हो गयी और जिस हाथ से उन्होंने अपनी चुचियाँ ढक रखी थी उसी हाथ से ब्रा उठाने लगी. तीन काम एक साथ हुए. एक गांड पर से उनका पेटीकोट थोड़ा नीचे को सरक गया और उनकी गांड की दरार का उपरी हिस्सा मेरी आँखों के सामने उजागर हो गया, दूसरा झुकने की वजह से उनकी गांड की दरार ठीक मेरे अकडे हुए लंड पर टिक गयी, और उसकी लंबाई दरार के समानांतर होकर वो एक तरह दरार में सेट हो गया. तीसरा उनकी नंगी गोल-मटोल बड़ी-बड़ी चुचियाँ, नीचे को झूल गयी जो मुझे साइड से दिखाई दे रही थी.
मेरी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी…, शरीर जुड़ी के मरीज की तरह काँपने लगा. लेकिन ना तो मैंने पीछे हटने की कोई कोशिश की और ना चाची ने मुझे हटने को कहा. ब्रा को उठा कर उन्होंने अपनी गांड को और थोड़ा पीछे को झटका देकर एक फुल लंबाई का रगड़ा मेरे लंड पर मारा और खड़ी हो गयी.
फिर उन्होंने अपनी ब्रा को वैसे ही अपनी चुचियों के ऊपर रख कर उसी पोज़िशन में रह कर बोली – अंकुश तुम जाओ यहाँ से.. तुम्हारे बस का कुछ नहीं है.. वैसे ही पहाड़ हो रहे हो, एक हुक तक नहीं लगा सकते…
मैं – पर चाची वो मिक्सर??
चाची – मैं अपने साथ लेकर आती हूँ, तुम जाओ.. और हां ! ये बातें किसी से कहना मत.. समझ गये…
मैं हां में अपना सर हिलाकर, अपनी गर्दन झुकाए वहाँ से लौट आया लेकिन आँखों में अभी भी वही दृश्य (सीन) घूम रहे थे. सोच-सोच कर मेरा लंड कच्छे में उछल कूद मचाए हुए था, मैं जितना उसको दबाने की कोशिश करता वो उतना ही उछलने लगता. ऐसी हालत में घर जाना मैंने उचित नहीं समझा, और मैं खेतों की ओर बढ़ गया.
एक झाड़ी के पीछे जाकर पेशाब की धार मारी, मामला कुछ हल्का हुआ. तो मैं घर लौट लिया. उस घटना के बाद मेरी हिम्मत नहीं होती चाची से नज़रें मिलाने की, लेकिन इसके ठीक उलट वो हर संभव प्रयास करती रहती मेरे पास आने का, मुझे लाड करने के बहाने अपने से चिपका लेती, कभी-कभी तो मेरे मुँह को अपने बड़े-बड़े स्तनों के बीच में डाल कर दबाए रखती. मैं उनकी हरकतों से उत्तेजित होने लगता लेकिन उन्हें अपनी तरफ से टच करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता. कुछ दिनों से चाची के मेरे प्रति आए बदलाव को भाभी ने नोटिस किया, लेकिन ये बात उन्होंने अपने तक ही रखी.
अब ये मेरे लिए प्रेस्टीज इशू बनता जा रहा था, मैं रमा दीदी को ज़्यादा खुले तौर पर टीज़ नहीं करना चाहता था, लेकिन उनके मन में पता नहीं क्या चल रहा था, मैं जैसे ही जाने दो सोच के खड़ा होता तो वो थोड़ा दूर से मुझे अंगूठा दिखा के जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती
मैंने ठान लिया कि अब इनको सबक सीखा के ही रहूँगा. इस समय हम अपने लंबे-चौड़े आँगन में ही थे. मैंने एक लंबी सी छलांग लगाई और इससे पहले कि रमा दीदी संभाल कर भाग पाती मैंने पीछे से उनकी कमर में लपेटा मार दिया. वो नीचे को झुकती चली गयी, मैं उनके ऊपर था. पीठ मेरे सीने से सटी हुई थी, मैंने उनको अपनी बाजुओं में कस कर उठा लिया. रमा दीदी खिल-खिला रही थी, और मुझसे छोड़ने के लिए बोलती जा रही थी. दीदी के हाथ मेरे हाथों के ऊपर थे, लेकिन उनसे वो मेरे हाथों पर दबाव डाले थी, उन्हें छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं था. मेरी हाइट दीदी से कुछ ज़्यादा ही थी, उनको ऊपर उठाते हुए मेरे हाथ उनके पेट से सरक कर थोड़ा ऊपर को हो गये और उनके अमरूद के निचले हिस्से को टच होने लगे.
दीदी लगातार खिल-खिलाए जा रही थी और अपने हाथों से मेरे हाथों को और ऊपर को खिसकाने की कोशिश कर रही थी, अब उनकी कमर का ऊपरी हिस्सा मेरे ठीक लंड के सामने था जो कमर के दबाव से फूलने लगा था. दीदी ने अब अपने को छुड़ाने के बहाने अपने को और झुकाया और मेरी बाजुओं पर झूल गयी, अपने दोनों पैर हवा में उठा लिए और उन्हें मेरे घुटनों पर जमा लिया. उसके बाद उन्होंने अपनी कमर को और ऊपर की ओर उछाला, अब उनके गोल-मटोल चुतड़ों की दरार ठीक मेरे अकड़ चुके लंड के सामने थी, वो लगातार मुझसे छोड़ने के लिए बोल रही थी और साथ ही अपने गांड को मेरे बाबू के ऊपर रगड़ रही थी.
हम दोनों के ही मुँह लाल पड़ गये थे. अभी कुछ और आगे होता उसके पहले बाहर के दरवाजे से एक और खिल-खिलाहट की आवाज़ सुनाई दी. मैंने दीदी को छोड़ दिया और हम दोनों ने ही पीछे मुड़कर देखा, दरवाजे पर आशा दीदी खड़ी ताली बजा-बजा कर हमारा खेल देखते हुए हंस रही थी.
आशा – वाह ! भाई-बहन अकेले-अकेले ही खेल में लगे हो. अरे भाई हमें भी शामिल कर लो.
रमा– देखो ना दीदी, ये छोटू बहुत तंग करता है मुझे, ऐसा कस कर पकड़ लिया कि छोड़ ही नहीं रहा था.
मैं – अच्छा मेरे गुदगुदी किसने की थी हां! अब बताओ दीदी को खुद शुरू करती है, और दोष मेरे ऊपर डाल रही है.
आशा – अरे बस करो तुम दोनों और बताओ कोई काम-वाम तो नहीं है तुम दोनों को..?
दोनों एक साथ – नहीं ऐसा तो कोई काम नहीं है.
