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Incest Mera Pyara Devar - Ankush

aidenabhishek

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भविष्य के गर्भ में क्या है डॉक्टर साहब? ये तो आगे ही पता चलेगा.
 

aidenabhishek

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UPDATE 11

हम 60-70 किमी निकल आए थे, भैया ने जो जगह घूमने के लिए बताई थी, वो आने वाली थी. आगे एक छोटे से गांव के बाहर सड़क के किनारे चाय नाश्ते की टपरी सी थी, मैंने उसके पास पहुँचकर अपनी बाइक रोकी और कुछ नाश्ते के लिए पूछा. वो गरमा-गरम पालक-मेथी के पकोड़े तल रहा था. हमने उससे पकोड़े लिए और खाने लगे उसके बाद एक-एक चाय ली जो कुछ ज़्यादा सही नहीं लगी, अब ले ली थी तो पीनी पड़ी.

चाय पीते-पीते मैंने उस टपरी वाले से उस जगह के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि यहाँ से आधे किमी के बाद अपने ही हाथ पर एक कच्चा पथरीला रास्ता आएगा, उसी से वहाँ पहुँचा जा सकता है. वो जगह रोड से करीब एक फर्लांग ही अंदर को है उसे चाय पकोड़े के पैसे देकर हम फिर आगे बढ़ गये. वो जगह वाकई में रोमांटिक थी. घने ऊँचे पेड़ों के बीच एक छोटी सी झील जैसी थी, जिसका पानी एक सिरे पर स्थित कोई 15-20 फीट ऊँची पहाड़ियों से निकल रहा था, और झील में जमा हो रहा था. ओवरफ्लो होकर झील का पानी सबसे निचले किनारे से निकल कर जंगलों के बीच जा रहा था. झील के दोनों किनारों पर उसके समानांतर तकरीबन 30-40 मीटर की चौड़ाई के हरी-हरी घास के मैदान थे. कुल मिलाकर प्रेमी जोड़ों के मज़े करने के लिए ये उत्तम जगह थी. जब हम वहाँ पहुँचे तो दोपहर के 12-12:30 का समय था, इस वजह से और कोई वहाँ नहीं था, एक-दो जोड़े थे, वो भी निकलने की तैयारी में थे.

मैंने बाइक पेड़ों के बीच खड़ी की और अपने बैग उठाकर झील के किनारे की तरफ चल दिए. दीदी तो उस जगह को देख कर बहुत एक्साईटेड हो रही थी.

दीदी - वाउ, छोटू क्या मस्त जगह है यार, मेरा तो मन कर रहा है, दो-चार दिन यहाँ से हिलूँ भी ना. हमने झील के किनारे घास पर अपने बैग रख दिए और कुछ दूर झील के किनारे घूमने लगे. रंगबिरंगी छोटी-बड़ी मछलीयाँ हमें देख कर किनारे से और गहराई को तैरती हुई भाग जाती जो झील के साफ नीले पानी में काफ़ी दूर तक दिखाई देती. वो एक जगह बैठ कर पानी में हाथ डालकर मछलीयों से खेलने लगी. वो कुछ देर दीदी के हाथ से दूर भाग जाती और एक जगह ठहर कर उसकी ओर देखने लगती, और फिर पूंछ हिला-हिलाकर इधर-उधर भाग लेती. जुलाई - अगस्त के महीने में भी झील का पानी ठंडा था. कुछ देर मछलीयों से खेलने के बाद दीदी बोली – भाई मेरा तो इसमें नहाने का मान कर रहा है.

मैं – लेकिन दीदी हमें तैरना तो आता नहीं, अगर पानी गहरा हुआ तो..?

दीदी – लगता तो नहीं की ज़्यादा गहरा होगा.. चल धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं. ज़्यादा अंदर तक नहीं जाएंगे और वो धीरे-धीरे पानी में उतरने लगी.

मैं अभी भी किनारे पर खड़ा उसे पानी के अंदर जाते हुए देख रहा था. दीदी काफ़ी अंदर तक चली गयी, फिर भी पानी उसके पेट से थोड़ा ऊपर तक ही था.

मैंने कहा दीदी बस यहीं नहा लो, और आगे मत जाना.

दीदी - तू भी आजा ना यार ! साथ मैं नहाते हैं.. मज़ा आएगा.

मैंने कहा – नहीं तुम ही नहाओ, मैं ऐसे ही ठीक हूँ.

तो वो वहीं डुबकी लगाने लगी. अब वो पूरी तरह भीग गयी थी, डुबकी लगाकर जैसे ही वो खड़ी हुई, उसकी झीने से कपड़े की टीशर्ट उसके शरीर से चिपक गयी और उसकी ब्रा साफ-साफ दिखाई देने लगी. ब्रा से बाहर झलकते हुए उसके अमरूदों की छटा उसकी टीशर्ट से नुमाया हो रही थी. उसे देखकर मेरा लंड भी मचलने लगा, मानो कह रहा हो- अरे यार क्या देखता ही रहेगा भेन्चोद ! कूद पड़ तू भी और ले ले मज़े, मौका है.

मैं उसके भीगे बदन के मज़े ले ही रहा था कि उसने फिर से डुबकी लगाई. इस बार वो कुछ देर तक बाहर नहीं आई. साफ पानी में उसका शरीर तो दिख रहा था लेकिन वो ऊपर नहीं आ रही थी. मेरे मन में आशंका सी उठने लगी. आधे मिनिट से भी ऊपर हो गया फिर भी वो बाहर नहीं आई तो मुझे कुछ गड़बड़ सी लगने लगी.

तभी दीदी झटके से ऊपर आई और एक लंबी साँस भर कर अपना एक हाथ ऊपर करके सिर्फ़ छोटू ही बोल पाई और फिर से अंदर डूबती चली गयी. मैंने इधर उधर नज़र दौड़ाई, शायद कोई मदद करने वाला हो, लेकिन वहाँ दूर दूर तक ना इंसान ना इंसान की जात, कोई भी नहीं था. जब कोई और सहारा ना दिखा, तो मैंने ले ऊपरवाले का नाम, आव देखा न ताव अपनी टीशर्ट और पाजामा उतार किनारे पर फेंका और पानी में जंप लगा दी.

मैं तेज़ी से दीदी की ओर बढ़ा.! और जैसे ही उसके पास पहुँचा, झटके से वो ऊपर आई, और खिल-खिलाकर मेरे सामने पानी में खड़ी होकर हँसने लगी. यहाँ पानी उसके गले से थोड़ा नीचे था, माने उसके बूब्स पानी के अंदर थे.

मैं डर और झुंझलाहट के मारे काँप रहा था, उसके ऊपर गुस्सा होते हुए बोला – दीदी ये क्या हिमाकत है? पता है मैं कितना डर गया था, और तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है.

दीदी – अरे बुद्धू ! मैं तो तुझे भी पाने में बुलाने के लिए नाटक कर रही थी. और खिल-खिलाकर हँसते हुए मेरे ऊपर पानी उछाल कर मुझे भिगोने लगी.

मैं – अच्छा ! तुम्हें मस्ती सूझ रही है रुको अभी बताता हूँ, और मैं भी हाथों में पानी भर-भर कर उसकी ओर उछालने लगा.

दीदी – अब तो डुबकी लगाएगा या अभी भी नहीं? तो मैंने भी सोच लिया कि अब इसको अच्छे से मज़ा चखा ही दिया जाए. मैंने पानी में डुबकी लगाई और अंदर ही अंदर उसके पीछे पहुँचा, अपना सर उसकी टाँगों के बीच डाला, उसको अपने कंधे पर उठाकर खड़ा हो गया. पहले तो वो शॉक लगने से चीख पड़ी, फिर मज़ा लेते हुए मेरे कंधे पर बैठी हवा में अपनी बाहें फैला कर याहू.याहू..हूऊ... करके चिल्लाने लगी. जंगल के शांत वातावरण में उसकी कोयल जैसी मीठी आवाज़ पेड़ों और पानी के बीच गूँजकर वापस हमारे कानों से टकरा रही थी.

रमा दीदी तो मस्ती में जैसे पागल ही हो उठी और ना जाने कब उसने मेरे कंधे पर बैठे हुए ही अपनी टीशर्ट उतार कर किनारे की तरफ उछाल दी. लेकिन वो किनारे से पहले ही पानी में गिरी और बहकर हमसे दूर जाने लगी.

मैं उसको कंधे पर उठाए हुए ही पानी में पीछे की तरफ पलट गया. कुछ देर हम पानी के अंदर डूबे रहे, लेकिन फिर बाहर आते ही वो मेरी पीठ पर सवार हो गयी और मेरे कंधे पर अपने दाँत गढ़ा दिए. मेरी चीख निकल गयी, मैंने अपना हाथ पीछे ले जाकर उसे पकड़ने की कोशिश की, तो वो हस्ती हुई किसी मछली की तरह मेरे हाथ से फिसलकर मेरे से दूर जाने लगी.

मैं जब उसे पकड़ने के लिए पलटा, तब पता लगा कि वो मात्र ब्रा में ही थी. उसके उभार किसी टेनिस की बॉल की तरह एकदम गोल-गोल उसके ब्रा में क़ैद मुझे बुला रहे थे, मानो कह रहे हों कि, आजा बेटा, गांड में दम है तो हमें मसल के दिखा.

मेरी झांटे सुलग उठी, और मैंने खड़े-खड़े ही उसके ऊपर जंप लगा दी और उसे पानी के अंदर दबोच लिया. मेरे जंप मारते ही वो भी बचने के लिए पीछे हटी, जिससे मेरे दोनों हाथ उसकी कमर पर जम गये, मेरी उंगलियाँ उसके लोवर की एलास्टिक में फँस गयी. उसने जैसे ही पीछे को तैरने के लिए अपने शरीर को झटका दिया, उसका लोवर उतर कर मेरे हाथों में आ गया. अब वो मात्र अपनी ब्रा और पैंटी में थी. मैंने उसके लोवर को हवा में गोल-गोल घुमाकर उसको चिढ़ाया, लेकिन उसपर कोई असर नहीं हुआ, और हँसती हुई अपनी जीभ चिढ़ा कर अंगूठा दिखाने लगी. मैं फिर एक बार उसको पकड़ने झपटा, तो वो किसी मछली की तरह मेरे हाथों से फिसल गयी. हम दोनों पानी में नहाते हुए अठखेलियाँ कर रहे थे. पानी में तैरती मछलियाँ भी जैसे हमारे खेल में शामिल हो गयी थी, और वो भी हमारे आस-पास जमा होकर इधर-से-उधर अपनी पूंछ हिला-हिला कर तैर रही थी.

फिर अचानक दीदी उछलकर मेरी गोद में आ गई, अपनी पतली लंबी बाहें मेरे गले में लपेट दी और पैरों से मेरी कमर को लपेट कर मेरे सीने से लिपट गयी. स्वतः ही हम दोनों के होंठ एक दूसरे से पहली बार जुड़ गये और हम दोनों एक लंबी स्मूच में खो गये. दीदी मेरे होंठों को बुरी तरह से झिंझोड़ने लगी, मानो वो उन्हें जल्दी से जल्दी खा जाने की फिराक में हो. मैंने भी उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और उसके मुँह में अपनी जीभ डालने की कोशिश करने लगा. कुछ देर तो उसके मोतियों जैसे दाँतों की दीवार मेरी जीभ को रोकती रही, फिर वो खुल गयी और मेरी जीभ उसके मुँह में घुसकर अपनी सहेली के साथ खेलने लगी.

मेरे हाथ दीदी के 36 के साइज़ के गोल-मटोल सुडौल नितंबों को मसलने लगे. दीदी की आँखें मस्ती में डूबकर लाल सुर्ख हो गयी, और दीदी में अब सिर्फ़ वासना ही दिख रही थी. मेरे हाथ दीदी के कूल्हों से हटकर उसकी पीठ पर आ गये और जैसे ही मेरी उंगलियों ने दीदी की ब्रा के एकमात्र हुक को टच किया, दीदी शरारत कर बैठी, और उसकी ब्रा भी पानी में तैरती नज़र आने लगी.

मेरे हाथ दीदी के कूल्हों से हटकर उसकी पीठ पर आ गये और जैसे ही मेरी उंगलियों ने दीदी की ब्रा के एकमात्र हुक को टच किया, दीदी शरारत कर बैठी, और उसकी ब्रा भी पानी में तैरती नज़र आने लगी. नीचे मेरा डंडा फुल अकड़ चुका था और इस समय दीदी की गांड और चूत के होंठों को सहारा दिए हुए था. दीदी लगातार उसपर अपनी गांड और चूत के होंठों को घिस रही थी. अब उसे अपनी पैंटी भी किसी सौतन की तरह अखरने लगी. दीदी मेरी बाँहों में पीछे को पलट गयी और अपने नंगे अल्हड़ कच्चे अमरूद जो पकने के लिए तैयार थे मेरी आँखों के सामने कर दिए. मेरा मन भी उन्हें खाने के लिए मचलने लगा.

मस्ती के जोर से उसके अंगूर के दाने जैसे निप्पल कड़क होकर मुझे निमंत्रण दे रहे थे. मेरी चटोरी जीभ कहाँ मानने वाली थी और उसके एक अंगूर को बड़े प्यार से बड़ी शालीनता से चाट लिया ईईईीीइसस्स्स्स्स् स्स्शह. भाईईईईईईईईईईईई. आआआहह. जोरसीईए. चतत्त. ना. प्लेीईईईई.

मैं भी उसे तड़पाना चाहता था. उसी तरह धीरे से दूसरे अंगूर को भी अपनी जीभ की नोक से जस्ट टच कर दिया.

दीदी - जोर से चाट न ना.. भेन्चोद्द्द्द्द्द्द्द्द्द. दीदी की सहनशक्ति जवाब दे गयी. और उसके मुँह से गाली निकल गई..

मैं उसके मुँह की तरफ देखता रह गया और शरारती लहजे में कहा – दीदी अभी कहाँ हुआ हूँ भेन्चोद..?

दीदी - तो जल्दी बन जा ना..! और उसने अपने एक हाथ को मेरे गले से हटा कर, अपनी एक चुचि पकड़ कर मेरे मुँह में ठूंस दी.

उसकी चुचि को चूसते हुए मैं उसकी गांड की गोलाईयों को भी नाप-जोख रहा था. उसकी पैंटी में कुछ चिपचिपाहट मेरे पेट पर महसूस हो रही थी. उसकी गर्दन पीछे को लटक गयी. वो तो अच्छा था कि उसके पैरों ने मेरी कमर को कस रखा था. जल्दी कुछ कर ना मेरे भाई. सिसकते हुए कहा उसने.

मैं – क्या करूँ दीदी.. कर तो रहा हूँ.. जो तुमने कहा वो.

दीदी - इसके आगे का. ! अब नहीं रहा जाता. आअहह. प्लीज़ छोटू. जल्दी से कुछ कर वरना मेरी जान ही ना निकल जाए कहीं.

मैं दीदी को उसी पोज़िशन में झील के किनारे पर ले आया वो मेरे गले से लटक कर खड़ी हो गयी. तो मैंने दीदी की पैंटी नीचे खिसका दी और उसकी जांघों के बीच बैठ गया. पहली बार मैंने दीदी की प्यारी चूत के दर्शन किए, जो अपने बंद होंठ किए हल्के बालों के बीच सूरज की तेज रोशनी में किसी कली की तरह चमक रही थी. मैंने दीदी की गोल-सुडौल जांघों जो अभी तक ज़्यादा मांसल नहीं हुई थी, और उन दोनों के बीच थोड़ा सा गैप था. हल्की उभरी हुई उसकी चूत को देखते हुए चूम लिया और उसके होंठों को खोलकर, अंदरूनी हिस्से को चाटने लगा. दीदी अपनी आँखें बंद किए खड़ी मेरे बालों को अपनी उंगलियों से सहला रही थी. खुले आसमान के नीचे हम दोनों बिना किसी परवाह के अपनी वासना के वशीभूत एक दूसरे के उन्माद को शांत करने के प्रयास में लगे थे. हमें ये भी डर नहीं था कि कोई इधर आ भी सकता है. हालाँकि जुलाई की उमस भरी दोपहरी में इस बात के कम ही चांस थे. फिर भी एक आशंका मन में ज़रूर थी.

मैंने अपना सर उठाकर दीदी से कहा- दीदी यहाँ कोई आ गया तो?

दीदी जैसे सपने से जागी हो और झल्लाकर बोली – तू मार खाएगा अब मेरे हाथ से. साले कुत्ते, मैं मरी जा रही हूँ और तुझे ऐसी गांडफाड़ बातें सूझ रही हैं.

दीदी के मुँह से ऐसी बातें सुन मुझे हँसी आ गई और मैंने जीभ निकाल कर दीदी की रस से भरी कुप्पी के ऊपर फिराई सस्स्स्स्स्स्स्स्सि ईईईईईईईईईई... आआआआआअहह.. .आआनन्नह. चत्ले आईईई.सीसीसएएए.हाईए.ई.. थोड़ा खोल ली यी. उसीए. आहह.. आईसीई.हिी. उईई.मा आअ.. हांननगज्गग...

मैंने उसकी चूत की फांकों को खोल कर उसकी अंदर की दीवार से जीभ लगा कर रगड़ दी.

मेरी खुरदरी जीभ के घर्षण से दीदी बिल-बिला उठी और उसने मेरा सर कसकर अपनी चूत के मुँह से सटा दिया और अपने पंजों पर खड़ी हो गयी. मेरी जीभ की नोक जैसे ही उसके छोटे से छेद में घुसने की कोशिश करती, वैसे ही वो वापस आ जाती. उत्तेजना के कारण उसकी क्लिट निकल कर बाहर आ गया जिसे मैंने जीभ से चाट कर अपने होंठों से दबा लिया और अपनी एक उंगली से उसके छेद के ऊपर मसलने लगा.

दीदी - उफफफफफफफफ्फ़..कचूततुउउ.म्मेरीए.भाइईइ..मईए..आअहह..गाइिईईई. और किलकारी मारते हुई वो झड़ने लगी. मैं उसकी कोरी गागर का सारा पानी पी गया, जो किसी अमृत से कम नहीं था मेरे लिए. अपनी बड़ी बहन का अमृत पीकर मैं धनी हो गया. दीदी खड़ी-खड़ी हाँफ रही थी, उसकी टाँगें काँपने लगी थी.

दीदी - मुझे कहीं छाया में ले चल, अब मुझसे धूप में खड़ा होना मुश्किल हो रहा है.

मैंने उसे गोद में उठाया और पेड़ों की छाया की तरफ ले चला. मैंने एक घने पेड़ की छाया के नीचे उसे घास पर उतार दिया और अपना कच्छे को नीचे करके बोला – दीदी तुम भी थोड़ा इसे प्यार करो ना.

दीदी ने भी आज पहली बार उसे बिना कपड़ों के देखा था, वो अपने पंजों पर मेरे सामने बैठ गयी और मेरे लंड को हाथ में लेकर सहलाते हुए बोली- छोटू ये तो बहुत बड़ा और मोटा भी.

मैं – तुम्हें अच्छा नहीं लगा दीदी?

तो वो तपाक से बोली – अच्छा तो है.. पर .. ये मेरी उसमें घुस पाएगा.?

मैंने कहा – किसमें घुसने की बात कर रही हो..?

तो दीदी सकपका गयी.. और झिझकते हुए बोली – मेरी उसमें. तुम लोग क्या कहते हो उसको.. जिससे हम लड़कियाँ सू सू करती हैं.

मैं – मुझे क्या पता दीदी.. तुम किससे सू सू करती हो.?

दीदी – तू बहुत बदमाश होता जा रहा है. अरे भाई.. वो.. च. च. चूत में. बता.. घुस जाएगा?

मैं – मुझे क्या मालूम? मैंने कभी घुसाया है क्या तुम्हारी चूत में जो मुझे पता हो? और अगर तुम्हें डाउट हो तो रहने दो.

दीदी ने मेरे कूल्हे पर एक ज़ोर की चपत मारी और मेरे लंड को मसल कर बोली – अब तो चाहे जो भी हो, इसे तो मैं आज ले कर ही रहूंगी अपनी चूत में. भले ही फट ही क्यों ना जाए.

और दीदी मेरे लंड को आगे-पीछे करने लगी, मेरा लंड तो उसके कोमल हाथ में आते ही ठुमके लगा रहा था, अब तो उसके धैर्य की सीमा ही खतम होती जा रही थी, जिसके चलते उसने एक बूँद अपने रस की सैंपल के तौर पर उसको पेश कर दी. सफेद मोटी जैसी बूँद को देख कर दीदी ने उसे अपनी उंगली पर रख लिया और उसे देखने लगी.

मैं – क्या देख रही हो दीदी, जैसे मैंने तुम्हारे रस को पीया है अमृत समझ कर वैसे ही ये तुम्हारे लिए अमृत है, चख कर देखो.

दीदी ने शर्माते हुए उसे अपनी जीभ से टच किया और उसका स्वाद लेने की कोशिश करती रही. फिर उसने अपनी पूरी उंगली को मुँह में ले लिया.

मैं – कैसा है.? तो दीदी ने आँखों के इशारे से ही हामी भरी और फिर अपनी उंगली मुँह से निकाल कर बोली – टेस्टी है..

तो मैंने कहा - फिर देख क्या रही हो इसे मुँह में लेकर प्यार करो. चूसो इसे.. जिससे ये तुम्हारी चूत को अच्छे से प्यार दे सके.

मेरी बात मान मुसकुराते हुए दीदी ने मेरे गरम सुपाड़े को अपने होंठों में क़ैद कर लिया और चूसने लगी और फिर धीरे-धीरे उसने उसे आधी लंबाई तक अपने मुँह में कर लिया. मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी. लंड एकदम कड़क हो चुका था, उसकी नसें फूलने लगी. मैंने उसका मुँह अपने लंड से अलग हटाया तो वो मुझे नाराजगी वाले भाव लाकर देखने लगी.

मैंने कहा - दीदी अब इसको अपनी प्यारी चूत में लेने का समय आ गया है और उसको वहीं हरी-हरी घास पर लिटा कर दीदी के घुटनो को मोड़ कर उसके पेट से लगा दिया. मैंने अपने घुटने ज़मीन पर टिकाए फिर दीदी के कूल्हों को अपनी जांघों के ऊपर रखा. अब उसकी छोटी सी कुँवारी चूत ऊपर को उभर आई, जिसे मैंने एक बार फिर से अपनी जीभ से चाट लिया, और दीदी की चूत के होंठ खोलकर अपना मोटा टमाटर जैसा सुपाड़े उसके छोटे से छेद पर भिड़ा दिया. मेरे सुपाड़े से उसकी छोटी सी चूत एकदम ढक सी गयी थी. मैंने अपनी कमर को हल्का सा पुश किया, जिससे वो दीदी की गीली चूत में सेट हो गया. इतने से ही दीदी के शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी और दीदी ने अपनी आँखें कस कर बंद कर ली.

मैंने एक हल्का सा धक्का अपनी कमर को लगाया तो मेरा सुपाड़ा आधे से थोड़ा ज़्यादा अंदर समा गया और वो किसी दीवार जैसी परत पर जाकर अटक गया जो शायद उसकी झिल्ली थी. रमा दीदी के मुँह से एक हल्की सी चीख निकल गयी और उसकी आँखों में पानी आ गया.

मैंने दीदी को एनकरेज करते हुए कहा – दीदी थोड़ा मैनेज करना पड़ेगा. और फिर एक लंबी साँस लेकर एक जोरदार धक्का लगा दिया..

दीदी – आआयय ययय ययययययीीईईईईईई. माआआआअ. मररर्र्र्ररर.. गाइिईईईईईईईईई. रीईईईईईईईई. आआआआअहह...

एक फ़च की आवाज़ के साथ उसकी झिल्ली फट गयी.. और एक खून की धार मेरे लंड की साइड से निकली. मेरा लंड भी दर्द करने लगा था. शायद उसकी चूत की झिल्ली से वो भी रगड़ गया था. 5-7 मिनिट मैं यूँ ही पड़ा रहा. दीदी के उपर, और इस दौरान मैं उसके आँसू पोंछता रहा, उसको ढाढ़स देता रहा. फिर उसको चुप कराकर.. उसके होंठो को चूसा. उसकी चुचियों को सहलाया. तब जाकर वो नॉर्मल हुई. और मेरा भी दर्द कम हुआ..

कुछ देर बाद मैंने पूछा – दीदी अब दर्द तो नहीं है?? तो उसने ना में सर हिलाया और बोली – पूरा चला गया कि नहीं??

मैं – हां लगभग. बस थोड़ा और बाकी है.. जबकि अभी मेरा आधा लंड ही गया था.

अब मैंने आधे लंड को थोड़ा बाहर को निकाला. लंड के साथ उसकी चूत की अंदर की परत भी बाहर तक आई और साथ ही उसकी कराह भी निकल गयी. मैं थोड़ा रुका और फिर से उतना अंदर कर दिया तो वो फिर कराही. ऐसे ही बड़े ध्यान से आराम से मैंने अपने आधे लंड को अंदर-बाहर किया. कोई 20-25 बार में ही दीदी की चूत फिर से गीली होने लगी और उसको दर्द होना बंद हो गया. अब वो भी मेरे साथ सहयोग देने लगी. दीदी की चूत से सफ़ेद-सफ़ेद रस निकल रहा था. मैंने मौका देख एक और भरपूर धक्का मार दिया और पूरा लंड दीदी की चूत में डालकर रुक गया.

दीदी - ऊ.माआ.मार दलाअ. रीए.. भेह्न्चोद. साले. और कितना डालेगा. तेरा ये खूँटा मेरे पेट तक तो पहुँच गया.

मैं – बस ये एंड हो गया.. दीदी.. अब तेरी चूत ही इतनी छोटी है.. तो इसमें बेचारे मेरे खूँटे का क्या दोष और उसकी चुचियों को मसलते हुए उसके होंठों को चूम लिया. थोड़ी देर के बाद मैंने फिर से धक्के लगाना शुरू कर दिया. कोई 5 मिनिट बाद ही दीदी भी नीचे से अपनी कमर उचकाने लगी और मेरे धक्कों का साथ देना शुरू कर दिया.

दीदी - आहह. छोटुऊ.जल्दी-जल्दी कर.. बहुत मज़ाअ.. आरहाआ.. है..सस्सिईईईई. हान्न्न.और ज़ॉर्सईए..हाईए.रीए.कितनाअ.मज़ाअ..आट्टाअ.चूड़नीई..मीईंन..शाबास और..टीज़्जज..उफफफ्फ़.. मे..गाइिईईईई.रीई..ओह.गोद्ड़द्ड.

वो जोर से मेरी कमर में दीदी अपने पैर लपेट कर चिपक गयी और इतनी तेज़ झड़ी कि तमाम गाढ़ा-गाढ़ा रस मेरे लंड की साइड से बहने लगा. मेरे धक्कों की गति धीमी पड़ गयी थी क्योंकि दीदी ने मुझे तेज़ कस रखा था लेकिन मेरा होना अभी बाकी था तो धक्के लगाता रहा. जब दीदी थोड़ा होश में आई तो बोली- भाई.. घास से मेरी पीठ छिलने लगी है.. तो मैं उसे लेकर खड़ा हो गया. मेरा डंडा इस समय 90 डिग्री खड़ा था, जो अकड़कर किसी सख्त रॉड की तरह लग रहा था. मैंने दीदी की जाँघों के नीचे से हाथ डाल कर उठा लिया, और अपने सुपाड़े को दीदी की ताजी फटी चूत के छेद पर फिट कर दिया.

दीदी ने अपनी बाहें मेरे गले में लपेट ली थी, जैसे ही मेरा लंड उसकी चूत में सेट हुआ. दीदी ने उसके शरीर के भार को नीचे की ओर आने दिया. नतीजा. धीरे-2 पूरा लंड उसकी चूत में समा गया. दीदी एक बार फिर दर्द से बिलबिला उठी, क्योंकि अभी कुछ पल पहले ही दीदी की चूत घायल हुई थी और अब एक साथ मेरा पूरा मूसल एक ही साथ समाकर उसके पेट तक ठोकर मारने लगा था. हम दोनों के प्रयास से दीदी दो-चार बार आराम से ऊपर नीचे हुई, लंड किसी पिस्टन की तरह अंदर जाता, बाहर आता. जिसे दीदी अपनी खुली आँखों से देख भी रही थी. दीदी फिर से गरम होने लगी और मेरे लंड पर कूदने लगी. मुझे इतना मज़ा आ रहा था जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.



10 मिनिट खड़े –खड़े चोदने के बाद हम दोनों एक साथ झड़ने लगे, वो मेरे सीने से ऐसी चिपक गयी, जैसे कि कभी अलग ही ना होना हो. हम दोनों एक बार फिर झील में उतार कर नहाए, एक दूसरे के बदन को साफ किया और फिर बाहर आकर अपने-अपने कपड़े पहने, बुलेट में किक लगाई और अपने घर को चल दिए.

रास्ते मैं मैंने दीदी से पूछा – दीदी अब तो खुश हो ना? ये सुनते ही उसने मुझे पीछे से अपनी बाँहों में कस लिया और मेरी गर्दन को चूमते हुए.

दीदी – थैंक्स भाई, आज तूने मेरा वर्षों का सपना पूरा कर दिया.

मैं – तो क्या तुम वर्षों से मेरे साथ ये सब करने का सोच रही थी..?

दीदी – सच कहूँ तो हां... हर लड़की अपने जीवन में इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार करती है, जब वो एक कली से फूल बनना चाहती है. वो एक लड़की से औरत बनती है. लेकिन मुझे पता नहीं क्यों बाहर के लड़कों पर कभी भरोसा नहीं हुआ, इसलिए मैं तेरे साथ वो सब करती रहती थी कि शायद तू मेरी फीलिंग्स को समझे. लेकिन बहुत कोशिशों के बाद भी तू मेरी भावनाओं को, मेरे इशारों को नहीं समझा, तब मैंने तेरे ऊपर नज़र रखना शुरू कर दिया, और मुझे तेरे और भाभी के बारे में शक़ होने लगा. जब भाभी तेरी मालिश करती थीं, तो छुप-छुप कर मैं सब देखा करती थी. वो भी जिस दिन भाभी ने पहली बार तेरा लंड मुँह में लिया था.

मैं दीदी की बातें सुन कर झटका खा गया फिर संभलते हुए बोला - तो क्या तुम्हें भाभी और मेरे संबंध से एतराज है?

दीदी – बिल्कुल नहीं. सच कहूँ तो भाभी को उनका हक़ मिला है. उन्होंने ही तुझे ऐसा बनाया है, तुझे सँवारने में अपने इतने साल गँवाए हैं. तेरी हर तकलीफ़ उन्होंने अपने ऊपर झेली है, तो तेरे ऊपर पहला हक़ तो उनका ही है. सच कहूँ तो मैं उनके लिए बहुत खुश हूँ. और अब तो तूने मुझे भी उस खुशी में शामिल कर लिया है इसके लिए मैं हमेशा तेरी अहसानमंद रहूंगी मेरे प्यारे भाई.

ये कहते हुए उसने उचक कर मेरे गाल को चूम लिया. रमा दीदी की भावनाएँ आज खुलकर सामने आ गयी थी और उसने जो चाहा वो आज उसे मिल भी गया था. बुलेट की आवाज़ सुनकर आस-पास के भी लोग हमारे दरवाजे पर आ गये थे, मेरी व्यक्तित्व के हिसाब से बुलेट एकदम मेरे लिए सही बाइक थी, जो शायद भाभी का ही सपना हो मुझे बुलेट चलाते देखना. मैंने अपने दरवाजे पर पहुँचकर जैसे ही बाइक खड़ी की, भाभी दौड़ कर बाहर आ गई, उनके हाथ में आरती की थाली थी. मैं उतरने को हुआ तो उन्होंने हाथ के इशारे से रुकने को कहा और मेरे सीट पर बैठे-बैठे ही मेरी आरती उतारी, अपने दोनों हाथों को मेरे सर के दोनों ओर से मेरी बलायें ली, फिर मेरे माथे को चूमकर बोली- अब आ जाओ.

ये सब बाबूजी दूर बैठे देख रहे थे, उनकी आँखों में पानी था. फिर वो हमारे पास चले आए. भाभी ने जैसे ही उनके पैर छुये, वो गद गद हो गये और उन्हें ढेरों आशीर्वाद दिए. दीदी मेरे पीछे से उतर कर बैग हाथ में लिए घर के अंदर जा रही थी, उसकी चाल कुछ बदली-2 सी देख भाभी को कुछ शक़ हुआ लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं. हमें घर पहुँचते-2 शाम के 4 बज गये थे, तो भाभी ने हमें चाय नाश्ता दिया, क्योंकि खाने का तो ये समय ही नहीं था.

दीदी नाश्ता करके अपने कमरे में आराम करने चली गयी, वो बहुत थकान महसूस कर रही थी. अब मैं और भाभी ही रह गये तो वो मुझे अपने कमरे में ले गयी, और हम दोनों पलंग पर लेटे-लेटे बात करने लगे.

भाभी – और सुनाओ अंकुश. कैसा रहा तुम्हारा शहर का सफ़र. बड़े देवर ने कुछ खातिर की अपने छोटे भाई बहन की या ऐसे ही टरका दिया.

मैं – अरे भाभी, पुछो मत! क्या रुतबा है भैया का. पुलिस वाले उनके आगे-पीछे घूमते हैं और फिर मैंने वहाँ भैया के साथ जो-जो खरीदारी की वो सब बताया, फिर दूसरे दिन मूवी देखी.

भाभी – अच्छा अंकुश, अब मैं जो पूछूं.. उसका सच-सच जवाब दोगे..?

मैं – क्या भाभी ! आपको लगता है कि मैं आपसे कभी झूठ भी बोल सकता हूँ..?

भाभी – नहीं, ऐसा अब तक तो नहीं हुआ है पर ये सवाल ही ऐसा है कि शायद इसका तुम जवाब ही ना देना चाहो.

मैं – आप निश्चिंत रहो भाभी, मेरे जीवन में आपसे बढ़कर ऐसी कोई बात नहीं है जो मैं आपसे शेयर ना कर पाऊं. आप पुछिये क्या पूछना है.

भाभी – मुझे शक़ है कि तुम्हारे और रमा के बीच ऐसा कुछ हुआ है, जो मुझे पता नहीं है. आज जब वो बाइक से उतरकर अंदर आ रही थी, तो उसकी चाल कुछ बदली-2 सी लग रही थी. ये कहकर वो मुझे सवालिया नज़रों से घूरने लगी.

मैं कुछ देर चुप रहा और फिर नज़रें नीची करके बोला - सॉरी भाभी! आज से पहले तो ऐसा कुछ नहीं था हम दोनों के बीच पर आज ही.

भाभी – हां बोलो आज ही क्या.? बताओ मुझे.. वो मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बोली.

मैं – आज से पहले हम दोनों के बीच बस कुछ बराबर के लड़के-लड़कियों जैसी थोड़ी बहुत छेड़-छाड़ होती रहती थी, जो मेरे लिए तो बस एक नॉर्मल भाई-बहन वाली ही छेड़-छाड़ जैसी थी, लेकिन दीदी की भावना कुछ अलग ही थी मेरे लिए. कल जब हम मूवी देख रहे थे तब और फिर मैंने जो भी हम दोनों के बीच हुआ, और फिर दीदी ने जो बताया वो सब मैंने भाभी को बता दिया, जिसे सुनकर वो एकदम सकते में आ गयी. फिर मैंने आज जो कुछ हम दोनों के बीच हुआ वो भी सब बता दिया. उसके बाद रास्ते में जो हमारी बातें हुई वो भी बता दी. तब जाकर उनको थोड़ा तसल्ली हुई.

मैं – अब आप ही बताओ भाभी इसमें मैंने कुछ ग़लत किया.? कुछ देर वो चुप-चाप मेरे चेहरे को देखती रही.

फिर कुछ सोच भाभी कर बोली – वैसे एक तरह से देखा जाए, तो रमा भी अपनी जगह सही है. आख़िर उसकी भी उम्र ये सब करने की है ही, और ज़्यादातर लड़के लड़कियाँ इस उम्र में बहक कर ग़लत-सलत कदम उठा लेते हैं. जिससे बदनामी का भी डर पैदा हो जाता है. लेकिन अब तुम दोनों एक लिमिट में रह कर ही ये सब आगे करना, वैसे मैं उससे भी बात करूँगी. पर तुम भी ये बात ध्यान रखना कि अब अपना माल उसके अंदर कभी मत छोड़ना, ठीक है?

फिर भाभी ने मेरे होंठों पर एक किस करके कहा – अब तुम थोड़ा अपने कॉलेज पर ध्यान दो, कल से रेग्युलर क्लास अटेंड करना.

थोड़ा स्माइल करते हुए भाभी बोली - और हां, समय निकाल कर थोड़ा छोटी चाची के पास चले जाया करो.

मैं – क्यों ? उनको मुझसे क्या काम है.. मैंने आपको बताया था ना, उनके बारे में.

भाभी – इसी लिए तो कह रही हूँ, मेरे प्यारे देवर अंकुश उन्हें तुम्हारी ज़रूरत है. शादी के इतने सालों बाद भी वो माँ नहीं बन पाई. बेचारी अधूरी सी हैं. तो तुम थोड़ा कोशिश करो. प्लीज़. उन्हें भी खुशी होगी.

मैं – क्या आप भी यही चाहती हैं..?



भाभी – मैं भी यही चाहती हूँ. इसलिए तो कह रही हूँ. बोलो! दोगे ना उन्हें ये खुशी?

मैं – मेरी भाभी का हुकुम सर आँखों पर फिर मैंने उनको अपनी बाँहों में कस लिया. पहले अपनी डार्लिंग भाभी को तो खुशी दे दूं, ये बोलकर उनके होंठ चूसने लगा. फिर हम दोनों ही अपना आपा खोते चले गये, दीं दुनिया से बेख़बर एक दूसरे में समाते चले गये.

