UPDATE 16
मुझे देखते ही सब खुश हो गये.
मोहिनी भाभी मेरी टाँग खींचते हुए बोली - लो जी, आ गये देवर राजा. बड़े एटीट्यूड वाले हैं. भाभी बेचारी कब से इंतजार में हैं कि उनके प्यारे, दुलारे, जगत से न्यारे देवर जी आएँ तो वो उन्हें लाड़ करें.
मैंने हँसते हुए. पीछे से उनके गले में बाहें डाल दी और बोला – क्या भाभी. मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी. आप मेरी ही टाँग खींचने लगी.
मोहिनी भाभी हँसते हुए बोली – अरे मेरे प्यारे देवर. यहाँ सब कब से तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. और तुम हो कि अभी तक सोए पड़े थे. खैर चलो. आज आपकी छोटी भाभी, कामिनी, का नंबर है लाड़ करने का. बड़ी से तो बहुत लाड़ ले लिया. जाओ जाकर कामिनी की गोद में बैठो.
फिर मेरे कान में फुसफुसा कर बोली – अंकुश कामिनी भाभी पर कोई रहम मत करना. पूरा वजन रख कर बैठना आराम से.
मैं मुस्कराते हुए कामिनी भाभी के आगे अपने घुटने टेक कर बैठ गया. और उनके चिन को उठा कर फेस अपनी तरफ कर के बोला – भाभी बिना देवर की ओर देखे ही लाड़ करोगी?
उन्होंने मुझे एक बार भरपूर नज़र डालकर देखा. एक सुर्ख लाल जोड़े में वो इस समय बहुत सुंदर लगा रही थी. कुछ– कुछ इस तरह की छवि.
एक दम चाँद का टुकड़ा. होंठों पर सुर्ख लिपस्टिक, गोरे-गोरे गाल, हल्की सी लाली लिए. लेकिन मेकअप के बाद भी उनके एक गाल पर कुछ निशान सा था.
कामिनी भाभी अपनी प्यारी सी मीठी सी आवाज़ में कहा – देवर जी आइए ना मेरी गोद में बैठिए.
मैं – आप मुझे झेल पाएँगी?
मेरी बात पर सभी हँसने लगे और कामिनी भाभी ने शर्म से नज़र झुका ली.
मैंने बुआ से पूछा – मेरी बात पर आप सभी लोग हंस क्यों रहे हो?
बुआ – कामिनी तेरे बड़े भाई को झेल चुकी है, तुझे झेलने में क्या तकलीफ़ होगी?
इस बात पर बुआ समेत सभी ज़ोर-2 से हँसने लगे.
मैंने झेंपते हुए कहा – अरे मैं तो अपने वजन की बात कर रहा था.
कामिनी भाभी – कोशिश करूँगी, आप बैठिए.
मैं अपनी तशरीफ़ लेकर उनकी गोद में बैठने लगा. मैंने धीरे-धीरे कर के अपना सारा वजन उनकी जांघों पर डाल दिया. उनकी मांसल जांघों का स्पर्श अपने कूल्हों पर फील होते ही मेरा लंड जीन्स में कुलबुलाने लगा.
उन्होंने मेरे गालों पर हाथ फेरकर प्यार से सहलाया और फिर अपने लिपस्टिक से पतले होंठ रख कर दोनों तरफ चूम लिया. लिपस्टिक के निशान मेरे दोनों गालों पर छप गये.
मैंने उनके कान में फुसफुसा कर कहा - भाभी में भी आपके गालों पर किस करना चाहता हूँ.
कामिनी भाभी मेरी बात सुनकर शरमा गयी.
मैंने कहा - बोलिए ना भाभी. प्लीज़ एक बार बस.
कामिनी भाभी – अपने भैया से पूछ लीजिए ना?
मैंने भैया से कहा – भैया. मैं भाभी को किस करना चाहता हूँ. अगर आप इज़ाज़त दें तो.
कृष्णा भैया बोले – अरे यार! आज तुम भाभी देवर के बीच कोई कुछ नहीं बोलेगा. तुम दोनों आपस में ही डिसाइड करो भाई.
मैंने कामिनी भाभी की तरफ देखा. उन्होंने मौन स्वीकृति दे दी. फिर मैंने भाभी के दोनों गालों का चुंबन लिया और फुसफुसाया.
मैंने कहा - भाभी लगता है भैया ने आपको रात बहुत ज़ोर से काटा है. निशान अभी तक है.
शर्म से उनकी गर्दन झुक गयी. मैं अभी उनकी गोद से उठने की सोच ही रहा था कि चाची बोली पड़ी.
चाची – अंकुश भाभी की गोद से बिना नेग लिए मत उठना.
वाउ! ये तो डबल धमाका हो गया. हां तो भाभी क्या देंगी. अपने देवर को?
कामिनी भाभी – जो भी चाहिए माँग लो.
मैं – तो ठीक है. मुझे एक एप्पल आई फ़ोन चाहिए

. (
जो उस समय नया लॉंच हुआ था मार्केट में).
कामिनी भाभी – ठीक है. जब आप पगफेरे के लिए आओगे. आपका फोन आपको मिल जाएगा.
मैंने एक्साइटमेंट में भाभी के गालों को फिर से चूम लिया और उन्हें थैंक्स बोलकर गोद से उठ गया.
दूसरे दिन शांति बुआ को अपने घर वापस जाना था, सुबह ही सुबह वो तैयार होने में लगी थी. मैं जब जाग के आया तब तक वो जाने के लिए तैयार खड़ी थी. मैंने बुआ को स्माइल किया. और उनके पैर छूते हुए कहा. क्यों बुआ? कल रात मज़ा आया??
शांति बुआ भी मुस्कराते हुए बोली – मस्त लौड़ा पाया है तुमने और बहुत ही मस्त चुदाई करते हो अंकुश. कभी आना मेरे घर. तब देखूँगी, तुम में कितना दम-खम है? और हँसते हुए उन्होंने मुझे अपने गले से लगा लिया., बुआ के खरबूजों ने मेरे सोए हुए शेर पर फिर अटैक कर दिया.
मैंने उनके कान में कहा - ज़रूर आऊँगा बुआ. आपका चैलेंज मुझे मंजूर है. मेरी हॉट डार्लिंग बुआ.
बीते एक हफ्ते में निशा ने मेरे दिल पर इस कदर कब्जा कर लिया था कि मुझे उठते-बैठते, सोते-जागते बस उसी के ख्याल आते रहते. बुआ के जाते ही मैं फिर उसके ख़यालों में खोने लगा. भाभी मेरी हालत से अनभिज्ञ नहीं थी, लेकिन घर की भीड़-भाड़ के चलते वो भी कुछ नहीं कर सकती थी. धीरे-धीरे एक-एक कर के रिश्तेदार विदा होने लगे.
भाभी ने निशा को और कुछ दिनों के लिए रोक लिया था. उनका भाई राजेश अपने घर लौट गया था. बड़ी बुआ भी जा चुकी थी., एक हफ्ते बाद कामिनी भाभी भी पहली बार विदा होकर अपने घर चली गयी. और दोनों भाई अपनी ड्यूटी पर लौट गये. एक दिन मैं छोटी चाची के यहाँ उनके आँगन में पड़ी चारपाई पर लेटा था, चाची सिरहाने की तरफ बैठी थी, मेरा सर उनकी गोद में रखा हुआ था.
मैंने चाची के बूब्स को दबा कर कहा – आह चाची ये तो और ज़्यादा फूल कर गुदगुदे होते जा रहे हैं.
चाची – हां अंकुश. अब इनमें दूध भी तो बनेगा ना. बच्चे के लिए. जैसे-2 दिन नज़दीक आते जाएँगे वैसे-2 इनमें दूध आता जाएगा.
मैंने एक चुचि को मसलते हुए कहा – तो अभी चूस कर देखूं क्या. दूध निकलेगा इनमें से?
चाची – नहीं अंकुश, अभी नहीं, वो तो बच्चे के जन्म के बाद ही आएगा. लेकिन अंकुश. अब मेरा मान बहुत करता है वो करने का. प्लीज़ कुछ करो ना?
मैं – मुझे कोई प्राब्लम नहीं है चाची. आप कहो तो अभी अंदर चलते हैं?
चाची - नहीं अभी नहीं. एक काम करना, कल कालेज से जल्दी सीधे यहीं आ जाना.
मैंने हां बोल के एक बार और उनके चुचे मसल दिए. उनके मुँह से आहहह निकल गयी. जवाब में उन्होंने मेरे लंड को पकड़ कर मरोड़ दिया.