आशा – तो चलो क्यों ना हम लोग खेतों में चलें, वही बाग़ में बैठ कर खेलते हैं, यहाँ कितनी गर्मी है.
मैंने कहा – हां दीदी चलो वहीं चलते हैं. फिर हम बाबूजी को बता कर तीनों खेतों की तरफ चल दिए, जो बस घर से कोई आधा किमी की दूरी पर ही थे.
हमारी लंबी चौड़ी ज़मीन थी, ज़मीन के लगभग सेंटर में 4 एकड़ का आम और अमरूद का बाग था, जिसमें और भी आमला, बेर जैसे पेड़ थे, लेकिन मुख्य तौर पर आम और अमरूद ही थे. बगीचे के चारों तरफ के हिस्से बराबर-बराबर खेत चारों भाइयों में बँटे हुए थे. गांव की तरफ का हमारा हिस्सा था, और उसके ठीक अपोजिट आशा दीदी के खेत थे, चारों की ज़मीन की सिंचाई हमारे ही ट्यूबवेल से होती थी. ये सीज़न आमों का था, लेकिन कच्चे आम लगे थे, पकने में अभी कम से कम एक महीना और लगने वाला था.
हम तीनों आम के बगीचे में जहाँ घने पेड़ थे उनके नीचे एक चादर बिछा कर बैठ गये, और कार्ड्स खेलने लगे. गर्मियों की चिलचिलाती दोपहरी में घर से ज़्यादा यहाँ राहत थी, वैसे तो हवा ज़्यादा नहीं थी, फिर भी जब भी हवा का झोंका आता, तो बड़ी ठंडक पहुँचती उस तमतमाति गर्मी में.
कार्ड खेलते हमारी पूरी दोपहरी निकल गयी, 3 बजे रमा दीदी बोली, यार अब चलो, बोर हो गये खेलते-खेलते. तभी आशा दीदी बोली चलो ठीक है, लेकिन कुछ आम ले लेते हैं, शाम को चटनी बनाने के काम आएँगे.
आशा दीदी बोली – छोटू तू ट्राइ करना कुछ आम तोड़ने की.. तो मैं उचक कर कुछ नीचे की तरफ लटके आमों को तोड़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन काफ़ी कोशिश करने पर भी उन तक पहुँच नहीं पाया. दोनों दीदी मिट्टी के ढेले उठाकर आमों को निशाना लगाकर तोड़ने की कोशिश करने लगी, लेकिन निशाना नहीं लग पा रहा था और एक-आध लगा भी तो कच्चे आम मिट्टी के ढेलों से नहीं टूट पाए.
आशा – छोटू यार ! तू घोड़ा बन जाए तो तेरे ऊपर चढ़ कर मैं या रमा पहुँच सकती हैं आमों तक. मैं अपने घुटने टेक कर घोड़ा बन गया, पहले रमा दीदी ने कोशिश किया लेकिन वो नहीं पहुँच पाई, फिर आशा दीदी ने भी कोशिश किया, उनका वजन थोड़ा ज़्यादा था, लेकिन मैंने उनको भी सहन कर लिया, लेकिन नतीजा वो ही ढाक के तीन पात.
आशा दीदी बोली, यार! ये तो बात नहीं बन रही, तू पेड़ पर चढ़के नहीं तोड़ सकता क्या? अब मैं आज तक किसी पेड़ पर नहीं चढ़ा था, तो मैंने मना कर दिया.
फिर वो बोली – तो एक काम कर, मुझे उचका दे. मैं तोड़ लूँगी.
मैंने रमा दीदी की ओर देखा, तो वो मन ही मन मुस्करा रही थी, लेकिन प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोली, मुझे चुप रहते हुए वो फिर बोली- अरे उचका ना बिंदास, सोच क्या रहा है.. तू भी ना… !
मैंने आशा दीदी को जैसे ही पीछे से पकड़ने की कोशिश की तो वो पलट गयी और बोली – आगे से उठा, जिससे तुझे भी दिखे कि और कितना ऊपर करना है.
मैंने थोड़ा झुक कर उनकी जांघों को अपने बाजुओं में लपेटा और ऊपर को उठाया. इस पोज़िशन में उनकी चूत मेरे कमर से थोड़ा ऊपर माने पेट पर था और उनके बूब्स मेरे मुँह से थोड़ा सा नीचे थे. उनकी मोटी मांसल जांघों के एहसास ने मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ा दी, भारी-भारी गोल मुलायम चुचियों का उपरी भाग मेरी ठोडी को सहला रहा था. दो-चार आम तो उनकी हद में आ गये और उन्होंने उन्हें तोड़ लिया, लेकिन और भी तोड़ने के लिए अभी भी वो नहीं पहुँच पा रही थी.
आशा – छोटू! भाई और थोड़ा ऊपर कर ना!
मैंने उन्हें और 6-8” ऊपर किया तो मेरा मुँह ठीक उनके बूब्स के बीच में आ गया, मेरे गाल उनकी चुचियों पर थे.
अचानक उनके मुँह से एक हल्की से सिसकी निकल गयी.. ईीीइसस्स्शह…सीईईईईईई.., मैंने कहा- क्या हुआ दीदी..? तो वो फ़ौरन बोली – कुछ नहीं तू ऐसे ही पकड़े रह बस मैं आम को पकड़ने ही वाली हूँ… अरे हिल मत…ना..!
मेरा मुँह और नाक उनकी मोटी-मोटी चुचियों में दब रहा था, तो उसको थोड़ा इधर-उधर किया. इससे मेरी नाक उनकी चुचियों पर रगड़ने लगी. वो तो आम तोड़ना भूल कर अपनी आँखें बंद करके मस्ती में खो गयी.
मेरा भी नीचे तंबू बनता जा रहा था, फिर अचानक रमा दीदी बोली – अरे दीदी ! तोडो ना आम जल्दी उसको प्राब्लम हो रही है, कब तक वो ऐसे उठाए खड़ा रहेगा..?
आशा – अरे तोड़ तो रही हूँ! छोटू ! भैया थोडा पीछे को हो ना ! ये चार आम थोड़े तेरे पीछे को हैं.
मैं जैसे ही थोड़ा पीछे को हुआ, मुझे पता नहीं था कि ज़मीन थोड़ा उबड़-खाबड़ है, मेरा पैर एक गड्ढे में चला गया और मैं पीछे को गिरने लगा. छोटूऊऊ….संभाअल. वो चिल्लाई लेकिन एक बार बॅलेन्स क्या बिगड़ा कि धडाम से में पीछे को गिर पड़ा. आशा दीदी मेरे उपर उनकी चूत मेरे आकड़े हुए लंड को किस कर रही थी.