दूसरे दिन मैं अपनी बुलेट से कॉलेज पहुँचा. कॉलेज की नई बिल्डिंग भी हमारे पुराने स्कूल से ही सटी हुई थी. बस गेट ही अलग था. कॉलेज का ये पहला ही साल था और ज़्यादातर हमारे स्कूल से पास हुए बच्चे ही थे तो सभी जानते ही थे. मुझे बुलेट पर देख कर सारे फ्रेंड्स ने मुझे घेर लिया, और गाड़ी की खुशी में पार्टी माँगने लगे, तो मुझे सभी को चाय नाश्ता कराना पड़ा. अभी भी अड्मिशन चल ही रहे थे. कालेज के प्रिन्सिपल मेरे पिताजी के मित्र थे. और ऊपर से मैं अपने स्कूल का टॉपर था तो उन्होंने मुझे अपने ऑफीस में बुलाया और मुझसे थोड़ा कालेज के कामों में मदद करते रहने के लिए कहा. क्लास तो अभी लगने नहीं थे, तो टीचर्स के साथ इंटरेक्शन कर के मैं जल्दी ही वापस घर लौट आया.

अभी गाड़ी स्टॅंड की ही थी, कि भाभी बोली – अंकुश थोड़ा छोटी चाची के यहाँ चले जाओ. उनको कुछ काम है. शायद बाज़ार जाना है उनको.

मैं उल्टे पैर चाची के घर पहुँचा. वो नहा धोकर तैयार हो रही थी. थोड़ा सा मेकअप भी किया हुआ था, जैसा गांव में नॉर्मली औरतें करती हैं. जैसे क्रीम, पाउडर. हल्की सी लाली होंठों पर, बारीक आँखों में काजल. इतने में ही चाची चमक रही थी, साड़ी भी थोड़ा कसकर लपेटे हुई थी, जिसमें उनके उभरे हुए कूल्हे कुछ ज़्यादा ही मादक लग रहे थे. मैंने जाकर चाची को आवाज़ दी, तो वो अपने कमरे से बाहर आई. सीने पर साड़ी का पल्लू कस कर कंधे पर पिन किया हुया था. मेरी नज़र में वो एकदम माल लग रही थी, जिसे अगर मिल जाए तो कोई भी चोदने को तैयार हो जाए.

चाची – आ गये अंकुश.

मैं – जी चाची, क्या काम था बोलिए??

चाची – मुझे थोड़ा बाज़ार जाना था, अब तुम्हारे चाचा तो समय देते नहीं हैं. सुबह स्कूल, फिर खेत. हो सके तो मेरे साथ थोड़ा बाज़ार तक चलो ना. इसी बहाने तुम्हारी बुलेट पर बैठने का मौका मिल जाएगा मुझे भी इतना कह कर वो हँसने लगी.



मैं – अरे क्यों नहीं चाची. वैसे लगता है आप बाज़ार में आज बिजलियाँ गिराने वाली हो. क्या लग रही हो, मैंने अपने उंगली और अंगूठे को मिलाकर टंच माल का इशारा किया.

चाची शर्मा कर सर झुककर मुस्कराते हुए बोली – क्या अंकुश तुम भी कैसी मज़ाक करते हो, मैं ऐसी भी सुंदर नहीं लग रही.

मैं – नहीं चाची सच में आज आप एकदम मस्त माल लग रही हो.

चाची – हाए अंकुश, अपनी चाची को ही माल बोल रहे हो, बहुत बिगड़ते जा रहे हो. लगता है जेठ जी को बोल कर जल्दी ही फेरे करवाने पड़ेंगे तुम्हारे.

मैं – अब यहीं खड़े-2 फेरे करवाएँगी मेरे, या बाज़ार भी चलना है?

चाची – हां चलो, मैं तो एकदम रेडी हूँ. तुम अपनी फट-फटी तो लाओ. चाची मेरे पीछे एक तरफ को दोनों पैर करके बैठ गयी, और बोली- अंकुश ये तुम्हारी हथनी जैसी गाड़ी है, थोड़ा संभाल कर चलना. मुझे तो डर लगता है.

मैं – आप चिंता ना करो, बस आप मुझे पकड़े रहना. तो उन्होंने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रख दिया. और थोड़ी तिरछी सी होकर बैठ गयी. मैंने गाड़ी बाज़ार की तरफ बढ़ा दी. अभी गांव से निकले ही थे, चौथा गियर डाला ही था, कि एक गाय सामने आ गई. मुझे एक साथ ब्रेक लगाने पड़े, और चाची का वजन मेरे उपर. उनकी 36” की चुचि जो अभी तक कोई बच्चा ना होने की वजह से अभी भी मस्त ठोस बनी हुई थी मेरी पीठ से दब गयी.

चाची डर गयी और बोली – अंकुश, लगता है मारोगे मुझे आज. मैंने तुम्हारे साथ आकर गलती कर दी.

मैं – चाची आप डरती बहुत हो. अब ये साइकल तो है नहीं जो धीरे-2 चलेगी. ब्रेक तो लगाने ही पड़ते हैं. आप एक काम करो, मेरी कमर पकड़ लो कसके.

तो चाची ने मेरी कमर में अपनी बाजू लपेट दी और सट कर बैठ गयी. उनकी चुचियों की चुभन मैं अपनी पीठ पर महसूस कर रहा था, जिससे मेरा लौड़ा पैंट में खड़ा होने लगा.

कस्बे का बाज़ार थोड़ी दूर ही था, सो 10 मिनिट में ही बाज़ार पहुँच गये. चाची अपना समान खरीदने लगी. सारा समान लेने के बाद वो अंडर गारमेंट की एक छोटी सी दुकान पर पहुँची.

दुकानदार देखते ही बोला – आइए.. आइए.. बहन जी इस बार तो आप काफ़ी दिनों के बाद आई हैं, बोलिए क्या दिखाऊ?

चाची ने अपनी पुरानी ब्रा बैग से निकाली और बोली – भैया मुझे अपने लिए ब्रा और पैंटी लेनी थी, ये ब्रा छोटी हो गयी है, इससे बड़ा साइज़ का दीजिए.

दुकानदार ने एक बार मेरी ओर देखा, और बोला – अब बहन जी ऐसे अंदाज़े से तो कैसे पता लगेगा आप अपना नंबर तो बताइए. ये पुरानी तो 34 की है और इसके ऊपर 36 की ही आती अब वो अगर ढीली, टाइट हुई तो?

चाची – नहीं होगी वो ही दे दो आप.

एक बार उसने चाची के पल्लू से ढके पपीतों पर नज़र डालते हुए बोला – ठीक है, मुझे क्या है मैं दे देता हूँ 36 नंबर की ब्रा.

फिर वो दो टाइप की ब्रा निकाल के लाया. एक जो बड़े कप वाली, जिससे चुचियों का अधिकतर हिस्सा ढक सके, और एक ऐसी जिसमें से निप्पल के साथ-साथ उनका निचला हिस्सा ही ढक पाता. चाची ने बड़े कप वाली ब्रा सेलेक्ट कर ली. जब वो दुकानदार पैंटी लेने अंदर गया.

तो मैंने चाची के कान में फुसफुसा कर कहा - चाची ये दूसरी वाली ब्रा आपको ज़्यादा अच्छी लगेगी.

चाची ने मुझे गहरी नज़र से घूरा और स्माइल करते हुए बोली – अंकुश इसमें तो कुछ ढकेगा ही नहीं उलटा दिखेगा ज़्यादा.

मैं – अरे चाची थोड़ा मॉर्डन बन के चाचा के सामने जाओगी तो उन्हें ज़्यादा अच्छा लगेगा और आपको ज़्यादा प्यार करेंगे ना.

चाची – अरे उन्हें तो मैं बिना कपड़ों के भी.

इतना फ्लो में बोल तो दिया, फिर शर्मा कर चुप हो गयी. फिर ना जाने क्या सोच कर उन्होंने एक छोटे कप वाली ब्रा भी ले ली. अब तक दुकानदार दो-तीन तरह की पैंटी लेकर आया, और मेरे इशारे पर उन्होंने एक माइक्रो पैंटी भी ले ली.



लौटते में चाची ने मुझ से पूछा – अंकुश तुमने किसी को पहले ऐसी पैंटी और ब्रा पहने देखा है?

चाची का सवाल सुनकर मुझे झटका सा लगा.

मैंने हड़बड़ा कर कहा - न.न.नहीं तो चाची.. मैंने तो किसी को नहीं देखा.

चाची – तो फिर तुम्हें कैसे पता कि वो मुझपर अच्छी लगेगी.?

मैं – व.वऊू..तो बस ऐसे ही कहा था छोटे कपड़ों में शरीर ज़्यादा सेक्सी लगता ही है.

चाची ने मेरी पीठ पर हौले से एक थप्पड़ लगाया और हँसते हुए हम्म्म... शैतान कह कर चुप हो गयी. मैंने उन्हें उनके घर उतारा.

जब मैं चलने लगा तो चाची बोली – अंकुश थोड़ा रुको तो सही कुछ खा-पी कर चले जाना.

मैं – अरे नहीं चाची, मैं अब घर जा के खाना ही खा लूँगा.

चाची – हां भाई, अब घर में इतनी लाड करने वाली भाभी हो तो चाची के हाथ का खाना क्यों अच्छा लगेगा?

मैं – ऐसी बात नहीं है चाची अच्छा ठीक है, आप चलो, मैं कपड़े चेंज करके 10 मिनिट में आता हूँ, फिर देखता हूँ आप क्या खिलाती हैं.. मुझे..

चाची हँसते हुए अपने घर के अंदर चली गयी, और मैं अपने घर की तरफ. घर आकर मैंने अपने कपड़े चेंज किए और एक हल्की से टीशर्ट और बिना कच्छे के एक हल्का सा होजरी का लोवर पहन लिया, जिससे गर्मियों में थोड़ा कंफर्टबल फील हो. टाइट जीन्स में सुबह से ही मेरा घोड़ा जो कई बार टाइट हुआ था उसको भी राहत हुई, और वो अब खुला-खुला फील कर रहा था. भाभी ने खाने के लिए बोला, क्योंकि अभी लंच का समय था.

मैंने कहा मैं चाची के यहाँ जा रहा हूँ, उन्होंने खाने के लिए बुलाया है.. अब देखते हैं क्या खिलाती हैं..?

भाभी ने मुझे गहरी नज़र से देखा.. लेकिन मेरे चेहरे से उन्हें ऐसा-वैसा कुछ नज़र नहीं आया.. तो फिर हँसती हुई बोली..ठ.हीककक.है, जाओ. आज अपनी चाची का लाड भी देख लो.

मैं उनको एक स्माइल देकर घर से निकल आया और चाची के यहाँ पहुँचा.

चाचा भी स्कूल से आ गये थे, और खाना खा रहे थे, चाची ने मुझे भी बिताया और खाना दे दिया. हम दोनों ने साथ-साथ खाना खाया. कुछ देर इधर-उधर की बातें हुई. फिर चाचा अपने खेतों की ओर चले गये. तब तक चाची भी खाना खा चुकी थी चाचा के जाने के बाद मैंने भी चाची से कहा – चाची मैं भी निकलता हूँ.

चाची - तुम रुको तुमसे अभी एक ज़रूरी काम है.

मैं फिर से उनके पलंग पर बैठ गया.और बोला- हां चाची बताइए, क्या काम है.?

चाची मेरे पास बैठ गयी और कुछ देर मेरी ओर देखती रही. फिर उनकी नज़र नीचे को हो गयी और अपनी सारी के पल्लू को अपनी उंगली में लपेटे हुए बोली.

चाची – अंकुश मैं वो ना. वो जो कपड़े तुमने पसंद किए थे ना. उनके बारे में बात करनी थी तुमसे.

मैं – उनके बारे में मुझसे क्या बात करनी है चाची..?

चाची – अब ऐसे कपड़े मैंने कभी लिए तो नहीं थे, ना जाने कैसे लगेंगे.. ?

मैं – अरे तो इसमें क्या है, एक बार पहन कर देख लीजिए ना ! पता चल जाएगा..

चाची – लेकिन मैं खुद कैसे देख पाऊँगी..?

मैं – पहन कर शीशे के सामने खड़ी होकर देख लेना और कैसे.

चाची – इतना बड़ा शीशा होना भी तो चाहिए ना. और मेरे पास मोहिनी बहू जैसी वो क्या कहते हैं, हां वो ड्रेसिंग टेबल तो है नहीं..

मैं – ओह ! ड्रेसिंग टेबल..

चाची – हां वही. तो अब कैसे देखूं..? क्या तुम मुझे देखकर बता दोगे..?

मैं – मैं.. मैं. कैसे देख सकता हूँ.. आपको उन कपड़ों में..? आप एक काम करिए, भाभी या रमा दीदी को दिखा दीजिए. वो आपको बता देंगी कैसे लगते हैं आप पर.

चाची – कैसी बातें करते हो अंकुश. मैं भला ऐसे कपड़ों को मोहिनी बहू या रमा बिटिया को कैसे दिखा सकती हूँ? वो क्या सोचेंगी मेरे बारे में? की देखो चाची को इस उमर में ऐसे कपड़ों की क्या ज़रूरत पड़ गयी? सच में तुमने तो मुझे फँसा दिया अंकुश.! अब तुम्हें ही देखकर बताना पड़ेगा हां ! और वैसे भी तुम हमारे घर में सबसे छोटे हो, ऊपर से तुमने एक दिन मुझे वैसी हालत में देख भी लिया था तो तुम्हारे सामने मुझे झिझक थोड़ी कम होगी.

मैं – ओह चाची ! तो आप चाचा को ही क्यों नहीं दिखा देती?

चाची – वो तो देखते ही मरखने बैल की तरह भड़क उठेंगे, छूटते ही कहेंगे ये क्या रंडियों जैसे कपड़े ले आई हो?

फिर वो मेरे हाथ अपने हाथों में लेकर बोली – अब अगर तुम भी नहीं देखना चाहते तो कल उन कपड़ों को वापस कर देना, जब कॉलेज जाओ तब.

मैं - ओह चाची ! अच्छा चलो अब !.. ठीक है आप पहनो मैं देख लेता हूँ कि आप कैसी लगती हो उन कपड़ों में?

चाची – तुम एक काम करो दो मिनिट बाहर चले जाओ, मैं तब तक वो पहन लेती हूँ, फिर तुम्हें आवाज़ दे लूँगी.

मैं उठकर बाहर उनके आँगन में चला गया. फिर कोई 10-15 मिनिट के बाद चाची ने मुझे आवाज़ देकर अंदर बुलाया. चाची गले तक एक चादर ओढ़े हुए पलंग के पास खड़ी थी. मुझे देखते ही उन्होंने नज़रें झुका ली.

मैं – हां चाची वो कपड़े पहने या नहीं? दिखाओ.

तो चाची ने झेंपते हुए धीरे-2 अपने बदन से चादर अलग की और अपनी नज़रें नीची किए पैर के अंगूठे से फर्श को कुरेदने लगी. एक मिनी ब्रा और छोटी सी पैंटी में कसे उनके मादक गदराए.. गोरे बदन की सुंदरता में मैं तो खो सा गया.. वो इन कपड़ों में मियाँ खलीफा को भी मात दे रही थी. बड़े-बड़े पपीते जैसे उनके कठोर वक्ष, जो अब भी अपनी कठोरता बरकरार रखे हुए थे, जिनका निप्पल से ऊपर का पूरा हिस्सा खुला हुआ था. ब्रा के कप की चौड़ाई भी मात्र 3” से ज़्यादा नहीं थी, जिससे दोनों चुचियों की पुष्टता एकदम साफ-2 दिखाई दे रही थी. 30 की उमर में भी उनका पेट ज़रा भी बाहर नहीं निकला था, हां हल्की सी मांसलता ज़रूर थी, जो उनके हुस्न में और चार चाँद लगा रही थी. खूब गहरी नाभि, जो थोड़ी सी नीचे की तरफ झुकी हुई, उनकी सेक्स अपील को दर्शा रही थी. मांसल केले के तने जैसी जांघों के बीच, दुनिया का अनमोल खजाना. माइक्रो बिकनी में सही से ढक भी नहीं रहा था, साइड से उनकी झांटो के बाल निकल कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, शायद महीने भर से साफ नहीं किए होंगे.



कसी हुई पैंटी में उनकी रसीली के होंठ अपनी पुष्टता दिखाने से बाज़ नहीं आए और उनका उठान, फिर उनके बीच की दरार साफ-साफ अपना इंप्रेशन दे रही थी. जब बहुत देर तक मैंने कुछ नहीं कहा, बस यूँ ही खड़ा उनके रूप लावण्य में खोया रहा, तो चाची ने अपनी नज़र उठाकर एक बार मेरी ओर देखा, और मुझे अपने बदन को निहारते पाकर, एक बार फिर से उनकी नज़र शर्म से झुक गयी.

चाची - बताओ ना अंकुश..! कैसी लग रही हूँ मैं इन कपड़ों में.?

मैं - हां.! मैं जैसे नींद से जागा. थोड़ा पलटना चाची. मैं एक बार पीछे से भी तो देख लूँ.. तब बताऊंगा.!

चाची जब पलटी तो..तो.उनके कूल्हों की पुष्टता देखकर मेरा मुँह खुला का खुला रह गया उनके 38” की गान्ड पर वो छोटी सी पैंटी की पट्टी सिर्फ़ उनकी दरार को ही ढक पा रही थी. ढक भी नहीं पा रही थी, बस उसमें फँसाने से अपने आप को किसी तरह बचाए हुए थी. मेरे सब्र का बाँध टूटने लगा था, मैं ठीक उनके पीछे जाकर खड़ा हो गया, मेरा लंड लोवर में एक दम सतर्क होकर नाग की तरह अपना फन फैलाए खड़ा हो गया. लोवर का सॉफ्ट कपड़ा उसे संभालने में असमर्थ दिखाई दे रहा था. मेरे लंड और चाची की गान्ड की खाई के बीच मात्र 1” का ही फासला बचा था.

मैंने अपना मुँह थोड़ा आगे करके चाची के कान के पास ले जा कर कहा – चाची आप सच में बहुत सुंदर हो.

मेरी आवाज़ अचानक अपने इतने नजदीक सुनकर वो हड़बड़ा गयी. इसी हड़बड़ाहट में चाची और थोड़ा सा पीछे को हटी. मेरा खड़ा लंड उनकी पतली सी पैंटी के ऊपर से उनकी गान्ड की दरार से अड़ गया.

चाची को इसका अंदाज़ा नहीं था. उनके मुँह से सस्स्सिईईईईईईईईई... करके एक मादक सिसकी निकल गयी और वो झट से मेरी ओर पलट गयी मेरी आँखों में देखकर बोली - तुम सच कह रहे हो अंकुश? मैं सुंदर दिख रही हूँ ना इनमें? चाची की आवाज़ में कंपन साफ-2 झलक रहा था.

मैं थोड़ा और आगे बढ़ा और उनके कंधों पर अपने हाथ रख कर उनकी आँखों में देखते हुए बोला – स्वर्ग से उतरी हुई किसी अप्सरा जैसी...!

चाची के होंठ थरथरा उठे.और कंपकपाते हुए बोली - ओह.अंकुश.. थैंक यू. तुमने मेरी तारीफ़ की. इतना कह कर वो मेरे सीने से लग गयी.

अब तो ग़ज़ब ही हो गया.... साला लौड़ा उनकी ठीक चूत के ऊपर जा टिका. चाची अपने पंजों पर खड़ी होकर उसे और अच्छे से अपनी चूत पर फील करना चाहती थी कि मेरे दिमाग़ ने झटका खाया.

फिर मैंने उनसे अलग होकर कहा - अब तो आप खुश हो ना ! मैंने आपके कपड़े देख लिए, अब मैं चलता हूँ. और ये बोलकर मैं उनके कमरे से बाहर को चल दिया.

अभी मैं उनके रूम के गेट पर ही पहुँचा था कि पीछे से चाची की रुआंसी सी आवाज़ आई - तुम्हें अपनी मोहिनी भाभी की सौगंध है अंकुश, जो यहाँ से कदम बाहर रखा तो.

मेरा एक पैर कमरे के दरवाजे से बाहर था, और दूसरा अभी कमरे में ही था.

भाभी मेरे लिए सब कुछ थी, माँ, दोस्त, महबूबा. सब कुछ.. जिसने मुझे हाथ पकड़ कर खड़ा किया था. वरना माँ के बाद मेरा क्या होता..? ईश्वर जाने.

भाभी की कसम सुनते ही मेरे पैर जहाँ के तहाँ जम गये.., मैं वहीं खड़ा रह गया.

चाची दौड़ती हुई आई और मुझे पीछे से अपनी बाँहों में कस लिया. मुझे यूँ छोड़ कर ना जाओ अंकुश. मुझे तुम्हारी बाँहों का सहारा चाहिए.उनकी मोटी-मोटी मुलायम लेकिन ठोस बूब्स मेरी पीठ पर दबी हुई थी, अपने गाल को मेरी गर्दन से सहलाती हुई वो बोली.

मैं – चाची प्लीज़ छोड़िए मुझे. ये ठीक नहीं है. हमारे रिश्ते का तो ख्याल करिए.आप मेरी माँ समान हैं.

चाची – तो क्या तुम अपनी माँ को दुखी देख सकते थे..?

मैं – आपको क्या दुख है. सब कुछ तो दे रहे हैं चाचा आपको.

चाची – औरत के लिए बांझ शब्द एक बहुत बड़ी गाली होती है. अंकुश, जब पीठ पीछे लोग मुझे बांझ बोलते हैं, सोचो मेरे दिल पर क्या बीतती होगी. जबकि मैं अच्छी तरह से जानती हूँ कि मैं बांझ नहीं हूँ.

मुझे भाभी के कहे हुए शब्द याद आ गये. (समय निकाल कर चाची के पास चले जाया करो, उन्हें तुम्हारी ज़रूरत है..) इन शब्दों का मतलब अब मेरी समझ में आ रहा था.. फिर भी मैं थोड़ा सेफ होने के लिए बोला.

मैं – लेकिन मैं चाचा के साथ धोखा नहीं कर सकता चाची.

चाची बिफर पड़ी.. और बोली – धोखा.? जानते हो धोखा किसे कहते हैं..? एक नामर्द को मेरे गले में बाँध दिया. धोखा इसे कहते हैं. अपने घर की इज़्ज़त की खातिर मैं चुप बनी रही, और अपने आप को बहकने से रोकती रही और उससे बड़ा धोखा, अब तुम मेरे साथ कर रहे हो, मुझे इस हालत में अकेला छोड़ कर. कई मौके ऐसे आए जिनमें मुझे लगा कि तुम मेरी भावनाओं को समझने लगे हो. लेकिन में ग़लत थी. तुम्हें तो अपने चाचा ही दिखाई दिए.

उन्होंने अपनी बाँहों का बंधन मेरे शरीर से हटा लिया और सुबकते हुए बोली – जाओ अंकुश तुम भी जाओ, मैं हूँ ही अभागी, तो इसमें तुम्हारा भी क्या दोष. इतना बोल कर वो फफक-फफक कर रो पड़ी, और पलट कर पलंग पर पड़ी अपनी साड़ी पहनने के लिए उठा ली.

मैंने पीछे से जाकर उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया, और बोला – मत पहनो ये कपड़े चाची वरना मुझे फिर से उतारने में समय बर्बाद करना पड़ेगा.

चाची मेरी ओर पलटी और मेरे चेहरे पर नज़र गढ़ा कर बोली – सच ! तुम सच कह रहे..? या अभी भी मज़ाक तो नहीं कर रहे.

मैं – नहीं ये एकदम सच है चाची. कोई मेरी चाची को बांझ होने की गाली दे, ये मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा.

चाची - ओह्ह्ह्ह...मेरे अंकुश अ. तुम कितने अच्छे हो.. और वो मेरे सीने से लिपट कर आँसू बहाने लगी..

मैंने उनकी थोड़ी के नीचे उंगली लगा कर उनका चेहरा ऊपर किया और आँसू पोंछते हुए कहा - प्लीज़ अब आप रोइए नहीं.. मैं आपकी आँखों में आँसू नहीं देख सकता.., इतना कहा कर मैंने अपने होंठ उनके लरजते होंठों पर रख दिए.

चाची मुझसे कसकर लिपट गयी. मैंने उनके नितंबों को अपने हाथों में लेकर कस दिया.. तो वो और तेज़ अपनी जांघों को मेरी जांघों से सटाने लगी. मेरा लंड जो कुछ इस दौरान ढीला पड़ गया था.. वो फिर से अकड़ने लगा और चाची की नाभि में अपना ठिकाना ढूँढने लगा. चाची ने उसे अपनी मुट्ठी में कस लिया और उसे मसलते हुए बोली – अंकुश ये तुम्हारा लौड़ा ग़लत रास्ते को ढूंढ रहा है. इसे संभालो, नहीं तो मेरे पेट में ही घुस जाएगा.!

मैं – ये अब आपके हवाले है, इसे सही रास्ता दिखना आपका काम है.

फिर चाची ने मेरी टीशर्ट निकाल दी और मेरी मजबूत कसरती छाती, जिसपर बाल घने होते जा रहे थे, को सहलाते हुए बोली – पूरे मर्द हो गये हो अंकुश. क्या मजबूत बना लिया तुमने अपने शरीर को? एक औरत को ऐसी ही मजबूत छाती चाहिए अपना सर रखने के लिए. बहुत खुश नसीब होगी वो, जिसे ब्याह कर लाओगे.

मैं – अभी तो ये आपके लिए है और.. और.. इस सब की ज़िम्मेदार मेरी भाभी हैं, उनकी मेहनत और लगन का नतीजा है, जो आज मैं हूँ.

चाची – सच में बहुत समझदार और सुशील है हमारी मोहिनी बहू.. भगवान ऐसी बहू सब को दे. ये कह कर चाची ने मेरे सीने को चूम लिया, फिर वो मेरे छोटे-2 निप्पल को चूमने, चाटने लगी. मेरे शरीर में सुरसुरी सी होने लगी और मैंने उनको अलग करके उनके दोनों खरबूजों को तेज़ मसल दिया. आअहह..अंकुश. एयाया. इतने तेज़ नहीं रजीईई. हान्ं.प्यार से सहलाते रहो. उफफफफ्फ़.. सीईईईई.ऊहह. वो अपनी कमर को मेरे लंड के चारों ओर घूमने लगी. उनकी पीठ पर हाथ ले जाकर मैंने उनकी ब्रा को निकाल दिया... आअहह. क्या मस्त खरबूजे थे चाची के. एकदम गोल-मटोल. बड़े-बड़े, लेकिन सुडौल. जिनपर एक-एक काले अंगूर के दाने जैसे ब्राउन कलर के निप्पल जो अब खड़े होकर 1” बड़े हो चुके थे.

मैंने उन दोनों को अपनी उंगली और अंगूठे में दबाकर मसल दिया.. चाची अपने पंजों पर खड़ी हो गयि. और एक लंबी से अह्ह्ह्ह.. उनके मुँह से निकल गयी. अब मैंने उनकी चुचियों को चूसना, चाटना शुरू कर दिया था, और एक हाथ से मसलने लगा. चाची मादक सिसकियाँ लेते हुए. कुछ ना कुछ बड़बड़ा रही थी. चूस-चूस कर, मसल-मसल कर मैंने उनके दोनों कबूतरों को लाल कर दिया. जब मैंने एक हाथ उनकी छोटी सी पैंटी के ऊपर रखा तो वो पूरी तरह कामरस से तर को चुकी थी. मैं उनके पेट को चूमते हुए उनकी जांघों के बीच बैठ गया. एक बार पैंटी के ऊपर से उसकी चूत को सहला कर किस कर लिया.

चाची - हइई..अंकुश.. ये क्या करते हो. भला वहाँ भी कोई मुँह लगाता है.

मैंने झिड़कते हुए कहा. आपको मज़ा आ रहा है ना. तो उन्होंने हां में मंडी हिला दी.



मैंने फिर कहा – तो बस चुप चाप मज़ा लीजिए. मुझे कहाँ क्या करना है वो मुझे करने दीजिए. चाची सहम कर चुप हो गयी.. और आने वाले मज़े की कल्पना में खोने लगी. मैंने उनकी उस 4 अंगुल चौड़ी पट्टी वाली पैंटी को भी उतार दिया. उनकी झांटो के बालों को अपनी मुट्ठी में लेकर हल्के से खींच दिया.

चाची - हइई. अंकुश. खींच क्यों रहे हो.?

मैंने कहा – तो ये जंगल साफ क्यों नहीं किया..?

चाची –अंकुश. बस आज माफ कर दो, आज के बाद ये कभी तुम्हें नहीं दिखेंगे.

मैं उनकी चूत चाटना चाहता था, लेकिन झांटो की वजह से मन नहीं किया.. और अपनी उंगलियों से ही उसके साथ थोड़ी देर खेला. उनकी चूत लगातार रस छोड़ रही थी, जिसकी वजह से उनकी झांटे और जाँघें चिपचिपा रही थी.

चाची – और मत तडपाओ अंकुश. नहीं तो मेरी जान निकल जाएगी. चाची मिन्नत सी करते हुए बोली तो मैंने उन्हें पलंग पर लिटा दिया, और अपना लोवर निकाल कर, लंड को सहलाते हुए उनकी जांघों के बीच आ गया.

चाची अपनी टाँगों को मोड़े हुए जाँघें फैलाकर लेटी थी. मेरे लौड़ा जैसे 8” लंबे और सोते जैसे लंड को देखकर उन्होंने झुरझुरी सी ली और बोली – अंकुश आराम से करना.. तुम्हारा हथियार बहुत बड़ा है.

मैं – क्यों ऐसा पहले नहीं लिया क्या..?

चाची – लेने की बात करते हो अंकुश. मैंने तो देखा भी नहीं है अब तक ऐसा. मेरी इसमें अभी तक तुम्हारे चाचा की लंड या फिर मेरी उंगलियों के अलावा और कुछ गया ही नहीं है.

मैंने चाची की झांटो को इधर-उधर करके, उनकी चूत को खोला, सच में उनका छेद अभी तक बहुत छोटा सा था. मैंने एक बार उनकी चूत के लाल-लाल अंदर हिस्से को चाटा. चाची की कमर लहराई. और मुँह से आससीईईईईईईई. जैसी आवाज़ निकल गयी. अपने लंड पर थोड़ा सा थूक लगाकर मैंने सुपाड़ा चाची के छेद में फिट किया और एक हल्का सा झटका अपनी कमर में लगा दिया.

चाची - आहह. धीरीए.. सीईईईईईई.. बहुत मोटा है तुम्हारा लंड अंकुश… आधा भी नहीं गया कि चाची कराहने लगी थी.

मैंने उनके होंठों को चूमते हुए कहा - बहुत कसी हुई चूत है चाची तेरी.. मेरे लंड को अंदर जाने ही नहीं दे रही. मेरे मुँह से ऐसे शब्द सुनकर चाची मेरे मुँह को देखने लगी.

मैंने कहा - खुलकर बोलने में ही ज़्यादा मज़ा है.. आप भी बोलो. मैंने फिर एक और धक्का मार दिया और मेरा 3/4 लंड उनकी कसी हुई चूत में चला गया, चाची एक बार फिर कराहने लगी. मैंने धीरे-2 लंड को अंदर बाहर किया.

चाची की चूत लगातार पानी छोड़ रही थी.. मैंने धक्के तेज कर दिए. चाची आह..ससिईहह.. करके मज़े लेने लगी, और कमर उठा-2 कर चुदाई का लुफ्त लूटने लगी, हमें पता ही नहीं चला कब लंड पूरा का पूरा अंदर चला गया.

मैं - आअहह.चाची क्या चूत है.. तेरी.. बहुत पानी छोड़ रही है.

चाची - ओह्ह्ह.. मेरे चोदु राजा. तेरा लौड़ा भी तो कितनी तेज़ कुटाई कर रहा है मेरी ओखली में. पानी ना दे बेचारी तो और क्या करेगी. अब चाची भी खुलकर मज़े ले रही थी और मनचाहे शब्द बोल रही थी. मेरे मोटे डंडे की मार उनकी चूत ज़्यादा देर नहीं झेल पाई और जल्दी ही पानी फेंकने लगी. चाची एक बार झड़ चुकी थी, मैं उनकी बगल में लेट गया और उनको अपने ऊपर खींच लिया. चाची मेरे ऊपर आकर मेरे होंठ चूसने लगी, मैंने उनकी चुचियों को मसलते हुए कहा. चाची मेरे लंड को अपनी चूत में लो ना.

चाची – अह्ह्ह्ह.. थोड़ा तो सबर करो. मेरे सोना.. फिर उन्होंने अपना एक हाथ नीचे ले जा कर मेरे लंड को मुट्ठी में जकड़कर उसे अपनी गीली चूत के होंठों पर रगड़ने लगी, जिससे वो फिर से गरम होने लगी. मेरे सुपाड़े को चूत के मुँह से सटा कर धीरे-2 वो उसके ऊपर बैठने लगी. जैसे-जैसे लंड अंदर होता जा रहा था. साथ-साथ चाची का मुँह भी खुलता जा रहा था, साथ में कराह भी, आँखें मूंद गयी थी उनकी.

पूरा लंड अंदर लेने के बाद वो हाँफने सी लगी और बोली - हाईए. राम.. अंकुश. कितना बड़ा लंड है तुम्हारा. मेरी बच्चेदानी के अंदर ही घुस गया ये तो.. और अपने पेडू पर हाथ रख कर बोली - उफफफफ्फ़. देखो. मेरे पेट तक चला गया. फिर धीरे-2 से वो उसपर उठने बैठने लगी. हइई. अब तक ये मुझे क्यों नहीं मिला. अब मैं माँ बनूँगी. इसी लौड़ा से. उउफफफ्फ़.. मेरे सोने राजा. मेरे अंकुश.. के बीज़ से.
 

aidenabhishek

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UPDATE 12

ऐसे ही अनाप-शनाप बकती हुई चाची, लग रहा था अपना आपा ही खो चुकी थी. मैंने भी अब कमान अपने हाथ में ले ली और उनके धक्कों की ताल मिलाते हुए नीचे से धक्के लगाने लगा. कमरे में ठप-ठप की आवाज़ें गूँज रही थी. दोनों ही पसीने से तरबतर हो चुके थे.

फिर जैसे ही मुझे लगा कि अब मेरा छूटने वाला है. मैंने झपट कर चाची को फिर से नीचे लिया, और 20-25 तूफ़ानी धक्के लगा कर उनकी चूत को अपने माल से भर दिया...!

15 मिनिट के बाद चाची मेरे बगल से उठी और अपने कपड़े समेटने लगी. मैंने उनका हाथ पकड़ कर कहा – ये क्या कर रही हो चाची?

चाची – अरे फ्रेश तो होने दो. फिर चाय बना के लाती हूँ. और साथ में कुछ नाश्ता भी कर लेंगे.

मैं – ऐसे ही जाओ, जहाँ जाना है.

चाची अपने मुँह पर हाथ रखकर बोली – हाय अंकुश तुम तो बड़े बेशर्म हो, और मुझे भी बेशर्म बनाए दे रहे हो. अब ऐसे नंगी-पुंगी बाहर कैसे जा सकती हूँ? किसी ने ऊपर से देख लिया तो?

मैं – तो एक चादर ओढ़ लो बस हँसते हुए उन्होंने अपने शरीर पर एक चादर डाल ली और बाहर निकल गयी.

बाथरूम तो जैसे मैंने पहले ही कहा है. ओपन ही था, तो उसी में बैठकर वो मूतने लगी, और बैठे-2 ही अपनी चूत साफ करके किचन में घुस गयी. उन्होंने चाय बनाने के लिए गैस चूल्हे पर रख दी, अभी वो उसमें चाय-चीनी डाल ही रही थी, कि मैंने पीछे से जाकर उन्हें जकड लिया. मैं एकदम नंगा ही था अब तक. मैंने उनकी चादर हटाकर एक तरफ रख दी, और अपना कड़क लंड उनकी मोटी लेकिन मस्त उभरी हुई गान्ड की दरार में फँसा दिया और अपनी कमर चलाने लगा. मेरा लंड उनकी गान्ड के छेद से लेकर चूत के मुँह तक सरकने लगा आहह..सीईईईईईईईईईईईईईईईई...अंकुशआाआ. रुकूऊ.चाय तो बनाने दो. सच में बहुत बेसबरे हो तुम. मैंने बिना कोई जवाब दिए चाची को पलटा लिया और किचन के स्लैब से सटा कर उनके होंठ चूसने लगा.

चाय जल जाएगी मेरे सोनााआ.आआईयईई..नहियिइ..रकूओ.प्लेआस् उनकी चुचि को दाँतों से काटते हुए मैंने हाथ लंबा करके गैस बंद कर दी. मैंने अपने हाथ की दो उंगलियाँ उनकी चूत में घुसा दी और अंदर बाहर करते हुए चुचियों को चूसने मसलने लगा. ओह्ह्ह्ह.उफ़फ्फ़. बहुत बेसबरे हो मेरे सोनाआ.सीईईई.आअहह.आययीईई.

तुम्हारी चुचियों को देखकर किस को सबर होगा चाची. क्या मस्त माल हो तुम. उनके होंठ चबाते हुए मैंने कहा- चाचा भोसड़ी का चूतिया है. जो इतने मस्त माल को भी नहीं चोदता.

चाची - उस चूतिया का नाम लेकर मज़ा खराब मत करो अंकुश .सीईईईई..चाची अपने खुश्क हो चुके होंठों पर जीभ से तर करते हुए बोली.

फिर मैंने चाची की एक जाँघ के नीचे से हाथ फँसा कर उठा लिया और अपना लंड उनकी गीली चूत में खड़े-2 पेल दिया.

चाची - अहह...मैय्आआआआ.मारगाई...भोसड़ी के धीरीईई..नहियीईईईईई.डाल सकताआआआअ.. आआआआआअ.. धीरे…

चाची का एक पैर ज़मीन पर था, एक हाथ स्लैब पर टिका लिया था और दूसरा हाथ मेरे गले में लपेट लिया. हुमच-हुमच कर धक्के लगाने से चाची का बैलेंस बिगड़ने लगा. मैंने दूसरी टाँग को भी उठा लिया, अब चाची हवा में मेरी कमर पर अपने पैरों को लपेटे हुए थी. एक हाथ अभी भी उनका स्लैब पर ही टिका रखा था. इस पोज़ में लंड इतना अंदर तक चला जाता, की चाची हर धक्के पर कराह उठती. एक बार फिर चाची हार गयी. और उनकी चूत पानी फेंकने लगी. मैंने उनको नीचे उतारा और स्लैब पर दोनों हाथ टिका कर घोड़ी बना लिया.