मैं - आयईीीई… क्या करती हो चाची?? उखाड़ोगी क्या? मैंने सिसकते हुए कहा.
चाची हँसते हुए बोली – जब तुमने मेरी चुचि मसली थी, तो कुछ नहीं, अब अपनी बारी आई तो चिल्लाने लगे.
अभी हम आगे कुछ और करते, कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट सुनाई दी. मैं उनकी गोद से उठ कर बैठ गया. सामने देखा तो निशा, रुचि को गोद में लिए खड़ी थी.
चाची – आओ निशा! अंदर आओ, वहाँ क्यों खड़ी रह गयी?
निशा हमारे पास तक आई. मैं भी चारपाई से खड़ा हो गया और रुचि के गाल पर किस करने के लिए अपने होंठ आगे किए. मैं जैसे ही उसको किस करने वाला था कि रुचि ने अपना सर पीछे हटा लिया और मेरे होंठ निशा के गाल पर जा टिके.
रुचि ताली बजाते हुए हँसने लगी और चिल्ला कर बोली - दादी देखो, चाचू ने मौसी को क़िस्सी कर दी. ओहोहो! चाचू ने मौसी को क़िस्सी करदी.
उसके साथ चाची भी हँसने लगी. और हम दोनों झेंप गये. मैंने उसे सॉरी बोला.
निशा रुचि को झूठा गुस्सा दिखा कर बोली – रुचि… तू बहुत शैतानी करती है. ठहर अभी तेरी पिटाई करती हूँ.
रुचि उसकी गोद से उतार कर मेरी गोद में आ गयी. और मेरे गले से लिपट गयी. रुचि के गाल पर एक पप्पी कर के मैंने उसे चाची के पास चारपाई पर बिठा दिया.
चाची बोली – तुम दोनों बैठो, मैं ज़रा गाय-भैंस को चारा डाल कर आती हूँ.
और वो बहाना कर के वहाँ से चली गयी. मैंने कहा, निशा जी बैठिए ना.
निशा – नहीं मैं ऐसे ही ठीक हूँ. आप बैठिए. आप मुझे निशा जी क्यों बुलाते हैं? खाली निशा बोला कीजिए ना प्लीज़.
मैं – आपको अच्छा लगेगा?
निशा – हां! और हो सके तो ये आप की बजाय तुम कहो तो मुझे और ज़्यादा अच्छा लगेगा.
मैं – ठीक है, जैसा तुम कहो. वैसे निशा, तुमने मेरी बात का अभी तक कोई जवाब नहीं दिया?
निशा – कौन सी बात का?
मैं – मैंने उस दिन कहा था ना, कि मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूँ. क्या तुम भी मुझे पसंद करती हो?
निशा बिना कोई जवाब दिए मेरी तरफ देखने लगी. पता नहीं कैसा जादू था उसकी आँखों में की मैं उसकी आँखों डूबने लगता था. कुछ देर बाद उसने अपनी पलकें झुका ली. लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. मैंने उसके हाथ अपने हाथों में ले लिए और फिर से अपना सवाल दोहराया.
मैं - बताओ ना प्लीज़.
निशा – अगर मैं ना कहूँ तो आप मान लेंगे कि मैं आपको पसंद नहीं करती?
मैं – फिर भी मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ.
निशा – सच कहूँ. तो मैं आपको पहली नज़र से ही चाहने लगी थी, तब मुझे आपके बारे में ये भी पता नहीं था, कि आप कौन हो?
मैं – सच, तुम सच कह रही हो? ओह निशा… आई लव यू… ये कहकर मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया.
निशा – आई लव यू टू अंकुश जी. मैं भी आपसे प्यार करने लगी हूँ. लेकिन अभी छोड़िए प्लीज़… चाची आ गयी तो क्या सोचेंगी???
मैंने उसे अपने सीने से लगाकर कहा – तुम चाची की चिंता मत करो जान. वो कुछ भी नहीं कहेंगी. तुम नहीं जानती तुमने मुझे कितनी बड़ी खुशी दे दी है.
ये कहकर मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके पतले-2 रसीले होंठों को चूम लिया. वो बुरी तरह से शरमा गयी, उसका शरीर थरथर काँपने लगा, साँसें भारी होने लगी.
रुचि फिर ताली बजकर चिल्लाई - ओहो! चाचू ने फिर मौसी की क़िस्सी कर दी.
रुचि की आवाज़ सुनकर हम दोनों अलग हो गये.
निशा रुचि को थप्पड़ दिखाते हुए बोली – ठहर शैतान. अभी बताती हूँ तुझे. और फिर मुस्कराते हुए प्यार से उसने रुचि को अपनी बाँहों में समेट लिया. उसके गाल पर एक प्यार भरा किस कर के मेरी ओर देखकर वो मुस्कराईं, और उसे गोद में लेकर खिल-खिलाती हुई घर की तरफ भाग गयी.
मैं मन ही मन मुस्कराता हुआ, उसे जाते हुए देखता रहा. रात को खाना खाते समय भाभी ने कहा…
भाभी - अंकुश जी. कल निशा को छोड़ आना. अब बहुत दिन हो गये उसको यहाँ. घरवाले परेशान हो रहे होंगे.
मेरी तो ये सुन कर साँस ही अटक गयी., खाना गले में अटक गया., मुझे खाँसी का धसका सा लग गया.
भाभी – क्या हुआ. अच्छे से खाना खाओ. इतनी भी क्या जल्दी है.
ये कहकर मुझे पानी का ग्लास पकड़ा दिया. मैंने चोर नज़रों से निशा की तरफ देखा, वो भी भाभी की बात सुन कुछ दुखी सी लग रही थी.
मैं – ऐसी भी क्या ज़रूरत आन पड़ी एकदम से भाभी. मुझे कल कालेज भी जाना ज़रूरी है. कोर्स बहुत पिछड़ गया है भैया की शादी के चक्कर में.
भाभी – तो कोई बात नहीं कालेज से लौट कर छोड़ आना. अब सारी जिंदगी ये यहाँ तो नहीं रह सकती ना., वैसे भी तुम्हारी बुलेट के लिए है ही कितना दूर?
मैं – ठीक है. फिर दोपहर के बाद ही निकल पाएँगे.
अब साला चाची से भी कल का वादा किया है, तो वो भी निभाना तो पड़ेगा वरना वो बुरा मान जाएँगी.
मैंने अकेले में भाभी को ये बात बताई.
तो वो बोली – कोई बात नहीं, मैनेज कर लेना. शाम को थोड़ा लेट चले जाना और रात वहीं रुक जाना.
मैंने कहा – वैसे भाभी इतना भी अर्जेंट नहीं है. निशा का जाना. और कुछ दिन रहने दो ना.
मोहिनी भाभी मेरी तरफ गहरी नज़रों से देखते हुए बोली – तुम उसको रोकने के लिए इतना प्रेशर क्यों डाल रहे हो? बात क्या है? कुछ लफड़ा लगता है, क्यों?
मैं नज़र नीची कर के बोला – नहीं भाभी ऐसा वैसा कुछ नहीं, बस मैं तो यूँ ही कह रहा था.
मोहिनी भाभी – अच्छा वो सब छोड़ो. अब मुझे सच-सच जवाब देना. जो मैं पूछूं उसका.
मैं – हां-हां! पूछिए.
मोहिनी भाभी – तुम्हें निशा कैसी लगती है?
मैं – निशा बहुत अच्छी है, बहुत सुन्दर है. इसमें छिपाने जैसा क्या है. जो सच है वो है.
मोहिनी भाभी – तुम उसे पसंद भी करते हो??
उनके इस सवाल पर में गड़बड़ा गया. जल्दी से कोई जवाब नहीं दे सका. तो नज़र अपने आप झुक गयी.
मेरी ओर से कोई जवाब ना पाकर वो फिर बोली – निशा भी तुम्हें पसंद करती है?
मैंने अपनी नज़र ऊपर की और उनकी ओर देखने लगा.
मुझे अपनी ओर देखते हुए पाकर वो बोली – अंकुश, मैं तुम दोनों के बारे में सब जानती हूँ, और इसलिए उसे यहाँ से भेज रही हूँ. जिससे तुम दोनों कहीं बहक ना जाओ, और समय से पहले कुछ ऐसा हो जो नहीं होना चाहिए. मैं तुम दोनों से नाराज़ नहीं हूँ. बल्कि मैं तो खुद चाहती हूँ कि आगे चल कर तुम दोनों एक हो जाओ. निशा के लिए तुमसे अच्छा जीवन साथी और कोई हो ही नहीं सकता. लेकिन रिश्तों की कुछ मर्यादाएँ होती हैं, जिन्हें हमें निभाना पड़ता है.