उसके 34” के दोनों उभार मेरे सीने में दबे पड़े थे, उत्तेजना के कारण दीदी के निप्पल भी कड़े होकर मेरे सीने में चुभन पैदा कर रहे थे. मेरे दोनों हाथ अभी भी उनकी मस्त गद्देदार गांड पर थे. मुझे पता नहीं चला कि कही चोट-वोट भी लगी है, मैं तो बस उनके मादक शरीर के नीचे पड़ा उनकी आँखों में झाँक रहा था, जिसमें एक निमंत्रण दिखाई दिया. वो भी ऐसे ही कुछ देर मज़े के आलम में खोई रही. रमा दीदी पास में खड़ी खिल-खिला रही थी.
फिर मुझे अपनी पीठ में कुछ चुभता सा महसूस हुआ और मैंने उनसे कहा- अरे दीदी ! उठो मेरी पीठ टूट गयी..!
वो – तो पहले तू मुझे छोड़ तो सही, तभी तो मैं उठुँगी…! तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे दोनों हाथ उसके चुतड़ों पर कसे हुए हैं. जब मैंने उन्हें छोड़ा, तो अपनी चूत को मेरे लंड के ऊपर ज़ोर से रगड़ा और एक मादक सिसकी भरती हुई वो मेरे ऊपर से उठ गयी.
मैं जैसे ही खड़ा हुआ तब मुझे अपनी पीठ में दर्द का एहसास हुआ. क्योंकि जहाँ में गिरा था, वहाँ एक छोटा सा ब्रिक (ईंट) का टुकड़ा पड़ा हुआ था और उस साले ने मेरी पीठ को चटका दिया था.
मैं आहह भरते हुए उठा… तो रमा दीदी बोली – क्या हुआ छोटू..? चोट लग गयी क्या..?
मैं – हां दीदी इस पत्थर से मेरी पीठ टूट गई शायद, तो आशा दीदी ने मेरी शर्ट ऊपर करके अपने हाथ से कुछ देर सहलाया और बोली- रमा घर जाकर थोड़ा आयोडेक्स की मालिश कर देना ठीक हो जाएगा. इसी तरह की चुहलबाज़ियों में समय व्यतीत हो रहा था, मेरी दोनों बहनें मेरे साथ दिनों दिन खुलती जा रही थी और मैं उनकी हरकतों से बुरी तरह उत्तेजित हो जाता था, लेकिन कुछ कर नहीं पाता.
मैंने अभी तक अपने लौडे को हाथ में लेकर सिवाय मुताने के और कोई उसे नहीं किया था. मन ही मन सोचता था, कि काश इसके आगे भी कुछ कर पाता. लेकिन क्या? ये कोई आईडिया नहीं था. मेरा कोई ऐसा दोस्त भी नहीं था जिससे मैं इस तरह की बातें शेयर कर पाता. वो दोनों तो मुझे गरम करके अपना काम निकाल कर अपने रास्ते हो लेती और मैं यूँ ही चूतिया बना रह जाता.
आख़िरकार छुट्टियों के दिन बीत गये और मैंने क्लास 11 में एडमिशन ले लिया. स्कूल शुरू होने के कुछ दिन बाद ही मोहिनी भाभी लौट आई, मतलब बड़े भैया ले आए अपनी ससुराल जाकर. आखिर उनके भी तो लौड़े में खुजली होती ही होगी. भाभी ने आते ही मेरी क्लास ले ली, और वो जो टाइम टेबल बना कर गयी थी, उसके बारे में पूछा जिसे मैं एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह ईमानदारी से पालन कर रहा था. उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और मेरा माथा चूम कर मुझे अपनी गोद में लिटाया और बीते दिनों का सारा प्यार उडेल दिया.
मैं अकेला स्कूल जाने वाला ही रह गया था, मंझले चाचा के बच्चे तो अपने मामा के यहाँ शहर में रह कर पढ़ रहे थे. और मेरी दीदी समेत वाकी की 12थ तक की पढ़ाई पूरी हो गयी थी. भाभी की प्रेग्नेन्सी को जैसे-जैसे दिन बढ़ रहे थे, उनके शरीर में कुछ ज़्यादा ही बदलाव दिखने लगे थे, उनके वक्ष और कूल्हे एक दम अपोजिट साइड को बाहर निकलते जा रहे थे.
यही नहीं, वो दिनों दिन बोल्ड भी होती जा रही थी. एक दिन मालिश करते-करते भाभी ने मेरी हालत बहुत खराब कर दी. ना जाने आज उनको क्या सूझी की अपनी साड़ी उतार कर एक तरफ रख दी, और मात्र ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे लौड़े के ऊपर अपनी उभरी हुई गांड टिका कर मेरे सीने पर मालिश करने लगी. आगे-पीछे होते हुए उनकी गांड मेरे लंड पर रगड़ा दे रही थी, जिसकी वजह से मेरे लंड महाराज बुरी तरह अकड़ गये, फिर तो उसकी ऐसी रेल बनी कि पुछो मत.
उधर ब्लाउज में कसे उनके बूब्स बिल्कुल मेरी आँखों के सामने थे जो झटकों के साथ उछल-उछल कर बाहर को निकलने पर आमादा दिखाई दे रहे थे. फिर भाभी मेरे ऊपर ही पसर गयी और उन्होंने मेरे होंठ अपने होंठों में भर लिए, मुझे बड़ा अजीब लगा कि ये कर क्या रही हैं, जिंदगी में पहली बार किसी ने मेरे होंठों को चूमा था. यही नहीं, वो अपनी कमर को लगातार ज़ोर-तेज़ मेरे लंड पर घिसने लगी.
15 मिनिट में उन्होंने मेरी हालत बैरंग कर दी, उनका मुँह लाल हो गया, बदन भट्टी की तरह तप रहा था, मानो बुखार चढ़ गया हो. फिर अचानक ही वो शांत पड़ गयी और कुछ देर बाद मेरे ऊपर से उतर कर अपनी साड़ी उठाई और नीचे भाग गयी. मैं बड़ा असमंजस में पड़ गया और सोचने लगा कि शायद भाभी को कहीं बुखार तो नहीं आ गया, जिसकी वजह से वो ऐसी हरकत कर रही थी. इधर मेरा बुरा हाल था, मेरा मन कर रहा था, कि अपने लंड को कच्छे से बाहर निकल लूँ और ज़ोर-ज़ोर से हिलाऊँ, उसे सहलाऊँ…!
आखिरकार मैंने आज पहली बार उसको बाहर निकाल ही लिया और ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा. इधर जैसे ही मेरे लंड के टोपे की खाल ऊपर को खिंची, मुझे बेहद दर्द का भी एहसास हुआ. लेकिन मन करे कि तेज़ इसको रगड़ूं, मसलूं. अभी मैं इसी कश्मकश में था कि क्या और कैसे करूँ कि अचानक भाभी की आवाज़ सुनाई दी.