उनकी गान्ड देख कर तो में वैसे ही पागल हो जाता था, सो पेल दिया लंड दम लगा कर उनकी चूत में. एक ही झटके में मेरे टट्टे गान्ड से टकरा गये. मेरे धक्कों से चाची हाई हाई कर उठी. 20 मिनिट के धक्कों ने उनकी कमर चटका दी. आखिर में उनकी ओखली को अपने लंड के पानी से भरकर मैंने चादर से अपना लंड पोंछा और कमरे में चला गया. 10 मिनिट बाद चाची चाय लेकर कमरे में पहुँची. तो मैंने उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया और हम दोनों चाय पीते हुए बातें करने लगे.

चाची - बहुत जबरदस्त चुदाई करते हो अंकुश तुम. सच में मुझे तो तोड़ ही डाला. पूरी तरह.

मैं – मज़ा नहीं आया आपको?

चाची – मज़ा…??? मैंने आज पहली बार जाना है कि चुदाई ऐसी भी होती है. इससे ज़्यादा जिंदगी में और कोई सुख नहीं हो सकता. सच में.

चाय खतम करके चाची बोली – अंकुश, मानो तो एक बात कहूँ?

मैंने उनके होंठों को चूमते हुए कहा. अब इससे बड़ी और क्या बात होगी जिसके लिए मैं ना कर दूं.

चाची – अंकुश अब तुम बड़े हो गये हो. कालेज जाने लगे हो. अब थोड़ा घर के कामों में भी हाथ बटाना चाहिए तुम्हें. जेठ जी और कब तक करेंगे?

मैंने कहा – मैं समझा नहीं चाची? किन कामों की बात कर रही हो. सारा काम तो नौकर ही करते हैं ना.!

चाची – तो क्या हुआ, उनकी देखभाल भी तो करनी होती है. मैं बस यही कहूँगी. कि तुम भी थोड़ा खेतों की देखभाल करो. जिससे तुम्हें कुछ चीज़ों का पता चले. और आगे चल कर तुम ये सब संभाल सको.

मैंने कहा – ठीक है चाची मैं आपकी बात समझ गया, आज से कोशिश करूँगा. और फिर अपने कपड़े पहन कर उनके पास से चला आया. अभी मैं अपने घर जाने की सोच ही रहा था कि चाची के शब्द याद आ गये “तुम्हें कुछ चीज़ों का पता चले”.!!!

चाची किस बारे में बोली? कुछ तो ऐसा है, जो चाची मुझे समझाना चाहती हैं?

यही सब सोच विचार करता हुआ मैं अपने खेतों की तरफ बढ़ गया. अभी शाम के 4:30 का समय हुआ था. मैं 15 मिनिट में अपने खेतों पर पहुँच गया. जैसा मैंने पहले बताया था, कि हमारे खेतों पर ही ट्यूबवेल है, उसी से चारों परिवारों के खेतों की सिंचाई होती है, जिसका वो बाकी के चाचा लोग कुछ मुआवजा देते हैं. ट्यूबवेल पर हमने दो कमरे बना रखे हैं, जिसमें एक में पंप सेट लगा है, दूसरा उठने बैठने और सोने के लिए है. ज़रूरत की सुविधाएँ उसी कमरे में मौजूद रहती हैं. मैं सीधा अपने ट्यूबवेल पर पहुँचा. कुछ मजदूर खेतों में लगे हुए थे. ट्यूबवेल चल रहा था, मुझे नहीं पता कि इस समय उसका पानी किसके खेतों में जा रहा था. मैं जैसे ही बैठक वाले कमरे के पास पहुँचा. मुझे अंदर से आती हुई कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई दी.

ट्यूबवेल के कमरों की छत ज़्यादा ऊँची नहीं थी, यही कोई दस ग्यारह फीट रही होगी. उस कमरे के पीछे वाली दीवार में एक रोशनदान था, जो छत से करीब दो-ढाई फीट नीचे था. मैंने पीछे जाकर उछलकर उस रोशनदान की जाली पकड़ ली, और अपने हाथों के दम से अपने शरीर को ऊपर उठा लिया. जैसे ही मैंने अंदर का नज़ारा देखा, मेरी आखें चौड़ी हो गयी. जिस बात की मैंने अपने जीवन में कल्पना भी नहीं की थी, वो हक़ीकत बनकर मेरी आँखों के सामने था. मैं ये सीन ज़्यादा देर ना देख सका. सच कहूँ तो देखना भी नहीं चाहता था. लेकिन तभी चाची के शब्द एक बार फिर मेरे कानों में गूंजने लगे. “कुछ चीज़ें हैं जो तुम्हें जाननी चाहिए.”

तो क्या चाची ये सब जानती हैं? या उन्हें शक़ था? अगर ये चीज़ें मुझे जाननी चाहिए. तो जाननी पड़ेगी. उसके लिए मैं किसी ऐसी चीज़ को खोजने लगा जो मुझे उस रोशनदान तक आसानी पहुँचा सके. मेरी नज़र पास में पड़ी एक 4-5 फुट लंबी मोटी सी लकड़ी पर पड़ी. बिना आवाज़ किए मैंने उसे उठा के दीवार के सहारे तिरछा करके टिकाया और उस पर पैर जमा कर फिर से रोशनदान की जाली पकड़ कर खड़ा हो गया.

अंदर बड़ी चाची चंपा एकदम नंगी अपनी टाँगें चौड़ी किए पड़ी थी. ऊपर बाबूजी अपने लौड़ा जैसे लंड जो लगभग मेरे जैसा ही था उससे चंपा चाची के भोसड़े की कुटाई कर रहे थे. उनकी मोटी-मोटी जांघें चाची के चौड़े चुतड़ों पर थपा-थप पड़ रही थी. चुदते हुए चंपा चाची हाय.उऊहह. सस्सिईइ. औरर्र. ज़ॉर्सईए.चोदो.जेठ जी. जैसी आवाज़ें निकाल रही थी.

चंपा – हाय जेठ जी, इस उमर में भी आपमें कितनी ताक़त है. हाय मेरी ओखली कूट-कूट कर खाली कर दी आपने. एक आपका भाई है, जो लंड घुसाते ही टपकने लगता है.

बाबूजी – अरे रानी, ये सब मेरी बहू की सेवा का कमाल है. सच में खाने पीने का बहुत ख्याल रखती है मोहिनी बहू. कुछ देर बाद वो दोनों फारिग हो गये. बाबूजी चाची के बगल में पड़े हाँफ रहे थे.

चाची उनके नरम पड़ चुके लंड को अपने पेटीकोट से साफ करते हुए बोली - जेठ जी मेरे नीलू को एक छोटी-मोटी बाइक ही दिलवा दीजिए. छोटू के पास बुलेट देखकर उसे भी मन करने लगा है.

बाबूजी – अभी पिछले महीने ही मैंने तुम्हें इतने पैसे दिए थे वो कहाँ गये? अब फिलहाल तो मेरे पास इतने पैसे नहीं है. और रही बात छोटू की, तो उसे कृष्णा ने दिलाई है गाड़ी.

चाची – अरे जेठ जी, मैं कोई ये थोड़े ना कह रही हूँ, कि उसे इतनी बड़ी गाड़ी ही दिलाओ. कोई छोटी-मोटी भी चलेगी.

बाबूजी – ठीक है. रात को आना. सोच के जवाब देता हूँ. कहकर उन्होंने उसकी बड़ी-2 बूब्स मसल दी.

तभी मुझे बड़े चाचा अपने खेतों की तरफ से आते हुए दिखाई दिए. मैं फौरन नीचे आकर छिप गया. जब वो भी उसी कमरे में घुस गये. तो मैं वहाँ से घर की ओर निकल लिया. अपनी सोच में डूबा हुआ मैं, पता नहीं कब घर पहुँच गया.

भाभी ने मुझे देखा. आवाज़ भी दी. लेकिन मैं अपनी धुन में सीधा अपने कमरे में चला गया. और धड़ाम से चारपाई पर गिर पड़ा. कुछ देर बाद भाभी मेरे कमरे में आईं, मुझे अपने ख़यालों में उलझे हुए पाकर वो मेरे सिरहाने पैर लटका कर बैठ गयी. और मेरे सर पर हाथ फिराया. मैंने उनकी तरफ देखकर अपना सर उनकी जाँघ पर रख दिया.

वो मेरे बालों में उंगलियाँ घुमाते हुए बोली – मेरा प्यारा बाबू कुछ परेशान लग रहा है. क्या हुआ है? मुझे नहीं बताओगे?

मैं – आपके अलावा मेरा और है ही कौन जिससे मैं अपने मन की बात कर सकूँ?

भाभी – तो बताओ मुझे हुआ क्या है. जिसकी वजह से मेरा लाड़ला देवर इतना परेशान है?

मैंने भाभी को ट्यूबवेल पर देखी हुई सारी घटना बता दी. भाभी कुछ देर सन्नाटे की स्थिति में बैठी रही.

फिर बोली – तो तुमने चाचा के आने के बाद की बातें नहीं सुनी.

मैं – नहीं मैं तो ये देख कर हैरान था, कि जब चाची ने चाचा के लिए गेट खोला था, तब भी वो आधे से ज़्यादा नंगी ही थी, सिर्फ़ पेटीकोट को अपने दूधों तक चढ़ाया हुआ था.

भाभी – हम्म… इसका मतलब. चाचा-चाची मिलकर बाबूजी को लूट रहे हैं. अब तो जल्दी ही कुछ करना पड़ेगा.

मैं – अब आप क्या करने वाली हैं भाभी? मुझे तो बड़ा डर लग रहा है.

भाभी मेरे बालों को सहलाते हुए बोली – अभी तो मुझे भी नहीं पता कि मैं क्या करूँगी? पर तुम बेफिक्र रहो. तुम्हारी भाभी सब ठीक कर देगी.

मैं – मुझे आप पर पूरा भरोसा है.

फिर भाभी ने झुक कर मेरे गाल पर चूमा और बोली – ये सब छोड़ो. ये बताओ आज छोटी चाची के यहाँ सारा दिन क्या किया?

मैंने शर्म से अपना मुँह उनकी साड़ी के पल्लू में छिपा लिया.

तो उन्होंने मेरे दोनों बगलों पर गुदगुदी करते हुए कहा - ओय-होय. मेरे शर्मीले राजा, इसका मतलब चाची अब जल्दी ही माँ बनने वाली हैं. बोलो?

मैंने हँसते हुए कहा. पता नहीं. हो भी सकता है.

भाभी – हो नहीं सकता. होगा ही. मुझे अपने देवर पर पूरा भरोसा है.

मैं – पर भाभी ! सच में चाची में ही कोई कमी हुई तो?

भाभी – तुम्हें लगता है. चाची जैसी भरपूर जवान औरत में कोई कमी होगी? मुझे 110% यकीन है. एक महीने के अंदर ही कोई अच्छी खबर सुनने को मिलेगी. देख लेना तुम.

मैं – भगवान करे. चाची माँ बन जाएँ. इससे बड़ी खुशी मेरे लिए और क्या होगी.

भाभी हँसते हुए बोली. और अपने बाप बनने की भी. है ना??

इस बात पर हम दोनों ही बहुत देर तक हँसते रहे. जिसे रमा दीदी सुनकर हमारे पास आई और पूछने लगी.

रमा दीदी - क्या बात है. देवर भाभी इतने खुश क्यों हो रहे हैं?

तो भाभी ने उसे गोल-मोल जवाब देकर टरका दिया. और फिर वो उठकर खाने पीने के इंतजाम में लग गयी. रात 8 बजे हम सभी एक साथ खाना खा रहे थे. भाभी ने हम तीनों को खाना परोसा और वो भी एक खाली चेयर लेकर हमारे पास ही बैठ गयी. बाबूजी के कहने पर ही अब उन्होंने उनसे परदा करना छोड़ दिया था, बस सर पर पल्लू ज़रूर डाल लेती थी. क्योंकि बाबूजी उन्हें अपनी बेटी ही मानते थे. हमारा खाना खतम होने ही वाला था, तभी भाभी ने बातों का सिलसिला शुरू किया.

भाभी – बाबूजी, आपसे एक बात करनी थी.

बाबूजी – हां कहो मोहिनी बेटा. क्या बात करनी है??

भाभी – रुचि के पापा कह रहे थे, शहर में कोई ज़मीन देखी है इन्होंने, अच्छे मौके की ज़मीन है. बड़े देवर जी से भी बात की थी उन्होंने, तो उस ज़मीन के लिए उन्होंने भी हां बोल दिया है. वो दोनों भी कुछ पैसों का इंतजाम कर सकते हैं. लेकिन ज़मीन ज़्यादा है, उनका विचार है कि मिलकर तीनों भाइयों के नाम से ले ली जाए. अगर बाबूजी कुछ मदद कर दें तो?

बाबूजी कुछ देर चुप रहे फिर कुछ देर सोच कर बोले – राम का विचार तो उत्तम है. पर सच कहूँ तो बेटा. अभी मेरे पास कुछ भी नहीं है.

भाभी चौंकने की एक्टिंग करते हुए बोली – ऐसा कैसे हो सकता है बाबूजी? माना कि, सालों पहले जब वो दोनों भाई पढ़ते थे, तब खर्चे भी ज़्यादा थे. लेकिन दो-तीन सालों से तो कोई ऐसा खर्चा भी नहीं रहा, ऊपर से दोनों भाई जब भी आते हैं, कुछ ना कुछ देकर ही जाते हैं. आपकी तनख़्वाह, खेतों की आमदनी. ये सब मिलाकर काफ़ी बचत हो जाती होगी. मैं तो समझ रही थी कि आपके पास ही इतना तो पैसा होगा कि उनको कुछ करने की ज़रूरत ही ना पड़े.

बाबूजी थोड़े तल्ख लहजे में बोले – तो अब तुम मुझसे हिसाब-किताब माँग रही हो बहू?

भाभी – नहीं बाबूजी! आप ग़लत समझ रहे हैं. मैं भला आपसे कैसे हिसाब माँग सकती हूँ? मैं तो बस कह रही थी, कि कुछ समय पहले आप अकेले ही कमाने वाले थे और खर्चे पहाड़ से ऊँचे थे, फिर भी आपने किसी बात की कोई कमी नहीं होने दी किसी को भी. पर अब तो इतने खर्चे भी नहीं रहे ऊपर से आमदनी भी बढ़ी है. तो स्वाभाविक है कि बचत तो ज़्यादा होनी ही चाहिए.

बाबूजी – मैं ये सब तुम्हें बताना ज़रूरी नहीं समझता कि पैसों का क्या और कैसे खर्च करता हूँ?

भाभी – अगर मेरी जगह माजी होती, और यही बात उन्होंने पूछी होती तो? तो क्या उनके लिए भी आपका यही जवाब होता?

भाभी की बात सुन कर बाबूजी विचलित से हो गये. जब कुछ देर वो नहीं बोले, तो भाभी ने फिर पूछा – बताइए बाबूजी. क्या माजी को भी यही जवाब देते आप?

बाबूजी – उसको ये हक़ था पूछने का, वो इस घर की मालकिन थी.

भाभी – क्यों? उनके गुजर जाने के बाद मुझसे इस घर को संभालने में कोई कमी नज़र आई आपको? क्या उनके बाद इस घर की ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पाई मैं? ये बोलते-2 भाभी की आँखों में आँसू आ गये.

फिर सुबकते हुए बोली - ठीक है बाबूजी. जब मेरा कोई हक़ ही नहीं है कुछ सवाल करने का, तो मेरा इस घर में रहने का भी कोई मतलब नहीं है. इस बार जब रुचि के पापा यहाँ आएंगे, मैं भी उनके साथ ही चली जाऊंगी. बाबूजी भाभी की ओर देखते ही रह गये.

अभी वो कुछ बोलते उससे पहले मैं बोल पड़ा. ठीक है भाभी, जहाँ आप रहेंगी वहीं मैं रहूँगा. मैं यहाँ किसके भरोसे रहूँगा. मैं भी आपके साथ चलूँगा. अभी और भी अटैक बाबूजी के ऊपर होने बाकी थे.

मेरे चुप होते ही रमा दीदी भी बोल पड़ी – मैं भी आपके साथ ही चलूंगी भाभी, मैं यहाँ अकेली क्या करूँगी?

बाबूजी की कराह निकल गयी, वो बोले – मुझे माफ़ कर दे बहू. मैं भूल गया था, कि बिना औरत के घर, घर नहीं होता. तुमने तो इस घर को विमला से भी अच्छी तरह से संभाला है. इसलिए तुम्हें हर बात जानने का पूरा हक़ भी है. पर… बोलते-2 वो कुछ रुक गये. लेकिन अब जवाब तो देना ही था सो बोले – अभी मैंने वो पैसा कुछ इधर-उधर खर्च कर दिए है. लेकिन अब मैं तुमसे वादा करता हूँ, आज के बाद इस घर के सारे पैसों का हिसाब किताब तुम रखोगी. बहू मैं तुम्हारे आगे हाथ फैलाकर भीख माँगता हूँ, जिस तरह से तुमने अब तक इस घर को संभाला है, आगे भी संभालो. इस घर को बिखरने से बचा लो बेटा. बाबूजी की आँखें भर आईं, अपने आँसुओं को रोकने का प्रयास करते हुए वो उठकर बाहर चले गये. भाभी के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान तैर रही थी.

हमारी चौपाल पर ही एक बड़ा सा हॉलनुमा कमरा बैठक के लिए है, जो घर के बाहर मेन गेट के बराबर में है. घर से उसका कोई डाइरेक्ट लिंक नहीं है, और ना ही उसका घर से कोई रास्ता. बैठक की पीछे की दीवार से लगी सीडीयाँ हैं, जो ऊपर को जाती हैं, बैठक की दीवार में एक छोटा सा रोशनदान है जो जीने में खुलता है.

मैं जल्दी से खाना ख़ाके सोने का बहाना करके अपने कमरे में चला गया. भाभी ने भी काम जल्दी से निपटाया और सोने चली गयी, जिसकी वजह से अब दीदी को भी वहाँ बैठे रहने का कोई मतलब नहीं बनता था. कोई दस बजे में जीने पर दबे पाँव चढ़ा, तब तक बैठक में पूर्ण शांति थी, वहाँ बाबूजी अकेले चारपाई पर लेटे हुए कमरे की छत को घूर रहे थे. उनकी आँखों में पश्चाताप के भाव साफ दिखाई दे रहे थे. अभी आधा घंटा ही हुआ होगा कि दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आई. बाबूजी ने उठकर दरवाजा खोल दिया.

आशा के मुताबिक, सामने चंपा चाची हाथ में दूध का ग्लास लिए खड़ी थी. बाबूजी, बिना कुछ कहे वापस अपने बिस्तर पर आकर बैठ गये. चंपा चाची ने दूध का ग्लास पास में पड़ी एक टेबल पर रख दिया और वापस जाकर दरवाजा बंद करने चली गयी.

इतने में मुझे अपने कंधे पर किसी के हाथ का आभास हुआ, देखा तो भाभी मेरे बगल में खड़ी थी. हम दोनों अब बेसब्री से अंदर होने वाले सीन के इंतजार में थे. चंपा चाची बाबूजी के बगल में आकर बैठ गयी. और बोली – आप लेट जाइए जेठ जी. मैं आपके पैर दबा देती हूँ.

बाबूजी – रहने दो चंपा, मैं ऐसे ही ठीक हूँ., फिर भी वो बैठे-2 ही उनकी जाँघ को दबाने लगी. बाबूजी ने उसकी ओर मुड़कर भी नहीं देखा.

चंपा – आप कुछ जवाब देने वाले थे, नीलू की बाइक के लिए. ?

बाबूजी ने झटके से कहा – क्यों ? नीलू तुम लोगों की ज़िम्मेदारी है. मैं क्यों बाइक दिलाऊँ उसको?

चंपा आश्चर्य से उनकी शक्ल देखने लगी. फिर कुछ देर बाद वो बोली – ये आप आज कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं जेठ जी.

बाबूजी – क्यों, इसमें क्या बहकी–2 बातें लगी तुम्हें? वो तुम्हारा बेटा है, उसकी ज़रूरतें तुम लोग पूरा करो.

चंपा – दोपहर को आपने कहा था, कि रात को जवाब दूँगा. फिर अब क्या हुआ?

बाबूजी – तो अब ना बोल दिया. बात खतम.

चंपा – ऐसे कैसे बात खतम., भूल गये वो दिन. जब जेठानी जी की मौत के बाद कैसे गुमसुम से हो गये थे आप, मैंने आपको वो सब सुख दिए जो आप पाना चाहते थे.

बाबूजी – तुमने भी तो मुझे दो साल में खूब लूट लिया. अब और नहीं. मेरे भी बच्चे हैं. वो भी पूछ सकते हैं कि मैं आमदनी का क्या कर रहा हूँ?

चंपा – ये आप ठीक नहीं कर रहे. जानते हैं मैं आपको बदनाम कर सकती हूँ, कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे आप.

बाबूजी गुस्से में आते हुए बोले – अच्छा, तू मुझे बदनाम करेगी हरामजादी, साली छिनाल, तू खुद अपनी चूत की खुजली मिटवाने आती है मेरे लौडे से. तू क्या बदनाम करेगी मुझे? ठहर, मैं ही खोलता हूँ दरवाजा और लोगों को इकट्ठा करके बताता हूँ, कि ये यहाँ क्यों आई है? इससे पहले कि मैं तेरी गान्ड पे लात लगाऊँ, दफ़ा हो जा यहाँ से. ट्यूबवेल का पानी फ्री देता हूँ तुम लोगों को, बाग का अपना हिस्सा भी नहीं लेता, उससे तुम्हारा पेट नहीं भरा. पता नहीं मेरे ऊपर क्या जादू टोना कर दिया तुमने, कि दो साल से मेरी सारी कमाई अपने भोसड़े में खा गयी. चंपा ने ये सपने में भी नहीं सोचा था, वो तो यहाँ और खून चूसने के इरादे से आई थी, लेकिन यहाँ तो उलटे बाँस बरेली लद गये. फिर भी उसने आखिरी कोशिश की.

उठ कर दूध का ग्लास ले आई और बोली - ठीक है जेठ जी. मैं आपसे अब आगे कुछ नहीं माँगूंगी. प्लीज आप नाराज़ मत होइए. लीजिए दूध पी लीजिए, मैं आपके लिए बादाम वाला दूध लाई थी.

बाबूजी – नहीं पीना तेरा ये जहर. क्या पता इसी से कोई टोना करती हो तू मेरे उपर?

चंपा – कैसी बातें कर रहे हैं आप? मैं भला आपके ऊपर टोना-टोटका क्यों करूँगी. आप तो मेरे अपने हैं.

बाबूजी – ऐसा है तो तू ही पी इसे मेरे सामने. और दफ़ा हो जा यहाँ से.

जब कुछ देर उसने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने वो ग्लास उसके हाथ से छीन लिया और जबरदस्ती उसे पिला दिया. खाली ग्लास उसके हाथ में थमा कर उसे गेट से बाहर धक्का दे दिया और दरवाजा बंद करके अपने बिस्तर पर बैठ गये. अपने सर को दोनों हाथों के बीच लेकर वो कुछ देर सोचते रहे. फिर भर्राई आवाज़ में बोले – मुझे माफ़ कर देना विमला. मैं तेरे बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पाया. शायद भाभी की बातों ने उन्हें अपने कर्तव्य से भटकने से बचा लिया था. पश्चाताप की आग में जलते हुए उन्होंने अपने सर को दोनों हाथों में लेकर आँसू बहाते रहे. हम दोनों की आँखें भी भीग गयी. कुछ देर बाद वो बिस्तर पर लेट गये. फिर उन्हें उसी अवस्था में छोड़ कर हम दोनों भी वहाँ से उठकर सोने चले गये. मैंने खेतों की देखभाल में बाबूजी का हाथ बटाना शुरू कर दिया था, उनकी हक़ीकत मेरे और भाभी के अलावा, हमने किसी और को पता नहीं चलने दी थी. अब मैं बाबूजी के लिए चिंतित रहने लगा.6 साल से विधुर का जीवन व्यतीत कर रहे आदमी के शरीर की ज़रूरतें उसे भटकने पर मजबूर कर ही सकती हैं. जब मैंने अपने आपको उनकी जगह रख कर देखा तो मुझे लगा कि बाबूजी ग़लत नहीं थे. लेकिन जिस तरह से चंपा चाची ने उनकी भावनाओं को भड़का कर उनका फ़ायदा उठाया, वो ग़लत था.

क्या मैं बाबूजी के लिए कुछ कर सकता हूँ? मेरे मन में ये विचार कौंधा. लेकिन क्या? ज़्यादा सोचने पर मुझे एक विचार सूझा. लेकिन उसे समय पर छोड़ कर अपने काम में लग गया. इधर मेरे और छोटी चाची के बीच दिन में कम से कम एक बार खाट-कबड्डी ज़रूर ही हो जाती थी, वो दिनों-दिन खुलती ही जा रही थी मेरे साथ. ऐसे ही एक दिन जब हम चुदाई कर रहे थे, चाची को मैं एक बार टाँगें चौड़ा कर गान्ड के नीचे डबल तकिये रख कर जबरदस्त तरीके से चोद कर झड़ चुका था. फिर कुछ देर बाद वो मेरे ऊपर आकर खुद से गान्ड पटक-पटक कर चुदने लगी. मैंने उनकी मस्त गान्ड को मसलते हुए कहा.

मैं – अच्छा चाची ! मान लो आप प्रेग्नेंट हो गयी तो मुझे क्या दोगी?

चाची – अगर मगर की तो अब कोई गुंजाइश ही नहीं रही अंकुश. मुझे तो पक्का यकीन है कि मैं माँ बन ही गयी हूँ. अब तुम बताओ, तुम्हें क्या चाहिए? ये जान तो अपने बच्चे के लिए जीनी है मुझे. उसके अलावा जो मेरे बस में होगा वो सब तुम्हारा.

मैं – ठीक है. समय आने पर माँग लूँगा. और हां वो देना आपके बस में होगा. ये मैं अभी से कह सकता हूँ.

चाची – मैं उस दिन का इंतजार करूँगी. अपने होनेवाले बच्चे के बाप को अगर मैं कुछ खुशी दे पाई, तो वो मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी होगी.

अगले महीने रश्मि चाची को पीरियड नहीं आए, जब ये बात उन्होंने मुझे बताई. तो पता नहीं मुझे अंदर से एक अनजानी सी खुशी महसूस हुई. दो दिन बाद उन्हें उल्टियाँ शुरू हो गयी, चाचा मेरे साथ उन्हें डॉक्टर के यहाँ दिखाने ले गये, तो ये बात कन्फर्म भी हो गयी की वो माँ बनने वाली हैं. चाचा की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा. इधर चाची ने मुझे धन्यवाद के तौर पर एक पूरी रात ही सौंप दी थी, मनमाने ढंग से मज़ा लूटने के लिए. हम तीन लोगों के अलावा और किसी को पता नहीं था. कि ये खुशी उनके जीवन में आई कैसे.

सभी बहुत खुश थे उनके लिए. मझले चाचा और चाची कुछ चिढ़ते थे हम लोगों से, उसका कारण भी बाबूजी की बड़े चाचा से नजदीकियाँ ही थी. क्योंकि अपने हिस्से के बाग की आमदनी और ट्यूबवेल का फ्री पानी जो आमतौर पर सब को पता ही था, बाबूजी उनको देते हैं. जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उनके खर्चे ज़्यादा होने की वजह बताई थी. इस कारण से मझले चाचा और चाची हम लोगों से खफा रहते थे. अब चूँकि, फ़ैसला बाबूजी ने लिया था, तो हम में से कोई उनकी बात का विरोध भी नहीं कर सकता था. खैर ये बात बहुत पुरानी हो चुकी थी, और अब हालत भी बदल गये थे, तो मैंने अब मझले चाचा-चाची से नजदीकियाँ बढ़ाने का फ़ैसला किया.

ऐसे ही एक दिन मैं खेतों पर घूमता फिरता उनके हिस्से के खेतों की तरफ बढ़ गया. शाम का वक़्त था, चाचा के साथ चाची भी बैठी हुई मिल गयी. मंझली चाची थोड़ा दुबली-पतली सी हैं, ऐसा नहीं है की वो शारीरिक तौर पर कमजोर हैं, उनके चुचे तो 34डी साइज़ के हैं, और कूल्हे भी थोड़े उभार लिए हैं. लेकिन कमर बहुत ही पतली सी है. और शायद ये उनके चाचा के साथ खेतों में ज़्यादा मेहनत करने की वजह से होगा. थोड़ा पैसों की तंगी की वजह से ही वो अपने बच्चों को अपने भाई के पास पढ़ाती थी. लेकिन जब मामा के बच्चे भी हो गये, और वो भी पढ़ने लिखने लगे तो मामा का रवैया उनके प्रति रूखा-रूखा सा रहने लगा. अब उनकी पढ़ाई का खर्चा इन्हें ही देना पड़ता था.

मैंने दोनों के पैर छुए, दोनों ने खुश होकर मुझे आशीर्वाद दिया और अपने पास बिठाया. बातों-बातों में मैंने चाची से शिकायती लहजे में कहा.

मैं - क्या चाची आप तो पता नहीं हम लोगों से क्यों नाराज़ रहती हैं, कभी खैर खबर लेने भी घर की तरफ नहीं आती?

चाची – अरे अंकुश, तुम्हें तो सब पता ही है. यहाँ खेतों मैं काम करना पड़ता है, अब हमारे पास इतने पैसे तो हैं नहीं कि मजदूरों से काम करवा सकें. उधर तुम्हारे बाबूजी भी पानी के पैसों में रियायत नहीं करते. उन्हें तो बस चंपा के ही खर्चे दिखाई देते हैं. हमारी परेशानियाँ कहाँ दिखाई देती हैं.

मैं – अभी हाल-फिलहाल में आपने बाबूजी से बात की है क्या?

चाची – नहीं. अभी फिलहाल में तो कोई बात नहीं हुई है. क्यों कुछ नई बात हो गयी है?

मैं – नहीं ऐसी कोई नई बात नहीं हुई. पर मैं चाहता हूँ, आप फिर से उनसे बात कीजिए. मेरा नाम बोल देना. आप से भी शायद पानी के पैसे ना लें.

चाची – क्या ? सच कह रहे हो अंकुश. जेठ जी मान जाएँगे?

मैं – प्यार से सब कुछ हल हो सकता है चाची. आपको तो पता ही है. पिताजी कितने अकेले-2 हो गये हैं. अब जो भी उनसे दो प्यार की बातें करता है वो उसी की मदद कर देते हैं. फिर आप तो अपने ही हैं. आपसे कोई दुश्मनी थोड़े ही है.

मेरी बातों का चाची पर असर हुआ और उनकी बातों से लगने लगा कि वो पिताजी के साथ नजदीकियाँ बढ़ा सकती हैं. फिर मैंने उनसे सोनू, मोनू के बारे में पूछा तो वो थोड़ा दुखी होकर बताने लगी, कि कैसे अब उनके भाई का बर्ताव बदल गया है. सोनू ग्रेजुएशन के पहले साल में ही था, मोनू 12थ में था, तो मैंने कहा कि आप उनको यहीं रख कर क्यों नहीं पढ़ाती,



अब तो हमारा नया कालेज भी खुल गया है. कम से कम सोनू का एडमिशन मेरे साथ ही कर दो. चाहो तो बाबूजी की मदद ले सकती हो. उनको मेरी बात जँची, और दोनों ने फ़ैसला किया कि वो सोनू को यहीं कालेज में पढ़ाएँगे, और मोनू को एक साल वहीं से 12थ करा देते हैं. उनसे बात करने के बाद मैं ट्यूबवेल की तरफ आ गया, खेतों में फिलहाल कोई ऐसा काम नहीं चल रहा था.

बाबूजी मुझे अकेले बैठे मिले, मैं थोड़ी देर उनके पास बैठा, थोड़ा काम धंधे के बारे में समझा. फिर धीरे से मैंने मंझले चाचा चाची से जो बातें हुई, वो कही. उनको भी लगा कि मैं जो कर रहा हूँ वो सही है. घर परिवार में एक जुटता रहे वो अच्छा है. दूसरे दिन मँझले चाचा और चाची दोनों ही बाबूजी से मिले और जो मैंने उन्हें कहा था वो बातें उन्होंने बाबूजी से कही.

तो बाबूजी ने कहा की हां छोटू भी बोल रहा था. मैं भी चाहता हूँ तुम सब खुश हाल रहो. बड़े चाचा चाची बहुत खून चूस चुके थे, सो बाबूजी ने फ़ैसला किया, कि अब उनके साथ कोई रियायत नहीं होगी, और जो फ़ायदा वो उनको दे रहे थे वो अब मँझले चाचा को देंगे. चाचा चाची बड़े खुश हुए, और मेरी बातों पर अमल करते हुए चाची ने बाबूजी से बात चीत करना शुरू कर दिया. चाची अब जब भी घर से खेतों को जाती थी, तो वो बाबूजी के लिए भी कुछ ना कुछ खाने की चीज़ें बना के ले जाती थी. इस तरह से दोनों परिवारों के बीच की कड़वाहट धीरे – 2 खतम होती जा रही थी.

प्रभा चाची ने सोनू को गांव वापस बुलवा लिया था, मैंने उसका एडमिशन अपने कालेज में ही करवा दिया. अब उसका शहर का खर्चा भी बचने लगा, और थोड़ा-2 घर खेतों के काम में भी हाथ बंटने लगा था वो. मेरी कोशिशों ने चाचा चाची की तकलीफ़ों को थोड़ा कम किया था. एक तरह से वो मेरे अहसानमंद थे. एक दिन बाबूजी अकेले दोपहर में ट्यूबवेल के कमरे में खाना खा कर लेटे हुए थे, तभी प्रभा चाची वहाँ आ गयी. दरवाजे पर आहट पाकर उन्होंने अपने बाजू को हटाकर देखा तो प्रभा चाची सर पे पल्लू डाले उसका एक कोना अपने दाँतों में दबाए खड़ी थी.

बाबूजी सिरहाने की ओर खिसकते हुए बोले – आओ-आओ प्रभा. कोई काम था?

प्रभा – नहीं जेठ जी. काम तो कुछ नहीं था, बस चली आई देखने. शायद आपको किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो. पूछ लूँ. इतना बोलकर वो चारपाई के नीचे बैठ गयीं.



बाबूजी – अच्छा किया, तुम आ गई., काम तो कुछ नहीं था, अभी खाना ख़ाके लेटा ही था. अब कोई बोल- बतलाने को तो था नहीं. सो लेट गया, तुम बताओ सब ठीक-ठाक से चल रहा है?

प्रभा – हां आपकी कृपा है, लाइए आपके पैर दबा दूं. ये कहकर वो चारपाई की तरफ सरक कर नीचे से ही उन्होंने बाबूजी की पिंडलियों पर अपने हाथ रख दिए.

बाबूजी ने उनका हाथ पकड़ कर रोकने की कोशिश की, तो वो बोली – लेटे रहिए, बड़ों की सेवा करने से मुझे आशीर्वाद ही मिलेगा. उन्होंने अपना हाथ हटा लिया, और चाची उनके पैर दबाने लगी. चारपाई थोड़ी उँची थी, और चाची ज़मीन पर अपनी गान्ड टिकाए बैठी थी, सो उन्हें हाथ आगे करके पैर दबाने में थोड़ा असुविधा हो रही थी.

तो प्रभा चाची बोली – जेठ जी आप थोड़ा मेरी ओर को आ जाइए, मेरे हाथ अच्छे से पहुँच नहीं पा रहे.

बाबूजी खिसक कर चारपाई के किनारे तक आ गये, अब चाची अच्छे से उनके पैर दबा पा रही थी. हाथ आगे करने से चाची का आँचल उनके सीने से धलक गया, और उनकी बूब्स खाट की पाटी से दबने के कारण ब्लाउज से और बाहर को उभर आई. चौड़े गले के ब्लाउज से उनके खरबूजे एक तिहाई तक दिखने लगे. बाबूजी उनसे बातें करते हुए जब उनकी नज़र चाची की चुचियों पर पड़ी, तो वो उनकी पुष्टता को अनदेखा नहीं कर सके, और उनकी नज़र उनपर ठहर गयी. अब तक उनके मन में कोई ग़लत भावना नहीं थी चाची के लिए, लेकिन उनकी जवानी की झलक पाते ही, उनके 9 इंची हथियार में हलचल शुरू हो गयी और वो उनके पाजामे में सर उठाने लगा.

प्रभा चाची उनके पैर दबाते – 2 जब जांघों की तरफ बढ़ने लगी, तो उनके हाथों के स्पर्श से उन्हें और ज़्यादा उत्तेजना होने लगी, अब उनका लौड़ा पाजामे के अंदर ठुमकाने लगा. चाची की नज़र भी उसपर पड़ चुकी थी, और वो टकटकी गढ़ाए उसे देखने लगी. लौड़ा अपना साइज़ का अनुमान बिना कच्छे के पाजामे से ही दे रहा था.

हाय राम. क्या मस्त हथियार है जेठ जी का. चाची अपने मन में ही सोचकर बुदबुदाते हुए अपनी चूत को मसलने लगी. बाबूजी का लंड निरंतर अपना आकार बढ़ाता जा रहा था, जिसे देख कर चाची की चूत गीली होने लगी. उनकी ये हरकत कहीं उनके जेठ तो नहीं देख रहे, ये जानने के लिए उन्होंने एक बार उनकी तरफ देखा, जो लगातार उनकी चुचियों पर नज़र गढ़ाए हुए थे. बाबूजी को अपने सीने पर नज़र गढ़ाए देख कर उनकी नज़र अपने उभारो पर गयी, और अपनी हालत का अंदाज़ा लगते ही. वो शर्म से पानी-2 हो गयी. अभी वो अपने आँचल को दुरुस्त करने के बारे में सोच ही रही थी, कि फिर ना जाने क्या सोच कर वो रुक गयी, और उसके उलट अपने शरीर को उन्होंने और आगे को करते हुए अपना आँचल पूरा गिरा दिया. उनके आगे को झुकने से उनकी बूब्स और ज़्यादा बाहर को निकल पड़ने को हो गयी. लेकिन उन्होंने शो ऐसा किया जैसे उन्हें इस बारे में कुछ पता ही ना हो. उनके हाथ अब ऊपर और ऊपर बढ़ते जा रहे थे और एक समय ऐसा आया कि उनका हाथ बाबूजी के झूमते हुए लंड से टकरा गया.