मैं मुँह बाए, बस उनके चेहरे को ही देखता रहा. उनके चेहरे पर किसी भी तरह के कोई भाव नहीं थे.
मोहिनी भाभी - जस्ट चिल, अंकुश.
मैं मोहिनी भाभी के गले से लग गया. मेरी आँखों से दो बूँद आँसुओं की निकल पड़ी और मैंने रुँधे गले से कहा - सच में आप मेरे लिए भगवान का रूप हो भाभी. हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करने लगे हैं और अब एक दूसरे के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते.
मोहिनी भाभी – लेकिन कुछ साल तो तुम दोनों को इंतजार करना पड़ेगा. लेकिन ये मेरा वादा है तुमसे. कि चाहे जो भी हो, मैं तुम दोनों को मिलाकर ही रहूंगी. अब तुम जाओ और बिना किसी शक के सो जाओ. कल बहुत मेहनत करनी है और मेरे गाल पकड़ कर हँसने लगी.
मैंने एक बार भाभी के गालों पर किस किया और सोने चला गया. दूसरे दिन कालेज में दो घंटे बिताने के बाद में जल्दी घर आ गया और सीधा छोटी चाची के पास पहुँच गया. चाची अभी-अभी नहा कर आई थी, मेरे आवाज़ देने पर उन्होंने गेट खोला, तो देखा वो उसी अंदाज में अपना पेटीकोट चुचियों पर चढ़ाए हुए थी.
गेट खोल कर वो अपने कमरे की तरफ चल दी. मैंने भी फटाफट दरवाजा बंद किया और उनकी मटकती गान्ड का पीछा करते हुए उनके कमरे में आ गया. उनकी मटकती गान्ड के सीन ने मेरे लंड को खड़ा कर दिया. चाची ने अभी तक अपना बदन भी नहीं पोंछा था. पानी की बूँदें किसी मोती के दानों की तरह उनके गोरे मादक बदन पर चमक रही थी. अंदर जाकर वो पलंग पर पड़े अपने कपड़े उठाने ही वाली थी, कि मैंने पीछे से उनकी गान्ड में अपना लंड सटा दिया और कमर में बाँहों का लपेटा डालकर उनके बदन से पानी की बूँदों को चाटने लगा. चाची कपड़े पहनना भूल गयी और अपनी आँखें मीचे आनंद के सागर में गोते लगाने लगी. उनके हाथ से पेटीकोट भी छूट गया. और अब वो उनके पैरों में पड़ा अपनी गुस्ताखी की भीख माँग रहा था. हाल ही में नहाया हुआ बदन, जो दिसंबर की सर्दी में और ज़्यादा ठंडा हो गया था. मेरे शरीर की गर्मी से गरमाने लगा. मैंने अपना पैंट खोल दिया और फ्रेंची से अपना गरमा-गरम लंड निकाल कर चाची की मदमस्त ठंडी-2 गान्ड से रगड़ दिया.
छोटी चाची - अहह..मेरे.. अंकुश अ..रजाआाआआ कितना गरम है तुम्हारा??
मैं – चाची? मैंने थोड़े बनावटी गुस्से से कहा – ये तुम्हारा? मेरा? क्या कहती रहती हो?? सीधे-2 नाम नहीं ले सकती. जाओ रख लो अपनी…. मुझे नहीं चाहिए.
इतना बोल कर मैं अलग हो गया और अपना पैंट उठा लिया.
छोटी चाची – अरे… मेरे राजा… मुन्ना… नाराज़ हो गया? चाची ने मेरा लंड अपनी मुट्ठी में लेकर कहा – तुम्हारा ये लंड कितना गरम है? लो अब ठीक है. ऐसे नाराज़ ना हुआ करो मेरे होनेवाले बच्चे के पापा. मुझे ऐसे शब्द बोलने में थोड़ी झिझक लगती है. पहले कभी बोले नहीं ना इसलिए. आगे से ख्याल रखूँगी.
मैंने चाची के होंठ अपने मुँह में भर लिए और उन्हें चूसने लगा. चाची भी मेरा साथ देने लगी, और साथ-साथ मेरा लंड भी मसलती जा रही थी. मैंने चाची की चूत में अपनी दो उंगलियाँ डाल दी और उन्हें अंदर बाहर करके चोदने लगा. चाची की आँखें लाल होने लगी. वासना की खुमारी उनके सर चढ़ने लगी. और उनकी चूत गीली हो गयी.
अब मैंने उनकी चुचि को दबाते हुए कहा – अह्ह्ह्ह चाची आपकी ये बूब्स कितनी मस्त हो गयी हैं? जी करता है चूसता ही रहूं.
छोटी चाची – तो चूसो ना रजाआ… आअहह...हान्न्न… और ज़ोर से… खा जाओ, बहुत परेशान करती हैं. काटो... आहह… ज़ोर से नहियीईईईईईई.
मैंने चूस-चूस कर उनकी चुचियों को लाल कर दिया. उत्तेजना में कयि जगह दाँत से काट भी लिया. जिससे खून झलकने लगा था.
मैं - सॉरी चाची, मैंने आपको काट लिया.
छोटी चाची – कोई बात नहीं. मुझे दर्द नहीं हुआ.
अब हम दोनों से ही और इंतजार करना मुश्किल हो रहा था. सो मैंने चाची को लिटा दिया. और उनकी चूत को हाथ से सहला कर चूम लिया. उनकी टाँगें मेरे लंड के स्वागत में खुल गयी. चाची का पेट अब थोड़ा सा उभर आया था, जिससे उनकी नाभि का गड्ढा थोड़ा कम गहरा हो गया था. एक बार मैंने उनके उभरे हुए पेट को चूमा और अपना लौड़ा उनकी रसीली गागर के मुँह से अड़ा कर अंदर डाल दिया.
छोटी चाची – अहह... आराम से करना. अंकुश. तुम्हारे बच्चे को चोट ना लग जाए. नहीं तो कहेगा. कैसा निर्दयी बाप है. पेट में भी मारता है.
मैंने धीरे-2 धक्के लगाकर उनकी चुदाई करने लगा. आजकल उनकी चूत मेरे लंड को कुछ ज़्यादा ही जकड़ लेती थी. जिससे हम दोनों को ही बहुत मज़ा आता. एक बार झड़ने के बाद मैंने चाची को घोड़ी बना दिया. और उनकी गान्ड को चाटते हुए कहा.
मैं - चाची आपकी गान्ड कितनी मस्त है. इसमें एक बार लंड डाल के देखें?
छोटी चाची – नहीं अंकुश, वहाँ नहीं, दर्द होगा.
मैं – प्लीज़ चाची… कई दिनों से मन था मेरा लेकिन कहा नहीं. पर आज मान नहीं मान रहा. प्लीज़ तोड़ा देखें तो सही. कैसा लगता है.
छोटी चाची – तुम भी ना अंकुश. बहुत जिद्दी हो. अच्छा वहाँ से तेल की शीशी ले लो और अच्छे से सुराख और अपने लंड पे लगा के तब डालना.
मैंने फ़ौरन तेल की शीशी ली. थोड़ा चाची की गान्ड के छेद पर डाला और उंगली से उसे अंदर तक चिकना कर दिया. फिर अपने लंड पर चुपड़ा. और उनकी गान्ड के भारी-2 पाटों को अलग कर के उनके छेद पर टिका दिया. गान्ड के छेद पर लंड का अहसास होते ही चाची की गान्ड का छेद खुलने-बंद होने लगा. मैंने बॉटल से दो बूँद तेल की और टपका दी. और इस बार अपनी दो उंगलियाँ एक साथ अंदर डाल दी, चाची ने चिहुंक कर अपनी गान्ड के छेद को सिकोड़ कर मेरी उंगलियों पर कस लिया.
छोटी चाची - हइई. अंकुश. क्या करते हो. मेरी गान्ड चटख रही है.
मैंने उनकी गान्ड पर दूसरे हाथ से चपत मार कर कहा – ऐसे गान्ड भींचोगी तो चटकेगी ही ना, इसको थोड़ा ढीला छोड़ो.
मेरी बात मानकर चाची ने अपनी गान्ड को थोड़ा ढीला कर लिया, अब मेरी दोनों उंगलियाँ आराम से अंदर तक पहुँच पा रही थी. उनकी गान्ड का छेद अब थोड़ा सा खुल गया था, मैंने उंगलियाँ बाहर निकाल कर दो बूँद तेल और डाला और उसे उंगली से अंदर कर के अपने लंड को उसके छेद पर फिर से रख दिया. एक हल्के से धक्के के साथ मेरा पूरा सुपाड़ा गान्ड के अंदर जाकर फिट हो गया.