भाभी - अंकुश!..... ये क्या हो रहा है..?
मैंने गर्दन घुमाकर देखा, तो भाभी जीने की सबसे उपरी सीढ़ी पर अपनी कमर पर हाथ रखे खड़ी थी. मेरी तो गांड ही फट गयी, इधर मेरा लंड फुल अकड़ में था. मैंने झट से उसे अपने पेट की तरफ लिटाया और अपने शॉर्ट को ऊपर की तरह खींच कर एलास्टिक छोड़ दी. चटकककक! शॉर्ट की टाइट एलास्टिक लंड के ठीक टोपे पर जहाँ उसकी स्किन का जॉइंट था वहाँ पड़ी. अरईईई…..मैय्आआआआअ………मररर्र्र्र्र्र्र्ररर…..गय्आआ……..रीईईईईईईईईईई. दर्द के मारे मेरी हालत पतली हो गयी और में करवट लेते हुए, अपने घुटनों को पेट पर मोड़ कर लोट-पोट होने लगा…!
मुझे दर्द से तड़पता देख भाभी दौड़ कर मेरे पास आई, और मेरे सर के पास बैठ, हाथ फेरते हुए बोली – क्या हुआ मेरे राजा मुन्ना को, बताओ मुझे… क्या हुआ..?
मेरे मुँह से कोई शब्द ही नहीं निकल पा रहे थे. मैं लगातार कभी करवट से हो जाता तो कभी पीठ के बल, मेरे घुटने मुड़े ही हुए थे. मेरी आँखों से पानी निकल आया. तेज दर्द की लहर मेरी जान ही निकाले दे रही थी. भाभी मेरे सर को लगातार सहलाए जा रही थी और बार-बार पूछने की कोशिश कर रही थी कि आख़िर मुझे हुआ क्या है..? जब थोड़ा दर्द में राहत हुई और मेरा चीखना कम हो गया तो उन्होंने फिर से पूछा… देखो अंकुश मुझे बताओ… क्या हुआ है तुम्हें..?
आह्ह्ह्ह…. भाभी मेरे पेट में बहुत तेज दर्द है… मैंने बात को छिपाने की कोशिश करते हुए कहा. मैं नहीं चाहता था कि भाभी को पता चले कि मैं क्या कर रहा था..?
भाभी – देखो झूठ मत बोलो,… पेट दर्द में कोई ऐसा नहीं बिलबिलाता है… सच-सच बताओ… शरमाओ नही… कहीं कुछ बड़ी प्राब्लम हो गयी तो लेने के देने पड़ जाएँगे…
दरअसल उन्होंने मुझे वो करते हुए तो देख ही लिया था, तो प्राब्लम भी कोई उसी से रिलेटेड होगी. इसलिए वो जानना चाहती थी.
मैं – नहीं भाभी सच में मेरे पेट में ही दर्द है.. मैंने फिर से छिपाने की कोशिश की.
भाभी थोड़ा बनावटी गुस्सा अपने चेहरे पर ला कर बोली – अंकुश..! मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी कि मुझसे तुम कोई बात छिपाओगे…!
सच बताओ क्या बात है. कहीं कुछ ज़्यादा प्राब्लम हो गयी तो सब मुझे ही दोष देंगे, कैसी भाभी है ये? बिन माँ के बच्चे का ख्याल भी नहीं रख सकी. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी भाभी किसी से बात करने लायक ना रहे?
अब मेरे पास सच बताने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था… उन्होंने इमोशनली मुझे फँसा दिया था. मेरा दर्द भी अब जा चुका था तो मैं उनकी गोद में अपना सर रख कर बोला – भाभी मेरी सूसू मेरे शॉर्ट की एलास्टिक से दब गयी थी. बस और कुछ नहीं.
भाभी – लेकिन तुम ऐसा क्या कर रहे थे जो तुम्हारी सूसू दब गयी? और इतनी ज़ोर से कैसे दबी कि इतना दर्द हुआ…?
मैं – जाने दो ना भाभी..! अब सब ठीक है..!
भाभी – तो तुम मुझे सच-सच नहीं बताओगे.. हां! कोई बात नहीं, आज के बाद मेरे से कभी बात मत करना और उन्होंने मेरा सर अपनी गोद से उठा दिया और उठ कर जाने लगी. मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और बोला – मैं सब सच बताता हूँ. लेकिन प्लीज़ भाभी मुझसे नाराज़ मत हो. वरना मैं कैसे जी पाऊंगा…?
उन्होंने लाड़ से मुझे अपने सीने में दबा लिया. उनके मुलायम दूध मेरे मुँह पर दब गये. कुछ देर बाद उन्होंने मुझे अलग किया और मेरा माथा चूमकर मेरी ओर देखने लगी…!
मैं – भाभी जब आप मालिश कर रही थी, तो आपके चुतड़ों की रगड़ से मेरी सूसू अकड़ने लगी. मेरे अंदर उत्तेजना बढ़ने लगी जो निरंतर बढ़ती ही गयी. जब आप उठकर चली गयी तो लाख कोशिश के बाद भी मैं अपने आप को रोक ना सका और अपनी लंड को बाहर निकाल कर मसलने लगा. लेकिन आपकी आवाज़ सुन कर मैंने जल्दबाज़ी में उसको छुपाना चाहा और झटके से एलास्टिक छूट कर उसके ऊपर लगी. भाभी कुछ देर चुप रही, और मेरे मासूम चेहरे की ओर देखती रही.फिर ना जाने क्या सोचकर वो मुस्कराने लगी और मेरे नंगे बदन पर हाथ फेरते हुए बोली – लाओ दिखाओ तो मुझे… क्या हुआ है वहाँ…?
मैंने शर्म से अपने घुटने जोड़ लिए ताकि भाभी कहीं जबरदस्ती मेरे शॉर्ट को ना खींच दें और बोला – नहीं भाभी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. अब दर्द भी नहीं हो रहा आप रहने दो..!
वो अपनी आँखें तरेर कर बोली – तुम अभी बच्चे हो, अभी दर्द नहीं है तो इसका मतलब ये तो नहीं हुआ कि सब कुछ सही है, कही अंदरूनी चोट हुई तो बाद में परेशान कर सकती है. देखो ये शर्म छोड़ो और मुझे देखने दो. फिर उन्होंने मुझे लिटा दिया और मेरे शॉर्ट को नीचे करने लगी. मैंने एक लास्ट कोशिश की और उनके हाथ पकड़ लिया. उन्होंने एक हाथ से मेरा हाथ हटा दिया और मेरा शॉर्ट नीचे खिसका कर घुटनों तक कर दिया.