चाची का हाथ अपने लंड से टच होते ही बाबूजी के शरीर में करंट सा दौड़ गया. उन्होंने सोने का नाटक करते हुए अपना एक हाथ चाची की चुचियों से सटा दिया. अब झटका लगने की बारी चाची की थी, उन्होंने बाबूजी की तरफ देखा, तो वो अपनी आँखें बंद किए पड़े थे, फिर उनके हाथ को देखा, जो उनकी चुचियों से सटा हुआ था. उन्होंने धीरे से उनके हाथ को अपनी चुचियों पर रख दिया, और उनके लंड को आहिस्ता-2 सहलाने लगी. बाबूजी आँखें बंद किए हुए, आनंद सागर में डूबते जा रहे थे. चाची अपनी चूत को अपने पैर की एड़ी से मसल रही थी.

बाबूजी अपनी आँखें बंद किए हुए ही बोले – प्रभा, तुम भी चारपाई पर ही बैठ जाओ, तुम्हें परेशानी हो रही होगी. नीचे से हाथ लंबे किए हुए. बाबूजी की आवाज़ सुनते ही चाची झेंप गयी, उन्होंने बाबूजी का हाथ अपनी चुचियों से हटा कर चारपाई पर रख दिया, और उठ कर खड़ी हो गयी.
 

aidenabhishek

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UPDATE 13

पापा ने अपनी आँखें खोल कर चाची की ओर देखा और बोले – जा रही हो?

चाची ने कोई जवाब नहीं दिया, वो अपने पल्लू को अपने दाँतों से चबाती रही. फिर कुछ सोच कर वो दरवाजे की तरफ बढ़ गयी. पापा ने अपनी आँखें बंद कर ली. चाची ने दरवाजे के पास पहुँच कर बाहर नज़र डाली, फिर धीरे से उसे अंदर से बंद करके कुण्डी लगा दी, और वापस पापा की चारपाई के पास आकर खड़ी रही.

वो अपनी आँखें बंद किए हुए सोने की कोशिश कर रहे थे, उनका लंड भी अब धीरे-2 सोने की कोशिश कर रहा था, कि तभी चाची आहिस्ता से चारपाई पर बैठ गयी. और उन्होंने उनके लंड को कस कर अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया. बेचारा अभी सही से बैठा भी नहीं था, कि फिर से खड़ा होना पड़ा. पापा ने झटके से अपनी आँखें खोल दी. और वो उनकी तरफ देखने लगे.

पापा - क्या हुआ प्रभा. गयी नहीं?

प्रभा चाची उनके लंड की तरफ इशारा करते हुए बोली – आपके इसने मुझे जाने ही नहीं दिया जेठ जी. मुझे अब इसकी ज़रूरत है. देंगे ना?

पापा – तुम्हारी मर्जी, जब इसने तुम्हें रोक ही लिया है. तो फिर ले लो.

इतना सुनते ही प्रभा चाची ने उनका पाजामा खोल दिया, और उसे अपने हाथ में लेकर मुठियाने लगी. वो फिर से फन उठाने लगा. पापा का मस्त तगड़ा लंड देख कर चाची की चूत, जो पहले ही पनिया गयी थी. और ज़ोर से बहने लगी, उन्होंने उसे अपने मुँह में भर लिया. पापा ने भी उनके कड़क मोटे-मोटे चुचों पर कब्जा जमा लिया और लगे मीँजने.

प्रभा - अहह. जेठ जी धीरे मसलो.

कुछ ही देर में कमरे में तूफान सा आ गया, दोनों के कपड़े बदन से अलग होकर एक तरफ को पड़े थे. फिर चाची अपनी पतली सी कमर और मोटी गान्ड लेकर पापा के लंड पर बैठती चली गयी. अपने होंठों को मजबूती से कस कर धीरे–2 वो पूरे 9” के लौड़े को अपनी चूत में घोंट गयी और हाँफते हुए बोली.

प्रभा - हइईई..दैयाआअ.जेठ जी कितना तगड़ा लंड है आपका. अब तक कहाँ छुपा रखा था? हइई.रामम्म.. कितना अंदर तक चला गया

और प्रभा चाची धीरे–2 उसके ऊपर उठक बैठक करने लगी. पापा भी उनकी पतली कमर को अपने हाथों में जकड़ कर नीचे से धक्का मारते हुए बोले.

पापा - अरे प्रभा, ये तो यहीं था मेरे पास, तुम ही अपनी चूत को घूँघट में छुपाये थी. !

प्रभा - ससिईईईईई.आअहह. जेठ जी, अब तक इस पर किसी और का कब्जा था, तो मैं क्या कर्तीईइ.उउउहह..आअहह..

पापा – प्रभा सच में तुम्हारी चूत बड़ी लाजवाब है, मेरा लंड एकदम कस गया है. उस मादरचोद चंपा का तो भोसड़ा बन चुका है. पापा के मोटे तगड़े लौड़े की चुदाई, चाची की चूत ज़्यादा देर तक नहीं झेल पाई और वो अपने मुलायम गोल-2 चुचियों को पापा की बालों भारी चौड़ी छाती से रगड़ती हुई झड़ने लगी. उनके कड़क कंचे जैसे चुचों के घर्षण से पापा भी उत्तेजना की चरम सीमा तक पहुँच गये. एक लंबी सी हुंकार मारते हुए उन्होंने नीचे से चाची को ऊपर उछाल दिया और अपनी मलाई से उनकी चूत को भर दिया.

कुछ देर का रेस्ट लेकर वो दोनों फिर से एक बार जीवन आनंद में लौट गये, और अपनी जिंदगी भर का चुदाई का अनुभव एक दूसरे के साथ अजमाते हुए चुदाई में लीन हो गये. उस दिन के बाद चाची पापा के लंड की दीवानी हो चुकी थी. मौका लगते ही वो उसे अपनी गरम चूत में डलवाकर खूब मस्ती करती. इस तरह से पापा को एक नई चूत का स्वाद मिल गया था, और चाची को नये लंड के साथ–2 कुछ मदद.

उधर बड़े चाचा और चाची जल भुन रहे थे, उनकी मज़े से आ रही कमाई जो बंद हो गयी थी, यही नहीं, आने वाले समय में पानी और बगीचे वाली राहत भी बंद होने वाली थी. लेकिन वो अब तक काफ़ी पैसा पापा से ऐंठ चुके थे, तो हाल फिलहाल उनपर कोई असर पड़ने वाला नहीं था. लेकिन अब चाची का भी ज़्यादातर समय खेतों में ही गुज़रता था.

घर पर आशा दीदी ही देख भाल करती थी. वो और रमा दीदी इस बार ग्रेजुएशन फाइनल ईयर के एग्जाम देने वाली थी. पापा वाली बात उनके बच्चों को पता नहीं थी. नीलू भी ग्रेजुएशन फाइनल में था और वो रेग्युलर शहर में रह कर पढ़ रहा था. एक दिन मुझे कालेज से लौटते वक़्त आशा दीदी घर के बाहर ही मिल गयी, जो शायद हमारे घर से ही आ रही थी, मुझे देखते ही वो चहकते हुए बोली.

आशा – ओए हीरो. कहाँ रहता है आजकल? अब तो तेरे दर्शन ही दुर्लभ हो जाते हैं. थोड़ा बहुत इधर भी नज़रें इनायत कर लिया करो भाई.

मैं – ऐसा कुछ नहीं है दीदी. बस थोड़ा अब मैंने भी घर खेती के काम में हाथ बँटाना शुरू किया है. इसलिए थोड़ा समय कम मिलता है और कोई बात नहीं है. आप बताइए. सवारी किधर से चली आ रही है?

आशा – रमा के पास गयी थी यार. थोड़ा नोट्स बनाने थे मिलकर. चल आजा थोड़ा बैठकर गप्पें लगते हैं. अकेली घर में बोर होती हूँ यार.

मैं उनके साथ उनके घर आ गया. आकर उनके बरामदे में पड़े तख्त पर बैठ गये, वो मेरे साथ सट कर बैठ गयी और पालती मारकर अपना घुटना मेरी जाँघ के ऊपर रख लिया.

आशा – छोटू, भाई तुझे अपने साथ बिताए पुराने दिन याद आते हैं कि नहीं.

मैं – हां ! क्या मस्ती किया करते थे, हम मिलकर एक दूसरे के साथ. बड़ा मज़ा आता था नहीं?

आशा दीदी मेरे कंधे और बाजू को सहलाते हुए बोली – हम्म.. फिर मेरे मसल्स को दबा कर बोली. भाई, तेरे तो मस्त डोले बन गये है. एकदम गबरू जवान हो गया है यार.

मैं – क्या दीदी आप भी न? नज़र लगाओगी क्या मुझे? वैसे, पहले से तो आप भी थोड़ा मस्त हो गयी हो. उनके आमों पर नज़र डालते हुए मैंने चुटकी ली.

आशा दीदी मेरी नज़रों को भांपती हुई बोली – कहाँ यार, इतना भी नहीं हुआ है. अच्छा एक बात बता. तेरे कालेज में लड़कियाँ भी पढ़ती हैं?

मैं - हां पढ़ती तो हैं ! क्यों?

आशा मेरी आँखों में देखते हुए बोली – फिर तो लगता है. तुझे देख कर आहें ही भरती रह जाती होंगी. है ना? क्योंकि तू तो किसी को घास ही नहीं डालता.

मैं – ऐसा कुछ नहीं है. कोई आहें नहीं भरती. वैसे घास ना डालने वाली बात क्यों कही आपने?

आशा दीदी ने शर्म से अपनी नज़रें झुका ली, फिर थोड़ा मेरी तरफ देख कर बोली – यहाँ भी तो तू किसी को घास नहीं डालता. इसलिए कहा है.

मैंने हँसते हुए कहा – यहाँ मेरी घास की किसको ज़रूरत पड़ गयी?

आशा दीदी अपने बूब्स को मेरे बाजू से सटाते हुए बोली – अगर ज़रूरत हो तो क्या मिलेगी?

मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा, उसकी आँखों में प्रेम निमंत्रण साफ-साफ दिखाई दे रहा था.

मैंने भी उसकी कमर में हाथ डालते हुए अपने से और सटाया और बोला – कोई माँगे तो सही. मैं तो डालने के लिए कब से तैयार हूँ.

मेरी बात सुनकर आशा दीदी की आँखों में चमक आ गई, और उसने सारी शर्म-झिझक छोड़ कर मेरे गले में अपनी बाहें लपेट दी. मैंने भी अपने होंठों को उसकी तरफ बढ़ाया. तो उसने झट से उन्हें चूम लिया.

गेट खुला है दीदी. मैंने उसे गेट की तरफ इशारा करते हुए कहा. तो आशा दीदी भाग कर गेट बंद करने चली गयी. इतने में मैं तख्त से उठ खड़ा हो गया. दीदी वापस आकर मेरे गले में झूल गयी और मेरे होंठों पर टूट पड़ी. मैंने भी आशा दीदी के मस्त उभरे हुए कूल्हों को पकड़ कर मसल दिया. दीदी की गान्ड एकदम कड़क सॉलिड गोल-गोल, मानो दो वॉलीबॉल आपस में जोड़ दिए हों. गान्ड को अच्छे से मसलते हुए मेरे हाथ उसके कुर्ते के अंदर चले गये और मैं अब उसकी कुँवारी चुचियों जो कि एक दम मस्त उठी हुई थी को ब्रा के ऊपर से ही मसलने लगा.

आशा दीदी - अहह..भाईईईईईईई.. धीरे कर ना यार दुखते हैं मेरे बूब्स.

मैं - उफफफफफफफ्फ़.. दीदी क्या मस्त आम हैं तेरे मन करता है, कच्चे ही खा जाऊं. 5 मिनिट हम यूँ ही खड़े-2 मस्ती लेते रहे, जिससे दोनों के अंदर की आग बुरी तरह से भड़क उठी.

मैंने फुसफुसाकर उसके कान में कहा – दीदी पहले कभी ये सब किया है?

आशा दीदी झिझकते हुए बोली – हां, अपने मामा के लड़के के साथ एक बार किया था. लेकिन पूरा नहीं हो पाया था. वो साला हरामी डरपोक बहुत था. तो मेरे चीखते ही भाग लिया.

उसकी बात सुनकर मुझे भी हँसी आ गई और बोला – तो इसका मतलब तुम्हारी सील पूरी तरह नहीं टूट पाई.

आशा दीदी – थोड़ा सा खून तो निकला था, अब पता नहीं. लेकिन तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो? तू अपना काम कर यार, बहुत मज़ा आ रहा है, ऐसी बातें करके खराब मत कर… प्लीज.

मैं – यहीं करना है या अंदर कमरे में चलें. तो वो मेरा बाजू पकड़ कर कमरे में खींच कर ले गयी, और मुझे पलंग पर धक्का दे दिया. फिर मेरे ऊपर आकर मेरी पैंट को खोलने लगी. उसकी चुदने की ललक देख कर मुझे हँसी आ गई, वो मेरी ओर देख कर बोली – हंस क्यों रहे हो?

मैं – बड़ी जल्दी है तुम्हें मेरा लंड लेने की.

सीधा लंड शब्द सुनकर उसके गाल लाल हो गये. और झूठा गुस्सा दिखाकर मेरे सीने में हल्के से मुक्का मार कर बोली – कितना गंदा बोलता है तू. बेशर्म कहीं का.

मैं – लो कर लो बात. कपड़े मेरे तुम उतार रही हो. बेशर्म मैं हो गया. वाह भाई वाह. उलटा चोर कोतवाल को डांटे. हहेहहे

शर्म से उसने अपने हाथ रोक कर अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया.

मैंने उसकी गान्ड सहलाते हुए कहा – दीदी ! शर्म ही करती रहोगी या कुछ और भी करना है.

मेरी बात सुनकर उसने झट से मेरा पैंट उतार दिया. और मेरे ऊपर बैठ कर मेरे होंठ चूसने लगी. मैंने उसकी कमीज़ में हाथ डाल दिया और ब्रा के ऊपर से उसके 34 साइज़ के बूब्स अपने हाथों में लेकर मसल दिए.

आशा दीदी – अहह. भाई. थोड़ा आरामम्म सीई.. इसस्शह. और अपनी चूत को मेरे लंड के ऊपर रगड़ने लगी. इतनी देर में उसकी मखमली चूत रस बहाने लगी.

मैंने आशा दीदी –के कुर्ते को उसके सर के ऊपर से निकाल दिया और जैसे ही सलवार के नाड़े पर हाथ लगाया. तो उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया.

मैं – क्यों नहीं करना है क्या? आशा दीदी ने झट से अपना हाथ हटा लिया. मैंने उसका नाड़ा खींच दिया और पैर के सहारे से उसकी सलवार खिसका कर पैरों तक कर दी. अब दीदी पिंक कलर की ब्रा और पैंटी में मेरे सामने थी. उसके होंठों को चूमते हुए मैंने उसके आमों को अपने हाथों में कस लिया. और उनसे रस निकालने की नाकाम कोशिश करने लगा. पतली कमर और पेट के अलावा, उसके चुचे और गान्ड परफेक्ट शेप में थे. फिर मैंने उसे अपने नीचे लिया और अपनी टीशर्ट निकाल कर उसपर छा गया. ब्रा को उसके शरीर से अलग करके उसकी चुचियों को चूसने लगा. आशा दीदी मस्ती में हाय-2 करके रस बहाने लगी.

आशा दीदी – मुझे जल्दी से चोद अंकुश. अब और इंतजार नहीं कर सकती जानू.

दीदी की आतुरता देख कर मैंने भी देर करना सही नहीं समझा और आशा दीदी की पैंटी उतार कर उसके ऊपर छाता चला गया. दीदी की चूत लगातार रस बहा रही थी. चूत के होंठों को चौड़ा करके अपने लाल-लाल सेब जैसे सुपाड़े को उसके छेद से भिड़ा दिया और एक हल्का सा धक्का देते ही पूरा सुपाड़ा उसकी गीली चूत में समा गया.

आशा दीदी – आईईईईई… ईईईईईईई... मररर्र्ररर गाइिईई रीईईई माआआआआ उफफफफ्फ़ भाईईईई प्लेआस्ईई रुक्क्क जाआ मेरा लौड़ा जैसे लंड को वो सह नहीं पाई और मेरे सीने पर हाथ रख कर अपने ऊपर से धकेलने लगी.

मैंने उसके होंठों को चूमते हुए कहा - दीदी थोड़ा झेल ले. ये कहकर मैंने थोड़ा अपनी गान्ड को और दबा दिया. आधे से ज़्यादा लंड उसकी चूत में और सरक गया.

आशा दीदी – बहुत बड़ा जालिम है तू. थोड़ा साँस तो लेने दे यार, मैं मर जाऊंगी.

आधे लंड को उसकी कसी हुई चूत में डाले, मैं चुचियों को मसलने लगा, उसके कंचे जैसे कड़क हो चुके चुचों को मड़ोड़ते हुए, एक और धक्का मार दिया. वो कन्फ्यूज़ हो गयी. इस बार दर्द चुचियों में हुआ या चूत में. पूरा लंड चूत में फिट हो गया, उसकी अधूरी सील पूरी तरह टूट गयी थी.

आशा दीदी हाँफते हुए बोली – आहह बहुत बड़ा है तेरा. मेरी तो दम निकल गया होता. उउउफफफ फफफफफ्फ़..माआ. आहह.. थोड़ा रुक, साँस लेने दे मुझे. मैंने कुछ देर उसके पेट और चुचियों को सहलाया, पुचकारते हुए मैंने अपने धक्के देने शुरू किए. थोड़ी देर में ही वो भी मज़े में आ गई, तो नीचे से अपनी गान्ड उछाल–2 कर चुदने लगी. आहह... भाई चोद मुझे और फाड़ दे मेरी चूत को, बड़ा मज़ा आ रहा है. उउउफफफ फफफफफ्फ़..माआ. आहह.

आशा फुल मस्ती में अपने कमर उठा – उठा कर बड़बड़ाती हुई चुदने लगी. उसने अपनी एड़ी मेरी गान्ड के दोनों तरफ से कस दी और बुरी तरह झड़ते हुए मेरे सीने से चिपक गयी. अब मैंने उसको अपने गले से चिपकाए हुए पलंग से उठा कर दीवार के सहारे खड़ा कर दिया, और पीछे खड़े होकर, उसकी वेल शेप्ड गान्ड को चाटने लगा. आशा दीदी फिर से गरम होने लगी, और पलट कर मेरे होंठों पर टूट पड़ी. मैंने उसकी पीठ पर अपने हाथ का दबाव डालकर उसको दीवार से टिका दिया, जिसकी वजह से उसकी गान्ड पीछे को हो गयी. मैंने पीछे से अपना लंड उसकी ताज़ा झड़ी चूत के मुँह पर टिकाया, और एक ज़ोर का झटका अपनी कमर को दिया. मेरा लंड सर्र्र्र्र्ररर से उसकी गीली चूत में चला गया. आशा ने अपने होंठ कस लिए और सारे दर्द को पी गयी.

मैं आशा दीदी की पीठ से चिपक कर उसे दनादन धक्के लगा कर चोदने लगा. आशा दीदी भी अपनी गान्ड को पीछे धकेलने लगी. हम दोनों ही बुरी तरह से चुदाई में लगे हुए थे. आखिरकार 20-25 मिनिट की चुदाई के बाद मैंने भी अपनी पिचकारी उसकी चूत में छोड़ दी. आशा दीदी भी ऊँट की तरह गर्दन उठाकर फिर एक बार और झड़ गयी. दोनों की साँसें धौंकनी की तरह चल रही थी. आशा दीदी आज मेरा लंड लेकर बेहद खुश थी, मैं भी अपना पुराना हिसाब चुकता करके अपने घर आ गया. आशा दीदी की अधखुली चूत को अच्छी तरह से खोलने के बाद, मैं जैसे ही घर पहुँचा. तो देखा पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ है.

भाभी के कमरे में गया तो वो दोनों माँ-बेटी गायब, दीदी को आवाज़ दी, कोई जवाब नहीं. फिर मैंने अपने कमरे में जाकर कपड़े चेंज करने लगा. बाथरूम में जाकर अपने लौडे को साफ किया जिसपर अभी तक आशा दीदी की चूत का खून मिश्रित चूत रस लगा हुआ था. मैंने अपना कच्छे उतार कर बाथरूम में ही डाल दिया, और एक खाली शॉर्ट पहन लिया.

बाहर आकर अलमारी से टीशर्ट निकाली ही थी कि पीछे से मुझे किसी की नरम-नरम बाँहों ने कस लिया. मैंने उन हाथों को पकड़ कर अपनी कमर से हटाया, और बाजू पकड़ कर आगे को किया. देखा तो रमा दीदी खड़ी मुस्करा रही थी. उसने इस समय मात्र ऊपर एक पतली सी टीशर्ट और नीचे एक जीन्स का शॉर्ट पहना हुआ था. सामने आकर उसने मेरे गले में अपनी बाहें डालकर मेरे होंठों पर अपने होंठ चिपका दिए. उसके गोल-गोल बूब्स मेरे सीने से दब गयी. मैंने उसके कंधों को पकड़ कर अपने से अलग किया.

मैं – रमा दीदी, भाभी कहाँ हैं?

रमा दीदी - भाभी छोटी चाची के यहाँ उनकी तबीयत जानने गयी हैं, उसने जवाब दिया.

मैं – इसलिए तुम मौके का फ़ायदा उठाना चाहती हो क्यों?

रमा दीदी – हेहेहे… हां तो उसमें क्या? कभी-2 थोड़ा बहुत मज़ा तो कर सकते हैं ना? प्लीज भाई जल्दी से कर दे ना भाभी के आने से पहले.

मैं – क्या कर दूं?

रमा दीदी – ओफ़्फओ तू भी ना, जान बूझकर हमेशा तंग करता है मुझे. चल अब बातें मत बना और जल्दी से मेरी चूत को अपने लंड से चोद दे यार. आज बहुत मन कर रहा है, प्लीज. इतना कहकर वो फिर से मेरे ऊपर चढ़ने लगी. मैंने उसके अमरूदों को जोर से मसल दिया.

रमा दीदी - सीईईई. धीरी. आराम से कर ना यार. ये कहीं भागे जा रहे हैं?

मैं मुश्किल से आधे घंटे पहले ही एक सील तोड़कर आया था, मेरा लंड अभी भी थोड़ा पहली वाली नई चूत की गर्मी से आकड़ा हुआ था और यहाँ एक और कमसिन चूत सामने थी, जिसकी खुशबू सूंघ कर वो फिर से अपनी औकात में आ गया. मैंने झट-पट रमा दीदी के पीछे जाकर उसका टॉप ऊपर करके निकाल दिया, बिना ब्रा के उसके बूब्स किसी स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह हिल-हिल कर बाहर आ गये. टॉप एक तरफ को उछल कर रमा दीदी के चुचे चूसने लगा. वो भी उतावली हो कर गान्ड उचका-उचका कर चुसवाने लगी. कुछ देर रमा दीदी की चुचियों को चूसने के बाद मैंने उसको पूरी तरह नंगा कर दिया और अपने लंड की तरफ इशारा करके कहा.

मैं - दीदी लगे हाथ अब ज़रा तुम भी इसकी सेवा कर दो. रमा दीदी मेरे डंडे जैसे खड़े लंड के आगे बैठ गयी, और उसे गड़प से अपने मुँह में भर कर लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी. कुछ देर लंड चुसवाने के बाद मैंने उसे अपने पलंग पर धकेल दिया और चढ़ गया दीदी के उपर. पहले धक्के में ही रमा दीदी की अह्ह्ह्ह निकल गयी. फिर धीरे-2 आराम से मैंने पूरा लंड रमा दीदी की चूत में डाल दिया और हल्के–2 धक्के मारने लगा. हम दोनों ही अब लय में आते जा रहे थे.

मैं कुछ देर पहले ही एक चूत चोद कर आया था, सो मेरा माल निकलने में समय लगने वाला था. करीब आधे घंटे भी ज़्यादा देर तक, मैं रमा दीदी को अलग-2 तरीकों से चोदता रहा. इतनी देर में रमा दीदी 2-3 बार अपना पानी छोड़ चुकी थी. आखिर मैंने भी अपना गाढ़ा-गाढ़ा माल उसकी चुचियों और मुँह पर उडेल दिया. रमा दीदी उसको प्यार से अपनी उंगली पर लेकर चाटने लगी, और अपने अमरूदों पर मल लिया. फिर रमा दीदी उठकर बाथरूम में जाकर अपने शरीर को साफ किया और कपड़े पहन कर मेरे लिए चाय बनाने चली गयी. दो-दो चूतों का स्वाद लेने के बाद लंड महोदय तो बड़े खुश थे, लेकिन मुझे कुछ थकान सी होने लगी सो चाय पीकर मैं सो गया. और सीधा शाम को 5 बजे ही उठा.

उठकर आँगन में पहुँचा तो वहाँ भाभी रुचि के साथ खेल रही थी, रमा दीदी भी उनके साथ शामिल थी. रुचि अब चलने और बोलने लगी थी. वो कभी-2 ऐसी बातें करती कि हम सब हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते.

मुझे देखते ही रुचि चिल्लाई – चाचू आ गये. मैं तो चाचू के साथ ही खेलूँगी और अपने छोटे-छोटे पैरों पर भागती हुई मेरी तरफ आई, मैंने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया. उसके गाल पर एक पप्पी करके बोला – अले मेला प्याला बच्चा. चाचू के साथ खेलेगा?

रुचि – हां चाचू. मम्मी और बुआ तो मुझे चिढ़ाती हैं. अब इन दोनों के पास कभी नहीं जाऊँगा.

भाभी बोली – अच्छा चाचा की चमची. हमारी शिकायत करती है. ठहर, अभी तुझे बताती हूँ.

भाभी जैसे ही उसकी तरफ थप्पड़ दिखा कर आई, मैं उसे लेकर घूम गया, और वो उन्हें अंगूठा दिखा कर चिढ़ाने लगी. ऐसे ही बच्ची के साथ थोड़ा खेलने के बाद

भाभी मेरे से बोली - क्या बात है अंकुश, आज तो बहुत सोए?

दीदी की तरफ देखते हुए भाभी बोली - कुछ मेहनत वाला काम किया था क्या? दीदी ने शर्म से अपनी गर्दन नीची कर ली.

मैंने कहा नहीं भाभी बस ऐसे ही कालेज में थोड़ा इधर-से उधर ज़्यादा भाग दौड़ रही सो थोड़ी थकान सी हो गयी थी.

भाभी - लगता है. कसरत में ढील दे दी है तुमने, आलसी होते जा रहे हो. अब कुछ टाइट रखना पड़ेगा. और कहकर वो हँसने लगी.

दीदी ने हम सब के लिए चाय बनाई, चाय पीकर मैं रुचि के साथ खेलता हुआ खेतों की तरफ निकल गया. रात को सोने से पहले भाभी ने मुझे इशारा कर दिया, तो दीदी के सोने को जाने के बाद मैं उनके कमरे में चला गया. वो एक लाल रंग का वन पीस गाउन पहने लेटी हुई थी, मुझे देख कर वो पलंग के सिरहाने के साथ टेक लगा कर कुछ इस तरह बैठ गयी.

भाभी – आओ अंकुश तुमसे कुछ बातें करनी थी.

मैंने अंदर से गेट लॉक किया, और उनके बगल में टेक लेकर बैठ गया.

भाभी मेरे हाथ को अपने हाथों के बीच लेकर बोली – अंकुश, मुझे पता है आज तुमने और रमाने फिर से मस्ती की, है ना?

मैं – हां भाभी सॉरी. वो दीदी ने मुझे जबरदस्ती पकड़ लिया. मैं क्या करता.

भाभी – अरे कोई बात नहीं. मैं कोई तुमसे नाराज़ थोड़ी ना हूँ, बस ये देखना चाह रही थी कि तुम मुझसे क्या-क्या छुपाते हो. वैसे यही बात छिपाई है या और कुछ भी है.

मैं – वो मैं वो…भाभी… आशा दीदी ने भी मुझे कालेज से आते वक़्त अपने घर रोक लिया. और उन्होंने भी…

भाभी – क्या? आशा को भी ठोक दिया तुमने. हेहेहे एक नंबर के चुदकड़ होते जा रहे हो अंकुश. लगाम कसनी पड़ेगी तुम्हारी.. हेहेहे. वैसे वो कुँवारी थी या फिर???

मैं – एक तरह से कुँवारी ही थी, इसके पहले उसके मामा के लड़के ने आधा करके छोड़ दिया था.

भाभी हँसते हुए बोली – क्यों? आधे में क्यों छोड़ दिया था उसने?

मैं – वो कह रही थी. मुझे जैसे ही दर्द हुआ, और मैं चीख पड़ी. तो वो डर गया और वहाँ से भाग लिया.

भाभी – हाहाहा… भाभी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी, मैं भी उनका साथ देने लगा.

फिर हँसते हुए भाभी बोली – साला एकदम गान्डू किस्म का लड़का निकला वो तो. खैर अब अपनी बहनों की ही चिंता करते रहोगे या इस भाभी की भी फिकर है कुछ.

मैं – अरे भाभी. आपके लिए तो आधी रात को भी हाज़िर है आपका ये आज्ञाकारी देवर. वो तो मैं आपके कहे बगैर कैसे कुछ कर सकता हूँ.

भाभी – तो अभी क्या इरादा है. लिखित में चाहिए?

भाभी का इतना कहना ही था कि मैंने भाभी की नंगी जाँघ जो गाउन के ऊपर सिमटने से हो गयी थी, को सहलाया और एक हाथ से उनकी चुचि को उमेठते हुए उनके लाल रसीले होंठों पर टूट पड़ा.
 

aidenabhishek

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UPDATE 14

मोहिनी भाभी का इतना कहना ही था कि मैंने भाभी की नंगी जाँघ जो गाउन के ऊपर सिमटने से हो गयी थी, को सहलाया और एक हाथ से उनकी चुचि को उमेठते हुए उनके लाल रसीले होंठों पर टूट पड़ा. भाभी मेरी सबसे पहली पसंद थी, उसे भला कैसे छोड़ सकता था. भैया का लंड शायद मोहिनी भाभी को अंदर तक तृप्त नहीं कर पाता था, इस वजह से वो मेरे साथ सेक्स करने में पूरी तरह खुल जाती थी.

मोहिनी भाभी - अहह..अंकुश मेरे बूब्स को चूसो.. बहुत खुजली होती है इनमें इस्शह.. खा जाओ..


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मैंने जैसे ही उनके कड़क हो चुके निप्पल्स को काटा मोहिनी भाभी कराह उठी.

मोहिनी भाभी - जोर से नहीं… मेरे राजा.. अ.. उफफफ्फ़… माँ... मसलो इन्हें.

मोहिनी भाभी दिनों दिन गदराती जा रही थी, उनके बूब्स अब 36 और गान्ड भी 36 की हो चुकी थी, जो मेरी बहुत बड़ी कमज़ोरी रही है शुरू से ही. एक गहरी स्मूच के बाद मैंने उनका गाउन निकाल फेंका, उन्होंने भी मेरे कपड़े नोच डाले, और एक दूसरे में समाते चले गये.

मोहिनी भाभी को सबसे ज़्यादा मज़ा मेरे लंड की सवारी करने में ही आता था,. सो उन्होंने अपना हाथ मेरे सीने पर रख कर मुझे पलंग पर धकेल दिया और वो मेरे ऊपर सवार होकर अपनी चुचियों के कंट्रोल बटन्स (निप्पल्स) को मेरे सीने से रगड़ती हुई. फुल मस्ती से अपनी चूत को मेरे कड़क लंड पर रगड़ने लगी.


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उनकी चूत से निकलने वाले रस से मेरी जांघें और पेट तक गीला होने लगा, फिर जब भाभी की मस्ती चरम पर पहुँची, तो उन्होंने अपना हाथ घुसा कर मेरे लौड़ा जैसे लंड को पकड़ कर अपनी सुरंग का रास्ता दिखा दिया. और खुद पीछे को सरकती चली गयी.

जैसे–जैसे लंड चूत की दीवारों को घिसता हुआ अंदर को बढ़ता गया, मोहिनी के मुँह से सिसकारी निकलती चली गयी. पूरा लंड सुरंग के अंदर घुसते ही भाभी लंबी साँस छोड़ते हुए बोली.


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मोहिनी भाभी - अहह..अंकुश... सच में ये तुम्हारा हथियार दिनों दिन बड़ा ही होता जा रहा है… उफफफ्फ़ ओफ़्फओ ओह… कहाँ तक मार करता है. फिर धीरे–धीरे धक्के लगाते हुए बुदबुदाने लगी – हाय उफ़ माँ तभी तो रुचि के पापा के साथ मज़ा ही नहीं आता है मुझे.

ना जाने क्यों जितना सुकून और संतुष्टि सेक्स करने में मुझे भाभी के साथ होती थी, वो किसी और के साथ में नहीं होती थी. मैं और भाभी रात के तीसरे पहर तक एक दूसरे के साथ कुश्ती करते, एक दूसरे को मात देने की कोशिश में लगे रहे.

आखिरकार दोनों ही जीत कर हारते हुए.. थक कर चूर, कोई 3 बजे सोए. सुबह नाश्ता करते हुए पापा ने मुझे पूछा – छोटू बेटा, तुझे मोबाइल चलाना आता है?

मैं – हां पापा, उसमें क्या है. मेरे कई दोस्तों के पास है. (हालाँकि मोबाइल का चलन अभी कुछ समय पहले ही शुरू हुआ था.)

पापा – तो एक काम कर राम को फोन करके बोल देना, एक मोबाइल लेता आए इस बार. ये ज़रूरी चीज़ें होती जा रही हैं जिंदगी में.

मैं – हां पापा! आप सही कह रहे हैं. वैसे मैं आपको बोलने ही वाला था इस बारे में, फोन होना ज़रूरी है.

पापा – देखा बहू. हम बाप बेटे के विचार कितने मिलते हैं.

भाभी ने हँसकर कहा – हां पापा. आखिर खून तो एक ही है ना.

हम सभी चकित थे, आज पापा के व्यवहार को देख कर. कुछ दिनों से उनमें काफ़ी बदलाव आया था. लेकिन आज वो कुछ ज़्यादा ही खुश लग रहे थे. कारण मेरी समझ में कुछ-कुछ आता जा रहा था, उनके खुश रहने का राज.

मैंने जैसा सोचा था, वैसा होता दिख रहा था. पापा की खुशी हम सब के लिए ज़रूरी थी. खैर मैं कालेज चला गया और लौटते में एसटीडी बूथ से मैंने भैया को फोन करके पापा की बात बताई. उन्होंने भी हां कर दी. सैटरडे को भैया आए और सिम के साथ मोबाइल भी ले आए, जो पापा के नाम से एक्टिवेटेड था. चूँकि दोनों भाइयों के पास पहले से ही फोन की सुविधा थी उनके ऑफिस और घर दोनों जगहों पर, तो अब दूरियाँ कम होने लगी थी.

हमारे इलाक़े के लोकल एमएलए रास बिहारी शर्मा, एक दिन अपने क्षेत्र के दौरे पर आए, जब उन्हें पता चला कि मास्टर शंकर लाल शर्मा का बेटा डीएसपी बन गया है, तो वो हमारे घर आए और पिताजी से मुलाकात की. पापा ने बड़े अच्छे से उनकी आवभगत की, मेरे बारे में भी बताया. मेरी पर्सनॅलिटी देख कर बहुत प्रभावित हुए वो, और उन्होंने पिताजी से कहा.

एमएलए रास बिहारी शर्मा - मास्टर साहब, आपने अपने सभी बच्चों की अच्छी परवरिश की है, ये बच्चा भी देखो क्या सही पर्सनॅलिटी है इसकी. इसको भी कोई बड़ा अफ़सर बनाना.

पापा – एमएलए साहब इसकी परवरिश में मेरा कोई हाथ नहीं, जब ये 8थ क्लास में था, तभी इसकी माँ चल बसी. पर ईश्वर की कृपा से हमारी बहू बहुत अच्छी निकली और उसने मेरे घर को अच्छे से संभाल लिया. ये सब उसी की वजह से है.

एमएलए रास बिहारी शर्मा - हमें नहीं मिलवाएंगे उस देवी से ?

पापा ने मुझे इशारा किया, तो मैं भाभी को बुलाने चला गया, कुछ देर बाद हम तीनों चाय नाश्ते के साथ वहाँ पहुँचे. बिना कहे चाय नाश्ते का इंतजाम देख कर एमएलए बहुत प्रभावित हुए और बोले – अब आपको आपकी बहू के बारे में कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं है. मैं समझ गया कि इसके संस्कार कितने अच्छे हैं. उन्होंने भाभी को भी अपने पास बिठा लिया और इधर-उधर की घर परिवार की बातें करने लगे.

बातों-बातों में एमएलए बोले – मास्टर साहब, मैं आपके परिवार से बहुत प्रभावित हुआ हूँ, मेरी भी एक बेटी है. पिछले साल ही उसने ग्रेजुएशन किया है. अगर आप हमें अपने परिवार में शामिल करना चाहें तो आपके बेटे से मैं अपनी बेटी की शादी करना चाहता हूँ.

पापा ने जल्दी ही कोई जवाब नहीं दिया और भाभी की तरफ देखने लगे. ना जाने उन्होंने क्या इशारा किया. कुछ देर बाद पापा ने उनसे कहा.

पापा - एमएलए साहब आप जैसे बड़े आदमी की बेटी मेरे घर की बहू हो, इससे ज़्यादा हमारे लिए गर्व की क्या बात होगी. लेकिन फिर भी मैं अपने बेटों की राई लिए बिना आपको कोई जवाब नहीं दे पाऊंगा.