छोटी चाची - अंकुश… थोड़ा धीरे करो. मेरी गान्ड फट रही है. हाय राम… बस करो…
मैंने चाची की चौड़ी पीठ को चूमते हुए उनकी चुचियों को थाम लिया और ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा. चाची की गान्ड में लंड की चुभन कुछ कम होने लगी तो मैंने और थोड़ा पुश किया और आधा लंड अंदर कर दिया.
छोटी चाची – हाय अंकुश लगता है आज नहीं छोड़ोगे. मुझे.. अरे… मर गई उई माँ…. उफफफफफ्फ़.
अब मैंने अपने एक हाथ को उनकी कमर की साइड से नीचे ले जाकर उनकी चूत को सहला दिया और अपनी दो उंगलियाँ चूत के अंदर कर के उसे चोदने लगा. अब मैंने अपने एक हाथ को उनकी कमर की साइड से नीचे ले जाकर उनकी चूत को सहला दिया और अपनी दो उंगलियाँ चूत के अंदर कर के उसे चोदने लगा. चूत की सुरसुराहट में चाची अपनी गान्ड का दर्द भूल गयी और सिसकियाँ भरने लगी.
मौका देख कर मैंने एक और धक्का मार दिया और मेरा पूरा लंड गान्ड की सुरंग में खो गया. वो दर्द से कराह उठी. तकिये में मुँह देकर बेडशीट को मुठ्ठियों में कस लिया. लेकिन मैंने अपनी उंगलियों से उनकी चूत चोदना जारी रखा. और धीरे-धीरे कर के गान्ड में लंड अंदर–बाहर करने लगा. चाची के दोनों छेदो में सुरसुरी बढ़ने लगी और वो अब मस्ती से आकर गान्ड मरवाने लगी. चूत से उंगलियाँ बाहर निकाल कर उनकी गान्ड पर थपकी देते हुए धक्के लगाने में मुझे असीम आनंद आ रहा था. चाची भी भरपूर मज़ा लेते हुए अब अपनी गान्ड को मेरे लंड पर पटक रही थी,
जब उनकी गदराई गान्ड मेरी जांघों से टकराती, तो एक मस्त ठप्प जैसी आवाज़ निकलती. मानो कोई टेबल पर थाप दे रहा हो. 10 मिनिट तक उनकी गान्ड मारने के बाद मेरा पानी उनकी गान्ड में भर गया. और हम दोनों ही पस्त होकर बिस्तर पर लेट गये.
5 मिनिट के बाद मैंने चाची की चुचि को सहलाते हुए पूछा – छोटी चाची, गान्ड मारने में मज़ा आया कि नहीं?
छोटी चाची – शुरू में तो लगा कि मेरी गान्ड फट गयी. बहुत दर्द हुआ. लेकिन बाद में मज़ा भी खूब आया. लेकिन आहह. अब फिर से दर्द हो रहा है. माआ. पर तुम चिंता मत करो, कुछ देर में ठीक हो जाएगा. तुम बताओ, तुम्हें मज़ा आया या नहीं?
मैं – मुझे तो बहुत मज़ा आया. लेकिन लगता है चाची. ये तरीक़ा सही नहीं है. वो तो आपकी गान्ड ऐसी मस्त है कि मैं अपने आप को रोक नहीं पाया वरना कभी नहीं मारता.
छोटी चाची – कोई बात नहीं. मेरे राजा. तुम्हारे लिए तो मेरी जान भी हाज़िर है. ये निगोड़ी गान्ड क्या चीज़ है.
चाची अब खुल कर गान्ड, लंड, चूत बोलने लगी थी. मैं अपने कपड़े पहन कर घर आया, आज अपनी जान निशा को जो चोदने जाना था. आकर फ्रेश हुआ. खाना खाया और उसके गांव जाने की तैयारी में जुट गया.
निशा का मन नहीं था जाने का, लेकिन भाभी का आदेश था, जाना तो पड़ेगा ही. भाभी का गांव कोई 30-35 किमी ही दूर था हमारे यहाँ से, सिंगल रोड था. पुराना सा. लेकिन वहाँ ज़्यादा नहीं चलते थे. रोड खराब होने के कारण थोड़ा जल्दी निकलना था जिससे दिन के उजाले में ही पहुँच जायें तो ज़्यादा अच्छा था. वैसे तो ज़्यादा से ज़्यादा 1 घंटा ही लगना था. हम दोनों को निकलते-2 सबसे मिलते-मिलते 5 बज गये. ठंडी के दिन थे. 5 बजे से ही दिन ढालने लगता था.
एक दूसरे से अपने प्रेम का इज़हार करने के बाद भी निशा मेरे साथ खुल नहीं पा रही थी. बाइक पर भी वो मुझसे दूरी बनाए हुए बैठी थी.
मैंने गांव निकलते ही कहा – निशा इतना दूर क्यों बैठी हो जैसे मैं कोई पराया हूँ.
निशा – ऐसा क्यों बोलते हो अंकुश. बस मुझे शर्म आती है और कोई बात नहीं.
मैं – मुझसे अब कैसी शर्म? अब तो हम दोनों प्रेमी हैं ना??
निशा – फिर भी मुझे शर्म आती है. मैं चुप हो गया, और गाड़ी दौड़ा दी.
अचानक से सड़क में एक गड्ढा आया, मैंने एकदम से ब्रेक लगाए. बुलेट की पिछली सीट थोड़ी ऊँची सी होती है ड्राइवर सीट से. तो ब्रेक लगते ही वो सरकती हुई मेरी पीठ से चिपक गयी और डर के मारे मेरे सीने में अपनी बाहें लपेट कर चीख पड़ी.
मैं – क्या हुआ डार्लिंग?
निशा – आराम से नहीं चला सकते?
मैं – आराम से चलाने का समय नहीं है मेरी जान. रोड खराब है. लेट हो गये तो रात में इन खड्डों में वैसे भी मुश्किल होगी. तुम ऐसे ही बैठी रहो ना. क्या दिक्कत है.
निशा हम्म कर के मुझे कस के पकड़ कर बैठ गयी. मैं बीच-2 मैं ब्रेक मार देता तो वो और ज़्यादा चिपक जाती. उसके 34” के ठोस बूब्स मेरी पीठ पर दब रहे थे.
कुछ देर में उसकी शर्म कम हो गयी और उसने मेरे कंधे से अपना गाल सटा लिया, फिर मेरे गाल को चूमकर बोली – अब खुश??
मैं – तुम्हारा साथ तो मेरे लिए हर हाल में खुशी ही देता है. जानेमन, तुम खुश हो कि नहीं?? या अब भी शर्म आ रही है?
निशा – आप मुझे बिल्कुल बेशर्म बना दोगे.
मैं – अरे यार, ऐसे बैठने से भी कोई बेशर्म हो जाता है क्या? मैंने उसे और थोड़ा खोलने के लिए कहा - निशा मेरे सीने को पकड़ने से मुझे ड्राइविंग में थोड़ा प्राब्लम होती है. तुम ना मेरी कमर को पकड़ लो.
निशा – आप जहाँ कहोगे वहीं पकड़ लूँगी जानू. ये कह कर उसने मेरी जांघों पर हाथ रख लिए.
मैं – थोड़ा अंदर की साइड में पकड़ो, नहीं तो तुम्हें सपोर्ट नहीं मिलेगा.
निशा – धत्त… अब आप मुझे बिल्कुल बेशर्म करना चाहते हैं. फिर कुछ सोच कर… अच्छा चलिए आपकी खुशी के लिए ये भी सही, और उसने अपने हाथ मेरी जाँघों के जोड़ पर रख लिए.
गाड़ी के जंप के कारण उसके हाथ भी इधर-उधर होते. तो उसकी उंगलियाँ मेरे लंड को छू जाती. आहहह… ये हल्का सा टच ही मेरे लिए बड़ा सुखद लग रहा था.