भाभी - हइई… दैयाआआआ.. ये क्या है अंकुश…? मेरा लंड देखकर उनका मुँह खुला का खुला रह गया और अपने खुले मुँह पर हाथ रख कर वो कुछ देर तक.. टक-टॅकी लगाए वो मेरे लंड की सुंदरता को देखती रह गयी..!
मैं – क्यों क्या हुआ भाभी…? ये मेरा सूसू ही तो है…!
भाभी - हे भगवान..! तुम इसे अभी भी सूसू ही समझ रहे हो..? ये तो पूरा मस्त हथियार हो गया है. फिर वो उसकी जड़ को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर इधर-उधर घुमा फिरा कर देखने लगी. जब उन्होंने मेरे टोपे की खाल को पीछे करने की कोशिश की तो वो बस अपना घूँघट की खोल पाया कि मुझे दर्द होने लगा.
मैं – अह्ह्ह्ह… भाभी नहीं… खोलो मत… दर्द होता है.
जब भाभी ने सुपाड़े के पीछे देखा तो मेरी खाल के होल से कोई आधा-पोना इंच नीचे ही जुड़ी हुई थी, जिसे खींचने पर दर्द होने लगता था.
भाभी – अंकुश! तुम्हारा हथियार तो अभी तक कोरा ही है. कभी कुछ किया नहीं इससे..?
मैं – हां ! रोज़ ही करता हूँ…. पेशाब..!
भाभी – खाली पेशाब?.... और कुछ नहीं..?
मैं – नहीं..! और भी कुछ होता है इससे..?
भाभी – हां अंकुश! और बहुत कुछ होता है.. लेकिन ताज्जुब है..! जब तुमने और कुछ भी नहीं किया है अब तक… तो फिर ये इतना लंबा और मोटा कैसे हो गया…?
मैं क्या जानू… ? मैंने जवाब दिया तो
भाभी बोली – तो फिर अभी क्यों हिला रहे थे..?
मैं – सच कहूँ भाभी.. आप जब भी मालिश करती हो और आपका बदन इससे रगड़ा ख़ाता है… तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि कुछ पुछो मत… और जी करने लगता है की इसको मसल डालूं…, कुचल कर रख दूं.. लेकिन दर्द की वजह से कुछ कर नहीं पाता….! पर आज आपने इसे ज़्यादा ही रगड़ दिया तो मुझसे रहा नहीं गया और वो करने लगा…
मेरा लंड अभी भी ज्यों का त्यों सोता सा एकदम 90 डिग्री पर खड़ा भाभी की मुट्ठी में क़ैद था. उन्होंने उसको थोड़ा खोल कर उसके पेशाब वाले छेद को अपनी उंगली से सहला दिया और बोली – तो अब कैसा लग रहा है..?
मैं – सीईईईई…. आहह.. भाभी ये सब मत करो… वरना ये फट जाएगा.
भाभी – तो इसको शांत कैसे करोगे अब…?
मैं – पता नहीं भाभी इसके पहले ये इतना कभी नहीं फूला था.. आज तो हद ही हो गयी है और अब आपका हाथ लगते ही तो और हालत खराब हो रही है…अह्ह्ह्ह…प्लीज़ भाभी कुछ करो ना ! प्लीज़…… वरना में कुछ कर बैठूँगा…!
भाभी – अच्छा.. अच्छा.. शांत रहो.. ! मैं कुछ करती हूँ, और फिर उसे हिलाने लगी, धीरे-धीरे बड़े एहतियात से उसको आगे पीछे करने लगी ताकि उसकी स्किन ज़्यादा ना खिंच जाए. मज़े में मेरे मुँह से आहह….उउउहह…और जल्दीीई.. ऐसी आवाज़ें निकलने लगी… और वो उनकी मुट्ठी में और ज़्यादा फूलने लगा… उसकी नसें उभर आईं.
भाभी की भी एक्साइटमेंट बढ़ने लगी, और किसी सम्मोहन सी शक्ति उनके चेहरे को मेरे लंड के नजदीक और नजदीक खींचने लगी. अब भाभी की गरम साँसें मेरे लंड पर महसूस हो रही थी. उत्तेजना में मेरे कान तक लाल हो गये थे. आखिरकार उनके होंठों ने मेरे अधखुले सुपाड़े को छू ही लिया. उफफफफफफफफफफफ्फ़…… मैं तो जैसे स्वर्ग में ही उड़ने लगा… उनके होंठों के स्पर्श होते ही मुझे एक सुकून सा मिला, और उनके रसीले होंठ उसको अपनी क़ैद में लेते चले गये. देखते-देखते उनके होंठों ने मेरे पूरे 3” लंबे सुपाड़े को जो दहक कर लाल शिमला के सेब जैसा दिख रहा था गडप्प कर लिया. एक ठंड सी पड़ गयी मेरे लंड में, जैसे किसी गरम चीज़ को एक साथ पानी में डाल दिया हो. उनकी जीभ मेरे पी होल पर गोल-गोल घूम रही थी. आनंद के मारे मेरी आँखें बंद हो चुकी थी और कमर थरथराने लगी. भाभी मेरे लंड को अंदर और अंदर अपने मुँह में लेती जा रही थी, लेकिन खूब कोशिश करके वो उसे करीब आधा ही ले पाई और उतने पर ही अपने होंठों से मालिश देने लगी. भाभी मेरे बगल में ही उकड़ू बैठी थी, लंड को अंदर-बाहर करते समय उनके मस्त मुलायम बूब्स मेरे पेट और कमर पर रगड़ खा रहे थे.
लंड का जड़ वाला हिस्सा अभी भी भाभी की मुट्ठी में ही था और वो मुँह के साथ-साथ अपने हाथ से भी उसे मसलती जा रही थी. 20-25 मिनिट की चुसाई के बाद भी मेरा कुछ नहीं हुआ तो भाभी ने अपना मुँह हटाया और मेरी ओर देख कर बोली – कुछ हुआ कि नहीं…?
मैं – बहुत अच्छा लग रहा है भाभी… प्लीज़ रूको मत ऐसे ही करती रहो..!
भाभी – तुम्हें तो मज़ा आ रहा है.. लेकिन मेरा तो मुँह दुखने लगा, और तुम्हारा माल अभी तक नहीं निकला.