एमएलए – कोई बात नहीं. मैं आपके जवाब का इंतजार करूँगा और मुझे आपके विचार जानकार बड़ी खुशी हुई. कि आप हर खास काम के लिए अपने परिवार से सलाह लेते हैं. मुझे पूरा भरोसा है, की आपके परिवार में मेरी बेटी हमेशा खुश रहेगी. अगर आपकी तरफ से हां हो तो आप हमें फोन कर दीजिए. फिर उन्होंने हमारा फोन नंबर लिया, और अपना फोन नंबर हमें दे दिया.

छोटे भैया को फोन कर दिया था अगले संडे आने के लिए, जिससे सभी लोग मिल बैठ कर उनकी शादी के बारे में बात कर सकें. अगले सैटरडे, शाम को ही दोनों भाई गये. रात के खाने पर ही पापा ने बात छेड़ दी, और एमएलए के साथ हुई सारी बातें उन्हें बता दी.

सब कुछ बताने के बाद पापा बोले – तुम क्या कहते हो राम बेटा, मेरे हिसाब से तो इतने बड़े खानदान से रिश्ता होना हमारे लिए गौरव की बात होगी.

राम – मैं इस बारे में क्या कहूँ पापा. ये कृष्णा की सारी जिंदगी का मामला है, वो ही कुछ बोल सकता है.

पापा – तुम्हारा क्या विचार है कृष्णा?

कृष्णा – आपको पता तो है ही पापा. हमारे घर में आप जो फ़ैसला लेंगे, वो हम सब को मंजूर होता है. फिर भी आप मुझसे पूछ रहे है. आप और बड़े भैया जो कहेंगे वो मुझे भी मंजूर होगा.

भाभी – अगर पापा की इजाजत हो तो मैं कुछ कहूँ?

पापा – अरे बहू! ये क्या कह रही हो तुम, इस घर की बड़ी बहू ही नहीं. मालकिन भी हो. तुम्हें भला अपने विचार रखने के लिए किसी की इज़ाज़त की ज़रूरत नहीं है. बोलो तुम्हारा क्या विचार है?

भाभी – वो बहुत बड़े लोग हैं. स्वाभाविक है उनकी बेटी लाड़ प्यार में पली होगी, अगर वो हमारे परिवार को स्वीकार नहीं कर पाई तो?

राम – मोहिनी ठीक कह रही है पापा. क्यों ना एक बार उनकी लड़की को देख लिया जाए, कुछ देर मोहिनी और चाची वग़ैरह उसके साथ समय बिताकर उसके स्वभाव और विचार जानने की कोशिश करें.

पापा – सही कहा तुमने. हम कल ही इस विषय पर एमएलए से बात कर लेते हैं. फिर देखते हैं वो क्या कहते हैं.

कृष्णा – कल क्यों? अभी फोन से बात कर सकते हैं, अगर वो मान गये तो कल ही चलते हैं देखने.

भाभी हँसते हुए बोली – देखा पापा. देवर को कितनी जल्दी पड़ी है. शादी की.

भाभी की बात सुनकर सभी हँसने लगे, तो छोटे भैया झेंपते हुए बोले – अरे वो बात नहीं है भाभी. मैंने सोचा कल संडे है, फिर हम लोग अपनी ड्यूटी पर चले जाएँगे.

पापा – ठीक है अभी बात कर लेते हैं. छोटू उनका नंबर लगा.

मैंने एमएलए का नंबर डायल किया, दो-चार बेल जाने के बाद उन्होंने कॉल पिक की.

एमएलए – हेलो मैं एमएलए रास बिहारी बोल रहा हूँ. आप कौन?

मैं – एमएलए साहब नमस्ते, मैं अंकुश श्री शंकर लाल शर्मा जी का बेटा.

एमएलए – नमस्ते बेटा ! बोलो. कैसे फोन किया?

मैं – लीजिए पापा आपसे बात करना चाहते हैं. फिर मैंने उन्हें फोन दिया.

दोनों तरफ से नमस्ते होने के बाद पापा ने उन्हें जो हमारे बीच डिसाइड हुआ था वो सब बता दिया. एमएलए फ़ौरन तैयार हो गये और तय हुआ कि कल ही हम लड़की देखने चलेंगे. उसी टाइम मैं जाकर तीनों चाचा-चाचियों को बुला लाया और उनसे कल सुबह लड़की देखने चलने की बात की. बड़े चाचा और चाची ने बहाना करके मना कर दिया, जो संभावना भी थी लेकिन उनकी जगह आशा दीदी को ले जाने के लिए मान गये, मझली चाची और छोटे चाचा – चाची जाने के लिए तैयार हो गये. दूसरे दिन सुबह ही मैं कस्बे में जा के एक इंनोवा किराए से तय कर आया. कृष्णा भैया की अपनी गाड़ी थी. तो दो गाड़ियों में हम 10 लोग आराम से जा सकते थे. एमएलए का घर राम भैया के कालेज वाले शहर में ही था. तो समय के हिसाब से हम 10 बजे निकल लिए. भैया की गाड़ी मैं भैया के साथ बड़े भैया, भाभी और छोटी चाची बैठ गये. बाकी 6 लोग दूसरी गाड़ी में बैठ गये.

मैं ड्राइवर के साथ था. बीच की सीट पर रामा, आशा दीदी और छोटे चाचा बैठ गये, और पीछे की सीट पर पापा और मंझली चाची बैठे थे. इस तरह बैठने का मेरा ही प्लान था. जिससे पापा को थोड़ा चाची के साथ बैठने का समय मिल सके. और बैक व्यू मिरर से मुझे ये बात पक्की भी हो गयी. कि उन दोनों के बीच ट्यूनिंग अच्छी चल रही है.

चाची का पल्लू ढलका हुआ था, पापा उनकी जाँघ सहला रहे थे, और शायद चाची का हाथ पापा के हथियार पर था.

11:30 तक हम उनके घर पहुँच गये. एमएलए ने हम सब के स्वागत सत्कार में कोई कमी नहीं रखी. एमएलए की लड़की कामिनी, अत्यंत ही खूबसूरत , 5’6” की हाइट, 34-28-36 का फिगर, रंग फक्क गोरा, अच्छे नैन नक्श. कुल मिलाकर देखने में एक सुन्दर सी कन्या के सारे गुण थे. लेकिन अंदर के गुणों को भाभी और चाचियों को ही परखना था. चाय नाश्ते के बाद मोहिनी भाभी उसे एक कमरे में ले गयी और वहाँ उन्होंने उसकी खूब जाँच पड़ताल कर ली. अंदर से आकर भाभी छोटे भैया के पास ही बैठ गयी, और उन्होंने उनके कान में फुसफुसा कर कहा.

मोहिनी भाभी - मुझे तो लड़की कोई खास नहीं लगी, क्यों आप क्या कहते हो देवर जी?

भैया ने भाभी की तरफ बड़े आश्चर्य के साथ देखा. मानो पूछ रहे हों, “कि इतना अच्छा माल आपको पसंद नहीं आया”? भैया के चेहरे पर घोर निराशा के भाव छा गये. और एक लंबी सी साँस छोड़कर बोले

कृष्णा भैया – ठीक है भाभी, आपको पसंद नहीं है तो कोई बात नहीं. चलो चलते हैं फिर.

उनकी रोनी सी शक्ल देख कर भाभी ठहाका लगा कर हँसने लगी. सभी लोग उनकी तरफ देखने लगे.

पापा – इस तरह से क्यों हँस रही हो बहू. हुआ क्या है?

भाभी हँसते हुए बोली. अरे पापा मैंने थोड़ा मज़ाक में देवर को बोल दिया कि मुझे लड़की खास नहीं लगी. तो देखो कैसी रोनी सी शक्ल हो गयी है इनकी हाहाहा… भाभी की बात पर वहाँ मौजूद सभी लोग हँसने लगे और भैया झेंप गये.

मोहिनी भाभी – भाई मुझे तो लड़की बहुत पसंद आई. मेरी देवरानी होने के सारे गुण हैं उसमें. अब आप लोग अपना कहिए.

दोनों चाचियों ने भी हामी भर दी. और रिश्ता तय हो गया. आनन-फानन में रिंग सेरेमनी भी कर दी गयी. फिर सगाई की तारीख पक्का करके हम सबने खाना खाया, और विदा हो लिए. नवंबर के महीने में शादी की डेट निकली. दोनों तरफ से तय हुआ कि शादी से एक हफ्ते पहले वो लोग सगाई की रस्म करने हमारे यहाँ आएँगे. सारे डेट वग़ैरह फिक्स करने के बाद निमंत्रण पत्र बनवा लिए गये और उन्हें सब जगह भेज दिया गया.

दोनों भैया अपने-2 जॉब पर चले गये, मैं और पापा परिवार के बाकी लोगों के सहयोग से शादी की तैयारियों में जुट गये. आख़िर इलाक़े के एमएलए की लड़की की शादी थी, तो किसी बात की कमी ना हो उनके स्टेटस के हिसाब से इसका पूरा ध्यान रखा गया. सगाई के दो दिन पहले से ही कुछ खास रिश्तेदार जैसे मेरी दोनों बुआएं, मामा-मामी और भाभी के भाई राजेश अपनी छोटी बहन, निशा, के साथ गये.

निशा, भाभी की छोटी बहन, मेरे उम्र की एकदम सिंगल पीस भाभी की ट्रू कॉपी. फक्क गोरा बदन. गांव की लालिमा लिए गाल, सुतवाँ नाक, तीखे नयन, लंबे काले घने बाल, 5’7” की हाइट. 34-26-34 का फिगर, चंचल हिरनी जैसी शोख अदाएँ. बोलती तो मानो कहीं दूर कोई कोयल कूक रही हो और अगर हँस पड़े तो मानो गुलशन में बाहर खिल उठे.

शाम को मैं शादी की तैयारियों में लगा. शहर से लौटा था. छोटे चाचा के साथ. बुलेट पर कुछ समान लेकर लौटे थे हम दोनों. मैंने जैसे ही अपनी चौपाल पर गाड़ी खड़ी की. घर के दरवाजे से निकल कर बाहर को आती हुई निशा एक हल्की सी काली साड़ी में मेरे सामने खड़ी दिखी.

इससे पहले मैंने उसे कभी नहीं देखा था, भैया की शादी पर मैं बहुत छोटा था. बाद में ना मैं कभी वहाँ गया, और ना वो कभी हमारे यहाँ आई थी. मैं सारे काम धाम, भूलकर उसकी सुंदरता में खो गया. निशा भी एकटक मुझे ही घूर रही थी. कुछ लोग और भी वहाँ मौजूद थे. जो हम दोनों को एक दूसरे को घूरते हुए ही देखने लगे. लेकिन कोई कुछ बोला नहीं. 10-15 मिनिट के बाद उसके पीछे से ताली बजने की आवाज़ के साथ भाभी की खिल-खिलाती आवाज़ सुनकर मैं चौंक पड़ा. निशा भी हड़बड़ा कर नीचे देखने लगी.

मोहिनी भाभी - वाउ… तोता मैना मिलते ही एक दूसरे में गुम हो गये. हँसते हुए भाभी ने तंज़ मारा.

भाभी की बात सुनकर मैं झेंप गया और नज़रें झुका कर स्माइल दी. तब तक भाभी मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी.

मैंने फुसफुसा कर कहा – ये कौन है मोहिनी भाभी? मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा?

मोहिनी भाभी – इसमें इतने फुसफुसाने की क्या बात है. तुम खुद ही पूछ लो इससे.

मैं – बताओ ना भाभी. मेरे मुँह से भाभी सुनकर वो नज़रें झुकाए मंद-मंद हँसने लगी.

मोहिनी भाभी – ये निशा है. मेरी छोटी बहन. तुम्हारी साली है अभी तो, आगे का पता नहीं. हेहेहे… और निशा, ये है मेरा प्यारा दुलारा लाड़ला देवर, अंकुश. फर्स्ट ईयर में हैं. यहीं कालेज में और मेरा कान उमेठते हुए बोली - बस हो गया ना इंट्रो अब चलो अपने काम में लगो.

वहाँ खड़े सभी लोग हँसने लगे. तब मेरा ध्यान गया. कि वहाँ मेरी दोनों बुआ मीरा और शांति अपने बच्चों के साथ थीं.

मीरा बुआ – क्यों भाई छोटे उस्ताद, साली के मोहपाश में ऐसे खो गये, ये भी ध्यान नहीं दिया कि कोई और भी है यहाँ?

मैंने जाकर दोनों बुआओं के पाँव छुए तो आशीर्वाद देते हुए शांति बुआ बोली – अब ये छोटे उस्ताद नहीं है दीदी. देख नहीं रही हो. हमारे घर में हैं कोई इसके मुकाबले का गबरू जवान? किसी फिल्म का हीरो सा लगता है अपना छोटू.

मीरा बुआ ने अपने हाथ मेरे ऊपर वारे, और माथा चूम कर बोली – किसी की नज़र ना लगे मेरे बेटे को. उसके बाद में घर के अंदर चला गया. भाभी ने मुझे नाश्ता कराया. उनके पास खड़ी निशा, रुचि को गोद में लिए चोर नज़रों से मेरी ओर देख रही थी.

मैं – भाभी, आपकी बहन क्या कर रही है आजकल?

मोहिनी भाभी – मुझे क्या तुमने इसका सेक्रेटरी समझ रखा है? जो भी पूछना है, सीधे-सीधे उसको ही पुछो ना.

मैं – हां तो साली साहिबा आजकल क्या कर रही हो? आई मीन पढ़ाई लिखाई.

पहली बार उसकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी. लगा जैसे कोई कोयल कुहुकी हो.

निशा - 12थ के एग्जाम दिए थे इस बार. नज़रें झुकाए जवाब दिया उसने.

मैं – रिज़ल्ट क्या रहा?

निशा – पास हो गयी हो. अच्छे नंबरों से.

मैं – आगे का क्या प्लान है. ?

निशा – प्राइवेट फॉर्म भरना है बीए का.

मैं – भाभी. इन्हें यहीं बुला लो ना, अपने कालेज में एडमिशन दिलवा देते हैं.

मोहिनी भाभी – अच्छा जी, तो साली को परमानेंट अपने पास रखना चाहते हो? तुम तो बड़े चालू हो. क्यों निशा. तू रहेगी यहाँ मेरे पास?

तभी रुचि बोल पड़ी. हां मम्मी. मौसी भी हमारे पास रहेगी. मुझे मौसी बहुत अच्छी लगती है.

मैं – अरे वाह! हमारी बिटिया को भी इतना जल्दी अपने बस में कर लिया इन्होंने. वास्तव में ये कोई जादू जानती हैं.

मोहिनी भाभी – तो क्या किसी और को भी बस में कर लिया है इसने? हाँ!

मैं उनकी बात सुनकर हड़बड़ा गया. और झेंपते हुए बोला – व. व. वो. मैं… तो… बस… ऐसे ही बोला. कि अभी कुछ घंटों में ही रुचि अपनी मौसी के फेवर में बोलने लगी. मेरी हड़बड़ाहट देख कर भाभी और रमा दीदी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी और निशा भी दबी आवाज़ में उनका साथ देने लगी. मैं अपनी इज़्ज़त बचा कर घर से बाहर चला गया...!

रात को खाने के बाद, मैं और चाचा लोग बैठक में पापा के पास बैठे हिसाब-किताब कर रहे थे. क्या-क्या हो गया, क्या-क्या करना बाकी है, कैसे और कौन करेगा यही सब तय कर रहे थे.

तभी रुचि भागती हुई मेरे पास आई और मेरी गोद में आकर बैठते हुए बोली – चाचू. आपको मम्मी बुला रही है.

मैंने उसके गाल को चूमा और बोला – अभी चलते हैं. तुम थोड़ी देर चाचू के पास बैठो. तो वो ज़िद करते हुए बोली – नहीं अभी चलो. मैं उसे और कुछ समझाता कि पापा बोले – तू जा बेटा, हम देख लेंगे बाकी का. वो एक बार ज़िद पकड़ गयी तो फिर किसी की सुनने वाली नहीं है. मैं उसे गोद में लेकर वहाँ से घर चला आया.

रास्ते में मैंने उसे पूछा - बेटा अभी मम्मी कहाँ हैं?

रुचि – वो मेरे वाले घर में हैं.

मैं – तुम्हारे वाले घर में? वो कहाँ है?

रुचि – ओह चाचू, आप बिल्कुल बुद्धू हो क्या? मेरा घर नहीं पता आपको? अरे वही जहाँ मम्मी और मैं रहते हैं.

मैं – ओह अच्छा. हां अब याद आया मुझे. चलो वहीं चलते हैं. मैं रुचि को लिए भाभी के रूम में चला गया. वहाँ उनके साथ रमा दीदी और निशा दोनों बैठी हुई थी.

मुझे देखते ही मोहिनी भाभी बोली – आओ अंकुश, बैठो. वो तीनों पलंग पर बैठी हुई थी, मैं जाकर बाजू में पड़ी चेयर पर बैठ गया.

रुचि मेरी गोद से उतर कर उन तीनों के बीच जाकर बैठ गयी.

मोहिनी भाभी – हां तो अंकुश. सब तैयारियाँ हो गयीं या अभी कुछ बाकी है?

मैं – ऑलमोस्ट हो ही गयीं हैं भाभी. बस सुबह जल्दी जा के कस्बे से सब समान उठवा कर लाना है.

मोहिनी भाभी – वो निशा के एडमिशन वाली बात तुमने ऐसे ही मज़ाक में कही थी या सीरियस्ली बोला था?

मैं – मैंने आपसे कभी मज़ाक किया है?

मोहिनी भाभी – लेकिन अब तो आधा साल निकल गया. अब कौन एडमिशन कर लेगा?

मैं – वो आप मुझपर छोड़ दो. बाकी निशा जी अपना देखें, क्या ये कोर्स कवर कर पाएंगी?

मोहिनी भाभी ने निशा की तरफ देखा.

तो निशा उनका आशय समझ कर बोली – ये हेल्प करेंगे तो हो भी सकता है.

फिर भाभी मेरी ओर देखने लगी.

मैंने कहा - मैं क्या हेल्प कर पाऊंगा. ज़्यादा से ज़्यादा अपने नोट्स ही शेयर कर सकता हूँ. बाकी तो निशा को ही देखना है.

मोहिनी भाभी – मुझे लगता है निशा, अब बहुत देर हो चुकी है इस सब के लिए. तू जैसा करना चाहती थी वो ही कर.

इतना कह कर भाभी उठ गयी और रमा दीदी बोली – चलो रमा तुम मेरे साथ आओ, थोड़ा मिलकर किचन का काम निपटा लेते हैं.

निशा – मैं भी आपके साथ आती हूँ दीदी.

भाभी – नहीं, तू यहीं रुक, रुचि के पास. बातें करो.

उनके साथ मैं भी उठ खड़ा हुआ. तो भाभी ने मेरे दोनों हाथ पकड़े और पलंग पर बिठाते हुए बोली – तुम कहाँ चले अंकुश जी? थोड़ा साली के साथ बैठ कर समय बतियाओ. मस्ती मज़ाक करो. तुम दोनों का रिश्ता ही ऐसा है. इसमें झिझकना कैसा? और आज मौका भी है एक दूसरे से बात करने का, कल तो भीड़ बढ़ जाएगी.

इतना बोलकर वो दोनों निकल गयीं. जाते-2 दीदी ने एक शरारत भरी स्माइल दी, और मुझे थम्स-अप का इशारा करते हुए, भाभी के पीछे चली गयी. मैं पलंग पर बैठा था, रुचि मेरे पास आ गई, और मेरी गोद में बैठ गयी.

निशा पलंग के नीचे खड़ी थी, तो रुचि ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली – आप भी हमारे साथ बैठो ना मौसी.

निशा – नहीं बेटा. मैं ठीक हूँ, और तुम्हारे पास ही तो हूँ.

मैं – बच्ची कह रही है तो बैठ भी जाइए. अब जब भाभी ने बोल ही दिया है जान-पहचान बढ़ने के लिए तो फिर. ये हिचक क्यों?

वो धीरे से थोड़ा दूरी बनाकर हमारे बगल में बैठ गयी. निशा अपनी गोद में अपने हाथों को रखे, आपस में अपनी उंगलियों से खेलती नज़रें झुकाए. सिकुड़ी सिमटी सी बैठी थी.

मैंने रुचि से कहा – बेटा, अपनी मौसी से पुछो, वो इतना डर क्यों रही है? क्या हमारे घर में उनको कोई प्राब्लम है?

निशा तपाक से बोली – नहीं तो मैं कहाँ डर रही हूँ, और आपने ऐसा क्यों बोला कि मुझे यहाँ प्राब्लम है?

मैं – वो आप ऐसे सिकुड़ी, सिमटी सी बैठी हो ना इसलिए पूछा की शायद आप यहाँ असहज फील कर रही होगी.

वो कुछ नहीं बोली. और ज़्यादा अपनी उंगलियों से खेलने लगी, . मैंने उसके चेहरे की तरफ गौर किया, तो पाया की वो भी कुछ ज़्यादा लाल हो रहा था, शर्म से उसके होंठों में कंपन जैसा हो रहा था.

मैं – शायद आपको ठंड लग रही है. एक काम करिए, आप कंबल ओढ़ लीजिए.

निशा – नहीं. नहीं. मुझे तुंड नहीं लग रही. मैं ठीक हूँ. आपको लग रही हो तो आप ओढ़ लीजिए.

मैं – भाई हमें तो लग रही है. क्यों रुचि बेटा, कंबल ओढें? रुचि ने हामी भर दी तो मैं पलंग पर और ऊपर की तरफ सरक कर रुचि को गोद में बिठा कर आगे घुटनों पर कंबल डाल लिया.

फिर मैंने कहा – देखिए निशा जी. शर्म या शेखी में कुछ नहीं रखा. ठंड तो है ही, लीजिए आप भी डाल लीजिए अपने उपर. अगर एक ही कंबल में आपको कोई प्राब्लम है तो दूसरा ले लीजिए, यही कही रखा होगा. वैसे ये भी डबल बेड का ही है.

तो कुछ सोच कर उसने भी मेरे बगल में बैठ कर अपने पैर सिकोड़ लिए और पालती मारकर कंबल ओढ़ लिया. रुचि मेरी गोद से निकल कर उसकी गोद की तरफ जाने लगी. तो उसने भी मेरी तरफ झुक कर उसे लेने के लिए हाथ बढ़ाए, इस चक्कर में उसका एक हाथ मेरी जाँघ से टच हो गया. हाथ लगते ही उसका शरीर कंप-कंपा गया. रुचि को ठीक से बिठा कर उसने अपनी नज़रें झुका ली, और चोरी-2 मेरी ओर देखने लगी.

मैंने रुचि के गाल को चूम कर कहा – क्यों बेटा? मौसी क्या आ गई. चाचू की गोद अच्छी नहीं लग रही है अब. मेरी बात सुन निशा मुस्कराने लगी.

मैंने बात करने की गर्ज से कहा – वैसे निशा जी, भाभी ने बाहर तोता-मैना कहा था. उसका क्या मतलब है?

उसने एक पल के लिए मेरी ओर देखा. मेरी नज़रों से नज़र मिलते ही उसकी सुरमयी आँखों के दरवाजे फिर से बंद हो गये. और उसने अपनी नज़रें झुका ली. बताइए ना, क्या मतलब है उस बात का? मैंने फिर कहा. तो वो इस बार मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगी.

शायद ये जानना चाहती थी कि मैं वाकई उस बात से अंजान हूँ, या जानबूझकर पूछ रहा हूँ?
 

Motaland2468

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UPDATE 14

मोहिनी भाभी का इतना कहना ही था कि मैंने भाभी की नंगी जाँघ जो गाउन के ऊपर सिमटने से हो गयी थी, को सहलाया और एक हाथ से उनकी चुचि को उमेठते हुए उनके लाल रसीले होंठों पर टूट पड़ा. भाभी मेरी सबसे पहली पसंद थी, उसे भला कैसे छोड़ सकता था. भैया का लंड शायद मोहिनी भाभी को अंदर तक तृप्त नहीं कर पाता था, इस वजह से वो मेरे साथ सेक्स करने में पूरी तरह खुल जाती थी.

मोहिनी भाभी - अहह..अंकुश मेरे बूब्स को चूसो.. बहुत खुजली होती है इनमें इस्शह.. खा जाओ..


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मैंने जैसे ही उनके कड़क हो चुके निप्पल्स को काटा मोहिनी भाभी कराह उठी.

मोहिनी भाभी - जोर से नहीं… मेरे राजा.. अ.. उफफफ्फ़… माँ... मसलो इन्हें.

मोहिनी भाभी दिनों दिन गदराती जा रही थी, उनके बूब्स अब 36 और गान्ड भी 36 की हो चुकी थी, जो मेरी बहुत बड़ी कमज़ोरी रही है शुरू से ही. एक गहरी स्मूच के बाद मैंने उनका गाउन निकाल फेंका, उन्होंने भी मेरे कपड़े नोच डाले, और एक दूसरे में समाते चले गये.

मोहिनी भाभी को सबसे ज़्यादा मज़ा मेरे लंड की सवारी करने में ही आता था,. सो उन्होंने अपना हाथ मेरे सीने पर रख कर मुझे पलंग पर धकेल दिया और वो मेरे ऊपर सवार होकर अपनी चुचियों के कंट्रोल बटन्स (निप्पल्स) को मेरे सीने से रगड़ती हुई. फुल मस्ती से अपनी चूत को मेरे कड़क लंड पर रगड़ने लगी.


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उनकी चूत से निकलने वाले रस से मेरी जांघें और पेट तक गीला होने लगा, फिर जब भाभी की मस्ती चरम पर पहुँची, तो उन्होंने अपना हाथ घुसा कर मेरे लौड़ा जैसे लंड को पकड़ कर अपनी सुरंग का रास्ता दिखा दिया. और खुद पीछे को सरकती चली गयी.

जैसे–जैसे लंड चूत की दीवारों को घिसता हुआ अंदर को बढ़ता गया, मोहिनी के मुँह से सिसकारी निकलती चली गयी. पूरा लंड सुरंग के अंदर घुसते ही भाभी लंबी साँस छोड़ते हुए बोली.


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मोहिनी भाभी - अहह..अंकुश... सच में ये तुम्हारा हथियार दिनों दिन बड़ा ही होता जा रहा है… उफफफ्फ़ ओफ़्फओ ओह… कहाँ तक मार करता है. फिर धीरे–धीरे धक्के लगाते हुए बुदबुदाने लगी – हाय उफ़ माँ तभी तो रुचि के पापा के साथ मज़ा ही नहीं आता है मुझे.

ना जाने क्यों जितना सुकून और संतुष्टि सेक्स करने में मुझे भाभी के साथ होती थी, वो किसी और के साथ में नहीं होती थी. मैं और भाभी रात के तीसरे पहर तक एक दूसरे के साथ कुश्ती करते, एक दूसरे को मात देने की कोशिश में लगे रहे.

आखिरकार दोनों ही जीत कर हारते हुए.. थक कर चूर, कोई 3 बजे सोए. सुबह नाश्ता करते हुए पापा ने मुझे पूछा – छोटू बेटा, तुझे मोबाइल चलाना आता है?

मैं – हां पापा, उसमें क्या है. मेरे कई दोस्तों के पास है. (हालाँकि मोबाइल का चलन अभी कुछ समय पहले ही शुरू हुआ था.)

पापा – तो एक काम कर राम को फोन करके बोल देना, एक मोबाइल लेता आए इस बार. ये ज़रूरी चीज़ें होती जा रही हैं जिंदगी में.

मैं – हां पापा! आप सही कह रहे हैं. वैसे मैं आपको बोलने ही वाला था इस बारे में, फोन होना ज़रूरी है.

पापा – देखा बहू. हम बाप बेटे के विचार कितने मिलते हैं.

भाभी ने हँसकर कहा – हां पापा. आखिर खून तो एक ही है ना.

हम सभी चकित थे, आज पापा के व्यवहार को देख कर. कुछ दिनों से उनमें काफ़ी बदलाव आया था. लेकिन आज वो कुछ ज़्यादा ही खुश लग रहे थे. कारण मेरी समझ में कुछ-कुछ आता जा रहा था, उनके खुश रहने का राज.

मैंने जैसा सोचा था, वैसा होता दिख रहा था. पापा की खुशी हम सब के लिए ज़रूरी थी. खैर मैं कालेज चला गया और लौटते में एसटीडी बूथ से मैंने भैया को फोन करके पापा की बात बताई. उन्होंने भी हां कर दी. सैटरडे को भैया आए और सिम के साथ मोबाइल भी ले आए, जो पापा के नाम से एक्टिवेटेड था. चूँकि दोनों भाइयों के पास पहले से ही फोन की सुविधा थी उनके ऑफिस और घर दोनों जगहों पर, तो अब दूरियाँ कम होने लगी थी.

हमारे इलाक़े के लोकल एमएलए रास बिहारी शर्मा, एक दिन अपने क्षेत्र के दौरे पर आए, जब उन्हें पता चला कि मास्टर शंकर लाल शर्मा का बेटा डीएसपी बन गया है, तो वो हमारे घर आए और पिताजी से मुलाकात की. पापा ने बड़े अच्छे से उनकी आवभगत की, मेरे बारे में भी बताया. मेरी पर्सनॅलिटी देख कर बहुत प्रभावित हुए वो, और उन्होंने पिताजी से कहा.

एमएलए रास बिहारी शर्मा - मास्टर साहब, आपने अपने सभी बच्चों की अच्छी परवरिश की है, ये बच्चा भी देखो क्या सही पर्सनॅलिटी है इसकी. इसको भी कोई बड़ा अफ़सर बनाना.

पापा – एमएलए साहब इसकी परवरिश में मेरा कोई हाथ नहीं, जब ये 8थ क्लास में था, तभी इसकी माँ चल बसी. पर ईश्वर की कृपा से हमारी बहू बहुत अच्छी निकली और उसने मेरे घर को अच्छे से संभाल लिया. ये सब उसी की वजह से है.

एमएलए रास बिहारी शर्मा - हमें नहीं मिलवाएंगे उस देवी से ?

पापा ने मुझे इशारा किया, तो मैं भाभी को बुलाने चला गया, कुछ देर बाद हम तीनों चाय नाश्ते के साथ वहाँ पहुँचे. बिना कहे चाय नाश्ते का इंतजाम देख कर एमएलए बहुत प्रभावित हुए और बोले – अब आपको आपकी बहू के बारे में कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं है. मैं समझ गया कि इसके संस्कार कितने अच्छे हैं. उन्होंने भाभी को भी अपने पास बिठा लिया और इधर-उधर की घर परिवार की बातें करने लगे.

बातों-बातों में एमएलए बोले – मास्टर साहब, मैं आपके परिवार से बहुत प्रभावित हुआ हूँ, मेरी भी एक बेटी है. पिछले साल ही उसने ग्रेजुएशन किया है. अगर आप हमें अपने परिवार में शामिल करना चाहें तो आपके बेटे से मैं अपनी बेटी की शादी करना चाहता हूँ.

पापा ने जल्दी ही कोई जवाब नहीं दिया और भाभी की तरफ देखने लगे. ना जाने उन्होंने क्या इशारा किया. कुछ देर बाद पापा ने उनसे कहा.

पापा - एमएलए साहब आप जैसे बड़े आदमी की बेटी मेरे घर की बहू हो, इससे ज़्यादा हमारे लिए गर्व की क्या बात होगी. लेकिन फिर भी मैं अपने बेटों की राई लिए बिना आपको कोई जवाब नहीं दे पाऊंगा.

एमएलए – कोई बात नहीं. मैं आपके जवाब का इंतजार करूँगा और मुझे आपके विचार जानकार बड़ी खुशी हुई. कि आप हर खास काम के लिए अपने परिवार से सलाह लेते हैं. मुझे पूरा भरोसा है, की आपके परिवार में मेरी बेटी हमेशा खुश रहेगी. अगर आपकी तरफ से हां हो तो आप हमें फोन कर दीजिए. फिर उन्होंने हमारा फोन नंबर लिया, और अपना फोन नंबर हमें दे दिया.

छोटे भैया को फोन कर दिया था अगले संडे आने के लिए, जिससे सभी लोग मिल बैठ कर उनकी शादी के बारे में बात कर सकें. अगले सैटरडे, शाम को ही दोनों भाई गये. रात के खाने पर ही पापा ने बात छेड़ दी, और एमएलए के साथ हुई सारी बातें उन्हें बता दी.

सब कुछ बताने के बाद पापा बोले – तुम क्या कहते हो राम बेटा, मेरे हिसाब से तो इतने बड़े खानदान से रिश्ता होना हमारे लिए गौरव की बात होगी.

राम – मैं इस बारे में क्या कहूँ पापा. ये कृष्णा की सारी जिंदगी का मामला है, वो ही कुछ बोल सकता है.

पापा – तुम्हारा क्या विचार है कृष्णा?

कृष्णा – आपको पता तो है ही पापा. हमारे घर में आप जो फ़ैसला लेंगे, वो हम सब को मंजूर होता है. फिर भी आप मुझसे पूछ रहे है. आप और बड़े भैया जो कहेंगे वो मुझे भी मंजूर होगा.

भाभी – अगर पापा की इजाजत हो तो मैं कुछ कहूँ?

पापा – अरे बहू! ये क्या कह रही हो तुम, इस घर की बड़ी बहू ही नहीं. मालकिन भी हो. तुम्हें भला अपने विचार रखने के लिए किसी की इज़ाज़त की ज़रूरत नहीं है. बोलो तुम्हारा क्या विचार है?

भाभी – वो बहुत बड़े लोग हैं. स्वाभाविक है उनकी बेटी लाड़ प्यार में पली होगी, अगर वो हमारे परिवार को स्वीकार नहीं कर पाई तो?

राम – मोहिनी ठीक कह रही है पापा. क्यों ना एक बार उनकी लड़की को देख लिया जाए, कुछ देर मोहिनी और चाची वग़ैरह उसके साथ समय बिताकर उसके स्वभाव और विचार जानने की कोशिश करें.

पापा – सही कहा तुमने. हम कल ही इस विषय पर एमएलए से बात कर लेते हैं. फिर देखते हैं वो क्या कहते हैं.

कृष्णा – कल क्यों? अभी फोन से बात कर सकते हैं, अगर वो मान गये तो कल ही चलते हैं देखने.

भाभी हँसते हुए बोली – देखा पापा. देवर को कितनी जल्दी पड़ी है. शादी की.

भाभी की बात सुनकर सभी हँसने लगे, तो छोटे भैया झेंपते हुए बोले – अरे वो बात नहीं है भाभी. मैंने सोचा कल संडे है, फिर हम लोग अपनी ड्यूटी पर चले जाएँगे.

पापा – ठीक है अभी बात कर लेते हैं. छोटू उनका नंबर लगा.

मैंने एमएलए का नंबर डायल किया, दो-चार बेल जाने के बाद उन्होंने कॉल पिक की.

एमएलए – हेलो मैं एमएलए रास बिहारी बोल रहा हूँ. आप कौन?

मैं – एमएलए साहब नमस्ते, मैं अंकुश श्री शंकर लाल शर्मा जी का बेटा.

एमएलए – नमस्ते बेटा ! बोलो. कैसे फोन किया?

मैं – लीजिए पापा आपसे बात करना चाहते हैं. फिर मैंने उन्हें फोन दिया.

दोनों तरफ से नमस्ते होने के बाद पापा ने उन्हें जो हमारे बीच डिसाइड हुआ था वो सब बता दिया. एमएलए फ़ौरन तैयार हो गये और तय हुआ कि कल ही हम लड़की देखने चलेंगे. उसी टाइम मैं जाकर तीनों चाचा-चाचियों को बुला लाया और उनसे कल सुबह लड़की देखने चलने की बात की. बड़े चाचा और चाची ने बहाना करके मना कर दिया, जो संभावना भी थी लेकिन उनकी जगह आशा दीदी को ले जाने के लिए मान गये, मझली चाची और छोटे चाचा – चाची जाने के लिए तैयार हो गये. दूसरे दिन सुबह ही मैं कस्बे में जा के एक इंनोवा किराए से तय कर आया. कृष्णा भैया की अपनी गाड़ी थी. तो दो गाड़ियों में हम 10 लोग आराम से जा सकते थे. एमएलए का घर राम भैया के कालेज वाले शहर में ही था. तो समय के हिसाब से हम 10 बजे निकल लिए. भैया की गाड़ी मैं भैया के साथ बड़े भैया, भाभी और छोटी चाची बैठ गये. बाकी 6 लोग दूसरी गाड़ी में बैठ गये.

मैं ड्राइवर के साथ था. बीच की सीट पर रामा, आशा दीदी और छोटे चाचा बैठ गये, और पीछे की सीट पर पापा और मंझली चाची बैठे थे. इस तरह बैठने का मेरा ही प्लान था. जिससे पापा को थोड़ा चाची के साथ बैठने का समय मिल सके. और बैक व्यू मिरर से मुझे ये बात पक्की भी हो गयी. कि उन दोनों के बीच ट्यूनिंग अच्छी चल रही है.

चाची का पल्लू ढलका हुआ था, पापा उनकी जाँघ सहला रहे थे, और शायद चाची का हाथ पापा के हथियार पर था.

11:30 तक हम उनके घर पहुँच गये. एमएलए ने हम सब के स्वागत सत्कार में कोई कमी नहीं रखी. एमएलए की लड़की कामिनी, अत्यंत ही खूबसूरत , 5’6” की हाइट, 34-28-36 का फिगर, रंग फक्क गोरा, अच्छे नैन नक्श. कुल मिलाकर देखने में एक सुन्दर सी कन्या के सारे गुण थे. लेकिन अंदर के गुणों को भाभी और चाचियों को ही परखना था. चाय नाश्ते के बाद मोहिनी भाभी उसे एक कमरे में ले गयी और वहाँ उन्होंने उसकी खूब जाँच पड़ताल कर ली. अंदर से आकर भाभी छोटे भैया के पास ही बैठ गयी, और उन्होंने उनके कान में फुसफुसा कर कहा.

मोहिनी भाभी - मुझे तो लड़की कोई खास नहीं लगी, क्यों आप क्या कहते हो देवर जी?