निशा भी अब अपनी शर्म से निकलती जा रही थी और अपनी उंगलियों को मेरे लंड के ऊपर फिरने लगी. पीछे से वो और अच्छे से चिपक गयी, अब उसकी जांघें मेरी जाँघों से सट चुकी थी. जो कभी-2 गाड़ी के जंप से आपस में रगड़ जाती. हम दोनों पर एक अनूठा सा उन्माद छाता जा रहा था. लेकिन ये उन्माद कुछ ही देर का था. उसका गांव आ चुका था, और वो फिर से मुझसे दूरी बना कर बैठ गयी. हम जब उसके घर पहुँचे तो घर में अकेली उसकी माँ थी, उसके भाई राजेश शहर में नौकरी पर थे, जो हफ्ते के हफ्ते ही आते थे, पिताजी अभी खेतों से आए नहीं थे.
निशा को मेरे साथ देखकर वो चौंकते हुए बोली – ये कौन है बेटी?
निशा – इनको नहीं पहचाना मम्मी? ये दीदी के छोटे देवर, अंकुश नाम है इनका.
मम्मी – ओह. आओ बेटा बैठो. माफ़ करना कभी देखा नहीं ना तुम्हें इसलिए पूछ लिया.
मैं – कोई बात नहीं मम्मी जी. वैसे भी मैं भैया की शादी में ही आया था.
मम्मी – हां, लेकिन तब तुम बहुत छोटे से थे. अब देखो. क्या गबरू जवान हो गये हो.
मैं - ये सब आपकी बेटी का ही कमाल है मम्मी जी.
वो एकदम से चौंकते हुए बोली – मेरी बेटी का? वो कैसे?
मैं – अरे मम्मी जी, भाभी मेरा इतना ख़याल रखती हैं. कि पुछो मत. मुझे कभी अपनी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी.
मम्मी – ओह हां… मोहिनी है ही ऐसी, यहाँ भी सब का बहुत ख़याल करती थी.
कुछ देर में निशा के पिताजी भी आ गये. वो भी मिलकर बड़े खुश हुए. और घर के हाल-चाल पूछे. खाना पीना खाकर वो लोग जल्दी ही सोते थे. सो कुछ देर और इधर-उधर की बातें हुई. और वो दोनों सोने चले गये.
जाते हुए निशा की मम्मी ने निशा से कहा – निशा बेटा सोने से पहले अंकुश जी को ध्यान से दूध पिला देना.
निशा का घर उनके घर की ज़रूरत के हिसाब से जैसा मध्यम वर्गीय ग्रामीण लोगों का होना चाहिए उस हिसाब से ही था. तीन कमरे, जिनमें एक में उसके मम्मी-पापा, एक में निशा और एक उसके भाई का था, एक बड़ा सा बैठक कम हॉल जिसमें एक टीवी भी लगा हुआ था. हॉल से बाहर एक बरामदा. उसके बाद थोड़ी खाली जगह जो बाउंड्री से घिरी हुई थी. हम इस समय हॉल में बैठे टीवी देख रहे थे. मैं सोफे पर था, और वो साइड में पड़ी सोफा चेयर पर बैठी थी.
मैंने उसकी मम्मी के जाने के कुछ देर बाद निशा से कहा – क्यों डार्लिंग. क्या ख़याल है?
निशा मेरी तरफ मुस्कराते हुए बोली – किस बात का?
मैं – अपनी मम्मी की आज्ञा का पालन नहीं करोगी?
निशा हंस कर बोली - ओह… वो…. तो अभी चाहिए. या सोने से पहले.
मैंने कहा शुभ काम में देरी नहीं करना चाहिए. मेरी बात सुनकर वो चेयर से उठी, और मेरे आगे से होकर किचन की तरफ दूध लाने के लिए जाने लगी. मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया. तो वो एक झोंके के साथ मेरी गोद में आ गिरी. गिरने से बचने के लिए उसने मेरे गले में बाहें डाल दी.
निशा मेरी आँखों में देखते हुए बोली – क्या करते हो? खुद ही कहते हो दूध लाने को और रोक भी रहे हो.
मैं उस दूध की बात नहीं कर रहा जानेमन, मुझे तो ये वाला दूध पीना है. ये कहकर मैंने उसके एक संतरे पर अपना हाथ रख दिया.
निशा - हटो बदमाश कहीं के. उसने मुझे हल्के से सीने में मुक्का मारा. कितना ऊटपटांग सोचते हो.
मैं – इसमें क्या ग़लत कहा है?? मैंने दूध ही तो माँगा है, नहीं पिलाना है तो मत पिलाओ. मैं सुबह मम्मी को बोल दूँगा. कि आपकी बेटी ने मुझे दूध दिया ही नहीं.
उसने शर्म से अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया. मैंने उसकी थोड़ी को अपनी उंगलियों से ऊपर कर के उसका चेहरा उठाया और उसकी झील सी गहरी आँखों में झाँकते हुए कहा.
मैं – तुम कितनी मासूम हो निशु? मैं सच में बहुत सौभाग्यशाली हूँ जिसे इतनी मासूम, और सुंदर सी प्यारी सी लड़की का प्यार मिल रहा है. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ मेरी जान. आई लव यू.
निशा - आई लव यू टू जानू…
इतना कहकर वो मेरे सीने से लिपट गयी. मैंने धीरे से उसकी पीठ पर हाथ रख कर सहला दिया और एक हाथ से उसके गाल को सहलाकर उसके होंठ चूम लिए.
निशा - मैं तुमसे दूर नहीं रह सकती अंकुश.
मैं – मैं कौन सा तुमसे दूर रह सकता हूँ. लेकिन हमें कुछ दिन तो रहना ही पड़ेगा.
निशा – अगर तुम मुझे नहीं मिले तो में मर जाऊंगी अंकुश. सीईईईईईईईई.
उसके होंठों पर उंगली रख कर कहा मैंने – ऐसे मरने गिरने की बात नहीं करते. भाभी ने मुझे प्रॉमिस किया है. चाहे कुछ हो जाए. हम मिलकर ही रहेंगे.
निशा – सच??? क्या दीदी को पता है हमारे प्यार के बारे में?
मैं – हां, और ये बात उन्होंने खुद से ही कही है. अब हमें बस कुछ सालों तक इंतजार करना पड़ेगा.
वो फिर से मुझसे लिपट गयी.
निशा - ओह जानू मैं आज बहुत खुश हूँ. लेकिन एक प्रॉमिस करो. तुम जल्दी-जल्दी मुझसे मिलने आया करोगे. कम से कम महीने में एक बार.
मैं – मुझे कोई प्राब्लम नहीं है. लेकिन तुम खुद सोचो. मेरा बार-बार यहाँ आना क्या लोगों में शक पैदा नहीं करेगा? क्या तुम्हारे मम्मी-पापा ये चाहेंगे?
निशा – तो फिर मैं कैसे रहूंगी इतने दिन? कम-से-कम फोन तो करते रहना.
मैं – हां, ये सही रहेगा. हम रोज़ रात को फोन से बात कर लिया करेंगे.
इतनी देर से निशा मेरी गोद में बैठी थी. उसकी गोल-मटोल छोटी लेकिन मुलायम गान्ड की गर्मी से मेरा लंड टाइट जीन्स में व्याकुल होने लगा. मैं अपने कपड़े नहीं लाया था.
मैंने निशा से कहा – यार मुझे कुछ चेंज करना है. ये जीन्स में कम्फर्टेबल नहीं लग रहा.
निशा मेरी गोद से उठ खड़ी हुई, और मेरा हाथ पकड़ कर अपने भैया के रूम में ले गयी. उसकी अलमारी से एक पजामा और टीशर्ट निकाल कर मुझे पकड़ा दिया. मैंने अपने कपड़े निकाल दिए और टीशर्ट पहन ली. मैंने जैसे ही अपनी जीन्स निकाली. मेरे फ्रेंची में खड़े मेरे लंड को देखकर वो शर्मा गयी और अपना मुँह फेर लिया. मैंने उसे कुछ नहीं कहा और मुसकुरा कर पजामा पहन लिया. मेरे सोने का इंतजाम भी इसी रूम में था, तो फिर हम दोनों उसमें पड़े पलंग पर बैठ गये.
मैंने फिर एक बार निशा को अपनी गोद में खींच लिया और उसके होंठ चूमकर कहा - निशा ! मेरी एक इच्छा पूरी करोगी?
निशा – क्या? अगर मेरे बस में हुआ तो ज़रूर पूरी करूँगी.
मैं - मुझे तुम्हारे रूप सौंदर्य के दर्शन करने हैं?
निशा – क्यों? अभी क्या मैं पर्दे में हूँ?
मैं – तुम्हारा ये संगमरमर सा बदन तो पर्दे में है ना.
ये आप कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? भला ये भी कोई इच्छा हुई? वो थोड़ा नाराज़गी भरे स्वर में बोली.