फिर वो मेरी कमर के नीचे की साइड में आकर बैठ गयी और फिर से अपने मुँह में लेकर चूसने लगी, अब साथ-साथ उनकी उंगलियाँ मेरे टट्टों से खेल रही थी. मेरा तो मज़ा ही दुगना हो गया और मैं अपनी कमर उचका-उचका कर उनके मुँह में लंड पेलने की कोशिश करने लगा. अब भाभी जल्दी से जल्दी मेरा पानी निकालना चाहती थी, क्योंकि उनका मुँह दर्द करने लगा था, बीच-बीच में वो अपना एक हाथ अपनी चूत के पास ले जाती और ऊपर से उसको सहला देती. अब वो मेरे टट्टों और गांड के होल के बीच की जगह पर नाख़ून से खुरचने लगी. ऐसा करने से मेरे उस जगह पर करंट जैसा लगा और मुझे उस जगह से कुछ उठता सा महसूस होने लगा.
मैंने भाभी के सर पर हाथ रखा और तेज़-तेज़ अपनी कमर उचका कर अपना ज़्यादा से ज़्यादा लंड उनके मुँह में ठूंस दिया उनका गला चोक हो गया, में दनादन धक्के मारकर उनके सर को दबाए हुए था. वो मेरे हाथों को हटाने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी, लेकिन अब में अपने होश-हवास खो चुका था, फिर कुछ ऐसा हुआ मानो मेरे टट्टों से कोई बिजली सी दौड़ती हुई मेरे लंड में प्रवेश कर रही हो और मैं उनका सर अपने लंड पर कसकर पिचकारी छोड़ने लगा. मुझे लगा जैसे कोई गरम लावा जैसा मेरे लंड से निकल कर भाभी के मुँह में भर रहा हो. दो मिनिट तक दे दना दन पिचकारी मारने के बाद मैंने अपना हाथ उनके सर से हटाया और अपनी कमर को फर्श पर लैंड करा दिया…..!!
झट से उन्होंने अपना सर ऊपर किया. फलफला कर ढेर सारी मलाई जैसी उनके मुँह से निकल कर मेरे पेट पर गिरी, उनका मुँह लाल सुर्ख हो रहा था. वो खांसने लगी, फिर भागते हुए छत पर लगे नल से पानी लेकर मुँह साफ किया.
मैं बैठ कर उन्हें ही देख रहा था, मुँह साफ करके वो वापस लौटी और एक प्यार भरी धौल मेरी पीठ पर जमाई और बोली – जंगली कहीं के! मेरी दम निकालना चाहते थे..? हां!... पता है! मेरी साँसें बंद होने लगी थी.
मैं – सॉरी भाभी वो मैं … मुझे… होश ही नहीं रहा…
भाभी मुस्करा के बोली… मैं समझ सकती हूँ.. अच्छा ये बताओ अब कैसा लग रहा है.. कुछ हल्का फील हुआ या नहीं?
मैं – हां भाभी! थैंक्स! अब मेरी उत्तेजना कुछ कम हो गयी है.
भाभी – लेकिन तुम्हारा ये हथियार तो ज्यों का त्यों खड़ा है, जाओ बाथरूम में जाकर कुछ देर इसपर ठंडा पानी डाल लो.
आज पहली बार मुझे पता चला कि लंड से पेशाब के अलावा और भी कुछ निकलता है, जो इतना आनंद देता है. अब तो मैं अपने हाथ से भी उस मज़े को लेने की कोशिश करने लगा, लेकिन वो मज़ा नहीं मिला जो भाभी के चूसने से मिला था. फिर एक दिन बाथरूम में खड़ा मैं अपने लंड को सहला रहा था कि भाभी ने देख लिया और वो डाँट पिलाई कि पुछो मत.
जब मैंने कारण पूछा तो वो समझाने लगी – अंकुश देखो ये रोज़-रोज़ की आदत मत लगाओ. ठीक नहीं है, इससे तुम्हारा शरीर कमजोर होने लगेगा, हो सकता है कोई बीमारी भी लग जाए. कभी-कभी कर लेने में कोई बुराई नहीं है, पर हाथ से नहीं. हाथ से करने को मूठ मारना बोलते हैं और लिमिट से ज़्यादा मूठ मारने से इसकी (लिंग) नसें कमजोर पड़ जाती हैं.., यहाँ तक कि आदमी नामर्द भी हो जाते हैं, और शादी के बाद वो किसी काम के नहीं रह पाते.
मैंने पूछा कि भाभी तो और कौन-कौन से तरीके हैं उस आनंद को लेने के?
तो वो मुस्कराईं और बोली – अंकुश तुम तो आज ही सब कुछ जानना चाहते हो..! फिर कुछ सोच कर वो बोली – उस दिन मैंने जिस तरह से तुम्हें रिलीस किया था उसको मुख मैथुन (ब्लोजॉब) कहते हैं. असल में तो वो भी सही तरीका नहीं है.
मैं – तो सही तरीका क्या है, भाभी…?
भाभी – मर्द और औरत के बीच संभोग ही सही तरीका होता है, जो प्राकृतिक माना जाता है.. लेकिन उसके लिए अभी तुम्हारी उमर नहीं हुई है, तुम्हारे लिंग की स्किन जो जुड़ी हुई है ना वो भी तभी अलग होगी जब तुम किसी के साथ ये सब करोगे लेकिन गलती से भी किसी के साथ ऐसे वैसे संबंध बनाने की कोशिश भी मत करना… वरना…! मुझसे बुरा कोई नहीं होगा..! जब भी वो समय आएगा, मैं खुद तुम्हारी मदद करूँगी.
मेरे अपरिपक्व दिमाग़ में कुछ पल्ले पड़ा कुछ नहीं, पर मैं इतना ज़रूर समझ गया, कि भाभी मेरी सब जायज़, नाजायज़ ज़रूरतों का ख्याल रखती हैं, और जब जिस काम की ज़रूरत होगी वो ज़रूर करेंगी. मैं अपनी पढ़ाई में जुट गया. समय निकलता रहा, भाभी की प्रेग्नेन्सी का समय नजदीक आता जा रहा था, अब उनका पेट काफ़ी बड़ा हो गया था. मैं उनके पेट पर हाथ फेरकर उनको चिढ़ाया करता, कभी उनके पेट पर कान लगाकर बच्चे से बात करता. छोटी चाची, समय-समय पर भाभी की देख भाल कर देती.
आखिरकार वो समय आ गया और भाभी ने एक प्यारी सी गुड़िया को जन्म दिया. सभी बहुत खुश थे उस नन्ही परी के आने से जिसका नाम मैंने रूचि रखा.