भैया ने भाभी की तरफ बड़े आश्चर्य के साथ देखा. मानो पूछ रहे हों, “कि इतना अच्छा माल आपको पसंद नहीं आया”? भैया के चेहरे पर घोर निराशा के भाव छा गये. और एक लंबी सी साँस छोड़कर बोले

कृष्णा भैया – ठीक है भाभी, आपको पसंद नहीं है तो कोई बात नहीं. चलो चलते हैं फिर.

उनकी रोनी सी शक्ल देख कर भाभी ठहाका लगा कर हँसने लगी. सभी लोग उनकी तरफ देखने लगे.

पापा – इस तरह से क्यों हँस रही हो बहू. हुआ क्या है?

भाभी हँसते हुए बोली. अरे पापा मैंने थोड़ा मज़ाक में देवर को बोल दिया कि मुझे लड़की खास नहीं लगी. तो देखो कैसी रोनी सी शक्ल हो गयी है इनकी हाहाहा… भाभी की बात पर वहाँ मौजूद सभी लोग हँसने लगे और भैया झेंप गये.

मोहिनी भाभी – भाई मुझे तो लड़की बहुत पसंद आई. मेरी देवरानी होने के सारे गुण हैं उसमें. अब आप लोग अपना कहिए.

दोनों चाचियों ने भी हामी भर दी. और रिश्ता तय हो गया. आनन-फानन में रिंग सेरेमनी भी कर दी गयी. फिर सगाई की तारीख पक्का करके हम सबने खाना खाया, और विदा हो लिए. नवंबर के महीने में शादी की डेट निकली. दोनों तरफ से तय हुआ कि शादी से एक हफ्ते पहले वो लोग सगाई की रस्म करने हमारे यहाँ आएँगे. सारे डेट वग़ैरह फिक्स करने के बाद निमंत्रण पत्र बनवा लिए गये और उन्हें सब जगह भेज दिया गया.

दोनों भैया अपने-2 जॉब पर चले गये, मैं और पापा परिवार के बाकी लोगों के सहयोग से शादी की तैयारियों में जुट गये. आख़िर इलाक़े के एमएलए की लड़की की शादी थी, तो किसी बात की कमी ना हो उनके स्टेटस के हिसाब से इसका पूरा ध्यान रखा गया. सगाई के दो दिन पहले से ही कुछ खास रिश्तेदार जैसे मेरी दोनों बुआएं, मामा-मामी और भाभी के भाई राजेश अपनी छोटी बहन, निशा, के साथ गये.

निशा, भाभी की छोटी बहन, मेरे उम्र की एकदम सिंगल पीस भाभी की ट्रू कॉपी. फक्क गोरा बदन. गांव की लालिमा लिए गाल, सुतवाँ नाक, तीखे नयन, लंबे काले घने बाल, 5’7” की हाइट. 34-26-34 का फिगर, चंचल हिरनी जैसी शोख अदाएँ. बोलती तो मानो कहीं दूर कोई कोयल कूक रही हो और अगर हँस पड़े तो मानो गुलशन में बाहर खिल उठे.

शाम को मैं शादी की तैयारियों में लगा. शहर से लौटा था. छोटे चाचा के साथ. बुलेट पर कुछ समान लेकर लौटे थे हम दोनों. मैंने जैसे ही अपनी चौपाल पर गाड़ी खड़ी की. घर के दरवाजे से निकल कर बाहर को आती हुई निशा एक हल्की सी काली साड़ी में मेरे सामने खड़ी दिखी.

इससे पहले मैंने उसे कभी नहीं देखा था, भैया की शादी पर मैं बहुत छोटा था. बाद में ना मैं कभी वहाँ गया, और ना वो कभी हमारे यहाँ आई थी. मैं सारे काम धाम, भूलकर उसकी सुंदरता में खो गया. निशा भी एकटक मुझे ही घूर रही थी. कुछ लोग और भी वहाँ मौजूद थे. जो हम दोनों को एक दूसरे को घूरते हुए ही देखने लगे. लेकिन कोई कुछ बोला नहीं. 10-15 मिनिट के बाद उसके पीछे से ताली बजने की आवाज़ के साथ भाभी की खिल-खिलाती आवाज़ सुनकर मैं चौंक पड़ा. निशा भी हड़बड़ा कर नीचे देखने लगी.

मोहिनी भाभी - वाउ… तोता मैना मिलते ही एक दूसरे में गुम हो गये. हँसते हुए भाभी ने तंज़ मारा.

भाभी की बात सुनकर मैं झेंप गया और नज़रें झुका कर स्माइल दी. तब तक भाभी मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी.

मैंने फुसफुसा कर कहा – ये कौन है मोहिनी भाभी? मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा?

मोहिनी भाभी – इसमें इतने फुसफुसाने की क्या बात है. तुम खुद ही पूछ लो इससे.

मैं – बताओ ना भाभी. मेरे मुँह से भाभी सुनकर वो नज़रें झुकाए मंद-मंद हँसने लगी.

मोहिनी भाभी – ये निशा है. मेरी छोटी बहन. तुम्हारी साली है अभी तो, आगे का पता नहीं. हेहेहे… और निशा, ये है मेरा प्यारा दुलारा लाड़ला देवर, अंकुश. फर्स्ट ईयर में हैं. यहीं कालेज में और मेरा कान उमेठते हुए बोली - बस हो गया ना इंट्रो अब चलो अपने काम में लगो.

वहाँ खड़े सभी लोग हँसने लगे. तब मेरा ध्यान गया. कि वहाँ मेरी दोनों बुआ मीरा और शांति अपने बच्चों के साथ थीं.

मीरा बुआ – क्यों भाई छोटे उस्ताद, साली के मोहपाश में ऐसे खो गये, ये भी ध्यान नहीं दिया कि कोई और भी है यहाँ?

मैंने जाकर दोनों बुआओं के पाँव छुए तो आशीर्वाद देते हुए शांति बुआ बोली – अब ये छोटे उस्ताद नहीं है दीदी. देख नहीं रही हो. हमारे घर में हैं कोई इसके मुकाबले का गबरू जवान? किसी फिल्म का हीरो सा लगता है अपना छोटू.

मीरा बुआ ने अपने हाथ मेरे ऊपर वारे, और माथा चूम कर बोली – किसी की नज़र ना लगे मेरे बेटे को. उसके बाद में घर के अंदर चला गया. भाभी ने मुझे नाश्ता कराया. उनके पास खड़ी निशा, रुचि को गोद में लिए चोर नज़रों से मेरी ओर देख रही थी.

मैं – भाभी, आपकी बहन क्या कर रही है आजकल?

मोहिनी भाभी – मुझे क्या तुमने इसका सेक्रेटरी समझ रखा है? जो भी पूछना है, सीधे-सीधे उसको ही पुछो ना.

मैं – हां तो साली साहिबा आजकल क्या कर रही हो? आई मीन पढ़ाई लिखाई.

पहली बार उसकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी. लगा जैसे कोई कोयल कुहुकी हो.

निशा - 12थ के एग्जाम दिए थे इस बार. नज़रें झुकाए जवाब दिया उसने.

मैं – रिज़ल्ट क्या रहा?

निशा – पास हो गयी हो. अच्छे नंबरों से.

मैं – आगे का क्या प्लान है. ?

निशा – प्राइवेट फॉर्म भरना है बीए का.

मैं – भाभी. इन्हें यहीं बुला लो ना, अपने कालेज में एडमिशन दिलवा देते हैं.

मोहिनी भाभी – अच्छा जी, तो साली को परमानेंट अपने पास रखना चाहते हो? तुम तो बड़े चालू हो. क्यों निशा. तू रहेगी यहाँ मेरे पास?

तभी रुचि बोल पड़ी. हां मम्मी. मौसी भी हमारे पास रहेगी. मुझे मौसी बहुत अच्छी लगती है.

मैं – अरे वाह! हमारी बिटिया को भी इतना जल्दी अपने बस में कर लिया इन्होंने. वास्तव में ये कोई जादू जानती हैं.

मोहिनी भाभी – तो क्या किसी और को भी बस में कर लिया है इसने? हाँ!

मैं उनकी बात सुनकर हड़बड़ा गया. और झेंपते हुए बोला – व. व. वो. मैं… तो… बस… ऐसे ही बोला. कि अभी कुछ घंटों में ही रुचि अपनी मौसी के फेवर में बोलने लगी. मेरी हड़बड़ाहट देख कर भाभी और रमा दीदी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी और निशा भी दबी आवाज़ में उनका साथ देने लगी. मैं अपनी इज़्ज़त बचा कर घर से बाहर चला गया...!

रात को खाने के बाद, मैं और चाचा लोग बैठक में पापा के पास बैठे हिसाब-किताब कर रहे थे. क्या-क्या हो गया, क्या-क्या करना बाकी है, कैसे और कौन करेगा यही सब तय कर रहे थे.

तभी रुचि भागती हुई मेरे पास आई और मेरी गोद में आकर बैठते हुए बोली – चाचू. आपको मम्मी बुला रही है.

मैंने उसके गाल को चूमा और बोला – अभी चलते हैं. तुम थोड़ी देर चाचू के पास बैठो. तो वो ज़िद करते हुए बोली – नहीं अभी चलो. मैं उसे और कुछ समझाता कि पापा बोले – तू जा बेटा, हम देख लेंगे बाकी का. वो एक बार ज़िद पकड़ गयी तो फिर किसी की सुनने वाली नहीं है. मैं उसे गोद में लेकर वहाँ से घर चला आया.

रास्ते में मैंने उसे पूछा - बेटा अभी मम्मी कहाँ हैं?

रुचि – वो मेरे वाले घर में हैं.

मैं – तुम्हारे वाले घर में? वो कहाँ है?

रुचि – ओह चाचू, आप बिल्कुल बुद्धू हो क्या? मेरा घर नहीं पता आपको? अरे वही जहाँ मम्मी और मैं रहते हैं.

मैं – ओह अच्छा. हां अब याद आया मुझे. चलो वहीं चलते हैं. मैं रुचि को लिए भाभी के रूम में चला गया. वहाँ उनके साथ रमा दीदी और निशा दोनों बैठी हुई थी.

मुझे देखते ही मोहिनी भाभी बोली – आओ अंकुश, बैठो. वो तीनों पलंग पर बैठी हुई थी, मैं जाकर बाजू में पड़ी चेयर पर बैठ गया.

रुचि मेरी गोद से उतर कर उन तीनों के बीच जाकर बैठ गयी.

मोहिनी भाभी – हां तो अंकुश. सब तैयारियाँ हो गयीं या अभी कुछ बाकी है?

मैं – ऑलमोस्ट हो ही गयीं हैं भाभी. बस सुबह जल्दी जा के कस्बे से सब समान उठवा कर लाना है.

मोहिनी भाभी – वो निशा के एडमिशन वाली बात तुमने ऐसे ही मज़ाक में कही थी या सीरियस्ली बोला था?

मैं – मैंने आपसे कभी मज़ाक किया है?

मोहिनी भाभी – लेकिन अब तो आधा साल निकल गया. अब कौन एडमिशन कर लेगा?

मैं – वो आप मुझपर छोड़ दो. बाकी निशा जी अपना देखें, क्या ये कोर्स कवर कर पाएंगी?

मोहिनी भाभी ने निशा की तरफ देखा.

तो निशा उनका आशय समझ कर बोली – ये हेल्प करेंगे तो हो भी सकता है.

फिर भाभी मेरी ओर देखने लगी.

मैंने कहा - मैं क्या हेल्प कर पाऊंगा. ज़्यादा से ज़्यादा अपने नोट्स ही शेयर कर सकता हूँ. बाकी तो निशा को ही देखना है.

मोहिनी भाभी – मुझे लगता है निशा, अब बहुत देर हो चुकी है इस सब के लिए. तू जैसा करना चाहती थी वो ही कर.

इतना कह कर भाभी उठ गयी और रमा दीदी बोली – चलो रमा तुम मेरे साथ आओ, थोड़ा मिलकर किचन का काम निपटा लेते हैं.

निशा – मैं भी आपके साथ आती हूँ दीदी.

भाभी – नहीं, तू यहीं रुक, रुचि के पास. बातें करो.

उनके साथ मैं भी उठ खड़ा हुआ. तो भाभी ने मेरे दोनों हाथ पकड़े और पलंग पर बिठाते हुए बोली – तुम कहाँ चले अंकुश जी? थोड़ा साली के साथ बैठ कर समय बतियाओ. मस्ती मज़ाक करो. तुम दोनों का रिश्ता ही ऐसा है. इसमें झिझकना कैसा? और आज मौका भी है एक दूसरे से बात करने का, कल तो भीड़ बढ़ जाएगी.

इतना बोलकर वो दोनों निकल गयीं. जाते-2 दीदी ने एक शरारत भरी स्माइल दी, और मुझे थम्स-अप का इशारा करते हुए, भाभी के पीछे चली गयी. मैं पलंग पर बैठा था, रुचि मेरे पास आ गई, और मेरी गोद में बैठ गयी.

निशा पलंग के नीचे खड़ी थी, तो रुचि ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली – आप भी हमारे साथ बैठो ना मौसी.

निशा – नहीं बेटा. मैं ठीक हूँ, और तुम्हारे पास ही तो हूँ.

मैं – बच्ची कह रही है तो बैठ भी जाइए. अब जब भाभी ने बोल ही दिया है जान-पहचान बढ़ने के लिए तो फिर. ये हिचक क्यों?

वो धीरे से थोड़ा दूरी बनाकर हमारे बगल में बैठ गयी. निशा अपनी गोद में अपने हाथों को रखे, आपस में अपनी उंगलियों से खेलती नज़रें झुकाए. सिकुड़ी सिमटी सी बैठी थी.

मैंने रुचि से कहा – बेटा, अपनी मौसी से पुछो, वो इतना डर क्यों रही है? क्या हमारे घर में उनको कोई प्राब्लम है?

निशा तपाक से बोली – नहीं तो मैं कहाँ डर रही हूँ, और आपने ऐसा क्यों बोला कि मुझे यहाँ प्राब्लम है?

मैं – वो आप ऐसे सिकुड़ी, सिमटी सी बैठी हो ना इसलिए पूछा की शायद आप यहाँ असहज फील कर रही होगी.

वो कुछ नहीं बोली. और ज़्यादा अपनी उंगलियों से खेलने लगी, . मैंने उसके चेहरे की तरफ गौर किया, तो पाया की वो भी कुछ ज़्यादा लाल हो रहा था, शर्म से उसके होंठों में कंपन जैसा हो रहा था.

मैं – शायद आपको ठंड लग रही है. एक काम करिए, आप कंबल ओढ़ लीजिए.

निशा – नहीं. नहीं. मुझे तुंड नहीं लग रही. मैं ठीक हूँ. आपको लग रही हो तो आप ओढ़ लीजिए.

मैं – भाई हमें तो लग रही है. क्यों रुचि बेटा, कंबल ओढें? रुचि ने हामी भर दी तो मैं पलंग पर और ऊपर की तरफ सरक कर रुचि को गोद में बिठा कर आगे घुटनों पर कंबल डाल लिया.

फिर मैंने कहा – देखिए निशा जी. शर्म या शेखी में कुछ नहीं रखा. ठंड तो है ही, लीजिए आप भी डाल लीजिए अपने उपर. अगर एक ही कंबल में आपको कोई प्राब्लम है तो दूसरा ले लीजिए, यही कही रखा होगा. वैसे ये भी डबल बेड का ही है.

तो कुछ सोच कर उसने भी मेरे बगल में बैठ कर अपने पैर सिकोड़ लिए और पालती मारकर कंबल ओढ़ लिया. रुचि मेरी गोद से निकल कर उसकी गोद की तरफ जाने लगी. तो उसने भी मेरी तरफ झुक कर उसे लेने के लिए हाथ बढ़ाए, इस चक्कर में उसका एक हाथ मेरी जाँघ से टच हो गया. हाथ लगते ही उसका शरीर कंप-कंपा गया. रुचि को ठीक से बिठा कर उसने अपनी नज़रें झुका ली, और चोरी-2 मेरी ओर देखने लगी.

मैंने रुचि के गाल को चूम कर कहा – क्यों बेटा? मौसी क्या आ गई. चाचू की गोद अच्छी नहीं लग रही है अब. मेरी बात सुन निशा मुस्कराने लगी.

मैंने बात करने की गर्ज से कहा – वैसे निशा जी, भाभी ने बाहर तोता-मैना कहा था. उसका क्या मतलब है?

उसने एक पल के लिए मेरी ओर देखा. मेरी नज़रों से नज़र मिलते ही उसकी सुरमयी आँखों के दरवाजे फिर से बंद हो गये. और उसने अपनी नज़रें झुका ली. बताइए ना, क्या मतलब है उस बात का? मैंने फिर कहा. तो वो इस बार मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगी.

शायद ये जानना चाहती थी कि मैं वाकई उस बात से अंजान हूँ, या जानबूझकर पूछ रहा हूँ?
Gajab ki story hai.maza a gaya padke.next plz
 
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aidenabhishek

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बताइए ना, क्या मतलब है उस बात का? मैंने फिर कहा. तो वो इस बार मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगी. शायद ये जानना चाहती थी कि मैं वाकई उस बात से अंजान हूँ, या जानबूझकर पूछ रहा हूँ.

मेरी आँखों में शरारत के कोई भाव ना देख, निशा बोली – सच में आपको तोता – मैना की कहानी नहीं मालूम?

मैं – क्या? ये कोई कहानी है? सच में मैंने कभी किसी से नहीं सुनी. आप सुनाइए ना. प्लीज़.

निशा शर्मा कर फिर से नीचे की ओर देखने लगी.

इस बार उसने रुचि से कहा – रुचि, तेरे चाचू तो सच में बड़े भोले हैं. इतने बड़े हो गये और इन्हें अभी तक तोता मैना के बारे में पता नहीं है.

फिर वो रुचि से ही मुखातिब होकर बोली – रुचि तुझे पता है. तोता मैना ना, एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे. ये बोलते वक़्त उसके गालों पर शर्म की लाली साफ-साफ दिखाई दे रही थी.

निशा ने फिर एक बार अपने आप को संयत किया और फिर आगे बोलना शुरू किया – कहते हैं. उन दोनों का प्यार 7 जन्मों तक चला. एक जन्म में तो वो बंदर-बंदरिया भी थे, पक्षियों में तोता-मैना. इस तरह 7 जन्म तक उनका प्यार चलता रहा.

मैं – तो क्या वो लैला–मजनूं और हीर-रांझा जो पिक्चर बनी हैं. उनके ऊपर ही बनी हैं.

निशा – हां, और वो किसी भी जन्म में एक नहीं हो पाए. अंत में एक-दूसरे की बाँहों में ही दम तोड़ा. कहानी बताते-2 वो मेरी आँखों में देखती हुई खो गयी. में भी अपलक उसकी झील सी गहरी आँखों में डूब सा गया. ना जाने कैसे और कब हमारे हाथ एक दूसरे के हाथों में आ गये थे. जाने कैसा आकर्षण था हम दोनों के बीच, की हम एक दूसरे की तरफ झुकते चले गये. दोनों के होंठों को आपस में जुड़ने के लिए कुछ ही फासला शेष था, एक दूसरे की साँसें आपस में टकराने लगी थी.

तभी रुचि बोल पड़ी - फिर क्या हुआ मौसी? आगे सुनाओ ना.

रुचि की आवाज़ सुनकर हम दोनों ही जैसे नींद से जागे. और हड़बड़ा कर सीधे होकर बैठ गये. नज़रें स्वतः ही झुकती चली गयी.

निशा – बेटा कहानी खतम हो गयी, अब तुम चाचू की गोद में बैठो. मैं अभी आती हूँ. इतना बोल कर उसने रुचि को मेरी गोद में बिठाया और खुद पलंग से उठ गयी. ना जाने मेरे अंदर कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी, कि मैंने उसका हाथ पकड़ लिया.

मैं - लेकिन निशा जी मेरे मन में कुछ और भी सवाल हैं.

उसने मेरे हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया और उसे प्यार से हटते हुए बोली – उनका जवाब अपनी भाभी से पूछ लेना. इतना कह कर वो रूम से बाहर चली गयी.

मैं ठगा सा वहीं बैठा रह गया. किसी महान चूतिया की तरह. फिर कुछ देर और वहीं बैठा रुचि के साथ खेलता रहा. कुछ देर बाद वो मेरी गोद में ही सो गयी. उसे पलंग पर लिटा कर मैं भी अपने कमरे में सोने चला गया. बिस्तर पर पड़े-2 मैं निशा की बातों के बारे में ही सोचता रहा. नींद मेरी आँखों से कोसों दूर जा चुकी थी. रह-रह कर मेरे मन में यही सवाल कौंध रहा था “की जब कहानी की सच्चाई ये है, तो भाभी ने हमें तोता-मैना क्यों कहा”? क्या ये महज़ एक जुमला था या कुछ और? जो भी हो. मेरा मन निशा की ओर खिंचा जा रहा था. उसकी वो झील सी आँखें जिनमें ना जाने कैसा आकर्षण था. मेरे ख़यालों में आ जाती और मैं अपने अन्दर अनजानी बेचैनी महसूस करने लगता.

मैंने इस बार कस कर अपनी आँखें बंद की और सोने की कोशिश करने लगा, कि निशा का मासूम सा चेहरा फिर से मेरे सामने आ गया. मैं फिर से निशा के ख़यालों में खोने लगा. बार -2 उसकी मधुर आवाज़ कानों में गूंजने लगती. अभी में इन ख्वाबों ख़यालों से बाहर निकलने के लिए जूझ ही रहा था कि दरवाजा खुलने की आवाज़ सुनाई दी. मैंने झट से अपनी आँखें खोल दी. देखा तो सामने मोहिनी भाभी दूध का ग्लास हाथ में लिए खड़ी थी. मुझे जागते हुए पाकर वो मेरे पास आकर बैठ गयी. दूध का ग्लास मेरे हाथ में दिया और मेरे चेहरे की तरफ गौर से देखने लगी. मैंने ग्लास खाली करके उन्हें पकड़ा दिया, खाली ग्लास को हाथ लेते हुए वो बोली.

मोहिनी भाभी – अंकुश, कुछ परेशान लग रहे हो? बात क्या है, नींद नहीं आ रही?

एक बार मेरे मन में आया कि भाभी से पूछ लूँ. लेकिन फिर सोचा. पता नहीं मोहिनी भाभी कैसे रिएक्ट करेंगी.

मैं – कुछ नहीं भाभी, बस दिन भर की भाग दौड़ से थोड़ा थकान सी है. और बाकी बचे कामों के बारे में सोच रहा था, इसलिए नींद नहीं आई अब तक.

मोहिनी भाभी – चलो अब ज़्यादा टेंशन ना लो, और सो जाओ और मेरे सर को प्यार से सहला कर वो चली गयी.

कुछ देर की कोशिशों के बाद उसके ख़यालों में खोया हुआ मैं भी नींद के आगोश में चला गया. दूसरे दिन दोनों भाई भी आ गये. उन्होंने सारी तैयारियों का जायज़ा लिया. कुछ शहरी स्टाइल से चेंजस भी कराए. घर में भीड़-भाड़ ज़्यादा हो गयी थी. दिन भर की भाग दौड़ के कारण निशा से मेरी और कोई बात नहीं हो पाई. बस एक-दो बार आमना सामना हुआ. नज़रें चार होते ही उसके चेहरे पर शर्मीली सी मुस्कान आ जाती. और फिर से नज़रें नीची करके निशा मेरी आँखों से ओझल हो जाती. लेकिन जितनी देर मैं घर में होता. मेरी नज़रें निशा को तलाश करती रहती. मैं समझ नहीं पा रहा था, कि आख़िर ये कैसा आकर्षण है. घर, गांव, कालेज में और भी लड़कियाँ थी, लेकिन ऐसा कभी किसी के साथ नहीं हुआ था. तो फिर अब क्यों?

आख़िर सगाई का समय आ गया. एमएलए अपने सगे संबंधियों समेत हमारे दरवाजे पर आ चुके थे. गांव की रीति-रिवाजों और घर मोहल्ले की औरतों के मंगलाचरण के बीच सगाई की रस्म पूरी हुई. उसके बाद हमने सारे गांव को दावत दी. लगान पत्रिका के हिसाब से 3 दिन पहले हल्दी की रस्म थी. पूरे घर, आँगन में चारों तरफ खुशी भरा माहौल व्याप्त था. पूरे आस-पास के इलाक़े में इस शादी को लेकर चर्चाएँ थीं, हो भी क्यों ना. आख़िर तो एक एमएलए की लड़की और डीएसपी की शादी जो थी. आज हल्दी की रस्म होनी थी. वार के नहाने से पहले उसे हल्दी लगाई जाती थी, उसके कुछ घंटे के बाद बेसन से उबटन करके नहलाया जाता था. नहाने तक के सारे काम वर खुद नहीं करता था, उसकी भाभी, चाची, बहनें या फिर बुआएं मिलकर करती थी.

आँगन में कृष्णा भैया मात्र कच्छे के ऊपर एक लूँगी लपेट कर एक लकड़ी के पटरे पर बैठ गये. एक बर्तन में हल्दी और चंदन का लेप घोला हुआ था. पंडित जी ने मंत्रोचारण करके विधि शुरू कराई. बहनों और बुआओं ने भैया के शरीर पर हल्दी का लेप लगा कर शुरुआत की. उसके बाद चाचियों ने हल्दी लगाई. उसके बाद भाभी का नंबर आया.

मैं भैया के पीछे खड़ा कौतूहल वश ये सब देख रहा था. भाभी मज़ाक करते-2 भैया के हल्दी लगा रही थी. कभी-2 उनके गालों पर हल्दी लगते-2 चांटा लगा देती. तो भैया के मुँह से आउच करके मीठी कराह निकल जाती. मैं सब इन्हीं चुहलबाज़ियों का आनंद ले रहा था सभी एक दूसरे से हँसी-ठिठोली कर रहे थे.

अचानक निशा ने हल्दी के बर्तन से हल्दी अपने हाथों में लेकर छुपा ली. किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं था. निशा चुपके से मेरे करीब आई और अपने हल्दी भरे हाथ मेरे गालों पर रगड़ दिए. जैसे ही मुझे पता लगा. और मैंने उसके हाथ पकड़ने की कोशिश की. खिल-खिलाती हुई वो मेरे से दूर भाग गयी. सब की नज़रें मेरी तरफ मुड़ गयी. सब लोग हँसते-2 लोटपोट हो रहे थे.

शांति बुआ ने मेरी गैरत को ललकारा - हाय रे अंकुश, कैसा मर्द है तू??? साली तुझे हल्दी लगा गयी और तू कुछ नहीं कर पाया?? तुझे तो चुल्लू भर पानी में डूब मारना चाहिए.

तो मैंने भी अपने हाथों में हल्दी ली और उसकी तरफ बढ़ने लगा. वो मेरे से बचने के लिए इधर से उधर भागने लगी. कृष्णा भैया ने मुझे उकसाया. शाबाश छोटू, छोड़ना मत उसको. अगर बच गयी तो समझ लेना हमारी नाक कट जाएगी.

मैं उसके पीछे लपका. बचने के लिए वो इधर-से-उधर भागने लगी. पूरे आँगन में. लेकिन मैंने उसका पीछा नहीं छोड़ा. अंत में उसे कोई रास्ता नहीं सूझा तो वो जीने पर चढ़ गयी और ऊपर के कमरे में घुस गयी. लेकिन इससे पहले कि वो उसका दरवाजा अंदर से बंद कर पाती. मैंने दरवाजे को धक्का देकर खोल दिया.

अब वो कहीं भाग नहीं सकती थी. सो कमरे के एक कोने में जाकर खड़ी हो गयी. गर्दन नीची किए, सिमटी सी शर्मायी सी, होंठों पर एक मीठी सी मुस्कान लिए. मैं धीरे–धीरे कदम बढ़ाता हुआ उसके नज़दीक जाने लगा, ना जाने क्यों?

जैसे–जैसे मेरे कदम उसकी तरफ बढ़ रहे थे, पूरे शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना पैदा होने लगी. जिसमें वासना लेशमात्र भी नहीं थी, मेरे शरीर के सारे रोंये खड़े होने लगे. शरीर में अजीब सी कंपकंपाहट सी होने लगी. अभी में उससे कुछ कदम दूर ही था, कि उसके लरजते होंठ हिले.

काँपती सी आवाज़ में बोली – प्लीज़ अंकुश जी, मुझे जाने दो.

मैंने कदम आगे बढ़ाते हुए कहा – वार करके हथियार डालना ठीक नहीं है. जब तक मेरे जैसा चेहरा आपका नहीं हो जाता, यहाँ से हिलना भी संभव नहीं होगा, अब ये आपके ऊपर निर्भर करता है, कि प्यार से होगा या फिर... मैंने जान बूझकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी और आगे बढ़ा.

वो खिल-खिलाती हुई फ़ौरन ज़मीन पर उकड़ू बैठ गयी, और अपने चेहरे को घुटनों में देकर छिपाने की कोशिश करने लगी.

मैं उसके सर पर खड़ा होकर बोला – बचना बेकार है निशा जी. आपने सोए हुए शेर को जगा दिया है. अच्छा होगा प्यार से लगवा लो. वरना मुझे जबरदस्ती करना भी आता है.

निशा – प्लीज़ अंकुश जी मत करिए ना. मान जाइए प्लीज़.

मैं – शुरुआत तो आपने ही की है निशा जी. अब खतम तो मुझे करना ही पड़ेगा ना.

ये कहकर मैंने अपने हाथ निशा की बगलों में फँसा दिए. निशा ने अपने घुटने शरीर से और तेज़ सटा लिए और ज़्यादा सर झुका कर उनके बीच कर लिया. अपने शरीर को उसने ऐसा कस लिया, कि मेरे हाथ उसके अंदर घुस नहीं पा रहे थे. तो मैंने निशा के बगलों में गुदगुदी कर दी. निशा खिल-खिलाकर अपने बदन को इधर से उधर लहराने लगी. इतने में ही मुझे मौका मिल गया और मेरे हल्दी भरे हाथों ने निशा के दोनों गालों को रगड़ दिया. उसने हथियार डाल दिए और खड़ी हो गयी. मेरे हाथ अभी भी उसके गालों पर ही थे. निशा की पीठ मेरे पेट और सीने से सटी हुई थी. वो अब भी मेरे हाथों को अपने गालों से हटाने की कोशिश में लगी थी, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

मैं निशा के गाल मलने में लीन हो गया. आगे को झुक कर उसने अपने चेहरे को नीचे करने की कोशिश की जिससे उसकी अनछुई गान्ड पीछे को होकर मेरी जांघों से सट गयी. उसकी मक्खन जैसी मुलायम गान्ड मुझे और ज़्यादा उससे चिपकने पर मजबूर करने लगी. दोनों के शरीर में एक सिहरन सी हो रही थी. जब काफ़ी देर तक ये चलता रहा, तो आख़िर में उसने अपने हथियार डाल दिए और बोली

निशा - अब तो छोड़ दीजिए प्लीज़. अब तो आपके मन की हो गयी ना. वो फुसफुसाई.

मैं – मन की आप कहाँ होने दे रही हैं निशा जी!. मैंने उसके ठीक कान के पास अपने होंठ ले जा कर कहा.

निशा – और कितना रगड़ेंगे? पूरा तो रगड़ दिया.

मैं – लेकिन आपने प्यार से तो रगड़ने नहीं दिया ना !.. ज़बरदस्ती में मज़ा नहीं आया !

निशा – प्यार से और कैसे होता है?

मैंने उसको अपनी तरफ घुमाया, और अपने हल्दी लगे गाल जो उसने रंग दिए थे. उनको उसके गालों से रगड़ने लगा. मेरे खुरदुरे शेव किए हुए गालों की रगड़ अपने गालों पर महसूस करके निशा की आँखें बंद हो गयी. और उसकी साँसें भारी होने लगी.

निशा - छोड़िए ना प्लीज़. कोई आ जाएगा. वो काँपते से स्वर में बोली.

मैं - तो आने दो न.

ये कह कर मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए, और एक प्यार भरा चुंबन लेकर उसको छोड़ दिया. वो शर्मीली स्माइल करती हुई वहाँ से भाग गयी. और कमरे के दरवाजे से निकल कर साइड में दीवार से पीठ टिका कर लंबी-2 साँसें लेने लगी. उसके पीछे-2 में भी बाहर आया. और उसको वहाँ खड़ा देख कर मैंने अपने दोनों हाथ उसके सर के आजू-बाजू से निकालकर दीवार पर टिका कर बोला.

मैं - निशा जी आप बहुत सुंदर हो. मैं आपको पसंद करने लगा हूँ.

उसने कोई जवाब नहीं दिया. बस एक बार उसके होंठ लरजे और फिर मेरे बाजू के नीचे से सर निकल कर किसी चंचल हिरनी की तरह झीने से भागती हुई नीचे चली गयी. मैं मन ही मन मुस्करा उठा, और धीरे-2 नीचे की तरफ बढ़ गया. आँगन में खड़े सब लोग उसका हल्दी से पुता चेहरा देख कर हँसने लगे.

भैया ने कहा – शाबाश मेरे शेर. ये हुई ना कुछ बात. फिर बोले – खाली हल्दी ही लगाई या कुछ और भी हाहाहा.

मेरी मुस्कराहट देख कर भाभी भाँप गयी. कि बात अब हल्दी लगाने तक ही नहीं रही. वो मन ही मन खुश हो रही थीं. घर में रिश्तेदारों की भीड़-भाड़ बढ़ती जा रही थी, सो अब सिर्फ़ आँखों-2 में ही प्यार पल रहा था. जो दिलों में और ज़्यादा हलचल बढ़ती जा रही थी. भैया की शादी बड़ी धूम-धाम से संपन्न हो गयी. घर में एक सदस्या की बढ़ोत्तरी हो गयी थी. और आज नई भाभी कामिनी अपने प्रियतम की बाँहों में थी. उनको तो फर्स्ट फ्लोर पर एक सेपरेट कमरा सज़ा सजाया मिल गया था सुहागरात मनाने के लिए. लेकिन बाकी लोगों को एडजस्ट करने के लिए काफ़ी मुश्किल थी. सभी चाचाओं के घर भी फुल थे. हमारे घर में तो और ही बुरा हाल था, बारात से लौटे, हारे थके सभी लोग जिसको जहाँ जगह मिली घुस गये रज़ाई लेकर.

काम निपटाते-2, और सभी रिश्तेदारों के इंतजाम करते-2 मैं अकेला रह गया. घर में सब जगह एक चक्कर लगा के देखा कि शायद कहीं जगह मिल जाए. आख़िरकार हॉल में दीवार की तरफ एक आदमी के लायक जगह मुझे मिल ही गयी. नींद से आँखें मुंदने लगी थी. रज़ाई ढूँढने की कोशिश की, तो कहीं नहीं दिखी. तो में वहीं लास्ट में अपने घुटने जोड़कर दीवार की तरफ मुँह करके सो गया. मैंने ये भी जानने की कोशिश नहीं कि बगल में रज़ाई ओढ़े कौन सो रहा है. इधर आँखों में नींद और ऊपर से ठंड, मैंने आधी नींद में ही बगल में सोने वाले की रज़ाई थोड़ी सी अपनी तरफ खींची और उसकी तरफ करवट लेकर रज़ाई अपने ऊपर कर ली.

शांति बुआ ने, अपनी रज़ाई खींचती देख उन्होंने पीछे पलट कर देखा तो मुझे गहरी नींद में सोता देख कर वो थोड़ा और पीछे हो गयी जिससे एक सिंगल टेंट की रज़ाई में हम दोनों का गुज़ारा चल सके. इस चक्कर में उनके मांसल कूल्हे मेरी जांघों से सट गये. एक रज़ाई में दो शरीर सटने से गर्मी आ ही जाती है. तो हम दोनों की ठंड भी गायब हो गयी. लेकिन बुआ की नींद उड़ चुकी थी. और वो धीरे-2 अपने कूल्हे मेरी जांघों के ऊपर रगड़ने लगी, मांसल कूल्हों के दबाव से मेरी टाँगें जो कुछ मुड़ी हुई थी वो भी सीधी हो गयी. अब शांति बुआ की चौड़ी गान्ड का दबाव मेरे लंड पर भी होने लगा था. कुछ तो गान्ड की गर्मी, ऊपर से वो धीरे- 2 मेरे लंड के ऊपर नीचे हो रही थी.

मेरा लंड नींद में भी अपनी औकात में आने लगा. जब सपने में किसी के स्पर्श के एहसास से लौड़ा खड़ा होकर पानी फेंक देता है, तो यहाँ तो ये सब साक्षात डबल धमाल चल रहा था. जैसे-2 मेरा लंड पाजामे में उठता जा रहा था, बुआ उतनी ही अपनी गान्ड को और पीछे करके मेरे लंड पर रगड़ने लगी. उसने ठीक अपनी गान्ड की दरार मेरे लंड की सीध में सेट करके अपनी गान्ड को मूव करने लगी. कई रातों से ठीक से ना सोने की वजह से मेरी नींद बहुत गहरी थी, मुझे दीन दुनिया की कोई खबर नहीं थी. जिसका पूरा फ़ायदा बुआ उठा रही थी. हॉल में शायद ही कोई होगा जो नींद में ना हो.

अब बुआ ने मेरा हाथ पकड़ कर अपने एक चुचे पर रख लिया और उसे मेरे हाथ के साथ मसलने लगी. उन्होंने अपनी साड़ी को भी कमर तक चढ़ा लिया और मेरे लंड की कठोरता का अपनी पैंटी के ऊपर से ही भरपूर मज़ा लेने लगी. बुआ की पैंटी गीली होने लगी थी, और वो बेहद गरम हो चुकी थी. उसे पक्का यकीन हो गया था कि अब मैं नींद से उठ नहीं सकता. बुआ ने पलट कर मेरी तरफ अपना मुँह कर लिया. और अपना एक हाथ नीचे ले जाकर मेरे पाजामे को घुटनो तक सरका दिया. फ्रेंची में फनफनाता मेरा लंड उसको और उत्तेजित करने लगा, तो उन्होंने उसे अपनी मुट्ठी में कस लिया. मेरे लंड के आकार और उसकी अकड़ देख कर बुआ के मुँह से सिसकी निकल गयी और मन ही मन फुसफुसाई. हइई.दैयाअ. कितना मस्त लंड है छोटू का. इसको चूत में लेने में कितना मज़ा आएगा. उफफफफफ्फ़. सोचकर ही मेरी चूत गीली हो गयी., अगर ये मेरी चूत में जाए तो क्या होगा? अहह.