मैं बस तुम्हारे इस सुन्दर बदन की छवि अपने मन में बसाना चाहता हूँ. जिसके सहारे आने वाला लंबा समय गुज़ार सकूँ. मैं तुमसे कोई ज़ोर जबरदस्ती नहीं करूँगा, अगर अपने प्यार पर भरोसा कर सको तो.
निशा खामोशी से मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, फिर कुछ सोच कर बोली - ठीक है, मैं आपसे सच्चा प्रेम करती हूँ. और आशा करती हूँ. कि आप भी एक सच्चे प्रेमी की नज़र से ही मुझे देखेंगे.
ये कह कर वो मेरी तरफ पीठ कर के खड़ी हो गयी. और बोली. देख लीजिए जैसे देखना चाहते हैं.
मैं उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया. और उसके गले पर अपने प्यासे होंठ रख दिए. उसके होंठों से एक मीठी सी सिसकी निकल पड़ी. और उसने कस कर अपनी आँखें बंद कर ली. निशा की कमीज़ की पीठ पर एक ज़िप थी, जो उसके गले से लेकर कमर तक पहुँचती थी. मैंने उसके कंधों पर अपने हाथ रखकर उसे सहलाते हुए. अपने हाथ धीरे-2 उसकी ज़िप पर ले आया. कुछ देर ज़िप के आस-पास हाथों को फिराया और उसकी ज़िप का लॉक अपने अंगूठे में लेकर धीरे-धीरे नीचे की तरफ खींचने लगा.
जैसे-जैसे उसकी ज़िप नीचे को खुलती जा रही थी, उसकी दूधिया रंग की पीठ किसी संगमरमर सी चिकनी मेरी आँखों के सामने किसी अनमोल खजाने की तरह खुलती जा रही थी. कमर तक ज़िप खोलने के बाद मैंने उसकी पीठ पर उसकी ब्रा की स्ट्रैप के ठीक ऊपर अपने गीले होंठ रख दिए. उसकी पीठ काँप कर और अंदर को चली गयी, और उसके मुँह से एक और सिसकी निकली.इस्शह..सस्सिईईईईईई.
अब में उसकी पीठ को ऊपर की तरफ चूमता हुआ. उसकी नंगी पीठ पर अपने हाथ फिरा रहा था. निशा तो जैसे कहीं खो ही गयी थी. फिर मेरे हाथ उसकी पीठ सहलाते हुए कंधों पर पहुँचे और उसकी कमीज़ को दोनों बाजुओं से नीचे सरका दिया. उसकी कमीज़ उसके बदन से सरसराती हुई. उसके कदमों में जा गिरी. मैंने उसे कंधों से पकड़कर अपनी तरफ घुमाया. निशा किसी कठपुतली की तरह मेरे हाथों के इशारों पर चल रही थी.
जब मेरी नज़र निशा के बूब्स पर पड़ी… उफफफफफफफफफफफ.. क्या दूधिया बदन था निशा का?? गोल-गोल टेनिस की बॉल के साइज़ के उसके दूधिया बूब्स एक छोटी सी गुलाबी रंग की ब्रा में क़ैद उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे. दोनों के बीच की चौड़ी खाई मुझे ललचा रही थी. मैं अपने आपको रोक नहीं पाया और झुक कर उसके उभारों के बीच की खाई पर अपने तपते होंठ रख दिए.
निशा ने आअहह.. भरते हुए मेरे सर को पकड़ लिया, फिर मैंने उसके उभारों के दोनों ओर की ढलान को बारी-बारी से अपनी खुरदुरी जीभ से चाटा और उन्हें चूमते हुए निशा के सपाट पेट की तरफ बढ़ने लगा. निशा अपनी आँखें मूँदे अपने अंतर्मन में इस असीम आनंद की अनुभूति को महसूस कर के दूर कहीं आसमानों में उड़ चली थी. मन नहीं माना तो मेरे शरारती हाथ एक बार उसके सुंदर बूब्स पर टिक ही गये और उन्हें सहलाते हुए उसकी बगलों से होते हुए, निशा की पतली कमर पर आ टिके.
मेरे हाथ किसी स्वचालित यन्त्र की तरह निशा की पतली कमर को सहलाते हुए, मेरी उंगलियाँ निशा की सलवार के नाड़े की गाँठ पर थी. कुछ ही देर में निशा की सलवार भी उसके कदमों में जा गिरी. मैं थोड़ा पीछे होकर निशा के कदमों में बैठ गया और उसके संगमरमरी बदन की सुंदरता का रस अपनी आँखों से पीने लगा.
वाह क्या सुडौल जांघें थी उसकी? जरा सा भी एक्सट्रा फैट नहीं था उसके बदन पर. साँचे में ढला उसका दूध जैसा गोरा बदन किसी संगमरमर की मूरत जैसा मेरे सामने था. निशा मात्र दो छोटे-से अधोवस्त्रों में मेरे सामने किसी बेजान मूरत सी खड़ी थी. उस कमसिन कली ने अपने प्रियतम की इच्छा का सम्मान करते हुए अपने अनछुए कोमल बदन को उसके हवाले कर दिया था.
पर किसलिए?
एक विश्वास पर. जो उसके निश्छल प्रेम ने उसके अंदर पैदा किया था. उसने अपने प्रियतम पर आँख बंद कर के भरोसा कर लिया था.
मैं उसकी केले जैसी चिकनी जांघों को सहलाते हुए उन्हें चूमने, चाटने लगा. मेरी छुअन से उसका बदन थरथरा रहा था. मैं घुटने मोड़ कर बैठा था, मेरे हाथ बड़े प्यार और दुलार से उसके शरीर पर तैर रहे थे. वो निशा के शरीर के जिस हिस्से में होते, वो हिस्सा किसी जुड़ी के मरीज़ की तरह काँपने लगता. फिर मैंने उसकी पतली कमर को अपने हाथों के बीच लेकर उसे पलटा दिया. अब उसकी छोटी सी पैंटी में कसे उसके गोल-गोल नितंब मेरे सामने थे. इन्हें मैं हौले-हौले सहलाने लगा.
मेरी उंगलियाँ उसकी छोटी सी पैंटी की एलास्टिक में फँस गयी, और उसे नीचे को खींच दिया. निशा की बॉल के साइज़ के उसके नितंब एकदम गोल-गोल सुडौल, गोरे-गोरे, थोड़े बाहर को निकले हुए मेरी आँखों के सामने थे, जिन्हें सहलाकर मैंने चूम लिया. नीचे बैठे ही मैंने उसे अपनी तरफ पलटा लिया, जांघों के जोड़ के बीच की कलाकृति अब मेरे सामने थी. जिसकी सुंदरता बयान करने लायक मेरे पास शब्द नहीं थे.
हल्के बालों से सजे पतले बंद होंठों के बीच एक पतली सी रेखा जैसी उसकी रस सुरंग, जो नीचे से ऊपर की तरफ थोड़ी सी मांसल दिखाई दे रही थी. मैंने अपने हाथ से उसे एक बार बड़े प्यार से सहलाया. और निशा की टाँगों को थोड़ा सा अलग कर के एक किस उसकी प्यारी चूत के बंद होंठों के ऊपर कर दिया.
निशा – ईइसस्स्स्शह… आअहह…
ना चाहते हुए निशा के मुँह से एक दबी सी सिसकी निकल ही गयी. मैंने फिर से उसे पलटा दिया और फिर से एक बार उसके नितंबों को चूमा. नितंबों के बाद उसकी कमर, फिर उसकी पीठ चूमते-चूमते मैं ऊपर उठता चला गया, फिर मेरी उंगलियों ने उसकी ब्रा के हुक भी खोल दिए.
उसकी पीठ से सट कर खड़ा होते हुए मैंने उसके कान की लौ को चूमकर कहा- निशा मेरी जान, तुम सचमुच सुंदरता की जीती-जागती मूरत हो. तुमने आज अपना ये संगमरमर सा सुंदर बदन दिखाकर मुझे अपना दीवाना बना दिया है. अब में तुम्हारे इंतजार में कुछ वर्ष तो क्या, सदियाँ गुज़ार सकता हूँ.
ये कहकर मैंने उसके अनार जैसे बूब्स को अपनी मुट्ठी में भर लिया और सहलाने लगा. निशा एकदम से पलट कर मेरे गले से लिपट गयी, उसके बूब्स मेरे सीने में दब कर रह गये.
निशा मेरे चेहरे पर अनगिनत किस करते हुए बोली - अंकुश मैं तुम्हें पसंद आ गयी, ये मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है. तुम्हारी ये छुअन, तुम्हारी आवाज़ सुनकर मेरे दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं. आई लव यू जान.