कुछ दिनों बाद मेरे एग्जाम भी हो गये, और अब में एक बार फिर बोर्ड की क्लास में पहुँच गया था. उधर कृष्णा भैया ने ग्रेजुएशन के फाइनल के साथ पी.सी.एस. के एग्जाम भी दे दिए थे, और उनका सेलेक्शन होना लगभग तय था. रमा दीदी ने फर्स्ट ईयर प्राइवेट से क्लियर कर लिया था, लेकिन प्रेग्नेन्सी की वजह से भाभी एग्जाम नहीं दे पाई, जिसका उनको मलाल था. लेकिन वो जिंदगी के अहम एग्जाम में तो पास हो ही चुकी थी. कुछ दिनो के बाद मँझले भैया का पी.सी.एस. का रिज़ल्ट आ गया, रैंक के हिसाब से उनको डीएसपी की पोस्ट के लिए सेलेक्ट किया गया था, अब उन्हें कुछ महीनों के लिए ट्रेनिंग पर जाना था. मेरा इस साल बोर्ड था, सभी को मेरे भविष्य की चिंता थी, सो स्कूल के पहले दिन से ही सब का अटेन्षन मेरे ऊपर ही था.
उस दिन संडे था, दोनों बड़े भाई भी घर आए हुए थे, कल मंझले भैया को ट्रेनिंग के लिए निकलना था, घर में थोड़ा मिल बैठ कर खाने का प्रोग्राम रखा था. हमारे परिवार में मेरे यहाँ ही मिक्सर था, जो बड़े भैया की शादी में आया था, और इस समय वो छोटी चाची के यहाँ था, वो किसी काम के लिए ले गयी थी उसे. वैसे तो चाची को भी हमारे घर ही आना था, लेकिन थोड़ा काम जल्दी हो जाए तो भाभी ने मुझे कहा – अंकुश! छोटी चाची के यहाँ से अपना मिक्सर तो ला दो ज़रा, कुछ नारियल वग़ैरह की चटनी भी बना लेंगे.
छोटे चाचा का घर भी बगल में ही था, उन्होंने अपने हिस्से में अपनी ज़रूरत के ही हिसाब से दो कमरे और एक छोटा सा किचन मेन गेट के साथ ही बना रखे थे, बाकी की ज़मीन में ऊँची सी बाउंड्री से कवर कर रखा था. बाउंड्री की पीछे की दीवार पर छप्पर डाल कर गाय-भैंस के लिए जगह कर रखी थी उसी के साथ में चारा काटने की मशीन लगा रखी थी जो एक सिंगल फेज़ की मोटर से चल जाती थी.
मैं चाची के घर पहुँचा तो उनका गेट अंदर से बंद था, मैंने गेट खटखटाया, तो अंदर से चाची की आवाज़ आई… कौन है…?
मैं हूँ चाची… मैंने जवाब दिया तो वो बोली – रूको अंकुश, अभी गेट खोलती हूँ.
थोड़ी देर बाद जैसे ही गेट खुला, सामने चाची को देख कर मेरी आँखें फटी रह गयी… मुँह खुला का खुला रह गया और मैं फटी आँखों से उन्हें देखता ही रह गया…. सामने चाची मात्र एक पेटीकोट में जो उनकी पहाड़ की चोटियों जैसी चुचियों पर सिर्फ़ लपेटा हुआ था और वो उसे एक हाथ से पकड़े हुए थी, वही पेटीकोट नीचे उनके घुटनों से भी 2”-3” ऊपर तक ही आ रहा था और उनकी गोल-गोल खंबे जैसी मांसल जांघें दिखाई दे रही थी. गेट खोलते ही वो मुझे देख क मुस्कराईं और बोली:
आओ छोटू..! और इतना कह कर पलट गयी.. अब उनकी हाहाकारी गांड मेरी आँखों के सामने थी. उनकी गांड पीछे को इतनी उभरी हुई थी कि, कमर के कटाव पर अगर कोई तौलिया रख दिया जाए तो गारंटीड वो गिर नहीं सकता. ऊपर से आगे को खिंचा हुआ पेटीकोट.. लगता था गांड के प्रेशर से कहीं फट ना जाए… कसे हुए पेटीकोट में उनकी गांड ऐसी लग रही थी मानो दो बड़े वाले तरबूज फिट हो रहे हों… दोनों के बीच की दरार तरबूजों की कसावट की वजह से बहुत ही कम दिखाई दी मुझे.
चाची अपनी तरबूजों को मटकाते हुए अपने बाथरूम की ओर चल दी जो किचन के साइड से मात्र 3 फीट की तीन तरफ से ओट सी लगाकर नहाने-धोने के लिए बना रखा था. उनके मटकते हुए कूल्हे ऐसे लग रहे थे, मानो एक दूसरे से शर्त लगा रहे हों… “कि मैं बड़ा कि तू..?” अब रहने वाले दो ही तो प्राणी थे.., शादी के 10 साल बाद भी इतनी उपजाऊ ज़मीन से भी चाचा कोई फसल नहीं काट पाए थे. चाची की इस जान मारु गांड को देख कर मेरा लंड फड़कने लगा. अब कुछ दिन पहले ऐसा कुछ हुआ होता तो शायद मेरे लिए ये नॉर्मल बात होती, लेकिन अब भाभी ने मेरे नाग से जहर निकाल कर ये जता दिया था, कि नारी का बदन क्या, क्यों और किसलिए होता है..?
वो अपनी लंड फाड़ू गांड को मटकाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ते हुए बोली – और बताओ अंकुश, कैसे आना हुआ..?
मैं हड़बड़ा कर बोला – वो चाची… वो..वो.. भाभी ने.. वो मिक्सर लाने के लिए बोला है…
चाची – अच्छा हां ! तुम थोड़ी देर बैठो.. उसके जार को साफ करना है अभी.. मैं थोड़ा नहा लेती हूँ.. उसके बाद साफ करके दूँगी..
मैं वहीं आँगन में पड़ी चारपाई पर पैर लटका कर बैठ गया, और कनखियों से उनके बाथरूम की तरफ देखने लगा. चाची बैठ कर नहा रही थी, उनके सर के बाल मुझे दिख रहे थे. वो मुझसे बातें भी करती जा रही थी नहाने के साथ-साथ. करीब 10 मिनिट में ही उनका नहाना हो गया और वहीँ पर रखे उनके दूसरे पेटीकोट को उन्होंने बैठे-बैठे ही उठाया और अपने सर के ऊपर से अपने शरीर पर डाल लिया, फिर वहीं रखी ब्रा उठाई और उसे पहनने लगी.
मैं अभी भी चोर नज़रों से उधर ही देख रहा था.. अचानक वो उठ खड़ी हुई, उनका पेटीकोट ठीक वैसे ही था जो नहाने से पहले वाला था.. उनकी कमर से ऊपर का हिस्सा मुझे दिख रहा था.
उन्होंने मुझे आवाज़ दी – ओ अंकुश! ज़रा इधर तो आना.