इस सोच के साथ ही उसने हिम्मत भी कर डाली, और मेरे फ्रेंची को खिसका नीचे कर दिया. अब मेरा नंगा सुडौल 8” का गरमा-गरम किसी रोड जैसा कड़क लंड, बुआ की मुट्ठी में क़ैद था, जिसे वो धीरे – 2 ऊपर नीचे करके मुठियाने लगी. वो नीचे को खिसकी, और उसने मेरे लंड का चुम्मा ले लिया, फिर धीरे से चाट कर अपनी चूत को रगड़ने लगी. वासना बुआ के सर पर सवार हो चुकी थी, सो उसने अपनी पैंटी को निकाल फेंका. मुझे कंधे से धक्का देकर सीधा किया और रज़ाई ओढ़े ही ओढ़े, अपनी चौड़ी गान्ड लेकर मेरे ऊपर सवार हो गयी.

मेरे दोनों ओर अपने घुटने टिकाए उसने अपनी गीली रस से सराबोर गरम चूत को मेरे लंड पर सेट किया और उसके ऊपर बैठती चली गयी. मेरा लंड शायद बुआ की चूत के हिसाब से ज़्यादा मोटा था, क्योंकि उसे अंदर करते हुए उसे दर्द का अहसास हुआ और उसने अपने होंठ कस कर भींच लिए. धीरे-2 कर के उसने मेरे पूरे लंड को उसकी चूत ने निगल लिया, और फिर मेरे ऊपर पसर कर हांफने लगी.

उसकी बूब्स मेरे चौड़े सीने से दब कर ब्लाउज को फाड़ डाल रही थी. नीम बेहोशी जैसी नींद की हालत में, मुझे ये सब सपने में होता प्रतीत हो रहा था. लेकिन जब लंड पर चूत की गर्मी और गीलापन महसूस होते ही मेरी नींद खुल गयी. और मैंने अपनी आँखें खोल कर देखा. शांति बुआ मेरे सीने में अपने बड़े-2 मुलायम चुचों को दबाए अपना मुँह मेरे कंधे से सटाये पड़ी हाँफ रही थी. पहले तो मैं उसको पहचान ही नहीं पाया., इसलिए मैंने उसके दोनों कंधे पकड़ कर जैसे ही उठाया वो सकपका गयी. और उसने फिर से अपना मुँह मेरे कंधे में छुपा लिया.

मैंने चौंक कर बुआ से कहा – शांति बुआ आप?? और आप ये क्या कर रही हो? हटो मेरे ऊपर से. कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?

बुआ – प्लीज़ छोटू, मुझे माफ़ कर दे, यार. तेरे इस लंड की गर्मी मेरे से सहन नहीं हुई. अब थोड़ी देर और रुक जा. मेरा राजा बेटा.

मैं – पर शांति बुआ, क्या ये सही है? आप मेरी माँ समान हो.

शांति बुआ – अब सही ग़लत सोचने का समय निकल चुका है. बेटा. अब अपनी बुआ को ठंडी हो लेने दे, वरना ये कम्बख़्त मेरी चूत मुझे सोने नहीं देगी.

मैं चुप रह गया. कुछ देर बाद शांति बुआ ने अपना काम शुरू कर दिया और वो अपनी मस्त गद्देदार गान्ड को मेरे लंड पर आगे पीछे करने लगी. बुआ अपनी गान्ड को ज़्यादा नहीं उछाल पा रही थी क्योंकि अगर ग़लती से भी कोई जाग गया, और रज़ाई के अंदर भूकंप आता देख लिया तो शांति बुआ के साथ-साथ मेरी भी पूरी तरह बेइज्जती हो जानी थी.

पापा अपनी बहन की चुदाई कैसे बर्दाश्त करते वो भी अपने बेटे से?? पता लगते ही, वो गान्ड कुटाई होनी थी. कि भगवान ही जाने. इसी डर के चलते, शांति बुआ की लय थोड़ी मध्यम ही रही, मैं तो कोई कोशिश कर ही नहीं सकता था. तो जैसे तैसे कर के बुआ ने अपना पानी निकाल ही लिया. और चूत में मेरा लंड घुसाए हुए वो मेरे ऊपर लेट कर हाँफने लगी.

मैं – अब क्या हुआ शांति बुआ? रुक क्यों गयी?

शांति बुआ - अरे छोटू! मेरा तो हो गया. वो फुसफुसा कर बोली.

ये सुनते ही मेरी झांटे सुलग गयीं. इसकी माँ की चूत मारु, भेन्चोद इसका हो गया तो ये खुश और मेरा क्या? भेन्चोद यहाँ लंड फटने की कगार पर है, और ये भोसड़ी की अपनी चूत झाड़ के फारिग हो गयी. सारा डर रखा ताक पर, लपक कर मैंने उसे बाजू में लिटाया और उसको अपनी तरफ गान्ड घुमाने को कहा. शांति बुआ ना नुकुर करने लगी. मुझे गुस्सा आने लगा.

मैंने कहा – बुआ अब ये ठीक नहीं होगा, चुप चाप उधर करवट ले लो वरना में सब को जगा के बताता हूँ.

उसकी गान्ड फट गयी, और झट से अपनी मोटी गुदगुदी गान्ड मेरी ओर कर दी. मैंने थोड़ा सा अपना सर पीछे को किया, टाँगों को उसकी तरफ कर के उसकी ऊपर की टाँग को उसके पेट से लगाया. मेरे और बुआ के सर के बीच अब 90 डिग्री का एंगल था, उसकी चूत मेरे लंड के ठीक सामने खुली पड़ी थी.

मैंने घचक से पूरा लंड एक ही झटके में पेल दिया. उसके मुँह से एक दबी-दबी सी कराह. निकल गयी. बुआ की चुचियों को ब्लाउज के ऊपर से मसलते हुए मैं ढका-धक धक्के मारने लगा. मेरे धक्कों की स्पीड इतनी ज़्यादा थी कि उसकी हाल ही झड़ी चूत सूखने लग गयी. और घर्षण से उसमें जलन होने लगी.

बुआ गिड़गिड़ाते हुए बोली – छोटू धीरे कर बेटा. मेरी चूत में जलन हो रही है.

मैं - क्या करूँ तो. आपने मेरे लौड़े को क्यों जगाया. अब झेलो.

थोड़ी देर बाद उसकी चूत फिर से पनियाने लग गयी और वो भी मज़े ले लेकर मेरे धक्कों पर अपनी गान्ड पीछे धकेल-धकेल कर चुदाई का मज़ा लेने लगी. आधे घंटे में बुआ दो बार पानी छोड़ गयी, तब जाकर मैंने उसकी पोखर को अपने गाढ़े पानी से भरा. मैंने अपना लंड बुआ की चूत से निकाला, पच की आवाज़ के साथ वो बाहर आ गया, उसके पेटीकोट से अपने लंड को पोंछ कर करवट लेकर मैं सो गया.

अगली सुबह तोड़ा देर से उठा, आज नई दुल्हन को अपने देवर को गोद में बिठाने की रस्म थी. रमा दीदी ने ही मुझे झकझोर कर उठाया. अलसाया सा मैं अपनी आँखों को मिचमिचाते हुए उठा और झल्लाकर बोला – क्या है? क्यों मुझे सोने नहीं देती.

रमा दीदी - अरे सब तेरा इंतजार कर रहे हैं. आज नई भाभी तुझे अपनी गोद में बिठा कर लाड़ करने वाली हैं.

मेरी उठने की कतई इच्छा नहीं थी, लेकिन नई भाभी की गोद में बैठने के नाम से ही मेरे अंदर गुदगुदी सी पैदा हो गयी. मेरा सारा आलस्य भाग खड़ा हुआ, और झटपट उठ के बाथरूम की तरफ भागा.

रमा दीदी खिल खिलाकर हँसते हुए बड़बड़ाई - देखो नई भाभी की गोद में बैठने के नाम से ही कैसी नींद भाग गयी हेहेहे...

मैं 1 घंटे में नहा धोकर फ्रेश होकर एक लाल सुर्ख रंग की टाइट टीशर्ट और ब्लू जीन्स पहन कर आँगन में पहुँचा. वहाँ सब रस्म के लिए मेरा इंतजार कर रहे थे. सबकी नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी, तो टिकी ही रह गयी. निशा तो मानो किसी सम्मोहन से बँधी. मुझे बड़ी ही प्यारी नज़रों से देखे जा रही थी. टाइट कसी हुई टीशर्ट में मेरी कसरती बॉडी के सारे कट्स दिखाई दे रहे थे, सीना एकदम बाहर उसके नीचे सिक्स पैक्स, बाजुओं की मछलियाँ. मैंने आज एक स्पेशल इंपोर्टेड पर्फ्यूम भी लगाया हुआ था. वैसे इन सब की मुझे कभी आदत नहीं थी.

आँगन में घर के बड़े लोगों को छोड़, वाकई सभी लोग मौजूद थे. पूरे आँगन में एक कालीन का बिछावन डाला हुआ था. सेंटर में दो मोटे-2 गद्दे जिन पर एक साफ-सुथरी चादर, जिसके ऊपर कामिनी भाभी. पालथी मारे सुर्ख लाल जोड़े में अपनी नज़रें झुकाए बैठी थी.
 

aidenabhishek

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UPDATE 16​

मुझे देखते ही सब खुश हो गये.

मोहिनी भाभी मेरी टाँग खींचते हुए बोली - लो जी, आ गये देवर राजा. बड़े एटीट्यूड वाले हैं. भाभी बेचारी कब से इंतजार में हैं कि उनके प्यारे, दुलारे, जगत से न्यारे देवर जी आएँ तो वो उन्हें लाड़ करें.

मैंने हँसते हुए. पीछे से उनके गले में बाहें डाल दी और बोला – क्या भाभी. मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी. आप मेरी ही टाँग खींचने लगी.

मोहिनी भाभी हँसते हुए बोली – अरे मेरे प्यारे देवर. यहाँ सब कब से तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. और तुम हो कि अभी तक सोए पड़े थे. खैर चलो. आज आपकी छोटी भाभी, कामिनी, का नंबर है लाड़ करने का. बड़ी से तो बहुत लाड़ ले लिया. जाओ जाकर कामिनी की गोद में बैठो.

फिर मेरे कान में फुसफुसा कर बोली – अंकुश कामिनी भाभी पर कोई रहम मत करना. पूरा वजन रख कर बैठना आराम से.

मैं मुस्कराते हुए कामिनी भाभी के आगे अपने घुटने टेक कर बैठ गया. और उनके चिन को उठा कर फेस अपनी तरफ कर के बोला – भाभी बिना देवर की ओर देखे ही लाड़ करोगी?

उन्होंने मुझे एक बार भरपूर नज़र डालकर देखा. एक सुर्ख लाल जोड़े में वो इस समय बहुत सुंदर लगा रही थी. कुछ– कुछ इस तरह की छवि.

एक दम चाँद का टुकड़ा. होंठों पर सुर्ख लिपस्टिक, गोरे-गोरे गाल, हल्की सी लाली लिए. लेकिन मेकअप के बाद भी उनके एक गाल पर कुछ निशान सा था.


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कामिनी भाभी अपनी प्यारी सी मीठी सी आवाज़ में कहा – देवर जी आइए ना मेरी गोद में बैठिए.

मैं – आप मुझे झेल पाएँगी?

मेरी बात पर सभी हँसने लगे और कामिनी भाभी ने शर्म से नज़र झुका ली.

मैंने बुआ से पूछा – मेरी बात पर आप सभी लोग हंस क्यों रहे हो?

बुआ – कामिनी तेरे बड़े भाई को झेल चुकी है, तुझे झेलने में क्या तकलीफ़ होगी?

इस बात पर बुआ समेत सभी ज़ोर-2 से हँसने लगे.

मैंने झेंपते हुए कहा – अरे मैं तो अपने वजन की बात कर रहा था.

कामिनी भाभी – कोशिश करूँगी, आप बैठिए.

मैं अपनी तशरीफ़ लेकर उनकी गोद में बैठने लगा. मैंने धीरे-धीरे कर के अपना सारा वजन उनकी जांघों पर डाल दिया. उनकी मांसल जांघों का स्पर्श अपने कूल्हों पर फील होते ही मेरा लंड जीन्स में कुलबुलाने लगा.

उन्होंने मेरे गालों पर हाथ फेरकर प्यार से सहलाया और फिर अपने लिपस्टिक से पतले होंठ रख कर दोनों तरफ चूम लिया. लिपस्टिक के निशान मेरे दोनों गालों पर छप गये.

मैंने उनके कान में फुसफुसा कर कहा - भाभी में भी आपके गालों पर किस करना चाहता हूँ.

कामिनी भाभी मेरी बात सुनकर शरमा गयी.

मैंने कहा - बोलिए ना भाभी. प्लीज़ एक बार बस.

कामिनी भाभी – अपने भैया से पूछ लीजिए ना?

मैंने भैया से कहा – भैया. मैं भाभी को किस करना चाहता हूँ. अगर आप इज़ाज़त दें तो.

कृष्णा भैया बोले – अरे यार! आज तुम भाभी देवर के बीच कोई कुछ नहीं बोलेगा. तुम दोनों आपस में ही डिसाइड करो भाई.

मैंने कामिनी भाभी की तरफ देखा. उन्होंने मौन स्वीकृति दे दी. फिर मैंने भाभी के दोनों गालों का चुंबन लिया और फुसफुसाया.

मैंने कहा - भाभी लगता है भैया ने आपको रात बहुत ज़ोर से काटा है. निशान अभी तक है.

शर्म से उनकी गर्दन झुक गयी. मैं अभी उनकी गोद से उठने की सोच ही रहा था कि चाची बोली पड़ी.

चाची – अंकुश भाभी की गोद से बिना नेग लिए मत उठना.

वाउ! ये तो डबल धमाका हो गया. हां तो भाभी क्या देंगी. अपने देवर को?

कामिनी भाभी – जो भी चाहिए माँग लो.

मैं – तो ठीक है. मुझे एक एप्पल आई फ़ोन चाहिए :wink:. (जो उस समय नया लॉंच हुआ था मार्केट में).

कामिनी भाभी – ठीक है. जब आप पगफेरे के लिए आओगे. आपका फोन आपको मिल जाएगा.

मैंने एक्साइटमेंट में भाभी के गालों को फिर से चूम लिया और उन्हें थैंक्स बोलकर गोद से उठ गया.

दूसरे दिन शांति बुआ को अपने घर वापस जाना था, सुबह ही सुबह वो तैयार होने में लगी थी. मैं जब जाग के आया तब तक वो जाने के लिए तैयार खड़ी थी. मैंने बुआ को स्माइल किया. और उनके पैर छूते हुए कहा. क्यों बुआ? कल रात मज़ा आया??

शांति बुआ भी मुस्कराते हुए बोली – मस्त लौड़ा पाया है तुमने और बहुत ही मस्त चुदाई करते हो अंकुश. कभी आना मेरे घर. तब देखूँगी, तुम में कितना दम-खम है? और हँसते हुए उन्होंने मुझे अपने गले से लगा लिया., बुआ के खरबूजों ने मेरे सोए हुए शेर पर फिर अटैक कर दिया.

मैंने उनके कान में कहा - ज़रूर आऊँगा बुआ. आपका चैलेंज मुझे मंजूर है. मेरी हॉट डार्लिंग बुआ.

बीते एक हफ्ते में निशा ने मेरे दिल पर इस कदर कब्जा कर लिया था कि मुझे उठते-बैठते, सोते-जागते बस उसी के ख्याल आते रहते. बुआ के जाते ही मैं फिर उसके ख़यालों में खोने लगा. भाभी मेरी हालत से अनभिज्ञ नहीं थी, लेकिन घर की भीड़-भाड़ के चलते वो भी कुछ नहीं कर सकती थी. धीरे-धीरे एक-एक कर के रिश्तेदार विदा होने लगे.

भाभी ने निशा को और कुछ दिनों के लिए रोक लिया था. उनका भाई राजेश अपने घर लौट गया था. बड़ी बुआ भी जा चुकी थी., एक हफ्ते बाद कामिनी भाभी भी पहली बार विदा होकर अपने घर चली गयी. और दोनों भाई अपनी ड्यूटी पर लौट गये. एक दिन मैं छोटी चाची के यहाँ उनके आँगन में पड़ी चारपाई पर लेटा था, चाची सिरहाने की तरफ बैठी थी, मेरा सर उनकी गोद में रखा हुआ था.

मैंने चाची के बूब्स को दबा कर कहा – आह चाची ये तो और ज़्यादा फूल कर गुदगुदे होते जा रहे हैं.

चाची – हां अंकुश. अब इनमें दूध भी तो बनेगा ना. बच्चे के लिए. जैसे-2 दिन नज़दीक आते जाएँगे वैसे-2 इनमें दूध आता जाएगा.

मैंने एक चुचि को मसलते हुए कहा – तो अभी चूस कर देखूं क्या. दूध निकलेगा इनमें से?

चाची – नहीं अंकुश, अभी नहीं, वो तो बच्चे के जन्म के बाद ही आएगा. लेकिन अंकुश. अब मेरा मान बहुत करता है वो करने का. प्लीज़ कुछ करो ना?

मैं – मुझे कोई प्राब्लम नहीं है चाची. आप कहो तो अभी अंदर चलते हैं?

चाची - नहीं अभी नहीं. एक काम करना, कल कालेज से जल्दी सीधे यहीं आ जाना.

मैंने हां बोल के एक बार और उनके चुचे मसल दिए. उनके मुँह से आहहह निकल गयी. जवाब में उन्होंने मेरे लंड को पकड़ कर मरोड़ दिया.

मैं - आयईीीई… क्या करती हो चाची?? उखाड़ोगी क्या? मैंने सिसकते हुए कहा.

चाची हँसते हुए बोली – जब तुमने मेरी चुचि मसली थी, तो कुछ नहीं, अब अपनी बारी आई तो चिल्लाने लगे.

अभी हम आगे कुछ और करते, कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट सुनाई दी. मैं उनकी गोद से उठ कर बैठ गया. सामने देखा तो निशा, रुचि को गोद में लिए खड़ी थी.

चाची – आओ निशा! अंदर आओ, वहाँ क्यों खड़ी रह गयी?

निशा हमारे पास तक आई. मैं भी चारपाई से खड़ा हो गया और रुचि के गाल पर किस करने के लिए अपने होंठ आगे किए. मैं जैसे ही उसको किस करने वाला था कि रुचि ने अपना सर पीछे हटा लिया और मेरे होंठ निशा के गाल पर जा टिके.

रुचि ताली बजाते हुए हँसने लगी और चिल्ला कर बोली - दादी देखो, चाचू ने मौसी को क़िस्सी कर दी. ओहोहो! चाचू ने मौसी को क़िस्सी करदी.

उसके साथ चाची भी हँसने लगी. और हम दोनों झेंप गये. मैंने उसे सॉरी बोला.

निशा रुचि को झूठा गुस्सा दिखा कर बोली – रुचि… तू बहुत शैतानी करती है. ठहर अभी तेरी पिटाई करती हूँ.

रुचि उसकी गोद से उतार कर मेरी गोद में आ गयी. और मेरे गले से लिपट गयी. रुचि के गाल पर एक पप्पी कर के मैंने उसे चाची के पास चारपाई पर बिठा दिया.

चाची बोली – तुम दोनों बैठो, मैं ज़रा गाय-भैंस को चारा डाल कर आती हूँ.

और वो बहाना कर के वहाँ से चली गयी. मैंने कहा, निशा जी बैठिए ना.

निशा – नहीं मैं ऐसे ही ठीक हूँ. आप बैठिए. आप मुझे निशा जी क्यों बुलाते हैं? खाली निशा बोला कीजिए ना प्लीज़.

मैं – आपको अच्छा लगेगा?

निशा – हां! और हो सके तो ये आप की बजाय तुम कहो तो मुझे और ज़्यादा अच्छा लगेगा.

मैं – ठीक है, जैसा तुम कहो. वैसे निशा, तुमने मेरी बात का अभी तक कोई जवाब नहीं दिया?

निशा – कौन सी बात का?

मैं – मैंने उस दिन कहा था ना, कि मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूँ. क्या तुम भी मुझे पसंद करती हो?

निशा बिना कोई जवाब दिए मेरी तरफ देखने लगी. पता नहीं कैसा जादू था उसकी आँखों में की मैं उसकी आँखों डूबने लगता था. कुछ देर बाद उसने अपनी पलकें झुका ली. लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. मैंने उसके हाथ अपने हाथों में ले लिए और फिर से अपना सवाल दोहराया.

मैं - बताओ ना प्लीज़.

निशा – अगर मैं ना कहूँ तो आप मान लेंगे कि मैं आपको पसंद नहीं करती?

मैं – फिर भी मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ.

निशा – सच कहूँ. तो मैं आपको पहली नज़र से ही चाहने लगी थी, तब मुझे आपके बारे में ये भी पता नहीं था, कि आप कौन हो?

मैं – सच, तुम सच कह रही हो? ओह निशा… आई लव यू… ये कहकर मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया.

निशा – आई लव यू टू अंकुश जी. मैं भी आपसे प्यार करने लगी हूँ. लेकिन अभी छोड़िए प्लीज़… चाची आ गयी तो क्या सोचेंगी???

मैंने उसे अपने सीने से लगाकर कहा – तुम चाची की चिंता मत करो जान. वो कुछ भी नहीं कहेंगी. तुम नहीं जानती तुमने मुझे कितनी बड़ी खुशी दे दी है.

ये कहकर मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके पतले-2 रसीले होंठों को चूम लिया. वो बुरी तरह से शरमा गयी, उसका शरीर थरथर काँपने लगा, साँसें भारी होने लगी.

रुचि फिर ताली बजकर चिल्लाई - ओहो! चाचू ने फिर मौसी की क़िस्सी कर दी.

रुचि की आवाज़ सुनकर हम दोनों अलग हो गये.

निशा रुचि को थप्पड़ दिखाते हुए बोली – ठहर शैतान. अभी बताती हूँ तुझे. और फिर मुस्कराते हुए प्यार से उसने रुचि को अपनी बाँहों में समेट लिया. उसके गाल पर एक प्यार भरा किस कर के मेरी ओर देखकर वो मुस्कराईं, और उसे गोद में लेकर खिल-खिलाती हुई घर की तरफ भाग गयी.

मैं मन ही मन मुस्कराता हुआ, उसे जाते हुए देखता रहा. रात को खाना खाते समय भाभी ने कहा…

भाभी - अंकुश जी. कल निशा को छोड़ आना. अब बहुत दिन हो गये उसको यहाँ. घरवाले परेशान हो रहे होंगे.

मेरी तो ये सुन कर साँस ही अटक गयी., खाना गले में अटक गया., मुझे खाँसी का धसका सा लग गया.

भाभी – क्या हुआ. अच्छे से खाना खाओ. इतनी भी क्या जल्दी है.

ये कहकर मुझे पानी का ग्लास पकड़ा दिया. मैंने चोर नज़रों से निशा की तरफ देखा, वो भी भाभी की बात सुन कुछ दुखी सी लग रही थी.

मैं – ऐसी भी क्या ज़रूरत आन पड़ी एकदम से भाभी. मुझे कल कालेज भी जाना ज़रूरी है. कोर्स बहुत पिछड़ गया है भैया की शादी के चक्कर में.

भाभी – तो कोई बात नहीं कालेज से लौट कर छोड़ आना. अब सारी जिंदगी ये यहाँ तो नहीं रह सकती ना., वैसे भी तुम्हारी बुलेट के लिए है ही कितना दूर?

मैं – ठीक है. फिर दोपहर के बाद ही निकल पाएँगे.

अब साला चाची से भी कल का वादा किया है, तो वो भी निभाना तो पड़ेगा वरना वो बुरा मान जाएँगी.

मैंने अकेले में भाभी को ये बात बताई.

तो वो बोली – कोई बात नहीं, मैनेज कर लेना. शाम को थोड़ा लेट चले जाना और रात वहीं रुक जाना.

मैंने कहा – वैसे भाभी इतना भी अर्जेंट नहीं है. निशा का जाना. और कुछ दिन रहने दो ना.

मोहिनी भाभी मेरी तरफ गहरी नज़रों से देखते हुए बोली – तुम उसको रोकने के लिए इतना प्रेशर क्यों डाल रहे हो? बात क्या है? कुछ लफड़ा लगता है, क्यों?

मैं नज़र नीची कर के बोला – नहीं भाभी ऐसा वैसा कुछ नहीं, बस मैं तो यूँ ही कह रहा था.

मोहिनी भाभी – अच्छा वो सब छोड़ो. अब मुझे सच-सच जवाब देना. जो मैं पूछूं उसका.

मैं – हां-हां! पूछिए.

मोहिनी भाभी – तुम्हें निशा कैसी लगती है?

मैं – निशा बहुत अच्छी है, बहुत सुन्दर है. इसमें छिपाने जैसा क्या है. जो सच है वो है.

मोहिनी भाभी – तुम उसे पसंद भी करते हो??

उनके इस सवाल पर में गड़बड़ा गया. जल्दी से कोई जवाब नहीं दे सका. तो नज़र अपने आप झुक गयी.

मेरी ओर से कोई जवाब ना पाकर वो फिर बोली – निशा भी तुम्हें पसंद करती है?

मैंने अपनी नज़र ऊपर की और उनकी ओर देखने लगा.

मुझे अपनी ओर देखते हुए पाकर वो बोली – अंकुश, मैं तुम दोनों के बारे में सब जानती हूँ, और इसलिए उसे यहाँ से भेज रही हूँ. जिससे तुम दोनों कहीं बहक ना जाओ, और समय से पहले कुछ ऐसा हो जो नहीं होना चाहिए. मैं तुम दोनों से नाराज़ नहीं हूँ. बल्कि मैं तो खुद चाहती हूँ कि आगे चल कर तुम दोनों एक हो जाओ. निशा के लिए तुमसे अच्छा जीवन साथी और कोई हो ही नहीं सकता. लेकिन रिश्तों की कुछ मर्यादाएँ होती हैं, जिन्हें हमें निभाना पड़ता है.

मैं मुँह बाए, बस उनके चेहरे को ही देखता रहा. उनके चेहरे पर किसी भी तरह के कोई भाव नहीं थे.

मोहिनी भाभी - जस्ट चिल, अंकुश.

मैं मोहिनी भाभी के गले से लग गया. मेरी आँखों से दो बूँद आँसुओं की निकल पड़ी और मैंने रुँधे गले से कहा - सच में आप मेरे लिए भगवान का रूप हो भाभी. हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करने लगे हैं और अब एक दूसरे के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते.

मोहिनी भाभी – लेकिन कुछ साल तो तुम दोनों को इंतजार करना पड़ेगा. लेकिन ये मेरा वादा है तुमसे. कि चाहे जो भी हो, मैं तुम दोनों को मिलाकर ही रहूंगी. अब तुम जाओ और बिना किसी शक के सो जाओ. कल बहुत मेहनत करनी है और मेरे गाल पकड़ कर हँसने लगी.

मैंने एक बार भाभी के गालों पर किस किया और सोने चला गया. दूसरे दिन कालेज में दो घंटे बिताने के बाद में जल्दी घर आ गया और सीधा छोटी चाची के पास पहुँच गया. चाची अभी-अभी नहा कर आई थी, मेरे आवाज़ देने पर उन्होंने गेट खोला, तो देखा वो उसी अंदाज में अपना पेटीकोट चुचियों पर चढ़ाए हुए थी.

गेट खोल कर वो अपने कमरे की तरफ चल दी. मैंने भी फटाफट दरवाजा बंद किया और उनकी मटकती गान्ड का पीछा करते हुए उनके कमरे में आ गया. उनकी मटकती गान्ड के सीन ने मेरे लंड को खड़ा कर दिया. चाची ने अभी तक अपना बदन भी नहीं पोंछा था. पानी की बूँदें किसी मोती के दानों की तरह उनके गोरे मादक बदन पर चमक रही थी. अंदर जाकर वो पलंग पर पड़े अपने कपड़े उठाने ही वाली थी, कि मैंने पीछे से उनकी गान्ड में अपना लंड सटा दिया और कमर में बाँहों का लपेटा डालकर उनके बदन से पानी की बूँदों को चाटने लगा. चाची कपड़े पहनना भूल गयी और अपनी आँखें मीचे आनंद के सागर में गोते लगाने लगी. उनके हाथ से पेटीकोट भी छूट गया. और अब वो उनके पैरों में पड़ा अपनी गुस्ताखी की भीख माँग रहा था. हाल ही में नहाया हुआ बदन, जो दिसंबर की सर्दी में और ज़्यादा ठंडा हो गया था. मेरे शरीर की गर्मी से गरमाने लगा. मैंने अपना पैंट खोल दिया और फ्रेंची से अपना गरमा-गरम लंड निकाल कर चाची की मदमस्त ठंडी-2 गान्ड से रगड़ दिया.

छोटी चाची - अहह..मेरे.. अंकुश अ..रजाआाआआ कितना गरम है तुम्हारा??

मैं – चाची? मैंने थोड़े बनावटी गुस्से से कहा – ये तुम्हारा? मेरा? क्या कहती रहती हो?? सीधे-2 नाम नहीं ले सकती. जाओ रख लो अपनी…. मुझे नहीं चाहिए.

इतना बोल कर मैं अलग हो गया और अपना पैंट उठा लिया.

छोटी चाची – अरे… मेरे राजा… मुन्ना… नाराज़ हो गया? चाची ने मेरा लंड अपनी मुट्ठी में लेकर कहा – तुम्हारा ये लंड कितना गरम है? लो अब ठीक है. ऐसे नाराज़ ना हुआ करो मेरे होनेवाले बच्चे के पापा. मुझे ऐसे शब्द बोलने में थोड़ी झिझक लगती है. पहले कभी बोले नहीं ना इसलिए. आगे से ख्याल रखूँगी.

मैंने चाची के होंठ अपने मुँह में भर लिए और उन्हें चूसने लगा. चाची भी मेरा साथ देने लगी, और साथ-साथ मेरा लंड भी मसलती जा रही थी. मैंने चाची की चूत में अपनी दो उंगलियाँ डाल दी और उन्हें अंदर बाहर करके चोदने लगा. चाची की आँखें लाल होने लगी. वासना की खुमारी उनके सर चढ़ने लगी. और उनकी चूत गीली हो गयी.

अब मैंने उनकी चुचि को दबाते हुए कहा – अह्ह्ह्ह चाची आपकी ये बूब्स कितनी मस्त हो गयी हैं? जी करता है चूसता ही रहूं.

छोटी चाची – तो चूसो ना रजाआ… आअहह...हान्न्न… और ज़ोर से… खा जाओ, बहुत परेशान करती हैं. काटो... आहह… ज़ोर से नहियीईईईईईई.

मैंने चूस-चूस कर उनकी चुचियों को लाल कर दिया. उत्तेजना में कयि जगह दाँत से काट भी लिया. जिससे खून झलकने लगा था.

मैं - सॉरी चाची, मैंने आपको काट लिया.

छोटी चाची – कोई बात नहीं. मुझे दर्द नहीं हुआ.

अब हम दोनों से ही और इंतजार करना मुश्किल हो रहा था. सो मैंने चाची को लिटा दिया. और उनकी चूत को हाथ से सहला कर चूम लिया. उनकी टाँगें मेरे लंड के स्वागत में खुल गयी. चाची का पेट अब थोड़ा सा उभर आया था, जिससे उनकी नाभि का गड्ढा थोड़ा कम गहरा हो गया था. एक बार मैंने उनके उभरे हुए पेट को चूमा और अपना लौड़ा उनकी रसीली गागर के मुँह से अड़ा कर अंदर डाल दिया.

छोटी चाची – अहह... आराम से करना. अंकुश. तुम्हारे बच्चे को चोट ना लग जाए. नहीं तो कहेगा. कैसा निर्दयी बाप है. पेट में भी मारता है.

मैंने धीरे-2 धक्के लगाकर उनकी चुदाई करने लगा. आजकल उनकी चूत मेरे लंड को कुछ ज़्यादा ही जकड़ लेती थी. जिससे हम दोनों को ही बहुत मज़ा आता. एक बार झड़ने के बाद मैंने चाची को घोड़ी बना दिया. और उनकी गान्ड को चाटते हुए कहा.

मैं - चाची आपकी गान्ड कितनी मस्त है. इसमें एक बार लंड डाल के देखें?

छोटी चाची – नहीं अंकुश, वहाँ नहीं, दर्द होगा.

मैं – प्लीज़ चाची… कई दिनों से मन था मेरा लेकिन कहा नहीं. पर आज मान नहीं मान रहा. प्लीज़ तोड़ा देखें तो सही. कैसा लगता है.

छोटी चाची – तुम भी ना अंकुश. बहुत जिद्दी हो. अच्छा वहाँ से तेल की शीशी ले लो और अच्छे से सुराख और अपने लंड पे लगा के तब डालना.

मैंने फ़ौरन तेल की शीशी ली. थोड़ा चाची की गान्ड के छेद पर डाला और उंगली से उसे अंदर तक चिकना कर दिया. फिर अपने लंड पर चुपड़ा. और उनकी गान्ड के भारी-2 पाटों को अलग कर के उनके छेद पर टिका दिया. गान्ड के छेद पर लंड का अहसास होते ही चाची की गान्ड का छेद खुलने-बंद होने लगा. मैंने बॉटल से दो बूँद तेल की और टपका दी. और इस बार अपनी दो उंगलियाँ एक साथ अंदर डाल दी, चाची ने चिहुंक कर अपनी गान्ड के छेद को सिकोड़ कर मेरी उंगलियों पर कस लिया.

छोटी चाची - हइई. अंकुश. क्या करते हो. मेरी गान्ड चटख रही है.

मैंने उनकी गान्ड पर दूसरे हाथ से चपत मार कर कहा – ऐसे गान्ड भींचोगी तो चटकेगी ही ना, इसको थोड़ा ढीला छोड़ो.

मेरी बात मानकर चाची ने अपनी गान्ड को थोड़ा ढीला कर लिया, अब मेरी दोनों उंगलियाँ आराम से अंदर तक पहुँच पा रही थी. उनकी गान्ड का छेद अब थोड़ा सा खुल गया था, मैंने उंगलियाँ बाहर निकाल कर दो बूँद तेल और डाला और उसे उंगली से अंदर कर के अपने लंड को उसके छेद पर फिर से रख दिया. एक हल्के से धक्के के साथ मेरा पूरा सुपाड़ा गान्ड के अंदर जाकर फिट हो गया.

छोटी चाची - अंकुश… थोड़ा धीरे करो. मेरी गान्ड फट रही है. हाय राम… बस करो…


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मैंने चाची की चौड़ी पीठ को चूमते हुए उनकी चुचियों को थाम लिया और ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा. चाची की गान्ड में लंड की चुभन कुछ कम होने लगी तो मैंने और थोड़ा पुश किया और आधा लंड अंदर कर दिया.

छोटी चाची – हाय अंकुश लगता है आज नहीं छोड़ोगे. मुझे.. अरे… मर गई उई माँ…. उफफफफफ्फ़.

अब मैंने अपने एक हाथ को उनकी कमर की साइड से नीचे ले जाकर उनकी चूत को सहला दिया और अपनी दो उंगलियाँ चूत के अंदर कर के उसे चोदने लगा. अब मैंने अपने एक हाथ को उनकी कमर की साइड से नीचे ले जाकर उनकी चूत को सहला दिया और अपनी दो उंगलियाँ चूत के अंदर कर के उसे चोदने लगा. चूत की सुरसुराहट में चाची अपनी गान्ड का दर्द भूल गयी और सिसकियाँ भरने लगी.

मौका देख कर मैंने एक और धक्का मार दिया और मेरा पूरा लंड गान्ड की सुरंग में खो गया. वो दर्द से कराह उठी. तकिये में मुँह देकर बेडशीट को मुठ्ठियों में कस लिया. लेकिन मैंने अपनी उंगलियों से उनकी चूत चोदना जारी रखा. और धीरे-धीरे कर के गान्ड में लंड अंदर–बाहर करने लगा. चाची के दोनों छेदो में सुरसुरी बढ़ने लगी और वो अब मस्ती से आकर गान्ड मरवाने लगी. चूत से उंगलियाँ बाहर निकाल कर उनकी गान्ड पर थपकी देते हुए धक्के लगाने में मुझे असीम आनंद आ रहा था. चाची भी भरपूर मज़ा लेते हुए अब अपनी गान्ड को मेरे लंड पर पटक रही थी,

जब उनकी गदराई गान्ड मेरी जांघों से टकराती, तो एक मस्त ठप्प जैसी आवाज़ निकलती. मानो कोई टेबल पर थाप दे रहा हो. 10 मिनिट तक उनकी गान्ड मारने के बाद मेरा पानी उनकी गान्ड में भर गया. और हम दोनों ही पस्त होकर बिस्तर पर लेट गये.

5 मिनिट के बाद मैंने चाची की चुचि को सहलाते हुए पूछा – छोटी चाची, गान्ड मारने में मज़ा आया कि नहीं?

छोटी चाची – शुरू में तो लगा कि मेरी गान्ड फट गयी. बहुत दर्द हुआ. लेकिन बाद में मज़ा भी खूब आया. लेकिन आहह. अब फिर से दर्द हो रहा है. माआ. पर तुम चिंता मत करो, कुछ देर में ठीक हो जाएगा. तुम बताओ, तुम्हें मज़ा आया या नहीं?

मैं – मुझे तो बहुत मज़ा आया. लेकिन लगता है चाची. ये तरीक़ा सही नहीं है. वो तो आपकी गान्ड ऐसी मस्त है कि मैं अपने आप को रोक नहीं पाया वरना कभी नहीं मारता.

छोटी चाची – कोई बात नहीं. मेरे राजा. तुम्हारे लिए तो मेरी जान भी हाज़िर है. ये निगोड़ी गान्ड क्या चीज़ है.