मैं - आई लव यू टू निशा. तुम्हारी खुशबू, तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारा तो रूप ही कुछ ऐसा है कि, मैं उसमें खो जाता हूँ. अब तुम अपने कपड़े पहन लो, तुम्हारे रूप रस का पान कर के मैं धन्य हो गया.
निशा ने फिर एक बार मुझे कसकर अपने गले लगाया और कपड़े पहन कर रूम से बाहर निकल गयी मेरे लिए दूध लेने. मैं खुद पर आश्चर्य चकित था, कि एक कमसिन बाला. पूर्ण रूप से नग्न मेरे सामने थी और मेरे मन में एक बार भी उसे भोगने की इच्छा तक नहीं हुई. क्या ये मेरा निशा के लिए निश्चल प्रेम था? जो शायद मेरी जिंदगी में पहली और आख़िरी बार हुआ था. दूसरे दिन सुबह-सुबह मैं निशा और उसके मम्मी पापा से विदा लेकर अपने घर वापस चल दिया.
निशा मुझे गांव के बाहर तक छोड़ने आई. विदा होते वक़्त स्वतः ही हम दोनों की आँखें छलक गयीं. हम एक दूसरे को किस कर के अंतिम बार गले मिले. फिर एक दूसरे को बाइ बोलकर अपने-अपने घर को चल दिए.
रास्ते में ही शांति बुआ का घर पड़ता था, जो निशा के गांव से ज़्यादा दूर नहीं था, तो सोचा बुआ का हाल चाल पूछते हुए ही निकलता हूँ. कभी आया तो नहीं था पहले बुआ के यहाँ, तो लोगों से घर का पता पूछ कर पहुँचा उनके दरवाजे पर.
बुलेट की आवाज़ सुन कर एक लड़की घर के अंदर से भागती हुई आई. मैं उस लड़की को देखता ही रह गया. स्कूल यूनिफॉर्म में वो शायद स्कूल जाने के लिए तैयार ही हुई थी, सफेद रंग की शर्ट और स्लेटी लाल चौखाने रंग की घुटनों तक की स्कर्ट में वो एक बहुत ही सुंदर गुड़िया जैसी लगी मुझे.
उसकी कसी हुई शर्ट में क़ैद 32-33” के उसके चुचे बटन तोड़कर बाहर निकलने को आतुर हो रहे थे. पतली सी कमर के नीचे थोड़ी उठी हुई गान्ड, देख कर मेरे अंदर कुछ–2 होने लगा.
अपनी बड़ी-2 कजरारी आँखें मटका कर वो बोली – कौन हो तुम?? किससे मिलना है?
मैं – शांति बुआ का घर यही है?
वो – हां, लेकिन तुम कौन हो जो मम्मी को बुआ बोल रहे हो?
मैं – ओह तो तुम उनकी बेटी हो… मेरा नाम अंकुश है, अभी कुछ दिन पहले मेरे भैया की शादी थी, तुम उसमें शामिल नहीं हुई थी.
वो – ओह अंकुश भैया. नमस्ते, सॉरी, मैंने आपको पहचाना नहीं, आओ.. आओ… फिर वो बुआ को आवाज़ देते हुए चिल्लाई. मम्मी… मम्मी…
अंदर से बुआ की आवाज़ आई - क्या है तनु, देख नहीं रही. तेरे लिए नाश्ता तैयार कर रही हूँ, स्कूल के लिए लेट हो रहा है.
तब तक मैं बाइक खड़ी कर के उसके पीछे–2 अंदर आया, उसके मटकते कूल्हे मुझे अपनी ओर लुभा रहे थे.
वो – मम्मी थोड़ा बाहर आकर देखो तो सही, कौन आया है?
बुआ अपने माथे का पसीना अपने पल्लू से पोंछती हुई रसोई से बाहर आई और मुझे देखते ही, अरे अंकुश!!!, चिल्लाते हुए दौड़कर मेरे सीने से लग गयी.
उनकी ये हरकत देख कर पास खड़ी तन्वी अपनी बड़ी–2 आँखें फाड़े उन्हें देखने लगी.
मैंने बुआ से पूछा – बुआ ये आपकी बेटी है?
बुआ – हां, बड़ी वाली तन्वी. तूने देखा तो है इसे कई बार गांव गयी है मेरे साथ.
मैं – ये वही तन्वी है ना? जिसकी नाक बहती रहती थी.
बुआ हँसते हुए बोली – हेहेहे… हां, वही तन्वी है, अब देख. अब नहीं बहती इसकी नाक.
तन्वी गुस्सा होते हुए बोली – क्या मम्मी आप भी चिढ़ाने लगी मुझे? फिर वो मेरी तरफ आँखें तरेर कर बोली.
तन्वी - आपने कब देखी मेरी नाक बहते हुए? हां??
बुआ – अरे नहीं बेटा, एक बार जब में तुझे लेकर गांव गयी थी, तब तुझे सर्दी हो गयी थी. तो तब कि बात कर रहा है अंकुश.
वैसे बड़े भाई की बात का क्या बुरा मानना. बेटा तू बैठ पहले मैं इसको स्कूल भेज दूं. फिर बैठ कर बात करते हैं. ठीक है और वो फिर से रसोई में घुस गयीं. तन्वी मुझे घूर-2 कर देख रही थी.
मैंने कहा – माफ़ करना मेरी गुड़िया, मैं तो ऐसे ही मज़ाक कर रहा था. तुझे बुरा लगा तो सॉरी और मैंने अपने कान पकड़ लिए तो वो खुश हो गयी.
तन्वी – कोई बात नहीं भैया.
फिर वो बुआ को आवाज़ देकर बोली – मम्मी जल्दी करो मैं लेट हो रही हूँ.
मैंने कहा – कितना दूर है तेरा स्कूल?
तन्वी – अरे भैया. दूसरे गांव में है, यहाँ से 3 किमी दूर है और मुझे साइकल से जाना पड़ता है, फिर घड़ी की तरफ देख कर बोली – ओफ़्फओ… मैं तो ऑलरेडी लेट हो गयी. अब पहला पीरियड तो मिलने वाला नहीं है. मम्मी… जल्दी करो… प्लीज़…
बुआ – अभी लाई. बस दो मिनिट.
मैं – तू कहे तो मैं छोड़ दूं तुझे स्कूल.
तन्वी – फिर उधर से कैसे आऊंगी?
तब तक बुआ किचन से उसका टिफ़िन बना कर ले आई और बोली – स्कूल छूटने के बाद भैया ही ले आएगा तुझे. क्यों अंकुश?? ले आएगा ना?
मैं – मुझे तो जाना था बुआ अभी. वो मैं निशा को छोड़ने आया था, लौटते में सोचा आपसे भेंट करता चलूं.
बुआ – अरे तो शाम को चले जाना. अभी सुबह-सुबह क्या करेगा घर जाकर?
मैंने कहा - ठीक है, फिर चल तन्वी. तुझे स्कूल छोड़ देता हूँ.
दूसरे गाँव का रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ था. तन्वी मेरे पीछे दोनों ओर को पैर कर के बैठी थी. कभी ब्रेक लगाने पड़ते थे तो वो मेरे से सट जाती. और उसके कच्चे अनार मेरी पीठ पर दब जाते. फिर जब गाड़ी उछलती तो वो रगड़ जाते. मेरा लंड उसके स्पर्श से ही सर उठाने लगा था. एक बार तो ज़ोर से ब्रेक लगते–2 भी गाड़ी एक खड्डे मैं चली ही गयी और ज़ोर से उछल गयी. अब बुलेट पर पीछे कुछ ज़्यादा ही झटका लगता है तो पहले तो वो मेरे ऊपर गिरी और फिर ऊपर को उछली, जिसकी वजह से उसके अनार तो पीठ से रगडे ही साथ ही उसकी चूत भी मेरी कमर से रगड़ा खा गयी, और वो ज़ोर से सिसक पड़ी. शायद उसको भी मज़ा आया होगा.
मैंने कहा – क्या हुआ तन्वी?
तन्वी – भैया धीरे–धीरे चलाओ, ये रास्ता बहुत खराब है, साइकल से चलना भी मुश्किल हो जाता है.
मैं – हां वो तो मैं देख ही रहा हूँ, पता नहीं लोगों का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं जाता.