मैं उठकर उनके पास पहुँचा, इस समय उनके गीले बदन से वो पेटीकोट भी जगह-जगह गीला होकर उनके बदन से चिपका हुआ था. गीले कपड़े से उनके शरीर का रंग तक झलक रहा था. उन्होंने पेटीकोट के ऊपर से ही वो ब्रा जिसकी स्ट्रिप्स अपने कंधों पर चढ़ा कर आगे अपने स्तनों पर पकड़ रखी थी, और उसकी पट्टियाँ जिनको पीछे लेजा कर हुक करते हैं, वो साइड्स से झूल रही थीं.
मैं उनके ठीक पीछे जा खड़ा हुआ और बोला – जी चाची .. बताइए क्या काम है..?
चाची – अरे अंकुश ! देखो ना ये मेरी ब्रा थोड़ी टाइट हो गयी है, बहुत कोशिश की लेकिन मैं अपने हाथ से इसके हुक नहीं लगा पा रही, थोड़ा तुम लगा दो ना!
मैंने उनके दोनों ओर झूल रही ब्रा के स्ट्रैप्स को पकड़ा.. तो मेरे हाथ उनके गीले नंगे कांख से टच हो गये. मेरे लंड ने एक फिर ठुमका मारा...! फिर उन्होंने पेटीकोट को ब्रा के नीचे से निकाल कर हाथों में पकड़ लिया और उसको कमर में बाँधने के लिए अपनी नाभि जो किसी बोरिंग के गड्ढे की तरह दिख रही थी… तक ले गयी, अब एक हाथ उनका आगे दोनों चोटियों के ऊपर से ब्रा को थामे था, और दूसरे में पेटीकोट पकड़ा हुआ था…. मैंने दोनों तरफ की स्ट्रैप को खींच कर पीछे उनकी पीठ पर लाया.. मेरी दोनों हथेलियाँ चाची की नंगी पीठ पर धीरे-धीरे फिसल रही थीं…
ना जाने ये कैसी उत्तेजना थी मेरे शरीर में की मेरे हाथ काँपने लगे….
ब्रा वाकई में कुछ ज़्यादा ही टाइट थी, उनके हुक के होल जो धागे के बने हुए थे, उनमें हुक डालने में मुझे बड़ी दिक्कत आ रही थी…
अरे ! खड़े-खड़े क्या कर रहे हो अंकुश, जल्दी डालो ना.. चाची की आवाज़ सुन कर मेरे हाथ और ज़्यादा काँपने लगे….
मैंने स्ट्रैप को और थोड़ा खींच कर उनके होल के मुँह तक हुक लाकर छोड़ दिए. चाची को लगा कि अब तो हुक लग ही जाएगा, सो उनका वो हाथ जो ब्रा को आगे से संभाले हुए था, वो भी अब पेटीकोट के नाडे को बाँधने के लिए नीचे कर लिया था...! जैसे ही मैंने हुक को उसके होल में छोड़ा, वो साला होल में जाने की बजाय बाहर से ही स्लिप हो गया… नतीजा… चाची की ब्रा किसी स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह उछल कर उनके सामने ज़मीन पर टपक गयी…
फ़ौरन चाची ने अपना एक हाथ अपनी बड़ी बड़ी चुचियों पर रख लिया…और वो उन्हें ढकने की नाकाम कोशिश करती हुई बोली – क्या अंकुश… ऊँट से हो गए हो और एक छोटा सा काम नहीं होता तुमसे.
मैंने मरी सी आवाज़ में कहा – मैंने पहले कभी डाला नहीं हैं ना चाची.. तो..
चाची – क्या नहीं डाला अभी तक..?
मैं – व.व.उूओ.. हुक कभी होल में नही…. डॅलाया.. सॉरी चाची..
चाची सामने पड़ी ब्रा उठाने के लिए आगे को झुकी, नाडे पर उनके हाथ की पकड़ कम हो गयी और जिस हाथ से उन्होंने अपनी चुचियाँ ढक रखी थी उसी हाथ से ब्रा उठाने लगी. तीन काम एक साथ हुए. एक गांड पर से उनका पेटीकोट थोड़ा नीचे को सरक गया और उनकी गांड की दरार का उपरी हिस्सा मेरी आँखों के सामने उजागर हो गया, दूसरा झुकने की वजह से उनकी गांड की दरार ठीक मेरे अकडे हुए लंड पर टिक गयी, और उसकी लंबाई दरार के समानांतर होकर वो एक तरह दरार में सेट हो गया. तीसरा उनकी नंगी गोल-मटोल बड़ी-बड़ी चुचियाँ, नीचे को झूल गयी जो मुझे साइड से दिखाई दे रही थी.
मेरी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी…, शरीर जुड़ी के मरीज की तरह काँपने लगा. लेकिन ना तो मैंने पीछे हटने की कोई कोशिश की और ना चाची ने मुझे हटने को कहा. ब्रा को उठा कर उन्होंने अपनी गांड को और थोड़ा पीछे को झटका देकर एक फुल लंबाई का रगड़ा मेरे लंड पर मारा और खड़ी हो गयी.
फिर उन्होंने अपनी ब्रा को वैसे ही अपनी चुचियों के ऊपर रख कर उसी पोज़िशन में रह कर बोली – अंकुश तुम जाओ यहाँ से.. तुम्हारे बस का कुछ नहीं है.. वैसे ही पहाड़ हो रहे हो, एक हुक तक नहीं लगा सकते…
मैं – पर चाची वो मिक्सर??
चाची – मैं अपने साथ लेकर आती हूँ, तुम जाओ.. और हां ! ये बातें किसी से कहना मत.. समझ गये…
मैं हां में अपना सर हिलाकर, अपनी गर्दन झुकाए वहाँ से लौट आया लेकिन आँखों में अभी भी वही दृश्य (सीन) घूम रहे थे. सोच-सोच कर मेरा लंड कच्छे में उछल कूद मचाए हुए था, मैं जितना उसको दबाने की कोशिश करता वो उतना ही उछलने लगता. ऐसी हालत में घर जाना मैंने उचित नहीं समझा, और मैं खेतों की ओर बढ़ गया.
एक झाड़ी के पीछे जाकर पेशाब की धार मारी, मामला कुछ हल्का हुआ. तो मैं घर लौट लिया. उस घटना के बाद मेरी हिम्मत नहीं होती चाची से नज़रें मिलाने की, लेकिन इसके ठीक उलट वो हर संभव प्रयास करती रहती मेरे पास आने का, मुझे लाड करने के बहाने अपने से चिपका लेती, कभी-कभी तो मेरे मुँह को अपने बड़े-बड़े स्तनों के बीच में डाल कर दबाए रखती. मैं उनकी हरकतों से उत्तेजित होने लगता लेकिन उन्हें अपनी तरफ से टच करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता. कुछ दिनों से चाची के मेरे प्रति आए बदलाव को भाभी ने नोटिस किया, लेकिन ये बात उन्होंने अपने तक ही रखी.