चाची अब खुल कर गान्ड, लंड, चूत बोलने लगी थी. मैं अपने कपड़े पहन कर घर आया, आज अपनी जान निशा को जो चोदने जाना था. आकर फ्रेश हुआ. खाना खाया और उसके गांव जाने की तैयारी में जुट गया.

निशा का मन नहीं था जाने का, लेकिन भाभी का आदेश था, जाना तो पड़ेगा ही. भाभी का गांव कोई 30-35 किमी ही दूर था हमारे यहाँ से, सिंगल रोड था. पुराना सा. लेकिन वहाँ ज़्यादा नहीं चलते थे. रोड खराब होने के कारण थोड़ा जल्दी निकलना था जिससे दिन के उजाले में ही पहुँच जायें तो ज़्यादा अच्छा था. वैसे तो ज़्यादा से ज़्यादा 1 घंटा ही लगना था. हम दोनों को निकलते-2 सबसे मिलते-मिलते 5 बज गये. ठंडी के दिन थे. 5 बजे से ही दिन ढालने लगता था.

एक दूसरे से अपने प्रेम का इज़हार करने के बाद भी निशा मेरे साथ खुल नहीं पा रही थी. बाइक पर भी वो मुझसे दूरी बनाए हुए बैठी थी.

मैंने गांव निकलते ही कहा – निशा इतना दूर क्यों बैठी हो जैसे मैं कोई पराया हूँ.

निशा – ऐसा क्यों बोलते हो अंकुश. बस मुझे शर्म आती है और कोई बात नहीं.

मैं – मुझसे अब कैसी शर्म? अब तो हम दोनों प्रेमी हैं ना??

निशा – फिर भी मुझे शर्म आती है. मैं चुप हो गया, और गाड़ी दौड़ा दी.

अचानक से सड़क में एक गड्ढा आया, मैंने एकदम से ब्रेक लगाए. बुलेट की पिछली सीट थोड़ी ऊँची सी होती है ड्राइवर सीट से. तो ब्रेक लगते ही वो सरकती हुई मेरी पीठ से चिपक गयी और डर के मारे मेरे सीने में अपनी बाहें लपेट कर चीख पड़ी.

मैं – क्या हुआ डार्लिंग?

निशा – आराम से नहीं चला सकते?

मैं – आराम से चलाने का समय नहीं है मेरी जान. रोड खराब है. लेट हो गये तो रात में इन खड्डों में वैसे भी मुश्किल होगी. तुम ऐसे ही बैठी रहो ना. क्या दिक्कत है.

निशा हम्म कर के मुझे कस के पकड़ कर बैठ गयी. मैं बीच-2 मैं ब्रेक मार देता तो वो और ज़्यादा चिपक जाती. उसके 34” के ठोस बूब्स मेरी पीठ पर दब रहे थे.

कुछ देर में उसकी शर्म कम हो गयी और उसने मेरे कंधे से अपना गाल सटा लिया, फिर मेरे गाल को चूमकर बोली – अब खुश??

मैं – तुम्हारा साथ तो मेरे लिए हर हाल में खुशी ही देता है. जानेमन, तुम खुश हो कि नहीं?? या अब भी शर्म आ रही है?

निशा – आप मुझे बिल्कुल बेशर्म बना दोगे.

मैं – अरे यार, ऐसे बैठने से भी कोई बेशर्म हो जाता है क्या? मैंने उसे और थोड़ा खोलने के लिए कहा - निशा मेरे सीने को पकड़ने से मुझे ड्राइविंग में थोड़ा प्राब्लम होती है. तुम ना मेरी कमर को पकड़ लो.

निशा – आप जहाँ कहोगे वहीं पकड़ लूँगी जानू. ये कह कर उसने मेरी जांघों पर हाथ रख लिए.

मैं – थोड़ा अंदर की साइड में पकड़ो, नहीं तो तुम्हें सपोर्ट नहीं मिलेगा.

निशा – धत्त… अब आप मुझे बिल्कुल बेशर्म करना चाहते हैं. फिर कुछ सोच कर… अच्छा चलिए आपकी खुशी के लिए ये भी सही, और उसने अपने हाथ मेरी जाँघों के जोड़ पर रख लिए.

गाड़ी के जंप के कारण उसके हाथ भी इधर-उधर होते. तो उसकी उंगलियाँ मेरे लंड को छू जाती. आहहह… ये हल्का सा टच ही मेरे लिए बड़ा सुखद लग रहा था.

निशा भी अब अपनी शर्म से निकलती जा रही थी और अपनी उंगलियों को मेरे लंड के ऊपर फिरने लगी. पीछे से वो और अच्छे से चिपक गयी, अब उसकी जांघें मेरी जाँघों से सट चुकी थी. जो कभी-2 गाड़ी के जंप से आपस में रगड़ जाती. हम दोनों पर एक अनूठा सा उन्माद छाता जा रहा था. लेकिन ये उन्माद कुछ ही देर का था. उसका गांव आ चुका था, और वो फिर से मुझसे दूरी बना कर बैठ गयी. हम जब उसके घर पहुँचे तो घर में अकेली उसकी माँ थी, उसके भाई राजेश शहर में नौकरी पर थे, जो हफ्ते के हफ्ते ही आते थे, पिताजी अभी खेतों से आए नहीं थे.

निशा को मेरे साथ देखकर वो चौंकते हुए बोली – ये कौन है बेटी?

निशा – इनको नहीं पहचाना मम्मी? ये दीदी के छोटे देवर, अंकुश नाम है इनका.

मम्मी – ओह. आओ बेटा बैठो. माफ़ करना कभी देखा नहीं ना तुम्हें इसलिए पूछ लिया.

मैं – कोई बात नहीं मम्मी जी. वैसे भी मैं भैया की शादी में ही आया था.

मम्मी – हां, लेकिन तब तुम बहुत छोटे से थे. अब देखो. क्या गबरू जवान हो गये हो.

मैं - ये सब आपकी बेटी का ही कमाल है मम्मी जी.

वो एकदम से चौंकते हुए बोली – मेरी बेटी का? वो कैसे?

मैं – अरे मम्मी जी, भाभी मेरा इतना ख़याल रखती हैं. कि पुछो मत. मुझे कभी अपनी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी.

मम्मी – ओह हां… मोहिनी है ही ऐसी, यहाँ भी सब का बहुत ख़याल करती थी.

कुछ देर में निशा के पिताजी भी आ गये. वो भी मिलकर बड़े खुश हुए. और घर के हाल-चाल पूछे. खाना पीना खाकर वो लोग जल्दी ही सोते थे. सो कुछ देर और इधर-उधर की बातें हुई. और वो दोनों सोने चले गये.

जाते हुए निशा की मम्मी ने निशा से कहा – निशा बेटा सोने से पहले अंकुश जी को ध्यान से दूध पिला देना.

निशा का घर उनके घर की ज़रूरत के हिसाब से जैसा मध्यम वर्गीय ग्रामीण लोगों का होना चाहिए उस हिसाब से ही था. तीन कमरे, जिनमें एक में उसके मम्मी-पापा, एक में निशा और एक उसके भाई का था, एक बड़ा सा बैठक कम हॉल जिसमें एक टीवी भी लगा हुआ था. हॉल से बाहर एक बरामदा. उसके बाद थोड़ी खाली जगह जो बाउंड्री से घिरी हुई थी. हम इस समय हॉल में बैठे टीवी देख रहे थे. मैं सोफे पर था, और वो साइड में पड़ी सोफा चेयर पर बैठी थी.

मैंने उसकी मम्मी के जाने के कुछ देर बाद निशा से कहा – क्यों डार्लिंग. क्या ख़याल है?

निशा मेरी तरफ मुस्कराते हुए बोली – किस बात का?

मैं – अपनी मम्मी की आज्ञा का पालन नहीं करोगी?

निशा हंस कर बोली - ओह… वो…. तो अभी चाहिए. या सोने से पहले.

मैंने कहा शुभ काम में देरी नहीं करना चाहिए. मेरी बात सुनकर वो चेयर से उठी, और मेरे आगे से होकर किचन की तरफ दूध लाने के लिए जाने लगी. मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया. तो वो एक झोंके के साथ मेरी गोद में आ गिरी. गिरने से बचने के लिए उसने मेरे गले में बाहें डाल दी.

निशा मेरी आँखों में देखते हुए बोली – क्या करते हो? खुद ही कहते हो दूध लाने को और रोक भी रहे हो.

मैं उस दूध की बात नहीं कर रहा जानेमन, मुझे तो ये वाला दूध पीना है. ये कहकर मैंने उसके एक संतरे पर अपना हाथ रख दिया.

निशा - हटो बदमाश कहीं के. उसने मुझे हल्के से सीने में मुक्का मारा. कितना ऊटपटांग सोचते हो.

मैं – इसमें क्या ग़लत कहा है?? मैंने दूध ही तो माँगा है, नहीं पिलाना है तो मत पिलाओ. मैं सुबह मम्मी को बोल दूँगा. कि आपकी बेटी ने मुझे दूध दिया ही नहीं.

उसने शर्म से अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया. मैंने उसकी थोड़ी को अपनी उंगलियों से ऊपर कर के उसका चेहरा उठाया और उसकी झील सी गहरी आँखों में झाँकते हुए कहा.

मैं – तुम कितनी मासूम हो निशु? मैं सच में बहुत सौभाग्यशाली हूँ जिसे इतनी मासूम, और सुंदर सी प्यारी सी लड़की का प्यार मिल रहा है. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ मेरी जान. आई लव यू.

निशा - आई लव यू टू जानू…

इतना कहकर वो मेरे सीने से लिपट गयी. मैंने धीरे से उसकी पीठ पर हाथ रख कर सहला दिया और एक हाथ से उसके गाल को सहलाकर उसके होंठ चूम लिए.

निशा - मैं तुमसे दूर नहीं रह सकती अंकुश.

मैं – मैं कौन सा तुमसे दूर रह सकता हूँ. लेकिन हमें कुछ दिन तो रहना ही पड़ेगा.

निशा – अगर तुम मुझे नहीं मिले तो में मर जाऊंगी अंकुश. सीईईईईईईईई.

उसके होंठों पर उंगली रख कर कहा मैंने – ऐसे मरने गिरने की बात नहीं करते. भाभी ने मुझे प्रॉमिस किया है. चाहे कुछ हो जाए. हम मिलकर ही रहेंगे.

निशा – सच??? क्या दीदी को पता है हमारे प्यार के बारे में?

मैं – हां, और ये बात उन्होंने खुद से ही कही है. अब हमें बस कुछ सालों तक इंतजार करना पड़ेगा.

वो फिर से मुझसे लिपट गयी.

निशा - ओह जानू मैं आज बहुत खुश हूँ. लेकिन एक प्रॉमिस करो. तुम जल्दी-जल्दी मुझसे मिलने आया करोगे. कम से कम महीने में एक बार.

मैं – मुझे कोई प्राब्लम नहीं है. लेकिन तुम खुद सोचो. मेरा बार-बार यहाँ आना क्या लोगों में शक पैदा नहीं करेगा? क्या तुम्हारे मम्मी-पापा ये चाहेंगे?

निशा – तो फिर मैं कैसे रहूंगी इतने दिन? कम-से-कम फोन तो करते रहना.

मैं – हां, ये सही रहेगा. हम रोज़ रात को फोन से बात कर लिया करेंगे.

इतनी देर से निशा मेरी गोद में बैठी थी. उसकी गोल-मटोल छोटी लेकिन मुलायम गान्ड की गर्मी से मेरा लंड टाइट जीन्स में व्याकुल होने लगा. मैं अपने कपड़े नहीं लाया था.

मैंने निशा से कहा – यार मुझे कुछ चेंज करना है. ये जीन्स में कम्फर्टेबल नहीं लग रहा.

निशा मेरी गोद से उठ खड़ी हुई, और मेरा हाथ पकड़ कर अपने भैया के रूम में ले गयी. उसकी अलमारी से एक पजामा और टीशर्ट निकाल कर मुझे पकड़ा दिया. मैंने अपने कपड़े निकाल दिए और टीशर्ट पहन ली. मैंने जैसे ही अपनी जीन्स निकाली. मेरे फ्रेंची में खड़े मेरे लंड को देखकर वो शर्मा गयी और अपना मुँह फेर लिया. मैंने उसे कुछ नहीं कहा और मुसकुरा कर पजामा पहन लिया. मेरे सोने का इंतजाम भी इसी रूम में था, तो फिर हम दोनों उसमें पड़े पलंग पर बैठ गये.

मैंने फिर एक बार निशा को अपनी गोद में खींच लिया और उसके होंठ चूमकर कहा - निशा ! मेरी एक इच्छा पूरी करोगी?

निशा – क्या? अगर मेरे बस में हुआ तो ज़रूर पूरी करूँगी.

मैं - मुझे तुम्हारे रूप सौंदर्य के दर्शन करने हैं?

निशा – क्यों? अभी क्या मैं पर्दे में हूँ?

मैं – तुम्हारा ये संगमरमर सा बदन तो पर्दे में है ना.

ये आप कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? भला ये भी कोई इच्छा हुई? वो थोड़ा नाराज़गी भरे स्वर में बोली.

मैं बस तुम्हारे इस सुन्दर बदन की छवि अपने मन में बसाना चाहता हूँ. जिसके सहारे आने वाला लंबा समय गुज़ार सकूँ. मैं तुमसे कोई ज़ोर जबरदस्ती नहीं करूँगा, अगर अपने प्यार पर भरोसा कर सको तो.

निशा खामोशी से मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, फिर कुछ सोच कर बोली - ठीक है, मैं आपसे सच्चा प्रेम करती हूँ. और आशा करती हूँ. कि आप भी एक सच्चे प्रेमी की नज़र से ही मुझे देखेंगे.

ये कह कर वो मेरी तरफ पीठ कर के खड़ी हो गयी. और बोली. देख लीजिए जैसे देखना चाहते हैं.

मैं उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया. और उसके गले पर अपने प्यासे होंठ रख दिए. उसके होंठों से एक मीठी सी सिसकी निकल पड़ी. और उसने कस कर अपनी आँखें बंद कर ली. निशा की कमीज़ की पीठ पर एक ज़िप थी, जो उसके गले से लेकर कमर तक पहुँचती थी. मैंने उसके कंधों पर अपने हाथ रखकर उसे सहलाते हुए. अपने हाथ धीरे-2 उसकी ज़िप पर ले आया. कुछ देर ज़िप के आस-पास हाथों को फिराया और उसकी ज़िप का लॉक अपने अंगूठे में लेकर धीरे-धीरे नीचे की तरफ खींचने लगा.

जैसे-जैसे उसकी ज़िप नीचे को खुलती जा रही थी, उसकी दूधिया रंग की पीठ किसी संगमरमर सी चिकनी मेरी आँखों के सामने किसी अनमोल खजाने की तरह खुलती जा रही थी. कमर तक ज़िप खोलने के बाद मैंने उसकी पीठ पर उसकी ब्रा की स्ट्रैप के ठीक ऊपर अपने गीले होंठ रख दिए. उसकी पीठ काँप कर और अंदर को चली गयी, और उसके मुँह से एक और सिसकी निकली.इस्शह..सस्सिईईईईईई.

अब में उसकी पीठ को ऊपर की तरफ चूमता हुआ. उसकी नंगी पीठ पर अपने हाथ फिरा रहा था. निशा तो जैसे कहीं खो ही गयी थी. फिर मेरे हाथ उसकी पीठ सहलाते हुए कंधों पर पहुँचे और उसकी कमीज़ को दोनों बाजुओं से नीचे सरका दिया. उसकी कमीज़ उसके बदन से सरसराती हुई. उसके कदमों में जा गिरी. मैंने उसे कंधों से पकड़कर अपनी तरफ घुमाया. निशा किसी कठपुतली की तरह मेरे हाथों के इशारों पर चल रही थी.

जब मेरी नज़र निशा के बूब्स पर पड़ी… उफफफफफफफफफफफ.. क्या दूधिया बदन था निशा का?? गोल-गोल टेनिस की बॉल के साइज़ के उसके दूधिया बूब्स एक छोटी सी गुलाबी रंग की ब्रा में क़ैद उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे. दोनों के बीच की चौड़ी खाई मुझे ललचा रही थी. मैं अपने आपको रोक नहीं पाया और झुक कर उसके उभारों के बीच की खाई पर अपने तपते होंठ रख दिए.

निशा ने आअहह.. भरते हुए मेरे सर को पकड़ लिया, फिर मैंने उसके उभारों के दोनों ओर की ढलान को बारी-बारी से अपनी खुरदुरी जीभ से चाटा और उन्हें चूमते हुए निशा के सपाट पेट की तरफ बढ़ने लगा. निशा अपनी आँखें मूँदे अपने अंतर्मन में इस असीम आनंद की अनुभूति को महसूस कर के दूर कहीं आसमानों में उड़ चली थी. मन नहीं माना तो मेरे शरारती हाथ एक बार उसके सुंदर बूब्स पर टिक ही गये और उन्हें सहलाते हुए उसकी बगलों से होते हुए, निशा की पतली कमर पर आ टिके.

मेरे हाथ किसी स्वचालित यन्त्र की तरह निशा की पतली कमर को सहलाते हुए, मेरी उंगलियाँ निशा की सलवार के नाड़े की गाँठ पर थी. कुछ ही देर में निशा की सलवार भी उसके कदमों में जा गिरी. मैं थोड़ा पीछे होकर निशा के कदमों में बैठ गया और उसके संगमरमरी बदन की सुंदरता का रस अपनी आँखों से पीने लगा.

वाह क्या सुडौल जांघें थी उसकी? जरा सा भी एक्सट्रा फैट नहीं था उसके बदन पर. साँचे में ढला उसका दूध जैसा गोरा बदन किसी संगमरमर की मूरत जैसा मेरे सामने था. निशा मात्र दो छोटे-से अधोवस्त्रों में मेरे सामने किसी बेजान मूरत सी खड़ी थी. उस कमसिन कली ने अपने प्रियतम की इच्छा का सम्मान करते हुए अपने अनछुए कोमल बदन को उसके हवाले कर दिया था.

पर किसलिए?

एक विश्वास पर. जो उसके निश्छल प्रेम ने उसके अंदर पैदा किया था. उसने अपने प्रियतम पर आँख बंद कर के भरोसा कर लिया था.

मैं उसकी केले जैसी चिकनी जांघों को सहलाते हुए उन्हें चूमने, चाटने लगा. मेरी छुअन से उसका बदन थरथरा रहा था. मैं घुटने मोड़ कर बैठा था, मेरे हाथ बड़े प्यार और दुलार से उसके शरीर पर तैर रहे थे. वो निशा के शरीर के जिस हिस्से में होते, वो हिस्सा किसी जुड़ी के मरीज़ की तरह काँपने लगता. फिर मैंने उसकी पतली कमर को अपने हाथों के बीच लेकर उसे पलटा दिया. अब उसकी छोटी सी पैंटी में कसे उसके गोल-गोल नितंब मेरे सामने थे. इन्हें मैं हौले-हौले सहलाने लगा.

मेरी उंगलियाँ उसकी छोटी सी पैंटी की एलास्टिक में फँस गयी, और उसे नीचे को खींच दिया. निशा की बॉल के साइज़ के उसके नितंब एकदम गोल-गोल सुडौल, गोरे-गोरे, थोड़े बाहर को निकले हुए मेरी आँखों के सामने थे, जिन्हें सहलाकर मैंने चूम लिया. नीचे बैठे ही मैंने उसे अपनी तरफ पलटा लिया, जांघों के जोड़ के बीच की कलाकृति अब मेरे सामने थी. जिसकी सुंदरता बयान करने लायक मेरे पास शब्द नहीं थे.

हल्के बालों से सजे पतले बंद होंठों के बीच एक पतली सी रेखा जैसी उसकी रस सुरंग, जो नीचे से ऊपर की तरफ थोड़ी सी मांसल दिखाई दे रही थी. मैंने अपने हाथ से उसे एक बार बड़े प्यार से सहलाया. और निशा की टाँगों को थोड़ा सा अलग कर के एक किस उसकी प्यारी चूत के बंद होंठों के ऊपर कर दिया.

निशा – ईइसस्स्स्शह… आअहह…

ना चाहते हुए निशा के मुँह से एक दबी सी सिसकी निकल ही गयी. मैंने फिर से उसे पलटा दिया और फिर से एक बार उसके नितंबों को चूमा. नितंबों के बाद उसकी कमर, फिर उसकी पीठ चूमते-चूमते मैं ऊपर उठता चला गया, फिर मेरी उंगलियों ने उसकी ब्रा के हुक भी खोल दिए.

उसकी पीठ से सट कर खड़ा होते हुए मैंने उसके कान की लौ को चूमकर कहा- निशा मेरी जान, तुम सचमुच सुंदरता की जीती-जागती मूरत हो. तुमने आज अपना ये संगमरमर सा सुंदर बदन दिखाकर मुझे अपना दीवाना बना दिया है. अब में तुम्हारे इंतजार में कुछ वर्ष तो क्या, सदियाँ गुज़ार सकता हूँ.

ये कहकर मैंने उसके अनार जैसे बूब्स को अपनी मुट्ठी में भर लिया और सहलाने लगा. निशा एकदम से पलट कर मेरे गले से लिपट गयी, उसके बूब्स मेरे सीने में दब कर रह गये.

निशा मेरे चेहरे पर अनगिनत किस करते हुए बोली - अंकुश मैं तुम्हें पसंद आ गयी, ये मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है. तुम्हारी ये छुअन, तुम्हारी आवाज़ सुनकर मेरे दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं. आई लव यू जान.

मैं - आई लव यू टू निशा. तुम्हारी खुशबू, तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारा तो रूप ही कुछ ऐसा है कि, मैं उसमें खो जाता हूँ. अब तुम अपने कपड़े पहन लो, तुम्हारे रूप रस का पान कर के मैं धन्य हो गया.

निशा ने फिर एक बार मुझे कसकर अपने गले लगाया और कपड़े पहन कर रूम से बाहर निकल गयी मेरे लिए दूध लेने. मैं खुद पर आश्चर्य चकित था, कि एक कमसिन बाला. पूर्ण रूप से नग्न मेरे सामने थी और मेरे मन में एक बार भी उसे भोगने की इच्छा तक नहीं हुई. क्या ये मेरा निशा के लिए निश्चल प्रेम था? जो शायद मेरी जिंदगी में पहली और आख़िरी बार हुआ था. दूसरे दिन सुबह-सुबह मैं निशा और उसके मम्मी पापा से विदा लेकर अपने घर वापस चल दिया.

निशा मुझे गांव के बाहर तक छोड़ने आई. विदा होते वक़्त स्वतः ही हम दोनों की आँखें छलक गयीं. हम एक दूसरे को किस कर के अंतिम बार गले मिले. फिर एक दूसरे को बाइ बोलकर अपने-अपने घर को चल दिए.

रास्ते में ही शांति बुआ का घर पड़ता था, जो निशा के गांव से ज़्यादा दूर नहीं था, तो सोचा बुआ का हाल चाल पूछते हुए ही निकलता हूँ. कभी आया तो नहीं था पहले बुआ के यहाँ, तो लोगों से घर का पता पूछ कर पहुँचा उनके दरवाजे पर.

बुलेट की आवाज़ सुन कर एक लड़की घर के अंदर से भागती हुई आई. मैं उस लड़की को देखता ही रह गया. स्कूल यूनिफॉर्म में वो शायद स्कूल जाने के लिए तैयार ही हुई थी, सफेद रंग की शर्ट और स्लेटी लाल चौखाने रंग की घुटनों तक की स्कर्ट में वो एक बहुत ही सुंदर गुड़िया जैसी लगी मुझे.

उसकी कसी हुई शर्ट में क़ैद 32-33” के उसके चुचे बटन तोड़कर बाहर निकलने को आतुर हो रहे थे. पतली सी कमर के नीचे थोड़ी उठी हुई गान्ड, देख कर मेरे अंदर कुछ–2 होने लगा.

अपनी बड़ी-2 कजरारी आँखें मटका कर वो बोली – कौन हो तुम?? किससे मिलना है?

मैं – शांति बुआ का घर यही है?

वो – हां, लेकिन तुम कौन हो जो मम्मी को बुआ बोल रहे हो?

मैं – ओह तो तुम उनकी बेटी हो… मेरा नाम अंकुश है, अभी कुछ दिन पहले मेरे भैया की शादी थी, तुम उसमें शामिल नहीं हुई थी.

वो – ओह अंकुश भैया. नमस्ते, सॉरी, मैंने आपको पहचाना नहीं, आओ.. आओ… फिर वो बुआ को आवाज़ देते हुए चिल्लाई. मम्मी… मम्मी…

अंदर से बुआ की आवाज़ आई - क्या है तनु, देख नहीं रही. तेरे लिए नाश्ता तैयार कर रही हूँ, स्कूल के लिए लेट हो रहा है.

तब तक मैं बाइक खड़ी कर के उसके पीछे–2 अंदर आया, उसके मटकते कूल्हे मुझे अपनी ओर लुभा रहे थे.

वो – मम्मी थोड़ा बाहर आकर देखो तो सही, कौन आया है?

बुआ अपने माथे का पसीना अपने पल्लू से पोंछती हुई रसोई से बाहर आई और मुझे देखते ही, अरे अंकुश!!!, चिल्लाते हुए दौड़कर मेरे सीने से लग गयी.

उनकी ये हरकत देख कर पास खड़ी तन्वी अपनी बड़ी–2 आँखें फाड़े उन्हें देखने लगी.

मैंने बुआ से पूछा – बुआ ये आपकी बेटी है?

बुआ – हां, बड़ी वाली तन्वी. तूने देखा तो है इसे कई बार गांव गयी है मेरे साथ.

मैं – ये वही तन्वी है ना? जिसकी नाक बहती रहती थी.

बुआ हँसते हुए बोली – हेहेहे… हां, वही तन्वी है, अब देख. अब नहीं बहती इसकी नाक.

तन्वी गुस्सा होते हुए बोली – क्या मम्मी आप भी चिढ़ाने लगी मुझे? फिर वो मेरी तरफ आँखें तरेर कर बोली.

तन्वी - आपने कब देखी मेरी नाक बहते हुए? हां??

बुआ – अरे नहीं बेटा, एक बार जब में तुझे लेकर गांव गयी थी, तब तुझे सर्दी हो गयी थी. तो तब कि बात कर रहा है अंकुश.

वैसे बड़े भाई की बात का क्या बुरा मानना. बेटा तू बैठ पहले मैं इसको स्कूल भेज दूं. फिर बैठ कर बात करते हैं. ठीक है और वो फिर से रसोई में घुस गयीं. तन्वी मुझे घूर-2 कर देख रही थी.

मैंने कहा – माफ़ करना मेरी गुड़िया, मैं तो ऐसे ही मज़ाक कर रहा था. तुझे बुरा लगा तो सॉरी और मैंने अपने कान पकड़ लिए तो वो खुश हो गयी.

तन्वी – कोई बात नहीं भैया.

फिर वो बुआ को आवाज़ देकर बोली – मम्मी जल्दी करो मैं लेट हो रही हूँ.

मैंने कहा – कितना दूर है तेरा स्कूल?

तन्वी – अरे भैया. दूसरे गांव में है, यहाँ से 3 किमी दूर है और मुझे साइकल से जाना पड़ता है, फिर घड़ी की तरफ देख कर बोली – ओफ़्फओ… मैं तो ऑलरेडी लेट हो गयी. अब पहला पीरियड तो मिलने वाला नहीं है. मम्मी… जल्दी करो… प्लीज़…

बुआ – अभी लाई. बस दो मिनिट.

मैं – तू कहे तो मैं छोड़ दूं तुझे स्कूल.

तन्वी – फिर उधर से कैसे आऊंगी?

तब तक बुआ किचन से उसका टिफ़िन बना कर ले आई और बोली – स्कूल छूटने के बाद भैया ही ले आएगा तुझे. क्यों अंकुश?? ले आएगा ना?

मैं – मुझे तो जाना था बुआ अभी. वो मैं निशा को छोड़ने आया था, लौटते में सोचा आपसे भेंट करता चलूं.

बुआ – अरे तो शाम को चले जाना. अभी सुबह-सुबह क्या करेगा घर जाकर?

मैंने कहा - ठीक है, फिर चल तन्वी. तुझे स्कूल छोड़ देता हूँ.

दूसरे गाँव का रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ था. तन्वी मेरे पीछे दोनों ओर को पैर कर के बैठी थी. कभी ब्रेक लगाने पड़ते थे तो वो मेरे से सट जाती. और उसके कच्चे अनार मेरी पीठ पर दब जाते. फिर जब गाड़ी उछलती तो वो रगड़ जाते. मेरा लंड उसके स्पर्श से ही सर उठाने लगा था. एक बार तो ज़ोर से ब्रेक लगते–2 भी गाड़ी एक खड्डे मैं चली ही गयी और ज़ोर से उछल गयी. अब बुलेट पर पीछे कुछ ज़्यादा ही झटका लगता है तो पहले तो वो मेरे ऊपर गिरी और फिर ऊपर को उछली, जिसकी वजह से उसके अनार तो पीठ से रगडे ही साथ ही उसकी चूत भी मेरी कमर से रगड़ा खा गयी, और वो ज़ोर से सिसक पड़ी. शायद उसको भी मज़ा आया होगा.

मैंने कहा – क्या हुआ तन्वी?

तन्वी – भैया धीरे–धीरे चलाओ, ये रास्ता बहुत खराब है, साइकल से चलना भी मुश्किल हो जाता है.

मैं – हां वो तो मैं देख ही रहा हूँ, पता नहीं लोगों का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं जाता.

खैर जैसे तैसे कर के हम उसके स्कूल पहुँच ही गये, उसे स्कूल छोड़ कर मैं बुआ के घर वापस आ गया. जब मैं घर लौटा तो बुआ घर में झाड़ू लगा रही थी. वो एक लो कट गले की नाईट ड्रेस पहने हुए थी. झुक कर झाड़ू लगाने से उनके बड़े-2 खरबूज जैसे स्तन लटक कर बाहर को झाँक रहे थे. मैं वहीं खड़ा होकर ये नज़ारा देख रहा था, कि इतने में उनकी नज़र पड़ गयी और सीधी खड़े होते हुए हंस कर बोली.

शांति बुआ – क्यों रे बदमाश, क्या देख रहा था?

मैंने भी हँसते हुए कहा – कुछ नहीं बुआ, तुम्हारा समान सामने आ गया तो देखने लगा.

शांति बुआ – चल बैठ मैं थोड़ी देर में झाड़ू मारकर फिर बैठती हूँ तेरे पास.

मैंने बुआ से पूछा – बुआ बाकी लोग कहाँ गये?

शांति बुआ – तेरे फूफा इस समय खेतों में होते हैं. छोटी यहीं गाँव के स्कूल में है, उसका स्कूल जल्दी शुरू हो जाता है, दो घंटे में आ भी जाएगी.

इतना बोलकर वो फिर से झुककर झाड़ू मारने लगी, टाइट नाईट ड्रेस में बुआ की चौड़ी गान्ड झुकने से और ज़्यादा बड़ी दिख रही थी. शायद वो नीचे पैंटी भी नहीं पहने थी, जिस कारण से उसके दो पाटों के बीच की दरार किसी नाली की तरह साफ-साफ दिखाई दे रही थी. सोने पे सुहागा ये था, कि जब वो खड़ी हुई थी, तो टाइट नाईट ड्रेस का कपड़ा शांति बुआ की गान्ड की दरार में फँस गया था, जो अभी तक बेचारा निकलने के लिए फड़फड़ा रहा था. लेकिन दोनों पाटों का दबाव इतना ज़्यादा था, कि वो वहाँ से टस से मस नहीं हो पाया. बुआ की गान्ड के नज़ारे ने मेरे लंड की ऐसी तैसी कर दी, वो साला जीन्स के अंदर फड़फड़ाने लगा.

मैं चुपके से बुआ के पीछे गया, और उसकी गान्ड से जाकर चिपक गया. शांति बुआ तो एकदम से हिल ही गयी, और अपनी गान्ड को मेरे लंड पर और ज़ोर से दबा दिया, तो मैंने भी झुक कर बुआ के खरबूजों को पकड़ लिया.

बुआ झाड़ू छोड़कर खड़ी हो गयी, और अपनी गान्ड को मेरे लंड के आगे दबाते हुए बोली – अंकुश थोड़ा सा तो सब्र कर ले. मुझे पता है, तुझे मेरी गान्ड ने परेशान कर रखा है. ये हरामजादी दिनों दिन चौड़ी ही होती जा रही है.
मैंने बुआ की चुचियों को मसलते हुए कहा – लगता है, फूफा जी, इस पर ज़्यादा ध्यान देते हैं. तभी ये चौड़ी होती जा रही है.

बुआ – ना अंकुश, उन्हें गान्ड मारने का शौक नहीं है पर वो ज़्यादा तर पीछे से ही करते हैं. अब छोड़ मुझे झाड़ू मारने दे. फिर आराम से बैठते हैं.

मैंने झुक कर बुआ की टाइट नाईट ड्रेस को उठाकर उनकी गान्ड को नंगा करते हुए कहा – इतना समय नहीं है बुआ. मेरा लंड अब और इंतजार नहीं कर पाएगा.

इतना कह कर मैंने अपनी जीन्स उतार दी, और फ्रेंची की साइड से लंड बाहर निकाल कर बुआ की गान्ड की दरार में फँसा कर ऊपर से नीचे रगड़ने लगा. मेरे नंगे लंड का अहसास अपनी नंगी गान्ड पर होते ही बुआ सारी ना नुकुर भूल गयी, और अपनी आँखें बंद कर के उसने अपने हाथ सामने की दीवार पर टिका दिए. मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जा कर बुआ की मालपुए जैसी चूत को मुट्ठी में भर कर मसल दिया.

बुआ की चूत रस छोड़ने लगी, उसने भी अपना हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख कर और दबा दिया, और सिसकते हुए बोली – सस्सिईईई. हाईएरे. ये क्या कर दिया तूने. मेरी चूत में आग लगा दी. अब और देर मत कर.

मैंने अपनी दो उंगलियाँ बुआ की चूत में डाल दी. और अंदर बाहर करने लगा. चूत हद से ज़्यादा गीली हो गयी. फिर मैंने बुआ की नाईट ड्रेस को उसके सर के ऊपर से निकाल कर उसे पूरी तरह नंगा कर दिया. अपने लौड़े को थूक लगा कर गीला किया, और बुआ की गीली चूत में पेल दिया. सरसराता हुआ मेरा साढ़े आठ इंच लंबा और सख्त रॉड जैसा लंड जैसे ही जड़ तक बुआ की चूत में गया, थप्पाक से मेरी जांघें उसके भारी चुतड़ों पर पड़ी, और इसी के साथ ही बुआ के मुँह से एक लंबी कराह निकल गयी.

शांति बुआ - हआइईईई रीई ए… बेरहम… नाशपीटे… मार डाला रे ज़ालिम… ई… ई… ई…, थोड़ा आराम से डालता. फाड़ दी मेरी चूत...

लेकिन मैंने अनसुना करते हुए, अपने धक्के शुरू कर दिए, और बुआ की धक्कमपेल चुदाई शुरू कर दी. एक बार खड़े-खड़े चोदने के बाद, जब वो झड़ गयी, तो फिर हम सोफे पर आ गये. बुआ को घोड़ी बना कर पहले कुछ देर उसकी चूत मारी, उसके बाद मैंने अपना लंड उसकी गद्देदार गान्ड में पेल दिया. उलट पलट कर मैंने शांति बुआ को अच्छे से रगड़-रगड़ कर दो बार चोदा. बुआ की सारी खुजली मिट गयी.

मैंने कहा – शांति बुआ देख लो मैंने आपका चैलैंज पूरा कर दिया. फिर मत कहना.

शांति बुआ – हां रे अंकुश. तू सच में मर्द हो गया है, मेरे जैसी दो बच्चों की औरत को बहुत ही मस्त चोदा और गांड भी मस्त तरीके से मारी.

उसके बाद उन्होंने मेरे लिए चाय बनाई, और अपना काम खतम कर के नहाने चली गयी. इतने में फूफा भी आ गये, और उसके कुछ देर बाद उनकी छोटी बेटी भी स्कूल से आ गयी. सबने मिलकर खाना खाया, उसके बाद मैं तन्वी को लेने उसके स्कूल चला गया. तन्वी ने घर आकर बताया कि कल से उसकी रक्षाबन्धन की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं जो जन्माष्टमी तक चलेगी.

तो मैंने कहा - बुआ ये वैसे भी भैया की शादी में नहीं जा पाई थी, क्यों ना इसे मैं अपने साथ ले जाऊं. रमा दीदी के साथ इसका मन भी लगा रहेगा.

मेरी बात सुन कर तन्वी भी कहने लगी - हां मम्मी मैं भैया के साथ जाऊंगी. मैंने मामा, मामियों को कब से नहीं देखा.

फूफा जी ने भी हां कर दी तो फिर बुआ ने उसे परमिशन दे ही दी, और उसी शाम मैं तन्वी को लेकर अपने घर वापस लौट लिया. रास्ते में बहुत ज़्यादा कुछ नहीं हुआ, मैं बस थोड़ा बहुत उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में ही पूछा. लेकिन स्कूल जाते-आते वक़्त की हल्की सी मस्ती याद आते ही, तन्वी ने थोड़ी बहुत हरकतें ऐसी की जो हम दोनों के शरीर में मस्ती भरने के लिए काफ़ी थी.

तन्वी को मेरे साथ देख कर भाभी ने पूछा – अरे देवर जी ये कौन है? एक को लेकर गये थे, और दूसरी के साथ लौटे हो. ये क्या चक्कर है भाई.

मैंने हँसते हुए कहा – कोई चक्कर नहीं है भाभी, ये शांति बुआ की बेटी तन्वी है. आप नहीं जानती इसको.

मेरे बताते ही रमा दीदी ने उसे पहचान लिया. और वो उसके गले लग गयी. फिर कुछ देर इधर-उधर की बातें की और अपने घर गाँव के हाल चाल पुछे. खैर इसी तरह आज का दिन भी शांति से समाप्त हुआ.
 
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