खैर जैसे तैसे कर के हम उसके स्कूल पहुँच ही गये, उसे स्कूल छोड़ कर मैं बुआ के घर वापस आ गया. जब मैं घर लौटा तो बुआ घर में झाड़ू लगा रही थी. वो एक लो कट गले की नाईट ड्रेस पहने हुए थी. झुक कर झाड़ू लगाने से उनके बड़े-2 खरबूज जैसे स्तन लटक कर बाहर को झाँक रहे थे. मैं वहीं खड़ा होकर ये नज़ारा देख रहा था, कि इतने में उनकी नज़र पड़ गयी और सीधी खड़े होते हुए हंस कर बोली.
शांति बुआ – क्यों रे बदमाश, क्या देख रहा था?
मैंने भी हँसते हुए कहा – कुछ नहीं बुआ, तुम्हारा समान सामने आ गया तो देखने लगा.
शांति बुआ – चल बैठ मैं थोड़ी देर में झाड़ू मारकर फिर बैठती हूँ तेरे पास.
मैंने बुआ से पूछा – बुआ बाकी लोग कहाँ गये?
शांति बुआ – तेरे फूफा इस समय खेतों में होते हैं. छोटी यहीं गाँव के स्कूल में है, उसका स्कूल जल्दी शुरू हो जाता है, दो घंटे में आ भी जाएगी.
इतना बोलकर वो फिर से झुककर झाड़ू मारने लगी, टाइट नाईट ड्रेस में बुआ की चौड़ी गान्ड झुकने से और ज़्यादा बड़ी दिख रही थी. शायद वो नीचे पैंटी भी नहीं पहने थी, जिस कारण से उसके दो पाटों के बीच की दरार किसी नाली की तरह साफ-साफ दिखाई दे रही थी. सोने पे सुहागा ये था, कि जब वो खड़ी हुई थी, तो टाइट नाईट ड्रेस का कपड़ा शांति बुआ की गान्ड की दरार में फँस गया था, जो अभी तक बेचारा निकलने के लिए फड़फड़ा रहा था. लेकिन दोनों पाटों का दबाव इतना ज़्यादा था, कि वो वहाँ से टस से मस नहीं हो पाया. बुआ की गान्ड के नज़ारे ने मेरे लंड की ऐसी तैसी कर दी, वो साला जीन्स के अंदर फड़फड़ाने लगा.
मैं चुपके से बुआ के पीछे गया, और उसकी गान्ड से जाकर चिपक गया. शांति बुआ तो एकदम से हिल ही गयी, और अपनी गान्ड को मेरे लंड पर और ज़ोर से दबा दिया, तो मैंने भी झुक कर बुआ के खरबूजों को पकड़ लिया.
बुआ झाड़ू छोड़कर खड़ी हो गयी, और अपनी गान्ड को मेरे लंड के आगे दबाते हुए बोली – अंकुश थोड़ा सा तो सब्र कर ले. मुझे पता है, तुझे मेरी गान्ड ने परेशान कर रखा है. ये हरामजादी दिनों दिन चौड़ी ही होती जा रही है.
मैंने बुआ की चुचियों को मसलते हुए कहा – लगता है, फूफा जी, इस पर ज़्यादा ध्यान देते हैं. तभी ये चौड़ी होती जा रही है.
बुआ – ना अंकुश, उन्हें गान्ड मारने का शौक नहीं है पर वो ज़्यादा तर पीछे से ही करते हैं. अब छोड़ मुझे झाड़ू मारने दे. फिर आराम से बैठते हैं.
मैंने झुक कर बुआ की टाइट नाईट ड्रेस को उठाकर उनकी गान्ड को नंगा करते हुए कहा – इतना समय नहीं है बुआ. मेरा लंड अब और इंतजार नहीं कर पाएगा.
इतना कह कर मैंने अपनी जीन्स उतार दी, और फ्रेंची की साइड से लंड बाहर निकाल कर बुआ की गान्ड की दरार में फँसा कर ऊपर से नीचे रगड़ने लगा. मेरे नंगे लंड का अहसास अपनी नंगी गान्ड पर होते ही बुआ सारी ना नुकुर भूल गयी, और अपनी आँखें बंद कर के उसने अपने हाथ सामने की दीवार पर टिका दिए. मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जा कर बुआ की मालपुए जैसी चूत को मुट्ठी में भर कर मसल दिया.
बुआ की चूत रस छोड़ने लगी, उसने भी अपना हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख कर और दबा दिया, और सिसकते हुए बोली – सस्सिईईई. हाईएरे. ये क्या कर दिया तूने. मेरी चूत में आग लगा दी. अब और देर मत कर.
मैंने अपनी दो उंगलियाँ बुआ की चूत में डाल दी. और अंदर बाहर करने लगा. चूत हद से ज़्यादा गीली हो गयी. फिर मैंने बुआ की नाईट ड्रेस को उसके सर के ऊपर से निकाल कर उसे पूरी तरह नंगा कर दिया. अपने लौड़े को थूक लगा कर गीला किया, और बुआ की गीली चूत में पेल दिया. सरसराता हुआ मेरा साढ़े आठ इंच लंबा और सख्त रॉड जैसा लंड जैसे ही जड़ तक बुआ की चूत में गया, थप्पाक से मेरी जांघें उसके भारी चुतड़ों पर पड़ी, और इसी के साथ ही बुआ के मुँह से एक लंबी कराह निकल गयी.
शांति बुआ - हआइईईई रीई ए… बेरहम… नाशपीटे… मार डाला रे ज़ालिम… ई… ई… ई…, थोड़ा आराम से डालता. फाड़ दी मेरी चूत...
लेकिन मैंने अनसुना करते हुए, अपने धक्के शुरू कर दिए, और बुआ की धक्कमपेल चुदाई शुरू कर दी. एक बार खड़े-खड़े चोदने के बाद, जब वो झड़ गयी, तो फिर हम सोफे पर आ गये. बुआ को घोड़ी बना कर पहले कुछ देर उसकी चूत मारी, उसके बाद मैंने अपना लंड उसकी गद्देदार गान्ड में पेल दिया. उलट पलट कर मैंने शांति बुआ को अच्छे से रगड़-रगड़ कर दो बार चोदा. बुआ की सारी खुजली मिट गयी.
मैंने कहा – शांति बुआ देख लो मैंने आपका चैलैंज पूरा कर दिया. फिर मत कहना.
शांति बुआ – हां रे अंकुश. तू सच में मर्द हो गया है, मेरे जैसी दो बच्चों की औरत को बहुत ही मस्त चोदा और गांड भी मस्त तरीके से मारी.
उसके बाद उन्होंने मेरे लिए चाय बनाई, और अपना काम खतम कर के नहाने चली गयी. इतने में फूफा भी आ गये, और उसके कुछ देर बाद उनकी छोटी बेटी भी स्कूल से आ गयी. सबने मिलकर खाना खाया, उसके बाद मैं तन्वी को लेने उसके स्कूल चला गया. तन्वी ने घर आकर बताया कि कल से उसकी रक्षाबन्धन की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं जो जन्माष्टमी तक चलेगी.
तो मैंने कहा - बुआ ये वैसे भी भैया की शादी में नहीं जा पाई थी, क्यों ना इसे मैं अपने साथ ले जाऊं. रमा दीदी के साथ इसका मन भी लगा रहेगा.
मेरी बात सुन कर तन्वी भी कहने लगी - हां मम्मी मैं भैया के साथ जाऊंगी. मैंने मामा, मामियों को कब से नहीं देखा.
फूफा जी ने भी हां कर दी तो फिर बुआ ने उसे परमिशन दे ही दी, और उसी शाम मैं तन्वी को लेकर अपने घर वापस लौट लिया. रास्ते में बहुत ज़्यादा कुछ नहीं हुआ, मैं बस थोड़ा बहुत उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में ही पूछा. लेकिन स्कूल जाते-आते वक़्त की हल्की सी मस्ती याद आते ही, तन्वी ने थोड़ी बहुत हरकतें ऐसी की जो हम दोनों के शरीर में मस्ती भरने के लिए काफ़ी थी.
तन्वी को मेरे साथ देख कर भाभी ने पूछा – अरे देवर जी ये कौन है? एक को लेकर गये थे, और दूसरी के साथ लौटे हो. ये क्या चक्कर है भाई.
मैंने हँसते हुए कहा – कोई चक्कर नहीं है भाभी, ये शांति बुआ की बेटी तन्वी है. आप नहीं जानती इसको.
मेरे बताते ही रमा दीदी ने उसे पहचान लिया. और वो उसके गले लग गयी. फिर कुछ देर इधर-उधर की बातें की और अपने घर गाँव के हाल चाल पुछे. खैर इसी तरह आज का दिन भी शांति से समाप्त हुआ.